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जागृति को बढ़ावा देने के तरीके
“ये लोग जो यहूदी हैं, हमारे नगर में बड़ी हलचल मचा रहे हैं; और ऐसे व्यवहार बता रहे हैं, जिन्हें ग्रहण करना या मानना हम रोमियों के लिये ठीक नहीं।” प्रेरितों के काम 16:20, 21
यहाँ जिन “लोगों” की चर्चा है, वे पौलुस और सीलास थे, जो सुसमाचार प्रचार करने के लिये फिलिप्पी गए थे, और उन्होंने उस नगर के लोगों को बहुत बेचैन कर दिया, क्योंकि लोगों का विचार था कि यह प्रचार उनकी सांसारिक कमाई में बाधा डालेगा। इसलिये वे सुसमाचार के प्रचारकों को अपराधियों के समान नगर के हाकिमों के सामने ले गए, और उन पर यह दोष लगाया कि वे ऐसी शिक्षाएँ सिखाते हैं, और विशेष करके ऐसे तरीके काम में लाते हैं, जो उचित नहीं थे।
इन वचनों पर प्रवचन करते हुए मेरा उद्देश्य यह दिखाना है,
I. कि सुसमाचार के प्रबन्ध में परमेश्वर ने तरीकों की कोई ऐसी विशेष प्रणाली स्थापित नहीं की है, जिसे धर्म को बढ़ावा देने में काम में लाया जाए और जिस पर सदा अटल रूप से चला जाए।
II. यह दिखाना कि हमारी सार्वजनिक आराधना के वर्तमान रूप, और जहाँ तक तरीकों का सम्बन्ध है, सब कुछ, धीरे-धीरे और नए तरीकों के एक के बाद एक आने से ही प्राप्त हुआ है।
I. मुझे यह दिखाना है कि सुसमाचार के अधीन परमेश्वर ने काम में लाने के लिये कोई विशेष तरीके स्थापित नहीं किए हैं।
यहूदी प्रबन्ध के अधीन कुछ विशेष रीतियाँ थीं जिनकी आज्ञा स्वयं परमेश्वर ने दी थी और जिन्हें उसी ने ठहराया था, और उनसे हटना उचित नहीं था। परन्तु ये सब रीतियाँ प्रतिरूप थीं, और उनका उद्देश्य मसीह की, या उस नए प्रबन्ध से जुड़ी किसी बात की, छाया दिखाना था जिसे मसीह लानेवाला था। और इसी कारण वे निश्चित थीं, और उनका एक-एक ब्योरा ईश्वरीय अधिकार से विशेष रूप से ठहराया गया था। परन्तु सुसमाचार के अधीन ऐसा कभी नहीं हुआ। जब मसीह आया, तो विधि-सम्बन्धी या प्रतिरूपी प्रबन्ध रद्द हो गया, क्योंकि उन रीतियों का उद्देश्य पूरा हो चुका था, और इसलिये वे स्वयं आगे किसी काम की न रहीं। क्योंकि वह स्वयं वह वास्तविकता था जिसकी वे प्रतिरूप थीं, इसलिये उसके आने पर प्रतिरूपों का मिट जाना स्वाभाविक ही था। तब धर्म को बढ़ावा देने के ठहराए हुए साधन के रूप में सुसमाचार का प्रचार किया गया; और यह बात कलीसिया के विवेक पर छोड़ दी गई कि वह समय-समय पर यह निर्णय करे कि सुसमाचार को उसकी सामर्थ देने के लिये कौन-से तरीके अपनाए जाएँ और कौन-सी रीतियाँ काम में लाई जाएँ। प्रेरितों और आरम्भिक प्रचारकों ने कौन-से तरीके अपनाए, इस विषय में हम अँधेरे में हैं, केवल उतना ही जानते हैं जितना प्रेरितों के काम की पुस्तक में कहीं-कहीं मिलनेवाले संकेतों से जान सकते हैं। हम नहीं जानते कि सार्वजनिक आराधना में वे कितनी बार गाते थे और कितनी बार प्रार्थना करते थे, और यह भी नहीं जानते कि प्रचार के लिये होनेवाली अपनी साधारण सभाओं में वे गाते या प्रार्थना करते भी थे या नहीं। जब यीशु मसीह पृथ्वी पर था, और अपने चेलों के बीच परिश्रम करता था, तो उसका रीतियों या तरीकों से कोई लेना-देना नहीं था। इस विषय में वह समय-समय पर ठीक वैसा ही करता था जैसा ऐसी परिस्थितियों में किसी भी मनुष्य के लिये करना स्वाभाविक होता, और करने की किसी बँधी-बँधाई रीति या ढंग जैसी कोई बात नहीं थी। यहूदियों ने उस पर यह दोष लगाया कि वह उनकी रीतियों की उपेक्षा करता है। उसका उद्देश्य मनुष्यजाति को सच्चे धर्म का प्रचार करना और उसकी शिक्षा देना था। और जब बाद में प्रेरितों ने स्वर्ग से भेजे गए पवित्र आत्मा के साथ प्रचार किया, तो हम यह कुछ नहीं सुनते कि उनके पास अपना काम चलाने के लिये तरीकों की कोई विशेष प्रणाली थी, या कि कोई प्रेरित किसी काम को किसी विशेष ढंग से इसलिये करता था कि दूसरे उसे उसी ढंग से करते थे। उनका आदेश यह था, “जाओ और सुसमाचार प्रचार करो, और सब जातियों को चेला बनाओ।” इस आदेश में कोई रीतियाँ ठहराई नहीं गईं। इसमें किसी रीति के लिये स्थान ही नहीं था। कोई भी व्यक्ति यह दावा नहीं कर सकता कि वह इस आदेश में से रीतियों का कोई समूह या तरीकों के विषय में कोई विशेष निर्देश निकाल सकता है। इसे करो—जितने अच्छे ढंग से कर सको—परमेश्वर से बुद्धि माँगो—उसकी दी हुई योग्यताओं को काम में लाओ—पवित्र आत्मा का मार्गदर्शन खोजो—आगे बढ़ो और इसे करो। यही उनका आदेश था। और उनका उद्देश्य था सुसमाचार को सबसे प्रभावशाली ढंग से प्रगट करना, सत्य को ऐसा स्पष्ट रूप से उभारकर रखना कि अधिक से अधिक लोगों का ध्यान आकर्षित हो और उनकी आज्ञाकारिता प्राप्त हो। कोई भी व्यक्ति बाइबल में ऐसा करने की कोई ठहराई हुई रीति नहीं पा सकता। वहाँ जो बात महान बात के रूप में स्पष्ट उभरकर सामने आती है, वह सुसमाचार का प्रचार है। रीति का प्रश्न ही अलग छोड़ दिया गया है।
यह स्पष्ट है कि सुसमाचार प्रचार करने में किसी न किसी प्रकार के तरीके अपनाने ही पड़ेंगे। सुसमाचार को लोगों के मनों के सामने लाना आवश्यक है, और ऐसे उपाय करने आवश्यक हैं कि वे उसे सुन सकें, और उस पर ध्यान देने के लिये वे प्रेरित हों। यह काम गिरजाघर बनाने, नियमित या अन्य सभाएँ करने, इत्यादि के द्वारा किया जाता है। किन्हीं तरीकों के बिना मनुष्यों के बीच इसे कभी प्रभावकारी नहीं बनाया जा सकता।
II. मुझे यह दिखाना है कि हमारी सार्वजनिक आराधना के वर्तमान रूप, और जहाँ तक तरीकों का सम्बन्ध है, सब कुछ, धीरे-धीरे और नए तरीकों के एक के बाद एक आने से ही प्राप्त हुआ है।
1. मैं सेवकाई के विषय में कुछ बातों का उल्लेख करूँगा।
बहुत वर्ष पहले पादरी एक विशेष प्रकार का पहनावा पहना करते थे। कैथोलिक देशों में आज भी ऐसा ही है। यहाँ भी पहले ऐसा ही था। पादरियों की एक विशेष पोशाक होती थी, ठीक वैसे ही जैसे सैनिकों की होती है। वे तिकोनी टोपी पहनते थे, और गुलूबंद या स्टॉक (गले का पट्टा) के स्थान पर गले की पट्टियाँ (बैंड्स) लगाते थे, और घुटनों तक की तंग पतलून (स्मॉल क्लोद्स) पहनते थे,
और विग (नकली बाल) लगाते थे। चाहे किसी मनुष्य के सिर पर कितने ही बाल क्यों न हों, उसे उन्हें कटवाकर विग लगाना पड़ता था। और फिर उसे चोगा भी पहनना पड़ता था। ये सब बातें प्रचलित रीतियाँ थीं, और हर एक पादरी इन्हें पहनने के लिये बाध्य माना जाता था, और इनके बिना उसका सेवा-कार्य करना उचित नहीं समझा जाता था। इन सब को निःसन्देह एक के बाद एक नई बातें चलाकर ही लाया गया था, क्योंकि हमारे पास यह मानने का कोई ठोस कारण नहीं कि प्रेरित और आरम्भिक सेवक दूसरे मनुष्यों से भिन्न वस्त्र पहनते थे।
परन्तु अब ये सब बातें एक-एक करके, एक के बाद एक नई बातों या नए तरीकों के द्वारा छोड़ दी गई हैं, यहाँ तक कि अब बहुत-सी कलीसियाओं में एक पादरी किसी भी दूसरे मनुष्य के समान वस्त्र पहने हुए मंच (पल्पिट) पर जाकर प्रचार कर सकता है और किसी का ध्यान भी नहीं जाता। और जब इनमें से हर एक बात के विषय में ऐसा किया गया, तो कलीसिया ने ऐसी शिकायत की मानो कोई ईश्वरीय विधि छोड़ दी गई हो। इसकी निन्दा एक नई बात कहकर की गई। जब पादरियों ने अपनी तिकोनी टोपियाँ उतारकर दूसरे लोगों जैसी टोपियाँ पहननी आरम्भ कीं, तो बड़े-बूढ़ों को इससे बहुत दुःख हुआ; वे कहते थे कि किसी पादरी का गोल टोपी पहनना कितना “गरिमाहीन” लगता है। जब 1827 में मैंने फर की टोपी पहनी, तो एक पादरी ने कहा, “यह एक पादरी के लिये बहुत ही बुरी बात है।”
जब कुछ वर्ष पहले पादरियों ने पहली बार सफ़ेद टोपियाँ पहननी आरम्भ कीं, तो बहुतों ने इसे एक दुःखद और अत्यन्त गरिमाहीन नई बात समझा। और आज भी कुछ स्थानों में लोग इतने कट्टर हैं कि कुछ ही दिन पहले एक पादरी ने मुझे बताया कि पिछली गर्मियों में जब वह सफ़ेद टोपी पहनकर न्यू इंग्लैंड में यात्रा कर रहा था, तो उसे साफ़ दिखाई दे रहा था कि इससे उसके प्रभाव को हानि पहुँची। इस मनोभाव को हानिरहित नहीं समझना चाहिए; मेरे पास यह जानने का अच्छा कारण है कि यह हानिरहित नहीं है। सोच-विचार करनेवाले लोग इसे निरी कट्टरता समझते हैं, और इसी कारण उनके धर्म की हर बात को इसी दृष्टि से देखने का बहुत बड़ा खतरा रहता है। बहुत-से उदाहरणों में यही परिणाम हुआ है। आज के दिन देश में शायद ही कोई ऐसा पादरी हो जो अपने आप को काला कोट पहनने के लिये उतना ही बाध्य न समझता हो, मानो यह कोई ईश्वरीय विधि हो। कलीसिया अब भी ऐसी बातों के प्रति एक प्रकार की अन्धविश्वासपूर्ण श्रद्धा से भरी हुई है। यह बहुत-से मनों के लिये ठोकर का बड़ा कारण है।
इसी प्रकार जब पादरियों ने गले की पट्टियाँ छोड़कर गुलूबंद या स्टॉक पहनने आरम्भ किए, तो कहा गया कि वे सांसारिक होते जा रहे हैं, और बहुतों ने दोष निकाला। आज भी कुछ स्थानों में कोई पादरी गुलूबंद या स्टॉक पहनकर मंच पर दिखाई देने का साहस नहीं करेगा। यदि उसके गले में पट्टियाँ न हों, तो लोगों को ऐसा लगेगा मानो उनका कोई पादरी ही नहीं है। इस नगर के एक पादरी ने कुछ ही दिन पहले दूसरे पादरी से पूछा कि क्या मंच पर काला स्टॉक पहनना ठीक रहेगा। अपने लोगों के साथ साधारण मेलजोल में तो वह उसे पहनता था, परन्तु उसे सन्देह था कि मंच पर उसे पहनना ठीक होगा या नहीं।
इसी प्रकार घुटनों तक की तंग पतलून के विषय में भी था; पहले उसे पादरी के पद के लिये आवश्यक समझा जाता था। आज भी कैथोलिक देशों में हर पुरोहित घुटनों तक की तंग पतलून पहनता है। वहाँ तो पुरोहित के पद के लिये प्रशिक्षण पानेवाले छोटे लड़के भी तिकोनी टोपियाँ, काले मोज़े और घुटनों तक की तंग पतलून पहनते हैं। हमारे बीच यह हास्यास्पद लगेगा। परन्तु पहले इस देश में भी यही चलता था। एक समय ऐसा था जब यदि कोई पादरी लम्बी पतलून पहनकर मंच पर चला जाता, तो भले लोगों को बड़ा धक्का लगता। वे सोचते कि वह अपनी नई बातों से निश्चय ही कलीसिया का नाश कर देगा। मुझे बताया गया है कि कुछ वर्ष पहले न्यू इंग्लैंड में एक बूढ़ा पादरी किसी सेवक के लम्बी पतलून पहनने के नए तरीके का इतना विरोधी था कि वह किसी भी दशा में अपने मंच पर उसकी अनुमति नहीं देता था। एक युवक उसकी ओर से प्रचार करनेवाला था, जिसके पास घुटनों तक की पतलून नहीं थी, और बूढ़े पादरी ने उसे लम्बी पतलून पहनकर सेवा-कार्य करने नहीं दिया। उसने कहा, “अरे, मंच पर किसी मनुष्य को लम्बी पतलून पहने देखकर मेरे लोग सोचेंगे कि मैं किसी छैले को मंच पर ले आया हूँ, और इससे उनके बीच उत्तेजना फैल जाएगी।” और इस प्रकार अन्त में उस युवक को उस बूढ़े सज्जन की एक पतलून उधार लेनी पड़ी, और वह उसके लिये बहुत छोटी थी, और उसमें वह काफ़ी हास्यास्पद दिखाई देता था। परन्तु लम्बी पतलून पहनकर प्रचार करने जैसी भयानक नई बात की अपेक्षा कुछ भी अच्छा था। परन्तु तर्क की जीत हुई है।
ठीक यही दशा विग के विषय में भी थी। मुझे एक पादरी याद है जो काफ़ी युवा होते हुए भी एक विशाल सफ़ेद विग पहना करता था। और लोग ऐसे बात करते थे मानो इसके पीछे कोई ईश्वरीय अधिकार हो, और इसे छोड़ना लगभग उतना ही कठिन था जितना स्वयं बाइबल को छोड़ना। चोगे भी पादरी के पद के लिये आवश्यक समझे जाते थे। और आज भी इस देश की बहुत-सी मंडलियों में लोग मंच पर किसी पादरी को तब तक सहन नहीं करेंगे जब तक वह रेशम का लहराता हुआ चोगा न पहने हो, जिसकी आस्तीनें उसके शरीर जितनी बड़ी हों। न्यू इंग्लैंड की कुछ कॉन्ग्रिगेशनल कलीसियाओं में भी वे इसे छोड़ना सहन नहीं कर सकते। अब लोगों ने यह कैसे मान लिया कि प्रभावशाली ढंग से प्रचार करने के लिये पादरी के पास चोगा या विग होना ही चाहिए? ऐसा क्यों था कि हर एक पादरी इन वस्तुओं को काम में लाने के लिये बाध्य माना जाता था? ऐसा क्यों है कि कलीसियाओं में इनमें से एक भी वस्तु उनके बीच धक्का पहुँचाए बिना नहीं छोड़ी गई? ये सब एक-एक करके छोड़ दी गई हैं, और बहुत-सी मंडलियाँ कुछ समय तक इस नई बात के कारण अशान्त रही हैं। परन्तु क्या कोई यह दावा करेगा कि इससे धर्म के कार्य को हानि पहुँची है? लोगों को ऐसा लगता था मानो इनके बिना वे परमेश्वर की आराधना कर ही नहीं सकते, परन्तु स्पष्ट है कि इन वस्तुओं से उनका लगाव उनके धर्म का कोई भाग नहीं था, अर्थात् मसीही धर्म का कोई भाग नहीं था। यह निरा अन्धविश्वास था। और जब ये वस्तुएँ हटा ली गईं, तो उन्होंने वैसी ही शिकायत की जैसी मीका ने की थी, “तुम तो मेरे देवताओं को ले चले हो।” परन्तु निःसन्देह अन्धविश्वासपूर्ण श्रद्धा की इन वस्तुओं के हटाए जाने से उनके धार्मिक चरित्र में सुधार हुआ। अतः कुल मिलाकर इन नई बातों से कलीसिया को बहुत लाभ ही हुआ है। इस प्रकार आप देखते हैं कि पादरी के पहनावे का वर्तमान ढंग नए तरीकों की एक श्रृंखला के द्वारा प्राप्त हुआ है।
2. सार्वजनिक आराधना की व्यवस्था के विषय में।
हर एक परिवर्तन लाने में यही कठिनाइयाँ सामने आई हैं, क्योंकि कलीसिया को ऐसा लगता रहा है मानो परमेश्वर ने ठीक वही ढंग स्थापित किया है जिसकी वह आदी थी।
(1.) भजन की पुस्तकें। पहले दाऊद के भजन गाने की प्रथा थी। कुछ समय बाद तुकबन्दी में भजनों का एक अनुवाद चलाया गया। निश्चय ही यह बहुत बुरा था। जब पादरियों ने उन्हें चलाने का प्रयास किया, तो कलीसियाएँ अशान्त हो गईं, लोगों ने प्रचण्ड विरोध किया, और इस नई बात के कारण बड़ा उपद्रव खड़ा हुआ। परन्तु नए तरीके की जीत हुई।
इसके बाद कविता की अधिक अच्छी शैली में एक और अनुवाद सामने लाया गया, और एक नए तरीके के रूप में उसके चलाए जाने का बहुत झगड़े के साथ विरोध हुआ। और अन्त में वॉट्स का अनुवाद आया, जिसका आज भी बहुत-सी कलीसियाओं में विरोध होता है। अभी 1828 की ही बात है, जब मैं फ़िलाडेल्फ़िया में था, मुझे बताया गया कि वहाँ एक पादरी अपनी मंडली को भजन-गायन पर व्याख्यानों की एक श्रृंखला सुना रहा था, ताकि वह उन्हें उस अनुवाद से, जिसके वे आदी थे, भजनों और गीतों के एक अधिक अच्छे अनुवाद का उपयोग करने के लिये तैयार कर सके। और आज भी बहुत-सी मंडलियों में ऐसे लोग हैं जो, यदि किसी नई पुस्तक में से कोई भजन या गीत गाने के लिये बताया जाए, तो गिरजाघर से बाहर चले जाएँगे। और यदि वॉट्स के भजन अपना लिये जाएँ, तो वे ऐसी नई बात को सहन करने के बजाय अलग होकर एक नई मंडली बना लेंगे। प्रार्थना-सभाओं में “विलेज हिम्स” (ग्राम-गीत) चलाने से भी इसी प्रकार की भावना भड़की है। इस नगर की एक प्रेस्बिटेरियन मंडली में, कुछ ही वर्ष पहले, पादरी की पत्नी स्त्रियों की प्रार्थना-सभाओं में “विलेज हिम्स” चलाना चाहती थी, इससे आगे बढ़ने का साहस उसने नहीं किया। उसने सोचा कि वह सफल हो जाएगी। परन्तु कुछ सावधान लोगों ने पता लगा लिया कि वह पुस्तक न्यू इंग्लैंड में बनी थी, और उन्होंने उसे स्वीकार करने से इन्कार कर दिया। “मैं कहता हूँ, यह कोई हॉपकिन्सवादी चीज़ है।”
(2.) भजनों को पंक्ति-पंक्ति करके बोलना। पहले, जब पुस्तकें बहुत कम थीं, तो भजनों को “पंक्ति-पंक्ति बोलने” की, जैसा कि इसे कहा जाता था, प्रथा थी। डीकन मंच के सामने खड़ा होकर भजन या गीत की एक-एक या दो-दो पंक्तियाँ पढ़कर सुनाता, और फिर गाता, और बाकी सब साथ में गाने लगते। कुछ समय बाद उन्होंने पुस्तकें चलानी आरम्भ कीं, और हर एक को अपनी पुस्तक में से गाने दिया। और यह कैसी नई बात थी! हाय, इससे कैसी गड़बड़ी और अव्यवस्था फैली! भले लोग गाने के द्वारा परमेश्वर की आराधना कैसे कर सकते थे, जब डीकन अपने पवित्र स्वर में भजन की पंक्तियाँ बोलनेवाला न हो, क्योंकि उसकी पवित्रता बहुत कुछ उस स्वर ही में प्रतीत होती थी, जो ऐसा होता था कि आप कठिनाई से बता सकते थे कि वह पढ़ रहा है या गा रहा है।
(3.) गायक-दल। इसके बाद एक और नई बात चलाई गई। यह उचित समझा गया कि गायकों का एक चुना हुआ दल अलग बैठकर गाए, ताकि संगीत को सुधारने का अवसर मिले। परन्तु इसका कड़ा विरोध हुआ। ओह, कितनी ही मंडलियाँ इस कारण टूटकर फट गईं कि पादरी और कुछ प्रमुख व्यक्ति गायक-दल बनाकर संगीत के अभ्यास में सुधार लाना चाहते थे। लोग नई बातों और नए तरीकों की चर्चा करते थे, और सोचते थे कि कलीसियाओं पर बड़ी बुराइयाँ आनेवाली हैं, क्योंकि गायक अलग बैठते थे, और संगीत का अभ्यास करते थे, और ऐसी नई धुनें सीखते थे जिन्हें बूढ़े लोग गा नहीं सकते थे। जब वे जवान थे तब ऐसा नहीं होता था, और वे कलीसिया में ऐसी नई रोशनियों और नवीनताओं को सहन नहीं करते थे।
(4.) पिचपाइप (सुर-बाँसुरी)। जब संगीत का अभ्यास होने लगा, और गायक-दल एक साथ बैठने लगे, तो गायकों को पिचपाइप की आवश्यकता हुई। पहले, जब डीकन या क्लर्क पंक्तियाँ बोलता था, तो वही धुन छेड़ देता था, और बाकी लोग जैसे-तैसे उसके पीछे चलते थे। परन्तु जब गायक-दलों के अगुवों ने सब के स्वरों को ठीक एक ही सुर पर मिलाने के लिये पिचपाइप का उपयोग आरम्भ किया, तो इससे कैसी भारी गड़बड़ी मच गई! मैंने एक पादरी को यह कहते सुना कि जिस नगर में वह पहले रहता था, वहाँ का एक प्राचीन, जब भी गायक-दल के अगुवे को अपना पाइप बजाते सुनता, तो उठकर भवन से बाहर चला जाता था। वह कहता, “हटाओ अपनी सीटी!” “क्या! परमेश्वर के भवन में सीटी!” वह इसे अपवित्रता समझता था।
(5.) वाद्य-संगीत। कुछ समय बाद कुछ मंडलियों में गायकों की सहायता करने और संगीत को सुधारने के उद्देश्य से तरह-तरह के वाद्य चलाए गए। जब पहली बार बेस वायल लाया गया, तो इससे बड़ी खलबली मच गई। लोग ज़ोर देकर कहते थे कि फिर तो वे परमेश्वर के भवन में फिडल (सारंगी) ही रख लें। “अरे, यह तो फिडल ही है, यह ठीक फिडल जैसा ही बना है, बस थोड़ा बड़ा है, और जहाँ फिडल हो वहाँ कौन आराधना कर सकता है? कुछ समय बाद तुम सभा-भवन में नाचना भी चाहोगे।” किसने इन बातों की ऐसी चर्चा नहीं सुनी मानो ये धर्म के कार्य और कलीसिया की शुद्धता के लिये सबसे अधिक महत्व के विषय हों? पादरियों ने गम्भीर कलीसियाई सभाओं में इन पर वाद-विवाद करने में दिन के दिन बिता दिए हैं। प्रेस्बिटेरियन कलीसिया की एक धर्मसभा (सिनॉड) में, केवल कुछ ही वर्ष पहले, कुछ लोगों ने गम्भीरता से इसे
किसी एक कलीसिया के विरुद्ध अनुशासन की कार्यवाही के योग्य विषय बताया कि उन्होंने परमेश्वर के भवन में ऑर्गन रखा था। यह कुछ ही वर्षों के भीतर की बात है। और आज भी बहुत-सी कलीसियाएँ हैं जो ऑर्गन को सहन नहीं करेंगी। यह सुनकर कि पापी नरक में जा रहे हैं, वे इतनी उत्तेजित न होंगी जितनी यह सुनकर कि सभा-भवन में ऑर्गन लगनेवाला है। ओह, कितने ही स्थानों में कलीसिया से कोई भी दूसरा काम करवा लेना इस बात से अधिक सरल है कि वह सहज और स्वाभाविक ढंग से आगे आकर वह करे जो धर्म को बढ़ावा देने और प्राणों का उद्धार करने के लिये आवश्यक, सबसे बुद्धिमानी का और सबसे अच्छा है! वे ऐसा व्यवहार करते हैं मानो उनके पास हर उस रीति और प्रथा के लिये, जो उन्हें पीढ़ियों से मिली है, या जिस पर वे स्वयं लम्बे समय से चलते आए हैं, चाहे वह कितनी ही बेतुकी या हानिकारक क्यों न हो, “यहोवा यों कहता है” का प्रमाण हो। (6.) बिना तैयारी के (मुँहज़बानी) प्रार्थनाएँ। कितने ही लोग ऐसे हैं जो ठीक ऐसे बात करते हैं मानो प्रार्थना-पुस्तक ईश्वरीय विधि हो! और मैं समझता हूँ कि बहुत-से लोग सचमुच ऐसा ही मानते हैं। और कलीसिया के कुछ भागों में किसी मनुष्य को अपने सामने अपनी पुस्तक रखे बिना प्रार्थना करने की अनुमति नहीं दी जाती।
(7.) बिना लिखे नोट्स के प्रचार करना। कुछ वर्ष पहले फ़िलाडेल्फ़िया की एक महिला को एक पादरी का प्रचार सुनने के लिये बुलाया गया, और उसने इन्कार कर दिया, क्योंकि वह अपने प्रवचन पढ़कर नहीं सुनाता था। वह यह समझती प्रतीत होती थी कि किसी मनुष्य का मंच पर जाकर ऐसे बोलना मानो वह लोगों से किसी रोचक और महत्वपूर्ण विषय पर बात कर रहा हो, अपवित्रता होगी। मानो परमेश्वर ने नोट्स और लिखे हुए प्रवचनों के उपयोग की आज्ञा दी हो। वे नहीं जानते कि स्वयं नोट्स भी एक नई बात हैं, और वह भी आधुनिक। वे इंग्लैंड में राजनीतिक कठिनाइयों के समय चलाए गए थे। पादरी डरते थे कि कहीं उन पर सरकार के विरुद्ध कुछ प्रचार करने का दोष न लगाया जाए, जब तक कि वे पहले से सब कुछ लिखकर यह न दिखा सकें कि उन्होंने क्या प्रचार किया था। और अवसरवादी मनोभाव के साथ वे राजनीतिक विचारों के आगे झुक गए, और उन्होंने कलीसिया पर दासत्व का जूआ रख दिया। और अब बहुत-से स्थानों में वे बिना तैयारी के (मुँहज़बानी) प्रचार को सहन नहीं कर सकते।
(8.) घुटने टेककर प्रार्थना करना। इससे देश के बहुत-से भागों में बड़ी हलचल मची है। न्यू इंग्लैंड की कॉन्ग्रिगेशनल कलीसियाओं में एक समय ऐसा था जब कोई पुरुष या स्त्री प्रार्थना-सभा में घुटने टेके हुए दिखाई देने में लज्जित होता, इस डर से कि कहीं उसे मेथोडिस्ट न समझ लिया जाए। मैंने ऐसे परिवारों में प्रार्थना की है जहाँ घुटने टेकनेवाला केवल मैं ही था। मेरा अनुमान है कि बाकी सब इसलिये खड़े रहे कि कहीं वे मेथोडिस्टों की नकल न करने लगें, और इस प्रकार स्थापित रीति में नई बातों का समर्थन न करने लगें। फिर दूसरे लोग ऐसे बात करते हैं मानो घुटने टेकने के सिवाय कोई दूसरी मुद्रा प्रार्थना में ग्रहणयोग्य हो ही नहीं सकती।
3. साधारण (अपुरोहित) लोगों के परिश्रम।
(1.) साधारण लोगों की प्रार्थनाएँ। पहले इस बात पर बहुत आपत्ति की जाती थी कि किसी भी मनुष्य को, जब तक वह पादरी न हो, प्रार्थना करने या प्रार्थना-सभा के संचालन में भाग लेने दिया जाए। कहा जाता था कि किसी साधारण व्यक्ति का सार्वजनिक रूप से प्रार्थना करना पादरियों की प्रतिष्ठा में हस्तक्षेप करना है, और इसे सहन नहीं किया जा सकता। पेन्सिल्वेनिया के एक पादरी ने मुझे बताया कि कुछ वर्ष पहले उसने गिरजाघर में एक प्रार्थना-सभा ठहराई, और प्राचीनों ने इसका विरोध किया और उसे भवन से बाहर निकाल दिया। उन्होंने कहा कि वे ऐसा काम नहीं होने देंगे, उन्होंने प्रार्थना करने के लिये एक पादरी को वेतन पर रखा है, और वही प्रार्थना करे, और वे साधारण लोगों को प्रार्थना करने नहीं देंगे।
पादरियों और बहुत-से दूसरे लोगों ने बहुत व्यापक रूप से किसी साधारण व्यक्ति के सार्वजनिक रूप से प्रार्थना करने पर, और विशेषकर किसी पादरी की उपस्थिति में प्रार्थना करने पर, आपत्ति की है। इससे पादरियों का अधिकार घट जाएगा, और इसे सहन नहीं किया जा सकता था। इस राज्य में हुई एक धर्मसभा में एक धर्मसभाई प्रार्थना-सभा ठहराई गई। प्रबन्ध-समिति ने, क्योंकि यह एक औपचारिक कार्यक्रम होनेवाला था, पहले से ही उन व्यक्तियों को नियुक्त कर दिया जिन्हें भाग लेना था, और दो पादरियों और एक साधारण व्यक्ति के नाम दिए। वह साधारण व्यक्ति योग्यता और ज्ञान में अधिकांश पादरियों के बराबर था। परन्तु धर्मविज्ञान के एक डॉक्टर ने उठकर गम्भीरता से इस पर आपत्ति की कि उस धर्मसभा के सामने किसी साधारण व्यक्ति से प्रार्थना करने को कहा जाए। उसने कहा, ऐसा प्रचलित नहीं है; इससे पादरियों के अधिकारों का उल्लंघन होता है, और वह कोई नई बात नहीं चाहता। कैसी दशा है! (2.) साधारण लोगों का उपदेश देना। यह एक अत्यन्त महत्व का प्रश्न बना दिया गया है, जिसने पूरे न्यू इंग्लैंड को, और देश के बहुत-से दूसरे भागों को भी, उद्वेलित कर दिया है, कि क्या साधारण लोगों को सार्वजनिक सभाओं में उपदेश देने की अनुमति दी जानी चाहिए। बहुत-से पादरियों ने साधारण लोगों के मुँह पूरी तरह बन्द करने का परिश्रम किया है। उन्होंने आरम्भिक कलीसियाओं की प्रथा को अनदेखा कर दिया। लगभग सौ वर्ष पहले इस प्रथा का इतना विरोध हुआ कि प्रेसिडेंट एडवर्ड्स को सचमुच यह विषय उठाना पड़ा, और साधारण लोगों के अधिकारों और कर्तव्यों के पक्ष में एक विस्तृत प्रतिवाद लिखना पड़ा। परन्तु यह विरोध आज तक पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। “क्या! एक ऐसा मनुष्य जो पादरी नहीं है, सार्वजनिक रूप से बोले! इससे गड़बड़ी फैलेगी, इससे सेवकाई की प्रतिष्ठा घटेगी; यदि हम साधारण लोगों को वही काम करने दें जो हम करते हैं, तो लोग हम पादरियों के विषय में क्या सोचेंगे?” आश्चर्य की बात है!
परन्तु अब अधिकांश स्थानों में ये सब बातें बीत चुकी हैं, और साधारण लोग बिना किसी आपत्ति के प्रार्थना कर सकते और उपदेश दे सकते हैं। साधारण लोगों के परिश्रम से जिन बुराइयों का डर था, वे सामने नहीं आईं, और बहुत-से पादरी प्रसन्न हैं कि साधारण लोग भलाई करने में अपने वरदानों का उपयोग करें।
4. स्त्रियों की प्रार्थना-सभाएँ। पिछले कुछ वर्षों में इस राज्य में स्त्रियों की प्रार्थना-सभाओं का व्यापक विरोध हुआ है। कैसी भयानक बातें! एक पादरी ने, जो अब नहीं रहा, कहा कि जब उसने पहली बार ये सभाएँ स्थापित करने का प्रयास किया, तो आसपास के सारे पादरी उसके विरोधी हो गए। “स्त्रियों से प्रार्थना करवाओगे? अरे, मैं समझता हूँ, अगला काम उनसे प्रचार करवाना होगा।” और यदि स्त्रियों को प्रार्थना करने के लिये इकट्ठा होने दिया जाए, तो सिय्योन की सुरक्षा के विषय में गम्भीर आशंकाएँ प्रगट की गईं। और आज भी कुछ कलीसियाओं में उन्हें सहन नहीं किया जाता।
कलीसिया के सभी सक्रिय प्रयासों के विषय में यही होता रहा है। मिशनों, संडे स्कूलों, और इस प्रकार की हर बात का विरोध हुआ है, और उन्होंने कलीसिया में अपनी वर्तमान पकड़ केवल एक के बाद एक संघर्षों और नई बातों की एक श्रृंखला के द्वारा ही पाई है। पेन्सिल्वेनिया की एक बैपटिस्ट एसोसिएशन ने कुछ वर्ष पहले ऐसे किसी भी पादरी से सारी संगति तोड़ने की घोषणा की जिसने उच्च शिक्षा पाई हो, या जो मिशनों, बाइबल सोसाइटियों, सब्त (विश्रामदिन) स्कूलों, मद्यनिषेध (संयम) समितियों इत्यादि का समर्थन करता हो। इन सब की निन्दा ऐसे नए तरीके कहकर की गई जो बाइबल में नहीं पाए जाते, और जो निश्चय ही कलीसियाओं में अशान्ति और गड़बड़ी फैलाएँगे। कुछ जर्मन कलीसियाओं में भी कुछ लोगों ने यही किया है। और बहुत-सी प्रेस्बिटेरियन कलीसियाओं में ऐसे लोग पाए जाते हैं जो यही पक्ष लेंगे, और इन सब बातों की—शायद शिक्षित सेवकाई को छोड़कर—नई बातें, नए तरीके, नई रोशनियाँ, अपने ही बल पर चलना, इत्यादि कहकर, और बड़ी बुराई करनेवाली बताकर निन्दा करेंगे।
5. मैं ऐसे कई व्यक्तियों का उल्लेख करूँगा जिन्हें परमेश्वर के विधान में इन नई बातों को चलाने में अगुवों के रूप में आगे रखा गया है।
(1.) जैसा कि आप सब जानते हैं, प्रेरित बड़े नई बातें चलानेवाले थे। पुनरुत्थान के बाद, और उन पर पवित्र आत्मा उंडेले जाने के बाद, वे कलीसिया को नए ढाँचे में ढालने निकल पड़े। उन्होंने तरीकों की यहूदी प्रणाली को तोड़ डाला और उसे जड़ से ऐसा उखाड़ दिया कि उसका शायद ही कोई चिह्न बचा।
(2.) लूथर और सुधारक। आप सब जानते हैं कि उन्हें किन कठिनाइयों से जूझना पड़ा, और उसका कारण यह था कि वे नए तरीके चलाने का प्रयास कर रहे थे—धर्म के सार्वजनिक कर्तव्यों को पूरा करने के नए ढंग, और सुसमाचार को सामर्थ के साथ मनुष्यों के हृदयों तक पहुँचाने के नए उपाय। रोमन कैथोलिकों की सारी विचित्र और हास्यास्पद बातों को कलीसिया में हठीली ज़िद के साथ ऐसे पकड़े रखा गया था मानो वे ईश्वरीय अधिकार से हों। और उन्हें बदलने के प्रयास से ऐसी उत्तेजना भड़की कि उसने लगभग सारे यूरोप को लहू में डुबो दिया।
(3.) वेस्ली और उसके सहकर्मी। वेस्ली ने आरम्भ में इंग्लैंड की राजकीय (स्थापित) कलीसिया से नाता नहीं तोड़ा, परन्तु हर जगह छोटी-छोटी कक्षाएँ (क्लास) बनाईं, जो बढ़कर कलीसिया के भीतर एक कलीसिया बन गईं। वह एपिस्कोपल कलीसिया में बना रहा, परन्तु उसने इतने नए तरीके चलाए कि सारा इंग्लैंड उत्तेजना, कोलाहल और विरोध से भर गया, और हर जगह उसकी निन्दा नई बातें चलानेवाले, और राजद्रोह भड़कानेवाले, और ऐसी नई बातें सिखानेवाले के रूप में की गई जिन्हें ग्रहण करना उचित नहीं था।
व्हाइटफ़ील्ड भी उसी विचारधारा का व्यक्ति था, और वेस्ली के समान नई बातें चलानेवाला था। मेरा विश्वास है कि उसे और उसके कई साथियों को कॉलेज से इसलिये निकाल दिया गया था कि उन्होंने सामूहिक प्रार्थना-सभा जैसा नया तरीका आरम्भ किया था। वे एक साथ प्रार्थना करते और पवित्रशास्त्र की व्याख्या करते थे, और यह ऐसी दुस्साहसपूर्ण नई बात थी कि इसे सहन नहीं किया जा सकता था। जब व्हाइटफ़ील्ड इस देश में आया, तो कैसा आश्चर्यजनक विरोध खड़ा हुआ! कई बार वह अपने प्राण खोते-खोते बचा, और बाल-बाल बचकर निकला। अब हर कोई उसे उस युग की महिमा मानता है जिसमें वह जीवित था। और हमारे अपने सम्प्रदाय के बहुत-से लोगों ने अपने आप को पूर्वाग्रह से यहाँ तक मुक्त कर लिया है कि वे वेस्ली को न केवल एक भला, बल्कि एक बुद्धिमान और अत्यन्त उपयोगी व्यक्ति मानते हैं। उस समय लगभग सारी कलीसिया उन्हें शत्रुता की दृष्टि से देखती थी, इस डर से कि जो नई बातें वह चला रहा था, वे कलीसिया का नाश कर देंगी।
(4.) प्रेसिडेंट एडवर्ड्स। यह महान व्यक्ति अपने समय में नए तरीकों के लिये प्रसिद्ध था। दूसरी नई बातों के साथ-साथ, उसने पश्चाताप न करनेवाले माता-पिता के बच्चों को बपतिस्मा देने से इन्कार कर दिया। भक्तिहीनों के बच्चों को बपतिस्मा देने की प्रथा पिछली शताब्दी में न्यू इंग्लैंड की कलीसियाओं में चलाई गई थी, और लगभग सर्वत्र फैल चुकी थी। प्रेसिडेंट एडवर्ड्स ने देखा कि यह प्रथा गलत है, और उसने ऐसा करने से इन्कार कर दिया, और इस इन्कार ने न्यू इंग्लैंड की सारी कलीसियाओं को हिला दिया। सौ पादरी एक साथ मिल गए और उसे दबा देने का निश्चय किया। उसने इस विषय पर एक पुस्तक लिखी, और उन सब को पराजित कर दिया। इससे न्यू इंग्लैंड में अब तक की सबसे बड़ी उत्तेजनाओं में से एक उत्पन्न हुई। शायद क्रान्तिकारी युद्ध (अमेरिकी स्वतंत्रता-संग्राम) को छोड़कर किसी भी बात ने कभी इतनी उत्तेजना उत्पन्न नहीं की।
कनेक्टिकट की जनरल एसोसिएशन ने व्हाइटफ़ील्ड का समर्थन करने से इन्कार कर दिया, क्योंकि वह ऐसा नई बातें चलानेवाला था। “अरे, वह तो खुले में और कहीं भी प्रचार कर देगा!” भयानक! कैसी डरावनी बात है कि कोई मनुष्य खेतों में या सड़कों पर प्रचार करे। उसे निकाल बाहर करो।
ये सब समर्पित लोग थे, जो भलाई करने और प्राणों का उद्धार करने के मार्ग खोज रहे थे। और ठीक इसी प्रकार के विरोध का सामना उन्हें सभी कलीसियाई संस्थाओं की ओर से करना पड़ा, जो उनके मार्ग में रुकावट डालती थीं और उनके चरित्र और प्रभाव को नष्ट करने का प्रयास करती थीं। प्रेसिडेंट एडवर्ड्स के समय में धर्मविज्ञान के एक डॉक्टर ने व्हाइटफ़ील्ड और एडवर्ड्स, उनके साथियों और उनके तरीकों के विरुद्ध एक पुस्तक लिखी थी, जो आज भी उपलब्ध है, और जिस पर बहुत-से पादरियों ने हस्ताक्षर किए थे। इस नगर में एक पादरी ने व्हाइटफ़ील्ड के विरुद्ध एक पत्र प्रकाशित किया था, जिसमें नई बातों के विरुद्ध वही आपत्तियाँ उठाई गई थीं जो हम आज सुनते हैं। न्यूयॉर्क राज्य में जागृतियों के हाल के विरोध के समय, इस पत्र की एक प्रति एक धार्मिक पत्रिका के सम्पादक के पास इस निवेदन के साथ ले जाई गई कि वह उसे प्रकाशित करे। उसने इन्कार कर दिया, और कारण यह बताया कि यदि वह प्रकाशित हुआ, तो बहुत-से लोग उसे आजकल चल रहे विवाद पर लागू करेंगे। मैं इसका उल्लेख केवल यह दिखाने के लिये करता हूँ कि धर्म के कार्य को आगे बढ़ाने के लिये बनाए गए सभी नए तरीकों के विरुद्ध भिन्न-भिन्न युगों में उठनेवाला विरोध कितना एक-सा होता है।
6. वर्तमान पीढ़ी में बहुत-सी ऐसी बातें चलाई गई हैं जो उपयोगी सिद्ध हुई हैं, परन्तु इस आधार पर उनका विरोध हुआ है कि वे नई बातें थीं। और क्योंकि बहुत-से लोग अब भी उनके विषय में दुविधा में हैं, इसलिये मैंने उनके विषय में कुछ बातें कहना उचित समझा है। विशेष रूप से तीन बातें हैं जिन पर मुख्य रूप से टीका-टिप्पणी हुई है, और इसलिये मैं उनके विषय में बोलूँगा। वे हैं: चिन्तित खोजियों की सभाएँ, लगातार चलनेवाली सभाएँ, और चिन्तित खोजियों की बेंच। इन सब का विरोध होता है, और इन्हें नए तरीके कहा जाता है।
(1.) चिन्तित खोजियों की सभाएँ। इस नाम से जिन सभाओं के विषय में मैंने पहली बार सुना, वे न्यू इंग्लैंड में थीं, जहाँ वे चिन्तित पापियों से व्यक्तिगत बातचीत करने के लिये, और हर एक व्यक्ति की दशा के अनुसार शिक्षा देने के लिये ठहराई जाती थीं, ताकि उन्हें तुरन्त मसीह के पास ले जाया जा सके। स्पष्ट है कि उनका उद्देश्य पूरी तरह तर्कसंगत है, परन्तु उनका विरोध इसलिये हुआ है कि वे नई थीं। चिन्तित खोजियों की सभा चलाने के दो ढंग हैं, और इनमें से किसी से भी उनका उद्देश्य पूरा हो सकता है।
(a.) कुछ क्षण व्यक्तिगत बातचीत में बिताकर और हर एक व्यक्ति के मन की दशा जानकर, और फिर सब को सम्बोधित करते हुए एक ही बार में उनकी सारी भूलों को उठाकर और उनकी कठिनाइयों को दूर करके।
(b.) हर एक के पास जाकर, और हर एक व्यक्ति की दशा को अलग-अलग लेकर, और हर एक के साथ अलग से पूरे विषय पर बात करके, और उनसे यह प्रतिज्ञा करवाकर कि वे अपना हृदय परमेश्वर को सौंप देंगे। दोनों ही ढंग महत्वपूर्ण हैं, और व्यवहार में अत्यन्त सफल पाए गए हैं। परन्तु बहुत-से लोगों ने इन पर इसलिये आपत्ति की है कि ये नए थे।
(2.) लगातार चलनेवाली सभाएँ। ये नई नहीं हैं, बल्कि जब से पृथ्वी पर कलीसिया है, तब से किसी न किसी रूप में सदा होती आई हैं। यहूदियों के पर्व लगातार चलनेवाली सभाओं के सिवाय और कुछ न थे। ढंग के विषय में, वे आज की सभाओं से भिन्न रीति से चलाए जाते थे। परन्तु उद्देश्य वही था, अर्थात् लोगों के मनों पर ईश्वरीय बातों की और भी प्रबल छाप डालने के लिये कई दिन लगातार धार्मिक आराधना में लगाना। मसीहियों के सभी सम्प्रदाय, जब उनके बीच धर्म उन्नति करता है, लगातार चलनेवाली सभाएँ करते हैं। स्कॉटलैंड में वे अपने सभी प्रभु-भोज के अवसरों पर गुरुवार से आरम्भ करते थे और सब्त के बाद तक चलाते थे। एपिस्कोपेलियन, बैपटिस्ट और मेथोडिस्ट सभी लगातार चलनेवाली सभाएँ करते हैं। फिर भी आज हमारे दिनों में, विशेषकर प्रेस्बिटेरियनों के बीच, उनका विरोध हुआ है, और उन्हें नए तरीके कहा गया है, और हर प्रकार की बुराई से भरी हुई समझा गया है, यद्यपि उन पर इतनी स्पष्टता से और इतने व्यापक रूप से आशीष हुई है। मैं उनके विषय में कुछ बातें सुझाऊँगा जिन पर विचार किया जाना चाहिए।
(a.) उन्हें ठहराने में लोगों की परिस्थितियों का ध्यान रखा जाना चाहिए; कि क्या कलीसिया सभा को चलाने के लिये अपना ध्यान दे सकती और अपना समय लगा सकती है। कुछ उदाहरणों में इस नियम की उपेक्षा की गई है। कुछ लोगों ने समाज के आवश्यक कामकाज में बाधा डालना उचित समझा है। गाँव में वे कटनी के समय सभा ठहरा देते, और नगर में कारोबार के सबसे व्यस्त मौसम में, जब सब पुरुष अपने सांसारिक परिश्रम में अनिवार्य रूप से लगे और दबे हुए होते थे। इस मार्ग के पक्ष में यह कहा जाता है कि हमारे कामकाज को सदा परमेश्वर के काम के आगे झुकना चाहिए; कि अनन्त बातें सांसारिक बातों से इतनी अधिक महत्वपूर्ण हैं कि किसी भी प्रकार का सांसारिक कामकाज, और किसी भी समय, लगातार चलनेवाली सभा के आगे झुककर उसे स्थान दे। परन्तु जिस सांसारिक कामकाज में हम लगे हैं, वह हमारा काम नहीं है। वह भी उतना ही परमेश्वर का काम है, और उतना ही हमारा कर्तव्य है, जितनी हमारी प्रार्थनाएँ और लगातार चलनेवाली सभाएँ हैं। यदि हम अपने कामकाज को इस दृष्टि से नहीं देखते, तो हमने अभी धर्म का पहला पाठ भी नहीं सीखा; हमने सब काम परमेश्वर की महिमा के लिये करना नहीं सीखा। अपने कामकाज को धर्म से अलग करनेवाले इस दृष्टिकोण के साथ हम छः दिन अपने लिये जीते हैं, और सातवाँ दिन परमेश्वर के लिये। सच्चे कर्तव्य कभी एक-दूसरे में बाधा नहीं डालते। सप्ताह के दिनों के अपने उचित कर्तव्य हैं, और सब्त के अपने उचित कर्तव्य हैं, और हमें सप्ताह के हर दिन, और हर दिन के कर्तव्यों को पूरा करने में, समान रूप से भक्त होना है। हमें हल चलाना, बोना, अपना माल बेचना, और अपने-अपने विभिन्न धन्धों पर ध्यान देना है, परमेश्वर की महिमा पर उसी एकाग्र दृष्टि के साथ जिसके साथ हम सब्त के दिन गिरजाघर जाते हैं, और अपने परिवारों में प्रार्थना करते हैं, और अपनी बाइबल पढ़ते हैं। यह धर्म का पहला सिद्धान्त है। जो इस सिद्धान्त को नहीं जानता और इस पर नहीं चलता, उसने अभी भक्ति की वर्णमाला भी नहीं सीखी। अब वर्ष में कुछ विशेष मौसम होते हैं जिनमें परमेश्वर अपने विधान में मनुष्यों को कामकाज पर ध्यान देने के लिये बुलाता है, क्योंकि उस समय सांसारिक कामकाज विशेष रूप से अत्यावश्यक होता है, और यदि उसे करना है तो उसी मौसम में करना होगा; किसान के लिये बोआई और कटनी का समय, और व्यापारी के लिये कारोबार के मौसम। और हमें यह कहने का कोई अधिकार नहीं कि उन विशेष मौसमों में हम अपना कामकाज छोड़कर लगातार चलनेवाली सभा करेंगे। वास्तविकता यह है कि वह कामकाज हमारा नहीं है। और जब तक परमेश्वर अपने विधान के किसी विशेष संकेत के द्वारा यह न दिखाए कि उसकी इच्छा है कि हम ऐसे समयों में अलग होकर लगातार चलनेवाली सभा करें, तब तक उस समय उन्हें ठहराने को मैं परमेश्वर की परीक्षा करना समझता हूँ। यह ऐसा कहना है, “हे परमेश्वर, यह सांसारिक कामकाज हमारा काम है, और हम तेरे काम के लिये इसे अलग रखने को तैयार हैं।” जब तक परमेश्वर ने यह संकेत न दिया हो कि ऐसे मौसम में अपना आत्मा उंडेलना और अपने काम को जागृत करना उसकी इच्छा है, और इस प्रकार अपने लोगों को कुछ समय के लिये अपने साधारण कामकाज छोड़कर विशेष रूप से लगातार चलनेवाली सभा पर ध्यान देने के लिये बुलाया न हो, तब तक मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि ऐसी परिस्थितियों में परमेश्वर हम से कह सकता है, “यह किसने तुम से चाहा है?”
परमेश्वर को यह अधिकार है कि वह हमारे समय का जैसा चाहे वैसा उपयोग करे, और हमसे माँगे कि हम अपने समय का कोई भी भाग, या अपना सारा समय, शिक्षा और भक्ति के कर्तव्यों के लिए दे दें। और जब परिस्थितियाँ स्पष्ट रूप से इसकी माँग करें, तो हमारा कर्तव्य है कि हम बाकी सब काम-धंधे एक ओर रख दें, और प्राणों के उद्धार के लिए सीधे और निरन्तर प्रयत्न करें। यदि हम अपना काम-धंधा सही सिद्धान्तों पर, और सही उद्देश्यों से, और पूरी तरह परमेश्वर की महिमा के लिए करते हैं, तो जब कभी परमेश्वर के विधान में इसकी पुकार दिखाई दे, हम लगातार चलनेवाली सभाओं में भाग लेने के लिए अपना काम छोड़कर जाने पर कभी आपत्ति नहीं करेंगे। जो मनुष्य अपने आप को भण्डारी या मुनीम समझता है, वह सब्त (विश्रामदिन) के दिन अपने परिश्रम से विश्राम करने को कष्ट नहीं, वरन् सौभाग्य समझता है। स्वार्थी मालिक सब्त के दिन अपना कारोबार रोकने में अनिच्छा महसूस कर सकता है। परन्तु मुनीम, जो कारोबार अपने लिए नहीं बल्कि अपने मालिक के लिए करता है, सब्त के दिन विश्राम करने को सौभाग्य समझता है। इसी प्रकार यदि हम अपना काम-धंधा परमेश्वर के लिए करते हैं, तो यदि वह हमारा यह कर्तव्य ठहराए कि हम अपना सांसारिक काम रोककर लगातार चलनेवाली सभाओं में भाग लें, तो हम इसे कठिन नहीं समझेंगे। बल्कि हमें इसे छुट्टी के दिन के समान समझना चाहिए। इसलिए जब कभी आप किसी मनुष्य को यह दलील देते सुनें कि वह लगातार चलनेवाली सभाओं में भाग लेने के लिए अपना काम-धंधा नहीं छोड़ सकता—कि अपने काम-धंधे पर ध्यान देना उसका कर्तव्य है, तो यह डरने का कारण है कि वह उस काम-धंधे को अपना समझता है, और सभा को परमेश्वर का काम। यदि वह यह अनुभव करता कि दुकान या खेत का काम भी उतना ही परमेश्वर का काम है जितना लगातार चलनेवाली सभाओं में भाग लेना, तो निःसन्देह जब कभी परमेश्वर की ओर से यह संकेत मिलता कि समाज को उस काम के लिए बुलाया गया है, तब वह बड़ी खुशी से अपने सांसारिक परिश्रम से विश्राम करता, और परमेश्वर के भवन में जाकर ताज़गी पाता। यह बात विशेष ध्यान देने योग्य है कि यहूदियों के पर्व वर्ष के उन्हीं समयों में ठहराए गए थे जब अनिवार्य सांसारिक काम-धंधे का दबाव सबसे कम होता था।
कुछ उदाहरणों में ऐसी सभाएँ ठीक काम-धंधे के व्यस्त मौसम के दबाव के बीच ठहराई गई हैं, और उनके बाद कोई अच्छा परिणाम नहीं निकला, और स्पष्टतः इसका कारण यही था कि यहाँ बताए गए नियम पर ध्यान नहीं दिया गया। अन्य मामलों में, सभाएँ ऐसे समयों में ठहराई गई हैं जब सांसारिक काम-धंधे का बड़ा दबाव था, और फिर भी उन्हें उल्लेखनीय रूप से आशीष मिली। परन्तु उन मामलों में आशीष इसलिए मिली कि वह सभा परमेश्वर की इच्छा के संकेतों की आज्ञाकारिता में ऐसे लोगों द्वारा ठहराई गई थी जिनमें आत्मिक विवेक था, और जो समय के चिह्नों को समझते थे। और निःसन्देह बहुत से मामलों में ऐसे लोग सभाओं में आए जो सचमुच यह समझते थे कि वे परमेश्वर के काम पर ध्यान देने के लिए अपना काम-धंधा छोड़ रहे हैं, और ऐसे मामलों में उन्होंने वह किया जिसे वे सच्चा बलिदान समझते थे, और परमेश्वर ने दया करके उन्हें आशीष दी।
(b.) साधारणतः लगातार चलनेवाली सभाएँ, यदि सम्भव हो, एक ही पादरी द्वारा आरम्भ से अन्त तक चलाई जानी चाहिए, और मुख्य परिश्रम भी उसी के द्वारा होना चाहिए। कभी-कभी लगातार चलनेवाली सभाएँ आयोजित की गई हैं और इस बात पर भरोसा रखा गया कि प्रतिदिन अलग-अलग पादरी आते रहेंगे। और उन्हें कोई आशीष नहीं मिली। और इसका कारण स्पष्ट था। वे ऐसी मनोदशा में नहीं आते थे कि काम में पूरी तरह लग जाएँ, और वे लोगों के मन की दशा नहीं जानते थे कि जान सकें कि क्या प्रचार करना है। मान लीजिए कि कोई बीमार व्यक्ति प्रतिदिन एक अलग चिकित्सक को बुलाए। वह चिकित्सक न तो यह जानेगा कि अब तक क्या लक्षण रहे हैं, न रोग का या उपचार का क्रम क्या रहा है, न कौन-कौन सी दवाइयाँ आज़माई जा चुकी हैं, और न यह कि रोगी क्या सह सकता है। अजी, वह निश्चय ही रोगी को मार डालेगा। ठीक यही दशा उन लगातार चलनेवाली सभाओं की होती है जो एक के बाद एक आनेवाले पादरियों द्वारा चलाई जाती हैं। उनमें से कोई भी उसकी आत्मा में प्रवेश नहीं कर पाता, और साधारणतः वे भलाई से अधिक हानि करते हैं।
साधारणतः लगातार चलनेवाली सभाएँ तब तक नहीं ठहराई जानी चाहिए, जब तक कि लोग सही प्रकार की सहायता प्राप्त न कर सकें, और एक-दो ऐसे पादरी न पा लें जो सभाओं के समाप्त होने तक वहीं रहने के लिए सहमत हों। तब सम्भवतः उन्हें भरपूर आशीष मिलेगी।
(c.) सार्वजनिक सभाएँ इतनी अधिक नहीं होनी चाहिए कि वे कोठरी (एकान्त प्रार्थना) और परिवार के कर्तव्यों में बाधा डालें। अन्यथा मसीही अपनी आत्मिकता खो देंगे और परमेश्वर पर से अपनी पकड़ छोड़ देंगे, और सभाएँ ठण्डी पड़ जाएँगी।
(d.) परिवारों को अजनबियों की पहुनाई में अपने आप को इतना अधिक नहीं खपाना चाहिए कि वे प्रार्थना और अन्य कर्तव्यों की उपेक्षा करें। प्रायः ऐसा होता है कि जब लगातार चलनेवाली सभाएँ होती हैं, तो कलीसिया के कुछ प्रमुख परिवार, मेरा अभिप्राय उन परिवारों से है जिन पर सभाओं को सँभालने के लिए मुख्य रूप से भरोसा किया जाता है, काम में बिल्कुल भी सम्मिलित नहीं हो पाते। और इसका कारण यह है कि वे बहुत सेवा-टहल के कारण घबराए रहते हैं। वे प्रायः उन मेहमानों के लिए, जो दूर से सभाओं में आते हैं, प्रबन्ध करने में व्यर्थ कष्ट उठाते हैं, और बड़ी मूर्खता से ऐसा भोज तैयार करने में लग जाते हैं जो केवल आरामदायक ही नहीं बल्कि शानदार भी हो। यह बात सदा समझ ली जानी चाहिए कि परिवारों का कर्तव्य है कि वे जितना हो सके उतना कम काम और दिखावा करें, और अपनी पहुनाई को सबसे सरल ढंग से निभाएँ, ताकि उन सब को प्रार्थना करने, और सभा में जाने, और परमेश्वर के राज्य की बातों पर ध्यान देने का समय मिल सके।
(e.) हर हाल में अनावश्यक रूप से देर रात तक जागने से बचें। यदि लोग रात-रात भर देर तक जागते रहें, तो वे अनिवार्य रूप से शरीर को थका डालेंगे, और उनका स्वास्थ्य बिगड़ जाएगा, और फिर प्रतिक्रिया होगी। कभी-कभी वे अपने आप को इतना उत्तेजित हो जाने देते हैं कि उनकी नींद उड़ जाती है, और उनके भोजन का समय अनियमित हो जाता है, यहाँ तक कि वे टूट जाते हैं, और प्रतिक्रिया आनी ही है। जब तक नियमित बने रहने के लिए सबसे अधिक सावधानी न बरती जाए, उत्तेजना इतनी बढ़ जाएगी कि शरीर जवाब दे देगा, और वे शिथिल पड़ जाएँगे, और काम रुक जाएगा।
(f.) हर प्रकार की सम्प्रदायवादिता से सावधानीपूर्वक बचना चाहिए। यदि प्रचार में, या प्रार्थना में, या बातचीत में सम्प्रदायवादी आत्मा प्रकट हो जाए, तो वह सभाओं की सारी भलाई को निष्फल कर देगी।
(g.) लगातार चलनेवाली सभाओं पर ऐसा भरोसा रखने से सावधान रहें, मानो वे अपने आप में ही जागृति उत्पन्न कर देंगी। यह बड़े खतरे की बात है, और सदा से रही है। यही वह बड़ा कारण है कि कलीसिया को पीढ़ी-दर-पीढ़ी सदा अपने तरीके छोड़ने पड़े हैं —क्योंकि मसीही सफलता के लिए उन्हीं पर भरोसा करने लगे थे। लगातार चलनेवाली सभाओं के विषय में भी कुछ स्थानों पर ऐसा ही हुआ है। उन पर इतनी आशीष हुई है कि कुछ स्थानों पर लोगों ने सोचा कि यदि उनकी केवल लगातार चलनेवाली सभाएँ हो जाएँ, तो उन्हें आशीष मिल जाएगी, और पापियों का मन-परिवर्तन अपने आप हो जाएगा। और इसलिए उन्होंने कलीसिया में कोई तैयारी किए बिना अपनी सभाएँ ठहरा दीं, और बस किसी प्रसिद्ध पादरी को बाहर से बुलवा लिया, और उसे प्रचार करने में लगा दिया, मानो इसी से पापियों का मन-परिवर्तन हो जाएगा। यह स्पष्ट है कि इस प्रकार खड़ी की गई सभाओं से आशीष रोक ली जाएगी।
(h.) यह धारणा अपनाने से बचें कि लगातार चलनेवाली सभाओं के बिना जागृति का आनन्द नहीं उठाया जा सकता। कुछ कलीसियाएँ इस विषय में एक रोगग्रस्त मनोदशा में पहुँच गई हैं। उनका उत्साह पूरी तरह दौरे जैसा और ज्वरग्रस्त हो गया है, यहाँ तक कि वे जागृति को बढ़ावा देने के लिए उस एक ढंग के सिवाय और कुछ करने की सोचते ही नहीं। जब लगातार चलनेवाली सभाएँ होती हैं, तो वे अद्भुत रूप से उत्साही दिखाई देंगे, और फिर एक सुस्त दशा में डूब जाएँगे, जब तक कि अगली लगातार चलनेवाली सभाएँ एक और दौरा उत्पन्न न कर दें। और अब कलीसिया में बहुत से लोग सोचते हैं कि लगातार चलनेवाली सभाओं को छोड़ देना आवश्यक है, क्योंकि उनका इस प्रकार दुरुपयोग होता है। हर कलीसिया में इस बात से सावधान रहना चाहिए, ताकि वे उन्हें छोड़ देने के लिए विवश न हों, और उन सब लाभों को न खो बैठें जो लगातार चलनेवाली सभाएँ उत्पन्न करने के योग्य हैं।
(3.) चिन्तित खोजियों की बेंच।
इससे मेरा अभिप्राय सभा-स्थान में किसी विशेष बेंच को ठहराना है, जहाँ चिन्तित लोग आ सकें और उन्हें विशेष रूप से सम्बोधित किया जा सके, और उनके लिए प्रार्थना की जा सके, और कभी-कभी उनसे व्यक्तिगत रूप से बातचीत की जा सके। हाल में इस तरीके का विरोध अन्य किसी भी तरीके से अधिक हुआ है। इसके विरुद्ध बड़ी आपत्ति क्या है? मुझे तो कोई दिखाई नहीं देती। चिन्तित खोजियों की बेंच की योजना निःसन्देह विवेकपूर्ण है, और मन के नियमों के अनुसार है। इसके दो प्रभाव हैं:
1. जब कोई व्यक्ति अपने मन में गम्भीर रूप से व्याकुल होता है, तो सब जानते हैं कि उसे छिपाने की एक प्रबल प्रवृत्ति होती है। जब कोई व्यक्ति अपनी दशा के बोध से दबा हुआ हो, तब यदि आप उसे इस बात के लिए तैयार कर सकें कि यह बात दूसरों को मालूम हो जाए, यदि आप उसे घमण्ड की ज़ंजीरों को तोड़ने के लिए तैयार कर सकें, तो आपने उसके मन-परिवर्तन की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण बात प्राप्त कर ली है। यह मानव मन के विज्ञान के अनुकूल है। ऐसे कितने हज़ारों लोग हैं जो अनन्तकाल तक परमेश्वर को धन्य कहेंगे कि जब सत्य ने उन पर दबाव डाला, तब वे यह कदम उठाने के लिए लाए गए, जिसके द्वारा उन्होंने इस धारणा को उतार फेंका कि किसी को यह मालूम होना भयानक बात है कि वे अपने प्राण के विषय में गम्भीर हैं।
2. चिन्तित खोजियों की बेंच का दूसरा प्रभाव धोखे और भ्रम को पकड़ना है, और इस प्रकार झूठी आशाओं को रोकना है। इसका विरोध इस आधार पर किया गया है कि यह भ्रम और झूठी आशाएँ उत्पन्न करने वाली है। परन्तु यह आपत्ति अनुचित है। सच्चाई इसके उलटी है। मान लीजिए कि मैं मद्यनिषेध (संयम) के विषय पर प्रचार कर रहा हूँ, और पहले मैं मदिरापान की बुराइयाँ दिखाता हूँ, और पियक्कड़ और उसके परिवार को सामने लाता हूँ, और उससे उत्पन्न होनेवाली अनेक बुराइयाँ दिखाता हूँ, यहाँ तक कि हर हृदय भावना से धड़कने लगता है। फिर मैं थोड़ी मात्रा में पीने के बड़े खतरे का चित्र खींचता हूँ, और दिखाता हूँ कि वह कैसे नशे और विनाश की ओर ले जाता है, और यह कि पूर्ण परहेज़ के सिवाय और कहीं सुरक्षा नहीं है, यहाँ तक कि सौ हृदय यह कहने को तैयार हो जाते हैं, “मैं संसार में फिर कभी तेज़ शराब की एक बूँद भी नहीं पीऊँगा; यदि पीऊँ, तो मुझे पियक्कड़ की कब्र की आशा रखनी चाहिए।” अब मैं वहीं रुक जाता हूँ, और प्रतिज्ञा-पत्र घुमाया जाता है, और हर वह व्यक्ति जिसने पूरा निश्चय कर लिया है, उस पर हस्ताक्षर करने को तैयार है। परन्तु जब आप उनसे पूर्ण परहेज़ की प्रतिज्ञा पर हस्ताक्षर करने को कहने लगते हैं, तब कितने ही पीछे हटने और हिचकिचाने लगेंगे। कोई अपने मन में कहता है, “क्या मैं इस पर हस्ताक्षर करूँ या नहीं? मैंने तो सोचा था कि मेरा मन पक्का हो गया है, पर फिर कभी न पीने की प्रतिज्ञा पर यह हस्ताक्षर करना, इसके विषय में मैं नहीं जानता।” इस प्रकार आप देखते हैं कि जब किसी व्यक्ति से प्रतिज्ञा करने को कहा जाता है, तब यदि वह दृढ़निश्चयी नहीं पाया जाता, तो वह प्रकट कर देता है कि वह सच्चा नहीं था। अर्थात्, वह उस विषय में कभी ऐसे संकल्प तक नहीं पहुँचा था जिस पर भरोसा किया जा सके कि वह उसके आगे के जीवन को नियंत्रित करेगा। ठीक यही बात जागे हुए पापी के साथ है। उसे प्रचार कीजिए, और उस क्षण वह सोचता है कि वह कुछ भी करने को तैयार है; वह सोचता है कि उसने प्रभु की सेवा करने का दृढ़ निश्चय कर लिया है; परन्तु उसे परख में लाइए, उससे एक काम करने को कहिए, एक ऐसा कदम उठाने को कहिए जो उसे परमेश्वर के लोगों के साथ जोड़ दे, या उसके घमण्ड के विरुद्ध हो—तो उसका घमण्ड उभर आता है, और वह इनकार कर देता है; उसका भ्रम प्रकट हो जाता है, और वह पाता है कि वह अब भी एक खोया हुआ पापी है; जबकि यदि आपने ऐसा न किया होता, तो वह शायद अपने आप को यह झूठी तसल्ली देते हुए चला जाता कि वह मसीही है। यदि आप उससे कहें, “वह रही चिन्तित खोजियों की बेंच, बाहर आइए और खुलकर घोषणा कीजिए कि आपने प्रभु की ओर रहने का निश्चय किया है,” और यदि वह इतना छोटा सा काम करने को भी तैयार नहीं है, तो वह कुछ भी करने को तैयार नहीं है, और वहीं वह अपने ही विवेक के सामने प्रकट कर दिया जाता है। यह मानव हृदय के भ्रम को उघाड़ देती है, और उन लोगों को, जो अन्यथा यह कल्पना कर सकते थे कि वे मसीह के लिए कुछ भी करने को तैयार हैं, यह दिखाकर कि वास्तव में वे कुछ भी करने को तैयार नहीं हैं, बहुत से नकली मन-परिवर्तनों को रोक देती है।
कलीसिया ने सदा यह आवश्यक समझा है कि ठीक इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए इस प्रकार का कुछ न कुछ हो। प्रेरितों के दिनों में बपतिस्मा इस उद्देश्य को पूरा करता था। लोगों को सुसमाचार सुनाया जाता था, और फिर उन सब से, जो मसीह की ओर होने को तैयार थे, बपतिस्मा लेने को कहा जाता था। मसीही बनने के उनके निश्चय के सार्वजनिक प्रदर्शन के रूप में उसका ठीक वही स्थान था जो आज चिन्तित खोजियों की बेंच का है। और आधुनिक समय में, जिन लोगों ने चिन्तित खोजियों की बेंच का प्रचण्ड विरोध किया है, उन्हें कोई न कोई विकल्प अपनाना पड़ा है, नहीं तो वे जागृति को बढ़ावा देने में आगे नहीं बढ़ सकते थे। कुछ लोगों ने यह उपाय अपनाया है कि जो लोग अपने प्राण के विषय में चिन्तित थे, उन्हें न्योता दिया कि बाकी मंडली के चले जाने के बाद वे बातचीत के लिए रुक जाएँ। परन्तु इसमें अन्तर क्या है? यह भी उतनी ही परख ठहराना है जितना वह दूसरा तरीका। अन्य लोगों ने, जो चिन्तित खोजियों की बेंच का प्रयोग करने में बहुत लज्जित होते, उन लोगों से जिनके मन में इस विषय में कुछ भी भावना है, कहा है कि जब बाकी लोग चले जाएँ तब वे अपने स्थानों पर बैठे रहें। अन्य लोगों ने चिन्तित लोगों को व्याख्यान-कक्ष में चले जाने को कहा है। इन सब का उद्देश्य एक ही है, और सिद्धान्त भी एक ही है, कि लोगों को झूठी लज्जा की शरण से बाहर निकाला जाए। मैंने एक ऐसे व्यक्ति के विषय में सुना जो नए तरीकों के विरोध में बहुत आगे बढ़ा हुआ था, कि उसने अपनी एक सभा में उन सब लोगों से, जो परमेश्वर के अधीन होने को तैयार थे, या चाहते थे कि उनके लिए प्रार्थना की जाए, यह अनुरोध किया कि वे आगे की ओर झुककर और अपने सामने की बेंच पर सिर टिकाकर इसे प्रकट करें। कौन नहीं देखता कि यह चिन्तित खोजियों की बेंच से केवल कतराना था, और यह उसी के स्थान पर उसी उद्देश्य को पूरा करने के लिए था, और उसने इसे इसलिए अपनाया कि उसने अनुभव किया कि इस प्रकार का कुछ होना महत्त्वपूर्ण है?
तो अब किसी विशेष बेंच पर बैठने, या खड़े होने, या व्याख्यान-कक्ष में जाने के विरुद्ध क्या आपत्ति है? जब इन्हें उचित रीति से चलाया जाए, तो इन सब का अर्थ एक ही है। और सिद्धान्त की दृष्टि से ये बिल्कुल भी नई बातें नहीं हैं। सार रूप में यह बात सदा से की जाती रही है। यहोशू के दिनों में उसने लोगों से कहा कि वे निर्णय करें कि वे क्या करेंगे, और उन्होंने सभा में ही खुलकर कहा, “हम यहोवा ही की सेवा करेंगे; हम तो अपने परमेश्वर यहोवा ही की सेवा करेंगे, और उसी की बात मानेंगे।”
टिप्पणियाँ।
1. यदि हम कलीसिया के इतिहास की जाँच करें, तो हम पाएँगे कि नए तरीकों के बिना कभी कोई व्यापक सुधार नहीं हुआ। जब कभी कलीसियाएँ काम करने के किसी एक रूप में जम कर बैठ जाती हैं, तो वे शीघ्र ही उसके बाहरी रूप से किए जाने पर भरोसा करने लगती हैं, और इस प्रकार धर्म का रूप तो बनाए रखती हैं पर उसका सार खो देती हैं। और तब सदा यही पाया गया है कि केवल उसी स्थापित रूप पर चलते रहने से उन्हें ऐसा जगाना असम्भव है कि बुराइयों का सुधार हो, और धर्म की जागृति उत्पन्न हो। शायद यह कहना बहुत अधिक न होगा कि स्वयं परमेश्वर के लिए भी नए तरीकों के बिना सुधार लाना असम्भव है। कम से कम यह एक तथ्य है कि परमेश्वर ने सदा इसी मार्ग को चुना है, उस सबसे बुद्धिमानी भरे और सबसे उत्तम मार्ग के रूप में जिसे वह सोच सकता या अपना सकता था। और यद्यपि सदा यही हुआ है कि जिन तरीकों को परमेश्वर ने काम में लाने के लिए चुना है, और जिन पर उसने अपने काम को फिर से जिलाने में आशीष दी है, उन्हीं का नए तरीके कहकर विरोध किया गया है, और उनकी निन्दा की गई है, फिर भी वह उसी सिद्धान्त पर काम करता रहा है। जब उसने देखा है कि कोई विशेष ढंग केवल एक रूप बन जाने के कारण अपना प्रभाव खो बैठा है, तो वह कोई नया तरीका ले आता है, जो उनकी आलसी आदतों को तोड़ डाले, और सोती हुई कलीसिया को जगा दे। और इससे बड़ी भलाई हुई है।
2. सार रूप में वही भेद, जो आज विद्यमान हैं, सुधार और धर्म की जागृति के सब समयों में सदा विद्यमान रहे हैं। सदा ऐसे लोग रहे हैं जो अपने रूपों और धारणाओं, और काम करने की अपनी ठीक-ठीक रीति से विशेष रूप से चिपके रहे, मानो उनमें से हर एक के लिए उनके पास “यहोवा यों कहता है” हो। जो लोग उनसे भिन्न थे, जो उद्धार के सन्दूक को आगे बढ़ाने का प्रयत्न कर रहे थे, उन्हें उन्होंने मेथोडिस्ट, न्यू लाइट्स (नई ज्योतिवाले), रैडिकल (उग्रपंथी), न्यू स्कूल, नया धर्मविज्ञान, और अनेक अन्य निन्दापूर्ण नाम दिए हैं। और जो पतन उसके बाद हुए हैं, वे सदा दो कारणों से हुए हैं, जिन्हें कलीसिया को कदापि अनदेखा नहीं करना चाहिए।
(1.) ओल्ड स्कूल, या पुराने तरीकों वाला दल, अपने विरोध में डटा रहा है, और उसने काम के समर्थकों की किसी भी वास्तविक या दिखाई देनेवाली अविवेकपूर्ण बात को उत्सुकता से पकड़ लिया है।
ऐसे मामलों में कलीसियाओं का नए तरीकों के विरोध पर से भरोसा धीरे-धीरे उठ गया है, और “नया धर्मविज्ञान” और “नवीनता” की पुकार ने उन्हें डराना बन्द कर दिया है। वे देखते हैं कि परमेश्वर की आशीष उन्हीं के साथ है जिन पर इस प्रकार नए तरीकों और नवीनता का आरोप लगाया जाता है, और ओल्ड स्कूल के निरन्तर विरोध ने, और साथ ही न्यू स्कूल की निरन्तर सफलता ने, विरोध पर से उनका भरोसा नष्ट कर दिया है, और वे “न्यू लाइट्स,” और “नया धर्मविज्ञान,” और “नए तरीके” की लगातार पुकार सुनते-सुनते थक जाते हैं। इस प्रकार पलड़ा पलट गया है, और कलीसियाओं ने न्यू स्कूल के पक्ष में, और ओल्ड स्कूल के विरुद्ध दोषसिद्धि का निर्णय सुना दिया है।
(2.) परन्तु अब, मेरी बात पर ध्यान दीजिए: ठीक इसी स्थिति में शैतान ने बार-बार लाभ उठाया है, और कुछ व्यक्ति उठ खड़े हुए हैं, और नए तरीकों वाले दल पर कलीसियाओं के भरोसे से सहारा पाकर, और यह देखकर कि कलीसियाएँ विरोध से ऊब चुकी हैं और मसीह के राज्य के हितों को बढ़ानेवाला कोई भी काम करने को तैयार हैं, वे स्वयं अन्धाधुन्ध आगे बढ़ गए हैं, और कुछ उदाहरणों में कलीसियाओं को ठीक उन्हीं कठिनाइयों के भँवर में ले गए हैं जिनकी भविष्यवाणी उनके विरोधियों ने की थी। इस प्रकार, जब लड़ाई लड़ी जा चुकी थी, और विजय प्राप्त हो चुकी थी, तब कुछ भली मंशा वाले परन्तु उतावले व्यक्तियों के अविवेकी उत्साह ने ऐसी प्रतिक्रिया उत्पन्न कर दी जिसने वर्षों तक कलीसियाओं पर शोक की चादर फैला दी। जैसा कि भली-भाँति ज्ञात है, प्रेसिडेंट एडवर्ड्स के दिनों में ऐसा ही हुआ था। यह एक ऐसी चट्टान है जिस पर अब एक प्रकाश-स्तम्भ बना हुआ है, और यदि कलीसिया अब इस पर टकराकर फँस जाए, तो दोनों दल पूरी तरह निरुत्तर हैं। अब यह भली-भाँति ज्ञात है, या ज्ञात होना चाहिए, कि उन दिनों की जागृतियों के बाद जो पतन हुआ, और साथ ही वे पतन जो बार-बार हुए हैं, वे ओल्ड स्कूल के निरन्तर और हठीले विरोध, और न्यू स्कूल के कुछ व्यक्तियों की अन्ततः बुरी आत्मा और लापरवाही, दोनों के मिले-जुले प्रभाव के कारण हुए।
और यहाँ दोनों दलों के लिए चेतावनी का बिगुल स्पष्ट रूप से बजाया जाना चाहिए, कहीं ऐसा न हो कि शैतान ठीक उसी बिन्दु पर, और ठीक उन्हीं परिस्थितियों में हम पर प्रबल हो जाए, जहाँ वह इतनी बार प्रबल हुआ है। क्या कलीसिया अनुभव से कभी बुद्धि नहीं सीखेगी? सहस्राब्दी के आने से पहले कितनी बार, ओह, कितनी बार ये दृश्य दोहराए जाएँगे! वह समय कब आएगा जब कलीसिया में जागृति हो सके, और धर्म प्रबल हो सके, और कलीसिया में ऐसा विरोध न भड़के जो अन्त में प्रतिक्रिया ले आए?
3. नए तरीकों के विरुद्ध वर्तमान पुकार अत्यन्त हास्यास्पद है, जब हम यह विचार करते हैं कि वह किस ओर से आ रही है, और इस मामले की सारी परिस्थितियों पर ध्यान देते हैं। यह सचमुच आश्चर्यजनक है कि गम्भीर पादरी वर्तमान समय के नए तरीकों से सचमुच भयभीत हों, मानो नए तरीके सूर्य के नीचे कोई नई बात हों, और मानो काम करने का वर्तमान रूप और ढंग प्रेरितों से उतरकर आया हो, और “यहोवा यों कहता है” के द्वारा स्थापित किया गया हो: जबकि सच्चाई यह है कि पोपतन्त्र के घोर अन्धकार से कलीसिया का हर कदम आगे बढ़ना एक के बाद एक नए तरीके के आरम्भ किए जाने के द्वारा ही हुआ है। अब हम हमारे समय से पहले उठी “नवीनता” की पुकार को आश्चर्य से देखते हैं, और लगभग तिरस्कार की दृष्टि से देखने को प्रवृत्त होते हैं; और जब हम उन भयों पर दृष्टि डालते हैं जो बीते दिनों में कलीसिया के बहुत से लोगों के मन में नवीनता के विषय में थे, तो हमें उन आपत्तियों और कठिनाइयों का कारण समझाना कठिन लगता है जो उन्होंने उठाईं, और जो हमें निराधार और बेतुकी, यदि हास्यास्पद नहीं, तो कम से कम इतनी तो दिखाई देती हैं। परन्तु, मेरे श्रोताओ, क्या यह आश्चर्य की बात नहीं कि इतने बाद के समय में, जबकि कलीसिया को इन बातों का इतना अधिक अनुभव हो चुका है, गम्भीर और भक्त लोग पिछले दस वर्षों के सरल, विवेकपूर्ण और अत्यधिक सफल तरीकों के आरम्भ किए जाने से गम्भीरता से भयभीत हों? मानो नए तरीके कोई ऐसी चीज़ हों जिन्हें सहा न जाए, जिनकी प्रवृत्ति अत्यन्त विनाशकारी हो, और जिनके कारण कलीसिया के हर कोने-कोने में चेतावनी के स्वर और उनकी गूँज उठनी चाहिए।
4. हम देखते हैं कि ऐसा क्यों है कि जो लोग नए तरीकों के विषय में हो-हल्ला मचाते रहे हैं, वे जागृतियों को बढ़ावा देने में सफल नहीं हुए।
वे उन बुराइयों में, वास्तविक या काल्पनिक, उलझे रहे हैं जो परमेश्वर के इस महान और धन्य काम के साथ-साथ आई हैं। कि बुराइयाँ हुई हैं, इससे कोई इनकार करने का दावा नहीं करेगा। परन्तु मैं सचमुच विश्वास करता हूँ कि जब से संसार आरम्भ हुआ, तब से ऐसी कोई जागृति नहीं हुई, जो उतनी बड़ी सामर्थ और विस्तार वाली हो जितनी वह जो पिछले दस वर्षों से फैली हुई है, और जिसके साथ उतनी ही बड़ी या उससे भी बड़ी बुराइयाँ न आई हों। फिर भी कलीसिया का एक बड़ा भाग जागृतियों की बुराइयों पर लगातार ध्यान देकर स्वयं को और दूसरों को डराता रहा है। एक प्रेस्बिटेरियन धर्मविज्ञान विद्यालय के एक प्रोफेसर ने प्रेस्बिटेरियनों के नाम पत्रों की एक श्रृंखला लिखना अपना कर्तव्य समझा, जो व्यापक रूप से प्रसारित हुए, और जिनका उद्देश्य ऐसा प्रतीत होता था कि जागृतियों के साथ आनेवाली बुराइयों के विषय में कलीसिया की सारी सीमाओं में चेतावनी का बिगुल बजा दिया जाए। जब लोग परमेश्वर के किसी धन्य काम की उत्तमताओं के बजाय उसकी बुराइयों में उलझे रहते हैं, तब यह कैसे आशा की जा सकती है कि वे उसे बढ़ावा देने में उपयोगी होंगे? मैं यह सब बड़ी कृपालुता से कहना चाहूँगा, फिर भी यह एक ऐसी बात है जिस पर मुझे चुप नहीं रहना चाहिए।
5. नए तरीकों के बिना यह असम्भव है कि कलीसिया संसार का ध्यान धर्म की ओर खींचने में सफल हो। जनता के मन के सामने लगातार इतने अधिक उत्तेजित करनेवाले विषय लाए जाते हैं, इतनी भाग-दौड़ है, इतने लोग पुकारते हैं कि “देखो, यहाँ है,” और “देखो, वहाँ है,” कि कलीसिया बहुत उत्तेजक प्रचार, और जनता के कान तक पहुँचने के लिए तरीकों में पर्याप्त नवीनता के बिना, न तो अपनी भूमि पर टिकी रह सकती है, और न ध्यान आकर्षित कर सकती है। राजनीतिज्ञों, नास्तिकों और विधर्मियों के तरीके, धन के पीछे छीना-झपटी, विलासिता की बढ़ती, और वे दस हज़ार उत्तेजित करनेवाले और विरोधी प्रभाव जो कलीसिया पर और संसार पर पड़ते हैं, लोगों का ध्यान खींच लेंगे और सब मनुष्यों को पवित्रस्थान से और प्रभु की वेदियों से दूर कर देंगे, जब तक कि हम बुद्धि और भक्ति में न बढ़ें, और बुद्धिमानी से ऐसे नए तरीके न अपनाएँ जो मनुष्यों का ध्यान मसीह के सुसमाचार की ओर खींचने के योग्य हों। मैं इन व्याख्यानों के दौरान पहले ही कह चुका हूँ कि नई बातें उससे अधिक शीघ्रता से आरम्भ नहीं की जानी चाहिए जितनी कि वास्तव में उनकी माँग हो। उन्हें सबसे अधिक बुद्धिमानी, और सावधानी, और प्रार्थनाशीलता के साथ, और ऐसे ढंग से आरम्भ किया जाना चाहिए जिससे जितना हो सके उतना कम विरोध भड़के। परन्तु नए तरीके तो हमें अपनाने ही होंगे। और परमेश्वर कलीसिया को किसी भी बँधे-बँधाए रूपों में जम कर बैठ जाने से, और अपने तरीकों के वर्तमान या किसी अन्य संस्करण को सदा के लिए एक ही साँचे में ढाल देने से रोके।
6. यह स्पष्ट है कि इस युग के स्वभाव और आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए हमें अधिक उत्तेजक प्रचार की आवश्यकता है। पादरी साधारणतः इस बात को समझने लगे हैं। और उनमें से कुछ इसकी शिकायत करते हैं, और समझते हैं कि यह उन बातों के कारण है जिन्हें वे नए तरीके कहते हैं। वे कहते हैं कि जिन पादरियों को सुनकर हमारे पूर्वज प्रसन्न होते, उन्हें अब कोई नहीं सुनता, उन्हें कोई नियुक्ति नहीं मिलती, और न वे श्रोता जुटा पाते हैं। और वे सोचते हैं कि नए तरीकों ने लोगों की रुचि बिगाड़ दी है। परन्तु कठिनाई यह नहीं है। युग का स्वभाव बदल गया है, और इन लोगों ने अपने आप को उसके अनुसार नहीं ढाला, बल्कि प्रचार की वही कठोर, रूखी, नीरस शैली बनाए रखी है जो आधी सदी पहले काम आती थी।
मेथोडिस्टों को देखिए। उनके बहुत से सेवक, शब्द के साधारण अर्थ में, अनपढ़ हैं, उनमें से बहुत से सीधे कारखाने या खेत से लिए गए हैं, और फिर भी उन्होंने मंडलियाँ इकट्ठी की हैं, और अपना मार्ग बनाते हुए आगे बढ़े हैं, और हर जगह प्राणों को जीता है। जहाँ कहीं मेथोडिस्ट गए हैं, वहाँ उनके प्रचार के सादे, सीधे-चुभनेवाले और सरल, परन्तु उत्साही और सजीव ढंग ने सदा मंडलियाँ इकट्ठी की हैं। थोड़े ही प्रेस्बिटेरियन पादरियों ने इतनी बड़ी सभाएँ इकट्ठी की हैं, या इतने अधिक प्राणों को जीता है। तो क्या अब हमसे यह कहा जाएगा कि इन सब परिवर्तनों के बीच हमें काम करने के उसी पुराने, औपचारिक ढंग पर चलते रहना चाहिए? ऐसे प्रचार के द्वारा संसार का मन-परिवर्तन होना वैसा ही है जैसे नॉर्थ रिवर को उलटा बहा देना। जो लोग प्रचार की भिन्न शैली अपनाते हैं, जैसा कि मेथोडिस्टों ने किया है, वे हमसे आगे निकल जाएँगे। संसार इस पुराने ढंग की, या यों कहें कि नए ढंग की, सेवकाई के प्रभाव से छूटकर निकल जाएगा। यह असम्भव है कि जनता का मन ऐसे प्रचार से बँधा रहे। हमें उत्तेजक, सामर्थी प्रचार चाहिए, नहीं तो शैतान लोगों को ले जाएगा, केवल उनको छोड़कर जिन्हें मेथोडिस्ट बचा सकें। यह असम्भव है कि हमारे पादरी भलाई करते रहें, जब तक कि प्रचार की शैली के विषय में हमारे यहाँ नवीनताएँ न हों। बहुत से पादरी पहले से ही यह समझने लगे हैं कि एक मेथोडिस्ट प्रचारक, उच्च शिक्षा के लाभों के बिना भी, अपने चारों ओर ऐसी मंडली इकट्ठी कर लेगा जिसकी बराबरी एक प्रेस्बिटेरियन पादरी, जिसके पास शायद उससे दस गुना अधिक विद्या हो, नहीं कर सकता, क्योंकि उसमें दूसरे जैसा उत्कट ढंग नहीं है, और जब वह प्रचार करता है तो अपने श्रोताओं पर आग नहीं बरसाता।
7. हम देखते हैं कि युवा पादरियों का जागृतियों के विषय में सही विचार प्राप्त करना कितना महत्त्वपूर्ण है। बहुत से मामलों में मैंने देखा है कि हमारे उन युवकों को, जो सेवकाई के लिए तैयारी कर रहे हैं, जागृतियों, नए तरीकों, और ऐसी ही बातों की बुराइयों के विषय में डराने के लिए बड़ा परिश्रम किया जाता है। कुछ धर्मविज्ञान विद्यालयों में युवकों को सिखाया जाता है कि वे नए तरीकों को ऐसे देखें मानो वे शैतान के ही आविष्कार हों। ऐसे लोगों के यहाँ जागृतियाँ कैसे हो सकती हैं? इसलिए जब वे बाहर आते हैं, तो वे चारों ओर देखते हैं, और चौकसी करते हैं, और चौंक उठते हैं, मानो शैतान वहाँ हो। कुछ वर्ष पहले प्रिंसटन के कुछ युवक “जागृतियों की बुराइयाँ” विषय पर एक निबन्ध लेकर सामने आए। अब मैं जानना चाहूँगा कि जब से वे सेवकाई में हैं, तब से उन युवकों में से कितनों के लोगों के बीच जागृतियाँ हुई हैं; और यदि किसी के यहाँ हुई हैं, तो मैं जानना चाहूँगा कि क्या उन्होंने जागृतियों की बुराइयों के विषय में लिखे उस लेख के लिए पश्चाताप नहीं किया।
यदि मेरी आवाज़ इतनी ऊँची होती कि प्रिंसटन में सुनाई दे, तो मैं उन युवकों से इस विषय में बात करता। अब समय आ गया है कि इस बात पर साफ़-साफ़ बात की जाए। कलीसिया अपनी सब सीमाओं में उपयुक्त पादरियों की कमी के कारण कराह रही है। भले लोग परिश्रम कर रहे हैं और रात-दिन परिश्रम करने को तैयार हैं, ताकि युवकों को सेवकाई के लिए, धर्म की जागृतियों को बढ़ावा देने के लिए, शिक्षित करने में सहायता दें; और जब वे विद्यालय से बाहर आते हैं, तो उनमें से कुछ उन सब तरीकों से, जिन पर परमेश्वर आशीष देता है, उतना ही कतराते हैं जितना स्वयं पोपतन्त्र से।
क्या सदा ऐसा ही रहेगा? क्या हमें युवकों को सेवकाई के लिए शिक्षित करना होगा, और फिर वे नए तरीकों के विषय में ऐसे डरे-सहमे बाहर आएँ, मानो नए तरीके जैसी कोई चीज़ पहले कभी रही ही न हो? उन्हें यह जानना चाहिए कि नए तरीके कलीसिया में कोई नई बात नहीं हैं। वे आगे बढ़ते रहें, और स्वयं काम में लगे रहें, और नए तरीकों के विषय में डरें नहीं। मुझे यह देखकर दुःख हुआ है कि कुछ लोगों ने जागृतियों का विवरण देते समय स्पष्ट रूप से यह आवश्यक समझा कि वे प्रयोग किए गए तरीकों का ब्योरा बारीकी से दें, ताकि कोई यह निष्कर्ष न निकाले कि नए तरीके आरम्भ किए गए थे; स्पष्ट है कि वे यह अनुभव करते थे कि स्वयं कलीसिया भी उस जागृति को कम महत्त्व देगी, जब तक यह प्रकट न हो कि वह नए तरीकों के बिना बढ़ाई गई थी। इसके अतिरिक्त, यह दिखाने के लिए कि उसमें कुछ भी नया नहीं था, तरीकों का ब्योरा देने में यह सावधानी ऐसा लगता है मानो यह मान लेना हो कि नए तरीके इसलिए गलत हैं कि वे नए हैं, और कोई जागृति इसलिए अधिक मूल्यवान है कि वह नए तरीकों के द्वारा नहीं बढ़ाई गई। मुझे आशंका है कि इस प्रकार पहले ही बहुत बुराई हो चुकी है, और यदि यह चलन जारी रहा, तो बात यहाँ तक पहुँच जाएगी कि किसी जागृति को इस तथ्य से परखा जाएगा कि वह नए तरीकों के साथ हुई या पुराने तरीकों के साथ। मैं ऐसी आत्मा का कभी समर्थन नहीं करूँगा, और न ही किसी जागृति के विवरण को नए या पुराने तरीकों के आरोप से बचाने के लिए झुकूँगा। मैं विश्वास करता हूँ कि नए तरीके सही हैं, अर्थात् किसी तरीके के विरुद्ध यह कोई आपत्ति नहीं है कि वह नया है या पुराना।
कोई पादरी पूरी तरह अपने काम में लग जाए, और आशीष के लिए परमेश्वर के सामने अपना हृदय उण्डेल दे, और जब कभी वह देखे कि लोगों के मन के सामने सत्य को अधिक सामर्थ के साथ लाने के लिए किसी तरीके की आवश्यकता है, तो वह उसे अपना ले और न डरे, और परमेश्वर अपनी आशीष नहीं रोकेगा। यदि पादरी आगे नहीं बढ़ेंगे, और सामर्थ और उत्कटता के साथ सुसमाचार का प्रचार नहीं करेंगे, और प्राणों को बचाने के उद्देश्य से कुछ नया करने के लिए अपनी लीक से नहीं हटेंगे, तो वे पवित्र आत्मा को शोकित करके दूर कर देंगे, और परमेश्वर उन पर अपना शाप भेजेगा, और संसार में काम करने के लिए दूसरे पादरियों को खड़ा करेगा।
8. जागृतियों को बढ़ावा देने के लिए नए तरीके अपनाना पादरियों का अधिकार और कर्तव्य है। कुछ स्थानों पर कलीसिया ने अपने पादरी का विरोध किया है जब उसने उन तरीकों को काम में लाने का प्रयत्न किया जिन पर परमेश्वर ने जागृति के लिए आशीष दी है, और वे यहाँ तक बढ़ गए हैं कि उन्होंने अपनी प्रार्थना-सभाएँ छोड़ दीं, और प्राणों को बचाने का परिश्रम छोड़ दिया, और हर बात से अलग खड़े हो गए, क्योंकि उनके पादरी ने वे तरीके अपनाए जिन्हें वे नए तरीके कहते हैं। इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता कि वे तरीके अपने आप में कितने ही तर्कसंगत हों, या कितने ही समयानुकूल हों, या परमेश्वर उन पर कितनी ही आशीष दे। इतना ही पर्याप्त है कि उन्हें नए तरीके कहा जाता है, और वे नए तरीकों से कोई वास्ता नहीं रखेंगे, और न लोगों के बीच उन्हें सहेंगे। और इस प्रकार वे मार्ग में ही आपस में झगड़ पड़ते हैं, और परमेश्वर के आत्मा को शोकित करके दूर कर देते हैं, और जागृति को रोक देते हैं, जबकि उनके चारों ओर का संसार नरक की ओर जा रहा है।
अन्त में।—काम करने के विशेष रूपों और ढंगों से यह उत्साहपूर्ण चिपकाव, जिसने कलीसिया को तरीकों में नवीनताओं का विरोध करने के लिए प्रेरित किया है, कट्टरपन की तीव्र गन्ध देता है। और जो बात कम विचित्र नहीं है, वह यह है कि इस प्रकार के कट्टरपंथी सदा सबसे पहले “कट्टरपन” की पुकार मचाते हैं। रोमन कैथोलिक कलीसिया में वह कट्टरपन नहीं तो और क्या है, जो उन्हें अपने विशेष ढंगों, और रूपों, और रीति-रस्मों, और मूर्खताओं से इतने हठ के साथ चिपके रहने को विवश करता है? वे ऐसा व्यवहार करते हैं मानो ये सब बातें ईश्वरीय अधिकार से स्थापित की गई हों; मानो उनमें से हर एक के लिए “यहोवा यों कहता है” हो। अब हम ठीक ही इसे कट्टरपन की आत्मा कहते हैं, और इसे डाँट के योग्य समझते हैं। परन्तु प्रेस्बिटेरियन कलीसिया के लिए, या किसी भी अन्य कलीसिया के लिए, अपने विशेष रूपों के विषय में अड़ियल होना, और ऐसा व्यवहार करना मानो वे ईश्वरीय अधिकार से स्थापित किए गए हों, ठीक उतना ही पूरा कट्टरपन है। सच्चाई यह है कि परमेश्वर ने किसी भी कलीसिया में धर्म के हितों को बढ़ावा देने के लिए आराधना का कोई विशेष रूप या ढंग स्थापित नहीं किया है। सुसमाचार के युग के अधीन पवित्रशास्त्र इन विषयों पर पूरी तरह चुप है, और कलीसिया पर छोड़ दिया गया है कि वह ऐसी सब बातों के सम्बन्ध में अपने विवेक का प्रयोग करे। और मैं आशा करता हूँ कि इसे निर्दयता नहीं समझा जाएगा, जब मैं फिर से कहता हूँ कि मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि काम करने के किसी विशेष ढंग और रीति के लिए निर्दयी, क्रोधपूर्ण उत्साह, और नए तरीकों के विरुद्ध दबंग, मिटा डालनेवाली पुकार, कट्टरपन की तीव्र गन्ध देती है।
सुसमाचार के युग के अधीन तरीकों के विषय में केवल एक ही बात पर ज़ोर दिया गया है, कि सभ्यता और क्रम हो। “सारी बातें सभ्यता और क्रमानुसार की जाएँ।” हमसे अपेक्षा की जाती है कि हम हर प्रकार की गड़बड़ी और अव्यवस्थित आचरण से सावधान रहें। परन्तु सभ्यता और क्रम क्या है? क्या यह दावा किया जाएगा कि चिन्तित खोजियों की सभा, या लगातार चलनेवाली सभाएँ, या चिन्तित खोजियों की बेंच, सभ्यता और क्रम के विपरीत है? परमेश्वर के भवन की आराधना में जो कुछ भी असभ्य और अव्यवस्थित हो, मैं उसकी अत्यन्त सच्चे मन से निन्दा करूँगा, और अत्यन्त दृढ़ता से उसका विरोध करूँगा। परन्तु मैं यह नहीं मानता कि “क्रम” से हमें कोई ऐसा विशेष बँधा-बँधाया ढंग समझना चाहिए जिसमें कोई कलीसिया अपनी आराधना-विधि करने की आदी रही हो।
