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कलीसियाएँ पादरियों की सहायता कैसे कर सकती हैं
“और जब तक मूसा अपना हाथ उठाए रहता था तब तक तो इस्राएल प्रबल होता था; परन्तु जब जब वह उसे नीचे करता तब तब अमालेक प्रबल होता था। और जब मूसा के हाथ भर गए, तब उन्होंने एक पत्थर लेकर मूसा के नीचे रख दिया, और वह उस पर बैठ गया, और हारून और हूर एक एक अलंग में उसके हाथों को सम्भाले रहे; और उसके हाथ सूर्यास्त तक स्थिर रहे। और यहोशू ने अनुचरों समेत अमालेकियों को तलवार के बल से हरा दिया।” निर्गमन 17:11-13
आप में से जो अपनी बाइबल पढ़ते हैं, उन्हें याद होगा कि ये पद किस प्रसंग में आते हैं। परमेश्वर के लोग अपने शत्रुओं को वश में करते हुए अमालेकियों से युद्ध करने आए, और तब ये घटनाएँ घटीं। यह समझना कठिन है कि मूसा के हाथ उठाए रखने की घटना को इतना महत्त्व क्यों दिया जाए, जब तक कि इस कथन को प्रार्थना की मुद्रा का सूचक न समझा जाए। और तब उसका हाथ उठाए रखना, और उसके साथ मिलनेवाली सफलता, हमें यह सिखाएगी कि परमेश्वर के शत्रुओं के साथ हमारे सब संघर्षों में उसकी सहायता के लिए परमेश्वर से प्रार्थना करना कितना महत्त्वपूर्ण है। हारून और हूर के सहयोग और सहारे को सामान्यतः इस बात का प्रतीक समझा गया है कि कलीसियाओं का कर्तव्य है कि वे पादरियों को उनके काम में सम्भालें और उनकी सहायता करें, और कि प्रचार किए गए सुसमाचार की सफलता के लिए यह सहयोग कितना महत्त्वपूर्ण है। इस अवसर पर मैं इसका यही उपयोग करूँगा। जैसे मैं पादरियों के इस कर्तव्य के विषय में बोल चुका हूँ कि वे जागृतियों के लिए परिश्रम करें, वैसे ही अब मैं इस पर विचार करूँगा कि
जागृति उत्पन्न करने और उसे जारी रखने में कलीसिया के सहयोग का महत्त्व।
ऐसी अनेक बातें हैं जिनके जागृति को बढ़ाने में महत्त्व पर कलीसियाओं और पादरियों ने उचित ध्यान नहीं दिया है, और यदि उन पर ध्यान न दिया जाए तो यह असम्भव हो जाएगा कि जागृतियाँ फैलें, या किसी उल्लेखनीय समय तक बनी भी रहें। अपने पिछले दो व्याख्यानों में मैं पादरियों के कर्तव्यों पर ठहरा रहा, क्योंकि मेरे लिए यह असम्भव था कि मैं जागृतियों पर व्याख्यानों की एक शृंखला प्रचार करूँ और साधनों के उस विभाग में कम या अधिक विस्तार से प्रवेश न करूँ। विषय के उस भाग को मैंने अभी समाप्त नहीं किया है, परन्तु मैंने यहाँ थोड़ा हटकर कुछ ऐसी बातों पर चर्चा करना महत्त्वपूर्ण समझा है जिनमें कलीसिया को, यदि वह जागृति का आनन्द पाने की आशा रखती है, अपने पादरी के साथ खड़ा होना और उसकी सहायता करनी चाहिए। इस विषय पर चर्चा करते हुए मैं प्रस्ताव करता हूँ कि
I. उन कई बातों का उल्लेख करूँ जिनसे मसीहियों को बचना चाहिए, यदि वे पादरियों को सहारा देना चाहते हैं।
II. कुछ ऐसी बातों का जिन पर उन्हें ध्यान देना चाहिए।
I. मुझे उन कई बातों का उल्लेख करना है जिनसे बचना आवश्यक है।
1. हर हाल में, सिद्धान्त और व्यवहार दोनों में, इस विचार से दूर रहिए कि पादरी को अकेले ही जागृतियों को बढ़ाना है। बहुत से लोग इस विषय में निष्क्रिय रवैया अपनाने की ओर झुके रहते हैं, और ऐसा अनुभव करते हैं मानो उन्हें कुछ करना ही नहीं। उन्होंने एक पादरी को नियुक्त किया है और उसे वेतन दिया है कि वह उन्हें शिक्षा और सांत्वना का भोजन खिलाए, और अब उन्हें बस बैठकर वह भोजन निगलना है जो वह उन्हें देता है। उन्हें उसका वेतन चुकाना है और उसके प्रचार में उपस्थित होना है, और वे सोचते हैं कि यह तो बहुत बड़ा काम है। और उसकी ओर से उससे यह आशा की जाती है कि वह अच्छी, खरी, सांत्वना देनेवाली शिक्षा का प्रचार करे, उन्हें सहारा दे और उन्हें चैन का अनुभव कराए, और इस प्रकार वे स्वर्ग जाने की आशा रखते हैं। मैं आपसे कहता हूँ, यदि यही उनका धर्म है, तो वे नरक में जाएँगे। स्वर्ग का मार्ग यह नहीं है।
निश्चय जानिए कि जहाँ कलीसिया में यह आत्मा छाई रहती है, वहाँ पादरी चाहे कितना ही भला क्यों न हो, कलीसिया ने जागृति को रोकने का मार्ग अपना लिया है। वह चाहे कितना ही विश्वासयोग्य हो, कितना ही लगन से लगा हुआ हो, कितना ही प्रतिभाशाली और वाक्पटु हो, वह अपने आप को थका डाल सकता है, और शायद अपना जीवन भी नष्ट कर दे, परन्तु उसे बहुत कम या बिल्कुल भी जागृति देखने को नहीं मिलेगी।
जहाँ कोई कलीसिया नहीं है, या कलीसिया में बहुत थोड़े सदस्य हैं, वहाँ कलीसिया के किसी संगठित प्रयास के बिना भी जागृति बढ़ाई जा सकती है, क्योंकि वहाँ कलीसिया है ही नहीं, और ऐसी स्थिति में परमेश्वर अपने अनुग्रह को परिस्थितियों के अनुसार ढाल देता है, जैसा उसने तब किया जब प्रेरित अकेले-अकेले संसार में सुसमाचार को रोपने निकले। मैंने ऐसी सामर्थी जागृतियों के उदाहरण देखे हैं जहाँ ऐसी ही स्थिति थी। परन्तु जहाँ साधन मौजूद हैं, वहाँ परमेश्वर चाहता है कि उनका उपयोग किया जाए। मैं ऐसी जगह में, जहाँ एक ऐसी कलीसिया हो जो काम नहीं करेगी, जागृति बढ़ाने का प्रयत्न करने के बजाय यह अधिक पसन्द करूँगा कि उस स्थान में कोई कलीसिया ही न हो। परमेश्वर चाहता है कि आशीषें देने के लिए उसके लोग उससे बिनती करें। जो कलीसिया काम नहीं करती, उसका विरोधी प्रभाव नास्तिकता से भी बुरा है। जागृति के सम्बन्ध में तटस्थ भूमि पर खड़े रहने की कोई सम्भावना नहीं है, यद्यपि धर्म का अंगीकार करनेवाले कुछ लोग कल्पना करते हैं कि वे तटस्थ हैं। यदि धर्म का अंगीकार करनेवाला कोई व्यक्ति इस काम में अपने आप को नहीं लगाएगा, तो वह उसका विरोध करता है। ऐसा व्यक्ति बीच की भूमि लेने का प्रयत्न करे, और कहे कि वह प्रतीक्षा करके देखेगा कि उनका काम कैसा निकलता है—अरे, यही तो वह भूमि है जिस पर शैतान उसे खड़ा करना चाहता है। धर्म का अंगीकार करनेवाले इस प्रकार खुले विरोध की अपेक्षा शैतान का काम कहीं अधिक प्रभावशाली ढंग से कर सकते हैं। यदि वे खुलकर विरोध में खड़े हो जाएँ, तो सब कहेंगे कि उनमें कोई धर्म नहीं है। परन्तु इस बीच के मार्ग से वे अपना प्रभाव बनाए रखते हैं, और इस प्रकार शैतान का काम अधिक प्रभावशाली ढंग से करते हैं।
पादरी को नियुक्त करते समय कलीसिया को याद रखना चाहिए कि उसने केवल एक अगुवे को नियुक्त किया है, जो मसीह के कार्य में उसे कर्म की ओर आगे ले चले। यदि कोई यह प्रस्ताव करे कि एक सेनापति का खर्च उठाया जाए और फिर उसे अकेले जाकर लड़ने दिया जाए, तो लोगों को यह बात विचित्र लगेगी! पादरी का अकेले आगे बढ़ने का प्रयत्न करना इससे तनिक भी कम बेतुका या विनाशकारी नहीं है। यदि कलीसिया अपने पादरी को अकेले काम करने के लिए छोड़ देती है, तो वह सेवकाई के उद्देश्य को गलत समझती है। यह पर्याप्त नहीं है कि वे उपदेश सुन लें। वह तो केवल आज्ञा का वचन है, जिसका पालन करने के लिए कलीसिया बाध्य है।
2. यदि आप अपना कर्तव्य नहीं कर रहे हैं, तो जागृति न होने के कारण अपने पादरी की शिकायत न कीजिए। यदि आप अपना कर्तव्य नहीं कर रहे हैं, तो जागृति न होने की शिकायत करने से कोई लाभ नहीं। जागृति न होने के लिए केवल यही एक कारण पर्याप्त है। किसी कलीसिया के लिए यह अत्यन्त क्रूर और घृणित बात है कि वह अपने पादरी की शिकायत करे, जबकि वह स्वयं गहरी नींद में सोई पड़ी है। धर्म का अंगीकार करनेवालों में यह बहुत सामान्य है कि वे अपने पादरियों की शिकायत करके अपने आप को बड़ा श्रेय देते हैं और अपने विवेक को शान्त कर लेते हैं। और जब पादरियों के जागते रहने के महत्त्व की चर्चा होती है, तो इस प्रकार के लोग झट कहने को तैयार रहते हैं, ऐसे पादरी के रहते हमारे यहाँ कभी जागृति नहीं होगी, जबकि वास्तविकता यह है कि उनका पादरी उनसे कहीं अधिक जागा हुआ है।
इस विषय के सम्बन्ध में एक और बात सत्य है, और ध्यान देने योग्य है। जब कलीसिया गिरकर निम्न दशा में पहुँच जाती है, तो धर्म का अंगीकार करनेवाले कलीसिया की, और अपने बीच धर्म की निम्न दशा की, शिकायत करने में बड़े तत्पर रहते हैं। वह अमूर्त और अनुत्तरदायी प्राणी, “कलीसिया,” उनकी ओर से सोए रहने के कारण बहुत शिकायत का पात्र बनता है। धर्म की निम्न दशा की, और कलीसिया या पादरी की ठंडक की, उनकी शिकायतें बड़े दुखड़े के साथ उँडेली जाती हैं, और उन्हें यह बोध ही नहीं होता दिखता कि कलीसिया व्यक्तियों से बनी है, और कि जब तक प्रत्येक व्यक्ति अपने मामले को अपने हाथ में न ले, अपनी ही शिकायत न करे, और परमेश्वर के सामने अपने आप को दीन न करे, और पश्चाताप न करे, और जाग न उठे, तब तक कलीसिया में कभी कोई प्रभावशीलता नहीं आ सकती, और कभी जागृति नहीं हो सकती। यदि आप अपने पादरी की, या कलीसिया की, शिकायत करने के बजाय व्यक्तिगत रूप से जाग उठें, और तब तक न उसकी और न उनकी शिकायत करें जब तक आप यह न कह सकें कि आप सब मनुष्यों के लोहू से निर्दोष हैं, और पापियों को बचाने के लिए अपना कर्तव्य कर रहे हैं, तो वह आपकी शिकायतों का औचित्य अनुभव करने लगेगा, और यदि वह न करे तो परमेश्वर करेगा, और या तो उसे जगा देगा या उसे हटा देगा।
3. जब आप अपने पादरी की सहायता करने से इनकार करते हैं, तब उसे अकेले काम चलाने का प्रयत्न करते-करते अपने आप को मार डालने न दीजिए। कभी-कभी ऐसा होता है कि पादरी पाता है कि जब तक वह अपनी पूरी शक्ति न लगा दे, तब तक यहोवा का सन्दूक आगे नहीं बढ़ेगा, और वह जागृति का इतना अभिलाषी रहा है कि उसने ऐसा किया है, और मर गया है। और वह इसके लिए मरने को तैयार था। मैं इसी राज्य के कुछ ऐसे उदाहरण बता सकता हूँ जहाँ पादरी मर गए, और निःसन्देह ऐसी जगह जागृति बढ़ाने के लिए अपने परिश्रम के परिणामस्वरूप मरे जहाँ कलीसिया उस काम से पीछे हटी रही।
मैं एक उदाहरण बताऊँगा। कुछ वर्ष पहले एक पादरी ऐसी जगह परिश्रम कर रहा था जहाँ जागृति हो रही थी; और कुछ दूरी पर स्थित एक कलीसिया का एक प्राचीन उससे मिलने आया, जो चाहता था कि वह वहाँ जाकर प्रचार करे। वहाँ कोई जागृति नहीं थी, और कभी हुई भी नहीं थी, और प्राचीन ने उनकी दशा की शिकायत की, कहा कि उनके यहाँ दो उत्तम पादरी रह चुके थे, एक ने अपने आप को पूरी तरह थका डाला और मर गया, और दूसरे ने अपने आप को चूर कर डाला, और निराश हो गया, और उन्हें छोड़कर चला गया, और वे एक निर्धन और निर्बल कलीसिया थे, और जब तक उनके यहाँ जागृति न हो, उनकी सम्भावनाएँ बहुत अन्धकारमय थीं, और इसलिए उसने इस पादरी से गिड़गिड़ाकर विनती की कि वह जाकर उनकी सहायता करे। वह बहुत दुखी दिखाई देता था, और पादरी ने उसका रोना-धोना सुना, और अन्त में यह पूछकर उत्तर दिया, आपके यहाँ कभी जागृति क्यों नहीं हुई? मैं नहीं जानता, प्राचीन ने कहा। हमारे पादरी ने कठोर परिश्रम किया, परन्तु कलीसिया जागती हुई नहीं दिखी, और न जाने क्यों कोई जागृति होती नहीं दिखी। “अच्छा, तो,” पादरी ने कहा, “मैं समझ गया कि आप क्या चाहते हैं; आपने परमेश्वर के एक सेवक को मार डाला, और दूसरे को ऐसा तोड़ डाला कि उसे आपको छोड़ना पड़ा, और अब आप एक और को वहाँ ले जाकर उसे भी मार डालना चाहते हैं, और शैतान ने आपको यहाँ भेजा है कि आप मुझे ले जाएँ कि मैं जाकर आपका पालना झुलाऊँ। आपके पास प्रचार करने के लिए एक अच्छा पादरी था, परन्तु आप सोते रहे, और उसने अपने आप को यहाँ तक खपाया कि वह सचमुच उस काम में मर गया। फिर प्रभु ने आपको एक और दिया, और तब भी आप पड़े सोते रहे, और अपने कर्तव्य के प्रति जागने को तैयार न हुए। और अब आप निराश होकर यहाँ आए हैं, और एक और पादरी चाहते हैं, है न? परमेश्वर न करे कि जब तक आप वैसा ही करते रहें जैसा आपने किया है, आपको कभी दूसरा पादरी मिले। परमेश्वर न करे कि आपको कभी कोई पादरी मिले, जब तक कलीसिया अपने कर्तव्य के प्रति जाग न उठे।” प्राचीन का मन भर आया, क्योंकि वह भला मनुष्य था। उसकी आँखों में आँसू आ गए, और उसने कहा कि वे इससे अधिक के योग्य नहीं थे। “और अब,” पादरी ने कहा, “क्या आप विश्वासयोग्य रहेंगे, और घर जाकर कलीसिया को वह बताएँगे जो मैं कह रहा हूँ? यदि आप ऐसा करें, और वे विश्वासयोग्य होकर अपने कर्तव्य के प्रति जाग उठें, तो उन्हें पादरी मिलेगा, इसकी मैं उन्हें ज़मानत देता हूँ।” प्राचीन ने कहा कि वह ऐसा करेगा, और वह अपने वचन का पक्का निकला; वह घर गया और कलीसिया को बताया कि जब तक वे जाग न उठें, किसी दूसरे पादरी से अपने बीच आने को कहना उनकी कितनी बड़ी क्रूरता होगी। उन्होंने यह बात अनुभव की, और अपने पापों को मान लिया, और अपने कर्तव्य के प्रति जाग उठे, और उनके पास एक पादरी भेजा गया, और एक बहुमूल्य और सामर्थी जागृति हुई।
कलीसियाओं को इस बात का बोध नहीं कि कितनी बार उनकी ठंडक और पिछड़ापन सचमुच पादरियों की मृत्यु का कारण बन सकता है। लोगों की, और पापियों की, दशा उनके मन पर बोझ बनी रहती है, वे रात-दिन प्राण में प्रसव-पीड़ा सहते हैं, और वे समय और असमय, मनुष्य की देह की सहनशक्ति से बढ़कर परिश्रम करते हैं, यहाँ तक कि वे घिस जाते हैं और मर जाते हैं। कलीसिया पादरी के हृदय की उस वेदना को नहीं जानती, जब वह प्राणों के लिए प्रसव-पीड़ा सहता है, और कलीसिया को सहायता के लिए जगाने का परिश्रम करता है, और फिर भी उन्हें मृत्यु की नींद में सोया हुआ देखता है। शायद कभी-कभी वे कुछ दिनों के लिए उत्तेजित होकर क्षणिक प्रयास करेंगे, और फिर सब कुछ पुनः ठंडा पड़ जाता है। और इस प्रकार बहुत से विश्वासयोग्य पादरी अपने आप को घिसाकर मर जाते हैं, और फिर यही हृदयहीन अंगीकार करनेवाले सबसे पहले उसे इतना अधिक करने का दोष देते हैं।
मुझे एक भले पादरी का उदाहरण याद है, जो एक ऐसी जगह गया जहाँ जागृति हो रही थी, और वहाँ रहते हुए उसने पादरियों के लिए एक तीखा उपदेश सुना। उसने उसे परमेश्वर के जन के समान ग्रहण किया; उसने परमेश्वर के सत्य के विरुद्ध विद्रोह नहीं किया, वरन् उसने परमेश्वर से मन्नत मानी कि जब तक वह अपने लोगों के बीच जागृति न देख ले, तब तक वह कभी विश्राम न करेगा। वह घर लौटा और काम में लग गया; कलीसिया जागने को तैयार न हुई, केवल कुछ सदस्यों को छोड़कर, और प्रभु ने उन्हें आशीष दी, और अपना आत्मा उँडेला, परन्तु पादरी जागृति के बीच ही अपने बिछौने पर लेट गया और मर गया।
4. सीधे-सादे, तीखे प्रचार की शिकायत न करने में सावधान रहिए, तब भी जब उसकी डाँट आप ही पर आ पड़ती हो। कलीसियाएँ यह भूल जाने की प्रवृत्ति रखती हैं कि पादरी केवल परमेश्वर के प्रति उत्तरदायी है। वे पादरी के प्रचार करने के लिए नियम बनाना चाहती हैं, ताकि वह उन पर लागू न हो। यदि वह कलीसिया पर ज़ोर डालता है, और उनके बीच फैले हुए पापों को उजागर करता है, तो वे उसे व्यक्तिगत आक्षेप कहते हैं, और सत्य के विरुद्ध विद्रोह करते हैं। या वे कहते हैं, उसे संसार के सामने कलीसिया को इतनी स्पष्टता से प्रचार नहीं करना चाहिए; वे कहते हैं, इससे धर्म की बदनामी होती है, और उसे चाहिए कि उन्हें अलग ले जाकर केवल कलीसिया को प्रचार करे, और पापियों को यह न बताए कि मसीही कितने बुरे हैं। परन्तु ऐसे अवसर होते हैं जब पादरी याकूब के घराने को उसके पाप जताने से कम कुछ नहीं कर सकता। यदि आप पूछें, जब हम अकेले हों तब ऐसा क्यों नहीं करते? तो मैं उत्तर देता हूँ, मानो पापी यह नहीं जानते कि आपने गलत किया। जब आप अकेले में पाप करने के लिए इकट्ठे होंगे, तब मैं आपको अकेले में आपके अपने पापों के विषय में प्रचार करूँगा। परन्तु यहोवा के जीवन की शपथ, यदि आप संसार के सामने पाप करते हैं, तो संसार के सामने ही आपको डाँटा जाएगा। क्या यह तथ्य नहीं है कि पापी जानते हैं कि आप कैसे जीते हैं, और कि वे आपसे ठोकर खाकर नरक में जा गिरते हैं? तो जब पादरी संसार के सामने खुलकर कलीसिया को डाँटना अपना कर्तव्य समझें, तब उन्हें दोष न दीजिए। यदि आप इतने घमण्डी हैं कि यह सह नहीं सकते, तो आपको जागृति की आशा रखने की आवश्यकता नहीं। प्रचार को केवल इसलिए अत्यधिक स्पष्ट न कहिए कि वह कलीसिया के दोषों को उजागर करता है। अत्यधिक स्पष्ट प्रचार नाम की कोई चीज़ होती ही नहीं।
5. कभी-कभी धर्म का अंगीकार करनेवाले इस बात से घबरा जाते हैं कि कहीं पादरी स्पष्ट प्रचार के द्वारा भक्तिहीनों को नाराज़ न कर दे। और वे उसे इसके विरुद्ध सावधान करने लगेंगे, और उससे पूछेंगे कि क्या यह अच्छा न होगा कि वह ठेस पहुँचाने से बचने के लिए थोड़ा बदल जाए, इत्यादि। यह भय विशेष रूप से तब जागता है जब मंडली के कुछ अधिक धनी और प्रभावशाली सदस्य नाराज़ हो जाते हैं, कि कहीं वे कलीसिया से अपना सहारा न हटा लें, और पादरी का वेतन चुकाने में सहायता के लिए अपना धन देना बन्द न कर दें, और इस प्रकार बोझ कलीसिया पर और भारी न आ पड़े। ऐसी कलीसिया में कभी जागृति नहीं हो सकती। अरे, कलीसिया को तो सब बातों से बढ़कर यह प्रार्थना करनी चाहिए कि सत्य भक्तिहीनों पर आग के समान आ पड़े। यदि वे नाराज़ हो जाएँ तो क्या? मसीह उनके धन के बिना भी भली-भाँति काम चला सकता है। अपने पादरी को दोष न दीजिए, और न उससे यह कहिए कि वह भक्तिहीनों को प्रसन्न करने और उन्हें मनाने के लिए अपने प्रचार का ढंग बदल दे। पश्चाताप न करनेवालों को प्रचार करने से पादरी को कोई लाभ नहीं, जब तक वह उन्हें सत्य का प्रचार न कर सके। और उनका सुसमाचार के खर्च के लिए धन देना किसी काम का नहीं, जब तक उसका प्रचार इस ढंग से न हो कि वे जाँचे जाएँ और उद्धार पाएँ।
कभी-कभी कलीसिया के सदस्य आपस में पादरी की अविवेकपूर्णता की चर्चा करेंगे, और एक दल खड़ा कर लेंगे, और बहुत ही गलत आत्मा में पड़ जाएँगे, क्योंकि दुष्ट लोग अप्रसन्न हैं। एक जगह थी जहाँ एक सामर्थी जागृति हुई, और बड़ा विरोध हुआ। कलीसिया घबरा गई, इस भय से कि यदि पादरी कम स्पष्ट और कम तीखा न हुआ, तो पश्चाताप न करनेवालों में से कुछ जाकर किसी दूसरी मंडली में सम्मिलित हो जाएँगे। और कलीसिया के प्रमुख पुरुषों में से एक को नियुक्त किया गया कि वह पादरी के पास जाकर उससे कहे कि वह इतना कड़ा प्रचार न करे, क्योंकि यदि वह ऐसा ही करता रहा, तो अमुक-अमुक व्यक्ति मंडली छोड़ देंगे। पादरी ने पूछा, क्या प्रचार सत्य नहीं है? “है।” क्या परमेश्वर उसे आशीष नहीं देता? “देता है।” क्या आपने इस स्थान में पहले कभी ऐसा काम देखा था? “नहीं, मैंने कभी नहीं देखा।” “हे शैतान, मेरे साम्हने से दूर हो; शैतान ने आपको इस काम पर यहाँ भेजा है; आप देखते हैं कि परमेश्वर प्रचार पर आशीष दे रहा है, काम आगे बढ़ रहा है, और प्रतिदिन पापियों का मन-परिवर्तन हो रहा है, और अब आप मुझसे यह करवाने आए हैं कि मैं प्रचार का स्वर धीमा कर दूँ, ताकि भक्तिहीनों के मन को चैन मिले।” उस मनुष्य ने इस डाँट को अनुभव किया, और उसे एक मसीही के समान ग्रहण किया; उसने अपनी भूल देखी और झुक गया, और फिर कभी प्रचार की स्पष्टता में दोष निकालते हुए नहीं सुना गया।
एक और नगर में, जहाँ जागृति हो रही थी, कुछ प्रभाव रखनेवाली एक स्त्री ने (जो भक्त नहीं थी) उस प्रचार की, जिसे वह स्पष्ट, तीखा, व्यक्तिगत प्रचार कहती थी, बहुत शिकायत की। परन्तु कुछ समय बाद वह स्वयं उस काम का विषय बन गई। इसके बाद उसके कुछ पश्चाताप न करनेवाले मित्रों ने उसे याद दिलाया कि वह प्रचारक के “इतना गरम-गरम प्रचार करने” के विरुद्ध क्या-क्या कहा करती थी। अब उसने कहा कि उसके विचार बदल गए हैं, और उसे इसकी कोई चिन्ता नहीं कि सत्य कितना गरम प्रचार किया जाए, चाहे वह लाल-तप्त ही क्यों न हो।
6. किसी भी प्रकार से दुष्टों का पक्ष न लीजिए। यदि आप ऐसा तनिक भी करेंगे, तो आप उनके हाथ दृढ़ करेंगे। यदि दुष्ट लोग पादरी पर अविवेकी होने, या व्यक्तिगत आक्षेप करने, का दोष लगाएँ, और कलीसिया के सदस्य, यह माने बिना कि पादरी ऐसा करता है, केवल इतना मान लें कि व्यक्तिगत प्रचार गलत है, और व्यक्तिगत प्रचार के अनुचित होने की चर्चा करें, तो दुष्ट लोग ऐसी टिप्पणियों से अपने आप को दृढ़ अनुभव करेंगे। उनके साथ बिल्कुल भी न मिलिए, क्योंकि वे अनुभव करेंगे कि उनके पादरी के विरुद्ध आप उनके पक्ष में हैं। आप उनके सिद्धान्त अपनाते हैं, और उनकी भाषा बोलते हैं, और यह समझा जाता है कि आपकी उनके साथ सहानुभूति है। व्यक्तिगत प्रचार क्या है? किसी भी व्यक्ति को प्रचार से कभी लाभ नहीं होता, जब तक उसे यह अनुभव न कराया जाए कि उसका अर्थ वही है। ऐसा प्रचार सदा व्यक्तिगत होता है। दुष्ट मनुष्यों को वह प्रायः इतना व्यक्तिगत प्रतीत होता है कि वे ऐसा अनुभव करते हैं मानो अभी मंडली के सामने उनका नाम लेकर उन्हें पुकारा जानेवाला है। एक बार एक पादरी एक मंडली को प्रचार कर रहा था, और कुछ विशेष प्रकार के चरित्रों का वर्णन करते हुए उसने कहा, “यदि मैं सर्वज्ञ होता, तो मैं उन्हीं व्यक्तियों का नाम ले सकता था जो इस चित्र से मेल खाते हैं।” एक मनुष्य चिल्ला उठा, “मेरा नाम लीजिए!” और वह ऐसा दिख रहा था मानो धरती में धँसा जा रहा हो। उसने बाद में कहा कि उसका बोल उठने का कोई इरादा नहीं था, परन्तु पादरी ने उसका वर्णन इतनी पूर्णता से किया कि उसने सचमुच सोचा कि वह उसका नाम लेकर पुकारनेवाला है। पादरी को यह पता भी न था कि संसार में ऐसा कोई मनुष्य है। मनुष्यों का यह सोचना सामान्य है कि उन्हीं के आचरण का वर्णन किया जा रहा है, और वे शिकायत करते हैं, “उसे मेरे बारे में किसने बताया है? किसी ने उससे मेरे बारे में बात की है, और उससे मुझ पर निशाना साधकर प्रचार करवाया है।” मेरा अनुमान है कि मैंने ठीक ऐसे ही पाँच सौ या हज़ार मामलों के विषय में सुना है। अब यदि कलीसिया के सदस्य इतना ही मान लें कि पादरी का अपने प्रचार में किसी को लक्ष्य करना गलत है, तो वह कोई भलाई कैसे कर सकता है? यदि आप नहीं चाहते कि आपका पादरी किसी को लक्ष्य करे, या किसी को प्रचार करे, तो अच्छा होगा कि आप उसे विदा कर दें। यदि उन व्यक्तियों को नहीं, उन लोगों को नहीं जो उसके सामने बैठे हैं, तो वह किसे प्रचार करे? और जब वह उन्हें लक्ष्य ही नहीं करता, तो वह उन्हें प्रचार कैसे कर सकता है?
7. यदि आप जागृति बढ़ाने में अपने पादरी के साथ खड़े रहना चाहते हैं, तो अपने जीवन से उसके प्रचार का खण्डन न कीजिए। यदि वह प्रचार करता है कि पापी नरक की ओर जा रहे हैं, तो अपनी छिछोरी हँसी और लापरवाही से उसे झूठा न ठहराइए, और मुस्कुराकर उसे उड़ा न दीजिए। मैंने पापियों को उस प्रभाव के विषय में बोलते सुना है जो एक गम्भीर और हृदय को जाँचनेवाले उपदेश के बाद मसीहियों की छिछोरी हँसी ने उनके मन पर डाला। वे गम्भीर और कोमल अनुभव करते हैं, और अपनी दशा पर घबराने लगते हैं, और वे देखते हैं कि ये धर्म का अंगीकार करनेवाले उन पर रोने के बजाय पूरी तरह हल्के-फुल्के और निश्चिन्त हैं, मानो कह रहे हों, “डरो मत, पापियो, आखिरकार बात इतनी बुरी नहीं है; शान्त रहो, तुम्हारा भला होगा; क्या तुम सोचते हो कि यदि तुम इतनी तेज़ी से नरक की ओर जा रहे होते तो हम हँसते और ठट्ठा करते? यदि केवल तुम्हारे घर में आग लगी होती तो भी हम न हँसते, और यदि हम तुम्हें उसमें जलते देखते तो और भी न हँसते।” ऐसी स्थिति में पादरी का पापियों को प्रचार करना किस काम का?
8. अपने पादरी का समय अनावश्यक रूप से न लीजिए। पादरियों का बहुत सा समय प्रायः उन व्यक्तियों के कारण नष्ट होता है जो उनसे बातें करने आते हैं, जबकि उनके पास बात करने को कोई महत्त्वपूर्ण विषय नहीं होता, और कोई विशेष काम नहीं होता। पादरी निःसन्देह अपने मित्रों को देखकर प्रसन्न होता है, और प्रायः अपने लोगों के साथ बातचीत में समय बिताने को बहुत अधिक तैयार रहता है, क्योंकि वह उनसे प्रेम करता है और उनका आदर करता है। धर्म का अंगीकार करनेवालों को याद रखना चाहिए कि पादरी का समय सोने से अधिक मूल्यवान है, क्योंकि वह उस काम में लगाया जा सकता है जिसे सोना कभी नहीं खरीद सकता। यदि पादरी को उसके घुटनों से, या उसकी बाइबल से, या उसके अध्ययन-कक्ष से इसलिए दूर रखा जाता है कि वे उसके साथ बातचीत का आनन्द उठाएँ, तो वे बड़ी हानि करते हैं। जब आपके पास उचित कारण हो, तो आपको उससे मिलने जाने में कभी हिचकना नहीं चाहिए, और जितना समय आवश्यक हो उतना ले भी लेना चाहिए। परन्तु यदि आपके पास कहने को कोई विशेष महत्त्वपूर्ण बात नहीं है, तो दूर रहिए। मैं हमारे एक नगर में एक मनुष्य को जानता था, जो बेरोज़गार था, और वह पादरी के महीनों का समय ले लिया करता था। वह उसके अध्ययन-कक्ष में आ जाता, और एक-एक बार में तीन-तीन घंटे बैठकर बातें करता, क्योंकि उसके पास करने को और कुछ नहीं था, यहाँ तक कि अन्त में पादरी को उसे स्पष्ट रूप से डाँटना पड़ा, और उसे बताना पड़ा कि वह कितना बड़ा पाप कर रहा है।
9. किसी भी ऐसी बात का समर्थन कदापि न कीजिए जो लोगों का ध्यान धर्म के विषय से हटा देनेवाली हो। प्रायः जब वर्ष का वह समय आता है जब काम करना है, जब शामें लम्बी होती हैं, और कारोबार हल्का होता है, और विशेष प्रयास करने का ठीक यही समय होता है, उसी क्षण कलीसिया में कोई व्यक्ति एक दावत देगा, और कुछ मसीही मित्रों को बुलाएगा, ताकि उसे एक धार्मिक दावत बनाया जा सके। और फिर किसी दूसरे परिवार को भी बदले में शिष्टाचार निभाने के लिए वैसा ही करना पड़ेगा। फिर एक और, और एक और, यहाँ तक कि वह दावतों की एक संगठित व्यवस्था बन जाती है, जो पूरे जाड़े को निगल जाती है। घृणित! यह शैतान की बड़ी युक्ति है, क्योंकि यह इतनी निर्दोष, और इतनी उचित दिखाई देती है, कि इससे अच्छी भावना बढ़ती है, और मसीहियों का एक
दूसरे से परिचय बढ़ता है। और इस प्रकार वे प्रार्थना-सभाओं के बजाय ये दावतें करेंगे।
इन दावतों की बुराइयाँ बहुत बड़ी हैं। वे प्रायः बड़े खर्च से आयोजित की जाती हैं, और उनमें अत्यन्त घृणित पेटूपन किया जाता है। कहा जाता है कि उनका खर्च एक सौ से दो हज़ार डॉलर तक होता है। मुझे बताया गया है कि कुछ उदाहरणों में मसीही होने का दावा करनेवालों ने बड़ी-बड़ी दावतें दी हैं, और बड़े भोज किए हैं, और यीशु मसीह के धन के उपयोग में अपनी भक्तिहीन फ़िज़ूलख़र्ची का बहाना यह बनाया है कि भोज समाप्त होने के बाद जो बचा, वह उन्होंने कंगालों को दे दिया! इस प्रकार वे कंगालों की भलाई के बहाने, परमेश्वर के विधान की उदार देनों पर, यहाँ तक कि ठूँस-ठूँसकर, भोज और रंगरलियाँ मनाने को एक सद्गुण बना देते हैं। सिद्धान्त में यह वैसा ही है जैसा कुछ वर्ष पहले एक पड़ोसी नगर में दिया गया एक भव्य नृत्य-समारोह। वह नृत्य-समारोह कंगालों के लाभ के लिए आयोजित किया गया था, और प्रत्येक सज्जन को एक निश्चित राशि देनी थी, और नृत्य-समारोह समाप्त होने के बाद, इस प्रकार इकट्ठी की गई राशि में से जो कुछ बचे, वह कंगालों को दिया जाना था। सचमुच यह विचित्र दान है, कि खाएँ और पीएँ और नाचें, और जब वे तब तक रंगरलियाँ और भोज मना चुकें जब तक और आनन्द न ले सकें, तब मेज़ से गिरे हुए टुकड़े कंगालों में बाँट दें। मुझे समझ नहीं आता कि ऐसा नृत्य-समारोह ऐसी मसीही दावतों के बराबर ही भक्तिपूर्ण क्यों नहीं है। नृत्य-समारोहों की बुराई केवल नाचने के अभ्यास में नहीं है, वरन् उनसे जुड़े भोग-विलास, और ठूँस-ठूँसकर खाने, और परीक्षाओं में है।
परन्तु कहा जाता है कि वे मसीही दावतें हैं, और कि उनमें आनेवाले सब, या लगभग सब, धर्म का अंगीकार करनेवाले होते हैं। और इसके अतिरिक्त, कि उनका समापन प्रायः प्रार्थना से होता है। अब मैं इसे उनकी सबसे बुरी विशेषताओं में से एक मानता हूँ; कि समय और धन की बर्बादी, खाने-पीने में अति, व्यर्थ बातचीत, और अनगिनत मूर्खताओं के बाद, जिनसे ऐसा अवसर भरा रहता है, उसे प्रार्थना के साथ समाप्त करके उसे पवित्र ठहराने, और परमेश्वर के मत्थे मढ़ने का प्रयत्न किया जाए। आप चाहे जो कहें, किसी नृत्य-समारोह, या नाटकशाला, या ताश की दावत को प्रार्थना के साथ समाप्त करना इससे अधिक बेतुका, या असंगत, या अधर्मपूर्ण न होगा।
क्या नौबत यहाँ तक आ पहुँची है कि धर्म का अंगीकार करनेवाले, जो संसार के उद्धार की इच्छा रखने का दावा करते हैं, जब आकाश की चारों दिशाओं से उनसे ऐसी पुकारें की जा रही हैं कि सुसमाचार भेजें, बाइबलें, और पर्चे, और मिशनरी जुटाएँ, ताकि संसार को मृत्यु से बचाया जाए, तब वे एक ही शाम में सैकड़ों डॉलर खर्च कर दें, और फिर मासिक प्रार्थना-सभा में जाकर अन्यजातियों के लिए प्रार्थना करें!
मुझे बताया गया है कि कुछ उदाहरणों में वे इस तथ्य में अपने विवेक के लिए मरहम पाते हैं कि उनका पादरी उनकी दावतों में उपस्थित होता है। यह, निःसन्देह, ऐसे उदाहरण को बल देगा, और यदि धर्म का अंगीकार करनेवाले एक व्यक्ति ने दावत दी और अपने पादरी को बुलाया, तो दूसरों को भी वैसा ही करना पड़ेगा। उनका अगला कदम यह हो सकता है कि हर एक नृत्य-समारोह दे, और अपने पादरी को उसका प्रबन्धक नियुक्त करे! क्यों नहीं? और शायद, कुछ समय बाद, वह उन पर यह कृपा करेगा कि सारंगी बजाए। मेरे विचार में वह ऐसा करे तो भी उतना ही ठीक है जितना ऐसी दावत में जाकर उसे प्रार्थना से समाप्त करना। मैंने दुःख के साथ सुना है कि रॉचेस्टर में—उस स्थान में जिस पर प्रभु की इतनी बड़ी कृपा हुई है—दावतों का एक सिलसिला चला है, न जाने किस सीमा तक। मैं नहीं जानता कि वे किसके प्रभाव से आयोजित की गई हैं, या किन विशेष व्यक्तियों ने उन्हें संरक्षण दिया है और उनमें भाग लिया है। परन्तु मैं किसी भी ऐसी मंडली को, जो दावतों का सिलसिला चलाने की योजना बना रही हो, यह सलाह दूँगा कि इस बीच वह अपने पादरी को विदा कर दे, और उसे जाकर वहाँ प्रचार करने दे जहाँ लोग वचन को ग्रहण करने और उससे लाभ उठाने को तैयार हों, और उसे वहाँ न रखे कि वह उनके बीच धर्म को बढ़ाने का प्रयत्न करते हुए व्याकुल, और दुखी, और मार डाला जाए, जबकि वे तन-मन से शैतान की सेवा में लगे हुए हैं।
धर्म का अंगीकार करनेवालों को कभी भी कोई ऐसी चीज़ आयोजित नहीं करनी चाहिए जो लोगों का ध्यान धर्म से हटा दे, जब तक कि उन्होंने पहले अपने पादरी से सलाह न ले ली हो, और उसे विशेष प्रार्थना का विषय न बना लिया हो। और यदि वे पाएँ कि उसका यही प्रभाव होगा, तो उन्हें वह कभी नहीं करना चाहिए। लोगों के सामने प्रायः ऐसे विषय आएँगे जिनकी यही प्रवृत्ति होती है; व्याख्यानों की कोई शृंखला, या कोई तमाशा, या ऐसा ही कुछ। धर्म का अंगीकार करनेवालों को बुद्धिमान होना चाहिए, और समझना चाहिए कि वे क्या कर रहे हैं, और किसी भी ऐसी बात को तब तक समर्थन न देना चाहिए, जब तक वे यह न देख लें कि उसका क्या प्रभाव होगा, और क्या वह जागृति में बाधा डालेगी। यदि वह ऐसा करेगी, तो उनका उससे कोई लेना-देना न हो। ऐसी हर बात को मसीह के राज्य पर उसके प्रभाव के आधार पर आँका जाना चाहिए।
दावतों के सम्बन्ध में, आप चाहे जितना कहें कि वे निर्दोष मनोरंजन हैं, मैं आप में से उन सब से, जो कभी उनमें गए हैं, अपील करता हूँ कि वे बताएँ कि क्या वे आपको प्रार्थना के योग्य बनाती हैं, या आपकी आत्मिकता बढ़ाती हैं, या क्या उनमें कभी पापियों का मन-परिवर्तन होता है, या मसीही प्राणों के लिए प्रार्थना में वेदना से जूझने लगते हैं?
II. मुझे उन कई बातों का उल्लेख करना है जो कलीसियाओं को करनी ही चाहिए, यदि वे जागृति बढ़ाना और अपने पादरी की सहायता करना चाहती हैं।
1. उन्हें उसकी सांसारिक आवश्यकताओं का ध्यान रखना चाहिए। जो पादरी अपने आप को पूरी तरह इस काम में लगा देता है, वह सांसारिक धन्धों में नहीं लग सकता, और इसलिए वह अपनी सांसारिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए, जिसमें उसके परिवार का भरण-पोषण भी सम्मिलित है, पूरी तरह अपने लोगों पर निर्भर रहता है। मुझे यहाँ इस बात पर तर्क करने की आवश्यकता नहीं, क्योंकि आप सब इसे भली-भाँति समझते हैं। यह परमेश्वर की आज्ञा है, कि “जो लोग सुसमाचार सुनाते हैं, उन की जीविका सुसमाचार से हो।” परन्तु अब चारों ओर देखिए कि कितनी कलीसियाएँ इस विषय में क्या करती हैं। उदाहरण के लिए, जब उन्हें पादरी चाहिए होता है, तो वे इधर-उधर देखेंगी कि कितने सस्ते में उन्हें एक मिल सकता है। वे एक-एक पाई तक हिसाब लगाएँगी कि उसके नमक पर कितना खर्च होगा, और उसके आटे पर कितना, और फिर उसका वेतन इतना कम तय करेंगी कि उसे गुज़ारा करने और अपने परिवार को पालने में अत्यधिक कठिनाई उठानी पड़े। प्रभावशाली ढंग से अध्ययन और परिश्रम करने के लिए पादरी का मन निश्चिन्त होना चाहिए, और वह दाम घटवाने, और मोल-भाव करने, और अपनी आवश्यक वस्तुएँ लाभ के साथ खरीदने के सबसे अच्छे अवसरों की ताक में रहने का काम नहीं कर सकता। यदि उसे ऐसा करने को विवश होना पड़े, तो उसका मन उलझ जाता है। जब तक उसकी सांसारिक आवश्यकताएँ इस प्रकार पूरी न की जाएँ कि उसके विचार उनसे हटकर रह सकें, वह अपना कर्तव्य कैसे कर सकता है?
2. अपने पादरी के साथ ईमानदार रहिए।
यह नाप-तौल और हिसाब न लगाइए कि वह कितने कम नमक और कितने कम बुशल अनाज में किसी प्रकार गुज़ारा कर सकता है। याद रखिए, आपका व्यवहार मसीह के साथ है। और वह आपको बुलाता है कि आप उसके सेवकों को ऐसी स्थिति में रखें कि साधारण समझदारी के साथ सांसारिक तंगी का प्रश्न ही न उठे।
3. उसके साथ समय के पाबन्द रहिए।
कभी-कभी कलीसियाएँ, जब वे किसी पादरी को नियुक्त करने जा रही होती हैं, तो वेतन देने के विषय में बड़ा घमण्ड दिखाती हैं, और वे चन्दे की सूची बनाएँगी, और एक ऐसी राशि तय करेंगी जो वे कभी नहीं चुकातीं, और बहुत सम्भव है कि जिसे चुकाने की उन्होंने कभी आशा भी न की थी। और इस प्रकार, एक, दो, तीन, या चार वर्ष बाद, समिति पर अपने पादरी के तीन या चार सौ डॉलर बकाया हो जाते हैं, और फिर वे आशा करते हैं कि वह उन्हें यह छोड़ देगा। और इस पूरे समय वे आश्चर्य करते रहते हैं कि जागृति क्यों नहीं होती! यही ठीक कारण हो सकता है, क्योंकि कलीसिया ने झूठ बोला है; उन्होंने इतनी राशि चुकाने का पक्का वचन दिया है, और वैसा नहीं किया। परमेश्वर अपने स्वभाव के अनुरूप रहते हुए ऐसी कलीसिया पर अपना आत्मा नहीं उँडेल सकता।
4. बिना माँगे उसे उसका वेतन चुका दीजिए।
पादरी के लिए प्रायः कोई बात इतनी लज्जाजनक नहीं होती जितना अपने वेतन के लिए अपने लोगों से तगादा करने को विवश होना। प्रायः वह शत्रु बना लेता है, और ठेस पहुँचाता है, क्योंकि उसे अपने धन के लिए बार-बार, और बार-बार, और बार-बार माँगने जाना पड़ता है, और फिर भी वह उसे उस तरह नहीं मिलता जैसा उन्होंने वचन दिया था। यदि उनकी साख दाँव पर होती तो वे उसे चुका देते, परन्तु जब बात केवल विवेक और परमेश्वर की आशीष की होती है, तो वे उसे यूँ ही पड़ा रहने देते हैं। यदि उनमें से किसी का बैंक में कोई रुक्का होता, तो आप देखते कि वह तीन बजे से पहले वहाँ पहुँच जाने में कितना सावधान और तत्पर रहता। यह इसलिए कि रुक्का अस्वीकृत घोषित हो जाएगा, और उनकी साख चली जाएगी। परन्तु वे जानते हैं कि पादरी अपने वेतन के लिए उन पर मुक़दमा नहीं करेगा, और वे लापरवाह रहते हैं और उसे बढ़ने देते हैं, और उसे असुविधा सहनी पड़ती है। यह शहर में उतना
सामान्य नहीं है जितना गाँव-देहात में। परन्तु देहात में मैंने मंडलियों की लापरवाही और क्रूरता के कारण, जो देय है उसे रोक रखने के कारण, संकट और दुर्दशा के कुछ हृदयविदारक उदाहरण देखे हैं। कलीसियाएँ आदतन झूठ और छल में जीती हैं, और फिर आश्चर्य करती हैं कि उनके यहाँ जागृति क्यों नहीं होती। वे आश्चर्य कैसे कर सकती हैं?
5. अपने पादरी के लिए प्रार्थना कीजिए।
इससे मेरा कुछ अर्थ है। और आप क्या सोचते हैं कि मेरा अर्थ क्या है? प्रेरित भी कलीसियाओं से आग्रह किया करते थे कि वे उनके लिए प्रार्थना करें। यह जितना आप सोचते हैं उससे कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण है। पादरी लोगों से केवल मनुष्य होने के नाते अपने लिए प्रार्थना करने को नहीं कहते, और न इसलिए कि वे आत्मा के प्रभावों की बहुतायत से भर जाएँ, केवल अपने व्यक्तिगत आनन्द को बढ़ाने के लिए। परन्तु वे जानते हैं कि जब तक कलीसिया पादरी के परिश्रम पर आशीष की बड़ी अभिलाषा न करे, तब तक उसका उसकी आशा रखना परमेश्वर की परीक्षा करना है। कितनी बार पादरी अपने मंच पर जाता है, यह अनुभव करते हुए कि परमेश्वर की आशीष के लिए उसका हृदय फटने को है, जबकि वह यह भी अनुभव करता है कि उसकी आशा रखने का कोई स्थान नहीं, क्योंकि यह विश्वास करने का कोई कारण नहीं कि कलीसिया उसकी अभिलाषा रखती है! शायद वह दो घंटे घुटनों पर गिड़गिड़ाकर बिनती करता रहा है, और फिर भी, क्योंकि कलीसिया आशीष की अभिलाषा नहीं रखती, वह ऐसा अनुभव करता है मानो उसके शब्द उछलकर उसी के मुँह पर लौट आएँगे।
मैंने ऐसे मसीही देखे हैं जो, जब पादरी मंच पर जा रहा होता, तो वेदना में होते, इस भय से कि कहीं उसका मन बादल में न हो, या उसका हृदय ठंडा न हो, या उसमें कोई अभिषेक न हो, और इस प्रकार आशीष न आए। मैंने इस प्रकार के एक मनुष्य के साथ परिश्रम किया है। वह तब तक प्रार्थना करता रहता जब तक उसके मन में यह निश्चय न हो जाता कि परमेश्वर प्रचार में मेरे साथ रहेगा, और कभी-कभी वह प्रार्थना करते-करते अपने आप को बीमार कर लेता। मुझे ऐसा समय याद है, जब लोग इकट्ठे हो रहे होते थे और वह कुछ समय के लिए अन्धकार में रहा, और उसका मन चिन्ता से भरा था, और वह बार-बार प्रार्थना करने जाता, यहाँ तक कि अन्त में वह शान्त चेहरे के साथ कमरे में आता, और कहता, “प्रभु आ गया है, और वह हमारे साथ रहेगा।” और मुझे याद नहीं कि मैंने उसे कभी गलत पाया हो।
मैंने एक कलीसिया को दिन-प्रतिदिन अपने पादरी को प्रार्थना में अपनी बाँहों पर उठाए रखते, और अकथनीय चिन्ता के साथ इस बात की चौकसी करते देखा है कि उसके परिश्रम में पवित्र आत्मा उसके साथ रहे! जब वे ऐसा अनुभव करते और ऐसी प्रार्थना करते हैं, तो ओह, मंडली में कैसी भावनाएँ और कैसे चेहरे प्रकट होते हैं! उन्होंने अकथनीय चिन्ता अनुभव की है कि वचन सामर्थ के साथ आए, और प्रभाव डाले, और जब वे अपनी प्रार्थना का उत्तर मिलते देखते हैं, और हृदय से गरम-गरम निकलता हुआ और लोगों पर प्रभाव डालता हुआ कोई शब्द या वाक्य सुनते हैं, तो आप देख सकते हैं कि उनका पूरा प्राण उनकी आँखों से झाँक रहा है। वह स्थिति कितनी भिन्न है, जहाँ कलीसिया यह अनुभव करती है कि पादरी प्रार्थना कर रहा है, और इसलिए उनके प्रार्थना करने की कोई आवश्यकता नहीं! वे भूल में हैं। कलीसिया को आशीष की अभिलाषा करनी और उसके लिए प्रार्थना करनी ही चाहिए। परमेश्वर कहता है कि इस्राएल के घराने को उससे बिनती करनी होगी। मैं चाहता हूँ कि आप अनुभव करें कि इसका कोई विकल्प नहीं हो सकता।
मैंने जागृतियों में ऐसे उदाहरण देखे हैं, जहाँ प्रार्थना के विषय में कलीसिया को पीछे रखा गया, और सब सभाओं में बाहर से आए लोगों को प्रार्थना करने के लिए बुलाया गया। यह सदा दुर्भाग्यपूर्ण होता है, चाहे जागृति हो भी जाए, क्योंकि तब जागृति कलीसिया पर अपने प्रभाव में कम सामर्थी और कम हितकारी होगी। सम्भव है कि मैंने कभी-कभी बाहर से आए मसीहियों और पादरियों को इस कारण ठेस पहुँचाई हो कि मैं उस स्थान की कलीसिया के सदस्यों को ही प्रार्थना के लिए बुलाता रहा, न कि बाहर से आए लोगों को। यह उनके प्रति किसी अनादर के कारण नहीं था, वरन् इसलिए कि उद्देश्य यह था कि जिस कलीसिया का सबसे अधिक सरोकार था, उसी से आशीष की अभिलाषा, और प्रार्थना, और उसके लिए वेदना में जूझना करवाया जाए।
एक स्थान में लगातार चलनेवाली सभाएँ आयोजित की गईं, जिनका कोई अच्छा परिणाम नहीं निकला, और बड़ी बुराइयाँ उत्पन्न हुईं। मुझे इसका कारण पूछने की प्रेरणा हुई। और यह बात सामने आई कि उनकी सब सभाओं में उनकी अपनी कलीसिया के एक भी सदस्य को प्रार्थना के लिए नहीं बुलाया गया, वरन् सारी प्रार्थनाएँ बाहर से आए लोगों ने कीं। कोई आश्चर्य नहीं कि कोई भलाई नहीं हुई। कलीसिया की उसमें कोई रुचि नहीं थी। सभा के अगुवे का इरादा अच्छा था, परन्तु उसने वहाँ की कलीसिया को काम में लगाए बिना जागृति बढ़ाने का बीड़ा उठाया। उसने एक आलसी कलीसिया को चुपचाप पड़े रहने और कुछ न करने दिया, और इसलिए कोई भलाई नहीं हो सकती थी।
कलीसियाओं को पादरियों के लिए इस रूप में प्रार्थना करनी चाहिए कि वे सत्य के वचन के द्वारा पापियों को तोड़ने के साधन हैं। पादरी के लिए प्रार्थना अक्सर एक बंधे-बंधाए और औपचारिक ढंग से की जाती है, और प्रार्थना-सभाओं तक ही सीमित रहती है। वे अपनी प्रार्थनाएँ उसी पुराने ढंग से बोल देंगे, जैसे सदा से बोलते आए हैं: “हे प्रभु, अपने सेवा करनेवाले दास को आशीष दे, जिसे तू ने सिय्योन की शहरपनाह के इस भाग पर नियुक्त किया है,” इत्यादि, और उसका कोई फल नहीं होता, क्योंकि उसमें मन नहीं होता। और इसका प्रमाण अक्सर यह होता है कि उन्होंने कभी एकान्त में उसके लिए प्रार्थना करने की बात सोची तक नहीं, उन्होंने कभी अपनी कोठरियों में उसके परिश्रम पर आशीष के लिए तड़पकर प्रार्थना नहीं की। हो सकता है कि वे अपनी सभाओं में इसे पूरी तरह न छोड़ें। यदि वे ऐसा करें, तो स्पष्ट है कि उन्हें अपने पादरी के परिश्रम की सचमुच बहुत ही कम चिन्ता है। परन्तु सबसे महत्त्वपूर्ण स्थान वह नहीं है। अपने पादरी के लिए प्रभावशाली प्रार्थना करने का तरीका यह है कि आप उसे अपनी कोठरी में ले जाएँ, और जब आप एकान्त में हों, तो परमेश्वर से मल्लयुद्ध करें कि उसके परिश्रम में सफलता मिले। मैं एक ऐसे पादरी को जानता था जिसका स्वास्थ्य खराब था, जो निराश हो गया और मन में बहुत दब गया, और बहुत अन्धकार में था, यहाँ तक कि उसे ऐसा लगता था मानो वह अब और प्रचार नहीं कर सकेगा। कलीसिया का एक व्यक्ति जाग उठा कि पादरी की दशा के लिए व्याकुल हो, और प्रार्थना करे कि उसके प्रचार के साथ पवित्र आत्मा हो। एक सब्त की सुबह इस व्यक्ति का मन बहुत व्याकुल था, और उजाला होते ही उसने प्रार्थना करनी आरम्भ की, और उस दिन आशीष के लिए बार-बार प्रार्थना की। और प्रभु ने किसी प्रकार पादरी को ऐसी जगह पहुँचा दिया जहाँ से वह उसकी प्रार्थना सुन सके। वह व्यक्ति प्रभु को ठीक-ठीक बता रहा था कि पादरी की परिस्थिति और मन की दशा के विषय में वह क्या सोचता है, और ऐसे गिड़गिड़ा रहा था मानो वह इनकार सुनने को तैयार ही न हो, कि आशीष मिले। पादरी पुलपिट पर गया और प्रचार किया, और उस पर ज्योति चमक उठी, और वचन सामर्थ के साथ था, और उसी दिन एक जागृति आरम्भ हो गई।
6. पादरी का प्रबन्ध कलीसिया को करना चाहिए, और भक्तिहीनों पर निर्भर हुए बिना उसके भरण-पोषण की गारंटी होनी चाहिए। नहीं तो उसे या तो अपने परिवार को भूखा मारना पड़ेगा, या सत्य का एक भाग रोक रखना पड़ेगा ताकि पापी नाराज़ न हों। मैंने एक बार एक पादरी को समझाया-बुझाया, जिसके विषय में मैंने पाया कि वह पूरी तरह खुलकर सत्य कहने से डरता था। मैंने उससे कहा कि मुझे आश्चर्य है कि वह कुछ बातों पर ज़ोर देकर प्रहार क्यों नहीं करता। उसने मुझसे कहा कि उसकी स्थिति ऐसी है कि उसे कुछ ऐसे लोगों को प्रसन्न रखना पड़ता है, जिन्हें उन बातों से चोट पहुँचेगी। मुख्य रूप से भक्तिहीन लोग ही उसका भरण-पोषण करते थे, और इसी बात ने उसे पराधीन और समय के अनुसार ढलनेवाला बना दिया था। और फिर भी शायद वही कलीसिया, जिसने अपने पादरी को अपनी रोटी के लिए भक्तिहीनों पर निर्भर छोड़ दिया, पलटकर उसके विश्वास की कमी और मनुष्यों के भय के लिए उसे बुरा-भला कहेगी। कलीसिया को सदा अपने पादरी से यह कहना चाहिए, “हम आपका भरण-पोषण करेंगे; काम में लग जाइए; सत्य को लोगों पर बरसने दीजिए, और हम आपके साथ खड़े रहेंगे।”
7. ध्यान रखें कि हर बात ऐसी व्यवस्थित हो कि लोग सभा में आराम से बैठ सकें। यदि लोग चैन से न बैठे हों, तो उनका ध्यान पाना या बनाए रखना कठिन होता है। और यदि वे ध्यान न दें, तो उनका मन-परिवर्तन नहीं हो सकता। वे अपने प्राणों के लिए सुनने आए हैं, और उनकी स्थिति ऐसी होनी चाहिए कि वे अपने सारे प्राण से सुन सकें, और उनकी शारीरिक दशा में ऐसा कुछ न हो जो उनका ध्यान खींचे। कलीसियाएँ यह नहीं समझतीं कि सभा-स्थान को आरामदेह बनाना कितना महत्त्वपूर्ण है। मेरा अर्थ दिखावटी बनाना नहीं है। कीमती झाड़-फानूसों, कीमती कालीनों और शानदार पुलपिटों की आपकी सारी चकाचौंध और शान-शौकत दूसरी अति है, और ध्यान को ठीक उतना ही बुरी तरह भटका देती है, और उस हर उद्देश्य को विफल कर देती है जिसके लिए किसी पापी को सभा में आना चाहिए। आप वहाँ जागृति की आशा न रखें।
8. ध्यान रखें कि परमेश्वर का भवन साफ़-सुथरा रखा जाए। परमेश्वर का भवन उतना ही साफ़ रखा जाना चाहिए जितना आप अपना घर रखा जाना चाहेंगे। गिरजाघर अक्सर बहुत ही गंदे रखे जाते हैं। मैंने ऐसे गिरजाघर देखे हैं जहाँ लोग इतना तम्बाकू इस्तेमाल करते थे, और सफ़ाई की इतनी कम परवाह करते थे, कि वहाँ चैन से प्रचार करना असम्भव था। एक बार लगातार चलनेवाली सभाओं के दौरान यह बात कलीसिया पर आरोपित की गई, और उन्हें मानना पड़ा कि वे मिशन के कार्य के लिए जितना पैसा देते थे उससे अधिक तम्बाकू पर खर्च करते थे। वे अपनी बेंचों में घुटने नहीं टेक सकते थे, और स्त्रियाँ बिना लगातार अपने कपड़ों पर नज़र रखे बैठ नहीं सकती थीं, और उन्हें सँभलकर पाँव रखना पड़ता था, क्योंकि भवन इतना गंदा था, और फ़र्श पर चारों ओर तम्बाकू का इतना रस बहता रहता था। यदि लोग ऐसी जगह नहीं जा सकते जहाँ वे घिनौने दृश्यों और दुर्गन्धों से परेशान हुए बिना सुन सकें, और जहाँ वे प्रार्थना में घुटने टेक सकें, तो लगातार चलनेवाली सभाओं से क्या भला होगा? इन बातों का ऐसा महत्त्व है जिसे समझा नहीं जाता। उस मनुष्य को देखिए! वह क्या कर रहा है? मैं उसे अनन्त जीवन के विषय में प्रचार कर रहा हूँ, और वह गंदी बेंच के बारे में सोच रहा है। और वह स्त्री पाँव रखने की चौकी माँग रही है ताकि अपने पाँव तम्बाकू के रस से बचा सके। लज्जा की बात है!
9. यह महत्त्वपूर्ण है कि भवन ठीक उतना ही गर्म हो जितना चाहिए, और बहुत अधिक गर्म न हो। मान लीजिए कि एक पादरी भवन में आता है और उसे ठंडा पाता है; भीतर पहुँचते ही वह देख लेता है कि इससे तो वह घर पर ही रह जाता तो अच्छा था; लोग ठिठुर रहे हैं, उनके पाँव ठंडे हैं, उन्हें लगता है कि उन्हें सर्दी लग जाएगी, वे बेचैन हैं, और वह चाहता है कि काश वह घर पर होता, क्योंकि वह जानता है कि वह कुछ नहीं कर सकता, परन्तु उसे प्रचार करना ही होगा, नहीं तो लोग निराश होंगे।
या वह भवन को बहुत अधिक गर्म पा सकता है, और लोग सत्य सुनने के बजाय पंखा झल रहे हैं, और साँस के लिए हाँफ रहे हैं, और कुछ देर बाद कोई स्त्री मूर्छित हो जाती है, और हलचल मच जाती है, और विचार और भावना का पूरा क्रम खो जाता है, और इस प्रकार पूरा उपदेश बिना किसी अच्छे परिणाम के व्यर्थ चला जाता है। ये छोटी-छोटी बातें लोगों का ध्यान अनन्त जीवन के वचनों से हटा देती हैं। और बहुधा ऐसा होता है कि यदि आप तर्क की शृंखला की एक भी कड़ी छोड़ दें, तो आप पूरी शृंखला खो देते हैं, और लोग दण्ड की आज्ञा पाते हैं, केवल इसलिए कि लापरवाह कलीसिया इन छोटी-छोटी बातों की उचित व्यवस्था पर ध्यान नहीं देती।
10. भवन में हवा का अच्छा आना-जाना होना चाहिए। सब भवनों में से गिरजाघर में हवा के आने-जाने का प्रबन्ध सबसे अधिक पूर्ण होना चाहिए। यदि हवा बदली न जाए, तो वह इतने सारे फेफड़ों से होकर गुज़रती है कि दूषित हो जाती है, और उसकी जीवनदायिनी शक्ति समाप्त हो जाती है, और लोग हाँफने लगते हैं, न जाने क्यों, और उन्हें सोने की लगभग अदम्य इच्छा होती है, और पादरी व्यर्थ प्रचार करता है। उपदेश खो जाता है, और खोने से भी बुरा होता है। मुझे अक्सर आश्चर्य हुआ है कि इस बात पर इतना कम विचार क्यों किया जाता है। प्राचीन और ट्रस्टी बैठकर पूरा उपदेश सुनेंगे, जबकि लोग हवा के अभाव में मानो मरने को हों, और पादरी ऐसी जगह प्रचार करने में अपनी शक्ति व्यर्थ गँवा रहा हो जो ठीक उस वायु-पंप के पात्र के समान है जिसकी हवा निकाल ली गई हो, और वे वहीं बैठे रहते हैं और इस स्थिति को सुधारने के लिए कुछ करने की बात सोचते तक नहीं। उन्हें स्वयं यह ज़िम्मेदारी लेनी चाहिए कि इसकी ठीक व्यवस्था हो, कि भवन ठीक उतना गर्म हो जितना चाहिए, और हवा शुद्ध रखी जाए। यह कितना महत्त्वपूर्ण है कि कलीसिया इस विषय में सजग हो, ताकि पादरी सबसे अच्छे ढंग से परिश्रम कर सके, और लोग उस सत्य पर अपना पूरा ध्यान दें जो उनके प्राणों का उद्धार करनेवाला है।
जब बातें गड़बड़ होती हैं, तो सारा दोष सेक्सटन (गिरजाघर के रखवाले) पर डाल देना बहुत आम बात है। ऐसा नहीं है। अक्सर रखवाला दोषी नहीं होता। यदि भवन ठंडा और असुविधाजनक है, तो बहुधा इसका कारण यह होता है कि ईंधन अच्छा नहीं है, या अँगीठियाँ उपयुक्त नहीं हैं, या भवन इतना खुला है कि उसे गर्म नहीं किया जा सकता। यदि वह बहुत गर्म है, तो शायद उसके बाहर रहते किसी ने दखल दिया और बिना विवेक के ईंधन का ढेर लगा दिया। या यदि रखवाला दोषी है, तो शायद इसलिए कि कलीसिया उसकी सेवाओं के लिए उसे पर्याप्त वेतन नहीं देती, और वह गिरजाघर को व्यवस्थित रखने के लिए आवश्यक ध्यान देने की स्थिति में नहीं है। कलीसियाएँ कभी-कभी रखवाले का वेतन घटाकर सबसे निचले स्तर तक ले आती हैं, जिससे उसे अपना काम आधे-अधूरे मन से करना पड़ता है। या वे सस्ते में पाने के लिए किसी अयोग्य व्यक्ति को चुन लेंगी, और फिर काम होता ही नहीं। दोष कलीसिया का है। वे काम के लिए उचित पारिश्रमिक दें, तो काम हो सकता है, और ईमानदारी से हो सकता है। यदि एक रखवाला ठीक से काम नहीं करेगा, तो दूसरा करेगा, और कलीसिया इस बात के लिए बाध्य है कि यह ठीक से हो, नहीं तो वे अपने पादरी को विदा कर दें, और उसे न रखें, बजाय इसके कि साथ ही बाकी बातें इतनी अव्यवस्थित रखें कि उसका सारा परिश्रम खो जाए। क्या ही किफ़ायत है! पादरी को वेतन दें, और फिर रखवाले की मज़दूरी में पचास डॉलर न जोड़ने के कारण हर बात इतनी अव्यवस्थित हो कि पादरी का सारा परिश्रम खो जाए, प्राण नाश हों, और आपके बच्चे और पड़ोसी नरक में जा पड़ें!
कभी-कभी इस गंदगी, लापरवाही और अव्यवस्था का दोष पादरी पर होता है। शायद वह तम्बाकू का सेवन करता है, और परमेश्वर के भवन को अशुद्ध करने का उदाहरण देता है। शायद पुलपिट ही भवन की सबसे गंदी जगह हो। मैं कभी-कभी ऐसे पुलपिटों में गया हूँ जो इतने घिनौने थे कि मनुष्यों के बैठने योग्य नहीं थे। यदि किसी पादरी में इससे अधिक भक्ति और शालीनता नहीं है, तो कोई आश्चर्य नहीं कि मंडली में सब कुछ अस्त-व्यस्त हो। और सामान्यतः ऐसा ही होता है।
11. लोगों को अपने कुत्ते, और बहुत छोटे बच्चे घर पर छोड़ आने चाहिए। मैंने अक्सर देखा है कि आराधना के ठीक उसी मोड़ पर कुत्तों में झगड़ा हो जाता है, और बच्चे रोने लगते हैं, जब इससे सभा का प्रभाव सबसे अधिक नष्ट होता है। यदि बच्चे उपस्थित हों और रोएँ, तो उन्हें तुरन्त बाहर ले जाना चाहिए। मैंने कभी-कभी देखा है कि कोई माँ या आया बैठी अपने बच्चे को उछालती-झुलाती रहती है, जबकि उसका रोना सारी मंडली का ध्यान भटका रहा होता है। यह क्रूरता है। और रहे कुत्ते, तो परमेश्वर के वचन से ध्यान भटकाने से कहीं अच्छा होता कि वे मर जाते। उस डीकन को देखिए; शायद उसके कुत्ते ने इस प्रकार उससे कहीं अधिक प्राणों का नाश किया है जितनों के उद्धार का साधन वह डीकन कभी बनेगा।
12. कलीसिया के सदस्यों को घर-घर जाकर मिलने, और प्राणों को बचाने का प्रयत्न करने के द्वारा पादरी की सहायता करनी चाहिए। यह सब पादरी पर न छोड़ें। उसके लिए यह करना असम्भव है, चाहे वह अपना सारा समय दे दे, और अपने अध्ययन और अपनी प्रार्थना की कोठरी की उपेक्षा कर दे। कलीसिया के सदस्यों को परिश्रम करके इस कर्तव्य के लिए अपने आप को योग्य बनाना चाहिए, ताकि वे इसमें उपयोगी हो सकें।
13. उन्हें बाइबल कक्षाएँ चलानी चाहिए। युवाओं की शिक्षा के लिए बाइबल कक्षाएँ चलाने हेतु उपयुक्त व्यक्तियों को चुना जाना चाहिए, और ऐसी कक्षाएँ जहाँ वे लोग, जो प्रचार के द्वारा जागृत या प्रभावित हुए हैं, ग्रहण किए जा सकें और उनका मन-परिवर्तन हो सके। जैसे ही कोई प्रभावित होता दिखाई दे, उसे बाइबल कक्षा में सम्मिलित होने का निमंत्रण दिया जाए, जहाँ उसके साथ उचित व्यवहार होगा, और सम्भवतः उसका मन-परिवर्तन हो जाएगा। कलीसिया को इस सेवा के लिए सबसे अच्छे लोगों को चुनना चाहिए, और सबको बाइबल कक्षाओं को भरने के लिए चौकस रहना चाहिए। इस मंडली में ऐसा किया गया है, और यह बहुत आम बात है कि जब लोगों के मन पर प्रभाव पड़ता है, तो कोई उन्हें देख लेता है, और उन्हें बाइबल कक्षा में सम्मिलित होने का निमंत्रण देता है, और वे सम्मिलित हो जाते हैं, और वहाँ उनका मन-परिवर्तन होता है। मेरा यह अर्थ नहीं है कि इस रूप में जो कुछ हमें करना चाहिए, या जो कुछ हम कर सकते हैं, वह सब हम कर रहे हैं। हमें और शिक्षकों की आवश्यकता है, जो ऐसी कक्षाओं का भार उठाने में समर्थ और इच्छुक हों।
14. कलीसियाओं को सब्त-स्कूल चलाने चाहिए, और इस प्रकार प्राणों को बचाने में अपने पादरियों की सहायता करनी चाहिए। पादरी इस पर ध्यान दे और प्रचार भी करे, यह कैसे हो सकता है? जब तक कलीसिया इन ज़िम्मेदारियों, चिन्ताओं और परिश्रमों को उसके ऊपर से न उठा ले, उसे या तो इनकी उपेक्षा करनी पड़ेगी, या वह कुचल जाएगा। कलीसिया पूरी तरह जागी रहे, चौकस रहकर बच्चों को स्कूल में लाए, और उन्हें ईमानदारी से सिखाए, और स्कूल में जागृति लाने के लिए अपने आप को लगा दे।
15. उन्हें कलीसिया के सदस्यों की देखभाल करनी चाहिए। उन्हें एक दूसरे से मिलने जाना चाहिए, ताकि वे एक दूसरे को उभारें, एक दूसरे की आत्मिक दशा जानें, और प्रेम और भले कामों में उस्काने के लिए एक दूसरे की चिन्ता करें। पादरी यह नहीं कर सकता, उसके पास समय नहीं है; यह असम्भव है कि वह अध्ययन करे और उपदेश तैयार करे, और साथ ही कलीसिया के हर सदस्य से उतनी बार मिलने जाए जितनी बार उन्हें आगे बढ़ाते रहने के लिए आवश्यक है। कलीसिया यह करने के लिए बाध्य है। उन्होंने एक दूसरे के आत्मिक कल्याण की देखभाल करने की शपथ ली है। परन्तु यह किस प्रकार किया जाता है? बहुत से लोग एक दूसरे को जानते तक नहीं। वे अजनबियों की तरह मिलते और एक दूसरे के पास से निकल जाते हैं, और कभी उनकी आत्मिक दशा के विषय में नहीं पूछते। परन्तु यदि वे किसी के बारे में कोई बुरी बात सुनते हैं, तो जाकर दूसरों को बता देते हैं। एक दूसरे की भलाई के लिए उसकी देखभाल करने के बजाय, वे उसके ठोकर खाने की ताक में रहते हैं। जब वे एक दूसरे से परिचित तक नहीं, तो वे भलाई के लिए चौकसी कैसे कर सकते हैं?
16. कलीसिया को प्रचार के प्रभाव पर दृष्टि रखनी चाहिए। यदि वे प्रचार किए गए वचन की सफलता के लिए प्रार्थना कर रहे हैं, तो निश्चय ही वे उसकी बाट जोहेंगे। उन्हें चौकस रहना चाहिए, और जब मंडली में कोई इस बात का प्रमाण दे कि परमेश्वर के वचन ने उसे पकड़ लिया है, तो उन्हें उसके पीछे लगे रहना चाहिए। जहाँ कहीं भावना का कोई प्रदर्शन हो, उन लोगों पर तुरन्त ध्यान दिया जाना चाहिए, और उन्हें तब तक के लिए छोड़ नहीं देना चाहिए जब तक उनके मन की छाप मिट न जाए। उन्हें उनसे बात करनी चाहिए, या किसी को उनसे मिलने भेजना चाहिए, या उन्हें चिन्तित खोजियों की सभा में, या बाइबल कक्षा में ले आना चाहिए, या उन्हें पादरी के पास लाना चाहिए। यदि कलीसिया के सदस्य इस पर ध्यान नहीं देते, तो वे अपने कर्तव्य की उपेक्षा करते हैं। यदि वे इस पर ध्यान दें, तो वे अपार भलाई कर सकते हैं।
एक भक्त युवती थी, जो एक बहुत ही ठंडे और दुष्ट स्थान में रहती थी। केवल उसी में प्रार्थना की आत्मा थी, और वह वचन पर आशीष के लिए प्रार्थना करती रही थी। अन्त में उसने मंडली में एक व्यक्ति को देखा जो प्रचार से प्रभावित होता जान पड़ता था, और जैसे ही पादरी पुलपिट से उतरा, वह आगे आई, व्याकुल और काँपती हुई, और उससे विनती की कि वह जाकर उस व्यक्ति से तुरन्त बातचीत करे। उसने ऐसा ही किया, और वह व्यक्ति शीघ्र ही मन-परिवर्तित हो गया, और उसके बाद एक जागृति आई। अब आपके सुस्त और जड़ धर्म का अंगीकार करनेवालों में से कोई उस व्यक्ति को जागृत होते न देखता, और ऐसे आधे दर्जन लोगों से बिना ध्यान दिए ठोकर खाकर निकल जाता, और उन्हें नरक में जाने देता। धर्म का अंगीकार करनेवालों को हर उपदेश पर दृष्टि रखनी चाहिए, और देखना चाहिए कि वह मंडली पर कैसा प्रभाव डालता है। मेरा यह अर्थ नहीं कि वे गर्दन उचका-उचकाकर भवन में इधर-उधर ताकते रहें, परन्तु जैसे बन पड़े वैसे उन्हें देखते रहना चाहिए, और यदि उन्हें कोई व्यक्ति प्रचार से प्रभावित दिखे, तो उसके मार्ग में जाकर उससे मिलें, और उसे उद्धारकर्ता तक पहुँचाएँ।
17. सावधान रहें कि सारा प्रचार दूसरों को न दे डालें। यदि आप अपना भाग नहीं लेंगे, तो आप भूखे मरेंगे, और आत्मिक कंकालों के समान हो जाएँगे। मसीहियों को अपना भाग अपने लिए लेना चाहिए। यदि वचन उन्हें बहुत गहराई से जाँचनेवाला हो, तो उन्हें ईमानदारी से उसे अपने ऊपर लागू करना चाहिए, और उसे अपने हृदय के साथ रखकर मिलाना चाहिए और उस पर चलना चाहिए, और उसके अनुसार जीना चाहिए। नहीं तो प्रचार से उनका कोई भला नहीं होगा।
18. भलाई करने की अपने पादरी की योजनाओं को पूरा करने में उसकी सहायता करने के लिए तैयार रहें। जब पादरी उपयोगिता की योजनाएँ बनाने में बुद्धिमान हो, और कलीसिया उन्हें पूरा करने को तैयार हो, तो वे सब कुछ जीत सकते हैं। परन्तु जब कलीसिया हर उद्यम से तब तक पीछे हटी रहती है जब तक उसे सचमुच घसीटकर उसमें न लाया जाए, जब वे हर प्रस्ताव का विरोध करते हैं क्योंकि उसमें कुछ खर्च होगा, तो वे पादरी पर एक मुर्दा बोझ होते हैं। यदि अँगीठियों की आवश्यकता हो, तो, अरे नहीं, उनमें कुछ खर्च होगा। यदि अन्धेरे में प्रचार करने से बचने के लिए लैम्पों की माँग की जाए, तो, अरे नहीं, उनमें कुछ खर्च होगा। और इस प्रकार वे खम्भों पर मोमबत्तियाँ खड़ी कर देंगे, या शाम की सभाओं के बिना ही काम चला लेंगे। यदि वे मोमबत्तियाँ खड़ी करते हैं, तो जल्दी ही यह होता है कि या तो वे कोई प्रकाश नहीं देतीं, या किसी को चारों ओर दौड़कर उनकी बत्ती कतरनी पड़ती है। और इस प्रकार सारी मंडली बत्ती कतरनेवाले से विचलित होती है, उनका ध्यान हट जाता है, और उपदेश खो जाता है।
मैं एक बार लगातार चलनेवाली सभाओं में था, जहाँ हम इस कारण परेशानी में पड़े कि भवन में लैम्प नहीं थे। मैंने लोगों से आग्रह किया कि वे लैम्प ले आएँ, परन्तु उन्होंने सोचा कि इसमें बहुत खर्च होगा। तब मैंने प्रस्ताव रखा कि मैं स्वयं ले आऊँगा, और ऐसा करने ही वाला था, परन्तु मैंने पाया कि इससे उन्हें बुरा लगेगा, और हम उनके बिना ही चलते रहे। परन्तु आशीष किसी बड़ी मात्रा में नहीं आई। आती भी कैसे? कलीसिया ने आरम्भ ही इस हिसाब से किया कि इसमें एक-एक सेंट तक कितना खर्च होगा, और प्राणों को नरक से बचाने के लिए वे उससे आगे नहीं जाते थे।
इसी प्रकार जब पादरी कोई सभा ठहराता है, तो ऐसे लोग उसे होने नहीं दे सकते, क्योंकि उसमें कुछ खर्च होगा। यदि वे प्रभु को वह चढ़ा सकें जिसमें उनका कुछ न लगे, तो वे चढ़ा देंगे। कैसे दयनीय सहायक हैं वे! ऐसी कलीसिया में कोई जागृति नहीं हो सकती। ऐसी कलीसिया होने से तो अच्छा होता कि पादरी के गले में चक्की का पाट लटका हो। यदि वह उन्हें इससे अच्छा न सिखा सके, तो अच्छा होगा कि वह उन्हें छोड़ दे, और ऐसी जगह जाए जहाँ उसके हाथ-पाँव इतने बंधे न हों।
19. कलीसिया के सदस्यों को प्रार्थना-सभाओं में उपस्थित होने, और समय पर उपस्थित होने को अपना नियम बना लेना चाहिए। कलीसिया के कुछ सदस्य प्रचार में तो सदा उपस्थित रहेंगे, क्योंकि वहाँ उन्हें बैठकर सुनने और मनोरंजन पाने के सिवा कुछ नहीं करना होता, परन्तु वे प्रार्थना-सभाओं में उपस्थित नहीं होंगे, इस डर से कि उनसे कुछ करने को कहा जाएगा। ऐसे सदस्य पादरी के हाथ बाँध देते हैं, और उसका हृदय तोड़ देते हैं। वे पादरी को नियुक्त क्यों करते हैं? क्या इसलिए कि वह प्रचार करके उनका मन बहलाए? या इसलिए कि वह उन्हें परमेश्वर की इच्छा सिखाए ताकि वे उसे पूरी करें?
20. कलीसिया के सदस्यों को यह अध्ययन और खोज करनी चाहिए कि वे क्या कर सकते हैं, और फिर उसे करना चाहिए। मसीहियों को सैनिकों की टुकड़ी के समान प्रशिक्षित किया जाना चाहिए। पादरी का कर्तव्य और पद यही है कि वह उन्हें उपयोगी होने के लिए प्रशिक्षित करे, उन्हें सिखाए और निर्देश दे, और उन्हें ऐसे ढंग से आगे ले चले कि अधिक से अधिक नैतिक प्रभाव उत्पन्न हो। और फिर उन्हें अपने स्थान पर डटे रहना चाहिए और अपना कर्तव्य करना चाहिए, नहीं तो वे ठीक रास्ते में बाधा बनकर खड़े होंगे।
और भी बहुत सी बातें हैं जिन्हें मैंने लिख रखा था, और जिन्हें छूने का मेरा विचार था, परन्तु समय नहीं है। जिन विभिन्न बातों पर ध्यान दिया जाना चाहिए, उनका विस्तार से वर्णन करने में मैं इस बाइबल जितनी बड़ी पुस्तक लिख सकता हूँ। मुझे कुछ टिप्पणियों के साथ समाप्त करना होगा:
टिप्पणियाँ।
1. आप देखते हैं कि पादरी की सफलता की कमी पूरी तरह इस कारण नहीं हो सकती कि अपने पद के निर्वाह में उसमें बुद्धि की कमी है। मैं लापरवाह पादरियों की वकालत करने नहीं जा रहा। मैं पादरियों को नग्न सत्य से कभी नहीं बचाऊँगा, और न मनुष्यों को चापलूसी की उपाधियाँ दूँगा। यदि वे दोषी हैं, तो उन्हें दोष दिया जाए। और निस्सन्देह जब वचन कोई प्रभाव उत्पन्न नहीं करता, तो वे सदा कुछ न कुछ दोषी होते ही हैं। परन्तु यह सच होने से बहुत दूर है कि सदा वे ही मुख्य दोषी होते हैं। कभी-कभी कलीसिया पादरी से कहीं अधिक दोषी होती है, और यदि कोई प्रेरित या स्वर्ग से कोई स्वर्गदूत भी प्रचार करे, तो वह उस कलीसिया में धर्म की जागृति उत्पन्न नहीं कर सकेगा। शायद वे अपने पादरी के प्रति बेईमान हैं, या लोभी हैं, या सार्वजनिक आराधना की सुविधाओं के प्रति लापरवाह हैं। हाय! बहुत सी देहाती कलीसियाएँ कैसी दशा में हैं, जहाँ सौ डॉलर की कमी के कारण हर बात असुविधाजनक और कष्टदायक है, और प्रचारक का परिश्रम खो जाता है। वे आप तो छतवाले घरों में रहते हैं, और परमेश्वर के भवन को उजाड़ पड़ा रहने देते हैं। या कलीसिया अपने भक्तिहीन जीवन के द्वारा प्रचार के सारे प्रभाव को निष्फल कर देती है। या शायद उनकी दावतें, उनका सांसारिक दिखावा, जैसा इस नगर की अधिकांश कलीसियाओं में है, सुसमाचार के प्रभाव को मिटा डालते हैं।
2. कलीसियाओं को स्मरण रखना चाहिए कि पादरी को नियुक्त करके फिर उसके काम में उसकी सहायता न करना उनका अत्यन्त बड़ा दोष है। प्रभु यीशु मसीह ने पापियों के पास एक राजदूत भेजा है, कि वह उन्हें उनके बुरे मार्गों से फेरे, और वह अपने उद्देश्य में विफल होता है, क्योंकि कलीसिया अपना कर्तव्य करने से इनकार करती है। उसके सन्देश की सिफ़ारिश करने, और उसकी विनतियों का समर्थन करने, और हर उचित रीति से उसके हाथों को सँभाले रखने के बजाय, वे ठीक उसके मार्ग में खड़े हो जाते हैं, और उसके सन्देश को झुठलाते हैं, और उसके प्रभाव को निष्फल करते हैं, और प्राण नाश होते हैं। निस्सन्देह संयुक्त राज्य अमेरिका की अधिकांश मंडलियों में पादरी को अक्सर इतनी बाधा पहुँचाई जाती है कि पापियों के मन-परिवर्तन में उसके प्रचार के किसी प्रभाव के विचार से, वह अधिकांश समय वहाँ रहने के बजाय किसी विदेशी मिशन पर होता तो भी कोई अन्तर न पड़ता, जबकि उसे एक निष्क्रिय, जड़ कलीसिया के सिरों के ऊपर से प्रचार करना पड़ता है।
और फिर भी यही कलीसियाएँ इस बात के लिए राज़ी नहीं होतीं कि उनका पादरी कुछ दिनों के लिए लगातार चलनेवाली सभाओं में भाग लेने बाहर जाए। “हम उसे नहीं छोड़ सकते; अरे, वह हमारा पादरी है, और हमें अच्छा लगता है कि हमारा पादरी यहीं रहे;” जबकि उसी समय वे उसके हर प्रयत्न में बाधा डालते हैं। यदि उसका बस चलता, तो वह अपने आप को तुरन्त छुड़ाकर ऐसी जगह चला जाता जहाँ कोई पादरी नहीं है, और जहाँ लोग सुसमाचार ग्रहण करने को तैयार होंगे। परन्तु उसे वहीं रहना पड़ता है, यद्यपि वह कलीसिया को ऐसी दशा में नहीं ला पाता कि तीन वर्ष में एक बार भी ऐसी जागृति हो जो तीन महीने तक चले। उसके लिए अच्छा हो सकता है कि वह कलीसिया से कहे, “जब कभी आप इनमें से किसी लम्बी झपकी लेने का निश्चय कर लें, तो मैं चाहता हूँ कि आप मुझे बता दें, ताकि इस बीच मैं कहीं और जाकर परिश्रम कर सकूँ, जब तक आप फिर से जागने के लिए तैयार न हो जाएँ।”
3. बहुत सी कलीसियाओं को जागृति की आशीष नहीं मिल सकती, क्योंकि वे अपने पादरी के भरण-पोषण के लिए दूसरी कलीसियाओं से और प्रभु के भण्डार से मुफ़्त में ऐंठती रहती हैं, जबकि वे स्वयं उसका भरण-पोषण करने में भरपूर समर्थ हैं। शायद वे होम मिशनरी सोसाइटी पर, या दूसरी कलीसियाओं पर निर्भर हैं, जबकि वे सुसमाचार के लिए किसी प्रकार का आत्म-त्याग नहीं कर रहीं। मुझे यह देखकर आश्चर्य हुआ है कि कुछ कलीसियाएँ कैसे जीती हैं। एक कलीसिया ने, जिससे मैं परिचित था, सचमुच यह स्वीकार किया कि वे मिशनों के लिए जितना देते थे उससे अधिक पैसा तम्बाकू पर खर्च करते थे। और फिर भी उनके पास कोई पादरी नहीं था, क्योंकि वे किसी का भरण-पोषण करने में असमर्थ थे। और आज भी उनके पास कोई नहीं है। और फिर भी उस कलीसिया में एक व्यक्ति ऐसा है जो अकेले एक पादरी का भरण-पोषण कर सकता है। और फिर भी उनके पास न कोई पादरी है, न कोई प्रचार।
कलीसियाओं को इस विषय में उनके कर्तव्य की शिक्षा नहीं दी गई है। पिछली गर्मियों में मैं एक ऐसे स्थान पर रुका जहाँ कोई प्रचार नहीं होता था। मैंने कलीसिया के एक प्राचीन से पूछा कि ऐसा क्यों है, और उसने कहा कि इसका कारण यह है कि वे बहुत गरीब हैं। मैंने उससे पूछा कि उसकी हैसियत कितनी है। उसने मुझे सीधा उत्तर नहीं दिया, परन्तु कहा कि एक दूसरे प्राचीन की आय लगभग $5,000 प्रति वर्ष है, और अन्त में मुझे पता चला कि इस व्यक्ति की आय भी लगभग उतनी ही है। मैंने कहा, यहाँ दो प्राचीन हैं, आप में से हर एक पादरी का भरण-पोषण करने में समर्थ है, और क्योंकि आपको बाहर से सहायता नहीं मिल पाती, इसलिए आपके यहाँ कोई प्रचार नहीं होता। अरे, यदि आपके यहाँ प्रचार होता भी, तो उस पर आशीष न होती, जब तक आप इस प्रकार प्रभु के भण्डार से मुफ़्त में ऐंठ रहे हैं। अन्त में उसने स्वीकार किया कि वह एक पादरी का भरण-पोषण करने में समर्थ है, और दोनों ने मिलकर यह ठहराया कि वे ऐसा करेंगे।
कलीसियाओं का सहायता माँगना आम बात है, जबकि वास्तव में उन्हें किसी सहायता की आवश्यकता नहीं होती, और जबकि उनके लिए कहीं अधिक अच्छा होता कि वे अपने पादरी का भरण-पोषण स्वयं करें। यदि वे होम मिशनरी सोसाइटी से धन लेती हैं, जबकि उन्हें वह स्वयं जुटाना चाहिए, तो वे अपने ऊपर प्रभु के शाप की आशा रखें, और यह इस बात का पर्याप्त कारण होगा कि सुसमाचार उनके लिए आशीष के बजाय शाप ठहरे। कितनी ही कलीसियाओं के विषय में यह कहा जा सकता है, “तुम ने परमेश्वर को लूटा है, वरन सारी कलीसिया ने ऐसा किया है।”
मैं एक कलीसिया को जानता हूँ जिसने एक पादरी को केवल आधे समय के लिए नियुक्त किया था, और उसका भी वेतन देने में अपने आप को असमर्थ समझती थी। पास के एक नगर की स्त्रियों की एक कार्य-समिति ने अपना धन इस उद्देश्य के लिए दे दिया, और अपने पादरी का वेतन चुकाने में इस कलीसिया की सहायता की। परिणाम वही हुआ जिसकी आशा की जा सकती थी। उसने उनका बहुत थोड़ा या कुछ भी भला नहीं किया। उसके प्रचार के अधीन उनमें कोई जागृति नहीं हुई, और न वे कभी किसी जागृति की आशा कर सकते थे, जब तक वे ऐसे सिद्धान्त पर चलते रहें। उस मंडली में एक व्यक्ति ऐसा था जो पूरे समय के लिए एक पादरी का भरण-पोषण कर सकता था। एक सदस्य ने मुझे बताया कि कलीसिया के सदस्यों की सम्पत्ति दो लाख डॉलर मानी जाती थी। अब यदि यह सच है, तो यह एक ऐसी कलीसिया है जिसकी आय, सात प्रतिशत की दर से, $14,000 प्रति वर्ष है, जो अपने आप को इतना गरीब समझती थी कि आधे समय प्रचार करनेवाले पादरी के भरण-पोषण के लिए $200 भी न दे सके, और पास के नगर की स्त्रियों को यह सहने देती थी कि वे यह रकम चुकाने में उनकी सहायता के लिए अपने हाथों से परिश्रम करें। इस कलीसिया के प्राचीनों में मैंने पाया कि उनमें से कई तम्बाकू का सेवन करते थे, और उनमें से दो ने, जो साथ रहते थे, अपनी बाइबल के कोरे पन्ने पर लिखी एक वाचा पर हस्ताक्षर किए, जिसमें उन्होंने सदा के लिए उस पाप को छोड़ देने की प्रतिज्ञा की।
यह कलीसिया बहुत हद तक उचित शिक्षा के अभाव के कारण ही ऐसा मार्ग अपना रही थी। क्योंकि जब इस विषय को उठाया गया, और उनका कर्तव्य उनके सामने रखा गया, तो जिस धनी व्यक्ति की मैं बात कर रहा हूँ उसने कहा कि यदि उसे लगता कि मंडली इसका बुरा नहीं मानेगी, और इससे भलाई से अधिक हानि नहीं होगी, तो वह पूरा वेतन स्वयं चुका देता; और यह कि यदि कलीसिया एक पादरी ले आए, और आगे बढ़कर उसके वेतन का एक भाग जुटा ले, तो बाकी वह पूरा कर देगा। अब वे न केवल आधे समय के लिए, बल्कि पूरे समय के लिए पादरी का भरण-पोषण कर सकते हैं, और उसका वेतन स्वयं चुका सकते हैं। और वे पाएँगे कि ऐसा करना अच्छा और लाभदायक है।
जागृतियों में परिश्रम करते हुए जब मैं एक स्थान से दूसरे स्थान पर गया हूँ, तो मैंने सदा यही पाया है कि कलीसियाओं को उनकी उदारता के अनुपात में आशीष मिली। जहाँ उन्होंने सुसमाचार के भरण-पोषण की, और प्रभु के भण्डार में अपना धन उदारता से उँडेलने की इच्छा दिखाई है, वहाँ उन्हें आत्मिक और सांसारिक, दोनों प्रकार की बातों में आशीष मिली है। परन्तु जहाँ वे कंजूस रही हैं, और पादरी को थोड़े में या बिना कुछ लिए ही अपने लिए प्रचार करने दिया है, उन कलीसियाओं पर आशीष के बजाय शाप पड़ा है। और सामान्यतः, धर्म की जागृतियों में, मैंने यह सच पाया है कि नए विश्वासी उन्हीं कलीसियाओं में सम्मिलित होने की ओर सबसे अधिक झुकते हैं जो सुसमाचार के भरण-पोषण के प्रयत्नों में सबसे अधिक उदार होती हैं।
कलीसियाएँ इस विषय में बहुत अन्धकार में हैं। उन्हें उनका कर्तव्य नहीं सिखाया गया है। मैंने बहुत से उदाहरणों में पाया है कि जब यह विषय उनके सामने रखा गया तो वे उसे करने के लिए अत्यन्त तत्पर थे। मैं एक कलीसिया के एक प्राचीन को जानता था जो आधे समय के लिए पादरी लाने की बात कर रहा था, क्योंकि कलीसिया गरीब थी, यद्यपि उसकी अपनी आय काफ़ी थी। मैंने उससे पूछा कि क्या उसकी आय इतनी नहीं कि वह स्वयं पूरे समय के लिए एक पादरी का भरण-पोषण कर सके। उसने कहा कि इतनी है। और जब उससे पूछा गया कि प्रभु का जो धन उसके पास है उसका वह और कौन सा ऐसा उपयोग कर सकता है जो मसीह के राज्य के हित के लिए इतना लाभदायक सिद्ध हो, जितना अपने ही नगर में आधे नहीं, बल्कि पूरे समय के लिए एक पादरी को नियुक्त करना, तो उसने इस काम में लग जाने का निश्चय किया। उसके अनुसार एक पादरी ले आया गया है, और मेरा विश्वास है कि उन्हें उसका पूरा वेतन चुकाने में कोई कठिनाई नहीं होती।
बात यह है कि केवल आधे समय प्रचार करके पादरी बहुत थोड़ा ही कर सकता है। यदि एक सब्त को कोई प्रभाव पड़ता है, तो पखवाड़ा बीतते-बीतते वह खो जाता है। किफ़ायत की दृष्टि से भी, कलीसिया को चाहिए कि पूरे समय सुसमाचार का भरण-पोषण करने में अपने आप को लगा दे। यदि उन्हें सही प्रकार का पादरी मिल जाए, और वे उसे लगातार काम में लगाए रखें, तो उनमें जागृति हो सकती है, और इस प्रकार भक्तिहीन लोगों का मन-परिवर्तन होगा और वे आकर उनकी सहायता करेंगे। और इस प्रकार एक ही वर्ष में उनकी शक्ति में बड़ी वृद्धि हो सकती है। परन्तु यदि वे पादरी को केवल आधे समय के लिए नियुक्त करते हैं, तो वर्ष पर वर्ष बीतते जा सकते हैं, जबकि पापी नरक में जा रहे हैं, और भक्तिहीनों की पंक्तियों में से उनकी शक्ति में कोई वृद्धि नहीं होती।
बात यह है कि धर्म का अंगीकार करनेवालों को यह अनुभव नहीं कराया गया है कि उनकी सारी सम्पत्ति प्रभु की है। इसी कारण वे सुसमाचार के भरण-पोषण के लिए अपनी सम्पत्ति देने की बात करते रहे हैं। मानो प्रभु यीशु मसीह कोई भिखारी हो, और उनसे दान-पुण्य के काम के रूप में उसके सुसमाचार का भरण-पोषण करने को कहा गया हो! इस राज्य के एक नगर में एक व्यापारी अपने पादरी के वेतन का एक बड़ा भाग चुका रहा था। कलीसिया का एक सदस्य बाहर से आए एक पादरी को यह बात बता रहा था, और उस त्याग की चर्चा कर रहा था जो यह व्यापारी कर रहा था। उसी समय वह व्यापारी भीतर आया। पादरी ने कहा, “भाई, आप व्यापारी हैं। मान लीजिए कि आप माल बेचने के लिए एक मुंशी को, और अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए एक शिक्षक को नियुक्त करते हैं। आप अपने मुंशी को आज्ञा देते हैं कि वह शिक्षक को उसकी पढ़ाने की सेवा के लिए दुकान में से इतनी रकम दे। अब मान लीजिए कि आपका मुंशी यह कहता फिरे कि उसे इस शिक्षक का वेतन चुकाना पड़ता है, और उस त्याग की चर्चा करे जो वह ऐसा करने में कर रहा है, तो आप इस पर क्या कहेंगे?” व्यापारी ने कहा, “अरे, मैं कहूँगा कि यह हास्यास्पद है।” पादरी कहता है, “अच्छा, परमेश्वर ने आपको अपने मुंशी के रूप में माल बेचने के लिए नियुक्त किया है, और आपके पादरी को वह अपने बच्चों को सिखाने के लिए नियुक्त करता है, और आपसे माँगता है कि आप दुकान की आय में से उसका वेतन चुकाएँ। अब, क्या आप इसे अपना त्याग कहते हैं, और कहते हैं कि इस पादरी का वेतन चुकाने में आप बड़ा त्याग कर रहे हैं? नहीं, आप परमेश्वर के लिए माल बेचने के लिए उतने ही बाध्य हैं जितना वह परमेश्वर के लिए प्रचार करने के लिए बाध्य है। आपको धन जमा करने के उद्देश्य से माल बेचने का उससे अधिक अधिकार नहीं जितना उसे उसी उद्देश्य से सुसमाचार प्रचार करने का है। आप माल बेचने में उतने ही भक्त होने, और उतनी ही एकाग्रता से परमेश्वर की महिमा को लक्ष्य करने के लिए बाध्य हैं, जितना वह सुसमाचार प्रचार करने में। और इस प्रकार आपको भी उतनी ही पूर्णता से अपना सारा समय परमेश्वर की सेवा के लिए अर्पित करना है जितना वह करता है। आप और आपका परिवार उचित रूप से इस दुकान की आमदनी से जीवन-निर्वाह कर सकते हैं, और ठीक उतने ही उचित रूप से पादरी और उसका परिवार भी। यदि आप इन उद्देश्यों से माल बेचते हैं, तो माल बेचना भी ठीक उतनी ही परमेश्वर की सेवा है जितना प्रचार करना। और जो मनुष्य इन सिद्धान्तों पर माल बेचता है, और उनके अनुसार कार्य करता है, वह ठीक उतना ही भक्त है, ठीक उतना ही परमेश्वर की सेवा में है, जितना वह जो सुसमाचार प्रचार करता है। हर मनुष्य अपने व्यवसाय में परमेश्वर की सेवा करने के लिए बाध्य है, पादरी सिखाने के द्वारा, व्यापारी माल बेचने के द्वारा, किसान अपने खेत जोतने के द्वारा, वकील और चिकित्सक अपने पेशे के कर्तव्यों को निभाने के द्वारा। “इनमें से किसी के लिए भी नाशवान भोजन के लिए परिश्रम करना समान रूप से अनुचित है। वे जो कुछ करें वह सब परमेश्वर के लिए हो, और वे जो कुछ कमा सकें, अपने परिवारों का आराम से भरण-पोषण करने के बाद, वह सब सुसमाचार के फैलाव और संसार के उद्धार के लिए अर्पित किया जाए।”
बहुत समय से यह माना जाता रहा है कि पादरियों को दूसरे मनुष्यों से अधिक भक्त होना चाहिए, कि उन्हें संसार से प्रेम नहीं करना चाहिए, कि उन्हें परमेश्वर के लिए परिश्रम करना चाहिए: उन्हें जितना हो सके उतनी मितव्ययिता से जीना चाहिए, और यीशु मसीह के राज्य को बनाने में अपना सारा समय, और स्वास्थ्य, और शक्ति, और जीवन लगा देना चाहिए। यह सच है। परन्तु यद्यपि दूसरे मनुष्य उसी क्षेत्र में परिश्रम करने, और सार्वजनिक शिक्षा के लिए अपना समय देने के लिए नहीं बुलाए गए हैं, फिर भी वे ठीक उतनी ही पूर्णता से अपने सारे समय को परमेश्वर का समझने के लिए बाध्य हैं, और उन्हें संसार से प्रेम करने, या धन जमा करने, या उसे अपने बच्चों के लिए रख छोड़ने, या उसे अपनी अभिलाषाओं पर उड़ाने का उससे अधिक अधिकार नहीं जितना पादरियों को है।
अब समय आ गया है कि कलीसिया इन सिद्धान्तों से परिचित हो; और होम मिशनरी सोसाइटी लोगों का मन-परिवर्तन करने के लिए न्याय के दिन तक परिश्रम करती रहे, तो भी वह कभी सफल नहीं होगी, जब तक कलीसियाओं को इस सम्बन्ध में अपने कर्तव्य को समझने और अनुभव करने की ओर न ले जाया जाए। अरे, यह
तथ्य ही कि वे अपने पादरी के भरण-पोषण के लिए होम मिशनरी सोसाइटी से सहायता माँग और ले रही हैं, जबकि वे स्वयं उसका भरण-पोषण करने में समर्थ हैं, सम्भवतः ठीक वही कारण है जिससे उनके बीच उसके परिश्रम पर अधिक आशीष नहीं होती।
मैं चाहता हूँ कि अमेरिकन होम मिशनरी सोसाइटी के पास उन निर्बल कलीसियाओं की सहायता के लिए, जो अपनी सहायता आप करने में असमर्थ हैं, आज से सौ गुना अधिक साधन हों। परन्तु अपना धन उन्हें देना, जो सुसमाचार का भरण-पोषण करने में समर्थ तो हैं परन्तु अनिच्छुक हैं, न तो अच्छी किफ़ायत है और न भक्ति। क्योंकि उनकी सहायता करने का प्रयत्न व्यर्थ है, जब तक वे अपनी सहायता आप करने में समर्थ होकर भी अनिच्छुक हैं।
यदि मिशनरी सोसाइटी के पास एक टन सोना भी हो, तो भी उसे ऐसी कलीसिया को देना कोई दान नहीं होगा। परन्तु कलीसिया सारे दशमांश परमेश्वर के भण्डार में ले आए, और परमेश्वर आकाश के झरोखे खोलकर आशीष की वर्षा करेगा। परन्तु कलीसियाएँ निश्चय जान लें कि यदि वे अपनी सामर्थ्य भर अपनी सहायता आप करने को तैयार नहीं हैं, तो वे जान लेंगी कि उनके पादरियों के परिश्रम को इतनी थोड़ी सफलता क्यों मिलती है। यहाँ वे अपना भरण-पोषण प्रभु के भण्डार से मुफ़्त में ऐंठ रही हैं। कितनी ही कलीसियाएँ चाय और कॉफ़ी और तम्बाकू पर अपना धन खर्च कर रही हैं, और फिर आकर होम मिशनरी सोसाइटी से सहायता माँगती हैं! मैं ऐसी कलीसिया की सहायता करने के विरुद्ध विरोध प्रकट करूँगा जो चाय और तम्बाकू का सेवन करती है, और तनिक भी आत्म-त्याग के बिना जीती है, और परमेश्वर को केवल वही चढ़ाना चाहती है जिसमें उसका कुछ न लगे।
अन्त में—यदि वे आशीष पाना चाहते हैं, तो वे अपना कर्तव्य करें, अपना सारा कर्तव्य करें, पहिए में कंधा लगाएँ, सुसमाचार के हथियार बाँध लें, और काम के लिए आगे आएँ। तब, यदि कलीसिया मैदान में है, तो उद्धार का रथ आगे बढ़ता जाएगा, चाहे सारा नरक विरोध करे, और पापी मन-परिवर्तित होंगे और उद्धार पाएँगे। परन्तु यदि कोई कलीसिया सारा परिश्रम पादरी पर छोड़ दे, और जब वह परिश्रम कर रहा हो तब चुपचाप बैठकर देखती रहे, और स्वयं उसकी शिकायत करने के सिवा कुछ न करे, तो वे न केवल धर्म की जागृति से वंचित रहेंगे, बल्कि यदि वे आलसी और दोष लगानेवाले बने रहें, तो कुछ समय बाद मसीह की सेवा में अपनी आज्ञा न मानने और निकम्मेपन के कारण अपने आप को नरक में पाएँगे।
