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प्रार्थना की आत्मा
“इसी रीति से आत्मा भी हमारी दुर्बलता में सहायता करता है, क्योंकि हम नहीं जानते कि प्रार्थना किस रीति से करना चाहिए; परन्तु आत्मा आप ही ऐसी आहें भर भरकर, जो बयान से बाहर हैं, हमारे लिये विनती करता है; और मनों का जाँचनेवाला जानता है कि आत्मा की मनसा क्या है, क्योंकि वह पवित्र लोगों के लिये परमेश्वर की इच्छा के अनुसार विनती करता है।” रोमियों 8:26, 27
मेरा पिछले से पहलेवाला व्याख्यान प्रभावशाली प्रार्थना के विषय पर था; उसमें मैंने कहा था कि प्रभावशाली या प्रबल प्रार्थना के सबसे महत्त्वपूर्ण गुणों में से एक विश्वास है। यह विषय इतना विस्तृत था कि मैंने इसे अलग चर्चा के लिये रख छोड़ा था। और उसी के अनुसार, पिछले शुक्रवार की संध्या को मैंने प्रार्थना में विश्वास के विषय पर, या जैसा उसे कहा जाता है, विश्वास की प्रार्थना पर व्याख्यान दिया। मेरा इरादा था कि इस विषय की चर्चा एक ही व्याख्यान में कर लूँ। परन्तु चूँकि कुछ बातों को मुझे बहुत संक्षेप में कहना पड़ा, इसलिये मुझे यह विचार आया, और दूसरों ने भी इसकी चर्चा की, कि कुछ ऐसे प्रश्न हो सकते हैं जो लोग पूछेंगे, और जिनका उत्तर अधिक विस्तार से दिया जाना चाहिए, विशेषकर इसलिये कि यह ऐसा विषय है जिस पर बहुत अंधकार छाया हुआ है। प्रचार का एक बड़ा उद्देश्य यह है कि सत्य को इस रीति से प्रस्तुत किया जाए कि उन प्रश्नों का उत्तर मिल जाए जो स्वाभाविक रूप से उन लोगों के मन में उठते हैं जो बाइबल को ध्यान से पढ़ते हैं, और जानना चाहते हैं कि उसका अर्थ क्या है, ताकि वे उस पर आचरण कर सकें। इस पद की व्याख्या करते हुए मैं ये बातें दिखाना चाहता हूँ,
I. यहाँ किस आत्मा की चर्चा की गई है, “आत्मा भी हमारी दुर्बलता में सहायता करता है।”
II. वह आत्मा हमारे लिये क्या करता है।
III. वह वह कार्य क्यों करता है जिसके विषय में यह पद कहता है कि वह करता है। IV. वह इसे कैसे पूरा करता है।
V. जो लोग उसके प्रभाव में हैं, उनके मनों को वह किस मात्रा तक प्रभावित करता है।
VI. उसके प्रभावों को दुष्ट आत्माओं के प्रभावों से, या हमारे अपने मन के सुझावों से, कैसे अलग पहचाना जाए।
VII. पवित्र आत्मा का यह कार्य हम कैसे प्राप्त करें।
VIII. किन लोगों को यह आशा रखने का अधिकार है कि इस विषय में उसके प्रभावों का आनन्द उठाएँ—अथवा आत्मा किनके लिये वे बातें करता है जिनकी चर्चा इस पद में है।
I. इस पद में किस आत्मा की चर्चा की गई है?
कुछ लोगों ने यह समझा है कि इस पद में जिस आत्मा की चर्चा है उसका अर्थ हमारी अपनी आत्मा—हमारा अपना मन—है। परन्तु पद पर थोड़ा-सा ध्यान देने से साफ़ दिखाई देगा कि इसका यह अर्थ नहीं है। तब “आत्मा हमारी दुर्बलता में सहायता करता है” का अर्थ यह होगा, “हमारी अपनी आत्मा हमारी अपनी आत्मा की दुर्बलता में सहायता करती है,”—और “हमारी अपनी आत्मा भी हमारी अपनी आत्मा के लिये विनती करती है।” आप देखते हैं कि इस धारणा पर इसका कोई अर्थ नहीं निकल सकता। जिस रीति से यह पद प्रस्तुत किया गया है, उससे स्पष्ट है कि जिस आत्मा की ओर संकेत है, वह पवित्र आत्मा है। “क्योंकि यदि तुम शरीर के अनुसार दिन काटोगे, तो मरोगे; यदि आत्मा से देह की क्रियाओं को मारोगे, तो जीवित रहोगे। इसलिये कि जितने लोग परमेश्वर के आत्मा के चलाए चलते हैं, वे ही परमेश्वर के पुत्र हैं। क्योंकि तुम को दासत्व की आत्मा नहीं मिली, कि फिर भयभीत हो; परन्तु लेपालकपन की आत्मा मिली है, जिससे हम हे अब्बा, हे पिता कहकर पुकारते हैं। आत्मा आप ही हमारी आत्मा के साथ गवाही देता है, कि हम परमेश्वर की सन्तान हैं।” और यह पद स्पष्ट रूप से उसी आत्मा की बात कर रहा है।
II. आत्मा क्या करता है।
उत्तर—वह पवित्र लोगों के लिये विनती करता है। “वह हमारे लिये विनती करता है,” और जब “हम नहीं जानते कि प्रार्थना किस रीति से करना चाहिए,” तब वह “हमारी दुर्बलता में सहायता करता है।” वह मसीहियों की सहायता करता है कि वे परमेश्वर की इच्छा के अनुसार प्रार्थना करें, अर्थात् उन बातों के लिये प्रार्थना करें जिनके लिये परमेश्वर चाहता है कि वे प्रार्थना करें।
III. पवित्र आत्मा इस प्रकार के कार्य में क्यों लगा रहता है?
हमारी अज्ञानता के कारण। क्योंकि हम नहीं जानते कि हमें किस बात के लिये किस रीति से प्रार्थना करनी चाहिए। हम परमेश्वर की उस इच्छा से भी, जो बाइबल में प्रकट की गई है, और उसकी उस अप्रकट इच्छा से भी, जिसे हमें उसके विधान से सीखना चाहिए, बहुत ही अनजान हैं। मनुष्य बाइबल की प्रतिज्ञाओं और भविष्यद्वाणियों दोनों से बहुत ही अनजान हैं, और परमेश्वर के विधान के प्रति अंधे हैं। और उन बातों के विषय में तो वे और भी अधिक अंधकार में हैं जिनके विषय में परमेश्वर ने अपने आत्मा की अगुवाई के सिवा और किसी रीति से कुछ नहीं कहा। आपको स्मरण होगा कि मैंने प्रमाण के ये चार स्रोत बताए थे जिन पर प्रार्थना में विश्वास को आधारित किया जाए—प्रतिज्ञाएँ, भविष्यद्वाणियाँ, ईश्वरीय विधान की घटनाएँ, और पवित्र आत्मा। जब अन्य सब साधन हमें यह जानने तक पहुँचाने में असफल हो जाते हैं कि हमें किस बात के लिये प्रार्थना करनी चाहिए, तब आत्मा यह कार्य करता है।
IV. वह पवित्र लोगों के लिये किस प्रकार विनती करता है? वह किस रीति से कार्य करता है, जिससे हमारी दुर्बलता में सहायता करे? हमारी शक्तियों के उपयोग को हटाकर नहीं। ऐसा नहीं कि वह हमारे लिये प्रार्थना करता रहे और हम कुछ न करें। वह हमारी अपनी शक्तियों को उभारकर हमारे लिये प्रार्थना करता है। ऐसा नहीं कि वह सीधे हमें शब्द सुझाता है, या हमारी भाषा का मार्गदर्शन करता है। परन्तु वह हमारे मनों को प्रकाशित करता है, और सत्य को हमारे प्राणों को पकड़ लेने देता है। वह हमें कलीसिया की दशा पर, और हमारे चारों ओर के पापियों की स्थिति पर विचार करने की ओर ले जाता है। वह किस रीति से सत्य को मन के सामने लाता है, और जब तक वह अपना प्रभाव उत्पन्न न कर ले तब तक उसे वहाँ बनाए रखता है, यह हम नहीं बता सकते। परन्तु इतना हम जान सकते हैं—कि वह हमें वस्तुओं की दशा पर गहराई से विचार करने की ओर ले जाता है; और इसका परिणाम, इसका स्वाभाविक और तर्कसंगत परिणाम, गहरी भावना है। जब आत्मा सत्य को किसी मनुष्य के मन के सामने लाता है, तो उसके लिये गहरी भावना से बचने का केवल एक ही उपाय है। वह यह कि अपने विचारों को उधर से हटा ले, और अपने मन को दूसरी बातें सोचने में लगा दे। जब परमेश्वर का आत्मा पापियों के सामने सत्य लाता है, तो उन्हें अनुभव करना ही पड़ता है। जब तक वे पश्चाताप न करनेवाले बने रहते हैं, तब तक उनकी भावना गलत होती है। इसी प्रकार, यदि कोई मनुष्य मसीही है, और पवित्र आत्मा किसी विषय को उसके हृदय के साथ उष्ण सम्पर्क में लाता है, तो उसका कुछ अनुभव न करना उतना ही असम्भव है जितना यह कि आप अपना हाथ आग में डालें और आपके हाथ को कुछ अनुभव न हो। यदि परमेश्वर का आत्मा उसे ऐसी बातों पर मनन करने की ओर ले जाए जो उत्कट और प्रबल भावनाएँ उत्पन्न करने के योग्य हैं, और फिर भी वह उनसे उत्तेजित न हो, तो इससे सिद्ध होता है कि उसमें आत्माओं के लिये कोई प्रेम नहीं है, मसीह के आत्मा का कुछ भी अंश नहीं है, और वह मसीही अनुभव के विषय में कुछ नहीं जानता।
2. आत्मा मसीही को आत्माओं का मूल्य, और पापियों की वर्तमान दशा में उनका दोष और उनका खतरा अनुभव कराता है। यह आश्चर्य की बात है कि मसीही अक्सर इस विषय में कितने अंधकार में और कितने सुन्न रहते हैं। मसीही माता-पिता भी अपने बच्चों को अपनी आँखों के सामने सीधे नरक में जाने देते हैं, और मुश्किल से ही कोई भावना प्रकट करते दिखाई देते हैं, या उन्हें बचाने का कोई प्रयत्न करते हैं। और क्यों? क्योंकि वे इस बात के प्रति इतने अंधे हैं कि नरक क्या है, बाइबल के विषय में इतने अविश्वासी हैं, और उन बहुमूल्य प्रतिज्ञाओं से इतने अनजान हैं जो परमेश्वर ने विश्वासयोग्य माता-पिता से की हैं। वे परमेश्वर के आत्मा को शोकित करके दूर कर देते हैं, और जब तक परमेश्वर का आत्मा उनसे दूर है, तब तक उनसे उनके बच्चों के लिये प्रार्थना करवाने का प्रयत्न व्यर्थ है।
3. वह मसीहियों को पवित्रशास्त्र की प्रतिज्ञाओं को समझने और लागू करने की ओर ले जाता है। यह आश्चर्य की बात है कि किसी भी युग में मसीही जीवन की घटनाओं पर, जैसे-जैसे वे घटती जाती हैं, पवित्रशास्त्र की प्रतिज्ञाओं को पूरी तरह लागू नहीं कर पाए। इसका कारण यह नहीं कि प्रतिज्ञाएँ स्वयं अस्पष्ट हैं। प्रतिज्ञाएँ स्वयं तो पर्याप्त रूप से स्पष्ट हैं। परन्तु जीवन की बीतती घटनाओं के विषय में प्रकाश के स्रोत के रूप में पवित्रशास्त्र की उपेक्षा करने की एक अद्भुत प्रवृत्ति सदा से रही है। जब मसीह ने इतनी सारी भविष्यद्वाणियों को अपने ऊपर लागू किया, तो प्रेरित कितने चकित हुए! ऐसा लगता था कि वे बार-बार यह कह उठने को तैयार रहते थे, “आश्चर्य! क्या ऐसा हो सकता है? हमने इसे पहले कभी नहीं समझा था।” जिसने यह देखा है कि प्रेरितों ने, पवित्र आत्मा से प्रभावित और प्रेरित होकर, किस रीति से पुराने नियम के अंशों को सुसमाचार के युग पर लागू किया, ऐसा कौन है जो उस अर्थ की समृद्धि पर चकित न हुआ हो जो उन्होंने पवित्रशास्त्र में पाई? ऐसा ही
बहुत-से मसीहियों के साथ भी हुआ है; प्रार्थना में गहराई से लगे रहते हुए उन्होंने देखा है कि पवित्रशास्त्र के ऐसे अंश उपयुक्त हैं जिनके विषय में उन्होंने पहले कभी सोचा भी न था कि उनका ऐसा कोई प्रयोग हो सकता है।
मैं एक व्यक्ति को जानता था जो बड़े आत्मिक अंधकार में था। वह प्रार्थना के लिये एकान्त में गया, और उसने ठान लिया कि जब तक वह प्रभु को पा न ले, तब तक नहीं रुकेगा। उसने घुटने टेके और प्रार्थना करने का प्रयत्न किया। सब कुछ अंधकारमय था, और वह प्रार्थना न कर सका। वह घुटनों से उठा, और कुछ देर खड़ा रहा, परन्तु वह इसे छोड़ न सका, क्योंकि उसने प्रतिज्ञा की थी कि वह अपने आप को परमेश्वर को सौंपे बिना सूर्य को अस्त न होने देगा। उसने फिर घुटने टेके, परन्तु सब अंधकारमय ही था, और उसका हृदय पहले जैसा ही कठोर था। वह लगभग निराश हो चुका था, और उसने वेदना में कहा, “मैंने परमेश्वर के आत्मा को शोकित करके दूर कर दिया है, और मेरे लिये कोई प्रतिज्ञा नहीं है। मैं परमेश्वर की उपस्थिति से बाहर कर दिया गया हूँ।” परन्तु उसका यह संकल्प दृढ़ था कि वह हार न मानेगा, और उसने फिर घुटने टेके। उसने कुछ ही शब्द कहे थे कि यह पद उसके मन में इतना ताज़ा होकर आया मानो उसने उसे अभी-अभी पढ़ा हो; ऐसा लगा मानो वह अभी-अभी ये शब्द पढ़ रहा था, “तुम मुझे ढूँढ़ोगे और पाओगे भी, क्योंकि तुम अपने सम्पूर्ण मन से मुझे खोजोगे।” यिर्मयाह 29:13। यद्यपि यह प्रतिज्ञा पुराने नियम में थी, और यहूदियों को दी गई थी, फिर भी यह उस पर उतनी ही लागू होती थी जितनी उन पर। और इसने एक ही क्षण में, प्रभु के हथौड़े के समान, उसके हृदय को तोड़ दिया। उसने प्रार्थना की, और परमेश्वर में आनन्दित होकर उठा। जब धर्म का अंगीकार करनेवाले अपने बच्चों के लिये प्रार्थना कर रहे होते हैं, तब भी अक्सर ऐसा ही होता है। कभी-कभी वे प्रार्थना करते हैं, और अंधकार और सन्देह में रहते हैं, और ऐसा अनुभव करते हैं मानो विश्वास के लिये कोई नींव नहीं है, और विश्वासियों के बच्चों के लिये कोई विशेष प्रतिज्ञा नहीं है। परन्तु जब वे विनती कर ही रहे होते हैं, परमेश्वर ने उन्हें किसी प्रतिज्ञा का पूरा अर्थ दिखा दिया है, और उनका प्राण उस पर ऐसे टिक गया है मानो परमेश्वर की सामर्थी भुजा पर। मैंने एक बार एक विधवा के विषय में सुना जो अपने बच्चों के लिये बहुत व्याकुल रहती थी, जब तक कि यह पद बड़ी सामर्थ के साथ उसके मन में न लाया गया: “अपने अनाथ बालकों को छोड़ जाओ, मैं उनको जिलाऊँगा।” उसने देखा कि इसका अर्थ व्यापक है, और वह मानो अपने हाथों से उसे पकड़ सकी; और तब वह प्रार्थना में प्रबल हुई, और उसके बच्चों का मन-परिवर्तन हो गया। पवित्र आत्मा को उद्धारकर्ता ने संसार में इसलिये भेजा कि वह उसके लोगों का मार्गदर्शन करे और उन्हें शिक्षा दे, और बातें उन्हें स्मरण कराए, और साथ ही संसार को पाप के विषय में निरुत्तर करे।
4. आत्मा मसीहियों को उन बातों की इच्छा करने और उनके लिये प्रार्थना करने की ओर ले जाता है जिनके विषय में परमेश्वर के वचन में विशेष रूप से कुछ नहीं कहा गया है। किसी एक व्यक्ति का उदाहरण लीजिए। यह एक सामान्य सत्य है कि परमेश्वर उद्धार करने को इच्छुक है। इसी प्रकार यह भी एक सामान्य सत्य है कि वह प्रार्थना का उत्तर देने को इच्छुक है। परन्तु मैं उस व्यक्ति के विषय में परमेश्वर की इच्छा कैसे जानूँ—कि मैं उस व्यक्ति के मन-परिवर्तन और उद्धार के लिये परमेश्वर की इच्छा के अनुसार विश्वास से प्रार्थना कर सकता हूँ या नहीं? यहीं आत्मा का कार्य आता है, कि वह परमेश्वर के लोगों के मनों को उन व्यक्तियों के लिये, और उन्हीं समयों पर, प्रार्थना करने की ओर ले जाए, जब परमेश्वर उन्हें आशीष देने के लिये तैयार है। जब हम नहीं जानते कि किस बात के लिये प्रार्थना करें, तब पवित्र आत्मा मन को किसी विषय पर टिकने, उसकी स्थिति पर विचार करने, उसके मूल्य को अनुभव करने, और उसके लिये तड़पने, और प्रार्थना करने, और प्रसव-पीड़ा सहने की ओर ले जाता है, जब तक वह विषय प्राप्त न हो जाए। मैं जानता हूँ कि इस प्रकार का अनुभव नगरों में देश के कुछ भागों की अपेक्षा कम होता है, क्योंकि नगरों में ध्यान भटकाने और आत्मा को शोकित करनेवाली असंख्य बातें होती हैं। मुझे यह जानने का बहुत अवसर मिला है कि कुछ क्षेत्रों में यह कैसे होता रहा है। मैं एक व्यक्ति से परिचित था जो उन लोगों की एक सूची रखा करता था जिनके लिये वह विशेष रूप से चिन्तित रहता था; और मुझे ऐसे बहुत-से लोगों को जानने का अवसर मिला है जिनके लिये वह इस प्रकार चिन्तित हुआ, और जिनका तुरन्त मन-परिवर्तन हो गया। मैंने उसे अपनी सूची के लोगों के लिये ऐसे समय प्रार्थना करते देखा है जब वह सचमुच उनके लिये घोर वेदना में था; और कभी-कभी मैंने उसे किसी दूसरे व्यक्ति को बुलाते देखा है कि वह ऐसे किसी व्यक्ति के लिये प्रार्थना करने में उसकी सहायता करे। मैंने देखा है कि उसका मन किसी ऐसे व्यक्ति पर टिक गया जो कठोर और बिगड़े हुए चरित्र का था, और जिस तक किसी साधारण रीति से पहुँचा नहीं जा सकता था। इस राज्य के उत्तरी भाग के एक नगर में, जहाँ जागृति हुई थी, एक व्यक्ति था जो अत्यन्त उग्र और उद्दण्ड विरोधी था। वह एक सराय चलाता था, और जब भी कोई मसीही सुनने की दूरी पर होता, तो उनकी भावनाओं को ठेस पहुँचाने के लिये जान-बूझकर बुरी तरह कोसने और गालियाँ बकने में आनन्द लेता था। वह इतना बुरा था कि एक मनुष्य ने कहा कि उसे लगता है कि उसे अपनी जगह बेचनी पड़ेगी, या यों ही दे देनी पड़ेगी, और नगर से बाहर चले जाना पड़ेगा, क्योंकि वह ऐसे मनुष्य के पास नहीं रह सकता जो इस प्रकार गालियाँ बकता हो। जिस भले मनुष्य की मैं चर्चा कर रहा था, वह उस नगर से होकर जा रहा था, और उसने इस मामले के विषय में सुना, और वह उस व्यक्ति के लिये बहुत दुःखी और व्याकुल हुआ। उसने उसे अपनी प्रार्थना की सूची में लिख लिया। वह मामला सोते-जागते उसके मन पर बोझ बना रहा। वह कई दिनों तक उसके विषय में सोचता रहा, और उसके लिये प्रार्थना करता रहा। और हमें पहली बार इसका पता तब चला जब यह भक्तिहीन मनुष्य एक सभा में आया, और खड़े होकर उसने अपने पाप मान लिये, और अपना प्राण उण्डेल दिया। उसका मदिरालय तुरन्त वह स्थान बन गया जहाँ प्रार्थना-सभाएँ होने लगीं। इस रीति से परमेश्वर का आत्मा अलग-अलग मसीहियों को उन बातों के लिये प्रार्थना करने की ओर ले जाता है जिनके लिये वे प्रार्थना न करते, यदि आत्मा उनकी अगुवाई न करता। और इस प्रकार वे परमेश्वर की इच्छा के अनुसार बातों के लिये प्रार्थना करते हैं।
कुछ लोग कह सकते हैं कि यह परमेश्वर की ओर से एक प्रकाशन है। मुझे सन्देह नहीं कि यह कहकर बड़ी हानि की गई है कि इस प्रकार का प्रभाव एक नए प्रकाशन के बराबर है। और बहुत-से लोग, यदि इसे नया प्रकाशन कहा जाता सुनें, तो इससे डर जाएँगे, यहाँ तक कि वे रुककर यह जाँच भी नहीं करेंगे कि इसका अर्थ क्या है, या पवित्रशास्त्र इसे सिखाता है या नहीं। वे समझते हैं कि इस विचार का यह पूरा उत्तर है। परन्तु इस विषय का सीधा सत्य यह है कि आत्मा मनुष्य को प्रार्थना करने की ओर ले जाता है। और यदि परमेश्वर किसी मनुष्य को किसी व्यक्ति के लिये प्रार्थना करने की ओर ले जाता है, तो बाइबल से यह निष्कर्ष निकलता है कि परमेश्वर उस व्यक्ति का उद्धार करने का अभिप्राय रखता है। यदि अपने मन की दशा की तुलना बाइबल से करने पर हम पाते हैं कि आत्मा हमें किसी व्यक्ति के लिये प्रार्थना करने की ओर ले जा रहा है, तो हमारे पास यह विश्वास करने का अच्छा प्रमाण है कि परमेश्वर उसे आशीष देने के लिये तैयार है।
6. मसीहियों को ईश्वरीय विधान की गतिविधियों और घटनाक्रमों के विषय में आत्मिक विवेक देकर। समर्पित, प्रार्थना करनेवाले मसीही अक्सर इन बातों को इतनी स्पष्टता से देखते हैं, और इतनी दूर तक आगे देखते हैं, कि दूसरे लोग इससे बड़ी ठोकर खाते हैं। कभी-कभी तो ऐसा लगता है मानो वे लगभग भविष्यद्वाणी कर रहे हों। इसमें सन्देह नहीं कि लोग धोखा खा सकते हैं, और कभी-कभी खा भी जाते हैं, जब वे यह सोचते हुए कि आत्मा उनकी अगुवाई कर रहा है, अपनी ही समझ का सहारा लेते हैं। परन्तु इसमें भी सन्देह नहीं कि एक मसीही को समय के चिह्न स्पष्ट रूप से देखने और पहचानने योग्य बनाया जा सकता है, ताकि वह ईश्वरीय विधान के द्वारा समझ सके कि किस बात की आशा रखनी है, और इस प्रकार विश्वास से उसके लिये प्रार्थना करे। इसी प्रकार वे अक्सर जागृति की आशा करने और विश्वास से उसके लिये प्रार्थना करने की ओर ले जाए जाते हैं, जब किसी और को उसका तनिक-सा भी चिह्न दिखाई नहीं देता।
न्यू जर्सी में, एक ऐसे स्थान पर जहाँ जागृति हो चुकी थी, एक स्त्री थी। उसे पूरा निश्चय था कि एक और जागृति होनेवाली है। वह इस बात पर अड़ी रही कि उन्हें पहली वर्षा मिल चुकी है, और अब पिछली वर्षा मिलनेवाली है। वह चाहती थी कि सम्मेलन-सभाएँ ठहराई जाएँ। परन्तु पादरी और प्राचीनों को इसके लिये कोई प्रोत्साहन दिखाई न दिया, और वे कुछ भी करने को तैयार न हुए। उसने देखा कि वे अंधे हैं, और इसलिये वह आगे बढ़ी और एक बढ़ई से अपने लिये बैठने की बेंचें बनवाईं, क्योंकि उसने कहा कि वह अपने ही घर में सभाएँ करेगी। निश्चय ही जागृति होनेवाली थी। उसने सभाओं के लिये अपने द्वार खोले ही थे कि परमेश्वर का आत्मा बड़ी सामर्थ के साथ उतर आया। और कलीसिया के इन ऊँघते हुए सदस्यों ने अचानक अपने आप को ऐसे पापियों से घिरा हुआ पाया जिन्हें पाप का बोध हुआ था। और वे केवल इतना ही कह सके, “निश्चय इस स्थान में यहोवा था; और हम इस बात को न जानते थे।” ऐसे लोग परमेश्वर की इच्छा के संकेत को जो समझ लेते हैं, उसका कारण यह नहीं कि उनमें कोई श्रेष्ठ बुद्धि है, परन्तु यह कि परमेश्वर का आत्मा उन्हें समय के चिह्न देखने की ओर ले जाता है। और यह किसी प्रकाशन के द्वारा नहीं; परन्तु वे ईश्वरीय विधान की घटनाओं को एक ही बिन्दु पर आ मिलते हुए देखने की ओर ले जाए जाते हैं, जिससे उनमें एक निश्चित परिणाम की दृढ़ आशा उत्पन्न होती है।
V. हमें किस मात्रा तक यह आशा रखनी चाहिए कि परमेश्वर का आत्मा विश्वासियों के मनों को प्रभावित करेगा? पद कहता है, “आत्मा ऐसी आहें भर भरकर, जो बयान से बाहर हैं, विनती करता है।” इसका अर्थ मैं यह समझता हूँ कि आत्मा ऐसी इच्छाएँ उत्पन्न करता है जो इतनी बड़ी होती हैं कि आहों के सिवा और किसी रीति से व्यक्त नहीं की जा सकतीं। कुछ ऐसा जिसे भाषा व्यक्त नहीं कर सकती—जो प्राण को इतना भर देता है कि वह अपनी भावनाओं को शब्दों में व्यक्त नहीं कर सकता, जहाँ वह व्यक्ति केवल कराहकर उन्हें परमेश्वर के सामने प्रकट कर सकता है, जो हृदय की भाषा समझता है।
VI. हम कैसे जानें कि हमारे मनों को प्रभावित करनेवाला परमेश्वर का आत्मा है या नहीं?
1. इस बात से नहीं कि हम अनुभव करें कि कोई बाहरी प्रभाव या शक्ति हम पर लगाई जा रही है। हमें यह आशा नहीं रखनी चाहिए कि हम अपने मनों को परमेश्वर के साथ प्रत्यक्ष भौतिक सम्पर्क में अनुभव करेंगे। यदि ऐसा हो भी सकता है, तो हम ऐसा कोई उपाय नहीं जानते जिससे वह इन्द्रियों के द्वारा अनुभव किया जा सके। हम जानते हैं कि हम अपने मनों का प्रयोग स्वतंत्र रूप से करते हैं, और कि हमारे विचार किसी ऐसी बात पर लगे रहते हैं जो हमारी भावनाओं को उभारती है। परन्तु हमें यह आशा नहीं रखनी चाहिए कि कोई चमत्कार किया जाएगा, मानो हमें प्रत्यक्ष रूप से हाथ पकड़कर ले जाया जा रहा हो, या मानो कान में कुछ फुसफुसाया जा रहा हो, या परमेश्वर की इच्छा का कोई चमत्कारी प्रकटीकरण होगा। लोग अक्सर आत्मा को शोकित करके दूर कर देते हैं, क्योंकि वे उसे अपने भीतर स्थान नहीं देते और उसके प्रभावों को सँजोकर नहीं रखते। पापी अक्सर अनजाने में ऐसा करते हैं। वे समझते हैं कि यदि आत्मा के द्वारा उन्हें पाप का बोध हो रहा होता, तो उन्हें अमुक-अमुक रहस्यमय भावनाएँ होतीं, उन पर एक ऐसा झटका आता जिसे पहचानने में वे भूल नहीं कर सकते थे। बहुत-से मसीही आत्मा के प्रभावों से इतने अनजान हैं, और उन्होंने प्रार्थना में उसकी सहायता पाने के विषय में इतना कम सोचा है, कि जब वह सहायता उन्हें मिलती है तब वे इसे जानते ही नहीं, और इसलिये न उन्हें सँजोते हैं, न उनके आगे झुकते हैं, और न उन्हें बनाए रखते हैं। इस विषय में हमें अपने मन की गतिविधि के सिवा और किसी बात का बोध नहीं होता। और कुछ भी ऐसा नहीं जिसे अनुभव किया जा सके। हमें केवल इतना ही पता रहता है कि हमारे विचार किसी विशेष विषय पर तीव्रता से लगे हुए हैं। मसीही अक्सर इस बात पर अनावश्यक रूप से भटक जाते और व्याकुल होते हैं, इस डर से कि उनमें परमेश्वर का आत्मा नहीं है। वे तीव्रता से अनुभव करते हैं, परन्तु नहीं जानते कि उन्हें ऐसा अनुभव क्यों होता है। वे पापियों के विषय में व्याकुल हैं; परन्तु जब वे उनकी दशा के विषय में सोचते हैं, तो वे व्याकुल क्यों न हों? वे हर समय उनके विषय में सोचते रहते हैं, तो वे व्याकुल क्यों न हों? अब, सच्चाई यह है कि यही तथ्य कि आप उनके विषय में सोच रहे हैं, इस बात का प्रमाण है कि परमेश्वर का आत्मा आपकी अगुवाई कर रहा है। क्या आप नहीं जानते कि अधिकांश समय ये बातें आपको इस प्रकार प्रभावित नहीं करतीं? अधिकांश समय आप पापियों की दशा के विषय में अधिक नहीं सोचते। आप जानते हैं कि उनका उद्धार सदा समान रूप से महत्त्वपूर्ण है। परन्तु अन्य समयों पर, जब आप बिलकुल फुरसत में होते हैं, तब भी आपका मन पूरी तरह अंधकार में और उनके लिये किसी भी भावना से रिक्त रहता है। परन्तु अब, यद्यपि आप दूसरे कामों में व्यस्त हों, फिर भी आप उनके लिये सोचते हैं, प्रार्थना करते हैं, और तीव्रता से अनुभव करते हैं, उस समय भी जब आप ऐसे काम में लगे हों जो अन्य समयों पर आपके सारे विचारों को घेर लेता। अब आपका लगभग हर विचार यही होता है, “परमेश्वर उन पर दया करे।” ऐसा क्यों है? क्यों, इसलिये कि उनकी दशा आपके मन के सामने तीव्र प्रकाश में रखी गई है। क्या आप पूछते हैं कि वह क्या है जो आपके मन को पापियों के प्रति परोपकार का भाव रखने, और उनके लिये प्रार्थना में घोर संघर्ष करने की ओर ले जाता है? वह परमेश्वर के आत्मा के सिवा और क्या हो सकता है? ऐसी कोई दुष्टात्मा नहीं जो आपको इस प्रकार ले जाए। यदि आपकी भावनाएँ सचमुच परोपकारी हैं, तो आपको इसे यही समझना चाहिए कि पवित्र आत्मा आपको परमेश्वर की इच्छा के अनुसार बातों के लिये प्रार्थना करने की ओर ले जा रहा है। 2. आत्माओं को बाइबल के द्वारा परखिए। लोग कभी-कभी विचित्र कल्पनाओं और सनक-भरे आवेगों के कारण भटक जाते हैं। यदि आप उन्हें ईमानदारी से बाइबल से मिलाकर देखें, तो आपको कभी भटकने की आवश्यकता नहीं। आप अपनी इच्छाओं की तुलना बाइबल में वर्णित धर्म की आत्मा और स्वभाव से करके सदा जान सकते हैं कि आपकी भावनाएँ आत्मा के प्रभावों से उत्पन्न हुई हैं या नहीं। बाइबल आपको आज्ञा देती है कि आत्माओं को परखें। “हे प्रियो, हर एक आत्मा की प्रतीति न करो, वरन आत्माओं को परखो कि वे परमेश्वर की ओर से हैं कि नहीं।” केवल अपने साथी मनुष्यों के सम्बन्ध में अपनी भावनाओं पर ही ध्यान न दीजिए, परन्तु साथ ही, और विशेष रूप से, हमारे प्रभु यीशु मसीह के विषय में आपके भीतर आत्मा की शिक्षाओं पर भी ध्यान दीजिए। “परमेश्वर का आत्मा तुम इसी रीति से पहचान सकते हो, कि जो कोई आत्मा मान लेती है कि यीशु मसीह शरीर में होकर आया है, वह परमेश्वर की ओर से है। और जो कोई आत्मा यह नहीं मानती कि यीशु मसीह शरीर में होकर आया है, वह परमेश्वर की ओर से नहीं; और वही तो मसीह के विरोधी की आत्मा है, जिसकी चर्चा तुम सुन चुके हो कि वह आनेवाला है, और अब भी जगत में है।”
VII. परमेश्वर के आत्मा का यह प्रभाव हम कैसे प्राप्त करें?
1. इसे उत्कट और विश्वासपूर्ण प्रार्थना के द्वारा खोजना चाहिए। मसीह कहता है, “सो जब तुम बुरे होकर अपने लड़केबालों को अच्छी वस्तुएँ देना जानते हो, तो स्वर्गीय पिता अपने माँगनेवालों को पवित्र आत्मा क्यों न देगा!” क्या कोई कहता है, मैंने उसके लिये प्रार्थना की है, और वह नहीं आता? इसका कारण यह है कि आप ठीक रीति से प्रार्थना नहीं करते। “तुम माँगते हो और पाते नहीं, इसलिये कि बुरी इच्छा से माँगते हो, ताकि अपने भोग-विलास में उड़ा दो।” आप सही उद्देश्यों से प्रार्थना नहीं करते। एक बार धर्म का अंगीकार करनेवाले एक व्यक्ति ने, जो एक कलीसिया का प्रमुख सदस्य था, एक पादरी से पूछा कि वह उसकी दशा के विषय में क्या सोचता है; वह सप्ताह पर सप्ताह आत्मा के लिये प्रार्थना करता रहा था, और उसे आत्मा नहीं मिला था। पादरी ने उससे पूछा कि प्रार्थना करने में उसका उद्देश्य क्या था। उसने कहा कि वह सुखी होना चाहता था। वह जानता था कि जिनमें आत्मा है वे सुखी हैं, और वह चाहता था कि जैसे वे अपने मन का आनन्द लेते हैं, वैसे ही वह भी ले। अरे, इस प्रकार तो स्वयं शैतान भी प्रार्थना कर सकता है। यह तो निरा स्वार्थ है। वह व्यक्ति क्रोध में आकर चला गया। उसने देखा कि उसने कभी जाना ही नहीं था कि प्रार्थना करना क्या है। उसे निश्चय हो गया कि वह एक कपटी था, और उसकी सारी प्रार्थनाएँ स्वार्थपूर्ण थीं, जो केवल अपने सुख की इच्छा से प्रेरित थीं। दाऊद ने प्रार्थना की कि परमेश्वर उदार आत्मा देकर उसे सम्भाले, ताकि वह अपराधियों को सिखाए और पापियों को परमेश्वर की ओर फेरे। एक मसीही को आत्मा के लिये इसलिये प्रार्थना करनी चाहिए कि वह और अधिक उपयोगी हो और परमेश्वर की और अधिक महिमा करे; इसलिये नहीं कि वह स्वयं और अधिक सुखी हो। इस व्यक्ति ने स्पष्ट देख लिया कि वह कहाँ भूल में था, और उसका मन-परिवर्तन हो गया। कदाचित् यहाँ भी बहुत-से लोग ठीक ऐसे ही रहे हैं। आपको जाँचकर देखना चाहिए कि कहीं आपकी सारी प्रार्थनाएँ स्वार्थपूर्ण तो नहीं हैं।
2. उन साधनों का प्रयोग कीजिए जो इस विषय में आपके मन को उभारने, और आपके ध्यान को वहीं टिकाए रखने के योग्य हैं। यदि कोई मनुष्य आत्मा के लिये प्रार्थना करता है, और फिर अपने मन को दूसरी बातों की ओर मोड़ देता है; कोई और साधन प्रयोग नहीं करता, परन्तु सीधे सांसारिक बातों की ओर चला जाता है; तो वह परमेश्वर की परीक्षा करता है, वह अपने लक्ष्य से ढीला छूट जाता है, और यदि उसे वह मिल जाए जिसके लिये वह प्रार्थना करता है, तो यह चमत्कार ही होगा। पापी को पाप का बोध कैसे हो? क्यों, अपने पापों के विषय में सोचने से। किसी मसीही के लिये गहरी भावना प्राप्त करने का भी यही मार्ग है—उस विषय पर सोचना। परमेश्वर आपके अपने किसी प्रयत्न के बिना ये बातें आप पर उण्डेलनेवाला नहीं है। आपको छोटी से छोटी छाप को भी सँजोकर रखना चाहिए। बाइबल लीजिए, और उन अंशों को पढ़िए जो संसार की दशा और उसके भविष्य को दिखाते हैं। संसार को देखिए, अपने बच्चों को, और अपने पड़ोसियों को देखिए, और देखिए कि जब तक वे पाप में बने रहते हैं तब तक उनकी दशा क्या है, और प्रार्थना और प्रयत्न में लगे रहिए, जब तक आप परमेश्वर के आत्मा की यह आशीष न पा लें कि वह आप में वास करे। निस्सन्देह, इसी रीति से डॉ. वॉट्स में वे भावनाएँ आईं जिनका वर्णन उन्होंने दूसरी पुस्तक के दूसरे भजन में किया है, जिसे घर जाने के बाद पढ़ना आपके लिये अच्छा होगा। मेरे विचार भयानक विषयों पर घूमते हैं, दण्डाज्ञा और मृतकों पर: कैसे आतंक दोषी प्राण को जकड़ लेते हैं मृत्यु-शय्या पर! इन नश्वर तटों के आसपास ठहरता हुआ, वह बहुत देर तक रुका रहता है, जब तक कि बाढ़ के समान, प्रचण्ड वेग से, मृत्यु उस अभागे को बहा नहीं ले जाती। तब, शीघ्र और भयानक रीति से, वह नीचे उतरता है, उस आग के तट तक, घृणित दुष्टात्माओं के बीच, स्वयं एक भयभीत प्रेत बनकर। वहाँ पापियों की अनगिनत भीड़ पड़ी है, और अंधकार ही उनकी जंजीरें बनता है; तीखी निराशा से यातना पाकर वे चिल्लाते हैं, फिर भी और भयंकर पीड़ाओं की बाट जोहते हैं। उनकी सारी वेदना और उनका लहू भी उनके बीते दोष का प्रायश्चित नहीं करता, और न परमेश्वर की करुणा उनकी कराहों पर कान लगाएगी। अद्भुत अनुग्रह, जिसने मेरी साँस को थामे रखा, और मेरे प्राण को जाने की आज्ञा न दी, जब तक मैंने अपने उद्धारकर्ता की मृत्यु को न जान लिया, और उसके प्रेम को भली-भाँति निश्चित न कर लिया! मानो एक ऐसी दूरबीन से देखिए जो उसे आपके निकट ले आए; नरक में झाँकिए, और उन्हें कराहते सुनिए; फिर शीशे को ऊपर की ओर घुमाइए और स्वर्ग को देखिए, और वहाँ पवित्र लोगों को उनके श्वेत वस्त्रों में, हाथों में वीणाएँ लिये देखिए, और उन्हें छुड़ानेवाले प्रेम का गीत गाते सुनिए; और अपने आप से पूछिए—क्या यह सम्भव है कि मैं परमेश्वर से प्रबल होकर पापी को वहाँ तक ऊँचा उठवा सकूँ? ऐसा कीजिए, और यदि आप दुष्ट मनुष्य और परमेश्वर के लिये अजनबी नहीं हैं, तो शीघ्र ही आपको प्रार्थना की आत्मा उतनी मात्रा में मिल जाएगी जितनी आपकी देह सह सके।
3. आपको प्रार्थना के लिये जागते रहना चाहिए। आपको चौकसी रखनी चाहिए, और देखना चाहिए कि जब आप परमेश्वर से माँगते हैं तो वह आशीष देता है या नहीं। लोग कभी-कभी प्रार्थना करते हैं, और कभी यह देखते ही नहीं कि प्रार्थना स्वीकार हुई या नहीं। यह भी सावधानी रखिए कि परमेश्वर के आत्मा को शोकित न करें। अपने पापों को मान लीजिए और उन्हें छोड़ दीजिए। परमेश्वर आपको अपने छिपे हुए जनों में से एक के रूप में कभी नहीं चलाएगा, और आपको अपने भेदों में सम्मिलित नहीं करेगा, जब तक आप अपने पापों को मान न लें और उन्हें छोड़ न दें। ऐसा नहीं कि सदा मानते ही रहें और कभी छोड़ें नहीं, परन्तु मान भी लें और छोड़ भी दें। जहाँ कहीं आपने किसी की हानि की है, वहाँ उसकी भरपाई कीजिए। आप यह आशा नहीं कर सकते कि पहले आपको प्रार्थना की आत्मा मिल जाए, और फिर आप पश्चाताप करें। आप इस प्रकार लड़कर पार नहीं पा सकते। धर्म का अंगीकार करनेवाले जो घमण्डी और हठीले हैं, और अपने आप को निर्दोष ठहराते हैं, वे परमेश्वर को कभी विवश नहीं कर सकेंगे कि वह उनके साथ वास करे।
4. लिखी हुई व्यवस्था का पूर्ण रूप से पालन करने का लक्ष्य रखिए। दूसरे शब्दों में, पाप के साथ कोई संगति न रखिए। संसार से पूरी तरह ऊपर उठने का लक्ष्य रखिए; “इसलिये चाहिए कि तुम सिद्ध बनो, जैसा तुम्हारा स्वर्गीय पिता सिद्ध है।” यदि आप पाप करें भी, तो वह आपके लिये प्रतिदिन का दुःख हो। जो मनुष्य इसका लक्ष्य नहीं रखता, वह पाप में जीते रहने का इरादा रखता है। ऐसे मनुष्य को परमेश्वर की आशीष की आशा नहीं रखनी चाहिए, क्योंकि वह उसकी सब आज्ञाओं को मानने की इच्छा में सच्चा नहीं है।
VIII. आत्मा किनके लिये विनती करता है?
उत्तर—वह पवित्र लोगों के लिये विनती करता है, सब पवित्र लोगों के लिये, हर उस व्यक्ति के लिये जो पवित्र जन है। “इसी रीति से आत्मा भी हमारी दुर्बलता में सहायता करता है, क्योंकि हम नहीं जानते कि प्रार्थना किस रीति से करना चाहिए; परन्तु आत्मा आप ही ऐसी आहें भर भरकर, जो बयान से बाहर हैं, हमारे लिये विनती करता है; और मनों का जाँचनेवाला जानता है कि आत्मा की मनसा क्या है, क्योंकि वह पवित्र लोगों के लिये परमेश्वर की इच्छा के अनुसार विनती करता है।”—रोमियों 8:26, 27।
टिप्पणियाँ। 1. आपके विचार में इसका क्या कारण है कि प्रार्थना में आत्मा के प्रभावों पर इतना कम बल दिया जाता है, जबकि मन-परिवर्तन में उसके प्रभावों के विषय में इतना अधिक कहा जाता है? बहुत-से लोग बहुत ही डरते हैं कि कहीं आत्मा के प्रभावों को छोड़ न दिया जाए। वे पापियों के मन-परिवर्तन में आत्मा के प्रभावों पर बड़ा बल देते हैं। परन्तु प्रार्थना में उसके प्रभाव के विषय में कितना कम कहा जाता है, कितना कम छापा जाता है! इस बात की कितनी कम शिकायत होती है कि लोग मसीहियों को परमेश्वर की इच्छा के अनुसार प्रार्थना करने की ओर ले जाने में आत्मा के प्रभावों को पर्याप्त महत्त्व नहीं देते! यह बात कभी न भुलाई जाए कि कोई भी मसीही कभी ठीक रीति से प्रार्थना नहीं करता, जब तक आत्मा उसकी अगुवाई न करे। उसमें प्रार्थना करने की स्वाभाविक शक्ति है, और जहाँ तक परमेश्वर की इच्छा प्रकट की गई है, वह ऐसा करने में समर्थ है; परन्तु वह कभी ऐसा करता नहीं, जब तक परमेश्वर का आत्मा उसे प्रभावित न करे। ठीक वैसे ही जैसे पापी पश्चाताप करने में समर्थ हैं, परन्तु कभी करते नहीं, जब तक आत्मा उन्हें प्रभावित न करे।
2. यह विषय उस कठिनाई की जड़ को खोल देता है जो बहुत-से लोग विश्वास की प्रार्थना के विषय में अनुभव करते हैं। वे इस विचार पर आपत्ति करते हैं कि प्रार्थना में विश्वास यह भरोसा है कि जिन वस्तुओं के लिये हम माँगते हैं, ठीक वे ही हमें मिलेंगी; और इस बात पर ज़ोर देते हैं कि ऐसे विश्वास को टिकाने के लिये कोई नींव या प्रमाण हो ही नहीं सकता। कुछ वर्ष पहले इस विषय पर प्रकाशित एक उपदेश में लेखक ने यह कठिनाई सामने रखी है, और उसे उसकी पूरी शक्ति के साथ प्रस्तुत किया है। वह कहता है, मेरे पास यह प्रमाण नहीं है कि जिस वस्तु के लिये प्रार्थना की गई है वह दी जाएगी, जब तक मैं विश्वास से प्रार्थना न कर लूँ; क्योंकि विश्वास से प्रार्थना करना ही वह शर्त है जिस पर उसकी प्रतिज्ञा की गई है। और निश्चय ही, जब तक मैं शर्त पूरी न कर लूँ, तब तक मैं प्रतिज्ञा का दावा नहीं कर सकता। अब, यदि शर्त यह है कि मैं विश्वास करूँ कि जिस आशीष के लिये मैं माँगता हूँ, ठीक वही मुझे मिलेगी, तो स्पष्ट है कि प्रतिज्ञा एक असम्भव शर्त के पूरा किए जाने पर दी गई है, और निश्चय ही वह निरर्थक है। तब प्रतिज्ञा का अर्थ ठीक इतना ही होगा: जो कुछ तुम माँगोगे वह तुम्हें मिलेगा, इस शर्त पर कि तुम पहले विश्वास करो कि वह तुम्हें मिलेगा। अब, प्रतिज्ञा का दावा करने से पहले मुझे शर्त पूरी करनी है। परन्तु जब तक मैं यह विश्वास न कर लूँ कि वह मुझे मिलेगा, तब तक मेरे पास कोई प्रमाण नहीं हो सकता कि वह मुझे मिलेगा। यह मुझे इस विवशता में डाल देता है कि इससे पहले कि मेरे पास कोई प्रमाण हो कि वह मुझे मिलेगा, मैं विश्वास करूँ कि वह मुझे मिलेगा—जो असम्भव है।
इस आपत्ति का सारा बल इस तथ्य से उत्पन्न होता है कि आत्मा के उन प्रभावों को पूरी तरह अनदेखा कर दिया जाता है, जो वह किसी व्यक्ति को विश्वास का प्रयोग करने की ओर ले जाने में डालता है। यह समझा गया है कि मरकुस 11:22 और 24 का अंश, विश्वास की प्रार्थना के विषय में अन्य मिलती-जुलती प्रतिज्ञाओं के साथ, केवल चमत्कारों से सम्बन्ध रखता है। परन्तु मान लीजिए कि यह सच है। मैं पूछूँगा, जब प्रेरित किसी चमत्कार के लिये प्रार्थना करते थे, तब उन्हें किस बात पर विश्वास करना था? क्या उन्हें यह विश्वास करना था कि ठीक वही चमत्कार होगा जिसके लिये उन्होंने प्रार्थना की? स्पष्ट है कि उन्हें ऐसा ही करना था। अभी जिन पदों की ओर संकेत किया गया, उनमें मसीह कहता है, “मैं तुम से सच कहता हूँ कि जो कोई इस पहाड़ से कहे, कि तू उखड़ जा, और समुद्र में जा पड़, और अपने मन में सन्देह न करे, वरन प्रतीति करे कि जो कहता है वह हो जाएगा, तो उसके लिये वही होगा। इसलिये मैं तुम से कहता हूँ, कि जो कुछ तुम प्रार्थना करके माँगो, तो प्रतीति कर लो कि तुम्हें मिल गया, और तुम्हारे लिये हो जाएगा।” यहाँ स्पष्ट है कि जिस बात पर विश्वास करना था, और जिसके विषय में उन्हें अपने मन में सन्देह नहीं करना था, वह यह थी कि ठीक वही आशीष उन्हें मिलेगी जिसके लिये उन्होंने प्रार्थना की। अब ऊपर बताई गई आपत्ति, किसी चमत्कार के किए जाने के लिये प्रार्थना करते समय, इस प्रकार के विश्वास के विरुद्ध अपने पूरे बल के साथ लागू होती है। यदि किसी अन्य आशीष के लिये प्रार्थना करते हुए इस पर विश्वास करना असम्भव है, तो किसी चमत्कार के लिये प्रार्थना करते हुए भी यह उतना ही असम्भव था। मैं पूछ सकता हूँ, क्या कोई प्रेरित शर्त पूरी करने से पहले यह विश्वास कर सकता था कि चमत्कार होगा? क्योंकि शर्त यह थी कि वह विश्वास करे कि जिसके लिये उसने प्रार्थना की, वह उसे मिलेगा। या तो प्रतिज्ञा निरर्थक और एक छल है, या शर्त को पूरा करना सम्भव है।
अब, जैसा मैंने कहा है, सारी कठिनाई इस तथ्य में है कि आत्मा के प्रभावों को पूरी तरह अनदेखा कर दिया जाता है, और वह विश्वास, जो परमेश्वर के कार्य से उत्पन्न होता है, विचार से बाहर कर दिया जाता है। यदि यह आपत्ति किसी भी वस्तु के लिये प्रार्थना करने के विरुद्ध ठीक है, तो वह किसी चमत्कार के किए जाने के लिये विश्वास से प्रार्थना करने के विरुद्ध भी उतनी ही ठीक है। सच तो यह है कि परमेश्वर का आत्मा ऐसा प्रमाण दे सकता था जिसके आधार पर विश्वास किया जाए कि कोई विशेष चमत्कार दिया जाएगा; वह मन को परमेश्वर पर दृढ़ भरोसा रखने की ओर, और यह भरोसा करने की ओर ले जा सकता था कि माँगी गई आशीष मिल जाएगी। और इसी प्रकार आज के दिन भी, जब हम किसी भी आवश्यक आशीष के लिये प्रार्थना करते हैं, तो वह वही निश्चय दे सकता है। न तो एक दशा में और न दूसरी में आत्मा के प्रभाव चमत्कारी होते हैं। प्रार्थना करना एक ही बात है, चाहे आप किसी प्राण के मन-परिवर्तन के लिये प्रार्थना करें, या किसी चमत्कार के लिये। विश्वास भी एक दशा में वैसा ही है जैसा दूसरी में; अन्तर केवल यह है कि वह भिन्न वस्तु पर जाकर टिकता है; एक दशा में किसी प्राण के मन-परिवर्तन पर, और दूसरी में किसी चमत्कार के किए जाने पर। और न तो एक में और न दूसरी में, किसी प्रतिज्ञा के सन्दर्भ के बिना विश्वास का प्रयोग होता है; और एक सामान्य प्रतिज्ञा को उसी उचितता के साथ किसी प्राण के मन-परिवर्तन पर लागू किया जा सकता है, जिस उचितता के साथ किसी चमत्कार के किए जाने पर। और यह भी एक दशा में उतना ही सच है जितना दूसरी में, कि कोई भी मनुष्य परमेश्वर के आत्मा से प्रभावित हुए बिना कभी विश्वास से प्रार्थना नहीं करता। और यदि आत्मा किसी प्रेरित के मन को किसी चमत्कार के विषय में विश्वास का प्रयोग करने की ओर ले जा सकता था, तो वह किसी दूसरे मसीही के मन को, उसी सामान्य प्रतिज्ञा का सहारा दिलाकर, कोई और आशीष पाने के विषय में विश्वास का प्रयोग करने की ओर ले जा सकता है।
यदि कोई पूछे, “हम कब इस बात के लिये बाध्य हैं कि विश्वास करें कि जिस आशीष के लिये हम माँगते हैं, वह हमें मिलेगी?” तो मैं उत्तर देता हूँ:
(1.) जब कोई विशेष प्रतिज्ञा हो, जो उस विशेष आशीष का नाम लेकर उल्लेख करती हो: जैसे जब हम पवित्र आत्मा के लिये प्रार्थना करते हैं। इस आशीष का नाम प्रतिज्ञा में विशेष रूप से लिया गया है, और यहाँ हमारे पास प्रमाण है, और हम विश्वास करने के लिये बाध्य हैं, चाहे हम पर कोई ईश्वरीय प्रभाव हो या न हो; ठीक वैसे ही जैसे पापी पश्चाताप करने के लिये बाध्य हैं, चाहे आत्मा उनके साथ संघर्ष करे या न करे। उनका दायित्व आत्मा के प्रभावों पर नहीं, परन्तु नैतिक कर्ता होने की उन शक्तियों पर टिका है जो उनमें हैं; अर्थात् अपना कर्तव्य करने की उनकी योग्यता पर। और यद्यपि यह सच है कि उनमें से एक भी आत्मा के प्रभावों के बिना कभी पश्चाताप नहीं करेगा, फिर भी उनमें ऐसा करने की शक्ति है, और वे ऐसा करने के लिये बाध्य हैं, चाहे आत्मा उनके साथ संघर्ष करे या न करे। मसीही के साथ भी ऐसा ही है। जहाँ उसके पास प्रमाण है, वहाँ वह विश्वास करने के लिये बाध्य है। और यद्यपि वह, जहाँ उसके पास स्पष्ट प्रतिज्ञा भी हो, वहाँ भी परमेश्वर के आत्मा के बिना कभी विश्वास नहीं करता, फिर भी ऐसा करने का उसका दायित्व उसकी योग्यता पर टिका है, न कि ईश्वरीय प्रभाव पर।
(2.) जहाँ परमेश्वर अपने विधान के द्वारा कोई प्रकाशन करता है, वहाँ हम उस ईश्वरीय संकेत की स्पष्टता के अनुपात में विश्वास करने के लिये बाध्य हैं।
(3.) इसी प्रकार जहाँ कोई भविष्यद्वाणी है, वहाँ भी हम विश्वास करने के लिये बाध्य हैं। परन्तु इन दोनों में से किसी भी दशा में हम वास्तव में परमेश्वर के आत्मा के बिना विश्वास नहीं करते। परन्तु जहाँ न कोई प्रतिज्ञा है, न ईश्वरीय विधान, न भविष्यद्वाणी, जिस पर हम अपना विश्वास टिका सकें, वहाँ हम विश्वास करने के लिये बाध्य नहीं हैं, सिवाय इसके कि, जैसा मैंने इस प्रवचन में दिखाया है, आत्मा इच्छाएँ उत्पन्न करके, और हमें किसी विशेष विषय के लिये प्रार्थना करने की ओर ले जाकर, हमें प्रमाण दे। सामान्य प्रकृति की उन प्रतिज्ञाओं के विषय में, जिनके बारे में हम सच्चाई से यह जानने में असमर्थ हैं कि उन्हें किन विशेष दशाओं पर लागू करें, बहुत-से उदाहरणों में उन्हें विशेष दशाओं पर लागू करना हमारा कर्तव्य होने की अपेक्षा हमारा विशेषाधिकार समझा जा सकता है; परन्तु जब भी परमेश्वर का आत्मा हमें उन्हें किसी विशेष विषय पर लागू करने की ओर ले जाता है, तब उन्हें इस प्रकार लागू करना हमारा कर्तव्य हो जाता है। इस दशा में परमेश्वर स्वयं अपनी प्रतिज्ञा की व्याख्या करता है, और दिखाता है कि उसका अभिप्राय क्या था कि वह किस प्रकार लागू की जाए। और तब इसे इस प्रकार लागू करने का, और इस विशेष विषय के सम्बन्ध में विश्वास करने का हमारा दायित्व पूरे बल के साथ बना रहता है।
3. कुछ लोगों ने यह समझा है कि पौलुस ने शरीर के काँटे को दूर करने के लिये विश्वास से प्रार्थना की, और वह स्वीकार नहीं हुई। परन्तु वे यह सिद्ध नहीं कर सकते कि पौलुस ने विश्वास से प्रार्थना की। अनुमान पूरी तरह दूसरी ओर है, जैसा मैंने एक पिछले व्याख्यान में दिखाया है। उसके पास न कोई प्रतिज्ञा थी, न भविष्यद्वाणी, न ईश्वरीय विधान, न परमेश्वर का आत्मा, जो उसे विश्वास करने की ओर ले जाते। सारी आपत्ति इस आधार पर चलती है कि प्रेरित आत्मा की अगुवाई के बिना भी विश्वास से प्रार्थना कर सकता था। प्रार्थना में आत्मा के प्रभावों को निपटा देने का यह सचमुच एक छोटा रास्ता है। निश्चय ही, यह मान लेना कि उसने विश्वास से प्रार्थना की, यह मान लेना है कि या तो उसने आत्मा की अगुवाई के बिना विश्वास से प्रार्थना की, या परमेश्वर का आत्मा उसे उस बात के लिये प्रार्थना करने की ओर ले गया जो परमेश्वर की इच्छा के अनुसार नहीं थी।
मैंने इस विषय पर और भी अधिक इसलिये ठहरकर बात की है, क्योंकि मैं चाहता हूँ कि यह इतना स्पष्ट कर दिया जाए कि आप सब सावधान रहें कि आत्मा को शोकित न करें। मैं चाहता हूँ कि पवित्र आत्मा के विषय में आपके विचार ऊँचे हों, और आप यह अनुभव करें कि उसके प्रभावों के बिना कुछ भी भला नहीं होगा। उसके बिना न कोई प्रार्थना और न कोई प्रचार किसी काम का होगा। यदि यीशु मसीह स्वयं यहाँ उतरकर पापियों को प्रचार करता, तो आत्मा के बिना एक का भी मन-परिवर्तन न होता। इसलिये सावधान रहिए कि जब वह आपको प्रार्थना करने के लिये बुलाता है, तब उसके स्वर्गीय प्रभावों की अवहेलना या उपेक्षा करके उसे शोकित करके दूर न कर दें।
4. किसी विषय के लिये प्रार्थना करते हुए, जब तक आप उसे प्राप्त न कर लें, तब तक लगे रहना आवश्यक है। ओह, जब परमेश्वर का आत्मा मसीहियों की इच्छाओं को किसी पापी पर टिका देता है, तब वे कभी-कभी अपनी प्रार्थनाओं में कितनी उत्सुकता से उसका पीछा करते हैं! कोई कंजूस भी अपने सोने के पीछे इतने दृढ़ संकल्प से नहीं पड़ता।
5. आवेगों के द्वारा चलाए जाने के डर ने, उस पर उचित रूप से विचार न किए जाने के कारण, बड़ी हानि की है। किसी व्यक्ति का मन छलावे की रोशनी (इग्निस फ़ैटुअस) के पीछे भी जा सकता है। परन्तु यदि हम आवेगों के डर से पवित्र आत्मा के भले आवेगों का विरोध करने लगें, तो हम गलत करते हैं। कोई आश्चर्य नहीं कि मसीहियों में प्रार्थना की आत्मा नहीं होती, यदि वे भेद पहचानने का कष्ट उठाने को तैयार नहीं; और इस प्रकार सब आवेगों को, और अदृश्य कर्ताओं की सारी अगुवाई को, अस्वीकार करते या उनका विरोध करते हैं। कट्टरता (धर्मोन्माद) के विषय में बहुत-सी ऐसी बातें कही गई हैं जो बहुत असावधानी से कही गई हैं, और जो बहुत-से मनों को परमेश्वर के आत्मा की अगुवाई को अस्वीकार करने की ओर ले जाती हैं। “जितने परमेश्वर के पुत्र हैं, वे परमेश्वर के आत्मा के चलाए चलते हैं।” और यह हमारा कर्तव्य है कि आत्माओं को परखें कि वे परमेश्वर की ओर से हैं कि नहीं। हमें बारीकी से जाँचने और ठीक-ठीक भेद करने पर ज़ोर देना चाहिए। आत्मा के द्वारा चलाए जाने जैसी कोई बात अवश्य है। और जब हमें निश्चय हो जाए कि यह परमेश्वर की ओर से है, तो हमें अवश्य उसके पीछे चलना चाहिए—पीछे चलते ही रहना चाहिए, इस पूरे भरोसे के साथ कि वह हमें गलत मार्ग पर नहीं ले जाएगा। 6. इस विषय से हम प्रार्थना के बँधे हुए रूपों का प्रयोग करने की मूर्खता देखते हैं। किसी बँधे हुए रूप का प्रयोग करने का विचार ही, निश्चय ही, आत्मा की अगुवाई को अस्वीकार करता है। प्रार्थना की आत्मा को नष्ट करने, और प्रार्थना किस बात में है इस विषय में मन को पूरी तरह अंधकारमय और उलझन में डालने के लिये, बँधे हुए रूपों का प्रयोग करने से बढ़कर और कुछ नहीं। प्रार्थना के बँधे हुए रूप न केवल अपने आप में मूर्खतापूर्ण हैं, बल्कि वे प्रार्थना की आत्मा को नष्ट करने और प्रार्थना की सामर्थ को तोड़ने के लिये शैतान की ही युक्ति हैं। यह कहने से कोई लाभ नहीं कि रूप अच्छा है। प्रार्थना शब्दों में नहीं है। और यदि हृदय परमेश्वर के आत्मा के द्वारा चलाया नहीं जाता, तो इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता कि शब्द क्या हैं। यदि इच्छा प्रज्वलित नहीं होती, विचार निर्देशित नहीं होते, और भावना की सारी धारा परमेश्वर के आत्मा के द्वारा उत्पन्न और संचालित नहीं होती, तो वह प्रार्थना नहीं है। और निर्धारित रूप, सब बातों में, किसी व्यक्ति को जैसी प्रार्थना करनी चाहिए वैसी प्रार्थना करने से रोकने के लिये सबसे अधिक उपयुक्त हैं।
7. यह विषय चरित्र की एक कसौटी प्रस्तुत करता है। आत्मा विनती करता है—किसके लिये? पवित्र लोगों के लिये। जो पवित्र जन हैं, वे इस प्रकार के आत्मिक संघर्ष में लगाए जाते हैं। यदि आप पवित्र जन हैं, तो आप अनुभव से जानते हैं कि इस प्रकार के आत्मिक संघर्ष में लगाए जाने का क्या अर्थ है; नहीं तो इसका कारण यह है कि आपने परमेश्वर के आत्मा को शोकित किया है, जिससे वह आपकी अगुवाई नहीं करेगा। आप ऐसी रीति से जीवन बिताते हैं कि यह पवित्र सहायक आपके साथ वास नहीं करेगा, और न आपको प्रार्थना की आत्मा देगा। यदि ऐसा है, तो आपको पश्चाताप करना चाहिए। आप मसीही हैं या नहीं, इस बात को तय करने के लिये रुकिए नहीं, परन्तु ऐसे पश्चाताप कीजिए मानो आपने कभी पश्चाताप किया ही न हो। अपने पहले काम कीजिए। यह मानकर न चलिए कि आप मसीही हैं, परन्तु एक दीन पापी के समान जाइए, और अपना हृदय प्रभु के सामने उण्डेल दीजिए। किसी और रीति से आपको कभी प्रार्थना की आत्मा नहीं मिल सकती।
8. इस विषय को समझने का महत्त्व।
(1.) उपयोगी होने के लिये। इस आत्मा के बिना आपके और परमेश्वर के बीच ऐसी कोई सहानुभूति नहीं हो सकती कि आप या तो परमेश्वर के साथ चल सकें या परमेश्वर के साथ काम कर सकें। आवश्यक है कि आपका हृदय उसके हृदय के साथ प्रबलता से धड़के, नहीं तो आपको बहुत उपयोगी होने की आशा नहीं रखनी चाहिए।
(2.) उतना ही महत्त्वपूर्ण जितना आपका पवित्रीकरण। ऐसी आत्मा के बिना आपका पवित्रीकरण नहीं होगा, आप बाइबल को नहीं समझेंगे, आप नहीं जानेंगे कि उसे अपनी दशा पर कैसे लागू करें। मैं चाहता हूँ कि आप हर समय परमेश्वर को अपने साथ रखने के महत्त्व को अनुभव करें। यदि आप वैसा जीवन बिताएँ जैसा आपको बिताना चाहिए, तो वह कहता है कि वह आपके पास आएगा, और आपके साथ वास करेगा, और आपके साथ भोजन करेगा, और आप उसके साथ।
9. यदि लोग प्रार्थना की आत्मा को नहीं जानते, तो वे प्रार्थना के परिणामों के विषय में अविश्वासी होने की ओर बहुत प्रवृत्त होते हैं। वे देखते नहीं कि क्या हो रहा है, या उसका सम्बन्ध नहीं देखते, या प्रमाण नहीं देखते। वे आत्मिक आशीषों की आशा नहीं कर रहे होते। जब पापियों को पाप का बोध होता है, तो वे सोचते हैं कि वे केवल ऐसे भयानक प्रचार से डर गए हैं। और जब लोगों का मन-परिवर्तन होता है, तो उन्हें कोई भरोसा नहीं होता, और वे केवल इतना कहते हैं, “देखेंगे कि ये आगे चलकर कैसे निकलते हैं।”
10. जिनमें प्रार्थना की आत्मा है, वे जानते हैं कि आशीष कब आती है। जब यीशु मसीह प्रकट हुआ, तब भी ठीक ऐसा ही था। उन भक्तिहीन शास्त्रियों ने उसे नहीं पहचाना। क्यों? क्योंकि वे इस्राएल के छुटकारे के लिये प्रार्थना नहीं कर रहे थे। परन्तु शमौन और हन्नाह ने उसे पहचान लिया। यह कैसे हुआ? ध्यान दीजिए कि उन्होंने क्या कहा, वे कैसे प्रार्थना करते थे और कैसे जीवन बिताते थे। वे विश्वास से प्रार्थना कर रहे थे, और इसलिये जब वह आया तो वे चकित नहीं हुए। ऐसे मसीहियों के साथ भी ऐसा ही है। यदि पापियों को पाप का बोध होता है या उनका मन-परिवर्तन होता है, तो वे इस पर चकित नहीं होते। वे ठीक ऐसी ही बातों की आशा कर रहे थे। जब परमेश्वर आता है तो वे उसे पहचान लेते हैं, क्योंकि वे उसके आगमन की बाट जोह रहे थे।
11. कलीसिया में तीन प्रकार के लोग हैं जिनके इस विषय में भूल करने की सम्भावना है, या जिन्होंने सत्य को दृष्टि से ओझल कर दिया है।
(1.) वे जो प्रार्थना पर बहुत भरोसा रखते हैं, और कोई दूसरा साधन प्रयोग नहीं करते। वे किसी भी विशेष साधन से घबरा जाते हैं, और आपके “जागृति खड़ी करने” की बात करते हैं।
(2.) इनके विपरीत वे हैं जो साधनों का प्रयोग करते हैं, और प्रार्थना करते हैं, परन्तु प्रार्थना में आत्मा के प्रभावों के विषय में कभी नहीं सोचते। वे आत्मा के लिये प्रार्थना की बात करते हैं, और पापियों के मन-परिवर्तन में आत्मा के महत्त्व को अनुभव करते हैं, परन्तु प्रार्थना में आत्मा के महत्त्व को नहीं समझते। और उनकी प्रार्थनाएँ केवल ठण्डी बातचीत होती हैं, ऐसा कुछ नहीं जिसे कोई अनुभव कर सके, या जो परमेश्वर को पकड़ सके।
(3.) वे जो परमेश्वर की प्रभुता के विषय में कुछ विचित्र धारणाएँ रखते हैं, और इस बाट में हैं कि परमेश्वर प्रार्थना या साधनों के बिना संसार का मन-परिवर्तन कर दे।
कलीसिया में प्रार्थना की आत्मा की आवश्यकता का और गहरा बोध होना चाहिए। सच तो यह है कि सामान्यतः वे लोग जो साधनों का सबसे अधिक परिश्रम से प्रयोग करते हैं, और मनुष्यों के उद्धार के लिये सबसे कठोर प्रयत्न करते हैं, और जिनकी धारणाएँ इस विषय में सबसे सही हैं कि पापियों के मन-परिवर्तन के लिये साधनों का प्रयोग किस रीति से किया जाना चाहिए, वे ही परमेश्वर के आत्मा के लिये सबसे अधिक प्रार्थना भी करते हैं, और उसकी आशीष के लिये परमेश्वर से सबसे अधिक मल्लयुद्ध करते हैं। और परिणाम क्या है? तथ्यों को बोलने दीजिए, और बताने दीजिए कि ये लोग प्रार्थना करते हैं या नहीं, और क्या परमेश्वर का आत्मा उनकी प्रार्थनाओं की गवाही नहीं देता, और अपनी सामर्थ के साथ उनके परिश्रम के पीछे नहीं आता।
12. इस समय प्रेस्बिटेरियन कलीसिया के कुछ भागों में प्रार्थना की आत्मा से बहुत भिन्न एक आत्मा प्रबल होती दिखाई देती है। प्रार्थना की आत्मा जितनी शीघ्र उत्तेजना और विरोध उत्पन्न करती है, उतनी शीघ्र और कोई बात नहीं करती। यदि कोई व्यक्ति प्रार्थना में पापियों की दशा का ऐसा बोझ अनुभव करे कि अपनी प्रार्थना में कराहने लगे, तो क्या होता है, स्त्रियाँ घबरा जाती हैं, और उस पर तुरन्त डाँट और विरोध टूट पड़ता है। मैं अपने प्राण से ऐसी हर दिखावटी भावना से घृणा करता हूँ जहाँ भावना है ही नहीं, और कराहों के द्वारा अपने आप को भावना में उभारने के हर प्रयत्न से भी। परन्तु मैं इस बात का समर्थन करने के लिये अपने आप को बाध्य अनुभव करता हूँ कि मन की एक ऐसी दशा भी होती है जिसमें कराहने से बचने का केवल एक ही उपाय है; और वह है पवित्र आत्मा का विरोध करना। एक बार मैं ऐसे स्थान पर उपस्थित था जहाँ इस विषय पर चर्चा हुई। कहा गया कि कराहने को हतोत्साहित करना चाहिए। यह प्रश्न पूछा गया कि क्या परमेश्वर ऐसी भावना की दशा उत्पन्न नहीं कर सकता जिसमें कराहने से रुकना असम्भव हो? और उत्तर यह था, “हाँ, परन्तु वह कभी ऐसा करता नहीं।” तब तो प्रेरित पौलुस ने, जब उसने ऐसी आहों के विषय में लिखा जो बयान से बाहर हैं, बड़ा भारी धोखा खाया। एडवर्ड्स ने, जब उसने जागृतियों पर अपनी पुस्तक लिखी, धोखा खाया। जागृतियाँ सब की सब अंधकार में हैं। अब, जो कोई मनुष्य कलीसिया के इतिहास पर दृष्टि डालता है, वह ऐसा विचार नहीं अपनाएगा। मुझे प्रार्थना की आत्मा को बाहर रखने, या दबाने, या कुचलने, या सीमित करने का यह प्रयत्न अच्छा नहीं लगता। जैसा मैंने सुना है कि यह कहकर किया गया है, “मुझे फिर कोई कराहना न सुनने दो,” उस प्रकार प्रार्थना की आत्मा को डाँटने से पहले मैं अपना दाहिना हाथ काट डालना पसन्द करूँगा। परन्तु फिर, मैं कठिनाई से जानता हूँ कि इस विषय को कहाँ समाप्त करूँ। मैं चाहूँगा कि इस पर एक महीने तक चर्चा करूँ, और तब तक करूँ जब तक सारी कलीसिया इसे समझ न ले, ताकि वह विश्वास की प्रार्थना कर सके। प्रियो, मैं आपसे पूछना चाहता हूँ कि क्या आप इस सब पर विश्वास करते हैं? या क्या आप आश्चर्य करते हैं कि मैं ऐसी बातें क्यों करता हूँ? कदाचित् आपमें से कुछ ने इन बातों की कुछ झलकियाँ पाई हैं। अब, क्या आप अपने आप को प्रार्थना के लिये सौंप देंगे, और ऐसा जीवन बिताएँगे कि आपमें प्रार्थना की आत्मा हो, और वह आत्मा हर समय आपके साथ रहे? ओह, कोई प्रार्थना करनेवाली कलीसिया मिल जाए! मैं एक बार एक पादरी को जानता था जिसके यहाँ लगातार चौदह जाड़ों में जागृति हुई। मैं इसका कारण नहीं समझ पाया, जब तक मैंने उसके एक सदस्य को एक प्रार्थना-सभा में खड़े होकर अंगीकार करते न देखा। उसने कहा, “भाइयो, मेरी बहुत समय से यह आदत रही है कि हर शनिवार की रात आधी रात के बाद तक हमारे बीच पवित्र आत्मा के उतरने के लिये प्रार्थना करता हूँ। और अब, भाइयो,” और वह रोने लगा, “मैं मान लेता हूँ कि दो-तीन सप्ताह से मैंने इसकी उपेक्षा की है।” भेद खुल गया। उस पादरी के पास एक प्रार्थना करनेवाली कलीसिया थी। भाइयो, अपने स्वास्थ्य की वर्तमान दशा में, मैं पाता हूँ कि जितनी प्रार्थना करने की मेरी आदत रही है, उतनी प्रार्थना करना और साथ ही प्रचार करते रहना मेरे लिये असम्भव है। इससे मेरी शक्ति चुक जाती है। अब, क्या मैं अपने आप को प्रार्थना के लिये सौंप दूँ, और प्रचार करना बन्द कर दूँ? यह ठीक न होगा। अब, क्या आप, जो स्वस्थ हैं, इस काम में अपने आप को झोंक न देंगे, और इस बोझ को न उठाएँगे, और अपने आप को प्रार्थना में न लगा देंगे, जब तक परमेश्वर हम पर अपनी आशीष न उण्डेले?
