अध्याय 18 (21 में से)

दसवाँ खण्ड

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इब्रानियों 11:1-40 — विश्वास की परिपूर्णता

98 विश्वास — अनदेखी वस्तुओं को ग्रहण करनेवाली इन्द्रिय

11:1. अब विश्वास आशा की हुई वस्तुओं का निश्चय, और अनदेखी वस्तुओं का प्रमाण है। 2. क्योंकि इसी के द्वारा प्राचीनों के विषय में गवाही दी गई। 3. विश्वास ही से हम जान जाते हैं कि सारे जगत की रचना परमेश्वर के वचन के द्वारा हुई है, यहाँ तक कि जो कुछ देखने में आता है, वह दिखाई देनेवाली वस्तुओं से नहीं बना।

पिछला अध्याय इस गम्भीर शिक्षा के साथ समाप्त हुआ था: कोई तीसरा मार्ग नहीं है — या तो विश्वास करना, या पीछे हट जाना; मसीही के लिये विश्वास में दृढ़ होने के सिवा न कोई सुरक्षा है, न कोई सामर्थ; परमेश्वर को प्रसन्न करने का, उसकी उपस्थिति और उसकी कृपा में बने रहने का, विश्वास के सिवा और कोई मार्ग नहीं है। यदि कोई पीछे हट जाए, तो मेरा मन उससे प्रसन्न न होगा। और इसलिये, जब पत्री यह सिखा चुकी है कि परमेश्वर ने क्या कुछ किया है, तो अब हमें यह देखना है कि उसकी सामर्थ और आशीष का आनन्द उठाने के लिये हमें केवल एक ही बात की आवश्यकता है — विश्वास की परिपूर्णता। हमें दिखाया जाएगा कि कैसे यही परमेश्वर के सब पवित्र लोगों के जीवन की, और उस सब की जो परमेश्वर ने उनके लिये किया, कुंजी है।

लेखक आरम्भ में एक सामान्य कथन देता है कि विश्वास अपने स्वभाव और अपनी क्रिया में वास्तव में क्या है। अब विश्वास आशा की हुई वस्तुओं का निश्चय, और अनदेखी वस्तुओं का प्रमाण है। विश्वास प्राण की वह आत्मिक शक्ति है जिसका सम्बन्ध भविष्य और अनदेखी आत्मिक वास्तविकताओं से है। जिस प्रकार हमारी इन्द्रियाँ हैं, जिनके द्वारा हम भौतिक जगत के साथ सम्पर्क रखते हैं, उसी प्रकार विश्वास वह आत्मिक इन्द्रिय या अंग है जिसके द्वारा प्राण आत्मिक जगत के सम्पर्क में आता है और उससे प्रभावित होता है। जिस प्रकार देखने या सुनने की इन्द्रिय तब तक एक सोई हुई शक्ति रहती है जब तक कि बाहरी वास्तविकता — प्रकाश या ध्वनि — उस पर आकर नहीं पड़ती, उसी प्रकार विश्वास अपने आप में एक ऐसी इन्द्रिय है जिसमें अनन्त बातों की छाप ग्रहण कर सकने की सम्भावना या क्षमता के सिवा और कोई सामर्थ नहीं। वह एक खाली पात्र के समान है जो अपनी अनदेखी सामग्री से भरे जाने की बाट जोहता है। केवल तभी, जब अनन्त वास्तविकताएँ निकट आती हैं और अपनी सामर्थ का प्रयोग करती हैं, विश्वास आशा की हुई वस्तुओं का सार बनता है और बना रहता है — वह नींव जो वे प्राण में डालती हैं; और अनदेखी वस्तुओं का प्रमाण या निश्चय बनता है — वह कायल करनेवाली सामर्थ जिसके द्वारा वे अपने अलौकिक अस्तित्व की गवाही और प्रमाण देती हैं।1 एक सोई हुई शक्ति के रूप में विश्वास इस संचार को ग्रहण करने की क्षमता है; एक क्रियाशील सामर्थ के रूप में विश्वास जो कुछ है, वह उस अदृश्य की छाया में होने के कारण है। अदृश्य ही पहल करता है और विश्वास को जगाता है; विश्वास उसकी छाप को ग्रहण करता है और उसके साथ और भी पूर्ण एकता की खोज में लगा रहता है।

इस प्रकार विश्वास किसी दूसरे के वचन पर भरोसा करने से कहीं अधिक है। वह भरोसा उसके आरम्भिक प्रयोग के रूप में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है, परन्तु 1 “सार” (substance) और “प्रमाण” (proof) — ये दोनों शब्द वस्तुगत और आत्मगत, दोनों अर्थों में प्रयुक्त होते हैं। “सार” के लिये प्रयुक्त शब्द का ठीक अर्थ नींव है, और वह किसी वस्तु के वास्तविक स्वभाव के लिये, उसके बाहरी रूप के विपरीत, प्रयुक्त होता है। इस प्रकार अध्याय 3 में वह परमेश्वर के तत्व, अर्थात् ईश्वरीय सार के लिये आया है। अथवा वह उस भरोसे के लिये प्रयुक्त होता है जो जानता है कि वह एक दृढ़ नींव पर टिका है। इस प्रकार अध्याय 3:14 में — “हमारे आरम्भ के भरोसे”। इन दोनों अर्थों के बीच के सम्बन्ध को दृढ़ता से थामे रहना महत्त्वपूर्ण है। इसी प्रकार “प्रमाण” या “निश्चय” शब्द, जो उस क्रिया से बना है जो ऐसे स्थलों में प्रयुक्त हुई है, जैसे — “आत्मा पाप के विषय में निरुत्तर करेगा,” और अन्यत्र अनेक बार डाँटने, झिड़कने के अर्थ में — दोनों बातों का अर्थ देता है: दोष का बोध, या किसी ऐसे सत्य का निश्चय जो बाहर से लाया जाता है, और वह आन्तरिक निश्चय भी जो तब उत्पन्न होता है जब कोई व्यक्ति झुक जाता है और अपने आप को कायल होने देता है। इस प्रकार इसका अर्थ प्रमाण का साधन भी है और स्वयं प्रमाण भी। देखिए 2 तीमुथियुस

3 — पवित्रशास्त्र ... समझाने के लिये लाभदायक है। — वचन को केवल एक सेवक होना चाहिए, जो हमें उस ईश्वरीय सत्य तक, जो उसमें निहित है, और उस जीवित व्यक्ति तक, जिससे वह आता है, भीतर ले जाए। विश्वास के आधार के रूप में वचन पर ही बहुत अधिक ध्यान देना एक ऐसे विश्वास की ओर ले जाएगा जो आत्मिक कम और बौद्धिक अधिक होगा — ऐसा विश्वास जो, जैसा कि कलीसिया में सर्वत्र दिखाई देता है, परमेश्वर की सामर्थ पर कम और मनुष्यों के ज्ञान पर, तर्क की शक्ति पर अधिक टिका रहता है। हमें बहुत गहराई से इस बात का निश्चय होना चाहिए कि विश्वास केवल कुछ प्रतिज्ञाओं के साथ व्यवहार करना नहीं है, वरन् हमारे चारों ओर के अनदेखे जगत के साथ निरन्तर चलनेवाली आत्मिक संगति है। जिस प्रकार साँस लेने में हमारे फेफड़े, या देखने में हमारी आँखें, अपने आप को खुला रखती हैं ताकि वायु या प्रकाश से वह सब निरन्तर ग्रहण करती रहें जो वे शाब्दिक अर्थ में बिना रुके हम पर डालते रहते हैं, उसी प्रकार विश्वास उस आत्मिक इन्द्रिय का स्वर्ग की ओर निरन्तर बढ़ते रहना है, जिस पर भविष्य और अनदेखी बातें अपने आप को निकट और उपस्थित, जीवित और सामर्थी रूप में प्रगट करती हैं। आत्मिक जीवन में विश्वास उतना ही स्वाभाविक, उतना ही निरन्तर होना चाहिए, जितना हमारा साँस लेना और देखना, जब हम अपना साधारण काम कर रहे होते हैं।

क्योंकि इसी के द्वारा प्राचीनों के विषय में गवाही दी गई। हाबिल के विषय में हम पढ़ते हैं: उसके धर्मी होने की गवाही दी गई, क्योंकि परमेश्वर ने उसकी भेंटों के विषय में गवाही दी। और हनोक के विषय में: उसकी यह गवाही दी गई थी कि उसने परमेश्वर को प्रसन्न किया है। और इसी प्रकार सब के विषय में, पद 39 में, कहा गया है: विश्वास ही के द्वारा इन सब के विषय में अच्छी गवाही दी गई। विश्वास अपनी आशीष के लिये अपने प्रयत्न की तीव्रता पर निर्भर नहीं है; अनदेखा जगत, वह अनन्तता जो हमें घेरे हुए है, सब जीवते परमेश्वर से भरा हुआ है; और जो विश्वास स्वर्ग की ओर अपने आप को खोलता है, उसके पक्ष में वह स्वयं गवाही देता है। आइए, हम इस बात का निश्चय रखें — विश्वास बढ़कर दृढ़ और पूर्ण निश्चय बन सकता है; वह अपना भरोसा अपने आप में नहीं, परन्तु परमेश्वर में पाता है। आइए, हम इस पर भरोसा रखें कि जो विश्वास अनन्त बातों की खोज करता है, उससे परमेश्वर स्वयं आकर मिलेगा, और वह स्वयं यह गवाही देगा कि परमेश्वर हमें धर्मी गिनता है, कि हम उसकी दृष्टि में उसे प्रसन्न करनेवाले हैं।

विश्वास ही से हम जान जाते हैं कि सारे जगत की रचना परमेश्वर के वचन के द्वारा हुई है, यहाँ तक कि जो कुछ देखने में आता है, वह दिखाई देनेवाली वस्तुओं से नहीं बना। यह दृश्य जगत मनुष्य के लिये परमेश्वर को भूल जाने की बड़ी परीक्षा है। विश्वास वह आँख है जिससे वह सब में परमेश्वर को देख सकता है, जो इस जगत के प्रत्येक भाग को परमेश्वर की निकटता और भलाई का पारदर्शी प्रकाशन बना देती है।

विश्वास ही से हम जान जाते हैं कि सब कुछ परमेश्वर के द्वारा रचा गया; विश्वास ही से हम सब में ईश्वरत्व और सर्वशक्तिमत्ता को देखते हैं, ताकि जो कुछ देखने में आता है उसके विषय में यह जाना जाए कि वह उन वस्तुओं से बना है जो दिखाई नहीं देतीं। उसके अनदेखे गुण, अर्थात् उसकी सनातन सामर्थ और परमेश्वरत्व, जगत की सृष्टि के समय से स्पष्ट देखने में आते हैं। विश्वास उसकी कारीगरी के प्रत्येक भाग पर उसकी छाप देखता है, सब को जीवते परमेश्वर से व्याप्त देखता है; नाश होनेवाली और मिट जानेवाली वस्तुओं से घिरा रहकर भी वह अनन्तता के बीच में खड़ा रहता है, वह जानता है कि उसका नाता उस अपरिवर्तनीय से जुड़ा है। यह जगत बाधा बनने के बजाय सनातन परमेश्वर को प्रगट करने में सहायक बन जाता है। और विश्वास अपना जीवन, अपना आनन्द और अपनी निरन्तर बढ़ती हुई सामर्थ इसी में पाता है कि वह हर कहीं उस परमेश्वर से भेंट करे जो अपने खोजनेवालों को अपने विषय में गवाही देने में आनन्दित होता है।

विश्वास को अधिकतर एक ऐसी शक्ति समझा जाता है जिसके द्वारा हम स्वर्गीय बातों को पकड़ते हैं, और ऐसा करने के व्यर्थ प्रयत्नों में हम अपने आप को थका डालते हैं। नहीं, विश्वास वह सार है, वह नीचे की नींव है, जिसे ईश्वरीय बातें मुझमें डालती हैं; वह प्रमाण है जो वे मुझमें अपनी वास्तविक सच्चाई का देती हैं। जिस प्रकार सूर्य का प्रकाश स्वयं ही अपनी गवाही और अपना प्रमाण है, वैसा ही परमेश्वर के प्रकाश के साथ भी है। जितना अधिक हम इसे देखेंगे, उतनी ही अधिक भरोसे से भरी हमारी यह आशा होगी कि वे अपने आप को हम पर प्रमाणित करेंगी, और उतनी ही अधिक नम्र, धीरजवन्त और दीन वह आत्मा होगी जिसमें हम उनके आत्म-प्रकाशन की बाट जोहते हैं।

इस प्रकार विश्वास को दृढ़ करने के नियम बहुत सरल हैं। अनदेखे जगत को ईश्वरीय सत्य और सामर्थ का एक वास्तव में विद्यमान राज्य समझिए, जो आप पर विजय पाना, आप को अपने अधिकार में लेना और आशीष देना चाहता है। आपके भीतर विश्वास का जो भी परिमाण है, उसे उस राज्य के अस्तित्व और कार्य का प्रमाण, और एक और भी पूर्ण प्रकाशन का बयाना मानकर स्वीकार कीजिए। वचन में उसके विषय में जो कुछ प्रगट किया गया है, उस सब को एक मार्ग-सूचक पट्ट के समान स्वीकार कीजिए, जो लालसा को जगाए और पूर्ण अधिकार तक पहुँचने का मार्ग दिखाए। पवित्र अलगाव में, संसार से अलग होकर, अपने हृदय को खुला रखिए; मनन, आराधना और आशा-भरी प्रतीक्षा में अनदेखा जगत दृश्य जगत से भी अधिक वास्तविक और अधिक निकट हो सकता है। 3. किसी बात का प्रमाण केवल वही हो सकता है जो प्रमाणित की जानेवाली वस्तु के स्वभाव में सहभागी हो। विश्वास और आत्मिक जगत के साथ भी ऐसा ही है।

99 हाबिल — विश्वास का बलिदान

11:4. विश्वास ही से हाबिल ने परमेश्वर के लिये एक उत्तम बलिदान चढ़ाया, उस बलिदान से भी उत्तम जो

कैन ने चढ़ाया था; उसी के द्वारा उसके धर्मी होने की गवाही दी गई, क्योंकि परमेश्वर ने उसकी भेंटों के विषय में गवाही दी; और उसी के द्वारा वह मरने पर भी अब तक बातें करता है। पत्री के मुख्य शब्दों में से एक है — चढ़ावा, बलिदान।

“मसीह ने अपने आप को परमेश्वर के सामने चढ़ाया।” “उसने अपने ही बलिदान के द्वारा पाप को दूर कर दिया।” “उसने एक ही चढ़ावे के द्वारा उन्हें जो पवित्र किए जाते हैं, सर्वदा के लिये सिद्ध कर दिया है।” उस जीवन की भीतरी आत्मा और सामर्थ, जिसके द्वारा मसीह ने अपने पिता को प्रसन्न किया, और पाप को दूर किया, और ऊँचे पर महामहिमन् के सिंहासन पर अपना स्थान पाया, उसकी देह का चढ़ाया जाना था। हमारे उद्धार के नायक के रूप में वह अपने लोगों को उसी मार्ग में, उस नए और जीवते मार्ग में, अर्थात् आत्म-बलिदान के मार्ग में ले चलता है।

यह एक अत्यन्त उल्लेखनीय और गहरा अर्थ रखनेवाला तथ्य है कि जो लोग विश्वास के मार्ग में हमसे पहले चले, उनमें हम देखते हैं कि सबसे पहले व्यक्ति, हाबिल, के साथ विश्वास का पहला फल बलिदान था। वह मनोवृत्ति, जिसकी अभिव्यक्ति बलिदान है, विश्वास के जीवन की ठीक जड़ में है। यदि मैं इस अध्याय में यह सीखना चाहता हूँ कि विश्वास क्या है, और मैं कैसे विश्वास में दृढ़ हो सकता हूँ, तो मुझे भली भाँति ध्यान देना होगा कि सबसे पहला कदम क्या है: विश्वास ही से हाबिल ने उत्तम बलिदान चढ़ाया।

हम जानते हैं कि हाबिल के बलिदान का दोहरा अर्थ क्या था। एक ओर, वह परमेश्वर को एक ऐसे जीवन का चढ़ाना था जो मृत्यु के लिये सौंपा जाना था, ताकि उसके स्थान पर वह उस मृत्यु को सहे जो अपने स्वभाव ही से पाप का दण्ड है। वह पाप के विरुद्ध परमेश्वर के धर्मी न्याय को स्वीकार करना था; यह अंगीकार था कि बिना लहू बहाए पापों का पापमोचन नहीं हो सकता।

वह विश्वास का एक कार्य था; उसने यह माना कि बलिदान ग्रहणयोग्य होगा, और उसके साथ वह स्वयं भी ग्रहण किया जाएगा। दूसरी ओर, बलिदान अपने आप को परमेश्वर और उसकी सेवा के लिये चढ़ा देना और सौंप देना था। वह जानता था कि यह बात सच्चे बलिदान के स्वभाव और आत्मा ही में निहित है कि यदि वह मेम्ना तो चढ़ाए, पर अपने आप को रोक रखे, तो वह परमेश्वर को प्रसन्न नहीं कर सकता। नहीं, बलिदान यह दोहरा अंगीकार था कि वह प्रायश्चित के बिना अपने आप को परमेश्वर के सामने चढ़ाने के योग्य नहीं है, परन्तु यह विश्वास करते हुए कि बलिदान में वह ग्रहण किया गया है, उसने अपने आप को परमेश्वर की आराधना और सेवा के लिये दे दिया, उसने अपने आप को मृत्यु तक के लिये दे दिया — स्वयं के लिये मरने और परमेश्वर के लिये जीने को। और मानो उसकी अपनी मृत्यु को इस सत्य की पुष्टि करके उस पर मुहर लगानी थी; जिस मनुष्य ने विश्वास का बलिदान चढ़ाया था, जिसने अपनी आराधना की नींव एक मेम्ने की मृत्यु पर रखी थी, उसे परमेश्वर तक पहुँचने का मार्ग पाने के लिये स्वयं मरना पड़ा। प्रायश्चित के बलिदान के सदा दो पहलू होते हैं — मेम्ना एक साथ स्थानापन्न भी था और प्रतीक भी; उसकी मृत्यु प्रायश्चित भी थी और समर्पण भी।

विश्वास बलिदान के द्वारा परमेश्वर के निकट आता है — मसीह में यह सत्य अपनी पूर्ण सिद्धि को पहुँचता है। उसने एक ही चढ़ावे के द्वारा उन्हें जो पवित्र किए जाते हैं, सर्वदा के लिये सिद्ध कर दिया है। परमेश्वर तक हमारी पहुँच और उसके साथ हमारी संगति केवल मसीह के पूरे किए हुए काम में ही हो सकती है। हमें उसके लहू के द्वारा हियाव है — उसका लहू विवेक को शुद्ध और सिद्ध करता है। विश्वास का पहला बड़ा काम यह है कि वह मसीह के बलिदान, उसकी आज्ञाकारिता और उसकी धार्मिकता को, जो हमारे लिये ग्रहण की गई है, अपना बना ले, उसे परमेश्वर के सामने प्रस्तुत करे, और पवित्र आत्मा के द्वारा यह गवाही पाए, और अनुभव करे कि हम कैसे ग्रहणयोग्य हैं। परन्तु विश्वास यह पूरी तरह तब तक नहीं कर सकता जब तक कि वह साथ ही साथ बलिदान के भीतरी आत्मिक अर्थ में प्रवेश न करे, और उस आत्मा और मनोवृत्ति का सहभागी न बने जो उसमें से प्रगट होती है, और जिसमें ही उसका मूल्य है। विश्वास देखता है कि आत्म-बलिदान की वह व्यवस्था, जिसके अधीन सिर परमेश्वर के पास भीतर गया, प्रत्येक अंग के लिये भी व्यवस्था है। पाप और पापमय शरीर से निकलने का, मृत्यु से होकर जीवन में जाने के सिवा, और कोई मार्ग नहीं है। और जब विश्वास मसीह में इस सत्य की सुन्दरता और सामर्थ को देखता है, तो वह उसकी इस सर्वोच्च नैतिक महिमा में उसके समान बनने के लिये भूखा होता है, और स्वयं एक भीतरी आत्म-बलिदान की जड़ बन जाता है — अपने आप को परमेश्वर और उसकी पवित्रता के लिये निरन्तर चढ़ाते रहने की जड़; क्योंकि वह स्वयं महायाजक मसीह के साथ एक वास्तविक, जीवित एकता से कम कुछ नहीं है। मसीह हमारा स्थानापन्न इसलिये बना क्योंकि वह हमारा सिर था; विश्वास उसे स्थानापन्न के रूप में जानने से आरम्भ करता है, परन्तु बढ़ते-बढ़ते उसमें, जो सब वस्तुओं का सिर है, बढ़ जाता है, और विशेष करके उसकी मृत्यु की संगति में। यह सत्य हमें सारे पवित्रशास्त्र में मिलता है। वह सब जो रोमियों 6 और कुलुस्सियों 3 में मसीह में हमारे पाप के लिये मरे हुए और परमेश्वर के लिये जीवित होने के विषय में कहा गया है; 2 कुरिन्थियों 4 में यीशु की मृत्यु को अपनी देह में लिये फिरने के विषय में, कि उसका जीवन भी हममें प्रगट हो; गलातियों 2 और 6 में हमारे मसीह के साथ क्रूस पर चढ़ाए जाने, और संसार के लिये क्रूस पर चढ़ाए जाने के विषय में; फिलिप्पियों 3 में उसकी मृत्यु की समानता को प्राप्त करने के विषय में — यह सब इसी ओर संकेत करता है: आत्म-बलिदान की भीतरी आत्मा और मनोवृत्ति उसके आत्मा के द्वारा हमारे भीतर उत्पन्न होती है, और जहाँ उसके साथ सच्ची संगति है, वहाँ प्रतिदिन हममें फूँकी जाती है। प्रायश्चित के रूप में मसीह की मृत्यु की आशीष से केवल उसकी मृत्यु की संगति की आशीष ही बढ़कर है, क्योंकि पहली आशीष केवल दूसरी में ही पूरी होती है।

प्रिय मसीही, हम जानते हैं कि पत्री की बड़ी शिक्षा क्या है: परमपवित्र स्थान का मार्ग खोल दिया गया है, हम परमेश्वर की उपस्थिति में निरन्तर जी सकते और बने रह सकते हैं। और अब यह अध्याय हमें यह सिखाने को है कि इस प्रकार परमेश्वर के निकट आने और निकट बने रहने की, और हमारे लिये तैयार किए गए पूर्ण उद्धार का आनन्द उठाने की सामर्थ केवल विश्वास को ही दी जाती है। और हाबिल, विश्वासी पुरुषों में सबसे पहला, हमें ठीक वही सिखाता है जो पत्री ने, जो हमारे महायाजक मसीह ने सिखाया है — कि परमेश्वर तक पहुँचने का मार्ग, विश्वास का मार्ग, बलिदान का, मृत्यु का मार्ग है। मसीह आत्म-बलिदान के मार्ग से परमेश्वर के पास भीतर गया; विश्वास में मैं उसे ग्रहण करता हूँ, और परमेश्वर की उपस्थिति में उसका प्रवेश, उसके साथ एकता में, मेरा है — एक ही बार और सदा के लिये मेरा। उसका आत्म-बलिदान मेरे जीवन की आत्मा और सामर्थ बन जाता है, और मुझमें विश्वास का जीवन उन दोनों की एकता बन जाता है — उसके और मेरे आत्म-बलिदान की। परमेश्वर ने कहा: मनुष्य मुझे देखकर जीवित नहीं रह सकता। मृत्यु के द्वारा — मसीह की मृत्यु, और उसमें और उसके साथ हमारी मृत्यु के द्वारा — ही परमेश्वर तक पहुँचने का मार्ग है। यही वह नया और जीवता मार्ग है, परमपवित्र स्थान में जाने का मार्ग। आइए, हम पवित्र आत्मा की सामर्थ में इस पर चलें। आइए, हम बड़ी सरलता और दीनता से अपने आप को स्वयं के लिये मरने को सौंप दें, जब हम अपनी असहायता का अंगीकार करते हैं, और परमेश्वर की ओर ताकते हैं कि वह हमें मसीह में जिलाए। आइए, हम बालकों की सी निर्भरता और धीरज के साथ ठहरे रहें, इस एक ही अभिलाषा के साथ कि जैसे यीशु ने पिता को प्रसन्न किया, वैसे ही हम भी उसे प्रसन्न करें। और जब हम बाट जोहते हैं, और धीरज से परमेश्वर की इच्छा पूरी करते हैं, तो वह हमें दिखा सकता है कि कैसे उसकी मृत्यु और पुनरुत्थान के “एक ही बार और सदा के लिये” में हमारे लिये उस सिद्ध जीवन में सिद्ध प्रवेश है जो हमारे विश्वास के सामने रखा गया है।

1. हाबिल के धर्मी होने की गवाही दी गई। जब वह पाप पर परमेश्वर के धर्मी न्याय के आगे झुका, और बलिदान के द्वारा उससे परमेश्वर के धर्मी छुटकारे पर भरोसा रखा, तब वह परमेश्वर की दृष्टि में धर्मी था। जब उसने मरते हुए मेम्ने पर अपनी दृष्टि लगाए हुए आराधना की, तो उसके विषय में गवाही दी गई। कैसे, यह मैं नहीं जानता। जब मैं मरते हुए मेम्ने पर अपनी दृष्टि लगाए हुए आराधना करता हूँ, तो पवित्र आत्मा के द्वारा मुझे यह गवाही मिलती है कि मैं धर्मी हूँ।

मैं मेम्ने के लहू की अपार सामर्थ पर तब तक विश्वास करता रहूँ, जब तक कि मेरा सारा अस्तित्व पवित्र आत्मा की गवाही से भर न जाए। जितना अधिक मैं अंगीकार और भरोसे के साथ मरते हुए मेम्ने को निहारूँ, उतना ही अधिक मैं यह दावा कर सकूँ कि उसके बलिदान की आत्मा मुझमें प्रवेश करे, और मुझे उसकी समानता में ढाल दे। 4. उत्तम बलिदान। कैन मृत्यु के बिना, लहू के बिना अपनी भेंट लाता है — यह संसार की आत्मा और संसार का धर्म है। हाबिल के साथ, और स्वर्ग की सेनाओं के साथ, सब कुछ मेम्ने का लहू ही है।

100 हनोक — विश्वास की चाल

11:5. विश्वास ही से हनोक उठा लिया गया कि मृत्यु को न देखे; और उसका पता नहीं मिला, क्योंकि परमेश्वर ने उसे उठा लिया था: क्योंकि उसके उठाए जाने से पहले उसके विषय में यह गवाही दी गई थी कि उसने परमेश्वर को प्रसन्न किया है।
6. और विश्वास बिना उसे प्रसन्न करना अनहोना है; क्योंकि परमेश्वर के पास आनेवाले को विश्वास करना चाहिए कि वह है, और कि वह अपने खोजनेवालों को प्रतिफल देता है।

विश्वास का बलिदान विश्वास के जीवन का प्रवेश-द्वार है, और सदा उसका मुख्य लक्षण बना रहता है। विश्वास के बलिदान के बाद विश्वास की चाल आती है — स्थिर, निरन्तर संगति मसीह के और हमारे आत्म-बलिदान का फल है। हाबिल के बाद हनोक आता है। हाबिल दिखाता है कि कैसे मृत्यु जीवन का प्रवेश-द्वार है: वह मृत्यु के अधीन होकर मृत्यु पर जय पाता है। हनोक में हम देखते हैं कि कैसे जीवन मृत्यु पर जय पाता है: वह मृत्यु को नहीं देखता। विश्वास के द्वारा हाबिल मरने पर भी अब तक बातें करता है; हनोक ऐसे व्यक्ति के समान बोलता है जो सदा जीवित है। हाबिल में हम देखते हैं कि कैसे मृत्यु जीवन की ओर ले जाती है। हनोक में हम वह जीवन देखते हैं जो कभी नहीं मरता। हाबिल में हम क्रूस पर चढ़ाए गए मसीह को देखते हैं, और वह हियाव देखते हैं जो लहू के द्वारा हमें उस नए और जीवते मार्ग से भीतर प्रवेश करने के लिये मिला है जो फटे हुए परदे में से होकर जाता है।

हनोक में हम महिमान्वित मसीह को देखते हैं, और परमपवित्र स्थान में जीवन पाते हैं — परमेश्वर के साथ, उस जीवते के साथ, चलना। हनोक के सम्बन्ध में हमें विश्वास के विषय में तीन बातें सिखाई जाती हैं। पहली बात उसके स्वभाव के विषय में है। परमेश्वर के पास आनेवाले को विश्वास करना चाहिए कि वह है, और कि वह अपने खोजनेवालों को प्रतिफल देता है। विश्वास वह आत्मिक इन्द्रिय है जिसके द्वारा हम अनदेखे परमेश्वर की उपस्थिति और उसके चरित्र को पहचानते हैं — दोनों बातों को, कि वह है, और कि वह खोजनेवाले को प्रतिफल देता है। अभिलाषा विश्वास की जड़ है; परमेश्वर के लिये भूख के बिना उसका अस्तित्व एक उदासीनता का विषय रह जाता है; उसके अस्तित्व का ज्ञान प्राण पर कोई प्रभाव नहीं डालता। विश्वास परमेश्वर को खोजता है — वह विश्वास करता है कि वह है — वह हृदय को उसकी ओर खुला रखता है — वह दीनता और आशा के साथ झुककर प्रतीक्षा करता है कि वह अपने आप को प्रगट करे। परमेश्वर को जानना, हर बात में और हर स्थान में परमेश्वर को देखना, अपने दैनिक जीवन में उसकी उपस्थिति के प्रति ऐसा सचेत रहना कि हम सदा उसके साथ चलें — यही मनुष्य की सच्ची प्रतिष्ठा है, यही वह जीवन है जो विश्वास जीता है, यही वह धन्यता है जिसे यीशु ने अब परदे के फटने में पूर्ण रूप से प्रगट कर दिया है। विश्वास परमेश्वर के साथ चल सकता है। परमेश्वर के पास आनेवाले को विश्वास करना चाहिए कि वह है। और यह भी कि वह अपने खोजनेवालों को प्रतिफल देता है।

विश्वास यह विश्वास करता है कि परमेश्वर मिल सकता है; कि वह अपने आप को प्रगट कर सकता है और करेगा; कि वह हर एक की चिन्ता करता है जो सचमुच उसकी लालसा रखता है; कि उसके पास अपने खोजनेवाले के लिये एक ईश्वरीय प्रतिफल है। उसे खोजने में कभी-कभी मार्ग अँधेरा और लम्बा हो सकता है, और उन्नति धीमी हो सकती है — विश्वास प्रेम और सत्य के परमेश्वर के रूप में अपने भरोसे से उसका आदर करता है; वह प्रतिफल देगा और आशीष देगा।

इस सुनिश्चित निश्चय का गहरा विश्राम परमेश्वर के प्रति आपकी सारी खोज की जड़ बने। दूसरी शिक्षा जो हमें मिलती है, वह इस विषय में है कि विश्वास का प्रतिफल क्या होगा। अपने उठाए जाने से पहले उसने परमेश्वर को प्रसन्न किया था। विश्वास बिना प्रसन्न करना अनहोना है। परमेश्वर ने हमें अपने लिये रचा: यही हमारी नियति है; हम इसी एक उद्देश्य से बनाए गए कि उसे प्रसन्न करें, और उसका आनन्द बनें। परमेश्वर सिद्ध भलाई है: जीवन की वह दशा जिसमें हम परमेश्वर को प्रसन्न करते हैं, भलाई और सिद्ध धन्यता की दशा ही होनी चाहिए। अपनी पतित दशा में हम विश्वास के द्वारा उसे प्रसन्न करते हैं। विश्वास परमेश्वर के प्रति आत्म-समर्पण है। विश्वास परमेश्वर का आदर करता है — उसकी उपस्थिति को स्वीकार करने और खोजने के द्वारा, केवल उसी से सब कुछ की आशा रखने के द्वारा, उसी पर विश्राम करने के द्वारा। विश्वास परमेश्वर को उसका स्थान और उसकी महिमा देता है — विश्वास वही चाहता है जो परमेश्वर चाहता है — विश्वास परमेश्वर को अपनी इच्छा पूरी करने देता है, और उसे सब में सब कुछ बना देता है। कोई आश्चर्य नहीं कि विश्वास उसे असीम रूप से प्रसन्न करता है। काश, मसीही केवल इस पर विश्वास करते, और केवल इसी को अपना एकमात्र अध्ययन बना लेते कि वे निकट आएँ और भीतर प्रवेश करें, और विश्वास की परिपूर्णता में उसके सामने चलें!

फिर तीसरी शिक्षा आती है — विश्वास जानता है कि वह परमेश्वर को प्रसन्न करता है। हनोक के विषय में यह गवाही दी गई थी कि उसने परमेश्वर को प्रसन्न किया है। यह गवाही विश्वास के द्वारा आई (देखिए पद)। यह एक स्वस्थ विश्वास का सार-तत्व ही है: परमेश्वर उस प्राण के लिये जो उस पर भरोसा रखता है, अपने आप को बिना गवाही के नहीं छोड़ता, और नए नियम में तो बिलकुल भी नहीं। प्रभु यीशु ने प्रतिज्ञा की कि वह स्वर्ग में पिता की ओर से पवित्र आत्मा को भेजेगा, उस सब का गवाह होकर जो उसके स्वर्गारोहण के समय स्वर्ग में हुआ। वह सब जो पत्री ने हमें फटे हुए परदे, और खुले हुए पवित्रस्थान, और परमेश्वर की उपस्थिति में प्रवेश के विषय में, और अविनाशी जीवन की सामर्थ में याजक के रूप में मसीह के सिद्ध काम और पूर्ण उद्धार के विषय में सिखाया है — उस सब की मुहर, उसका मूल्य, उसकी सामर्थ और हमारे हृदय में उसकी वास्तविकता पिन्तेकुस्त के वरदान से ही है। पवित्र आत्मा परदे के भीतर के उस परमपवित्र स्थान में से स्वर्ग के राज्य को एक वास्तविक सच्चाई के रूप में मनुष्यों के हृदयों में उतार लाया, ताकि परमेश्वर की उपस्थिति, और अपने पुत्र में पिता का आनन्द, और पिता का प्रेम जो अब उनके हृदयों में डाला गया है, उनका प्रतिदिन का अनुभव और चेतना बन जाए। और आज भी ठीक ऐसा ही है — जो लोग पवित्र आत्मा को, उसके पूर्ण निवास और उसकी गवाही में, खोजते हैं और ग्रहण करते हैं और उसके अधीन हो जाते हैं, उनमें विश्वास यह गवाही ग्रहण करता है और देता है कि हम परमेश्वर को प्रसन्न करनेवाले हैं।

विश्वास ही से हनोक परमेश्वर के साथ-साथ चलता रहा। मेरे भाई, आप जो हाबिल के साथ यीशु के असीम आत्म-बलिदान में परमेश्वर के निकट आए हैं, हनोक के साथ परमेश्वर के संग चलना — विश्वास की चाल — सीखिए। परमेश्वर की उपस्थिति आपकी एकमात्र अभिलाषा हो; परमेश्वर की इच्छा आपका एकमात्र चुनाव; परमेश्वर की सहायता आपका एकमात्र भरोसा; परमेश्वर की समानता आपकी एकमात्र आशा। हर दिन — सबसे साधारण दिन भी, सबसे कठिन दिन भी — परमेश्वर के साथ बिताया हुआ दिन हो, पृथ्वी पर स्वर्ग के दिनों में से एक दिन के समान, एक ऐसा दिन जिसका आरम्भ और अन्त विश्वास हो।

पत्री की सारी शिक्षा — परमेश्वर के पुत्र में उस अद्भुत, सिद्ध और अनन्त छुटकारे के विषय में — यही एक परिणाम उत्पन्न करे कि वह आपको परमेश्वर पर विश्वास से भर दे, और आपको परमेश्वर के निकट आने, परमेश्वर के साथ चलने की ओर ले चले; और आप भी जानेंगे कि मृत्यु को न देखना क्या है; विश्वास के द्वारा उठा लिया जाना, और अपने विषय में यह लिखा हुआ पाना: वह लोप हो गया, क्योंकि परमेश्वर ने उसे उठा लिया।

1. यीशु ने कहा कि यूहन्ना बपतिस्मा देनेवाला सब भविष्यद्वक्ताओं में सबसे बड़ा था, हनोक से भी बड़ा। और फिर भी, राज्य में जो सबसे छोटा है वह यूहन्ना से बड़ा था। तो क्या यह असम्भव गिना जाए कि मनुष्य आज भी परमेश्वर के साथ चलें, और यह गवाही पाएँ कि वे उसे प्रसन्न करनेवाले हैं? हाय उस कलीसिया पर, जो इस पर मुश्किल से विश्वास करती है!

2. यीशु का एक बड़ा काम यह है कि वह हमें परमेश्वर के निकट लाए — इच्छा और हृदय की एकता की निकटता में। और जो कुछ वह करता है, वह अविनाशी जीवन की सामर्थ में करता है; वह सदा बना रहता है, और जो कुछ वह देता है, वह भी सदा बना रहता है। हम सदा परमेश्वर की उपस्थिति में बने रह सकते हैं और उसके साथ चल सकते हैं। 3. विश्वास के द्वारा — उस विश्वास के द्वारा जो अनदेखे में जीता है; जो मसीह को अपना सामर्थी काम करने देता है; जो यह विश्वास करता है कि परमेश्वर की उपस्थिति अब उसका घर है; और इस प्रकार उसके विश्राम में प्रवेश करता है।

101 नूह — विश्वास का काम

11:7. विश्वास ही से नूह ने, उन बातों के विषय में जो उस समय दिखाई न पड़ती थीं, परमेश्वर से चितौनी पाकर, भक्तिमय भय से प्रेरित होकर, अपने घराने के बचाव के लिये जहाज बनाया, जिसके द्वारा उसने संसार को दोषी ठहराया, और उस धार्मिकता का वारिस हुआ जो विश्वास के अनुसार है।

हाबिल में हम देखते हैं कि कैसे विश्वास मृत्यु को जीवन का मार्ग बना देता है। हनोक में, कि कैसे विश्वास मृत्यु पर जय पाता है। नूह में, कि कैसे विश्वास उस काम के द्वारा जो वह दूसरों के लिये करता है, उन्हें मृत्यु से बचाता है। जिस क्षण लहू के द्वारा परमपवित्र स्थान में प्रवेश हमारे लिये खोल दिया गया, उसी क्षण हम प्रेम के काम के लिये बुलाए गए (10:19, 24, 25)।

यदि हाबिल के साथ हम मसीह की मृत्यु में और स्वयं के प्रति मृत्यु में परमेश्वर के निकट आए हैं — यह वृक्ष की जड़ है — यदि हनोक के साथ हमने अपने आप को परमेश्वर के साथ, उसकी उपस्थिति में और उसकी प्रसन्नता में, चलने के लिये सौंप दिया है — यह वह वृक्ष है जो जड़ से बढ़ता है — तो आइए, हम नूह के साथ विश्वास का वह काम करें, जो हमारे आस-पास के लोगों को आशीष दे सके और बचा सके — यह वृक्ष का फल है। उसके वृत्तान्त में हमें विश्वास के सब आवश्यक तत्व एक साथ मिलते हैं।

विश्वास ही से नूह ने, उन बातों के विषय में जो उस समय दिखाई न पड़ती थीं, परमेश्वर से चितौनी पाकर। विश्वास का सम्बन्ध सदा भविष्य और अनदेखी बातों से है। वह परमेश्वर के वचन और विचारों में जीता है — वह वह देखता है जो संसार नहीं देख सकता — वह सब कुछ को, भविष्य को भी, परमेश्वर के प्रकाश में देखता है। जब परमेश्वर अपने भयानक, लगभग अविश्वसनीय न्याय को प्रगट करता है, तो वह सीधे-सीधे विश्वास कर लेता है। वह अपने अनुभव या अपनी सहज बुद्धि पर, अपने विचारों या अपनी इच्छाओं पर भरोसा नहीं करता। वह आनेवाले न्याय की अकल्पनीय भयानकता पर विश्वास करता है। हे विश्वासी! यदि आप जीना और मनुष्यों को बचाना चाहते हैं, तो परमेश्वर ने उस आनेवाले विनाश के विषय में, जो संसार पर आ रहा है, जो कहा है, उस पर विश्वास कीजिए।

भक्तिमय भय से प्रेरित होकर। जब यीशु ने गतसमनी में (5:9), पाप और मृत्यु क्या हैं इसका बोध रखते हुए, प्रार्थना की, तो वह भक्तिमय भय के साथ थी। हमें (12: में) उपदेश दिया गया है कि हम भक्तिमय भय के साथ परमेश्वर की ऐसी सेवा करें जिससे वह प्रसन्न होता है, क्योंकि हमारा परमेश्वर भस्म करनेवाली आग है। जीवते परमेश्वर के हाथों में पड़ना भयानक बात है। हमारी पत्री आज्ञा न माननेवालों के अन्त के विषय में कितनी भयावह रीति से और कितनी बार बोलती है! निश्चय ही हमें, जिनकी आँखें खोली गई हैं, यह उचित है कि हम भक्तिमय भय के साथ परमेश्वर की चेतावनियों को सुनें, और फिर उस प्रेरणा के प्रबल वेग के अधीन, भक्तिमय भय से प्रेरित होकर, कितनों पर भय के साथ दया करें, और उन्हें आग में से झपटकर निकालें।

विश्वास ही से नूह ने जहाज बनाया। विश्वास ने भय उत्पन्न किया, और भय ने परिश्रम उत्पन्न किया, और विश्वास ने छुटकारे के काम के लिये हृदय और हाथ का मार्गदर्शन किया। किसी ने कभी किसी आनेवाली जल-प्रलय के विषय में, और जल के द्वारा एक संसार के विनाश के विषय में नहीं सुना था। किसी ने कभी यह सोचा भी न होगा कि यदि संसार डूब जाए, तो एक जहाज अकेला बच निकलेगा। परन्तु विश्वास परमेश्वर के साथ संगति में जीता है — वह न्याय और उद्धार के उसके भेदों को जानता है — वह मनुष्य पर ऐसा अधिकार कर लेता है कि वह उसे कार्य में उतारने के लिये अपना जीवन दे देता है। मनुष्यों के उपहास, और उस दिन के लम्बे विलम्ब, और काम की सारी कठिनाइयों के सामने भी, नूह परमेश्वर के वचन को दृढ़ता से थामे रहा। केवल यह सुनना कि परमेश्वर क्या कहता है, और विश्वास की आज्ञाकारिता में अपना सारा हृदय और जीवन उसे पूरा करने में दे देना — यही विश्वास है। अपने घराने के बचाव के लिये। विश्वासी को परमेश्वर इसलिये आशीष देता है कि वह आशीष का कारण बनाया जाए। नूह के विश्वास ने, जो कामों के द्वारा सिद्ध हुआ, उसके परिवार को बचाया, और परिवार के साथ उसने मनुष्य-जाति को बचाया, और हम सब का पिता बन गया। उसके प्रचार का फल बहुत थोड़ा दिखाई दिया, और फिर भी परमेश्वर की सारी कलीसिया, उसके समय से, अपने जीवन के लिये उसके विश्वास की भी ऋणी है। मनुष्य परमेश्वर के स्वरूप में इस बात में भी रचा गया कि उसे दूसरों के जीवनों पर सामर्थ है। यह सामर्थ परिवार से आरम्भ होती है, परन्तु उससे आगे तक पहुँचती है। विश्वास का वह मनुष्य, जो हाबिल के साथ उस एक बलिदान में मृत्यु से होकर जीवन में पहुँच गया है, और हनोक के साथ परमेश्वर के साथ-साथ चलता है, परमेश्वर के यहाँ सामर्थ रखता है — जीवन और आशीष की सामर्थ।

जिस विश्वास के द्वारा उसने संसार को दोषी ठहराया। अविश्वासी और विश्वासी के बीच अन्तर यह है: एक संसार का मनुष्य है, और यहीं जीता है; दूसरा परमेश्वर का मनुष्य है, और स्वर्ग में जीता है। उसका सारा जीवन संसार के विरुद्ध एक विरोध और उसका दोषी ठहराया जाना है। हाबिल, हनोक, नूह — तीनों को संसार ने समान रूप से ठुकराया और तुच्छ जाना, क्योंकि उन्होंने उसके कामों को दोषी ठहराया। परमेश्वर करे कि उसकी विश्वासी सन्तानों का जीवन ऐसा स्पष्ट और उज्ज्वल हो कि संसार उनके द्वारा अपने आप को दोषी ठहराया हुआ अनुभव करे! और उस धार्मिकता का वारिस हुआ जो विश्वास के अनुसार है — अर्थात् परमेश्वर के साथ ठीक सम्बन्ध में खड़े होने की धार्मिकता, एक ऐसे जीवन की धार्मिकता जिसकी जड़ और सामर्थ विश्वास है। धार्मिकता की परिभाषा यह दी गई है: हर एक को उसका हक देना। परमेश्वर की दृष्टि में विश्वास का यही मूल्य है — वह उसे परमेश्वर के रूप में उसका स्थान देता है; उसमें प्राण यह अंगीकार करता है कि वह कुछ भी नहीं, और परमेश्वर ही सब कुछ है। इसी विश्वास को परमेश्वर धार्मिकता गिनता है।

जो विश्वास नूह ने जहाज के सम्बन्ध में, और उस उद्धार के सम्बन्ध में जो उसके द्वारा आना था, प्रगट किया, वही विश्वास हमें मसीह और उसके उद्धार के सम्बन्ध में दिखाना चाहिए। खुला हुआ पवित्रस्थान शरण का जहाज है — मसीह ने सब कुछ पूरा और सिद्ध कर दिया है। परन्तु हमारे करने के लिये कितना काम है — उन सब को उसमें इकट्ठा करना जो बचाए जा सकते हैं! आइए, हम नूह के समान अपने जीवन इसी के लिये दे दें। आइए, हम पापमय संसार पर परमेश्वर की भयानक धमकियों को सुनें, और भय से प्रेरित हों। आइए, हम उस बड़े उद्धार की असीम सामर्थ पर विश्वास करें जो तैयार किया गया है, और उस प्रेम पर भी जो उसे बाँटने और लागू करने के लिये प्रतीक्षा में है। आइए, हम परमेश्वर की उस बुलाहट पर विश्वास करें जो उसकी छुड़ाई हुई प्रत्येक सन्तान को नाश होनेवालों के लिये दया का सन्देशवाहक होने को आमन्त्रित करती और आज्ञा देती है, और जो हमें निश्चय दिलाती है कि वह हर एक को, जो उस पर भरोसा रखता है, बहुतायत से काम में लाएगा। विश्वास ही से नूह ने अपने घराने के बचाव के लिये जहाज बनाया: क्या यह बात विश्वास को एक नया आकर्षण और मूल्य नहीं देती?

विश्वास की प्रार्थना और विश्वास के परिश्रम के द्वारा, मसीह में स्वयं के प्रति मृत्यु के द्वारा, और परमेश्वर की उपस्थिति में चलने के द्वारा, हमारे हृदय ऐसे प्रेम और ऐसी सामर्थ से भर सकते हैं जो निष्फल नहीं हो सकती। वह पवित्र आत्मा, जो परमपवित्र स्थान में सिंहासन पर विराजमान हमारे प्रिय याजक-राजा के पास से, हमसे परमेश्वर की प्रसन्नता की और हमारे प्रभु के भीतर वास करने की गवाही के रूप में आया, विशेष करके सामर्थ के वरदान के रूप में आया, ताकि हमें भी अपनी बारी में उसके गवाह बनाए। हे आप सब लोगो, जो विश्वास के द्वारा परमपवित्र स्थान और उसकी आशीषों में प्रवेश कर चुके हैं, निकल पड़िए और विश्वास का काम कीजिए; विश्वास के द्वारा उन्हें भीतर ले आइए जो अब तक बाहर हैं। यही वह विश्वास है जो आपको उस धार्मिकता का वारिस बनाता है जो विश्वास के अनुसार है।

1. हाबिल, हनोक, नूह: तीनों यीशु के प्रतिरूप हैं। हाबिल: वह धर्मी, जिससे उसके भाइयों ने बैर किया और जिसे उन्होंने मार डाला, जो बलिदान के साथ परमेश्वर के पास आता है। हनोक: वह प्रिय पुत्र, जिससे परमेश्वर प्रसन्न है, जो पृथ्वी पर उसके साथ चलता है, और स्वर्ग में उठा लिया जाता है। नूह: जो उद्धार तैयार करता है, अपने लोगों को बचाता है, संसार को दोषी ठहराता है।

2. जो एक वस्तु परमेश्वर मुझे देता है, वह है यीशु — मरनेवाला, जीवित रहनेवाला, छुटकारा देनेवाला। जो एक वस्तु वह मुझसे माँगता है, वह है विश्वास। विश्वास मुझे उसके समान बना देगा। हाबिल-आशीष से आरम्भ करके — मृत्यु के द्वारा परमेश्वर के निकट आना — मैं हनोक-आशीष तक पहुँचता हूँ, अर्थात् अटूट संगति का जीवन। और इस प्रकार मैं नूह-आशीष का भेद सीखता हूँ, और दूसरों को बचानेवाला बन जाता हूँ। और यह सब — विश्वास ही से।

102 अब्राहम — विश्वास की आज्ञाकारिता

11:8. विश्वास ही से अब्राहम, जब बुलाया गया, तो आज्ञा मानकर ऐसी

जगह निकल गया जिसे वह मीरास में लेनेवाला था; और वह यह न जानता था कि मैं किधर जाता हूँ, तौभी निकल गया। 9. विश्वास ही से उसने प्रतिज्ञा किए हुए देश में, जैसे पराए देश में, परदेशी होकर इसहाक और याकूब समेत, जो उसके साथ उसी प्रतिज्ञा के वारिस थे, तम्बुओं में वास किया। 10. क्योंकि वह उस नेववाले नगर की बाट जोहता था, जिसका रचनेवाला और बनानेवाला परमेश्वर है।

आदम की सन्तान में ऐसा कोई नहीं जिसका मानव-जाति का इतना बड़ा भाग ऐसा आदर करता हो जैसा अब्राहम का। यहूदी, मसीही, मुसलमान — सब उसे विश्वासियों के पिता के रूप में देखते हैं। और परमेश्वर उसे अपना मित्र कहकर उसका आदर करता है। यदि कोई बता सकता है, तो विश्वास की आज्ञाकारिता का यही वीर हमें बता सकता है कि विश्वास के जीवन का भेद क्या है। हमारी पत्री ने हमें बुलाया है कि हम उनका अनुकरण करें जो विश्वास और धीरज के द्वारा प्रतिज्ञाओं के वारिस होते हैं, और उसमें विशेष रूप से अब्राहम का उल्लेख है, जिसने धीरज धरकर प्रतिज्ञा की हुई बात प्राप्त की (6:12-15)। जैसे पौलुस भी (रोमियों 4

में) उनकी चर्चा करता है जो हमारे पिता अब्राहम के उस विश्वास की लीक पर चलते हैं जो उसमें था। जितनों ने अब्राहम के समान मन के दृढ़ संकल्प के साथ यह ठान लिया है कि वे विश्वास में दृढ़ होकर परमेश्वर की महिमा करेंगे, वे सब उसके जीवन की शिक्षा को सुनें। परमेश्वर हमसे ठीक उसी विश्वास की अपेक्षा रखता है जो उसमें था; हमें सचमुच उसी की आवश्यकता है; और वही हमारी पहुँच के भीतर है।

विश्वास ही से अब्राहम, जब बुलाया गया, तो आज्ञा मानकर ऐसी जगह निकल गया जिसे वह मीरास में लेनेवाला था; और वह यह न जानता था कि मैं किधर जाता हूँ, तौभी निकल गया। अब्राहम के साथ परमेश्वर के इस प्रकार व्यवहार करने का उद्देश्य क्या था? और वास्तविक सच्चाई में उसकी आज्ञाकारिता का मूल्य और उसकी आशीष क्या थी? परमेश्वर की बुलाहट कोई मनमानी बुलाहट नहीं थी — जब हम उसके ईश्वरीय अर्थ को भीतर तक देखेंगे, तब हम समझेंगे कि परमेश्वर हमसे क्या माँगता है और हमारे विश्वास को किस बात को पकड़ना है। मनुष्य दृश्य और अदृश्य के बीच खड़ा है।

उसका पाप और पतन इसी में था कि वह परमेश्वर से मुड़कर संसार की ओर फिर गया। पाप की सामर्थ से उसका छुटकारा केवल इसी में मिल सकता था कि वह संसार को त्याग दे और अपना सारा हृदय परमेश्वर पर लगाए। उसे इसी के लिये प्रशिक्षित करने को, उसे यह सिखाने को कि वह अपना जीवन और अपना सुख स्वयं परमेश्वर में पाए, यह बुलाहट आई: अपने देश और अपने कुटुम्बियों में से निकलकर उस देश में चला जा जो मैं तुझे दिखाऊँगा। परमेश्वर उसे अपने साथ अकेला रखना चाहता था, उन सब बातों से अलग करके जिनसे वह लिपट सकता था या जिन पर वह भरोसा रख सकता था, ताकि वह उसे सिखाए कि वह अपना सब कुछ उसी में पाए। और यह विश्वास ही से था — ऐसे विश्वास से, जिसने केवल उस देश को, और उसके साथ जुड़ी प्रतिज्ञा को, दूर से ही नहीं देखा, वरन् प्रतिज्ञा को पूरा करने के लिये जीवते परमेश्वर को निकट देखा — कि अब्राहम ने आज्ञा मानी। परमेश्वर की बुलाहट के साथ सदा प्रतिज्ञा होती है; प्रतिज्ञा पर सच्चा विश्वास सदा बुलाहट के प्रति आज्ञाकारिता से जुड़ा रहता है। आज्ञाकारिता विश्वास का सार-तत्व ही है। विश्वास सदा वह सामर्थ है जिसके द्वारा मनुष्य अपने आप को किसी अनदेखी वस्तु के प्रति सौंप देता है, और उसे अपने हृदय और अस्तित्व में ग्रहण करता है। वस्तुओं के स्वभाव ही में यह असम्भव है कि कोई परमेश्वर को ग्रहण करे, पर उसकी इच्छा को ग्रहण न करे।

विश्वास ही से अब्राहम ने आज्ञा मानी। हम देख चुके हैं कि कैसे आज्ञाकारिता के द्वारा, परमेश्वर की इच्छा पूरी करने के द्वारा, स्वयं पुत्र सिद्ध किया गया, और उसने हमें सिद्ध किया: और अपने सब आज्ञा माननेवालों के लिये उद्धार का कारण हो गया। आइए, हम यह सीखें कि आज्ञाकारिता ही विश्वास का जीवन है, और परमपवित्र स्थान में जाने का एकमात्र मार्ग है। तुरन्त, बिना किसी रोक-टोक के, आनन्द-भरी आज्ञाकारिता ही वह एक बात हो जिस पर हमारा हृदय लगा हो। और यह विशेष रूप से इस बात में प्रगट हो — जो परमेश्वर की इच्छा के मूल सिद्धान्तों में से एक है — अर्थात् उसकी इस बुलाहट में कि हम बाहर निकल आएँ और अलग हों, और जहाँ कहीं वह ले चले, वहाँ उसके साथ चलने के लिये अपने आप को सौंप दें।

वह यह न जानता था कि मैं किधर जाता हूँ, तौभी निकल गया। यह न कहिए कि आप नहीं समझ सकते कि बाहर निकल आना और सब कुछ त्याग देना क्या है। आपको यह जानने की आवश्यकता नहीं। आपको कुछ और जानने की आवश्यकता है, कि आपका एक परमेश्वर है, जो आप पर दृष्टि रखता और आपकी अगुवाई करता है, और आप में ऐसा चरित्र गढ़ रहा है जो स्वर्ग और अनन्तकाल के योग्य हो। उस चरित्र का, पुत्र की समानता और स्वर्ग की योग्यता का, एक बड़ा चिह्न यह है कि परमेश्वर के प्रति पूर्ण और निःशेष समर्पण हो, कि उसी को सब कुछ होने दिया जाए। उस समर्पण की पहली अनिवार्य बात गहरी दीनता है, जो केवल आज्ञा मानना और भरोसा रखना चाहती है। इसलिए परमेश्वर से कह दीजिए कि आप हर कीमत पर, और किसी भी रीति से, आज्ञा मानने को तैयार हैं। जो प्राण पूरी रीति से उसे और उसकी इच्छा को सौंप दिया गया है, उसके भरोसे को वह कभी निराश न करेगा।

विश्वास ही से वह प्रतिज्ञा किए हुए देश में परदेशी होकर रहा। वह केवल हारान से बाहर ही नहीं निकला, वरन् कनान में भी गया। और केवल इतना ही नहीं, वरन् वह वहाँ परदेशी होकर रहा, वहाँ टिका रहा, वहाँ जीवन बिताता रहा। उसने केवल अच्छा आरम्भ ही नहीं किया, वरन् विश्वास और धीरज के द्वारा प्रतिज्ञा का वारिस हुआ। यह फिर से स्थिर बने रहने का बड़ा पाठ है।

प्रतिदिन, बार-बार, बस आज्ञाकारिता और विश्वास ही होना चाहिए, जब तक कि परमेश्वर हमें अपने साथ और भी घनिष्ठ संगति में न ले आए, और मनुष्यों से हमारे विषय में, या हमारे द्वारा, ऐसे लोगों के रूप में बात न कर सके जो उसके परखे हुए और भरोसेमंद मित्र हैं, ऐसे मनुष्य जो केवल उसकी महिमा करने के लिए जीते हैं।

क्योंकि वह उस नगर की बाट जोहता था, जिसका बनानेवाला परमेश्वर है। विश्वास ही से उसने अनदेखी वस्तुओं को देखा; आशा में वह भविष्य में जीता रहा। उसका मन जितना कम हारान में लगा था, उतना ही कम कनान में लगा था; वह स्वर्ग में था, वह परमेश्वर के पास था। और हम, जो उस सच्चे तम्बू में प्रवेश करने के लिए बुलाए गए हैं जिसे परमेश्वर ने खड़ा किया है, ओह, क्या हम आज्ञा न मानें, और बाहर न निकल जाएँ, चाहे यह न भी जानते हों कि हम किधर जाते हैं? आइए, हम अपने आपको संसार से और उसकी आत्मा से पूरी रीति से अलग कर लें; आइए, हम पुत्र के समान सृष्टि के प्रति मर जाएँ, ताकि परमेश्वर के लिए जीवित रहें।

कलीसिया में या मसीही में सांसारिक आत्मा एक घातक रोग है; वह विश्वास के जीवन को असम्भव बना देती है। आइए, हम उसे अपना सबसे बड़ा शत्रु समझें, और परदेशियों की नाईं जीवन बिताएँ, जो उस नगर की खोज में हैं जो आनेवाला है। आइए, हम उस वाणी को सुनें जो हमें बाहर निकलकर उसके पास आने के लिए बुला रही है, घनिष्ठ संगति के लिए, स्वर्ग के स्वर्गदूतों की सी आज्ञाकारिता के लिए, संसार के लिए गवाही और आशीष बनने के लिए। और हमारे विषय में भी यह कहा जाए: विश्वास ही से उसने आज्ञा मानी, और वह निकल गया, और प्रतिज्ञा किए हुए देश में परदेशी होकर रहा, क्योंकि वह एक नगर की बाट जोहता था।

1. अब्राहम में देखिए कि विश्वास का सारा जीवन कैसा अलौकिक है। उसकी बुलाहट, एक देश की, एक पुत्र की, एक वंश की प्रतिज्ञा, सब कुछ स्पष्ट रूप से ईश्वरीय है, सारी इन्द्रियों और तर्क से परे। केवल तभी, जब प्राण उन सचमुच अलौकिक बातों पर स्थिर दृष्टि लगाता है जिन्हें परमेश्वर हमारे लिए और हम में और हमारे द्वारा करनेवाला है, उसका विश्वास पूरी रीति से परमेश्वर की सामर्थ पर टिकेगा, और वह हर कीमत पर आज्ञा मानेगा।

2. परमेश्वर आपके साथ भी वैसी ही व्यक्तिगत संगति रखेगा जैसी उसने अब्राहम के साथ रखी। परमेश्वर आपके लिए भी सब कुछ होगा, जैसा वह उसके लिए था। आपका जीवन अलौकिक हो; ईश्वरीय सर्वसामर्थ के कार्य के अधीन पूरी असमर्थता; परमेश्वर अपने आत्मा के द्वारा आप में अपना ही जीवन उत्पन्न करता हुआ।

3. प्रतिज्ञा किए हुए देश में परदेशी होकर रहिए, उस जीवन में जो परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं के द्वारा हमारे लिए खोला गया है, अर्थात् पवित्र आत्मा के द्वारा परमपवित्र स्थान का जीवन। प्रतिज्ञाओं में जीवन बिताइए। 4. वह यह न जानता था कि मैं किधर जाता हूँ, तौभी निकल गया। मसीह केवल याजक ही नहीं, वरन् भविष्यद्वक्ता, शिक्षक और नायक भी है। उस पर भरोसा रखिए कि वह आपको परदे के भीतर ले आएगा, और जीवन भर उस नए और जीवते मार्ग में आपकी अगुवाई करेगा। वह शान्ति जो सारी समझ से परे है, वह प्रेम जो ज्ञान से परे है, वह सामर्थ जो जो कुछ हम सोच सकते हैं उससे कहीं अधिक बढ़कर काम कर सकती है, यही प्रतिज्ञा किए हुए देश में विश्वास के जीवन की पहचान है। आइए, हम यह न जानते हुए भी कि किधर जाते हैं, निकल चलें।

103 सारा—परमेश्वर की विश्वासयोग्यता पर विश्वास

11:11. विश्वास ही से सारा ने आप भी, बूढ़ी हो जाने पर भी, गर्भ धारण करने की सामर्थ पाई, क्योंकि उसने प्रतिज्ञा करनेवाले को विश्वासयोग्य जाना;
12. इस कारण एक ही जन से, जो मरा हुआ सा था, इतने उत्पन्न हुए जितने आकाश के तारे हैं, और जितना समुद्र के

तीर का बालू है, अनगिनित। विश्वास ही से सारा ने इसहाक को जन्म देने की सामर्थ पाई। स्वभाव और उसकी सम्भावनाओं के अनुसार देखें तो पुत्र की कोई आशा न थी। परन्तु इसहाक का जन्म परमेश्वर की सामर्थ का कार्य होना था: उसने प्रतिज्ञा की थी और वह उसे पूरा करता। सारा ने प्रतिज्ञा पर विश्वास किया, क्योंकि उसने प्रतिज्ञा करनेवाले परमेश्वर पर विश्वास किया; विश्वास ही से उसने इसहाक की माता बनने की सामर्थ पाई; और एक ऐसे जन से, जो मरा हुआ सा था, इतने उत्पन्न हुए जितने आकाश के तारे हैं।

हमें बताया गया है कि जो मनुष्य के लिए असम्भव था, उसके सामने उसके विश्वास ने अपना बल कहाँ से पाया: उसने प्रतिज्ञा करनेवाले को विश्वासयोग्य जाना। उसने प्रतिज्ञा की ओर देखा; उसने उस पर ध्यान किया जिसने उसे दिया था; उसने उसकी विश्वासयोग्यता पर विश्राम किया। परमेश्वर की विश्वासयोग्यता ही उसके हृदय और उसके विश्वास का विश्राम थी।

विश्वास के जीवन के विषय में, और उस कार्य के विषय में जो परमेश्वर विश्वास के द्वारा हम में करना चाहता है, सारा हमें कौन-सा पाठ सिखाती है? एक ऐसे जन से, जो मरा हुआ सा था, तारों के समान अनगिनित उत्पन्न हुए। परमेश्वर जीवित परमेश्वर है, जो मृत्यु में जीवन देने से प्रसन्न होता है। जब आदम ने पाप किया, तो वह और सारी मनुष्य जाति मर गई; उन्होंने अदन की वाटिका का और परमेश्वर का जीवन खो दिया। परमेश्वर का बड़ा कार्य उस जीवन को फिर से लौटा देना है। पुराने नियम में उसने इसे इसहाक जैसे उदाहरण में दिखाया, यह प्रमाणित करके कि जिस नई जाति को वह तैयार करने पर था, उसे अपना जीवन स्वयं उसी से पाना होगा, ऐसा जीवन जो एक मरे हुए से जन्मा हो। इसहाक का जीवन विशेष अर्थ में परमेश्वर का दिया हुआ जीवन होना था। नए नियम में उसने इसे यीशु मसीह के आश्चर्यकर्मी जन्म के द्वारा दिखाया: परमेश्वर की महान सामर्थ ने बैतलहम के बालक में ईश्वरीय जीवन प्रकट किया। परमेश्वर हमें जो सिखाना चाहता है वह यह है: नया जीवन परमेश्वर से ही आना चाहिए; केवल उसी की महान सामर्थ को, और सीधे उसी को, उसे उत्पन्न करना होगा, नहीं तो सब व्यर्थ है। इसी के लिए हमारे विश्वास को उस पर भरोसा रखना है।

जिस प्रकार आदम का जीवन, इसहाक का जीवन, मसीह का जीवन, सचमुच परमेश्वर की सर्वशक्तिमान सामर्थ का प्रत्यक्ष कार्य था, उसी प्रकार सचमुच हमारे प्राणों में ईश्वरीय जीवन भी उसी का कार्य है। और यह केवल अपने आरम्भ में ही उसका कार्य नहीं है, मानो उसने हमें एक ऐसा जीवन दे दिया हो जिसे हमें सुरक्षित रखना, और पालना-पोसना और सिद्धता तक पहुँचाना हो।

नहीं, जैसे वृक्ष प्रतिदिन उसी जड़ पर बढ़ता है जिससे वह उगा, वैसे ही हमारे आत्मिक जीवन को प्रतिदिन परमेश्वर और मसीह में स्थिर रहना और बढ़ना चाहिए। उत्साही मसीहियों के आत्मिक जीवन की दुर्बलता का, उनकी प्रार्थनाओं और प्रयत्नों के बावजूद, एक बड़ा कारण यह है कि वे वह काम करना चाहते हैं जिसे केवल परमेश्वर ही कर सकता है। वे नहीं जानते कि परमेश्वर, जिसका आत्मा हम में वास करता है, हमारे जीवन को ईश्वरीय सामर्थ में बनाए रखेगा, और हम में वह काम करेगा जो उसकी दृष्टि में भाता है। यदि वे इसे ठीक-ठीक जानते, तो वे देखते कि उनका एकमात्र कर्तव्य यह है कि पूरी असहायता में, गहरी दीनता और निर्भरता में, परमेश्वर की बाट जोहें, और उस पर भरोसा रखें और उस पर आशा लगाए रहें कि वह अपना धन्य कार्य करेगा।

सारा हमें यही सिखाती है। वह जानती थी कि परमेश्वर ने क्या प्रतिज्ञा की थी। पच्चीस लम्बे वर्षों तक उसका हृदय उस पुत्र के लिए तरसता रहा जिसके विषय में परमेश्वर ने कहा था। कभी-कभी उसका विश्वास बहुत कठोरता से परखा गया, परन्तु वह सदा इसी एक बात पर लौट आती थी: जिसने प्रतिज्ञा की है, वह विश्वासयोग्य है। और ठीक समय पर परमेश्वर ने अपना सर्वशक्तिमान जिलानेवाला कार्य किया, और सारा ने इसहाक की और यीशु की माता बनने की सामर्थ पाई। और युगों-युगों से उसकी गवाही की वाणी सुनाई देती है: परमेश्वर पर भरोसा रखो; वह विश्वासयोग्य है; वह जीवित परमेश्वर है; वह मरे हुओं में से जीवन देता है। इस पत्री की शिक्षा हमें जीवित परमेश्वर के विषय में, और जीवित परमेश्वर के उस नगर के विषय में बताती है जिसके पास हम आ पहुँचे हैं; एक ऐसे महायाजक के विषय में जो जीवित है, और सदा जीवित रहता है, और एक ऐसे कार्य के विषय में जो वह हमारे भीतर करता है, अर्थात् अविनाशी जीवन की सामर्थ; एक नए और जीवते मार्ग के विषय में, जिसमें होकर हम परमेश्वर की उपस्थिति में पहुँचाए जाते हैं; हृदय में लिखी हुई जीवन की व्यवस्था के विषय में, और परदे के भीतर, परमपवित्र स्थान में, एक जीवन के विषय में। यह नया और अद्भुत जीवन, जिसे इस पत्री ने प्रकट किया है, प्राण में परमेश्वर के जीवन और कार्य से कम कुछ नहीं। इस प्रश्न का, जो इतनी बार पूछा जाता है, कि हम उस जीवन का अनुभव और अधिक सामर्थ के साथ क्यों नहीं करते, केवल एक ही उत्तर हो सकता है: हम मसीह में परमेश्वर को उसे अपने भीतर उत्पन्न करने नहीं देते; हम पवित्र आत्मा के निरन्तर वास करने और कार्य करने पर विश्वास नहीं करते। जैसे सारा तब चूक गई जब उसने हाजिरा को अब्राहम को देकर प्रतिज्ञा किए हुए पुत्र को पाना चाहा, वैसे ही हम इसलिए चूक जाते हैं कि हम अपने प्रयत्न से वह करना चाहते हैं जिसे परमेश्वर अपने सिवा किसी और को करने नहीं देगा। आइए, हम सारा के समान अपने ही गढ़े हुए मार्गों से लौट आएँ, और उस नए और जीवते मार्ग से प्रवेश करें; स्वभाव और स्वयं के प्रति मृत्यु के मार्ग से; पवित्र आत्मा के द्वारा जीवन के मार्ग से, उस जीवन में जिसे केवल परमेश्वर ही बनाए रख सकता है।

विश्वास वह शक्ति है जिसके द्वारा हम उस वस्तु को, जिससे हमारा हृदय लिपटा रहता है और जिस पर वह विश्राम करता है, अपने अस्तित्व में ग्रहण कर लेते हैं, और अपने आपको उसे सौंप देते हैं और उसके साथ एक हो जाते हैं। परमेश्वर ने अपने पुत्र के द्वारा हम से बातें की हैं। उसका पुत्र ही हमारे लिए बड़ी प्रतिज्ञा है, इस बात का चिह्न और बयाना कि परमेश्वर हमें क्या बनाएगा। आइए, हम प्रतिज्ञा की ओर देखें, पुत्र की ओर देखें, उस विश्वासयोग्य की ओर देखें जिसने प्रतिज्ञा की है, और जिसका झूठा ठहरना अनहोना है, तो हम उस नए जीवन को, जो परमेश्वर की ओर से है, ग्रहण करने और उत्पन्न करने की सामर्थ पाएँगे। आइए, हम सबसे बढ़कर परमेश्वर के सामने वही स्थान लें जो सारा ने लिया, एक मरे हुए का सा स्थान, जहाँ तक नया जीवन उत्पन्न करने की आशा का सम्बन्ध था, पूरी निराशा और असहायता में मरे हुए का सा; तो हम निश्चय जान सकते हैं कि परमेश्वर अपना कार्य करेगा। असमर्थता सदा ही सच्चे विश्वास की शर्तों में से एक है। पूरी रिक्तता में परमेश्वर के सामने झुक जाइए; उसके आगे सिर झुकाइए और उसकी बाट जोहिए, और उसके साथ चलिए, मन की गहरी दीनता और नम्रता में, मानो आपके पास कुछ भी नहीं और आप कुछ भी नहीं; उसके चरणों पर मरे हुए के समान गिर पड़िए, और वह कहेगा: मत डर, मैं वही हूँ जो जीवित है, और जीवन देता है।

1. अब झुककर परमेश्वर से कहिए कि आप उस अद्भुत नए जीवन के लिए उस पर भरोसा रखते हैं जिसे इस पत्री ने मसीह में प्रकट किया है। उस पर भरोसा रखिए कि वह मसीह को अविनाशी जीवन की सामर्थ में आपके भीतर प्रकट करेगा। 2. हर सन्देह और भय का सामना इस प्रकार कीजिए कि फिर से प्रतिज्ञा की ओर, प्रतिज्ञा करनेवाले परमेश्वर की ओर, और उसकी विश्वासयोग्यता की ओर देखिए, जिसने शपथ खाकर आपके लिए आशीष की अपनी प्रतिज्ञा को, और मसीह के सनातन याजकपद की सामर्थ की प्रतिज्ञा को, दृढ़ किया है।

इस भरोसे में गहरी असहायता और निर्भरता और दीनता का अपना स्थान ग्रहण कीजिए। कुछ न बनिए, ताकि परमेश्वर सब कुछ हो। बस अपने आपको सौंप दीजिए, कि जीवित परमेश्वर अपने पुत्र और आत्मा के द्वारा आप में अपना महान कार्य करे। सारा के विश्वास की पूरी आशीष केवल इसहाक ही नहीं था, वरन् तारों के समान अनगिनित वंश। आपके साथ भी ऐसा ही है। जब आप अपने आपको पूरी रीति से इसलिए दे देते हैं कि सीधे स्वयं परमेश्वर ही से ईश्वरीय जीवन से भरे जाएँ, तो वह आपके चारों ओर आशीष बनकर फूट निकलेगा। मैं निश्चय आशीष दूँगा, और निश्चय बढ़ाऊँगा।

104 विश्वास, और उसका यात्री-भाव

11:13. ये सब विश्वास ही की दशा में मरे, और उन्होंने प्रतिज्ञाएँ नहीं पाईं, पर उन्हें दूर से देखकर उनका अभिवादन किया, और मान लिया कि

हम पृथ्वी पर परदेशी और यात्री हैं। 14. क्योंकि जो ऐसी ऐसी बातें कहते हैं, वे प्रगट करते हैं कि अपने निज देश की खोज में हैं। 15. और जिस देश से वे निकल आए थे, यदि सचमुच उसकी सुधि करते, तो उन्हें लौट जाने का अवसर था।

16. पर अब वे एक उत्तम, अर्थात् स्वर्गीय देश के अभिलाषी हैं: इसी लिए परमेश्वर उनका परमेश्वर कहलाने में उनसे नहीं लजाता: क्योंकि उसने उनके लिए एक नगर तैयार किया है। यहाँ जो वर्णन हमें दिया गया है कि विश्वास ने पुराने समय के पवित्र लोगों को परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं की पूर्ति के लिए किस प्रकार तैयार किया, वह अत्यन्त शिक्षाप्रद है। पहले आता है, उन्हें दूर से देखकर: विश्वास उनके लिए अनदेखी वस्तुओं का प्रकाशन था। फिर आता है, और उन्हें गले लगाकर; उन्होंने आनन्द से उनका अभिवादन किया, उनका स्वागत किया, उन्हें स्वीकार किया और उन्हें अपना बना लिया, और ऐसे लोगों की नाईं जीवन बिताया जिनकी वे थीं। फिर आता है पाना। पुराने नियम के पवित्र लोगों के विषय में यहाँ कहा गया है, उन्होंने प्रतिज्ञाएँ नहीं पाईं। कुछ प्रतिज्ञाएँ तो उन्होंने सचमुच पाईं, जैसा हम इसहाक के जन्म में देख चुके हैं। परन्तु प्रतिज्ञाओं को उनके पूरे अर्थ में उन्होंने नहीं पाया; यह हमारा सौभाग्य है। देखना, गले लगाना, पाना, ये विश्वास के जीवन के तीन बड़े कदम हैं।

इसके बाद उस जीवन का वर्णन आता है जिसमें उनका विश्वास प्रगट हुआ: और मान लिया कि हम पृथ्वी पर परदेशी और यात्री हैं। विश्वास ऐसी शक्ति है कि वह सारे जीवन पर राज्य करता है। मनुष्य का विश्वास ही है जो उससे अपना घर छुड़वाकर उसे हमारी सोने की खानों में ले आता है। यदि उसे धन कमाकर किसी बड़े आकर्षण के केन्द्र को लौट जाने का मार्ग दिखाई देता है, तो यही विश्वास उसमें उस परदेशी और यात्री का-सा मन बनाए रखता है, जिसका हृदय अपने स्वदेश में लगा रहता है। इसी प्रकार इन पवित्र लोगों ने प्रमाणित किया कि वे अपने निज देश की खोज में थे, कि जिस देश से वे निकल आए थे उसको लौटने का उनका कोई मन न था; वे एक उत्तम, अर्थात् स्वर्गीय देश के अभिलाषी थे। विश्वास ने उन्हें यात्री और परदेशी बनाया, और उनके लिए ईश्वरीय आशीष सुनिश्चित की। इसी लिए परमेश्वर उनका परमेश्वर कहलाने में नहीं लजाता, क्योंकि उसने उनके लिए एक नगर तैयार किया है।

हमारा बड़ा पाठ यह है: विश्वास हमें यहाँ पृथ्वी पर यात्री और परदेशी बनाता है। मसीह ऐसा ही था; हमें भी ऐसा ही होना है। जिस क्षण हम यह सन्देश अपने ही हृदय पर लागू करने लगते हैं, बहुत से प्रश्न उठ खड़े होते हैं। क्या यह हमें दैनिक जीवन के अयोग्य न बना देगा? यदि सब मनुष्य इसी यात्री-भाव में, परदेशियों और प्रवासियों के समान जीवन बिताने लगें, तो क्या होगा? संसार की उन्नति का क्या होगा? क्या हम नहीं देखते कि विज्ञान और राजनीति और साहित्य में वे ही लोग सबसे अधिक काम कर दिखाते हैं जो अपने आपको पूरी रीति से इन बातों में लगा देते हैं? जो लोग किसी उपनिवेश में आते हैं, और अपना धन वहाँ खर्च करने के लिए स्वदेश लौट जाते हैं, वे कभी वैसी रुचि नहीं लेते जैसी वे लेते हैं जो यहाँ बस जाने के लिए अपने आपको दे देते हैं। क्या सच्चा, तीव्र यात्री-भाव सचमुच सब के लिए कर्तव्य है? इससे बढ़कर सूक्ष्म कोई परीक्षा नहीं कि जो कुछ करने के लिए परमेश्वर हमें बुलाता है, उसे हम तब तक टाले रहें जब तक हमें पहले यह न बता दिया जाए कि दूसरों को क्या करना है, या परमेश्वर शेष संसार के साथ क्या करेगा। उसकी आज्ञाओं के पालन का क्या परिणाम होगा, यह हम निश्चिन्त होकर उसी पर छोड़ सकते हैं जो सब का शासक है, जो सर्वज्ञानी है। हर एक प्रश्न पर, कि इसका क्या हाल होगा?

मसीह का उत्तर है: तुझे इससे क्या? तू मेरे पीछे हो ले। यदि हम मसीह के चेले हैं, तो हम में से हर एक को यह यत्न करना चाहिए कि उसके आत्मा का जितना अधिक हो सके उतना हम में हो। यदि हमें उसके द्वारा नए और जीवते मार्ग में ले चला जाना है, कि हम उसके साथ परमपवित्र स्थान में रहें, तो हमें उसके समान यहाँ यात्री और परदेशी होकर जीवन बिताना होगा।

विश्वास स्वर्गीय मनवाला बनाता है। स्वर्गीय बुलाहट में भागी होने के नाते हम यीशु की ओर ताकते हैं, जिसने लज्जा की कुछ चिन्ता न करके क्रूस का दुख सहा। संसार से अलग होना विश्वास के जीवन के लिए अनिवार्य है। आदम का पतन इस दृश्य संसार की शक्ति और आत्मा के अधीन पतन था। मसीह ने अपने आपको दे दिया ताकि हमें इस वर्तमान बुरे संसार से छुड़ाए। जिस संसार में हम रहते हैं, तथाकथित मसीही संसार, वह अब भी वही है जिसने मसीह को ठुकरा दिया। उसके नाम का अंगीकार करते हुए भी, उसकी आत्मा, अर्थात् देखी हुई वस्तुओं के प्रति उसकी भक्ति, सुख-विलास और धन और सम्मान के पीछे उसकी दौड़, संस्कृति और समृद्धि में उसका आनन्द और उन पर उसका घमण्ड, यह सब ऐसी आत्मा है जो मसीह-समान, स्वर्गीय मनवाली आत्मा से पूरी रीति से विपरीत है। यही कारण है कि इतने लोग विश्वास में बढ़ना चाहते हैं, और असफल रहते हैं। वे परमपवित्र स्थान में रहना तो चाहते हैं, परन्तु संसार को त्यागे बिना। अब्राहम और उसका वंश ऐसे मनुष्यों की नाईं रहे जो अपने निज देश की खोज में थे, ऐसे लोगों की नाईं जो एक उत्तम, अर्थात् स्वर्गीय देश के अभिलाषी थे। जब तक स्वर्ग का राज्य अपनी सामर्थ में, जैसा वह स्वर्ग में परमेश्वर के सिंहासन से उतरा, हमारी एकमात्र अभिलाषा न बन जाए, और जब तक हम इस बहुमूल्य मोती के लिए सब कुछ छोड़ न दें और सब कुछ बेच न दें, तब तक हमारा विश्वास परमेश्वर की सामर्थ में स्थिर नहीं रह सकता, न संसार पर जय पा सकता है। यदि हमारी एकमात्र अभिलाषा यह न हो कि हम ऐसे लोगों के समान जीवन बिताएँ जो स्वर्गीय बुलाहट में भागी हैं, हाँ, मसीह में भागी हैं, जो यात्री और परदेशी हैं, और प्रगट करते हैं कि वे अपने निज देश की खोज में हैं, ऐसे लोगों के समान जो स्वर्गीय देश के अभिलाषी हैं, तो कोई आश्चर्य नहीं कि परमेश्वर हमारा परमेश्वर कहलाने में लजाता है, और हमारे प्राण उसकी उपस्थिति में चलने के आनन्द का स्वाद नहीं ले पाते।

विश्वास के समान मन को जाँचनेवाली कोई वस्तु नहीं। यदि हम उन सब बातों पर विश्वास करने का अंगीकार करते हैं जो इस पत्री ने प्रकट की हैं, तो आइए, हम अपने नायक के पीछे नए और जीवते मार्ग में चलकर, और उसके साथ परमपवित्र स्थान में रहकर इसे प्रमाणित करें। जैसे-जैसे हम अपने आपको पूरी रीति से इसके लिए दे देंगे, हमारा विश्वास बढ़ेगा; हम विश्वास के मनुष्य बन जाएँगे, जिनकी पहचान यह एक बात होगी, ऐसा विश्वास जो हमें स्वर्गीय संसार में उठा ले जाता है, और हमें यहाँ यात्री और परदेशी बना देता है।

विश्वास की आँख अधिकाधिक स्पष्ट होती जाएगी, और आरम्भ में कदाचित दूर से वह देखेगी जो बहुत से लोग नहीं देख पाते, अर्थात् अविनाशी जीवन की सामर्थ में, संसार और उसकी आत्मा से अलग और स्वतन्त्र होकर, परमपवित्र स्थान में निरन्तर बने रहने की प्रतिज्ञा और वास्तविकता और सम्भावना। विश्वास का हियाव अधिकाधिक दृढ़ होता जाएगा; जो कुछ परमेश्वर ने मसीह में यहाँ नीचे जीवित परमेश्वर के नगर में एक जीवन के विषय में कहा है, उस सब का हम अभिवादन करेंगे और उसे गले लगाएँगे, उस पर दावा करेंगे और उसे दृढ़ता से थामे रहेंगे, अपनी ही निज वस्तु के रूप में। और हम धीरज के साथ परमेश्वर की इच्छा पूरी करने में स्थिर बने रहेंगे, यह जानते हुए कि स्वयं परमेश्वर की और परमेश्वर के पुत्र की सामर्थ इस बात की जामिन है कि हम प्रतिज्ञा का फल पाएँगे। सच्चा विश्वास इससे आरम्भ होता है कि जिस बात की परमेश्वर ने प्रतिज्ञा की है उस पर आशा लगाए, परन्तु वह वहीं समाप्त नहीं होता; वह परमेश्वर की सामर्थ में उस सब के वास्तविक अधिकार और आनन्द तक ले जाता है जिसे उसने उसके वचन में गले लगाया था। जो कुछ परमेश्वर ने विश्वास से कहा है, उसका हाथ उसे पूरा करेगा।

1. विश्वास के तीन कदमों पर भली-भाँति ध्यान दीजिए। पहले मुझे देखना होगा कि परमेश्वर ने क्या प्रतिज्ञा की है। मुझे उस धन्य जीवन पर विश्वास करना होगा जो मसीह मेरे भीतर दे सकता है और बनाए रख सकता है। आइए, हम आत्मा के प्रकाश के लिए प्रार्थना करें (इफिसियों 1:14-20)। फिर मैं उस प्रतिज्ञा को गले लगाता हूँ, उसका अभिवादन करता हूँ, उसका स्वागत करता हूँ, उसे अपना कहकर उस पर दावा करता हूँ, और उसके पूरे होने की आशा रखता हूँ। यह मैं ठीक समय पर हृदय में और अनुभव में पाता हूँ। जो कुछ परमेश्वर ने मुझ से प्रतिज्ञा की है, उसका अनुभव करने की मुझे आशा रखनी चाहिए। प्रतिज्ञा सदा इस बात की अभिव्यक्ति होती है कि परमेश्वर की सर्वसामर्थ क्या करनेवाली है; हमारा विश्वास सदा इस बात की अभिव्यक्ति होना चाहिए कि हम उस सर्वसामर्थ से क्या करने की आशा रखते हैं।

105 परमेश्वर की सामर्थ पर भरोसा रखनेवाला विश्वास

11:17. विश्वास ही से अब्राहम ने, परखे जाने के समय, इसहाक को बलिदान चढ़ाया; हाँ, जिसने प्रतिज्ञाओं को आनन्द से ग्रहण किया था, वही अपने एकलौते पुत्र को चढ़ा रहा था;
18. हाँ, वही जिससे कहा गया था, कि इसहाक से तेरा वंश कहलाएगा:
19. क्योंकि उसने विचार किया कि परमेश्वर मरे हुओं में से भी जिलाने की सामर्थ रखता है; जहाँ से उसने दृष्टान्त की रीति पर उसे फिर पाया भी।

यहाँ फिर हमारे सामने अब्राहम के विश्वास की विशेषता के रूप में वह बड़ा शब्द है, चढ़ाना। हाबिल ने चढ़ाया; मसीह ने अपने आपको चढ़ाया; अब्राहम ने अपने एकलौते को चढ़ाया, और ऐसा करने में अपने आपको भी। किसी न किसी रूप में परमेश्वर के साथ संगति, अर्थात् विश्वास के जीवन, का अर्थ सदा बलिदान होता है। पापमय संसार में परमेश्वर के निकट आने का, पापमय स्वभाव से बाहर निकलने का कोई और मार्ग नहीं, सिवाय इसके कि हम उसके प्रति मर जाएँ, और स्वयं परमेश्वर से नया जीवन पाएँ, या यों कहें कि परमेश्वर अपना ही जीवन उस मरे हुए में डालकर उसे फिर जिलाए। परमेश्वर तक पहुँचने का कोई मार्ग नहीं, सिवाय इसके कि हम अपने जीवन को, और जो कुछ हमें प्राण के समान प्रिय है उसे, मृत्यु तक सौंप दें।

यह बलिदान केवल विश्वास के लिए ही सम्भव है। वह विश्वास, जिसने प्रतिज्ञा को देखा और गले लगाया है, जो परमेश्वर को जीवित और जीवन देनेवाले परमेश्वर के रूप में जानता है, और जो उसकी सामर्थ पर दावा करने और उस पर आशा लगाने का साहस करता है कि जो कुछ उसने कहा है वह मेरे साथ करेगा, वही विश्वास है जिसमें वेदी और छुरी और आग के लिए साहस होता है। अपने लोगों को विश्वास के पथ पर ले चलने में परमेश्वर का बड़ा उद्देश्य यह है कि उन्हें अधिकाधिक बड़े बलिदान के लिए प्रशिक्षित करे। जब अब्राहम ने अपने कुटुम्बियों और अपने पिता के घर को छोड़ा, तो वह उन सब का बलिदान था जो उसे प्रिय थे।

जब उसे पच्चीस वर्ष तक इसहाक की बाट जोहनी पड़ी, तो वह उसके अपने सारे विचारों और इच्छाओं का बलिदान था। परन्तु यह सब केवल उसे उस सर्वोच्च बलिदान के लिए तैयार करने के लिए था, अर्थात् अपने एकलौते पुत्र को, प्रतिज्ञा के पुत्र को, मृत्यु के लिए सौंप देना।

और वह क्या था जिसने यहाँ, उसकी इस सबसे कठिन परीक्षा में, विश्वास को उसका बल और उसकी जय दी? वह परमेश्वर पर सर्वशक्तिमान के रूप में विश्वास था, जो मरे हुओं में से भी जिलाने की सामर्थ रखता है। इसहाक के जन्म में उसने परमेश्वर को जीवन देनेवाले के रूप में जानना सीख लिया था, वहाँ भी जहाँ वह स्वयं मरा हुआ सा था। वह अपने परमेश्वर को जानता था और उस पर भरोसा रखता था, ऐसे परमेश्वर के रूप में जो मरे हुओं को जिलाता है, और जो बातें हैं ही नहीं, उनका नाम ऐसा लेता है कि मानो वे हैं। और वह क्या है जो हमारे विश्वास को वही सर्वविजयी बल देगा, और हमें अपने लिए परमेश्वर की जिलानेवाली सामर्थ के उसी महान प्रदर्शन के लिए तैयार करेगा? यदि हमें वही विश्वास, और परमेश्वर का वही अनुभव पाना है, तो हमें वही बलिदान करने के लिए तैयार रहना होगा। आज का हमारा पाठ हमें विश्वास के जीवन की सबसे गहरी जड़ों तक ले जाता है। जितना अधिक हम स्वयं के प्रति मृत्यु में गहरे उतरने को तैयार होंगे, उतना ही अधिक हम परमेश्वर की महान सामर्थ को, और सिद्ध भरोसे की सिद्ध धन्यता को जानेंगे।

सारा के विश्वास में हमने देखा कि जीवित और जीवन देनेवाले परमेश्वर पर विश्वास का अर्थ और उसकी सामर्थ क्या थी। परन्तु मोरिय्याह पर अब्राहम हमें बहुत आगे ले जाता है। सारा ने परमेश्वर पर भरोसा रखा कि वह ऐसी शक्ति प्रदान करेगा जो स्वभाव में नहीं थी; अब्राहम ने भरोसा रखा कि वह ऐसा जीवन लौटा देगा जो ले लिया गया था। सारा उस प्राण का प्रतिरूप है जो, स्वयं की मृत्यु के विषय में अधिक सोचने से पहले ही, अनुग्रह और विश्वासयोग्यता के कार्य के रूप में परमेश्वर की जिलानेवाली सामर्थ की बाट जोहता है। उसके साथ जिलाया जाना एक ऐसी मृतप्राय दशा के उत्तर में आया जो केवल स्वभाव की दुर्बलता का परिणाम प्रतीत होती है। अब्राहम के साथ सब कुछ भिन्न है; इसहाक, परमेश्वर का दिया हुआ जीवन, बलिदान किया जाना चाहिए, इससे पहले कि सामर्थ के इस नए प्रदर्शन की आशा की जा सके। उस बलिदान को यह सिखाना था कि परमेश्वर का दिया हुआ जीवन भी अब तक पतित स्वभाव की शक्ति के अधीन है; कि केवल मृत्यु के द्वारा ही वह पाप और मृत्यु की शक्ति से छुड़ाया जा सकता है; कि केवल इसी रीति से वह ऐसा जीवन बन सकता है जिस पर पूरी रीति से परमेश्वर का अधिकार हो। पहली बार उसके द्वारा जिलाया गया, फिर भी पाप की शक्ति के अधीन; दूसरी बार, पाप के लिए मरा हुआ, और अनन्तकाल के सिद्ध जीवन में परमेश्वर के लिए जीवित।

यह उस बात का प्रतीक था जो मसीह यीशु में, और हर एक में जो उसकी मृत्यु की संगति में उसके समान बनाया जाता है, होनेवाली थी। हम देखते हैं कि मसीही जीवन में यह हमें कहाँ ले जाता है। जैसे मसीह ने अपने जन्म में पिता से अपना जीवन पाया, वैसे ही हम भी अपने नए जन्म में पाते हैं। परन्तु उस जीवन का बलिदान होना आवश्यक था, इससे पहले कि वह पिता की महिमा में पूरे जीवन में प्रवेश कर सके। ठीक वैसा ही हमारे साथ भी है। जो जीवन परमेश्वर हमें नए जन्म में देता है, वह केवल इसलिए है कि हमें इसके लिए तैयार करे कि हम मसीह की मृत्यु के साथ एक सिद्ध, स्वेच्छा से की हुई अनुरूपता को समझें, और उसकी अभिलाषा करें, और उसे स्वीकार करें, और उसमें प्रवेश करें। जैसे-जैसे हम देखते हैं कि स्वयं अब तक हम में कितना अधिक है, हम उस बात को सीखने और उसकी लालसा करने लगते हैं जो स्वयं के प्रति मृत्यु में सम्मिलित है। इसका अर्थ है इस बात की और गहरी अन्तर्दृष्टि कि हम कोई भी भलाई करने में पूरी रीति से और सर्वथा असमर्थ हैं। इसका अर्थ है कुछ न होने और कुछ न करने की, और परमेश्वर को सब कुछ होने और सब कुछ करने देने की, स्वेच्छा से और हृदय से सहमति। इसका अर्थ है अपने ही कामों से सचमुच रुक जाना, और पवित्र आत्मा के द्वारा परमेश्वर के प्रत्यक्ष और निरन्तर कार्यों के प्रति पूरा समर्पण, कि वह हम में उन बातों के लिए, जो उसकी दृष्टि में भाती हैं, इच्छा और काम दोनों उत्पन्न करे।

इसका अर्थ है अपने प्राण से ऐसा बैर रखना, अपने आप का ऐसा इन्कार करना, कि मनुष्य उसके लिए मृत्यु से कम किसी बात से सन्तुष्ट न हो। वही प्राण, जो इस नए और जीवते मार्ग में अपने प्रभु के पीछे चलना चाहता है, उस विश्वास की आवश्यकता का अनुभव करता है जो मरे हुओं को जिलानेवाले जीवित परमेश्वर पर होता है, और वही उसका अभ्यास करने के योग्य बनाया जाएगा। विश्वास की परीक्षा ही उसकी सामर्थ को जगाती है; विश्वास की आवश्यकता ही परमेश्वर की सामर्थ को नीचे बुला लाती है। ओह, यदि हम केवल परमेश्वर की यह बुलाहट सुनते कि जो जीवन उसने स्वयं हमें दिया है, उसके सारे धन्य अनुभवों समेत, उसे ले आएँ और मृत्यु के लिए सौंप दें, तो हम उसे उसकी जिलानेवाली महान सामर्थ में कैसे जानना सीखते! ऐसे जीवन के स्थान पर, जिसमें परमेश्वर का कुछ अंश तो है परन्तु मनुष्य का कहीं अधिक, वह जिसने अब्राहम की अगुवाई की थी, हमें मृत्यु के स्थान पर ले आता, जहाँ वह हमें यह निश्चय देता कि अब से उसकी सर्वशक्तिमान सामर्थ सब कुछ करेगी, और हम अपनी धन्यता इसमें पाते कि हम कुछ न रहें और परमेश्वर को अपना जीवन होने दें।

हे मसीही, अब्राहम ने इसहाक को चढ़ाया, यह विचार करके कि परमेश्वर उसे मरे हुओं में से भी जिलाने की सामर्थ रखता है। मृत्यु का स्थान ग्रहण कीजिए; उस परमेश्वर पर भरोसा रखिए जो मरे हुओं को जिलाता है, और मृत्यु में जीवन देता है; विश्वास कीजिए, तो आप परमेश्वर की महिमा को देखेंगे।

1. परमेश्वर की सामर्थ का सबसे ऊँचा प्रदर्शन मसीह का मरे हुओं में से जिलाया जाना है। मसीह द्वारा विश्वास का सबसे ऊँचा अभ्यास मृत्यु में था: उसने अपनी आत्मा पिता के हाथों में सौंप दी। विश्वासी में विश्वास का सबसे ऊँचा अभ्यास यह है कि जो जीवन परमेश्वर ने हमें दिया है उसे प्रतिदिन मृत्यु के लिए सौंप दें, इस विश्वास में कि वह अपने भीतर वास करनेवाले आत्मा के द्वारा हर क्षण उसे जिलाएगा।

2. इसहाक के जन्म से पहले अब्राहम के पास प्रतिज्ञा के सिवा सहारा लेने को कुछ न था। उसके बाद इस बात का खतरा था कि वह इसहाक पर सहारा लेने लगे: इसलिए इसहाक को छोड़ देना पड़ा। परमेश्वर के सब दान, जो विश्वास से पाए गए हैं, हमारा भरोसा बन सकते हैं, और उन्हें एक और ऊँचे विश्वास में उसी को वापस सौंप देना चाहिए। 3. हमारा सारा जीवन, हर दिन, हर क्षण, सर्वशक्तिमान परमेश्वर का वह कार्य होना है जो वह अपने पवित्र आत्मा के द्वारा हमारे भीतर करता है।

106 बच्चों को आशीष देनेवाला विश्वास

11:20. विश्वास ही से इसहाक ने याकूब और एसाव को आनेवाली बातों के विषय में भी आशीष दी।
21. विश्वास ही से याकूब ने मरते समय यूसुफ के पुत्रों में से एक एक को आशीष दी, और अपनी लाठी के सिरे पर सहारा लेकर दण्डवत् किया।
22. विश्वास ही से यूसुफ ने, जब उसका अन्त निकट था, इस्राएल की सन्तान के निकल जाने की चर्चा की, और अपनी हड्डियों के विषय में आज्ञा दी।
23. विश्वास ही से मूसा, जब उत्पन्न हुआ, तो उसके माता-पिता ने उसे तीन महीने तक छिपा रखा, क्योंकि उन्होंने देखा कि बालक सुन्दर है; और वे राजा की आज्ञा से न डरे।

यह ध्यान देने योग्य बात है कि इस अध्याय में, और सारे पवित्रशास्त्र में भी, विश्वास का माता-पिता और बच्चों के सम्बन्ध से कितना अधिक लेना-देना है। स्वभाव में माता-पिता का जीवन बच्चों को दिया जाता है। आत्मिक संसार में भी ऐसा हो सकता है; परमेश्वर के साथ विश्वास की संगति बच्चों तक भी पहुँचती है; दृढ़ विश्वासवाला मनुष्य अपने बच्चों के लिए आशीष होता है। हम नूह और अब्राहम और सारा में देख चुके हैं कि परमेश्वर पर उनके विश्वास का उनके बच्चों से कितना बड़ा सम्बन्ध था। और यहाँ हमें चार और उदाहरण मिलते हैं।

विश्वास ही से इसहाक ने याकूब और एसाव को आशीष दी। अपने बच्चों पर उसकी आशीष उस प्रतिज्ञा पर उसके विश्वास का प्रदर्शन थी जो परमेश्वर ने उसके पिता से और उससे की थी, और उन तक उस आशीष का पहुँचाया जाना थी। विश्वास ही से याकूब ने यूसुफ के पुत्रों में से एक एक को आशीष दी, और हर एक को आनेवाले भविष्य में उसका स्थान दिया। विश्वास ही से यूसुफ ने इस्राएल की सन्तान के निकल जाने की चर्चा की, यह कहते हुए: “मैं तो मरने पर हूँ; परन्तु परमेश्वर निश्चय तुम्हारी सुधि लेगा, और तुम्हें इस देश से निकालकर ले जाएगा।” विश्वास ही से मूसा को उसके माता-पिता ने तीन महीने तक छिपा रखा, क्योंकि उन्होंने देखा कि बालक सुन्दर है। उस भविष्य पर उनके विश्वास ने, जिसके विषय में वे जानते थे कि वह इस्राएल की सन्तान की बाट जोह रहा है, और परमेश्वर की उस दया पर उनके विश्वास ने जो अपने लोगों पर दृष्टि रखती है, उन्हें यह साहस दिया कि वे राजा की आज्ञा से न डरें। इन सब उदाहरणों में विश्वास ही अपने बच्चों के प्रति उनके व्यवहार की गुप्त प्रेरणा, और आशीष का स्रोत था। विश्वास कभी अपने आपको विश्वासी के अपने ही व्यक्तित्व तक सीमित नहीं रखता, वरन् उसके घर और बच्चों को भी अपने में समेट लेता है।

और मसीही माता-पिता अपने बच्चों के लिए यह बहुप्रतीक्षित आशीष कैसे सुनिश्चित कर सकते हैं? इसका केवल एक ही उत्तर है: विश्वास के द्वारा। हमारा जीवन पूरी रीति से विश्वास का होना चाहिए, अर्थात् अनदेखी वस्तुएँ हमारा जीवन हों, हाँ, बल्कि अनदेखा परमेश्वर हमारा जीवन हो। आशीष और सामर्थ उसी की है; और जितना अधिक हमारे जीवन में और हमारे घर में परमेश्वर होगा, उतना ही वह छिपी हुई सामर्थ हमारे बच्चों पर ठहरी रहेगी। विश्वास का अर्थ केवल यह जानना ही नहीं कि हमारे बच्चों के लिए वाचा की एक प्रतिज्ञा है, और प्रार्थना में उसे लेकर बिनती करना। यह भी विश्वास का एक अभ्यास है, और इसका बड़ा मूल्य है। परन्तु मुख्य बात जीवन है; विश्वास परमेश्वर के लिए मार्ग बनाना और उसे अपने जीवन में स्थान देना है। और जब कभी दर्शन में विलम्ब होता है, और प्रतिज्ञा विफल होती-सी दिखाई देती है, तो विश्वास इसे केवल इस बात की बुलाहट समझता है कि परमेश्वर पर और भी पूरा और और भी निश्चिन्त भरोसा रखा जाए। जब हम अपने भरोसे को अन्त तक दृढ़ता से थामे रहते हैं, जब हम धीरज और सहनशीलता में विश्वास में दृढ़ होकर परमेश्वर की महिमा करते हैं, तो हम निश्चय जान लेंगे कि हम इस प्रतिज्ञा के भी वारिस होंगे: मैं तेरा परमेश्वर और तेरे वंश का परमेश्वर ठहरूँगा।

कुलपिताओं से हम सीखते हैं कि वह वातावरण और वह भूमि कौन-सी है जिसमें ऐसा विश्वास उगता है जो बच्चों को आशीष देता है। वे प्रतिज्ञा किए हुए देश में परदेशी और यात्री होकर रहते थे, या मिस्र में भी परदेशी और यात्री होकर, उस देश में लौटने की लालसा करते हुए। उनका सारा जीवन परमेश्वर में, और जो कुछ वह करेगा उसमें, आशा था। वे ऐसे मनुष्य थे जिन्हें परमेश्वर ने पकड़ लिया था, ताकि उनके इतिहास में प्रमाणित करे कि वह अपनी प्रतिज्ञा को कितनी महिमा के साथ पूरा करेगा। और उनके पास जीने के लिए परमेश्वर के सिवा कुछ न था। यह प्रकृति का नियम है कि कोई वस्तु एक ही समय में दो स्थानों पर नहीं हो सकती। यह बात हृदय के विषय में भी उतनी ही सच है। जब परमेश्वर अब्राहम और उसके वंश को उनके देश से निकाल लाया, तो इसलिए कि प्रतिज्ञा किया हुआ देश, मनुष्यों से अलग होने का, परमेश्वर के लिए अलग किए जाने का देश, उनके लिए विश्वास की पाठशाला बने। वे घर और परिवार की संगति से निकलकर परमेश्वर की संगति में रहने के लिए गए। वहीं उन्होंने विश्वास से बच्चों को आशीष देना सीखा।

संसार से अलग होना, परमेश्वर के लिए अलग किया जाना, स्वयं और उसके जीवन का इन्कार, अपने निकल जाने में अब्राहम का, और अपने आत्म-बलिदान में मसीह का अनुकरण, यही उस प्रतिज्ञा किए हुए देश का एकमात्र मार्ग है जहाँ विश्वास का जीवन फलता-फूलता है। पूरी रीति से परमेश्वर के लिए जीना, केवल परमेश्वर पर आशा रखना, सदा परमेश्वर के साथ चलना, सब बातों में परमेश्वर की सुनना, यही भीतरी पवित्रस्थान में जाने का वह नया और जीवता मार्ग है, जिसमें हमारा महायाजक यीशु हमारी अगुवाई करता है। जो प्रतिज्ञा किया हुआ देश कुलपिताओं के लिए था, अर्थात् अलग रहने और आज्ञाकारिता और विश्वास के जीवन का स्थान, वही हमारे लिए परमपवित्र स्थान है। यही वह स्थान है जिसके विषय में परमेश्वर ने हम से कहा है: अपने देश से निकलकर उस स्थान को चला जा जो मैं तुझे दिखाऊँगा, और मैं तुझे आशीष दूँगा; यही एकमात्र स्थान है जहाँ हमारा विश्वास स्वतन्त्रता से बढ़ सकता है, और परमेश्वर हम में अपनी सारी सामर्थ प्रमाणित कर सकता है, कि हम भी उनके समान इस बात का प्रदर्शन बन सकें कि परमेश्वर क्या कर सकता है। और यही वह स्थान है जहाँ हमारा विश्वास पूरी मात्रा में हमारे बच्चों के लिए आशीष बनेगा।

केवल विश्वास ही से हम आशीष दे सकते हैं। परमेश्वर हमें अपने घर से भी बड़े दायरों के लिए आशीष बनाने को तैयार है। वह ऐसे पात्रों को, छूछे पात्रों को, और थोड़े नहीं, बुला रहा है, जिनमें वह अपनी आशीष को बढ़ा सके। वही आशीष का एकमात्र सोता है; जैसे-जैसे हमारा विश्वास परमेश्वर के आगे झुकता है, और उसे सब कुछ होने देता है, वैसे-वैसे उसकी आशीष बहेगी। जो मसीही आशीष बनना चाहता है, वह विश्वास का मनुष्य हो, अर्थात् ऐसा मनुष्य जिसके पास अपने में कुछ नहीं और जो अपने में कुछ नहीं, और जिसमें परमेश्वर को काम करने की पूरी स्वतन्त्रता है; तब आशीष की कमी न होगी। ओह, कि परमेश्वर को अपने इस निज संसार में वह स्थान मिले जो उसका है! और यदि अभी यह न हो सके, तो ओह, कि उसे अपने लोगों के हृदयों में वह स्थान मिले! और यदि ऐसा लगे कि अभी यह भी न होगा, तो ओह, मेरे पाठक, हम उसे आपके हृदय में और मेरे हृदय में वह स्थान दें। विश्वास यह देखे, और इस पर सहमत हो, और यह प्रमाणित करे कि परमेश्वर ही सब कुछ है, और वह प्रमाणित करेगा कि वह आपके लिए और आपके चारों ओर के सब लोगों के लिए आशीष का परमेश्वर है।

1. हे माता-पिता, शिक्षक, सेवक, काम में आशीष का भेद, प्रभाव डालने की सामर्थ, विश्वास ही है। केवल कभी-कभी किसी प्रतिज्ञा पर विश्वास नहीं, वरन् एक पवित्र विश्वास की ऐसी आदत जो परमेश्वर को हमारे जीवन का सर्वस्व बना देती है। अपने जीवन के परमेश्वर के रूप में परमेश्वर पर विश्वास रखिए, उस परमेश्वर के रूप में जो आपके भीतर अपने जीवन और अपनी उपस्थिति को बनाए रखता है; वह आपके द्वारा काम करेगा।

2. कैसी धन्य बात है परमेश्वर के हाथों में एक साधन होना, जिसके द्वारा वह अपना उद्देश्य पूरा करता है; एक ऐसा पात्र होना जिसे वह अपने प्रेम से भरता है। 3. अपने आपको ऐसा समझना सीखिए कि आप आशीष बनने के लिए ठहराए गए हैं, और विश्वास और प्रेम आपके सारे जीवन की पहचान हों।

107 मूसा, और विश्वास का निर्णय

11:24. विश्वास ही से मूसा ने सयाना होकर फिरौन की बेटी का पुत्र कहलाने से इन्कार किया;
25. और परमेश्वर के लोगों के साथ दुख भोगना इससे उत्तम चुना कि

थोड़े दिन तक पाप का सुख भोगे; 26. और मसीह की निन्दा को मिस्र के भण्डारों से बड़ा धन समझा; क्योंकि उसकी आँखें फल पाने की ओर लगी थीं। हम सब विश्वास से जीते हैं। जिस वस्तु से हम प्रेम करते हैं और जिसमें हम जीते हैं, उसी पर हम विश्वास करते हैं। जो दृश्य और क्षणिक वस्तुओं पर भरोसा रखता है और अपने आपको उन्हें सौंप देता है, वह पार्थिव, शारीरिक जीवन जीता है। जो अनदेखी और अनन्त वस्तुओं की ओर देखता है, और अपने आपको उनसे जोड़ लेता है, वह ईश्वरीय, स्वर्गीय जीवन जीता है।

इन दोनों के बीच विश्वास को सदा चुनाव करना पड़ता है। अनदेखी वस्तुओं के पक्ष में निर्णय जितना स्पष्ट और जितना सोच-समझकर, जितना सचेत होगा, उतना ही परमेश्वर पर विश्वास दृढ़ होगा और प्रतिफल पाएगा। सही चुनाव करने में बड़ी कठिनाई इस बात में है कि अदन की वाटिका में देखी और इन्द्रियगोचर वस्तुओं ने जो जय पाई, उसके कारण हमारी आँखें अन्धी हो गई हैं, और समय की वस्तुओं ने, वहाँ भी जहाँ हम मानते हैं कि उनका मूल्य कम है, अपनी निरन्तर उपस्थिति और अपने दबाव डालनेवाले दावों के कारण, अधिक प्रबल शक्ति प्राप्त कर ली है। विश्वास को जो बड़ा काम करना है, और उसकी बढ़ती और दृढ़ता के लिए जो सबसे अच्छी पाठशाला है, वह अनदेखी वस्तुओं का चुनाव है।

इस चुनाव का मूसा एक प्रभावशाली उदाहरण है। ज़रा देखिए कि एक ओर क्या था। शरीर की अभिलाषा: पाप में थोड़े दिन का सुख। आँखों की अभिलाषा: मिस्र का धन। जीविका का घमण्ड: फ़िरौन की बेटी का पुत्र कहलाना।

और दूसरी ओर, दुःख भोगना, निन्दा सहना। और वह क्या था जिसने उसे बुद्धिमानी का चुनाव करने के योग्य बनाया? उसने देखा कि परमेश्वर के लोगों के साथ दुःख भोगना परमेश्वर को अपना भाग और अपनी शरण पाना है। उसने मसीह की निन्दा, स्वर्ग से आनेवाले मसीह के आत्मा की सामर्थ में सही, जो उसके हृदय को पृथ्वी से ऊपर उठाता था। जैसे मसीह ने उस आनन्द के लिये जो उसके आगे धरा था, क्रूस का दुःख सहा, वैसे ही उसकी दृष्टि प्रतिफल पाने की ओर लगी थी। परमेश्वर के लोगों पर परमेश्वर की आशीष में विश्वास — परमेश्वर के मसीह के साथ आत्मा में एकता — आनेवाले जगत का निश्चय, जो पृथ्वी के न्यायों को उलट देगा; कोई आश्चर्य नहीं कि इन सब ने उसे उस चुनाव की ओर मार्ग दिखाया और उसमें दृढ़ किया जो उसने किया — वह उत्तम भाग जो उससे कभी छीना न जाएगा। हम इस अध्याय का अध्ययन पत्री के साथ उसके सम्बन्ध में कर रहे हैं, और उस जीवन के विषय में उसकी शिक्षा के साथ जो मसीह की अगुवाई में बीतता है — उसके अनुरूप होने के नए और जीवते मार्ग का जीवन, जो परमेश्वर की उपस्थिति के परमपवित्र स्थान में ले जाता है। हम यह जानने की लालसा रखते हैं कि हम कैसे बलवन्त हो सकते हैं, और ऐसे विश्वास के पूरे अभ्यास में जी सकते हैं जो प्रतिज्ञा का वारिस होता है और परमेश्वर के विश्राम में प्रवेश करता है। मूसा की गवाही स्पष्ट है: विश्वास अपने आप को इसमें प्रमाणित करे कि वह एक ही बार और सदा के लिये, चाहे कुछ भी मूल्य चुकाना पड़े, अनदेखी वस्तुओं को चुन ले — प्रतिफल निश्चित और बड़ा होगा। अब्राहम में हमने यह चुनाव तब देखा जब कोई विशेष विरोध या सताव न था। मूसा के चुनाव में जो विशेषता हमें ध्यान से देखनी है, वह यह है: जब हम पर दुःख भोगने, और निन्दा सहने, और सब कुछ खो देने का सामना करने का ख़तरा मण्डरा रहा हो, तब विश्वास को झिझकना या रुकना नहीं चाहिए। परमेश्वर के लोगों के साथ दुःख भोगना, मसीह की निन्दा सहना, और इन्हें मिस्र के सारे भण्डारों से बड़ा धन समझना — यही वह है जो विश्वास मनुष्य को करने के योग्य बनाता है, यही वह आत्मिक अनुशासन है जो विश्वास को बलवन्त बनाता है। विश्वास हर एक वस्तु को अनन्तकाल के प्रकाश में देखता है, और उसका ऐसा मूल्यांकन करता है जैसा कोई न्याय का दिन बीत जाने और महिमा आरम्भ हो जाने पर करेगा; हर एक वस्तु अपने सच्चे मूल्य में दिखाई देती है, और त्याग और दुःख और हानि और परीक्षा का स्वागत उस प्रशिक्षण के रूप में किया जाता है जिसमें आनन्द-भरा निर्णय, और दृढ़ इच्छा, और बलवन्त चरित्र, और विश्वास की विजय प्राप्त होती है।

यहाँ हमारे सामने हमारे दिनों में विश्वास की निर्बलता का बड़ा कारण है। संसार से कोई अलगाव नहीं है। बहुत से मसीही संसार के सुख और सम्मान और धन में से उतना अधिक पाने का प्रयत्न करते हैं जितना वे अपने धर्म के अंगीकार के साथ-साथ किसी प्रकार पा सकते हैं।

ऐसे वातावरण में विश्वास का दम घुट जाता है। बहुत से लोग मुश्किल से ही विश्वास करते हैं, या कभी स्मरण ही नहीं रखते, कि संसार, अपनी कलाओं और संस्कृति और समृद्धि के साथ, अपने सारे धार्मिक अंगीकारों के बीच भी, अब भी वही संसार है जिसने मसीह को ठुकरा दिया। वह चेला जो अपने प्रभु के समान होना चाहता है, “संसार का नहीं, जैसे वह संसार का नहीं था,” पौलुस के साथ यह कहने का प्रयत्न करता है, “पर ऐसा न हो कि मैं और किसी बात का घमण्ड करूँ, केवल हमारे प्रभु यीशु मसीह के क्रूस का, जिसके द्वारा संसार मेरे लिये क्रूस पर चढ़ाया गया है, और मैं संसार के लिये।” परमेश्वर के राज्य में मूसा का स्थान कितना अद्भुत है! एक भविष्यद्वक्ता के रूप में, एक मध्यस्थ के रूप में, एक बिनती करनेवाले के रूप में, अपनी नम्रता और अपनी विश्वासयोग्यता में यीशु का एक नमूना — परमेश्वर के सेवकों में ऐसे थोड़े ही हैं जो उससे ऊँचे खड़े हों। और किस बात ने उसे यह स्थान लेने के योग्य बनाया? बस यही — मसीह की निन्दा के लिये सब कुछ छोड़ देने का चुनाव। हे मसीही, क्या आप परमेश्वर के अनुग्रह में जीना चाहते हैं, और मूसा के समान उससे मिलने के लिये उसके तम्बू में प्रवेश करना चाहते हैं?

क्या आप आशीष का एक साधन और आशीष की एक सामर्थ, विश्वास में बलवन्त मनुष्य बनना चाहते हैं? तो संसार की आत्मा से पूरी रीति से अलग रहने का प्रयत्न कीजिए, उसके सुख और सम्मान और धन को ठुकरा दीजिए; परमेश्वर के लोगों के अपमान और मसीह की निन्दा को अपना धन समझिए। पवित्र आत्मा से प्रकाश माँगिए कि वह आपको सिखाए कि संसार के साथ, उसकी संस्कृति, उसकी सम्पत्ति, उसकी मित्रता के साथ आपके सम्बन्ध में मसीह के अनुरूप होना सचमुच क्या है। किसी मानवीय मापदण्ड से यह निर्णय करने से सावधान रहिए कि क्या उचित है — केवल मसीह ही आपको सिखा सकता है कि सब कुछ छोड़ देने, सब कुछ बेच देने, अपने आप का इन्कार करने, और क्रूस उठाकर उसके पीछे हो लेने का क्या अर्थ है। उसके अनुरूप बनने के लिये सब वस्तुओं को हानि समझिए। मसीह की निन्दा सहने ही में मूसा जैसा चरित्र गढ़ा गया था।

विश्वास के लिये सामर्थ और आशीष तक पहुँचने का यही निश्चित मार्ग है। मसीह की निन्दा को अपना धन समझते हुए मूसा के पीछे चलिए, और आप उसके साथ प्रतिफल में भागी होंगे। सो आओ, हम उसकी निन्दा अपने ऊपर लिये हुए उसके पास निकल चलें।

1. बहुत ध्यान से जाँचिए कि आपका ख़तरा कहाँ है। क्या वह मनुष्यों की मित्रता और सम्मान है? क्या वह सुख-विलास है? क्या वह संसार की चिन्ताएँ हैं? वह जो कुछ भी हो, उसे छोड़ दीजिए। केवल संसार से अलग आत्मा ही विश्वास में बलवन्त हो सकती है।

2. वह विश्वास क्या है जो मनुष्य को सब कुछ सहने और सब कुछ त्याग देने के योग्य बनाता है? और कुछ नहीं, केवल ऐसी आँख जो वस्तुओं के सच्चे स्वभाव और मूल्य को भीतर तक देखती है, जो उनका वैसा ही मूल्यांकन करती है जैसा परमेश्वर करता है। हाँ, बल्कि यह कि हम परमेश्वर को सब कुछ देखें, और सृष्टि को कुछ भी नहीं, सिवाय इसके कि वह उस तक पहुँचाती है।

एकान्त में जाकर और अदृश्य के साथ संगति करके इस विश्वास में अपने आप को साधिए। इस संसार के साहित्य के साथ बहुत खुले मेल-जोल से सावधान रहिए: उसकी आत्मा आपके भीतर प्रवेश कर जाती है। संसार परमेश्वर को नहीं जानता: अपना चुनाव कीजिए और उस पर स्थिर रहिए।

108 इस्राएल, और विश्वास के द्वारा छुटकारा

11:27. विश्वास ही से राजा के क्रोध से न डरकर उसने मिस्र को छोड़ दिया; क्योंकि वह अनदेखे को मानो देखता हुआ दृढ़ रहा।
28. विश्वास ही से उसने फसह और लहू छिड़कने की विधि मानी, कि

पहिलौठों का नाश करनेवाला उन्हें न छूए। 29. विश्वास ही से वे लाल समुद्र के पार ऐसे उतर गए जैसे सूखी भूमि पर से; और जब मिस्रियों ने वैसा ही करना चाहा, तो सब डूब मरे। 30. विश्वास ही से यरीहो की शहरपनाह, जब सात दिन तक उसका चक्कर लगा चुके, तो गिर पड़ी।

31. विश्वास ही से राहाब वेश्या आज्ञा न माननेवालों के साथ नाश नहीं हुई; इसलिये कि उसने भेदियों को कुशल से रखा था। इन पदों में हमें, मिस्र से कनान की ओर जाते हुए इस्राएल के इतिहास में से पाँच उदाहरणों में, इस सत्य की नए सिरे से पुष्टि मिलती है कि छुटकारे में परमेश्वर जो कुछ करता है, उस सब में मनुष्य की ओर से विश्वास ही आदि और अन्त है। चाहे हम उसके प्रकाशन को सम्पूर्ण रूप में देखें, या उसके अलग-अलग भागों को, हर जगह वह एक ही बात जो वह माँगता है, वह एक ही बात जो उसे प्रसन्न करती है, वह एक ही बात जो उसकी आशीष को निश्चित करती है, विश्वास है। पाँच बार दोहराए गए “विश्वास ही से” में हम देखते हैं कि परिस्थितियों और कर्तव्यों की बड़ी से बड़ी विविधता में भी सब कर्तव्यों में पहला कर्तव्य सदा उस अदृश्य पर विश्वास है। ओह, कि हम अन्त में यह पाठ सीख लें: जैसे एक ही परमेश्वर है, और एक ही छुटकारा, वैसे ही उस तक और उस छुटकारे तक पहुँचने का केवल एक ही मार्ग है — उस पर विश्वास। जितनी पूर्ण और सार्वभौमिक और निर्विवाद परमेश्वर की एकमात्र सर्वोच्चता है, उतनी ही हमारे हृदय में विश्वास की सर्वोच्चता होनी चाहिए। क्योंकि जब विश्वास सर्वोच्च होकर राज्य करता है, तो वह परमेश्वर के लिये मार्ग बनाता है, और परमेश्वर हमारे भीतर वही बन सकता है जो वह विश्व में है, जो वह अपने स्वभाव ही में है — सब में सब।

इस्राएल का इतिहास, परमेश्वर के पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन में, प्राण में मसीह के जीवन का सच्चा प्रतिरूप और चित्र है। उस इतिहास के आरम्भ से लिये गए इन उदाहरणों में मसीही जीवन के कुछ मुख्य कदम बड़ी स्पष्टता से चित्रित हैं। विश्वास ही से मूसा ने इस्राएल के साथ मिस्र को छोड़ दिया, और वह उस राजा के क्रोध से न डरा जो उनका पीछा करता। यह सदा पहला कदम है — बाहर निकल आना, अलग हो जाना, पाप से नाता तोड़ना, मिस्र को, जो हमारी जन्मभूमि है, विदा कहना, और शैतान या संसार के क्रोध से न डरना। यह विश्वास को छोड़ और किसी रीति से निश्चित रूप से और लगातार नहीं किया जा सकता। परन्तु विश्वास हमें यह करने के योग्य बना सकता है, जैसा उसने मूसा को बनाया। क्योंकि वह अनदेखे को मानो देखता हुआ दृढ़ रहा। यही विश्वास की महान सामर्थ है — वह वह देखता है जो दूसरे नहीं देख सकते। उन हज़ारों बातों के बीच जिन्हें दूसरे देखते हैं और जिनसे वे चलाए जाते हैं, वह कुछ ऐसा देखता है जो असीम रूप से बड़ा है — वह परमेश्वर को देखता है। कोई आश्चर्य नहीं कि वह मनुष्य को दूसरे मनुष्यों से भिन्न रीति से काम करने की ओर ले जाता है। जिस किसी वस्तु पर वह दृष्टि करता है, उस पर अनन्तकाल का, परमेश्वर का, उज्ज्वल प्रकाश चमक रहा होता है। कोई आश्चर्य नहीं कि उस दर्शन की प्रेरणा में वह बड़े-बड़े काम कर सकता है, क्योंकि वह परमेश्वर को अपना सहायक और बल देखता है।

मैं यहाँ हर एक विश्वासी से यह कहूँ कि जैसे किसी भी काम में अभ्यास के द्वारा आँख को वह देखने के लिये साधा जा सकता है जो दूसरे नहीं देख सकते, वैसे ही विश्वास की आँख को हर जगह परमेश्वर को देखने के लिये साधा जा सकता है। उसकी उपस्थिति में तब तक बने रहिए जब तक हृदय उससे भर न जाए। जो कुछ भी घटित होता है, उस हर एक बात में उसे पहचानिए। उसके मुख के प्रकाश में चलने का प्रयत्न कीजिए। अदृश्य को देखना संसार को छोड़ देना और परमेश्वर की इच्छा पूरी करना सहज बना देगा।

विश्वास ही से उसने, इस्राएल के साथ, फसह और लहू छिड़कने की विधि मानी, कि नाश करनेवाला उन्हें न छूए। जब विश्वास पहले कदम के लिये, अर्थात् मिस्र को छोड़ने के लिये, तैयार होता है, तो परमेश्वर अपने ईश्वरीय प्रबन्ध के साथ उससे मिलता है, और विश्वास लहू की आड़ में पूरी सुरक्षा और विश्राम पाता है। और यदि इस्राएल ने इस प्रकार परमेश्वर के वचन का आदर किया और एक मेम्ने के लहू पर भरोसा रखा — ओह, तो क्या हम उस मेम्ने के लहू का दस हज़ार गुना अधिक आदर न करें, और उस अनन्त उद्धार पर विश्वास करके उसका दावा न करें जो वह हमारे लिये लाता है? हमें उसकी अद्भुत सामर्थ सिखाई गई है — पाप और मृत्यु पर जय पाने में, स्वर्ग को खोलने में, हमारे विवेक और हृदय को शुद्ध और सिद्ध करने में, और हमें परमेश्वर के निकट लाने में — आओ, हम अपना सारा अस्तित्व उस लहू की सामर्थ के लिये खोल दें जो सब पापों से शुद्ध करता है। हमारा विश्वास अदृश्य परमेश्वर में और परमेश्वर के मेम्ने के बहुमूल्य लहू में आनन्द करे।

विश्वास ही से वे लाल समुद्र के पार ऐसे उतर गए जैसे सूखी भूमि पर से। लहू के छिड़काव के बाद एक नए जीवन में प्रवेश होता है — अपने आप को इस बात के लिये सौंप देना कि परमेश्वर हमें ऐसे मार्ग से ले चले जिसे हम नहीं जानते, ऐसी कठिनाइयों के बीच से जो हमारे लिये अलंघ्य हैं। विश्वास ही से वे जल के बीच से होकर ऐसे मार्ग से पार गए जिस पर मनुष्य कभी नहीं चला था, ऐसे मार्ग से जिस पर चलने का उनका पीछा करनेवालों ने व्यर्थ प्रयत्न किया। जहाँ स्वाभाविक शक्ति विफल होती है, वहाँ विश्वास जयवन्त होता है, क्योंकि वह उस मार्ग पर चलता है जिस पर परमेश्वर ले चलता है।

विश्वास ही से यरीहो की शहरपनाह गिर पड़ी। शत्रु का बल, जिस पर वह परमेश्वर के लोगों की असमर्थता को देखते हुए भरोसा रखता था, विश्वास की सामर्थ के सामने किसी काम का न रहा। हम कब सीखेंगे कि शान्त धीरज और लगन के साथ परमेश्वर की बाट जोहें — हमारे भी सात दिन, एक पूर्ण समय का चक्र — जब तक वह प्रतिज्ञा किए हुए विश्राम का अधिकार न दे दे? हमारा विश्वास उसका दावा करे; हम उस परमेश्वर की सन्तान हैं जो असम्भव काम करता है; हम विश्वास के ऐसे जीवन के लिये बुलाए गए हैं जो उनकी आशा रखता है और उन्हें पाता है। हमारा जीवन परमेश्वर पर विश्वास हो।

विश्वास ही से राहाब नाश नहीं हुई। विश्वास के द्वारा उद्धार केवल इस्राएल ही के लिये नहीं, परन्तु अन्यजातियों के लिये भी था। विश्वास ही से राहाब न केवल बचाई गई, परन्तु यीशु के पूर्वजों में से एक, और गवाहों के उस बादल में से एक बन गई जो विश्वास की धन्यता का वर्णन करते हैं। वे सब एक स्वर से हमें पुकारकर कहते हैं: परमेश्वर पर विश्वास रखो, विश्वास करनेवाले के लिये सब कुछ हो सकता है। विश्वास ही हमारे लिये सब कुछ हो, और परमेश्वर सब कुछ होगा। परमेश्वर को सब कुछ होने दो, और वह सब कुछ करेगा।

विश्वास ही से। यह हमारे जीवन का आदर्श-वाक्य हो। हर एक आवश्यकता और उलझन में, हर एक इच्छा और प्रार्थना के साथ, हर एक काम और परीक्षा के साथ, अपने विषय में और परमेश्वर के विषय में हर एक विचार के साथ, यही वह एक बात हो जिसका हम प्रयत्न करें — जीवते परमेश्वर में जीवते विश्वास की साँस सदा लेते रहना। एक बार फिर कहिए: जितनी पूर्ण और सार्वभौमिक और निर्विवाद परमेश्वर की सर्वोच्चता है, उतनी ही हमारे हृदय और जीवन में विश्वास की सर्वोच्चता होनी चाहिए। हमारे हृदय में परमेश्वर उतना ही हो सकता है जितना हमारे पास विश्वास है। और क्योंकि परमेश्वर सब कुछ है, और हमारे लिये सब कुछ होना चाहिए, इसलिये हमारे भीतर विश्वास भी सब कुछ होना चाहिए।

1. पुराने संतों के पास हमसे कम प्रकाश था — फिर क्या कारण है कि उनमें हम में से बहुतेरों से अधिक विश्वास था? कारण यह है कि हम उस प्रकाश पर भरोसा रखते हैं जो हमारे पास है, जैसे हम उसे अपने मन और बुद्धि में थामे रहते हैं। वे परमेश्वर पर छोड़ दिए गए थे और उन्होंने उस पर भरोसा रखा। यदि हम केवल अपने आप को उस सिद्ध जीवन के लिये सौंप दें जिसे यीशु ने प्रगट किया है — तो विश्वास हमें कैसी सामर्थ देगा!

2. परन्तु हर जगह ध्यान दीजिए कि विश्वास केवल आज्ञाकारिता ही में काम कर सका। मिस्र को छोड़ने में, और लहू छिड़कने में, और लाल समुद्र के पार जाने में, और यरीहो के चारों ओर घूमने में, और राहाब के छुटकारे में — यह सब पूरी रीति से और सम्पूर्णतः आज्ञाकारिता ही में था कि विश्वास ने काम किया और जय पाई। विश्वास इच्छा की वह सामर्थ है जो परमेश्वर की इच्छा को चुनती है, उसमें प्रवेश करती है और उसके अधीन हो जाती है। क्या आप विश्वास में बलवन्त होना चाहते हैं? तो परमेश्वर की सारी इच्छा में सिद्ध होकर स्थिर रहिए।

109 विश्वास, और बड़े काम कर दिखाने की उसकी सामर्थ

11:32. अब और क्या कहूँ? क्योंकि समय नहीं रहा कि गिदोन का, और बाराक और समसून का, और यिफ्तह का, और दाऊद का और शमूएल का, और भविष्यद्वक्ताओं का वर्णन करूँ। 33. इन्होंने विश्वास ही के द्वारा राज्य जीते, धर्म के काम किए, प्रतिज्ञा की हुई

वस्तुएँ प्राप्त कीं, सिंहों के मुँह बन्द किए, 34. आग की शक्ति को बुझाया, तलवार की धार से बच निकले, निर्बलता में से बलवन्त किए गए, लड़ाई में वीर निकले, विदेशियों की सेनाओं को मार भगाया। 35. स्त्रियों ने अपने मरे हुओं को पुनरुत्थान के द्वारा फिर पाया।

कनान में प्रवेश और यरीहो के पतन के साथ इस्राएल के इतिहास का पहला काल समाप्त होता है। लेखक के लिये वैसे ही आगे बढ़ना जैसे वह अब तक करता आया था, बहुत अधिक समय ले लेता; अब वह न्यायियों, राजाओं और भविष्यद्वक्ताओं में से कुछ अत्यन्त प्रमुख नामों का उल्लेख करता है, और फिर उन अति अद्भुत प्रमाणों के एक सामान्य दृश्य की ओर बढ़ता है जो विश्वास ने इस बात के दिए थे कि वह क्या कर सकता है या क्या सह सकता है। उसकी इच्छा यह है कि इब्रानियों के हृदय पर से परदा हटा दे, और उन्हें वह दिखाए जो पवित्रशास्त्र के इतिहास को जाननेवाले बहुत से लोग कभी नहीं देखेंगे, कि जितनी बाहरी घटनाएँ लिखी गई हैं उन सब के नीचे और पीछे और भीतर, जीवन के मूल तत्व के रूप में, परमेश्वर पर विश्वास जीवित है। यह इतिहास, एक ओर, उस बात का वृत्तान्त है जो परमेश्वर ने उनके द्वारा और उनके लिये किया जिन्होंने उस पर भरोसा रखा; दूसरी ओर, इस बात का प्रमाण है कि परमेश्वर द्वारा अपने लोगों की अगुवाई में, उसकी उपस्थिति और कार्य का एकमात्र चिह्न सदा विश्वास की वह आत्मा थी जो वह देता था। अभ्यास में लाया गया विश्वास भीतर के ईश्वरीय जीवन का फूट निकलना है, आशा की हुई वस्तुओं का निश्चय ही, अनदेखी वस्तुओं की उपस्थिति का प्रमाण।

विश्वास की बड़ी उपलब्धियों का उल्लेख करते हुए हमारा लेखक तीन अलग-अलग त्रयी देता है। पहली में हम पाते हैं कि विश्वास के वीरों ने क्या कुछ पूरा किया था। अपने शत्रुओं से युद्ध में, उन्होंने राज्य जीते; लोगों पर शासन करने और बुराई का विरोध करने में, उन्होंने धर्म के काम किए; परमेश्वर के साथ व्यवहार में, उन्होंने प्रतिज्ञा की हुई वस्तुएँ प्राप्त कीं। दूसरी में, जंगली पशुओं से, प्रकृति की शक्तियों से, मनुष्यों की हिंसा से व्यक्तिगत छुटकारा सबसे आगे है। उन्होंने सिंहों के मुँह बन्द किए, आग की शक्ति को बुझाया, तलवार की धार से बच निकले। तीसरी में, हमें व्यक्तिगत रूप से बल पाने में विश्वास की सामर्थ का अनुभव मिलता है: निर्बलता में से बलवन्त किए गए, लड़ाई में वीर निकले, विदेशियों की सेनाओं को मार भगाया। और फिर एक बात और जोड़ी गई है: स्त्रियों ने अपने मरे हुओं को पुनरुत्थान के द्वारा फिर पाया। विश्वास ही से स्त्रियों ने मृत्यु की शक्ति पर जय पाई। पृथ्वी पर ऐसी कोई शक्ति नहीं जो विश्वास की सामर्थ के सामने ठहर सके, क्योंकि विश्वास की सामर्थ हम में काम करनेवाली परमेश्वर की सामर्थ है।

प्राचीन काल के वीरों और वीरता के कामों का स्मरण बहुत ही शिक्षाप्रद हो सकता है, यदि हम उन्हें उनके सच्चे प्रकाश में देखें। एक बात जो हम पर छाप छोड़ती है, वह यह है कि परमेश्वर ने विश्वास से कितनी कम यह प्रतिज्ञा की है कि वह कठिनाई और ख़तरे से मुक्त रखा जाएगा। परमेश्वर के लिये शत्रु को आने से रोकना उतना ही सहज होता जितना उस पर विजय देना। ऐसा करना असीम हानि होती — विश्वास को कभी काम में आने के लिये बुलाया ही न जाता; मनुष्य न तो अपने परमेश्वर को और न अपने आप को उसकी सन्तान के रूप में कभी जानना सीखता। हर एक परीक्षा दोहरा उद्देश्य पूरा करती है। वह हमें उस भरोसे के द्वारा परमेश्वर का आदर करने का अवसर देती है जिसके साथ हम उसकी बाट जोहते हैं। और वह परमेश्वर को यह दिखाने का अवसर देती है कि वह अपनी सन्तान की चौकसी करने में कितना विश्वासयोग्य है, और वह कितनी सच्चाई से उसके लिये और उसके भीतर काम कर रहा है।

परीक्षा ही में सन्तान का सारा हृदय निर्भरता और दीनता और भरोसे के साथ पिता की ओर खिंच आता है। परीक्षा ही में परमेश्वर अपनी सन्तान के खुले हुए हृदय में अपने प्रेम की सारी कोमलता और सारी उद्धार देनेवाली सामर्थ प्रगट कर सकता है। परीक्षा के बिना विश्वास की कोई पाठशाला न होती, आत्मिक चरित्र की कोई बढ़ती न होती, परमेश्वर को सौंपी हुई और उससे लिपटी रहनेवाली इच्छा का कोई बल न होता। आओ, हम हर एक परीक्षा के लिये, चाहे छोटी हो या बड़ी, परमेश्वर को धन्य कहें — वह हमें परमेश्वर के सिर पर मुकुट रखने का, और इस योग्य बनाए जाने का कि वह हमें भी मुकुट पहनाए, एक महान अवसर देती है। एक और विचार, जो कम महत्व का नहीं है, और जो इस्राएल के इतिहास में विश्वास की उपलब्धियों पर सोचते हुए हमारे मन में आता है, यह है कि वे सब सार्वजनिक भलाई से, परमेश्वर और लोगों के काम के लिये समर्पित जीवनों से, कितनी निकटता से जुड़ी हुई थीं। स्वार्थ विश्वास की मृत्यु है। तुम जो एक दूसरे से आदर चाहते हो, क्योंकर विश्वास कर सकते हो? जब तक हम अपने ही सुख और भलाई के लिये, और सामर्थ पाने के लिये, विश्वास में बलवन्त होने का प्रयत्न करते हैं — चाहे हम यह सपना भी देखें कि एक बार पा लेने पर हम उस सब को दूसरों के लिये काम में लाएँगे — तब तक हम विफल होंगे। वही प्राण जो तुरन्त, अपनी निर्बलता ही में, अपने आप को परमेश्वर और दूसरों के लिये सौंप देता है, उस आत्म-बलिदान में परमेश्वर की सामर्थी सहायता का दावा करने की आवश्यकता और अधिकार पाएगा। गिदोन और बाराक, दाऊद और शमूएल — ये सब ऐसे मनुष्य थे जिनके नाम और जिनका विश्वास कभी जाना न जाता, यदि वे अपनी जाति के लिये और उसमें परमेश्वर के काम के लिये न जीते, यदि वे अपने लोगों में अपना छुटकारे का काम करने के लिये परमेश्वर के चुने हुए साधन न होते।

परमेश्वर के विशेष प्रकाशन का क्षेत्र अब इस्राएल नहीं, परन्तु संसार है। उसमें कितना काम करने को पड़ा है! मसीहियों और अन्यजातियों के बीच, कलीसिया और मिशन और पाठशाला में, संयम और पवित्रता के काम में, हर प्रकार के अधर्म और सांसारिकता के विरुद्ध बड़े युद्ध में, बड़े और छोटे दायरों में — विश्वास के वीरों के लिये राज्य जीतने, धर्म के काम करने, प्रतिज्ञा की हुई वस्तुएँ प्राप्त करने का कितना स्थान, कितनी आवश्यकता है! हम में से हर एक इस संघर्ष के लिये अपने आप को परमेश्वर को अर्पित करे। और ऐसा करते हुए, आओ, हम इस दोहरे पाठ को भली-भाँति स्मरण रखें: ऐसा कोई विश्वास नहीं जिसके सामने जीतने के लिये कठिनाइयाँ न हों। ऐसी कोई कठिनाई नहीं जिसे विश्वास निश्चय ही जीत न सके। इस सम्बन्ध में, आओ, हम अपने ही हित के लिये विश्वास खोजना छोड़ दें — आओ, हम परमेश्वर और प्राणों के लिये काम में अपने आप को खो दें। हम अपने आप को खो देंगे ताकि परमेश्वर में और उसके प्रेम में अपने आप को फिर पा लें।

1. सो हे भाइयो, जब कि हमें परमपवित्र स्थान में प्रवेश करने का हियाव है, तो आओ, हम पूरे विश्वास के साथ निकट आएँ। परमपवित्र स्थान में परमेश्वर के साथ विश्वास का जीवन जीइए: तब पृथ्वी पर आपका सारा जीवन विश्वास ही का जीवन होगा। 2. अपने आप को पूरी रीति से परमेश्वर को सौंप दीजिए — तब आपके विश्वास में यह माँगने का भरोसा होगा कि परमेश्वर अपने आप को पूरी रीति से आपको दे दे।

3. दैनिक जीवन की छोटी बातों में हमें विश्वास की उतनी ही आवश्यकता है जितनी बड़ी बातों में। विश्वास किसी बात को तुच्छ नहीं समझता, क्योंकि ऐसी कोई बात भली नहीं जिसमें परमेश्वर न हो। विश्वास अपने आप को परमेश्वर को सौंप देता है, ताकि वह पूरी रीति से और अक्षरशः सब कुछ हो। 4. स्मरण रखिए कि बलवन्त विश्वास का असली मूल्य यह है कि परमेश्वर के लिये विजय पाई जाए, प्राणों के उद्धार और उसके राज्य के विस्तार के लिये जिया जाए।

110 विश्वास, और सहने की उसकी सामर्थ

11:35. और कितने यातना दिए गए, और उन्होंने अपना छुटकारा स्वीकार न किया; इसलिये कि उत्तम पुनरुत्थान के भागी हों:
36. और कई एक ठट्ठों में उड़ाए जाने और कोड़े खाने, वरन बाँधे जाने और कैद में पड़ने के द्वारा परखे गए:
37. वे पत्थरवाह किए गए, आरे से चीरे गए, उनकी परीक्षा की गई, तलवार से मारे गए: वे भेड़ों और बकरियों की खालें ओढ़े हुए इधर उधर मारे मारे फिरे:

कंगाल, क्लेशित और दुःख भोगते हुए 38. (संसार उनके योग्य न था), वे जंगलों, और पहाड़ों, और गुफाओं में, और पृथ्वी की दरारों में भटकते फिरे। विश्वास की दोहरी विजय होती है। एक दशा में, वह शत्रु या कठिनाई को हटवाकर या नष्ट करवाकर उस पर जय पाता है।

दूसरी दशा में, संकट से कोई छुटकारा नहीं मिलता, फिर भी विश्वास उस सामर्थ में जय पाता है जो उसे सहने के लिये मिलती है, और यह प्रमाणित करने में कि उसकी आत्मा उन सब बातों से बढ़कर है जो मनुष्य या शैतान कर सकते हैं। विश्वास की विजयें अक्सर उन लोगों में उतनी ही अद्भुत रीति से दिखाई देती हैं जिन्हें आनेवाली विपत्ति से कोई छुटकारा नहीं मिलता, जितनी उनमें जिन्हें मिलता है। उन वीरों के उल्लेख के बाद जिनके विश्वास का प्रतिफल सफलता थी, यहाँ हमें उनका उल्लेख मिलता है जिन्होंने, ऐसे दुःख के बीच जो हटाया नहीं गया, यह प्रमाणित किया कि उनके विश्वास ने उन्हें उन सारी पीड़ाओं से ऊपर उठा लिया जिनका डर पृथ्वी उन्हें दिखा सकती थी। वे यातना दिए गए, और जब उनकी विश्वासयोग्यता के मूल्य पर उन्हें छुटकारा दिया गया तो उन्होंने उसे स्वीकार न किया, इसलिये कि उत्तम पुनरुत्थान के भागी हों। आत्मिक और अनन्त वास्तविकताएँ विश्वास के द्वारा उनके लिये इतनी स्पष्ट और निकट थीं कि उन्होंने इस वर्तमान समय के दुःखों को उस महिमा के सामने, जो प्रगट होनेवाली है, कुछ भी न समझा। विश्वास की विजय जितनी विजय प्राप्त करने में दिखाई देती है, उतनी ही अस्थायी पराजय सहने में भी। पराजित की विजय अक्सर सबसे ऊँची उपलब्धि होती है। इन पुरुषों और स्त्रियों में, जो शहीदों की महान सेना के अगुवे थे, जो संसार द्वारा ठुकराए गए और तुच्छ जाने गए, परमेश्वर ऐसे विश्वास की स्वर्गीय सुन्दरता देखता है जो उसका आदर करता है, और उसकी इच्छा, उसकी कृपा, उसकी धार्मिकता को सारे सांसारिक सुख से बढ़कर समझता है। विश्वास ही से उन्हें परमेश्वर और उसकी प्रसन्नता का ऐसा दर्शन मिला था कि वे उसे पाने के लिये आनन्द के साथ सब कुछ त्याग सकते थे। विश्वास ही से वे, उस आनन्द के लिये जो उनके आगे धरा था, स्वर्गीय प्रतिफल के निश्चय में, पृथ्वी के सारे सुखों को कुछ नहीं से भी कम समझ सकते थे। उचित रीति से दुःख सहना विश्वास के सबसे ऊँचे और श्रेष्ठ अभ्यासों में से एक है। और जो आशीष दुःख के द्वारा आती है, वह उन सबसे धनी प्रतिफलों में से एक है जो विश्वास जीत सकता है।

परमेश्वर ने हमें उन लोगों के ये उदाहरण दिए हैं जिन्होंने विश्वास के द्वारा दुःख की चरम सीमाओं पर जय पाई, ताकि हम उनसे अपनी छोटी परीक्षाओं को सहना सीखें। असाधारण दुःख में उनका विश्वास साधारण दुःख में हमारे विश्वास को दृढ़ करे। दैनिक जीवन की छोटी-छोटी साधारण परीक्षाओं ही में हर एक विश्वासी इन संतों के पदचिह्नों पर, हमारे उद्धार के महान नायक के पदचिह्नों पर चल सकता है। केवल विश्वास ही से हम दुःख को, चाहे वह बड़ा हो या छोटा, उचित रीति से, परमेश्वर की महिमा के लिये या अपनी भलाई के लिये सह सकते हैं।

हाँ, केवल विश्वास ही से। विश्वास उसे परमेश्वर और अनन्तकाल के प्रकाश में देखता है — उसकी थोड़ी देर की पीड़ा, उसका अनन्त लाभ — प्राण को हानि पहुँचाने में उसकी असमर्थता, उसे शुद्ध करने और आशीष देने की उसकी सामर्थ। वह उसे, जो उसे होने देता है, आग में हमारे साथ देखता है — शुद्ध करनेवाले के रूप में जो हमारे शोधे जाने और सिद्ध किए जाने पर दृष्टि लगाए रहता है, हमारे बल और शान्ति के सहायक के रूप में।

वह देखता है कि परमेश्वर के पुत्र के समान चरित्र का बनना — जो हर मूल्य पर पिता की इच्छा और आदर को बनाए रखता है — उस सब से बढ़कर है जो सारा संसार दे सकता है। वह देखता है कि उसकी पवित्रता में भागी बनाया जाना, परमेश्वर के मेम्ने की दीनता और निर्बलता और कोमलता का हम में गढ़ा जाना, और उसके समान दुःख उठाने के द्वारा सिद्ध किया जाना — यही स्वर्ग की आत्मा है, और इस धन को पाने के लिये वह किसी बात को बहुत बड़ा नहीं समझता। केवल विश्वास ही से, परन्तु विश्वास ही से निश्चय, हम गहरे से गहरे दुःख के बीच भी जयवन्त से भी बढ़कर हो सकते हैं।

हम दुःख के संसार में रहते हैं। कैसा सौभाग्य है कि दुःख, हमें अयोग्य बनाने या बाहर रखने के बदले, परमेश्वर का विशेष निमन्त्रण है कि हम उस पर भरोसा रखें और उसकी महिमा करें। जब हम उन सब बातों के विषय में पढ़ते हैं जो विश्वास के लोगों ने की थीं, तो एक से अधिक व्यक्ति ने अपनी प्रतिकूल परिस्थितियों और अपने दुर्बल बल के विषय में सोचा है; उसका विश्वास कभी उन मनुष्यों की उपलब्धियों तक नहीं पहुँच सकता जो उदाहरण के रूप में उसके सामने रखे गए हैं। कैसा सौभाग्य है कि कोई दुःख इतना बड़ा और निराश करनेवाला, इतना छोटा और सतानेवाला नहीं है, जो विश्वास की पाठशाला न बन सके, परमेश्वर को सब कुछ बनाने की धन्य कला में एक स्वर्गीय शिक्षा; यह प्रमाणित करने की कि परमेश्वर की इच्छा के लिये और उसके अधीन होने के लिये हम सब कुछ सहने को तैयार हैं। विश्वास दुःख का रूप बदल देता है, उसे परमेश्वर के प्रेम से, यीशु की उपस्थिति से, पवित्रता की सुन्दरता से, स्वर्ग की आशीष से पारदर्शी बना देता है।

जब तक हम संसार और शरीर के प्रभाव में जीते हैं, तब तक यह सब केवल एक सुन्दर विचार जान पड़ता है, जिसमें न वास्तविकता है न सम्भावना। हमारी पत्री उनसे बात कर रही है जिन्हें वह परमपवित्र स्थान में ले आई है, जो परमेश्वर की इच्छा के, यीशु की आज्ञाकारिता और आत्म-बलिदान और मृत्यु के नए और जीवते मार्ग पर चल रहे हैं। जब हम परमेश्वर की उपस्थिति में ठहरे रहते हैं, और सब बातों से बढ़कर उसकी पवित्रता और उसकी इच्छा को खोजते हैं, तभी हम वस्तुओं को वैसे देखेंगे जैसे परमेश्वर देखता है, और दुःख को उसके प्रकाश में समझेंगे। यही हमारा लक्ष्य हो। हमारा यह वचन-भाग उस एक पाठ की नए सिरे से पुष्टि करता है — केवल विश्वास ही से। क्या आप परमेश्वर को प्रसन्न करना चाहते हैं, क्या आप पाप और संसार पर जय पाना चाहते हैं, क्या आप पवित्र और सिद्ध होना चाहते हैं, क्या आप स्वर्ग और अनन्तकाल के वारिस के रूप में जीना चाहते हैं — तो विश्वास के मनुष्य के रूप में जीइए, हर एक परीक्षा का सामना परमेश्वर पर आनन्द-भरे विश्वास की आत्मा में कीजिए; हर एक परीक्षा आपको परमेश्वर की धन्य उपस्थिति के और अधिक योग्य बनाएगी, और आपको उसके और निकट ले आएगी।

पुराने नियम में समृद्धि की प्रतिज्ञा की गई थी। फिर भी विश्वास विपत्ति सह सकता था। नए नियम में हमें विपत्ति की आशा रखना सिखाया गया है: क्रूस हमारे विश्वास का चिह्न है; दुःखी पुरुष हमारा नायक है; तो हमें कितना अधिक सहने के योग्य होना चाहिए!

हर एक दुःखी जन, हर एक जो रोगशय्या से बँधा है या किसी क्रूस के नीचे झुका हुआ है, यह विश्वास करना सीखे कि क्लेश में हम विश्वास के द्वारा परमेश्वर की बड़ी महिमा कर सकते हैं, और कि विश्वास के द्वारा हम दूसरों के शिक्षक और सहायक बन सकते हैं, और अपने उदाहरण और मध्यस्थता के द्वारा, अपने परिमाण के अनुसार, मसीह की देह के काम का एक बहुत ही धन्य भाग पूरा कर सकते हैं।

111 हमारे लिये कोई उत्तम बात

11:39. और ये सब, जिनके विषय में गवाही दी गई थी, अपने

विश्वास के द्वारा, प्रतिज्ञा की हुई वस्तु न पा सके, 40. क्योंकि परमेश्वर ने हमारे विषय में पहिले से एक उत्तम बात ठहराई, कि वे हमारे बिना सिद्ध न किए जाएँ। इन अन्तिम पदों में हमें अध्याय का सार मिलता है। नए नियम की श्रेष्ठता यह बताई गई है कि हमारे पास कोई उत्तम बात है, कोई सिद्ध बात, जिसकी बाट संत जोहते रहे थे पर जिसे उन्होंने कभी नहीं देखा था। हमें उनके विषय में बताया गया है कि उनके पास क्या था, और क्या नहीं था। इन सब के विषय में उनके विश्वास के द्वारा गवाही दी गई, तौभी उन्होंने प्रतिज्ञा की हुई वस्तु न पाई। उन्होंने प्रतिज्ञा की हुई वस्तु न पाई। निःसन्देह कुछ प्रतिज्ञाएँ ऐसी थीं जिनकी पूर्ति उन्होंने पाई (देखें 6:15; 11:33)। परन्तु यीशु मसीह और उसके छुटकारे की, और पवित्र आत्मा के उण्डेले जाने की बड़ी प्रतिज्ञा — उत्तम वाचा की उत्तम प्रतिज्ञाएँ — ये उन्होंने नहीं पाईं। वे विश्वास ही की दशा में मरे, और उन्होंने प्रतिज्ञा की हुई वस्तुएँ नहीं पाईं, पर उन्हें दूर से देखकर गले लगाया। उन्होंने प्रतिज्ञाओं को देखा, और उनमें आनन्द किया — उन प्रतिज्ञाओं को, जिनके पूरे अधिकार में प्रवेश करना हमारा सौभाग्य है।

उन्होंने उन्हें नहीं पाया, परन्तु उनके विश्वास के द्वारा उनके विषय में गवाही दी गई (देखें 11:2, 4, 6)। जीवते परमेश्वर ने, जिसने उन्हें प्रतिज्ञा दी थी और जो उसकी पूर्ति के लिये अपने ही समय की बाट जोह रहा था, विश्वास के द्वारा उन्हें यह गवाही दी कि वे उसे भाते हैं। हाबिल को जो गवाही दी गई कि वह धर्मी था, और हनोक को कि उसने परमेश्वर को प्रसन्न किया, वह उन सब को दी गई। परमेश्वर उनका परमेश्वर कहलाने में, और उन्हें यह बताने में नहीं लजाया।

उनके विश्वास और हमारे विश्वास के बीच, प्रकाशन की स्पष्टता और प्रतिज्ञा के वास्तविक अधिकार के सम्बन्ध में, सारे अन्तर के होते हुए भी, इस बात में उनका विश्वास हमारे विश्वास के साथ एक था — अदृश्य परमेश्वर ने अपने आप को उन पर प्रगट किया और वह उनका परमेश्वर था।

उन्होंने प्रतिज्ञा की हुई वस्तु न पाई, क्योंकि परमेश्वर ने हमारे विषय में पहिले से एक उत्तम बात ठहराई, कि वे हमारे बिना सिद्ध न किए जाएँ। यहाँ के दो शब्द, उत्तम और सिद्ध, वे शब्द हैं जो नए प्रबन्ध की, अर्थात् प्रतिज्ञा की पूर्ति के समय की, विशेषता बताते हैं। हम पहले कह चुके हैं कि “उत्तम” शब्द तेरह बार आता है। मसीह ने उत्तम नाम का अधिकार पाया है; वह हमारे लिये उत्तम आशा लाया है; वह उत्तम वाचा का जामिन है जो उत्तम प्रतिज्ञाओं के सहारे बाँधी गई है; उसमें हमारे पास उत्तम देश और उत्तम सम्पत्ति है। उनसे परमेश्वर ने भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा बातें कीं; हमसे पुत्र के द्वारा। उनके सामने कनान का विश्राम रखा गया; हमारे सामने परमेश्वर का विश्राम। उनका महायाजक एक मनुष्य था जो मर गया; हमारा अविनाशी जीवन की सामर्थ के अनुसार सर्वदा का याजक है। उनका पवित्रस्थान पृथ्वी पर था, और उसमें भी परदा था — हमारा सच्चा पवित्रस्थान है, जिसका परदा हटा दिया गया है। उनकी पुरानी वाचा थी, जिसमें बने रहने की कोई सामर्थ न थी — हमारी नई वाचा है, जिसमें आत्मा के द्वारा हृदय नया बनाया गया है। उनका बैलों और बकरों का लहू था, हमारा यीशु का लहू है। उनकी शरीर की शुद्धता के लिये पवित्र करनेवाली शुद्धि थी; हमारी बुरे विवेक से हृदय की शुद्धि है। उनकी ऐसी आराधना थी जिसने किसी बात को सिद्ध नहीं किया — हमारी आराधना में हम सर्वदा के लिये सिद्ध किए गए हैं। उनकी आराधना इस बात की गवाही थी कि परमपवित्र स्थान का मार्ग अभी खुला नहीं था; हमारा यह धन्य अनुभव है कि नए और जीवते मार्ग में हमें पिता की उपस्थिति और प्रेम ही में जीवता प्रवेश मिला है। सचमुच परमेश्वर ने हमारे लिये कोई उत्तम बात ठहराई है।

कि वे हमारे बिना सिद्ध न किए जाएँ। परमेश्वर ने जो उत्तम बात ठहराई है, वह सिद्धता है। “सिद्ध” शब्द पत्री में चौदह बार प्रयोग हुआ है (देखें 5 …)। व्यवस्था ने किसी बात को सिद्ध नहीं किया। यीशु स्वयं, अपनी आज्ञाकारिता और दुःख उठाने में, अपने मानवीय स्वभाव में, अपनी इच्छा और जीवन और चरित्र में, सिद्ध किया गया, ताकि उसके पास हमें देने के लिये एक सच्चा, नया, सिद्ध मानवीय जीवन हो। वह पुत्र, जो सर्वदा के लिये सिद्ध किया गया है, हमारा महायाजक है, जिसने अपने बलिदान में हमें सर्वदा के लिये सिद्ध करके, अब उस सिद्धता को हम में पहुँचाने के द्वारा हमें परमेश्वर के साथ सच्चे, भीतरी, जीवते सम्पर्क में ले आता है। और इस प्रकार वह हमारे विश्वास का सिद्ध करनेवाला है; वह हमें अपने सिद्ध लोग बनाता है, जो सिद्धता की ओर आगे बढ़ते जाते हैं। और पृथ्वी पर हमारा जीवन इसलिये ठहराया गया है कि वह इस बात का धन्य अनुभव हो कि परमेश्वर हमें हर एक भली बात में सिद्ध करता है कि हम उसकी इच्छा पूरी करें, और जो कुछ उसे भाता है उसे हम में उत्पन्न करता है। हमारे बिना वे सिद्ध न किए जा सकते थे; हमें उस उत्तम बात की, अर्थात् सिद्ध किए जाने की, आशीष मिली है।

मेरे संगी मसीहियो, पुराने संतों के पास केवल प्रतिज्ञा थी — हमारे पास प्रतिज्ञा की हुई वस्तु है, वह ईश्वरीय वास्तविकता, उस सब का पूरा उत्तराधिकार जो उनके लिये केवल आनेवाली अच्छी वस्तुएँ थीं। वह प्रतिज्ञा उन्हें विश्वास का एक अद्भुत जीवन जीने के लिये पर्याप्त थी। तो हमारे जीवनों में इस बात का कितना बड़ा प्रभाव न होना चाहिए कि हमने प्रतिज्ञाएँ प्राप्त कर ली हैं, कि हमने उस वस्तु के अधिकार में प्रवेश कर लिया है जिसकी केवल प्रतिज्ञा ने उन्हें इतना उभार दिया था? छुटकारा उसकी आशा से जितना बड़ा है, ईश्वरीय अधिकार उसकी प्रतिज्ञा से जितना बड़ा है, उतनी ही बड़ी वह उत्तम, वह सिद्ध बात है जो परमेश्वर ने हमारे लिये ठहराई है, और उतना ही अधिक बड़ा हमारा आनन्द और पवित्रता और परमेश्वर से निकटता, और हमारे जीवनों की सामर्थ होनी चाहिए। क्या ऐसा है?

यदि नहीं, तो कारण स्पष्ट होना चाहिए। हम उस अधिकार को उस तीव्रता के साथ ग्रहण नहीं करते जिसके साथ उन्होंने प्रतिज्ञा को ग्रहण किया था। हमारी सारी पत्री इसी बुराई को उजागर करने के लिये, और उस उत्तम, उस सिद्ध बात की महिमा को, जो परमेश्वर ने मसीह में हमारे लिये ठहराई है, हमारे सामने रखने के लिये लिखी गई थी। क्या हम अपने विश्वास के उन वीरों की गवाही न सुनें जो उन दिनों में थे जब सूर्य अभी उदय नहीं हुआ था, और लज्जित होकर अपनी सांसारिकता और आलस्य से बाहर न निकल आएँ? यदि हम केवल अपने आप को हमारी पत्री के सिद्धता-सम्बन्धी महिमामय सत्यों के, अर्थात् हमारे महायाजक और उसके काम की सिद्धता के, अधीन कर दें और उसकी ओर आगे बढ़ते जाएँ, तो वह, जिसे यह दिया गया है कि अविनाशी जीवन की सामर्थ में हम में अपना काम करे, और इस प्रकार पूरा पूरा उद्धार करे, हम में उस उत्तम और सिद्ध बात को ऐसा प्रगट करेगा जैसा हमने अब तक कभी नहीं जाना। विश्वास ही से उन्होंने प्रतिज्ञाएँ प्राप्त कीं। विश्वास ही से हर एक प्रतिज्ञा की पूर्ति पिन्तेकुस्त के उस आत्मा की सामर्थ में हमारे लिये सच्ची की जाएगी, जो हमारे महान महायाजक के सिंहासन से आता है।

1. सो हे पवित्र भाइयो, तुम जो स्वर्गीय बुलाहट में भागी हो, यीशु पर ध्यान करो। उसी ने सब कुछ किया है: वही है जिसे अब भी उसी प्रकार सब कुछ करना है। वही परमपवित्र स्थान को, और उसमें प्रवेश को, और वहाँ जीवते परमेश्वर की सेवा के जीवन को एक जीवती, निरन्तर वास्तविकता बनाता है। यदि अब तक आप परदे के बाहर जीते रहे हैं, तो विश्वास कीजिए कि परमेश्वर ने आपके लिये भी कोई उत्तम बात ठहराई है।

2. वह यह हमारे भीतर वास करनेवाले पवित्र आत्मा की सामर्थ में करता है। मसीह ने हमें छुड़ाया, कि हम विश्वास के द्वारा उस आत्मा को प्राप्त करें जिसकी प्रतिज्ञा हुई है। पवित्र आत्मा उत्तम वाचा की सब कुछ समेटनेवाली आशीष है। उसी का काम है कि यीशु को और स्वर्ग को और अविनाशी जीवन की सामर्थ को हमारे भीतर ले आए, और हमें उसमें बनाए रखे।

3. परमेश्वर हम पर प्रगट करे कि अब्राहम का अपने देश से निकल जाना, मूसा का दुःख और निन्दा को चुनना, इस्राएल का मिस्र को छोड़ना — इनका क्या अर्थ है। यदि हम सब कुछ छोड़ने को तैयार हैं, तो हम सब कुछ के वारिस होंगे। ग्यारहवाँ खण्ड — 12। आशा का धीरज।

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