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“इसलिए मसीही निराशा के दलदल में अकेला लड़खड़ाता रह गया; परन्तु फिर भी वह जूझता हुआ दलदल के उस किनारे की ओर बढ़ने का यत्न करता रहा जो उसके अपने घर से और भी दूर था, और छोटे फाटक के निकट था; ऐसा उसने किया भी, परन्तु वह बाहर न निकल सका, क्योंकि उसकी पीठ पर बोझ लदा था। परन्तु मैंने अपने स्वप्न में देखा कि एक मनुष्य उसके पास आया, जिसका नाम सहायक था, और उसने उससे पूछा कि वह वहाँ क्या कर रहा है। “मसीही: ‘महोदय,’ मसीही ने कहा, ‘सुसमाचार-प्रचारक नाम के एक मनुष्य ने मुझे इस मार्ग से जाने को कहा था, और उसी ने मुझे उस फाटक की ओर भी जाने का मार्ग बताया था, ताकि मैं आनेवाले क्रोध से बच सकूँ; और जब मैं वहाँ जा रहा था, तो मैं इसमें गिर पड़ा।’ “सहायक: ‘परन्तु तुमने सीढ़ियाँ क्यों न ढूँढ़ीं?’ “मसीही: ‘भय ने मेरा ऐसा पीछा किया कि मैं निकटतम रास्ते से भागा और इसमें गिर पड़ा।’ “तब उसने कहा, ‘अपना हाथ मुझे दो।’ सो उसने उसे अपना हाथ दिया, और उसने उसे बाहर खींच लिया, और ठोस भूमि पर खड़ा किया, और उससे कहा कि अपने मार्ग पर आगे बढ़ो (भजन संहिता 40:2)।” परमेश्वर के उसी एक आत्मा से निकलनेवाले वरदानों की भिन्नता के अनुसार, मसीहियत के आरम्भिक युगों में जो लोग यात्रियों को स्वर्गीय नगर की ओर मार्ग दिखाने में परिश्रम करते थे, वे भिन्न-भिन्न पद निभाते थे, और भिन्न-भिन्न नामों से जाने जाते थे। पौलुस कुरिन्थुस के यात्रियों के नाम लिखी अपनी पहली पत्री में (1 कुरिन्थियों 12:28) हमें बताता है, “परमेश्वर ने कलीसिया में अलग अलग व्यक्ति नियुक्त किए हैं; प्रथम प्रेरित।” इन्हें स्थान-स्थान पर जाकर कलीसियाएँ स्थापित करनी और सेवकों को नियुक्त करना था। फिर “दूसरे भविष्यद्वक्ता” थे; जिनमें से कुछ भविष्यद्वाणियाँ करते थे, जबकि दूसरों को उनकी व्याख्या करने का वरदान मिला था। फिर “तीसरे शिक्षक” आते थे; जो सम्भवतः या तो विभिन्न कलीसियाओं पर नियुक्त पास्टर थे, जो महाहृदय के समान यात्रियों को स्वर्ग की ओर जानेवाले मार्ग पर ले चलते थे, या सुसमाचार-प्रचारक जैसे लोग थे, जो इधर-उधर यात्रा करते हुए, जो कोई उन्हें मिलता उसे चेतावनी देते और मार्ग दिखाते थे। “फिर सामर्थ्य के काम करनेवाले, फिर चंगा करनेवाले;” और प्रेरित लोगों के एक और वर्ग का उल्लेख करना नहीं भूलता, जिन्हें “सहायक” कहा गया है। ये लोग ठीक-ठीक कौन थे, यह इतने समय बाद बताना यदि बिलकुल असम्भव नहीं, तो बहुत ही कठिन अवश्य होगा। यात्रियों के अभिलेखों में विद्वान कुछ लोगों ने सोचा है कि वे सहायक सेवक थे, जो कभी-कभी नियुक्त पास्टरों की सहायता करते थे, भेंट करने के पास्टरीय काम में भी और वचन के प्रचार में भी। दूसरों ने अनुमान लगाया है कि वे सहायक डीकन थे, और शायद डीकनेस भी, जो पद प्रेरितों के समय की कलीसियाओं में माना जाता था। और कुछ अन्य लोगों ने कल्पना की है कि ये “सहायक” पवित्रस्थान के सेवक थे, जो इस बात का ध्यान रखते थे कि अजनबियों को उचित रीति से बैठाया जाए, और सामूहिक आराधना के लिए लोगों के एकत्र होने से सम्बन्धित उन छोटी-छोटी बातों का प्रबन्ध करते थे, जिनकी देखरेख किसी न किसी को सदा करनी ही पड़ती है। वे कोई भी रहे हों, या उनके काम कुछ भी रहे हों, ऐसा प्रतीत होता है कि वे लोगों का एक उपयोगी समूह थे, जो इस योग्य थे कि उनका उल्लेख प्रेरितों, भविष्यद्वक्ताओं और शिक्षकों की उसी सूची में किया जाए, और यहाँ तक कि सामर्थ्य के काम करनेवालों तथा चंगाई के वरदान पानेवालों के साथ उनका नाम लिया जाए। बहुत सम्भव है कि उनका कोई आधिकारिक पद न था, परन्तु वे केवल अपने भीतर के ईश्वरीय जीवन की स्वाभाविक प्रेरणा से ऐसा कोई भी और हर काम करने को प्रेरित होते थे जिससे प्रभु के काम में शिक्षक, पास्टर या डीकन की सहायता हो सके। वे भाइयों के उस वर्ग के थे जो कहीं भी उपयोगी होते हैं, जो सदा किसी भी खाली जगह को भर सकते हैं, और जो तब बहुत ही आनन्दित होते हैं जब वे पाते हैं कि वे परमेश्वर की कलीसिया की किसी भी भूमिका में, चाहे वह कितनी ही छोटी क्यों न हो, सेवा के योग्य बन सकते हैं। इस युग की कलीसिया “सहायकों” की एक अच्छी टुकड़ी से आनन्दित है, परन्तु शायद एक-दो बातें सुधि दिलाकर उनके शुद्ध मन को उभार सकें। जॉन बनयन ने, जिसे हम पवित्र रूपक-कथा के साथ-साथ मसीही अनुभव का भी स्वामी पाएँगे, इस अध्याय के आरम्भ में दिए गए अंश में इन “सहायकों” के काम के एक ऐसे भाग का वर्णन किया है जो सबसे अधिक मूल्यवान है, और जिसकी सबसे अधिक आवश्यकता है। “वह मनुष्य जिसका नाम सहायक था” मसीही के पास तब आया जब वह निराशा के गन्दे कीचड़ में छटपटा रहा था। ठीक उस समय जब वह बेचारा दलदल में पैर फिसल जाने के कारण दम घुटकर मरने को था, और जब अपने सारे संघर्ष के साथ वह कीचड़ में और गहरा, और गहरा धँसता ही जा रहा था, तब अचानक उसके पास एक व्यक्ति आया—जिसके विषय में बनयन अपनी पूरी रूपक-कथा में और कुछ नहीं कहता, और यहाँ केवल उसका नाम बताता है—जिसने अपना हाथ बढ़ाया, और उससे प्रोत्साहन के कुछ शब्द कहते हुए उसे कीचड़ से बाहर खींच लिया, उसे राजा के राजमार्ग पर खड़ा कर दिया, और फिर अपने काम पर चला गया—एक ऐसा मनुष्य जो पृथ्वी पर प्रसिद्ध नहीं था, परन्तु आकाश के इतिहास में आत्माओं को जीतनेवाले बुद्धिमान के रूप में लिखा हुआ था। ईश्वरीय जीवन में ऐसे समय आते हैं जब समझदार मसीही भाइयों की सहायता अमूल्य होती है। हममें से अधिकांश लोग, जो अब एक सुदृढ़ आशा में आनन्दित हैं, उस भयानक निराशा के दलदल के विषय में उतना जान चुके हैं जितना हम जानना चाहते हैं। मैं स्वयं लगभग पाँच वर्ष तक उसमें छटपटाता रहा, और इसलिए उसके भयानक भूगोल से भली-भाँति परिचित हूँ। कुछ स्थानों पर वह दूसरों की अपेक्षा अधिक गहरा और अधिक घिनौना है; जैसे वह स्थान जहाँ दाऊद था जब उसने पुकारा, “मैं बड़े दलदल में धँसा जाता हूँ, और मेरे पैर कहीं नहीं रुकते”; परन्तु मेरा विश्वास कीजिए, जब कोई मनुष्य उससे बाहर निकल आता है तो वह अपने को तिगुना धन्य समझ सकता है; क्योंकि जब वह उसमें पूरी तरह फँसा होता है, तो अपनी सबसे अच्छी दशा में भी वह दलदल उसे जीवित निगल जाने की धमकी देता है। वह हाथ हमें सदा प्रिय, अति प्रिय रहेगा जिसने हमें उस भयानक गड़हे से बाहर निकालने में सहायता की; और यद्यपि हम सारी महिमा अनुग्रह के परमेश्वर को देते हैं, फिर भी हम उस साधन से अत्यन्त स्नेहपूर्वक प्रेम किए बिना नहीं रह सकते जिसे उसने हमारे छुटकारे का माध्यम बनाकर भेजा। स्विट्ज़रलैंड के कुछ पहाड़ी दर्रों के शिखर पर, वहाँ का कैंटन यात्रियों की रक्षा और सुविधा के लिए कुछ लोगों का एक छोटा दल रखता है, जो पहाड़ पर एक छोटे से घर में रहते हैं, और जिनका काम यात्रियों को उनके मार्ग पर सहायता देना है। जब हम उत्तरी इटली में कोल डी’ओबिया की खड़ी चढ़ाई पर कठिनाई से चढ़ रहे थे, तब चोटी से कोई तीन-चार मील पहले एक मनुष्य को नीचे आते देखना बहुत ही सुखद था, जिसने हमारा ऐसे अभिवादन किया मानो वह हमें वर्षों से जानता हो, और हमारे आने की बाट जोह रहा हो। उसके हाथ में एक फावड़ा था; और यद्यपि हम नहीं जानते थे कि आगे क्या है, वह स्पष्ट रूप से उसके विषय में सब कुछ जानता था, और हर संकट के लिए पहले से सुसज्जित और तैयार था। थोड़ी देर बाद हम गहरी बर्फ़ तक पहुँचे, और हमारा दयालु अगुआ तुरन्त अपने फावड़े से पगडंडी साफ़ करने के काम में लग गया, और उसके सहारे वह दल के दुर्बल लोगों को अपनी पीठ पर उठाकर ले गया। यात्रियों की देखभाल करना उसका काम था; और शीघ्र ही एक और व्यक्ति उससे आ मिला, जो थके हुओं के लिए जलपान लाया था। ये लोग “सहायक” थे, जिन्होंने अपना जीवन मार्ग के उस भाग पर बिताया जहाँ यह ज्ञात था कि उनकी सेवाओं की बार-बार आवश्यकता पड़ेगी। मैदानों में उनका कोई विशेष मूल्य न होता; यदि वे हमें किसी और स्थान पर मिलते तो उनकी सेवाओं को शायद दखलंदाज़ी भी समझा जाता; परन्तु वे अत्यन्त मूल्यवान थे, क्योंकि वे ठीक वहीं उपस्थित हुए जहाँ उनकी आवश्यकता थी, और मानो उन्होंने दया के साथ हमारा रास्ता घेर लिया था। जब कोई मनुष्य अपनी सहायता स्वयं कर सकता है, तब “सहायक” उसके लिए कम ही उपयोगी होते हैं; परन्तु जब वह निराशा के दलदल की कीचड़ में निरुपाय होकर फिसल रहा होता है, तब स्नेहपूर्ण हृदयवाला मनुष्य ओपीर के सोने से भी अधिक बहुमूल्य हो जाता है। यदि मैं बनयन को ठीक समझता हूँ, तो “सहायकों” की इस टुकड़ी के लोग निराशा के उस विशाल उदास दलदल की सारी सीमाओं पर चारों ओर तैनात हैं; और उनका काम है पहरा देना, और दलदल के किनारे-किनारे किसी भी ऐसे बेचारे, अँधेरे में भटके यात्री की पुकार सुनते रहना जो कीचड़ में लड़खड़ा रहा हो। जैसे रॉयल ह्यूमेन सोसाइटी जाड़े के मौसम में पार्कों की झीलों के किनारों पर अपने लोग तैनात रखती है, और जब बर्फ़ जम रही होती है, तो उन्हें आदेश देती है कि वे चौकस रहें, और जो कोई उस पर जाने का साहस करे उसकी देखभाल करें, वैसे ही हर कलीसिया में मसीही लोगों की, पुरुषों और स्त्रियों दोनों की, एक छोटी टोली को सदा तैयार रहना चाहिए कि वे संकट की पुकार सुनें, और टूटे हृदयों और गिरी हुई आत्माओं पर दृष्टि रखें। ऐसे ही “सहायकों” की हमें आवश्यकता है; और शायद पौलुस द्वारा बताए गए प्राचीन “सहायक” भी ऐसे ही थे। अच्छा होगा कि इन “सहायकों” को कुछ निर्देश दिए जाएँ कि वे खोजनेवाले पापियों को निराशा के दलदल से बाहर निकलने में कैसे सहायता दे सकते हैं। अपने पास्टरीय अनुभव के आधार पर मैं यह सलाह देने को प्रेरित हूँ कि बनयन ने “वह मनुष्य जिसका नाम सहायक था” का जैसा वर्णन किया है, उसका सावधानी से अनुकरण किया जाए। सो, पहली बात, जब आपको कोई निराश व्यक्ति मिले, तो उससे उसकी अपनी दशा का वर्णन करवाइए। जब सहायक ने मसीही की सहायता की, तो उसने तुरन्त उसकी ओर अपना हाथ नहीं बढ़ाया; परन्तु उसने उससे पूछा कि वह वहाँ क्या कर रहा है, और उसने सीढ़ियाँ क्यों नहीं ढूँढ़ीं। लोगों से उनके आत्मिक दुःख उनके सान्त्वना देनेवालों के सामने खुलवाना उनके लिए बहुत भला होता है। किसी पुरोहित के सामने पाप-स्वीकार करना घृणित बात है, परन्तु किसी संगी मसीही को अपनी आत्मिक कठिनाइयाँ बताना बहुधा मधुर राहत और सहायक अभ्यास सिद्ध होगा। आप, जो जागृत लोगों की सहायता करना चाहते हैं, बुद्धिमानी करेंगे यदि आप कब्र के पास के स्वर्गदूतों के समान रोती हुई मरियम से पूछें, “हे नारी, तू क्यों रोती है?” उनके उत्तर सहायता करनेवाले की कार्य-विधि को दिशा देंगे, और आवश्यक सान्त्वना को लागू करने में सहायक होंगे। जो रोगी अपने रोग को समझता है, वह किसी बुद्धिमान वैद्य के उपचार के आगे और अधिक प्रसन्नता से झुक जाता है। मैंने कभी-कभी पाया है कि किसी कठिनाई को केवल कह देना ही उसे तुरन्त दूर करने का साधन बन गया है। सबसे अधिक दुःख देनेवाले कुछ सन्देह, घिनौने चीखनेवाले उल्लुओं के समान, दिन का प्रकाश सह नहीं सकते। बहुत सी आत्मिक कठिनाइयाँ ऐसी हैं कि यदि कोई मनुष्य उनका पूरी तरह और निष्पक्ष रूप से इतनी देर तक सामना करे कि उनका वर्णन कर सके, तो वे जाँच के दौरान ही लुप्त हो जाएँगी। “हे अल्पविश्वासी, तू ने क्यों सन्देह किया?”—यह हमारे प्रभु का अविश्वास के विरुद्ध तर्क को युद्ध के लिए पंक्तिबद्ध करने का ढंग है। हर हाल में शोक करनेवाले को अपनी दशा बताने दीजिए; और आप धीरज से उसे सुनिए। प्रिय भाई, उस युवक को अकेले में ले जाइए; उससे कहिए कि वह शान्ति से आपके साथ बैठे, और फिर उससे पूछिए, “वह कौन सी बात है जो तुम्हें उलझन में डालती है? तुम क्या नहीं समझ पाते? वह क्या है जो तुम्हें इतना उदास और हताश कर देता है?” भले सहायक ने बुद्धिमानी से मसीही को अपने दुःख खोलकर कहने के लिए प्रेरित किया; तू भी ऐसा ही कर। इसके बाद, जहाँ तक हो सके, अपने सामने के मामले में प्रवेश कीजिए। सहायक दलदल के किनारे तक आया, और अपने बेचारे मित्र की ओर झुका। शायद यह आपको एक महत्वहीन निर्देश लगे; परन्तु निश्चय जानिए, यदि आप इसका पालन न करें, तो आप बहुत ही कम सहायता दे पाएँगे, यदि दे भी पाएँ। सहानुभूति ही दूसरों को सान्त्वना देने की हमारी योग्यता का मुख्य स्रोत है। यदि आप किसी प्राण के दुःख में प्रवेश नहीं कर सकते, तो आप उस प्राण के लिए कोई “शान्ति का पुत्र” न होंगे। इसलिए अपने आपको इतना नीचे लाने का यत्न कीजिए कि आप “रोनेवालों के साथ रोएँ,” ताकि आप उन्हें उठाकर अपने आनन्द के मंच तक ला सकें। किसी कठिनाई का इसलिए उपहास न कीजिए कि वह आपको छोटी लगती है; स्मरण रखिए कि जो व्यक्ति उससे परेशान है उसके लिए वह बहुत बड़ी हो सकती है। डाँटना आरम्भ न कीजिए, और चिन्तित खोजी से यह न कहिए कि उसे वैसा अनुभव नहीं करना चाहिए जैसा वह करता है, या उसे वैसा व्याकुल नहीं होना चाहिए जैसा वह है। जैसे परमेश्वर हमारी दुर्बलता में अपनी सनातन भुजाएँ हमारे नीचे रखता है, वैसे ही आपको अपने छोटे और दुर्बल भाइयों के नीचे अपनी सहानुभूति की फैली हुई भुजाएँ रखनी चाहिए, ताकि आप उन्हें ऊपर उठा सकें। यदि आप किसी भाई को कीचड़ में देखें, तो अपनी भुजाएँ ठीक नीचे कीचड़ में डाल दीजिए, ताकि परमेश्वर के अनुग्रह से आप उसे पूरा का पूरा उसमें से उठा सकें। स्मरण रखिए कि आप भी कभी ठीक वहीं थे जहाँ आपकी वह निराश बहन अब है; और यदि हो सके तो उस समय की अपनी भावनाओं को फिर से याद करने का प्रयास कीजिए जब आप उसकी दशा में थे। हो सकता है, जैसा आप कहते हैं, वह किशोर या युवती बहुत मूर्ख हो। हाँ, परन्तु आप भी तो कभी मूर्ख थे; और तब आपका जी सब भाँति के भोजन से मिचलाने लगा था, और आप मृत्यु के फाटक तक पहुँच गए थे। पौलुस की भाषा का प्रयोग करें तो, आपको “उनके लिए मूर्ख बनना” होगा। आपको अपने आपको इन सीधे-सादे लोगों की दशा में रखना होगा। यदि आप ऐसा नहीं कर सकते, तो आपको सहायक बनना सीखने के लिए प्रशिक्षण की आवश्यकता है; अभी तक आप मार्ग नहीं जानते। आपका अगला कदम यह हो सकता है कि आप इन बेचारे भाइयों को परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं से सान्त्वना दें। सहायक ने मसीही से पूछा कि उसने सीढ़ियाँ क्यों नहीं ढूँढ़ीं; क्योंकि दलदल के ठीक बीच से होकर अच्छे और मज़बूत पैर रखने के पत्थर रखे गए थे; परन्तु मसीही ने कहा कि अत्यधिक भय के कारण वह उनसे चूक गया था। हमें डूबती हुई आत्माओं को परमेश्वर के वचन की अनेक बहुमूल्य प्रतिज्ञाओं की ओर संकेत करना चाहिए। भाइयो, ध्यान रखिए कि आप स्वयं पवित्रशास्त्र के सान्त्वना देनेवाले कथनों से भली-भाँति परिचित हों; उन्हें अपनी ज़बान की नोक पर रखिए, ताकि जब भी उनकी आवश्यकता हो, वे उपयोग के लिए तैयार रहें। मैंने एक विद्वान के विषय में सुना है, जो प्राचीन शास्त्रीय लेखकों की छोटी-छोटी प्रतियाँ अपने साथ लिए फिरता था, यहाँ तक कि ऐसा लगता था मानो उसकी जेब में लगभग पूरा बोडलियन पुस्तकालय हो। भला होता कि आप छोटी-छोटी बाइबलें अपने साथ लिए फिरते; या इससे भी अच्छा यह कि परमेश्वर का सम्पूर्ण वचन आपके हृदयों में छिपा होता, ताकि आप अपने प्रभु के समान “थके हुए को वचन के द्वारा सम्भालना जानते”! “अवसर पर कहा हुआ वचन क्या ही भला होता है!” जब कभी आपका सामना किसी व्याकुल प्राण से हो, तो आपके लिए यह कितनी धन्य बात है कि आप उससे कह सकें: “हाँ, यह सच है कि तुम पापी हो; परन्तु यीशु मसीह पापियों का उद्धार करने के लिए जगत में आया!” सम्भव है वह आपसे कहे कि वह कुछ नहीं कर सकता; परन्तु आप उत्तर दे सकते हैं कि उससे कुछ करने को कहा ही नहीं गया है, क्योंकि लिखा है, “प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास कर, तो तू उद्धार पाएगा।” शायद वह उत्तर दे कि वह विश्वास नहीं कर सकता; परन्तु आप उसे इस प्रतिज्ञा की याद दिला सकते हैं, “जो कोई प्रभु का नाम लेगा, वह उद्धार पाएगा।” बाइबल के कुछ पद आकाश के उन तारामण्डलों के समान हैं जो इतने स्पष्ट दिखाई देते हैं कि जब नाविक उन्हें एक बार देख लेता है, तो वह जान लेता है कि वह किस दिशा में जहाज़ चला रहा है। पवित्रशास्त्र के कुछ चमकते हुए अंश प्रकाशन के आकाशमण्डल में भटकी हुई आत्माओं के लिए मार्गदर्शक तारों के रूप में जड़े हुए प्रतीत होते हैं। इन्हीं की ओर संकेत कीजिए। इन्हें बार-बार उद्धृत कीजिए। पापी की आँखें इन पर टिका दीजिए। इस प्रकार आप सबसे प्रभावशाली ढंग से उसकी सहायता करेंगे। यदि कोई निराश प्राण इन पृष्ठों को पढ़े, तो मैं उसके लिए अपने अनुग्रहकारी परमेश्वर की ये बहुत ही बड़ी और बहुमूल्य प्रतिज्ञाएँ उद्धृत करूँ: “दुष्ट अपनी चालचलन और अनर्थकारी अपने सोच विचार छोड़कर यहोवा ही की ओर फिरे, वह उस पर दया करेगा, वह हमारे परमेश्वर की ओर फिरे और वह पूरी रीति से उसको क्षमा करेगा।” “वह अपने क्रोध को सदा बनाए नहीं रहता, क्योंकि वह करुणा से प्रीति रखता है।” “जो कोई चाहे वह जीवन का जल सेंतमेंत ले।” ये तीन पद उन “सीढ़ियों” के नमूने हैं जिन्हें “मार्ग के प्रभु” ने ऐसे स्थानों पर रखवाया है जहाँ वे डूबते हुए पापियों की सबसे अच्छी सहायता कर सकें। प्रतिज्ञाएँ उद्धृत करने के बाद, जिन्हें आपकी सहायता की आवश्यकता हो उन्हें उद्धार की योजना के विषय में और पूरी रीति से सिखाने का प्रयास कीजिए। हर सब्त के दिन हज़ारों पुलपिटों से सुसमाचार का प्रचार होता है, फिर भी कोई भी बात इतनी कम जानी और ठीक से समझी नहीं जाती जितना वह सत्य जो यीशु में है। प्रचारक अपने सारे प्रयत्नों के बावजूद अपने कुछ सुननेवालों के लिए सीधे-सादे सुसमाचार को स्पष्ट नहीं कर पाता; परन्तु आप, जो प्रचारक नहीं हैं, शायद ऐसा कर सकें, क्योंकि आपकी मानसिक दशा और शिक्षा संयोग से उस व्यक्ति की समझ के ठीक अनुकूल हो सकती है। परमेश्वर मेरा साक्षी है कि मैं जो कुछ भी कहता हूँ उसे स्पष्ट और सरल बनाने का सदा कितनी लगन से प्रयत्न करता हूँ, फिर भी मेरे सोचने और बोलने के विशेष ढंग मेरे श्रोताओं में से कुछ लोगों की दशा के लिए उपयुक्त न हों, ऐसा हो सकता है। आप पवित्र चतुराई और लगन के द्वारा शायद उन हृदयों को आनन्दित कर सकें जिन्हें मुझसे प्रकाश की एक किरण भी नहीं मिलती। यदि मेरे भाई और बहनें, ये “सहायक,” निरन्तर और समझदारी से सक्रिय रहें, तो वे घरेलू भाषा के द्वारा बहुधा वहाँ बात समझा सकते हैं जहाँ धर्मविज्ञानी केवल उलझन पैदा करते हैं; जो बात विद्वत्तापूर्ण धर्मविज्ञान के रूप में शायद समझ में न आई हो, वह दैनिक जीवन की भाषा में कही जाने पर हृदय तक पहुँच सकती है। हमें बैठक, रसोई और कार्यशाला के ऐसे प्रचारकों की आवश्यकता है, जो मनुष्यों की स्वाभाविक बोली में बात कर सकें; विश्वविद्यालय और कॉलेज अपनी बोलने की शैलियों से बहुधा सत्य को धुंधला कर देते हैं। यदि आप, हमारे मित्र जो संसार के लोगों के बीच उठते-बैठते हैं, केवल उसी बात को दूसरे रूप में कह दें, तो पापी कहेगा, “अहा! अब मेरी समझ में आ गया; पास्टर की भाषा से मैं इसे नहीं समझ सका, परन्तु आपकी सीधी-सादी बातचीत से मैं इसे समझ सकता हूँ।” यदि आप आत्माओं की सहायता करना चाहते हैं, तो उन्हें उद्धारकर्ता की ओर अवश्य संकेत कीजिए। उन्हें असम्बद्ध बातों से परेशान न कीजिए, परन्तु उन्हें तुरन्त “यीशु के बहुमूल्य लहू” की ओर ले जाइए, क्योंकि क्षमा और शुद्धि का एकमात्र स्रोत वही है। पापी को बताइए कि जो कोई यीशु पर भरोसा रखता है वह उद्धार पाएगा। छोटे फाटक की ओर संकेत न कीजिए, जैसा सुसमाचार-प्रचारक ने किया था; क्योंकि वह सबसे सच्चा मार्ग नहीं है, परन्तु पापी से कहिए कि वह सीधे क्रूस के पास जाए। यदि बेचारे मसीही को आरम्भ में ही उसे मार्ग दिखाने के लिए कोई पूरी तरह शिक्षा पाया हुआ विश्वासी मिल जाता, तो उसे निराशा के दलदल में लोटने की आवश्यकता न होती। भूल करनेवाले सुसमाचार-प्रचारक को डाँटिए नहीं, परन्तु पापी को सदा कलवरी की ओर संकेत करके उस हानि को मिटाने का यत्न कीजिए जो उसने यात्री को पहुँचाई। क्या आप इसमें कुछ और जोड़ना चाहेंगे? तो, परेशान व्यक्ति को अपना स्वयं का अनुभव बताइए। बहुतों को इस प्रकार निराशा के दलदल से बच निकलने में सहायता मिली है। “क्या!” वह युवा मित्र, जिससे हम बात कर रहे हैं, चिल्ला उठता है, “क्या आपने भी कभी ऐसा अनुभव किया है जैसा मैं करता हूँ?” खोजियों से बात करते समय मुझे कभी-कभी यह देखकर बड़ा मनोरंजन हुआ है कि वे यह सोचकर आश्चर्य से आँखें फाड़ देते हैं कि मैंने भी कभी वैसा ही अनुभव किया था जैसा वे करते हैं, जबकि यदि मैंने ऐसा अनुभव न किया होता तो मैं कहीं अधिक आश्चर्य से अपनी आँखें फाड़ता। हम अपने रोगियों को उनके सारे लक्षण बता देते हैं, और तब वे सोचते हैं कि हमने अवश्य उनके हृदय पढ़ लिए होंगे; जबकि सच्चाई यह है कि हमारे हृदय ठीक उनके हृदयों जैसे हैं, और अपने आपको पढ़ने में हम उन्हें पढ़ लेते हैं। हम उसी मार्ग से होकर गए हैं जिससे वे गए हैं, और यह बड़ी कठिन बात होगी यदि हम उस बात का वर्णन न कर सकें जिसे हमने स्वयं भोगा है। उन्नत मसीही भी दूसरों के अनुभव को पढ़ने और सुनने से बहुधा बड़ी सान्त्वना पाते हैं, यदि वह कुछ-कुछ उनके अपने अनुभव जैसा हो; और युवा लोगों के लिए यह सुनना कि दूसरे उनसे पहले किन-किन बातों से होकर गुज़रे हैं, अनुग्रह का एक अत्यन्त धन्य साधन है। मैं चाहता हूँ कि हमारे बड़े भाई इस विषय में अधिक बार “सहायक” बनें; और जब वे दूसरों को परेशानी में देखें, तो उन्हें बताएँ कि वे स्वयं ठीक उन्हीं कठिनाइयों से होकर गुज़रे हैं, बजाय इसके कि, जैसा कुछ लोग करते हैं, वे युवाओं को इस बात का दोष दें कि वे वह नहीं जानते जो वे जान ही नहीं सकते, और उन्हें इसलिए उलाहना दें कि उनके “जवान कन्धों पर बूढ़े सिर” नहीं हैं, जहाँ, प्रसंगवश, वे बड़े ही बेतुके लगते। एक बार फिर, आप युवा खोजी के साथ प्रार्थना करके उसकी बहुत सहायता करेंगे। अहा, प्रार्थना की सामर्थ्य! जब आप पापी से वह नहीं कह पाते जो आप कहना चाहते हैं, तब आप कभी-कभी पापी के सुनते हुए उसे परमेश्वर से कह सकते हैं। किसी व्यक्ति के साथ प्रार्थना में वह बात कहने का एक ढंग है जो आप सीधे उसके मुँह पर नहीं कह सकते; और कभी-कभी, किसी दूसरे के साथ प्रार्थना करते समय, मामले को बहुत स्पष्ट और हार्दिक रूप से रखना अच्छा होता है—कुछ इस प्रकार, “हे प्रभु, तू जानता है कि यह बेचारी स्त्री, जो अब तेरे सामने घुटने टेके हुए है, बहुत परेशान है; परन्तु यह उसका अपना दोष है। वह तेरे प्रेम पर विश्वास नहीं करेगी, क्योंकि वह कहती है कि उसे उसका कोई प्रमाण अनुभव नहीं होता। तू ने अपने प्रिय पुत्र के दान में पर्याप्त प्रमाण दे दिया है; परन्तु वह हठ करती है कि उसे अपने में कुछ ऐसा दिखाई दे जिस पर वह टिक सके, कुछ अच्छी मनोदशाएँ या भावनाएँ। उसे बहुत बार बताया गया है कि उसकी सारी आशा मसीह में है, और अपने आप में बिलकुल नहीं; फिर भी वह पानी के बीच आग, और मृत्यु की कब्रों में जीवन ढूँढ़ती रहती है। हे प्रभु, उसकी आँखें खोल; उसका मुँह सही दिशा की ओर फेर दे, और उसे ऐसा चला कि वह अपने आप की ओर नहीं, वरन् मसीह की ओर देखे!” इस प्रकार प्रार्थना करने से मामला बहुत स्पष्ट रूप से सामने आ जाता है, और यह अपने आप में उपयोगी हो सकता है। इसके अतिरिक्त, प्रार्थना में वास्तविक सामर्थ्य है; प्रभु निश्चय ही अब भी अपने लोगों की दोहाई सुनता है। जैसे निश्चय ही बिजली की धारा एक स्थान से दूसरे स्थान तक सन्देश ले जाती है, जैसे निश्चय ही गुरुत्वाकर्षण के नियम ग्रहों-नक्षत्रों को नियन्त्रित करते हैं, वैसे ही निश्चय प्रार्थना एक रहस्यमय परन्तु अत्यन्त वास्तविक सामर्थ्य है। परमेश्वर सचमुच प्रार्थना का उत्तर देता है। हमें इस बात का उतना ही निश्चय है जितना इस बात का कि हम साँस लेते हैं: हमने इसे आज़माया है, और परखा है। ऐसा नहीं कि परमेश्वर ने कभी-कभी ही हमारी सुनी हो, परन्तु हमारे लिए माँगना और पाना उतनी ही नियमित बात बन गई है जितनी हमारे बच्चों के लिए हमसे भोजन माँगना और हमारे हाथों से उसे पाना। मैं यह सिद्ध करने का प्रयत्न करने की बात शायद ही सोचूँ कि परमेश्वर मेरी प्रार्थना सुनता है; मुझे इसमें उससे अधिक सन्देह नहीं जितना इस तथ्य में कि गुरुत्वाकर्षण का नियम मेरे चलने, बैठे रहने, उठने और लेटने में मुझ पर प्रभाव डालता है। तो, प्रार्थना की इस सामर्थ्य का प्रयोग कीजिए; और आप बहुधा पाएँगे कि जब और कुछ भी किसी प्राण को उसकी कठिनाई से बाहर निकलने में सहायता नहीं देगा, तब विनती यह काम कर देगी। प्रिय मित्रो, यदि परमेश्वर आपके साथ है, तो प्रार्थना की सामर्थ्य के द्वारा दूसरों की सहायता करने की आपकी योग्यता की कोई सीमा नहीं। इन निर्देशों को—और ये बहुत अधिक नहीं हैं—आपको अपनी स्मृति में वैसे ही रखना चाहिए जैसे आप डूबने के खतरे में पड़े लोगों के सम्बन्ध में रॉयल ह्यूमेन सोसाइटी के निर्देशों को रखते।
