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पापियों के लिए झूठी सांत्वनाएँ
“तुम्हारे उत्तरों में तो झूठ ही पाया जाता है, इसलिये तुम क्यों मुझे व्यर्थ शान्ति देते हो?” अय्यूब 21:34
अय्यूब के तीनों मित्र इसी बात पर अड़े रहे कि जो विपत्तियाँ वह भोग रहा था, वे उसके पापों के दण्ड के रूप में भेजी गई थीं, और इस बात का निर्णायक प्रमाण थीं कि वह कपटी है, और वैसा भला मनुष्य नहीं है जैसा होने का वह दावा करता है। इस पर एक लम्बा वाद-विवाद हुआ, जिसमें अय्यूब ने बीते हुए सारे अनुभव का हवाला देकर यह सिद्ध किया कि इस संसार में मनुष्यों के साथ उनके चरित्र के अनुसार व्यवहार नहीं किया जाता; कि परमेश्वर के विधान के बँटवारों में यह भेद नहीं रखा जाता। उसके मित्रों ने इसके विपरीत बात पर ज़ोर दिया, और यह संकेत किया कि यह संसार भी प्रतिफल और दण्ड का स्थान है, जिसमें मनुष्य अपने कामों के अनुसार भला या बुरा पाते हैं। इस अध्याय में अय्यूब सामान्य बुद्धि, सामान्य अवलोकन और अनुभव की दुहाई देकर यह दिखाता है कि यह सच नहीं हो सकता, क्योंकि यह एक प्रत्यक्ष तथ्य है कि दुष्ट लोग अक्सर संसार में और जीवन भर समृद्ध रहते हैं, और इसलिए वह यह निष्कर्ष निकालता है कि उनका न्याय और दण्ड अवश्य ही आनेवाली अवस्था के लिए रखा गया होगा। “दुष्ट जन विनाश के दिन के लिये रखा जाता है,” और “वे उसके कोप के दिन के लिये निकाले जाएँगे।” और क्योंकि उसके मित्र उसे सांत्वना देने आए थे, परन्तु इस मूलभूत बात के विषय में अँधेरे में होने के कारण वे उसकी दशा को समझ नहीं पाए थे, और इसलिए उसे कोई सांत्वना न दे सके, वरन् उसके दुःख को और बढ़ा दिया, इसलिए अय्यूब इस बात पर अड़ा रहा कि वह फिर भी सांत्वना के लिए आनेवाली अवस्था की ही ओर देखेगा, और अपने प्राण की कड़वाहट में यह पुकारकर उन्हें डाँटता है, “तुम्हारे उत्तरों में तो झूठ ही पाया जाता है, इसलिये तुम क्यों मुझे व्यर्थ शान्ति देते हो?”
मेरा वर्तमान उद्देश्य यह है कि चिन्तित पापियों को सांत्वना देने में जो अनेक तरीके काम में लाए जाते हैं, उन पर कुछ टिप्पणियाँ करूँ, और मेरा विचार है:
I. संक्षेप में चिन्तित पापियों को शिक्षा देने की आवश्यकता और उद्देश्य पर ध्यान देना।
II. यह दिखाना कि चिन्तित पापी सदा सांत्वना की खोज में रहते हैं। उनका सबसे बड़ा लक्ष्य यही होता है कि अपने संकट में सांत्वना पा लें।
III. उन झूठी सांत्वनाओं में से कुछ पर ध्यान देना जो अक्सर दी जाती हैं।
I. चिन्तित पापियों को शिक्षा देने की आवश्यकता और उद्देश्य।
चिन्ता का विचार ही यह बताता है कि कुछ शिक्षा मिल चुकी है। कोई पापी अपनी आनेवाली अवस्था के विषय में बिलकुल भी चिन्तित न होता, यदि उसके पास इतना प्रकाश न होता कि वह जान सके कि वह पापी है, और कि वह दण्ड के खतरे में है और उसे क्षमा की आवश्यकता है। परन्तु मनुष्यों का मन-परिवर्तन न तो शारीरिक बल से होता है, और न ही सृजनहार सामर्थ द्वारा उनके स्वभाव या बनावट में किए गए किसी परिवर्तन से, वरन् उस सत्य के द्वारा होता है जिसे पवित्र आत्मा प्रभावशाली बनाता है। मन-परिवर्तन सत्य के आगे झुक जाना है। और इसलिए, अन्य बातें समान होने पर, जितना अधिक सत्य मन पर डाला जा सके, उतनी ही अधिक सम्भावना है कि उस व्यक्ति का मन-परिवर्तन होगा। जब तक सत्य उस पर डाला न जाए, यह निश्चित है कि उसका मन-परिवर्तन नहीं होगा। यदि सत्य उस पर डाला जाए, तो यह पूर्णतः निश्चित नहीं कि वह प्रभावशाली होगा, परन्तु सम्भावना उसी अनुपात में होती है जिस हद तक सत्य उस पर डाला जाता है। किसी चिन्तित पापी से व्यवहार करने का महान उद्देश्य यह है कि उसकी सारी कठिनाइयाँ और अन्धकार दूर कर दिए जाएँ, उसकी सब भूलें मिटा दी जाएँ, उसकी स्व-धार्मिक आशाओं की नींव खोद डाली जाए, और हर वह चिह्न तक बुहार दिया जाए जिससे वह अपने आप में कोई सांत्वना पा सकता था। इसमें अक्सर बहुत कठिनाई होती है, और बहुत शिक्षा की आवश्यकता पड़ती है। पापी अक्सर अपने झूठे सहारों से मृत्यु की सी पकड़ के साथ चिपटे रहते हैं। राहत पाने के लिए पापी जिस स्थान की ओर सबसे अन्त में जाता है, वह यीशु मसीह है। पापी संसार के किसी भी और मार्ग से उद्धार पाना अधिक पसन्द करेंगे। वे कोई भी बलिदान करने, कोई भी खर्च उठाने, या कोई भी कष्ट सहने को तैयार रहेंगे, बजाय इसके कि वे बस दोषी और खोए हुए विद्रोहियों के रूप में उद्धार के लिए केवल मसीह पर अपने आप को डाल दें। यही वह सबसे अन्तिम मार्ग है जिससे वे कभी उद्धार पाने को तैयार होते हैं। यह उनकी सारी स्व-धार्मिकता को काट डालता है, और उनके घमण्ड और आत्म-सन्तोष को ऐसा पूरी तरह मिटा देता है कि वे इसे अपनाने के लिए अत्यन्त अनिच्छुक रहते हैं। परन्तु यह बात तर्क की दृष्टि से भी उतनी ही सच है जितनी तथ्य की दृष्टि से, कि आखिरकार यही एकमात्र मार्ग है जिससे पापी को राहत मिल सकती है। यदि परमेश्वर पापियों के घमण्ड को नम्र किए बिना और उन्हें उनके पापों से फेरे बिना उन्हें राहत देने और उनका उद्धार करने का प्रयत्न करता, तो वह ऐसा नहीं कर सकता था। अब किसी चिन्तित पापी को शिक्षा देने का उद्देश्य यह होना चाहिए कि उसे यथासम्भव सबसे छोटे मार्ग से यह करने तक पहुँचाया जाए। अर्थात् उसके मन को सबसे छोटे रास्ते से इस व्यावहारिक निष्कर्ष तक लाया जाए कि वास्तव में उसके राहत पाने और उद्धार पाने का कोई और मार्ग नहीं, सिवाय इसके कि वह अपने आप का इन्कार करे और केवल मसीह पर भरोसा रखे। इसे प्रभावशाली ढंग से करने के लिए बड़े कौशल की आवश्यकता है। इसके लिए मानव-हृदय का पूरा ज्ञान, उद्धार की योजना की स्पष्ट समझ, और उस ठीक-ठीक बात का सटीक और निश्चित विचार आवश्यक है जो उद्धार पाने के लिए पापी को अवश्य ही करनी है। इसे प्रभावशाली ढंग से करना जानना आज के समय सेवकाई में सबसे दुर्लभ योग्यताओं में से एक है। यह देखकर दुःख होता है कि ऐसे पादरी और धर्म का अंगीकार करनेवाले कितने कम हैं जिनके अपने मन में उस करने योग्य बात का ऐसा स्पष्ट विचार हो कि वे किसी चिन्तित पापी के पास जाकर उसे ठीक-ठीक बता सकें कि उसे क्या करना है और कैसे करना है, और उसे स्पष्ट रूप से दिखा सकें कि जो बात वे उसे बता रहे हैं, उसी को करने के सिवाय उसके उद्धार पाने का कोई भी सम्भव मार्ग नहीं, और उसे इस बात की निश्चितता का अनुभव करा सकें कि उसे यह अवश्य करना है, और कि जब तक वह ठीक वही बात न करे, वह दण्ड की आज्ञा पाएगा।
II. मुझे यह दिखाना है कि चिन्तित पापी सदा सांत्वना की खोज में रहते हैं।
पापी अक्सर कल्पना करते हैं कि वे यीशु मसीह को खोज रहे हैं, और धर्म को खोज रहे हैं, परन्तु यह भूल है। किसी भी व्यक्ति ने कभी धर्म की खोज नहीं की और फिर भी अधर्मी बना रहा हो। धर्म क्या है? यह परमेश्वर की आज्ञा मानना है। धर्म की खोज करना परमेश्वर की आज्ञा मानने की खोज करना है। जो प्राण धार्मिकता का भूखा और प्यासा है, वह एक मसीही का प्राण है। यह कहना कि कोई व्यक्ति परमेश्वर की आज्ञा मानने की खोज कर सकता है और फिर भी उसकी आज्ञा न माने, बेतुका है। क्योंकि यदि वह धर्म की खोज कर रहा है, तो वह पश्चाताप न करनेवाला पापी नहीं है। धर्म की खोज करने का अर्थ है परमेश्वर की आज्ञा मानने की इच्छा, और परमेश्वर की आज्ञा मानने की इच्छा ही धर्म है। यह कहना कि पश्चाताप न करनेवाला पापी धर्म की खोज कर रहा है, अपने आप में विरोधाभास है। यह ऐसा ही कहना है कि वह परमेश्वर की आज्ञा मानने की खोज करता है और सचमुच उसके लिए लालायित है, और परमेश्वर उसे ऐसा करने नहीं देता, या कि वह यीशु मसीह को अपनाने के लिए लालायित है, और मसीह उसे आने नहीं देता। सच तो यह है कि चिन्तित पापी एक आशा की खोज कर रहा है, वह क्षमा, सांत्वना और नरक से छुटकारे की खोज कर रहा है। वह बड़ी चिन्ता से किसी ऐसे व्यक्ति को ढूँढ़ रहा है जो उसे सांत्वना दे और उसे कुछ अच्छा महसूस कराए, और उसे सुसमाचार की उन जैसी दीन करनेवाली शर्तों के अनुसार चलने के लिए विवश न होना पड़े। और उसकी चिन्ता और व्याकुलता केवल इसलिए बनी रहती है कि वह उन शर्तों के आगे झुकना नहीं चाहता। दुर्भाग्य से, चिन्तित पापियों को अपनी रुचि के अनुसार सांत्वना देनेवाले बहुत मिल जाते हैं। और वे सब के सब निकम्मे सांत्वना देनेवाले भी हैं, “क्योंकि उनके उत्तरों में तो झूठ ही पाया जाता है।” इसमें सन्देह नहीं कि लाखों-लाखों लोग आज नरक में हैं, क्योंकि उनके आस-पास ऐसे लोग थे जिन्होंने उन्हें झूठी सांत्वना दी, जिनमें इतनी झूठी दया थी, या जो स्वयं इतने अन्धकार में थे, कि उन्होंने उन्हें तब तक चिन्ता में रहने न दिया जब तक वे अपने हृदय परमेश्वर को समर्पित न कर दें, वरन् उन्हें झूठ पिलाया, और इस रीति से उनकी व्याकुलता दूर कर दी, और अब उनके प्राण खो गए हैं।
III. मुझे उन कई तरीकों पर ध्यान देना है जिनसे चिन्तित पापियों को झूठी सांत्वना दी जाती है।
मैं लगभग यह कह सकता हूँ कि यह काम करने के तरीकों की कोई गिनती नहीं। जितना अधिक मेरा अनुभव बढ़ता है, और जितना अधिक मैं उन तरीकों को देखता हूँ जिनसे भले लोग भी चिन्तित पापियों से व्यवहार करते हैं, उतना ही अधिक मुझे उन अनगिनत मूर्खताओं और झूठी बातों पर दुःख होता है जिनसे वे अपने चिन्तित मित्रों को सांत्वना देने का प्रयत्न करते हैं, और इस प्रकार वास्तव में उन्हें धोखा देते हैं और बहकाकर उन्हें उनके उद्धार से वंचित कर देते हैं। इससे मुझे अक्सर उस ढंग की याद आती है जिससे लोग किसी के बीमार पड़ने पर व्यवहार करते हैं। आप में से कोई भी लगभग संसार के किसी भी रोग से बीमार पड़ जाए, तो आप पाएँगे कि जो भी व्यक्ति आपसे मिलता है, उसके पास उस रोग का कोई उपाय है, कोई पक्का इलाज, कोई अचूक दवा, कोई सर्वरोगहारी औषधि; और आप अपने चारों ओर नीम-हकीमी का ऐसा संसार पाएँगे कि यदि आप सावधान न रहें और उस सब को पूरी तरह बाहर न रखें, तो आप निश्चय ही अपनी जान गँवा बैठेंगे। मनुष्य को अपनी ही समझ से काम लेना पड़ता है, क्योंकि उसे उतने ही उपाय मिलेंगे जितने उसके मित्र हैं, और हर एक अपनी दवा पर अड़ा रहता है, और यदि वह न ली जाए तो शायद बुरा भी मानेगा। और इसमें सन्देह नहीं कि यह निकम्मी नीम-हकीमी बहुत से लोगों की जान ले लेती है।
यह बात शरीर के रोगों के विषय में जितनी सच है, मन के रोगों के विषय में उससे किसी भी प्रकार कम सच नहीं। व्याकुल प्राणों को सांत्वना देने के लिए लोगों के पास अपनी अचूक दवाएँ, अपनी सर्वरोगहारी औषधियाँ और अपने रामबाण नुस्खे होते हैं, और जब भी वे किसी चिन्तित पापी से बात करने लगते हैं, तो अपनी झूठी सांत्वनाएँ इतनी अधिक ले आते हैं कि यदि वह सावधान न रहे, और परमेश्वर के वचन पर ध्यान न दे, तो वह निश्चय ही धोखा खाकर अपने ही विनाश को पहुँचेगा। मेरा विचार है कि मैं उन झूठी बातों में से कुछ का उल्लेख करूँ जो चिन्तित पापियों को सांत्वना देने के प्रयत्न में अक्सर सामने लाई जाती हैं। उन सब के नाम गिनाने के लिए भी मेरे पास समय न रहेगा।
बहुत से लोगों का सीधा उद्देश्य पापियों को सांत्वना देना होता है, और वे इसमें अक्सर इतने लगे रहते हैं कि साधनों या सांत्वना के प्रकार की कोई परवाह नहीं करते। वे अपने मित्रों को व्याकुल देखते हैं, और उन पर तरस खाते हैं, उनके मन में बड़ी करुणा उमड़ती है, “ओह, ओह, मैं उन्हें ऐसा व्याकुल नहीं देख सकता, मुझे किसी न किसी तरह उन्हें सांत्वना देनी ही होगी,” और इसलिए वे एक तरीका आज़माते हैं, फिर दूसरा, और यह सब उन्हें सांत्वना देने के लिए! अब, परमेश्वर चाहता है कि उन्हें सांत्वना मिले। वह परोपकारी है, और उसकी भावनाएँ कृपालु हैं, और जब वह उन्हें ऐसा व्याकुल देखता है तो उसका हृदय उनके लिए तरसता है। परन्तु वह देखता है कि पापी को सच्ची सांत्वना देने का केवल एक ही मार्ग है। उसमें सब मनुष्यों से बढ़कर परोपकार और करुणा है, और वह उन्हें सांत्वना देना चाहता है। परन्तु जिन शर्तों पर वह पापी को राहत देगा, उन्हें उसने अपने सिंहासन के समान अटल ठहराया है। और वह उन्हें नहीं बदलेगा। वह जानता है कि और कोई बात पापी का प्रभावशाली भला नहीं करेगी, क्योंकि जब तक वह अपने पापों से पश्चाताप करके उन्हें त्याग न दे और परमेश्वर की ओर न फिरे, तब तक कोई भी बात उसे सुखी नहीं कर सकती। और इसलिए परमेश्वर नहीं झुकेगा। हमारा उद्देश्य भी वही होना चाहिए जो परमेश्वर का है। हमें भी वैसी ही करुणा और परोपकार का अनुभव करना चाहिए जैसा वह करता है, और सांत्वना देने को उतना ही तैयार रहना चाहिए, परन्तु यह निश्चित कर लेना चाहिए कि वह सही प्रकार की हो। सच तो यह है कि हमारा प्रमुख उद्देश्य पापी को परमेश्वर की आज्ञा मानने के लिए प्रेरित करना होना चाहिए। उसकी सांत्वना हमारे लिए भी और उसके लिए भी केवल गौण उद्देश्य होनी चाहिए, और जब तक हम इस बात के लिए अधिक चिन्तित हैं कि उसकी व्याकुलता दूर हो, बजाय इसके कि वह परमेश्वर का अपमान और निरादर करना छोड़ दे, तब तक यह सम्भावना नहीं कि हम अपनी शिक्षा से उसका कोई सच्चा भला करेंगे। चिन्तित पापियों से व्यवहार करने में यह एक मूलभूत भेद है, परन्तु स्पष्ट है कि बहुत से लोग इसकी अनदेखी करते हैं, जिनका पापी के प्रति सहानुभूति या करुणा से ऊँचा कोई उद्देश्य दिखाई नहीं देता। यदि सुसमाचार का प्रचार करने में, या चिन्तित लोगों को शिक्षा देने में, हम परमेश्वर के आदर के प्रति ऊँचे सम्मान से प्रेरित नहीं होते, और व्याकुल लोगों की व्याकुलता दूर करने की इच्छा से ऊपर नहीं उठते; तो यह उससे आगे नहीं जाना है जहाँ तक स्वाभाविक सहानुभूति या करुणा हमें ले जाती। इस सिद्धान्त की अनदेखी ने अक्सर धर्म का अंगीकार करनेवालों को भटका दिया है, और जब उन्होंने दूसरों को चिन्तित पापियों से विश्वासयोग्यता के साथ व्यवहार करते सुना है, तो उन पर क्रूरता का दोष लगाया है। अक्सर धर्म का अंगीकार करनेवाले चिन्तित पापियों को मेरे पास लाए हैं, और मुझसे विनती की है कि मैं उन्हें सांत्वना दूँ, और जब मैंने उनके विवेक को गहराई तक टटोला है, तो वे काँप उठे हैं, और कभी-कभी पापियों का पक्ष भी लेने लगे हैं। कभी-कभी चिन्तित युवाओं से उनके माता-पिता की उपस्थिति में प्रभावशाली ढंग से व्यवहार करना असम्भव होता है, क्योंकि उनमें परमेश्वर के आदर के प्रति सम्मान से कहीं अधिक अपने बच्चों के लिए करुणा होती है। यह सब गलत है, और ऐसे विचारों और भावनाओं के साथ, चिन्तित लोगों से कुछ भी कहने की अपेक्षा अच्छा होगा कि आप अपनी जीभ को थामे रहें।
1. लोग व्याकुल पापियों को जिन तरीकों से झूठी सांत्वना देते हैं, उनमें से एक यह है कि वे उनसे पूछते हैं, “तुमने किया ही क्या है? तुम इतने बुरे नहीं हो।” वे उन्हें व्याकुल देखते हैं, और पुकार उठते हैं, “अरे, तुमने किया ही क्या है?” मानो उन्होंने कभी कोई दुष्ट काम किया ही न हो, और वास्तव में उनके पास व्याकुल होने का कोई कारण ही न हो। मैं पहले एक फैशनपरस्त महिला की घटना का उल्लेख कर चुका हूँ, जो इसी नगर में जागृत हुई थी, और एक पादरी से बातचीत करने के लिए उससे मिलने जा रही थी, कि रास्ते में उसे एक मित्र मिली, जिसने उसे वापस लौटा दिया, और यह पुकारकर उसकी चिन्ता भगा दी, “तुमने ऐसा क्या किया है कि तुम्हें ऐसा लगे? मुझे पक्का विश्वास है कि तुमने कभी कोई ऐसा पाप नहीं किया जिसके कारण तुम्हें ऐसा लगना चाहिए।”
मैंने इस प्रकार की घटनाएँ अक्सर देखी हैं। एक माँ अपने चिन्तित बेटे से कहेगी कि वह सदा कैसा आज्ञाकारी बच्चा रहा है, कितना भला और कितना दयालु, और उससे विनती करेगी कि वह इतना दुःख न माने। इसी प्रकार पति अपनी पत्नी से, या पत्नी अपने पति से कहेगी कि वे कितने भले हैं, और पूछेगी, “तुमने किया ही क्या है?” जब वे उन्हें बड़े संकट में देखते हैं, तो उन्हें सांत्वना देने लगते हैं, “अरे, तुम इतने बुरे नहीं हो। तुम उस डरावने पादरी को सुनने गए थे, जो लोगों को डराता है, और तुम उत्तेजित हो गए हो। धीरज धरो, क्योंकि मुझे पक्का विश्वास है कि तुम इतने बुरे नहीं रहे कि तुम्हें इतनी व्याकुलता हो।” जबकि सच यह है कि वे जितना सोचते हैं, उससे कहीं अधिक बुरे रहे हैं। किसी भी पापी को कभी यह विचार नहीं हुआ कि उसके पाप जितने हैं उससे बड़े हैं। किसी भी पापी को कभी इस बात का पूरा अनुमान नहीं हुआ कि वह कितना बड़ा पापी है। यह सम्भव नहीं जान पड़ता कि कोई मनुष्य अपने पापों का पूरा दृश्य देखकर जीवित रह सके। परमेश्वर ने दया करके पृथ्वी पर अपने सब प्राणियों को उस सबसे भयानक दृश्य से, अर्थात् एक खुले हुए मानव-हृदय से, बचा रखा है। पापी का दोष उसके विचार से कहीं अधिक गहरा और दण्ड के योग्य है, और उसका खतरा उसके विचार से कहीं अधिक बड़ा है, और यदि वह उन्हें वैसे ही देख ले जैसे वे हैं, तो शायद वह एक क्षण भी जीवित न रहे। हो सकता है कि इस विषय में पापी के कुछ झूठे विचार हों जो व्याकुलता उत्पन्न करते हों, और जिनकी कोई नींव न हो। वह सोच सकता है कि उसने अक्षम्य पाप कर डाला है, या कि उसने आत्मा को शोकित करके दूर कर दिया है, या पाप करते-करते अपने अनुग्रह के दिन को गँवा दिया है। परन्तु संसार के सबसे नैतिक और स्वभाव से सबसे मिलनसार व्यक्ति से भी यह कहना कि वह काफ़ी भला है, या कि वह उतना बुरा नहीं जितना वह अपने को समझता है, उसे विवेकपूर्ण सांत्वना देना नहीं, वरन् उसे धोखा देना, और उसके प्राण का सत्यानाश करना है। जो ऐसा करते हैं, वे सावधान रहें।
2. दूसरे लोग जागृत पापियों से कहते हैं कि “मन-परिवर्तन एक क्रमिक कार्य है,” और इस रीति से उनकी चिन्ता को हल्का कर देते हैं। जब कोई मनुष्य इसलिए व्याकुल होता है कि वह अपने आप को ऐसा पापी देखता है, और देखता है कि यदि वह परमेश्वर की ओर न फिरे तो दण्ड की आज्ञा पाएगा; तो उसके लिए यह बड़ी राहत की बात होती है कि कोई मित्र यह विचार सामने रखे कि वह धीरे-धीरे अच्छा हो सकता है, और कि वह अब थोड़ा-थोड़ा करके आगे बढ़ रहा है। वे उससे कहते हैं, “अरे, तुम यह आशा नहीं कर सकते कि सब कुछ एक साथ हो जाए; मैं इन अचानक होनेवाले मन-परिवर्तनों पर विश्वास नहीं करता, तुम्हें प्रतीक्षा करनी होगी और इसे काम करने देना होगा, तुमने अच्छी शुरुआत की है, और आगे चलकर तुम्हें सांत्वना मिल जाएगी।” यह सब अथाह कुंड के समान झूठ है। सच यह है कि नया जन्म, या मन-परिवर्तन, कोई क्रमिक कार्य नहीं है। नया जन्म क्या है? यह परमेश्वर की आज्ञाकारिता के आरम्भ के सिवाय और क्या है? और क्या किसी बात का आरम्भ क्रमिक होता है? यह परमेश्वर के प्रति सच्ची आज्ञाकारिता का पहला कार्य है—मन का वह पहला स्वैच्छिक कार्य जिसे परमेश्वर स्वीकार करता है, या जिसे परमेश्वर की आज्ञाकारिता माना जा सकता है। यही मन-परिवर्तन है। जब लोग मन-परिवर्तन को
एक क्रमिक कार्य बताते हैं, तो यह बेतुका है। वे दिखाते हैं कि वे नए जन्म या मन-परिवर्तन के विषय में उतना ही जानते हैं जितना नीकुदेमुस जानता था। जैसा उन्हें जानना चाहिए, वैसा वे इसके विषय में कुछ नहीं जानते, और वे चिन्तित खोजियों की सभा चलाने, या चिन्तित पापियों को सलाह या शिक्षा देने के लिए उससे अधिक योग्य नहीं हैं जितना नीकुदेमुस था।
3. एक और तरीका जिससे चिन्तित पापियों को झूठी सांत्वना देकर धोखा दिया जाता है, यह है कि उन्हें सलाह दी जाती है कि वे फ़िलहाल इस विषय को मन से निकाल दें।
जिन मनुष्यों को बुद्धिमान और भला समझा जाता है, उन्होंने अपने आप को परमेश्वर से इतना अधिक बुद्धिमान मान लिया है कि जब परमेश्वर अपने आत्मा के द्वारा किसी पापी से व्यवहार कर रहा होता है, और उसे तुरन्त निर्णय पर लाने का प्रयत्न कर रहा होता है; तो वे सोचते हैं कि परमेश्वर बहुत अधिक दबाव डाल रहा है, और उनका बीच में पड़ना आवश्यक है; और वे उस व्यक्ति को सलाह देंगे कि वह घूमने निकल जाए, या लोगों की संगति में जाए, या कारोबार में लग जाए, या कोई ऐसा काम करे जिससे उसके मन को कम से कम फ़िलहाल थोड़ी राहत मिले। वे परमेश्वर से साफ़ शब्दों में यह भी कह सकते थे, “हे परमेश्वर, तू बहुत कठोर है, तू बहुत तेज़ी से चल रहा है, तू उसे पागल कर देगा, या मार डालेगा, वह इसे सह नहीं सकता; बेचारा प्राणी, यदि उस पर इतना दबाव डाला गया तो वह मर जाएगा।” ठीक इसी प्रकार वे परमेश्वर के विरुद्ध पक्ष लेते हैं, और यह वैसा ही करते हैं मानो स्वयं पापी से कह रहे हों, “यदि तुम इस विषय को मन से न निकालो, और आत्मा का विरोध न करो, और उसे अपने मन से भगा न दो, तो परमेश्वर तुम्हें पागल कर देगा।”
यदि पापी को सचमुच पाप का बोध ही व्याकुल कर रहा हो, तो ऐसी सलाह किसी भी दशा में न तो सुरक्षित है और न उचित। किसी पापी को होश में लाने के लिए आत्मा का प्रयत्न करना उसे कभी हानि नहीं पहुँचाएगा, और न उसे पागल करेगा। वह विरोध करके अपने आप को विक्षिप्त कर सकता है, परन्तु यह सोचना निन्दा है कि परमेश्वर का धन्य, बुद्धिमान और परोपकारी आत्मा कभी इतनी असावधानी से काम करेगा कि उस प्राण को विक्षिप्त और नष्ट कर दे जिसे पवित्र करने और बचाने के लिए वह आया है। जब आत्मा का प्रयत्न पापी को व्याकुलता में डाल दे, तो उसके साथ उचित व्यवहार यह है कि उसे शिक्षा दी जाए, उसके विचारों को स्पष्ट किया जाए, उसकी भूलें सुधारी जाएँ, और उद्धार का मार्ग इतना सरल कर दिया जाए कि वह उसे ठीक अपने सामने देख सके। विषय को मन से निकालना नहीं, वरन् आत्मा के साथ सहमत हो जाना, और इस प्रकार उन सब भयानक पीड़ाओं को शान्त कर देना जो पवित्र आत्मा का विरोध करने से उत्पन्न होती हैं। स्मरण रखिए, यदि कोई जागृत पापी एक बार अपनी इच्छा से इस विषय को मन से निकाल दे, तो सम्भवतः वह फिर कभी इसे नहीं उठाएगा।
4. कभी-कभी जागृत पापी को यह कहकर सांत्वना दी जाती है कि धर्म बुरा महसूस करने में नहीं है। मैंने एक बार डॉक्टर ऑफ़ डिविनिटी की उपाधिवाले एक व्यक्ति के विषय में सुना जो एक चिन्तित पापी को ऐसी सलाह दे रहा था, जबकि वह सचमुच सर्वशक्तिमान के तीरों के नीचे छटपटा रहा था। उसने कहा, “धर्म आनन्दमय है, धर्म उदास नहीं है, व्याकुल मत हो, धीरज धरो, अपने भय दूर कर दो, तुम्हें इतना बुरा नहीं लगना चाहिए,” और ऐसी ही निकम्मी सांत्वनाएँ, जबकि वास्तव में उस मनुष्य के पास व्याकुल होने का असीम कारण था, क्योंकि वह पवित्र आत्मा का विरोध कर रहा था, और उसे सदा के लिए शोकित करके दूर कर देने के खतरे में था।
यह सच है कि धर्म बुरा महसूस करने में नहीं है। परन्तु पापी के पास व्याकुल होने का कारण है, क्योंकि उसके पास धर्म नहीं है। यदि उसके पास धर्म होता, तो उसे ऐसा न लगता। यदि वह मसीही होता, तो आनन्द करता। परन्तु पश्चाताप न करनेवाले पापी से प्रसन्न रहने को कहना! अरे, आप यह सिद्धान्त नरक में भी प्रचार कर सकते हैं, और वहाँ के लोगों से कह सकते हैं, “यहाँ खुश रहो, खुश रहो, इतना बुरा मत मानो।” पापी तो नरक के ठीक किनारे पर है, वह परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह में है, और उसका खतरा उसकी कल्पना से असीम रूप से बड़ा है। ओह, यह कैसा दुष्टात्माओं का सिद्धान्त है! कि स्वर्ग के विरुद्ध विद्रोह करनेवाले से कहा जाए कि व्याकुल मत हो। उसकी सारी व्याकुलता स्वयं विद्रोह के सिवाय और क्या है? उसे सांत्वना नहीं मिलती, क्योंकि वह सांत्वना पाने से इन्कार करता है। परमेश्वर उसे सांत्वना देने को तैयार है। आप यह न सोचें कि आप परमेश्वर से अधिक करुणामय हो सकते हैं। यदि वह समर्पण कर दे, तो परमेश्वर उसे एक क्षण में सांत्वना से भर देगा। परन्तु वह वहाँ खड़ा है, परमेश्वर के विरुद्ध, और पवित्र आत्मा के विरुद्ध, और विवेक के विरुद्ध संघर्ष करता हुआ, यहाँ तक कि वह लगभग मृत्यु तक व्याकुल है, और फिर भी वह नहीं झुकता; और अब कोई आकर कहता है, “ओह, मुझे तुम्हें इतना दुःखी देखना अच्छा नहीं लगता, इतने व्याकुल मत हो, खुश रहो, खुश रहो, धर्म उदास रहने में नहीं है, धीरज धरो।” कितनी भयानक बात!
5. जो कुछ भी धर्म के विषय को रहस्य में लपेट देता है, वह पापी को झूठी सांत्वना देनेवाला है।
जब कोई पापी धर्म के विषय में चिन्तित होता है, तो बहुत बार, यदि आप उसे रहस्य के बादलों में ढँक दें, तो उसे राहत महसूस होगी। पापी की व्याकुलता वर्तमान दायित्व के दबाव से उत्पन्न होती है। इस बात पर उसे प्रकाश दीजिए, और इसे स्पष्ट कर दीजिए, और यदि वह न झुके, तो इससे उसकी व्याकुलता केवल बढ़ेगी। परन्तु उससे कहिए कि नया जन्म पूरी तरह एक रहस्य है, कुछ ऐसा जिसे वह समझ नहीं सकता; और उसे अन्धकार के कोहरे में ही छोड़ दीजिए, तो आप उसकी चिन्ता दूर कर देते हैं। पश्चाताप के स्वरूप और कर्तव्य का स्पष्ट दर्शन ही उसकी व्याकुलता उत्पन्न करता है। यह प्रकाश ही है जो, जब तक वह आज्ञा मानने से इन्कार करता है, उसके मन में पीड़ा लाता है। यही वह बात है जिससे नरक की पीड़ाएँ बनेंगी। और यदि यह केवल पर्याप्त स्पष्ट कर दिया जाए, तो यह यहीं पापी के हृदय में लगभग नरक बना देगा। परन्तु केवल इस प्रकाश को ढँक दीजिए, और उसकी चिन्ता तुरन्त कहीं कम तीव्र और कम मर्मभेदी हो जाएगी। परन्तु यदि आप एक निश्चित और स्पष्ट प्रकाश ऊपर उठाएँ, और उसे उसके प्राण पर पूरी तरह चमका दें, और यदि वह न झुके, तो आप उसके हृदय में नरक की यातनाएँ सुलगा देते हैं।
6. जो कुछ भी पापी को दोष की भावना से मुक्त करता है, वह उसे झूठी सांत्वना देनेवाला है।
मनुष्य जितना अधिक अपने आप को दोषी अनुभव करता है, उसकी व्याकुलता उतनी ही गहरी होती है। परन्तु जो कुछ भी उसकी दोष की भावना को घटाता है, वह निःसन्देह उसकी व्याकुलता को भी घटाता है, परन्तु वह मृत्यु से भरी हुई सांत्वना है। यदि कोई बात उसे दोष बाँटने में, और उसका एक भाग परमेश्वर पर डाल देने में सहायता करे, तो उससे सांत्वना मिलेगी, परन्तु यह ऐसी राहत है जो उसके प्राण को नष्ट कर देगी।
7. उससे उसकी असमर्थता की बात कहना झूठी सांत्वना है। किसी चिन्तित पापी से कहिए, “तुम कर ही क्या सकते हो? तुम एक बेचारे, निर्बल प्राणी हो, तुम कुछ नहीं कर सकते।” आप उसमें एक प्रकार की निराशा उत्पन्न कर देंगे। परन्तु यह पछतावे की वह तीखी पीड़ा नहीं है, जिससे परमेश्वर प्राण को मरोड़ता है, जब वह उसे काट गिराने और पश्चाताप तक लाने का परिश्रम कर रहा होता है।
यदि आप उससे कहें कि वह सुसमाचार को मानने में असमर्थ है, तो वह स्वाभाविक रूप से इसे राहत समझकर अपना लेता है। वह अपने आप से कहता है, “हाँ, मैं असमर्थ हूँ, मैं एक बेचारा, निर्बल प्राणी हूँ, मैं यह नहीं कर सकता, और निश्चय ही परमेश्वर मुझे उस काम को न करने के लिए नरक नहीं भेज सकता जिसे मैं कर ही नहीं सकता।” अरे, यदि मैं यह विश्वास करता कि पापी असमर्थ है, तो मैं उससे साफ़-साफ़ कहता, “डरो मत, सुसमाचार की बुलाहट को न मानने के लिए तुम दोषी नहीं हो: क्योंकि तुम असमर्थ हो, और परमेश्वर तुम्हें उस काम को न करने के लिए कभी नरक नहीं भेजेगा जिसे करने की तुममें शक्ति ही नहीं। “क्या सारी पृथ्वी का न्यायी न्याय न करे?” मैं जानता हूँ कि जो लोग पापी की असमर्थता की बात करते हैं, उनके लिए यह सामान्य बात नहीं कि वे इतने सुसंगत हों, और अपने सिद्धान्त को उसके अन्त तक ले जाएँ। परन्तु पापी यह सब निष्कर्ष स्वयं निकाल लेता है, और इसलिए उसे राहत महसूस होती है। यह सब झूठ है, और इससे मिलनेवाली सारी सांत्वना केवल क्रोध के दिन के लिए क्रोध कमाना है।
8. जो कुछ भी पापी के मन पर यह छाप डालता है कि धर्म में उसे निष्क्रिय रहना है, वह उसे झूठी सांत्वना देनेवाला है।
उसे यह विचार दीजिए कि उसे परमेश्वर के समय की प्रतीक्षा करने के सिवाय और कुछ नहीं करना है; उससे कहिए कि मन-परिवर्तन परमेश्वर का कार्य है, और उसे यह परमेश्वर पर छोड़ देना चाहिए; और कि उसे सावधान रहना चाहिए कि वह इस कार्य को परमेश्वर के हाथ से लेने का प्रयत्न न करे; तो वह पहले की तरह यह निष्कर्ष निकालेगा कि वह दोषी नहीं है, और उसे राहत महसूस होगी। यदि उसे केवल स्थिर रहना है, और परमेश्वर को कार्य करने देना है, ठीक वैसे ही जैसे कोई मनुष्य अपनी बाँह कटवाने के लिए स्थिर रहता है, तो उसे राहत महसूस होती है। परन्तु ऐसी शिक्षा पूरी तरह गलत है। यदि पापी को इस प्रकार स्थिर रहकर परमेश्वर को यह करने देना है, तो वह तुरन्त यह निष्कर्ष निकालता है कि इसे स्वयं न करने के लिए वह दोषी नहीं है। और यह निष्कर्ष न केवल स्वाभाविक वरन् उचित भी है, क्योंकि तब वह दोषी नहीं है।
यह सच है कि एक अर्थ में मन-परिवर्तन परमेश्वर का कार्य है। परन्तु जैसा इसे अक्सर प्रस्तुत किया जाता है, वह झूठ है। यह भी सच है कि एक अर्थ में मन-परिवर्तन पापी का अपना कार्य है। इसलिए यह कहना हास्यास्पद है कि पापी नए जन्म में निष्क्रिय है, या मन-परिवर्तन होने में निष्क्रिय है, क्योंकि मन-परिवर्तन उसका अपना कार्य है। जो बात करनी है, वह ऐसी है जो उसके बदले कोई और नहीं कर सकता। यह कुछ ऐसा है जो उसे स्वयं करना होगा, नहीं तो यह कभी नहीं होगा।
9. पापी से परमेश्वर के समय की प्रतीक्षा करने को कहना।
कुछ वर्ष पहले, मैं फ़िलाडेल्फ़िया में एक स्त्री से मिला, जो अपने प्राण के विषय में चिन्तित थी, और बहुत समय से उसी दशा में थी। मैंने उससे बातचीत की, और उसकी दशा जानने का प्रयत्न किया। उसने मुझे बहुत सी बातें बताईं, और अन्त में कहा कि वह जानती है कि उसे परमेश्वर की उतनी ही देर तक प्रतीक्षा करने को तैयार रहना चाहिए जितनी देर तक परमेश्वर ने उसकी प्रतीक्षा की है। उसने कहा कि परमेश्वर ने बहुत वर्षों तक उसकी प्रतीक्षा की, इससे पहले कि वह उसकी बुलाहटों पर कुछ भी ध्यान देती, और अब उसका विश्वास था कि उसका कर्तव्य है कि वह परमेश्वर के उस समय की प्रतीक्षा करे जब वह दया दिखाकर उसके प्राण का मन-परिवर्तन करे। और उसने कहा कि उसे यही शिक्षा मिली थी। उसे धीरज रखना चाहिए, और परमेश्वर के समय की प्रतीक्षा करनी चाहिए, और आगे चलकर परमेश्वर उसे राहत देगा। ओह, कैसी आश्चर्यजनक मूर्खता!
यहाँ पापी विद्रोह में है। परमेश्वर एक हाथ में क्षमा और दूसरे हाथ में तलवार लेकर आता है, और पापी से कहता है कि पश्चाताप करके क्षमा पा ले, या इन्कार करके नाश हो जाए। और अब यहाँ सुसमाचार का एक सेवक आता है, और पापी से कहता है कि “परमेश्वर के समय की प्रतीक्षा करो।” वास्तव में वह यह कहता है कि परमेश्वर अभी इसके लिए तैयार नहीं कि वह पश्चाताप करे, और अभी उसे क्षमा करने को तैयार नहीं, और इस प्रकार वास्तव में उसके पश्चाताप न करने का दोष परमेश्वर पर डाल देता है। पापी के दोष को, कि वह तुरन्त परमेश्वर के अधीन नहीं होता, दिखाने के बजाय वह यह दिखाता है कि परमेश्वर ने प्रस्ताव रखने में कपट किया, जबकि वास्तव में वह आशीष देने को तैयार नहीं था।
मैंने अक्सर सोचा है कि ऐसे शिक्षकों को एलिय्याह की उस डाँट की आवश्यकता है जो उसने बाल के याजकों से मिलने पर दी थी। “ऊँचे शब्द से पुकारो, वह तो देवता है; वह ध्यान लगाए होगा, या कहीं गया होगा, या यात्रा में होगा, या हो सकता है कि सोता हो और उसे जगाना चाहिए।” जो पादरी यह संकेत करने का साहस करता है कि परमेश्वर तैयार नहीं, और पापी से कहता है कि परमेश्वर के समय की प्रतीक्षा करो, वह लगभग उससे यह भी कह सकता है कि अभी परमेश्वर सो रहा है, या यात्रा पर गया है, और इस समय उसकी ओर ध्यान नहीं दे सकता। सचमुच निकम्मे सांत्वना देनेवाले! यह परमेश्वर की घोर निन्दा से कुछ ही कम है। कितने ही लोग उन प्राणों के लहू से सिर से पाँव तक लाल होकर न्याय के लिए गए हैं, जिन्हें उन्होंने यह कहकर धोखा दिया और नष्ट किया कि परमेश्वर अभी उनका उद्धार करने को तैयार नहीं, और उन्हें परमेश्वर के समय की प्रतीक्षा करनी होगी। इसमें सन्देह नहीं कि ऐसा सिद्धान्त किसी चिन्तित पापी को तत्काल राहत देने में बहुत समर्थ है। यह उसे यह कहने का अधिकार देता है, “ओह, हाँ, परमेश्वर तैयार नहीं है, मुझे परमेश्वर के समय की प्रतीक्षा करनी है और इसलिए मैं पाप में जी सकता हूँ, और कुछ समय और मौज कर सकता हूँ, जब तक वह मेरी ओर ध्यान देने को तैयार न हो जाए, और तब मैं धर्म पा लूँगा।”
10. किसी चिन्तित पापी से राहत के लिए कोई ऐसा काम करने को कहना झूठी सांत्वना है, जिसे वह अपना हृदय परमेश्वर के अधीन किए बिना कर सकता है।
एक चिन्तित पापी अक्सर और सब कुछ करने को तैयार रहता है, केवल उस बात को छोड़कर जिसे करने की परमेश्वर उससे माँग करता है। वह पृथ्वी की छोर तक जाने को, या अपना धन देने को, या कष्ट सहने को, या कुछ भी करने को तैयार है, केवल परमेश्वर के प्रति पूर्ण और तत्काल समर्पण को छोड़कर। अब, यदि आप उसके साथ इस विषय में समझौता कर लें, और उसे कोई और काम बता दें जिसे वह कर सकता है, और फिर भी उस बात से बच सकता है, तो उसे बड़ी सांत्वना मिलेगी। उसे वह शिक्षा अच्छी लगती है। वह कहता है, “ओह, हाँ, मैं यह करूँगा, मुझे यह पादरी अच्छा लगता है, वह दूसरों के समान कठोर नहीं है, वह मेरी विशेष दशा को समझता हुआ जान पड़ता है, और जानता है कि कैसे छूट दी जाए।”
इससे मुझे अक्सर एक ऐसे रोगी के आचरण की याद आती है जो बहुत बीमार है, परन्तु किसी विशेष चिकित्सक और किसी विशेष दवा से उसे बड़ी अरुचि है; परन्तु वही एकमात्र चिकित्सक है जो उसके रोग का उपचार करना जानता है, और वही उसका एकमात्र उपाय है। अब रोगी और कुछ भी करने को, और किसी भी दूसरे चिकित्सक को बुलाने को तैयार है; और वह चिन्तित और व्याकुल है, और अपने सब मित्रों से पूछ रहा है कि क्या वे उसे नहीं बता सकते कि वह क्या करे, और उस एकमात्र उपचार के आगे झुकने से पहले, जो उसे राहत दे सकता है, वह देश भर के सारे नुस्खे और नीम-हकीमी दवाएँ ले लेगा। आगे चलकर, जब वह बिना किसी लाभ के सब कुछ आज़मा चुका होता है, तब यदि वह इस प्रयोग में मर न जाए, तो अपना अनुचित विरोध छोड़ देता है, उस चिकित्सक को बुलाता है, उचित दवा लेता है, और चंगा हो जाता है। ठीक यही दशा पापियों की है। यदि आप उन्हें परमेश्वर के अधीन होने के इस वर्तमान दायित्व के असहनीय दबाव से छुटकारा दे दें, तो वे बड़ी उत्सुकता से कुछ भी करेंगे। मैं उन कुछ बातों का उल्लेख करूँगा जिन्हें करने के लिए पापियों से कहा जाता है।
(1.) पापी से यह कहना कि उसे साधनों का उपयोग करना चाहिए। किसी चिन्तित पापी से यह कहिए—तुम्हें साधनों का उपयोग करना चाहिए, और उसे राहत मिल जाती है। “ओह, हाँ, यदि बस इतना ही है, तो मैं यह करूँगा। मैं सोचता था कि परमेश्वर मुझसे माँग करता है कि मैं अभी पश्चाताप करूँ और उसके अधीन हो जाऊँ। परन्तु यदि साधनों का उपयोग करने से काम चल जाए, तो मैं अपने पूरे मन से यह करूँगा।” वह पहले व्याकुल था, क्योंकि वह घिर गया था, और नहीं जानता था कि किस ओर मुड़े। विवेक ने उसे आग की दीवार के समान घेर लिया था, और उस पर ज़ोर डाल रहा था कि वह अभी पश्चाताप करे। परन्तु इससे उसे तुरन्त राहत मिल जाती है, और वह अच्छा महसूस करता है, और बड़ा धन्यवादी है, वह कहता है, कि उसे अपने संकट में ऐसा अच्छा सलाहकार मिला। परन्तु वह, जैसा वह इसे कहता है, न्याय के दिन तक साधनों का उपयोग करता रह सकता है, और इससे रत्ती भर भी अच्छा न होगा, वरन् केवल मृत्यु की ओर अपने मार्ग को और तेज़ करेगा। पापी का साधनों का उपयोग करना परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह के सिवाय और क्या है? परमेश्वर साधनों का उपयोग करता है। कलीसिया पापियों का मन-परिवर्तन करने और उन्हें बचाने, उन पर दबाव डालने, और उन्हें अधीनता तक लाने के लिए साधनों का उपयोग करती है। परन्तु पापी का साधनों का उपयोग करने से क्या सम्बन्ध? क्या आप उसे परमेश्वर पर उलटे साधन चलाने में लगा देंगे, और इस प्रकार मामले में बराबरी कर देंगे? या क्या उसे अपने आप को परमेश्वर के अधीन करने के लिए साधनों का उपयोग करना है? वह अपने आप को अधीन करने के लिए अपने साधनों से कैसे काम में लगेगा? यह तो बस पापी से यह कहना है, “तुम्हें अभी परमेश्वर के अधीन होने की आवश्यकता नहीं, बस कुछ समय साधनों का उपयोग करो, और देखो कि क्या तुम परमेश्वर के हृदय को अपनी ओर पिघला नहीं सकते, ताकि वह बिना शर्त अधीनता की इस बात पर झुक जाए।” यह परमेश्वर के प्रति तुरन्त अधीन होने के कर्तव्य से बचने के लिए केवल एक कुतर्क है। यह सच है कि पापी, अपनी ही सुख-शान्ति के विचार से प्रेरित होकर, अक्सर धर्म के विषय पर ध्यान देते हैं, सभाओं में जाते हैं, और प्रार्थना करते हैं, और पढ़ते हैं, और ऐसे बहुत से काम करते हैं। परन्तु इस सब में उन्हें परमेश्वर के आदर का कोई ध्यान नहीं होता, और न ही वे उसकी आज्ञा मानने का इरादा तक रखते हैं। उनका उद्देश्य आज्ञाकारिता नहीं है, क्योंकि यदि होता, तो वे पश्चाताप न करनेवाले पापी न होते। इसलिए वे मसीही बनने के लिए नहीं, वरन् क्षमा और एक आशा पाने के लिए साधनों का उपयोग कर रहे हैं। यह कहना बेतुका है कि पश्चाताप न करनेवाला पापी पश्चाताप करने के लिए साधनों का उपयोग कर रहा है, क्योंकि यह ऐसा ही कहना है कि वह पश्चाताप करने को तैयार है, या दूसरे शब्दों में, कि वह पश्चाताप करता है, और पश्चाताप न करनेवाला पापी नहीं है। इसी प्रकार, यह कहना कि मन-परिवर्तन रहित पापी मसीही बनने के उद्देश्य से साधनों का उपयोग करता है, एक विरोधाभास है, क्योंकि यह कहना है कि वह मसीही बनने को तैयार है, जो यह कहने के बराबर है कि वह पहले से ही मसीही है।
(2.) पापी से नए मन के लिए प्रार्थना करने को कहना। मैंने एक बार एक प्रसिद्ध संडे-स्कूल शिक्षक को ऐसा करते सुना। वह इस देश में संडे-स्कूलों का लगभग जनक था। उसने एक छोटी लड़की को अपने पास बुलाया, और उससे बातें करने लगा। “मेरी छोटी बेटी, क्या तुम मसीही हो?” नहीं, महाशय। “अच्छा, तुम अपने आप तो मसीही नहीं बन सकतीं, बन सकती हो?” नहीं, महाशय। “नहीं, तुम मसीही नहीं बन सकतीं, तुम अपना मन स्वयं नहीं बदल सकतीं, परन्तु तुम्हें नए मन के लिए प्रार्थना करनी चाहिए, बस तुम इतना ही कर सकती हो, परमेश्वर से प्रार्थना करो, परमेश्वर तुम्हें नया मन देगा।” वह एक वृद्ध और आदरणीय व्यक्ति था, परन्तु मेरा मन लगभग यह हुआ कि प्रभु के नाम से उसे खुलेआम डाँटूँ, मैं उसे उस बच्ची को धोखा देते, उससे यह कहते हुए कि वह मसीही नहीं बन सकती, सुन नहीं सका। क्या परमेश्वर कहता है, “नए मन के लिए प्रार्थना करो?” कभी नहीं। वह कहता है, “अपने लिये नया मन बना लो।” और पापी से यह नहीं कहना है कि वह परमेश्वर से प्रार्थना करे कि वह उसके बदले उसका कर्तव्य पूरा कर दे, वरन् यह कि वह जाकर उसे स्वयं करे। मैं जानता हूँ कि भजनकार ने, जो एक भला मनुष्य था, प्रार्थना की, “हे परमेश्वर, मेरे अन्दर शुद्ध मन उत्पन्न कर, और मेरे भीतर स्थिर आत्मा नये सिरे से उत्पन्न कर।” उसमें विश्वास था और उसने विश्वास से प्रार्थना की। परन्तु यह एक हठीले विद्रोही को नए मन के लिए प्रार्थना करने में लगा देने से बहुत भिन्न बात है। इसमें सन्देह नहीं कि एक चिन्तित पापी ऐसी शिक्षा से प्रसन्न होगा। “अरे, मैं जानता था कि मुझे नए मन की आवश्यकता है, और मुझे पश्चाताप करना चाहिए, परन्तु मैं सोचता था कि मुझे यह स्वयं करना होगा, मैं परमेश्वर से यह करने को कहने के लिए बड़ी खुशी से तैयार हूँ, मुझे इसे स्वयं करना बुरा लगता था, परन्तु यदि परमेश्वर करे तो मुझे कोई आपत्ति नहीं कि वह इसे करे, और यदि बस इतना ही माँगा जाता है, तो मैं इसके लिए प्रार्थना करूँगा।”
(3.) पापी से डटे रहने को कहना। और मान लीजिए कि वह डटा रहता है। तो उसका दण्ड की आज्ञा पाना उतना ही निश्चित है मानो वह जगत की उत्पत्ति से ही नरक में रहा हो। उसकी चिन्ता केवल उसके विरोध से उत्पन्न होती है, और यदि वह अधीन हो जाए, तो वह समाप्त हो जाएगी। और अब, क्या आप उससे उसी बात में डटे रहने को कहेंगे जो उसकी व्याकुलता का कारण है? मान लीजिए कि मेरा बच्चा क्रोध के आवेश में कोई किताब या कोई और चीज़ फ़र्श पर फेंक दे। मैं उससे कहता हूँ, “इसे उठाओ,” और मेरी बात मानने के बजाय, वह भागकर खेलने लगता है। “इसे उठाओ!” वह देखता है कि मैं गम्भीर हूँ, और गम्भीर दिखने लगता है। “इसे उठाओ, नहीं तो मैं छड़ी लाऊँगा।” और मैं छड़ी लेने के लिए अपना हाथ ऊपर उठाता हूँ। वह स्थिर खड़ा रहता है। “इसे उठाओ, नहीं तो तुम्हें पिटना पड़ेगा।” वह धीरे-धीरे उस स्थान तक आता है, और फिर रोने लगता है। “इसे उठाओ, मेरे बच्चे, नहीं तो तुम्हें निश्चय ही दण्ड मिलेगा।” अब वह व्याकुल है, और ऐसे सिसकता और आहें भरता है मानो उसकी छाती फट जाएगी, परन्तु फिर भी वह ऐसा हठीला बना रहता है मानो वह जानता हो कि मैं उसे दण्ड नहीं दे सकता। अब मैं अधीन होने और आज्ञा मानने के लिए कारण देकर उस पर ज़ोर डालने लगता हूँ, परन्तु वह वहाँ पीड़ा में खड़ा रहता है, और अन्त में फूट पड़ता है, “ओह, पिताजी, मुझे बहुत बुरा लग रहा है, मुझे लगता है कि मैं सुधर रहा हूँ।” और अब, मान लीजिए कि एक पड़ोसी भीतर आता है, और बच्चे को अपने हठ की इस सारी पीड़ा में वहाँ खड़ा देखता है। पड़ोसी उससे पूछता है कि वह वहाँ क्यों खड़ा है, और क्या कर रहा है। “ओह, मैं उस किताब को उठाने के लिए साधनों का उपयोग कर रहा हूँ।” यदि वह पड़ोसी बच्चे से कहे, “डटे रहो, डटे रहो, मेरे बेटे, आगे चलकर तुम उसे उठा लोगे,” तो मैं क्या करूँगा? अरे, मैं उसे घर से बाहर निकाल दूँगा। मेरे बच्चे को उसके विद्रोह में प्रोत्साहित करने से उसका क्या अभिप्राय है?
अब, परमेश्वर पापी को पश्चाताप करने के लिए बुलाता है, वह उसे धमकाता है, वह चमचमाती तलवार खींचता है, वह उसे समझाता है, वह कारण प्रस्तुत करता है, और पापी पीड़ा की सीमा तक व्याकुल है, क्योंकि वह देखता है कि वह इस भयानक विकल्प तक धकेल दिया गया है कि या तो अपने पाप छोड़ दे या नरक जाए। उसे तुरन्त अपने हथियार डाल देने चाहिए, और एक ही बार में अपना हृदय टूट जाने देना चाहिए। परन्तु वह विरोध करता है, और पाप के बोध के विरुद्ध संघर्ष करता है, और यही उसकी व्याकुलता उत्पन्न करता है। अब क्या आप उससे डटे रहने को कहेंगे? किस बात में डटे रहना? परमेश्वर के विरुद्ध संघर्ष करने में! यही तो वह निर्देश है जो शैतान देगा। शैतान केवल यही देखना चाहता है कि वह जिस मार्ग पर चल रहा है ठीक उसी पर डटा रहे, और उसका विनाश निश्चित है। शैतान तो चैन से सो सकता है।
(4.) पापी से आगे बढ़ते रहने को कहना। अर्थात्, “तुम अच्छे मार्ग पर हो, बस आगे बढ़ते रहो, और तुम स्वर्ग पहुँच जाओगे।” यह इस धारणा पर आधारित है कि उसका मुँह स्वर्ग की ओर है, जबकि वास्तव में उसका मुँह नरक की ओर है, और वह आगे बढ़ रहा है, और अभी से अधिक तेज़ी से कभी नहीं, जबकि वह पवित्र आत्मा का विरोध कर रहा है। मैंने अक्सर यह निर्देश दिए जाते सुना है, जबकि पापी उतने बुरे मार्ग पर था जितना वह हो सकता था। आपको उससे यह कहना चाहिए, “रुक जाओ—पापी, रुक जाओ, उस ओर एक कदम भी और न बढ़ाओ, वह नरक को ले जाता है।” परमेश्वर उससे रुकने को कहता है, और क्योंकि वह रुकना नहीं चाहता, इसलिए वह व्याकुल है। अब, आप इस प्रकार उसे सांत्वना देने का प्रयत्न क्यों करें?
(5.) पापी से कहना कि उसे पश्चाताप करने और अपना हृदय परमेश्वर को देने का प्रयत्न करना चाहिए। “ओह, हाँ,” पापी कहता है, “मैं प्रयत्न करने को तैयार हूँ। मैंने इसे करने का अक्सर प्रयत्न किया है, और मैं फिर प्रयत्न करूँगा।” आह, क्या परमेश्वर आपसे पश्चाताप करने का प्रयत्न करने को कहता है? सारा संसार अपने ढंग से पश्चाताप करने का प्रयत्न करने को तैयार होगा। यह निर्देश देने का अर्थ यह है कि पश्चाताप करना बहुत कठिन है, और शायद असम्भव, और कि पापी जो सबसे अच्छा कर सकता है वह यह है कि प्रयत्न करे और देखे कि वह इसे कर सकता है या नहीं। यह परमेश्वर की आज्ञा के स्थान पर अपनी आज्ञा रख देने के सिवाय और क्या है? परमेश्वर पश्चाताप और एक पवित्र हृदय से कम कुछ भी नहीं माँगता। उससे कम कोई भी बात उसे व्यर्थ सांत्वना देना है, “क्योंकि तुम्हारे उत्तरों में तो झूठ ही पाया जाता है।”
(6.) उससे पश्चाताप के लिए प्रार्थना करने को कहना। “ओह हाँ, यदि बस इतना ही है, तो मैं पश्चाताप के लिए प्रार्थना करूँगा। मैं इसलिए व्याकुल था कि मैं सोचता था कि परमेश्वर मुझसे पश्चाताप करने की माँग करता है, परन्तु यदि वह इसे करेगा, तो मैं प्रतीक्षा कर सकता हूँ।” और इस प्रकार उसे राहत महसूस होती है, और वह बड़े आराम में रहता है।
(7.) किसी पापी से पाप के बोध के लिए प्रार्थना करने को कहना, या यह प्रार्थना करने को कहना कि पवित्र आत्मा उसे उसके पाप दिखाए, या अपने पाप का बोध बढ़ाने के लिए अपने दोष के विषय में और अधिक प्रकाश पाने का परिश्रम करने को कहना। यह सब ठीक वही है जो पापी चाहता है, क्योंकि इससे वह वर्तमान दायित्व के दबाव से छूट जाता है। वह बस थोड़ा और समय चाहता है। कोई भी बात जो तुरन्त पश्चाताप करने के दायित्व के उस वर्तमान दबाव को टाल दे, उसके लिए राहत है। उसे और अधिक पाप-बोध की क्या आवश्यकता है? क्या परमेश्वर किसी पश्चाताप न करनेवाले पापी को ऐसा कोई निर्देश देता है? परमेश्वर यह मानकर चलता है कि उसके पास पहले से ही पर्याप्त पाप-बोध है। और सचमुच है। क्या आप कहते हैं कि वह अपने सब पापों को अनुभव नहीं कर सकता? यदि वह उनमें से केवल एक को भी अनुभव कर सके, तो वह उस एक से पश्चाताप करे, और वह मसीही है। मान लीजिए कि वह उन सब को देख सकता, तो यह सोचने का क्या कारण है कि वह उन सब से पश्चाताप करेगा, उससे अधिक जितना कि वह उस एक से पश्चाताप करेगा जिसे वह देखता है? यह सब पापी को ऐसी बात में लगाकर सांत्वना देना है जिसे वह कर सकता है, और फिर भी अपना हृदय परमेश्वर के अधीन नहीं करेगा।
11. चिन्तित पापियों को झूठी शान्ति देने का एक और तरीका यह है कि उनसे कहा जाए कि परमेश्वर उन्हें भट्ठी में रखकर उनके विश्वास को परख रहा है, और उन्हें धीरज से प्रभु की बाट जोहनी चाहिए। मानो दोष परमेश्वर का हो, या उसके मसीही बनने के मार्ग में परमेश्वर ही आड़े खड़ा हो। या मानो पश्चाताप न करनेवाले पापी के पास विश्वास हो! कैसी घृणित बात है! मान लीजिए, जब मेरा बच्चा उस पुस्तक के पास खड़ा हो, जैसा मैंने वर्णन किया है, तब कोई उससे कहे, “बेटा, धीरज से प्रतीक्षा कर, तेरा पिता तेरे विश्वास को परख रहा है।” नहीं। पापी ही परमेश्वर के धीरज और सहनशीलता को परख रहा है। परमेश्वर पापी को यातना देने और उसे धीरज का पाठ पढ़ाने पर तुला हुआ नहीं है। वरन् वह उसकी बाट जोह रहा है, और परिश्रम कर रहा है कि उसे तुरन्त मन की ऐसी दशा में ले आए जिसमें उसके प्राण को स्वर्ग की शान्ति से भर देना उचित ठहरे। और क्या पापी को इस विचार से विरोध करने के लिए प्रोत्साहित किया जाए कि परमेश्वर उसके साथ हँसी-ठट्ठा कर रहा है? सावधान रहिए। परमेश्वर ने कहा है कि उसका आत्मा सदा लों विवाद करता न रहेगा।
12. एक और झूठी शान्ति पापी से यह कहना है, अपना कर्तव्य करो, और अपने मन-परिवर्तन को परमेश्वर पर छोड़ दो।
मैंने एक बार एक कलीसिया के एक प्राचीन को एक चिन्तित पापी से यह कहते सुना, “अपना कर्तव्य करो, और अपने मन-परिवर्तन को परमेश्वर पर छोड़ दो, वह अपने समय पर और अपनी रीति से उसे कर देगा।” यह ठीक वैसा ही था जैसे उससे यह कहना कि अभी मन-परिवर्तन करना उसका कर्तव्य नहीं है। उसने यह नहीं कहा, अपना कर्तव्य करो, और अपने उद्धार को परमेश्वर पर छोड़ दो। वह तो काफ़ी उचित होता, क्योंकि वह केवल उसे परमेश्वर के अधीन हो जाने को कहना होता, और उसमें मन-परिवर्तन सब कर्तव्यों में पहला कर्तव्य होकर सम्मिलित होता। परन्तु उसने उससे कहा कि अपने मन-परिवर्तन को परमेश्वर पर छोड़ दो। और ऐसी सलाह देनेवाला यह प्राचीन उच्च शिक्षा पाया हुआ मनुष्य भी था। कैसी बेतुकी बात! मानो वह अपना कर्तव्य कर सकता हो और फिर भी उसका मन-परिवर्तन न हो। मानो परमेश्वर किसी पापी का मन-परिवर्तन करने जा रहा हो और पापी साधनों का प्रयोग करता हुआ चुपचाप बैठा उसे सहता रहे। भयानक! नहीं। परमेश्वर ने उससे माँग की है कि वह अपने लिए नया मन बनाए, और आप सावधान रहिए कि आप उसे झूठ भरे उत्तर से शान्ति न दें।
13. कभी-कभी धर्म का अंगीकार करनेवाले किसी पापी को यह कहकर शान्ति देने का प्रयत्न करते हैं, “निराश मत हो; मैं भी शान्ति पाने से पहले बहुत समय तक इसी दशा में रहा था।” वे उससे कहेंगे, “मैं इतने सप्ताहों तक—या शायद इतने महीनों तक, या कभी-कभी वर्षों तक—पाप के बोध में रहा, और इन सब बातों से होकर गुज़रा हूँ, और ठीक जानता हूँ कि तुम कैसा अनुभव करते हो, तुम्हारा अनुभव ठीक-ठीक मेरे अनुभव के समान है, और इतने लम्बे समय के बाद मुझे छुटकारा मिला, और मुझे सन्देह नहीं कि तुम्हें भी कुछ समय बाद मिल जाएगा। निराश मत हो, परमेश्वर शीघ्र ही तुम्हें शान्ति देगा।” किसी पापी से कहना कि अपने विद्रोह में हियाव बाँधे रहो! ओह, भयानक। ऐसे अंगीकार करनेवालों को लज्जित होना चाहिए। मान लीजिए आप इतने सप्ताहों तक पाप के बोध में रहे, और बाद में आपको छुटकारा मिला, तो यह तो सबसे अन्तिम बात है जो आपको किसी चिन्तित पापी से कहनी चाहिए। यह उसे डटे रहने के लिए प्रोत्साहित करने के सिवा और क्या है, जबकि उसका काम अधीन हो जाना है? क्या आप इतने सप्ताहों तक अड़े रहे जबकि आत्मा आपसे विवाद कर रहा था? तब तो आप अपनी हठ और जड़ता के कारण और भी अधिक दण्ड के योग्य थे।
पापी! यह कोई चिह्न नहीं है कि परमेश्वर आपको इतने लम्बे समय तक छोड़े रखेगा, या कि उसका आत्मा आपके पास बना रहेगा कि आप उसका विरोध करते रहें। और स्मरण रखिए, यदि आत्मा उठा लिया गया, तो आप नरक में भेज दिए जाएँगे।
14. “मुझे यह विश्वास है कि तुम्हारा मन-परिवर्तन हो जाएगा।”
आपको विश्वास है! आपका विश्वास किस बात पर टिका है? परमेश्वर की प्रतिज्ञा पर? पवित्र आत्मा के प्रभावों पर? तब तो आप अपने ही विश्वास के विरुद्ध काम कर रहे हैं। परमेश्वर के आत्मा का ठीक यही उद्देश्य और लक्ष्य है कि जब तक पापी पाप में बना है, तब तक उससे आशा का अन्तिम अवशेष भी छीन ले; हर उस चट्टान और टहनी को मिटा दे जिससे वह चिपका रह सकता है। और आपकी शिक्षा का उद्देश्य भी यही होना चाहिए। आपको परमेश्वर की योजना के साथ मेल रखना चाहिए। केवल इसी रीति से आप कभी कोई भलाई कर सकते हैं—उसे ठीक काम तक धकेलकर, कि वह तुरन्त अधीन हो जाए और अपने प्राण को परमेश्वर के हाथों में सौंप दे। परन्तु जब कोई ऐसा व्यक्ति, जिसे वह मसीही समझता है, उससे कहता है, “मुझे यह विश्वास है कि तुम्हारा मन-परिवर्तन हो जाएगा,” तो यह उसे उसकी झूठी आशा में सम्भाले रहता है। उसे उसकी झूठी आशाओं से अलग करके मसीह पर डाल देने के बदले, आप उसे अपने विश्वास पर लटके रहने के लिए छोड़ देते हैं, और वह इस बात से शान्ति पाता है कि आपको उसके लिए विश्वास है। यह सब झूठी शान्ति है, जो मृत्यु उत्पन्न करती है।
15. “मैं तुम्हारे लिए प्रार्थना करूँगा।” कभी-कभी धर्म का अंगीकार करनेवाले किसी चिन्तित पापी को इस रीति से शान्ति देने का प्रयत्न करते हैं, उससे यह कहकर, “मैं तुम्हारे लिए प्रार्थना करूँगा।” यह झूठी शान्ति है, क्योंकि यह पापी को मसीह पर भरोसा करने के बदले उन प्रार्थनाओं पर भरोसा करने की ओर ले जाती है। पापी कहता है, “वह भला मनुष्य है, और परमेश्वर भले मनुष्यों की प्रार्थनाएँ सुनता है, इसमें सन्देह नहीं कि किसी न किसी समय उसकी प्रार्थनाएँ प्रबल होंगी, और मेरा मन-परिवर्तन हो जाएगा, मैं नहीं समझता कि मैं नाश हो जाऊँगा।” और उसकी चिन्ता, उसकी वेदना, सब जाती रहती है। एक स्त्री ने एक पादरी से कहा, “अभी मुझे कोई आशा नहीं है, परन्तु मुझे आपकी प्रार्थनाओं पर विश्वास है।” यह ठीक वैसा ही विश्वास है जैसा शैतान चाहता है कि उनमें हो—मसीह पर विश्वास के बदले प्रार्थनाओं पर विश्वास।
16. “मैं तुम्हें इस दशा में देखकर आनन्दित हूँ, और आशा करता हूँ कि तुम विश्वासयोग्य रहोगे, और डटे रहोगे।” यह उसे परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह में देखकर आनन्दित होने के सिवा और क्या है? क्योंकि ठीक यही वह भूमि है जिस पर वह खड़ा है। वह पाप के बोध का विरोध कर रहा है, और विवेक का विरोध कर रहा है, और पवित्र आत्मा का विरोध कर रहा है, और फिर भी आप उसे इस दशा में देखकर आनन्दित होते हैं, और आशा करते हैं कि वह विश्वासयोग्य रहेगा और डटा रहेगा। निस्सन्देह एक अर्थ में यह कहा जा सकता है कि उसकी स्थिति उस समय से अधिक आशाजनक है जब वह जड़ता में था। क्योंकि परमेश्वर ने उसे कायल किया है, और सम्भव है कि वह उसे फेरने और वश में करने में सफल हो जाए। परन्तु पापी स्वयं इसे इस अर्थ में नहीं समझेगा। वह यह समझेगा कि आप उसे आशाजनक दशा में मानते हैं, क्योंकि वह पहले से अच्छा कर रहा है। जबकि वास्तव में उसका दोष और उसका संकट पहले से कहीं अधिक बड़ा है। और आनन्दित होने के बदले, आपको उसे इस प्रकार पवित्र आत्मा का विरोध करते देखकर व्याकुल और वेदना में होना चाहिए, क्योंकि जितनी देर वह ऐसा करता है, उसका हर क्षण इस संकट में है कि परमेश्वर उसे छोड़ दे, और वह मन की कठोरता और निराशा के हवाले कर दिया जाए।
17. “तुम्हें कुछ समय बाद इसका बदला मिलेगा, परमेश्वर तुम्हें प्रतिफल देगा।” हाँ, पापियो, परमेश्वर आपको प्रतिफल देगा, यदि आप इसी रीति से चलते रहे, तो वह आपको नरक की आग में डाल देगा। इस सारी व्याकुलता का प्रतिफल! हाँ, यदि आपको कभी इसका प्रतिफल मिला, तो वह नरक में मिलेगा। मैंने एक बार एक पापी को यह कहते सुना, “मुझे बहुत बुरा लग रहा है, मुझे पक्की आशा है कि मुझे मेरा प्रतिफल मिलेगा।” परन्तु उसी व्यक्ति ने बाद में कहा, “मुझ जैसा काला पापी कहीं नहीं मिल सकता, और मेरे जीवन का कोई भी पाप मुझे उस कथन जितना काला और दण्ड के योग्य नहीं लगता।” वह इस बात पर पछतावे से अभिभूत हो गया कि उसके मन में कभी ऐसा विचार आया था कि परमेश्वर उसे इतनी व्याकुलता सहने का प्रतिफल देगा, जबकि वह सब उसने सत्य का दुष्टतापूर्वक विरोध करके व्यर्थ ही अपने ऊपर लाया था। सच्चाई यह है कि ऐसे लोग पापी को शान्ति देना चाहते हैं, और स्वयं धर्म के विषय में पूरी तरह अन्धकार में होने के कारण, वे स्वाभाविक रूप से उसे झूठी शान्ति देते हैं।
18. एक और झूठी शान्ति पापी से यह कहना है कि उसने पर्याप्त पश्चाताप नहीं किया है। सच्चाई यह है कि उसने पश्चाताप किया ही नहीं है। ज्योंही पापी पश्चाताप करता है, परमेश्वर उसे सदा शान्ति देता है। यह निर्देश इस बात का संकेत करता है कि उसकी भावनाएँ जहाँ तक हैं वहाँ तक ठीक हैं। यह संकेत देना कि उसमें कुछ पश्चाताप है, उससे झूठ बोलना है, और छल करके उसके प्राण को उससे छीन लेना है।
19. लोग कभी-कभी किसी पापी को यह कहकर शान्ति देते हैं, “यदि तुम चुने हुए हो, तो तुम भीतर ले आए जाओगे।” मैंने एक बार एक घटना के विषय में सुना जिसमें मन की बड़ी व्याकुलता में पड़े एक व्यक्ति को पड़ोस के एक पादरी से बातचीत करने के लिए भेजा गया। उन्होंने बहुत देर तक बातचीत की। जब वह व्यक्ति जाने लगा, तो पादरी ने उससे कहा, “मैं तुम्हारे हाथ तुम्हारे पिता को एक पत्र भेजना चाहता हूँ।” उसका पिता एक भक्त मनुष्य था। पादरी ने पत्र लिखा, और उस पर मुहर लगाना भूल गया। जब पापी घर जा रहा था, तो उसने देखा कि पत्र पर मुहर नहीं लगी है, और उसने मन में सोचा कि शायद पादरी ने उसके विषय में लिखा होगा, और अन्त में उसकी उत्सुकता ने उसे पत्र खोलकर पढ़ने पर विवश कर दिया। और उसमें उसने इस आशय की बात लिखी पाई: “प्रिय महोदय, मैं आपके पुत्र को पाप के बोध में और बड़ी व्याकुलता में पाता हूँ, और ऐसा लगता है कि उसे छुटकारा देने के लिए कुछ कहना सरल नहीं है। परन्तु, यदि वह चुने हुओं में से एक है, तो वह निश्चय ही भीतर ले आया जाएगा।” वह पिता को शान्ति देने के लिए कुछ कहना चाहता था। परन्तु अब, ध्यान दीजिए। उस पत्र ने उसके प्राण को लगभग नष्ट कर दिया। वह चुनाव के सिद्धान्त पर आकर टिक गया—“यदि मैं चुना हुआ हूँ, तो मैं भीतर ले आया जाऊँगा,” और उसका पाप का बोध पूरी तरह जाता रहा। वर्षों बाद वह जागृत हुआ और उसका मन-परिवर्तन हुआ, परन्तु केवल एक बड़े संघर्ष के बाद, और तब तक नहीं जब तक वह झूठी छाप उसके मन से मिट न गई, और उसे यह दिखाया न गया कि चुनाव के सिद्धान्त से उसका कोई लेना-देना नहीं है, परन्तु यदि वह पश्चाताप न करे, तो वह दण्ड पाएगा।
20. कुछ लोगों में यह बहुत आम है कि वे किसी जागृत पापी से कहते हैं, “तुम बड़ी अच्छी दशा में हो, मैं तुम्हें ऐसा देखकर प्रसन्न हूँ, और तुम्हारे विषय में मेरा हियाव बढ़ता है।” कभी-कभी ऐसा लगता है मानो कलीसिया ने पापियों को पवित्र आत्मा का विरोध करने में सहायता देने के लिए शैतान से साँठ-गाँठ कर ली हो। पवित्र आत्मा पापी को जो बात अनुभव कराना चाहता है, वह यह है कि उसकी सारी चालें गलत हैं, और वे नरक को ले जाती हैं। और हर कोई इसके उलटी छाप डालने का षड्यन्त्र कर रहा है। आत्मा उसे हताश करने का प्रयत्न कर रहा है, और वे उसे प्रोत्साहित करने का प्रयत्न कर रहे हैं; आत्मा उसे यह दिखाकर व्याकुल करता है कि वह पूरी तरह गलत है, और वे यह कहकर उसे शान्ति देते हैं कि वह अच्छा कर रहा है। क्या बात यहाँ तक पहुँच गई है कि सत्य का सबसे बुरा विरोध, और आत्मा के मार्ग की सबसे बड़ी बाधा, कलीसिया ही से उत्पन्न हो? पापी! ऐसी किसी बात पर विश्वास मत कीजिए। आप आशाजनक दशा में नहीं हैं। आप अच्छा नहीं, बुरा कर रहे हैं; जितना बुरा आप कर सकते हैं उतना, जब तक आप पवित्र आत्मा का विरोध कर रहे हैं। 21. एक और बहुत घातक तरीका, जिससे पापियों को झूठी शान्ति दी जाती है, यह है कि पवित्रशास्त्र की कुछ ऐसी प्रतिज्ञाएँ उन पर लागू की जाएँ जो केवल पवित्र लोगों के लिए ठहराई गई थीं। यह शैतान की एक बड़ी युक्ति है। यूनिवर्सलिस्ट इसका बहुत अभ्यास करते हैं। परन्तु मसीही भी प्रायः ऐसा करते हैं। उदाहरण के लिए:
(1.) “धन्य हैं वे, जो शोक करते हैं, क्योंकि वे शान्ति पाएँगे।” कितनी ही बार यह पद उन चिन्तित पापियों पर लागू किया गया है जो इसलिए व्याकुल थे कि वे परमेश्वर के अधीन नहीं होना चाहते थे; धन्य हो तुम जो शोक करते हो। सचमुच! यह तब सत्य है जब वे परमेश्वर-भक्ति के शोक से शोक करते हैं। परन्तु यह पापी किस बात पर शोक कर रहा है? वह इसलिए शोक कर रहा है कि परमेश्वर की व्यवस्था पवित्र है और उद्धार की उसकी शर्तें ऐसी स्थिर हैं कि वह उन्हें अपने मन के अनुसार नीचे नहीं ला सकता। ऐसे विद्रोही से कहिए—धन्य हैं वे, जो शोक करते हैं! आप इसे उतनी ही उचित रीति से उन पर भी लागू कर सकते हैं जो नरक में हैं। वहाँ भी शोक है। पापी इसलिए शोक कर रहा है कि उद्धार का कोई दूसरा मार्ग नहीं है, क्योंकि परमेश्वर ऐसा पवित्र है कि वह उससे अपने सब पाप छोड़ देने की माँग करता है, और वह अनुभव करता है कि समय आ गया है कि उसे या तो उन्हें छोड़ना होगा, या दण्ड पाना होगा। क्या हम उससे कहें कि वह शान्ति पाएगा? तो जाइए और शैतान से कहिए, “बेचारे शैतान, तू अभी शोक करता है, परन्तु बाइबल कहती है कि यदि तू शोक करे तो तू धन्य है, और कुछ समय बाद तू शान्ति पाएगा।”
(2.) “जो ढूँढ़ता है, वह पाता है।” यह पापियों से इस ढंग से कहा जाता है मानो चिन्तित पापी धर्म को ढूँढ़ रहा हो। यह प्रतिज्ञा उन मसीहियों के सम्बन्ध में दी गई थी जो विश्वास से माँगते हैं, और परमेश्वर की इच्छा पूरी करने का यत्न करते हैं, और यह उन पर लागू नहीं होती जो आशा या शान्ति ढूँढ़ रहे हैं; वरन् पवित्र खोज पर लागू होती है। इसे पश्चाताप न करनेवाले पापी पर लागू करना केवल उसे धोखा देना है, क्योंकि उसकी खोज इस प्रकार की नहीं है। उससे यह कहना, “तुम ढूँढ़ रहे हो, है न? अच्छा, ढूँढ़ो, और तुम पाओगे,” एक घातक भ्रम को पालना है। जब तक वह पश्चाताप न करनेवाला बना रहता है, उसमें एक भी ऐसी इच्छा नहीं है जो शैतान में न हो सकती हो, और फिर भी वह शैतान ही बना रहे।
यदि उसमें अपना कर्तव्य करने की इच्छा होती, यदि वह परमेश्वर की इच्छा पूरी करने और अपने पापों को छोड़ देने का यत्न कर रहा होता, तो वह मसीही होता। परन्तु पश्चाताप न करनेवाले पापी को ऐसी प्रतिज्ञा से शान्ति देना—इससे अच्छा तो आप शैतान को ही शान्ति दे दें।
(3.) “भले काम करने में हियाव न छोड़ो, क्योंकि यदि तुम ढीले न हो, तो ठीक समय पर कटनी काटोगे।” इसे शान्ति देने के लिए किसी पापी पर लागू करना बेतुकी बात है। मानो वह परमेश्वर को प्रसन्न करने के लिए कुछ कर रहा हो। उसने कभी भला नहीं किया है, और अभी से अधिक बुरा उसने कभी नहीं किया। मान लीजिए मेरा पड़ोसी, जो उस समय भीतर आया जब मैं अपने बच्चे को वश में करने का प्रयत्न कर रहा था, बच्चे से कहे, “यदि तू ढीला न हो, तो ठीक समय पर कटनी काटेगा,” तो मैं क्या कहूँगा? “काटेगा, हाँ, तू काटेगा, यदि तू अपना हठ नहीं छोड़ेगा, तो तू सचमुच काटेगा, क्योंकि मैं छड़ी चलाऊँगा।” इसी प्रकार संघर्ष करता हुआ पापी, यदि वह अपने पाप नहीं छोड़ता, तो नरक के दण्ड की कटनी काटेगा।
22. कुछ धर्म का अंगीकार करनेवाले, जब वे जागृत पापियों से बातचीत करने का प्रयत्न करते हैं, तो यह कहने के बहुत शौकीन होते हैं, “मैं तुम्हें अपना अनुभव बताऊँगा।” यह एक खतरनाक फन्दा है, और प्रायः शैतान को एक पकड़ दे देता है कि वह आपके अनुभव की नकल करने के प्रयत्न द्वारा उसे नरक की ओर ले जाए। यदि आप उसे अपना अनुभव बताएँ, और वह उसे मसीही अनुभव समझे, तो वह लगभग निश्चय ही उसकी नकल करने का प्रयत्न करने लगेगा, और सुसमाचार का, या अपने प्राण में आत्मा की अगुवाई का अनुसरण करने के बदले, वह आपके उदाहरण का अनुसरण करेगा। यह बेतुका भी है और खतरनाक भी। उसके मन में कभी ठीक वैसी भावनाएँ नहीं होंगी जैसी आपके मन में थीं। कभी कोई दो व्यक्ति ठीक एक समान अनुभव से नहीं गुज़रे। मनुष्यों के अनुभव उतने ही भिन्न होते हैं जितने उनके चेहरे। ऐसा ढंग उसे भटका देने की बहुत सम्भावना रखता है। इसका उद्देश्य प्रायः उसे ठीक उस बिन्दु पर प्रोत्साहित करने के सिवा और कुछ नहीं होता जहाँ उसे प्रोत्साहित नहीं किया जाना चाहिए, अर्थात् उसके परमेश्वर के अधीन होने से पहले। और इसका स्वभाव ही ऐसा है कि यह परमेश्वर के उस काम में बाधा डालता है जो उसके
प्राण में हो रहा है।
23. कितनी ही बार लोग किसी जागृत पापी से कहेंगे कि परमेश्वर ने उसमें अच्छा काम आरम्भ किया है, और वह उसे पूरा करेगा। मैंने ऐसे माता-पिता देखे हैं जो अपने बच्चों से इसी प्रकार बातें करते थे, और ज्योंही उन्होंने अपने बच्चों को जागृत देखा, उनके विषय में अपनी सारी पहली चिन्ता छोड़ दी, और यह सोचकर निश्चिन्त बैठ गए कि अब जबकि परमेश्वर ने उनके बच्चों में अच्छा काम आरम्भ किया है, वह उसे पूरा करेगा। यह उतना ही तर्कसंगत होता जितना किसी किसान का अपने अनाज के विषय में ऐसा कहना, और ज्योंही वह भूमि से ऊपर निकले, यह कहना, “अच्छा, परमेश्वर ने मेरे खेत में अच्छा काम आरम्भ किया है, और वह उसे पूरा करेगा।” ऐसे किसान के विषय में क्या सोचा जाएगा जो अपना बाड़ा खड़ा करने में इसलिए लापरवाही करे कि परमेश्वर ने उसे अनाज की फसल देने का काम आरम्भ कर दिया है? यदि आप किसी पापी से ऐसा कहें, और वह आपकी बात पर विश्वास कर ले, तो यह निश्चय ही उसका विनाश होगा, क्योंकि यह उसे वह करने से रोकेगा जो उसके उद्धार पाने के लिए नितान्त अनिवार्य है। यदि, ज्योंही पापी जागृत होता है, उसे यह सिखाया जाए कि अब परमेश्वर ने एक अच्छा काम आरम्भ किया है, जिसे केवल आगे बढ़ाया जाना है, और परमेश्वर निश्चय ही उसे पूरा करेगा, तो वह देखता है कि अब उसके चिन्तित होने का कोई कारण नहीं रहा, क्योंकि वास्तव में उसके करने को और कुछ बचा ही नहीं। और इस प्रकार वह पश्चाताप करने और परमेश्वर के अधीन होने के वर्तमान दायित्व के उस असहनीय दबाव से छूट जाएगा। और यदि वह ऐसा करने के अपने दायित्व के बोध से छूट गया, तो वह कभी ऐसा नहीं करेगा।
24. कुछ लोग पापी से कहेंगे, “अच्छा, तुमने अपने पापों को छोड़ दिया है, है न?” “ओह, हाँ,” पापी कहता है। जबकि यह सब झूठ है, उसने एक क्षण के लिए भी अपने पापों को नहीं त्यागा है, उसने केवल पाप के एक रूप को दूसरे रूप से बदल लिया है; केवल विरोध की एक नई मुद्रा अपना ली है। और उससे यह कहना कि उसने उन्हें छोड़ दिया है, उसे झूठी शान्ति देना है।
25. कभी-कभी किसी चिन्तित पापी की वेदना को दूर करने के उद्देश्य से यह निर्देश दिया जाता है, “जो तुम कर सकते हो वह करो, और बाकी परमेश्वर करेगा,” या “जो तुम कर सकते हो वह करो, और परमेश्वर तुम्हारी सहायता करेगा।” यह पापी से यह कहने के समान है, “परमेश्वर तुमसे जो करने की माँग करता है वह तुम नहीं कर सकते, परन्तु यदि तुम वह करो जो तुम कर सकते हो, तो बाकी के विषय में परमेश्वर तुम्हारी सहायता करेगा।” अब पापी प्रायः यह धारणा बना लेते हैं कि जो कुछ वे कर सकते थे वह सब उन्होंने कर लिया है, जबकि वास्तव में उन्होंने कुछ भी नहीं किया, केवल अपनी सारी शक्ति से परमेश्वर का विरोध किया है। मैंने प्रायः उन्हें यह कहते सुना है, “जो कुछ मैं कर सकता हूँ वह सब मैंने कर लिया है, और मुझे कोई छुटकारा नहीं मिलता, मैं और क्या कर सकता हूँ?” अब आप देख सकते हैं कि ऐसे व्यक्ति को यह कितनी शान्ति देनेवाली बात होगी कि धर्म का अंगीकार करनेवाला कोई व्यक्ति आकर कहे, “यदि तुम वह करो जो तुम कर सकते हो, तो परमेश्वर तुम्हारी सहायता करेगा।” यह उसकी सारी तीखी व्याकुलता को एकाएक दूर कर देता है। वह बेचैन और दुखी तो हो सकता है, परन्तु उसकी वेदना जाती रहती है।
26. फिर वे कहते हैं, “जो तुम्हारे पास है उसके लिए तुम्हें धन्यवादी होना चाहिए, और और अधिक की आशा रखनी चाहिए।” यदि पापी को पाप का बोध हुआ है, तो वे उससे कहते हैं कि उसे पाप के बोध के लिए धन्यवादी होना चाहिए, और मन-परिवर्तन की आशा रखनी चाहिए। यदि उसमें कुछ भावना है, तो उसे अपनी उस भावना के लिए धन्यवादी होना चाहिए, मानो उसकी भावना धार्मिक भावना हो, जबकि उसमें शैतान से अधिक धर्म नहीं है। धन्यवादी होने का कारण तो उसके पास सचमुच है; इस बात के लिए धन्यवादी कि वह नरक से बाहर है, और इस बात के लिए धन्यवादी कि परमेश्वर अब भी उसकी बाट जोह रहा है। परन्तु उससे यह कहना हास्यास्पद है कि उसे अपने मन की दशा के विषय में धन्यवादी होना चाहिए, जबकि वह सारे समय अपनी सारी शक्ति से अपने सृजनहार का विरोध कर रहा है। पापियों के लिए प्रार्थना करने में होनेवाली भूलें।
मैं यहाँ पापियों की उपस्थिति में उनके लिए प्रार्थना करने की कुछ भूलों का उल्लेख करूँगा, जिनके द्वारा उनके मन पर एक दुर्भाग्यपूर्ण छाप पड़ती है, और जिसके परिणामस्वरूप वे प्रायः अपनी व्याकुलता में झूठी शान्ति पा लेते हैं।
1. लोग कभी-कभी पापियों के लिए ऐसे प्रार्थना करते हैं मानो वे दोषी ठहराए जाने से अधिक दया के पात्र हों। वे उनके लिए शोक करनेवालों के रूप में प्रार्थना करते हैं। “हे प्रभु, इन उदास शोक करनेवालों की सहायता कर,” मानो वे केवल शोक कर रहे हों, उस व्यक्ति के समान जिसने कोई मित्र खो दिया हो, या जिस पर कोई और विपत्ति आ पड़ी हो, और वे उसमें कुछ न कर सकते हों, और उसके लिए बहुत दुखी हों, परन्तु मृत्यु तो आकर ही रहेगी, और इसलिए वे बड़े दया के पात्र हों, जैसे वे वहाँ उदास, खिन्न और आहें भरते हुए बैठे हों। बाइबल कभी इस प्रकार बात नहीं करती। वह पापियों पर दया करती है, परन्तु उन पर पागल और दोषी विद्रोहियों के रूप में दया करती है, जो दोषी हैं, और नरक जाने के योग्य हैं, न कि बेचारे उदास शोक करनेवालों के रूप में, जो उसमें कुछ नहीं कर सकते, जो छुटकारा चाहते हैं, परन्तु बैठकर शोक करने के सिवा और कुछ नहीं कर सकते।
2. उनके लिए बेचारे पापियों के रूप में प्रार्थना करना। क्या बाइबल कभी ऐसी भाषा का प्रयोग करती है? बाइबल कभी उनके विषय में “बेचारे पापी” कहकर बात नहीं करती, मानो वे दोषी ठहराए जाने से अधिक दया के पात्र हों। मसीह अपने हृदय में पापियों पर दया करता है। और परमेश्वर भी उन पर दया करता है। जब वह उन्हें अपने अनन्त क्रोध के संकट को मोल लेकर, हठ और मनमानी के साथ अपनी अभिलाषाओं को तृप्त करते हुए चलते देखता है, तो वह अपने हृदय में उनके लिए करुणा का पूरा उमड़ता हुआ प्रवाह अनुभव करता है। परन्तु वह कभी अपने मुँह से ऐसी कोई बात नहीं निकलने देता मानो पापी केवल एक “बेचारा प्राणी” हो जिस पर दया की जाए, मानो वह उसमें कुछ न कर सकता हो। यह विचार कि वह दुष्ट होने के बदले बेचारा है, दोषी होने के बदले अभागा है, पापी को बहुत राहत देता है। मैंने किसी सभा में पापी को सत्य के नीचे वेदना से छटपटाते देखा है, जब तक किसी ने उसके लिए एक बेचारे प्राणी के रूप में प्रार्थना करना आरम्भ नहीं कर दिया। और तब वह आँसुओं में फूट पड़ता, और फूट-फूटकर रोता, और समझता कि ऐसी प्रार्थना से उसे बड़ा लाभ हुआ है। “ओह, वह कैसी अच्छी प्रार्थना थी।” यदि आप अब जाकर उस पापी से बातचीत करें, तो आप पाएँगे कि वह अपने आप पर एक बेचारे अभागे प्राणी के रूप में दया कर रहा है, शायद अपनी दुखद दशा पर रो रहा है, परन्तु उसका पाप का बोध, भयानक दोष की उसकी गहरी छाप, सब जाती रही है।
3. यह प्रार्थना करना कि परमेश्वर पापी को पश्चाताप करने में सहायता दे। “हे प्रभु, इस बेचारे पापी को अभी पश्चाताप करने की सामर्थ्य दे।” इससे पापी के मन में यह विचार पहुँचता है कि वह अभी अपनी सारी शक्ति से पश्चाताप करने का प्रयत्न कर रहा है, और वह ऐसा नहीं कर सकता, और इसलिए मसीही परमेश्वर को पुकार रहे हैं कि वह उसकी सहायता करे, और उसे ऐसा करने की सामर्थ्य दे। धर्म का अंगीकार करनेवालों में से अधिकांश पापियों के लिए यह प्रार्थना नहीं करते कि परमेश्वर उन्हें पश्चाताप करने के लिए इच्छुक बनाए, परन्तु यह कि वह उन्हें सामर्थ्य दे, या उन्हें समर्थ बनाए। कोई आश्चर्य नहीं कि उनकी प्रार्थनाएँ सुनी नहीं जातीं। वे पापी को उसकी ज़िम्मेदारी के बोध से छुटकारा दे देते हैं, और इससे उसकी व्याकुलता दूर हो जाती है। परन्तु यह परमेश्वर का अपमान है, मानो परमेश्वर ने पापी को वह करने की आज्ञा दी हो जो वह कर ही नहीं सकता।
4. लोग कभी-कभी यह प्रार्थना करते हैं: “हे प्रभु, ये पापी कुढ़ते हुए तुझे ढूँढ़ रहे हैं।” यह भाषा उस घटना की ओर संकेत करती है जो उस समय हुई जब यीशु एक छोटा बालक था, और रब्बियों और उपदेशकों से बातचीत करने के लिए मन्दिर में गया। आपको स्मरण होगा कि उसके माता-पिता उसके न होने का पता चलने से पहले घर की ओर एक दिन का मार्ग चले गए, और तब वे लौट आए, और चारों ओर ढूँढ़ने के बाद, उन्होंने बालक यीशु को मन्दिर में खड़े होकर विद्वानों से वाद-विवाद करते पाया, और उसकी माता ने उससे कहा, “पुत्र, तू ने हम से क्यों ऐसा व्यवहार किया? देख, तेरा पिता और मैं कुढ़ते हुए तुझे ढूँढ़ते थे।” और इसी प्रकार यह प्रार्थना पापियों को ऐसे दिखाती है मानो वे यीशु को ढूँढ़ रहे हों, और वह उनसे छिप जाता हो, और वे चारों ओर देखते, और खोजते, और उसे पाने का प्रयत्न करते हों, और आश्चर्य करते हों कि यीशु कहाँ है, और कहते हों, “हे प्रभु, हम तीन दिन से कुढ़ते हुए यीशु को ढूँढ़ रहे हैं।” यह झूठ है। किसी भी पापी ने कभी तीन दिन, या तीन मिनट भी, अपने सारे हृदय से यीशु को नहीं ढूँढ़ा कि वह उसे न पा सका हो। देखिए, यीशु उसके द्वार पर खड़ा खटखटा रहा है, देखिए, वह ठीक उसके सामने है, उससे विनती कर रहा है, और उसके सब झूठे बहानों के बावजूद उसका सामना करके उसे निरुत्तर कर रहा है। उसे ढूँढ़ रहा है! पापी रिरियाकर और रोकर कह सकता है, “ओह, मैं कैसा कुढ़ रहा हूँ, और यीशु को ढूँढ़ रहा हूँ।” ऐसी कोई बात नहीं; यीशु आपको ढूँढ़ रहा है। और फिर भी कितने ही दबे हुए विवेक ऐसी किसी प्रार्थना को सुनकर राहत और शान्ति पा लेते हैं।
5. “हे प्रभु, इन पापियों पर दया कर, जो तेरे प्रेम को जानने की खोज में हैं।” यह बहुतों की प्रिय अभिव्यक्ति है, मानो पापी मसीह के प्रेम को जानने की खोज में हों, और न जान सकते हों। ऐसी कोई बात नहीं। वे मसीह के प्रेम को नहीं ढूँढ़ रहे, परन्तु यीशु मसीह के बिना स्वर्ग पहुँचने का मार्ग ढूँढ़ रहे हैं। मानो वे उसे ढूँढ़ रहे हों, और वह ऐसा कठोर-हृदय हो कि उन्हें वह पाने न दे।
6. “हे प्रभु, इन पश्चातापी प्राणों पर दया कर;” चिन्तित पापियों को पश्चातापी प्राण कहना। यदि वे पश्चातापी हैं, तो वे मसीही हैं। किसी ऐसे पापी पर, जिसका मन-परिवर्तन नहीं हुआ है, यह छाप डालना कि वह पश्चातापी है, उससे झूठ पर विश्वास कराना है। परन्तु पापी को इससे बड़ी शान्ति मिलती है, और वह इसे उठा लेना और फिर से दोहराकर प्रार्थना करना पसन्द करता है, “हे प्रभु, मैं एक बेचारा पश्चातापी प्राणी हूँ, मैं बहुत पश्चातापी हूँ, मैं बहुत व्याकुल हूँ, हे प्रभु, एक बेचारे पश्चातापी पर दया कर।” भयंकर भ्रम!
7. कभी-कभी लोग चिन्तित पापियों के लिए दीन प्राणियों के रूप में प्रार्थना करते हैं। “हे प्रभु, इन पापियों ने अपने आप को दीन किया है।” अरे, यह सत्य नहीं है, उन्होंने अपने आप को दीन नहीं किया है; यदि किया होता, तो प्रभु ने, जैसी उसने प्रतिज्ञा की है, उन्हें ऊँचा उठाया होता और शान्ति दी होती। इसी प्रकार का एक भजन है, जिसने बड़ी हानि की है। वह इस प्रकार आरम्भ होता है: “आ, हे दीन पापी, जिसके हृदय में हज़ारों विचार घूमते हैं।”
यह भजन एक बार एक पादरी ने एक जागृत पापी को उसकी दशा पर लागू होनेवाले भजन के रूप में दिया। उसने पढ़ना आरम्भ किया, “आ, हे दीन पापी।” वह रुक गया, “दीन पापी, यह मुझ पर लागू नहीं होता, मैं दीन पापी नहीं हूँ।” आह, उसके लिए यह कितना अच्छा हुआ कि पवित्र आत्मा ने उसे उस भजन से अधिक अच्छी शिक्षा दी थी। यदि भजन में कहा गया होता, आ, हे चिन्तित पापी, या दोषी पापी, या काँपते हुए पापी, तो वह ठीक होता, परन्तु उसे दीन पापी कहना ठीक नहीं था। इसी प्रकार के बहुत से भजन हैं। पापियों को किसी भजन की झूठी भावनाओं को उद्धृत करते हुए पाना बहुत आम है, ताकि वे परमेश्वर के विरुद्ध अपने विद्रोह में अपने आप को निर्दोष ठहरा सकें।
एक पादरी ने मुझे बताया कि उसने अभी हाल ही में इन शब्दों में एक प्रार्थना सुनी, “हे प्रभु, इन पापियों ने अपने आप को दीन किया है, और जितना अच्छा वे जानते हैं उतनी अच्छी रीति से तेरे पास आए हैं। यदि वे इससे अच्छा जानते, तो इससे अच्छा करते, परन्तु हे प्रभु, जैसे वे अपनी सबसे अच्छी रीति से तेरे पास आए हैं, हम तुझसे प्रार्थना करते हैं कि तू उन्हें ग्रहण कर और दया दिखा।” भयानक!
8. बहुत से लोग यह प्रार्थना करते हैं, “हे पिता, इन्हें क्षमा कर, क्योंकि ये नहीं जानते कि क्या कर रहे हैं।” यह वह प्रार्थना है जो मसीह ने अपने हत्यारों के लिए की थी। और उस दशा में यह सत्य था, वे नहीं जानते थे कि वे क्या कर रहे हैं, क्योंकि वे विश्वास नहीं करते थे कि यीशु मसीह ही मसीहा है। परन्तु सुसमाचार के अधीन रहनेवाले पापियों के विषय में यह नहीं कहा जा सकता कि वे नहीं जानते कि वे क्या कर रहे हैं। वे जानते हैं कि वे क्या कर रहे हैं। वे उसकी पूरी सीमा को नहीं देखते, परन्तु वे यह तो जानते हैं कि वे परमेश्वर के विरुद्ध पाप कर रहे हैं, और मसीह को ठुकरा रहे हैं, और कठिनाई यह है कि वे परमेश्वर के अधीन होने को तैयार नहीं हैं। परन्तु ऐसी प्रार्थना उसे राहत का अनुभव कराने के लिए उपयुक्त है, और उससे यह कहलवाती है, “हे प्रभु, तू मुझे इतना दोष कैसे दे सकता है, मैं एक बेचारा अज्ञानी प्राणी हूँ, मैं नहीं जानता कि जो मुझसे माँगा गया है उसे कैसे करूँ। यदि मैं जानता कि कैसे, तो मैं उसे करता।”
9. एक और अभिव्यक्ति यह है, “हे प्रभु, इन पापियों का मार्गदर्शन कर, जो सिय्योन का मार्ग पूछ रहे हैं, और जिनके मुँह उसी की ओर हैं।” परन्तु यह भाषा केवल मसीहियों पर लागू होती है। पापियों के मुँह सिय्योन की ओर नहीं हैं, उनके मुँह नरक की ओर लगे हुए हैं। और किसी पापी के विषय में यह कैसे कहा जा सकता है कि वह सिय्योन का “मार्ग पूछ रहा है,” जबकि वहाँ जाने की उसकी कोई इच्छा ही नहीं है। वास्तविक कठिनाई यह है कि वह उस मार्ग पर चलने को तैयार नहीं है जिस पर वह जानता है कि उसे जाना चाहिए।
10. लोग प्रार्थना करते हैं कि पापियों को और अधिक पाप का बोध हो। या, वे यह प्रार्थना करने के बदले कि वे अभी पश्चाताप करें, यह प्रार्थना करते हैं कि पापी गम्भीर और कोमल मन से घर जाएँ, और इस विषय पर विचार करें। या, वे ऐसे प्रार्थना करते हैं मानो वे यह समझते हों कि पापी वह करने को तैयार है जो उससे माँगा जाता है। ऐसी सब प्रार्थनाएँ ठीक वैसी ही प्रार्थनाएँ हैं जैसी शैतान चाहता है। वह ऐसी प्रार्थनाएँ होते देखना चाहता है, और मैं कहने का साहस करता हूँ कि उसे इसकी कोई चिन्ता नहीं कि ऐसी कितनी प्रार्थनाएँ चढ़ाई जाती हैं।
कभी-कभी मैंने किसी चिन्तित खोजियों की सभा में, या जब पापियों को चिन्तित खोजियों की बेंच पर बुलाया गया है, और पादरी ने उद्धार का मार्ग उनके लिए बिल्कुल स्पष्ट कर दिया है, और उनके मार्ग से ठोकर के सब पत्थर हटा दिए हैं, और विभिन्न बातों के विषय में उनके मन का अन्धकार दूर कर दिया है, और जब वे ठीक झुक जाने को तैयार होते हैं, तब देखा है कि किसी को प्रार्थना करने के लिए बुलाया जाता है, और यह प्रार्थना करने के बदले कि वे अभी पश्चाताप करें, वह प्रार्थना करने लगता है, “हे प्रभु, हम प्रार्थना करते हैं कि ये पापी गम्भीर हों, कि उन्हें अपनी पापमयता का गहरा बोध हो, कि वे अपनी खोई हुई दशा की छाप लेकर घर जाएँ, कि वे अपनी सामर्थ्य से कुछ करने का प्रयत्न न करें, कि वे अपना पाप का बोध न खोएँ, और कि तेरे अपने समय पर और तेरी अपनी रीति से, वे परमेश्वर की सन्तानों की महिमामय ज्योति और स्वतन्त्रता में ले आए जाएँ।”
उन्हें ठीक उसी स्थान पर तुरन्त अधीन होने के बिन्दु तक ले आने के बदले, यह उन्हें साँस लेने का समय दे देता है, यह पाप के बोध का सारा दबाव निकाल देता है, और वह फिर से खुलकर साँस लेता है और राहत अनुभव करता है, और निश्चिन्त होकर बैठ जाता है। इस प्रकार, जब पापी को मानो ऊपर तक ले आया गया है, और वह स्वर्ग के फाटक पर खड़ा है, तब ऐसी प्रार्थना उसे भीतर धकेलने के बदले, उसे फिर से बहुत पीछे हटा देती है,—“वहाँ, बेचारे, वहीं बैठे रहो जब तक परमेश्वर तुम्हारी सहायता न करे।”
11. मसीही कभी-कभी इस ढंग से प्रार्थना करते हैं कि यह छाप पड़ती है कि मसीह पापी का मित्र उस अर्थ से भिन्न अर्थ में है जिसमें परमेश्वर पिता है। वे उससे प्रार्थना करते हैं, “हे पापियों के मित्र,” मानो परमेश्वर क्रोध और कठोर प्रतिशोध से भरा हो, और उस बेचारे अभागे को कुचलने ही वाला हो, जब तक यीशु मसीह आकर उसका पक्ष न ले, और उसे छुड़ा न ले। अब यह सब गलत है। पिता और पुत्र पूरी तरह एकमत हैं, उनकी भावनाएँ बिल्कुल एक समान हैं, और दोनों समान रूप से चाहते हैं कि पापी उद्धार पाएँ। और ऐसी छाप डालना पापी को धोखा देता है, और परमेश्वर के प्रति गलत भावनाओं की ओर ले जाता है। परमेश्वर पिता को ऐसे दिखाना मानो वह अपने हाथ में न्याय की तलवार लिए उसके ऊपर खड़ा हो, और वार करने को उतावला हो, जब तक मसीह बीच में न आ जाए, सत्य नहीं है। पिता भी पापी का उतना ही मित्र है जितना पुत्र। उसकी करुणा बराबर है। परन्तु यदि पापी के मन में परमेश्वर पिता के विषय में यह प्रतिकूल विचार बैठ जाए, तो वह कैसे कभी उससे अपने सारे हृदय से ऐसा प्रेम करेगा कि कह सके, “हे अब्बा, हे पिता।”
12. प्रार्थना करने के ढंग से प्रायः यह छाप पड़ती है कि आप पापियों से अभी पश्चाताप करने की आशा नहीं रखते, या आप यह आशा रखते हैं कि परमेश्वर उनका कर्तव्य करेगा, या आप उन्हें अपनी प्रार्थनाओं पर भरोसा करने के लिए प्रोत्साहित करना चाहते हैं। और इस प्रकार पापी नष्ट हो जाते हैं। कभी इस प्रकार प्रार्थना न कीजिए कि पापियों पर यह छाप पड़े कि आप मन ही मन आशा रखते हैं कि वे पहले से ही मसीही हैं, या आपको पक्का भरोसा है कि वे कुछ समय बाद मसीही हो जाएँगे, या आप आधा विश्वास करते हैं कि अब उनका मन-परिवर्तन हो गया है। यह सदा दुर्भाग्यपूर्ण होता है। इस प्रकार अनगिनत लोग झूठी शान्ति से धोखा खाते हैं, और ठीक निर्णायक बिन्दु पर अपने आप को अन्तिम रूप से परमेश्वर को सौंप देने से रोक दिए जाते हैं।
भाइयो, मैं इस क्षेत्र को इतना विस्तृत पाता हूँ कि जो कुछ मैं कहना चाहता था वह सब सम्भवतः नहीं कह सकता। बहुत सी और बातें थीं जिनको मैं आज सन्ध्या छूना चाहता था, परन्तु समय बहुत बीत चुका है। मुझे कुछ संक्षिप्त टिप्पणियों के साथ समाप्त करना होगा:
टिप्पणियाँ
1. बहुत से लोग जो चिन्तित पापियों के साथ इस प्रकार व्यवहार करते हैं, वे झूठी दया के कारण ऐसा करते हैं। उनमें इतनी सहानुभूति और करुणा होती है कि वे उन्हें वह सत्य बताना सह नहीं सकते जो उनके उद्धार के लिए आवश्यक है। इसी प्रकार कोई शल्य-चिकित्सक भी, जब वह देखे कि किसी मनुष्य की बाँह काटनी पड़ेगी, नहीं तो वह मर जाएगा, झूठी दया की इस भावना के वश में होकर केवल एक पट्टी लगा दे, और उसे अफ़ीम की दवा दे दे। उसमें कोई परोपकार नहीं है। सच्चा परोपकार शल्य-चिकित्सक को इस ओर ले जाएगा कि वह अपनी भावनाओं को छिपाए, और शान्त और स्थिर रहे, और तेज़ छुरी से अंग को काट दे, और प्राण बचा ले। इससे कुछ भी कम करना झूठी कोमलता है। मैंने एक बार मन की व्याकुलता में पड़ी एक स्त्री को देखा, जो महीनों से लगभग निराशा की सीमा तक पहुँच चुकी थी। उसके मित्रों ने ये सब झूठी शान्तियाँ आज़माई थीं, पर कोई प्रभाव न हुआ, और वे उसे एक पादरी से मिलाने लाए। वह दुबली हो गई थी, और वेदना से थककर चूर हो चुकी थी। पादरी ने उस पर अपनी दृष्टि गड़ाई, और उसके मन पर सत्य उँडेल दिया, और अत्यन्त तीखे ढंग से उसे डाँटा। जो स्त्री उसके साथ थी उसने बीच में टोका, उसे यह निर्दयता लगी, और उसने कहा, “ओह, इसे शान्ति दीजिए, यह इतनी व्याकुल है, इसे और कष्ट मत दीजिए, यह इसे सह नहीं सकती।” उसने मुड़कर उसे डाँटा, और उसे बाहर भेज दिया, और फिर चिन्तित पापिनी पर आग के समान सत्य उँडेल दिया, और पाँच मिनट में उसका मन-परिवर्तन हो गया, और वह आनन्द से भरी हुई घर गई। स्पष्ट सत्य ने उसकी सारी झूठी धारणाओं को बहा दिया, और कुछ ही क्षणों में वह परमेश्वर में आनन्दित थी।
2. चिन्तित पापियों के साथ ऐसा व्यवहार, उन्हें झूठी शान्ति देना, वास्तव में निर्दयता है। यह कब्र के समान निर्दयी है, नरक के समान निर्दयी है, क्योंकि यह पापी को उसके जलते हुए अथाह गड्ढे में भेजने वाला है। मसीही चिन्तित लोगों के लिए करुणा अनुभव करते हैं, और उन्हें ऐसा करना भी चाहिए। परन्तु उन्हें सबसे अन्तिम बात जो करनी चाहिए, वह यह है कि ठीक उस बिन्दु पर पीछे हट जाएँ जहाँ बात संकट की घड़ी तक आ पहुँचती है। उन्हें करुणा अनुभव करनी चाहिए, परन्तु उन्हें उसे ठीक वैसे ही दिखाना चाहिए जैसे शल्य-चिकित्सक दिखाता है, जब वह सोच-समझकर, सही और सबसे अच्छी रीति से काम में लगता है, और मनुष्य की बाँह काट देता है, और इस प्रकार उसे चंगा करता और उसका प्राण बचाता है। ठीक इसी प्रकार मसीहियों को पापी को अपनी करुणा और कोमलता दिखानी चाहिए, परन्तु उन्हें पूरी तरह और दृढ़ता से परमेश्वर का पक्ष लेना चाहिए। उन्हें पापी के सामने उसकी दशा की सबसे बुरी बात खोलकर रखनी चाहिए, उसके दोष और संकट को प्रकट करना चाहिए, और फिर उसे सीधे क्रूस तक ले जाना चाहिए, और तुरन्त अधीन होने पर ज़ोर देना चाहिए। उनमें इतनी दृढ़ता होनी चाहिए कि वे इस काम को पूरी रीति से करें, और यदि वे पापी को व्याकुल और वेदना में देखें, तब भी उन्हें उस पर लगातार दबाव डालते जाना चाहिए, और तनिक भी ढीला नहीं पड़ना चाहिए, चाहे वह कितनी ही वेदना में क्यों न हो, परन्तु तब तक दबाव डालते रहना चाहिए जब तक वह झुक न जाए।
ऐसा करने के लिए प्रायः साहस की आवश्यकता होती है। मैं प्रायः ऐसी परिस्थितियों में रखा गया हूँ कि इसे अनुभव से जान सकूँ। मैंने अपने आप को ऐसे चिन्तित पापियों से घिरा पाया है जो ऐसी व्याकुलता में थे कि हर नस काँप उठे, कुछ भावनाओं से अभिभूत होकर फ़र्श पर पड़े थे, कुछ को मूर्च्छित होने से बचाने के लिए कपूर सुँघाया जा रहा था, और अन्य ऐसे चीख रहे थे मानो वे अभी नरक में जा रहे हों। अब, मान लीजिए ऐसी दशा में कोई झूठी शान्ति दे। मान लीजिए उसमें इतना साहस न हो कि वह उन्हें तुरन्त और पूर्ण अधीनता के बिन्दु तक ठीक ले आए। ऐसी दशा में ऐसा मनुष्य भरोसे के लिए कितना अयोग्य है।
3. कभी-कभी पापी निराशा और मन की पीड़ा के कारण विक्षिप्त हो जाते हैं। जहाँ ऐसा होता है, वहाँ लगभग सदा इसका कारण यह होता है कि जो लोग उनके साथ व्यवहार करते हैं वे उन्हें झूठी शान्ति से प्रोत्साहित करने का प्रयत्न करते हैं, और इस प्रकार उन्हें पवित्र आत्मा के साथ ऐसे संघर्ष में ले जाते हैं। वे उन्हें सम्भाले रखने का प्रयत्न करते हैं, जबकि परमेश्वर उन्हें तोड़ देने का प्रयत्न कर रहा है। और कुछ समय बाद, इन परस्पर विरोधी प्रभावों से पापी का मन उलझ जाता है, और वह या तो विक्षिप्त हो जाता है, या निराशा में धकेल दिया जाता है।
4. यदि आप पापियों के साथ व्यवहार करने जा रहे हैं, तो स्मरण रखिए कि आप शीघ्र ही न्याय में उनसे मिलनेवाले हैं, और निश्चय कीजिए कि आप उनके साथ ऐसा व्यवहार करें कि यदि वे नाश हों, तो वह उन्हीं का दोष हो। अभी झूठी धारणाओं से उन्हें शान्ति देने का प्रयत्न न कीजिए, कि तब वे इसके लिए आपको उलाहना दें। उत्तम यह है कि आप अपनी झूठी सहानुभूति को दबा दें, और नंगे सत्य को उन्हें जोड़ जोड़ और गूदे गूदे तक चीरने दें, इसकी अपेक्षा कि आप उन्हें झूठी शान्ति से बहलाएँ, और फुसलाकर परमेश्वर से दूर ले जाएँ।
4. पापी! यदि आप किन्हीं मसीहियों से बातचीत करें, और वे आपसे कुछ करने को कहें, तो पहले यह पूछिए, “यदि मैं वह करूँ, तो क्या मैं उद्धार पाऊँगा?” आप चिन्तित हो सकते हैं, और फिर भी उद्धार न पाएँ। आप प्रार्थना कर सकते हैं, और फिर भी उद्धार न पाएँ। आप अपनी बाइबल पढ़ सकते हैं, और फिर भी उद्धार न पाएँ। आप अपनी रीति से साधनों का प्रयोग कर सकते हैं, और फिर भी उद्धार न पाएँ। वे आपसे जो कुछ भी करने को कहें, यदि आप उसे कर सकते हैं और फिर भी उद्धार न पाएँ, तो ऐसी शिक्षाओं पर ध्यान मत दीजिए। वे आपको झूठी शान्ति देने, और उस मुख्य काम से जो करना है आपका ध्यान हटाने, और फुसलाकर आपको नरक में उतार देने वाली हैं। ऐसे किसी निर्देश का पालन मत कीजिए, कहीं ऐसा न हो कि आप उसे करते-करते ही मर जाएँ, और तब फिर सुधार का कोई उपाय नहीं रहता।
अन्त में, किसी पापी से कभी कोई ऐसी बात न कहिए, या उसे कोई ऐसा निर्देश न दीजिए, जो उसे बीच ही में रुक जाने की ओर ले जाए, या जिसमें परमेश्वर के प्रति पूर्ण अधीनता सम्मिलित न हो। उसे इससे कम किसी भी बिन्दु पर रुकने देना असीम रूप से खतरनाक है। मान लीजिए आप किसी चिन्तित खोजियों की सभा में, या किसी प्रार्थना सभा में हैं, और किसी पापी से कहते हैं कि प्रार्थना करो, या कोई पुस्तक पढ़ो, या उद्धार देनेवाले पश्चाताप से कम कोई भी बात करो, और वह उसी रात गिरकर अपनी गर्दन तोड़ बैठे, तो उसके लहू का लेखा किससे लिया जाएगा? न्यू इंग्लैंड में एक युवक एक बार सड़क पर एक पादरी से मिला, और उससे पूछा कि उद्धार पाने के लिए उसे क्या करना चाहिए। पादरी ने उससे कहा कि घर जाओ और अपनी कोठरी में जाकर घुटने टेको और अपना हृदय परमेश्वर को दे दो। “ओह, महोदय,” लड़के ने कहा, “मुझे इतना बुरा लग रहा है, मुझे डर है कि मैं घर पहुँचने तक जीवित नहीं रहूँगा।” पादरी ने अपनी भूल देखी, और उस उलाहने को अनुभव किया जो एक बालक ने इस प्रकार अनजाने में दिया था, और उसने उससे कहा, “अच्छा, तो अपना हृदय यहीं परमेश्वर को दे दो, और घर जाकर अपनी कोठरी में उसे यह बता देना।” ओह, चिन्तित पापियों के लिए इतने सारे निकम्मे शान्तिदाताओं को देखकर, जिनके उत्तरों में झूठ ही पाया जाता है, किसी का भी हृदय लहूलुहान हो जाए। संसार में कितनी भारी आत्मिक नीम-हकीमी है, और कितने “झूठी बात के गढ़नेवाले” हैं, “निकम्मे वैद्य,” जो पापियों को झूठी आशाओं से शान्ति देने, और अपनी “बूढ़ियों की सी कहानियों” और मूर्खतापूर्ण बातों से उन्हें भरमाने से अधिक कुछ नहीं जानते, या जो झूठी कोमलता और सहानुभूति के ऐसे वश में हो जाते हैं कि उनमें इतनी दृढ़ता नहीं रहती कि वे आत्मा की तलवार को मनुष्यों के प्राण तक चीरने, और पापी के नंगे हृदय को खोलकर रख देने के लिए चलाए जाते देख सकें। हाय! कि इतने सारे लोग कभी सेवकाई में रखे जाते हैं, जिनमें इतना कौशल भी नहीं कि वे पास खड़े होकर परमेश्वर के आत्मा को उसका काम करते देख सकें—पुरानी नींवों को तोड़ते हुए, और पापी की सब सड़ी हुई आशाओं को कुचलते हुए, और उसे पूरी तरह यीशु के चरणों पर तोड़कर गिराते हुए।
