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यह हिन्दी संस्करण मशीन-सहायता से अनुवादित है और समीक्षा की प्रक्रिया में है। अध्ययन के लिए अंग्रेज़ी मूल पाठ ही प्रामाणिक है। कोई त्रुटि दिखे तो [email protected] पर लिखें।
“फिर मैंने अपने स्वप्न में देखा कि वह राजमार्ग, जिस पर मसीही को ऊपर जाना था, दोनों ओर एक दीवार से घिरा हुआ था, और उस दीवार का नाम उद्धार था। इसलिये बोझ से दबा हुआ मसीही इसी मार्ग पर ऊपर की ओर दौड़ा, परन्तु अपनी पीठ पर लदे बोझ के कारण बड़ी कठिनाई के साथ। वह इसी प्रकार दौड़ता रहा जब तक कि वह एक ऐसे स्थान पर न पहुँचा जो कुछ ऊँचाई पर था, और उस स्थान पर एक क्रूस खड़ा था, और उससे थोड़ा नीचे, तराई में, एक कब्र थी।” एक आवाज़ ने कहा, “चल, चल, कलवरी की ओर!” फिर भी वह उस आवाज़ से काँप उठा, क्योंकि उसने अपने मन में कहा, “मैं वहाँ क्यों जाऊँ, क्योंकि वहीं तो मेरा सबसे काला पाप किया गया था; वहीं मैंने अपने अपराधों के द्वारा उद्धारकर्ता की हत्या की थी।” परन्तु दया ने इशारे से बुलाया और कहा, “आ, चला आ, हे बेचारे पापी!” और पापी उसके पीछे चल पड़ा। उसके पैरों और हाथों में ज़ंजीरें थीं, परन्तु वह जैसे-तैसे रेंगता हुआ चलता रहा, जब तक कि कलवरी नामक पहाड़ी की तलहटी तक न पहुँच गया, जिसकी चोटी पर उसने एक क्रूस देखा। हे पापी, मैं चाहता हूँ कि तू क्रूस के तले खड़ा हो, और यीशु के विषय में तब तक सोचता रहे जब तक तुझे शान्ति न मिल जाए! मेरा विश्वास है कि विश्वास तक पहुँचने का सबसे छोटा मार्ग यह है कि विश्वास के विषय पर भली-भाँति मनन किया जाए। शान्ति पाने का सच्चा मार्ग यह नहीं कि आप क्रूस से दूर रहकर अपने आप को सान्त्वना देने का प्रयत्न करें, बल्कि यह कि आप अपने लिये मरते हुए मसीह के विषय में तब तक सोचते रहें जब तक आपको सान्त्वना न मिल जाए; अपने प्राण से कहिए, “जब तक मैं इस बहुमूल्य लहू में धोया न जाऊँ, तब तक मैं क्रूस से कभी न हटूँगा: ‘हे धन्य उद्धारकर्ता, मैं तेरे चरणों में पड़ा हूँ, यहीं चंगाई पाने को या मरने को; परन्तु अनुग्रह उस दुःखदायी डर को वर्जित करता है, वह सर्वशक्तिमान अनुग्रह, जो यहाँ विजयी होता है।’ ” साँप के डसे हुओं को चंगाई उस साँप की ओर देखने से मिली थी, न कि अपने घावों को देखने से, और न ही दूसरों की चंगाई के विषय में सुनने से; और इसी प्रकार आपको भी चंगाई न तो पाप को देखने से मिलेगी, और न मसीह के विषय में सुनने से, बल्कि उससे कहीं बढ़कर अपने मन की आँख को क्रूस पर टिकाने से और उस पर मरनेवाले पर मनन करने से मिलेगी, यहाँ तक कि उसकी योग्यता पर विचार करते-करते आप उस पर विश्वास करें, और इस प्रकार उद्धार पाएँ। “तब मैंने अपने स्वप्न में देखा कि ज्यों ही मसीही क्रूस के पास पहुँचा, उसका बोझ उसके कन्धों से ढीला होकर उसकी पीठ से गिर पड़ा, और लुढ़कने लगा, और लुढ़कता ही रहा जब तक कि वह कब्र के मुँह तक न पहुँच गया, जहाँ वह भीतर गिर पड़ा, और फिर मैंने उसे कभी नहीं देखा।” यात्री को अपने बोझ से तब तक कभी छुटकारा नहीं मिला जब तक वह क्रूस के तले न पहुँचा, और वहाँ उसने उसे सदा के लिये खो दिया। इससे बनयन का अभिप्राय उस पोपवादी प्रतीक से नहीं था जिसका आजकल इतने सामान्य रूप से आदर किया जाता है; उसके मन में ऐसे खिलौनों और मूर्तिपूजाओं के प्रति कोई आदर न था। उसका अभिप्राय यह था कि बोझ से दबे प्राण को तब तक शान्ति नहीं मिलती जब तक वह यीशु के प्रायश्चित करनेवाले बलिदान पर भरोसा नहीं करता। पाप का दण्ड अवश्य मिलना चाहिए; विवेक यह जानता है, और पापी को कँपा देता है। जो लोग यीशु पर भरोसा रखते हैं उनके स्थान पर यीशु को दण्ड दिया गया; विश्वासी यह जानता है, और अनुभव करता है कि वह आगे के दण्ड से न्यायपूर्वक सुरक्षित है; उसके विवेक को विश्राम मिलता है, और उसका हृदय आनन्दित होता है। यदि यीशु ने मेरे लिये व्यवस्था का दण्ड सह लिया, तो परमेश्वर न्यायी है, और फिर भी मैं सुरक्षित हूँ। न्याय एक ही अपराध के लिये दो दण्डों की माँग नहीं कर सकता; दुःख उठानेवाला यीशु इस सम्भावना को ही रोक देता है कि वे लोग दोषी ठहराए जाएँ जिनके लिये वह प्रतिनिधि के रूप में मरा। यीशु के घावों में थके हुए विवेकों के लिये विश्राम है, परन्तु और कहीं नहीं। जो उसके प्रायश्चित की योग्यता पर भरोसा रखते हैं, वे उसके द्वारा क्रोध से बचाए जाते हैं। जब प्रसिद्ध कर्मकाण्डवादी डॉ. नील ने ‘मसीही यात्रा’ को रोमी रंग में ढाला, तो उसने यात्री को एक निश्चित स्नान-कुण्ड तक आते हुए दिखाया, जिसमें उसे डुबोया गया, और वहाँ उसका बोझ धुल गया। इस रूपक के इस गढ़े हुए संस्करण के अनुसार, मसीही को बपतिस्मा के हौज़ में धोया गया, और इस प्रकार उसके सब पाप दूर कर दिए गए। पाप से छुटकारा पाने का यह हाई चर्च वाला ढंग है। सच्चा मार्ग यह है कि उसे क्रूस पर खो दिया जाए। अब ध्यान दीजिए कि क्या हुआ। डॉ. नील की ‘मसीही यात्रा’ के अनुसार वह बोझ यात्री की पीठ पर फिर से उग आया। मुझे इस पर कोई आश्चर्य नहीं; क्योंकि जो बोझ बपतिस्मा से हट सकता है वह निश्चय ही फिर लौट आएगा, परन्तु जो बोझ क्रूस पर खो जाता है वह फिर कभी, सदा तक, दिखाई नहीं देता। “तब मसीही आनन्दित और हल्का हो गया, और प्रसन्न हृदय से बोला, उसने अपने दुःख के द्वारा मुझे विश्राम दिया है, और अपनी मृत्यु के द्वारा जीवन। तब वह कुछ देर खड़ा होकर देखता और अचम्भा करता रहा, क्योंकि उसे यह बड़ा आश्चर्यजनक लगा कि क्रूस के दर्शन ने उसे इस प्रकार उसके बोझ से छुटकारा दे दिया। इसलिये वह देखता रहा, और फिर-फिर देखता रहा, यहाँ तक कि उसके सिर के सोतों ने उसके गालों पर जल बहा दिया।” जागृत पापी उन लोगों से सान्त्वना पाने से सावधान रहें जो पश्चाताप को छोटा करके आँकते हैं। आख़िरकार यह कोई छोटी बात नहीं है। वे हमसे कहते हैं, “यह तो केवल मन का परिवर्तन है।” परन्तु वह मन का कैसा परिवर्तन है! शब्द तो काफ़ी छोटे लगते हैं, परन्तु पश्चाताप स्वयं कोई तुच्छ बात नहीं। वे हमसे कहते हैं कि पश्चाताप में पाप के लिये शोक का होना आवश्यक नहीं; परन्तु हम उन्हें, और उन सब को जिनसे इसका सम्बन्ध हो, गम्भीरता से चेतावनी देते हैं कि यदि उनके पश्चाताप में अपराध करने का कोई दुःख नहीं है, तो वह परमेश्वर-भक्ति के अनुसार का पश्चाताप नहीं है, और उस पश्चाताप से भी पश्चाताप करना पड़ेगा। सूखी आँखों वाला पश्चाताप कोई पश्चाताप नहीं। जो ठीक रीति से प्रभु की ओर फिरते हैं, वे पाप के लिये विलाप करते हैं और ऐसे कड़वे दुःख में होते हैं जैसे कोई अपने पहिलौठे के लिये कड़वा दुःख मनाता है। पश्चाताप और विश्वास दोनों क्रूस से ही उत्पन्न होते हैं। हम ये अनुग्रह क्रूस तक लेकर नहीं आते, बल्कि उन्हें क्रूस पर पाते हैं। वे यीशु की ओर से प्रेम की निशानियाँ हैं। जब वह धार्मिकता के सूर्य के रूप में हम में उदय होता है, तो ये उसकी भोर की पहली किरणें होती हैं। ओह, कि सब बेचारे पापी आकर इस धूप में बैठें। जब मैं अपने अपराधों के विषय में सोचता हूँ, जिन्हें मैं किसी और से अधिक जानता हूँ, और यह भी स्मरण करता हूँ कि मैं भी उन्हें उस रीति से नहीं जानता जैसे परमेश्वर उन्हें जानता है, तो मुझे लगता है कि सारी आशा बह गई है और मेरा प्राण घोर निराशा में छोड़ दिया गया है, जब तक कि मैं फिर से क्रूस के पास न आऊँ, और यह न सोचूँ कि वहाँ मरनेवाला कौन था, और उसकी मृत्यु के द्वारा असीम दया के कौन-कौन से उद्देश्य पूरे होते हैं। उस क्रूस पर चढ़ाए गए की ओर फिर से ऊपर देखना, और यह कहना कितना मधुर है, “हे मेरे प्रभु, तेरे सिवा मेरे पास कुछ नहीं, तेरे सिवा मेरा कोई भरोसा नहीं। यदि तू मेरे प्रतिनिधि के रूप में ग्रहण न किया जाए, तो मुझे नाश होना ही पड़ेगा; यदि परमेश्वर का ठहराया हुआ उद्धारकर्ता पर्याप्त नहीं, तो मेरे पास कोई दूसरा नहीं; परन्तु मैं जानता हूँ कि तू पिता का अति प्रिय है, और मैं तुझ में ग्रहण किया गया हूँ। मेरे पास जो कुछ है, या जो कुछ मुझे चाहिए, वह सब तू ही है।” प्रियो, मैं समझता हूँ कि आप अपने ही अनुभव से जानते हैं कि आपके मन-परिवर्तन के विषय में वास्तव में जिस बात ने आप पर सबसे अधिक प्रभाव डाला, वह मसीह की मृत्यु ही थी। मैं बहुत बातें सुनता हूँ कि मसीह के आदर्श का भक्तिहीन मनुष्यों पर बड़ा प्रभाव पड़ता है; परन्तु मैं इस पर विश्वास नहीं करता, और निश्चय ही मैंने ऐसा कभी होते नहीं देखा। मनुष्यों पर उसका बड़ा प्रभाव तब पड़ता है जब वे नये सिरे से जन्म लेते हैं, और आनेवाले क्रोध से बचाए जाते हैं, और इस कारण कृतज्ञता से भरे होते हैं; परन्तु ऐसा होने से पहले, हमने ऐसे मनुष्यों को जाना है जो मसीह के आचरण की प्रशंसा करते थे, और उसके चरित्र की सुन्दरता पर पुस्तकें तक लिखते थे, जबकि उसी समय वे उसके ईश्वरत्व का इनकार करते थे। इस प्रकार उन्होंने उसके मूल स्वरूप में उसे अस्वीकार किया, और उसके जीवन की उनकी ठंडी प्रशंसा का उनके आचरण पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। परन्तु जब कोई मनुष्य यह देख लेता है कि यीशु की मृत्यु के द्वारा उसे क्षमा मिली है और उसका उद्धार हुआ है, तो वह कृतज्ञता से, और फिर प्रेम से भर उठता है। “हम इसलिये प्रेम करते हैं, कि पहले उसने हम से प्रेम किया।” उस प्रेम ने, जो उसने अपनी मृत्यु में प्रकट किया, हमारे अस्तित्व की मूल कमानी को छू लिया है, और हमें ऐसे उत्साह से भर दिया है जिससे हम पहले अनजान थे; और इसी कारण हम उन पापों से घृणा करते हैं जो कभी मीठे लगते थे, और पूरे हृदय से उस आज्ञाकारिता की ओर फिरते हैं जो कभी इतनी अप्रिय लगती थी। मनुष्य के चरित्र को बदलने में मसीह के लहू पर विश्वास में अन्य सब विचारों से अधिक प्रभाव है। एक बार क्रूस दिख गया, तो पाप क्रूस पर चढ़ा दिया जाता है: एक बार यह समझ में आ गया कि स्वामी ने वह दुःख हमारे लिये सहा, तो हम अनुभव करते हैं कि हम अपने नहीं हैं, बल्कि दाम देकर मोल लिये गए हैं। हमारे प्रभु यीशु की मृत्यु में छुड़ानेवाले प्रेम की यह पहचान ही सारा अन्तर उत्पन्न करती है: यही हमें उस जीवन के लिये तैयार करती है जो किसी भी उस जीवन से ऊँचा और उत्तम है जिसे हमने पहले कभी जाना था। यह उसकी मृत्यु ही है जो यह कार्य करती है। “अब, जब वह खड़ा होकर देख रहा था और रो रहा था, तो देखो, तीन चमकते हुए जन उसके पास आए, और ‘तुझे शान्ति मिले’ कहकर उसको नमस्कार किया। तब पहले ने उससे कहा, ‘तेरे पाप क्षमा हुए;’ दूसरे ने उसके चिथड़े उतार दिए, और उसे बदलने के लिये नये वस्त्र पहिनाए; तीसरे ने भी उसके माथे पर एक चिह्न लगाया, और उसे मुहर लगा हुआ एक पत्र दिया, जिसके विषय में उसने उससे कहा कि दौड़ते हुए वह उसे देखता रहे, और उसे स्वर्गीय फाटक पर सौंप दे; तब वे अपने मार्ग चले गए। तब मसीही ने आनन्द के मारे तीन छलाँगें लगाईं, और गाता हुआ आगे बढ़ा:— “ ‘अब तक मैं अपने पाप से लदा हुआ आया, और कोई भी वस्तु उस शोक को हल्का न कर सकी जिसमें मैं था, जब तक मैं यहाँ न आया: यह कैसा स्थान है! क्या यहीं से मेरे परम सुख का आरम्भ होना है? क्या यहीं मेरी पीठ से बोझ गिरना है? क्या यहीं वे डोरियाँ टूटनी हैं जिन्होंने उसे मुझसे बाँध रखा था? धन्य क्रूस! धन्य कब्र! परन्तु उससे बढ़कर धन्य हो वह मनुष्य जो वहाँ मेरे लिये लज्जित किया गया!’ ” किसी ऐसे प्रिय मित्र के अनुभव की कल्पना कीजिए जिसने अभी-अभी यीशु पर विश्वास किया है, और जिसके विषय में परमेश्वर का आत्मा गवाही देता है कि उसे क्षमा मिल गई है। वह कैसा मनुष्य होगा? मैं उसका चित्र आपके सामने खींचने का प्रयत्न करूँगा। मैं अभी से उसकी आँखों को एक ऐसी ज्योति से चमकते हुए देखता हूँ जैसी मैंने वहाँ पहले कभी नहीं देखी। वह मनुष्य सचमुच सुन्दर दिखाई देता है; यदि आप उसे उस बड़े परिवर्तन के होने से पहले जानते थे, तो आप उसे कठिनाई से ही पहचान पाते। उसके मन पर एक ऐसा बोझ था जिसके कारण वह सदा चिन्ता से घिसा हुआ दिखाई देता था। वह जाता रहा है, और अब वह परम धन्य दिखाई देता है। परन्तु मैं उसकी आँखों में आँसू भी देखता हूँ; वे वहाँ कैसे आए? अपने पुराने दिनों में तो वह रोने का अधिक आदी नहीं था? वह यह सोचकर शोकित है कि उसने कभी ऐसे दयालु परमेश्वर को अप्रसन्न किया; क्योंकि पूरी रीति से क्षमा पा लेने के बोध से बढ़कर कोई बात हमें पाप के लिये इतना दुःखी नहीं करती। वह जानता है कि उसे क्षमा मिल गई है, उसे इसका पूरा निश्चय है; वह जानता है कि परमेश्वर उससे प्रेम करता है, और अब वह अपने आप से घृणा करता है कि वह कभी इतना नीचे गिरा था। फिर भी, यदि आप उसका एक आँसू लेकर सूक्ष्मदर्शी यंत्र के नीचे रखें, या उसके तत्वों का विश्लेषण करें, तो आप पाएँगे कि उसमें कोई कड़वाहट नहीं है। जब वह क्रूस के तले खड़ा होकर अपने प्रभु के चरणों को अपने पश्चाताप-भरे, फिर भी इन्द्रधनुष से रँगे आँसुओं से धोता है, तो उसके शोक में आनन्द मिला होता है। अब उसे घर जाते हुए देखिए। मैं आशा करता हूँ कि वहाँ उसके कुछ मसीही मित्र हैं; और यदि ऐसा है, तो उनके साथ उसे अधिक समय नहीं बीतेगा कि वे उसमें आए परिवर्तन को देखने लगेंगे, और उसे भी वह धन्य भेद उन्हें बताने की इच्छा होने में देर नहीं लगेगी। माँ जानना चाहती है कि उसके बेटे को क्या हुआ है, और वह अपनी बाँहें उसके गले में डालकर कहता है, “माँ, मैंने प्रभु को पा लिया है।” वह बहुत प्रसन्न होती है, और शायद बहुत चकित भी, क्योंकि धर्म के विषय में बातें करना उसकी सामान्य आदत नहीं थी; वह कभी-कभी उसकी हँसी और ठट्ठा उड़ाया करता था। क्या वह बिना प्रार्थना किए सोने चला जाएगा? नहीं; उसे यह बताने के लिये किसी की आवश्यकता नहीं कि वह प्रार्थना करे; वह घर लौटते हुए पूरे मार्ग भर प्रार्थना करता आया है, और वहाँ बैठे-बैठे भी प्रार्थना करता रहा है। ये पहली सच्ची प्रार्थनाएँ हैं जो उसने कभी चढ़ाई हैं; परन्तु अब उसके लिये प्रार्थना करना उतना ही स्वाभाविक हो गया है जितना किसी जीवित मनुष्य के लिये साँस लेना। मसीही लोग प्रभु के मार्गों में गाना तब आरम्भ करते हैं जब वे पहली बार क्रूस के तले अपना बोझ खो देते हैं। परमेश्वर की क्षमा पाई हुई सन्तान के अन्तरतम प्राण से फूट निकलनेवाले परमानन्द के पहले गीत के समान तो स्वर्गदूतों के गीत भी मधुर नहीं लगते। भला ही था कि बेचारे यात्री ने, अपना बोझ खो देने पर, आनन्द के मारे तीन बड़ी छलाँगें लगाईं और गाता हुआ आगे बढ़ा:— “धन्य क्रूस! धन्य कब्र! परन्तु उससे बढ़कर धन्य हो वह मनुष्य जो वहाँ मेरे लिये लज्जित किया गया!” हे विश्वासी, क्या आपको वह दिन स्मरण है जब आपकी बेड़ियाँ टूटकर गिर पड़ी थीं? क्या आपको वह स्थान याद है जहाँ यीशु आपसे मिला और कहा, “मैं तुझ से सदा प्रेम रखता आया हूँ; मैं ने तेरे अपराधों को बादल के समान और तेरे पापों को काली घटा के समान मिटा दिया है; वे फिर कभी, सदा तक, तेरे विरुद्ध स्मरण न किए जाएँगे?” ओह! वह कैसा मधुर समय होता है जब यीशु पाप की पीड़ा को दूर कर देता है। जब प्रभु ने पहली बार मेरा पाप क्षमा किया, तो मैं इतना आनन्दित था कि मैं नाचने से अपने आप को कठिनाई से ही रोक पाया। उस घर से, जहाँ मुझे स्वतंत्र किया गया था, घर लौटते हुए मार्ग में मैंने सोचा कि मुझे सड़क के पत्थरों को भी अपने छुटकारे की कहानी सुनानी चाहिए। मेरा प्राण आनन्द से इतना भरा हुआ था कि मैं आकाश से गिरते हुए हर हिमकण को यीशु के उस अद्भुत प्रेम के विषय में बताना चाहता था, जिसने विद्रोहियों में सबसे बड़े विद्रोही के पापों को मिटा दिया था। वह आनन्दमय दिन, जब मैंने उद्धारकर्ता को पाया और उसके प्रिय चरणों से लिपटना सीखा, मेरे लिये कभी न भूलनेवाला दिन था। मैं गवाही दे सकता हूँ कि उस दिन का आनन्द पूर्णतः अवर्णनीय था। कोई भी अभिव्यक्ति, चाहे वह कितनी ही उन्मादपूर्ण क्यों न हो, उस घड़ी मेरी आत्मा के आनन्द से बेमेल न होती। तब से मसीही अनुभव के बहुत से दिन बीत चुके हैं, परन्तु कोई भी दिन ऐसा नहीं रहा जिसमें वह पूरी उमंग, वह झिलमिलाता हुआ आनन्द रहा हो जो उस पहले दिन में था। मुझे लगा कि मैं उस आसन से, जिस पर मैं बैठा था, उछल पड़ूँ, और वहाँ उपस्थित मेथोडिस्ट भाइयों में से सबसे जोशीले भाई के साथ पुकार उठूँ, “मुझे क्षमा मिल गई! मुझे क्षमा मिल गई! अनुग्रह का एक स्मारक! लहू से बचाया गया एक पापी।” मेरी आत्मा ने अपनी ज़ंजीरों को टुकड़े-टुकड़े होते देखा; मैंने अनुभव किया कि मैं एक स्वतंत्र किया हुआ प्राण हूँ, स्वर्ग का एक वारिस, एक क्षमा पाया हुआ जन, यीशु में ग्रहण किया हुआ, दलदल की कीच में से और सत्यानाश के गड़हे में से निकाला हुआ, जिसके पैर चट्टान पर खड़े किए गए और जिसके पग दृढ़ किए गए। मैं समझ सका कि जॉन बनयन का क्या अभिप्राय था, जब उसने कहा कि वह जुते हुए खेत के कौओं को भी अपने मन-परिवर्तन के विषय में सब कुछ बताना चाहता था। मैंने एक मसीही को यह कहते सुना है कि जब उसने उद्धारकर्ता को पाया, तो वह इतना आनन्दित था कि वह नहीं जानता था कि अपने आप को कैसे सँभाले, और वह पूरे एक बाजे-मण्डली के समान गा उठा, “आनन्द का दिन, आनन्द का दिन, जब यीशु ने मेरे पाप धो डाले।” सच्चे विश्वासियों का यह विशेषाधिकार है कि वे “हर समय गाते रहें।” परमेश्वर में आनन्द हमारी दशा के योग्य है। “राजा की सन्तान क्यों अपने सारे दिन शोक करती फिरे?” प्रभु में आनन्द शैतान के साम्राज्य के लिये किसी भी और बात से अधिक हानिकारक है। मैं लूथर के विचार से सहमत हूँ, जो कोई बुरा समाचार सुनने पर कहा करता था, “आओ, हम एक भजन गाएँ, और शैतान को चिढ़ाएँ।” “वे यहोवा की गति के विषय में गाएँगे।” जब मार्ग बहुत ऊबड़-खाबड़ हो जाएँ, और दुःख की पगडण्डियाँ बन जाएँ, और पीड़ाएँ बार-बार और तीव्र हों, तब भी गाते रहिए। परमेश्वर के सिंहासन तक पहुँचनेवाला कोई भी संगीत यहोवा के कानों में दुःख उठानेवाले पवित्र लोगों के गीत से अधिक मधुर नहीं है। वे अपने बिछौनों पर उसे धन्य कहेंगे और आग में भी उसकी ऊँची स्तुति गाएँगे। मृत्यु की छाया की तराई में से ठीक आर-पार जाना, और पूरे मार्ग गाते रहना; कठिनाई की पहाड़ी पर चढ़ना, और उसकी खड़ी चट्टानों पर गाते हुए चढ़ना; दानव क्रूर के पास से, और दानव निराशा के गढ़ के पास से भी, और मोहित भूमि में से होकर गुज़रना और फिर भी गाते रहना, और नदी के किनारे तक पहुँचकर उसमें गाते-गाते ही उतर जाना — किसी मसीही में यह बड़ी मनोहर बात है। प्रभु की विधियाँ हमारी तीर्थयात्रा के घर में हमारे गीत बनी रहें, जब तक कि हम ऊपर जाकर गाने न लगें! हम सब कुछ के लिये क्रूस पर चढ़ाए गए यीशु के ऋणी हैं। मेरे भाइयो, आपका जीवन क्रूस के सिवा और क्या है? आपके प्राण की रोटी क्रूस के सिवा और कहाँ से आती है? आपका आनन्द क्रूस के सिवा और क्या है? आपका सुख क्या है, आपका स्वर्ग क्या है, सिवाय उस धन्य जन के जो एक बार आपके लिये क्रूस पर चढ़ाया गया, और जो आपके लिये बिनती करने को सर्वदा जीवित है? तो फिर, क्रूस से लिपटे रहिए। उसे दोनों बाँहों में भर लीजिए! क्रूस पर चढ़ाए गए को थामे रहिए, और उसे कभी जाने न दीजिए। इसी क्षण फिर से क्रूस के पास आइए, और अब और सदा के लिये वहीं विश्राम कीजिए! फिर, परमेश्वर की सामर्थ्य को अपने ऊपर ठहरी हुई पाकर, निकल जाइए और क्रूस का प्रचार कीजिए! लहूलुहान मेम्ने की कहानी सुनाइए। उसी अद्भुत कथा को दोहराइए, और किसी और बात को नहीं। इस बात की चिन्ता मत कीजिए कि आप इसे किस ढंग से करते हैं, बस यह घोषणा कीजिए कि यीशु पापियों के लिये मरा। किसी शिशु के हाथ से ऊँचा उठाया गया क्रूस उतना ही सामर्थी है जितना किसी दानव के हाथ से उठाया गया। सामर्थ्य स्वयं उस वचन में है, या कहें कि उस पवित्र आत्मा में है जो उसके द्वारा और उसके साथ काम करता है। हे महिमामय मसीह, जब मैंने तेरे क्रूस का दर्शन पाया है, तो पहले मैंने उसे एक साधारण फाँसी के खम्भे के समान देखा है, और तू उस पर एक अपराधी के समान लटका हुआ था; परन्तु जैसे-जैसे मैं देखता रहा, मैंने उसे उठते और ऊँचा होते देखा, यहाँ तक कि वह सबसे ऊँचे स्वर्ग तक पहुँच गया, और अपनी प्रबल सामर्थ्य से असंख्य लोगों को परमेश्वर के सिंहासन तक उठा ले गया। मैंने उसकी भुजाओं को फैलते और बढ़ते देखा है, यहाँ तक कि उन्होंने सारी पृथ्वी को अपने आलिंगन में ले लिया। मैंने उसके पाँव को उतनी गहराई तक नीचे जाते देखा है जितनी गहरी हमारी असहाय दुर्दशाएँ हैं; और हे क्रूस पर चढ़ाए गए, तेरे प्रताप का मुझे कैसा दर्शन मिला है! भाइयो, अपने आस-पास के लोगों के मन-परिवर्तन के लिये क्रूस की सामर्थ्य पर विश्वास कीजिए। किसी भी मनुष्य के विषय में यह मत कहिए कि उसका उद्धार नहीं हो सकता। यीशु का लहू सर्वशक्तिमान है। किसी भी क्षेत्र के विषय में यह मत कहिए कि वह बहुत गिरा हुआ है, या मनुष्यों के किसी भी वर्ग के विषय में कि वे बहुत दूर जा चुके हैं: क्रूस का वचन खोए हुओं को फिर से प्राप्त कर लेता है। इसे परमेश्वर की सामर्थ्य मानिए, और आप इसे वैसा ही पाएँगे। क्रूस पर चढ़ाए गए मसीह पर विश्वास कीजिए, और उसके नाम से साहसपूर्वक प्रचार कीजिए, और आप बड़ी और आनन्द-भरी बातें देखेंगे। मसीही धर्म की अन्तिम विजय पर सन्देह मत कीजिए। अविश्वास को अपने प्राण में क्षण भर के लिये भी मत आने दीजिए। क्रूस को जय पानी ही है; उसमें मुकुट खिलना ही है, ऐसा मुकुट जो क्रूस पर चढ़ाए गए के व्यक्तित्व और उसकी वेदना की कड़वाहट के अनुरूप हो। उसका प्रतिफल उसके दुःखों के बराबर होगा। परमेश्वर पर भरोसा रखिए, और अपना झण्डा ऊँचा उठाइए, और अब भजनों और गीतों के साथ युद्ध के लिये आगे बढ़िए, क्योंकि सेनाओं का यहोवा हमारे संग है, परमप्रधान का पुत्र हमारी अगुवाई करता है। चाँदी की तुरही के नाद और लूट पकड़नेवालों की जयजयकार के साथ आगे बढ़ो। किसी भी मनुष्य का हृदय कच्चा न हो! मसीह मर चुका है! प्रायश्चित पूरा हो गया है! परमेश्वर सन्तुष्ट है! शान्ति की घोषणा हो चुकी है! स्वर्ग उस दया के प्रमाणों से जगमगा रहा है जो दस हज़ार गुना दस हज़ार लोगों पर पहले ही उण्डेली जा चुकी है! नरक काँप रहा है, स्वर्ग आराधना कर रहा है, पृथ्वी बाट जोह रही है। हे पवित्र लोगो, निश्चित विजय की ओर आगे बढ़ो! तुम मेम्ने के लहू के द्वारा जय पाओगे।
