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इब्रानियों 1:1-3 — पुत्र की महिमा: उसके व्यक्तित्व और उसके कार्य में
1 वह पुत्र जिसमें होकर परमेश्वर ने बातें की हैं
1. पूर्व युग में परमेश्वर ने बाप दादों से थोड़ा थोड़ा करके और भाँति भाँति से भविष्यद्वक्ताओं में होकर बातें करके, 2. इन दिनों के अन्त में हम से अपने पुत्र में होकर बातें कीं। परमेश्वर ने बातें की हैं! यह वह भव्य द्वार है जिससे होकर हम उस मन्दिर में प्रवेश करते हैं जिसमें परमेश्वर हम पर अपनी महिमा प्रगट करनेवाला है। हम तुरन्त स्वयं परमेश्वर की उपस्थिति में पहुँचा दिए जाते हैं। इस पत्री का एकमात्र उद्देश्य यह है कि हमें परमेश्वर तक ले जाए, परमेश्वर को प्रगट करे, और हमें स्वयं उसके सम्पर्क में लाए। मनुष्य परमेश्वर के लिए सृजा गया था। पाप ने उसे परमेश्वर से अलग कर दिया। मनुष्य अपनी आवश्यकता को अनुभव करता है, और परमेश्वर को खोजता है। यह पत्री छुटकारे का सुसमाचार-सन्देश लेकर आती है, ताकि हमें सिखाए कि परमेश्वर को कहाँ और कैसे पाएँ। जितने परमेश्वर के, हाँ, जीवते परमेश्वर के प्यासे हैं, वे सब निकट आएँ और सुनें।
परमेश्वर ने बातें की हैं! बोलना संगति का माध्यम है। यह इस बात का प्रमाण है कि बोलनेवाला जिससे बात करता है उसे अपने साथ संगति के योग्य समझता है; यह इस बात का चिह्न है कि वह उस संगति के लिए लालायित है। मनुष्य परमेश्वर के साथ संगति के लिए सृजा गया था। पाप ने उसे भंग कर दिया। प्रकृति परमेश्वर और उसके कार्यों के विषय में बताती है, परन्तु स्वयं उसके विषय में, उसके हृदय के विषय में, और हम पापियों के प्रति उसके प्रेम के विचारों के विषय में प्रकृति कुछ नहीं बता सकती। अपनी गहरी से गहरी दुर्दशा में मनुष्य परमेश्वर को खोजता है, परन्तु कितनी ही बार, जहाँ तक दिखाई देता है, व्यर्थ। परन्तु परमेश्वर की स्तुति हो, सदा के लिए नहीं। वह चुप्पी टूट गई है। परमेश्वर मनुष्य को अपने साथ संगति में लौट आने के लिए बुलाता है। परमेश्वर ने बातें की हैं! परमेश्वर ने बातें की हैं! कुछ समय तक अधूरे और अस्थायी रूप से भविष्यद्वक्ताओं में होकर, ताकि अपने आप के और भी सिद्ध प्रकाशन की तैयारी हो। परन्तु अब अन्त में यह आनन्द का समाचार सुनाई देता है: परमेश्वर ने अपने पुत्र में होकर बातें की हैं! परमेश्वर, वह अनन्त, अगम्य, अदृश्य परमेश्वर, बोला है! और वह भी अपने पुत्र में होकर! आहा, कैसा आनन्द और कैसी महिमा! कौन इसे माप सकता है? “सुन,
हे आकाश! और हे पृथ्वी, कान लगा! क्योंकि यहोवा ने कहा है।” परमेश्वर ने बातें की हैं! जब मनुष्य बोलता है तो वह अपने आप का प्रकाशन होता है, ताकि वह अपने हृदय के उन विचारों और स्वभावों को प्रगट करे जो अन्यथा छिपे रहते। जब परमेश्वर, जो अगम्य ज्योति में रहता है, अपनी महिमा की ऊँचाइयों से बोलता है, तो इसलिए बोलता है कि वह अपने आप को प्रगट करे। वह चाहता है कि हम जानें कि वह हम से कैसा प्रेम करता है और हमारे लिए कैसा लालायित रहता है, वह किस प्रकार उद्धार करना और आशीष देना चाहता है, और वह किस प्रकार चाहता है कि हम निकट आएँ और उसके साथ संगति में जीवन बिताएँ।
परमेश्वर ने अपने पुत्र में होकर बातें की हैं! स्वर्गदूतों और भविष्यद्वक्ताओं की सेवा केवल मार्ग तैयार करने के लिए थी; वह कभी न तो परमेश्वर के और न मनुष्य के हृदय को सन्तुष्ट कर सकती थी; परमेश्वर के जीवन की सच्ची सामर्थ्य, उसकी निकटता का पूरा अनुभव, पाप से सच्चा छुटकारा, हृदय में प्रेम का उण्डेला जाना — यह सब सृजी हुई वस्तुओं की सेवा के द्वारा नहीं पहुँचाया जा सकता था। स्वयं पुत्र को परमेश्वर का वचन होकर हमारे पास आना था, पिता के जीवन और प्रेम का वाहक होकर। स्वयं पुत्र को आना था कि हमें ईश्वरीय सत्ता के साथ जीवित सम्पर्क में लाए, हमारे हृदय में वास करे, जैसे वह परमेश्वर के हृदय में वास करता है, हम में परमेश्वर का वचन हो जैसे वह परमेश्वर में है, और इस प्रकार हमें इस बात का जीवित अनुभव दे कि परमेश्वर का हम से बातें करने का क्या अर्थ है। परमेश्वर ने बातें की हैं! किसी मनुष्य के शब्दों का महत्व उस धारणा के अनुसार होता है जो मैं उसकी बुद्धि, उसकी सच्चाई, उसकी सामर्थ्य और उसके प्रेम के विषय में रखता हूँ। परमेश्वर के वचन — आहा, कौन बता सकता है कि हमारे लिए उनका कितना मूल्य होना चाहिए! हर एक वचन अपने साथ परमेश्वर का सारा जीवन, उसकी सारी उद्धार करनेवाली सामर्थ्य और प्रेम लिए रहता है। परमेश्वर अपने पुत्र में होकर बोल रहा है! निश्चय ही जिन्होंने उसे जानना आरम्भ किया है, वे उसकी सुनने के लिए सब कुछ त्याग देने को तैयार होंगे।
परमेश्वर ने बातें की हैं! मनुष्यों के शब्दों ने प्रायः अद्भुत और प्रबल प्रभाव डाला है। परन्तु परमेश्वर के वचन — वे सृजनहार कार्य हैं, वे जो कहते हैं वही दे देते हैं। “जब उसने कहा, तब हो गया।” जब परमेश्वर अपने पुत्र में होकर बोलता है, तो वह उसे हमें दे देता है, न केवल हमारे लिए और हमारे साथ, वरन् हमारे भीतर। वह अपने हृदय की गहराई में से पुत्र को हमारे हृदय की गहराइयों में बोल देता है। मनुष्यों के शब्द बुद्धि या इच्छा से, भावनाओं या आवेगों से अपील करते हैं। परमेश्वर उससे बात करता है जो इन सब से गहरा है — हृदय से, हमारे भीतर की उस केन्द्रीय गहराई से जहाँ से जीवन के सोते निकलते हैं। आइए, हम विश्वास करें कि परमेश्वर के वचन में कैसी प्रबल, जिलानेवाली सामर्थ्य होगी।
परमेश्वर ने बातें की हैं! बोलना सुनने की माँग करता है। परमेश्वर केवल एक ही बात माँगता है — और वह इतनी सरल और उचित है — कि हम सुनें। क्या हम पवित्र श्रद्धा और आराधना के साथ, पूरे मन के ध्यान और समर्पण के साथ, उस पर कान न लगाएँगे जो वह इस पत्री में भी हम से कहना चाहता है? तब हम भी जानेंगे कि परमेश्वर का अपने पुत्र में होकर हम से बातें करना कैसी सामर्थ्य और कैसा आनन्द है। परमेश्वर आत्मा है। इस नाते उसके पास अपना जीवन या अपना प्रेम हम तक पहुँचाने का इसके सिवा और कोई मार्ग नहीं कि वह हमारी आत्मा में प्रवेश करे और वहाँ वास करे और कार्य करे। वहीं वह मसीह को वास कराता है, और वहीं वह मसीह में होकर हम से छुटकारा देनेवाले प्रेम और सामर्थ्य के वे वचन कहता है जो हमें जीवन देते हैं। मसीह के वचनों से हमें कोई लाभ नहीं हो सकता, जब तक कि वे हम पर यह न खोलें कि परमेश्वर हम में क्या कार्य कर रहा है, और हमें उस ओर न ले जाएँ जो हमारे हृदय में प्रगट होनेवाला है। परमेश्वर हृदय चाहता है — आइए, हम सुनने और लालसा करने के लिए अपना सारा हृदय खोल दें।
परमेश्वर ने अपने पुत्र में होकर बातें की हैं! जीवित यीशु, जो परमेश्वर की पवित्रता की धधकती भट्ठी में से, अनन्त प्रेम की जलती हुई लौ में से निकलकर आया है, वह स्वयं जीवित वचन है। आइए, इस पत्री के अध्ययन में, जिसमें उसकी महिमा इतनी अद्भुत रीति से प्रगट की गई है, हम यह खोजें कि उसके सम्पर्क में आएँ, उसे अपने हृदयों में ग्रहण करें, उसे अपना जीवन बना लें, ताकि वह हमें पिता के पास पहुँचा दे। आदि में परमेश्वर ने कहा, “उजियाला हो; तो उजियाला हो गया।” ठीक वैसे ही अब वह अपने पुत्र में होकर सृजनहार सामर्थ्य के साथ बोलता है, और मसीह की उपस्थिति और ज्योति प्राण का जीवन और ज्योति बन जाती है।
1. किसी विदेशी भाषा के लेखकों तक पहुँच पाने के लिए लोग उस भाषा को सीखने में कितना परिश्रम करते हैं! परमेश्वर की भाषा को, उसके वचन को, उसके पुत्र को समझने के लिए कोई भी परिश्रम बहुत बड़ा न समझा जाए। विदेशी भाषा सीखने के लिए मैं किसी ऐसे व्यक्ति को ढूँढ़ता हूँ जो उसे जानता हो, कि वह मुझे सिखाए। परमेश्वर की भाषा स्वर्गीय, आत्मिक, अलौकिक — पूर्णतः ईश्वरीय है; केवल पवित्र आत्मा ही मुझे उसे समझना, परमेश्वर के अपने विचार सोचना सिखा सकता है। मैं उसी को अपना शिक्षक बना लूँ।
“तब अब्राम मुँह के बल गिरा; और परमेश्वर उससे बातें करता रहा।” उतनी ही व्यक्तिगत और सीधी रीति से, वरन् उससे भी अधिक अद्भुत और प्रभावशाली रीति से, परमेश्वर अपने पुत्र में होकर मुझ से बातें करेगा; परन्तु गहरी, पवित्र श्रद्धा, और यह जानने की तीव्र लालसा कि परमेश्वर क्या कहता है — यही वह मनोभाव होना चाहिए जिसके साथ मैं इस पत्री का अध्ययन करूँ और धन्य पुत्र की सुनूँ।
“स्वर्गीय सत्य कहीं भी नहीं बोला जाता सिवाय मसीह की वाणी के द्वारा, और न सुना जाता है सिवाय मसीह की उस सामर्थ्य के द्वारा जो सुननेवाले में जीवित है।” “जो परमेश्वर से होता है, वह परमेश्वर की बातें सुनता है।” केवल वही, जो अपने आप को नए स्वभाव के अधीन कर देता है, सचमुच जान सकता है कि मसीह में होकर परमेश्वर का बोलना क्या है।
4. मसीह के जीवनकाल में परमेश्वर का वचन तीन बार सुनाई दिया। हर बार वह यही था: “यह मेरा प्रिय पुत्र है; उसकी सुनो।” “मैंने उसकी महिमा की है।” आइए, हम परमेश्वर को अपने हृदयों में यह एक वचन बोलने दें: मेरा प्रिय पुत्र। हे मेरे परमेश्वर! अपने पुत्र में होकर मुझ से बातें कर। आह, वह एक वचन अपने हृदय की गहराई में से मेरे हृदय की गहराई में बोल।
2 पुत्र भविष्यद्वक्ताओं से बढ़कर
1. पूर्व युग में परमेश्वर ने बाप दादों से थोड़ा थोड़ा करके और भाँति भाँति से भविष्यद्वक्ताओं में होकर बातें करके,
2. इन दिनों के अन्त में हम से अपने पुत्र में होकर बातें कीं। हम सब जानते हैं कि दो नियम हैं — पुराना और
नया। ये दो प्रबन्धों को, आराधना की दो रीतियों को, दो प्रकार के धर्मों को, उन दो मार्गों को दर्शाते हैं जिनके द्वारा परमेश्वर मनुष्य से व्यवहार रखता है और मनुष्य परमेश्वर के निकट आता है। पहला अस्थायी, तैयारी करनेवाला था, और उसका टल जाना ठहराया गया था। जो कुछ उसने दिया और जो कुछ उसने किया, वह सन्तुष्ट करने के लिए नहीं था, वरन् केवल किसी उत्तम वस्तु की आशा जगाने के लिए था जो आनेवाली थी। दूसरा उसकी पूर्ति था जिसकी प्रतिज्ञा की गई थी, और वह सदा बने रहने के लिए ठहराया गया था, क्योंकि वह स्वयं एक अनन्त छुटकारे का, अविनाशी जीवन की सामर्थ्य में मिलनेवाले उद्धार का सम्पूर्ण प्रकाशन था।
पुराने और नए, दोनों नियमों में परमेश्वर ही बोला। पुराने में भविष्यद्वक्ता और नए में पुत्र, दोनों समान रूप से परमेश्वर के सन्देशवाहक थे। परमेश्वर भविष्यद्वक्ताओं में होकर उतनी ही सच्चाई से बोला जितनी सच्चाई से पुत्र में होकर। परन्तु पुराने में सब कुछ बाहरी था और मनुष्यों की मध्यस्थता के द्वारा था। स्वयं परमेश्वर अभी मनुष्य में प्रवेश करके उस पर अधिकार नहीं कर सकता था और उसमें वास नहीं कर सकता था। नए में सब कुछ अधिक सीधे और प्रत्यक्ष रूप से ईश्वरीय है — एक भीतरी सामर्थ्य और वास्तविकता और जीवन में, जिसकी पुराने में केवल छाया और आशा थी। पुत्र, जो परमेश्वर है, हमें ठीक परमेश्वर की उपस्थिति में ले आता है।
और ऐसा क्यों था कि परमेश्वर ने बिलकुल आरम्भ से ही अपने आप को पुत्र में प्रगट नहीं किया, वरन् कर ही नहीं सका? उसकी आराधना और सेवा करने के इन दो मार्गों की क्या आवश्यकता थी? उत्तर दो प्रकार का है: यदि मनुष्य को सचमुच समझ-बूझकर और स्वेच्छा से परमेश्वर के प्रेम और छुटकारे को अपना बनाना था, तो उसे उसके लिए तैयार किए जाने की आवश्यकता थी। उसे सबसे पहले अपनी पूरी असमर्थता और निराशाजनक दुर्दशा को जानने की आवश्यकता थी। और इसलिए उसके हृदय को सच्ची लालसा और प्रतीक्षा में जगाया जाना था, ताकि परमेश्वर के पास जो कुछ देने को था उसका वह स्वागत करे और उसका मूल्य समझे।
जब परमेश्वर मसीह में होकर हम से बोलता है, तो वह पुत्र में वास करनेवाले पिता के रूप में बोलता है। “ये बातें जो मैं तुम से कहता हूँ, अपनी ओर से नहीं कहता, परन्तु पिता मुझ में रहकर अपने काम करता है।” जिस प्रकार मसीह में होकर परमेश्वर का बोलना एक भीतरी बात थी, उसी प्रकार परमेश्वर अब भी हम से किसी और रीति से नहीं बोल सकता। मसीह के बाहरी वचन, ठीक भविष्यद्वक्ताओं के वचनों के समान, इसलिए हैं कि हमें पवित्र आत्मा के द्वारा हृदय में होनेवाले उस भीतरी बोलने के लिए तैयार करें और उसकी ओर संकेत करें, जो अकेला ही जीवन और सामर्थ्य है। यही अपने पुत्र में होकर परमेश्वर का सच्चा बोलना है।
हमारे आत्मिक जीवन के लिए इस बात का अत्यधिक महत्व है कि हम मनुष्य के साथ परमेश्वर के व्यवहार की इन दो अवस्थाओं को ठीक-ठीक समझें। दो रीतियों से, एक से नहीं; दो से अधिक से भी नहीं — दो रीतियों से परमेश्वर ने बातें की हैं। वे दर्शाती हैं कि सारतः हर एक मसीही के साथ परमेश्वर की रीति क्या है। 1 उसके मन-परिवर्तन के बाद तैयारी और परख का एक समय आता है, यह देखने के लिए कि क्या वह पूरी आशीष के लिए स्वेच्छा से और मन से सब कुछ बलिदान करता है। यदि इस अवस्था में वह सच्चे प्रयत्न और संघर्ष में स्थिर बना रहे, तो उसे वे दो पाठ सीखने तक पहुँचाया जाएगा जिन्हें सिखाने के लिए पुराना नियम ठहराया गया था। वह अपनी असमर्थता के प्रति और भी गहराई से सचेत हो जाएगा, “जो विशेषताएँ पहले स्वयं प्रकाशन की पहचान थीं, वे अब अन्तिम प्रकाशन की मानवीय समझ की पहचान हैं।” — वेस्टकॉट।
और उसमें एक उत्तम जीवन के लिए प्रबल लालसा जाग उठेगी, जो मसीह के उस पूरे प्रकाशन में पाया जाता है जिसमें वह पूरा-पूरा उद्धार करने में समर्थ है। जब ये दो पाठ सीख लिए जाते हैं — अपने आप से निराशा का, और केवल परमेश्वर पर आशा का पाठ — तब प्राण, यदि वह विश्वास में अपने आप को पवित्र आत्मा की अगुवाई के अधीन कर दे, इस बात के लिए तैयार हो जाता है कि वह सचमुच नए नियम के जीवन में प्रवेश करे — परदे के भीतर, ठीक परमपवित्र स्थान में — जैसा कि इस पत्री में उसका वर्णन किया गया है। जहाँ मसीही लोग अधूरी शिक्षा के कारण, या उपेक्षा और आलस्य के कारण, सिद्धता की ओर आगे ले चलने के परमेश्वर के मार्ग को नहीं समझते, वहाँ मसीही जीवन सदा निर्बलता और असफलता से भरा रहेगा। इब्रानी मसीहियों के साथ ऐसा ही था। वे नए नियम के थे, परन्तु उनका जीवन उस सामर्थ्य और आनन्द का प्रदर्शन तो बिलकुल भी न था जिसे प्रगट करने के लिए मसीह आया था। वे उससे बहुत पीछे थे जो पुराने नियम के बहुत से पवित्र लोग रह चुके थे; और इसका कारण यह था: वे उस छुटकारे के स्वर्गीय स्वरूप को नहीं जानते थे जो मसीह लाया था। वे न तो उस स्वर्गीय स्थान को जानते थे जहाँ वह सेवा करता है, न उस स्वर्गीय आशीष को जो वह बाँटता है, न उस स्वर्गीय सामर्थ्य को जिसके द्वारा वह यह निश्चित करता है कि हम इन आशीषों का आनन्द उठाएँ। वे भविष्यद्वक्ताओं और पुत्र के बीच का अन्तर नहीं जानते थे; वे नहीं जानते थे कि इसका क्या अर्थ है कि परमेश्वर ने अब अपने पुत्र में होकर हम से बातें की हैं। इस पत्री का एकमात्र उद्देश्य यह है कि मसीह के स्वर्गीय याजकपद को, और उस स्वर्गीय जीवन को जिसमें वह अपनी ईश्वरीय सामर्थ्य से हमें प्रवेश देता है, हमारे सामने रखे। यही बात इस पत्री को सब युगों के लिए अमूल्य बनाती है कि वह हमें मसीही जीवन की आरम्भिक अवस्था से निकलकर परमेश्वर तक पूरी और सिद्ध पहुँच की अवस्था में आने का मार्ग सिखाती है।
आइए, हम इन दो अवस्थाओं के अन्तर को समझें और दृढ़ता से थामे रहें। एक में मनुष्य का कार्य अधिक प्रमुख है: परमेश्वर भविष्यद्वक्ताओं में होकर बोलता है। दूसरी में ईश्वरीय उपस्थिति और सामर्थ्य अधिक पूर्णता से प्रगट होती है: परमेश्वर पुत्र में होकर बोलता है, जो परमेश्वर के अपने जीवन को धारण करता और ले आता है, और हमें स्वयं परमेश्वर के साथ जीवित सम्पर्क में ले आता है। एक में मानवीय शब्द ही हमें व्यस्त रखते, प्रभावित करते और परमेश्वर को खोजने में सहायता देते हैं; दूसरी में ईश्वरीय, भीतर वास करनेवाला वचन भीतर अपनी सामर्थ्य प्रगट करता है। एक में विचारों और सच्चाइयों की, विधियों और प्रयत्नों की बहुतायत है; दूसरी में परमेश्वर के एक ही पुत्र की सरलता और एकता है, और केवल उसी पर विश्वास।
कितनों ने बाइबल के वचनों के अध्ययन और मनन और उन्हें स्वीकार करने के द्वारा परमेश्वर को पाना चाहा, और फिर भी असफल रहे। वे नहीं जानते थे कि ये तो केवल मार्ग-सूचक पट्टियाँ हैं जो जीवित पुत्र की ओर संकेत करती हैं — ऐसे वचन जो आते तो सचमुच परमेश्वर ही से हैं, अत्यन्त आवश्यक और लाभदायक हैं, फिर भी पर्याप्त नहीं; वे हमें अपनी सच्ची आशीष तभी देते हैं जब वे हमें इस स्थिति तक ले आते हैं कि हम स्वयं परमेश्वर को अपने पुत्र में होकर बोलते हुए सुनें।
1. हम में से कोई भी निचली अवस्था से सन्तुष्ट होकर न बैठ जाए। आइए, हम यह देखें कि पवित्र आत्मा के द्वारा परमेश्वर के साथ व्यक्तिगत संगति ही वह है जो मसीह देता है। परमेश्वर हमें उसी के लिए बुलाता है: मसीह स्वर्ग में जीवित है ताकि उस आत्मा के द्वारा जिसे वह स्वर्ग से देता है, इसे पूरा करे।
2. कोई बाइबल और परमेश्वर के वचनों के विषय में बहुत कुछ जान सकता है, और फिर भी निर्बल बना रह सकता है। आवश्यकता इस बात की है कि जीवित वचन को जाना जाए, जिसमें होकर परमेश्वर भीतर, जीवन और सामर्थ्य के साथ बोलता है। सब भविष्यद्वक्ता पुत्र की ओर, सच्चे भविष्यद्वक्ता की ओर संकेत करते हैं। आइए, हम उन्हें बड़ी निश्चितता के साथ अपने शिक्षक मानें, ताकि वे परमेश्वर को हम में प्रगट करें।
4. जब मैं कोई वचन बोलता हूँ, तो मैं चाहता हूँ कि उसका सारा अर्थ और बल उसके भीतर प्रवेश करे जिससे मैं बात कर रहा हूँ। इन अन्तिम दिनों में परमेश्वर के पास केवल एक ही वचन है। वह चाहता है कि वह वचन जो कुछ है और जिसका जो कुछ अर्थ है, वह सब हम में प्रवेश करे और हम में जीवित रहे। आइए, हम अपने हृदय खोल दें, और परमेश्वर उसमें वह एक वचन — यह मेरा पुत्र है — इस रीति से बोलेगा कि वह सचमुच पूरी तरह हमारा अपना हो जाएगा।
3 पुत्र — उसके व्यक्तित्व की महिमा
2. परमेश्वर ने हम से अपने पुत्र में होकर बातें कीं, जिसे उसने सारी
वस्तुओं का वारिस ठहराया, और जिसके द्वारा उसने सारी सृष्टि भी रची; 3. वह उसकी महिमा का प्रकाश, और उसके तत्व की ठीक छाप है, और सब वस्तुओं को अपनी सामर्थ्य के वचन से संभालता है। हम जानते हैं कि मनुष्य जिस किसी वस्तु पर अपना मन लगाता है, वह उसके जीवन पर प्रबल प्रभाव डालती है और उसके चरित्र पर अपनी छाप छोड़ जाती है। जो व्यर्थ वस्तुओं के पीछे चलता है, वह स्वयं व्यर्थ हो जाता है। जो अपनी कल्पना के गढ़े हुए देवता पर भरोसा रखता है, वह अपने धर्म को एक भ्रम पाएगा। जो जीवते परमेश्वर पर अपना मन लगाता है, वह पाएगा कि जीवता परमेश्वर उसके हृदय पर अधिकार कर लेता है और उसे भर देता है। यही कारण है कि यह बात इतने असीम महत्व की है कि हमें उस मसीह के विषय में, जिसके द्वारा परमेश्वर हम से बोलता है, केवल एक साधारण-सी धारणा ही न हो, वरन् हम उसे ठीक-ठीक जानें और परमेश्वर ने उसके विषय में जो कुछ प्रगट किया है उस सब से हमारा हृदय भरा हो। उसके विषय में हमारा ज्ञान हमारे विश्वास का भोजन होगा, और जैसा हमारा विश्वास होगा वैसा ही उसकी उद्धार करनेवाली सामर्थ्य का, और परमेश्वर के साथ उस संगति का, जिसमें वह ले चलता है, हमारा अनुभव होगा। आइए, हम सुनें कि उस पुत्र के विषय में, जिसमें होकर परमेश्वर हम से बोलता है, हमें क्या सिखाया गया है। जिसे उसने सारी वस्तुओं का वारिस ठहराया। सृष्टि में परमेश्वर का महान उद्देश्य और लक्ष्य यह था कि उसके पुत्र के लिए एक मीरास हो, जिसमें वह अपनी महिमा प्रगट करे और अपना परम आनन्द पाए। पुत्र ही अन्तिम कारण है, सब वस्तुओं का अन्त (लक्ष्य)। वही आदि भी है। जिसके द्वारा उसने सारी सृष्टि भी रची। वही उन सब वस्तुओं का मूल और कर्ता-कारण है जो अस्तित्व में हैं।
“जो कुछ उत्पन्न हुआ है, उसमें से कोई भी वस्तु उसके बिना उत्पन्न न हुई।” ईश्वरीय सत्ता में पुत्र का स्थान ऐसा था कि जो कुछ परमेश्वर से बाहर था, उस सब के साथ परमेश्वर का सम्बन्ध केवल पुत्र ही के द्वारा था। जो कुछ अस्तित्व में है, उस सब का अन्त और आदि उसी में मिलते हैं।
और वही मध्य भी है। सब वस्तुओं को अपनी सामर्थ्य के वचन से संभालता है। वह सब वस्तुओं को धारण किए हुए है, “सब वस्तुएँ उसी में स्थिर रहती हैं।” जैसे वे उसके बिना सृजी नहीं गईं, वैसे ही क्या वे उसके बिना बनी रह सकती हैं? वह हर क्षण उन्हें अपनी सामर्थ्य के वचन से संभाले रहता है, ठीक वैसे ही जैसे उसके वचन से वे सृजी गई थीं।
यही वह पुत्र है जिसके द्वारा परमेश्वर हम से बोलता है। और वह क्या है जो उसे सृजनहार और सृष्टि के बीच यह ऊँचा स्थान लेने के योग्य बनाता है? यह कि पुत्र होने के नाते केवल वही है जिसमें परमेश्वर की अगम्य और पूर्णतः अबोधगम्य महिमा प्रगट होती है, और जिसके द्वारा, मध्यस्थ के रूप में, वह असृजित परमेश्वर और उसके हाथों की रचनाएँ सम्पर्क और संगति में आ सकती हैं। सृष्टि के साथ उसका सम्बन्ध पिता के साथ उसके सम्बन्ध पर आधारित है। वह परमेश्वर की महिमा का चमकता तेज है, और उसके तत्व की ठीक छाप है। जैसे हम सूर्य को केवल उस ज्योति के द्वारा जानते हैं जो उससे चमकती है, वैसे ही मसीह परमेश्वर की महिमा का चमकता तेज, उसका प्रकाशन है। जैसे सूर्य से चमकनेवाली ज्योति उसी के स्वभाव की होती है, वैसे ही पुत्र पिता के साथ एक ही स्वभाव का है — परमेश्वर से परमेश्वर। और जैसे पुत्र अपने पिता का स्वरूप धारण करता है, क्योंकि उसने अपना जीवन और स्वभाव उसी से पाया है, वैसे ही परमेश्वर का पुत्र उसके तत्व की ठीक छाप है। वह पिता के साथ एक ही तत्व का है — उसकी ठीक छाप — और इसलिए अपने आप में जीवन रखता है, जैसे पिता अपने आप में जीवन रखता है।
कोई यह सोचने की परीक्षा में पड़ सकता है कि ये तो ऐसे धर्मविज्ञान के भेद हैं जो साधारण मसीही के लिए बहुत गहरे हैं, और हमारे मसीही विश्वास और जीवन के लिए आवश्यक नहीं। और लोग यह पूछने को प्रवृत्त होते हैं कि एक सीधे-सादे विश्वासी के लिए यह सब जानने का क्या महत्व हो सकता है? मेरे भाई, ऐसा न सोचिए। यह अत्यन्त आवश्यक है कि हम यीशु की महिमा को जानें। प्राण जितना अधिक उस महिमा से भरता है, और उसमें उसकी आराधना करता है, उतना ही अधिक वह देखेगा कि वह कितने भरोसे के साथ उस पर निर्भर हो सकता है कि वह हम में एक ईश्वरीय और अलौकिक कार्य करेगा, और हमें अपने पिता परमेश्वर के साथ वास्तविक, जीवित संगति में ले चलेगा। आह, हम इतने स्वार्थी और तुच्छ न बनें कि इस आशा से सन्तुष्ट हो जाएँ कि यीशु हमारा उद्धार करता है, जबकि हमें उसके साथ घनिष्ठ, व्यक्तिगत परिचय रखने की कोई चिन्ता न हो। यदि अपने लिए नहीं, तो परमेश्वर के लिए, उसके असीम प्रेम और अनुग्रह के लिए, आइए, हम इस धन्य पुत्र को, जिसे पिता ने हमें दिया है, ठीक-ठीक जानने का यत्न करें। आइए, हम पृथ्वी से मुँह मोड़ लें, आइए, हम मनन करें और टकटकी लगाएँ और आराधना करें, जब तक कि वह, जो ईश्वरीय महिमा का चमकता तेज है, हमारे हृदय के भीतर तक न चमके, और वह, जिसे पिता ने सब का सृजनहार और संभालनेवाला और वारिस होने का ऐसा स्थान दिया है, हमारे साथ भी वही स्थान न ले ले, और हमारे लिए सब का आदि और केन्द्र और अन्त न बन जाए।
परमेश्वर इसी पुत्र के द्वारा हम से बोलता है। केवल पुत्र के वचनों के द्वारा नहीं, क्योंकि वे भी मानवीय शब्द हैं, और ठीक भविष्यद्वक्ताओं के प्रेरित वचनों के समान, उनसे भी बहुत थोड़ा ही लाभ हो सकता है। परमेश्वर पुत्र के द्वारा — जीवित, सामर्थी, ईश्वरीय पुत्र के द्वारा — सीधे बोलता है; केवल पुत्र के साथ सीधे, जीवित सम्पर्क में ही वे वचन लाभ पहुँचा सकते हैं। और वह पुत्र, वैसा नहीं जैसा हम ऊपरी तौर पर उसके विषय में सोचते हैं, वरन् वह सच्चा ईश्वरीय पुत्र जैसा परमेश्वर ने उसे प्रगट किया है — जिसे ईश्वरीय महिमा के चमकते तेज के रूप में जाना जाता, पूजा जाता और जिसकी बाट जोही जाती है — परमेश्वर का यही पुत्र, हमारे हृदय में प्रवेश करके और वहाँ वास करके, वह है जिसमें होकर परमेश्वर हम से बोलेगा, और जिसमें होकर हम परमेश्वर के निकट लाए जाएँगे। जब मसीह पिता को प्रगट करता है, तो वह बुद्धि पर नहीं, कि हमें उसके विषय में नए विचार दे, वरन् हृदय और जीवन में प्रगट करता है, ताकि हम उस सामर्थ्य को जानें और अनुभव करें जिसमें परमेश्वर मनुष्य में वास और कार्य कर सकता है, और उसे उस धन्य संगति के आनन्द में फिर से पहुँचा सकता है जिसके लिए वह सृजा गया था, और जिसे उसने पतन के द्वारा खो दिया था। स्वर्ग में परमेश्वर का महान कार्य, उसके हृदय का मुख्य विचार और लालसा यह है कि अपने पुत्र में होकर आपके हृदय तक पहुँचे और आप से बातें करे।
आह, इसे अपने जीवन का महान कार्य और अपने हृदय की महान लालसा बना लीजिए कि आप इस यीशु को एक दीन, नम्र चेले के रूप में जानें — उसके चरणों पर झुकें, और उसे अपने को परमेश्वर और अनन्त जीवन के विषय में सिखाने दें। हाँ, अभी इसी समय, आइए, हम उसकी उस चौगुनी महिमा में उसके सामने झुकें जिसमें वचन ने उसे हमारे सामने रखा है। वह उस सब का वारिस है जो परमेश्वर का है। वह उसका सृजनहार है। वह उसका संभालनेवाला भी है। वह परमेश्वर की महिमा का चमकता तेज है, और उसके तत्व की सिद्ध छाप है। हे मेरे उद्धारकर्ता! कुछ भी हो, बस मैं तुझे और अच्छी तरह जानूँ, और तुझ में होकर मेरा परमेश्वर मुझ से बातें करे! “कोई पुत्र को नहीं जानता, केवल पिता; और कोई पिता को नहीं जानता, केवल पुत्र और वह जिस पर पुत्र उसे प्रगट करना चाहे।” पुत्र को जानने के लिए हम पिता पर कितने निर्भर हैं; पिता को जानने के लिए पुत्र पर! आइए, हम गहरी दीनता में इस निर्भरता को स्वीकार करें, और विश्वास करें, और प्राण की नम्रता में ईश्वरीय प्रकाशन की बाट जोहें।
ऐसे समय आते हैं जब प्राण में परमेश्वर को जानने की गहरी लालसा उठती है। बाहरी शिक्षा सन्तुष्ट नहीं करती। ऐसी लालसा को परमेश्वर का प्रेम भरा खिंचाव समझकर सँजोकर रखिए। प्राण की शान्ति में संसार से मुँह मोड़िए, और उस गुप्त सामर्थ्य पर विश्वास कीजिए जो यीशु हृदय में प्रगट कर सकता है।
यीशु के चेले बन जाइए — ऐसे व्यक्ति जो उसके पीछे चलता है और उससे सीखता है। हे तू जो सब का वारिस, सृजनहार और संभालनेवाला है, पिता की महिमा का तेज, उसके तत्व की ठीक छाप, हे मेरे प्रभु यीशु, पिता को मुझ पर प्रगट कर, ताकि मैं जानूँ कि परमेश्वर मुझ से बातें करता है।
4 पुत्र — उसके कार्य की महिमा
3. वह, जब शुद्धि कर चुका
1 पापों की, तो ऊँचे स्थानों पर महामहिमन के दाहिने जा बैठा। मसीह के व्यक्तित्व की महिमा के वर्णन के बाद इस पुत्र के कार्य का वर्णन आता है, जिसमें होकर परमेश्वर हम से बोलता है। परमेश्वर के वचन कार्य हैं। मसीह जो कुछ है और जो कुछ करता है, उसी में परमेश्वर हम से बोलता है। उसके ईश्वरत्व और देहधारण में हम देखते हैं कि परमेश्वर ने हमें क्या दिया है। उसके जीवन और मृत्यु और स्वर्गारोहण में हम देखते हैं कि परमेश्वर का वरदान किस प्रकार हमारे सारे मानवीय जीवन में प्रवेश करता और कार्य करता है, हमारा उद्धार कितना सम्पूर्ण है, और परमेश्वर अब हम से क्या माँगता है। मसीह का सारा कार्य हमारे प्रति परमेश्वर का वचन है।
वह कार्य दो भागों में है: एक पृथ्वी पर, दूसरा स्वर्ग में। पहले के विषय में कहा गया है, जब वह पापों की शुद्धि कर चुका; दूसरे के विषय में, वह ऊँचे स्थानों पर महामहिमन के दाहिने जा बैठा। एक स्वस्थ मसीही जीवन में हमें मसीह के कार्य के दोनों भागों को जानना और दृढ़ता से थामे रहना चाहिए। जो कार्य उसने पृथ्वी पर किया, वह उस कार्य का केवल आरम्भ था जो उसे स्वर्ग में करना था; दूसरे में पृथ्वी का कार्य अपनी सिद्धता और अपनी महिमा पाता है। याजक के रूप में उसने यहाँ नीचे पापों की शुद्धि की; याजक-राजा के रूप में वह सिंहासन के दाहिने बैठा है, ताकि अपने कार्य को लागू करे, स्वर्गीय सामर्थ्य में उसकी आशीषें बाँटे, और हमारे भीतर स्वर्गीय जीवन को बनाए रखे। जब वह पापों की शुद्धि कर चुका। पापों की शुद्धि, ऐसी वस्तु के रूप में जिसे मसीह ने स्वर्ग जाने से पहले पूरा किया, उसके सारे कार्य की नींव है। आइए, हम बिलकुल आरम्भ में ही यह सीख लें कि जो कुछ परमेश्वर को मसीह में होकर हम से कहना है, उसका आरम्भ यहीं से होता है: पाप को धोकर दूर किया जाना अवश्य है। यही छुटकारे का मूल-विचार है। जब तक हम उद्धार को मुख्यतः व्यक्तिगत सुरक्षा की इच्छा से खोजते हैं, या मसीह के व्यक्तित्व और कार्य के अध्ययन को केवल उसके प्रकाशन के रूप में देखते हैं जो सत्य और सुन्दर और भला है, तब तक हम उसकी सामर्थ्य में पूरी रीति से प्रवेश नहीं कर सकते। परमेश्वर पापों की शुद्धि पर ही बल देता है — ऐसी तीव्र इच्छा के साथ कि उसने इसके लिए अपने पुत्र को मरने के लिए दे दिया। पापों की शुद्धि की तीव्र लालसा में ही, सारे मसीही जीवन में आदि से अन्त तक, मसीह के उद्धार के निकट आने और उसमें प्रवेश करने की आत्मिक क्षमता पाई जाएगी। यह सब की जड़ में है। यही मसीही सिद्धता का भेद है। जब उसने यह पूरा कर लिया, केवल तभी स्वर्ग उसके लिए खुला। पापों की शुद्धि को पूरी रीति से ग्रहण कर लेना — जैसा कि आगे चलकर इस शब्द का अर्थ खोला जाएगा — हमारे लिए भी स्वर्गीय जीवन में प्रवेश होगा।
जब वह पापों की शुद्धि कर चुका, तो ऊँचे स्थानों पर महामहिमन के दाहिने जा बैठा। वहाँ वह जीवित है — हमारे लिए परमेश्वर की उपस्थिति और संगति का धन्य मार्ग खोलता और खुला रखता है, हमें ऊपर उठाकर उसके आनन्द में पहुँचाता और उसमें बनाए रखता है; और उस सामर्थ्य में, जो वहाँ प्रबल है, स्वर्ग के राज्य को हृदय के भीतर एक वास्तविकता बना देता है। इस पत्री का महान उद्देश्य यह है कि मसीह की स्वर्गीय महिमा को हमारे मन में बैठा दे — हमारे भरोसे की नींव के रूप में, हमारी आशा के माप के रूप में, और उस भीतरी उद्धार के स्वरूप के रूप में जो वह प्रदान करता है। यह बात कि मसीह ने हमारे प्रधान और अगुआ के रूप में परदे को फाड़ डाला है, और अपने लहू की सामर्थ्य में परमपवित्र स्थान पर अधिकार कर लिया है और उसमें प्रवेश का मार्ग सुरक्षित कर दिया है, केवल यही अर्थ नहीं रखती कि हम मरने पर स्वर्ग में प्रवेश करेंगे। इस पत्री की सारी व्यावहारिक शिक्षा इस एक वचन में समेटी और लागू की गई है: “हमें प्रवेश करने का हियाव है … आओ, हम निकट आएँ … आओ, हम भीतर प्रवेश करें।” स्वर्ग में सिंहासन पर बैठे मसीह का अर्थ यह है कि हम उस अलौकिक सामर्थ्य में, जो पवित्र आत्मा के उतरने से मिलती है, सचमुच परमेश्वर की पवित्र उपस्थिति में पहुँचाए जाते हैं, और वहीं अपना प्रतिदिन का जीवन बिताते हैं। इसी कारण कि इब्रानी यह नहीं जानते थे, इसी कारण कि वे विश्वास और मन-परिवर्तन के विषय में आरम्भिक सच्चाइयों से, और फिर मृत्यु के बाद स्वर्ग में जीवन से, सन्तुष्ट होकर बैठ गए थे — वे इतनी बुरी तरह असफल हुए थे। परमेश्वर के दाहिने विराजमान यीशु को सचमुच जान लेना ही उनके रोगों की चंगाई होती, और उन्हें उस जीवन के आनन्द और बल में फिर से पहुँचा देता जो उनकी स्वर्गीय बुलाहट के अनुरूप हो।
हमारे दिनों की कलीसिया भी उसी कारण से पीड़ित है, और उसे भी उसी उपचार की आवश्यकता है। पृथ्वी पर मसीह के कार्य को अपनाना स्वर्ग में उसके कार्य को अपनाने की अपेक्षा कहीं अधिक सरल है। एक स्थानापन्न और प्रायश्चित के, पश्चाताप और क्षमा के सिद्धान्त को ग्रहण कर लेना, उस महायाजक के सिद्धान्त की अपेक्षा कहीं अधिक सरल है जो हमें परमेश्वर की उपस्थिति में ले आता है और उसके साथ प्रेम भरी संगति में बनाए रखता है। केवल पृथ्वी पर बहाया गया लहू ही नहीं, वरन् स्वर्ग में लहू का छिड़काव, और स्वर्ग से हृदय और विवेक पर लहू का छिड़काव ही है, जो स्वर्गीय जीवन की सामर्थ्य हम तक पहुँचाता है। और केवल यही हमें ऐसे मसीही बनाता है जो न केवल फाटक में प्रवेश करना चाहते हैं, वरन् प्रतिदिन उस जीवित मार्ग पर आगे बढ़ते जाते हैं जो परमपवित्र स्थान में और भी गहराई तक ले जाता है।
कोई यह न सोचे कि मैं किसी बहुत ऊँची बात के विषय में कह रहा हूँ। मैं उस बात के विषय में कह रहा हूँ जो आपकी मीरास और आपकी नियति है। क्रूस पर के यीशु में आपका जितना भाग है, उतना ही भाग सिंहासन पर के यीशु में भी है। स्वर्गीय जीवन के लिए पार्थिव जीवन को बलिदान करने को तैयार रहिए — संसार से उसकी अलगाव में और परमेश्वर की इच्छा के प्रति उसके समर्पण में मसीह के पूरी रीति से पीछे चलने को तैयार रहिए; और स्वर्ग में विराजमान मसीह आप में अपने स्वर्गीय याजकपद की वास्तविकता और सामर्थ्य सिद्ध कर दिखाएगा। पापों की शुद्धि आपके लिए भी, जैसे वह मसीह के लिए थी, परमपवित्र स्थान का प्रवेश-द्वार हो। जिसने पृथ्वी पर शुद्धि पूरी की, और स्वर्ग से स्वयं उसे लागू करता है, वह निश्चय ही आपको आशीष की उस सारी परिपूर्णता में ले चलेगा जो उस शुद्धि ने उसके लिए और आपके लिए खोल दी है।
1. विश्वास की नींव में चार बड़े कोने के पत्थर हैं जिन पर सारा भवन टिका है: मसीह का ईश्वरत्व, देहधारण, क्रूस पर प्रायश्चित, और सिंहासन तक स्वर्गारोहण। अन्तिम सबसे अद्भुत है, बाकी सब का मुकुट, इस बात का सिद्ध प्रकाशन कि परमेश्वर ने मसीह को हमारे लिए क्या बनाया है। और इसलिए मसीही जीवन में भी यही सबसे महत्वपूर्ण है — उन सब बातों का महिमामय फल जो इससे पहले आती हैं।
पवित्र आत्मा स्वर्गारोहण के बाद भेजा गया। क्यों? इसलिए कि वह हमें एक स्वर्गीय मसीह की गवाही दे, और स्वर्ग के राज्य को हमारे हृदयों और जीवनों में ले आए। “पापों की शुद्धि।” कोई कहता है: “उस समय मैंने स्पष्ट देखा कि प्रभु अपने विषय में और अपने राज्य के भेद के विषय में जो कुछ भी बताना और प्रगट करना चाहे, वह उसे शुद्धता और पवित्रता की रीति से ही करेगा।” दो ओर से हम पवित्रता और यीशु की समानता के विषय में परमेश्वर के वचन के ऊँचे सत्य के निकट आ सकते हैं। एक है पवित्रशास्त्र के सारे सत्य को पूरी रीति से जानने की, और अपनी सिद्धान्त-व्यवस्था को पूर्ण और सिद्ध बनाने की इच्छा। दूसरी है पाप से छूटने की — उतना छूटने की जितना परमेश्वर हमें इस जीवन में छुड़ा सकता है — गहरी, तीव्र लालसा। केवल इसी दूसरी ओर से मसीह के स्वर्गीय जीवन में सच्चा प्रवेश दिया जाएगा। पहला खण्ड — 1:4-14. परमेश्वर का पुत्र स्वर्गदूतों से बढ़कर।
- 1 बाहर चमकता तेज।
- 1 शुद्धि पूरी की।