अध्याय 2 (21 में से)

इब्रानियों के नाम पत्री

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इब्रानियों के नाम पत्री। परमेश्वर का पुत्र — मसीही जीवन का बल। पहला आधा भाग — सैद्धान्तिक। — अध्याय 1–10। परमेश्वर का पुत्र, एक उत्तम वाचा का मध्यस्थ। अध्याय 1। विषय — 1। पुत्र की महिमा, उसके व्यक्तित्व और उसके कार्य में।

पूर्व युग में परमेश्वर ने बापदादों से भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा थोड़ा थोड़ा करके और भांति भांति से बातें करके, 2 इन दिनों के अन्त में हम से अपने पुत्र के द्वारा बातें कीं, जिसे उस ने सारी वस्तुओं का वारिस ठहराया, और जिसके द्वारा उस ने जगत की भी रचना की है। 3 वह उसकी महिमा का तेज, और उसके तत्व की ठीक छाप है, और सब वस्तुओं को अपनी सामर्थ के वचन से संभालता है; वह पापों का शुद्धिकरण करके ऊंचे स्थानों पर महामहिमन के दाहिने जा बैठा। पहला खण्ड — 1। परमेश्वर का पुत्र स्वर्गदूतों से बढ़कर। पुत्र का अधिक उत्तम नाम।

और वह स्वर्गदूतों से उतना ही उत्तम ठहरा, जितना उस ने उन से अधिक उत्तम नाम का वारिस होकर पाया है। और जब वह पहिलौठे को फिर जगत में लाता है, तो कहता है, — एकलौता पुत्र।

5 क्योंकि स्वर्गदूतों में से उस ने कब किसी से कहा, कि तू मेरा पुत्र है, आज तू मुझ से उत्पन्न हुआ? और फिर यह, कि मैं उसका पिता होऊंगा, और वह मेरा पुत्र होगा? और परमेश्वर के सब स्वर्गदूत उसे दण्डवत करें। 7 और स्वर्गदूतों के विषय में यह कहता है, कि वह अपने दूतों को पवन, और अपने सेवकों को धधकती आग बनाता है। पुत्र स्वयं परमेश्वर है।

8 परन्तु पुत्र के विषय में कहता है, कि हे परमेश्वर, तेरा सिंहासन युगानुयुग रहेगा; और तेरे राज्य का राजदण्ड सीधाई का राजदण्ड है। पुत्र — सनातन सृष्टिकर्ता। 10 और यह कि, हे प्रभु, आदि में तू ने पृथ्वी की नेव डाली, और आकाश तेरे हाथों की कारीगरी है। 11 वे तो नाश हो जाएंगे; परन्तु तू बना रहेगा: और वे सब वस्त्र की नाईं पुराने हो जाएंगे। 12 और तू उन्हें चादर की नाईं लपेटेगा, वस्त्र की नाईं, और वे बदल जाएंगे: पर तू वही है, और तेरे वर्षों का अन्त न होगा।

परमेश्वर के दाहिने हाथ पर पुत्र। 13 और स्वर्गदूतों में से उस ने किस से कब कहा, कि तू मेरे दाहिने बैठ, जब तक कि मैं तेरे बैरियों को तेरे पांवों के नीचे की पीढ़ी न कर दूं? 14 क्या वे सब सेवा टहल करनेवाली आत्माएं नहीं, जो उद्धार के वारिस होनेवालों के लिये सेवा करने को भेजी जाती हैं?

अध्याय 2। पहली चेतावनी। अध्याय 2:1-4। पुत्र जो कहता है उस पर ध्यान देना। इस कारण चाहिए, कि हम उन बातों पर जो हम ने सुनी हैं, और भी अधिक मन लगाएं, ऐसा न हो कि बहककर उन से दूर चले जाएं। 2 क्योंकि जो वचन स्वर्गदूतों के द्वारा कहा गया था, जब वह स्थिर रहा, और हर एक अपराध और आज्ञा न मानने का ठीक ठीक बदला मिला, 3 तो हम लोग ऐसे बड़े उद्धार की उपेक्षा करके क्योंकर बच सकते हैं? जिसकी चर्चा पहिले पहिल प्रभु के द्वारा हुई, और सुननेवालों के द्वारा हमारे लिये पक्की की गई; 4 और साथ ही परमेश्वर भी अपनी इच्छा के अनुसार चिन्हों, और अद्भुत कामों, और नाना प्रकार के सामर्थ के कामों, और पवित्र आत्मा के वरदानों के द्वारा उनके साथ गवाही देता रहा।

दूसरा खण्ड — 2। मनुष्य के रूप में यीशु स्वर्गदूतों से बढ़कर। उसकी दीनता का कारण। सब कुछ मनुष्य के आधीन किया गया, स्वर्गदूतों के नहीं। 5 उस ने उस आनेवाले जगत को, जिसकी चर्चा हम कर रहे हैं, स्वर्गदूतों के आधीन न किया। 6 वरन किसी ने कहीं यह गवाही दी है, कि मनुष्य क्या है, कि तू उसकी सुधि लेता है? या मनुष्य का पुत्र क्या है, कि तू उस पर दृष्टि करता है?

7 तू ने उसे स्वर्गदूतों से कुछ ही कम किया; तू ने उस पर महिमा और आदर का मुकुट रखा, और उसे अपने हाथों के कामों पर अधिकार दिया; 8 तू ने सब कुछ उसके पांवों के नीचे कर दिया। इसलिये जब कि उस ने सब कुछ उसके आधीन कर दिया, तो उस ने कुछ भी रख न छोड़ा, जो उसके आधीन न हो। पर हम अब तक सब कुछ उसके आधीन नहीं देखते।

मनुष्य की नियति यीशु में पूरी हुई। … मृत्यु के कारण महिमा और आदर का मुकुट पहिने हुए, ताकि परमेश्वर के अनुग्रह से वह हर एक मनुष्य के लिये मृत्यु का स्वाद चखे। यीशु की दीनता के कारण। 10 क्योंकि जिसके लिये सब कुछ है, और जिसके द्वारा सब कुछ है, उसे यही अच्छा लगा, कि जब वह बहुत से पुत्रों को महिमा में पहुंचाए, तो उनके उद्धार के कर्ता को दुख उठाने के द्वारा सिद्ध करे।

1. हमारे अगुए के रूप में उसका सिद्ध किया जाना। क्योंकि पवित्र करनेवाला और जो पवित्र किए जाते हैं, सब एक ही मूल से हैं; इसी कारण वह उन्हें भाई कहने से नहीं लजाता, और कहता है, कि मैं तेरा नाम अपने भाइयों को सुनाऊंगा, सभा के बीच में मैं तेरा भजन गाऊंगा।

13 और फिर यह, कि मैं उस पर भरोसा रखूंगा। और फिर यह, कि देख, मैं उन लड़कों सहित जिन्हें परमेश्वर ने मुझे दिया। 2. शैतान के सामर्थ से हमारा छुटकारा। 14 इसलिये जब कि लड़के मांस और लहू के भागी हैं, तो वह आप भी उसी प्रकार उनका सहभागी हो गया; ताकि मृत्यु के द्वारा उसे, जिसे मृत्यु पर शक्ति मिली थी, अर्थात शैतान को निकम्मा कर दे; 15 और जितने मृत्यु के भय के मारे जीवन भर दासत्व में फंसे थे, उन्हें छुड़ा ले।

3. कि वह एक दयालु महायाजक बने। 16 क्योंकि वह तो स्वर्गदूतों को नहीं, वरन अब्राहम के वंश को संभालता है। 17 इस कारण उसको चाहिए था, कि सब बातों में अपने भाइयों के समान बने; जिस से वह उन बातों में जो परमेश्वर से सम्बन्ध रखती हैं, एक दयालु और विश्वासयोग्य महायाजक बने, ताकि लोगों के पापों के लिये प्रायश्चित करे।

18 क्योंकि जब उस ने परीक्षा की दशा में आप दुख उठाया, तो वह उनकी भी सहायता कर सकता है, जिनकी परीक्षा होती है। अध्याय 3। तीसरा खण्ड — 3। मसीह यीशु मूसा से बढ़कर। मसीह मूसा के समान विश्वासयोग्य। सो हे पवित्र भाइयो, तुम जो स्वर्गीय बुलाहट में भागी हो, हमारे अंगीकार के प्रेरित और महायाजक, अर्थात यीशु पर ध्यान करो; 2 जो अपने नियुक्त करनेवाले के लिये विश्वासयोग्य था, जैसा मूसा भी उसके सारे घर में था।

मसीह पुत्र, मूसा सेवक से बढ़कर। 3 क्योंकि वह मूसा से इतना बढ़कर महिमा के योग्य गिना गया है, जितना कि घर का बनानेवाला घर से बढ़कर आदर रखता है। 4 क्योंकि हर एक घर का कोई न कोई बनानेवाला होता है, पर जिस ने सब कुछ बनाया वह परमेश्वर है। 5 और मूसा तो विश्वासयोग्य रहा

उसके सारे घर में सेवक की नाईं, कि जिन बातों का वर्णन आगे होनेवाला था, उनकी गवाही दे; 6 पर मसीह पुत्र की नाईं उसके घर का अधिकारी है; और उसका घर हम हैं, यदि हम अपने हियाव को, और

अपनी आशा के घमण्ड को अन्त तक दृढ़ता से थामे रहें। दूसरी चेतावनी। अध्याय 3:7–4:13। प्रतिज्ञा किए हुए विश्राम से वंचित न रह जाना। इस्राएल कैसे चूक गया। 7 सो जैसा पवित्र आत्मा कहता है, कि यदि आज तुम उसका शब्द सुनो, 8 तो अपने मन को कठोर न करो, जैसा कि क्रोध दिलाने के समय, और परीक्षा के दिन जंगल में किया था, 9 जहां तुम्हारे बापदादों ने मुझे जांचकर परखा, और चालीस वर्ष तक मेरे काम देखे।

10 इस कारण मैं उस समय के लोगों से रूठा रहा, और कहा, कि इनके मन सदा भटकते रहते हैं, और इन्होंने मेरे मार्गों को नहीं पहिचाना; 11 तब मैं ने क्रोध में आकर शपथ खाई, कि वे मेरे विश्राम में प्रवेश करने न पाएंगे। स्थिर बने रहने की आवश्यकता। 12 हे भाइयो, चौकस रहो, कि तुम में से किसी में अविश्वास का ऐसा बुरा मन न हो, जो जीवते परमेश्वर से दूर हट जाने में प्रगट हो। 13 वरन जब तक आज का दिन कहा जाता है, हर दिन एक दूसरे को समझाते रहो, ऐसा न हो, कि तुम में से कोई जन पाप के छल में आकर कठोर हो जाए। 14 क्योंकि हम मसीह के भागी हुए हैं, यदि हम अपने आरम्भ के भरोसे को अन्त तक दृढ़ता से थामे रहें; 15 जैसा कहा जाता है, कि यदि आज तुम उसका शब्द सुनो, तो अपने मनों को कठोर न करो, जैसा कि क्रोध दिलाने के समय किया था।

इस्राएल का अविश्वास और आज्ञा न मानना। 16 भला किन लोगों ने सुनकर क्रोध दिलाया? क्या उन सब ने नहीं, जो मूसा के द्वारा मिस्र से निकले थे? 17 और वह चालीस वर्ष तक किन लोगों से रूठा रहा? क्या उन्हीं से नहीं, जिन्होंने पाप किया, और जिनकी लोथें जंगल में पड़ी रहीं?

18 और उस ने किन से शपथ खाई, कि वे मेरे विश्राम में प्रवेश करने न पाएंगे, केवल उन से जिन्होंने आज्ञा न मानी? 19 सो हम देखते हैं, कि वे अविश्वास के कारण प्रवेश न कर सके। अध्याय 4। विश्वास के द्वारा हम विश्राम में प्रवेश करते हैं। इसलिये जब कि उसके विश्राम में प्रवेश करने की प्रतिज्ञा अब तक छोड़ी गई है, तो हमें डरना चाहिए, ऐसा न हो, कि तुम में से कोई जन उस से रहित जान पड़े।

2 क्योंकि हमें उन्हीं की नाईं सुसमाचार सुनाया गया है; पर सुने हुए वचन से उन्हें कुछ लाभ न हुआ, क्योंकि वे सुननेवालों के साथ विश्वास के द्वारा एक न हुए। 3 और हम जिन्होंने विश्वास किया है, उस विश्राम में प्रवेश करते हैं; जैसा उस ने कहा, कि मैं ने अपने क्रोध में शपथ खाई, कि वे मेरे विश्राम में प्रवेश करने न पाएंगे; यद्यपि जगत की उत्पत्ति के समय से उसके काम पूरे हो चुके थे।

यहोशू लोगों को परमेश्वर के विश्राम में नहीं ले गया। 4 क्योंकि सातवें दिन के विषय में उस ने कहीं यों कहा है, कि परमेश्वर ने सातवें दिन अपने सब कामों से विश्राम किया; 5 और इस जगह फिर यह कहता है, कि वे मेरे विश्राम में प्रवेश न करने पाएंगे।

6 तो जब यह बात बाकी है, कि कितने और हैं जो उस विश्राम में प्रवेश करें, और जिन्हें उसका सुसमाचार पहिले सुनाया गया, उन्होंने आज्ञा न मानने के कारण उस में प्रवेश न किया, दूसरी चेतावनी (जारी)। 8 और यदि यहोशू उन्हें विश्राम में प्रवेश करा लेता, तो उसके बाद दूसरे दिन की चर्चा न होती।

9 सो परमेश्वर के लोगों के लिये सब्त का विश्राम बाकी है। आओ, हम विश्राम में प्रवेश करें। 10 क्योंकि जिस ने उसके विश्राम में प्रवेश किया है, उस ने भी परमेश्वर की नाईं अपने कामों से विश्राम किया है। 11 सो हम उस विश्राम में प्रवेश करने का प्रयत्न करें, ऐसा न हो, कि कोई जन उन्हीं की नाईं आज्ञा न मानकर गिर पड़े।

हमारा न्याय करने में परमेश्वर के वचन की सामर्थ। 12 क्योंकि परमेश्वर का वचन जीवित, और प्रबल, और हर एक दोधारी तलवार से भी बहुत चोखा है, और जीव, और आत्मा को, और गांठ गांठ, और गूदे गूदे को अलग करके, वार पार छेदता है; और मन की भावनाओं और विचारों को जांचता है।

13 और सृष्टि की कोई वस्तु उस से छिपी नहीं है, वरन जिस से हमें काम है, उसकी आंखों के साम्हने सब वस्तुएं खुली और बेपरदा हैं। चौथा खण्ड — 4। यीशु हमारा महायाजक, हारून से बढ़कर। … जो हमारी निर्बलताओं में हमारे साथ दुखी न हो सके; वरन वह सब बातों में हमारी नाईं परखा तो गया, तौभी निष्पाप निकला।

16 इसलिये आओ, हम अनुग्रह के सिंहासन के निकट हियाव बान्धकर आएं, कि हम पर दया हो, और वह अनुग्रह पाएं, जो आवश्यकता के समय हमारी सहायता करे। यीशु, महान और सहानुभूति रखनेवाला महायाजक। सो जब हमारा ऐसा बड़ा महायाजक है, जो स्वर्गों से होकर गया है, अर्थात परमेश्वर का पुत्र यीशु, तो आओ, हम अपने अंगीकार को दृढ़ता से थामे रहें।

15 क्योंकि हमारा ऐसा महायाजक नहीं, अध्याय 5। महायाजक में करुणा होनी चाहिए। क्योंकि हर एक महायाजक मनुष्यों में से लिया जाता है, और मनुष्यों ही के लिये उन बातों के विषय में जो परमेश्वर से सम्बन्ध रखती हैं, ठहराया जाता है, कि भेंट और पापों के लिये बलिदान दोनों चढ़ाया करे; 2 और वह अज्ञानियों और भूले भटकों के साथ नर्मी से व्यवहार कर सकता है, इसलिये कि वह आप भी निर्बलता से घिरा है; 3 और इसी कारण उसे चाहिए, कि जैसे लोगों के लिये, वैसे ही अपने लिये भी पापों के लिये बलिदान चढ़ाया करे।

महायाजक परमेश्वर की ओर से ठहराया जाना चाहिए। 4 और यह आदर का पद कोई अपने आप से नहीं लेता, परन्तु जब परमेश्वर की ओर से बुलाया जाता है, जैसा हारून बुलाया गया था। 5 वैसे ही मसीह ने भी महायाजक बनने की बड़ाई अपने आप से नहीं ली, पर उसी ने दी, जिस ने उस से कहा था, कि तू मेरा पुत्र है, आज मैं ही ने तुझे जन्माया है; 6 जैसा वह दूसरी जगह में भी कहता है, तू मलिकिसिदक की रीति पर सदा के लिये याजक है।

आज्ञाकारिता के द्वारा सिद्ध किया गया हमारा महायाजक यीशु। 7 उस ने अपनी देह में रहने के दिनों में ऊंचे शब्द से पुकार पुकारकर, और आंसू बहा बहाकर उस से जो उसको मृत्यु से बचा सकता था, प्रार्थनाएं और बिनती कीं, और भक्तिपूर्ण भय के कारण उसकी सुनी गई; 8 और पुत्र होने पर भी, उस ने दुख उठा उठाकर आज्ञा माननी सीखी; 9 और सिद्ध बनकर, अपने सब आज्ञा माननेवालों के लिये अनन्त उद्धार का कर्ता हो गया; 10 और परमेश्वर की ओर से मलिकिसिदक की रीति पर महायाजक कहलाया।

तीसरी चेतावनी। अध्याय 5:11–6:20। आलस्य और धर्मत्याग के विरुद्ध। आलसी और सिद्ध के बीच का अन्तर। 11 इसके विषय में हमें बहुत सी बातें कहनी हैं, जिनका समझाना भी कठिन है; इसलिये कि तुम ऊंचा सुनने लगे हो।

12 क्योंकि समय के विचार से तो तुम्हें गुरु हो जाना चाहिए था, पर तुम्हें फिर इस बात की आवश्यकता है, कि कोई तुम्हें परमेश्वर के वचनों के आदि सिद्धान्तों की प्रारम्भिक बातें सिखाए; और तुम ऐसे हो गए हो, कि तुम्हें अन्न नहीं, दूध की आवश्यकता है।

13 क्योंकि जो दूध ही पीता है, उसे धार्मिकता के वचन का अनुभव नहीं होता, क्योंकि वह बालक है। 14 पर अन्न सयानों के लिये है, अर्थात उनके लिये जिनकी ज्ञानेन्द्रियां अभ्यास करते करते, भले बुरे में भेद करने के लिये पक्की हो गई हैं।

अध्याय 6। सिद्धता की ओर आगे बढ़ने की आवश्यकता। इसलिये आओ, मसीह के विषय की आरम्भ की बातों की चर्चा छोड़कर, हम सिद्धता की ओर आगे बढ़ते जाएं; और मरे हुए कामों से मन फिराने, और परमेश्वर पर विश्वास करने की नेव फिर से न डालें, 2 अर्थात बपतिस्मों की शिक्षा, और हाथ रखने, और मरे हुओं के जी उठने, और अनन्त न्याय की नेव।

3 और यदि परमेश्वर चाहे, तो हम यही करेंगे। धर्मत्यागी के लिये कोई आशा नहीं। 4 क्योंकि जिन्होंने एक बार ज्योति पाई है, और जो स्वर्गीय वरदान का स्वाद चख चुके हैं, और पवित्र आत्मा के भागी हो गए हैं, 5 और परमेश्वर के उत्तम वचन का और आनेवाले युग की सामर्थों का स्वाद चख चुके हैं, 6 और फिर भटककर गिर गए, उन्हें मन फिराव के लिये फिर नया बनाना अनहोना है; क्योंकि वे परमेश्वर के पुत्र को अपने लिये फिर से क्रूस पर चढ़ाते हैं, और प्रगट में उस पर कलंक लगाते हैं। 7 क्योंकि जो भूमि वर्षा के पानी को, जो उस पर बार बार पड़ता है, पी पीकर जिन लोगों के लिये वह जोती-बोई जाती है, उनके काम का साग-पात उपजाती है, वह परमेश्वर से आशीष पाती है; 8 पर यदि वह झाड़ी और ऊंटकटारे उगाती है, तो निकम्मी ठहरती है, और शाप के निकट है, और उसका अन्त जलाया जाना है।

स्थिर बने रहने के लिये प्रोत्साहन। 9 पर हे प्रियो, यद्यपि हम ये बातें कहते हैं, तौभी तुम्हारे विषय में हम इस से अच्छी और उद्धारवाली बातों का भरोसा करते हैं। 10 क्योंकि परमेश्वर अन्यायी नहीं, कि तुम्हारे काम, और उस प्रेम को भूल जाए, जो तुम ने उसके नाम के लिये इस रीति से दिखाया, कि पवित्र लोगों की सेवा की, और अब भी कर रहे हो।

11 पर हम बहुत चाहते हैं, कि तुम में से हर एक जन अन्त तक आशा की परिपूर्णता के लिये ऐसा ही प्रयत्न करता रहे; 12 ताकि तुम आलसी न हो जाओ, वरन उनका अनुकरण करो, जो विश्वास और धीरज के द्वारा प्रतिज्ञाओं के वारिस होते हैं। परमेश्वर की विश्वासयोग्यता में हमारी आशा।

13 क्योंकि जब परमेश्वर ने अब्राहम को प्रतिज्ञा दी, तो इसलिये कि शपथ खाने के लिये उसे अपने से बड़ा कोई न मिला, उस ने अपनी ही शपथ खाई, 14 और कहा, कि मैं सचमुच तुझे बहुत आशीष दूंगा, और तुझे बहुत बढ़ाऊंगा। तीसरी चेतावनी (जारी)। 15 और इस रीति से उस ने धीरज धरकर प्रतिज्ञा की हुई बात प्राप्त की। 16 मनुष्य तो अपने से किसी बड़े की शपथ खाया करते हैं, और उनके हर एक विवाद का अन्त शपथ से पक्का होता है।

17 इसलिये जब परमेश्वर ने प्रतिज्ञा के वारिसों पर और भी साफ रीति से प्रगट करना चाहा, कि उसकी मनसा बदल नहीं सकती, तो शपथ को बीच में लाया; 18 ताकि दो बे-बदल बातों के द्वारा, जिनके विषय में परमेश्वर का झूठा ठहरना अनहोना है, हमें दृढ़ प्रोत्साहन मिले, जो शरण लेने को इसलिये दौड़े हैं, कि उस आशा को जो साम्हने रखी हुई है, थाम लें; 19 वह आशा हमारे प्राण के लिये ऐसा लंगर है, जो स्थिर और दृढ़ है, और परदे के भीतर तक पहुंचता है; जहां यीशु अगुआ होकर हमारे लिये प्रवेश कर गया है, और मलिकिसिदक की रीति पर सदा काल का महायाजक बना है।

अध्याय 7। पाँचवाँ खण्ड। मलिकिसिदक की रीति पर नया याजकपद। मलिकिसिदक परमेश्वर के पुत्र के स्वरूप ठहराया गया। क्योंकि यह मलिकिसिदक, शालेम का राजा, और परमप्रधान परमेश्वर का याजक, जो राजाओं को मारकर लौटते समय अब्राहम से मिला, और उसे आशीष दी; 2 जिसे अब्राहम ने सब वस्तुओं का दसवां अंश भी दिया (यह पहिले तो अपने नाम के अर्थ के अनुसार धार्मिकता का राजा, और फिर शालेम का राजा, अर्थात मेल का राजा है; 3 जिसका न पिता, न माता, न वंशावली है, जिसके न दिनों का आदि है, और न जीवन का अन्त है; परन्तु परमेश्वर के पुत्र के स्वरूप ठहरा), वह सदा के लिये याजक बना रहता है।

मलिकिसिदक अब्राहम से बढ़कर। 4 अब इस पर ध्यान करो, कि यह कैसा महान था, जिसको कुलपति अब्राहम ने लूट के अच्छे से अच्छे माल का दसवां अंश दिया। 5 और लेवी की सन्तान में से जो याजक का पद पाते हैं, उन्हें आज्ञा मिली है, कि लोगों से, अर्थात अपने भाइयों से, चाहे वे अब्राहम ही की देह से क्यों न जन्मे हों, व्यवस्था के अनुसार दसवां अंश लें; 6 पर इस ने, जिसकी वंशावली उन में से नहीं गिनी जाती, अब्राहम से दसवां अंश लिया, और जिसे प्रतिज्ञाएं मिली थीं, उसे आशीष दी।

7 और इस में कुछ भी सन्देह नहीं, कि छोटा बड़े से आशीष पाता है। मलिकिसिदक लेवी से बढ़कर। 8 और यहां तो मरनहार मनुष्य दसवां अंश लेते हैं, पर वहां वह लेता है, जिसकी गवाही दी जाती है, कि वह जीवित है। 9 तो हम यह भी कह सकते हैं, कि लेवी ने भी, जो दसवां अंश लेता है, अब्राहम के द्वारा दसवां अंश दिया; 10 क्योंकि जिस समय मलिकिसिदक ने उसके पिता से भेंट की, उस समय यह अपने पिता की देह में था।

नया याजकपद हारून की रीति को अलग कर देता है। 11 तब यदि लेवीय याजकपद के द्वारा सिद्धता हो सकती थी (जिसके आधीन लोगों को व्यवस्था मिली थी), तो फिर क्या आवश्यकता थी, कि दूसरा याजक मलिकिसिदक की रीति पर खड़ा हो, और हारून की रीति का न गिना जाए?

12 क्योंकि जब याजकपद बदला जाता है, तो व्यवस्था का भी बदलना अवश्य है। 13 क्योंकि जिसके विषय में ये बातें कही जाती हैं, वह दूसरे गोत्र का है, जिस में से किसी ने वेदी की सेवा नहीं की। 14 क्योंकि प्रगट है, कि हमारा प्रभु यहूदा में से उदय हुआ है; और इस गोत्र के विषय में मूसा ने याजकों की कुछ चर्चा नहीं की।

अविनाशी जीवन की सामर्थ के अनुसार नया याजकपद। 15 और जो हम कहते हैं वह और भी अधिक स्पष्ट है, यदि मलिकिसिदक के समान एक और याजक उत्पन्न होता है, 16 जो शारीरिक आज्ञा की व्यवस्था के अनुसार नहीं, पर अविनाशी जीवन की सामर्थ के अनुसार ठहराया गया है; 17 क्योंकि उसके विषय में यह गवाही दी गई है, कि तू मलिकिसिदक की रीति पर युगानुयुग याजक है।

क्योंकि पहिली आज्ञा अपनी निर्बलता और निष्फलता के कारण लोप हो जाती है (इसलिये कि व्यवस्था ने किसी बात को सिद्ध नहीं किया), और उसके स्थान पर एक ऐसी उत्तम आशा रखी जाती है, जिसके द्वारा हम परमेश्वर के निकट आते हैं। परमेश्वर की शपथ के द्वारा ठहराया गया नया याजकपद।

20 और जितना यह बिना शपथ के नहीं हुआ, 21 (क्योंकि वे तो बिना शपथ याजक ठहराए गए, पर यह शपथ के साथ उसकी ओर से ठहराया गया, जिस ने इसके विषय में कहा, कि प्रभु ने शपथ खाई, और वह उस से फिर न पछताएगा, कि तू युगानुयुग याजक है), 22 उतना ही यीशु एक उत्तम वाचा का जामिन ठहरा।

अनन्त याजकपद होने के कारण यह पूरा उद्धार देता है। 23 और वे तो बहुत से याजक बनते आए, इसका कारण यह था, कि मृत्यु उन्हें बने रहने नहीं देती थी; 24 पर यह युगानुयुग बना रहता है, इस कारण उसका याजकपद अटल है।

25 इसी लिये जो उसके द्वारा परमेश्वर के निकट आते हैं, वह उनका पूरा पूरा उद्धार कर सकता है, क्योंकि वह उनके लिये बिनती करने को सर्वदा जीवित है। पुत्र, हमारा महायाजक, सदा के लिये सिद्ध किया गया। 26 सो ऐसा ही महायाजक हमारे योग्य था, जो पवित्र, और निष्कपट, और निर्मल, और पापियों से अलग, और स्वर्ग से भी ऊंचा किया हुआ हो; 27 जिसे उन महायाजकों की नाईं प्रतिदिन यह आवश्यक नहीं, कि पहिले अपने पापों और फिर लोगों के पापों के लिये बलिदान चढ़ाए; क्योंकि यह उस ने एक ही बार सदा के लिये किया, जब अपने आप को बलिदान चढ़ाया। 28 क्योंकि व्यवस्था तो निर्बल मनुष्यों को महायाजक नियुक्त करती है; परन्तु उस शपथ का वचन, जो व्यवस्था के बाद खाई गई, उस पुत्र को नियुक्त करता है, जो युगानुयुग के लिये सिद्ध किया गया है।

अध्याय 8। छठा खण्ड — 8। नया पवित्रस्थान और नई वाचा। सिंहासन पर विराजमान महायाजक। अब जो बातें हम कह रहे हैं, उन में से मुख्य बात यह है, कि हमारा ऐसा महायाजक है, जो स्वर्ग में महामहिमन के सिंहासन के दाहिने जा बैठा; सच्चे पवित्रस्थान का सेवक।

2 अर्थात पवित्रस्थान और उस सच्चे तम्बू का सेवक, जिसे किसी मनुष्य ने नहीं, वरन प्रभु ने खड़ा किया था। 3 क्योंकि हर एक महायाजक भेंट और बलिदान दोनों चढ़ाने के लिये ठहराया जाता है; इस कारण अवश्य है, कि इसके पास भी कुछ चढ़ाने के लिये हो।

4 और यदि वह पृथ्वी पर होता, तो कभी याजक न होता, इसलिये कि व्यवस्था के अनुसार भेंट चढ़ानेवाले तो हैं; 5 जो स्वर्ग में की वस्तुओं की नकल और छाया की सेवा करते हैं, जैसे जब मूसा तम्बू बनाने पर था, तो उसे परमेश्वर से यह चितावनी मिली, कि देख, जो नमूना तुझे पहाड़ पर दिखाया गया था, उसके अनुसार सब कुछ बनाना।

नई वाचा का मध्यस्थ। 6 पर अब उस ने उतनी ही अधिक उत्तम सेवकाई पाई है, जितना वह एक उत्तम वाचा का मध्यस्थ भी है, जो और उत्तम प्रतिज्ञाओं के सहारे बान्धी गई है। 7 क्योंकि यदि वह पहिली वाचा निर्दोष होती, तो दूसरी के लिये अवसर न ढूंढ़ा जाता।

8 पर वह उन पर दोष लगाकर कहता है, कि प्रभु कहता है, देखो, वे दिन आते हैं, कि मैं इस्राएल के घराने के साथ, और यहूदा के घराने के साथ, नई वाचा बान्धूंगा; 9 यह उस वाचा के समान न होगी, जो मैं ने उनके बापदादों के साथ उस समय बान्धी थी, जब मैं उनका हाथ पकड़कर उन्हें मिस्र देश से निकाल लाया; क्योंकि वे मेरी वाचा पर स्थिर न रहे, और मैं ने उनकी सुधि न ली; प्रभु यही कहता है।

नई वाचा की आशीषें। 10 फिर प्रभु कहता है, कि जो वाचा मैं उन दिनों के बाद इस्राएल के घराने के साथ बान्धूंगा, वह यह है, कि मैं अपनी व्यवस्था को उनके मनों में डालूंगा, और उसे उनके हृदय पर भी लिखूंगा; और मैं उनका परमेश्वर ठहरूंगा, और वे मेरे लोग ठहरेंगे। 11 और हर एक अपने देशवाले को, और अपने भाई को यह शिक्षा न देगा, कि तू प्रभु को पहिचान; क्योंकि छोटे से बड़े तक सब मुझे जान लेंगे।

12 क्योंकि मैं उनके अधर्म के विषय में दयावन्त होऊंगा, और उनके पापों को फिर स्मरण न करूंगा। 13 नई वाचा के कहने से, उस ने पहिली वाचा को पुरानी ठहराया; और जो वस्तु पुरानी और जीर्ण हो जाती है, वह मिट जाने के निकट है।

अध्याय 9। सातवाँ खण्ड — 9। नए पवित्रस्थान और नई वाचा की स्थापना के लिये यीशु के लहू की सामर्थ। पवित्रस्थान और परमपवित्र स्थान। निदान, उस पहिली वाचा में भी सेवा के नियम थे, और उसका पवित्रस्थान था — ऐसा पवित्रस्थान जो इस जगत का था।

2 अर्थात एक तम्बू बनाया गया, पहिला, जिस में दीवट, और मेज, और भेंट की रोटियां थीं; और वह पवित्रस्थान कहलाता है। 3 और दूसरे परदे के पीछे वह तम्बू था, जो परमपवित्र स्थान कहलाता है; 4 उस में सोने की धूपदानी, और चारों ओर सोने से मढ़ा हुआ वाचा का सन्दूक था, और इस में मन्ना से भरा हुआ सोने का मर्तबान, और हारून की छड़ी जिस में फूल फल आ गए थे, और वाचा की पटियां थीं; 5 और उसके ऊपर महिमा के करूब थे, जो प्रायश्चित के ढकने पर छाया किए हुए थे; इन्हीं का एक एक करके वर्णन करने का अभी अवसर नहीं है।

परमपवित्र स्थान का मार्ग अब तक खुला न था। 6 ये वस्तुएं इस रीति से तैयार हो चुकीं, तो उस पहिले तम्बू में याजक हर समय प्रवेश करके सेवा के काम पूरे करते हैं; 7 पर दूसरे में केवल महायाजक वर्ष भर में एक ही बार जाता है, और बिना लहू लिये नहीं जाता, जिसे वह अपने लिये और लोगों की भूल चूक के लिये चढ़ाता है। 8 इस से पवित्र आत्मा यही दिखाता है, कि जब तक पहिला तम्बू खड़ा है, तब तक पवित्रस्थान का मार्ग प्रगट नहीं हुआ; 9 और यह तम्बू तो वर्तमान समय के लिये एक दृष्टान्त है, जिसके अनुसार ऐसी भेंट और बलिदान चढ़ाए जाते हैं, जो विवेक के विषय में आराधना करनेवाले को सिद्ध नहीं कर सकते। मसीह अपने ही लहू के द्वारा परमपवित्र स्थान को खोलता है।

11 परन्तु जब मसीह आनेवाली अच्छी अच्छी वस्तुओं का महायाजक होकर आया, तो उस ने और भी बड़े और सिद्ध तम्बू से होकर, जो हाथ का बनाया हुआ नहीं, अर्थात इस सृष्टि का नहीं, 12 और बकरों और बछड़ों के लहू के द्वारा नहीं, पर अपने ही लहू के द्वारा एक ही बार सदा के लिये पवित्रस्थान में प्रवेश किया, और अनन्त छुटकारा प्राप्त किया।

हमारे विवेक को शुद्ध करनेवाला लहू। 13 क्योंकि जब बकरों और बैलों का लहू, और कलोर की राख अशुद्ध लोगों पर छिड़की जाकर शरीर की शुद्धता के लिये पवित्र करती है, 14 तो मसीह का लहू, जिस ने अपने आप को सनातन आत्मा के द्वारा परमेश्वर के साम्हने निर्दोष चढ़ाया, तुम्हारे विवेक को मरे हुए कामों से कितना अधिक शुद्ध करेगा, ताकि तुम जीवते परमेश्वर की सेवा करो?

नई वाचा के मध्यस्थ की मृत्यु। 15 और इसी कारण वह नई वाचा का मध्यस्थ है, ताकि उस मृत्यु के द्वारा जो पहिली वाचा के समय के अपराधों से छुटकारा पाने के लिये हुई है, बुलाए हुए लोग अनन्त मीरास की प्रतिज्ञा को प्राप्त करें।

16 क्योंकि जहां वसीयत है, वहां वसीयत करनेवाले की मृत्यु का होना भी अवश्य है। 17 क्योंकि ऐसी वसीयत मृत्यु होने पर ही पक्की होती है; क्योंकि जब तक वसीयत करनेवाला जीवित रहता है, तब तक क्या वह कभी काम की होती है? पहिली वाचा लहू के साथ स्थापित हुई।

18 इसी लिये पहिली वाचा भी बिना लहू के नहीं बान्धी गई। 19 क्योंकि जब मूसा सब लोगों को व्यवस्था के अनुसार हर एक आज्ञा सुना चुका, तो उस ने बछड़ों और बकरों का लहू लेकर, पानी और लाल ऊन और जूफा के साथ, उस पुस्तक पर और सब लोगों पर छिड़क दिया, 20 और कहा, कि यह उस वाचा का लहू है, जिसकी आज्ञा परमेश्वर ने तुम्हारे लिये दी है।

21 और इसी रीति से उस ने तम्बू और सेवा के सारे सामान पर लहू छिड़का। 22 और व्यवस्था के अनुसार, मैं कह सकता हूं, कि प्रायः सब वस्तुएं लहू के द्वारा शुद्ध की जाती हैं; और बिना लहू बहाए पापमोचन नहीं होता।

उत्तम बलिदान ने स्वयं स्वर्ग को खोल दिया है। 23 इसलिये अवश्य था, कि स्वर्ग में की वस्तुओं के प्रतिरूप इनके द्वारा शुद्ध किए जाएं; पर स्वर्ग में की वस्तुएं आप इन से उत्तम बलिदानों के द्वारा।

24 क्योंकि मसीह ने उस हाथ के बनाए हुए पवित्रस्थान में, जो सच्चे का प्रतिरूप है, प्रवेश नहीं किया, पर स्वर्ग ही में प्रवेश किया, ताकि हमारे लिये अब परमेश्वर के साम्हने दिखाई दे। पाप को दूर करने के लिये मसीह एक बार बलिदान हुआ। 25 यह नहीं कि वह अपने आप को बार बार चढ़ाए, जैसा कि महायाजक प्रति वर्ष दूसरे का लहू लिये पवित्रस्थान में प्रवेश किया करता है; 26 नहीं तो जगत की उत्पत्ति से लेकर उसको बार बार दुख उठाना पड़ता; पर अब युगों के अन्त में वह एक बार प्रगट हुआ है, ताकि अपने ही बलिदान के द्वारा पाप को दूर कर दे।

27 और जैसे मनुष्यों के लिये एक बार मरना और उसके बाद न्याय का होना नियुक्त है, 28 वैसे ही मसीह भी बहुतों के पापों को उठा लेने के लिये एक बार बलिदान हुआ; और जो लोग उसकी बाट जोहते हैं, उनके उद्धार के लिये दूसरी बार बिना पाप के दिखाई देगा।

अध्याय 10। आठवाँ खण्ड — 10। मसीह के बलिदान का असीम मूल्य। व्यवस्था आनेवाली अच्छी वस्तुओं की केवल छाया है। क्योंकि व्यवस्था, जिस में आनेवाली अच्छी वस्तुओं की छाया है, पर उन वस्तुओं का असली स्वरूप नहीं, इसलिये उन एक ही प्रकार के बलिदानों के द्वारा, जो प्रति वर्ष लगातार चढ़ाए जाते हैं, निकट आनेवालों को कभी सिद्ध नहीं कर सकती।

2 नहीं तो क्या उनका चढ़ाया जाना बन्द न हो जाता, इसलिये कि आराधना करनेवाले एक ही बार शुद्ध हो जाने पर फिर पापों का बोध न रखते? 3 परन्तु उन बलिदानों के द्वारा प्रति वर्ष पापों का स्मरण हुआ करता है। 4 क्योंकि अनहोना है, कि बैलों और बकरों का लहू पापों को दूर करे।

परमेश्वर की इच्छा का पूरा किया जाना — मसीह के बलिदान का मूल्य। 5 इसी कारण वह जगत में आते समय कहता है, कि बलिदान और भेंट तू ने न चाही, पर मेरे लिये एक देह तैयार की; 6 होम-बलियों और पाप-बलियों से तू प्रसन्न नहीं हुआ। 7 तब मैं ने कहा, देख, मैं आ गया हूं, (पुस्तक की पोथी में मेरे विषय में लिखा हुआ है) ताकि हे परमेश्वर, तेरी इच्छा पूरी करूं। 8 ऊपर तो वह कहता है, कि बलिदान और भेंट और होम-बलियां और पाप-बलियां न तू ने चाहीं, और न उन से प्रसन्न हुआ (यद्यपि ये व्यवस्था के अनुसार चढ़ाई जाती हैं), 9 फिर उस ने कहा है, कि देख, मैं आ गया हूं, ताकि तेरी इच्छा पूरी करूं। निदान वह पहिले को उठा देता है, ताकि दूसरे को स्थापित करे।

10 उसी इच्छा से हम यीशु मसीह की देह के एक ही बार सदा के लिये बलिदान चढ़ाए जाने के द्वारा पवित्र किए गए हैं। एक ही बलिदान सदा के लिये सिद्ध करता है। 11 और हर एक याजक तो खड़े होकर प्रतिदिन सेवा करता है, और वे ही बलिदान बार बार चढ़ाता है, जो पापों को कभी भी दूर नहीं कर सकते; 12 पर यह व्यक्ति तो पापों के लिये एक ही बलिदान सर्वदा के लिये चढ़ाकर परमेश्वर के दाहिने जा बैठा; 13 और उसी समय से इसकी बाट जोह रहा है, कि उसके बैरी उसके पांवों के नीचे की पीढ़ी बनें।

14 क्योंकि उस ने एक ही चढ़ावे के द्वारा उन्हें जो पवित्र किए जाते हैं, सर्वदा के लिये सिद्ध कर दिया है। 15 और पवित्र आत्मा भी हमें यही गवाही देता है; क्योंकि उस ने पहिले कहा था, 16 कि प्रभु कहता है, जो वाचा मैं उन दिनों के बाद उन से बान्धूंगा, वह यह है, कि मैं अपनी व्यवस्था को उनके हृदय पर डालूंगा, और उनके मन पर भी उसे लिखूंगा; तब वह कहता है, 17 और उनके पापों को, और उनके अधर्म के कामों को मैं फिर कभी स्मरण न करूंगा।

18 और जहां इनका पापमोचन हो गया है, वहां पाप के लिये फिर कोई चढ़ावा नहीं रहता। दूसरा आधा भाग — व्यावहारिक। — अध्याय 10:19–13:25। उस महान उद्धार की सामर्थ में जीवन के विषय में। नौवाँ खण्ड — 10। नई आराधना। परमपवित्र स्थान में प्रवेश करने के विषय में।

19 सो हे भाइयो, जब कि हमें यीशु के लहू के द्वारा उस पवित्रस्थान में प्रवेश करने का हियाव हो गया है, 20 उस नए और जीवते मार्ग से, जो उस ने परदे, अर्थात अपने शरीर में से होकर, हमारे लिये स्थापित किया है; 21 और इसलिये कि हमारा ऐसा महान याजक है, जो परमेश्वर के घर का अधिकारी है; 22 तो आओ, हम सच्चे मन और पूरे विश्वास के साथ, और अपने हृदयों पर छिड़काव पाकर बुरे विवेक से शुद्ध होकर, और देह को शुद्ध जल से धुलवाकर, निकट आएं। परमपवित्र स्थान में हमारे जीवन के विषय में।

23 और अपनी आशा के अंगीकार को दृढ़ता से थामे रहें, कि वह डगमगाए नहीं; क्योंकि जिस ने प्रतिज्ञा की है, वह विश्वासयोग्य है; 24 और प्रेम और भले कामों में उस्काने के लिये एक दूसरे की चिन्ता किया करें; 25 और एक दूसरे के साथ इकट्ठा होना न छोड़ें, जैसे कि कितनों की रीति है, पर एक दूसरे को समझाते रहें; और ज्यों ज्यों उस दिन को निकट आते देखो, त्यों त्यों और भी अधिक यह किया करो।

चौथी चेतावनी। अध्याय 10:26-39। जान बूझकर पाप करने और पीछे हटने के विरुद्ध। जान बूझकर पाप करने का भयानक खतरा। 26 क्योंकि सच्चाई की पहिचान प्राप्त करने के बाद यदि हम जान बूझकर पाप करते रहें, तो पापों के लिये फिर कोई बलिदान बाकी नहीं, 27 पर दण्ड की एक भयानक बाट जोहना, और आग का ज्वलन बाकी है, जो विरोधियों को भस्म कर देगा।

28 जब कि मूसा की व्यवस्था का न माननेवाला दो या तीन जनों की गवाही पर, बिना दया के मार डाला जाता है, 29 तो सोच लो, कि वह कितने और भी भारी दण्ड के योग्य ठहरेगा, जिस ने परमेश्वर के पुत्र को पांवों से रौंदा, और वाचा के लहू को, जिसके द्वारा वह पवित्र ठहराया गया था, अपवित्र जाना है, और अनुग्रह के आत्मा का अपमान किया?

30 क्योंकि हम उसे जानते हैं, जिस ने कहा, कि पलटा लेना मेरा काम है, मैं ही बदला दूंगा: और फिर यह, कि प्रभु अपने लोगों का न्याय करेगा। जीवते परमेश्वर के हाथों में पड़ना भयानक बात है। हियाव और धीरज के लिये उपदेश।

32 परन्तु उन पहिले दिनों को स्मरण करो, जिन में तुम ज्योति पाकर दुखों के बड़े संघर्ष में स्थिर रहे; 33 कुछ तो यों, कि तुम निन्दा और क्लेश सहते हुए तमाशा बने; और कुछ यों, कि तुम उनके साझी हुए जिनकी ऐसी दुर्दशा की जाती थी।

चौथी चेतावनी (जारी)। 34 क्योंकि तुम कैदियों के दुख में भी दुखी हुए, और अपनी संपत्ति भी आनन्द से लुटने दी; यह जानकर, कि तुम्हारे पास एक और भी उत्तम और सर्वदा ठहरनेवाली संपत्ति है। 35 सो अपना हियाव न छोड़ो, क्योंकि उसका प्रतिफल बड़ा है।

36 क्योंकि तुम्हें धीरज धरना अवश्य है, ताकि परमेश्वर की इच्छा को पूरी करके तुम प्रतिज्ञा का फल पाओ। विश्वास करने और पीछे न हटने के लिये उपदेश। 37 क्योंकि अब बहुत ही थोड़ा समय रह गया है, जब कि आनेवाला आएगा, और देर न करेगा। 38 और मेरा धर्मी जन विश्वास से जीवित रहेगा; और यदि वह पीछे हट जाए, तो मेरा मन उस से प्रसन्न न होगा।

39 पर हम पीछे हटनेवाले नहीं, कि नाश हो जाएं, पर विश्वास करनेवाले हैं, कि प्राण का उद्धार हो। अध्याय 11। दसवाँ खण्ड — 11। विश्वास की परिपूर्णता। विश्वास — अनदेखे की आंख। अब विश्वास आशा की हुई वस्तुओं का निश्चय, और अनदेखी वस्तुओं का प्रमाण है।

2 क्योंकि इसी के द्वारा प्राचीनों के विषय में अच्छी गवाही दी गई। 3 विश्वास ही से हम जान जाते हैं, कि सारी सृष्टि की रचना परमेश्वर के वचन के द्वारा हुई है; यहां तक कि जो कुछ दिखाई देता है, वह दिखाई देनेवाली वस्तुओं से नहीं बना। जलप्रलय से पहिले के विश्वास के विषय में। 4 विश्वास ही से हाबिल ने कैन से उत्तम बलिदान परमेश्वर के लिये चढ़ाया; और उसी के द्वारा उसके धर्मी होने की गवाही भी दी गई, क्योंकि परमेश्वर ने उसकी भेंटों के विषय में गवाही दी; और उसी के द्वारा वह मरने पर भी अब तक बातें करता है।

5 विश्वास ही से हनोक उठा लिया गया, कि मृत्यु को न देखे; और उसका पता नहीं मिला, क्योंकि परमेश्वर ने उसे उठा लिया था; और उसके उठाए जाने से पहिले उसकी यह गवाही दी गई थी, कि उस ने परमेश्वर को प्रसन्न किया है। 6 और विश्वास बिना उसे प्रसन्न करना अनहोना है; क्योंकि परमेश्वर के पास आनेवाले को विश्वास करना चाहिए, कि वह है, और अपने खोजनेवालों को प्रतिफल देता है।

7 विश्वास ही से नूह ने उन बातों के विषय में जो उस समय दिखाई न पड़ती थीं, चितावनी पाकर भक्तिपूर्ण भय के साथ अपने घराने के बचाव के लिये जहाज बनाया; और उसके द्वारा उस ने संसार को दोषी ठहराया, और उस धार्मिकता का वारिस हुआ, जो विश्वास से होती है।

अब्राहम और सारा। 8 विश्वास ही से अब्राहम जब बुलाया गया, तो आज्ञा मानकर ऐसी जगह निकल गया, जिसे मीरास में लेनेवाला था; और यह न जानता था, कि मैं किधर जाता हूं, तौभी निकल गया। 9 विश्वास ही से उस ने प्रतिज्ञा किए हुए देश में, जैसे पराए देश में, परदेशी होकर इसहाक और याकूब समेत, जो उसके साथ उसी प्रतिज्ञा के वारिस थे, तम्बुओं में वास किया। 10 क्योंकि वह उस नगर की बाट जोहता था, जिसकी नेवें हैं, जिसका रचनेवाला और बनानेवाला परमेश्वर है।

11 विश्वास ही से सारा ने आप भी अवस्था ढल जाने पर गर्भ धारण करने की सामर्थ पाई, क्योंकि उस ने प्रतिज्ञा करनेवाले को विश्वासयोग्य जाना था। 12 इस कारण एक ही जन से, और वह भी मरा हुआ सा था, आकाश के तारों के समान बहुत, और समुद्र के तीर के बालू के समान अनगिनत वंश उत्पन्न हुआ।

… उन्हें दूर से देखकर उनका अभिवादन किया, और मान लिया, कि हम पृथ्वी पर परदेशी और यात्री हैं। 14 जो ऐसी ऐसी बातें कहते हैं, वे प्रगट करते हैं, कि अपने निज देश की खोज में हैं। 15 और जिस देश से वे निकल आए थे, यदि उसकी सुधि करते, तो उन्हें लौट जाने का अवसर था। 16 पर अब वे एक उत्तम, अर्थात स्वर्गीय देश के अभिलाषी हैं; इसी लिये परमेश्वर उनका परमेश्वर कहलाने में उन से नहीं लजाता; क्योंकि उस ने उनके लिये एक नगर तैयार किया है।

17 विश्वास ही से अब्राहम ने, परखे जाने के समय, इसहाक को बलिदान चढ़ाया; हां, जिस ने प्रतिज्ञाओं को आनन्द से ग्रहण किया था, वही अपने एकलौते को चढ़ाने लगा; 18 वही, जिस से यह कहा गया था, कि इसहाक से तेरा वंश कहलाएगा; 19 क्योंकि उस ने विचार किया, कि परमेश्वर सामर्थी है, कि मरे हुओं में से भी जिलाए; सो उन्हीं में से दृष्टान्त की रीति पर वह उसे फिर मिला।

इसहाक, याकूब और यूसुफ। 20 विश्वास ही से इसहाक ने याकूब और एसाव को आनेवाली बातों के विषय में भी आशीष दी। 21 विश्वास ही से याकूब ने मरते समय यूसुफ के दोनों पुत्रों में से एक एक को आशीष दी, और अपनी लाठी के सिरे पर सहारा लेकर दण्डवत किया।

22 विश्वास ही से यूसुफ ने, जब वह मरने पर था, तो इस्राएल की सन्तान के निकल जाने की चर्चा की, और अपनी हड्डियों के विषय में आज्ञा दी। मूसा। 23 विश्वास ही से मूसा के माता पिता ने उसको, उत्पन्न होने के बाद तीन महीने तक छिपा रखा; क्योंकि उन्होंने देखा, कि बालक सुन्दर है; और वे राजा की आज्ञा से न डरे।

24 विश्वास ही से मूसा ने सयाना होकर फिरौन की बेटी का पुत्र कहलाने से इन्कार किया; 25 इसलिये कि उसे पाप में थोड़े दिन के सुख भोगने से परमेश्वर के लोगों के साथ दुख भोगना और भी उत्तम लगा; 26 और मसीह की निन्दा को मिस्र के भण्डार से बड़ा धन समझा; क्योंकि उसकी आंखें फल पाने की ओर लगी थीं।

विश्वास के द्वारा इस्राएल के छुटकारे के विषय में। 27 विश्वास ही से राजा के क्रोध से न डरकर उस ने मिस्र को छोड़ दिया; क्योंकि वह अनदेखे को मानो देखता हुआ दृढ़ रहा। 28 विश्वास ही से उस ने फसह और लहू छिड़कने की विधि मानी, कि पहिलौठों का नाश करनेवाला उन्हें न छूए।

29 विश्वास ही से वे लाल समुद्र के पार ऐसे उतर गए, जैसे सूखी भूमि पर से; और जब मिस्रियों ने वैसा ही करना चाहा, तो वे सब डूब मरे। 30 विश्वास ही से यरीहो की शहरपनाह, जब सात दिन तक उसका चक्कर लगा चुके, तो वह गिर पड़ी। 31 विश्वास ही से राहाब वेश्या आज्ञा न माननेवालों के साथ नाश नहीं हुई; इसलिये कि उस ने भेदियों को कुशल से रखा था।

विश्वास ने जो अद्भुत काम किए। 32 अब और क्या कहूं? क्योंकि समय नहीं रहा, कि गिदोन का, और बाराक और शिमशोन का, और यिप्तह का, और दाऊद का, और शमूएल का, और भविष्यद्वक्ताओं का वर्णन करूं। 33 इन्होंने विश्वास ही के द्वारा राज्य जीते; धार्मिकता के काम किए; प्रतिज्ञा की हुई वस्तुएं प्राप्त कीं; सिंहों के मुंह बन्द किए; 34 आग के बल को ठंडा किया; तलवार की धार से बच निकले; निर्बलता में बलवन्त हुए; लड़ाई में वीर निकले; विदेशियों की सेनाओं को मार भगाया।

35 स्त्रियों ने अपने मरे हुओं को पुनरुत्थान के द्वारा फिर पाया; और कितने तो यातनाएं सहते रहे, और छुटकारा स्वीकार न किया, इसलिये कि उत्तम पुनरुत्थान के भागी हों। विश्वास ने जो दुख सहे। 36 और कितने ठट्ठों में उड़ाए जाने, और कोड़े खाने, वरन बान्धे जाने और कैद में पड़ने के द्वारा परखे गए। 37 पत्थरवाह किए गए; आरे से चीरे गए; उनकी परीक्षा की गई; तलवार से मारे गए; वे कंगाली में, और क्लेश में, और दुर्व्यवहार सहते हुए भेड़ों और बकरियों की खालें ओढ़े हुए इधर उधर मारे मारे फिरे;

38 (संसार उनके योग्य न था), और वे जंगलों, और पहाड़ों, और गुफाओं में, और पृथ्वी की दरारों में भटकते फिरे। हमारे लिये कोई उत्तम बात। 39 और विश्वास ही के द्वारा इन सब के विषय में अच्छी गवाही दी गई, तौभी उन्हें प्रतिज्ञा की हुई वस्तु न मिली, अध्याय 12। ग्यारहवाँ खण्ड — 12।

आशा का धीरज। यीशु, दौड़ में अगुआ। इस कारण जब कि गवाहों का ऐसा बड़ा बादल हम को घेरे हुए है, तो आओ, हम भी हर एक रोकनेवाली वस्तु, और उलझानेवाले पाप को दूर करके, वह दौड़ जिस में हमें दौड़ना है, धीरज से दौड़ें, 2 और अपने विश्वास के कर्ता और सिद्ध करनेवाले यीशु की ओर ताकते रहें, जिस ने उस आनन्द के लिये जो उसके आगे धरा था, लज्जा की कुछ चिन्ता न करके, क्रूस का दुख सहा; और परमेश्वर के सिंहासन के दाहिने जा बैठा।

3 इसलिये उस पर ध्यान करो, जिस ने अपने विरोध में पापियों का इतना वाद-विवाद सह लिया, कि तुम थककर अपने मन में हियाव न छोड़ दो। परख — परमेश्वर की सन्तान का भाग। 4 तुम ने पाप से लड़ते हुए उस से ऐसी मुठभेड़ नहीं की, कि तुम्हारा लहू बहा हो; 5 और तुम उस उपदेश को भूल गए हो, जो तुम से पुत्रों की नाईं बातें करता है, कि हे मेरे पुत्र, प्रभु की ताड़ना को हलकी बात न जान, और जब वह तुझे घुड़के तो हियाव न छोड़; 6 क्योंकि प्रभु, जिस से प्रेम करता है, उसकी ताड़ना भी करता है, और जिस किसी पुत्र को ग्रहण करता है, उसे कोड़े भी लगाता है।

तुम ताड़ना ही के लिये सह रहे हो; परमेश्वर तुम्हें पुत्र जानकर तुम्हारे साथ बर्ताव करता है; वह कौन सा पुत्र है, जिसकी ताड़ना पिता नहीं करता? 8 पर यदि तुम उस ताड़ना से रहित हो, जिसके भागी सब होते हैं, तो तुम व्यभिचार की सन्तान ठहरे, पुत्र नहीं।

ताड़ना की आशीष। 9 फिर जब कि हमारे शारीरिक पिता भी हमारी ताड़ना किया करते थे, और हम ने उनका आदर किया, तो क्या हम आत्माओं के पिता के और भी अधिक आधीन न रहें, और जीवित रहें? 10 वे तो अपनी अपनी समझ के अनुसार थोड़े दिनों के लिये ताड़ना करते थे; पर यह तो हमारे लाभ के लिये करता है, कि हम भी उसकी पवित्रता के भागी हो जाएं।

11 और वर्तमान में हर प्रकार की ताड़ना आनन्द की नहीं, पर शोक ही की बात दिखाई पड़ती है; तौभी जो उसके द्वारा अभ्यस्त हो चुके हैं, बाद में उन्हें वह शान्ति का फल, अर्थात धार्मिकता का फल देती है। 12 इसलिये लटकते हुए हाथों और निर्बल घुटनों को सीधे करो; 13 और अपने पांवों के लिये सीधे मार्ग बनाओ, कि लंगड़ा मार्ग से भटक न जाए, पर भला चंगा हो जाए।

पाँचवीं चेतावनी। अध्याय 12:14-29। पाप से और यीशु को ठुकराने से सावधान रहना। परमेश्वर के अनुग्रह से वंचित रह जाने के विषय में। 14 सब से मेल मिलाप रखने, और उस पवित्रीकरण के खोजी हो, जिसके बिना कोई प्रभु को कदापि न देखेगा; 15 और ध्यान से देखते रहो, ऐसा न हो, कि कोई परमेश्वर के अनुग्रह से वंचित रह जाए, या कोई कड़वी जड़ फूटकर कष्ट दे, और उसके द्वारा बहुत से लोग अशुद्ध हो जाएं; 15 ऐसा न हो, कि कोई जन व्यभिचारी, या एसाव की नाईं अधर्मी हो, जिस ने एक बार के भोजन के बदले अपने पहिलौठे होने का पद बेच डाला।

17 तुम जानते तो हो, कि बाद को जब उस ने आशीष का वारिस होना चाहा, तो ठुकरा दिया गया (क्योंकि उसे पश्चाताप का अवसर न मिला), यद्यपि उस ने आंसू बहा बहाकर यत्न से उसे खोजा। पाँचवीं चेतावनी (जारी)। तुम सीनै पर्वत के पास नहीं आए हो।

18 तुम तो उस पहाड़ के पास जो छूआ जा सकता था, और आग से प्रज्वलित था, और काली घटा, और अन्धेरे, और आंधी के पास, 19 और तुरही की ध्वनि, और बोलनेवाले के ऐसे शब्द के पास नहीं आए, जिसके सुननेवालों ने बिनती की, कि अब हम से और कोई बात न की जाए; 20 क्योंकि वे उस आज्ञा को न सह सके, कि यदि कोई पशु भी पहाड़ को छूए, तो पत्थरवाह किया जाए। 21 और वह दर्शन ऐसा डरावना था, कि मूसा ने कहा, मैं बहुत डरता और कांपता हूं। तुम सिय्योन पर्वत के पास आए हो।

22 पर तुम सिय्योन के पहाड़ के पास, और जीवते परमेश्वर के नगर, स्वर्गीय यरूशलेम के पास, और स्वर्गदूतों की अनगिनत सेनाओं के पास, 23 और उन पहिलौठों की महासभा और कलीसिया के पास, जिनके नाम स्वर्ग में लिखे हुए हैं, और सब के न्यायी परमेश्वर के पास, और सिद्ध किए हुए धर्मियों की आत्माओं के पास,

24 और नई वाचा के मध्यस्थ यीशु, और छिड़काव के उस लहू के पास आए हो, जो हाबिल के लहू से उत्तम बातें कहता है। आओ, हम उस से डरें, जो भस्म करनेवाली आग है। 25 सावधान रहो, और उस कहनेवाले से मुंह न फेरो; क्योंकि वे लोग जब पृथ्वी पर के चितावनी देनेवाले से मुंह मोड़कर न बच सके, तो हम स्वर्ग पर से चितावनी देनेवाले से मुंह मोड़कर क्योंकर बच सकेंगे? 26 उस समय तो उसके शब्द ने पृथ्वी को हिला दिया, पर अब उस ने यह प्रतिज्ञा की है, कि एक बार फिर मैं केवल पृथ्वी को नहीं, वरन आकाश को भी हिला दूंगा। 27 और यह वचन, कि एक बार फिर, इस बात को प्रगट करता है, कि जो वस्तुएं हिलाई जाती हैं, वे सृजी हुई वस्तुएं होने के कारण टल जाएंगी, ताकि जो वस्तुएं हिलाई नहीं जातीं, वे अटल बनी रहें।

28 इस कारण हम इस राज्य को पाकर, जो हिलने का नहीं, उस अनुग्रह को थामे रहें, जिसके द्वारा हम भक्ति और भय सहित परमेश्वर की ऐसी सेवा करें, जिस से वह प्रसन्न होता है; 29 क्योंकि हमारा परमेश्वर भस्म करनेवाली आग है। अध्याय 13। बारहवाँ खण्ड — 13। प्रेम और भले काम।

प्रेम के विषय में। भाईचारे की प्रीति बनी रहे। 2 अजनबियों से प्रेम दिखाना न भूलना, क्योंकि इसके द्वारा कितनों ने अनजाने स्वर्गदूतों की पहुनाई की है। 3 कैदियों की ऐसी सुधि लो, कि मानो उनके साथ तुम भी कैद हो; और जिनके साथ बुरा बर्ताव किया जाता है, उनकी भी यह समझकर सुधि लिया करो, कि तुम आप भी देह में हो।

4 विवाह सब में आदर की बात समझी जाए, और बिछौना निष्कलंक रहे; क्योंकि परमेश्वर व्यभिचारियों और परस्त्रीगामियों का न्याय करेगा। सन्तोष के विषय में। 5 तुम धन के लोभ से मुक्त रहो, और जो तुम्हारे पास है, उसी पर सन्तोष किया करो; क्योंकि उस ने आप ही कहा है, कि मैं तुझे कभी न छोड़ूंगा, और न कभी तुझे त्यागूंगा।

यीशु सदा एक सा — हमारी सान्त्वना और सुरक्षा। 7 जो तुम्हारे अगुवे थे, और जिन्होंने तुम्हें परमेश्वर का वचन सुनाया है, उन्हें स्मरण रखो; और ध्यान से उनके चाल-चलन का अन्त देखकर उनके विश्वास का अनुकरण करो। 8 यीशु मसीह कल और आज, हां, और युगानुयुग एक सा है।

9 नाना प्रकार के और अनोखे उपदेशों से न भरमाए जाओ; क्योंकि मन का अनुग्रह से दृढ़ रहना भला है, न कि उन खाने की वस्तुओं से, जिन से काम रखनेवालों को कुछ लाभ न हुआ। छावनी के बाहर यीशु के बलिदान में हमारी संगति।

10 हमारी एक ऐसी वेदी है, जिस पर से खाने का अधिकार उन लोगों को नहीं, जो तम्बू की सेवा करते हैं। 11 क्योंकि जिन पशुओं का लहू महायाजक पाप-बलि के लिये पवित्रस्थान में ले जाता है, उनकी देह छावनी के बाहर जलाई जाती है।

12 इसी कारण यीशु ने भी लोगों को अपने ही लहू के द्वारा पवित्र करने के लिये फाटक के बाहर दुख उठाया। 13 सो आओ, उसकी निन्दा अपने ऊपर लिये हुए छावनी के बाहर उसके पास निकल चलें। 14 क्योंकि यहां हमारा कोई स्थिर रहनेवाला नगर नहीं, वरन हम एक आनेवाले नगर की खोज में हैं।

जो बलिदान हमें चढ़ाने हैं, उनके विषय में। 15 इसलिये हम उसके द्वारा स्तुतिरूपी बलिदान, अर्थात उन होठों का फल जो उसके नाम का अंगीकार करते हैं, परमेश्वर के लिये सर्वदा चढ़ाया करें। 16 पर भलाई करना और बांटना न भूलो; क्योंकि परमेश्वर ऐसे बलिदानों से प्रसन्न होता है।

अपने अगुवों के आधीन रहना और उनके लिये प्रार्थना। 17 अपने अगुवों की मानो, और उनके आधीन रहो; क्योंकि वे उनकी नाईं तुम्हारे प्राणों के लिये जागते रहते हैं, जिन्हें लेखा देना पड़ेगा; कि वे यह काम आनन्द से करें, न कि ठंडी सांस ले लेकर, क्योंकि इस दशा में तुम्हें कुछ लाभ नहीं।

18 हमारे लिये प्रार्थना करते रहो, क्योंकि हमें भरोसा है, कि हमारा विवेक अच्छा है, और हम सब बातों में अच्छी चाल चलना चाहते हैं। 19 और इसके करने के लिये मैं तुम्हें और भी समझाता हूं, कि मैं शीघ्र तुम्हारे पास फिर पहुंचाया जाऊं। विदाई की प्रार्थना।

20 अब शान्ति का परमेश्वर, जो भेड़ों के उस महान रखवाले को सनातन वाचा के लहू के साथ मरे हुओं में से फिर ले आया, 21 अर्थात हमारे प्रभु यीशु को, तुम्हें हर एक भली बात में सिद्ध करे, कि तुम उसकी इच्छा पूरी करो; और जो कुछ उसकी दृष्टि में भाता है, उसे यीशु मसीह के द्वारा हम में उत्पन्न करे; जिसकी महिमा युगानुयुग होती रहे। आमीन।

अन्तिम शब्द। 22 हे भाइयो, मैं तुम से बिनती करता हूं, कि इन उपदेश की बातों को सह लो; क्योंकि मैं ने तुम्हें बहुत संक्षेप में लिखा है। 23 तुम यह जान लो, कि हमारा भाई तीमुथियुस छूट गया है; और यदि वह शीघ्र आ गया, तो मैं उसके साथ तुम से भेंट करूंगा। 24 अपने सब अगुवों और सब पवित्र लोगों को नमस्कार कहो। इतालियावाले तुम्हें नमस्कार कहते हैं। 25 तुम सब पर अनुग्रह होता रहे। आमीन।

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