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इब्रानियों 2:5-18 — यीशु, मनुष्य के रूप में अपनी दीनता में भी, स्वर्गदूतों से बढ़कर
11 जगत मनुष्य के आधीन किया गया, स्वर्गदूतों के नहीं
2. 5. क्योंकि उसने उस आनेवाले जगत को, जिसकी चर्चा हम
कर रहे हैं, स्वर्गदूतों के आधीन न किया। 6. वरन किसी ने कहीं यह गवाही दी है (भजन संहिता 8:5), कि मनुष्य क्या है, कि तू उसकी सुधि लेता है? या मनुष्य का पुत्र क्या है, कि तू उस पर दृष्टि करता है? तू ने उसे स्वर्गदूतों से कुछ ही कम किया; तू ने उस पर महिमा और आदर का मुकुट रखा, और उसे अपने हाथों के कामों पर अधिकार दिया; तू ने सब कुछ उसके पाँवों के नीचे उसके आधीन कर दिया। इसलिये जब कि उसने सब कुछ उसके आधीन कर दिया, तो उसने कुछ भी न छोड़ा जो उसके आधीन न हो; पर अब तक हम सब कुछ उसके आधीन नहीं देखते।
9. पर हम यीशु को महिमा और आदर का मुकुट पहिने हुए देखते हैं। परमेश्वर के पुत्र के रूप में मसीह स्वर्गदूतों से बढ़कर है। मनुष्य के पुत्र के रूप में भी यीशु स्वर्गदूतों से बढ़कर है। वह सचमुच, मनुष्य के रूप में, स्वर्गदूतों से कुछ ही कम किया गया; फिर भी, क्योंकि वह आनेवाला जगत, जिसकी चर्चा मसीह का आत्मा भविष्यद्वक्ताओं में करता था, मनुष्य के आधीन किया गया था, इसलिये उसे आदर और प्रभुता का ऐसा स्थान मिला जो उनसे कहीं अधिक श्रेष्ठ था। केवल मसीह का ईश्वरत्व ही नहीं, वरन उसकी मानवता भी यह प्रमाणित करेगी कि नई व्यवस्था उस व्यवस्था से, जो स्वर्गदूतों की सेवा के द्वारा दी गई थी, कितनी असीम रूप से श्रेष्ठ है।
क्योंकि उसने आनेवाले जगत को स्वर्गदूतों के आधीन नहीं किया — उस जगत को, जिसकी ओर यह भजन आशा से देखता है, अर्थात मसीहा का राज्य, पृथ्वी पर स्वर्ग का राज्य। यह भजन सीधे-सीधे मसीहा के विषय में नहीं, वरन मनुष्य और उसकी नियति के विषय में बोलता है। परन्तु यह पूरी उचितता के साथ मसीहा पर लागू किया गया है, क्योंकि उसी में यह भजन और मनुष्य दोनों उस बात की पूर्ति पाते हैं जिसकी प्रतिज्ञा की गई है।
भजनकार पहले मनुष्य की तुच्छता की, और इस आश्चर्य की चर्चा करता है कि परमेश्वर उस पर ध्यान दे। मनुष्य क्या है कि तू उसकी सुधि लेता है? या मनुष्य का पुत्र क्या है कि तू उस पर दृष्टि करता है? फिर वह बताता है कि मनुष्य का स्थान कितना ऊँचा है। उसका स्वभाव ईश्वरीय से थोड़ा ही कम है। तू ने उसे स्वर्गदूतों से कुछ ही कम किया; तू ने उस पर महिमा और आदर का मुकुट रखा। और सब पर प्रभुता उसे सौंपी गई है। तू ने उसे अपने हाथों के कामों पर अधिकार दिया। तू ने सब कुछ उसके पाँवों के नीचे उसके आधीन कर दिया। हमारी पत्री बताती है कि यह प्रतिज्ञा, यद्यपि मनुष्य के विषय में अभी सच नहीं हुई, फिर भी यीशु में पूरी हो चुकी है। अब तक हम सब कुछ मनुष्य के आधीन नहीं देखते, परन्तु हम यीशु को महिमा और आदर का मुकुट पहिने हुए देखते हैं। जो बात मनुष्य के विषय में प्रतिज्ञा के रूप में सच थी, उसे हम यीशु में पूरी हुई देखते हैं; जो कुछ हम यीशु में देखते हैं, वह मनुष्य के विषय में भी सच किया जाएगा। यह भजन कैसे अद्भुत विचार हमारे मन में जगाता है!
मनुष्य की नियति कितनी महिमामय है! परमेश्वर के स्वरूप में सृजा जाकर, उसे इस बात में भी परमेश्वर की समानता धारण करनी थी कि वह राजा होकर सब पर शासन करे। सारा आनेवाला जगत उसके आधीन किया गया। मनुष्य ने परमेश्वर से ऐसा जीवन, ऐसा स्वभाव, ऐसी आत्मा पाई है जो उसके अपने जीवन और आत्मा में, उसकी इच्छा और उसकी पवित्रता में सहभागी होने के योग्य है; जो उसकी समानता और उसके साथ संगति के योग्य है — यहाँ तक कि उसके सिंहासन पर बैठने के, और सारी सृष्टि पर उसके साथ प्रभुता में सहभागी होने के योग्य है। कैसी नियति! हम उस नियति को यीशु में कैसी महिमा के साथ पूरी होते देखते हैं! क्योंकि मनुष्य ऐसे स्वभाव के साथ सृजा गया था जो ऐसी नियति के योग्य था, इसी कारण परमेश्वर का पुत्र मनुष्य बन सका, और उस नियति को स्वयं पूरा करना अपनी ईश्वरीय महिमा के अयोग्य न समझा। वह आया और उसने प्रमाणित किया कि मनुष्य का जीवन कैसा होना था — कि दीनता और परमेश्वर के आधीन रहना ही महिमा और आदर का निश्चित मार्ग है। वह आया और उसने दीनता के जीवन को परमेश्वर के दाहिने हाथ तक ऊँचा उठाए जाने की पाठशाला बनाकर महिमामय किया; मनुष्य के पुत्र के रूप में मनुष्य की नियति को अपने में पूरा करते हुए, उसने परमेश्वर के पुत्र के रूप में उसे हमारे लिये भी पूरा किया।
मनुष्य की नियति कितनी महिमा और निश्चयता के साथ अभी पूरी होगी! यीशु, मनुष्य का पुत्र, दूसरे आदम के रूप में आया। वह हमसे उतने ही निकट, उतने ही वास्तविक, उतने ही घनिष्ठ सम्बन्ध में खड़ा है जितना आदम था। जितनी पूर्णता से आदम ने पापमय स्वभाव हम तक पहुँचाया, उतनी ही पूर्णता से वह एक नया स्वभाव — अपना ही स्वभाव — हमें प्रदान करेगा। परमेश्वर के पुत्र के रूप में, सब का सृजनहार और सम्भालनेवाला, जिसमें सब वस्तुएँ स्थिर रहती हैं, उसके पास यह ईश्वरीय सामर्थ है कि जो कुछ वह स्वयं में था, उस सब के साथ वह हमारे भीतर वास करे। उसकी मानवता इस बात का प्रकाशन है कि हम क्या बन सकते हैं; उसका ईश्वरत्व इस बात की जमानत है कि हम वह बन सकते हैं। अब तक हम सब कुछ मनुष्य के आधीन नहीं देखते, परन्तु — और इतना ही बहुत है — हम यीशु को महिमा और आदर का मुकुट पहिने हुए देखते हैं।
शरीर में हमारे जीवन के साथ अपने मेल के द्वारा, हमारे स्वभाव के साथ अपने आप को एक कर देने के द्वारा ही यीशु उस महिमा का दावा कर सका, उसे प्राप्त कर सका और उसका अधिकारी बन सका, जिसकी प्रतिज्ञा परमेश्वर ने मनुष्य से की थी। और उसके स्वभाव को ग्रहण करने के द्वारा, और पृथ्वी पर तथा स्वर्ग में इस जीवन में अपने आप को उसके साथ एक कर देने के द्वारा ही, जो कुछ उसने हमारे लिये प्राप्त किया है, वह सचमुच हमारा हो सकता है। आइए, हम यहीं, अपनी पत्री के बिलकुल आरम्भ में, इस सत्य को भली-भाँति पकड़ लें कि मसीह हमारे नायक, हमारे याजक, हमारे छुड़ानेवाले के रूप में हमारे लिये जो कुछ करता है, वह कोई बाहरी बात नहीं है। प्रकृति में, स्वर्ग में या पृथ्वी पर, तारों में या वृक्षों में परमेश्वर जो कुछ करता है, वह भीतर से करता है, उन नियमों के द्वारा जो उनके सारे अस्तित्व में व्याप्त हैं। आदम ने हम में जो कुछ किया, वह भीतर से है, उस शक्ति के द्वारा जो हमारे अन्तरतम जीवन पर शासन करती है। और मसीह हमारे लिये जो कुछ करता है, चाहे परमेश्वर के पुत्र के रूप में चाहे मनुष्य के पुत्र के रूप में, वह भी समान रूप से और पूरी तरह हमारे भीतर किया गया कार्य है। जब हम जान लेंगे कि वह हमारे साथ एक है और हम उसके साथ, ठीक जैसा आदम के विषय में था, तभी हम जानेंगे कि हमारी नियति उसमें कितनी सच्चाई से पूरी होगी। हमारे साथ उसकी एकता हमारे छुटकारे की जमानत है, और उसके साथ हमारी एकता उसकी सामर्थ।
हे मनुष्य, आपकी नियति यह है कि आप यीशु के साथ उसके सिंहासन पर बैठें। उसकी तैयारी करनेवाले के समान जीवन बिताइए। राजसी आत्मा को विकसित कीजिए। उसमें बने रहिए: वह आप में बना रहेगा। 2. जगत मनुष्य के आधीन किया गया। पाप का विनाश कितना भयानक है, जिसके द्वारा मनुष्य जगत के आधीन कर दिया गया। उसका राजा उसका दास बन गया, और ठीक तभी सबसे अधिक दास होता है जब वह उस पर सबसे अधिक स्वामित्व करता हुआ दिखाई देता है।
मसीह हमें सिखाता है कि जगत का इन्कार करके उस पर जय पाएँ; उसका न होकर उसे अपने आधीन रखें। केवल दीनता और आत्म-त्याग के मार्ग में ही मनुष्य की नियति पूरी हो सकती है। पत्री यीशु में हमें दो बातें दिखाती है जो अटूट रूप से जुड़ी हुई हैं: महिमा का वह स्थान जहाँ वह अब है; और दीनता का वह मार्ग जो उसे वहाँ ले गया। इसे अपनी चिन्ता बना लीजिए कि आप उसकी दीनता में मसीह के पीछे चलें; वह इसे अपनी चिन्ता बना लेगा कि आपको अपनी महिमा तक पहुँचाए।
4. इन दोनों के बीच के घनिष्ठ सम्बन्ध, उनकी वास्तविक एकता को देखने का यत्न कीजिए। जो आत्मा पृथ्वी पर परमेश्वर के आधीन रहती है, उसी के आधीन परमेश्वर स्वर्ग में सब कुछ कर देता है। जो प्राण पृथ्वी की दीनता में परमेश्वर को ही सब कुछ बना लेता है, वही स्वर्ग के योग्य है, जब परमेश्वर महिमा में सब में सब के रूप में प्रकट होगा।
12 हम यीशु को महिमा और आदर का मुकुट पहिने हुए देखते हैं
8. पर अब तक हम सब कुछ उसके आधीन नहीं देखते।
9. पर हम उसे देखते हैं जो स्वर्गदूतों से कुछ ही कम किया गया था, अर्थात यीशु को, जो मृत्यु का दुख उठाने के कारण महिमा और आदर का मुकुट पहिने हुए है।
कैसा महिमामय विरोधाभास! अब तक हम सब कुछ उसके, अर्थात मनुष्य के, आधीन नहीं देखते; परन्तु — जो इससे कहीं उत्तम है — हम यीशु को महिमा और आदर का मुकुट पहिने हुए देखते हैं। जब हम इस जगत पर, उसके सारे पाप और दुःख के साथ, दृष्टि डालते हैं, तो सचमुच ऐसा नहीं लगता कि मनुष्य स्वर्गदूतों से ऊँचा होने और परमेश्वर के हाथों के सब कामों पर प्रभुता करने के लिये ठहराया गया है। परन्तु जब हम स्मरण करते हैं कि यीशु मनुष्य बना, ताकि वह सब मनुष्यों के लिये मृत्यु का स्वाद चखे, और कि वह, सिंहासन पर विराजमान एक मनुष्य, अब हमारे जामिन, हमारे छुड़ानेवाले और हमारे सिर के रूप में जीवित है, तो इतना ही बहुत है कि हम उसे महिमा और आदर का मुकुट पहिने हुए देखें। इसमें हमें यह जमानत मिलती है कि वह एक दिन मनुष्य को भी उस महिमा और आदर तक पहुँचाएगा। इसमें हमें यह निश्चय मिलता है कि वह अभी भी वह सारी महिमा और आदर हमारी भलाई के लिये काम में ला रहा है। अब तक हम सब कुछ मनुष्य के आधीन नहीं देखते, परन्तु हम यीशु को आदर और महिमा का मुकुट पहिने हुए देखते हैं। धन्य विरोधाभास! इस विरोध को ठीक से जानना और काम में लाना ही विश्वास के जीवन का भेद है। अब तक हम सब कुछ उसके आधीन नहीं देखते — ये शब्द उस निराशा और असफलता को कितनी ठीक-ठीक व्यक्त करते हैं, जो प्रायः विश्वासी का अनुभव होता है जब उसका पहला आनन्द और आशा ढलने लगते हैं। वह पाता है कि पाप उससे कहीं अधिक बलवान है जितना वह जानता था; कि संसार और शरीर और अहं की शक्ति अभी उसके आधीन नहीं की गई, जैसी उसने आशा की थी। कभी-कभी उसे ऐसा लगता है मानो परमेश्वर की प्रतिज्ञाएँ, और वे आशाएँ जो उन्होंने उसके हृदय में जगाई थीं, व्यर्थ हैं। या फिर, यदि वह मान भी ले कि परमेश्वर उन्हें पूरा करने में सचमुच विश्वासयोग्य है, तो भी उसे लगता है कि उसके समान निर्बल व्यक्ति के लिये, और उसकी परिस्थितियों में, इन प्रतिज्ञाओं को प्राप्त करने का मार्ग बहुत कठिन है। परमेश्वर की प्रतिज्ञाएँ — कि वह सब कुछ हमारे आधीन कर देगा और हमें जयवन्त से भी बढ़कर बनाएगा — सचमुच अति बहुमूल्य हैं; परन्तु हाय, बार-बार वह कड़वा अनुभव लौट आता है: मनुष्य अब तक सब कुछ अपने आधीन नहीं देखता।
धन्य है वह मनुष्य जो तब जीवित विश्वास के साथ यह कहना जानता है: परन्तु हम यीशु को महिमा और आदर का मुकुट पहिने हुए देखते हैं। धन्य है वह मनुष्य जो अपने भीतर पाई जानेवाली सारी अपूर्णता और असफलता से दृष्टि हटाकर, ऊपर देखना और उस सारी सिद्धता और महिमा को निहारना जानता है जो वह यीशु में पाता है! हाँ, धन्य है वह मनुष्य जो हर निराशा और हर कठिनाई का सामना इस धन्य वचन से करने में अपना आनन्द और अपना जीवन पाता है: परन्तु हम यीशु को महिमा और आदर का मुकुट पहिने हुए देखते हैं। हमें बस यही चाहिए; यही प्राण को तृप्त करता है, और उसे शान्ति, आनन्द और बल देता है।
पत्री अब हमें उस महान भेद को खोलकर समझाने पर है कि परमेश्वर का पुत्र क्यों स्वर्गदूतों से कुछ ही कम किया गया। यह इसलिये था कि परमेश्वर के अनुग्रह से वह हर एक मनुष्य के लिये मृत्यु का स्वाद चखे, और इस प्रकार परमेश्वर की उपस्थिति और उसकी कृपा में प्रवेश का मार्ग फिर से खोल दे। उसके दुःखों और मृत्यु की आवश्यकता और अर्थ को वह हमारे सामने तीन भिन्न पहलुओं में रखेगी। पहला (10): कि दुःख और मृत्यु में मसीह का स्वयं सिद्ध किया जाना आवश्यक था, ताकि वह हमारा नायक होकर हमारे लिये सिद्धता का पथ खोल दे, और उस नए स्वभाव, जीने की उस नई रीति को तैयार करे जिसमें हमें महिमा तक ले जाया जाना है। दूसरा (15): कि मृत्यु के द्वारा पाप का प्रायश्चित करते हुए वह शैतान को, उसकी मृत्यु की शक्ति समेत, नष्ट कर दे, और हमें उसके सारे भय से पूरा छुटकारा दे। और तीसरा (16-18): कि जो दुःख उसने उठाए उनमें वह एक दयालु और विश्वासयोग्य महायाजक बने, जो हमारा पूरा भरोसा पा सके और हमें वह सहायता दे सके जिसकी हमें आवश्यकता है। परन्तु मसीह की दीनता का यह अर्थ खोलने से पहले लेखक पहले उसकी महिमा की ओर संकेत करता है। यही नये नियम की श्रेष्ठता है, यही हमारे विश्वास को धीरज और विजय की सामर्थ देती है: हम यीशु को अब परमेश्वर के महामहिमन के दाहिने हाथ देखते हैं। आइए, हम इसे इस पत्री के मुख्य विचार के रूप में, उस एक महान पाठ के रूप में दृढ़ता से थामे रहें जिसकी इब्रानियों को, और सब निर्बल, पीछे हटनेवाले मसीहियों को आवश्यकता है: यीशु, जिसने हमारे लिये दुःख उठाया; यीशु, जिसने हमारे नायक के रूप में अपने दुःख में हमारे लिये परमेश्वर तक का मार्ग खोला; यीशु, जो हमारे साथ सहानुभूति रखता है — यही यीशु आदर और महिमा का मुकुट पहिने हुए है। उसे देखना यह जानना है कि जो कुछ भी हमें चाहिए, वह सब हमारे पास है। मेरे पाठक, क्या आप उस बड़े उद्धार पर और भी अधिक मन लगाना चाहते हैं? क्या आप अनुभव करना चाहते हैं कि यीशु कितना पूरा पूरा उद्धार कर सकता है? क्या आप यह लालसा रखते हैं कि परमेश्वर का प्रेम और उसकी उपस्थिति, उसकी पवित्रता, उसका आनन्द और उसकी सामर्थ आप में ठीक उतनी ही हो जितनी यीशु में आपके लिये है? तो यहाँ इस सब का भेद है। सारे पाप और निर्बलता, सारे अन्धकार और सन्देह, सारी असफलता और उलझन के बीच, इस एक सत्य को दृढ़ता से थामे रहिए, विश्वास के इस एक अभ्यास में लगे रहिए: अब तक हम सब कुछ मनुष्य के आधीन नहीं देखते, परन्तु हम यीशु को आदर और महिमा का मुकुट पहिने हुए देखते हैं। यह शान्ति, और विजय, और अवर्णनीय आनन्द देता है। और यदि आप जानना चाहते हैं कि इस प्रकार हृदय सदा यीशु की ओर कैसे लगा रहे, तो स्मरण रखिए, वह अपने लोगों का उनके पापों से उद्धार करने आया। वही हृदय, जो अपने आप से और अपने पापों से थक गया है, जो उस सब की, जो पुराने स्वभाव और अहं का है, पूरी भ्रष्टता और पूरी असहायता को पूरी तरह स्वीकार कर लेता है, अपने आप को प्रबल लालसा के साथ इस सामर्थी छुड़ानेवाले की ओर खिंचा हुआ पाएगा।
ऐसे हृदय में यीशु, वह मुकुटधारी, केवल कोई दूर की वस्तु न रहेगा, वरन पवित्र आत्मा के द्वारा भीतर वास करनेवाली उपस्थिति होगा। पवित्र आत्मा का आना यीशु के महिमान्वित किए जाने से अटूट रूप से जुड़ा हुआ है, उसका हमारे पास एकमात्र प्रमाण है (यूहन्ना 7:38, 39; 16:14; 17:10), और उन आशीषों में, जो उससे बहती हैं, हमारी एकमात्र वास्तविक सहभागिता है। महिमा और आदर का मुकुट पहिने हुए उसकी हमारी सारी आराधना इस विश्वास में हो कि पिन्तेकुस्त का आत्मा हम में उसकी महिमा करता है, ताकि हमारा सारा भीतरी अस्तित्व उसकी उपस्थिति से भर जाए।
1. यीशु, जो स्वर्गदूतों से कुछ ही कम किया गया। यीशु, जो मृत्यु का दुख उठाने के कारण महिमा और आदर का मुकुट पहिने हुए है। केवल महिमा को ही न देखिए, वरन उसके जन्म-स्थान को, उस मार्ग को भी भली-भाँति देखिए जिससे वह प्राप्त हुई। यह वही मार्ग है जिस पर आप अभी चल रहे हैं। दीनता और दुःख का स्वागत करना सीखिए — उस बीज के रूप में, उस सामर्थ के रूप में जिससे महिमा उत्पन्न होती है, उस मार्ग के रूप में जिसमें महिमा में विराजमान यीशु आपको महिमा के लिये तैयार कर रहा है।
2. हम यीशु को महिमा और आदर का मुकुट पहिने हुए देखते हैं। इस विरोधाभास का हर अनुभव — कि अब तक हम सब कुछ मनुष्य के आधीन नहीं देखते — यीशु की ओर मुड़ने के लिये एक बुलाहट, एक प्रेरणा और एक सहायता बन जाए। आइए, हम समय निकालें, और तब तक निहारते और आराधना करते रहें जब तक हमारा सारा प्राण इस विश्वास से भर न जाए: दीनता का यह जीवन अनन्त महिमा की कली है; महिमा में विराजमान यीशु इसका प्रमाण है कि ऐसा ही है, और इसकी जमानत कि हमारे साथ भी ऐसा ही होगा। हमारा जीवन यही हो: हम यीशु को, मृत्यु का दुख उठाने के कारण, महिमा और आदर का मुकुट पहिने हुए देखते हैं।
13 यीशु का हर एक मनुष्य के लिये मृत्यु का स्वाद चखना
2. 9. हम उसे देखते हैं जो स्वर्गदूतों से कुछ ही कम
किया गया था, अर्थात यीशु को, जो मृत्यु का दुख उठाने के कारण महिमा और आदर का मुकुट पहिने हुए है, ताकि परमेश्वर के अनुग्रह से वह हर एक मनुष्य के लिये मृत्यु का स्वाद चखे। यहाँ हमारे सामने वह एक महान कारण है जिसके लिये यह उचित था कि यीशु स्वर्गदूतों से कुछ ही कम किया जाए। यह इसलिये था कि वह हर एक मनुष्य के लिये मृत्यु का स्वाद चखे। ईश्वरीय अनुग्रह की युक्ति में, और छुटकारे की महान योजना में, यह देहधारण के प्रथम उद्देश्यों में से एक था — जन्म मृत्यु के निमित्त था। उस अद्भुत जन्म के बिना — कि वह वचन, जो परमेश्वर था, देहधारी हुआ — वह मृत्यु हमारे किसी लाभ की न होती। उस अद्भुत जन्म के बिना वह मृत्यु हमारे बहुत थोड़े काम आती। जिसे परमेश्वर ने जोड़ा है, उसे मनुष्य अलग न करे। आइए, हम सावधान रहें कि एक को दूसरे की कीमत पर ऊँचा न उठाएँ। जन्म और मृत्यु उसी एक प्रक्रिया के दो अविभाज्य भाग हैं, जिसके द्वारा वह मरे हुओं में से पहिलौठे के रूप में सिद्ध किया गया, और हमारा छुटकारा देनेवाला और राजा बना। यीशु की मानवता और दीनता हर एक मनुष्य के लिये, अर्थात हर एक मनुष्य की ओर से, उसकी मृत्यु के लिये आवश्यक थी।
और इस मृत्यु का अर्थ क्या था? और उसकी प्रभावशीलता किस बात में है? पवित्रशास्त्र में मसीह की मृत्यु, हमारे सिर के रूप में, दो पहलुओं में हमारे सामने रखी गई है। एक यह कि वह पाप के लिये मरा, उसका शाप उठाते हुए, और उसके कारण परमेश्वर के धर्मी न्याय के रूप में मृत्यु सहते हुए। उसकी मृत्यु ने हमारे लिये परमेश्वर तक का मार्ग खोल दिया। उसने हमारे लिये वह किया जो हम न कर सकते हैं और न हमें करने की आवश्यकता है — उसने एक पूरा किया हुआ उद्धार सम्पन्न किया, जिसे हमें केवल ग्रहण करना और जिस पर विश्राम करना है। दूसरे पहलू के अनुसार, वह पाप के प्रति मरा। उसकी मृत्यु पाप और उसकी परीक्षा के प्रति उसके प्रतिरोध का प्रमाण थी, इस बात का कि वह पाप के आगे झुकने के बजाय अपना प्राण दे देने को तैयार था; इस बात का प्रमाण कि शरीर से और पाप के साथ उसके सम्बन्ध से पूरी तरह स्वतंत्र होने का इसके सिवा कोई मार्ग नहीं कि पुराने जीवन को मृत्यु को सौंप दिया जाए, ताकि परमेश्वर से नए सिरे से और सीधे एक पूर्णतः नया जीवन प्राप्त किया जाए। इस दृष्टि से उसकी मृत्यु असीम नैतिक और आत्मिक मूल्य का कार्य थी, उस कार्य की पराकाष्ठा जो परमेश्वर ने तब किया जब उसने दुःख उठाने के द्वारा उसे सिद्ध किया।
पहला पहलू — हमारी ओर से पाप के लिये मृत्यु — अपना मूल्य दूसरे से पाता है, जो प्रकट करता है कि उसका सच्चा स्वरूप और सामर्थ क्या है। और इसी प्रकार पाप के लिये मृत्यु में विश्वास को हमें पाप के प्रति मृत्यु में ले जाना चाहिए। एक दृष्टि प्रतिस्थापन की है: मसीह वह कर रहा है जो मैं नहीं कर सकता। दूसरी संगति की: मसीह मुझ में वह कार्य कर रहा है जो मैं उसमें देखता हूँ। पहला पूरा किया हुआ कार्य है, और मुझे एक ही बार और सदा के लिये परमेश्वर पर भरोसा करने का हियाव देता है। दूसरा पवित्रीकरण की सामर्थ है, जब मसीह की मृत्यु और उसका जीवन मुझ में कार्य करते हैं।
दोनों दृष्टियाँ इस पत्री में पूरे सामंजस्य के साथ पाई जाती हैं। देखिए, इस अध्याय में पहली दृष्टि कितनी स्पष्टता से सामने आती है। मृत्यु का दुख उठाने के कारण ही वह महिमा और आदर का मुकुट पहिने हुए है। “वह स्वर्गदूतों से कुछ ही कम किया गया, ताकि वह हर एक मनुष्य के लिये मृत्यु का स्वाद चखे,” — ताकि वह पाप के फल के रूप में मृत्यु का कटोरा सब के लिये पी ले। कुछ मनुष्य मृत्यु की कड़वाहट चखे बिना मर जाते हैं; यीशु ने पाप के शाप के रूप में उसकी कड़वाहट पूरे माप में चखी। फिर हम पद 14 में पढ़ते हैं कि वह मनुष्य बना, ताकि मृत्यु के द्वारा उसे जिसे मृत्यु पर शक्ति मिली थी, अर्थात शैतान को, निकम्मा कर दे, और उन्हें छुड़ा ले जो दासत्व के आधीन थे।
उसकी मृत्यु ने हमारे लिये वह पूरा किया जो हम कभी नहीं कर सकते थे, जो अब हमें करने की आवश्यकता नहीं। और पद 17 हमें बताता है कि उसका मनुष्य बनाया जाना इसलिये था कि वह उन बातों में जो परमेश्वर से सम्बन्ध रखती हैं, महायाजक हो, ताकि लोगों के पापों के लिये प्रायश्चित करे। ये सब अभिव्यक्तियाँ — मृत्यु का दुख उठाना, सब के लिये मृत्यु का स्वाद चखना, शैतान को निकम्मा करना, लोगों के पापों के लिये प्रायश्चित करना — उस पूरे किए हुए कार्य की ओर संकेत करती हैं जो मसीह ने सम्पन्न किया, वह निश्चित और अनन्त नींव जिस पर हमारा विश्वास और हमारी आशा टिक सकती है।
अपनी आगे की शिक्षा में यह पत्री हमें दिखाएगी कि उस नींव पर टिका हुआ भवन क्या है — वह स्वर्गीय सामर्थ और जीवन, परमेश्वर की वह धन्य निकटता और सेवा क्या है, जिस तक महायाजक, हमारा अगुआ और नायक, उस मार्ग में जो उसने खोला, हमें अपनी संगति में ले आता है। परन्तु वह चाहती है कि हम यहीं से आरम्भ करें, और अपने विश्वास की जड़ें उस कार्य में गहरी जमाएँ जो मसीह ने हमारे स्थानापन्न के रूप में कलवरी पर किया। आइए, हम इन शब्दों का ध्यान से अध्ययन करें, उन्हें भली-भाँति स्मरण रखें, और उन पर पूरा विश्वास करें: मसीह ने सब के लिये मृत्यु का स्वाद चखा है, और कटोरा खाली कर दिया है; मसीह ने शैतान को निकम्मा कर दिया है; मसीह ने पाप के लिये प्रायश्चित कर दिया है। मृत्यु और शैतान और पाप — ये दूर कर दिए गए हैं, निकम्मे कर दिए गए हैं। पूरा छुटकारा सम्पन्न हो चुका है। मसीह के दुःखों और मृत्यु का परमेश्वर की दृष्टि में ऐसा असीम मूल्य और ऐसी बहुमूल्यता है कि कोई भी प्राण, जिसने ठान लिया है कि अब पाप से उसका कोई सम्बन्ध न रहेगा, अब और भय न माने, वरन हियाव के साथ अपने परमेश्वर के सामने आ सकता है। मसीह की मृत्यु ने स्वर्ग और पृथ्वी और नरक में बड़ी सामर्थ के साथ कार्य किया है। उसने परमेश्वर को सन्तुष्ट और आनन्दित किया है; उसने मृत्यु और पाप और नरक पर जय पाई है; उसने मनुष्यजाति को छुड़ाया और स्वतंत्र किया है।
उस मृत्यु को अपने हृदय में जीवित रहने दीजिए; वह वहाँ भी अपने सामर्थी आश्चर्यकर्म करेगी। और आप अपने हृदय में यीशु को पाएँगे, जो मृत्यु का दुख उठाने के कारण महिमा और आदर का मुकुट पहिने हुए है। पहले आदम ने वर्जित फल चखा, और सब के लिये मृत्यु कमाई। दूसरे आदम ने यह मृत्यु चखी, और सब के लिये जीवन लाया। उन सब के लिये जो उसे ग्रहण करते हैं, उस जीवन की सामर्थ, उसका भीतर वास करना, उसकी क्रियाशीलता उतनी ही सच्ची और वास्तविक है जितनी पाप और मृत्यु की रही है। “हम यीशु को मृत्यु का दुख उठाने के कारण महिमा और आदर का मुकुट पहिने हुए देखते हैं।”
2. हे मेरे प्राण, यीशु ने तेरे पाप और तेरी मृत्यु की कड़वाहट चखी, ताकि तू उसके जीवन और प्रेम की मिठास चखे। परखकर देखो कि यहोवा कैसा भला है। “परमेश्वर के अनुग्रह से … हर एक मनुष्य के लिये मृत्यु का स्वाद चखे।” “जहाँ पाप बहुत हुआ, वहाँ अनुग्रह उससे भी कहीं अधिक हुआ, कि जैसा पाप ने मृत्यु में राज्य किया, वैसा ही अनुग्रह भी धार्मिकता के द्वारा अनन्त जीवन के लिये राज्य करे।”
14 हमारे उद्धार का नायक
2. 10. क्योंकि जिसके लिये सब कुछ है, और जिसके द्वारा सब कुछ है, उसे यही अच्छा लगा कि जब वह
1 बहुत से पुत्रों को महिमा में पहुँचाए, तो उनके उद्धार के कर्ता को दुख उठाने के द्वारा सिद्ध करे। हम देख चुके हैं कि प्रभु यीशु की दीनता के — यहाँ तक कि मृत्यु का दुख उठाने तक की दीनता के — एक से अधिक कारण हैं। यहाँ हमारे सामने पहला कारण है: कि हमारे उद्धार के नायक के रूप में, जिसके द्वारा परमेश्वर अपने पुत्रों को महिमा तक ले चलता है, वह उस पथ को, उस जीवन-मार्ग को खोल दे जिस पर हमें चलना था। इसके लिये आवश्यक था कि वह दुःख और मृत्यु के द्वारा सिद्ध किया जाए। केवल इसी प्रकार वह शब्द के सच्चे और पूरे अर्थ में नायक, 3 बन सकता था। दुःख में उसकी इच्छा सिद्ध की गई, उसका चरित्र गढ़ा गया, परमेश्वर पर उसकी निर्भरता और परमेश्वर की इच्छा में उसका आनन्द दृढ़ किया गया और प्रकट हुआ। दुःख में, मृत्यु तक की उसकी आज्ञाकारिता ने वह जीवता मार्ग खोल दिया जिसमें होकर ही सृष्टि अपने सृजनहार तक पहुँच सकती है — गहरी से गहरी दीनता और पूर्ण समर्पण। नायक के रूप में उसने जीवन का पथ खोला, जीने और कार्य करने की एक रीति, जिसमें हमें उसके पीछे चलना है।
यही वह बात है जिसे हमने दूसरे पहलू के रूप में भी बताया था — 1 ले चलते हुए। एक नायक। 3 डच अनुवाद में है: “प्रधान नायक।” “नायक” अनुवाद पहले कही गई बात के साथ सम्बन्ध को अधिक स्पष्ट कर देता है: “ले चलनेवाला (अगागोन) परमेश्वर प्रधान नायक (आर्खेगोस) को सिद्ध करता है।” ए.वी. के “कप्तान” (Captain) और आर.वी. के “कर्ता” (Author) के विषय में वेस्टकॉट कहते हैं: “कोई भी शब्द अर्थ की पूर्णता नहीं देता। आर्खेगोस स्वयं पहले उस बात में भाग लेता है जिसे वह स्थापित करता है।” 12:1 में वे अपने अनुवाद में “नायक” शब्द अपनाते हैं: यीशु, विश्वास का नायक और सिद्ध करनेवाला।
मसीह की मृत्यु का। वह मृत्यु केवल प्रायश्चित ही नहीं, वरन संगति भी है। केवल दुःख में, मसीह के साथ क्रूस पर चढ़ाए जाने और मरने में ही हम मसीह को और उसके उद्धार को जानते हैं। मसीह दुःख उठाने के द्वारा सिद्ध किया गया ताकि वह नायक हो, ताकि उसके अनुरूप होकर, और उसके आत्मा और उसकी समानता में सहभागी होकर, हम परमेश्वर तक और महिमा तक का पथ पा सकें।
नायक का कार्य तीन बातों की अपेक्षा रखता है। पहली: उसे स्वयं मार्ग में आगे चलना चाहिए, उसकी सारी कठिनाइयों और खतरों में से होकर गुज़रते हुए, उसे जानते हुए और अपने पीछे चलनेवालों को दिखाते हुए। दूसरी: जो पीछे चलते हैं उन्हें अपने आप को पूरी तरह उसके मार्गदर्शन को सौंप देना चाहिए, और ठीक वैसे ही चलना चाहिए जैसे वह चला। तीसरी: उसे अपने अनुयायियों की देखभाल का भार अपने ऊपर लेना चाहिए, यह देखते हुए कि सारी रुकावटें दूर की जाएँ, और उनकी सब आवश्यकताओं का प्रबन्ध करते हुए। आइए, हम देखें कि यह सब यीशु में कितनी धन्यता से पूरा हुआ है, और यह जानना हमें कितनी सान्त्वना देता है कि यीशु यह नाम भी धारण करता है — हमारे उद्धार का नायक।
नायक को ठीक उसी पथ पर चलना चाहिए जिस पर उसके अनुयायियों को जाना है। जिस पथ को हम व्यर्थ ढूँढ़ते रहे, वह ऐसा पथ था जो हमें पाप की प्रभुता के नीचे से निकाल सके — उसके दोष से भी, जो परमेश्वर के विरुद्ध अपराध है, और उसकी शक्ति से भी, जो हर पवित्र और भली बात के लिये मृत्यु है। पाप और दोष और मृत्यु की इस दशा से निकलने का इसके सिवा कोई सम्भव मार्ग न था कि परमेश्वर के न्याय के आगे झुका जाए, और उस न्याय को सहते हुए, परमेश्वर की इच्छा के प्रति पूर्ण और स्वेच्छा से किए गए समर्पण का प्रमाण दिया जाए। पतित स्वभाव से, जिस पर अहं और स्वेच्छा की शक्ति राज्य करती है, बाहर निकलने का इसके सिवा कोई मार्ग न था कि उसके प्रति पूरी तरह मर जाया जाए — उसे अपनी मनमानी करने देने के बजाय कुछ भी सह लिया जाए। यही वह मार्ग था जिसमें यीशु को हमें ले चलना था। और उसे स्वयं उसमें चलना था। परमेश्वर को यही उचित लगा कि बहुत से पुत्रों को महिमा में पहुँचाते हुए, उनके उद्धार के नायक को दुःख उठाने के द्वारा सिद्ध करे। मसीह अपने जन्म से ही सिद्ध था; उसकी हर इच्छा और हर झुकाव वैसा ही था जैसा होना चाहिए; परन्तु केवल एक प्रवृत्ति के रूप में, एक सामर्थ के रूप में, जिसे परीक्षा के द्वारा परखा, विकसित और दृढ़ किया जाना आवश्यक था। दुःख और मृत्यु ने व्यक्तिगत रूप से मसीह में, उसके चरित्र को सिद्ध करने में, जो कुछ किया, वही उस सब की नींव है जो उन्होंने हमारी ओर से किया। यह आवश्यक था कि परमेश्वर उसे दुःख उठाने के द्वारा सिद्ध करे; जो सिद्धता दुःख के द्वारा आती है, वह नम्रता और कोमलता, धीरज और परमेश्वर की इच्छा के प्रति सिद्ध समर्पण है। परमेश्वर के मेम्ने ने यहाँ पृथ्वी पर जो दीनता, नम्रता और मन की विनम्रता दिखाई, उसी के कारण वह अब सिंहासन पर विराजमान मेम्ना है। दुःख उठाने के द्वारा वह सिद्ध किया गया, और हमारा महायाजक होने के योग्य पाया गया।
नायक के पीछे चला जाना चाहिए। उसके अनुयायियों को ठीक उसी पथ पर चलना चाहिए जिस पर वह चलता है। यीशु आया और हमारे समान बनाया गया: हमें आना और उसके समान बनाया जाना है। उसका दुःख और मृत्यु केवल प्रतिस्थापन और प्रायश्चित नहीं है। वह यह तो है — परमेश्वर का धन्यवाद हो! — परन्तु वह इससे कहीं अधिक भी है। वह संगति और अनुरूपता के लिये बुलाता है। प्रतिस्थापन एकरूपता पर टिका है: उसी में से अनुरूपता अपनी बढ़ती और बल पाती है। परमेश्वर के मेम्ने के पास हमें देने के लिये कोई उद्धार और कोई सिद्धता नहीं, सिवाय अपने उस नम्र आत्मा के, जो परमेश्वर पर पूर्ण निर्भरता और उसके प्रति पूर्ण आधीनता का आत्मा है। जिस नम्रता और दीनता को परमेश्वर के लिये उसमें सिद्ध करना आवश्यक था, वह हमारे लिये भी उतनी ही आवश्यक है। हमें उसके साथ दुःख उठाना, क्रूस पर चढ़ाया जाना और मरना है। अहं और संसार के प्रति मृत्यु, चाहे उसका मूल्य कैसा भी दुःख या आत्म-त्याग क्यों न हो — यही महिमा का एकमात्र पथ है जो हमारे उद्धार के नायक ने हमारे लिये खोला है।
नायक अपने अनुयायियों की चिन्ता करता है। वह यह नहीं कहता, जो कर सके वह मेरे पीछे आए। वह हर एक पर, यहाँ तक कि सबसे निर्बल पर भी, दृष्टि रखता है। स्मरण कीजिए, स्टैनली ने अन्धकारमय अफ्रीका में कैसी सावधानी बरती कि पीछे छूट गए लोगों को इकट्ठा करे, निर्बलों को शिविर में सब आवश्यक प्रबन्ध के साथ छोड़े, और फिर उनके आ पहुँचने की प्रतीक्षा करे। यीशु एक ऐसा नायक है जो करुणामय और सहानुभूतिपूर्ण है, और अत्यन्त विश्वासयोग्य है: जिस सारी विश्वासयोग्यता और दृढ़ता से वह स्वयं पृथ्वी पर उस पथ पर चला, उसी से वह हर एक की, जो केवल नम्रता से उस पर भरोसा करे और उसकी आज्ञा माने, उस मार्ग में अन्त तक चलने में सहायता करेगा।
मेरे भाइयो, क्या आप समझते हैं कि इसका क्या अर्थ है कि पिता ने, आपको महिमा तक ले चलते हुए, यीशु को हमारे उद्धार का नायक बनाया है? यीशु आपके लिये उत्तरदायी है। उसे अपने नायक के रूप में ग्रहण कीजिए और उस पर भरोसा कीजिए। जो किसी नायक के पीछे चलता है, उसकी सबसे बड़ी आवश्यकता एक कोमल, सिखाने योग्य आत्मा है। आनन्दित होइए कि आपका ऐसा नायक है, जो स्वयं दुःख उठाने के द्वारा नम्रता और आधीनता में सिद्ध किया गया, ताकि वह आपको उस धन्य पथ पर ले चले जो उसे पिता की महिमा तक ले आया, और उतनी ही निश्चयता से आपको भी ले आएगा।
और स्मरण रखिए कि यह नायक कौन है — परमेश्वर का पुत्र, सब वस्तुओं का ईश्वरीय रचनेवाला और सम्भालनेवाला। वह केवल मनुष्य के पुत्र के रूप में, हमारे बाहर के एक नायक के रूप में, उदाहरण और शिक्षा से, अधिकार और कृपा से हम पर प्रभाव डालकर ही हमारा मार्गदर्शन नहीं करता। नहीं, वरन परमेश्वर के पुत्र के रूप में, जो अपने आत्मा के द्वारा हम में कार्य करता है, हाँ, जो स्वयं हमारे भीतर वास करता है। ठीक जैसे परमेश्वर ही था जिसने उसमें कार्य किया और उसे सिद्ध किया, वैसे ही वह, परमेश्वर होकर, अब हम में कार्य करेगा और हमें सिद्ध करेगा।
1. मसीह इसलिये आया कि हमें सच्चे जीवन की एक पूरी तरह नई धारणा दे, हमें सोचने और जीने का एक नया ढंग दिखाए, हमें यह सिखाए कि स्वर्गीय जीवन इस बात में है कि पिता को पूरी तरह प्रसन्न करने के लिये हर उस वस्तु को त्याग दिया जाए जिसका पाप से तनिक-सा भी सम्बन्ध है। यही वह नया और जीवता मार्ग है जो उसने शरीर के फटे हुए परदे में से होकर खोला।
“परमेश्वर को उसे सिद्ध करना उचित लगा।” मसीह ने जो कुछ किया, और जो कुछ उसमें किया गया, वह सब परमेश्वर के द्वारा किया गया। उसने अपने आप को परमेश्वर को सौंप दिया: उसने अपने आप से कुछ नहीं किया: उसने परमेश्वर को अपने में सब कुछ करने दिया। यही सिद्धता का पथ है, महिमा का पथ, जिसमें यीशु ले चलता है। उसका ईश्वरत्व हमारे लिये अवर्णनीय रूप से बहुमूल्य है, इस कारण कि वह हम में क्या हो सकता है और क्या कर सकता है।
परन्तु उसकी मानवता भी उतनी ही अवर्णनीय रूप से बहुमूल्य है, जो हमें दिखाती है कि वह कैसे सिद्ध किया गया, परमेश्वर ने उसमें कैसे कार्य किया, हमें क्या होना चाहिए, और उसके द्वारा हम निश्चय ही क्या हो सकते हैं। 3. इस सत्य को बहुत स्पष्टता से पकड़ने का यत्न कीजिए कि वह केवल उसी रूप में उद्धारकर्ता है जिस रूप में वह नायक है। उद्धार उसके द्वारा ले चलाया जाना है।
15 जिसके लिये सब कुछ है और जिसके द्वारा सब कुछ है
2. 10. क्योंकि जिसके लिये सब कुछ है, और जिसके द्वारा
सब कुछ है, उसे यही अच्छा लगा कि जब वह बहुत से पुत्रों को महिमा में पहुँचाए, तो उनके उद्धार के कर्ता को दुःख उठाने के द्वारा सिद्ध करे। जिसके लिये सब कुछ है। परमेश्वर उस सब का अन्तिम कारण है जो कुछ अस्तित्व में है। सब कुछ केवल इसी एक उद्देश्य से अस्तित्व में है कि उसकी महिमा प्रकट हो। प्रकृति की प्रत्येक वस्तु के अस्तित्व का एकमात्र कारण यही है कि परमेश्वर की अद्भुत भलाई और सामर्थ उसके द्वारा चमक उठे। सबसे बढ़कर, मनुष्य इसलिये सृजा गया कि वह आराध्य सत्ता, जिसका स्वभाव ही प्रेम है, उसमें यह प्रमाणित करने का अवसर पाए कि वह कितनी उदारता से और कितनी पूर्णता से उसे अपने अनुग्रह और अपनी महिमा के धन का भागी बनाएगा।
जिसके लिये सब कुछ है, ताकि उन सब में उसकी महिमा और भलाई प्रकट हो। “हे हमारे प्रभु और हमारे परमेश्वर, तू ही महिमा और आदर और सामर्थ पाने के योग्य है; क्योंकि तू ही ने सब वस्तुएँ सृजीं, और वे तेरी ही इच्छा से हैं और सृजी गईं।”
जिसके द्वारा सब कुछ है। परमेश्वर उस सब का कर्ता-कारण है जो कुछ अस्तित्व में है। परमेश्वर सब वस्तुओं का अन्त और लक्ष्य है, क्योंकि वही उनका आरम्भ और मूल है। सब कुछ उसी की ओर लौटना चाहिए, क्योंकि सब कुछ उसी से निकला है और केवल उसी के द्वारा स्थिर है। ऐसा कोई जीवन, कोई भलाई या कोई सुन्दरता नहीं जो फिर से उसी की ओर, जो उसका एकमात्र सोता और स्रोत है, ऊपर न उठती हो।
“एक ही परमेश्वर है, अर्थात् पिता, जिसकी ओर से सब वस्तुएँ हैं, और हम उसी के लिये हैं।” “सब का एक ही परमेश्वर और पिता है, जो सब के ऊपर, और सब के मध्य में, और सब में है।” प्रेरित यह भी लिख सकता था, “परमेश्वर को यही अच्छा लगा कि हमारे उद्धार के अगुआ को दुःख उठाने के द्वारा सिद्ध करे।” पर बिना उचित कारण के नहीं कि वह यहाँ परमेश्वर के उस स्वरूप का उल्लेख करता है जिसमें उसने पुत्र को हमारे उद्धार का अगुआ बनाकर सिद्ध करने में कार्य किया। जब मनुष्य ने पाप किया और परमेश्वर से गिर गया, तो उसने एक साथ वे दोनों धन्य सच्चाइयाँ खो दीं जिन पर परमेश्वर के साथ उसका सम्बन्ध टिका हुआ था।
परमेश्वर के प्रति उसकी पवित्र स्वामिभक्ति, जिसमें सब कुछ परमेश्वर के लिये था; और परमेश्वर पर उसकी धन्य निर्भरता, जिसमें सब कुछ परमेश्वर के द्वारा था। इनके स्थान पर अहं का राज्य आ गया, जिसके साथ अपने लिये और अपने ही द्वारा जीया जानेवाला जीवन आया। अहं के इसी जीवन से हमें छुड़ाने के लिये यीशु आया, ताकि हमें परमेश्वर के पास लौटा लाए, कि हम उसे उस परमेश्वर और पिता के रूप में जानें और उसका आदर करें, जिसके लिये सब कुछ है और जिसके द्वारा सब कुछ है। ऐसा करके उसने फिर से वह एकमात्र मार्ग खोल दिया जो महिमा तक ले जा सकता था। उसने यह पहले तो मनुष्य के रूप में अपने जीवन में हमें यह दिखाकर किया कि मनुष्यों को किस प्रकार परमेश्वर के लिये और परमेश्वर के द्वारा जीना चाहिए; और फिर अपनी मृत्यु के द्वारा हमें पाप के प्रभुत्व से छुड़ाकर, और हमारे लिये स्वर्गीय जीवन की सामर्थ प्राप्त करके।
जिसके लिये सब कुछ है, और जिसके द्वारा सब कुछ है। इसी स्वरूप में परमेश्वर ने मसीह को दुःखों के द्वारा सिद्ध किया। इसी स्वरूप में मसीह ने अपने दुःखों में परमेश्वर को प्रकट किया और उसका आदर किया। हमें इसी स्वरूप में परमेश्वर को जानने, उससे प्रेम करने और उसकी सेवा करने के लिये जीत लेना और उसके पास ले आना—इसी के लिये यीशु उद्धारकर्ता है।
जिसके लिये सब कुछ है। अपने सम्पूर्ण जीवन में यीशु ने अपने चेलों के मन पर किसी भी बात को इससे अधिक स्पष्टता से अंकित करना नहीं चाहा, जितना इस बात को कि वह पिता का दूत और सेवक है; कि उसके मन में अपनी इच्छा पूरी करने या अपना आदर ढूँढ़ने का कोई विचार ही नहीं था; कि वह केवल वही ढूँढ़ता और करता था जो पिता की प्रसन्नता और महिमा के लिये हो। उसने हमें पृथ्वी पर रहनेवाले एक ऐसे मनुष्य का आदर्श दिया जो पूर्ण रूप से और सर्वथा स्वर्ग के परमेश्वर के लिये जीता था। पृथ्वी पर उसका जीवन यहाँ देह में उस ईश्वरीय दावे का प्रदर्शन था, मानवीय भाषा में उसका अनुवाद था: “सब कुछ परमेश्वर के लिये।” परमेश्वर के प्रति उसकी स्वामिभक्ति पूर्ण थी। उसने हमें प्रमाणित करके दिखाया कि मनुष्य की नियति, धन्यता और अनन्त महिमा इसी बात में पाई जाती है: पूर्ण रूप से परमेश्वर के लिये जीना।
जिसके द्वारा सब कुछ है। मसीह का जीवन इस बात की भी व्याख्या था। वह निरन्तर यह कहने में नहीं लजाया कि वह अपने आप से कुछ नहीं कर सकता, और कि केवल जैसा पिता उसे दिखाता या उससे कहता था, वैसा ही वह कार्य कर सकता और बोल सकता था। अपने आप से कुछ भी न कर पाना, वरन् निरन्तर निर्भरता में परमेश्वर की और अपने भीतर उसके कार्य की बाट जोहना—इसे वह अपनी धन्यता और अपनी शक्ति समझता था। वह जानता था, और उसने हमें सिखाया, कि जिस मनुष्य ने पूरे मन से परमेश्वर के प्रति समर्पित होकर कहा है, “सब कुछ परमेश्वर के लिये,” वह भरोसे के साथ यह भी कह सकता है, “सब कुछ परमेश्वर के द्वारा।”
“सब कुछ परमेश्वर के लिये,” “सब कुछ परमेश्वर के द्वारा।” यीशु मसीह ने हमारे लिये यह सम्भव कर दिया है कि हम इन्हें अपने मूलमंत्र बनाएँ। परमेश्वर के साथ और निकटता से चलने की सारी अभिलाषाओं में, अधिक शुद्ध, अधिक सच्चे, अधिक ऊँचे जीवन के सारे प्रयत्नों में, ये ही वे दो ध्रुव हैं जिनके बीच प्राण को चलते रहना चाहिए। ये उस सच्चे पवित्रशास्त्रीय रहस्यवाद के निश्चित चिह्न हैं, जिसमें उन सब भूखे प्राणों के लिये इतना आकर्षण है जो परमेश्वर को पूरी रीति से जानने और प्रसन्न करने की लालसा रखते हैं।
सब कुछ परमेश्वर के लिये! पूर्ण रूप से, एक भी क्षण, एक भी विचार, एक भी शब्द, एक भी व्यक्ति या सम्पत्ति को छोड़े बिना; सर्वथा परमेश्वर के लिये—यही प्राण की एकमात्र अभिलाषा बन जाती है। उसने देख लिया है कि परमेश्वर इसके योग्य है, कि वह इसका दावा करता है, और कि वस्तुओं के स्वभाव ही के अनुसार, इससे कम कुछ भी उस हृदय को तृप्त नहीं कर सकता जिसे परमेश्वर ने अपने आप से भर जाने के लिये बनाया है।
सब कुछ परमेश्वर के द्वारा! जितना अधिक यह लक्ष्य स्पष्ट होता जाता है कि सब कुछ परमेश्वर के लिये हो, और जितना अधिक प्राण इस निश्चय के नीचे कि मनुष्य से यह अनहोना है, अपनी शून्यता और असमर्थता में गहरा धँसता जाता है, उतनी ही शीघ्र विश्वास यह देखने तक ऊपर उठता है कि हम न केवल कह सकते हैं, वरन् सचमुच यह कहने का साहस करते हैं, सब कुछ परमेश्वर के लिये! क्योंकि हम यह भी कह सकते हैं, सब कुछ परमेश्वर के द्वारा! परमेश्वर स्वयं इसे हम में पूरा करेगा।
यही वह परमेश्वर है जिसने अपने पुत्र में अपने आप को हम पर प्रकट किया है। उसे, जिसके लिये सब कुछ और जिसके द्वारा सब कुछ है, यही अच्छा लगा कि हमारे उद्धार के अगुआ को दुःखों के द्वारा सिद्ध करे। आइए, हम उसकी आराधना करें! आइए, हम उसकी वन्दना करें! आइए, हम उसे पूर्ण स्वामिभक्ति और बालक-समान निर्भरता का बलिदान चढ़ाएँ, जब ये शब्द हमारे हृदय और जीवन में गूँजते रहें: सब कुछ परमेश्वर के लिये! सब कुछ परमेश्वर के द्वारा! परमेश्वर ही सब कुछ है।
परमेश्वर की उपस्थिति का अभ्यास एक अत्यन्त आवश्यक और अत्यन्त धन्य आत्मिक अभ्यास है। जब प्राण शान्ति और दीनता में झुकता है, और मौन में आराधना करता है, तो वह उस सही मनोदशा में आ जाता है जिसमें वह अपनी शून्यता को पहचानता है, और यह अनुभव करता है कि परमेश्वर ही सब कुछ है, कि सब कुछ उसी के लिये है, और सब कुछ उसी के द्वारा है।
2. सब कुछ परमेश्वर के लिये: यह समर्पण है। सब कुछ परमेश्वर के द्वारा: यह विश्वास है। यही वह आत्मा थी जिसमें मसीह ने अपने आप को परमेश्वर को सौंप दिया: समर्पण और विश्वास। यही वह परमेश्वर था जिसने मसीह को सिद्ध किया। परमेश्वर को इसी स्वरूप में जानना और उसका आदर करना सिद्धता का रहस्य है, क्योंकि ऐसे लोगों में वह अपना कार्य कर सकता है। यही वह परमेश्वर है जो बहुत से पुत्रों को महिमा में पहुँचा रहा है; उसे जानना और उसका आदर करना महिमा का मार्ग है। इस परमेश्वर को और उसके दावों को प्रकट करना, यह दिखाना कि सब कुछ उसे कैसे सौंप दिया जाए—इसी के लिये मसीह आया। यही वह जीवन है जो वह हमारे लिये लाया, वह मार्ग जो उसने खोला, वह उद्धार जो वह देता है।
16 यीशु हमें भाई कहता है
2:11 क्योंकि पवित्र करनेवाला और जो पवित्र किए जाते हैं, सब
1 एक ही से हैं: इसी कारण वह उन्हें भाई कहने से नहीं लजाता, और कहता है (भजन संहिता 22:23), 12. मैं तेरा नाम अपने भाइयों को सुनाऊँगा, सभा के बीच में मैं तेरा भजन गाऊँगा। 13. और फिर यह, कि मैं उस पर भरोसा रखूँगा (यशायाह 8:17)। और फिर यह, कि देख, मैं और वे लड़के जिन्हें परमेश्वर ने मुझे दिया है (यशायाह 8:18)।
यहाँ हमें पिछली बात का कारण मिलता है। परमेश्वर के लिये, बहुत से पुत्रों को महिमा में पहुँचाते हुए, उनके उद्धार के अगुआ को दुःख उठाने के द्वारा सिद्ध करना क्यों आवश्यक था? अथवा, ऐसा कैसे हुआ कि उसके सिद्ध किए जाने से वे सिद्ध हो सके, और उन्हें उद्धार मिल सका? उत्तर यह है, कि पवित्र करनेवाला, अर्थात् यीशु, और जो पवित्र किए जाते हैं, अर्थात् परमेश्वर के पुत्र, सब एक ही में से, अर्थात् परमेश्वर से हैं। इसके प्रमाण में तीन वचन उद्धृत किए गए हैं, जिनमें यीशु हमें भाई कहता है, परमेश्वर पर भरोसा रखने में हमारे साथ अपना स्थान लेता है, और हमारे विषय में उन सन्तानों के रूप में बात करता है जिन्हें परमेश्वर ने उसे दिया है। यीशु, जो पहिलौठा पुत्र है, और वे पुत्र जिन्हें वह महिमा तक ले जाता है, परमेश्वर से उत्पन्न होने में एक हैं—इसी कारण उसकी सिद्धता उनका उद्धार निश्चित करती है। यीशु की हमारे साथ यह एकता ही उसे उद्धार का अगुआ होने के योग्य बनाती है।
इस एकता की जड़ ईश्वरीय जीवन की सच्चाई में है। पवित्र करनेवाला और जो पवित्र किए जाते हैं, दोनों सब एक ही में से हैं। यीशु एकलौता है, अनन्त पुत्र, अपनी ईश्वरीय सत्ता और प्रताप में पिता के साथ एक। हम परमेश्वर के पुत्र हैं, क्योंकि हम उसके द्वारा और उसमें ईश्वरीय जीवन के भागी होते हैं। उसके पुत्रत्व और हमारे पुत्रत्व में अन्तर होने पर भी—उसका मौलिक है और हमारा उससे प्राप्त—वे मूल में एक हैं: दोनों के जीवन का उद्गम परमेश्वर के जीवन में है।
मसीह की हमारे साथ उद्गम की यही एकता थी जिसने उसके लिये यह सम्भव किया कि वह हमारी मनुष्यता में हमारे साथ एक हो जाए, और इस प्रकार हमारे उद्धार का अगुआ बने। यही एकता उसके लिये यह सम्भव करती है कि वह हमें वह सिद्धता प्रदान करे—वह सिद्ध नम्रता और परमेश्वर की इच्छा में वह आनन्द, जो दुःख उठाने के द्वारा उसके मानव-स्वभाव में गढ़ा गया—उसकी वह पवित्रता जिससे हमें पवित्र किया जाना है।
क्योंकि पवित्र करनेवाला और जो पवित्र किए जाते हैं, दोनों सब एक ही से हैं। यीशु पवित्र करनेवाला है, हम पवित्र किए जानेवाले हैं। वह उद्देश्य जिसके लिये मसीह हमारे उद्धार का अगुआ बना, वह महान कार्य जो उसे हमारे लिये करना है, पुत्र और परमेश्वर के पुत्रों के बीच एकता का बन्धन, इस बात का प्रमाण कि वे उसका स्वरूप और समानता धारण करते हैं, और उनकी वास्तविक एकता का चिह्न—यह सब पवित्रता है।
‘पवित्र’ शब्द पवित्रशास्त्र के सबसे गहरे शब्दों में से एक है। इसका अर्थ केवल ‘अलग किया हुआ’ या ‘परमेश्वर के लिये समर्पित’ होने से कहीं अधिक है। त्रिएक परमेश्वर वह त्रि-पवित्र जन है: पवित्रता उसकी सत्ता का सबसे गहरा भेद है, उसकी धार्मिकता और उसके प्रेम का अद्भुत मेल। पवित्र होना परमेश्वर के साथ संगति में होना है, उसके अधिकार में होना है। इसी कारण आत्मा विशेष रूप से ‘पवित्र’ नाम धारण करता है, क्योंकि वही परमेश्वर के प्रेम को हम तक पहुँचानेवाला है, और ईश्वरीय संगति को बनाए रखना उसका विशेष कार्य है। यीशु परमेश्वर का पवित्र जन है, जो हमें अपने पवित्र आत्मा से भरकर पवित्र बनाता है।
यीशु और हमारे बीच का अन्तर बड़ा है; एकता उससे भी बड़ी है। वह और हम एक ही से हैं, मिलकर परमेश्वर के जीवन और परमेश्वर की पवित्रता के भागी हैं। आइए, हम ऐसे बड़े उद्धार पर और भी अधिक मन लगाएँ। यह एकता उस ‘भाई’ नाम में प्रकट होती है जो यीशु हमें देता है। इसी कारण वह उन्हें भाई कहने से नहीं लजाता, और कहता है, मैं तेरा नाम अपने भाइयों को सुनाऊँगा। लेखक ने यीशु के साथ हमारी भीतरी एकता के विषय में कहा था। पर हाय, वास्तविक जीवन में कैसा अन्तर है! ऐसा भयानक अन्तर कि वह भली-भाँति हम पर लज्जित हो सकता था! हाँ, स्वर्गदूतों के सामने भी और संसार के सामने भी, कितनी ही बार उसके पवित्र लोगों ने उसे लज्जित किया है, उसे अपने इस सम्बन्ध पर लज्जित होने का कारण दिया है! पर उसका नाम धन्य हो! उसका मनुष्य बनना दीनता से झुकने का एक कार्य था, जिसकी जड़ इस बोध में थी कि वह हमारे साथ एक है—क्योंकि हम परमेश्वर में से उसके साथ एक हैं—और जिसका बल मानो एक बड़े भाई के प्रेम में था।
अब तीन वचन उद्धृत किए गए हैं: पहला भजन संहिता 22:23 से, जिसमें दुःख उठानेवाला मसीहा अपने भाइयों पर पिता का नाम प्रकट करने की प्रतिज्ञा करता है; दूसरा और तीसरा यशायाह 8:17-18 से, जिनमें भविष्यसूचक प्रतिरूपों के द्वारा, विश्वास और भरोसे के जीवन में अपने सब लोगों के साथ उसकी सहभागिता, और उन लोगों के सिर पर उसका स्थान, जिन्हें परमेश्वर ने उसे सन्तान करके दिया है, व्यक्त होते हैं।
कैसे अद्भुत विचार! हम, उतनी ही सच्चाई से जितना यीशु, परमेश्वर से हैं! इसी सच्चाई के प्रकाश में यीशु हमें देखता है, हमसे प्रेम करता है, और हमसे व्यवहार करता है! इसी सच्चाई के प्रकाश में हमें यीशु को देखना, उससे प्रेम करना और उससे व्यवहार करना चाहिए। और इसी सच्चाई के प्रकाश में हम अपने आप को भी देखें। विश्वास का जीवन यही है: यीशु को और अपने आप को वैसे देखना जैसे वह हमें देखता है, वैसे सोचना जैसे वह सोचता है, उसके हृदय में जीना। तब वह प्रतिज्ञा पूरी होगी पवित्रीकरण के सिद्धान्त से साधारणतः जितना अर्थ लिया जाता है, उससे कहीं अधिक।
“‘पवित्र करना’ में यहाँ वह सब सम्मिलित है जो परमेश्वर हमारी पुनःस्थापना के लिये करता है, जब वह बुलाता है, धर्मी ठहराता है और महिमा देता है।” —लांगे की टीका में रीगर, 10:10 पर (तुलना करें अध्याय 9; 13)। हमारे लिये: “मैं तेरा नाम अपने भाइयों को सुनाऊँगा,” “कि जो प्रेम तू ने मुझ से रखा, वह उनमें रहे।” जब हम दीन, बाट जोहती हुई शान्ति में उसके सामने झुकते हैं, तो प्राण उसे यह कहते सुनेगा: मेरे भाई! मुझे तुझ पर पिता को प्रकट करने दे। और पिता का नाम, उसका प्रेम और उसकी निकटता तब नया अर्थ पाएँगे, जब हम कह सकेंगे, यीशु मुझे अपना भाई कहता है! परमेश्वर ने अपने पुत्र में मुझसे बात की है! और हम समझेंगे कि विश्वास के लिये यीशु के साथ एकता की वह अबोधगम्य वास्तविकता प्राण के दैनिक जीवन में धन्य, सचेत अनुभव बन जाती है।
1. परमेश्वर से जन्म लेने में, पवित्र होने में, उसके द्वारा भाई स्वीकार किए जाने में यीशु के साथ एकता! कैसा धन्य जीवन! कैसा पूर्ण उद्धार! “जो कोई परमेश्वर की इच्छा पर चले, वही मेरा भाई है।” क्या आप यीशु के मुँह से अपने लिये ‘भाई!’ सुनने का पवित्र आनन्द जानना चाहते हैं? तो आपका जीवन वैसा ही हो जैसा उसका था—परमेश्वर की इच्छा पर चलना। इसी में वह दुःख उठाकर सिद्ध किया गया। इसी में उसका आत्मा और जीवन आप में प्रकट होगा, और ‘भाई’ नाम न केवल उसकी करुणा का, वरन् आत्मा में उस एकता और आचरण में उस समानता का भी सूचक होगा जो आपको परमेश्वर का पुत्र प्रमाणित करती है।
पवित्रीकरण, अर्थात् पवित्रता, यीशु के साथ एकता में जीवन के सिवा और कुछ नहीं। न इससे अधिक, न इससे कम। पवित्र करनेवाला और जो पवित्र किए जाते हैं, सब एक ही से हैं। उस एकता में जीना, यीशु का हम में जीवित रहना, पवित्र होने का मार्ग है। “और फिर यह, कि मैं उस पर भरोसा रखूँगा।” यीशु परमेश्वर पर विश्वास के द्वारा जीया। वह विश्वास का अगुआ और सिद्ध करनेवाला है। उसने हमारे लिये विश्वास का मार्ग खोल दिया है और उसमें हमारी अगुवाई करता है।
17 ताकि वह शैतान को निकम्मा कर दे
2:14 इसलिये जब कि लड़के मांस और लहू के भागी हैं, तो वह आप भी
उनके समान उनका सहभागी हो गया; ताकि मृत्यु के द्वारा उसे, जिसे मृत्यु पर शक्ति मिली थी, अर्थात् शैतान को, निकम्मा कर दे; 15. और जितने मृत्यु के भय के मारे जीवन भर दासत्व में फँसे थे, उन्हें छुड़ा ले।
पिछले पदों में यीशु और उसके भाइयों की एकता के विषय में ईश्वरीय पक्ष से कहा गया था: वे सब एक ही से हैं। यहाँ वह हमारे सामने मानवीय पक्ष से रखी गई है: जब कि लड़के मांस और लहू के भागी हैं, तो वह आप भी उनके समान उनका सहभागी हो गया। हम पहले ही कह चुके हैं कि इसके लिये, अर्थात् मसीह के मनुष्य बनने के लिये, एक से अधिक कारण थे। पहला, कि हमारा अगुआ होने के नाते वह स्वयं सिद्ध किया जाए, और इस प्रकार एक मार्ग तैयार करे—जीने का एक मार्ग या दशा, एक स्वभाव, एक जीवन—जिसमें हम परमेश्वर के निकट आ सकें। दूसरा, कि वह हमें मृत्यु और शैतान की शक्ति से छुड़ाए। तीसरा, कि हमारे लिये और हम में अपने सारे कार्य में वह उन बातों में जो परमेश्वर से सम्बन्ध रखती हैं, एक दयालु महायाजक हो, जो हमें समझ सके और हमसे सहानुभूति रख सके, और हमें सह लेने और हमारी सहायता करने को तैयार हो। यहाँ मसीह के देहधारण के इन तीन पहलुओं में से दूसरा पहलू सामने लाया गया है: वह मनुष्य बना ताकि मृत्यु और शैतान की शक्ति का सामना करे, उस पर जय पाए और उसे नष्ट करे।
जब कि लड़के मांस और लहू के भागी हैं, तो वह आप भी उसी प्रकार उनका सहभागी हो गया। देहधारण का विचार हमें चाहे कितना ही परिचित क्यों न हो, आइए, हम फिर से उसके सम्पूर्ण अर्थ को भली-भाँति समझने का यत्न करें। जैसे आदम हमें कभी पाप और मृत्यु की शक्ति के अधीन न ला सकता, यदि वह हमारा पिता न होता और अपना स्वभाव हमें न देता, वैसे ही मसीह हमें कभी न बचा सकता था, सिवाय इसके कि वह हमारा स्वभाव अपने ऊपर ले, उस स्वभाव में वह सब करे जो हमें करना पड़ता यदि अपने आप को छुड़ाना हमारे लिये सम्भव होता, और फिर जो कुछ उसने पूरा किया उसका फल हमारे भीतर एक स्वभाव के रूप में दे, कि वह एक नए, अनन्त जीवन की सामर्थ बने। एक ईश्वरीय आवश्यकता के रूप में, जिसके बिना कोई उद्धार हो ही न सकता था, और असीम प्रेम तथा दीनता के एक कार्य के रूप में, परमेश्वर का पुत्र मांस और लहू का भागी बना। केवल इसी प्रकार वह दूसरा आदम, एक नई जाति का पिता हो सकता था।
ताकि मृत्यु के द्वारा उसे, जिसे मृत्यु पर शक्ति मिली थी, अर्थात् शैतान को, निकम्मा कर दे। मृत्यु एक ऐसी शक्ति है जिसे स्वयं परमेश्वर की ओर से मान्यता प्राप्त है। वस्तुओं के स्वभाव ही के अनुसार यह अन्यथा हो ही नहीं सकता था कि जब मनुष्य जीवन के सोते परमेश्वर से फिरकर शैतान और अहं की ओर मुड़ा, तो वह मृत्यु की शक्ति के अधीन हो गया। उसने अपने आप को शैतान के हाथ सौंप दिया था, और शैतान को उस पर शक्ति मिल गई थी। जैसे जेलर राजा के अधिकार के अधीन बन्दी को बन्द रखता है, वैसे ही शैतान पापी को तब तक मृत्यु की शक्ति में रखता है जब तक कोई सच्ची, विधिसम्मत मुक्ति न दी जाए। शैतान और मृत्यु की शक्ति के नीचे से निकलने का हमारे लिये एकमात्र मार्ग यह था कि हम उस पतित स्वभाव को उतार दें जिस पर उनकी शक्ति थी, उस पापमय जीवन के प्रति मरकर उससे बाहर निकल आएँ, और मरने में उससे पूरी रीति से स्वतंत्र हो जाएँ। ऐसा करने की शक्ति हम में नहीं थी। यीशु ने हमारी पतित मनुष्यता की सारी दशाओं में प्रवेश किया। उसने हमारी मृत्यु में प्रवेश किया, और उसे पाप के दण्ड के रूप में सहा, और सहकर परमेश्वर की व्यवस्था की माँग को पूरा किया। और इस प्रकार, क्योंकि व्यवस्था ही पाप का बल थी, उसने पाप और शैतान से हम पर मृत्यु की शक्ति छीन ली। उसने परमेश्वर के धर्ममय न्याय को पूरी रीति से स्वीकार करते हुए, अपनी आत्मा पिता को सौंपकर, मृत्यु को शरीर के जीवन के अन्त के रूप में सहा। मृत्यु—व्यवस्था के दण्ड के रूप में; मृत्यु—स्वाभाविक जीवन के अन्त के रूप में; मृत्यु—मनुष्य पर शैतान की शक्ति के रूप में—नष्ट कर दी गई, और जिसे मृत्यु पर शक्ति मिली थी वह निकम्मा कर दिया गया। और अब, जितना कम दावा या अधिकार मृत्यु का उस पर है, उतना ही कम उन पर है जो उसमें हैं, उन पर जिनमें अब उसके जीवन की सामर्थ कार्य करती है। वह आप भी मांस और लहू का सहभागी हुआ, ताकि मृत्यु के द्वारा उसे, जिसे मृत्यु पर शक्ति मिली थी, अर्थात् शैतान को, नष्ट कर दे।
और जितने मृत्यु के भय के मारे जीवन भर दासत्व में फँसे थे, उन्हें छुड़ा ले। मृत्यु और शैतान की शक्ति इतनी पूरी रीति से तोड़ दी गई है कि अब मृत्यु के उस भय से, जो इतने लोगों को दासत्व में रखता है, पूर्ण छुटकारा है। पुराने नियम के अधीन जीवन और अमरता अभी पूरी रीति से प्रकाश में नहीं लाए गए थे। कोई आश्चर्य नहीं कि प्राचीन पवित्र लोग प्रायः दासत्व में फँसे हुओं की नाईं जीते और बोलते थे। पर कितने दुःख की बात है कि यीशु मसीह के छुड़ाए हुए लोग, उसके भाई, इतनी बार यह प्रमाणित करते हैं कि वे उसके छुटकारे की वास्तविकता और सामर्थ को, या आनन्द के इस गीत को, बहुत कम जानते हैं: “जय ने मृत्यु को निगल लिया। परमेश्वर का धन्यवाद हो, जो हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा हमें जयवन्त करता है।” मेरे भाई, क्या आप इस धन्य सच्चाई के पूर्ण अनुभव में जी रहे हैं? क्योंकि आप मांस और लहू के भागी हैं, मसीह आया और उसी प्रकार उनका सहभागी हुआ, ताकि उसके और आपके बीच पूर्ण एकता हो। क्या आप इस एकता में जीते हैं? अपनी मृत्यु के द्वारा उसने शैतान को नष्ट किया, ताकि आप उसकी शक्ति से पूरी रीति से स्वतंत्र हो जाएँ। क्या आपका जीवन इस स्वतंत्रता में है? वह मृत्यु के भय से और उससे आनेवाले दासत्व से छुड़ाता है, और उसे महिमा की आशा के आनन्द में बदल देता है।
क्या यह आनन्द आपका भाग है? आइए, हम विश्वास करें कि वह, जो अब महिमा और आदर का मुकुट पहने हुए है, सचमुच सब कुछ हमारे लिये वास्तविक बना सकता है, ताकि हम, जो परमेश्वर से जन्म और मांस और लहू में जन्म के दोहरे बन्धन से उसके साथ एक हैं, उसके छुड़ाए हुए, उसके पवित्र किए हुए, उसके प्रिय भाई हों। उसने अपने आप को सौंप दिया कि पूर्ण रूप से हमारे समान और हमारे लिये हो; क्या हम अपने आप को नहीं सौंपेंगे कि पूर्ण रूप से उसके समान और उसके लिये हों?
“मृत्यु के द्वारा उसने उसे, जिसे मृत्यु पर शक्ति मिली थी, नष्ट कर दिया।” मृत्यु को अपनी शक्ति व्यवस्था से मिली थी। उसकी माँग को पूरा करने के सिवा उस पर जय पाने का और कोई मार्ग न था। मृत्यु के द्वारा उसने मृत्यु को नष्ट किया। हमारे लिये भी यही मार्ग है। जब मैं अपने आप को मृत्यु के लिये सौंप देता हूँ, जब मैं पापमय जीवन को त्याग देता हूँ, और मसीह की मृत्यु की सामर्थ में अहं के प्रति मर जाता हूँ, तब उसके छुटकारे की सामर्थ मुझ में कार्य करेगी।
2. मृत्यु के द्वारा जीवन तक। यह प्रकृति का नियम है, जैसा गेहूँ के हर दाने में दिखाई देता है। यह मसीह के जीवन का नियम है, जैसा उसके पुनरुत्थान में दिखाई देता है। यह विश्वास के जीवन का नियम है, जिसे हर दिन महसूस और अनुभव किया जाना है, जब वह नई मृत्यु जो मसीह मरा, और वह नया जीवन जो वह जीता है, सामर्थ बनकर हम में कार्य करते हैं।
पहले अध्याय ने हम पर मसीह के ईश्वरत्व को सुसमाचार की नींव के रूप में प्रकट किया, ताकि हम जानें कि जो कुछ उसने अपनी मनुष्यता में पूरा किया, वह ईश्वरीय वास्तविकता में सम्पन्न हुआ है, और ईश्वरीय सृजनात्मक सामर्थ के साथ हम में कार्य करता है।
18 सहायता करने में समर्थ महायाजक
2:16 क्योंकि वह तो स्वर्गदूतों को नहीं थामता, वरन् अब्राहम के वंश को थामता है।
17. इस कारण उसको चाहिए था कि सब बातों में अपने
भाइयों के समान बने; जिससे वह उन बातों में जो परमेश्वर से सम्बन्ध रखती हैं, एक दयालु और विश्वासयोग्य महायाजक बने, ताकि लोगों के पापों के लिये प्रायश्चित करे। 18. क्योंकि जब उसने परीक्षा की दशा में दुःख उठाया, तो वह उनकी भी सहायता कर सकता है जिनकी परीक्षा होती है।
पहले अध्याय में हमने देखा कि लेखक पुराने नियम से एक के बाद एक वचन उद्धृत करता है, ताकि हमें हमारे प्रभु के ईश्वरत्व की सच्चाई और उसके अर्थ की पूरी समझ तक पहुँचाए। इस अध्याय में हम उसे उसी प्रकार बार-बार हमारे प्रभु की मनुष्यता की बात दोहराते देखते हैं, कहीं ऐसा न हो कि हम उसके सम्पूर्ण अर्थ को पूरी रीति से न समझें। यहाँ भी ऐसा ही है। उसने अभी-अभी कहा था, जब कि लड़के मांस और लहू के भागी थे, तो वह आप भी उसी प्रकार उनका सहभागी हो गया।
ऐसा लगता है मानो वह शब्दों की अपर्याप्तता को अनुभव करता है, और इसलिये एक बार फिर अपनी बात दोहराता और पक्की करता है: क्योंकि वह तो स्वर्गदूतों को नहीं थामता, वरन् अब्राहम के वंश को थामता है। मनुष्य भले ही स्वर्गदूतों से कुछ कम बनाया गया हो, पर यह आदर उन्हें प्राप्त नहीं कि उसने उन्हें थामा हो; वह अब्राहम के वंश को थामता है। और वह किस प्रकार थामता है? परमेश्वर किसी प्राणी को इसके सिवा और किसी रीति से नहीं थाम सकता कि वह अपने जीवन और आत्मा के साथ उसमें प्रवेश करे, और इस प्रकार अपनी भलाई और सामर्थ उसे प्रदान करे, और उसे अपने साथ एकता में ले आए। यीशु ने मनुष्य को इसी प्रकार थामा। उसने मनुष्यता में प्रवेश किया और उसके साथ एक हो गया। और इसी प्रकार वह एक-एक प्राण को थामता है, प्रत्येक के साथ व्यक्तिगत एकता और संगति में प्रवेश करके।
इस कारण, जब उसने इस प्रकार मनुष्य को थामने का मन बनाया, तो उसको चाहिए था—यह ईश्वरीय दृष्टि से उचित और योग्य था, और वस्तुओं के स्वभाव के अनुसार, उसके उद्देश्य के परिणामस्वरूप, एक पूर्ण आवश्यकता थी—उसको चाहिए था कि सब बातों में अपने भाइयों के समान बने। इस थामने में यह निहित था कि वह अपने आप को उनके साथ एकरूप करे, और यह फिर सब बातों में उनके समान बने बिना असम्भव था। केवल इसी प्रकार वह उन्हें बचा सकता था। यह सचमुच आवश्यक था, ताकि इस प्रकार वह उन बातों में जो परमेश्वर से सम्बन्ध रखती हैं, एक दयालु और विश्वासयोग्य महायाजक बने, कि लोगों के पापों के लिये प्रायश्चित करे।
यहाँ हमें पहली बार ‘महायाजक’ शब्द मिलता है—एक ऐसा शब्द जो नए नियम की किसी और पुस्तक में हमारे प्रभु यीशु के लिये प्रयुक्त नहीं हुआ, पर इस पत्री में वही केन्द्रीय विचार है। हम आगे (अध्याय 5 में) देखेंगे कि उसका ईश्वरीय पुत्रत्व और उसका याजकपद कैसे अविभाज्य रूप से जुड़े हुए हैं। यहाँ हमें सिखाया गया है कि उसकी वास्तविक मनुष्यता भी उसके लिये उतनी ही अनिवार्य है। इस पत्री की उल्लेखनीय बातों में से एक यह है कि वह हमारे प्रभु के जीवन में व्यक्तिगत विकास के मूल्य को इतनी अद्भुत रीति से खोलकर दिखाती है।
वह व्यक्ति और कार्य को सदा अविभाज्य मानकर जोड़ती है। यहाँ इसे देखिए। जो कार्य उसे करना था वह लोगों के पापों के लिये प्रायश्चित करना था। पाप ने परमेश्वर का क्रोध भड़काया था, और उसका प्रेम मनुष्यों की ओर तब तक नहीं बह सकता था जब तक पाप ढाँप न दिया जाए, उसका प्रायश्चित न हो जाए, वह दूर न कर दिया जाए। पुराने नियम के बलिदानों में जो कुछ हमें सिखाया गया था, उसकी पूर्ति में मसीह यह करने आया। उसने अपने ही बलिदान के द्वारा पाप को दूर किया, और अनन्त छुटकारा प्राप्त किया। इसके विषय में पत्री आगे चलकर कहेगी। यहाँ वह जिस बात पर ज़ोर देना चाहती है, वह यह है कि मसीह केवल मरने और प्रायश्चित करने के लिये मनुष्य नहीं बना, वरन् इसलिये कि ऐसा करते हुए वह एक विश्वासयोग्य और दयालु महायाजक हो।
हमारे साथ उसका सम्बन्ध व्यक्तिगत होना था। जो उद्धार उसने पूरा किया, उसे स्वयं ही हम तक पहुँचाना था। सब कुछ इस पर निर्भर था कि वह हमारा भरोसा जीते, हमारे हृदय और प्रेम को अपने अधिकार में ले, और एक जीवित अगुआ के रूप में हमें परमेश्वर तक पहुँचानेवाले मार्ग में ले चले। यही बात पृथ्वी पर उसके मानवीय जीवन को हमारे लिये इतना बहुमूल्य बनाती है। उसने उसे विश्वासयोग्य प्रमाणित किया: हम पूरे साहस से उस पर भरोसा कर सकते हैं। उसमें वह दयालु पाया गया: हमें उसके पास आने से डरने की आवश्यकता नहीं। वह सब बातों में अपने भाइयों के समान बना, ताकि वह एक दयालु और विश्वासयोग्य महायाजक बने।
क्योंकि जब उसने परीक्षा की दशा में दुःख उठाया, तो वह उनकी भी सहायता कर सकता है जिनकी परीक्षा होती है। हमारे महायाजक का कार्य केवल उसके प्रायश्चित में ही नहीं है, न ही केवल उस पैरवी और मध्यस्थता में जो उस प्रायश्चित का फल है; वरन् सबसे बढ़कर, इन सब के परिणामस्वरूप, हमारे आत्मिक जीवन की उस व्यक्तिगत देखरेख में है जो वह अपने ऊपर लेता है, और उस कभी न रुकनेवाली सहायता में है जो वह हर परीक्षा में दे सकता है। हमें परमेश्वर तक पहुँचाने के उसके कार्य का यही सबसे बड़ा और सबसे धन्य भाग है, कि दुःख और सिद्धता के मार्ग में अगुआ होकर वह हम में अपनी ही मनोवृत्तियाँ फूँकता है, और हमारे भीतर अपने आत्मा के सामर्थी कार्य के द्वारा आवश्यकता की हर घड़ी में हमें अपनी सहायता देता है। हमें जिस एक बात की आवश्यकता है, वह यह है कि हम उसे पूरी रीति से जानें और उस पर पूरा भरोसा रखें। उसे ऐसे महायाजक के रूप में जानें जिसने न केवल हमारे चलने के लिये परमेश्वर तक एक मार्ग खोल दिया है, और न केवल स्वर्ग में हमारे लिये प्रार्थना करता है, वरन् जो यह ज़िम्मा लेता है कि हमें इस प्रकार अपने साथ संगति में, अपनी सामर्थ की छाया में, और अपने पूर्ण छुटकारे के अनुभव में बनाए रखे, कि परीक्षा हम पर कभी जय न पा सके। उसका ईश्वरत्व हमारे लिये उसकी कभी न चूकनेवाली और कभी न रुकनेवाली उपस्थिति को निश्चित करता है। उसकी मनुष्यता हमें उसकी सहानुभूति और करुणा का आश्वासन देती है। परीक्षा से अधिक सदा-उपस्थित और अधिक सामर्थी, उसका कभी न चूकनेवाला प्रेम जय देने के लिये सदा निकट है। वह ऐसा कर सकता है और करेगा। हमारा महायाजक एक जीवित, विश्वासयोग्य सहायक है; आइए, हम उस पर भरोसा रखें। उद्धार कोई ऐसी वस्तु नहीं जो वह हमें अपने से अलग करके देता हो। पूर्ण उद्धार स्वयं यीशु के सिवा और कुछ नहीं—जो दैनिक जीवन में अत्यन्त करुणा और अत्यन्त विश्वासयोग्यता से हमारी चौकसी करता है, और अत्यन्त वास्तविक और पूर्ण रीति से अपना जीवन हम में देता और जीता है। यीशु की स्थायी, भीतर वास करनेवाली उपस्थिति, जो सहायता करने में समर्थ है, मसीही जीवन का सच्चा रहस्य है। विश्वास हमें इस अनुभव में ले जाएगा कि जो कुछ यीशु के विषय में कहा गया है, वह सब वह है और करता है।
1. कैसा अध्याय! यीशु महिमा और आदर का मुकुट पहने हुए। हमारा अगुआ, हमारा पवित्र करनेवाला, हमारा भाई, जो हमारे समान बनाया गया, हमारा दयालु और विश्वासयोग्य महायाजक, जिसकी हमारी नाईं परीक्षा हुई, परीक्षा में हमारा सहायक। कैसा उद्धारकर्ता! 2. मेरी देह का कोई भी अंग ऐसा नहीं जिसे चोट लगे और मैं उसे अनुभव न करूँ और उसकी रक्षा करने का यत्न न करूँ। कोई भी परीक्षा मुझे ऐसे नहीं छू सकती कि यीशु उसे तुरन्त अनुभव न करे और सहायता न दे। क्या हमें जिस एक बात की आवश्यकता है वह यह नहीं कि हम उसे और अच्छी रीति से जानें, विश्वास से उसकी सदा-उपस्थित निकटता का अनुभव करें, और उसकी सहायता पर भरोसा रखें?
यीशु का जो ज्ञान मन-परिवर्तन के लिये पर्याप्त था, वह पवित्रीकरण के लिये पर्याप्त न होगा। आत्मिक जीवन की बढ़ती के लिये यह अनिवार्य है कि जो कुछ यीशु है, उस सब के ज्ञान में हम और गहरे प्रवेश करें। यीशु स्वर्ग की रोटी है, हमारे आत्मिक जीवन का भोजन; उसे और अच्छी रीति से जानना ही उसे खाने का एकमात्र मार्ग है। 4. हर परीक्षा को अपने सदा-उपस्थित महायाजक पर भरोसा रखने और उसकी सहायता का अनुभव करने का धन्य अवसर समझना सीखिए। तीसरा खण्ड — 3:1-6. मसीह यीशु मूसा से बढ़कर।
- 1 अगुवाई करते हुए, 2 अगुआ।
- 1 में से।
- 1 यहाँ और पूरी पत्री में ‘पवित्र’ और ‘पवित्र करना’ शब्द में बहुत कुछ
- 1 बन गए।