अध्याय 12 (21 में से)

पाँचवाँ खण्ड

यह हिन्दी संस्करण मशीन-सहायता से अनुवादित है और समीक्षा की प्रक्रिया में है। अध्ययन के लिए अंग्रेज़ी मूल पाठ ही प्रामाणिक है। कोई त्रुटि दिखे तो [email protected] पर लिखें।

इब्रानियों 7:1-28 — मलिकिसिदक की रीति पर नया याजकपद

50 मलिकिसिदक परमेश्वर के पुत्र के स्वरूप ठहराया गया

7. 1. क्योंकि यह मलिकिसिदक, शालेम का राजा, परमप्रधान परमेश्वर का याजक, जिसने राजाओं को मारकर लौटते हुए अब्राहम से भेंट की और उसे आशीष दी,
2. जिसको अब्राहम ने सब वस्तुओं का दसवाँ अंश भी दिया (जो पहले, अपने नाम के

अर्थ के अनुसार, धार्मिकता का राजा है, और फिर शालेम का राजा भी, अर्थात् शान्ति का राजा; 3. जिसका न पिता, न माता, न वंशावली है, जिसके न दिनों का आदि है और न जीवन का अन्त, परन्तु परमेश्वर के पुत्र के स्वरूप ठहराया गया), सदा के लिये याजक बना रहता है।

अध्याय 5 में हम पढ़ते हैं कि यीशु परमेश्वर की ओर से बुलाया गया, जैसे हारून बुलाया गया था। बहुत सी बातों में हारून मसीह का प्रतिरूप था। परन्तु कुछ और बातें ऐसी थीं जिनमें हारून का याजकपद मसीह के याजकपद की पूर्वछाया तक देने में पूरी तरह असफल रहा। विशेष ईश्वरीय प्रबन्ध के द्वारा एक और व्यक्ति का नाम मिलता है, जिसमें वह बात, जिसकी प्रतिरूप के रूप में हारून में कमी थी, पहले से छाया के रूप में दिखाई गई। हारून और मलिकिसिदक के याजकपद के बीच का अन्तर एक मूलभूत अन्तर है। वह अन्तर क्या है, इसे ठीक-ठीक समझने में, और उस बात को जानने में जिसमें मलिकिसिदक परमेश्वर के पुत्र के स्वरूप ठहराया गया है, इस पत्री का भेद छिपा है, और अपनी सामर्थ और सिद्धता में मसीही जीवन का भेद भी। यह भेद एक ही शब्द में कहा जा सकता है: युगानुयुग याजक। पवित्र इतिहास में मलिकिसिदक जो पूरा स्थान रखता है, वह इस बात के सबसे अद्भुत प्रमाणों में से एक है कि पवित्रशास्त्र ईश्वर-प्रेरित है और एक ही है, क्योंकि वह पवित्र आत्मा के सीधे अलौकिक मार्गदर्शन में लिखा गया। उत्पत्ति की पुस्तक में उसके विषय में जो कुछ हम जानते हैं, वह सब तीन छोटी और बहुत सरल आयतों में बताया गया है। एक हज़ार वर्ष बाद हमें एक भजन मिलता है जिसमें केवल एक ही आयत है, जिसमें स्वयं परमेश्वर को अपने पुत्र से शपथ खाते हुए दिखाया गया है कि वह मलिकिसिदक की रीति पर महायाजक होगा। फिर एक और हज़ार वर्ष बीतते हैं, और वही एक आयत इस पत्री में उस अद्भुत व्याख्या का बीज बन जाती है, जो मसीह यीशु में प्रगट किए गए छुटकारे के सम्पूर्ण कार्य की व्याख्या है। उसकी सब से अद्भुत विशेषताएँ उस अद्भुत प्रतिरूप में लिपटी हुई पाई जाती हैं। हम जितना अधिक उसका अध्ययन करते हैं, उतना ही अधिक पुकार उठते हैं: यह तो यहोवा की ओर से हुआ है, यह हमारी दृष्टि में अद्भुत है। हम इसमें ईश्वरीय ज्ञान के आश्चर्यकर्म से कम कुछ नहीं देखते, जिसने मलिकिसिदक और अब्राहम का मार्गदर्शन उस बात को ध्यान में रखकर किया जो दो हज़ार वर्ष बाद परमेश्वर के पुत्र के साथ होनेवाली थी; जिसने भजनकार पर ईश्वरीय मन का वह गुप्त अभिप्राय प्रगट किया जो स्वर्ग में पुत्र से की गई प्रतिज्ञा में था; और फिर उसी पवित्र आत्मा के द्वारा हमारी पत्री के लेखक को उसकी ईश्वर-प्रेरित व्याख्या तक पहुँचाया। विश्वास करनेवाले मन के लिये ईश्वर-प्रेरणा का इससे बढ़कर दृढ़ प्रमाण दिया ही नहीं जा सकता। सचमुच यह वही सनातन आत्मा, स्वयं मसीह का आत्मा है, जिसके द्वारा यह सब किया गया और ठीक समय पर लिखा गया।

हमारे अध्याय की पहली तीन आयतों में हमें मलिकिसिदक की कहानी का स्मरण दिलाया जाता है, और उसके नाम और इतिहास की व्याख्या दी जाती है। उसके नाम का अर्थ है धार्मिकता का राजा। जिस नगर में वह राज्य करता था, अर्थात् शालेम, जिसका अर्थ है शान्ति, उसके कारण वह शान्ति का राजा भी कहलाता है। इस प्रकार एक साथ जुड़ी हुई ये दो उपाधियाँ प्रमाणित करती हैं कि परमेश्वर ने उसे किस प्रकार अपने पुत्र का प्रतिरूप होने के लिये ठहराया था। धार्मिकता और शान्ति का उल्लेख पुराने नियम और नये नियम दोनों में मसीह के राज्य की विशेष आशीषों के रूप में एक साथ किया गया है। धार्मिकता शान्ति की एकमात्र नींव है; शान्ति उसका निश्चित और धन्य फल है। परमेश्वर का राज्य धार्मिकता और शान्ति है, और इन दोनों के निश्चित फल के रूप में वह आनन्द है जो पवित्र आत्मा से होता है। मलिकिसिदक याजक और राजा दोनों था, यह एक ऐसी बात थी जो इस्राएल के सम्पूर्ण इतिहास में अज्ञात रही। जो बातें परमेश्वर के लोगों में सदा अलग-अलग रखी गईं, वे ईश्वरीय पूर्व-विचार के द्वारा उसमें एक कर दी गई थीं जो परमेश्वर के पुत्र के स्वरूप ठहराया गया था। याजक-राजा के रूप में मसीह की महिमा ही वह बात है जिसे हमारी पत्री को विशेष रूप से खोलकर दिखाना है।

फिर उसकी वंशावली, जन्म और मृत्यु के विषय में पवित्रशास्त्र की चुप्पी की व्याख्या इस बात के प्रमाण के रूप में की गई है कि उसका याजकपद हारून और इस्राएल के याजकों के याजकपद से कितना भिन्न है, जहाँ वंश ही सब कुछ था। इस प्रकार परमेश्वर ने उसमें अपने पुत्र की एक अद्भुत भविष्यद्वाणी तैयार की थी, जिसका याजकपद का अधिकार किसी सांसारिक जन्म में नहीं, परन्तु अनादि से अनन्त तक परमेश्वर का पुत्र होने में था। परमेश्वर के पुत्र के स्वरूप ठहराया जाकर मलिकिसिदक सदा के लिये याजक बना रहता है।

मलिकिसिदक की रीति पर युगानुयुग याजक। परमेश्वर का यह वचन उस भजन में है जो उत्पत्ति और हमारी पत्री के बीच जोड़नेवाली कड़ी है। वह पवित्र आत्मा, जिसने पहले इसे प्रेरित किया और फिर इसकी व्याख्या की, हमें इसकी महिमा के भेद में एक जीवित अनुभव के रूप में ले चलने की बाट जोह रहा है। वह शब्द “सदा” या “अनन्त”, जो हमें इन वाक्यांशों में मिलता है: युगानुयुग याजक, अनन्त उद्धार, अनन्त छुटकारा, सदा के लिये सिद्ध किया गया, केवल “बिना अन्त के” का ही अर्थ नहीं रखता, परन्तु उससे असीम रूप से अधिक। परमेश्वर सनातन है; उसका जीवन अनन्त जीवन है। अनन्त वह है जो ईश्वरीय है, जिसमें कोई परिवर्तन या क्षय नहीं, परन्तु सदा बनी रहनेवाली जवानी और बल है, क्योंकि परमेश्वर उसमें है। मसीह के सनातन याजकपद का अर्थ है कि वह अपना कार्य हममें उस अनन्त जीवन की सामर्थ में करेगा, जैसा वह जीवन परमेश्वर में और स्वर्ग में जिया जाता है।

वह सदा जीवित है, इसलिये वह पूरा-पूरा उद्धार कर सकता है। परमेश्वर हमें सिखाए कि इसका क्या अर्थ है कि मसीह हमारा मलिकिसिदक, युगानुयुग याजक है। इस सनातन याजकपद की आत्मिक समझ ही, जो यहाँ भी हममें एक सनातन, अपरिवर्तनीय जीवन को पहुँचाता और बनाए रखता है, हमारे भीतरी अनुभव को प्रयास, परिवर्तन और असफलता के क्षेत्र से ऊपर उठाकर परमेश्वर के विश्राम में ले जाती है, ताकि उसकी मनसा की अटलता ही हमारे विश्वास और आशा की अटलता का माप बन जाए।

इस अध्याय में अब उन बातों का आरम्भ होता है जिन्हें सिद्ध लोगों को छोड़ और कोई कठिनाई से समझ सकता है। केवल वे ही, जो सिद्धता की ओर बढ़ते जाते हैं, जो उस सब की चरम सीमा तक पाने की लालसा रखते हैं जो परमेश्वर मसीह के द्वारा उनमें कर सकता है, सनातन याजकपद के प्रकाशन को भीतर से अपना सकते हैं। न प्रतिभा और न बुद्धि की विलक्षणता इसके लिये पर्याप्त है; वह हृदय ही, जो जीवते परमेश्वर का प्यासा है, हमारे परमेश्वर के निकट लाए जाने के विषय में इस शिक्षा को समझेगा।

वह पवित्र आत्मा, जिसके द्वारा यह इतिहास लिखा गया, और पुत्र से खाई गई शपथ प्रगट की गई, और यह व्याख्या प्रेरित हुई, वही अकेला हमें उस आत्मिक सामर्थ और आशीष में ले जा सकता है जो यहाँ प्रगट की गई है। और पवित्र आत्मा केवल तभी ले चलता है जब वह भीतर वास करनेवाले के रूप में जाना जाता है, गहरी दीनता में उसकी बाट जोही जाती है, और नम्र आत्म-समर्पण में उसके अधीन हुआ जाता है। यह विश्वास करना कैसी गम्भीर, पवित्र और धन्य बात है कि परमेश्वर का आत्मा हमें सिद्धता के इस सत्य में एक निज सम्पत्ति और अनुभव के रूप में ले जा रहा है।

3. वह सदा बना रहता है: एक अपरिवर्तनीय, कभी न समाप्त होनेवाला जीवन, जो मलिकिसिदक की विशेषता है, जो मसीह के स्वरूप ठहराया गया; अपने स्वर्गीय याजकपद में मसीह की विशेषता है; और उस विश्वासी के जीवन की विशेषता है जो उसे ठीक-ठीक जानना और उस पर भरोसा रखना सीखता है।

51 मलिकिसिदक और अब्राहम

7. 4. अब इस पर ध्यान करो कि यह कैसा महान था, जिसको

कुलपति अब्राहम ने लूट के अच्छे से अच्छे माल का दसवाँ अंश दिया। 5. और लेवी की सन्तान में से जो याजक का पद पाते हैं, उन्हें आज्ञा मिली है कि व्यवस्था के अनुसार लोगों से, अर्थात् अपने भाइयों से, दसवाँ अंश लें, यद्यपि वे अब्राहम ही की देह से उत्पन्न हुए हैं; 6. पर उसने, जिसकी वंशावली उनमें नहीं गिनी जाती, अब्राहम से दसवाँ अंश लिया है, और जिसे प्रतिज्ञाएँ मिली थीं उसे आशीष दी है।

7. और इसमें कोई सन्देह नहीं कि छोटा बड़े से आशीष पाता है। 8. और यहाँ तो मरनहार मनुष्य दसवाँ अंश लेते हैं; पर वहाँ वह लेता है जिसके विषय में गवाही दी जाती है कि वह जीवित है। 9. और यों कहें तो लेवी ने भी, जो दसवाँ अंश लेता है, अब्राहम के द्वारा दसवाँ अंश दिया; 10. क्योंकि जब मलिकिसिदक ने उसके पिता से भेंट की, तब वह अपने पिता की देह में ही था। अब इस पर ध्यान करो कि यह कैसा महान था। यदि हम मलिकिसिदक की महानता को ठीक-ठीक समझ लें, तो यह हमें मसीह की, जो हमारा महान महायाजक है, महानता समझने में सहायता देगी। इब्रानी अब्राहम पर घमण्ड करते थे, जो चुनी हुई जाति का पिता था; हारून पर, जो महायाजक होने के नाते परमेश्वर और उसकी आराधना का प्रतिनिधि था; और उस व्यवस्था पर, जो परमेश्वर की अपनी प्रजा के साथ बाँधी गई वाचा के चिह्न के रूप में स्वर्ग से दी गई थी। इन सब बातों में मलिकिसिदक की श्रेष्ठता प्रमाणित की गई है। वह अब्राहम से बढ़कर है (4-10), हारून से बढ़कर है (11-14), व्यवस्था से बढ़कर है (11-19)।

मलिकिसिदक अब्राहम से बढ़कर है; इसका दोहरा प्रमाण दिया गया है। अब्राहम ने मलिकिसिदक को दसवाँ अंश दिया; मलिकिसिदक ने अब्राहम को आशीष दी। व्यवस्था के अनुसार याजक अपने भाइयों से दसवाँ अंश लेते थे, परन्तु यहाँ एक परदेशी सारी जाति के पिता से उसे लेता है। इससे भी बढ़कर बात है; इस्राएल में मरनहार मनुष्य दसवाँ अंश लेते हैं, परन्तु यहाँ वह लेता है जिसके विषय में गवाही दी जाती है कि वह जीवित है, जो सदा बना रहता है। और अब्राहम में लेवी ने भी, जो दसवाँ अंश लेता था, दसवाँ अंश दिया। यह सब परमेश्वर ने ऐसा ठहराया था कि यह हमारे महायाजक मसीह की महानता की एक गुप्त भविष्यद्वाणी हो, जो ठीक समय पर खोली जाए। इस पर ध्यान करो कि यह कैसा महान था।

उसकी महानता का एक दूसरा प्रमाण है: मलिकिसिदक ने अब्राहम को आशीष दी। और इसमें कोई सन्देह नहीं कि छोटा बड़े से आशीष पाता है। अब्राहम को स्वयं परमेश्वर से पहले ही आशीष मिल चुकी थी (उत्पत्ति 12:2)। यहाँ वह मलिकिसिदक से आशीष ग्रहण करता है, और अपनी हीनता को स्वीकार करता है, और अनजाने में अपने आप को, और उस सम्पूर्ण याजकपद को जो उससे निकलनेवाला था, परमप्रधान परमेश्वर के इस याजक के अधीन कर देता है।

इस ईश्वर-नियुक्त प्रतिरूप का खोला जाना न केवल लेवीय याजकपद पर मसीह की श्रेष्ठता को प्रगट करता है, परन्तु याजक के रूप में मसीह के साथ हमारे सम्बन्ध की दो विशेषताओं को भी बड़े अर्थपूर्ण ढंग से हमारे सामने रखता है। हम उससे आशीष पाते हैं; वह हमसे दसवाँ अंश पाता है।

मसीह हमारे लिये परमेश्वर की आशीष लाने आता है। हम अध्याय 6:14 में देख चुके हैं कि परमेश्वर की आशीष क्या है। मसीह ही में वह आशीष पक्की की जाती और प्रदान की जाती है। और यदि हम पूरी रीति से जानना चाहें कि वह आशीष क्या है जो मसीह हमारे लिये लाता है, तो हमें केवल इस्राएल में याजकीय आशीर्वाद के विषय में सोचना है।

तुम इस्राएलियों को इन वचनों से आशीर्वाद दिया करना, और उनसे कहना: यहोवा तुझे आशीष दे और तेरी रक्षा करे; यहोवा तुझ पर अपने मुख का प्रकाश चमकाए, और तुझ पर अनुग्रह करे; यहोवा अपना मुख तेरी ओर करे, और तुझे शान्ति दे।

सचमुच ये वे स्वर्गीय स्थानों की आत्मिक आशीषें हैं, जिनसे परमेश्वर ने हमें मसीह में आशीष दी है, और जिन्हें मसीह महायाजक होकर बाँटता है। वह हमें पिता के पास लाता है, और हम जानना सीखते हैं कि वह हमें आशीष देता और हमारी रक्षा करता है। उसमें, अर्थात् पुत्र में, परमेश्वर का मुख हम पर चमकता है, और हमारे प्रभु यीशु मसीह का अनुग्रह हमारा भाग है। उसमें परमेश्वर अपना मुख हमारी ओर करता है, और पवित्र आत्मा के द्वारा हमारे हृदयों को अपनी शान्ति देता है। महायाजक मसीह इस आशीष के हर भाग को एक ईश्वरीय वास्तविकता, सदा बने रहनेवाले जीवन की सामर्थ में एक जीवित अनुभव बना देता है।

मसीह हमें आशीष देता है, हम उसे दसवाँ अंश देते हैं। परमेश्वर को दिया गया दसवाँ अंश इस बात की स्वीकृति है कि सब कुछ पर उसी का अधिकार है। हमारे महायाजक का अधिकार है कि जो कुछ हमारे पास है, वह सब उसी का जानकर उसे सौंप दिया जाए, और जो कुछ वह अपनी सेवा के लिये माँगे या जिसकी उसे आवश्यकता हो, वह सब स्वेच्छा से बलिदान कर दिया जाए। दसवें अंश और आशीष के बीच का सम्बन्ध जितना हम जानते हैं उससे कहीं अधिक घनिष्ठ है। जितना अधिक हम बिना किसी रोक-टोक के अपना सब कुछ उसके हाथ में सौंप देंगे, जितना अधिक हम सचमुच उसके लिये सब कुछ छोड़ देंगे, उतना ही अधिक धनी हमारा अनुभव उस परिपूर्णता और सामर्थ का होगा जिससे हमारा महायाजक आशीष दे सकता है।

इसमें कोई सन्देह नहीं कि छोटा बड़े से आशीष पाता है। यही सच्चा सम्बन्ध है। जितना अधिक हम उस उत्तम नाम को जानेंगे जो यीशु ने पाया है, और अपने हृदयों को उसकी महिमा से भरा रखेंगे, उतना ही अधिक हम नीचे झुकेंगे, उतने ही अधिक हम अपनी दृष्टि में छोटे होते जाएँगे, और इसी के द्वारा आशीष पाने के लिये उतने ही अधिक योग्य और उतने ही अधिक इच्छुक होंगे; और उसे न केवल दसवाँ अंश, परन्तु जो कुछ हम हैं और जो कुछ हमारे पास है, वह सब अर्पित करने के लिये भी उतने ही अधिक तैयार होंगे। जब हमारे आत्मिक जीवन में अपने महान महायाजक के साथ यह दोहरा सम्बन्ध बना रहता है, और उसकी आशीष की ईश्वरीय परिपूर्णता पर गहरा विश्वास और निर्भरता, उसके अधिकार और सेवा के प्रति पूर्ण समर्पण के साथ-साथ बढ़ाई जाती है, तब उसके याजकपद की महान सामर्थ हमारे हृदयों में प्रगट होगी। और हम निरन्तर बढ़ती हुई स्पष्टता से देखेंगे कि ये दोनों मनोभाव, अर्थात् आशीष देनेवाले पर विश्वास और उसकी सेवा के लिये समर्पण, दीनता के उस एक प्रधान सद्गुण में जड़ पकड़े हुए हैं, जो हमें अपनी दृष्टि में सदा छोटे से छोटा बनाता जाता है, यहाँ तक कि हम उस शून्यता में डूब जाते हैं जो स्वयं के लिये मृत्यु है, और उसके लिये स्थान बनाती है कि वह सब कुछ हो। तब यह वचन एक नये अर्थ में हममें पूरा होगा: इसमें कोई सन्देह नहीं कि छोटा बड़े से आशीष पाता है।

1. मलिकिसिदक ने अब्राहम को आशीष दी। हे मेरे प्राण, तेरे महायाजक का काम केवल आशीष देना है। यीशु के विषय में ऐसा ही सोचना सीख, और यह बड़ा भरोसा रखने का यत्न कर कि वह आशीष देने में आनन्दित होता है। वह आशीष के सोते के सिवा और कुछ नहीं; इसमें बहुत आनन्द मना और इसके लिये उस पर भरोसा रख।

2. स्मरण रख कि स्वर्ग में तेरे मलिकिसिदक की सब कुछ समेटनेवाली आशीष स्वर्ग से तेरे हृदय में आया हुआ पवित्र आत्मा है। जैसा लिखा है: “मसीह ने हमें छुड़ाया, ताकि अब्राहम की आशीष यीशु मसीह में हम पर आए; और हम विश्वास के द्वारा आत्मा की प्रतिज्ञा को प्राप्त करें।” हृदय में “सदा बना रहनेवाला” पवित्र आत्मा ही महायाजकीय आशीष है। आज वह तुझसे भेंट करने आता है, जब तू युद्ध से थका-माँदा और मूर्च्छित होकर लौट रहा है। उसके सामने झुक, और उसे तुझे आशीष देने दे! “जैसा पवित्र आत्मा कहता है, आज।” विश्वास कर कि यीशु तेरे लिये सब कुछ है।

52 मलिकिसिदक हारून और व्यवस्था से बढ़कर

7. 11. सो यदि लेवीय याजकपद के द्वारा सिद्धता होती (क्योंकि उसी के अधीन लोगों को व्यवस्था मिली थी), तो फिर क्या आवश्यकता थी कि दूसरा याजक मलिकिसिदक की रीति पर खड़ा हो, और हारून की रीति का न गिना जाए?
12. क्योंकि जब याजकपद बदला जाता है तो व्यवस्था का भी बदलना अवश्य है।
13. क्योंकि जिसके विषय में ये बातें कही जाती हैं, वह दूसरे गोत्र का है, जिसमें से किसी ने वेदी की सेवा नहीं की।
14. क्योंकि यह प्रगट है कि हमारा प्रभु यहूदा में से उदय हुआ है; और इस गोत्र के विषय में मूसा ने याजकों की कुछ चर्चा नहीं की।

जब परमेश्वर ने भजन संहिता 110 में शपथ खाकर मलिकिसिदक की रीति पर एक याजक के विषय में कहा, तो वह गहरे आत्मिक अर्थ से भरी एक भविष्यद्वाणी थी। हारून की रीति को, जिसे स्वयं परमेश्वर ने बुलाया था, और जिसके कार्य ने परमेश्वर के अभिप्राय में और पवित्रशास्त्र में इतना बड़ा स्थान पाया था, किसी दूसरे की रीति के लिये क्यों छोड़ दिया जाए, जिसके विषय में हम एक ही कार्य को छोड़ और कुछ नहीं जानते? क्या आवश्यकता थी कि दूसरा याजक मलिकिसिदक की रीति पर खड़ा हो, और हारून की रीति का न गिना जाए? उत्तर यह है: क्योंकि हारून की रीति केवल पृथ्वी पर यीशु के कार्य का प्रतिरूप थी; उसके सनातन और सर्वशक्तिमान स्वर्गीय याजकपद के लिये कुछ और आवश्यक था।

आइए, हम इसे देखें और पकड़ लें। हारून का कार्य पृथ्वी पर मसीह के कार्य की छाया था, अर्थात् बलिदान और लहू बहाने की, प्रायश्चित और परमेश्वर से मेल की छाया। हारून सचमुच लहू लेकर परदे के भीतर गया, इस बात के चिह्न के रूप में कि परमेश्वर ने प्रायश्चित को और लोगों को ग्रहण कर लिया है। परन्तु वह वहाँ ठहर नहीं सकता था; उसे तुरन्त फिर बाहर आना पड़ता था। उसका वर्ष में केवल एक बार, और वह भी केवल कुछ क्षणों के लिये भीतर जाना, जैसा हम अध्याय 9 में देखते हैं, अधिकतर लोगों को यही सिखाने के काम आता था कि परमपवित्र स्थान का मार्ग अब तक खुला नहीं था; कि इसके लिये उन्हें तब तक ठहरना होगा जब तक कोई दूसरा प्रबन्ध न आ जाए। परमपवित्र स्थान में जीवन का, परमेश्वर की उपस्थिति में निवास करने और वहाँ उसके साथ संगति रखने का, परदे के भीतर के जीवन की सामर्थ के लोगों तक पहुँचाए जाने का, इन सब बातों का कोई विचार ही नहीं था। मसीह के याजकपद की महिमा इसमें है कि उसने परदा फाड़ डाला और हमारे लिये भीतर प्रवेश किया; कि वह परमेश्वर के दाहिने बैठा है, ताकि परमेश्वर का आत्मा और स्वर्गीय जीवन की सामर्थें पाए और बाँटे; कि वह हमें भी भीतर ला सकता है, ताकि हम भी परमेश्वर के निकट आएँ; कि वह अपनी निरन्तर मध्यस्थता और अविनाशी जीवन की सामर्थ में अपनी सेवकाई के द्वारा हममें स्वर्ग का जीवन बनाए रखता है; इन सब बातों की कोई प्रतिज्ञा हारून की सेवकाई नहीं दे सकती थी।

इन्हीं सब बातों में मलिकिसिदक परमेश्वर के पुत्र के स्वरूप ठहराया गया। परमप्रधान परमेश्वर का याजक होकर वह राजा भी था, आदर और सामर्थ से सुशोभित। इस नाते उसकी आशीष सामर्थ के साथ थी। और एक ऐसे व्यक्ति के रूप में, जिसकी मृत्यु और जिसके याजकपद के अन्त के विषय में पवित्रशास्त्र कुछ नहीं कहता, और जो सदा बना रहता है, वह उस सनातन याजकपद का प्रतिरूप है, जिसकी सेवा स्वर्ग में, अनन्तकाल में, अविनाशी जीवन की सामर्थ में होती है।

हमारे प्रभु यीशु के मलिकिसिदकी याजकपद के भेद और महिमा का प्रकाशन ही इस पत्री का महान उद्देश्य है। और मैं अपने पाठक से इस बात का बहुत आग्रह करता हूँ, जितना भी करूँ कम है, कि आप हारून और मलिकिसिदक की इन दो रीतियों या सेवकाइयों के बीच के असीम अन्तर को पूरी तरह समझ लें। यह प्रत्यक्ष रूप से सरल प्रश्न, कि क्या आवश्यकता थी कि दूसरा याजक मलिकिसिदक की रीति पर खड़ा हो? हमारे आत्मिक जीवन से जितना हम सोचते हैं उससे कहीं अधिक सम्बन्ध रखता है।

हमारी पत्री की आरम्भिक आयतों में हमने मसीह के कार्य को दो भागों में बँटा हुआ पाया। जब वह पापों की शुद्धि कर चुका (यह हारून की रीति पर था), तब वह ऊँचे स्थानों पर महामहिमन् के दाहिने जा बैठा (यह मलिकिसिदक की रीति पर था)। बहुत से मसीही ऐसे हैं जो मसीह में केवल उसी बात की पूर्ति देखते हैं जिसका प्रतिरूप हारून था।

मसीह की मृत्यु और उसका लहू उनके लिये बहुत बहुमूल्य हैं; वे सचमुच अपने विश्वास को उन्हीं पर टिकाने का यत्न करते हैं। तौभी वे अचम्भा करते हैं कि उनके पास उस शान्ति और आनन्द का, उस पवित्रता और सामर्थ का इतना थोड़ा भाग क्यों है जो उद्धारकर्ता देता है, और जो उस पर विश्वास से मिलना चाहिए। कारण सीधा है: क्योंकि मसीह केवल उनका हारून है, उनका मलिकिसिदक नहीं। वे सचमुच विश्वास करते हैं कि वह स्वर्ग पर चढ़ गया है और परमेश्वर के सिंहासन पर बैठा है; परन्तु उन्होंने इसका अपने प्रतिदिन के आत्मिक जीवन से सीधा सम्बन्ध नहीं देखा। वे इस बात पर भरोसा नहीं रखते कि यीशु स्वर्गीय जीवन की सामर्थ में उनमें कार्य करता है और वह जीवन उन्हें प्रदान करता है।

वे अपनी स्वर्गीय बुलाहट को नहीं जानते, और न उस सब-पर्याप्त प्रबन्ध को, जो उनमें उसकी पूर्ति के लिये उनके याजक-राजा के स्वर्गीय जीवन में सुनिश्चित किया गया है। और इसके परिणामस्वरूप, वे संसार को छोड़ देने की आवश्यकता नहीं देखते, ताकि उनका जीवन और चालचलन स्वर्ग में हो।

छुटकारे का कार्य पृथ्वी पर निर्बलता में पूरा किया गया (2 कुरिन्थियों 13:4); वह स्वर्ग से पुनरुत्थान और स्वर्गारोहण की सामर्थ में पहुँचाया जाता है। क्रूस पाप की क्षमा का प्रचार करता है; सिंहासन पाप पर सामर्थ देता है। क्रूस, अपने लहू के छिड़काव के साथ, मिस्र से छुटकारा है; सिंहासन, अपने जीवित याजक-राजा के साथ, परमेश्वर के विश्राम में और उसकी विजय में ले आता है। हारून के साथ प्रायश्चित और ग्रहणयोग्य ठहराए जाने से आगे कुछ नहीं है; राजकीय शासन और सामर्थ का कुछ भी नहीं; सामर्थ और आशीष की परिपूर्णता, वह आशीष जो सदा बनी रहती है, मलिकिसिदक के साथ ही आती है। जब आत्मा फिर कभी नींव को ही बार-बार नहीं ढूँढ़ता, परन्तु उस पर और केवल उसी पर टिककर, मसीह यीशु में, जो सिद्ध किया गया और महान पद पर ऊँचा किया गया है, बढ़ता और बनता जाता है, तभी वह अपनी दुर्बलता से छुड़ाया जाएगा, और स्वर्गीय जीवन की सामर्थ को जानेगा। जितना अधिक हम अपने धन्य राजा-याजक, अपने मलिकिसिदक, पर ध्यान करेंगे और उसकी आराधना करेंगे, उतना ही अधिक हमारा यह भरोसा दृढ़ होगा कि वह स्वर्ग में अपने सिंहासन से, ईश्वरीय सामर्थ में, स्वयं अपने प्रायश्चित के सब धन्य फल हम पर लागू करेगा, और परमेश्वर की उपस्थिति और निकटता में जीवन को हमारा प्रतिदिन का अनुभव बना देगा।

1. जब वह हमारे पापों की शुद्धि कर चुका: हमारे हारून के लिये परमेश्वर की स्तुति हो! उस मेम्ने की महिमा हो जो वध किया गया! वह ऊँचे स्थानों पर महामहिमन् के दाहिने जा बैठा: हमारे मलिकिसिदक के लिये परमेश्वर की स्तुति हो! उस मेम्ने की महिमा हो जो सिंहासन के बीच में है! परमपवित्र स्थान अब खुल गया है, और हमारा महान महायाजक हमें भीतर ले जाने और वहाँ बनाए रखने के लिये है।

यीशु के द्वारा पापों की शुद्धि का किया जाना सिंहासन पर बैठने से पहले हुआ। परन्तु सामर्थ के साथ हममें उसका लागू होना उसके बाद आता है। यही कारण है कि हमें यहाँ पहले स्वर्ग के महायाजक के विषय में सिखाया जाता है, फिर अध्याय 8 में स्वर्गीय पवित्रस्थान के विषय में, और उसके बाद अध्याय 9 में

स्वर्ग में लहू की सामर्थ के विषय में, और स्वर्ग से हममें उसकी सामर्थ के विषय में। केवल स्वर्ग में विराजमान यीशु को जानने के द्वारा ही हम शुद्ध करनेवाले लहू की पूरी सामर्थ को जानेंगे। इसलिये, हे पवित्र भाइयो, तुम जो स्वर्गीय बुलाहट में भागी हो, स्वर्ग में सिंहासन पर विराजमान यीशु पर ध्यान करो! स्वर्गीय मसीह की आराधना और संगति ही स्वर्गीय मसीही बनाती है।

53 युगानुयुग याजक—अविनाशी जीवन की सामर्थ में

7. 15. और जो हम कहते हैं वह और भी अधिक स्पष्ट हो जाता है, जब

मलिकिसिदक के समान एक और याजक उत्पन्न होता है, 16. जो शारीरिक आज्ञा की व्यवस्था के अनुसार नहीं, पर अविनाशी जीवन की सामर्थ के अनुसार नियुक्त हुआ है। 17. क्योंकि उसके विषय में यह गवाही दी गई है, कि तू मलिकिसिदक की रीति पर युगानुयुग याजक है।

भजन संहिता 110 के शब्दों में हर एक वाक्यांश अर्थ से भरा हुआ है। हम देख चुके हैं (5:4-6) कि यह वचन, “तू याजक है,” इस बात का प्रमाण है कि मसीह ने याजक बनने के लिये अपनी बड़ाई आप नहीं की, परन्तु परमेश्वर की ओर से ठहराया गया। हम इन शब्दों का गहरा महत्व भी देख चुके हैं: “मलिकिसिदक की रीति पर।” अब हम इस बात पर आते हैं कि इस कथन में क्या निहित है: “तू युगानुयुग याजक है।”

“सदा” या “अनन्त” शब्द इस पत्री के सबसे महत्वपूर्ण शब्दों में से एक है। यह सत्रह बार आता है। इसमें वह सब कुछ समाया हुआ है जो नये नियम को पुराने नियम से अलग करता है, सिद्ध लोगों के स्वस्थ मसीही जीवन को बालकों की रुकी हुई, रोगी बढ़ती से अलग करता है। इसका अर्थ समझने के लिये हमें इसे परमेश्वर से, जो सनातन है, जोड़ना चाहिए। अनन्तता परमेश्वरत्व और ईश्वरीय जीवन का एक गुण है, और उसका सच्चा अस्तित्व केवल उस जीवन की संगति में है। परमेश्वर में कोई परिवर्तन, या बूढ़ा होना, या मुरझाना नहीं; वह जो कुछ है, वह सब एक सदा ताज़ी, कभी न बदलनेवाली जवानी में है। जैसा किसी ने कहा है, “वह अति प्राचीन है, और तौभी सब से अधिक जवान है, क्योंकि वह सदा उस अनन्त बल की ताज़गी में जीता है जो किसी अतीत को नहीं जानता।” अनन्त जीवन वह है जो सदा एक सा रहता है, क्योंकि वह सदा परमेश्वर में है। और जब परमेश्वर अपने पुत्र से कहता है, “तू युगानुयुग याजक है,” तो इसका अर्थ केवल यह नहीं कि यह याजकपद कभी समाप्त नहीं होगा, परन्तु यह उस बात की ओर संकेत करता है जो इसकी जड़ और कारण है: इसकी जड़ परमेश्वर के जीवन और बल में है। मसीह अविनाशी जीवन की सामर्थ के अनुसार याजक बना है। निरन्तर, एक क्षण के भी विराम के बिना, अटूट निरन्तरता में, वह ईश्वरीय जीवन की सामर्थ में जीता और कार्य करता है।

विरोधाभास से अर्थ स्पष्ट हो जाएगा। वह हारून के समान शारीरिक आज्ञा की व्यवस्था के अनुसार नहीं, परन्तु अविनाशी जीवन की सामर्थ के अनुसार याजक बनाया गया है, जैसे मलिकिसिदक, जो सदा के लिये याजक बना रहता है। व्यवस्था और जीवन, ये एक-दूसरे के विपरीत हैं। हर प्राणी स्वभाव से अपने भीतर के जीवन के अनुसार कार्य करता है, बाहर से किसी व्यवस्था या दबाव के बिना। पक्षी को उड़ने की आज्ञा देने के लिये किसी व्यवस्था की आवश्यकता नहीं, और न मछली को तैराने के लिये; उसका जीवन ही इसे उसके लिये आनन्द बना देता है। व्यवस्था इस बात का प्रमाण है कि जीवन की कमी है। चोरी को मना करनेवाली व्यवस्था इस बात का प्रमाण है कि जिनके लिये वह बनाई गई है उनका जीवन बिगड़ा हुआ है। और व्यवस्था न केवल इस बात का प्रमाण है कि सही जीवन की कमी है, परन्तु वह उसे उत्पन्न करने में असहाय भी है। वह रोक-थाम और अंकुश लगा सकती है, पर प्रेरणा नहीं दे सकती। वह माँग सकती है, पर दे नहीं सकती; उसमें आज्ञा देने की सामर्थ है, पर जिस बात को वह ढूँढ़ती है उसे सृजने की नहीं। हारून शारीरिक आज्ञा की व्यवस्था के अनुसार याजक बना, ऐसी व्यवस्था जिसने किसी बात को सिद्ध नहीं किया, और जो अपनी निर्बलता और निष्फलता के कारण लोप कर दी गई; मसीह अविनाशी जीवन की सामर्थ के अनुसार। उसके पवित्र और धन्य याजकपद का हर कार्य, उसके अनन्त छुटकारे के फलों का हर प्रयोग, अविनाशी जीवन की सामर्थ में किया जाता है।

ये दो सिद्धान्त धर्म की दो प्रणालियों को, परमेश्वर की आराधना करने के दो मार्गों को, भीतरी जीवन के दो अनुभवों को चिह्नित करते हैं। एक व्यवस्था का है, जिसमें प्रायश्चित और परमेश्वर के सामने ग्रहणयोग्य ठहराया जाना है, जैसा हारून में प्रतिरूप के रूप में दिखाया गया। मसीही मसीह पर अपने छुड़ानेवाले के रूप में भरोसा रखता है, और कृतज्ञता की महान प्रेरणा के द्वारा अपने आप को प्रेम और आज्ञाकारिता के लिये विवश करने का यत्न करता है। उसका जीवन निरन्तर प्रयास का जीवन है। परन्तु वह पीड़ा के साथ अपनी असफलता के प्रति सचेत रहता है; आज्ञाकारिता उसका जीवन और आनन्द नहीं है। नया नियम एक उत्तम जीवन प्रस्तुत करता है। अविश्वास और आलस्य के कारण अधिकांश मसीही उसके विषय में बहुत कम जानते हैं। परन्तु यहाँ वह है, पवित्र आत्मा के द्वारा मलिकिसिदक के भेद के रूप में खोला गया। यीशु मसीह अविनाशी जीवन की सामर्थ के अनुसार याजक बना है। ये बहुमूल्य शब्द उच्चतर जीवन की कुंजी हैं। यीशु स्वर्ग में अविनाशी जीवन की सामर्थ में महायाजक होकर जीवित है। और जैसे वह जीता है, वैसे ही वह उसी सामर्थ में कार्य करता है। यही उसके युगानुयुग याजक होने का अर्थ है। उसका कार्य हारून के कार्य के समान क्रमशः होनेवाले कार्यों की एक श्रृंखला में नहीं है, जो सदा समाप्त हो जाते हैं और जिन्हें सदा फिर से नया करने की आवश्यकता होती है। नहीं, वह हमारे लिये जो भी कार्य करता है, उसे वह अविनाशी जीवन की सामर्थ में करने में समर्थ है। वह उसे हमारे भीतर एक जीवन के रूप में, हमारे अपने जीवन के रूप में करता है, यहाँ तक कि परमेश्वर में और उसकी इच्छा में आनन्दित होना हमारा स्वभाव ही बन जाता है। उसका याजकपद हमारे भीतर एक भीतरी जीवन के रूप में कार्य करता है, और हमें केवल विचार में नहीं, परन्तु आत्मा और सच्चाई से परमेश्वर के साथ एक जीवित संगति में ऊपर उठाता है। वह अपना ही जीवन हममें फूँकता है। और वह उसे जीवन की सामर्थ के रूप में हममें कार्यान्वित करता है, ऐसा जीवन जो बलवान और स्वस्थ है, क्योंकि वह स्वर्ग से आया हुआ उसका अपना जीवन है। और वह उसे अविनाशी, अटूट जीवन की सामर्थ में कार्यान्वित करता है, ऐसा जीवन जिसे एक क्षण के लिये भी किसी टूटन या रुकावट को जानने की आवश्यकता नहीं, क्योंकि वह अनन्तता का जीवन है, वह जीवन जो हममें उसके द्वारा बनाए रखा जाता है जो युगानुयुग याजक है, ऐसा याजक जो सदा बना रहता है।

और ऐसा क्यों है कि इतने सारे मसीही अविनाशी, अपरिवर्तनीय, सदा बने रहनेवाले जीवन की इस सामर्थ का इतना थोड़ा अनुभव करते और इतना थोड़ा प्रमाण पाते हैं? कुछ इसके विषय में कुछ भी नहीं जानते; वे मसीह को केवल हारून के रूप में जानते हैं। और कुछ इसके विषय में सुनते तो हैं, पर इस बहुमूल्य मोती को मोल लेने के लिये सब कुछ छोड़ने को तैयार नहीं; इस स्वर्गीय जीवन के लिये संसार को छोड़ने को तैयार नहीं। और कुछ ऐसे हैं जो सब कुछ छोड़ना तो चाहते हैं, पर विश्वास नहीं कर सकते, विश्वास करने का साहस नहीं करते, विश्वास करेंगे ही नहीं, कि मसीह सचमुच मलिकिसिदक है, युगानुयुग याजक, ऐसा याजक जो सब कुछ अनन्त जीवन की सामर्थ में करता है।

वह सदा के लिये याजक बना रहता है। उसके याजकपद की निरन्तरता कभी बाधित या भंग नहीं होती; उतनी ही कम उसके याजकपद के कार्य की निरन्तरता; उतनी ही कम उस कार्य के अनुभव की। मेरे स्वर्गीय महायाजक के रूप में मसीह मेरे लिये जो कुछ करता है, वह सब अविनाशी जीवन की सामर्थ में करता है, ऐसे याजक के रूप में जो सदा बना रहता है; जो कुछ वह कार्य करता है, वह भी सदा बना रह सकता है। आह, कि हममें मसीह यीशु पर, जो युगानुयुग याजक है, अविनाशी जीवन की सामर्थ के अनुसार याजक है, ध्यान करने, उसे जानने और उस पर भरोसा रखने का विश्वास हो!

1. अविनाशी जीवन की सामर्थ। पूरी पत्री में इससे अधिक अर्थपूर्ण या महत्वपूर्ण कोई वाक्यांश नहीं है। हमें जीवन की आवश्यकता है, और बलवान जीवन की, और ऐसे जीवन की जो कभी हार नहीं मानता। यहाँ वह हमें मिलता है: बहुतायत का जीवन। 2. हमें बार-बार इन शब्दों का उल्लेख करने का अवसर मिलेगा। हम याजक को ऐसे मनुष्य के रूप में सोचने के इतने आदी हैं जो दूसरे मनुष्यों की ओर से, अपने से अलग, कुछ निश्चित कार्य करता है, कि हम सोचने के इसी ढंग को प्रभु यीशु पर भी लागू कर देते हैं। मसीह कोई बाहरी उद्धारकर्ता नहीं है, और न वह हमें कोई उद्धार एक बाहरी वस्तु के रूप में दे सकता है। जो कुछ वह हमारे लिये और हममें करता है, वह हमारे हृदय में रखता है, उसे हमारा जीवन बना देता है। हमें यह जानने की आवश्यकता है कि जो कुछ वह स्वर्ग में महायाजक होकर हमारे लिये करता है, वह सब वह हमारे भीतर भी एक जीवन के रूप में करता है जिसे वह देता है। वह याजक है, और अविनाशी जीवन की सामर्थ के अनुसार होने के सिवा किसी और रीति से उद्धार नहीं कर सकता। केवल हमारे भीतर एक जीवन के रूप में ही उसका याजकपद अपने उद्देश्य को प्राप्त कर सकता है।

3. यीशु निर्बलता में क्रूस पर चढ़ाया गया, परन्तु परमेश्वर की सामर्थ में जिलाया गया। उसने निर्बलता के द्वारा, अर्थात् मृत्यु तक सब कुछ के बलिदान के द्वारा, सामर्थ प्राप्त की। वे सब, जो उसे अविनाशी जीवन की सामर्थ में जानना चाहते हैं, उसकी मृत्यु की संगति में प्रवेश करें, और गहरी दीनता और नम्रता और परमेश्वर पर निर्भरता के साथ उस मार्ग पर चलें जिस पर वह सिंहासन तक पहुँचने के लिये चला।

54 एक उत्तम आशा, जिसके द्वारा हम परमेश्वर के निकट आते हैं

7:18. क्योंकि पहिली आज्ञा अपनी निर्बलता और निष्फलता के कारण लोप की जाती है, 19. (इसलिये कि व्यवस्था ने किसी बात को सिद्ध नहीं किया), और उसके स्थान पर एक उत्तम आशा लाई जाती है, जिसके द्वारा हम परमेश्वर के निकट आते हैं।

पद 12 में हम पढ़ते हैं, “क्योंकि जब याजकपद बदला जाता है, तो व्यवस्था का भी बदलना अवश्य है।” जब हारून की रीति को मलिकिसिदक की रीति के लिये स्थान छोड़ना पड़ा, तो वह व्यवस्था भी, जिसके अधीन हारून ने सेवा की थी, उस नई रीति के लिये स्थान छोड़ने को विवश हुई — उस व्यवस्था के लिये जो आज्ञा की नहीं, परन्तु अविनाशी जीवन की सामर्थ की व्यवस्था है। इसका कारण अब बताया जाता है। पहिली आज्ञा अपनी निर्बलता और निष्फलता के कारण लोप की जाती है, क्योंकि व्यवस्था ने किसी बात को सिद्ध नहीं किया। सिद्धता ही वह वस्तु थी जिसे परमेश्वर और मनुष्य दोनों पाप और उसके परिणामों से छुटकारे के रूप में खोज रहे थे; सिद्ध पुनःस्थापना और सिद्ध संगति। व्यवस्था किसी वस्तु को सिद्ध न कर सकी, न विवेक को और न आराधक को। यीशु उसी सिद्धता को पूरा करने, प्रगट करने और प्रदान करने आया, जिसकी व्यवस्था केवल पूर्वछाया दिखा सकती थी।

और यह सिद्धता क्या है, यह अब हमें बताया जाता है: “पहिली आज्ञा लोप की जाती है, और एक उत्तम आशा लाई जाती है, जिसके द्वारा हम परमेश्वर के निकट आते हैं।” मनुष्य को परमेश्वर के निकट लाना, उसकी पूर्ण कृपा और वास्तविक संगति में ले आना, हर एक याजक का उद्देश्य है। हारून यह न कर सका; यीशु ने यह कर दिया है। यही नये नियम की महिमा है: वह एक उत्तम आशा लाता है, जीवते परमेश्वर के सचमुच निकट आना, पवित्र आत्मा के द्वारा उसके साथ सहभागिता। यही वह सिद्धता है जो व्यवस्था नहीं, परन्तु यीशु देता है। अध्याय 6 में आशा का उल्लेख पहले ही उस वस्तु के रूप में हो चुका है जिसके द्वारा हम परदे के भीतर प्रवेश करते हैं, जहाँ हमारा अगुआ हमारे लिये गया है। अविनाशी जीवन की सामर्थ से उसने परदा खोल दिया है और मार्ग खोल दिया है; वह उस उत्तम आशा को ले आया है जिसके द्वारा हम परमेश्वर के निकट आते हैं।

परमेश्वर के निकट आना! यह वाक्यांश उन मार्ग-सूचक खंभों में से एक है जो आगे आनेवाली ऊँची शिक्षा के मार्ग पर खड़े हैं। यह हमें मसीह के कार्य का मुख्य उद्देश्य बताता है — कि वह हमें इस योग्य बनाए कि हम परमेश्वर की निकटता में अपना जीवन बिताएँ। कुछ मसीही ऐसे हैं जो उद्धार खोजते समय केवल अपने विषय में और अपने सुख के विषय में सोचते हैं; मसीह उनके लिये केवल किसी लक्ष्य तक पहुँचने का साधन है। कुछ और हैं जो इससे आगे बढ़ते हैं: वे मसीह के साथ एक व्यक्तिगत सम्बन्ध का अनुभव करते हैं, और उसे और भी अच्छी रीति से जानने और उसकी सेवा करने की बड़ी लालसा रखते हैं। परन्तु इनमें भी किसी ऐसी बात की घटी है जो एक सम्पूर्ण और सशक्त मसीही चरित्र के लिये अनिवार्य है। वे नहीं जानते कि मसीह केवल मार्ग है, पिता तक पहुँचने का द्वार है, और उसकी बड़ी अभिलाषा यह है कि वह हमें अपने में से होकर और अपने से आगे पिता तक ले जाए, सचमुच हमें परमेश्वर के पास पहुँचाए। वह चाहता है कि हम वही जीवन जीएँ जो उसने पृथ्वी पर जीया — सदा ऊपर स्वर्ग में रहनेवाले परमेश्वर की ओर, जो उससे ऊपर था, दृष्टि लगाए हुए, उस पर निर्भर रहते हुए, और उसका आदर करते हुए।

परमेश्वर के निकट आना! इसके सिवाय और कुछ भी परमेश्वर को और उसके प्रेम को सन्तुष्ट नहीं कर सकता। वह लालायित है कि उसकी सन्तान उस प्रेम में आकर वास करे, और उसकी उपस्थिति में आनन्दित हो। उसने अपने पुत्र को इसलिये भेजा कि वह हमें उसके पास ले आए। यही पूर्ण उद्धार है। हमारे अस्तित्व का रचयिता होने के नाते परमेश्वर लालायित है कि हम अपने आप को उसे सौंप दें और उसी की बाट जोहें, ताकि वह हम में अपना कार्य करे। धर्मी और पवित्र होने के नाते वह चाहता है कि हम पूरी रीति से उसकी इच्छा और उसके ज्ञान के अधीन हो जाएँ। अदृश्य और गुप्त होने के नाते वह माँगता है कि हम अपने आप को दिखाई देनेवाली वस्तुओं से अलग करके उसके साथ संगति रखें। मनुष्य परमेश्वर की उपस्थिति के लिये सृजा गया था। परमेश्वर की निकटता ही उसका स्वाभाविक वातावरण होना था। यही वह वस्तु है जिसे परमेश्वर हम में से हर एक को प्रदान करने को तैयार है; यही वह वस्तु है जिसे स्वर्गीय याजकपद सम्भव बनाता है; यही वह वस्तु है जिसे परमेश्वर चाहता है कि हम खोजें। जैसे परमेश्वर कोई बाहरी सत्ता नहीं, वैसे ही उसकी निकटता भी कोई बाहरी बात नहीं, वरन् स्वभाव का एक भीतरी आत्मिक मेल, संगति और इच्छा की एकता है। जैसे-जैसे उसका आत्मा हमें ईश्वरीय स्वभाव का अधिक भाग देता है, और परमेश्वर हम में अपनी इच्छा को अधिक स्वतंत्रता और पूर्णता से पूरी करता है, वैसे-वैसे हम उसके और निकट आते जाते हैं, हम सचमुच उसके साथ एक हो जाते हैं।

परमेश्वर के निकट आना! इससे कम कुछ नहीं — यही वह है जिसे मसीह के छुटकारे ने हमारे लिये प्राप्त किया और हमारे लिये खोल दिया है। व्यवस्था की निर्बलता यही थी कि उसमें परमेश्वर के लोगों के लिये उसके पवित्रस्थान में, उसकी प्रत्यक्ष उपस्थिति में, प्रवेश करने का कोई प्रबन्ध न था। परमपवित्र स्थान का मार्ग यीशु के द्वारा खोल दिया गया है। हम हियाव से भीतर प्रवेश कर सकते हैं और परमेश्वर के सामने उपस्थित हो सकते हैं। सिंहासन पर बैठे हुए हमारे महायाजक के पास यह सामर्थ है कि वह अपने पवित्र आत्मा के द्वारा परमेश्वर के निकट आने को हमारा निरन्तर, स्थायी अनुभव बना दे। वह यह अविनाशी जीवन की सामर्थ से करता है। जीवन कभी बाहर से कार्य नहीं करता, सदा भीतर से करता है। हमारा महायाजक अपनी जीवन-सामर्थ के द्वारा हमारे जीवन में प्रवेश करता है, उसे नया करता है, और उसे ऊपर उठाता है; उसका स्वर्गीय जीवन हमारा वास्तविक जीवन बन जाता है, और परमेश्वर की उपस्थिति हमें घेरे रहती है और हम पर ऐसे चमकती है जैसे सूर्य का प्रकाश हमारे शरीरों पर चमकता है। वह परमेश्वर के प्रेम को हमारे मन में ऐसा डाल सकता है कि उसकी उपस्थिति दिन भर हमारा आनन्द बनी रहे।

परमेश्वर के निकट आना! इससे कम कुछ नहीं — यही वह होना चाहिए जिसका दावा हमारा विश्वास करे। मसीह में छुटकारा इतना सिद्ध और सर्वप्रबल है, उसका उद्धार इतना सम्पूर्ण है, हम में उसके जीवन की सामर्थ इतनी स्वर्गीय और अविनाशी है, उसके याजकपद का कार्य इतना निरन्तर और अटूट है, और उसके आत्मा का कार्य इतना निश्चित और इतना ईश्वरीय है, कि यह सचमुच सम्भव है कि हम दिन भर परमेश्वर के प्रेम और संगति का आनन्द लेते हुए निवास करें। यह जीवन की एक दशा है जिसमें उसने प्रवेश किया है, जिसे उसने हमारे लिये खोल दिया है, और जिसमें हमें बनाए रखने के लिये वह जीवित है। आइए हम इस पर विश्वास करें। हाँ, विश्वास ही हमारे प्राण की एकमात्र आदत बन जाए — ऐसा विश्वास जो सिंहासन पर विराजमान हमारे राजा-याजक का आदर इस रीति से करता है कि उससे वह आशा रखता है जो मनुष्य के लिये असम्भव है, जो केवल परमेश्वर के लिये सम्भव है: कि वह दिन भर हमारे हृदयों को परदे के भीतर परमेश्वर के सम्मुख बनाए रखे।

मसीह द्वार है। किसका द्वार? परमेश्वर के हृदय का द्वार। उसके द्वारा मैं भीतर प्रवेश कर सकता हूँ और परमेश्वर के प्रेम में बना रह सकता हूँ, परमेश्वर में वास कर सकता हूँ और परमेश्वर मुझ में। वह जीवित द्वार है, जो मुझे उठाकर परमेश्वर के पास भीतर ले आता है। वह यह पूरे निश्चय के साथ करता है, क्योंकि वह अविनाशी जीवन की सामर्थ में महायाजक है।

1. परमेश्वर के निकट एक जीवन! यही वह उत्तम आशा है, जो परदे के भीतर की वस्तु तक पहुँचती है। इस आशा के घमण्ड को दृढ़ता से थामे रहिए। आशा की पूर्णता के लिये यत्न करते रहिए: आशा से लज्जा नहीं होती। 2. परमेश्वर निकट, तो संसार दूर; संसार निकट, तो परमेश्वर दूर। यीशु ने उसी मार्ग से परमेश्वर की उपस्थिति में प्रवेश किया जिसे उसने हमारे लिये खोला। वह मार्ग दीनता और नम्रता, आज्ञाकारिता और मृत्यु का मार्ग था।

उस मार्ग को खोलने और भीतर प्रवेश करने के लिये यीशु को सम्पूर्ण और गहरे आत्म-समर्पण का मूल्य चुकाना पड़ा। उसने हमारे लिये अपने पीछे चलने की सामर्थ प्राप्त कर ली है, और अविनाशी जीवन की सामर्थ में वह उसे सब सीधे मनवाले प्राणों को प्रदान करता है। 3. परमेश्वर के निकट! क्या यह आपका जीवन है? क्या यह आपकी अभिलाषा है? क्या यह आपकी आशा है? यही वह उद्धार है जो मसीह ने आपके लिये तैयार किया है, और जिसे आपको देने के लिये वह बाट जोह रहा है। 55.

55 यीशु, एक उत्तम वाचा का जामिन

7:20. और इसलिये कि यह बिना शपथ के नहीं हुआ
21. (क्योंकि वे तो बिना शपथ के याजक ठहराए गए थे; परन्तु यह शपथ के साथ उसके द्वारा ठहराया गया जिसने उसके विषय में कहा,

कि प्रभु ने शपथ खाई, और वह उससे फिर न पछताएगा, कि तू युगानुयुग याजक है) 22. उसी के अनुसार यीशु एक उत्तम वाचा का जामिन भी ठहरा है। अध्याय 6 में परमेश्वर की शपथ का गहरा अर्थ हमारे सामने रखा गया था। उसकी ओर से यह उसके अटल अभिप्राय का प्रमाण है, किसी ऐसी बात के विषय में जिसे विश्वासयोग्यता से पूरा करने के लिये वह अपने आप को बाँधता है। हमारी ओर से यह किसी ऐसी बात की ओर संकेत करती है जिसमें विश्वास की विशेष आवश्यकता है, और हमें बुलाती है कि इस बात के निश्चय के विषय में कि परमेश्वर प्रतिज्ञा को अवश्य पूरा करेगा, हम पूर्ण और निःसंकोच भरोसा रखें। मसीह को महायाजक ठहराए जाने के वचनों में हम पहले ही तीन अर्थपूर्ण अभिव्यक्तियाँ पा चुके हैं; अब एक चौथी पर ध्यान देना है। प्रभु ने शपथ खाई और वह उससे फिर न पछताएगा: परमेश्वर की यह शपथ मसीह के याजकपद की महिमा का और पुराने याजकपद से उसकी श्रेष्ठता का एक नया प्रमाण है। परमेश्वर ने अब्राहम को दी हुई अपनी आशीष को शपथ के द्वारा दृढ़ किया; वह आशीष अनन्त और अटल है। हारून बिना शपथ के याजक ठहराया गया; उसका याजकपद केवल अस्थायी था, आनेवाली बातों की छाया मात्र। नई रीति के अनुसार एक याजक की पहली घोषणा पर परमेश्वर फिर शपथ को बीच में लाया: और इसलिये कि यह बिना शपथ के नहीं हुआ, उसी के अनुसार यीशु एक उत्तम वाचा का जामिन ठहरा है। यह शपथ हमें वाचा की ओर संकेत करती है — इस बात की ओर कि वह एक उत्तम वाचा है, कि यीशु उसका जामिन है — और उस याजकपद की ओर, जिसमें वाचा और उसके जामिन होने की सामर्थ निहित है।

एक उत्तम वाचा। वाचा का उद्देश्य यह है कि वह उसमें प्रवेश करनेवाले दोनों पक्षों के बीच के सम्बन्ध को निर्धारित और स्थिर करे, और एक दूसरे के प्रति उनके वचनों के विश्वासयोग्य पालन की जमानत दे। वह पुरानी वाचा जो परमेश्वर ने इस्राएल के साथ बाँधी थी, असफल सिद्ध हुई थी। उसके स्थापित होते समय वे प्रतिज्ञा करने को बड़े तत्पर थे: “जो कुछ यहोवा ने कहा है उस सब को हम करेंगे, और उसकी आज्ञा मानेंगे।” परन्तु कितनी जल्दी वह वाचा भुला दी गई और प्रतिज्ञा तोड़ दी गई। उन्होंने वह करने का बीड़ा उठाया था जो वे पूरा नहीं कर सकते थे; सामर्थ के बिना मन्नत और संकल्प किसी काम के न थे। समय बीतने पर परमेश्वर ने प्रतिज्ञा की कि वह एक नई वाचा बाँधेगा, और उसमें उस बात का प्रबन्ध करेगा जिसकी घटी थी — आज्ञा मानने की सामर्थ, और इस प्रकार वाचा को निभाने की सामर्थ। वह जीवन की वाचा होगी, जो हृदय में वह नया जीवन देगी जिससे आज्ञाकारिता स्वाभाविक रूप से फूट निकलेगी। इस उत्तम वाचा के विषय में, जो उत्तम प्रतिज्ञाओं पर बाँधी गई है, हम अगले अध्याय में सुनेंगे।

एक उत्तम वाचा का जामिन। यीशु यही करने आया है: वाचा को उसकी जमानत देना, और यह ज़िम्मा लेना कि उसके वचन सचमुच पूरे होंगे। वह दोनों ओर से वाचा का जामिन है। हमारे लिये जामिन कि परमेश्वर अपनी प्रतिज्ञा निभाएगा, और अपना जीवन और अपनी व्यवस्था और अपना आत्मा हमारे हृदय में देगा; हमारी ओर से परमेश्वर के लिये जामिन कि वह हमारी आज्ञाकारिता और हमारे वाचा के पालन को निश्चित करेगा।

शपथ के साथ याजक ठहराया गया। यीशु के याजकपद में ही वाचा और उसके जामिन होने की सामर्थ है। वह युगानुयुग का याजक ही है जो पाप से निपटता है और अविनाशी जीवन की सामर्थ से उसे दूर कर देता है। वह युगानुयुग का याजक, परमेश्वर का पुत्र, जो सदा के लिये सिद्ध किया गया है, वही है जिसने एक नया और जीवित मार्ग, जीवन की एक नई दशा खोल दी है, और जो सब कुछ अविनाशी जीवन की सामर्थ से करता है; उसी में हमारे पास एक ईश्वरीय जामिन है कि उत्तम वाचा की हर एक प्रतिज्ञा और हर एक दायित्व परमेश्वर के द्वारा और हमारे द्वारा पूरा किया जाएगा।

हमें इस बात का जीवित और अत्यन्त पूर्ण निश्चय देने के लिये कि यह सब ऐसा ही होगा, यीशु के याजक के पद पर बैठाए जाने की घोषणा स्वर्ग से शपथ के द्वारा की गई। परमेश्वर की ऐसी तीव्र लालसा है कि हम सचमुच उस अनन्त छुटकारे के पूरे भागी बन जाएँ जो उसके पुत्र ने हमारे लिये प्राप्त किया है; और क्योंकि वह देखता है कि जब तक हमारे हृदय विश्वास और आशा के साथ उसके लिये नहीं खुलते, तब तक उसके लिये हम में अपनी इच्छा पूरी करना असम्भव है, इसलिये वह जो कुछ कर सकता है वह सब करने को तैयार है, ताकि हमारा भरोसा जगाए और हमें विवश करे कि हम पूरी रीति से उस पर भरोसा रखें। इसलिये उसका आत्मा हमें स्मरण दिलाता है कि यीशु का याजकपद, और उससे हमारे अनन्त जीवन की सामर्थ में आनेवाली सारी आशीषें, पूर्ण रूप से निश्चित और अटल हैं। मानो इतना जानना पर्याप्त न हो कि परमेश्वर का पुत्र होने के नाते वह सर्वशक्तिमान है, मनुष्य का पुत्र होने के नाते दयालु और विश्वासयोग्य महायाजक है, और महान किया हुआ होने के नाते परमेश्वर के सिंहासन पर विराजमान राजा है, परमेश्वर हमें बुलाता है कि हम उस शपथ पर ध्यान दें जो उसने खाई। वह अपनी ही शपथ खाता है। वह अपनी ओर, और परमेश्वर के रूप में अपने आदर की ओर, अनन्त और सर्वशक्तिमान परमेश्वर के रूप में अपनी ओर संकेत करता है, और हमें आज्ञा देता है कि हम विश्वास करें कि यह युगानुयुग का याजक, जिसे उसने हमें दिया है, सचमुच अनन्त उद्धार से उद्धार करता है — ऐसे उद्धार से जिसमें अनन्तता की सामर्थ कार्य करती है।

जब परमेश्वर ने अब्राहम से की हुई आशीष की अपनी प्रतिज्ञा को शपथ के द्वारा दृढ़ किया, तब अब्राहम ने, यद्यपि वह बहुत थोड़ा ही जानता था कि वह आशीष आगे चलकर क्या होगी, परमेश्वर पर विश्वास किया: वह विश्वास में दृढ़ होकर परमेश्वर की महिमा करता रहा। और हम, जो उस पुत्र को जानते हैं जिसमें परमेश्वर ने अब अपने आप को प्रगट किया है, और जिसके हमारे लिये किए गए कार्य के प्रभाव और अनन्त जीवन-सामर्थ के विषय में परमेश्वर ने अब हम से शपथ खाई है — क्या हम सन्देह करें या हिचकिचाएँ? कदापि नहीं! भला होता कि हमारे हृदय समझने के लिये खुल जाते! परमेश्वर हम से एक ही बात माँगता है — वह विश्वास जो देखता है कि उसने क्या करने की प्रतिज्ञा की है, और जो उसके सामने झुककर उसे वह कार्य करने देता है जिसका बीड़ा उसने उठाया है।

एक ही बात है जिसके लिये हमें यत्न करना है, जब हम उस मार्ग पर आगे बढ़ते हैं जिसे यह पत्री भीतरी पवित्रस्थान की ओर खोलती है: कि हमारा विश्वास मनुष्यों के ज्ञान पर नहीं — न इस विषय में हमारे अपने विचारों पर कि परमेश्वर किस रीति से या किस मात्रा में अपनी प्रतिज्ञा पूरी करेगा — परन्तु केवल और पूरी रीति से परमेश्वर की सामर्थ पर निर्भर हो। जिस बात का हमें निश्चय दिलाने के लिये परमेश्वर की शपथ की आवश्यकता पड़ी, उसे पूरा करने के लिये परमेश्वर की सामर्थ की आवश्यकता है, और वह सामर्थ उसके पास है।

1. इन दो बातों को अवश्य दृढ़ता से थामे रहिए। विश्वास को यह देखना चाहिए कि परमेश्वर क्या प्रतिज्ञा करता है, और फिर परमेश्वर को हम में उस प्रतिज्ञा को पूरा करने देना चाहिए। पवित्र आत्मा के प्रकाश के लिये प्रार्थना कीजिए, ताकि आप उन सब अधूरी और त्रुटिपूर्ण धारणाओं से छुटकारा पाएँ जो इस विषय में हैं कि हमारा महायाजक हम में क्या कर सकता है; और फिर अपना सबसे बड़ा कार्य यह समझिए कि आप परमेश्वर की बाट जोहें और आराधना से भरे भरोसे के साथ उसके कार्य के अधीन हो जाएँ।

परमेश्वर की शपथ का विषय और सार जीवित, व्यक्तिगत मसीह है, पुत्र और याजक के रूप में; अर्थात् उस ईश्वरीय और अनन्त जीवन की सामर्थ में याजक के रूप में, जिसे वह प्रदान करता है। जो मसीह से लिपटा रहता है, वह उन सब बातों को जानने की ओर आगे बढ़ाया जाएगा जिनकी परमेश्वर ने उसमें प्रतिज्ञा की है। 56.

56 एक याजक, जो पूर्ण रूप से उद्धार कर सकता है

7:23. और वे तो बहुत से याजक बनते आए, इसका कारण यह था कि मृत्यु उन्हें रहने नहीं देती थी:
24. पर यह, इसलिये कि युगानुयुग रहता है, इसका याजकपद अटल है। 25. इसी लिये जो इसके द्वारा परमेश्वर के निकट आते हैं, वह उनका पूरा पूरा उद्धार कर सकता है, क्योंकि वह उनके लिये बिनती करने को सर्वदा जीवित है।

हारून की रीति में याजकों का निरन्तर उत्तराधिकार चलता रहा, एक मरता और दूसरा उसका स्थान लेता। यही सारी पद्धति की विशेषता थी: उस पर परिवर्तन और निर्बलता और मृत्यु की छाप थी। वह ऐसा कुछ भी उत्पन्न नहीं कर सकती थी जो सचमुच स्थायी और टिकाऊ हो, अनन्त तो बिलकुल भी नहीं। आराधक का सारा भीतरी जीवन भी वैसा ही था जैसी वह पद्धति थी — परिवर्तन और क्षय के अधीन। पर यह, इसलिये कि युगानुयुग रहता है, इसका याजकपद अटल है। वह आप ही सनातन है, जो युगानुयुग याजक बना रहता है। उसका याजकपद अटल है; वह जीवन भी, जिसकी सामर्थ में वह सेवा करता है, और वह जीवन भी, जिसे वह पहुँचाता है, ऐसा जीवन है जो अटल बना रहता है। उसका याजकपद अनन्तकाल का है, सदा जीवित, सदा सक्रिय।

इसी लिये जो उसके द्वारा परमेश्वर के निकट आते हैं, वह उनका पूर्ण रूप से उद्धार कर सकता है। इसी लिये — अर्थात् इस कारण कि वह युगानुयुग रहता है; इस कारण कि एक भी क्षण ऐसा नहीं होता जिसमें उसका याजकीय कार्य, हमारे लिये उसकी चौकस देखभाल, उसकी प्रेममय सहानुभूति और सहायता, हमारे अविनाशी जीवन की सामर्थ में हम में उसका कार्य, पूरी रीति से चालू न हो। इसलिये वह पूर्ण रूप से उद्धार कर सकता है; अर्थात् ऐसा कोई क्षण होने की आवश्यकता ही नहीं जिसमें उसकी उद्धार करनेवाली सामर्थ का अनुभव रुक जाए, जिसमें वह उद्धार, जो उसने पूरा किया है, उद्धार न करे। इसकी पुष्टि के लिये यह जोड़ा गया है: क्योंकि वह उनके लिये बिनती करने को सर्वदा जीवित है। उससे पिता की ओर उसके अपने लोगों में से हर एक के लिये और उनकी हर एक आवश्यकता के लिये उसके प्रेम की प्रार्थना बिना रुके बहती रहती है; उसका व्यक्तित्व और उसकी उपस्थिति ही वह प्रार्थना है — वह उन लोगों के साथ, जिन्हें वह अपने भाई कहता है, इतनी घनिष्ठता से और इतने अविभाज्य रूप से एक है। और पिता की ओर से उसकी ओर उसकी प्रसन्नता का उत्तर, और उस उत्तर को लेकर आनेवाली पवित्र आत्मा की सामर्थ, बिना रुके बहती रहती है। और इसी प्रकार उससे उसकी देह के हर एक अंग की ओर समय पर सहायता के लिये अनुग्रह बिना रुके बहता रहता है। क्योंकि वह बिनती करने को सर्वदा जीवित है, एक क्षण के भी विराम के बिना, इसलिये वह पूर्ण रूप से उद्धार कर सकता है।

वह पूर्ण रूप से उद्धार कर सकता है। इस प्रतिज्ञा का मसीह के चरित्र और कार्य से जो सम्बन्ध है, वह हमें दिखाता है कि इसका अर्थ क्या है। मसीहियों की बड़ी शिकायत यह है कि उनका अनुभव इतना परिवर्तनशील है कि परमेश्वर के प्रेम और अनुग्रह का धन्य बोध जाता रहता है, और मसीह की सम्भालनेवाली, शुद्ध करनेवाली सामर्थ के विषय में जो कुछ वे जानते हैं, वह टिकता नहीं; परमेश्वर की निकटता का बोध निरन्तर बना नहीं रहता। ऐसा लगता है मानो किसी न किसी रीति से उसका खो जाना अनिवार्य हो। परिस्थितियों के बदलने के साथ, हाय, बहुधा परमेश्वर की निकटता में और उसकी उद्धार करनेवाली सामर्थ में भी बदलाव आ जाता है। यदि मसीह जो कुछ उनके लिये कभी-कभी करता है, वह निरन्तर बना रह पाता, यदि वह टिक पाता, तो उनका आनन्द पूरा हो जाता, उनका उद्धार सम्पूर्ण हो जाता। यहाँ हमारे पास ठीक वही प्रतिज्ञा है जिसकी ऐसे मसीहियों को आवश्यकता है। क्योंकि वह युगानुयुग रहता है, क्योंकि वह बिनती करने को सर्वदा जीवित है, क्योंकि वह युगानुयुग का याजक है, जो अपने पद का हर एक कार्य एक अविनाशी जीवन-सामर्थ में करता है, जो एक क्षण के लिये भी अपना कार्य नहीं रोकती — इसलिये वह पूर्ण रूप से उद्धार कर सकता है। अपने आप में वह सदा के लिये सिद्ध किया गया है; अपने साथ उसने उन्हें जो पवित्र किए जाते हैं, सर्वदा के लिये सिद्ध कर दिया है। जो उद्धार उसने पूरा किया है, वह परमेश्वर की उपस्थिति के खुले हुए पवित्रस्थान में, परमेश्वर के आत्मा की सामर्थ में एक जीवन है; केवल इतना ही आवश्यक है कि विश्वासी सदा बना रहे, और इस उद्धार-जीवन में, जिसे यीशु ने खोल दिया है, सदा जीवित रहे। और यह वह कर सकता है, जब एक बार वह इसके लिये यीशु पर भरोसा रखना सीख लेता है, क्योंकि वह समझ लेता है कि वह बिनती करने को सर्वदा जीवित है। उसने पतरस के लिये बिनती की कि उसका विश्वास जाता न रहे। क्योंकि उसकी मध्यस्थता का कार्य कभी थमता या रुकता नहीं, इसलिये हमारे विश्वास को और उस मध्यस्थता की सामर्थ के हमारे अनुभव को कभी भी जाता रहने की आवश्यकता नहीं। वह उनका पूर्ण रूप से उद्धार कर सकता है जो उसके द्वारा परमेश्वर के निकट आते हैं। पद 19 में हमने देखा कि हमें परमेश्वर के निकट आने के योग्य बनाना ही वह उत्तम आशा है जो सुसमाचार लाता है — मसीह के याजकपद का एकमात्र लक्ष्य। यहाँ वही बात फिर हमारे सामने है। बहुत से लोगों को इस बात की कोई धारणा ही नहीं कि मसीह पूर्ण रूप से उद्धार कर सकता है, इसका एक कारण बस यह है कि उन्होंने कभी पूरी रीति से नहीं समझा कि उद्धार क्या है। आगे के अध्याय इसे हमारे लिये खोलेंगे — और परमेश्वर का आत्मा सचमुच इसे खोले! — कि मसीह के द्वारा परमेश्वर के पास आने, परमेश्वर के निकट आने का अर्थ इससे कम कुछ नहीं कि हम परमपवित्र स्थान में प्रवेश करें, और दिन भर वहाँ निवास करें, अपना जीवन वहीं बिताएँ, वहाँ निरन्तर बने रहें। केवल वे ही, जो इसे सम्भव मानते हैं, अपने आप को इसके लिये सौंपेंगे। केवल उन्हीं के लिये, जो सब कुछ छोड़कर अपने आप को इसके लिये सौंप देते हैं, यह सम्भव होगा। परन्तु जितने उसके द्वारा परमेश्वर के पास आते हैं, उन सब के लिये प्रतिज्ञा निश्चित है: वह युगानुयुग रहता है; वह पूर्ण रूप से उद्धार कर सकता है।

आह, आइए हम अपनी आँखें और अपने हृदय स्वर्ग में विराजमान यीशु पर लगाएँ — हमारे मलिकिसिदक पर, सामर्थ के सिंहासन पर बैठे हमारे राजा-याजक पर — और उसकी निरन्तर मध्यस्थता पर। और हमारी एकमात्र अभिलाषा यह हो कि हम विश्वास करें कि वह परमेश्वर, जिसने अपनी ही शपथ खाई है — परमेश्वर के रूप में अपने ही जीवन की शपथ — हमारे लिये कुछ ऐसा करना चाहता है जो हमारी बिनती और समझ से कहीं अधिक है।

1. पूर्ण रूप से उद्धार कर सकता है। यही सिद्ध लोगों के लिये वह ठोस भोजन है, जिसे केवल सचमुच समर्पित प्राण ही ग्रहण कर सकता है। यह उन बातों में से है “जिनका समझाना भी कठिन है; इसलिये कि तुम ऊँचा सुनने लगे हो।” 2. जैसा याजक, वैसी प्रजा। याजक का चरित्र उन लोगों के चरित्र को निर्धारित करता है जिनकी आराधना की वह अगुवाई करता है। मसीह के याजकपद का चरित्र उन लोगों के चरित्र को निर्धारित करता है जो उसके हैं। और वह याजकपद क्या कुछ कर सकता है, इसके विषय में हमारी धारणा हमारे धार्मिक चरित्र को निर्धारित करेगी। उसकी आराधना करना और उस पर यह भरोसा रखना कि वह पूर्ण रूप से उद्धार कर सकता है — यह कितने असीम महत्व की बात है! यही हमारे मसीही चरित्र और जीवन को निर्धारित करेगा।

3. मध्यस्थता के स्थान और सामर्थ का कैसा दर्शन! मसीह का सारा जीवन इसी को समर्पित है। सिंहासन पर राजा-याजक के रूप में उसकी सामर्थ के प्रयोग का और कोई माध्यम नहीं। आप दूसरों को बचाने की लालसा रखते हैं। अपने आप को प्रार्थना और मध्यस्थता में लगा दीजिए। अपने साथी मनुष्यों के लिये अपने आप को परमेश्वर के सामने बलिदान के रूप में प्रस्तुत कीजिए, और अपने आप को अर्पित कीजिए कि आप उसके आत्मा से भर जाएँ और उसकी आग से भस्म हो जाएँ।

मध्यस्थता को स्वर्ग की आशीष नीचे उतार लाने का रहस्य समझिए। इन दो बातों को अविभाज्य रूप से एक साथ जोड़िए: निरन्तर मध्यस्थता, और मसीह में पूर्ण रूप से उद्धार करने की सामर्थ। पूर्ण उद्धार और निरन्तर मध्यस्थता। 57.

57 ऐसा महायाजक, पुत्र जो सदा के लिये सिद्ध किया गया है

7:26. क्योंकि ऐसा ही महायाजक हमारे योग्य था, जो पवित्र, और निष्कपट, और निर्मल, और पापियों से अलग, और स्वर्ग से भी ऊँचा किया हुआ हो; 27. जिसे उन महायाजकों की नाईं प्रति दिन बलिदान चढ़ाने की आवश्यकता नहीं,

पहले अपने पापों के लिये, और फिर लोगों के पापों के लिये: क्योंकि यह उसने एक ही बार किया, जब उसने अपने आप को बलिदान चढ़ाया। 28. क्योंकि व्यवस्था तो निर्बल मनुष्यों को महायाजक ठहराती है; परन्तु उस शपथ का वचन, जो व्यवस्था के बाद आया, एक पुत्र को ठहराता है, जो सदा के लिये सिद्ध किया गया है।

क्योंकि ऐसा ही महायाजक हमारे योग्य था — हमारे लिये उपयुक्त था, क्योंकि वह वही था जिसकी हमें आवश्यकता थी। ये शब्द सारे अध्याय की ओर संकेत करते हैं, परन्तु विशेष रूप से उस पद की ओर जो ठीक पहले आया है: ऐसा महायाजक, जो युगानुयुग रहता है, जो पूर्ण रूप से उद्धार कर सकता है। ये उस बात की ओर भी संकेत करते हैं जो अब आगे आती है, जिसमें उसके व्यक्तिगत गुणों का सार दिया गया है। पवित्र — परमेश्वर के साथ संगति और मेल में; निष्कपट — अपने स्वभाव की शुद्धता में; निर्मल — इस बात में कि उसने पाप और संसार की ओर से आनेवाली हर परीक्षा पर जय पाई; पापियों से अलग — मनुष्यों के बीच सच्चा मनुष्य, फिर भी ऐसा जिसने अपने आप को उनके पाप से अलग रखा; स्वर्ग से भी ऊँचा किया हुआ — अब परमेश्वर की महिमा में महान किया गया, ताकि हमें स्वर्गीय संसार का जीवन और उसकी आशीषें पहुँचाए।

जिसे उन महायाजकों की नाईं प्रति दिन पहले अपने पापों के लिये और फिर लोगों के पापों के लिये बलिदान चढ़ाने की आवश्यकता नहीं; क्योंकि यह उसने एक ही बार किया, जब उसने अपने आप को बलिदान चढ़ाया। हमने देखा कि मसीह के याजकपद की महिमा, उन बहुतों के याजकपद की तुलना में जिन्हें मृत्यु के कारण एक के बाद एक आना पड़ता था, यह थी कि केवल वही याजक है, क्योंकि वह सदा बना रहता है। यहाँ हमारे सामने वही सत्य दूसरी ओर से है: प्रति दिन बार-बार दोहराए जानेवाले बलिदानों के विपरीत, उसने जब एक बार अपने आप को चढ़ाया, तब सब कुछ पूरा कर दिया। जिसे दोहराना पड़ता है वह अपूर्ण है; जिसे केवल एक बार करने की आवश्यकता है वह सिद्ध है और सदा बना रहता है। आगे चलकर हम “एक ही बार” शब्द को फिर पाएँगे, जिसका उसके बलिदान के सम्बन्ध में वही अर्थ है जो “युगानुयुग” का उसके याजकपद के सम्बन्ध में है।

उसने अपने आप को बलिदान चढ़ाया। यहाँ हमें मसीह के बलिदान का पहला उल्लेख मिलता है। अध्याय 2 में उसकी मृत्यु का उल्लेख हुआ था; यहाँ हम देखते हैं कि वह वेदी पर की मृत्यु थी। वह याजक भी है और बलि भी। उसका ईश्वरीय याजकपद, जैसा वह स्वर्ग में निभाया जाता है, उस बलिदान के लहू और उसकी सामर्थ का प्रयोग है जो उसने पृथ्वी पर चढ़ाया। बलिदान का “एक ही बार सदा के लिये” स्वर्ग के सिंहासन के “अब से युगानुयुग” का प्रतिरूप है।

क्योंकि व्यवस्था — यह पूरी बात का निष्कर्ष है — निर्बल मनुष्यों को महायाजक ठहराती है; परन्तु उस शपथ का वचन, जो व्यवस्था के बाद आया, एक पुत्र को ठहराता है, जो सदा के लिये सिद्ध किया गया है। व्यवस्था एक तैयारी थी, ताकि परमेश्वर के साथ उस सच्ची, अलौकिक, स्वर्गीय संगति की आवश्यकता और आशा को जगाए, जो शब्दों या इच्छाओं में नहीं, परन्तु अनन्त जीवन की सामर्थ में होनी थी। जो व्यवस्था न कर सकी, वह परमेश्वर ने कर दिया, पुत्र को, जो सदा के लिये सिद्ध किया गया है, महायाजक ठहराकर।

इन अन्तिम शब्दों में पत्री की पूरी पिछली शिक्षा का सार है। अध्याय 1 में उसने परमेश्वर के पुत्र और उसकी महिमा के विषय में कहा था: वह परमेश्वर की ओर से आया, वह परमेश्वर है, और उसमें परमेश्वर का जीवन है; वह हमें निकट ला सकता है, परमेश्वर के जीवन के सच्चे अधिकार और आनन्द में।

अध्याय 2-5 में हमारे सामने उसकी मानवता थी, दुःख उठाने और आज्ञाकारिता के द्वारा उसका सिद्ध किया जाना। इस प्रकार उसने एक नया मानव स्वभाव सिद्ध किया, जिसे वह स्वर्ग से पवित्र आत्मा की सामर्थ में हमें प्रदान करता है। अध्याय 7 में अब हमें सिखाया गया है कि उसके मलिकिसिदक की रीति पर युगानुयुग का याजक होने का क्या अर्थ है — जिसका व्यक्तित्व और याजकपद और कार्य सब अविनाशी जीवन की सामर्थ में हैं, और जो, क्योंकि वह सदा बना रहता है और सदा बिनती करता है, पूर्ण रूप से उद्धार कर सकता है, और हमारे परमेश्वर के निकट आने को ऐसा जीवन बना सकता है जो निरन्तर बना रहता है। ऐसा ही महायाजक हमारे योग्य था — वह पुत्र, जो सदा के लिये सिद्ध किया गया है।

और यदि ऐसा महायाजक हमारे योग्य था, तो अब उसके प्रति हमें क्या करना योग्य है? निश्चय ही एक बात: कि हम पूरे मन से उसकी उद्धार करनेवाली सामर्थ को जानने, उस पर भरोसा रखने और उसका अनुभव करने का यत्न करें। यदि आपका हृदय सचमुच पाप से छुटकारे की, परमेश्वर के साथ सच्ची और निकट संगति की, पूर्ण उद्धार की, और परमेश्वर के पुत्र — परदे के भीतर हमारे नायक और अगुआ — की सामर्थ और समानता में जीवन की लालसा रखता है, तो आपको यीशु को परमेश्वर के पुत्र और अपने महायाजक, दोनों रूपों में जानना सीखना होगा। आपको ज्ञान और प्रकाश की आत्मा के लिये प्रार्थना करनी होगी, ताकि आप जानें कि उसकी सामर्थ हमारी ओर जो विश्वास करते हैं, कितनी महान है, उसकी शक्ति के प्रभाव के उस कार्य के अनुसार जो उसने मसीह यीशु में किया, जब उसने उसे मरे हुओं में से जिलाकर अपनी दाहिनी ओर बैठाया। आपको विश्वास करना होगा कि वही महान सामर्थ, जिसके द्वारा वह इस प्रकार सदा के लिये सिद्ध किया गया और परमेश्वर की दाहिनी ओर बैठा है, आप में कार्य कर रही है। विश्वास के साथ अपने आप को परमेश्वर के इस सामर्थी कार्य के अधीन कर दीजिए जो वह मसीह में करता है — उस अनन्त जीवन की सामर्थ के अधीन, जिसके द्वारा वह स्वर्ग से आप में कार्य करेगा, ताकि आपको परमेश्वर के निकट ले आए और वहाँ बनाए रखे। जब आप इस पर विश्वास करेंगे, और इसके लिये यीशु पर भरोसा रखेंगे, तो वह आप ही इसे आपका अनुभव बना देगा। आह, इस विचार से सावधान रहिए कि ये केवल सुन्दर शब्द और चित्र हैं जो पवित्रशास्त्र देता है; परमेश्वर का अभिप्राय यह है कि ये प्रति दिन के जीवन और चाल-चलन के लिये सबसे ठोस, वास्तविक सच्चाइयाँ हों। परमेश्वर ने आपको ऐसा महायाजक इसलिये दिया है कि आप एक असम्भव जीवन जी सकें — इन्द्रियों और तर्क से ऊपर का जीवन, उसके पुत्र की सामर्थ में एक अलौकिक जीवन। जब यीशु सिंहासन पर चढ़ा, तब उसके चेलों को प्रतीक्षा करनी थी कि उस स्वर्गीय जीवन का आत्मा और सामर्थ, जिसमें उसने उनके लिये प्रवेश किया था, सीधे उसी की ओर से उन्हें प्रदान किया जाए।

वही पवित्र आत्मा, जो पिन्तेकुस्त की सामर्थ में हम में वास करता है, अकेला ही इस पत्री के सारे धन्य वस्तुगत सत्य को हमारे भीतर एक जीवित वास्तविकता बना सकता है। 1. इस अध्याय से विदा होने से पहले उन तीन शब्दों पर भली-भाँति ध्यान दीजिए, जिनमें इसकी व्यावहारिक शिक्षा यह समेटती है कि हमारा मलिकिसिदक, जो सदा याजक बना रहता है, हमारे लिये क्या है। उसके कार्य का नियम: वह सब कुछ अविनाशी जीवन की सामर्थ के अनुसार करता है। उसके कार्य का उद्देश्य: वह उत्तम आशा, जिसके द्वारा हम परमेश्वर के निकट आते हैं। उसके कार्य का परिमाण: पूर्ण रूप से उद्धार कर सकता है।

अनन्त जीवन की सामर्थ, परमेश्वर की निकटता, और पूर्ण उद्धार — यही वे वस्तुएँ हैं जो उसे प्रदान करनी हैं। मसीह का अनन्त याजकपद: यह सिद्धता के उन सत्यों में पहला है जो हमें सिद्धता के जीवन तक ले जाते हैं। पुत्र, जो सदा के लिये सिद्ध किया गया है, हमारा महायाजक है, जो अपने में से और अपने में होकर हमें वह जीवन देता है जो हमें जीना है।

परमेश्वर के वचन में यहाँ उसका एक ही विचार यह है कि हम अनुभव करें कि ऐसे उद्धारकर्ता के साथ हमारे लिये कैसा पूर्ण उद्धार है। परमेश्वर अपने पुत्र में हम से बोलता है, और उसमें हमें अपना ही जीवन देता है। छठा खण्ड — 8:1-13। नया पवित्रस्थान और नई वाचा। 58.

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  1. 1 पूर्ण रूप से।

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