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जब मैंने पहली बार उन मसीही लोगों के लिए, जिनके बीच मैं परिश्रम करता हूँ, डच भाषा में इस व्याख्या को तैयार करने का काम हाथ में लिया, तो यह इस गहरे निश्चय के साथ था कि यह पत्री ठीक वही शिक्षा रखती है जिसकी उन्हें आवश्यकता थी। इसे अंग्रेज़ी में प्रस्तुत करते हुए यह धारणा और भी दृढ़ हो गई है, और ऐसा लगता है मानो आज के दिन मसीह की सारी कलीसिया की दशा के लिए इससे अधिक ठीक-ठीक उपयुक्त और कुछ लिखा ही नहीं जा सकता। जिन पर प्राणों की देखभाल का भार है, उन सब की बड़ी शिकायत यही है कि मसीही जीवन में पूरे मन की लगन, स्थिरता, स्थिर बने रहने और उन्नति की कमी है। बहुत से लोग, जिनके विषय में यह आशा किए बिना नहीं रहा जा सकता कि वे सच्चे मसीही हैं, एक जगह आकर ठहर जाते हैं, और मसीही जीवन और आचरण की आरम्भिक बातों से आगे नहीं बढ़ते। और उनसे भी कहीं अधिक लोग तो जहाँ हैं वहीं ठहरे भी नहीं रहते, बल्कि संसारिकता, औपचारिकता और उदासीनता के जीवन की ओर लौट जाते हैं। और यह प्रश्न बार-बार पूछा जाता है: हमारे धर्म में वह कौन सी कमी है कि वह बहुत सी दशाओं में स्थिर खड़े रहने, आगे बढ़ने, और सिद्धता की ओर बढ़ते जाने की कोई सामर्थ्य नहीं देता? और वह कौन सी शिक्षा है जिसकी आवश्यकता है, कि मसीही जीवन को ऐसा स्वास्थ्य और बल मिले कि वह सब विपरीत परिस्थितियों में भी अपने आरम्भ के भरोसे को अन्त तक दृढ़ता से थामे रह सके?
इस पत्री की शिक्षा इन प्रश्नों का ईश्वरीय उत्तर है। यह हर सम्भव रीति से हमारे सामने यह सत्य रखती है कि केवल इस बात का पूरा और सिद्ध ज्ञान कि मसीह हमारे लिए क्या है और क्या करता है, हमें पूरे और सिद्ध मसीही जीवन तक पहुँचा सकता है।
मसीह यीशु का जो ज्ञान हमें मन फिराने के लिए चाहिए, वह बढ़ने, उन्नति करने, पवित्रीकरण और परिपक्वता के लिए पर्याप्त नहीं है। जैसे दो व्यवस्थाएँ हैं, पुराना नियम और नया नियम, और पुराने नियम के पवित्र लोग अपने सारे विश्वास और परमेश्वर के भय के होते हुए भी नये नियम के अधिक सिद्ध जीवन को प्राप्त न कर सके, वैसे ही मसीही जीवन की उन दो अवस्थाओं के विषय में भी है जिनकी चर्चा यह पत्री करती है। जो लोग आलस्य के कारण मसीह में बालक ही बने रहते हैं, और परिपक्वता की ओर आगे नहीं बढ़ते, वे सदा इस जोखिम में रहते हैं कि अपना मन कठोर कर लें, पीछे रह जाएँ और भटक जाएँ। केवल वे ही, जो अपने आरम्भ के भरोसे को अन्त तक दृढ़ता से थामे रहते हैं, जो विश्राम में प्रवेश करने का यत्न करते हैं, जो सिद्धता की ओर आगे बढ़ते जाते हैं, सचमुच उन अद्भुत नई वाचा की आशिषों के अधिकारी होते और उनका आनन्द उठाते हैं जो मसीह में हमारे लिए निश्चित कर दी गई हैं। और इस पत्री का बड़ा उद्देश्य हमें यह दिखाना है कि यदि हम केवल प्रभु के पूरी रीति से पीछे चलें, और जो कुछ परमेश्वर मसीह में करने को तैयार है उसके प्रति अपने आप को पूरी तरह सौंप दें, तो हम सुसमाचार में और मसीह में वह सब कुछ पाएँगे जिसकी हमें आनन्द, बल और अन्तिम विजय के जीवन के लिए आवश्यकता है।
हमारी सारी विफलताओं और दुर्बलताओं के लिए इस पत्री के पास जो उपचार है, सारे जोखिम और रोग से बचाने वाला जो एकमात्र साधन है, वह यीशु के विषय में ऊँचे सत्य का ज्ञान है, अर्थात् उसके स्वर्गीय याजकपद में उसका ज्ञान। इस सत्य के सम्बन्ध में लेखक तीन बड़े भेदों को खोलना चाहता है। पहला यह कि स्वर्गीय पवित्रस्थान हमारे लिए खोल दिया गया है, ताकि हम अब आकर वहाँ, परमेश्वर की ठीक उपस्थिति में, यीशु के साथ अपना स्थान ग्रहण करें। दूसरा यह कि वह नया और जीवता मार्ग, जिससे होकर यीशु ने प्रवेश किया, अर्थात् आत्म-बलिदान और परमेश्वर की सिद्ध आज्ञाकारिता का मार्ग, वही मार्ग है जिससे होकर अब हम निकट आ सकते हैं और हमें निकट आना ही है। तीसरा यह कि यीशु, हमारा स्वर्गीय महायाजक होकर, स्वर्गीय पवित्रस्थान का सेवक है, और उसकी आशिषें, अर्थात् स्वर्गीय जीवन की आत्मा और सामर्थ्य, हमें इस रीति से बाँटता है कि हम संसार में उन लोगों की नाईं जी सकें जो स्वर्गीय यरूशलेम के पास आ पहुँचे हैं, और जिनमें स्वर्ग की आत्मा ही उनके सारे जीवन और चाल-चलन की आत्मा है; यीशु का स्वर्गीय याजकपद, दिन-प्रतिदिन हमारे लिए खुला हुआ स्वर्ग, नये और जीवते मार्ग से होकर उसमें हमारा प्रवेश करना, और पवित्र आत्मा के द्वारा स्वर्ग का हम में प्रवेश करना। यही वह सुसमाचार है जो यह पत्री इब्रानियों के पास लाती है, यही वह जीवन है जिसका मार्ग और जिसकी सामर्थ्य यह प्रगट करती है। मसीह के व्यक्तित्व और कार्य के स्वर्गीय स्वरूप का ज्ञान ही अकेला ऐसे स्वर्गीय मसीही बना सकता है, जो पृथ्वी पर के जीवन की सारी कठिनाइयों और परीक्षाओं के बीच उन लोगों की नाईं जी सकें जिन्हें ऊपरवाले लोक की श्रेष्ठ सामर्थ्य ने अपने अधिकार में कर लिया है, और जिनमें वह सदा विजय दे सकती है।
इन मनन-लेखों को अब पाठकों के एक बड़े समुदाय के सामने रखते हुए, मैं यह प्रार्थना करता हूँ कि परमेश्वर को यह भाए कि वह इनके द्वारा अपनी कुछ सन्तानों में उनके धन्य प्रभु के प्रति नया भरोसा जगाए, जब वे उसे और भली भाँति जानना सीखें, और जो कुछ वह उनके लिए कर सकता है उस सब की आशा करने और उसका अनुभव करने के लिए अपने आप को सौंप दें। मैं इस एक ही विचार को बार-बार दोहराने से नहीं डरा हूँ : हमारी एकमात्र आवश्यकता यह है कि हम यीशु को और भली भाँति जानें; हमारी सारी दुर्बलता का एकमात्र उपचार यह है कि हम स्वर्ग के सिंहासन पर विराजमान उसकी ओर ताकें, और उस स्वर्गीय जीवन पर सचमुच अपना अधिकार जताएँ जिसे देने के लिए वह बाट जोह रहा है।
ठीक जब मैं डच संस्करण की प्रस्तावना लिखने ही वाला था, पिछले वर्ष के पहले सप्ताह में, मुझे अपने प्रिय सहकर्मी से नये वर्ष के पद के रूप में, इस शुभकामना के साथ कि यह मेरा अनुभव बन जाए, ये वचन मिले: “यीशु ने पतरस और याकूब और यूहन्ना को साथ लिया, और एकान्त में किसी ऊँचे पहाड़ पर ले गया; और उनके सामने उसका रूप बदल गया।” मैंने तुरन्त यह वचन अपने पाठकों तक पहुँचा दिया, और अब फिर वैसा ही करता हूँ। धन्य स्वामी हमें अपने साथ उस ऊँचे पहाड़ पर, अर्थात् सिय्योन पर्वत पर, ले जाए, जहाँ वह याजक-राजा होकर सामर्थ्य के साथ सिंहासन पर विराजमान है, हम में से हर एक को एकान्त में अलग ले जाए, और हमें उस धन्य दर्शन के लिए तैयार करे कि हम अपने सामने उसका रूप बदलते हुए देखें, उसे उसकी स्वर्गीय महिमा में देखें। तब भी वह हमारे लिए वही यीशु होगा जिसे हम अब जानते हैं। और फिर भी वही नहीं; वरन् उसका सारा अस्तित्व उस स्वर्गीय जीवन की महिमा और सामर्थ्य से प्रकाशमान होगा, जिसे वह हमारे लिए रखे हुए है, और जिसे वह उन लोगों को दिन-प्रतिदिन देने के लिए बाट जोहता है जो सब कुछ छोड़कर उसके पीछे हो लेते हैं। इस दीन भरोसे और प्रार्थना के साथ कि ऐसा ही हो, मैं अपने सब पाठकों को उसकी धन्य शिक्षा और अगुवाई को सौंपता हूँ। एन्ड्रयू मरे। सितम्बर 1894।