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प्रबल प्रार्थना
“धर्मी जन की प्रार्थना के प्रभाव से बहुत कुछ हो सकता है।” याकूब 5:16
पिछला व्याख्यान मुख्य रूप से पाप के अंगीकार से सम्बन्धित था। आज रात मेरी बातें मुख्यतः मध्यस्थता, अर्थात् प्रार्थना, के विषय तक सीमित रहेंगी। जागृति को बढ़ाने के लिए दो प्रकार के साधन आवश्यक हैं; एक मनुष्यों को प्रभावित करने के लिए, और दूसरा परमेश्वर को प्रभावित करने के लिए। मनुष्यों को प्रभावित करने के लिए सत्य का उपयोग किया जाता है, और परमेश्वर को द्रवित करने के लिए प्रार्थना का। जब मैं परमेश्वर को द्रवित करने की बात कहता हूँ, तो मेरा अर्थ यह नहीं है कि प्रार्थना से परमेश्वर का मन बदल जाता है, या उसका स्वभाव या चरित्र बदल जाता है। परन्तु प्रार्थना हम में ऐसा परिवर्तन उत्पन्न करती है और ऐसी शर्तें पूरी करती है, जिनके कारण परमेश्वर के लिए वह करना उचित हो जाता है जो अन्यथा उसके लिए करना उचित न होता। जब कोई पापी पश्चाताप करता है, तो उसके मन की वह दशा परमेश्वर के लिए उसे क्षमा करना उचित बना देती है। परमेश्वर उस शर्त पर उसे क्षमा करने के लिए सदा तैयार रहा है, इसलिए जब पापी परमेश्वर के प्रति अपना मन बदलता है, तो उसे क्षमा करने के लिए परमेश्वर की भावना में किसी परिवर्तन की आवश्यकता नहीं होती। पापी का पश्चाताप ही उसकी क्षमा को उचित बनाता है, और वही परमेश्वर के वैसा करने का अवसर बनता है जैसा वह करता है। इसी प्रकार जब मसीही लोग प्रभावशाली प्रार्थना करते हैं, तो उनके मन की दशा परमेश्वर के लिए उन्हें उत्तर देना उचित बना देती है। वह इस शर्त पर आशीष देने के लिए सदा तैयार था कि उनकी भावना सही हो, और वे सही प्रकार की प्रार्थना करें। जब कभी उनमें यह परिवर्तन होता है, और वे सही प्रकार की प्रार्थना करते हैं, तब परमेश्वर, अपने आप में कोई परिवर्तन किए बिना, उन्हें उत्तर दे सकता है। जब हम दूसरों के लिए प्रभावशाली, उत्कट प्रार्थना करते हैं, तो यह तथ्य कि हम ऐसी प्रार्थना करते हैं, उसके लिए वह करना उचित बना देता है जिसके लिए हम प्रार्थना करते हैं, जबकि अन्यथा वह उचित न होता।
प्रार्थना उन कारणों की श्रृंखला की एक अनिवार्य कड़ी है जो जागृति तक पहुँचाते हैं; उतनी ही अनिवार्य जितना सत्य है। कुछ लोगों ने मनुष्यों का मन-परिवर्तन कराने के लिए बड़े उत्साह से सत्य का उपयोग किया है, और प्रार्थना पर बहुत कम बल दिया है। उन्होंने प्रचार किया, बातचीत की, और बड़े उत्साह से ट्रैक्ट बाँटे, और फिर आश्चर्य किया कि उन्हें इतनी कम सफलता क्यों मिली। और इसका कारण यह था कि वे साधनों की दूसरी शाखा, अर्थात् प्रभावशाली प्रार्थना, का उपयोग करना भूल गए। उन्होंने इस तथ्य को अनदेखा कर दिया कि सत्य अकेला, परमेश्वर के आत्मा के बिना, कभी यह प्रभाव उत्पन्न नहीं करेगा, और वह आत्मा सच्चे मन की प्रार्थना के उत्तर में दिया जाता है।
कभी-कभी ऐसा होता है कि जो लोग सत्य का उपयोग करने में सबसे अधिक लगे रहते हैं, वे प्रार्थना में सबसे अधिक लगे हुए नहीं होते। यह सदा दुर्भाग्यपूर्ण होता है।—क्योंकि जब तक उनमें, या किसी और में, प्रार्थना की आत्मा न हो, तब तक सत्य अकेला मनुष्यों को उनके पश्चाताप-रहित दशा में और कठोर बनाने के सिवा कुछ नहीं करेगा। सम्भवतः न्याय के दिन यह पाया जाएगा कि सत्य के द्वारा, चाहे वह कितने ही उत्साह से उपयोग किया गया हो, कभी कुछ नहीं होता, जब तक सत्य के प्रस्तुत किए जाने के साथ-साथ कहीं न कहीं प्रार्थना की आत्मा न हो।
दूसरे लोग विपरीत दिशा में भूल करते हैं। यह नहीं कि वे प्रार्थना पर बहुत अधिक बल देते हैं। परन्तु वे इस तथ्य को अनदेखा करते हैं कि प्रार्थना अकेली सदा-सर्वदा की जाती रहे, तो भी कुछ न होगा। क्योंकि पापियों का मन-परिवर्तन पवित्र आत्मा के सीधे स्पर्श से नहीं, बल्कि साधन के रूप में उपयोग किए गए सत्य के द्वारा होता है। सत्य का उपयोग किए बिना केवल प्रार्थना के द्वारा पापियों के मन-परिवर्तन की आशा करना परमेश्वर की परीक्षा करना है।
आज संध्या के प्रवचन का विषय है
प्रबल प्रार्थना।
I. मैं यह दिखाने का प्रस्ताव रखता हूँ कि प्रभावशाली या प्रबल प्रार्थना क्या है।
II. प्रबल प्रार्थना के कुछ सबसे आवश्यक गुण बताऊँगा। III. कुछ कारण बताऊँगा कि परमेश्वर इस प्रकार की प्रार्थना क्यों चाहता है।
IV. दिखाऊँगा कि ऐसी प्रार्थना से बहुत कुछ हो सकता है।
I. अब मैं यह दिखाता हूँ कि प्रबल प्रार्थना क्या है।
1. प्रभावशाली, प्रबल प्रार्थना केवल परोपकारी इच्छाओं में नहीं है। परोपकारी इच्छाएँ निःसन्देह परमेश्वर को प्रसन्न करती हैं। ऐसी इच्छाएँ स्वर्ग में सर्वत्र व्याप्त हैं, और सब पवित्र प्राणियों में पाई जाती हैं। परन्तु वे प्रार्थना नहीं हैं। मनुष्यों में ये इच्छाएँ वैसे ही हो सकती हैं जैसे स्वर्गदूतों और महिमा पाई हुई आत्माओं में होती हैं। परन्तु यह वह प्रभावशाली, प्रबल प्रार्थना नहीं है जिसकी चर्चा इस पद में की गई है। प्रबल प्रार्थना इससे कुछ बढ़कर है।
2. प्रबल, या प्रभावशाली प्रार्थना वह प्रार्थना है जो उस आशीष को प्राप्त कर लेती है जिसे वह खोजती है। यह वह प्रार्थना है जो परमेश्वर को प्रभावशाली रूप से द्रवित करती है। प्रभावशाली प्रार्थना का मूल विचार ही यह है कि वह अपना उद्देश्य पूरा कर लेती है।
II. मैं प्रबल प्रार्थना के कुछ सबसे आवश्यक गुण बताऊँगा। मैं उन सब बातों का पूरा विवरण नहीं दे सकता जिनसे मिलकर प्रबल प्रार्थना बनती है। परन्तु मैं कुछ ऐसी बातों का उल्लेख करूँगा जो उसके लिए आवश्यक हैं; कुछ ऐसी बातें जो प्रार्थना में प्रबल होने के लिए मनुष्य को अवश्य करनी चाहिए।
1. उसे किसी निश्चित उद्देश्य के लिए प्रार्थना करनी चाहिए। यदि वह किसी स्पष्ट या निश्चित उद्देश्य के बिना, यों ही अटकल से प्रार्थना करता है, तो उसे ऐसी प्रार्थना करने की आशा नहीं करनी चाहिए। उसके मन के सामने एक स्पष्ट उद्देश्य होना चाहिए। मैं अभी गुप्त प्रार्थना के विषय में बोल रहा हूँ। बहुत से लोग अपनी कोठरियों में केवल इसलिए जाते हैं कि उन्हें अपनी प्रार्थनाएँ बोलनी ही हैं। वह समय आ गया है जब उनकी आदत है कि सुबह, या दोपहर, या दिन के किसी भी समय, वे अकेले में प्रार्थना के लिए जाएँ। और कुछ कहने को होने के बजाय, अपने मन के सामने कोई निश्चित उद्देश्य रखने के बजाय, वे घुटनों के बल गिर पड़ते हैं, और जो कुछ उनके मन में आता है, उस समय उनकी कल्पना में जो कुछ तैरता है, उसी के लिए प्रार्थना करते हैं, और जब वे प्रार्थना समाप्त कर चुकते हैं, तो वे मुश्किल से एक शब्द भी बता सकते हैं कि उन्होंने किस बात के लिए प्रार्थना की थी। यह प्रभावशाली प्रार्थना नहीं है। हम उस व्यक्ति के विषय में क्या सोचेंगे जो इस प्रकार किसी विधान-सभा को प्रभावित करने का प्रयत्न करे, और कहे, “अब जाड़ा है, और विधान-सभा का सत्र चल रहा है, और यह आवेदन-पत्र भेजने का समय है,” और विधान-सभा में जाकर बिना किसी निश्चित उद्देश्य के यों ही अटकल से आवेदन करे? क्या आप सोचते हैं कि ऐसे आवेदन विधान-सभा को प्रभावित करेंगे?
मनुष्य के मन के सामने कोई निश्चित उद्देश्य अवश्य होना चाहिए। वह एक साथ अनेक प्रकार के उद्देश्यों के लिए प्रभावशाली रूप से प्रार्थना नहीं कर सकता। मनुष्य का मन ऐसा बना है कि वह एक ही समय में अनेक बातों पर अपनी इच्छाओं को तीव्रता से नहीं जमा सकता। बाइबल में लिखे प्रभावशाली प्रार्थना के सब उदाहरण इसी प्रकार के थे। जहाँ कहीं आप देखते हैं कि प्रार्थना में माँगी गई आशीष प्राप्त हुई, वहाँ आप पाएँगे कि जो प्रार्थना की गई थी, वह उसी निश्चित उद्देश्य के लिए की गई प्रार्थना थी।
2. प्रार्थना प्रभावशाली होने के लिए परमेश्वर की प्रकट की हुई इच्छा के अनुसार होनी चाहिए। परमेश्वर की प्रकट की हुई इच्छा के विपरीत बातों के लिए प्रार्थना करना परमेश्वर की परीक्षा करना है। प्रार्थना में मनुष्यों के मार्गदर्शन के लिए परमेश्वर की इच्छा तीन प्रकार से प्रकट की गई है।
(1.) बाइबल में स्पष्ट प्रतिज्ञाओं या भविष्यद्वाणियों के द्वारा, कि वह कुछ विशेष बातें देगा या करेगा। या तो विशेष बातों के विषय में स्पष्ट प्रतिज्ञाओं के द्वारा, या सामान्य शब्दों में दी गई प्रतिज्ञाओं के द्वारा, ताकि हम उन्हें विशेष बातों पर लागू कर सकें। उदाहरण के लिए, यह प्रतिज्ञा है: “जो कुछ तुम प्रार्थना करके माँगो, तो प्रतीति कर लो कि तुम्हें मिल गया, और तुम्हारे लिये हो जाएगा।”
(2.) कभी-कभी परमेश्वर अपनी इच्छा अपने विधान के द्वारा प्रकट करता है। जब वह यह स्पष्ट कर देता है कि अमुक-अमुक घटनाएँ होनेवाली हैं, तो यह उतना ही प्रकाशन है मानो उसने इसे अपने वचन में लिख दिया हो। बाइबल में हर बात प्रकट करना असम्भव होता। परन्तु परमेश्वर अक्सर उन लोगों पर, जिनमें आत्मिक विवेक है, यह स्पष्ट कर देता है कि अमुक-अमुक आशीषें देना उसकी इच्छा है।
(3.) अपने आत्मा के द्वारा। जब परमेश्वर के लोग असमंजस में होते हैं कि उसकी इच्छा के अनुसार किस बात के लिए प्रार्थना करें, तो उसका आत्मा अक्सर उन्हें सिखाता है। जहाँ कोई विशेष प्रकाशन नहीं है, और विधान भी बात को अँधेरे में छोड़ देता है, और हम नहीं जानते कि किस रीति से प्रार्थना करना उचित है, वहाँ हमें स्पष्ट रूप से बताया गया है कि “आत्मा भी हमारी दुर्बलता में सहायता करता है,” और “आत्मा आप ही ऐसी आहें भर भरकर जो बयान से बाहर हैं, हमारे लिये बिनती करता है।” जो बातें प्रकट नहीं की गई हैं, उनके लिए विश्वास से प्रार्थना करने के विषय पर बहुत कुछ कहा गया है। यह आपत्ति की जाती है कि इस सिद्धान्त में एक नए प्रकाशन की बात निहित है। मेरा उत्तर यह है कि नया हो या पुराना, यह ठीक वही प्रकाशन है जिसके विषय में यहोवा कहता है कि वह उसे देता है। यहाँ यह उतना ही स्पष्ट है मानो अभी स्वर्ग से आई किसी वाणी के द्वारा प्रकट किया गया हो, कि परमेश्वर का आत्मा परमेश्वर के लोगों की सहायता करता है कि वे परमेश्वर की इच्छा के अनुसार प्रार्थना करें, जब वे स्वयं नहीं जानते कि उन्हें किन बातों के लिए प्रार्थना करनी चाहिए। “और मनों का जाँचनेवाला जानता है कि आत्मा की मनसा क्या है,” क्योंकि वह पवित्र लोगों के लिये परमेश्वर की इच्छा के अनुसार बिनती करता है, और वह मसीहियों को ठीक उन्हीं बातों के लिए, ऐसी आहें भर भरकर जो बयान से बाहर हैं, प्रार्थना करने की अगुवाई करता है। जब न तो वचन और न विधान उन्हें निर्णय करने में समर्थ बनाता है, तब वे आत्मा से परिपूर्ण हों, जैसा परमेश्वर उन्हें आज्ञा देता है। वह कहता है, “आत्मा से परिपूर्ण होते जाओ।” और वह उनके मन को उन बातों की ओर ले जाएगा जिन्हें परमेश्वर देने को तैयार है।
3. प्रभावशाली रूप से प्रार्थना करने के लिए आपको परमेश्वर की इच्छा के प्रति समर्पण के साथ प्रार्थना करनी चाहिए। समर्पण को उदासीनता के साथ न मिलाइए। कोई भी दो बातें इनसे अधिक भिन्न नहीं हैं। मैं एक बार एक ऐसे व्यक्ति को जानता था जो वहाँ आया जहाँ जागृति हो रही थी। वह स्वयं ठण्डा था, और उसकी आत्मा में सम्मिलित नहीं हुआ, और उसमें प्रार्थना की आत्मा नहीं थी; और जब उसने भाइयों को ऐसे प्रार्थना करते सुना मानो उन्हें इनकार किया ही नहीं जा सकता, तो वह उनके साहस से चौंक गया, और सारे समय समर्पण के साथ प्रार्थना करने के महत्व पर ज़ोर देता रहा; जबकि यह उतना ही स्पष्ट था जितना कोई बात हो सकती है, कि वह समर्पण को उदासीनता के साथ मिला रहा था।
इसी प्रकार, प्रार्थना में समर्पण को इस सामान्य भरोसे के साथ न मिलाइए कि परमेश्वर वही करेगा जो उचित है। यह भरोसा रखना उचित है कि परमेश्वर सब बातों में वही करेगा जो उचित है। परन्तु यह समर्पण से भिन्न बात है। प्रार्थना में समर्पण से मेरा अर्थ है, परमेश्वर की प्रकट की हुई इच्छा को स्वीकार कर लेना। परमेश्वर की किसी आज्ञा के प्रति समर्पित होना उसे मानना है। परमेश्वर के किसी कल्पित या सम्भावित, परन्तु गुप्त आदेश के प्रति समर्पित होना समर्पण नहीं है। विधान के किसी प्रबन्ध के आने से पहले उसके प्रति समर्पित होना असम्भव है। क्योंकि जब तक घटना घट न जाए, तब तक हम कभी नहीं जान सकते कि घटना क्या होगी। एक उदाहरण लीजिए: जब दाऊद का बच्चा बीमार था, तो वह व्याकुल था, और प्रार्थना में तड़पता था, और शान्ति पाने से इनकार करता था। उसने इस बात को इतना मन पर ले लिया था कि जब बच्चा मर गया, तो उसके सेवक उसे यह बताने से डरते थे कि बच्चा मर गया है, इस भय से कि वह अपने आप को और भी अधिक दुःख देगा। परन्तु ज्यों ही उसने सुना कि बच्चा मर गया है, उसने अपना शोक एक ओर रख दिया, और उठा, और भोजन माँगा, और सदा की भाँति खाया-पिया। जब तक बच्चा जीवित था, वह नहीं जानता था कि परमेश्वर की इच्छा क्या है, और इसलिए उसने उपवास और प्रार्थना की, और कहा, “कौन जाने परमेश्वर मुझ पर ऐसा अनुग्रह करे कि बच्चा जीवित रहे?” वह नहीं जानता था कि कहीं उसकी प्रार्थना और तड़प ही वह बात न हो जिस पर यह निर्भर था कि बच्चा जीवित रहेगा या नहीं। उसने सोचा कि यदि वह अपने आप को दीन करे और परमेश्वर से विनती करे, तो शायद परमेश्वर उसे इस आघात से बचा ले। परन्तु ज्यों ही परमेश्वर की इच्छा प्रकट हुई, और बच्चा मर गया, वह एक संत के समान झुक गया। ऐसा लगता था कि उसने न केवल इसे स्वीकार किया, बल्कि वास्तव में इसमें सन्तोष पाया। “मैं तो उसके पास जाऊँगा, परन्तु वह मेरे पास लौट न आएगा।” यह सच्चा समर्पण था। इस विषय में उसने ठीक तर्क किया। जब तक उसके पास परमेश्वर की इच्छा का कोई प्रकाशन नहीं था, वह नहीं जानता था कि कहीं बच्चे का चंगा होना उसकी प्रार्थना पर निर्भर न हो। परन्तु जब उसे परमेश्वर की इच्छा का प्रकाशन मिल गया, तो वह समर्पित हो गया। जब तक परमेश्वर की इच्छा ज्ञात नहीं है, प्रार्थना किए बिना समर्पित हो जाना परमेश्वर की परीक्षा करना है। शायद, और जहाँ तक आप जानते हैं, आपका सही प्रकार की प्रार्थना करना ही वह बात हो सकती है जिस पर घटना निर्भर है। पश्चाताप न करनेवाले किसी मित्र के विषय में, वह शर्त जिस पर वह नरक से बचाया जाएगा, उस व्यक्ति के लिए आपकी प्रार्थना की उत्कटता और आग्रह ही हो सकता है।
4. किसी उद्देश्य के लिए प्रभावशाली प्रार्थना में यह बात निहित है कि उस उद्देश्य के लिए उसके महत्व के अनुरूप इच्छा हो। यदि कोई व्यक्ति सचमुच किसी आशीष की इच्छा रखता है, तो उसकी इच्छाएँ उस आशीष की महानता के कुछ अनुपात में होंगी। जिस आशीष के लिए प्रभु यीशु मसीह ने प्रार्थना की, उसके लिए उसकी इच्छाएँ आश्चर्यजनक रूप से प्रबल थीं, यहाँ तक कि वे घोर व्यथा तक पहुँच गईं। यदि किसी उद्देश्य के लिए इच्छा प्रबल है, और परोपकारी इच्छा है, और वह बात परमेश्वर की इच्छा और विधान के विपरीत नहीं है, तो अनुमान यही है कि वह दी जाएगी। इस अनुमान के दो कारण हैं:
(1.) परमेश्वर की सामान्य परोपकारिता से। यदि वह वांछनीय उद्देश्य है; यदि, जहाँ तक हम देख सकते हैं, उसे देना परमेश्वर की ओर से परोपकार का कार्य होगा, तो उसकी सामान्य परोपकारिता इस बात का अनुमानित प्रमाण है कि वह उसे देगा।
(2.) यदि आप पाते हैं कि किसी उद्देश्य के लिए आप परोपकारी इच्छाओं से व्याकुल हैं, तो इस बात का प्रबल अनुमान है कि परमेश्वर का आत्मा ही इन इच्छाओं को जगा रहा है, और आपको उस उद्देश्य के लिए प्रार्थना करने को उकसा रहा है, ताकि वह प्रार्थना के उत्तर में दिया जाए। ऐसी दशा में प्रार्थना में कोई भी मात्रा की इच्छा या आग्रह अनुचित नहीं है। एक मसीही, मानो, निकट आकर परमेश्वर का हाथ पकड़ सकता है। याकूब का उदाहरण देखिए, जब उसने इच्छा की घोर व्यथा में पुकारकर कहा, “जब तक तू मुझे आशीर्वाद न दे, तब तक मैं तुझे जाने न दूँगा।” क्या परमेश्वर उसके साहस और आग्रह से अप्रसन्न हुआ? कदापि नहीं; बल्कि उसने उसे ठीक वही बात दी जिसके लिए उसने प्रार्थना की थी। मूसा के विषय में भी ऐसा ही है। परमेश्वर ने मूसा से कहा, “अब मुझे मत रोक, कि मैं उनको नष्ट कर डालूँ, और उनका नाम आकाश के नीचे से मिटा डालूँ, और मैं उनसे बढ़कर एक बड़ी और सामर्थी जाति तुझ ही से उत्पन्न करूँगा।” मूसा ने क्या किया? क्या वह एक ओर खड़ा रहा और परमेश्वर को वैसा ही करने दिया जैसा उसने कहा था? नहीं, उसका मन मिस्रियों की ओर दौड़ता है, और वह सोचता है कि वे कैसे विजय का आनन्द मनाएँगे। “मिस्री लोग यह क्यों कहने पाएँ, कि वह उनको बुरे अभिप्राय से निकाल ले गया?” ऐसा लगता था मानो उसने आघात को टालने के लिए परमेश्वर का उठा हुआ हाथ पकड़ लिया हो। क्या परमेश्वर ने उसके हस्तक्षेप के लिए उसे डाँटा, और उससे कहा कि उसे हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार नहीं? नहीं; ऐसा लगता था मानो वह ऐसे आग्रह को किसी बात से इनकार नहीं कर सका, और इस प्रकार मूसा दरार में खड़ा हुआ, और परमेश्वर के साथ प्रबल हुआ। मिशनरी ज़ेवियर के विषय में कहा जाता है कि एक बार उसे एक बीमार व्यक्ति के लिए प्रार्थना करने को बुलाया गया, और उसने इतनी उत्कटता से प्रार्थना की कि मानो उसने स्वर्ग पर बलप्रयोग किया हो—लेखक ने यही शब्द कहे हैं। और वह प्रबल हुआ, और वह व्यक्ति चंगा हो गया।
ऐसी प्रार्थना आज के दिनों में भी अक्सर की जाती है, जब मसीही आग्रह की ऐसी चरम सीमा तक और ऐसे पवित्र साहस तक पहुँच गए हैं कि बाद में, जब उन्होंने उस पर पीछे मुड़कर देखा, तो वे अपने आप पर डर गए और चकित हुए, यह सोचकर कि उन्होंने परमेश्वर के साथ ऐसा आग्रह करने का साहस कैसे किया। और फिर भी ये प्रार्थनाएँ प्रबल हुई हैं, और उन्होंने आशीष प्राप्त की है। और इनमें से बहुत से लोग, जिनसे मैं परिचित हूँ, संसार में मेरे जाने हुए सबसे पवित्र लोगों में से हैं।
5. प्रार्थना प्रभावशाली होने के लिए सही उद्देश्यों से की जानी चाहिए। प्रार्थना स्वार्थपूर्ण नहीं होनी चाहिए, बल्कि परमेश्वर की महिमा के प्रति सर्वोपरि आदर से प्रेरित होनी चाहिए। बहुत सी प्रार्थना शुद्ध स्वार्थ से की जाती है। स्त्रियाँ कभी-कभी अपने पतियों के लिए प्रार्थना करती हैं कि उनका मन-परिवर्तन हो जाए, क्योंकि वे कहती हैं, “यह कितना अधिक सुखद होगा कि मेरे पति मेरे साथ सभा में जाएँ,” और इसी प्रकार की बातें। और ऐसा लगता है कि वे अपने विचारों को कभी स्वयं से ऊपर उठाती ही नहीं। वे यह सोचती हुई प्रतीत नहीं होतीं कि उनके पति अपने पापों के द्वारा परमेश्वर का कैसा अनादर कर रहे हैं, और उनके मन-परिवर्तन में परमेश्वर की कैसी महिमा होगी। माता-पिता के साथ भी बहुधा ऐसा ही होता है। वे यह सोचना सहन नहीं कर सकते कि उनके बच्चे नाश हो जाएँ। वे उनके लिए सचमुच बड़ी लगन से प्रार्थना करते हैं। परन्तु यदि आप उनसे बात करने जाएँ, तो वे बहुत कोमल हो जाते हैं, और आपको बताते हैं कि उनके बच्चे कितने अच्छे हैं, वे धर्म का कितना आदर करते हैं, और वे सोचते हैं कि वे अब लगभग मसीही हैं; और इस प्रकार वे ऐसे बात करते हैं मानो उन्हें डर हो कि यदि आप उनके बच्चों को सत्य बताएँगे तो आप उन्हें चोट पहुँचाएँगे। वे यह नहीं सोचते कि ऐसे सुशील और प्यारे बच्चे अपने पापों के द्वारा परमेश्वर का कैसा अनादर कर रहे हैं; वे केवल यह सोच रहे हैं कि उनका नरक में जाना उनके लिए कितनी भयानक बात होगी। आह! जब तक उनके विचार इससे ऊपर नहीं उठते, उनकी प्रार्थनाएँ पवित्र परमेश्वर के साथ कभी प्रबल न होंगी। स्वार्थपूर्ण उद्देश्यों की परीक्षा इतनी प्रबल है कि यह डरने का कारण है कि माता-पिता की बहुत सी प्रार्थनाएँ माता-पिता की कोमलता की ललक से कभी ऊपर नहीं उठतीं। और यही कारण है कि इतनी सारी प्रार्थनाएँ सुनी नहीं जातीं, और क्यों इतने सारे भक्त, प्रार्थना करनेवाले माता-पिता की सन्तान भक्तिहीन होती है। अन्यजाति संसार के लिए की जानेवाली बहुत सी प्रार्थना सहानुभूति से ऊँचे किसी सिद्धान्त पर आधारित प्रतीत नहीं होती। मिशनरी कार्यकर्ता, और दूसरे लोग, लगभग पूरी तरह नरक की ओर जा रहे साठ करोड़ अन्यजातियों पर ही ज़ोर देते रहते हैं, जबकि उनके द्वारा परमेश्वर के अनादर के विषय में बहुत कम कहा जाता है। यह एक बड़ी बुराई है; और जब तक कलीसिया के पास प्रार्थना और मिशनरी प्रयत्न के लिए अन्यजातियों के प्रति सहानुभूति से ऊँचे उद्देश्य न हों, तब तक उनकी प्रार्थनाएँ और प्रयत्न कभी बहुत कुछ नहीं कर पाएँगे।
6. प्रार्थना प्रभावशाली होने के लिए आत्मा की मध्यस्थता के द्वारा होनी चाहिए। आप आत्मा के बिना परमेश्वर की इच्छा के अनुसार प्रार्थना करने की कभी आशा नहीं कर सकते। पहली दो दशाओं में, जहाँ परमेश्वर की इच्छा उसके वचन में प्रकट की गई है, या उसके विधान के द्वारा संकेत की गई है, बात यह नहीं है कि मसीही ऐसी प्रार्थना करने में असमर्थ हैं। वे ऐसा करने में उतने ही समर्थ हैं जितने वे पवित्र होने में समर्थ हैं। परन्तु वास्तविकता यह है कि वे इतने दुष्ट हैं कि जब तक परमेश्वर का आत्मा उन्हें प्रभावित न करे, वे ऐसी प्रार्थना कभी करते ही नहीं। ऐसा विश्वास होना चाहिए जैसा पवित्र आत्मा के प्रभावशाली कार्य से उत्पन्न होता है। 7. वह लगातार बनी रहनेवाली प्रार्थना होनी चाहिए। सामान्य रूप से, जो मसीही पीछे हट गए हैं और जिन्होंने प्रार्थना की आत्मा खो दी है, वे एकाएक लगातार प्रार्थना करने की आदत में नहीं आ जाएँगे। उनके मन सही दशा में नहीं होते, और वे अपने मन को स्थिर नहीं कर पाते, और आशीष आने तक डटे नहीं रह पाते। यदि उनके मन ऐसी दशा में होते कि वे उत्तर आने तक लगे रहते, तो किसी उद्देश्य के लिए कितनी ही बार प्रार्थना करने के बाद की भाँति, प्रभावशाली प्रार्थना एकदम भी की जा सकती थी। परन्तु उन्हें बार-बार प्रार्थना करनी पड़ती है, क्योंकि उनके विचार इतनी आसानी से भटक जाते हैं, और इतनी सरलता से उस उद्देश्य से हटकर किसी और बात की ओर मुड़ जाते हैं। जब तक उनके मन प्रार्थना की आत्मा से भर न जाएँ, वे एक ही बात पर स्थिर नहीं रहेंगे, और वहीं के वहीं अपनी विनती को उसके परिणाम तक नहीं पहुँचाएँगे। यह न सोचिए कि आप प्रबल प्रार्थना करने के लिए तैयार हैं, यदि आपकी भावनाएँ आपको किसी उद्देश्य के लिए एक बार प्रार्थना करने देती हैं, और फिर उसे छोड़ देने देती हैं। अधिकांश मसीही एक लम्बी प्रक्रिया के द्वारा प्रबल प्रार्थना तक पहुँचते हैं। उनके मन धीरे-धीरे किसी उद्देश्य के विषय में चिन्ता से भर जाते हैं, यहाँ तक कि वे अपने काम-धन्धे पर जाते हुए भी आहें भरकर अपनी इच्छाएँ परमेश्वर के सामने रखते रहते हैं। ठीक वैसे ही जैसे वह माता जिसका बच्चा बीमार है, अपने घर में इधर-उधर घूमती है, ऐसी आहें भरती हुई मानो उसका हृदय फट जाएगा। और यदि वह प्रार्थना करनेवाली माता है, तो उसकी आहें दिन भर परमेश्वर के सामने निकलती रहती हैं। यदि वह उस कमरे से बाहर जाती है जहाँ उसका बच्चा है, तो भी उसका मन उसी पर लगा रहता है; और यदि वह सो रही है, तो भी उसके विचार उसी पर होते हैं, और वह स्वप्न में चौंक उठती है, यह सोचकर कि बच्चा मर रहा है। उसका पूरा मन उस बीमार बच्चे में लीन रहता है। यही मन की वह दशा है जिसमें मसीही प्रबल प्रार्थना करते हैं।
याकूब ने सारी रात परमेश्वर के साथ प्रार्थना में मल्लयुद्ध क्यों किया? वह जानता था कि उसने बहुत समय पहले पहिलौठे का अधिकार छीनकर अपने भाई एसाव की बड़ी हानि की थी। और अब उसे सूचना मिली कि उसका वह हानि उठाया हुआ भाई एक ऐसी हथियारबन्द सेना लेकर उससे मिलने आ रहा है, जिसका सामना करना उसके बस के बिलकुल बाहर था। और यह मानने का बड़ा कारण था कि वह बदला लेने के उद्देश्य से आ रहा है। तब उसके व्याकुल होने के दो कारण थे। पहला यह कि उसने यह बड़ी हानि की थी, और कभी उसकी कोई क्षतिपूर्ति नहीं की थी। दूसरा यह कि एसाव ऐसी सेना लेकर आ रहा था जो उसे कुचल डालने के लिए पर्याप्त थी। अब, वह क्या करता है? अजी, पहले तो वह अपने भाई से मिलने के लिए जितनी अच्छी रीति से हो सके सब कुछ व्यवस्थित करता है, पहले अपनी भेंट भेजता है, फिर अपनी सम्पत्ति, फिर अपना परिवार, और जिन्हें वह सबसे अधिक प्रेम करता था उन्हें सबसे पीछे रखता है। और इस समय तक उसका मन इतना व्याकुल हो गया था कि वह अपने आप को रोक न सका। वह अकेला नाले के पार चला जाता है, और सारी रात प्रार्थना की घोर व्यथा में अपना पूरा प्राण उण्डेल देता है। और ठीक जब पौ फट रही थी, वाचा के दूत ने कहा, “मुझे जाने दे;” और उसका पूरा अस्तित्व, मानो, हार मान लेने के विचार से ही तड़प उठा, और उसने पुकारकर कहा, “जब तक तू मुझे आशीर्वाद न दे, तब तक मैं तुझे जाने न दूँगा।” उसका प्राण घोर व्यथा तक पहुँच गया था, और उसने आशीष प्राप्त की, परन्तु उसके चिह्न वह सदा धारण किए रहा, और यह दिखाता रहा कि इस मानसिक संघर्ष से उसकी देह पर बड़ा प्रभाव पड़ा था। यही प्रबल प्रार्थना है।
अब, यह सोचकर अपने आप को धोखा न दीजिए कि आप प्रभावशाली प्रार्थना करते हैं, जब तक आप में आशीष के लिए यह तीव्र इच्छा न हो। मैं इस पर विश्वास नहीं करता। प्रार्थना तब तक प्रभावशाली नहीं होती जब तक वह इच्छा की घोर व्यथा के साथ न की जाए। प्रेरित पौलुस इसे प्राण की प्रसव-पीड़ा कहता है। यीशु मसीह, जब वह बारी में प्रार्थना कर रहा था, ऐसी घोर व्यथा में था कि उसका पसीना मानो लहू की बड़ी-बड़ी बूँदों के समान भूमि पर गिर रहा था। मैंने कभी किसी व्यक्ति को लहू का पसीना बहाते नहीं देखा; परन्तु मैंने ऐसे व्यक्ति को जाना है जिसने इतनी प्रार्थना की कि उसकी नाक से लहू निकल आया। और मैंने ऐसे लोगों को जाना है जिन्होंने जाड़े की सबसे ठण्डी ऋतु में इतनी प्रार्थना की कि वे पसीने से पूरी तरह भीग गए। मैंने ऐसे लोगों को जाना है जिन्होंने घण्टों तक प्रार्थना की, यहाँ तक कि उनके मन की घोर व्यथा से उनकी सारी शक्ति समाप्त हो गई। ऐसी प्रार्थनाएँ परमेश्वर के साथ प्रबल हुईं।
प्रार्थना में यह घोर व्यथा प्रेसिडेंट एडवर्ड्स के समय में, उन दिनों में हुई जागृतियों में, व्यापक रूप से पाई जाती थी। उन दिनों में जो लोग जागृति के विरोधी थे, उनके लिए यह बड़ी ठोकरों में से एक थी कि लोग तब तक प्रार्थना करते रहते थे जब तक उनकी देह उनकी भावनाओं से अभिभूत न हो जाती थी। मैं इस विषय पर प्रेसिडेंट एडवर्ड्स के कथन का एक अनुच्छेद पढ़ूँगा, ताकि आप देख सकें कि यह कलीसिया में कोई नई बात नहीं है, बल्कि जहाँ कहीं जागृतियाँ सामर्थ के साथ फैलीं, वहाँ सदा पाई गई है। यह उनकी पुस्तक “जागृतियों पर विचार” से है।
“हम यह निर्धारित नहीं कर सकते कि परमेश्वर किसी व्यक्ति को अपने आप का इतना दर्शन कभी न देगा कि उससे न केवल उसकी देह निर्बल हो जाए, बल्कि उसका जीवन भी ले लिया जाए। बड़े विद्वान और विवेकशील धर्मविज्ञानियों का मानना है कि मूसा का जीवन इसी रीति से लिया गया था; और कुछ अन्य संतों के विषय में भी ऐसा ही माना गया है। हाँ, मैं नहीं देखता कि किसी के पास यह निर्धारित करने का कोई ठोस, निश्चित आधार है कि परमेश्वर अपने आत्मा के द्वारा मन पर कभी ऐसी प्रबल छाप न डालेगा जो देह की बनावट को, और विशेषकर देह के उस भाग, मस्तिष्क, को इतना क्षीण कर देने का अवसर बन जाए कि लोग बुद्धि के उपयोग से वंचित हो जाएँ। जैसा मैंने पहले कहा, हमारे लिए यह निर्धारित करना बहुत बड़ी बात है कि परमेश्वर आत्मिक और अनन्त आशीषें देने में कोई बाहरी विपत्ति न लाएगा: वैसे ही हमारे लिए यह निर्धारित करना भी बहुत बड़ी बात है कि वह कितनी बड़ी बाहरी विपत्ति लाएगा। यदि परमेश्वर अपने आप के दर्शनों में, और अपने प्रति प्रेम में, बड़ी वृद्धि दे, तो उसका लाभ विपत्ति से अनन्त गुना बड़ा है, चाहे उसके तुरन्त बाद जीवन ले लिया जाए; हाँ, चाहे प्राण तुरन्त स्वर्ग में न ले जाया जाए, बल्कि कुछ वर्षों तक गहरी नींद में पड़ा रहे, और फिर स्वर्ग में ले जाया जाए; या, जो लगभग एक ही बात है, यदि वह अपनी शक्तियों के उपयोग से वंचित हो जाए, और ऐसा निष्क्रिय और अनुपयोगी हो जाए मानो कुछ वर्षों तक गहरी नींद में पड़ा हो, और फिर महिमा में प्रवेश करे। हम यह निर्धारित नहीं कर सकते कि बुद्धि-भ्रम कितनी बड़ी विपत्ति है, जब उस पर उसके सब परिणामों के साथ विचार किया जाए, और उन सब बातों के साथ जो परिणामस्वरूप हो सकती थीं यदि वह बुद्धि-भ्रम न हुआ होता; और न ही वास्तव में यह कि (इस प्रकार विचार करने पर) वह कोई विपत्ति है भी या नहीं, या कहीं वह दया तो नहीं, कि उसने किसी बड़े पाप को, या किसी और भी भयानक बात को, जो वह न होता तो होती, रोक दिया। यह हमारा बड़ा दोष होगा कि हम उस सर्वप्रभु, सर्वज्ञानी परमेश्वर को, जिसके न्याय अथाह सागर हैं, और जिसके मार्ग अगम हैं, वहाँ सीमित करें जहाँ उसने अपने आप को सीमित नहीं किया, और उन बातों में जिनके विषय में उसने हमें नहीं बताया कि उसका मार्ग क्या होगा। यह उल्लेखनीय है, यह देखते हुए कि हाल में कितने ही असंख्य उदाहरणों में, और कितनी अधिक मात्रा में, देह की बनावट अभिभूत हुई है, कि फिर भी लोगों के जीवन सुरक्षित रहे हैं, और जो बुद्धि से वंचित हुए उनके उदाहरण बहुत ही थोड़े रहे हैं, और वे, शायद सब के सब, ऐसे लोग थे जिनकी देह की प्रकृति निर्बल और वात-रोगी होने का विशेष दोष था। इसमें एक दयालु और सावधान ईश्वरीय हाथ बहुत प्रत्यक्ष है, कि इतने सारे उदाहरणों में जहाँ जहाज़ डूबने लगा था, फिर भी वह थामे रखा गया, और पूरी तरह नहीं डूबा। जो बुद्धि से वंचित हुए उनके उदाहरण इतने थोड़े हैं कि निश्चय ही वे हमें इस प्रकार भयभीत करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं, मानो यह कार्य जो देश में चलाया गया है, हानिकारक प्रभाववाला होनेवाला हो; जब तक कि हम उसे कलंकित करने के लिए जो कुछ बटोर सकते हैं वह सब बटोरने, और उसे भयानक रंगों में प्रस्तुत करने की प्रवृत्ति न रखते हों। “मन के एक विशेष प्रकार के अभ्यास और चिन्ता से बहुत से लोग अभिभूत हुए हैं, जो कुछ लोगों के लिए विशेष रूप से ठोकर का कारण रहा है; और वह है, वह गहरी चिन्ता और व्यथा जो उन्हें दूसरों के प्राणों के लिए रही है। मुझे खेद है कि कोई हमें ऐसा काम करने का कष्ट दे जो इतना अनावश्यक प्रतीत होता है, जैसे ऐसी बात का बचाव करना। इतने स्पष्ट विषय में एक औपचारिक और विस्तृत वाद-विवाद में पड़ना, यह निर्धारित करने के लिए कि क्या इस विषय की महानता और महत्व में कोई ऐसी बात है जो उस चिन्ता की महानता के अनुरूप और अनुपात में हो जो कुछ लोगों ने प्रकट की है, केवल व्यर्थ की बात लगती है। मनुष्यों को, साधारण सद्बुद्धि और मानवता से ऊँचे किसी सिद्धान्त के बिना भी, दूसरों को डूबने, या आग लगे घर में जल जाने जैसी—जिससे बड़ी कोई विपत्ति नहीं—बड़े संकट में देखकर बहुत गहरी चिन्ता करने और मन में बहुत व्याकुल होने की अनुमति दी जा सकती है। और यदि ऐसा है, तो निःसन्देह यह भी उतना ही उचित माना जाएगा कि यदि वे उन्हें इससे दस गुनी बड़ी विपत्ति के संकट में देखें, तो और भी अधिक चिन्तित हों; और यदि विपत्ति उससे भी बहुत बड़ी हो, तो और भी कहीं अधिक। तो फिर इसे अनुचित क्यों समझा जाए, और बहुत सन्देह की दृष्टि से क्यों देखा जाए, मानो यह किसी बुरे कारण से ही उत्पन्न हुआ हो, जब लोग दूसरों को सर्वशक्तिमान परमेश्वर के प्रचण्ड क्रोध को अनन्तकाल तक सहने के बहुत बड़े संकट में देखकर अत्यन्त चिन्तित होते हैं? और इसके अतिरिक्त, निःसन्देह यह माना जाएगा कि जिनमें परमेश्वर का आत्मा, अर्थात् प्रेम की आत्मा, बहुत बड़ी मात्रा में है, उनके विषय में यह मानना उचित है कि उनमें अपने संगी प्राणियों के प्रति उन लोगों से कहीं अधिक प्रेम और करुणा होगी जो केवल साधारण मानवता से प्रभावित होते हैं। इसे विचित्र क्यों समझा जाए कि जो मसीह के आत्मा से परिपूर्ण हैं, वे प्राणों के प्रति अपने प्रेम में उसी अनुपात में मसीह के समान हों? जिसका उनके प्रति इतना प्रबल प्रेम और उनके लिए इतनी चिन्ता थी कि वह उनके लिए परमेश्वर के प्रकोप के कटोरे की तलछट तक पीने को तैयार था; और जिस समय उसने प्राणों के लिए अपना लहू अर्पित किया, उसी समय उसने उनके महायाजक के रूप में, अत्यन्त घोर व्यथा के साथ, ऊँचे शब्द से पुकार पुकारकर और आँसू बहा बहाकर भी अर्पण किया, जब मसीह का प्राण, मानो, चुने हुओं के प्राणों के लिए प्रसव-पीड़ा में था; और इसलिए, उन्हें बचाने के विषय में, कहा गया है कि वह अपने प्राणों के परिश्रम का फल देखेगा। जैसे प्राणों के प्रति प्रेम और उनके लिए चिन्ता की ऐसी आत्मा मसीह की आत्मा थी, वैसे ही यह कलीसिया की आत्मा है; और इसलिए, कलीसिया को, इस इच्छा और खोज में कि मसीह संसार में और मनुष्यों के प्राणों में उत्पन्न हो, प्रकाशितवाक्य 12 में ‘एक स्त्री जो चिल्लाती थी, और प्रसव की पीड़ा में थी, और बच्चा जनने की पीड़ा उसे लगी थी’ के रूप में दिखाया गया है। जो लोग दूसरों के प्राणों के लिए व्यथा में रहे हैं, उनकी आत्मा, जहाँ तक मैं परख सकता हूँ, उस प्रेरित की आत्मा से भिन्न प्रतीत नहीं होती, जिसने प्राणों के लिए प्रसव-पीड़ा सही, और दूसरों के लिए स्वयं मसीह से शापित हो जाने की इच्छा करने को तैयार था। और भजनकार की आत्मा से, भजन संहिता 119:53, ‘जो दुष्ट तेरी व्यवस्था को छोड़े हुए हैं, उनके कारण मुझ पर भय छा गया है।’ और पद 136, ‘मेरी आँखों से जल की धारा बहती रहती है, क्योंकि लोग तेरी व्यवस्था को नहीं मानते।’ और यिर्मयाह भविष्यद्वक्ता की आत्मा से, यिर्मयाह 4:19, ‘हाय! मेरी अन्तड़ियाँ, मेरी अन्तड़ियाँ! मेरे हृदय में पीड़ा है; मेरा मन भीतर ही भीतर घबराता है; मैं चुप नहीं रह सकता, क्योंकि हे मेरे प्राण, तू ने नरसिंगे का शब्द और युद्ध की ललकार सुनी है!’ और इसी प्रकार, अध्याय 9:1, और 13:17, और यशायाह 22:4। हम मोर्दकै के विषय में पढ़ते हैं, कि जब उसने अपने लोगों को सांसारिक विनाश से नष्ट किए जाने के संकट में देखा, एस्तेर 4:1, तो उसने ‘अपने वस्त्र फाड़े, और टाट पहिनकर राख डाली, और नगर के मध्य जाकर ऊँचे और दुःखभरे शब्द से चिल्लाने लगा। तो फिर लोगों को बुद्धि-भ्रष्ट क्यों समझा जाए, जब वे अनन्त विनाश की ओर जा रहे लोगों की दुर्दशा पर विचार करके चिल्लाए बिना नहीं रह सकते?” मैंने यह इसलिए पढ़ा है कि यह दिखाऊँ कि उन दिनों की महान जागृतियों में यह बात सामान्य थी। सब महान जागृतियों में सदा ऐसा ही हुआ है, और कार्य की महानता, विस्तार और गहराई के अनुपात में यह कम या अधिक सामान्य रहा है। स्कॉटलैंड की महान जागृतियों में भी ऐसा ही हुआ, और असंख्य लोग अपनी घोर व्यथा की गहराई से अभिभूत हो जाया करते थे, और कुछ तो लगभग मर ही गए।
9. यदि आप प्रभावशाली रूप से प्रार्थना करना चाहते हैं, तो आपको बहुत अधिक प्रार्थना करनी चाहिए। प्रेरित याकूब के विषय में कहा जाता है कि उसकी मृत्यु के बाद पाया गया कि इतनी अधिक प्रार्थना करने के कारण उसके घुटने ऊँट के घुटनों के समान कठोर हो गए थे। आह! उन आरम्भिक सेवकों की सफलता का रहस्य यही था। उनके घुटने कठोर हो गए थे।
10. यदि आप चाहते हैं कि प्रार्थना प्रभावशाली हो, तो वह मसीह के नाम में की जानी चाहिए। आप अपने नाम में परमेश्वर के पास नहीं आ सकते। आप अपनी योग्यता की दुहाई नहीं दे सकते। परन्तु आप एक ऐसे नाम में आ सकते हैं जो सदा ग्रहणयोग्य है। आप सब जानते हैं कि किसी मनुष्य के नाम का उपयोग करना क्या होता है। यदि आप जॉन जेकब एस्टर द्वारा पृष्ठांकित कोई ड्राफ़्ट या हुण्डी लेकर बैंक जाएँ, तो इसका अर्थ यह होगा कि उसने आपको अपना नाम दे दिया है, और आप जानते हैं कि आप बैंक से उतनी ही आसानी से रुपया प्राप्त कर सकते हैं जितनी आसानी से वह स्वयं कर सकता। अब, यीशु मसीह आपको अपने नाम का उपयोग करने देता है। और जब आप मसीह के नाम में प्रार्थना करते हैं, तो इसका अर्थ यह है कि आप उतने ही प्रबल हो सकते हैं जितना वह स्वयं हो सकता, और उतना ही पा सकते हैं जितना परमेश्वर का अति प्रिय पुत्र पाता यदि वह स्वयं उन्हीं बातों के लिए प्रार्थना करता। परन्तु आपको विश्वास से प्रार्थना करनी चाहिए। उसके नाम में आपके होंठों पर वही सारी सामर्थ है जो उसके अपने होंठों पर है, और जब आप मसीह के नाम में, और विश्वास से माँगते हैं, तो परमेश्वर आपको आशीषें देने के लिए उतना ही स्वतन्त्र है जितना वह मसीह को देने के लिए होता, यदि वह माँगता।
11. आप अपने सब पापों को त्यागे बिना प्रार्थना में प्रबल नहीं हो सकते। आपको न केवल उन्हें स्मरण करना चाहिए, बल्कि वास्तव में उन्हें त्यागना चाहिए, और उन्हें छोड़ देना चाहिए, और अपने हृदय के संकल्प में उन सबको सदा के लिए त्याग देना चाहिए।
12. आपको विश्वास से प्रार्थना करनी चाहिए। आपको उन बातों को पाने की आशा रखनी चाहिए जिन्हें आप माँगते हैं। यदि आप उसे पाने की आशा रखे बिना प्रार्थना करते हैं, तो आपको प्रार्थना के उत्तर की बाट जोहने की आवश्यकता नहीं। आपको बिना किसी कारण के ऐसी आशाएँ नहीं बाँधनी चाहिए। जिन दशाओं की मैंने कल्पना की है, उनमें आशा का कारण है। यदि वह बात परमेश्वर के वचन में प्रकट की गई है, और आप आशीषें पाने की आशा के बिना प्रार्थना करते हैं, तो आप परमेश्वर को झूठा ठहराते हैं। यदि परमेश्वर की इच्छा उसके विधान के द्वारा संकेत की गई है, तो आपको संकेत की स्पष्टता के अनुसार उस पर इतना भरोसा करना चाहिए कि यदि आप उसके लिए प्रार्थना करें तो आशीष पाने की आशा रखें। और यदि उसका आत्मा आपको कुछ विशेष बातों के लिए प्रार्थना करने की अगुवाई करता है, तो आपके पास उस बात के पूरे होने की आशा रखने का उतना ही कारण है मानो परमेश्वर ने उसे अपने वचन में प्रकट किया हो।
परन्तु कुछ लोग कहते हैं, “क्या परमेश्वर के आत्मा की अगुवाई का यह विचार लोगों को कट्टर उन्माद की ओर नहीं ले जाएगा?” मेरा उत्तर यह है कि मैं नहीं जानता, हो सकता है बहुत से लोग इस विषय में अपने आप को धोखा दें। असंख्य लोगों ने धर्म की अन्य सब बातों के विषय में अपने आप को धोखा दिया है। और यदि कुछ लोग यह सोचें कि वे परमेश्वर के आत्मा की अगुवाई में चल रहे हैं, जबकि वह उनकी अपनी कल्पना के सिवा कुछ नहीं, तो क्या यह कोई कारण है कि जो लोग जानते हैं कि वे आत्मा की अगुवाई में चल रहे हैं, वे उसके पीछे न चलें? बहुत से लोग अपने आप को मन-परिवर्तित समझते हैं जबकि वे नहीं होते। क्या यह कोई कारण है कि हम प्रभु यीशु मसीह से लिपटे न रहें? मान लीजिए कुछ लोग यह सोचने में धोखा खाते हैं कि वे परमेश्वर से प्रेम करते हैं, तो क्या यह कोई कारण है कि वह भक्त संत, जो जानता है कि परमेश्वर का प्रेम उसके हृदय में डाला गया है, स्तुति के गीतों में अपनी भावनाओं को प्रकट न करे? इसी प्रकार मैं मानता हूँ कि कुछ लोग यह सोचने में अपने आप को धोखा दे सकते हैं कि वे परमेश्वर के आत्मा की अगुवाई में चल रहे हैं। परन्तु धोखा खाने की कोई आवश्यकता नहीं है। यदि लोग आवेगों के पीछे चलते हैं, तो यह उनका अपना दोष है। मैं नहीं चाहता कि आप आवेगों के पीछे चलें। मैं चाहता हूँ कि आप संयमी मनवाले हों, और परमेश्वर के आत्मा की संयमित, विवेकपूर्ण अगुवाई के पीछे चलें। ऐसे लोग हैं जो समझते हैं कि मेरा क्या अर्थ है, और जो भली-भाँति जानते हैं कि प्रार्थना में अपने आप को परमेश्वर के आत्मा के हाथ में सौंप देना क्या होता है।
III. मैं कुछ कारण बताऊँगा कि ये बातें प्रभावशाली प्रार्थना के लिए क्यों आवश्यक हैं। परमेश्वर ऐसी प्रार्थना, ऐसी प्रबल इच्छाएँ, ऐसी घोर व्यथा भरी विनतियाँ क्यों चाहता है?
1. ये प्रबल इच्छाएँ परमेश्वर की भावनाओं की प्रबलता को प्रबलता से प्रकट करती हैं। वे पश्चाताप न करनेवाले पापियों के प्रति परमेश्वर की वास्तविक भावनाओं के समान हैं। जब मैंने, जैसा मैंने कभी-कभी देखा है, प्राणों के प्रति उस प्रेम की अद्भुत प्रबलता देखी है जो मसीहियों ने अनुभव की है, तो मैं परमेश्वर के अद्भुत प्रेम से, और उनके उद्धार के लिए उसकी इच्छाओं से, आश्चर्यजनक रूप से प्रभावित हुआ हूँ। एक जागृति में एक स्त्री के उदाहरण ने, जिसके विषय में मैंने पढ़ा, मेरे मन पर सबसे गहरी छाप छोड़ी। उसमें प्राणों के प्रति ऐसी अकथनीय करुणा और प्रेम था कि वह वास्तव में साँस के लिए इतना हाँफती थी कि लगभग दम घुटने लगता था। उस इच्छा की प्रबलता कैसी होगी जो परमेश्वर अनुभव करता है, जब उसका आत्मा मसीहियों में ऐसी अद्भुत व्यथा, प्राण की ऐसी तड़प, ऐसी प्रसव-पीड़ा उत्पन्न करता है—परमेश्वर ने इसे व्यक्त करने के लिए सबसे उत्तम शब्द चुना है—यह प्रसव-पीड़ा है—प्राण की प्रसव-पीड़ा।
मैंने एक ऐसे मनुष्य को, जो बुद्धि और शारीरिक बल में समाज के किसी भी मनुष्य के बराबर था, पापियों के लिए अपनी अकथनीय इच्छाओं से पूरी तरह अभिभूत होकर मुँह के बल गिरते देखा है। मैं जानता हूँ कि यह बहुतों के लिए ठोकर का कारण है; और जब तक कलीसिया में इतने सारे अन्धे और जड़ धर्म का अंगीकार करनेवाले बने रहेंगे, तब तक यह सदा ऐसा ही रहेगा। परन्तु मैं सन्देह नहीं कर सकता कि ये बातें परमेश्वर के आत्मा का कार्य हैं। काश कि सारी कलीसिया आत्मा से ऐसी परिपूर्ण हो जाए कि वह प्रार्थना में प्रसव-पीड़ा सहे, यहाँ तक कि एक ही दिन में एक जाति उत्पन्न हो जाए!
परमेश्वर के वचन में कहा गया है कि “जैसे ही सिय्योन को पीड़ाएँ उठीं, वैसे ही उससे सन्तान उत्पन्न हुए।” इसका क्या अर्थ है? मैंने एक बार धर्म का अंगीकार करनेवाले एक व्यक्ति से यह प्रश्न पूछा। वह प्रभावशाली प्रार्थना के विषय में हमारे विचारों पर आपत्तियाँ उठा रहा था, और मैंने उससे पूछा कि उसके विचार में सिय्योन की
प्रसव-पीड़ा का क्या अर्थ है। “ओह,” उसने कहा, “इसका अर्थ यह है कि ज्यों ही कलीसिया सुसमाचार की संगति में मिलकर चलने लगती है, तब कहा जाएगा कि सिय्योन यात्रा करता है! इस मिलकर चलने को ही यात्रा करना कहा गया है।” आप देखते हैं, यह वही शब्द नहीं है (travail, अर्थात् प्रसव-पीड़ा, न कि travel, अर्थात् यात्रा)। इतना ही वह जानता था।
2. ये प्रबल इच्छाएँ, जिनका मैंने वर्णन किया है, महान परोपकार और पापियों के संकट के स्पष्ट दर्शन के स्वाभाविक परिणाम हैं। यह पूरी तरह उचित है कि ऐसा ही हो। यदि इस भवन में बैठी स्त्रियाँ ऊपर की ओर देखें, और एक परिवार को आग में जलकर मरते देखें, और उनकी चीखें सुनें, और उनकी व्यथा देखें, तो वे व्याकुल हो जाएँगी, और बहुत सम्भव है कि उनमें से बहुत सी व्यथा के मारे मूर्छित हो जाएँ। और कोई इस पर आश्चर्य नहीं करेगा, या यह नहीं कहेगा कि ऐसे भयानक दृश्य पर इतना व्याकुल होने के कारण वे मूर्ख या पागल हैं। वे इसे विचित्र समझेंगे यदि प्रबल भावना की कुछ अभिव्यक्तियाँ न हों। तो फिर इसमें आश्चर्य की क्या बात है यदि मसीही वैसा ही अनुभव करें जैसा मैंने वर्णन किया है, जब उन्हें पापियों की दशा का, और उस भयानक संकट का जिसमें वे हैं, स्पष्ट दर्शन होता है? वास्तविकता यह है कि जिन लोगों ने कभी ऐसा अनुभव नहीं किया, उन्होंने कभी अधिक सच्चा परोपकार अनुभव नहीं किया, और उनकी भक्ति अवश्य ही बहुत ऊपरी प्रकार की होगी। मेरा अभिप्राय कठोरता से न्याय करना, या अप्रिय बोलना नहीं है। परन्तु मैं इसे एक सीधे तथ्य के रूप में कहता हूँ; और लोग इसके विषय में जैसा चाहें कहें, परन्तु मैं जानता हूँ कि ऐसी भक्ति ऊपरी है। यह दोष ढूँढ़ना नहीं, बल्कि स्पष्ट सत्य है।
लोग कभी-कभी मसीहियों में ऐसी भावनाएँ होने पर आश्चर्य करते हैं। किस बात पर आश्चर्य? अजी, परमेश्वर के प्रति गहरी भक्ति, और मनुष्य के प्रति गहरे परोपकार के उन स्वाभाविक, तर्कसंगत और अनिवार्य परिणामों पर, जो उस बड़े संकट को देखकर होते हैं जिसमें वे पापियों को पड़ा देखते हैं।
3. जब एक मसीही का प्राण इस प्रकार बोझ से दबा होता है, तो उसे राहत अवश्य मिलनी चाहिए। परमेश्वर यह बोझ मसीही के प्राण पर इसलिए डालता है कि उसे अपने निकट लाए। मसीही अक्सर इतने अविश्वासी होते हैं कि वे परमेश्वर पर उचित विश्वास तब तक नहीं रखते जब तक वह उन पर यह बोझ इतना भारी न डाल दे कि वे उसके नीचे जी न सकें, और तब उन्हें राहत के लिए परमेश्वर के पास जाना ही पड़ता है। यह बहुत से ऐसे पापियों की दशा के समान है जिन्हें पाप का बोध हुआ है। परमेश्वर उसे तुरन्त ग्रहण करने को तैयार है, यदि वह यीशु मसीह पर विश्वास के साथ सीधे उसके पास आए। परन्तु पापी आता नहीं। वह पीछे हटता है, और संघर्ष करता है, और अपने पापों के बोझ के नीचे कराहता है, और अपने आप को परमेश्वर पर नहीं डालता, जब तक उसके पाप के बोध का बोझ इतना बड़ा न हो जाए कि वह और जी न सके; और जब वह, मानो, निराशा की चरम सीमा तक पहुँचा दिया जाता है, और ऐसा अनुभव करता है मानो वह नरक में डूबने ही वाला है, तब वह एक ज़ोरदार छलाँग लगाता है, और अपनी एकमात्र आशा के रूप में अपने आप को परमेश्वर की दया पर डाल देता है। उसका कर्तव्य था कि वह पहले ही आ जाता। परमेश्वर को उसकी व्यथा में, उसके अपने लिए, कोई आनन्द नहीं था। केवल पापी की हठ ने इस सारी व्यथा की आवश्यकता उत्पन्न की। वह इसके बिना आता ही नहीं। इसी प्रकार जब धर्म का अंगीकार करनेवाले प्राणों के बोझ से लद जाते हैं, तो वे अक्सर बार-बार प्रार्थना करते हैं, और फिर भी बोझ नहीं हटता, न उनकी व्यथा कम होती है, क्योंकि उन्होंने उसे कभी पूरी तरह विश्वास से परमेश्वर पर नहीं डाला। परन्तु वे बोझ से छुटकारा नहीं पा सकते। जब तक उनका परोपकार बना रहता है, बोझ बना रहेगा और बढ़ता जाएगा, और जब तक वे पवित्र आत्मा का विरोध करके उसे बुझा न दें, तब तक उन्हें कोई राहत नहीं मिल सकती, यहाँ तक कि अन्त में, जब वे चरम सीमा तक पहुँचा दिए जाते हैं, तो वे एक हताश प्रयत्न करते हैं, बोझ को प्रभु यीशु मसीह पर डाल देते हैं, और उस पर बालक का सा भरोसा रखते हैं। तब उन्हें राहत मिलती है; तब उन्हें ऐसा लगता है मानो जिस प्राण के लिए वे प्रार्थना कर रहे थे, वह उद्धार पाएगा। बोझ चला जाता है, और परमेश्वर मानो कृपा करके मन को शान्त कर देता है, कि वह यह मधुर निश्चय अनुभव करे कि आशीष दी जाएगी। अक्सर, जब एक मसीही यह संघर्ष, प्रार्थना में यह घोर व्यथा सह चुका होता है, और इस रीति से राहत पा चुका होता है, तो आप पाएँगे कि सबसे मधुर और सबसे स्वर्गीय भावनाएँ उमड़ पड़ती हैं—प्राण मधुरता और महिमा के साथ परमेश्वर में विश्राम करता है, और “ऐसे आनन्द से जो वर्णन से बाहर और महिमा से भरा हुआ है” आनन्दित होता है।
क्या आप में से कोई अब यह सोचता है कि विश्वासियों के अनुभव में ऐसी बातें होती ही नहीं? मैं आपसे कहता हूँ, यदि मेरे पास समय होता, तो मैं प्रेसिडेंट एडवर्ड्स से, और अन्य मान्य लेखकों से, ठीक ऐसे ही उदाहरण और वर्णन आपको दिखा सकता था। क्या आप पूछते हैं कि यहाँ न्यूयॉर्क में हमारे बीच ऐसी बातें क्यों कभी नहीं होतीं? मैं आपसे कहता हूँ, यह बिलकुल इस कारण नहीं है कि आप देहात के मसीहियों से बहुत अधिक बुद्धिमान हैं, या आपके पास धर्म के स्वरूप के विषय में अधिक समझ या अधिक विस्तृत विचार हैं, या अधिक स्थिर और सुव्यवस्थित भक्ति है। मैं आपसे कहता हूँ, नहीं; ऐसी अतिवादिता से मुक्त होने पर घमण्ड करने के बजाय, आपको अपना सिर छिपा लेना चाहिए, क्योंकि न्यूयॉर्क के मसीही इतने संसारी हैं, और उनमें इतनी अकड़, और घमण्ड, और फ़ैशन है, कि वे ऐसी आत्मिकता तक नीचे उतर ही नहीं सकते। काश ऐसा हो सकता। काश कि इस नगर में, और इस कलीसिया में ऐसी आत्मा होती! मैं जानता हूँ कि यदि यहाँ ऐसी बातें होतीं तो बड़ा शोर मचता। परन्तु मैं उसकी चिन्ता न करता। वे चाहें तो कहें कि चैथम चैपल के लोग पागल होते जा रहे हैं। यदि हम परमेश्वर के इतने निकट रह सकें कि जिस रीति से मैंने वर्णन किया है उस रीति से उसके आत्मा का आनन्द ले सकें, तो हमें उससे डरने की आवश्यकता नहीं।
4. देह पर प्रार्थना की आत्मा के ये प्रभाव स्वयं धर्म का कोई भाग नहीं हैं। बात केवल इतनी है कि देह अक्सर इतनी निर्बल होती है कि प्राण की भावनाएँ उसे अभिभूत कर देती हैं। ये शारीरिक प्रभाव प्रबल प्रार्थना के लिए बिलकुल आवश्यक नहीं हैं, बल्कि मन की अत्यन्त उत्तेजित भावनाओं का केवल एक स्वाभाविक या शारीरिक परिणाम हैं। धर्म के अतिरिक्त अन्य विषयों पर भी मन की किसी प्रबल भावना से देह का निर्बल हो जाना, और यहाँ तक कि अभिभूत हो जाना, बिलकुल असामान्य नहीं है। क्रान्ति के समय में कांग्रेस का द्वारपाल कोई अत्यन्त हर्षदायक समाचार पाकर गिरकर मर गया। मैं रोचेस्टर में एक स्त्री को जानता था, जो अपने दामाद के मन-परिवर्तन के लिए प्रार्थना की बड़ी घोर व्यथा में थी। एक सुबह वह चिन्तित खोजियों की सभा में था, और वह घर पर रहकर उसके लिए प्रार्थना कर रही थी। सभा के अन्त में, वह नया विश्वासी बनकर घर आया, और वह इतनी आनन्दित हुई कि वहीं गिरकर मर गई। धर्म के द्वारा ये प्रभाव उत्पन्न होना किसी अन्य विषय पर प्रबल भावना के द्वारा उत्पन्न होने से अधिक विचित्र नहीं है। यह प्रार्थना के लिए आवश्यक नहीं, बल्कि मन के बड़े प्रयत्न का स्वाभाविक परिणाम है।
5. निःसन्देह एक बड़ा कारण कि परमेश्वर इस घोर व्यथा भरी प्रार्थना की माँग करता है, यह है कि यह मसीह और कलीसिया के बीच एकता का ऐसा बन्धन बनाती है। यह उनके बीच ऐसी सहानुभूति उत्पन्न करती है। यह ऐसा है मानो मसीह आकर अपने परोपकारी हृदय का उमड़ता हुआ प्रेम अपनी कलीसिया में उण्डेल देता है, और उन्हें अपने साथ ऐसी सहानुभूति रखने और ऐसा सहयोग करने की अगुवाई करता है जैसा वे किसी और रीति से कभी नहीं करते। वे ठीक वैसा ही अनुभव करते हैं जैसा मसीह अनुभव करता है—पापियों के लिए ऐसी करुणा से भरे हुए कि वे अपने आप को रोक नहीं सकते। उन सेवकों के साथ अक्सर ऐसा ही होता है जो पापियों को प्रचार करने में अपनी सफलता के लिए प्रसिद्ध हैं; उनमें अक्सर ऐसी करुणा, उनके उद्धार के लिए ऐसी उमड़ती हुई इच्छाएँ होती हैं कि वे उनके बोलने में, और उनके प्रचार में, ऐसे प्रकट होती हैं मानो यीशु मसीह उनके द्वारा बोल रहा हो। शब्द उनके होंठों से ताज़े और उष्ण निकलते हैं, मानो स्वयं मसीह के हृदय से। मेरा यह अर्थ नहीं कि वह उन्हें शब्द बोलकर लिखवाता है; परन्तु वह उन भावनाओं को जगाता है जो उन्हें शब्द देती हैं। तब आप सुननेवालों में एक हलचल देखते हैं, मानो स्वयं मसीह मिट्टी के होंठों के द्वारा बोल रहा हो।
6. प्राणों के लिए यह प्रसव-पीड़ा उत्साही हृदयवाले मसीहियों और नए विश्वासियों के बीच भी एकता का एक उल्लेखनीय बन्धन बनाती है। जिनका मन-परिवर्तन होता है, वे उन हृदयों को बहुत प्रिय लगते हैं जिनमें उनके लिए यह प्रार्थना की आत्मा रही है। यह भावना वैसी ही है जैसी एक माता की अपने पहिलौठे के प्रति। पौलुस इसे बड़ी सुन्दरता से व्यक्त करता है, जब वह कहता है, “हे मेरे बालको!” उनके प्रति उसका हृदय उष्ण और कोमल था। “हे मेरे बालको, जिनके लिये मैं फिर जच्चा की सी पीड़ाएँ सहता हूँ।” वे पीछे हट गए थे, और उसे भटके हुए बच्चे पर माता-पिता की सी सारी व्यथा है। “मैं फिर जच्चा की सी पीड़ाएँ सहता हूँ, जब तक तुम में मसीह का रूप न बन जाए, जो महिमा की आशा है।” जागृति में, मैंने अक्सर देखा है कि जिनमें प्रार्थना की आत्मा रही है, वे नए विश्वासियों से कैसा प्रेम करते हैं। मैं जानता हूँ कि जिन्होंने कभी इसे अनुभव नहीं किया, उनके लिए यह सब बीजगणित के समान है। परन्तु जिन्होंने किसी प्राण के मन-परिवर्तन के लिए मल्लयुद्ध करनेवाली, प्रबल प्रार्थना की घोर व्यथा का अनुभव किया है, उनके विषय में आप निश्चय जानिए कि वह प्राण, मन-परिवर्तन के बाद, उन्हें उतना ही प्रिय लगता है जितना एक बच्चा उस माता को जिसने उसे पीड़ा के साथ जन्म दिया। उसने उसके लिए घोर व्यथा सही है, और उसे प्रार्थना के उत्तर में पाया है, और उसे प्रभु यीशु मसीह के सामने यह कहते हुए प्रस्तुत कर सकता है, “देख, हे प्रभु, मैं और वे सन्तान जो तू ने मुझे दी हैं।”
7. एक और कारण कि परमेश्वर इस प्रकार की प्रार्थना की माँग करता है, यह है कि केवल यही वह रीति है जिससे कलीसिया बड़ी आशीषें पाने के लिए, उनसे हानि उठाए बिना, उचित रूप से तैयार की जा सकती है। जब कलीसिया इस प्रकार परमेश्वर के सामने धूल में दण्डवत् पड़ी होती है, और प्रार्थना में गहरी व्यथा में होती है, तो आशीष उसका भला करती है। जबकि उसी समय, यदि उन्होंने प्राण की इस गहरी दीनता के बिना आशीष पाई होती, तो वह उन्हें घमण्ड से फुला देती। परन्तु जैसा है, वह उनकी पवित्रता, उनके प्रेम, उनकी नम्रता को बढ़ाती है।
IV. मुझे यह दिखाना है कि जैसी प्रार्थना का मैंने वर्णन किया है, उससे बहुत कुछ हो सकता है। परन्तु समय की कमी के कारण मैं उन प्रमाणों के विस्तृत विवरण में नहीं जा सकता जिन्हें मैं इस शीर्षक के अन्तर्गत प्रस्तुत करना चाहता था।
एलिय्याह भविष्यद्वक्ता ने इस्राएल के घराने के पतन पर विलाप किया, और जब उसने देखा कि मूर्तिपूजा में निरन्तर भटकते जाने को रोकने के लिए कोई और साधन प्रभावशाली होने की सम्भावना नहीं है, तो उसने प्रार्थना की कि परमेश्वर के दण्ड उस दोषी जाति पर आ पड़ें। उसने प्रार्थना की कि मेंह न बरसे, और परमेश्वर ने तीन वर्ष और छः महीने तक आकाश को बन्द कर दिया, यहाँ तक कि लोग अन्तिम सीमा तक पहुँच गए। और जब उसने देखा कि अब नरम पड़ने का समय आ गया है, तो वह क्या करता है? उसे पहाड़ पर चढ़कर प्रार्थना में झुकते देखिए। वह अकेला रहना चाहता था; और उसने अपने सेवक से कहा कि सात बार जाए, जबकि वह प्रार्थना में घोर व्यथा सह रहा था। अन्तिम बार, सेवक ने उससे कहा कि मनुष्य के हाथ के समान एक छोटा सा बादल दिखाई दिया है, और वह तुरन्त अपने घुटनों से उठ खड़ा हुआ—आशीष प्राप्त हो गई थी। विपत्ति के लौटाए जाने का समय आ गया था। “आह, परन्तु,” आप कहते हैं, “एलिय्याह तो भविष्यद्वक्ता था।” अब यह आपत्ति न कीजिए। प्रेरित के दिनों में भी लोगों ने यही आपत्ति की थी, और प्रेरित क्या कहता है? अजी, उसने प्रबल प्रार्थना के उदाहरण के रूप में ठीक यही घटना, और यह तथ्य कि एलिय्याह भी हमारे समान दुःख-सुख भोगी मनुष्य था, प्रस्तुत किया, और इस बात पर बल दिया कि वे भी ऐसी ही प्रार्थना करें।
जॉन नॉक्स प्रार्थना में अपनी सामर्थ के लिए इतने प्रसिद्ध थे कि रक्तपिपासु रानी मेरी कहा करती थी कि वह यूरोप की सब सेनाओं से अधिक उनकी प्रार्थनाओं से डरती है। और घटनाओं ने दिखा दिया कि उसके डरने का कारण था। वे अपने देश के छुटकारे के लिए ऐसी घोर व्यथा में रहा करते थे कि सो नहीं पाते थे। उनके बगीचे में एक स्थान था जहाँ वे प्रार्थना करने जाया करते थे। एक रात वे और कई मित्र मिलकर प्रार्थना कर रहे थे, और जब वे प्रार्थना कर रहे थे, तो नॉक्स ने कहा कि छुटकारा आ गया है। वे नहीं बता सकते थे कि क्या हुआ है, परन्तु उन्होंने अनुभव किया कि कुछ घटित हुआ है, क्योंकि परमेश्वर ने उनकी प्रार्थनाएँ सुन ली थीं। वह क्या था? अजी, अगला समाचार जो उन्हें मिला, वह यह था कि मेरी मर गई!
एक घटना लीजिए जो एक पादरी ने मेरे सुनते हुए सुनाई थी। उसने कहा कि एक नगर में बहुत वर्षों से कोई जागृति नहीं हुई थी; कलीसिया लगभग समाप्त हो चुकी थी, युवा सब के सब मन-परिवर्तन रहित थे, और उजाड़ बिना किसी बाधा के छाया हुआ था। नगर के एक एकान्त भाग में एक बूढ़ा मनुष्य रहता था, जो पेशे से लोहार था, और इतना हकलाता था कि उसे बोलते सुनना कष्टदायक था। एक शुक्रवार को, जब वह अपनी दुकान में अकेला काम कर रहा था, उसका मन कलीसिया की, और पश्चाताप न करनेवालों की दशा के विषय में बहुत व्याकुल हो गया। उसकी व्यथा इतनी बढ़ गई कि वह अपना काम एक ओर रखने, दुकान का द्वार बन्द करने, और तीसरा पहर प्रार्थना में बिताने को प्रेरित हुआ। वह प्रबल हुआ, और सब्त के दिन पादरी के पास गया, और उससे एक विचार-विमर्श सभा नियुक्त करने की इच्छा प्रकट की। कुछ हिचकिचाहट के बाद, पादरी सहमत हो गया, परन्तु यह कहते हुए कि उसे डर है कि बहुत कम लोग आएँगे। उसने उसी संध्या को एक बड़े निजी घर में सभा नियुक्त की। जब संध्या आई, तो इतने लोग इकट्ठे हुए कि घर में समा न सके। कुछ समय तक सब चुप रहे, जब तक कि एक पापी फूट-फूटकर रो न पड़ा, और कहा कि यदि कोई प्रार्थना कर सकता है, तो वह उससे विनती करता है कि उसके लिए प्रार्थना करे। दूसरा भी वैसा ही करने लगा, और फिर एक और, और फिर एक और, यहाँ तक कि पता चला कि नगर के हर भाग से लोग गहरे पाप के बोध में थे। और उल्लेखनीय बात यह थी कि उन सबने अपने पाप के बोध का आरम्भ उसी घड़ी से बताया जब वह बूढ़ा मनुष्य अपनी दुकान में प्रार्थना कर रहा था। इसके बाद एक सामर्थी जागृति हुई। इस प्रकार यह हकलानेवाला बूढ़ा मनुष्य प्रबल हुआ, और एक राजकुमार के समान परमेश्वर के साथ सामर्थ पाई। मैं ऐसे ही असंख्य उदाहरणों के नाम ले सकता हूँ, परन्तु समय की कमी के कारण, कुछ बातों के साथ समाप्त करना होगा।
टिप्पणियाँ।
1. बहुत सी प्रार्थना व्यर्थ जाती है, और बहुत से लोग प्रार्थना में कभी प्रबल नहीं होते, क्योंकि जब उनमें विशेष आशीषों के लिए इच्छाएँ होती हैं, तो वे उनके पीछे लगे नहीं रहते। उनमें परोपकारी और शुद्ध इच्छाएँ रही होंगी, जो परमेश्वर के आत्मा ने जगाई थीं; और जब उनमें ऐसी इच्छाएँ हों, तो उन्हें प्रार्थना में लगे रहना चाहिए, क्योंकि यदि वे अपना ध्यान दूसरी बातों की ओर मोड़ लेंगे, तो वे आत्मा को बुझा देंगे। हम पापियों से कहते हैं कि वे अपने मन को उस एक बात से न हटाएँ, बल्कि अपना ध्यान वहीं लगाए रखें, जब तक उनका उद्धार न हो जाए। जब आप अपने मन में ये पवित्र इच्छाएँ पाएँ, तो दो बातों का ध्यान रखिए:
(1.) आत्मा को न बुझाइए।
(2.) दूसरी बातों की ओर न भटकिए।
आत्मा की अगुवाई के पीछे चलते रहिए, जब तक आप वह प्रभावशाली, उत्कट प्रार्थना न कर लें जिससे बहुत कुछ हो सकता है।
2. प्रार्थना की आत्मा के बिना सेवक बहुत कम भलाई करेंगे। किसी सेवक को बड़ी सफलता की आशा नहीं करनी चाहिए, जब तक वह उसके लिए प्रार्थना न करे। कभी-कभी दूसरों में प्रार्थना की आत्मा हो सकती है, और वे उसके परिश्रम पर आशीष प्राप्त कर सकते हैं। फिर भी सामान्यतः वही प्रचारक सबसे अधिक सफल होते हैं जिनमें स्वयं प्रार्थना की आत्मा सबसे अधिक होती है।
3. केवल सेवकों में ही प्रार्थना की आत्मा होना आवश्यक नहीं, बल्कि यह भी आवश्यक है कि कलीसिया मिलकर वह प्रभावशाली, उत्कट प्रार्थना करे जो परमेश्वर के साथ प्रबल हो सके। जब तक आप आशीष माँगें नहीं, आपको उसकी आशा नहीं करनी चाहिए। “इन सब बातों के लिये इस्राएल का घराना मुझ से बिनती करेगा, कि मैं उनके लिये यह करूँ।”
अब, मेरे भाइयो, आज रात मैंने जो प्रचार किया है, उसके विषय में मुझे आपसे केवल यही पूछना है, “क्या आप ऐसा करेंगे?” पिछले शुक्रवार की संध्या को मैंने आपको जो प्रचार किया था, क्या आपने वह किया है? क्या आपने अपने पापों पर एक-एक करके विचार किया है, और उनका अंगीकार किया है, और उन सबको मार्ग से हटा दिया है? क्या अब आप प्रार्थना कर सकते हैं? और क्या आप मिलकर प्रबल प्रार्थना करेंगे, कि परमेश्वर का आत्मा यहाँ उतर आए?
