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नए विश्वासियों को शिक्षा देना
“मेरे मेमनों को चरा।” यूहन्ना 21:15
अपने पिछले व्याख्यान में मैंने इसी पाठ पर विचार किया था, और समय की कमी के कारण मुझे उन बहुत-सी बातों को छोड़ देना पड़ा था जिन्हें मैं इस विषय के सम्बन्ध में प्रस्तुत करना चाहता था, अर्थात्
नए विश्वासियों को शिक्षा देना।
आज रात मैं इस विषय को आगे बढ़ाते हुए इन बातों पर ध्यान देना चाहता हूँ,
I. कई और बातें जिनके विषय में नए विश्वासियों को शिक्षा दी जानी चाहिए।
II. यह दिखाना कि कलीसिया को नए विश्वासियों के साथ किस प्रकार व्यवहार करना चाहिए।
III. उन बुराइयों में से कुछ का उल्लेख करना जो मसीही अनुभव की उस अवस्था में दी गई अधूरी शिक्षा से स्वाभाविक रूप से उत्पन्न होती हैं।
I. मैं विषय को वहीं से उठाऊँगा जहाँ मैंने उसे छोड़ा था, और कुछ और ऐसी शिक्षाओं का उल्लेख करूँगा जिनका नए विश्वासियों को दिया जाना महत्त्वपूर्ण है।
1. यह बहुत ही महत्त्वपूर्ण है कि नए विश्वासियों को आरम्भ में ही यह समझा दिया जाए कि धर्म किस बात में है। कदाचित् आपको आश्चर्य होगा कि मैं इस बात का उल्लेख कर रहा हूँ। “क्या! वे नए विश्वासी हैं, और क्या वे यह नहीं जानते कि धर्म किस बात में है?” मैं उत्तर देता हूँ, यदि उन्हें बाइबल से ली गई शिक्षा के अतिरिक्त और कोई शिक्षा न मिली होती, तो वे जान लेते। परन्तु बहुत-से लोगों ने धर्म के विषय में ऐसी धारणाएँ अपना ली हैं कि न केवल नए विश्वासी, बल्कि कलीसिया का एक बड़ा भाग भी यह नहीं जानता कि धर्म किस बात में है—इस प्रकार कि उन्हें उसका स्पष्ट और सुनिश्चित ज्ञान हो। बहुत-से पादरी भी नहीं जानते। मेरा यह अर्थ नहीं कि उनमें कोई धर्म नहीं, क्योंकि उदारता से यह माना जा सकता है कि उनमें है; परन्तु मेरा अर्थ यह है कि वे इस बात में भेद नहीं कर पाते कि धर्म किस बात में है, और यह ठीक-ठीक नहीं बता सकते कि किस बात से सच्चा धर्म बनता है और किस बात से नहीं। यह महत्त्वपूर्ण है कि नए विश्वासियों को सिखाया जाए।
नकारात्मक रूप से, कि धर्म किस बात में नहीं है
(1.) सिद्धान्तों के ज्ञान में नहीं। ज्ञान धर्म के लिये आवश्यक है, परन्तु ज्ञान धर्म नहीं है। शैतान के पास सिद्धान्तों का ज्ञान है, परन्तु उसमें कोई धर्म नहीं। एक मनुष्य के पास चाहे जितना सिद्धान्तों का ज्ञान हो, फिर भी उसमें धर्म का कण भर भी न हो। तौभी कुछ लोगों के इस विषय में बड़े विचित्र विचार हैं, मानो सिद्धान्तों का ज्ञान होना भक्ति में बढ़ोतरी का प्रमाण हो। मैंने एक बार इस प्रकार की एक बात सुनी थी: एक विशेष अवसर पर, जहाँ कुछ नए विश्वासियों ने सिद्धान्तों के ज्ञान में तेज़ी से उन्नति की थी, वहाँ इसे देखनेवाले एक व्यक्ति ने कहा, “ये नए विश्वासी अनुग्रह में कैसे बढ़ रहे हैं!” यहाँ उसने ज्ञान में उन्नति को भक्ति में उन्नति के साथ मिला दिया। सच तो यह था कि उसके पास उनकी अनुग्रह में बढ़ोतरी को परखने का कोई साधन न था, और उनका सिद्धान्तों के ज्ञान में उन्नति करना इस बात का कोई प्रमाण न था।
(2.) उन्हें सिखाया जाना चाहिए कि धर्म कोई पदार्थ नहीं है। वह कोई जड़, या अंकुर, या बीज, या मन में कोई और ऐसी वस्तु नहीं जो स्वयं मन का एक भाग हो। लोग प्रायः धर्म के विषय में ऐसे बोलते हैं मानो वह कोई ऐसी वस्तु हो जो मन में ढकी रह सकती है, जैसे आग की एक चिंगारी राख में ढकी रह सकती है, जो स्वयं को प्रकट नहीं करती और कोई प्रभाव उत्पन्न नहीं करती, फिर भी जीवित रहती है और जैसे ही उघाड़ी जाए, काम करने को तैयार रहती है। और इसी प्रकार वे सोचते हैं कि उनमें धर्म हो सकता है, कोई ऐसी वस्तु जो उनके भीतर बनी रहती है, यद्यपि वे परमेश्वर की आज्ञा मानकर उसे प्रकट नहीं करते। परन्तु उन्हें सिखाया जाना चाहिए कि धर्म का स्वभाव ऐसा नहीं है। वह न तो स्वयं मन का कोई भाग है, न देह का; न वह कोई जड़, या बीज, या चिंगारी है जो बनी भी रहे और छिपी भी रहे और कोई प्रभाव उत्पन्न न करे।
(3.) उन्हें सिखाइए कि धर्म आनन्द-विभोर होने, या परमानन्द, या भावनाओं की ऊँची उड़ानों में नहीं है। जहाँ धर्म होता है वहाँ ये बहुत मात्रा में हो सकते हैं। परन्तु यह समझ लेना चाहिए कि ये सब अनैच्छिक भावनाएँ हैं, और जहाँ कोई धर्म नहीं वहाँ भी ये पूरी शक्ति के साथ हो सकती हैं। ये केवल कल्पना की क्रियाएँ हो सकती हैं, जिनमें सच्ची धार्मिक भावना बिलकुल भी न हो। लोग इन्हें इस सीमा तक अनुभव कर सकते हैं कि धर्म के विषय पर भी परमानन्द में सचमुच मूर्छित हो जाएँ, और फिर भी उनमें कोई धर्म न हो। मैं एक ऐसे व्यक्ति को जानता हूँ जो केवल परमेश्वर के स्वाभाविक गुणों को—उसकी सामर्थ और बुद्धि को, जैसी वे तारों भरे आकाश में प्रकट होती हैं—देखकर आनन्द से लगभग बेसुध हो गया, और फिर भी उस व्यक्ति में कोई धर्म न था। धर्म परमेश्वर की आज्ञाकारिता है, अर्थात् प्राण का परमेश्वर की इच्छा के प्रति स्वेच्छा से अधीन होना।
(4.) न ही धर्म सभा में जाने, या बाइबल पढ़ने, या प्रार्थना करने, या उन अन्य कामों में है जिन्हें साधारणतः धार्मिक कर्तव्य कहा जाता है। “धार्मिक कर्तव्य” यह वाक्यांश ही नए विश्वासियों के शब्दकोश से काट दिया जाना चाहिए। उन्हें यह जता दिया जाना चाहिए कि ये काम धर्म नहीं हैं। बहुत-से लोग कुछ ऐसे कामों को करने में बड़े कठोर हो जाते हैं जिन्हें वे धार्मिक कर्तव्य कहते हैं, और समझते हैं कि यही धार्मिक होना है; जबकि वे जीवन के उन साधारण कर्तव्यों के विषय में लापरवाह रहते हैं जिनसे वास्तव में भक्ति का जीवन बनता है। प्रार्थना भक्ति की अभिव्यक्ति और भक्ति का कार्य हो सकती है, और नहीं भी हो सकती। गिरजाघर या प्रार्थना-सभा में जाना या तो एक साधन, या एक कार्य, या भक्तिपूर्ण भावना की अभिव्यक्ति माना जा सकता है; परन्तु इन्हें करने से कोई मनुष्य मसीही नहीं बन जाता, और इनमें बड़ी कठोरता और उत्साह हो सकता है, और फिर भी धर्म का कण भर भी न हो। यदि नए विश्वासियों को भेद करना न सिखाया जाए, तो वे यह सोचने लग सकते हैं कि जिन्हें धार्मिक कर्तव्य कहा जाता है उनमें कोई विशेष बात है, और यह कल्पना कर सकते हैं कि उनमें बहुत धर्म है क्योंकि वे कुछ ऐसे कामों में बढ़-चढ़कर हैं जिन्हें साधारणतः धार्मिक कर्तव्य कहा जाता है, यद्यपि उसी समय वे ईमानदारी, या विश्वासयोग्यता, या समय की पाबन्दी, या संयम, या उन अन्य बातों में बहुत कमज़ोर हो सकते हैं जिन्हें वे अपने साधारण कर्तव्य कहना पसन्द करते हैं। वे कुछ बातों में बहुत बारीकी बरत सकते हैं, पोदीने और सौंफ और जीरे का दसवाँ अंश दे सकते हैं, और फिर भी व्यवस्था की गम्भीर बातों को, अर्थात् न्याय और परमेश्वर के प्रेम को, छोड़ सकते हैं।
(5.) धर्म भले काम करने की इच्छाओं में नहीं है। जो इच्छाएँ चुनाव और कार्य में परिणत नहीं होतीं, वे सद्गुणपूर्ण नहीं हैं। न ही ऐसी इच्छाएँ अनिवार्य रूप से दुर्गुणपूर्ण हैं। वे कुछ वस्तुओं को देखकर मन में अनैच्छिक रूप से उठ सकती हैं, परन्तु जब तक वे कोई ऐच्छिक कार्य उत्पन्न नहीं करतीं, तब तक वे नाड़ी की धड़कन से अधिक सद्गुणपूर्ण या दुर्गुणपूर्ण नहीं हैं—सिवाय उन स्थितियों के जहाँ हमने स्वेच्छा से अपने आपको ऐसी परिस्थितियों में डालकर जो उन्हें उभारती हैं, परोक्ष रूप से उन्हें उत्पन्न होने दिया हो। पृथ्वी का सबसे दुष्ट मनुष्य भी पवित्रता की प्रबल इच्छाएँ रख सकता है। क्या आपने कभी इस पर विचार किया है? वह स्पष्ट देख सकता है कि पवित्रता ही सुख का एकमात्र और अनिवार्य साधन है, और स्वाभाविक रूप से वह उसकी इच्छा करता है। डर है कि बहुत-से लोग इस धारणा से अपने आपको धोखा दे रहे हैं कि सुख के साधन के रूप में पवित्रता की इच्छा करना ही धर्म है। निस्सन्देह बहुत-से लोग ऐसी इच्छाओं के लिये अपने आपको बड़ा श्रेय देते हैं जो कभी सही चुनाव में परिणत नहीं होतीं। वे अपना कर्तव्य करने की इच्छा अनुभव करते हैं, परन्तु उसे करना चुनते नहीं, क्योंकि कुल मिलाकर उसे न करने की उनकी इच्छाएँ अब भी अधिक प्रबल हैं। ऐसी इच्छाओं में कोई सद्गुण नहीं। परमेश्वर की दृष्टि में सद्गुणपूर्ण होने के लिये किसी कार्य या इच्छा का इच्छा-शक्ति का कार्य होना आवश्यक है। लोग प्रायः इस विषय पर बड़ी बेतुकी बातें करते हैं, मानो उनकी इच्छाओं में, जब तक वे केवल इच्छाएँ ही बनी रहें, कोई भलाई हो। “मुझे लगता है कि मैं ऐसा-ऐसा करने की इच्छा रखता हूँ।” परन्तु क्या आप उसे करते हैं? “ओह, नहीं, परन्तु मैं प्रायः उसे करने की इच्छा अनुभव करता हूँ।” यह व्यावहारिक नास्तिकता है।
किसी व्यक्ति की चाहे जो भी इच्छाएँ हों, यदि वे वास्तविक चुनाव और कार्य में नहीं ढलतीं, तो वे सद्गुणपूर्ण नहीं हैं। और इच्छा की कोई भी मात्रा अपने आप में सद्गुणपूर्ण नहीं है। यदि यह विचार प्रमुख बनाया जा सके और मनुष्यों के मन में पूरी तरह जमा दिया जा सके, तो सम्भवतः यह आधी कलीसिया की आशाओं को नष्ट कर देगा, जो परमेश्वर के लिये कुछ भी न करते हुए अपनी अच्छी इच्छाओं के सहारे जी रहे हैं।
(6.) उन्हें यह समझाया जाना चाहिए कि जो कुछ स्वार्थपूर्ण है, वह धर्म नहीं है। उनकी चाहे जो भी इच्छाएँ हों, और वे चाहे जो भी चुनाव और कार्य करें, यदि अन्ततः उनका कारण स्वार्थपूर्ण है, तो उनमें कोई धर्म नहीं। यदि किसी मनुष्य का उद्देश्य स्वार्थपूर्ण है, तो वह प्रार्थना करने, या बाइबल पढ़ने, या सभा में जाने में भी उतना ही पाप कर सकता है जितना किसी और काम में। मान लीजिए कि कोई मनुष्य केवल अपना सुख बढ़ाने के उद्देश्य से प्रार्थना करता है। क्या वह धर्म है? वह परमेश्वर को अपना सर्वशक्तिमान सेवक बनाने के प्रयत्न के सिवाय और क्या है? यह एक बड़ा सौदा करने का प्रयत्न है, जिसमें सारे विश्व को, परमेश्वर समेत, उसे सुखी बनाने के काम में लगाया जाए। यह दुष्टता की चरम सीमा है। यह भक्ति से इतनी दूर है कि वास्तव में यह सबसे बड़ी दुष्टता है।
(7.) धर्म के रूप में परमेश्वर को कोई भी बात ग्रहणयोग्य नहीं, जब तक वह मन लगाकर, परमेश्वर को प्रसन्न करने के लिये न की जाए। किसी भी बाहरी कार्य में कोई भलाई नहीं, या ऐसी कोई बात नहीं जिसे परमेश्वर स्वीकार करे, जब तक वह सही उद्देश्यों से और मन से न किया जाए।
(a) नए विश्वासियों को पूरी तरह और सकारात्मक रूप से सिखाया जाना चाहिए कि सारा धर्म मन से परमेश्वर की आज्ञा मानने में है। सारा धर्म ऐच्छिक कार्य में है। जो कुछ पवित्र है, जो कुछ परमेश्वर की दृष्टि में मनोहर है, जो कुछ उचित रूप से धर्म कहलाता है, वह सब ऐच्छिक कार्य में, अर्थात् स्वेच्छा से मन से परमेश्वर की इच्छा का पालन करने में है।
2. नए विश्वासियों को सिखाया जाना चाहिए कि आत्म-त्याग का कर्तव्य सुसमाचार की प्रमुख विशेषताओं में से एक है। उन्हें समझना चाहिए कि वे उससे अधिक भक्त बिलकुल नहीं हैं जितना वे प्रतिदिन क्रूस उठाने और मसीह के लिये अपना इनकार करने को तैयार हैं। कलीसिया में आत्म-त्याग बहुत ही कम है, और इसका कारण यह है कि नए विश्वासियों को शिक्षा देते समय इस कर्तव्य को इतना अधिक भुला दिया जाता है। उन्हें कितनी कम बार बताया जाता है कि आत्म-त्याग मसीही धर्म की प्रमुख विशेषता है। परोपकारी कार्यों के लिये निवेदन करते समय आप कितनी बार पाएँगे कि पादरी और एजेंट मसीहियों से उस कार्य को आगे बढ़ाने के लिये अपना इनकार करने को कहते तक नहीं। वे उनसे केवल वह देने को कहते हैं जिसे वे आसानी से अलग कर सकें, या दूसरे शब्दों में, प्रभु को वह चढ़ाने को जिसमें उनका कुछ भी खर्च न हो। कैसी घृणित बात! वे केवल बचे हुए को माँगते हैं, जिसकी उन्हें आवश्यकता नहीं, जिसे वे बिना किसी कठिनाई के दे सकते हैं। इस प्रकार के दान में कोई धर्म नहीं। कोई मनुष्य किसी परोपकारी कार्य के लिये एक लाख डॉलर दे सकता है, और उसमें कोई धर्म न होगा, यदि वह उसे बिना किसी कठिनाई के दे सकता था और उसमें कोई आत्म-त्याग न था। यीशु मसीह ने पापियों को बचाने के लिये आत्म-त्याग किया। इसी प्रकार परमेश्वर पिता ने अपने पुत्र को हमारे लिये मरने को देने में, और हमें छोड़ देने में, और हमारी हठधर्मिता को सहने में आत्म-त्याग किया है। पवित्र आत्मा ऐसे अपवित्र प्राणियों को परमेश्वर के पास लाने के लिये उनके साथ संघर्ष करने को झुककर आत्म-त्याग करता है। स्वर्गदूत इस संसार की रखवाली करने में आत्म-त्याग करते हैं। प्रेरितों ने आत्म-त्याग के द्वारा जातियों के बीच मसीही धर्म को स्थापित किया। और क्या हम बिना किसी आत्म-त्याग के धार्मिक होने की सोचें? क्या हम अपने आपको मसीही, मसीह के अनुयायी, पवित्र आत्मा के मन्दिर कहें, और प्रेरितों के साथ संगति का दावा करें, जबकि हमने मसीह के राज्य को बढ़ाने के लिये कभी अपने आपको किसी ऐसी वस्तु से वंचित नहीं किया जो हमारे व्यक्तिगत सुख-भोग को बढ़ाती? नए विश्वासियों को यह दिखाया जाना चाहिए कि जब तक वे अपने आपको परमेश्वर के लिये पूरी तरह लगा देने को, और मसीह के लिये प्राण और सब कुछ बलिदान करने को तैयार नहीं हैं, तब तक उनमें मसीह का आत्मा नहीं, और वे उसके जन नहीं हैं।
3. उन्हें सिखाया जाना चाहिए कि पवित्रीकरण क्या है। “क्या!” आप कहेंगे, “क्या सब मसीही यह नहीं जानते कि पवित्रीकरण क्या है?” नहीं, बहुत-से नहीं जानते। बहुत-से लोग यह समझदारी से बताने में उतने ही असमर्थ होंगे कि पवित्रीकरण क्या है, जितने यह बताने में कि धर्म क्या है। यदि इस नगर के हर एक धर्म का अंगीकार करनेवाले से यह प्रश्न पूछा जाए कि पवित्रीकरण क्या है? तो मुझे सन्देह है कि दस में से एक भी सही उत्तर देगा। वे ठीक वैसे ही भूल करेंगे जैसे वे तब करते हैं जब यह बताने का प्रयत्न करते हैं कि धर्म क्या है, और उसके विषय में ऐसे बोलते हैं मानो वह प्राण में सोई हुई कोई वस्तु हो, कोई ऐसी वस्तु जो भीतर डाल दी गई है और वहाँ पड़ी रहती है, कोई ऐसी वस्तु जिसका अभ्यास किया जाए या न किया जाए, फिर भी वह उनमें बनी रहे। इसी प्रकार वे पवित्रीकरण के विषय में ऐसे बोलते हैं मानो वह किसी मलिनता को धो डालने, या किसी भौतिक अशुद्धता को निकाल फेंकने के समान हो। या वे उसके विषय में ऐसे बोलेंगे मानो मन की शक्तियाँ पाप में डूबी हुई हों, और पवित्रीकरण उनके दागों को निकालना हो। यही कारण है कि कुछ लोग पवित्रीकरण के लिये प्रार्थना करते हैं, और पाप का अभ्यास करते रहते हैं, स्पष्ट रूप से यह समझकर कि पवित्रीकरण कोई ऐसी वस्तु है जो आज्ञाकारिता से पहले आती है। उन्हें सिखाया जाना चाहिए कि पवित्रीकरण कोई ऐसी वस्तु नहीं जो आज्ञाकारिता से पहले आती हो, प्राण के स्वभाव या बनावट में कोई परिवर्तन नहीं। परन्तु पवित्रीकरण आज्ञाकारिता है, और एक बढ़ती हुई प्रक्रिया के रूप में, वह परमेश्वर की आज्ञा को अधिकाधिक सिद्धता से और निरन्तर मानने में है।
4. नए विश्वासियों को ऐसी शिक्षा दी जानी चाहिए कि वे समझ सकें कि स्थिर बने रहना क्या है। यह आश्चर्य की बात है कि लोग स्थिर बने रहने के विषय में कैसी बातें करते हैं। मानो स्थिर बने रहने का सिद्धान्त यह हो कि “एक बार अनुग्रह में, तो सदा अनुग्रह में,” या “एक बार मन-परिवर्तन हुआ, तो स्वर्ग जाना निश्चित।” स्थिर बने रहने का यह अर्थ नहीं है। सच्चा अर्थ यह है कि यदि किसी मनुष्य का सचमुच मन-परिवर्तन हुआ है, तो वह परमेश्वर की आज्ञा मानता रहेगा। और परिणामस्वरूप, वह निश्चय स्वर्ग जाएगा। परन्तु यदि किसी व्यक्ति के मन में यह विचार बैठ जाए कि क्योंकि उसका मन-परिवर्तन हो गया है, इसलिए वह निश्चय स्वर्ग जाएगा, तो वह मनुष्य लगभग निश्चय ही नरक जाएगा।
5. नए विश्वासियों को हर बात में धार्मिक होना सिखाया जाना चाहिए। उन्हें जीवन के हर क्षेत्र में और अपने सब कामों में धार्मिक होने का लक्ष्य रखना चाहिए। यदि वे यह लक्ष्य नहीं रखते, तो उन्हें समझ लेना चाहिए कि उनमें कोई धर्म नहीं है। यदि परमेश्वर की सब आज्ञाओं को मानना उनका इरादा और लक्ष्य नहीं है, तो वे भक्ति का क्या दावा कर सकते हैं? जो कोई सारी व्यवस्था का पालन करता है परन्तु एक ही बात में चूक जाए, तो वह सब बातों में दोषी ठहरा। वह न्याय से पूरे दण्ड के अधीन है। यदि वह किसी एक बात में आदतन परमेश्वर की आज्ञा नहीं मानता, तो वास्तव में वह किसी भी बात में उसकी आज्ञा नहीं मानता। परमेश्वर की आज्ञाकारिता मन की दशा में है। वह परमेश्वर की आज्ञा मानने को तैयार होना है; इस बात के लिये तैयार होना कि सब बातों में परमेश्वर ही राज्य करे। परन्तु यदि कोई मनुष्य किसी एक बात में आदतन परमेश्वर की आज्ञा नहीं मानता, तो वह मन की ऐसी दशा में है जो किसी और बात में आज्ञाकारिता को असम्भव बना देती है। यह कहना बेतुका है कि कुछ बातों में मनुष्य परमेश्वर के अधिकार का आदर करके उसकी आज्ञा मानता है, और कुछ अन्य बातों में आज्ञा मानने से इनकार करता है। सच तो यह है कि परमेश्वर की आज्ञाकारिता मन की आज्ञाकारी दशा में है, अर्थात् परमेश्वर के अधिकार और आज्ञाओं को और सब बातों से बढ़कर मानने में। इसलिए यदि कोई व्यक्ति कुछ बातों में आज्ञा मानता हुआ दिखाई देता है, और फिर भी किसी एक बात में लगातार और जान-बूझकर आज्ञा नहीं मानता, तो वह धोखे में है। वह एक बात में चूकता है, और इससे सिद्ध होता है कि वह सब बातों में दोषी है; दूसरे शब्दों में, कि वह मन से बिलकुल भी आज्ञा नहीं मानता। कोई मनुष्य आधा समय प्रार्थना में बिता सकता है और फिर भी उसमें कोई धर्म न हो; यदि वह परमेश्वर की आज्ञाओं को नहीं मानता, तो उसकी प्रार्थना ही परमेश्वर को घृणित लगेगी। “जो अपना कान व्यवस्था सुनने से फेर लेता है, उसकी प्रार्थना घृणित ठहरती है।” क्या आप यह सुनते हैं? यदि कोई मनुष्य परमेश्वर की व्यवस्था मानने से इनकार करता है, यदि वह किसी एक कर्तव्य को पूरा करने से इनकार करता है, तो वह प्रार्थना नहीं कर सकता, उसमें कोई धर्म नहीं, उसकी भक्ति ही घृणित है।
6. उचित शिक्षा के द्वारा नए विश्वासियों को आसानी से “सब बातों में संयमी” बनाया जा सकता है। फिर भी नए विश्वासियों के सम्बन्ध में इस विषय की बहुत उपेक्षा की जाती है, और कलीसियाओं में इसे लगभग भुला दिया गया है। कलीसियाओं में बहुत अधिक असंयम है। मेरा अर्थ विशेष रूप से असंयमपूर्ण पीने से नहीं, बल्कि खाने में, और साधारणतः रहन-सहन में असंयम से है। वास्तव में कलीसियाओं में इसके विषय में विवेक बहुत कम है। और इसलिए इस बात में सुधार की प्रगति इतनी धीमी है। प्रकाशित विवेक के सिवाय और कुछ भी स्थायी सुधार को आगे नहीं बढ़ा सकता। दस वर्ष पहले अधिकांश पादरी तेज़ शराब का सेवन करते थे, और अपने मित्रों और अपने सेवक भाइयों का सत्कार करने के लिये उसे अपने घरों में रखते थे। और कलीसियाओं के सदस्यों का बड़ा भाग भी ऐसा ही करता था। अब दोनों में से बहुत थोड़े हैं—सिवाय उनके जो सचमुच पियक्कड़ हैं—जो ऐसा करेंगे। परन्तु फिर भी बहुत-से ऐसे हैं जो बिना किसी झिझक के दाखमधु का सेवन करते हैं। कुछ पादरी, और बहुत-से अंगीकार करनेवाले, ऐसा दाखमधु पी जाते हैं जिसमें उतनी ही तेज़ शराब होती है जितनी पानी मिली ब्रांडी में। यह असंयम है। तम्बाकू चबाना और पीना केवल असंयम के काम हैं। यदि वे इन मात्र उत्तेजक पदार्थों का सेवन तब करते हैं जब इसकी कोई आवश्यकता नहीं, तो यह असंयम के सिवाय और क्या है? यह सब बातों में संयमी होना नहीं है। जब तक मसीहियों में इस विषय पर विवेक न जागे, और उन्हें यह अनुभव न कराया जाए कि उन्हें किसी भी बात में असंयमी होने का कोई अधिकार नहीं, तब तक वे धर्म में बहुत थोड़ी उन्नति करेंगे। यह भली-भाँति ज्ञात है, या होना चाहिए, कि चाय और कॉफ़ी में कोई पोषण नहीं। वे मात्र उत्तेजक पदार्थ हैं। वे बिना पचे शरीर में से निकल जाती हैं। जो दूध और चीनी आप उनमें डालते हैं, वे पौष्टिक हैं। और यदि आप उन्हें रम में मिलाकर मिल्क-पंच बना लें, तब भी वे उतने ही पौष्टिक होंगे। परन्तु चाय और कॉफ़ी से कोई पोषण नहीं मिलता। और फिर भी मैं कहने का साहस करता हूँ कि इस नगर के अधिकांश परिवार एक वर्ष में अपनी चाय और कॉफ़ी पर उससे अधिक खर्च करते हैं जितना वे संसार को नरक से बचाने के लिये देते हैं। सम्भवतः पूरी-पूरी कलीसियाओं के विषय में भी यही सच है। परोपकारी संस्थाओं के एजेंट तक मिशनरी और अन्य संस्थाओं के समर्थन के लिये धन माँगते हुए कलीसियाओं में घूमने का साहस करते हैं, और फिर भी चाय, कॉफ़ी, और कुछ स्थितियों में तम्बाकू का सेवन करते हैं। विचित्र बात है! इस समय इस नगर में धन माँगने के काम पर लगा हुआ एक एजेंट है, जो इन तीनों निकम्मे से भी बुरे उत्तेजक पदार्थों का सेवन करता है। और इससे बढ़कर, वह सुसमाचार का सेवक है! निस्सन्देह बहुत-से लोग मात्र असंयम पर उससे पाँच गुना अधिक खर्च कर रहे हैं जितना वे संसार को बचाने के हर प्रयत्न के लिये देते हैं। यदि कलीसिया को यह जताया जा सके कि वे उन वस्तुओं पर कितना खर्च करते हैं जो मात्र विष हैं और कुछ नहीं, तो वे चकित रह जाएँगे। बहुत-से लोगों के साथ बैठकर बात कीजिए, और वे दृढ़ता से यह कहेंगे कि वे इन उत्तेजक पदार्थों के बिना, इन विषों के बिना, काम नहीं चला सकते, और वे इन्हें नहीं छोड़ सकते—नहीं, संसार को अनन्त दण्ड से छुड़ाने के लिये भी नहीं। और बहुत बार, जैसे ही तर्क उनके विवेक को चुभने लगता है, वे तर्क किए जाने पर सचमुच क्रोध दिखाने लगते हैं। ओह, कलीसिया कब तक मासिक संयुक्त प्रार्थना-सभा में अपना कपटी मुख दिखाती रहेगी, और परमेश्वर से संसार को बचाने की प्रार्थना करती रहेगी, जबकि वह वास्तव में केवल असंयम पर उससे पाँच गुना अधिक फेंक रही है जितना वह संसार को बचाने के लिये देगी। आप में से कुछ लोग सोच सकते हैं कि ये छोटी बातें हैं, और चाय और कॉफ़ी के विरुद्ध भाषण देना मंच की गरिमा से बिलकुल नीचे है। परन्तु मैं आपसे कहता हूँ कि यदि आप इन्हें छोटी बातें समझते हैं तो यह आपकी बड़ी भूल है, जबकि ये कलीसिया के कपट और लालसा को प्रकट करके उसे परमेश्वर की दृष्टि में घृणित बना देती हैं। यहाँ एक व्यक्ति है जो दावा करता है कि उसने यीशु मसीह की सेवा के लिये अपने आपको दे दिया है, और फिर भी वह अपनी किसी प्रिय लालसा का इनकार करने से इनकार करता है, और फिर जाकर प्रार्थना करता है, “हे प्रभु, संसार को बचा; हे प्रभु, तेरा राज्य आए।” मैं आपसे कहता हूँ कि यह कपट है। क्या ऐसी प्रार्थनाएँ सुनी जाएँगी? जब तक मनुष्य अपना इनकार करने को तैयार न हों, तब तक मैं ऐसे इतने अंगीकार करनेवालों की प्रार्थनाओं के लिये, जो सारे संयुक्त राज्य अमेरिका को ढँक लें, एक कौड़ी भी न दूँगा।
ये बातें नए विश्वासियों को सिखाई जानी चाहिए। कलीसिया में यह स्थिति आनी ही चाहिए कि मनुष्य तब तक मसीही न कहलाएँ जब तक वे मसीह के लिये अपना दाहिना हाथ काट डालने, और अपनी दाहिनी आँख निकाल फेंकने, और अपना इनकार करने को तैयार न हों। छोटी बात? देखिए, यह प्रार्थना की आत्मा को कैसे विषैला कर देती है? देखिए, यह प्राण को कैसे नीचा और विषयी बना देती है! क्या यह मंच की गरिमा से नीचे की कोई तुच्छ बात है? जबकि एक या दूसरे प्रकार के ये असंयमपूर्ण भोग-विलास कलीसिया को उस सब से पाँच गुना, यदि पचास गुना नहीं, अधिक महँगे पड़ते हैं जो वे संसार के उद्धार के लिये करते हैं।
हाल ही में एक अनुमान लगाया गया है, जिससे पता चलता है कि संयुक्त राज्य अमेरिका प्रति वर्ष सत्तर लाख डॉलर की कॉफ़ी का उपभोग करता है; और कौन नहीं जानता कि इसका बड़ा भाग कलीसिया ही उपभोग करती है। और फिर भी गम्भीर पादरी और मसीही कलीसियाओं के सदस्य धन की इस भारी बरबादी का समर्थन करते हुए दिखाई देने में लज्जित नहीं होते; जबकि उसी समय बेचारे अन्यजाति लोग आकाश की हर हवा के साथ सहायता के लिये अपनी वेदनापूर्ण पुकार भेज रहे हैं। स्वर्ग ऊपर से पुकारता है, “जाकर सारी सृष्टि के लोगों को सुसमाचार प्रचार करो।” नरक नीचे से कराहता है, और स्वर्ग, पृथ्वी और नरक से दस हज़ार आवाज़ें पुकार उठती हैं, “संसार को बचाने के लिये कुछ करो!” अभी करो! ओह, अभी, नहीं तो तुम्हारी उपेक्षा के कारण लाखों और लोग नरक में होंगे। और ओह, गत में यह न बताना, कि कलीसिया, सेवकाई, संसार को बचाने के लिये अपनी लालसाओं का भी इनकार नहीं करेंगे। क्या यही मसीहियत है? आपको मसीह के धन को ऐसे उद्देश्य के लिये उपयोग करने का क्या अधिकार है? क्या आप भण्डारी हैं? आपको यह छूट किसने दी? सावधान रहिए, ऐसा न हो कि अन्त में यह पाया जाए कि आपने आज्ञाकारिता से बढ़कर अपनी तृप्ति को चुना, और “अपने पेट को अपना ईश्वर” बना लिया।
इन बातों को प्रभावशाली ढंग से सिखाने का समय तब है जब वे नए विश्वासी हों। यदि तब उन्हें ठीक से न सिखाया जाए, यदि उनमें कोई गलत आदत पड़ जाए, और वे आरामतलब, आत्म-भोगी रहन-सहन के साथ आरम्भ करें, तो ऐसा विरले ही होता है कि उनका कभी पूरी तरह सुधार हो। मैंने पुराने अंगीकार करनेवालों से इन विषयों पर बातचीत की है, और अपनी लालसाओं को पूरा करने में उनकी अड़ियल हठ को देखकर चकित रह गया हूँ। और मुझे निश्चय है कि कलीसिया इस आलस्य से तब तक कभी ऊपर नहीं उठ सकती जब तक नए विश्वासियों को उनके धार्मिक जीवन के आरम्भ में ही विश्वासयोग्यता से सब बातों में संयमी होना न सिखाया जाए।
7. उन्हें सिखाया जाना चाहिए कि उनके सारे व्यापार में ठीक उतना ही धर्म हो जितना प्रार्थना में, या सभा में जाने में होता है। उन्हें अपने सब दैनिक कामों में ठीक उतना ही पवित्र, उतना ही सचेत, ठीक उतनी ही एकाग्रता से परमेश्वर की महिमा का लक्ष्य रखनेवाला, ठीक उतना ही सच्चा और गम्भीर होना चाहिए, जितना वे तब होते हैं जब वे अनुग्रह के सिंहासन के पास आते हैं। यदि वे ऐसे नहीं हैं, तो उनके सब्त के दिन के कार्य घृणित ठहरेंगे।
8. उन्हें सिखाया जाना चाहिए कि उनके लिये ठीक उतना ही पवित्र होना आवश्यक है जितना वे पादरियों का होना उचित समझते हैं। बहुत समय से यह धारणा रही है कि पादरी पवित्र होने और आत्म-त्याग का अभ्यास करने के लिये बाध्य हैं। और वे हैं भी। परन्तु यह विचित्र है कि लोग यह समझें कि पादरी दूसरे लोगों से अधिक पवित्र होने के लिये बाध्य हैं। किसी पादरी को ओछापन दिखाते, या फ़ैशन के पीछे भागते, या क्रोधित होते, या किसी शानदार घर में रहते, या बग्घी में सवारी करते देखकर उन्हें धक्का लगेगा। ओह, यह तो भयानक है। पादरी को यह शोभा नहीं देता। सचमुच! पादरी की पत्नी ऐसा बढ़िया बोनट, या ऐसी रेशमी शॉल पहने! ओह, नहीं। परन्तु किसी साधारण सदस्य में या साधारण सदस्य की पत्नी में वे इन सब बातों को कुछ भी नहीं समझते। वह तो कोई अपराध ही नहीं। मैं यह नहीं कह रहा कि ये बातें पादरी को शोभा देती हैं; मैं जानता हूँ कि नहीं देतीं। परन्तु परमेश्वर की दृष्टि में वे पादरी को ठीक उतनी ही शोभा देती हैं जितनी किसी साधारण सदस्य को। आपको व्यर्थता और मूर्खता और घमण्ड में लिप्त होने का किसी पादरी से अधिक अधिकार नहीं। क्या आप पवित्र किए बिना स्वर्ग जा सकते हैं? क्या आप परमेश्वर के लिये जीए बिना, और अपना सब कुछ उसकी महिमा के लिये किए बिना पवित्र हो सकते हैं? मैंने ऐसे लोगों को, जो भले होने का दावा करते थे, पादरियों के बड़े वेतन पाने और खर्चीले ढंग से रहने के विरुद्ध बोलते सुना है, जबकि वे स्वयं वास्तव में अपने परिवारों के भरण-पोषण पर किसी भी पादरी से कहीं अधिक धन खर्च कर रहे थे। यदि कोई पादरी उस ढंग से रहे जिस ढंग से इस नगर में धर्म का अंगीकार करनेवाले और कलीसियाओं के प्राचीन रह रहे हैं, तो उसके विषय में क्या सोचा जाएगा? अरे, हर कोई कहेगा कि वे कपटी हैं। परन्तु किसी साधारण सदस्य का परमेश्वर का धन अपनी लालसाओं को पूरा करने, या संसार को, या अपने परिवार को प्रसन्न करने में खर्च करना ठीक उतना ही कपट का प्रमाण है जितना किसी पादरी का ऐसा ही करना। हमारे कुछ अग्रणी साधारण सदस्यों को यह कहते सुनना दुःखदायी है कि पादरियों को बड़ा वेतन देना और उन्हें खर्चीले ढंग से रहने देना धर्म के लिये अपमानजनक है, जबकि यह तथ्य है कि उनके अपने खर्च, उनके परिवारों के सदस्यों की संख्या और उनके यहाँ आनेवाले अतिथियों के अनुपात में, किसी भी पादरी के खर्च से कहीं अधिक हैं। यह सब उन मूलतः गलत धारणाओं से उत्पन्न होता है जो उन्होंने नए विश्वासी रहते हुए अपना ली थीं। नए विश्वासियों को यह आशा रखना सिखाया गया है कि सारा धर्म, विशेषकर सारा आत्म-त्याग, पादरियों में ही होगा, और जब तक यह चलता रहेगा तब तक कोई आशा नहीं कि कलीसिया कभी परमेश्वर की महिमा के लिये, या संसार के मन-परिवर्तन के लिये बहुत कुछ करेगी। बाइबल में इस सब की कोई बात नहीं। परमेश्वर ने कहाँ कहा है, “हे पादरियो, तुम अपने सारे मन और प्राण और बुद्धि और शक्ति से परमेश्वर से प्रेम रखो,” या “हे पादरियो, तुम जो कुछ करो, सब परमेश्वर की महिमा के लिये करो?” यह सब से समान रूप से कहा गया है, और जो कोई किसी कर्तव्य या आत्म-त्याग से, किसी सचेतता या संयम से, उसे पादरियों पर डालकर अपने आपको छुड़ाने का प्रयत्न करता है, या जो अपने लिये पवित्र जीवन का उससे नीचा स्तर अपनाने का साहस करता है जितना वह किसी पादरी के लिये उचित समझता है, वह अपने आपको कपटी सिद्ध करने, और नरक में अपनी मूर्खता का दण्ड भरने के बड़े खतरे में है।
नए विश्वासियों को दी गई शिक्षा पर बहुत कुछ निर्भर है। यदि एक बार उन्हें यह समझने की आदत पड़ जाए कि वे उन बातों में लिप्त हो सकते हैं जिनकी वे किसी पादरी में निन्दा करेंगे, तो दस में से नौ सम्भावना है कि वे उससे कभी न निकलेंगे।
8. उन्हें सिद्ध होने का लक्ष्य रखना चाहिए। हर एक नए विश्वासी को सिखाया जाना चाहिए कि यदि बिना पाप के जीना उसका उद्देश्य नहीं है, तो उसने अभी धार्मिक होना आरम्भ ही नहीं किया। धर्म परमेश्वर से सर्वोच्च प्रेम और परमेश्वर की आज्ञा मानने के लिये मन के सर्वोच्च उद्देश्य या प्रवृत्ति के सिवाय और क्या है? यदि यह नहीं है, तो कोई धर्म है ही नहीं। सिद्ध होने का दावा करना एक बात है, और यह स्वीकार करना और अनुभव करना कि आपको सिद्ध होना चाहिए, दूसरी बात है। यह कहना एक बात है कि मनुष्यों को सिद्ध होना चाहिए, और यदि वे ऐसा चाहें तो हो सकते हैं, और यह कहना दूसरी बात है कि वे सिद्ध हैं। यदि कोई यह कहने को तैयार हैं कि वे सिद्ध हैं, तो मुझे केवल इतना कहना है, वे इसे सिद्ध करें। यदि वे ऐसे हैं, तो मैं आशा करता हूँ कि वे अपने कामों से इसे दिखाएँगे, अन्यथा हम कभी विश्वास नहीं कर सकते कि वे सिद्ध हैं।
परन्तु सब का यह कर्तव्य है कि वे सिद्ध हों और परमेश्वर की पूर्ण, निरन्तर और सर्वव्यापी आज्ञाकारिता का संकल्प करें। पूरी तरह परमेश्वर के लिये जीना और उसकी सब आज्ञाओं को मानना उनका निरन्तर उद्देश्य होना चाहिए। उन्हें ऐसे जीना चाहिए कि यदि वे पाप करें तो वह एक असंगति, एक अपवाद, एक अकेली घटना हो, जिसमें वे अपने जीवन के स्थिर और सामान्य उद्देश्य और प्रवाह के विपरीत काम करते हैं। उन्हें बिलकुल भी पाप नहीं करना चाहिए; वे उतने ही पवित्र होने के लिये बाध्य हैं जितना परमेश्वर पवित्र है, और नए विश्वासियों को सही मार्ग पर चल पड़ना सिखाया जाना चाहिए, नहीं तो वे कभी सही न होंगे।
9. उन्हें अपनी ज्योति दिखाना सिखाया जाना चाहिए।
यदि नया विश्वासी अपनी ज्योति नहीं दिखाता, और उसे संसार के सामने ऊँचा नहीं उठाता, तो वह बुझ जाएगी। यदि वह सक्रिय नहीं होता, और आगे बढ़कर अपने आसपास के लोगों को प्रकाशित करने का प्रयत्न नहीं करता, तो उसकी ज्योति बुझ जाएगी, और उसका अपना प्राण शीघ्र ही अन्धकार में होगा। कभी-कभी नए विश्वासी इस मनोवृत्ति में दिखाई देते हैं कि जब तक उन्हें बहुत अधिक ज्योति, या बहुत अधिक धर्म न मिल जाए, तब तक चुप रहें और सार्वजनिक रूप से कुछ न करें। परन्तु यह रीति नहीं है। नया विश्वासी जो कुछ उसके पास है उसका उपयोग करे; वह अपने छोटे-से टिमटिमाते दीये को साहस और सच्चाई से ऊँचा उठाए, और तब परमेश्वर उसमें तेल उँडेलेगा और उसे एक धधकती मशाल के समान बना देगा। परन्तु परमेश्वर ऐसी ज्योति को जलाए रखने का कष्ट नहीं उठाएगा जो छिपाई गई हो। वह क्यों उठाए? उसका क्या लाभ?
यही कारण है कि बहुत-से लोग धर्म में इतना कम आनन्द पाते हैं। वे परमेश्वर का आदर करने के लिये परिश्रम नहीं करते। जो थोड़ा-सा आनन्द उन्हें मिलता है, उसे वे इतनी पूरी तरह अपने तक ही रखते हैं कि परमेश्वर के लिये उन्हें आशीषें और उपकार देने का कोई उचित कारण नहीं रहता।
10. उन्हें सिखाया जाना चाहिए कि आत्माओं को मसीह के लिये कैसे जीतें। नए विश्वासियों को विशेष रूप से सिखाया जाना चाहिए कि इसके लिये क्या करें, और कैसे करें, और फिर इसी उद्देश्य के लिये, जीवन के महान और प्रमुख लक्ष्य के रूप में, जीना सिखाया जाना चाहिए। कभी-कभी कैसा विचित्र मार्ग अपनाया गया है। इन लोगों का मन-परिवर्तन हुआ है, और बस वे वहीं हैं। वे कलीसिया में आ जाते हैं, और फिर उन्हें अपने कारोबार में ठीक वैसे ही चलते रहने के लिये छोड़ दिया जाता है जैसे वे पहले चलते थे; वे मसीह के लिये कुछ नहीं करते और उन्हें कुछ करना सिखाया भी नहीं जाता, और एकमात्र परिवर्तन यह होता है कि वे सब्त के दिन अधिक नियमित रूप से गिरजाघर जाते हैं, और पादरी को उन्हें खिलाने देते हैं, जैसा कि कहा जाता है। परन्तु मान लीजिए कि वह उन्हें खिलाता है, तौभी वे बलवन्त नहीं होते, क्योंकि वे उसे पचा नहीं सकते, क्योंकि वे कोई व्यायाम नहीं करते। वे आत्मिक अपच के रोगी बन जाते हैं। अब वह महान उद्देश्य, जिसके लिये मसीहियों का मन-परिवर्तन होता है और वे इस संसार में छोड़े जाते हैं, यह है कि वे पापियों को आग में से खींच निकालें। यदि वे यह पूरा नहीं करते, तो उनका मर जाना ही भला होता। और नए विश्वासियों को यह बात उसी समय सिखाई जानी चाहिए जब वे राज्य में जन्म लेते हैं। उनका पहला काम इसी उद्देश्य के लिये, अर्थात् पापियों को बचाने के लिये, काम में लग जाना होना चाहिए।
II. मुझे यह दिखाना है कि कलीसिया को नए विश्वासियों के साथ किस प्रकार व्यवहार करना चाहिए।
1. पुराने अंगीकार करनेवालों को नए विश्वासियों को बहुत-सी शिक्षा देने के योग्य होना चाहिए, और उन्हें वह देनी चाहिए। परन्तु सच्चाई यह है कि कलीसियाओं में अंगीकार करनेवालों का बड़ा भाग यह नहीं जानता कि नए विश्वासियों को अच्छी शिक्षा कैसे दें, और यदि वे उन्हें शिक्षा देने का प्रयत्न करते हैं, तो केवल वही देते हैं जो झूठी है। कलीसिया को अपने बच्चों को सिखाने के योग्य होना चाहिए; और जब वह उन्हें ग्रहण करती है, तब उसे उन्हें काम करने के लिये प्रशिक्षित करने में उतना ही व्यस्त होना चाहिए जितनी माताएँ अपने छोटे बच्चों को वे बातें सिखाने में व्यस्त रहती हैं जिन्हें उन्हें आगे चलकर जानना और करना होगा। परन्तु साधारणतः स्थिति ऐसी होने से बहुत दूर है। और हम तब तक यह देखने की आशा कभी नहीं कर सकते कि नए विश्वासी आदतन कर्तव्य को ठीक से पकड़ें और बिना शिथिल हुए और पीछे हटे सीधे आगे बढ़ते जाएँ, जब तक कलीसिया नए विश्वासियों को समझदारी से प्रशिक्षित न करे।
2. नए विश्वासियों को कलीसिया के बाकी लोगों के पीछे दबाकर नहीं रखना चाहिए। कितनी बार यह पाया जाता है कि पुराना अंगीकार करनेवाला नए विश्वासियों को कलीसिया के बाकी लोगों के पीछे दबाकर रखता है, और उन्हें धर्म में कोई सक्रिय भाग लेने से रोकता है, इस डर से कि कहीं वे आत्मिक घमण्ड में न पड़ जाएँ। ऐसी कलीसियाओं में नए विश्वासियों से सभाओं में भाग लेने को, या किसी सक्रिय कर्तव्य या ऐसे ही किसी काम में लगने को विरले ही या कभी नहीं कहा जाता, इस डर से कि कहीं वे आत्मिक घमण्ड से फूल न जाएँ। इस प्रकार कलीसिया उनकी नम्रता की शालीन रखवाली बन जाती है, और उन्हें पुराने, अकड़े हुए, सूखे, ठण्डे सदस्यों और प्राचीनों के पीछे पंक्ति में खड़े होना सिखाती है, इस डर से कि यदि उन्हें मसीह के लिये कुछ करने दिया गया, तो इससे वे घमण्डी हो जाएँगे। जबकि नए विश्वासियों को नम्र बनाने और नम्र बनाए रखने का ठीक यही उपाय है कि उन्हें उनके काम में लगा दिया जाए और वहीं लगाए रखा जाए। यही परमेश्वर को उनके साथ बनाए रखने का उपाय है, और जब तक परमेश्वर उनके साथ है, वह उनकी नम्रता की चिन्ता करेगा। उन्हें धर्म में निरन्तर लगाए रखिए, और तब परमेश्वर का आत्मा उनके साथ वास करेगा, और तब वे सबसे प्रभावशाली प्रक्रिया के द्वारा नम्र रखे जाएँगे। परन्तु यदि नए विश्वासियों को पुराने अंगीकार करनेवालों के पीछे पंक्ति में खड़े रहने के लिये छोड़ दिया जाए, जहाँ वे कभी कुछ नहीं कर सकते, तो वे कभी नहीं जान पाएँगे कि वे किस आत्मा के हैं, और उन्हें सबसे बुरे प्रकार के आत्मिक घमण्ड के खतरे में डालने का ठीक यही उपाय है।
3. कलीसिया को उनकी चौकसी करनी चाहिए, और उन्हें उनके खतरों के विषय में चिताना चाहिए, ठीक वैसे ही जैसे एक कोमल माता अपने छोटे बच्चों की चौकसी करती है। नए विश्वासी उन खतरों को बिलकुल नहीं जानते जिनसे वे घिरे हुए हैं। शैतान की युक्तियों को, संसार की परीक्षाओं को, अपनी वासनाओं और आदतों की शक्ति को, और खतरे के हज़ारों रूपों को वे नहीं जानते; और यदि उनकी ठीक से चौकसी न की जाए और उन्हें चिताया न जाए, तो वे सीधे खतरे में जा पड़ेंगे। उस माता को देखिए जो अपने छोटे बच्चे की चौकसी कर रही है। क्या वह उसे अपना छोटा-सा हाथ मोमबत्ती में डालने देती है, या उसे वहाँ रेंगने देती है जहाँ वह गिर पड़ेगा, केवल इसलिए कि उसका अपना अन्धापन और अज्ञान उसे ऐसा करने की इच्छा से नहीं रोकता? कलीसिया को अपने छोटे बच्चों की चौकसी और देखभाल ठीक वैसे ही करनी चाहिए जैसे इस बड़े नगर में माताएँ अपने छोटे बच्चों की चौकसी करती हैं, इस डर से कि कहीं गाड़ियाँ उन्हें कुचल न दें, या वे भटककर खो न जाएँ; या जैसे वे बड़े होते समय उनकी चौकसी करती हैं, इस डर से कि कहीं वे अधर्म के भँवरों में न खिंच जाएँ। कलीसिया को अपने नए सदस्यों के सब हितों की चौकसी करनी चाहिए, जानना चाहिए कि वे कहाँ हैं, और उनकी आदतें, परीक्षाएँ, खतरे, सुअवसर, उनके हृदयों में धर्म की दशा, और उनकी प्रार्थना की आत्मा कैसी है। उस चिन्तित माता को देखिए, जब वह अपने बच्चे के छोटे-से माथे पर पीलापन छाते देखती है। “मेरे बच्चे, तुझे क्या हुआ? क्या तूने कुछ अनुचित खा लिया है? क्या तुझे सर्दी लग गई है? तुझे क्या कष्ट है?” ओह, कलीसिया के बच्चों के साथ, उन मेमनों के साथ जिन्हें उद्धारकर्ता ने अपनी कलीसियाओं की देखभाल में सौंपा है, कितना भिन्न व्यवहार होता है। हाय! अपने बच्चों को रोकने और उनकी देखभाल करने के बजाय, कलीसिया उन्हें कहीं भी जाने देती है, और अपनी चिन्ता आप करने देती है। हम उस माता के विषय में क्या कहेंगे जो जान-बूझकर अपने छोटे बच्चे को लड़खड़ाते हुए किसी खड़ी चट्टान के किनारे तक जाने दे? क्या हम यह न कहेंगे कि ऐसा करने के कारण वह भयंकर रूप से दोषी है, और यदि बच्चा गिरकर मर जाए, तो उसका लहू माता के सिर पर होगा? तो फिर अपने नए विश्वासियों की जान-बूझकर उपेक्षा करने में कलीसिया का दोष क्या है? मैं ऐसी कलीसियाओं को जानता हूँ जहाँ पहले तो नए विश्वासियों की पूरी तरह उपेक्षा की गई, और उन्हें सन्देह और ईर्ष्या की दृष्टि से देखा गया; कोई उन्हें दृढ़ करने या प्रोत्साहित करने या सलाह देने के लिये उनके पास नहीं गया; उन्हें उपयोगी बनाने के लिये, उन्हें यह सिखाने के लिये कि क्या करें, या कैसे करें, या उनके लिये परिश्रम का कोई क्षेत्र खोलने के लिये कुछ नहीं किया गया। और फिर—फिर क्या? अरे, जब वे पाते हैं कि नए विश्वासी सब कुछ सह नहीं सकते, और उन्हें अपने ही व्यवहार के कारण ठण्डे और पिछड़ते हुए पाते हैं, तो वे पलटकर उन्हें इसलिए बुरा-भला कहते हैं कि वे टिके न रहे।
4. उन्हें डाँटने में कोमल रहिए। जब मसीही नए विश्वासियों को डाँटना आवश्यक समझें, तो उन्हें ऐसा करने के अपने ढंग के विषय में अत्यन्त सावधान रहना चाहिए। कलीसिया के बड़े सदस्यों को विश्वासयोग्यता से नए विश्वासियों की चौकसी करनी चाहिए, और जब वे पीछे हटने लगें, या भटकने लगें, तो उन्हें तुरन्त चिताया जाना चाहिए, और यदि आवश्यक हो, तो डाँटा जाना चाहिए। परन्तु इसे गलत ढंग से करना न करने से भी बुरा है। कभी-कभी यह ऐसे ढंग से किया जाता है जो रूखा, कठोर, असभ्य और स्पष्ट रूप से दोष ढूँढ़नेवाला होता है, भाईचारे की चितावनी से अधिक डाँट-फटकार के समान। ऐसा ढंग, विश्वास उत्पन्न करने या सुधार की ओर ले जाने के बजाय, नए विश्वासी के मन को कठोर करने, और उसे उसके गलत मार्गों में पक्का करने के ही योग्य है, जबकि उसी समय वह ऐसे दोष ढूँढ़नेवाले संरक्षकों के प्रभाव के विरुद्ध उसके मन को बन्द कर देता है। नए विश्वासी का हृदय कोमल होता है, और आसानी से दुःखी हो जाता है, और कभी-कभी एक ही कठोर दृष्टि उन्हें मन की ऐसी दशा में डाल देगी जो उसकी भूलों को उस पर जकड़ देगी और उसे बुरे से बुरा बनाती जाएगी।
आप जो माता-पिता हैं, जानते हैं कि जब आप अपने बच्चों को डाँटते हैं, तो यह कितना महत्त्वपूर्ण है कि वे देखें कि आप यह सबसे अच्छे उद्देश्यों से, उनकी भलाई के लिये, इसलिए करते हैं कि आप चाहते हैं कि वे अच्छे बनें, न कि इसलिए कि आप क्रोधित हैं। नहीं तो वे शीघ्र ही आपको मित्र के बजाय एक अत्याचारी समझने लगेंगे। ठीक यही बात नए विश्वासियों के साथ है। दयालुता और कोमलता, डाँटने में भी, उनका विश्वास जीत लेगी, और उन्हें आपसे जोड़ देगी, और आपकी भाईचारे की शिक्षाओं और सलाहों को ऐसा प्रभाव देगी कि आप उन्हें परिपक्व मसीही बनाने के लिये ढाल सकें। इसके बजाय, यदि आप अपने ढंग में कठोर और आलोचनात्मक हैं, तो यही उन्हें यह सोचने पर विवश करने का उपाय है कि आप उन पर प्रभुता जताना चाहते हैं। बहुत-से लोग, विश्वासयोग्य होने के बहाने, जैसा वे इसे कहते हैं, प्रायः नए विश्वासियों को ऐसे कठोर और रौब जमानेवाले ढंग से चोट पहुँचाते हैं कि उन्हें दूर भगा देते हैं, या कदाचित् उन्हें कुचलकर निराशा और उदासीनता में डाल देते हैं। नए विश्वासियों का अनुभव बहुत थोड़ा होता है, और वे आसानी से गिरा दिए जाते हैं। वे ठीक उस छोटे बच्चे के समान हैं जो पहली बार चलना आरम्भ करता है। आप उसे लड़खड़ाते हुए चलते देखते हैं, और वहाँ वह एक तिनके से ठोकर खा जाता है। आप देखते हैं कि जब उसका छोटा बच्चा चलने का प्रयत्न करनेवाला होता है, तो माता फ़र्श पर से हर वस्तु उठा लेती है। ठीक यही बात नए विश्वासियों के साथ है। कलीसिया को हर ठोकर के कारण को हटा देना चाहिए, और उनके साथ ऐसा व्यवहार करना चाहिए कि वे देखें कि यदि उन्हें डाँटा जाता है, तो उसमें मसीह है, और तब वे उसे उसी भाव से ग्रहण करेंगे जिस भाव से वह दी गई है, और उससे उनका भला होगा।
5. नए विश्वासी में जो बातें दोषपूर्ण हैं और जिन्हें वह नहीं देखता, उन्हें दयालुता से बताइए। वह अभी बालक ही है, और धर्म के विषय में बहुत थोड़ा जानता है, और स्वाभाविक है कि उसमें बहुत-सी बातें होंगी जो उसे सीखनी हैं, और बहुत-सी जिन्हें उसे सुधारना चाहिए। जो कुछ भी उसकी आत्मा में गलत है, या उसके आचरण में अप्रिय है, या उसके व्यवहार में असंस्कृत है, जो एक मसीही के रूप में उसकी उपयोगिता में बाधा डालेगा या उसके प्रभाव को घटाएगा, उसे दयालुता से बताया और सुधारा जाना चाहिए। परन्तु इसे सही ढंग से करने के लिये बड़ी बुद्धि की आवश्यकता है। मसीहियों को इसे बहुत प्रार्थना और मनन का विषय बनाना चाहिए, ताकि वे इसे सही ढंग से करें, जिससे भलाई से अधिक हानि न हो। यदि आप उसे केवल उन बातों के लिये डाँटते हैं जिन्हें उसने देखा नहीं, या जिनका अनुचित होना वह नहीं जानता था, तो इससे वह दुःखी और खिन्न होगा। ऐसी शिक्षा सावधानी से उचित समय पर दी जानी चाहिए; प्रायः यह अच्छा है कि आप साथ मिलकर प्रार्थना करने के बाद, या धार्मिक विषयों पर किसी स्नेहपूर्ण बातचीत के बाद, अवसर लें, जो उसे यह अनुभव कराने के योग्य हो कि आप उससे प्रेम करते हैं, और उसकी भलाई चाहते हैं, और सच्चे मन से उसके पवित्रीकरण, उसकी उपयोगिता और उसके सुख को बढ़ाना चाहते हैं। तब प्रायः एक संकेत मात्र ही काम कर देगा। बस इतना सुझा दीजिए कि “आपकी प्रार्थना में अमुक बात,” या “आपका अमुक आचरण, मुझे अच्छा नहीं लगा। क्या आप उस पर विचार न करेंगे, और कदाचित् आप यही उचित समझेंगे कि फिर से वैसा करने से बचें।” इसे सही ढंग से कीजिए, और आप उसकी सहायता करेंगे और उसका भला करेंगे। इसे गलत ढंग से कीजिए, और आप भलाई से दस गुना अधिक हानि करेंगे। प्रायः नए विश्वासी अज्ञान के कारण भूल करेंगे; उनकी समझ अभी कच्ची है, और उन्हें किसी ऐसी बात पर, जो आरम्भ में उन्हें सन्दिग्ध लगती है, सोचने और एक प्रकाशित निर्णय पर पहुँचने के लिये समय चाहिए। ऐसी स्थितियों में कलीसिया को उनके साथ बड़ी दयालुता और सहनशीलता से व्यवहार करना चाहिए। उसे दयालुता से उन्हें सिखाना चाहिए, और इस बात के लिये उनकी तुरन्त निन्दा नहीं करनी चाहिए कि वे आरम्भ में वह नहीं देख पाए जिसे कदाचित् वे स्वयं भी अपने मन-परिवर्तन के वर्षों बाद तक नहीं समझ पाए थे।
6. नए विश्वासियों के दोषों की चर्चा उनकी पीठ पीछे मत कीजिए। पुराने अंगीकार करनेवालों में यह बहुत ही आम है, और आगे चलकर यह बात उनके कानों तक पहुँचती है; और इसका कैसा प्रभाव पड़ता होगा—अपने बड़े भाइयों पर नए विश्वासियों के भरोसे को नष्ट करना, उनके हृदयों को दुःखी करना और उन्हें निरुत्साहित करना, और कदाचित् उन्हें कलीसिया के अच्छे प्रभाव से दूर भगा देना।
III. मुझे नए विश्वासियों को दी गई अधूरी शिक्षा की कुछ बुराइयों का उल्लेख करना है।
1. यदि उन्हें पूरी शिक्षा न दी जाए, तो वे सही सिद्धान्तों में कभी पूरी तरह स्थिर न होंगे। यदि उनके मूलभूत सिद्धान्त सही हैं, तो वे उन्हें हर विशेष स्थिति में आचरण का सही मार्ग अपनाने की ओर ले जाएँगे। मसीही चरित्र के निर्माण में बहुत कुछ उन मूलभूत सिद्धान्तों को स्थापित करने पर निर्भर है जो सब विषयों पर सही हों। यदि आप बाइबल को देखें तो वहाँ देखेंगे कि परमेश्वर सही सिद्धान्त सिखाता है, जिन्हें हम विस्तार से सही आचरण में उतार सकते हैं। यदि नए विश्वासियों की शिक्षा प्रकार में या मात्रा में अधूरी है, तो आप उसे जीवन भर उनके चरित्र में देखेंगे। यह तर्कसंगत परिणाम है, ठीक वही जिसकी आशा की जा सकती है, और सदा ऐसा ही होना चाहिए। यदि मेरे पास समय होता, तो यह दिखाया जा सकता था कि कलीसिया में प्रचलित लगभग सभी व्यावहारिक भूलें कुछ ऐसी झूठी मान्यताओं के स्वाभाविक परिणाम हैं जो नए विश्वासियों को सिखाई गई हैं, और जिन्हें उस समय, जब वे इतने अज्ञानी थे कि इससे अच्छा कुछ न जानते थे, परमेश्वर के सत्य के रूप में उनके गले उतार दिया गया।
2. यदि नए विश्वासियों को दी गई शिक्षा सही और पूरी नहीं है, तो वे अनुग्रह में नहीं बढ़ेंगे, परन्तु उनका धर्म घटता और क्षीण होता जाएगा। उनका मार्ग धर्मियों की उस चाल के समान होने के बजाय, जिसका प्रकाश दोपहर तक अधिक अधिक बढ़ता रहता है, धुँधला और धुँधला होता जाएगा, और क्षीण हो जाएगा, और अन्त में कदाचित् अन्धकार में बुझ जाएगा। जहाँ कहीं आप नए विश्वासियों को ऐसा देखें कि उनका धर्म घटते-घटते कुछ भी न रहे, तो आप समझ सकते हैं कि यह अधूरी शिक्षा का उचित परिणाम है। नए विश्वासियों को सत्य, और पूरा सत्य, सिखाने का तर्कसंगत परिणाम यह है कि वे बलवन्त से बलवन्त होते जाते हैं। सत्य मन का भोजन है—वही मन को बल देता है। और जहाँ धार्मिक चरित्र दुर्बल होता जाता है, निश्चय जानिए कि दस में से नौ स्थितियों में इसका कारण यह है कि जब वे नए विश्वासी थे, तब उनकी उपेक्षा की गई, या उन्हें झूठी शिक्षा दी गई।
3. वे न्यायसंगत रूप से इस सन्देह में छोड़ दिए जाएँगे कि वे मसीही हैं या नहीं। यदि उनकी आरम्भिक शिक्षा झूठी या अधूरी है, तो उनके जीवन में इतनी असंगति होगी, और सच्ची भक्ति का सच्चा प्रमाण इतना कम होगा, कि अन्त में वे स्वयं सन्देह करेंगे कि उनमें भक्ति है भी या नहीं। सम्भवतः वे सन्देह में ही जीएँगे और मरेंगे। आप थोड़े-से प्रमाण को बहुत दूर तक नहीं खींच सकते। यदि वे स्पष्ट नहीं देखते तो वे संगत जीवन नहीं जीएँगे, यदि वे संगत जीवन नहीं जीते तो उनके पास बहुत थोड़ा प्रमाण हो सकता है, और यदि उनके पास प्रमाण नहीं है तो उन्हें या तो सन्देह करना होगा, या ढिठाई में जीना होगा।
4. यदि नए विश्वासियों को सही शिक्षा और प्रशिक्षण दिया जाए, तो साधारणतः यह देखा जाएगा कि कलीसिया के सामने आनेवाले सब बड़े विषयों पर वे सही पक्ष लेंगे। कलीसियाओं के सामने निरन्तर ऐसे विषय आते रहते हैं जिन पर उन्हें पक्ष लेना पड़ता है, और उनमें से बहुतों पर पूरी कलीसिया से सही पक्ष लिवाने में प्रायः कम कठिनाई नहीं होती। उदाहरण के लिये, ट्रैक्टों, या मिशनों, या सब्त-स्कूलों, या मद्यनिषेध के विषय को लीजिए, और देखिए कि अलग-अलग स्थानों में कलीसिया के सदस्यों की ओर से कैसी-कैसी नुक्ताचीनी और आपत्तियों, और प्रतिरोध, और विरोध का सामना करना पड़ा है। कलीसियाओं में घूमकर देखिए, और जहाँ आप पाएँगे कि नए विश्वासियों को अच्छी शिक्षा दी गई है, वहाँ आप उन्हें कभी कठिनाई खड़ी करते, या आपत्तियाँ उठाते, या नुक्ताचीनी करते नहीं पाएँगे। मैं यह दोष पास्टरों और कलीसियाओं के पुराने सदस्यों पर लगाने में नहीं झिझकता कि ऐसे बहुत-से लोग हैं जिन्हें ऐसे सब विषयों पर घसीटकर सही पक्ष तक लाना पड़ता है। यदि उन्होंने आरम्भ में ही, जब उनका पहले-पहल मन-परिवर्तन हुआ था, उन्हें सुसमाचार के सिद्धान्तों में अच्छी तरह स्थिर कर दिया होता, तो वे इन सब बातों पर अपने सिद्धान्तों का प्रयोग देख लेते। यह देखना रोचक है, और मुझे इसे देखने का बहुत अवसर मिला है, कि नए विश्वासी किसी भी प्रस्तावित विषय पर सही पक्ष लेने के लिये कितने तैयार रहते हैं। देखिए, वे पादरियों की शिक्षा के लिये, मिशनों के लिये, नैतिक सुधार के लिये, दासों के लिये क्या कुछ करने को तैयार हैं। यदि हाल की जागृतियों से निकले नए विश्वासियों का बड़ा भाग सुसमाचार के सिद्धान्तों में अच्छी तरह स्थिर किया गया होता, तो आप
सारी कलीसिया में उनमें, कर्तव्य के हर उठनेवाले प्रश्न के विषय में, एक ही मन और एक ही प्राण पाते। उनकी आरम्भिक शिक्षा सही हो, तो आपको मसीहियों का एक ऐसा समूह मिल जाता है जिस पर आप भरोसा कर सकते हैं। यदि कलीसिया में यह बात सर्वत्र होती, तो ओह, संसार के उद्धार के लिये उसके सब बड़े प्रयासों में कितना अधिक बल होता। 5. यदि नए विश्वासियों को अच्छी शिक्षा न दी जाए तो वे अनिवार्य रूप से पीछे हट जाएँगे। यदि उनकी शिक्षा अधूरी है, तो सम्भवतः वे ऐसे जीएँगे कि धर्म का अपमान हो। नए विश्वासी के मन के सामने उचित अनुपात में निरन्तर रखा गया सत्य स्वाभाविक रूप से उसे मसीह यीशु में सिद्ध मनुष्य के पूरे डील-डौल तक बढ़ाने की प्रवृत्ति रखता है। यदि दी गई शिक्षा में किसी एक बात को आवश्यकता से अधिक प्रमुख बना दिया जाए, तो सम्भवतः उसके चरित्र में ठीक वही असन्तुलन होगा। यदि उसे कुछ बातों में पूरी शिक्षा दी जाए और दूसरों में नहीं, तो आप उसके जीवन और चरित्र में उसी के अनुरूप कमी पाएँगे।
यदि नए विश्वासियों की शिक्षा बहुत अधूरी है, तो वे धर्म में उससे आगे नहीं बढ़ेंगे जितना उन्हें उनके पहले मन-परिवर्तन की भावनाएँ ज़ोर से धकेलती हैं। जैसे ही वह वेग समाप्त होगा, वे रुक जाएँगे, और फिर वे गिरने लगेंगे और पीछे हट जाएँगे। और उसके बाद आप सदा पाएँगे कि वे केवल तभी आगे बढ़ेंगे जब कोई प्रबल उत्तेजना उन्हें जगाए। ये आपके सामयिक मसीही हैं, जो जागृति के समय जाग उठने के बड़े आदी होते हैं, और कुछ दिनों तक ऐसे हो-हल्ला मचाते फिरते हैं मानो उनमें किसी स्वर्गदूत का उत्साह हो, और फिर उत्तरी देश के जाड़े के समान मरे हुए और ठण्डे पड़ जाते हैं। ओह, यह कितना वांछनीय, कितना अनन्त रूप से महत्त्वपूर्ण है कि नए विश्वासियों को ऐसी शिक्षा दी जाए कि उनका धर्म आवेगों और उत्तेजनाओं पर निर्भर न रहे, परन्तु वे मसीही मार्ग पर स्थिरता से आगे बढ़ते जाएँ, बल पर बल पाते जाएँ, और अपने चारों ओर स्पष्ट और सुरक्षित और स्थिर ज्योति फैलाते रहें।
टिप्पणियाँ
1. नए विश्वासियों की शिक्षा के सम्बन्ध में अपनी पिछली उपेक्षा के लिये कलीसिया सचमुच दोषी है।
अपने नए विश्वासियों को काम करनेवाले मसीही बनाकर पालने-पोसने के बजाय, कलीसियाओं ने साधारणतः ऐसा व्यवहार किया है मानो वे नहीं जानतीं कि नए विश्वासियों को किस काम में लगाएँ, या उनका क्या उपयोग करें। उन्होंने उस माता के समान व्यवहार किया है जिसकी बहुत-सी बेटियों का बड़ा परिवार है, और जो नहीं जानती कि उन्हें कैसे काम में लगाए, और इसलिए उन्हें आलसी और अशिक्षित, निकम्मी और तिरस्कृत बनकर बड़ी होने देती है, और हर कुटिल बदमाश का आसान शिकार बनने देती है।
यदि कलीसिया ने केवल नए विश्वासियों को काम करने और मसीह के लिये परिश्रम करने के लिये प्रशिक्षित करने का अपना कर्तव्य पूरा किया होता, तो संसार का मन-परिवर्तन बहुत पहले हो गया होता। परन्तु इसके बजाय, कितनी ही कलीसियाएँ नए विश्वासियों का विरोध तक करती हैं, जब वे मसीह के लिये काम में लगने का प्रयत्न करते हैं। बहुत-से पुराने अंगीकार करनेवाले नए विश्वासियों की हर गतिविधि को सन्देह की दृष्टि से देखते हैं, और उनके विरुद्ध बातें करते हैं, और कहते हैं, “ये बहुत आगे बढ़ रहे हैं, इन्हें अपने आपको आगे नहीं करना चाहिए, बल्कि जो बड़े हैं उनकी प्रतीक्षा करनी चाहिए।” फिर वही प्रतीक्षा। जब नए विश्वासी उत्साही हृदयों और बलवन्त हाथों से काम पकड़ते हैं, तब उन्हें “परमेश्वर तुम्हें सफल करे” कहने और उनका उत्साह बढ़ाने के बजाय, बहुत बार वे उन्हें रोकते हैं और कदाचित् उन्हें दबा देते हैं। कितनी बार नए विश्वासियों को आगे बढ़ने से रोक दिया गया है, और एक औपचारिक, आलसी, निकम्मी कलीसिया के पीछे मोड़ दिया गया है, यहाँ तक कि उनकी आत्मा कुचल दी जाती है, और उनका उत्साह बुझ जाता है, और बन्धनों को तोड़ फेंकने के कुछ निष्फल संघर्षों के बाद, वे यह ठान लेते हैं कि बाकी लोगों के साथ बैठकर प्रतीक्षा करें। बहुत-से स्थानों में नए विश्वासी अपने आप एक प्रार्थना-सभा करने का प्रयत्न तक नहीं कर सकते, कि पास्टर, या कोई डीकन, उन्हें इतना आगे बढ़ने के लिये डाँट न दे, और उन पर आत्मिक घमण्ड का दोष न लगाए। “ओहो! तो तुम नए विश्वासी हो, है न? और इसलिए तुम इकट्ठे होकर सब पड़ोसियों को बुलाना चाहते हो कि वे तुम्हें देखें, क्योंकि तुम नए विश्वासी हो।” अच्छा हो कि तुम तुरन्त प्रचारक ही बन जाओ। न्यू इंग्लैंड के एक प्रसिद्ध डॉक्टर ऑफ़ डिविनिटी ने एक सार्वजनिक भोज की मेज़ पर अपने सब नए विश्वासियों को चुप रखने में अपनी सफलता की शेखी बघारी। उसने कहा कि उसे बड़ी कठिनाई हुई, क्योंकि वे कुछ करने के लिये, बोलने, या प्रार्थना करने, या सभाएँ आयोजित करने के लिये भयंकर ज्वर में थे, परन्तु बड़ी चौकसी के द्वारा उसने सब कुछ दबा दिया था, और अब उसकी कलीसिया ठीक वैसी ही शान्त थी जैसी जागृति से पहले थी। यीशु मसीह के एक सेवक की कैसी अद्भुत उपलब्धि! क्या धन्य उद्धारकर्ता का यही अर्थ था जब उसने पतरस से कहा, “मेरे मेमनों को चरा?”
2. नए विश्वासियों को परिश्रम के लिये ठीक उतनी ही सावधानी से प्रशिक्षित किया जाना चाहिए जितनी सावधानी से सेना में नए रंगरूटों को युद्ध के लिये प्रशिक्षित किया जाता है।
मान लीजिए कि सेना का कोई कप्तान अपनी कम्पनी में भर्ती तो कर ले, और फिर उन्हें सिखाने और प्रशिक्षित करने और अनुशासित करने में उससे अधिक परिश्रम न करे जितना बहुत-से पास्टर अपने नए विश्वासियों को प्रशिक्षित करने और आगे ले जाने में करते हैं। अरे, शत्रु ऐसी सेना पर हँसेगा। उन्हें सैनिक कहिए! अरे, किसी भी प्रभावशाली सेवा के विषय में तो वे निरी शैशवावस्था में हैं, वे कुछ नहीं जानते कि क्या करें या कैसे करें, और यदि आप उन्हें धावे के लिये आगे लाएँ, तो वे कहाँ हैं? ऐसी सेना उस कलीसिया के समान होगी जो अपने नए विश्वासियों को प्रशिक्षित नहीं करती। आक्रमण में कंधे से कंधा मिलाकर खड़े होने के लिये प्रशिक्षित होने के बजाय, वे न अपने अगुवों पर कोई व्यावहारिक भरोसा रखते हैं, न अपने पड़ोसियों पर, न अपने आप पर, और युद्ध के पहले ही धक्के में तितर-बितर हो जाते हैं। अब कलीसिया को देखिए। पादरी इस बात पर सहमत नहीं हैं कि क्या किया जाए, और उनमें से बहुत-से पलटकर अपने ही भाइयों से लड़ने लगेंगे, नए तरीकों, या ‘ऐक्ट ऐंड टेस्टिमनी’, या किसी और बात पर झगड़ते हुए। और जहाँ तक सदस्यों का सम्बन्ध है, जब वे अपने अगुवों को इतना बँटा हुआ देखते हैं, तो वे भरोसा अनुभव नहीं कर सकते। और फिर यदि वे कुछ करने का प्रयत्न करते हैं—हाय! हाय! कैसा अज्ञान, कैसा भद्दापन, कैसी फूट, कैसी दुर्बलता, वे उसका कैसा दयनीय काम बना देते हैं। और यह तब तक ऐसा ही चलता रहेगा जब तक कलीसिया नए विश्वासियों को समझदार, एकनिष्ठ, आत्म-त्यागी, काम करनेवाले मसीही बनने के लिये प्रशिक्षित न करे। इस नगर में इस समय एक कार्य चल रहा है, जिसे देखकर मैं आनन्दित होता हूँ। मेरा अभिप्राय ट्रैक्ट-कार्य से है—एक धन्य कार्य। और योजना यह है कि समर्पित मसीहियों का एक समूह प्रशिक्षित किया जाए कि वे—क्या करें?—अरे, वही करें जिसके लिये सारी कलीसिया को बहुत पहले प्रशिक्षित किया जाना चाहिए था, अर्थात् यह जानना कि प्रार्थना कैसे करें, और लोगों से उनके प्राण के उद्धार के विषय में बातचीत कैसे करें, और चिन्तित खोजियों की सभाओं में कैसे भाग लें, और खोजियों के साथ कैसे व्यवहार करें, और प्राणों को कैसे बचाएँ।
3. कलीसिया ने उस रीति को पूरी तरह गलत समझ लिया है जिससे उसे पवित्र किया जाना है।
कलीसिया के लोगों के लिये कोई काम ढूँढ़े बिना उसे पवित्र करने का प्रयोग बहुत समय तक चल चुका है। परन्तु पवित्रता परमेश्वर की आज्ञा मानने में है। और पवित्रीकरण, एक प्रक्रिया के रूप में, का अर्थ है उसकी आज्ञा को अधिकाधिक सिद्धता से मानना। और कलीसिया में इसे बढ़ाने का उपाय यह है कि हर एक को कुछ करने को दिया जाए। इन बड़ी-बड़ी कलीसियाओं को देखिए, जिनके 500 या 700 सदस्य हैं, और जो एक पादरी रख लेती हैं कि वह सब्त-दर-सब्त उन्हें खिलाए, जबकि उनमें से इतने अधिक एक साथ हैं कि बड़े भाग के पास करने को कुछ भी नहीं, और उन्हें प्राणों के उद्धार के लिये कोई प्रत्यक्ष प्रयत्न करने का प्रशिक्षण कभी नहीं दिया जाता। और इस प्रकार वे आशा कर रहे हैं कि वे पवित्र किए जाएँगे और स्वर्ग के लिये तैयार किए जाएँगे। वे इस प्रकार कभी पवित्र नहीं किए जाएँगे। यह वह मार्ग नहीं जिसे परमेश्वर ने ठहराया है। यीशु मसीह ने पापियों को बचाने में अपने लोगों को अपना सहकर्मी ठीक इसी कारण बनाया है, क्योंकि पवित्रीकरण उन कामों को करने में है जो इस कार्य को बढ़ाने के लिये आवश्यक हैं। यह एक कारण है कि उसने इस कार्य में स्वर्गदूतों को नहीं लगाया, या मनुष्यों के मन पर सत्य के प्रत्यक्ष प्रकाशन के द्वारा इसे नहीं चलाया। कारण यह है कि पवित्रीकरण के एक साधन के रूप में यह आवश्यक है कि कलीसिया पापियों के मन-परिवर्तन के लिये मसीह की भावनाओं और उसके परिश्रम में सहभागी हो। और संसार का मन-परिवर्तन होने से पहले सारी कलीसिया को इसी प्रकार आगे बढ़ना होगा। जब वह दिन आएगा कि सारी कलीसिया यह अनुभव करेगी कि वे पृथ्वी पर मिशनरियों के एक समूह के रूप में हैं, और उसी के अनुसार जीएगी और परिश्रम करेगी, तब मनुष्य के छुटकारे का दिन निकट आ जाएगा।
हे मसीही! यदि आप बाहर जाकर परिश्रम नहीं कर सकते, तो आप अपने परिवार में ही मिशनरी क्यों नहीं हैं? यदि आप इतने दुर्बल हैं कि अपना कमरा तक नहीं छोड़ सकते, तो वहीं अपने शयनकक्ष में मिशनरी बनिए। आपके घर में कितने ऐसे नौकर हैं जिनका मन-परिवर्तन नहीं हुआ? अपने उन नौकरों को, जिनका मन-परिवर्तन नहीं हुआ, और अपने उन बच्चों को, जिनका मन-परिवर्तन नहीं हुआ, बुलाइए, और उनके लिये मिशनरी बनिए। कदाचित् अपने डॉक्टर के विषय में सोचिए, जो आपकी देह को बचाने के लिये अपने आपको लगा रहा है, जबकि वह अपना ही प्राण खो रहा है, और आप उसकी दया ग्रहण करते हैं और कभी उसे वह सबसे बड़ा प्रतिफल नहीं देते जो आपके वश में है।
यह आवश्यक है कि कलीसिया अपने नए विश्वासियों को आरम्भ में ही सँभाले, और उन्हें काम में लगाए, और सही ढंग से काम में लगाए। कलीसिया की आशा नए विश्वासियों में है।
4. हम देखते हैं कि पादरियों, और प्राचीनों, और उन सब पर, जिन्हें नए विश्वासियों को प्रशिक्षित करने में सहायता करने का अवसर मिलता है, कैसा उत्तरदायित्व है। वह दृश्य कितना दुःखदायी है जो प्रायः मन के सामने ज़बरदस्ती आ खड़ा होता है, जहाँ बहुत-से लोगों का मन-परिवर्तन होता है, और फिर भी नए विश्वासियों पर इतना कम परिश्रम किया जाता है कि एक ही वर्ष में आप नए विश्वासियों को कलीसिया के बाकी लोगों से अलग नहीं पहचान सकते। और फिर पुराने कलीसिया-सदस्यों को पलटकर इन नए विश्वासियों की शिकायत करते, और कदाचित् उनकी निन्दा करते देखना, जबकि सच में ये पुराने अंगीकार करनेवाले स्वयं सबसे अधिक दोषी हैं। ओह, यह बहुत बुरा है। यह प्रतिक्रिया, जिसके विषय में लोग जागृति के बाद इतनी बातें करते हैं, (मानो प्रतिक्रिया जागृति का अनिवार्य परिणाम हो,) कभी न आती, नए विश्वासी कभी ऐसे पीछे न हटते जैसे वे हटते हैं, यदि कलीसिया उनकी शिक्षा पर तत्परता और विश्वासयोग्यता से ध्यान देती। यदि उनका सचमुच मन-परिवर्तन हुआ है, तो वे पक्के और उत्साही मसीही बनाए जा सकते हैं। और यदि वे ऐसे नहीं बनते, तो यीशु मसीह कलीसिया के हाथों से इसका लेखा लेगा।
