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इब्रानियों 10:1-18 — परमपवित्र स्थान में जाने का नया मार्ग
75 व्यवस्था के बलिदान सिद्ध नहीं कर सकते
1. क्योंकि व्यवस्था, जिसमें आनेवाली अच्छी वस्तुओं की छाया है, न कि
उन वस्तुओं का असली स्वरूप, उन्हीं बलिदानों के द्वारा जो वे प्रति वर्ष लगातार चढ़ाते हैं, निकट आनेवालों को कदापि सिद्ध नहीं कर सकती। 2. नहीं तो क्या उनका चढ़ाया जाना बन्द न हो जाता, क्योंकि आराधना करनेवाले एक बार शुद्ध हो जाने पर फिर पापों का कोई बोध न रखते?
3. परन्तु उन बलिदानों में प्रति वर्ष पापों का स्मरण हुआ करता है। 4. क्योंकि अनहोना है कि बैलों और बकरों का लहू पापों को दूर करे। हम अब तक उस याजक को देख चुके हैं जो सर्वदा का याजक है और पूरा पूरा उद्धार कर सकता है (अध्याय 7); उस सच्चे पवित्रस्थान को भी, जिसमें वह सेवा करता है (अध्याय 8); और उस लहू को भी, जिसके द्वारा पवित्रस्थान खोला गया, और जिसके द्वारा हम भीतर प्रवेश करने के लिये शुद्ध किए गए हैं (अध्याय 9)। अब भी एक चौथी सच्चाई बाकी है, जिसका चलते-चलते उल्लेख तो हुआ है, पर जिसकी अभी व्याख्या नहीं की गई: परमपवित्र स्थान में जाने का वह मार्ग क्या है, जिससे होकर मसीह भीतर गया? वह पथ कौन-सा था जिस पर वह चला, जब वह अपना लहू बहाने और परदे में से होकर भीतर जाने और परमेश्वर के सामने प्रगट होने के लिये गया? दूसरे शब्दों में, वह क्या था जिसने उसके बलिदान को उसका मूल्य दिया, और उसकी मध्यस्थता का वह स्वभाव, वह भीतरी मूल स्वरूप क्या था जिसने हमारे महायाजक के रूप में उसका ग्रहण किया जाना निश्चित कर दिया? इस अध्याय के पहले अठारह पदों में जो उत्तर दिया जाएगा, वही इस पत्री के सैद्धान्तिक आधे भाग का, और विशेष करके उस ऊँची शिक्षा का जो यह सिद्ध लोगों के लिये देती है, उपसंहार होगा।
इस उत्तर के लिये मार्ग तैयार करने के निमित्त अध्याय का आरम्भ हमें एक बार फिर व्यवस्था की असमर्थता का स्मरण दिलाने से होता है। व्यवस्था, जिसमें आनेवाली अच्छी वस्तुओं की छाया है, न कि उन वस्तुओं का असली स्वरूप। व्यवस्था के पास केवल छाया थी, सार वस्तु नहीं। सुसमाचार हमें असली स्वरूप देता है। परमेश्वर का वह स्वरूप, जिसमें मनुष्य सृजा गया था, एक वास्तविक आत्मिक सच्चाई था। स्वयं पुत्र, पिता के स्वरूप के रूप में, उसकी सच्ची समानता था, जो सदा अपने पिता के जीवन और महिमा का स्वामी था। जब मनुष्य कोई प्रतिमा बनाता है, तो वह केवल एक निर्जीव वस्तु होती है। जब परमेश्वर कोई स्वरूप देता है, तो वह एक जीवित वास्तविकता होता है, जो मूल के जीवन और गुणों में भागी होता है। और इसी प्रकार सुसमाचार हमें कोई छाया, कोई चित्र, कोई मानसिक कल्पना नहीं, वरन् स्वर्गीय वस्तुओं का असली स्वरूप ही देता है, ताकि हम उन्हें जानें और पाएँ, सचमुच उनका स्वाद चखें और उन्हें अपने अधिकार में रखें। छाया सबसे पहले एक चित्र होती है, एक बाहरी आकृति, जो आनेवाली अच्छी वस्तुओं की धुँधली-सी समझ देती है। फिर, जब बाहरी बात जाती रहती है, और देखना विश्वास में बदल जाता है, तब ईश्वरीय और स्वर्गीय आशीषों की अधिक स्पष्ट समझ आती है। और फिर विश्वास अधिकार और अनुभव में बदल जाता है, और पवित्र आत्मा मसीह के छुटकारे की सामर्थ को और स्वर्गीय जीवन को हमारे भीतर एक वास्तविकता बना देता है। कुछ मसीही कभी आकृतियों और छायाओं से आगे नहीं बढ़ते; कुछ उस आत्मिक भलाई पर, जो सामने रखी गई है, विश्वास करने तक आगे बढ़ते हैं; धन्य हैं वे जो आगे बढ़कर उस सब पर पूरा अधिकार पा लेते हैं जिसे विश्वास ने गले लगाया था।
जो कुछ व्यवस्था करने में समर्थ नहीं, उसकी व्याख्या करते हुए लेखक चार उल्लेखनीय वाक्यांशों का प्रयोग करता है, जो अपनी छायाओं सहित व्यवस्था की निर्बलता की बात करते हुए, साथ ही यह भी दिखाते हैं कि वे आनेवाली अच्छी वस्तुएँ क्या हैं, जिनका असली स्वरूप, अर्थात् ईश्वरीय अनुभव, मसीह हमारे पास लानेवाला है।
याजक निकट आनेवालों को कदापि सिद्ध नहीं कर सकते। यही वह है जो मसीह कर सकता है। वह विवेक को सिद्ध करता है। उसने हमें सर्वदा के लिये सिद्ध कर दिया है। ये शब्द उस अनन्त अन्तर की ओर संकेत करते हैं जो व्यवस्था के कर सकने और मसीह के सचमुच ले आने के बीच है। परमेश्वर के मन में इनका क्या अर्थ है, और मसीह, हमारा महायाजक, अविनाशी जीवन की सामर्थ में इन्हें हमारे लिये क्या कुछ बना सकता है, यह पवित्र आत्मा प्रगट करेगा। आइए, हम किसी सहज मानवीय व्याख्या से सन्तुष्ट न हों, जिसके द्वारा हम आलसी मसीही के साधारण, निम्न अनुभव को—क्षमा पाने की आशा को—सिद्ध विवेक की प्रतिज्ञाओं से परमेश्वर के अभिप्राय की पर्याप्त पूर्ति मान कर सन्तुष्ट हो जाते हैं। आइए, हम उस आशीष को उसकी स्वर्गीय सामर्थ में जानने का यत्न करें।
आराधना करनेवाले एक बार शुद्ध हो जाने पर फिर पापों का कोई बोध न रखते। यही सिद्ध विवेक है, जब पापों का फिर कोई बोध नहीं रहता—ऐसा विवेक, जो उसी सामर्थ में एक बार शुद्ध होकर जिसमें लहू एक बार बहाया गया था, यह जानता है कि परमेश्वर के साथ उस आत्मिक संगति के क्षेत्र में से, जिसमें उसे प्रवेश मिल गया है, पाप कितनी पूरी रीति से दूर कर दिया गया है।
उन बलिदानों में प्रति वर्ष पापों का स्मरण हुआ करता है। स्वर्ग का शुद्ध किया जाना और पाप का दूर किया जाना इतना पूर्ण है कि परमेश्वर के यहाँ हमारे पाप फिर स्मरण नहीं किए जाते। और अभिप्राय यह है कि जो प्राण पूरी रीति से परमपवित्र स्थान में प्रवेश करता है, और अनन्त महायाजक की सामर्थ से वहीं रखा जाता है, उसे उसके अनन्त, सदा बने रहनेवाले, सदा कार्य करनेवाले छुटकारे का ऐसा अनुभव हो कि उसे और किसी बात का स्मरण न रहे, केवल इसी का कि वह क्या है, और क्या करता है, और क्या करेगा। जब हम स्वर्गीय स्थानों में, परमपवित्र स्थान में, जीवन बिताते हैं, तो हम वहाँ रहते हैं जहाँ पापों का फिर कोई स्मरण नहीं होता।
अनहोना है कि बैलों और बकरों का लहू पापों को दूर करे। जो व्यवस्था के लिये अनहोना है, वही मसीह ने कर दिखाया है। वह केवल दोष को नहीं, वरन् पापों को भी दूर करता है, और वह भी अविनाशी जीवन की ऐसी सामर्थ में कि निकट आनेवाले सिद्ध किए जाते हैं, कि पापों का फिर कोई बोध नहीं रहता, कि पापों का फिर कोई स्मरण न हो।
कितने ही मसीहियों के लिये मसीह का क्रूस और उसकी मृत्यु और कुछ नहीं, बस पापों का एक स्मरण ही है। आइए, हम विश्वास करें कि परमेश्वर की सामर्थ से, पवित्र आत्मा के द्वारा, जो हम पर परमपवित्र स्थान का मार्ग प्रगट करता है, यह एक ऐसे जीवन की सामर्थ बन सकता है जिसमें पापों का फिर कोई बोध न हो, और परमेश्वर के सामने सिद्ध विवेक के साथ चाल चलने की सामर्थ बन सकता है।
1. यहाँ हमारे सामने फिर से दोनों व्यवस्थाओं का अन्तर है। एक में परमेश्वर ने भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा बातें कीं, और विचार और कल्पनाएँ दीं—आनेवाली अच्छी वस्तुओं की छायाएँ। परन्तु अब वह अपने पुत्र में होकर हम से बातें करता है, जो परमेश्वर की समानता है, और जो स्वर्गीय वस्तुओं के हमारे अनुभव में हमें असली स्वरूप, वास्तविक समानता देता है। यह बाहरी और भीतरी के बीच, सृजी हुई और ईश्वरीय वस्तु के बीच का गहरा अन्तर है।
2. एक सिद्ध विवेक। पाप का फिर कोई बोध नहीं। मैं डर कर यह न कहूँ, “हाँ, मसीह यही विवेक देता है, परन्तु मेरे लिये इसे बनाए रखना या इसकी आशीष का स्थायी रूप से आनन्द लेना असम्भव है।” मैं उस पर विश्वास करूँ जो मेरा याजक है, अविनाशी जीवन की सामर्थ के अनुसार, जो प्रार्थना करने के लिये सदा जीवित है, और पूरा पूरा उद्धार कर सकता है, क्योंकि हर क्षण उसका लहू और प्रेम और सामर्थ पूरी तरह कार्य कर रहे हैं—मुझमें सिद्ध विवेक, क्योंकि वह स्वर्ग में मेरे लिये है, एक याजक जो युगानुयुग के लिये सिद्ध किया गया है।
76 तू ने मेरे लिये एक देह तैयार किया
5. इसी कारण वह जगत में आते समय कहता है, कि बलिदान और भेंट तू ने न चाही, पर मेरे लिये एक देह तैयार किया; होम-बलियों और पाप-बलियों से तू
प्रसन्न नहीं हुआ। तब मैं ने कहा, देख, मैं आ गया हूँ (पुस्तक के खर्रे में मेरे विषय में लिखा हुआ है), ताकि हे परमेश्वर, तेरी इच्छा पूरी करूँ। लेखक हमें स्मरण दिला चुका है कि व्यवस्था के बलिदान वह करने में, जो पाप को दूर करने या आराधना करनेवाले को सिद्ध करने के लिये आवश्यक था, सर्वथा अपर्याप्त थे। उनके विपरीत अब वह हमारे सामने मसीह के बलिदान का भीतरी अर्थ, उसका वास्तविक स्वरूप और मूल्य खोलकर रखेगा। अध्याय 9 में लहू के विषय में बात करते हुए उसने हमें सिखाया है कि उसकी अनन्त सामर्थ और प्रभाव क्या है। परन्तु हमें अभी यह जानने की आवश्यकता है: वह क्या था जिसने उसे वह अनन्त प्रभाव दिया—उसका आत्मिक चरित्र क्या है, और उसका मूल स्वरूप क्या है, कि वह हमारे लिये परमेश्वर तक का मार्ग खोलने में इतनी सामर्थ के साथ प्रभावशाली हुआ। मसीह की मृत्यु पर विश्वास करते हुए भी हम इस खतरे में रहते हैं कि किसी ऐसी बात से सन्तुष्ट होकर बैठ जाएँ जो उसकी छाया से कुछ अधिक अच्छी नहीं—अर्थात् उसने जो कुछ सम्पन्न किया उसकी केवल सैद्धान्तिक समझ—और उसके ईश्वरीय अर्थ में इस प्रकार प्रवेश न करें कि उसके अर्थ का असली स्वरूप, उसकी वास्तविक समानता, सामर्थ के साथ हमारे भीतर प्रवेश करे।
हमारा लेखक यहाँ फिर, जिस बात की वह व्याख्या करना चाहता है, उसे पुराने नियम में पाता है। वह भजन संहिता 40 से उद्धरण देता है, जहाँ भजनकार ऐसे शब्द कहता है जो यद्यपि उसके अपने विषय में सच थे, तौभी उनका पूरा अर्थ केवल तभी प्रगट हो सकता था जब मसीहा आया। हमारा लेखक दो अर्थपूर्ण वाक्यांशों का विशेष उपयोग करता है: “तू ने मेरे लिये एक देह तैयार किया,” और, “देख, मैं आ गया हूँ, ताकि हे परमेश्वर, तेरी इच्छा पूरी करूँ।” पुराने नियम के बलिदानों के विषय में बोलते हुए भजनकार ने यह दिखाया था कि वह समझता था कि वे कभी वह नहीं थे जो परमेश्वर सचमुच चाहता था: वे केवल छायाएँ थे जो किसी उत्तम वस्तु की ओर, एक आत्मिक वास्तविकता की ओर संकेत करती थीं—अर्थात् देह में बिताए गए ऐसे जीवन की ओर जो परमेश्वर की इच्छा के प्रति समर्पित हो—उस बात की एक ईश्वरीय भविष्यद्वाणी के रूप में जो अब मसीह में प्रगट हुई है।
तू ने मेरे लिये एक देह तैयार किया। बलिदानों के स्थान पर परमेश्वर ने मसीह के लिये एक देह तैयार की, जिसे उसने इस प्रकार चढ़ाया या बलिदान किया कि अब हम यीशु मसीह की देह के एक ही बार सदा के लिये चढ़ाए जाने के द्वारा पवित्र किए गए हैं। मसीह की देह उसके लिये ठीक वैसी ही थी जैसी किसी भी मनुष्य की देह उसके लिये होती है—प्राण का निवास-स्थान और साधन, बाहरी जगत के साथ सम्पर्क का माध्यम, सुख और दुःख की अनुभूतियों को ग्रहण करनेवाली, और इसलिये परीक्षा के पहले अवसरों में से एक। उसकी देह उसके मानवीय व्यक्तित्व और जीवन का अंग थी। वह भी, ठीक हमारी तरह, इस खतरे में था कि देह का उपयोग अपनी सेवा या अपने सुख के लिये, अपने आप को तृप्त करने के साधन के रूप में करे। परन्तु उसने ऐसा कभी नहीं किया। वह एक ही विचार से भरा हुआ था: “परमेश्वर ने यह देह मेरे लिये तैयार की है—यह मेरे पास उसी के काम में लाए जाने के लिये, उसकी सेवा और महिमा के लिये है; मैं इसे हर क्षण उसके लिये बलिदान होने को तैयार रखता हूँ। देह परमेश्वर की ओर से आती है—यह उसी की है—इसके अस्तित्व का और कोई उद्देश्य नहीं, केवल उसे प्रसन्न करना। मेरी देह का एक ही मूल्य है, कि मैं इसे परमेश्वर को बलिदान करके दे सकता हूँ।”
पुराने नियम के बलिदानों का उद्देश्य आराधना करनेवाले में इसी मनोभाव को जगाना था। उसमें केवल यह विचार ही न रहे—जैसा विशेषकर पाप-बलि में था—कि “यह बलिपशु मेरे स्थान पर मरता है, ताकि मुझे न मरना पड़े।” वरन् वह आगे का विचार भी रहे जिसका विशेष प्रतीक होम-बलि थी: “इस मेम्ने का और इसके प्राण का परमेश्वर के लिये बलिदान में दे दिया जाना, मेरे अपने जीवन को उसके लिये दे देने का प्रतिरूप और बयाना है। मैं अपने आप को उसे अर्पित करने के चिह्न के रूप में यह बलिदान परमेश्वर को चढ़ाता हूँ।” वेदी पर प्रतिस्थापन और समर्पण, दोनों समान रूप से दर्शाए गए थे।
भजन लिखते समय दाऊद की यही भावना थी। जिसे वह केवल आंशिक रूप से समझ और पूरा कर सका, वह मसीह में पूरा हो गया है। और जो कुछ मसीह ने हमारे लिये सम्पन्न किया, उसके हम पूरे भागी तब होते हैं जब वह उसके साथ संगति के जीवन में हमारे भीतर गढ़ा जाता है। हमारे पास यह वचन आता है, “अपनी देहों को जीवित बलिदान करके परमेश्वर को चढ़ाओ।” मसीह के बलिदान का वास्तविक मूल स्वरूप, जो उसे मूल्य और प्रभाव देता है, यह है: जो देह परमेश्वर ने उसके लिये तैयार की, उसे उसने परमेश्वर को चढ़ा दिया। और जैसे दाऊद ने, मसीह से पहले, मसीह के आत्मा के द्वारा, ये शब्द अपने विषय में कहे, वैसे ही मसीह के बाद हर एक विश्वासी, मसीह के आत्मा और सामर्थ में, इन्हें कहता है: “तू ने मेरे लिये एक देह तैयार किया।” यही वह नया और जीवित मार्ग है जिसे मसीह ने खोल दिया है। दाऊद पहले से ही आशा में इस पर चला—मसीह, नायक और अगुआ, इस पर चला और इसे पूरी रीति से खोल दिया; केवल तभी जब हम भी, उसके साथ सहभागी होकर, इस पर चलते हैं, हम परमपवित्र स्थान में प्रवेश पा सकते हैं। हर विश्वासी, जो पुराने नियम के धर्म से—उस भरोसे से जो हमारे बाहर किए गए किसी काम पर होता है और हमें बिना बदले छोड़ देता है—पूरी रीति से छुटकारा पाना चाहता है, और पूरी रीति से जानना चाहता है कि मसीह की देह के एक ही चढ़ावे के द्वारा हमारे पवित्र और सिद्ध किए जाने का अर्थ क्या है, उसे इस वचन को, मसीह के विषय में और उसकी देह के एक अंग के रूप में अपने विषय में सत्य मानकर, पूरी रीति से अपनाने का यत्न करना चाहिए: “तू ने मेरे लिये एक देह तैयार किया।” अदन की वाटिका में पाप देह ही के द्वारा प्रवेश कर गया; देह ही में उसने अपना डेरा डाला और अपनी सामर्थ दिखाई। वर्जित भोजन की लालसा में, नंगेपन और लज्जा के बोध में, फिर से मिट्टी में मिल जाने में, पाप ने अपनी विजय प्रमाणित की। देह ही में अनुग्रह राज्य करेगा और विजयी होगा। देह का छुटकारा हो चुका है—वह आत्मा का मन्दिर और मसीह की देह का अंग बन जाती है—वह उसकी महिमा की देह के समान बना दी जाएगी। “तू ने मेरे लिये एक देह तैयार किया”—मसीह के लिये और उन सब के लिये जो उसमें पवित्र किए गए हैं, सिद्धता का पथ देह ही में से होकर जाता है।
और तौभी कितने ही विश्वासी हैं जिनके लिये देह उनके मसीही जीवन में सबसे बड़ी बाधा है। केवल इसलिये कि उन्होंने मसीह से यह नहीं सीखा कि देह का सबसे ऊँचा उपयोग क्या है—उसे परमेश्वर को चढ़ा देना। अपने अंगों को परमेश्वर को सौंपने के बदले, आत्मा के द्वारा देह की क्रियाओं को मारने के बदले, देह को वश में रखने के बदले, वे उसे मनमानी करने देते हैं, और दासत्व में पड़ जाते हैं। आह, काश हमें अपने वास्तविक छुटकारे के सच्चे स्वरूप की समझ मिले, जो एक ऐसी देह के द्वारा हुआ जो परमेश्वर से मिली, उसी के द्वारा तैयार की गई, और उसी को चढ़ाई गई!
प्राण देह में निवास करता है। देह की तुलना ठीक ही किसी नगर की शहरपनाह से की गई है। युद्ध के समय केवल नगर और उसके निवासियों ही को नहीं, वरन् विशेष करके शहरपनाह को भी राजा के शासन के अधीन रहना चाहिए। यीशु, जिसके लिये परमेश्वर ने एक देह तैयार की, जिसने अपनी देह चढ़ा दी, देह की भी रक्षा करना जानता है।
2. देहधारण का भेद यह है कि परमेश्वरत्व एक देह में वास करता था। प्रायश्चित का भेद है—मसीह की देह का वह एक ही चढ़ावा। पूर्ण छुटकारे का भेद यह है कि पवित्र आत्मा देह में भी वास करता है और उसे भी पूरी रीति से पवित्र करता है।
“क्या तुम नहीं जानते कि तुम्हारी देह पवित्र आत्मा का मन्दिर है, जो तुम में बसा हुआ है? इसलिये अपनी देह के द्वारा परमेश्वर की महिमा करो।” क्या आपने कभी यह जाना कि पवित्र आत्मा विशेष रूप से देह के लिये भी दिया गया है, ताकि उसके कार्यों को नियन्त्रित करे और उसे पूरी रीति से पवित्र करे?
77 देख, मैं तेरी इच्छा पूरी करने आया हूँ
ऊपर तो वह कहता है, कि बलिदानों और भेंटों और होम-बलियों और पाप-बलियों को तू ने न चाहा, और न उनसे प्रसन्न हुआ (यद्यपि ये व्यवस्था के अनुसार चढ़ाए जाते हैं), 9. फिर उसने कहा है, देख, मैं आ गया हूँ, ताकि तेरी इच्छा पूरी करूँ। वह पहले को उठा देता है, ताकि दूसरे को स्थिर करे।
10. उसी इच्छा से हम यीशु मसीह की देह के एक ही बार सदा के लिये चढ़ाए जाने के द्वारा पवित्र किए गए हैं। “तू ने मेरे लिये एक देह तैयार किया”—परमेश्वर के दावे को प्रगट करनेवाले इस वचन के बाद भजन में अब वह दूसरा वचन आता है, जो उस दावे के प्रति आत्मसमर्पण का है: “देख, मैं तेरी इच्छा पूरी करने आया हूँ।”
इसी में—परमेश्वर की इच्छा पूरी करने में—हमें सृष्टि की नियति, स्वर्ग का परम आनन्द, और छुटकारे का सबसे भीतरी भेद मिलता है। इसी में मसीह के बलिदान का मूल्य है, और केवल यही कारण है कि उसका लहू प्रबल होता है। वह पथ जो उसने परमेश्वर तक खोल दिया, वह पथ जिस पर वह चला और जिस पर हम परमपवित्र स्थान में प्रवेश करने के लिये चलते हैं, यही है: “मैं तेरी इच्छा पूरी करने आया हूँ।” केवल परमेश्वर की इच्छा ही के द्वारा हम स्वयं परमेश्वर के पास प्रवेश करते हैं। नई वाचा का मध्यस्थ यीशु, जब वह हमें अपने आप को देता है, तो जो केन्द्रीय आशीष हमें देता है, वह है एक ऐसा हृदय जिसमें परमेश्वर की इच्छा जीवित रहती है।
हम एक से अधिक बार मसीह की मृत्यु के दो पहलुओं की चर्चा कर चुके हैं—प्रतिस्थापन, उस प्रायश्चित सहित जो उसने सम्पन्न किया; और संगति, उस अनुरूपता सहित जो वह लाती है। ये दोनों अटूट रूप से जुड़े हुए हैं। जब तक हम प्रतिस्थापन को केवल एक ऐसे कार्य के रूप में देखते हैं जो हमारे बाहर सम्पन्न हुआ, और उसके भीतरी स्वरूप और अर्थ को जानने का यत्न नहीं करते, तब तक मसीह की मृत्यु की संगति और उसकी अनुरूपता असम्भव रहेगी। परन्तु जब हम उस मृत्यु के वास्तविक अर्थ में, जो हमारे लिये और हमारे स्थान पर हुई, अर्थात् उस बात में प्रवेश करते हैं जिससे उसका ईश्वरीय जीवन और सामर्थ बना था, तब हम पाएँगे कि वह मृत्यु, और मृत्यु में से निकलनेवाला जीवन, सचमुच हमारा हो जाता है—हमें पकड़ लेता है, और हमें अपने धन्य नायक और अगुआ के साथ सच्ची जीवन-संगति में ले आता है; हम देखेंगे और अनुभव करेंगे कि जो उसके लिये परमपवित्र स्थान में जाने का मार्ग था, वही हमारे लिये वहाँ तक पहुँचने का एकमात्र, परन्तु निश्चित, जीवित मार्ग होगा।
देख, हे परमेश्वर, मैं तेरी इच्छा पूरी करने आया हूँ। “उसने अपने आप को दीन किया, और आज्ञाकारी रहा... इस कारण परमेश्वर ने उसको अति महान भी किया।” क्योंकि परमेश्वर जीवन और भलाई और आशीष का सर्वसिद्ध सोता है, इसलिये उसकी इच्छा के सिवा और कहीं कोई जीवन या भलाई या आशीष नहीं हो सकती। पाप की सारी बुराई और विनाश यही है कि मनुष्य परमेश्वर की इच्छा से मुँह मोड़कर अपनी इच्छा पूरी करने लगा। मसीह के छुटकारे का, मनुष्य को फिर से परमेश्वर की इच्छा पूरी करने की दशा में लौटाने के सिवा, न कोई कारण था, न कोई उद्देश्य, और न सफलता की कोई सम्भावना। इसी के लिये यीशु मरा। उसने अपनी इच्छा त्याग दी; अपनी इच्छा पूरी करने के बदले उसने अपना प्राण दे दिया। इसी ने उसके हमारे पापों को, उनके श्राप और परिणामों सहित, उठा लेने को—हर एक मनुष्य के लिये उसके मृत्यु का स्वाद चखने को—मूल्य दिया। इसी ने उसके लहू को ऐसा अनन्त मूल्य दिया। इसी ने उसे जगत के पापों के लिये सच्चा प्रायश्चित बनाया। और इसी के हम भागी बनाए जाते हैं—पहले तो उस आज्ञाकारिता के रूप में जिसके कारण हम धर्मी ठहराए जाते हैं; परन्तु आगे चलकर उस मृत्यु और उस जीवन के आत्मा ही की संगति में भी, जिसमें होकर वह परमेश्वर की उपस्थिति में प्रवेश कर गया। “मैं तेरी इच्छा पूरी करने आया हूँ”—यही उसके लिये और हमारे लिये परमपवित्र स्थान में जाने का मार्ग है।
उसी इच्छा से हम पवित्र किए गए हैं। उसी इच्छा से—जैसी परमेश्वर ने चाही, जैसी मसीह ने अपने एक चढ़ावे में पूरी और सम्पन्न की, जैसी हमने विश्वास में ग्रहण की। जब हम मसीह को ग्रहण करते हैं, तो परमेश्वर की वह इच्छा भी, जो हमारी ओर से मसीह में पूरी की गई, हमारे द्वारा ग्रहण की जाती है—वह वह सामर्थ बन जाती है जो पवित्र आत्मा के द्वारा हमारे जीवन में राज्य करती है। उसी इच्छा में—किसी मृत, बीते हुए लेन-देन के रूप में नहीं, न ही किसी निश्चित किए जानेवाले कार्य की मात्र पूर्ति के रूप में, वरन् एक जीवित, अनन्त वास्तविकता के रूप में, जो जीवित सामर्थ में मनुष्य को परमेश्वर की इच्छा में लौटा लाती है—इसी में हमें परमेश्वर तक पहुँचने का नया और जीवित मार्ग मिलता है।
उसी इच्छा से हम पवित्र किए गए हैं। इस पत्री में पवित्रीकरण एक ऐसा शब्द है जिसका अर्थ उससे कहीं अधिक व्यापक है जो साधारण कलीसियाई सिद्धान्त में इस नाम से समझा जाता है। इसमें वह सब सम्मिलित है जो हमें परमेश्वर के साथ जीवित संगति में लाने में निहित है। वह पवित्र है। उसका जीवन ही उसकी पवित्रता है। वह भीतरी पवित्रस्थान, जिसमें हम प्रवेश करते हैं, पवित्रताओं की पवित्रता है। अध्याय 2 में हम पढ़ते हैं: “पवित्र करनेवाला और जो पवित्र किए जाते हैं, सब एक ही से हैं।” हमारा पवित्रीकरण यीशु के साथ हमारी एकता में जड़ पकड़े हुए है। उसी इच्छा से हम पवित्र किए गए हैं—पाप की और इस बुरे संसार की सामर्थ से छुड़ाए गए, पवित्र परमेश्वर के साथ संगति में लाए गए, और परमपवित्र स्थान में प्रवेश करने के योग्य बनाए गए।
उसी इच्छा से हम यीशु मसीह की देह के चढ़ाए जाने के द्वारा पवित्र किए गए हैं। उसके चढ़ावे में ऐसी सामर्थ इसलिये है, क्योंकि वह परमेश्वर की इच्छा को पूरा करना था, परमेश्वर की इच्छा में प्रवेश करना था, और उसके द्वारा परमेश्वर की पवित्रता में, स्वयं परमपवित्र स्थान में प्रवेश करना था। और अब, जैसे मसीह के सिवा और किसी में अपने आप से यह कहने की सामर्थ न थी, “देख, मैं तेरी इच्छा पूरी करने आया हूँ,” वैसे ही कोई भी ऐसा कह नहीं सकता, या ऐसा जीवन बिता नहीं सकता, जब तक कि मसीह का ईश्वरीय स्वभाव सचमुच उसके भीतर जन्म न ले और आकार न पाए, और उसके जीवन का जीवन और उसकी आत्मा का आत्मा न बन जाए। इसी प्रकार उसका याजकपद हमें परमेश्वर के निकट लाने की अपनी सामर्थ प्रगट करता है।
प्रिय मसीही भाई! क्या आपने विश्वास करना और अपने आप को परमेश्वर की उस इच्छा में, जैसी यीशु ने पूरी की, पवित्र किया हुआ समझना सीख लिया है—पवित्र परमेश्वर की संगति में प्रवेश पाया हुआ? कहीं यही तो कारण नहीं कि आप अब तक परदे के भीतर परमेश्वर के विश्राम में प्रवेश नहीं कर पाए, क्योंकि आपने मसीह को ग्रहण करते समय कभी उस बात को ग्रहण नहीं किया जो वास्तव में उसे मसीह बनाती है? वह वही मसीह है जो परमेश्वर की इच्छा पूरी करने आया—यही उसे उद्धारकर्ता बनाता है। आह, आइए और विश्वास कीजिए कि उसने यह आपके लिये और आपकी ओर से किया, ताकि आप भी इसे कर सकें। परमपवित्र स्थान में जाने का नया और जीवित मार्ग, जिसे यीशु ने नायक और अगुआ के रूप में खोल दिया है, यह मार्ग है: परमेश्वर द्वारा मेरे लिये तैयार की गई एक देह, उसी को चढ़ाई गई एक देह, और उसकी इच्छा पूरी करने के लिये दिया गया जीवन। जब मैं यीशु के साथ कहता हूँ, “मैं तेरी इच्छा पूरी करने आया हूँ,” और जीवन में मेरा और कोई उद्देश्य नहीं, केवल इसी के लिये मैं जीता हूँ, तो मैं उसके साथ परमेश्वर की उपस्थिति में बना रहूँगा।
1. परमेश्वर तक पहुँचने का एकमात्र मार्ग परमेश्वर की इच्छा ही के द्वारा है। एक ऐसी सच्चाई जो इतनी सरल और स्वतःस्पष्ट है! और तौभी इतनी गहरी और आत्मिक कि थोड़े ही लोग इसे पूरी तरह समझ पाते हैं। हाँ, यही मार्ग है, एकमात्र मार्ग, परमपवित्र स्थान में जाने का वह नया और जीवित मार्ग जिसे यीशु ने खोल दिया। आइए, हम अपने नायक और अगुआ के पीछे चलें, उसके पदचिह्नों पर, परमेश्वर की इच्छा में चलते हुए।
2. यह कहने से मत डरिए: “हाँ, हे मेरे परमेश्वर, देख, मैं यहाँ हूँ, हर बात में परमेश्वर की इच्छा पूरी करने के लिये पूरी रीति से समर्पित; तेरे अनुग्रह और पवित्र आत्मा के द्वारा, अपने अस्तित्व के हर भाग को परमेश्वर की इच्छा पूरी करने का साधन बनाने के लिये! हे परमेश्वर, इसमें मेरी सहायता कर!” 3. पश्चाताप करनेवाले नए विश्वासी के लिये मसीह की शिक्षा का आरम्भ जान लेना पर्याप्त है—कि उसकी आज्ञाकारिता ने प्रायश्चित किया है और मुझे धर्मी ठहराती है। जो विश्वासी बढ़ना और पुत्र के स्वरूप में ढलना चाहता है, वह इससे अधिक खोजता और पाता है। वह आज्ञाकारिता, जिसने स्वर्ग में बलिदान को उसकी सामर्थ दी, उसके हृदय में वही सामर्थ प्रगट करती है। वह आराध्य स्थानापन्न प्रिय नायक और भाई बन जाता है—स्वर्गीय जीवन की सामर्थ में महायाजक, जो हमें उसकी इच्छा में ले चलकर और वहीं बनाए रखकर परमेश्वर के निकट ले आता है।
78 एक ही बार और सर्वदा के लिये
11. और हर एक याजक तो प्रतिदिन खड़े होकर सेवा करता है, और
एक ही प्रकार के बलिदान बार बार चढ़ाता है, जो पापों को कभी भी दूर नहीं कर सकते; 12. पर यह व्यक्ति तो पापों के बदले एक ही बलिदान सर्वदा के लिये चढ़ाकर परमेश्वर के दाहिने जा बैठा; 13. और उसी समय से इस बात की बाट जोह रहा है कि उसके बैरी उसके पाँवों की पीढ़ी बनाए जाएँ।
14. क्योंकि उसने एक ही चढ़ावे के द्वारा उन्हें जो पवित्र किए जाते हैं, सर्वदा के लिये सिद्ध कर दिया है। अध्याय 7 के अन्तिम पदों में, जहाँ यीशु के अनन्त याजकपद का वर्णन किया गया था, उसके विषय में कहा गया था कि उसे प्रतिदिन बलिदान चढ़ाने की आवश्यकता नहीं, “क्योंकि यह उसने एक ही बार सदा के लिये कर दिया, जब उसने अपने आप को चढ़ाया”—एक पुत्र, जो युगानुयुग के लिये सिद्ध किया गया है। और इसी प्रकार अध्याय 9 में, उसके लहू के प्रभाव की शिक्षा के साथ, यही विचार दोहराया गया था: “मसीह एक ही बार सदा के लिये भीतर गया।” “यह नहीं कि वह अपने आप को बार बार चढ़ाए, नहीं तो उसे बार बार दुःख उठाना पड़ता—पर अब वह एक ही बार प्रगट हुआ है—मसीह, एक बार चढ़ाया जाकर, दूसरी बार दिखाई देगा।” बार बार दोहराए जानेवाले बलिदानों और मसीह के एक ही बार सदा के लिये चढ़ाए गए चढ़ावे के बीच का अन्तर जितना हो सकता है उतना प्रबल करके रखा गया है। वैसे ही हमारे अध्याय के आरम्भ में भी, प्रति वर्ष लगातार चढ़ाए जानेवाले बलिदानों की असमर्थता इस तथ्य से प्रमाणित की गई है कि एक बार शुद्ध किए गए विवेक को किसी नए बलिदान की आवश्यकता न रहती; वास्तव में, वे केवल पापों के स्मरण को नया करते थे। और अब, तर्क के समापन पदों में, इस विचार का सार प्रस्तुत करके उसे नए सिरे से दृढ़ता के साथ मन में बैठाया गया है। याजक प्रतिदिन खड़ा होकर बार बार चढ़ाता है—मसीह ने एक ही बलिदान सर्वदा के लिये चढ़ाया। उसने एक ही चढ़ावे के द्वारा उन्हें जो पवित्र किए जाते हैं, सर्वदा के लिये सिद्ध कर दिया है। मसीह के कार्य का ‘एक ही बार’ ही उसके ‘सर्वदा’ होने का भेद है: उस ईश्वरीय ‘एक ही बार सदा के लिये’ को जितनी स्पष्टता से ग्रहण किया जाए, उस ईश्वरीय ‘सर्वदा’ का—अविनाशी जीवन की सामर्थ के निरन्तर बने रहनेवाले कार्य का—अनुभव उतना ही निश्चित होगा।
एक ही बार और सर्वदा के लिये: देखिए कि मसीह के कार्य में, उसके दो प्रमुख प्रकटीकरणों में, ये दोनों किस प्रकार साथ-साथ चलते हैं। उसकी मृत्यु में, उसके बलिदान में, उसके लहू बहाए जाने में, यह ‘एक ही बार सदा के लिये’ है। पाप का प्रायश्चित, उसका उठाया जाना और दूर किया जाना, इतना पूर्ण था कि उसके फिर से दुःख उठाने, या फिर से अपने आप को चढ़ाने का कभी कोई विचार ही नहीं हो सकता। परमेश्वर अब उस पाप को सर्वदा के लिये फिर स्मरण नहीं करता। उसने एक ही बलिदान सर्वदा के लिये चढ़ाया है; उसने हमें सर्वदा के लिये सिद्ध कर दिया है। उसके पुनरुत्थान और स्वर्ग पर चढ़ जाने में भी ठीक ऐसा ही है। वह अपने लहू के द्वारा एक ही बार सदा के लिये परमपवित्र स्थान में प्रवेश कर गया। जब वह एक ही बलिदान सर्वदा के लिये चढ़ा चुका, तो परमेश्वर के दाहिने जा बैठा। उसकी मृत्यु का ‘एक ही बार सदा के लिये’ उसके बलिदान की सामर्थ के ‘सर्वदा’ का भेद है। लहू के द्वारा उसके प्रवेश का ‘एक ही बार सदा के लिये’, सिंहासन पर उसके बैठे रहने के ‘सर्वदा’ की सामर्थ है।
जो मसीह के विषय में सत्य है, वही उसके लोगों के विषय में भी सत्य है। उसके जीवन का नियम ही उनके जीवन का नियम है। पृथ्वी और स्वर्ग में उसके कार्य के ‘एक ही बार सदा के लिये’ और ‘सर्वदा’ की सामर्थ को उनके जीवन और आत्मिक अनुभव भी महसूस करेंगे और उसकी छाप धारण करेंगे। मन-परिवर्तन में इसे देखिए। कितने ही लोग वर्षों तक सन्देह और भय में संघर्ष करते रहे, केवल इसलिये कि उन्होंने मसीह के प्रायश्चित के ‘एक ही बार सदा के लिये’ को नहीं समझा। वे नहीं समझ सके कि किसी पापी के लिये एक ही बार सदा के लिये विश्वास करना और उद्धार पाना कैसे सम्भव है। ज्योंही उन पर यह स्पष्ट किया गया कि दण्ड भोगा जा चुका है, कि ऋण चुकाया जा चुका है, एक ही बार सदा के लिये, त्योंही सब कुछ स्पष्ट हो गया, और उन्होंने इसे अपना कर्तव्य और आनन्द समझा कि जो कुछ इतना पूरा हो चुका और इतना निश्चित है, उसे तुरन्त ग्रहण कर लें। और वे यह भी देख सके कि किस प्रकार वह ‘एक ही बार’ सर्वदा के लिये है—अविनाशी जीवन की सामर्थ, जो उन्हें परमेश्वर की उपस्थिति के ‘सर्वदा’ में आगे लिये चलती है।
और उन विश्वासियों के साथ भी, जो परदे के भीतर, बिना बादल के और बिना टूटे संगति के जीवन में प्रवेश करते हैं, कुछ और नहीं होता। हमने मसीह के कार्य में ‘एक ही बार’ और ‘सर्वदा’ के दो प्रकटीकरण देखे। यह केवल मृत्यु और लहू बहाए जाने में ही नहीं, वरन् परमपवित्र स्थान में प्रवेश करने और स्वर्ग में लहू छिड़कने में भी था। बहुतों को यह बढ़ने और विकसित होने के सब नियमों के विरुद्ध दिखाई देता है कि परदे के भीतर प्रवेश का भी कोई ‘एक ही बार सदा के लिये’ हो। और तौभी थोड़े नहीं वरन् बहुत-से गवाह हैं जो गवाही दे सकते हैं कि जब मसीह के भीतर प्रवेश करने का वह ‘एक ही बार’ अपनी अनन्त सामर्थ में उनका अपना होकर उन पर प्रगट हुआ, तो सारा सन्देह जाता रहा, और न केवल हियाव, वरन् निकट जाने की सामर्थ भी दी गई, जो उन्हें स्वर्गीय याजकपद की अनन्त और अपरिवर्तनीय सामर्थ के, और पवित्र आत्मा के द्वारा स्थापित और स्थिर रखे गए भीतरी राज्य के, एक ऐसे अनुभव में ले आई जिसकी उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की थी। और उस ‘एक ही बार’ के पीछे निरन्तर बने रहने का वह ‘सर्वदा’ आया, जिसे निश्चित करना यीशु के याजकपद का उद्देश्य था।
पर यह व्यक्ति तो पापों के बदले एक ही बलिदान सर्वदा के लिये चढ़ाकर परमेश्वर के दाहिने जा बैठा; और उसी समय से इस बात की बाट जोह रहा है कि उसके बैरी उसके पाँवों की पीढ़ी बनाए जाएँ। हम पहले कह चुके हैं कि यह पत्री हमें एक स्वर्गीय मसीह के विचार से भर देना चाहती है; उसके ज्ञान से कम कोई बात हमें स्वर्गीय बुलाहट के भागियों की तरह जीने के योग्य नहीं बना सकती। आइए, हम यहाँ फिर अपनी आँखें राजा के रूप में मसीह पर लगाएँ। बलिदान और मृत्यु का ‘एक ही बार’ परमेश्वर की निकटता और सामर्थ के ‘सर्वदा’ में परिणत होता है। मसीह की मृत्यु और उसके जीवन में हमारे प्रवेश का ‘एक ही बार’ हमें स्वर्ग में पिता के प्रेम और सामर्थ में मसीह के साथ संगति में वापस ले आता है। उसका ‘सर्वदा’ विजय का, और हर एक बैरी के वश में किए जाने के द्वारा उस विजय के पूर्ण प्रकटीकरण की धन्य प्रतीक्षा का ‘सर्वदा’ है। परदे के भीतर हमारा जीवन भी अधिकार और प्रतीक्षा, दोनों का मेल हो सकता है; विजयी जीवन का आनन्द, और साथ ही हर एक शत्रु पर विजय में बल पर बल पाते हुए आगे बढ़ना। इन दो खम्भों के बीच से—एक ओर यह ‘एक ही बार सदा के लिये’, दूसरी ओर यह ‘सर्वदा’—परमपवित्र स्थान का मार्ग जाता है और हमें परमेश्वर और मेम्ने के सिंहासन तक पहुँचाता है।
1. वह समय, जब लम्बी और धीरजभरी तैयारी इस ‘एक ही बार सदा के लिये’ में सिद्ध हुई, परमेश्वर के हाथ में था। मसीह ने पिता की बाट जोही। वैसे ही, इसमें हमारी पूरी सहभागिता भी कोई ऐसी वस्तु नहीं जिसे हम झपट लेने की वस्तु समझें; इसके विश्वास में हम परमेश्वर के समय की प्रतीक्षा करते हैं, और हर दिन एक ऐसे छुटकारे में जीने का यत्न करते हैं जो सिद्ध और अनन्त है। विश्वास और धीरज के द्वारा हम प्रतिज्ञाओं के वारिस होते हैं।
2. एक ही बार सदा के लिये। यह मेरे अतीत को पूरी रीति से ढाँप लेता है—मेरे अतीत को, न केवल दोष के विषय में, वरन् पाप और उसके सब परिणामों के विषय में भी। सर्वदा के लिये। यह मेरे भविष्य को, उसकी सब सम्भावित आवश्यकताओं सहित, ढाँप लेता है। इन दोनों के बीच, वर्तमान क्षण में, दैनिक जीवन के ‘अभी’ में, मैं अनन्त उद्धार के द्वारा उद्धार पाता हूँ; अनन्त आत्मा का ‘आज’—जैसा पवित्र आत्मा कहता है, “आज”—उस ‘एक ही बार’ और ‘सर्वदा’ को एक दैनिक, वर्तमान वास्तविकता बना देता है।
79 पवित्र किए हुए लोग सर्वदा के लिये सिद्ध किए गए
14. क्योंकि उसने एक ही चढ़ावे के द्वारा उन्हें जो पवित्र किए
जाते हैं, सर्वदा के लिये सिद्ध कर दिया है। यह पद वास्तव में पत्री के सैद्धान्तिक भाग का उपसंहार है। इसके बाद के चार पद केवल नई वाचा के शब्दों का उद्धरण हैं, ताकि पवित्र आत्मा की गवाही के द्वारा इसकी शिक्षा की पुष्टि हो। लेखक ने, सन्दर्भ में, मसीह के बलिदान के स्वरूप की व्याख्या करके यह दिखा दिया कि परमपवित्र स्थान का मार्ग क्या है, और अब वह उसके मूल्य और प्रभाव के अपने प्रमाण का सार इन शब्दों में देता है: “उसने एक ही चढ़ावे के द्वारा उन्हें जो पवित्र किए जाते हैं, सर्वदा के लिये सिद्ध कर दिया है।” यहाँ हमें पत्री में आनेवाले सबसे महत्वपूर्ण शब्दों में से पाँच मिलते हैं।
पवित्र किए गए। यह मसीह के आने के उस महान उद्देश्य की ओर पीछे देखता है, जैसा हमने अध्याय 2 में पाया। पवित्र किया जाना यह है: पाप से शुद्ध किया जाना, संसार और पाप के क्षेत्र और सामर्थ में से निकाला जाना, और परमपवित्र स्थान में परमेश्वर की पवित्रता के क्षेत्र और सामर्थ में जीवन बिताने के लिये लाया जाना। यह पद 10 की ओर भी पीछे देखता है: “उसी इच्छा से हम मसीह की देह के चढ़ाए जाने के द्वारा पवित्र किए गए हैं।”
उसने उन्हें जो पवित्र किए जाते हैं, सिद्ध कर दिया है। यह केवल इतना ही नहीं कहता कि उसने उनके लिये वह सब कुछ जिसकी उन्हें आवश्यकता है, समाप्त और पूरा कर दिया है। यह शब्द उस बात की ओर पीछे संकेत करता है जो स्वयं उसके सिद्ध किए जाने के विषय में कही गई थी। जो कुछ वह बना, वह हमारे लिये था। अपने एक बलिदान में उसने न केवल स्वयं सिद्धता पाई, वरन् हमें भी सिद्ध कर दिया; उसने हमें अपनी सिद्धता की संगति में ले लिया, अपना सिद्ध जीवन हममें रोप दिया, और अपना सिद्ध किया हुआ मानवीय स्वभाव हमें दे दिया, कि हम उसे पहिन लें और उसी में जीवन बिताएँ।
सर्वदा के लिये। उसने हमें एक ही बार सदा के लिये और सर्वदा के लिये सिद्ध कर दिया है। उसकी सिद्धता हमारी है; हमारा सारा जीवन हमारे लिये तैयार किया गया है, कि हम उसे उसके हाथ से ग्रहण करें। बलिदान के द्वारा। मसीह की मृत्यु, उसका लहू, उसका बलिदान ही वह सामर्थ है जिसके द्वारा हम पवित्र भी किए गए हैं और सिद्ध भी। यही वह मार्ग है जिसे उसने खोल दिया, जिसमें वह हमें अपने साथ ले चलता है—उसमें जो वह है और जो वह करता है, उस एक के रूप में जो युगानुयुग के लिये सिद्ध किया गया है—और परमपवित्र स्थान में।
एक ही बलिदान के द्वारा। एक, क्योंकि और किसी की आवश्यकता नहीं, न दूसरों के द्वारा, न स्वयं उसके द्वारा; एक, जो ईश्वरीय है, और इसलिये पर्याप्त और सर्वदा के लिये है। इस खण्ड का मुख्य विचार यह है: उसने उन्हें जो पवित्र किए जा रहे हैं, सर्वदा के लिये सिद्ध कर दिया है। पद 10 के शब्द, “उसी इच्छा से हम पवित्र किए गए हैं,” हमारे पवित्रीकरण की बात एक सम्पन्न तथ्य के रूप में करते हैं: हम पवित्र लोग हैं, मसीह में पवित्र, उसके साथ अपने वास्तविक मेल के कारण, और इस कारण कि उसका पवित्र जीवन हमारे अस्तित्व के केन्द्र में रोपा गया है। यहाँ हमारी चर्चा ऐसे लोगों के रूप में की गई है जो पवित्र किए जा रहे हैं। एक प्रक्रिया है जिसके द्वारा मसीह में हमारे नए जीवन को हमारे सारे बाहरी अस्तित्व पर अधिकार पाना और उसमें पवित्रता को सिद्ध करना है। परन्तु इस क्रमिक पवित्रीकरण का विश्राम और उसका निश्चय मसीह के कार्य के ‘एक ही बार’ और ‘सर्वदा’ में है। उसने उन्हें जो पवित्र किए जा रहे हैं, सर्वदा के लिये सिद्ध कर दिया है।
अध्याय 9:9 और 10:1 में हम पढ़ते हैं कि बलिदान विवेक के विषय में आराधना करनेवाले को कभी सिद्ध नहीं कर सकते थे, निकट आनेवालों को कभी सिद्ध नहीं कर सकते थे, कि उन्हें पापों का फिर कोई बोध न रहे। हमारा विवेक वह है जो यह निर्धारित करता है कि परमेश्वर के सामने अपने विषय में हमारा बोध कैसा होना चाहिए—मसीह विवेक के विषय में आराधना करनेवाले को सिद्ध कर देता है, यहाँ तक कि पापों का फिर कोई बोध नहीं रहता। उसने उन्हें जो पवित्र किए जाते हैं, सर्वदा के लिये सिद्ध कर दिया है। मसीह के याजकपद वाले अध्याय के अन्त में हम स्वयं उसके विषय में पढ़ते हैं (7:28): वह एक महायाजक है, एक पुत्र, जो युगानुयुग के लिये सिद्ध किया गया है। यहाँ उसके कार्य के विवरण के अन्त में उसके पवित्र लोगों के विषय में कहा गया है: उसने उन्हें सर्वदा के लिये सिद्ध कर दिया है। दोनों स्थानों में सिद्धता एक ही और वही है। मनुष्य के पुत्र के रूप में, दूसरे आदम के रूप में, जो अपने सब लोगों में जीवित है, उसने उनके लिये अपने आप को, और अपने आप में उन्हें सिद्ध किया। उसकी सिद्धता और उनकी सिद्धता एक ही है।
और उसकी सिद्धता किस बात में है, यह भी हम जानते हैं। (देखिए 2:10 और 5:9।) महिमा के मार्ग में नायक के रूप में, परमेश्वर ने उसे दुःख उठाने के द्वारा सिद्ध किया; उसमें उस दीनता और नम्रता और धीरज को सिद्ध किया जो उसे मेम्ने के रूप में चिह्नित करते हैं, जो परमेश्वर मनुष्य से माँगता है, और जो परमेश्वर के साथ वास करने के लिये मनुष्य की एकमात्र योग्यता हैं। प्रार्थनाएँ चढ़ाकर, और अपनी भक्ति के कारण सुना जाकर, पुत्र होने पर भी उसने दुःख उठा उठाकर आज्ञा माननी सीखी, और सिद्ध बना। उसकी भक्ति, अपनी इच्छा के पूर्ण समर्पण में परमेश्वर की बाट जोहना, आज्ञाकारिता सीखने के लिये उसका झुक जाना, मृत्यु तक भी आत्मबलिदान की उसकी आत्मा—इसी के द्वारा वह मनुष्य के रूप में सिद्ध किया गया, इसी में उसने मानवीय स्वभाव को सिद्ध किया, और अपने लोगों को भी सिद्ध किया। अपनी मृत्यु में उसने तीन प्रकार का कार्य पूरा किया। उसने अपने आप को, अपने मानवीय स्वभाव और चरित्र को सिद्ध किया। उसने हमारे छुटकारे को सिद्ध किया, पाप को उस स्थान से, जो उसका स्वर्ग में था (9:23), और हमारे हृदयों में से, सिद्ध रीति से दूर करके। उसने हमें सिद्ध किया, हमें अपनी ही सिद्धता में ऊपर उठा लेकर, और हमें उस सिद्ध मानवीय स्वभाव का भागी बनाकर, जिसे उसने दुःख उठाने और आज्ञा मानने में, अपने लिये तैयार की गई देह में, और उसमें पूरी की गई परमेश्वर की इच्छा में, हमारे लिये गढ़कर तैयार किया था। स्वयं मसीह हमारी सिद्धता है—उसमें यह पूर्ण है; उसमें निरन्तर बने रहना ही सिद्धता है।
“आइए, हम सिद्धता की ओर आगे बढ़ते जाएँ”—यही वह पुकार थी जिसके साथ हम इस पत्री की उच्चतर जीवन की शिक्षा में ले जाए गए थे। यहाँ हमारा लक्ष्य है। मसीह ने एक ही चढ़ावे के द्वारा हमें सर्वदा के लिये सिद्ध कर दिया है। हम उसे सर्वदा के याजक, नए पवित्रस्थान के सेवक, और नई वाचा के मध्यस्थ के रूप में जानते हैं, जो अपने लहू के द्वारा परमपवित्र स्थान में प्रवेश कर गया—वहाँ वह अविनाशी जीवन की सामर्थ में सर्वदा जीवित है, ताकि अपना सिद्ध जीवन हमें दे और हमारे भीतर उसे बनाए रखे। सिद्धता के इस पथ पर चलना—जिसे उसने, हमारे नायक के रूप में, परमेश्वर की इच्छा पूरी करने में खोल दिया—यही परमपवित्र स्थान में जाने का नया और जीवित मार्ग है।
मसीह का कार्य एक सिद्ध और सिद्ध किया हुआ कार्य है। सब कुछ सर्वदा के लिये समाप्त और पूर्ण है। और हमें बस विश्वास के द्वारा देखना और भीतर प्रवेश करना है, और खोजना और आनन्द करना है, और उसकी परिपूर्णता में से अनुग्रह पर अनुग्रह पाना है। आपके सामने रखी गई विभिन्न आशीषों को समझने या उन पर दावा करने में, या उन्हें आपस में जोड़ने में, आप जो भी कठिनाई अनुभव करते हैं, उसका समाधान इस एक विचार में पाइए: मसीह ने हमें सर्वदा के लिये सिद्ध कर दिया है; उस पर भरोसा कीजिए, उससे लिपटे रहिए, वह सब कुछ करेगा।
2. एक ही बलिदान सर्वदा के लिये। हम सर्वदा के लिये सिद्ध किए गए। और वह, जिसने यह सब किया, वह सर्वदा के लिये सिंहासन पर बैठा है। हमारा धन्य याजक-राजा, वह यह सब हमारा बना देने के लिये जीवित है। अविनाशी जीवन की उस सामर्थ में, जिसमें उसने अपने आप को परमेश्वर के सामने चढ़ाया, जिसमें वह परमपवित्र स्थान में प्रवेश कर गया, वह अब इसलिये जीवित है कि जो कुछ उसने सम्पन्न किया है, वह सब हमारे हृदयों में दे और वह सब वहाँ हो। हमें और किस बात की आवश्यकता हो सकती है? इसलिये, हे पवित्र भाइयो! तुम जो स्वर्गीय बुलाहट में भागी हो, यीशु पर ध्यान करो।
80 पवित्र आत्मा की गवाही
10:15. और पवित्र आत्मा भी हमें गवाही देता है; क्योंकि यह कहने के बाद कि, प्रभु कहता है, जो वाचा मैं उन दिनों के बाद उनसे बाँधूँगा वह यह है, कि मैं अपनी व्यवस्थाओं को उनके हृदय पर डालूँगा, और उनके मन पर भी उन्हें लिखूँगा, फिर वह कहता है, और उनके पापों को और उनके अधर्म के कामों को मैं फिर कभी स्मरण न करूँगा।
18. और जहाँ इनका पापमोचन है, वहाँ पाप के लिये फिर कोई चढ़ावा नहीं। लेखक ने अपना तर्क समाप्त कर दिया है। उसने स्पष्ट कर दिया है कि मसीह के बलिदान ने, अर्थात् परमेश्वर की इच्छा के प्रति उसकी देह के चढ़ाए जाने ने, हमारे लिये परमपवित्र स्थान में जाने का एक नया मार्ग खोल दिया है।
यीशु मसीह की देह के चढ़ाए जाने के द्वारा हम पवित्र किए गए हैं। जब वह एक ही बलिदान सर्वदा के लिये चढ़ा चुका, तो परमेश्वर के दाहिने जा बैठा। उसने एक ही चढ़ावे के द्वारा उन्हें जो पवित्र किए जाते हैं, सर्वदा के लिये सिद्ध कर दिया है। उसका बलिदान पूरा हो चुका है, और उसकी सामर्थ सदा के लिये बनी रहती है—उसी के बल पर वह सिंहासन पर बैठा है, अपनी अन्तिम विजय की बाट जोहता हुआ—जिन्हें उसने पवित्र किया है, वे सर्वदा के लिये सिद्ध किए गए हैं। बलिदान अनन्त मूल्य का है—उसने सिद्ध और अनन्त पवित्रता और महिमा की दशा का द्वार खोल दिया है; अब और किसी बात की आवश्यकता नहीं, केवल इसकी कि हम आनन्द करें और बाट जोहें और सिंहासन पर विराजमान राजा को अपने पूरे किए हुए कार्य की सामर्थ लागू करते और प्रगट करते हुए देखें।
लेखक ने जो कुछ कहा है, उसके समर्थन में वह नई वाचा की स्थापना के शब्दों की दुहाई देता है (8:6-13)। वह यह इन शब्दों के साथ करता है: “और पवित्र आत्मा भी हमें गवाही देता है।” यिर्मयाह के शब्द उसके लिये पवित्र आत्मा के शब्द हैं। वह सीधी प्रेरणा पर विश्वास करता है। यह वही परमेश्वर था जो आदि ही से अन्त को जानता है, जिसने छुटकारे की तैयारी में छोटी से छोटी से लेकर बड़ी से बड़ी बात तक सब कुछ ठहराया था, जिसने यिर्मयाह पर उस नई वाचा को प्रगट किया था जो सदियों बाद बाँधी जानेवाली थी। यह वही पवित्र आत्मा था जिसने मलिकिसिदक के पहले विवरण को, और परमेश्वर की शपथवाले भजन को प्रेरित किया था, जिसने तम्बू और परदे का ऐसा प्रबन्ध किया था कि वे दिखाएँ कि परमपवित्र स्थान का मार्ग अभी खुला नहीं था, और जिसने पहली वाचा और उसके बिना लहू के नहीं हुए प्रतिष्ठापन पर दृष्टि रखी थी—उसी के द्वारा नई वाचा की प्रतिज्ञा कही और लिखी गई। हमारा लेखक उसी की और उसकी गवाही की दुहाई देता है।
वह ऐसा उस व्यक्ति के रूप में करता है जिसे स्वयं उसी आत्मा की शिक्षा प्राप्त है। वाचा के शब्दों को, और यीशु की मृत्यु के विषय में, कोई भी पढ़ सकता था; परन्तु उसी आत्मा से शिक्षा पाए हुए व्यक्ति के सिवा और कोई उन्हें उनके ईश्वरीय सामंजस्य और उनके अनन्त महत्व में जोड़ और समझा नहीं सकता था। इन लोगों ने स्वर्ग से भेजे गए पवित्र आत्मा के द्वारा सुसमाचार सुनाया; सिंहासन पर जा बैठे राजा की ओर से आए आत्मा ने उनमें और उन पर परमेश्वर की इच्छा को, और परमपवित्र स्थान का मार्ग खोलने के लिये उस एक बलिदान की अनन्त सामर्थ को प्रगट किया।
और अब नई वाचा में पवित्र आत्मा की गवाही क्या है? वाचा की दोनों आशीषों की, उनकी ईश्वरीय, अविभाज्य एकता में, गवाही। “मैं अपनी व्यवस्थाओं को उनके हृदय में डालूँगा, और उनके पापों को मैं फिर कभी स्मरण न करूँगा।” पापों के पूर्ण पापमोचन की, पाप के परमेश्वर की दृष्टि और स्मरण में से सर्वदा के लिये हटा दिए जाने की प्रतिज्ञा की गई थी। अब, हमारा लेखक तर्क करता है, जहाँ इनका पापमोचन है, वहाँ पाप के लिये फिर कोई चढ़ावा नहीं। उस एक चढ़ावे ने उन्हें जो पवित्र किए जाते हैं, सर्वदा के लिये सिद्ध कर दिया है। मसीह की मृत्यु ने परमेश्वर के साथ एक ऐसे सम्बन्ध का, उसके सामने जीवन की एक ऐसी दशा का मार्ग खोल दिया है और हमें उसमें पहुँचा दिया है, जिसमें पाप अन्तिम रूप से दूर कर दिया गया है, और परमेश्वर हमें उन लोगों के रूप में अपनी संगति में ग्रहण करता है जो मसीह में पवित्र किए गए हैं। वह लहू के द्वारा हमें परमपवित्र स्थान में ग्रहण करता है। वह लहू, जो प्रायश्चित के ढकने पर छिड़का जाता है, हमारे विवेक पर भी छिड़का जाता है और उसे शुद्ध करता है, और पूर्ण पापमोचन को, पाप और उसकी सामर्थ से पूर्ण छुटकारे को, हमारे अन्तरतम अस्तित्व में ले आता है, और हमारे हृदय को स्वर्ग के उस आत्मा को ग्रहण करने के योग्य बनाता है जो लहू के साथ गवाही देता है, और जो जीवन के आत्मा के रूप में व्यवस्था को हमारे भीतर, हमारे जीवन की व्यवस्था के रूप में, डाल देता है।
और इस प्रकार हम मसीह के पूरे किए हुए कार्य में, और उसमें परमेश्वर के विश्राम में प्रवेश करते हैं; उस सिद्धता में प्रवेश करते हैं जिसके द्वारा वह स्वयं युगानुयुग के लिये सिद्ध किया गया, और जिसके द्वारा उसने हमें सर्वदा के लिये सिद्ध कर दिया है; उस परमपवित्र स्थान में, जिसमें परमेश्वर यह प्रतिज्ञा पूरी करता है, “मैं उनका परमेश्वर ठहरूँगा, और वे मेरे लोग ठहरेंगे।” और मसीह की देह का एक ही बार सदा के लिये चढ़ाया जाना, वह एक ही बलिदान जो सर्वदा के लिये है, सदा बढ़ते हुए आनन्द में विश्वासी का एकमात्र विचार, एकमात्र भरोसा, एकमात्र आनन्द, एकमात्र जीवन बन जाता है। उसका उद्धार और छुटकारा पूरी और अनन्त वास्तविकताएँ हैं, उसकी सिद्धता और पवित्रीकरण भी। हमारी एकमात्र आवश्यकता यह है कि हम विश्वास करें, और उसमें बने रहें, और उसे ग्रहण करें जो सिंहासन पर विराजमान हमारा याजक-राजा अपने आत्मा के द्वारा देता है—‘पाप के लिये फिर कोई चढ़ावा नहीं’ में, और उससे निकलनेवाली सब बातों में, पूर्ण प्रवेश; हमारे सर्वदा के याजक के व्यक्तित्व और सिंहासन और कार्य में—यही परमपवित्र स्थान में प्रवेश है। और पवित्र आत्मा भी हमें गवाही देता है। पाप की क्षमा की सच्चाई को उन प्रारम्भिक नींव की सच्चाइयों में से एक के रूप में समझना सहज है, जिनके विषय में हम अध्याय 6
(पद 1) में पढ़ते हैं। परन्तु यदि हम सिद्धता की ओर आगे बढ़ने, और यह जानने का यत्न करें कि उद्धार की वह परिपूर्णता क्या है जिसमें यह ले जाती है, तो हम भरोसा रख सकते हैं कि पवित्र आत्मा उसे प्रगट करेगा, और हमारे भीतरी जीवन में उसकी गवाही देगा। वह उसे बुद्धि पर, या सांसारिक अध्ययन के प्रतिफल के रूप में, प्रगट नहीं करता, वरन् मन के दीनों पर और उन पर जो हृदय में नम्र हैं।
परमेश्वर अपने पुत्र के आत्मा को हृदय ही में भेजता है; जो हृदय परमेश्वर के साथ सिद्ध संगति के इस जीवन की लालसा करता है, इसे चुनता है, इससे प्रेम करता है, और अपने सबसे बड़े आनन्द से भी बढ़कर इसकी बाट जोहता है, उसे परमेश्वर का आत्मा यह गवाही देगा कि ‘पाप के लिये फिर कोई चढ़ावा नहीं’ सचमुच परमपवित्र स्थान का खोला जाना है। पवित्र आत्मा, जो स्वर्ग से आता है, जो कुछ स्वर्ग में है उसकी गवाही देता है। स्वर्ग में जो कुछ होता है, उसके विषय में हम अपने हृदय में पवित्र आत्मा के द्वारा ही कुछ सचमुच जान सकते हैं, और किसी रीति से नहीं। हममें वास करते हुए वह हमारे अन्तरतम जीवन में मसीह के प्रायश्चित के सारे प्रभाव की, और परमेश्वर की उपस्थिति में उसके सिंहासन पर विराजमान होने की, पूरी गवाही देता है।
वह एक केन्द्रीय सच्चाई, जिसकी पवित्र आत्मा गवाही देता है, यह है: कि जीने और परमेश्वर की सेवा करने का पुराना ढंग अब पूरी रीति से और सर्वदा के लिये समाप्त हो गया है। मृत्यु और शैतान निकम्मे कर दिए गए हैं; परदा फट गया है; पाप दूर कर दिया गया है; पुरानी वाचा रद्द कर दी गई है, मिट गई है, उठा दी गई है। मसीह यीशु की सामर्थ में एक नई व्यवस्था, एक नया मार्ग, एक नया और अनन्त जीवन खोल दिया गया है। आह, काश हमारी आँखें और हृदय खुल जाएँ, कि हम देखें कि यह केवल एक विचार, बुद्धि के लिये एक सच्चाई ही नहीं, वरन् अस्तित्व की एक आत्मिक दशा है, जिसमें पवित्र आत्मा हमें पहुँचा सकता है।
2. पवित्र आत्मा गवाही देता है। इसी के लिये वह पिन्तेकुस्त के दिन स्वर्गीय पवित्रस्थान में से, और हमारे अति महान किए गए याजक-राजा की ओर से, नीचे उतरा, ताकि स्वर्गीय जीवन को, स्वर्ग के राज्य को, चेलों के पास नीचे ले आए, और उसे उनके लिये वास्तविक बना दे, एक ऐसी वस्तु के रूप में जो उनके हृदयों में पाई और अनुभव की जाती है।
हम में से हर एक को उसी पिन्तेकुस्ती सामर्थ में पवित्र आत्मा की आवश्यकता है, और हम उस पर दावा कर सकते हैं, और तब वह नया, वह अनन्त, वह स्वर्गीय जीवन हमें भी भर देगा। दूसरा आधा भाग — व्यावहारिक। अध्याय 10:19 — 13:24। पुत्र में परमेश्वर के अपने आप को प्रगट करने की महिमा के अनुरूप जीवन के लिये बुलाहट।
नौवाँ खण्ड — 10:19-25। परमपवित्र स्थान में जीवन के विषय में। इस केन्द्रीय खण्ड की, जिसमें पूरी पत्री का सार है, समृद्ध विषय-वस्तु को भली-भाँति ग्रहण करने में शायद यह हमारी सहायता करे, यदि हम यहाँ इसमें निहित मुख्य विचारों को प्रस्तुत कर दें।
I. नई आराधना की चार महान आशीषें — 1. परमपवित्र स्थान खोल दिया गया। 2. लहू के द्वारा हियाव। 3. एक नया और जीवित मार्ग। 4. महान महायाजक। II. सच्चे आराधक के चार मुख्य चिह्न — 1. सच्चा मन। 2. विश्वास की परिपूर्णता।
3. बुरे विवेक से छिड़का हुआ हृदय। 4. शुद्ध जल से धोई हुई देह। III. वे चार महान कर्तव्य जिनके लिये खुला हुआ पवित्रस्थान बुलाता है — 1. आइए, हम (विश्वास की परिपूर्णता में) निकट आएँ। 2. आइए, हम अपनी आशा के अंगीकार को दृढ़ता से थामे रहें। 3. आइए, हम प्रेम के लिये उस्काने को एक दूसरे की चिन्ता करें। 4. आइए, हम एक दूसरे के साथ इकट्ठा होना न छोड़ें।
- 1 परमपवित्र स्थान।