व्याख्यान 1 (22 में से) · 1868

धर्म की जागृति क्या है

चार्ल्स जी. फ़िन्नी · 1868

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    यह हिन्दी संस्करण मशीन-सहायता से अनुवादित है और समीक्षा की प्रक्रिया में है। अध्ययन के लिए अंग्रेज़ी मूल पाठ ही प्रामाणिक है। कोई त्रुटि दिखे तो [email protected] पर लिखें।

    धर्म की जागृति क्या है

    “हे यहोवा, वर्तमान युग में अपने काम को फिर से जिला; इसी युग में तू उसको प्रगट कर; क्रोध करते हुए भी दया करना स्मरण कर।” हबक्कूक 3:2

    ऐसा माना जाता है कि हबक्कूक भविष्यद्वक्ता यिर्मयाह का समकालीन था, और यह भविष्यद्वाणी बाबुल की बँधुआई के पूर्वाभास में की गई थी। उन दण्डों को देखकर जो शीघ्र ही उसकी जाति पर आनेवाले थे, भविष्यद्वक्ता का प्राण वेदना से भर उठा, और वह अपने संकट में पुकार उठता है, “हे यहोवा, अपने काम को फिर से जिला।” मानो वह कह रहा हो, “हे प्रभु, ऐसा कर कि तेरे दण्ड इस्राएल को उजाड़ न कर दें। इन भयानक वर्षों के बीच परमेश्वर के दण्ड हमारे बीच धर्म को फिर से जागृत करने का साधन बनाए जाएँ। क्रोध करते हुए भी दया करना स्मरण कर।”

    धर्म मनुष्य का काम है। यह कुछ ऐसा है जिसे मनुष्य को करना है। यह हृदय के साथ और हृदय से परमेश्वर की आज्ञा मानने में है। यह मनुष्य का कर्तव्य है। यह सच है कि परमेश्वर उसे ऐसा करने के लिए प्रेरित करता है। वह अपने आत्मा के द्वारा उस पर प्रभाव डालता है, क्योंकि मनुष्य बड़ा दुष्ट है और आज्ञा मानने से कतराता है। यदि परमेश्वर के लिए मनुष्यों पर प्रभाव डालना आवश्यक न होता—यदि मनुष्य परमेश्वर की आज्ञा मानने को तैयार होते, तो यह प्रार्थना करने का कोई अवसर ही न होता, “हे यहोवा, अपने काम को फिर से जिला।” ऐसी प्रार्थना की आवश्यकता का आधार यह है कि मनुष्य आज्ञा मानने को बिलकुल तैयार नहीं हैं; और जब तक परमेश्वर अपने आत्मा का प्रभाव बीच में न डाले, तब तक पृथ्वी पर एक भी मनुष्य कभी परमेश्वर की आज्ञाओं को नहीं मानेगा।

    “धर्म की जागृति” यह मानकर चलती है कि पहले गिरावट आ चुकी है। संसार में लगभग सारा धर्म जागृतियों के द्वारा ही उत्पन्न हुआ है। परमेश्वर ने यह आवश्यक पाया है कि मनुष्यजाति में उत्तेजित होने की जो क्षमता है उसका लाभ उठाकर उनके बीच प्रबल उत्तेजनाएँ उत्पन्न करे, और इसके बाद ही वह

    उन्हें आज्ञा मानने की ओर ले जा सकता है। मनुष्य आत्मिक रीति से इतने सुस्त हैं, और इतनी बातें हैं जो उनके मन को धर्म से हटा ले जाती हैं और सुसमाचार के प्रभाव का विरोध करती हैं, कि उनके बीच उत्तेजना उत्पन्न करना आवश्यक हो जाता है, यहाँ तक कि ज्वार इतना ऊँचा उठे कि विरोध करनेवाली सब बाधाओं को बहा ले जाए। उन्हें इतना उत्तेजित होना चाहिए कि वे इन विरोधी प्रभावों को तोड़कर पार निकल जाएँ, तभी वे परमेश्वर की आज्ञा मानेंगे। इसका अर्थ यह नहीं कि उत्तेजित भावना ही धर्म है, क्योंकि ऐसा नहीं है; परन्तु उत्तेजित इच्छा, लालसा और भावना ही वह चीज़ है जो धर्म को रोकती है। एक अर्थ में इच्छा-शक्ति शारीरिक और सांसारिक अभिलाषाओं की दास बनी हुई है। इसलिए यह आवश्यक है कि मनुष्यों को उनके दोष और खतरे का बोध कराकर जगाया जाए, और इस प्रकार विरोधी भावना और इच्छा की ऐसी उत्तेजना उत्पन्न की जाए जो शारीरिक और सांसारिक अभिलाषा की शक्ति को तोड़ दे और इच्छा-शक्ति को परमेश्वर की आज्ञा मानने के लिए स्वतंत्र छोड़ दे।

    यहूदियों के इतिहास पर पीछे दृष्टि डालिए, तो आप देखेंगे कि परमेश्वर उनके बीच विशेष अवसरों के द्वारा धर्म को बनाए रखता था, जब बड़ी उत्तेजना होती थी और लोग प्रभु की ओर फिरते थे। और जब वे इस प्रकार फिर से जागृत हो जाते, तो थोड़े ही समय में उन पर इतने विरोधी प्रभाव आ पड़ते कि धर्म घटने लगता, और घटता ही चला जाता, जब तक कि परमेश्वर को—यों कहें—इतना समय न मिल जाता कि वह अपने आत्मा के द्वारा उन्हें पाप का बोध कराए और अपने विधान के द्वारा उन्हें डाँटे, और इस प्रकार जनसाधारण का ध्यान उद्धार के महान विषय की ओर इतना खींचे कि धार्मिक रुचि की व्यापक जागृति उत्पन्न हो, और परिणामस्वरूप धर्म की जागृति हो। फिर विरोधी कारण दोबारा काम करने लगते, और धर्म घट जाता, और सारी जाति विलासिता, मूर्तिपूजा और घमण्ड के भँवर में बह जाती।

    कलीसिया में सिद्धान्त इतना कम है, उद्देश्य की दृढ़ता और स्थिरता इतनी थोड़ी है, कि जब तक धार्मिक भावनाएँ जगाई न जाएँ और उत्तेजित न रखी जाएँ, तब तक विरोधी सांसारिक भावना और उत्तेजना प्रबल हो जाएगी, और मनुष्य परमेश्वर की आज्ञा नहीं मानेंगे। उनका ज्ञान इतना थोड़ा है, और उनके सिद्धान्त इतने कमज़ोर हैं, कि जब तक वे उत्तेजित न हों, वे कर्तव्य के मार्ग से पीछे हट जाएँगे, और परमेश्वर की महिमा को बढ़ाने के लिए कुछ भी नहीं करेंगे। संसार की दशा अब भी ऐसी है, और सम्भवतः तब तक ऐसी ही रहेगी जब तक सहस्राब्दी राज्य पूरी रीति से न आ जाए, कि धर्म को मुख्यतः जागृतियों के द्वारा ही बढ़ाया जाना चाहिए। कितने लम्बे समय तक और कितनी बार यह प्रयोग किया गया है कि कलीसिया इन समय-समय की उत्तेजनाओं के बिना ही परमेश्वर के लिए स्थिरता से काम करती रहे। बहुत से भले लोगों ने यह माना है, और अब भी मानते हैं, कि धर्म को बढ़ाने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि एक समान गति से चलते रहें, और भक्तिहीनों को धीरे-धीरे और बिना उत्तेजना के भीतर लाते रहें। परन्तु सैद्धान्तिक रूप में ऐसा तर्क चाहे जितना ठोस दिखाई दे, तथ्य उसकी व्यर्थता को सिद्ध कर देते हैं। यदि कलीसिया ज्ञान में पर्याप्त आगे बढ़ी हुई होती, और उसमें जागती रहने के लिए सिद्धान्त की पर्याप्त स्थिरता होती, तो ऐसा मार्ग ठीक रहता; परन्तु कलीसिया में ज्ञान का प्रकाश इतना कम है, और विरोधी कारण इतने अधिक हैं, कि जब तक कोई विशेष रुचि न जगाई जाए, वह स्थिरता से काम में नहीं लगेगी। जैसे-जैसे सहस्राब्दी राज्य निकट आता जाएगा, सम्भव है कि ये समय-समय की उत्तेजनाएँ अज्ञात हो जाएँ। तब कलीसिया प्रकाशित होगी, और विरोधी कारण दूर कर दिए जाएँगे, और सारी कलीसिया परमेश्वर की अभ्यस्त और स्थिर आज्ञाकारिता की दशा में रहेगी। सारी कलीसिया खड़ी होकर बालकों के कोमल मन को सँभालेगी, और उसे परमेश्वर के लिए विकसित करेगी। लड़कों को उसी मार्ग की शिक्षा दी जाएगी जिसमें उनको चलना चाहिए, और तब सांसारिकता, फैशन और लोभ की ऐसी बाढ़ें नहीं होंगी जो जागृति की उत्तेजना के हटते ही कलीसिया की भक्ति को बहा ले जाएँ।

    यह बहुत ही वांछनीय है कि ऐसा ही हो। यह बहुत ही वांछनीय है कि कलीसिया इन उत्तेजनाओं के बिना आज्ञाकारिता के मार्ग पर स्थिरता से चलती रहे। ऐसी उत्तेजनाओं से स्वास्थ्य को हानि पहुँचने का डर रहता है। हमारा स्नायु-तंत्र ऐसा बना है कि कोई भी प्रबल उत्तेजना, यदि वह लम्बे समय तक बनी रहे, हमारे स्वास्थ्य को हानि पहुँचाती है और हमें कर्तव्य के योग्य नहीं रहने देती। यदि धर्म को कभी संसार में सर्वव्यापी प्रभाव प्राप्त करना है, तो ऐसा नहीं चल सकता; यह रह-रहकर उठनेवाला धर्म समाप्त होना ही चाहिए। तब इसकी आवश्यकता नहीं रहेगी। तब मसीही अधिकांश समय सोते नहीं रहेंगे, कि कभी-कभार जागकर आँखें मलें, और इधर-उधर हो-हल्ला करें, और थोड़ी देर चिल्लाएँ, और फिर सो जाएँ। तब इस बात की कोई आवश्यकता नहीं होगी कि पादरी उस सांसारिक प्रभाव की बाढ़ को पीछे धकेलने के प्रयत्नों में, जो कलीसिया पर चढ़ी आती है, अपने आप को थका डालें और अपने प्राण गँवा दें। परन्तु अभी तो मसीही जगत की दशा ऐसी है कि उत्तेजनाओं के बिना धर्म को बढ़ाने की आशा करना विवेक-विरुद्ध और बेतुका है। बड़ी-बड़ी राजनीतिक और अन्य सांसारिक उत्तेजनाएँ, जो मसीही जगत को झकझोरती रहती हैं, सब की सब धर्म के प्रतिकूल हैं, और मन को प्राण के हितों से हटा देती हैं। अब इन उत्तेजनाओं का सामना केवल धार्मिक उत्तेजनाओं से ही किया जा सकता है। और जब तक संसार में इतना धार्मिक सिद्धान्त न हो कि वह अधार्मिक उत्तेजनाओं को दबा दे, तब तक विरोधी उत्तेजनाओं के सिवाय किसी और रीति से धर्म को बढ़ाने का प्रयत्न करना व्यर्थ है। यह तत्वज्ञान की दृष्टि से भी सच है, और एक ऐतिहासिक तथ्य भी है। यह बिलकुल असम्भव-सा है कि अन्यजाति राष्ट्रों में धर्म कभी जागृतियों के प्रभाव के बिना उन्नति करेगा। अब इसे शिक्षा के द्वारा, और अन्य सावधान और क्रमिक सुधारों के द्वारा करने का प्रयत्न किया जा रहा है। परन्तु जब तक मन के नियम वैसे ही हैं जैसे वे हैं, तब तक यह इस रीति से नहीं किया जा सकता। इतनी उत्तेजना होनी चाहिए कि वह सोई हुई नैतिक शक्तियों को जगा दे, और पतन और पाप के ज्वार को पीछे धकेल दे। और ठीक उतनी ही मात्रा में, जितना हमारा अपना देश अन्यजातियों की दशा के निकट पहुँचता है, ऐसी परिस्थिति में प्रबल उत्तेजनाओं के बिना धर्म को बढ़ाना न परमेश्वर के लिए सम्भव है न मनुष्य के लिए। यह इस तथ्य से स्पष्ट है कि परमेश्वर ने सदा इसी रीति से यह काम किया है। परमेश्वर इन उत्तेजनाओं को व्यर्थ या बिना कारण उत्पन्न नहीं करता, और न धर्म को बढ़ाने के लिए यह तरीका यों ही चुनता है। जहाँ मनुष्यजाति परमेश्वर की आज्ञा मानने से इतनी कतराती है, वहाँ जब तक वे उत्तेजित न हों, वे कुछ करेंगे ही नहीं। उदाहरण के लिए, कितने ही ऐसे लोग हैं जो जानते हैं कि उन्हें धार्मिक होना चाहिए, परन्तु वे डरते हैं कि यदि वे भक्त बन गए तो उनके साथी उनकी हँसी उड़ाएँगे। बहुत से लोग मूर्तियों से बँधे हुए हैं, और दूसरे पश्चाताप को टालते रहते हैं, जब तक कि वे जीवन में जम न जाएँ, या जब तक वे कोई प्रिय सांसारिक लाभ प्राप्त न कर लें। ऐसे लोग अपनी झूठी लज्जा को कभी नहीं छोड़ेंगे, और न अपनी महत्त्वाकांक्षी योजनाओं को त्यागेंगे, जब तक कि वे अपने दोष और खतरे के बोध से इतने उत्तेजित न हो जाएँ कि वे अपने आप को और अधिक रोक न सकें।

    ये बातें केवल इस उपदेश की भूमिका के रूप में कही गई हैं। अब मैं मुख्य उद्देश्य की ओर बढ़ूँगा, और यह दिखाऊँगा,

    I. धर्म की जागृति क्या नहीं है;

    II. वह क्या है; और,

    III. उसे बढ़ाने में कौन-कौन से कर्ता काम में लाए जाते हैं।

    I. धर्म की जागृति कोई आश्चर्यकर्म नहीं है।

    1. आश्चर्यकर्म की सामान्य परिभाषा यह दी गई है कि वह एक ईश्वरीय हस्तक्षेप है, जो प्रकृति के नियमों को एक ओर कर देता है या स्थगित कर देता है। इस अर्थ में जागृति कोई आश्चर्यकर्म नहीं है। पदार्थ और मन के सब नियम लागू रहते हैं। जागृति में वे न तो स्थगित किए जाते हैं और न एक ओर किए जाते हैं।

    2. आश्चर्यकर्म शब्द की एक और परिभाषा के अनुसार भी—अर्थात् कोई ऐसी बात जो प्रकृति की शक्तियों से ऊपर हो—यह आश्चर्यकर्म नहीं है। धर्म में ऐसी कोई बात नहीं जो प्रकृति की साधारण शक्तियों से परे हो। वह पूरी रीति से प्रकृति की शक्तियों के ठीक उपयोग में है। वह ठीक यही है, और इसके सिवाय कुछ नहीं। जब मनुष्य धार्मिक बन जाते हैं, तो उन्हें ऐसे प्रयत्न करने की सामर्थ्य नहीं दी जाती जिन्हें वे पहले नहीं कर सकते थे। वे केवल उन्हीं शक्तियों को जो उनमें पहले से थीं, एक भिन्न रीति से काम में लाते हैं, और उन्हें परमेश्वर की महिमा के लिए प्रयोग करते हैं।

    3. यह किसी भी अर्थ में न तो आश्चर्यकर्म है और न किसी आश्चर्यकर्म पर निर्भर है। यह ठहराए हुए साधनों के ठीक उपयोग का पूर्णतः स्वाभाविक और तर्कसंगत परिणाम है—ठीक वैसे ही जैसे साधनों के प्रयोग से उत्पन्न होनेवाला कोई भी अन्य परिणाम। उसके पूर्ववर्ती कारणों में कोई आश्चर्यकर्म हो भी सकता है, और नहीं भी हो सकता। प्रेरितों ने आश्चर्यकर्मों को केवल एक साधन के रूप में काम में लिया, जिनके द्वारा उन्होंने लोगों का ध्यान अपने सन्देश की ओर खींचा, और उसके ईश्वरीय अधिकार को स्थापित किया। परन्तु आश्चर्यकर्म जागृति नहीं था। आश्चर्यकर्म एक बात थी; उसके पीछे आनेवाली जागृति बिलकुल दूसरी बात थी। प्रेरितों के दिनों की जागृतियाँ आश्चर्यकर्मों से जुड़ी हुई थीं, परन्तु वे स्वयं आश्चर्यकर्म नहीं थीं।

    मैंने कहा कि जागृति उपयुक्त साधनों के ठीक उपयोग का परिणाम है। जो साधन परमेश्वर ने जागृति उत्पन्न करने के लिए ठहराए हैं, उनमें निस्सन्देह जागृति उत्पन्न करने की स्वाभाविक प्रवृत्ति है। नहीं तो परमेश्वर उन्हें ठहराता ही नहीं। परन्तु हम सब जानते हैं कि परमेश्वर की आशीष के बिना साधन जागृति उत्पन्न नहीं करेंगे। उसी प्रकार अनाज भी, जब बोया जाता है, परमेश्वर की आशीष के बिना फसल उत्पन्न नहीं करेगा। हमारे लिए यह कहना असम्भव है कि अनाज की फसल उत्पन्न करने में परमेश्वर का उतना ही सीधा प्रभाव या कार्य नहीं होता, जितना जागृति उत्पन्न करने में होता है। प्रकृति के वे नियम क्या हैं जिनके अनुसार माना जाता है कि अनाज फसल देता है? वे परमेश्वर के कार्यों की ठहराई हुई रीति के सिवाय और कुछ नहीं हैं। बाइबल में परमेश्वर के वचन की तुलना अनाज से की गई है, और प्रचार की तुलना बीज बोने से, और परिणामों की तुलना फसल के उगने और बढ़ने से। और परिणाम एक दशा में भी उतना ही स्वाभाविक नियम के अनुसार है जितना दूसरी में, और कारण से उतनी ही स्वाभाविक रीति से जुड़ा हुआ है; या, अधिक ठीक कहें तो, जागृति उपयुक्त साधनों के उपयोग का उतना ही स्वाभाविक परिणाम है जितनी फसल अपने उपयुक्त साधनों के उपयोग का परिणाम है। यह सच है कि धर्म ठीक-ठीक कारण और कार्य की श्रेणी में नहीं आता; परन्तु यद्यपि वह साधनों के द्वारा उत्पन्न नहीं किया जाता, तौभी उसका अपना अवसर होता है, और वह अपने अवसर से उतनी ही स्वाभाविक और निश्चित रीति से उत्पन्न हो सकता है जितनी फसल अपने कारण से होती है।

    मैं चाहता हूँ कि यह विचार आप सब के मन पर अंकित हो जाए, क्योंकि लम्बे समय से यह धारणा फैली हुई है कि धर्म को बढ़ाने में कोई बहुत ही विचित्र बात है, जिसका न्याय कारण और कार्य के साधारण नियमों से नहीं किया जा सकता; संक्षेप में, कि साधनों का परिणाम से कोई सम्बन्ध नहीं, और साधनों में परिणाम उत्पन्न करने की कोई प्रवृत्ति नहीं। कलीसिया की उन्नति के लिए इससे अधिक खतरनाक कोई शिक्षा नहीं, और इससे अधिक बेतुकी कोई बात नहीं।

    मान लीजिए कि कोई मनुष्य किसानों के बीच जाकर उनके अनाज बोने के विषय में यही शिक्षा प्रचार करे। वह उनसे कहे कि परमेश्वर प्रभुसत्ताधारी है, और जब उसे अच्छा लगेगा तभी वह उन्हें फसल देगा, और यह कि उनका इस प्रकार हल चलाना और बोना और परिश्रम करना मानो वे फसल उगाने की आशा रखते हों, बहुत ही गलत है, और परमेश्वर के हाथ से काम छीन लेना है, कि यह उसकी प्रभुसत्ता में हस्तक्षेप करना है, और अपने ही बल पर चलना है: और यह कि साधनों और परिणाम के बीच ऐसा कोई सम्बन्ध नहीं जिस पर वे भरोसा कर सकें। और अब, मान लीजिए कि किसान ऐसी शिक्षा पर विश्वास कर लें। अरे, वे तो सारे संसार को भूखों मार डालेंगे।

    ठीक ऐसे ही परिणाम तब निकलेंगे जब कलीसिया को यह विश्वास दिला दिया जाए कि धर्म को बढ़ाना किसी प्रकार इतने रहस्यमय रूप से ईश्वरीय प्रभुसत्ता का विषय है, कि साधनों और लक्ष्य के बीच कोई स्वाभाविक सम्बन्ध नहीं है। इसके परिणाम क्या हैं? अरे, पीढ़ी के बाद पीढ़ी नरक में उतर गई है। निस्सन्देह पाँच अरब से अधिक लोग नरक में उतर गए हैं, जबकि कलीसिया सपने देखती रही, और इस बात की बाट जोहती रही कि परमेश्वर साधनों के उपयोग के बिना ही उन्हें बचा लेगा। प्राणों का नाश करने के लिए यह शैतान का सबसे सफल साधन रहा है। धर्म में यह सम्बन्ध उतना ही स्पष्ट है जितना तब, जब किसान अपना अनाज बोता है।

    परमेश्वर के शासन में एक तथ्य ऐसा है जो सब के ध्यान देने योग्य और सदा स्मरण रखने योग्य है; वह यह है कि सबसे उपयोगी और महत्त्वपूर्ण वस्तुएँ उपयुक्त साधनों के उपयोग से सबसे सरलता से और सबसे निश्चित रूप से प्राप्त होती हैं। स्पष्ट है कि यह ईश्वरीय शासन-व्यवस्था का एक सिद्धान्त है। इसलिए जीवन की सारी आवश्यक वस्तुएँ सबसे सरल साधनों के उपयोग से बड़ी निश्चितता के साथ प्राप्त होती हैं। विलासिता की वस्तुएँ प्राप्त करना अधिक कठिन है; उन्हें पाने के साधन अधिक उलझे हुए हैं और उनके परिणाम कम निश्चित हैं; जबकि वे वस्तुएँ जो सर्वथा हानिकारक और विषैली हैं, जैसे मदिरा और ऐसी ही वस्तुएँ, प्रायः प्रकृति को यातना देकर ही, और उस मृत्युदायक घृणित वस्तु को तैयार करने के लिए एक प्रकार के नारकीय जादू-टोने का प्रयोग करके ही प्राप्त होती हैं। यह सिद्धान्त नैतिक शासन में भी सच ठहरता है, और क्योंकि आत्मिक आशीषें सबसे बढ़कर महत्त्व की हैं, इसलिए हमें आशा करनी चाहिए कि उनकी प्राप्ति उपयुक्त साधनों के उपयोग के साथ बड़ी निश्चितता से जुड़ी होगी; और हम पाते हैं कि तथ्य भी ऐसा ही है; और मेरा पूरा विश्वास है कि यदि तथ्य जाने जा सकते, तो यह पाया जाता कि जब ठहराए हुए साधनों का ठीक उपयोग किया गया है, तब आत्मिक आशीषें सांसारिक आशीषों से भी अधिक एकरूपता के साथ प्राप्त हुई हैं।

    II. अब मुझे यह दिखाना है कि जागृति क्या है।

    यह मसीहियों के पहले प्रेम का नया हो जाना है, जिसके परिणामस्वरूप पापी जागते हैं और उनका परमेश्वर की ओर मन-परिवर्तन होता है। प्रचलित अर्थ में, किसी समुदाय में धर्म की जागृति का अर्थ है उस कलीसिया को, जो कम या अधिक पीछे हट चुकी है, झकझोरकर जगाना, उसमें नया जीवन फूँकना और उसे फिर से लौटा लाना, और सब वर्गों के लोगों का कम या अधिक व्यापक रूप से जाग उठना, और परमेश्वर के दावों की ओर ध्यान दिलाना सुनिश्चित करना।

    यह इस बात को मानकर चलती है कि कलीसिया पीछे हटी हुई दशा में डूब गई है, और जागृति इस बात में है कि कलीसिया अपने पीछे हटने से लौट आए, और पापियों का मन-परिवर्तन हो।

    1. जागृति में सदा कलीसिया की ओर से पाप का बोध सम्मिलित रहता है। पीछे हटे हुए अंगीकार करनेवाले हृदय की गहरी जाँच के बिना जागकर तुरन्त परमेश्वर की सेवा ठीक-ठीक आरम्भ नहीं कर सकते। पाप के सोतों को तोड़कर खोल डालना आवश्यक है। सच्ची जागृति में मसीही सदा ऐसे पाप-बोध के अधीन लाए जाते हैं; वे अपने पापों को ऐसे प्रकाश में देखते हैं कि प्रायः उन्हें यह आशा बनाए रखना असम्भव लगता है कि परमेश्वर ने उन्हें ग्रहण किया है। यह सदा उस सीमा तक नहीं पहुँचता; परन्तु सच्ची जागृति में पाप का गहरा बोध सदा होता है, और प्रायः ऐसे उदाहरण भी होते हैं जिनमें लोग सारी आशा छोड़ बैठते हैं।

    2. पीछे हटे हुए मसीही पश्चाताप की ओर लाए जाएँगे। जागृति परमेश्वर की आज्ञाकारिता के नए आरम्भ के सिवाय और कुछ नहीं है। जैसे किसी पापी के मन-परिवर्तन में होता है, वैसे ही पहला कदम है गहरा पश्चाताप, हृदय का टूट जाना, परमेश्वर के सामने गहरी दीनता के साथ धूल में गिर पड़ना, और पाप को त्याग देना।

    3. मसीहियों का विश्वास नया किया जाएगा। जब तक वे अपनी पीछे हटी हुई दशा में रहते हैं, वे पापियों की दशा के प्रति अन्धे रहते हैं। उनके हृदय संगमरमर के समान कठोर होते हैं। बाइबल की सच्चाइयाँ उन्हें केवल एक सपने के समान दिखाई देती हैं। वे मानते हैं कि यह सब सच है; उनका विवेक और उनकी बुद्धि इसे स्वीकार करते हैं; परन्तु उनका विश्वास उसे अनन्तकाल की सारी धधकती वास्तविकताओं में स्पष्ट उभरा हुआ नहीं देखता। परन्तु जब वे जागृति में प्रवेश करते हैं, तो वे मनुष्यों को चलते हुए पेड़ों के समान नहीं देखते, परन्तु वे बातों को उस तेज़ प्रकाश में देखते हैं जो उनके हृदयों में परमेश्वर के प्रेम को नया कर देगा। यह उन्हें दूसरों को उसके पास लाने के लिए उत्साह से परिश्रम करने को प्रेरित करेगा। जब वे स्वयं परमेश्वर से इतना प्रेम करते हैं, तो उन्हें यह देखकर दुःख होगा कि दूसरे उससे प्रेम नहीं करते। और वे हृदय की भावना के साथ अपने पड़ोसियों को मनाने में लग जाएँगे कि वे अपना हृदय उसे दे दें। इस प्रकार मनुष्यों के प्रति उनका प्रेम नया हो जाएगा। वे प्राणों के लिए कोमल और धधकते प्रेम से भर जाएँगे। उनमें सारे संसार के उद्धार के लिए तीव्र लालसा होगी। वे उन व्यक्तियों के लिए वेदना में होंगे जिनका उद्धार वे चाहते हैं—अपने मित्रों, सम्बन्धियों, शत्रुओं के लिए। वे न केवल उनसे आग्रह करते रहेंगे कि वे अपना हृदय परमेश्वर को दे दें, परन्तु वे उन्हें विश्वास की बाँहों में उठाकर परमेश्वर के पास ले जाएँगे, और ऊँचे शब्द से पुकार-पुकारकर और आँसू बहा-बहाकर परमेश्वर से विनती करेंगे कि वह उन पर दया करे, और उनके प्राणों को अनन्त जलन से बचा ले।

    4. जागृति मसीहियों पर संसार और पाप की शक्ति को तोड़ देती है। यह उन्हें ऐसी लाभदायक स्थिति में ले आती है कि उन्हें स्वर्ग की ओर बढ़ने की नई प्रेरणा मिलती है। उन्हें स्वर्ग का नया पूर्वस्वाद मिलता है, और परमेश्वर के साथ एक होने की नई अभिलाषाएँ जागती हैं; और संसार का आकर्षण टूट जाता है, और पाप की शक्ति पर जय प्राप्त होती है।

    5. जब कलीसियाएँ इस प्रकार जाग उठती हैं और सुधर जाती हैं, तब पापियों का सुधार और उद्धार भी होगा, और वे भी पाप-बोध, पश्चाताप और सुधार की उन्हीं अवस्थाओं से होकर गुज़रेंगे। उनके हृदय टूट जाएँगे और बदल जाएँगे। बहुत बार सबसे अधिक भ्रष्ट और दुराचारी लोग भी इसके पात्र बनते हैं। वेश्याएँ, और पियक्कड़, और नास्तिक, और हर प्रकार के भ्रष्ट चरित्रवाले लोग जागते हैं और उनका मन-परिवर्तन होता है। मनुष्यों में सबसे बुरे लोग भी कोमल किए जाते हैं, और लौटा लाए जाते हैं, और पवित्रता की शोभा के मनोहर नमूने बना दिए जाते हैं।

    III. अब मुझे उन कर्ताओं पर विचार करना है जो धर्म की जागृति को आगे बढ़ाने में काम में लाए जाते हैं।

    साधारणतः मन-परिवर्तन के काम में तीन कर्ता और एक उपकरण काम में लाए जाते हैं। कर्ता हैं परमेश्वर,—कोई व्यक्ति जो सत्य को मन पर लागू करता है,—और स्वयं पापी। उपकरण सत्य है। सच्चे मन-परिवर्तन के हर उदाहरण में सदा दो कर्ता, परमेश्वर और पापी, काम में लगे और सक्रिय रहते हैं।

    1. परमेश्वर का कार्य दो प्रकार का है; अपने विधान के द्वारा और अपने आत्मा के द्वारा।

    (1.) अपने विधान के शासन के द्वारा वह घटनाओं को ऐसा व्यवस्थित करता है कि पापी का मन और सत्य आमने-सामने आ जाएँ। वह पापी को वहाँ ले आता है जहाँ सत्य उसके कानों या उसकी आँखों तक पहुँचता है। यह देखना प्रायः बड़ा रोचक होता है कि परमेश्वर यह करने के लिए घटनाओं को किस रीति से व्यवस्थित करता है, और कैसे वह कभी-कभी हर बात को जागृति के अनुकूल बना देता है। मौसम की दशा, और लोगों का स्वास्थ्य, और अन्य परिस्थितियाँ मिलकर हर बात को ठीक वैसा बना देती हैं कि सत्य अधिक से अधिक प्रभाव के साथ लागू हो सके। कभी-कभी वह किस प्रकार ठीक उसी समय एक सेवक को भेज देता है जब उसकी आवश्यकता होती है! वह किस प्रकार किसी विशेष सत्य को ठीक उसी विशेष समय सामने लाता है जब वह व्यक्ति, जिस तक पहुँचने के लिए वह सत्य उपयुक्त है, उसे सुनने के मार्ग में होता है!

    (2.) अपने पवित्र आत्मा के द्वारा परमेश्वर का विशेष कार्य। मन तक सीधी पहुँच रखते हुए, और हर एक पापी के सारे इतिहास और उसकी दशा को असीम रूप से भली-भाँति जानते हुए, वह उस सत्य को काम में लाता है जो उसकी विशेष दशा के लिए सबसे उपयुक्त है, और फिर उसे ईश्वरीय सामर्थ्य के साथ भीतर तक पहुँचा देता है। वह उसे ऐसी सजीवता, बल और सामर्थ्य देता है कि पापी काँप उठता है, और अपने विद्रोह के हथियार डाल देता है, और प्रभु की ओर फिरता है। उसके प्रभाव में सत्य आग की नाईं जलता और अपना मार्ग काटता चला जाता है। वह सत्य को ऐसे रूपों में उभारकर सामने लाता है कि वह सबसे घमण्डी मनुष्य को भी पहाड़ के बोझ के समान कुचलकर नीचे गिरा देता है। यदि मनुष्य परमेश्वर की आज्ञा मानने को तैयार होते, तो सत्य बाइबल में पर्याप्त स्पष्टता से दिया गया है; और प्रचार से वे वह सब सीख सकते थे जो उन्हें जानना आवश्यक है। परन्तु क्योंकि वे उसे मानने के लिए बिलकुल अनिच्छुक हैं, इसलिए परमेश्वर उसे उनके मन के सामने स्पष्ट कर देता है, और उनके प्राणों पर कायल कर देनेवाले प्रकाश की ऐसी ज्वाला उँडेल देता है जिसका वे सामना नहीं कर सकते, और वे उसके आगे झुक जाते हैं, और परमेश्वर की आज्ञा मानते हैं, और उद्धार पाते हैं।

    2. साधारणतः मनुष्यों का कार्य भी काम में लाया जाता है। मनुष्य परमेश्वर के हाथों में केवल उपकरण नहीं हैं। सत्य उपकरण है। प्रचारक इस काम में एक नैतिक कर्ता है; वह कार्य करता है; वह केवल एक निष्क्रिय उपकरण नहीं है; वह पापियों के मन-परिवर्तन को बढ़ाने में अपनी इच्छा से काम करता है।

    3. स्वयं पापी का कार्य। पापी का मन-परिवर्तन इसमें है कि वह सत्य को माने। इसलिए यह असम्भव है कि वह उसके अपने कार्य के बिना हो, क्योंकि वह उसके ठीक काम करने में ही है। वह परमेश्वर के कार्य के द्वारा और मनुष्यों के कार्य के द्वारा इसके लिए प्रेरित किया जाता है। मनुष्य अपने संगी मनुष्यों पर न केवल भाषा के द्वारा, परन्तु अपनी दृष्टि, अपने आँसुओं, और अपने प्रतिदिन के आचरण के द्वारा भी प्रभाव डालते हैं। वहाँ उस पश्चाताप न करनेवाले मनुष्य को देखिए, जिसकी पत्नी भक्त है। उसकी दृष्टि ही, उसकी कोमलता, उसकी गम्भीर, करुणा से भरी गरिमा, जो कोमल होकर मसीह के स्वरूप में ढल गई है, हर समय उसके लिए एक उपदेश है। उसे अपना मन दूसरी ओर फेरना पड़ता है, क्योंकि यह उसके लिए ऐसी ताड़ना है। वह दिन भर अपने कानों में एक उपदेश गूँजता हुआ अनुभव करता है।

    मनुष्य अपने पड़ोसियों के चेहरे पढ़ने के अभ्यस्त होते हैं। पापी प्रायः किसी मसीही की आँखों में उसके मन की दशा पढ़ लेते हैं। यदि उसकी आँखें छिछोरेपन से, या सांसारिक चिन्ता और जोड़-तोड़ से भरी हों, तो पापी उसे पढ़ लेते हैं। यदि वे परमेश्वर के आत्मा से भरी हों, तो पापी उसे पढ़ लेते हैं; और प्रायः केवल मसीहियों का चेहरा देखकर ही उन्हें पाप का बोध हो जाता है।

    एक बार एक व्यक्ति मशीनें देखने के लिए एक कारखाने में गया। उसका मन गम्भीर था, क्योंकि वह ऐसे स्थान से आया था जहाँ जागृति हो रही थी। वहाँ काम करनेवाले सब लोग उसे देखकर पहचानते थे, और जानते थे कि वह कौन है। एक युवती ने, जो काम कर रही थी, उसे देखा, और अपनी साथिन के कान में कोई मूर्खतापूर्ण बात फुसफुसाई, और हँस पड़ी। वह व्यक्ति रुक गया और दुःख की भावना के साथ उसकी ओर देखने लगा। वह रुक गई, उसका धागा टूट गया, और वह इतनी व्याकुल हो गई कि उसे जोड़ न सकी। उसने अपने आप को सँभालने के लिए खिड़की से बाहर देखा, और फिर प्रयत्न किया; बार-बार उसने अपने ऊपर फिर से नियन्त्रण पाने का यत्न किया। अन्त में वह अपनी भावनाओं से अभिभूत होकर बैठ गई। तब वह व्यक्ति पास गया और उससे बात की; शीघ्र ही उसमें पाप का गहरा बोध प्रकट हुआ। यह भावना आग की नाईं सारे कारखाने में फैल गई, और कुछ ही घण्टों में वहाँ काम करनेवाले लगभग सब लोग पाप-बोध के अधीन थे, यहाँ तक कि कारखाने का मालिक, यद्यपि वह एक सांसारिक मनुष्य था, चकित रह गया, और उसने कहा कि काम बन्द कर दिया जाए और एक प्रार्थना-सभा की जाए; क्योंकि उसने कहा कि काम चलते रहने की अपेक्षा इन लोगों का मन-परिवर्तन होना कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण है। और कुछ ही दिनों में मालिक और उस कारखाने में काम करनेवाले लगभग सब लोगों का मन-परिवर्तन हो गया, और उनके मन-परिवर्तन के सच्चे होने की अच्छी आशा थी। इस व्यक्ति की आँख ने, उसके गम्भीर चेहरे ने, उसकी करुणामय भावना ने उस युवती के छिछोरेपन को डाँटा, और उसे पाप के बोध के अधीन ले आई: और सम्भवतः यह सारी जागृति बहुत कुछ इसी छोटी-सी घटना से उत्पन्न हुई।

    यदि मसीहियों में स्वयं धर्म के विषय में गहरी भावना हो, तो वे जहाँ कहीं जाएँगे, गहरी भावना उत्पन्न करेंगे। और यदि वे ठण्डे, या हल्के और छिछोरे हों, तो वे अनिवार्य रूप से सारी गहरी भावना को नष्ट कर देते हैं, यहाँ तक कि जागे हुए पापियों में भी। मैं एक बार एक ऐसे व्यक्ति को जानता था जो बहुत चिन्तित थी, परन्तु एक दिन मुझे यह देखकर दुःख हुआ कि उसका पाप-बोध मानो पूरी तरह जाता रहा था। मैंने उससे पूछा कि वह क्या करती रही थी। उसने मुझे बताया कि वह दोपहर के बाद का समय अमुक स्थान पर कुछ धर्म का अंगीकार करनेवालों के बीच बिताती रही थी, यह सोचे बिना कि धर्म का अंगीकार करनेवालों के साथ एक दोपहर बिताने से उसका पाप-बोध मिट जाएगा। परन्तु वे छिछोरे और व्यर्थ बातों में लगे थे, और इस प्रकार उसका पाप-बोध खो गया। और निस्सन्देह उन धर्म का अंगीकार करनेवालों ने अपनी मूर्खता से एक प्राण का नाश कर दिया, क्योंकि उसका पाप-बोध फिर लौटकर नहीं आया।

    कलीसिया से यह माँग की जाती है कि वह पापियों के मन-परिवर्तन के लिए साधनों का उपयोग करे। पापियों के विषय में ठीक-ठीक यह नहीं कहा जा सकता कि वे अपने मन-परिवर्तन के लिए साधनों का उपयोग करते हैं। कलीसिया साधनों का उपयोग करती है। पापी जो करते हैं वह यह है कि वे सत्य के आगे झुक जाएँ, या उसका विरोध करें। पापियों की यह भूल है कि वे सोचते हैं कि वे अपने मन-परिवर्तन के लिए साधनों का उपयोग कर रहे हैं। जागृति का सारा उद्देश्य, और उसकी हर एक बात, इसी के लिए है कि सत्य को आपके मन के सामने रखा जाए, ताकि आप उसे मानें या उसका विरोध करें।

    टिप्पणियाँ।

    1. पहले जागृतियों को आश्चर्यकर्म समझा जाता था। और हमारे समय में भी कुछ लोग ऐसा ही समझते रहे हैं। और दूसरों के विचार इस विषय पर इतने ढीले और असन्तोषजनक हैं कि यदि वे केवल सोचें, तो उन्हें अपने विचारों का बेतुकापन दिखाई दे जाए। लम्बे समय तक कलीसिया यह मानती रही कि जागृति एक आश्चर्यकर्म है, ईश्वरीय सामर्थ्य का ऐसा हस्तक्षेप जिससे उनका कोई लेना-देना नहीं, और जिसे उत्पन्न करने में उनका उतना ही कम हाथ है जितना बादलों की गड़गड़ाहट, या ओलों के तूफान, या भूकम्प को उत्पन्न करने में। केवल कुछ ही वर्षों से पादरी सामान्य रूप से यह मानने लगे हैं कि जागृतियों को ऐसे साधनों के उपयोग से बढ़ाया जाना चाहिए जो विशेष रूप से उसी उद्देश्य के लिए बनाए गए और उसके उपयुक्त हों। न्यू इंग्लैंड में भी यह माना जाता रहा है कि जागृतियाँ ठीक वैसे ही आती हैं जैसे वर्षा की बौछारें आती हैं, कभी एक नगर में, और कभी दूसरे में, और यह कि पादरी और कलीसियाएँ उन्हें उत्पन्न करने के लिए उससे अधिक कुछ नहीं कर सकते जितना वे अपने नगर पर वर्षा की बौछारें लाने के लिए कर सकते हैं, जब वे पड़ोस के नगर पर पड़ रही हों।

    पहले यह माना जाता था कि लगभग पन्द्रह वर्ष में एक बार जागृति आएगी, और जिन सब को परमेश्वर बचाना चाहता है उनका मन-परिवर्तन हो जाएगा, और फिर उन्हें तब तक प्रतीक्षा करनी होगी जब तक जीवन के मंच पर एक और फसल आगे न आ जाए। अन्त में यह समय घटकर पाँच वर्ष रह गया, और वे मानने लगे कि लगभग इतनी बार जागृति हो सकती है।

    मैंने इन पास्टरों में से एक के विषय में एक घटना सुनी है, जो यह मानता था कि लगभग पाँच वर्ष में एक बार जागृति आ सकती है। उसकी मंडली में एक जागृति हो चुकी थी। अगले वर्ष पड़ोस के एक नगर में जागृति हुई, और वह वहाँ प्रचार करने गया, और कई दिन ठहरा रहा, यहाँ तक कि उसका प्राण पूरी तरह उस काम में लग गया। वह शनिवार को घर लौटा, और सब्त (विश्रामदिन) की तैयारी करने के लिए अपने अध्ययन-कक्ष में गया। और उसका प्राण वेदना में था। उसने सोचा कि उसकी मंडली में कितने वयस्क लोग परमेश्वर से बैर रखते हैं—कितने अब तक मन-परिवर्तन के बिना हैं—हर वर्ष कितने लोग मरते हैं—उनमें से इतना भाग बिना मन-परिवर्तन के—यदि पाँच वर्ष के भीतर जागृति न आई, तो परिवारों के इतने वयस्क मुखिया नरक में होंगे। उसने अपनी गणनाएँ कागज़ पर लिखीं, और उन्हें अगले दिन के अपने उपदेश में सम्मिलित किया, और उस भयानक चित्र को देखकर उसका हृदय लहू-लुहान हो रहा था। जैसा मैंने समझा, उसने यह किसी जागृति की आशा से नहीं किया, परन्तु उसने गहराई से अनुभव किया, और अपने लोगों के सामने अपना हृदय उँडेल दिया। और उस उपदेश ने परिवारों के चालीस मुखियाओं को जगा दिया, और उसके बाद एक प्रबल जागृति हुई; और इस प्रकार पाँच वर्ष में एक बार जागृति का उसका सिद्धान्त पूरी तरह धराशायी हो गया।

    इस प्रकार परमेश्वर ने सामान्य रूप से इस सिद्धान्त को उलट दिया है कि जागृतियाँ आश्चर्यकर्म हैं।

    2. परमेश्वर की प्रभुसत्ता के विषय में गलत धारणाओं ने जागृतियों में बहुत बाधा डाली है।

    बहुत से लोगों ने परमेश्वर की प्रभुसत्ता को उससे बहुत भिन्न कोई चीज़ समझ लिया है जो वह वास्तव में है। उन्होंने उसे घटनाओं का, और विशेष करके उसके आत्मा के दान का, ऐसा मनमाना प्रबन्ध समझा है जो धर्म की जागृति को बढ़ाने के लिए साधनों के विवेकपूर्ण उपयोग की सम्भावना को ही समाप्त कर देता है। परन्तु बाइबल से इस बात का कोई प्रमाण नहीं मिलता कि परमेश्वर ऐसी कोई प्रभुसत्ता चलाता है। इसे सिद्ध करने के लिए कोई तथ्य नहीं हैं। परन्तु हर बात यही दिखाती है कि परमेश्वर ने अपने शासन के सब विभागों में—प्रकृति में और अनुग्रह में—साधनों को लक्ष्य के साथ जोड़ दिया है। कोई भी प्राकृतिक घटना ऐसी नहीं जिसमें उसका अपना कार्य सम्मिलित न हो। उसने सृष्टि को किसी विशाल मशीन के समान नहीं बनाया जो उसकी आगे की देखभाल के बिना अपने आप चलती रहे। वह विश्व से अलग नहीं हो गया कि उसे अपने आप काम करने दे। ऐसा मानना तो निरी नास्तिकता है। वह सब पर देखरेख और नियन्त्रण रखता है। और फिर भी प्रकृति की हर घटना साधनों के द्वारा ही घटित हुई है। वह न तो अपना विधान और न अपना अनुग्रह उस प्रकार की प्रभुसत्ता से चलाता है जो साधनों के उपयोग को अनावश्यक कर दे। एक में दूसरे से अधिक प्रभुसत्ता नहीं है।

    और फिर भी कुछ लोग जागृति को बढ़ाने के सब प्रत्यक्ष प्रयत्नों से बुरी तरह घबरा जाते हैं, और वे चिल्ला उठते हैं, “तुम अपने ही बल पर जागृति खड़ी करने का प्रयत्न कर रहे हो। सावधान रहो, तुम परमेश्वर की प्रभुसत्ता में हस्तक्षेप कर रहे हो। अच्छा है कि साधारण ढर्रे पर चलते रहो, और जब परमेश्वर उचित समझे तब उसे जागृति देने दो। परमेश्वर प्रभुसत्ताधारी है, और तुम्हारे लिए केवल इसलिए जागृति खड़ी करने का प्रयत्न करना कि तुम्हें लगता है कि जागृति की आवश्यकता है, बहुत गलत है।” यह ठीक वैसा ही प्रचार है जैसा शैतान चाहता है। और मनुष्य शैतान का काम इससे अधिक प्रभावशाली रीति से नहीं कर सकते कि वे परमेश्वर की प्रभुसत्ता का इस कारण के रूप में प्रचार करें कि हमें जागृति उत्पन्न करने के लिए प्रयत्न नहीं करने चाहिए।

    3. आप उन लोगों की भूल देखते हैं जो यह सोचने लगे हैं कि संसार में धर्म को जागृतियों के बिना अधिक अच्छी रीति से बढ़ाया जा सकता है, और जो धार्मिक जागृति उत्पन्न करने के सब प्रयत्नों को छोड़ देने की ओर झुके हुए हैं। क्योंकि कुछ उदाहरणों में धर्म के विषय में बड़ी उत्तेजनाओं से कुछ बुराइयाँ उत्पन्न होती हैं, इसलिए उनकी राय है कि उन्हें पूरी तरह छोड़ देना ही सबसे अच्छा है। ऐसा नहीं हो सकता, और ऐसा होना भी नहीं चाहिए। यह सच है कि दुरुपयोग का खतरा है। बड़ी धार्मिक उत्तेजनाओं में, जैसे अन्य सब उत्तेजनाओं में, कम या अधिक आनुषंगिक बुराइयों की आशा तो की ही जा सकती है। परन्तु यह इस बात का कोई कारण नहीं कि उन्हें छोड़ दिया जाए। सबसे अच्छी वस्तुओं का भी सदा दुरुपयोग हो सकता है। परमेश्वर के विधान-सम्बन्धी और नैतिक शासनों से भी बड़ी और अनेक प्रकार की बुराइयाँ उत्पन्न हुई हैं। परन्तु इन पहले से देखे हुए विकारों और बुराइयों को उन्हें छोड़ देने के लिए पर्याप्त कारण नहीं माना गया। क्योंकि कुल मिलाकर इन शासनों की स्थापना ही वह सबसे अच्छी बात थी जो सबसे अधिक आनन्द उत्पन्न करने के लिए की जा सकती थी। इसी प्रकार धर्म की जागृतियों के विषय में अनुभव से यह पाया गया है कि संसार की वर्तमान दशा में उनके बिना धर्म को किसी उल्लेखनीय सीमा तक नहीं बढ़ाया जा सकता। जिन बुराइयों की कभी-कभी शिकायत की जाती है, वे जब वास्तविक होती भी हैं, तब भी आनुषंगिक होती हैं, और जागृतियों के द्वारा उत्पन्न भलाई की मात्रा की तुलना में बहुत कम महत्त्व की होती हैं। कलीसिया को एक क्षण के लिए भी यह विचार स्वीकार नहीं करना चाहिए कि जागृतियों को छोड़ा जा सकता है। यह विचार सिय्योन के हितों के लिए हर प्रकार के खतरे से भरा है, मिशनों के कार्य के लिए मृत्यु है, और अपने साथ संसार का सर्वनाश लाता है।

    अन्त में।—मुझे आप लोगों के सामने, जो यहाँ उपस्थित हैं, एक प्रस्ताव रखना है। मैंने जागृतियों पर व्याख्यानों की यह श्रृंखला इस विषय पर अपना कोई अनोखा सिद्धान्त खड़ा करने के लिए आरम्भ नहीं की है। मैं अपना समय और बल केवल आपको शिक्षा देने, आपकी जिज्ञासा को तृप्त करने, और आपको बातचीत करने के लिए कोई विषय देने में नहीं लगाऊँगा। मेरा जागृतियों के विषय में केवल प्रचार करते रहने का कोई विचार नहीं है। मेरा यह उद्देश्य नहीं कि मैं ऐसा प्रचार करूँ कि अन्त में आप कह सकें, “अब हम जागृतियों के विषय में सब कुछ समझ गए हैं,” जबकि आप कुछ भी न करें। परन्तु मैं आपसे एक प्रश्न पूछना चाहता हूँ। आप जागृतियों पर व्याख्यान किसलिए सुनते हैं? क्या आपका यह अभिप्राय है कि जब कभी आपको निश्चय हो जाए कि जागृति को बढ़ाने में आपका कर्तव्य क्या है, तो आप काम में लग जाएँगे और उसे व्यवहार में लाएँगे?

    क्या आप उन निर्देशों का पालन करेंगे जो मैं आपको परमेश्वर के वचन से दूँगा, और उन्हें अपने जीवन में व्यवहार में लाएँगे? क्या आप उन्हें अपने परिवारों, अपने परिचितों, पड़ोसियों पर, और सारे नगर में लागू करेंगे? या आप यह जाड़ा जागृतियों के विषय में सीखने में बिता देंगे, और उनके लिए कुछ भी नहीं करेंगे? मैं चाहता हूँ कि जैसे-जैसे आप जागृतियों के विषय में कोई बात सीखें, वैसे-वैसे आप उसे व्यवहार में लाएँ, और काम में लग जाएँ और देखें कि क्या आप यहाँ पापियों के बीच जागृति को बढ़ा नहीं सकते। यदि आप ऐसा नहीं करेंगे, तो मैं चाहता हूँ कि आप मुझे आरम्भ में ही बता दें, ताकि मुझे अपना बल व्यर्थ न गँवाना पड़े। आपको अभी निर्णय कर लेना चाहिए कि आप ऐसा करेंगे या नहीं। आप जानते हैं कि हम पापियों से कहते हैं कि वे उसी स्थान पर निर्णय करें कि वे सुसमाचार को मानेंगे या नहीं। और हमें आपको इस पर विचार करने के लिए समय देने का, कि आप परमेश्वर की आज्ञा मानेंगे या नहीं, उससे अधिक अधिकार नहीं है जितना पापियों को ऐसा करने देने का है। हम आपसे आग्रह करते हैं कि आप अभी मिलकर परमेश्वर के सामने एक गम्भीर प्रतिज्ञा करें, कि जैसे-जैसे आप सीखेंगे कि आपका कर्तव्य क्या है, वैसे-वैसे आप अपना कर्तव्य पूरा करेंगे, और यह प्रार्थना करें कि वह इस जाड़े में इस कलीसिया पर और सारे नगर पर अपना आत्मा उँडेले।

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