68 में से अध्याय 8

स्कॉटलैंड ने अब तक जितने भी बौद्धिक और गहन चिन्तन करनेवाले धर्मविज्ञानी उत्पन्न किए हैं, उनमें सबसे प्रमुख। आइए

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स्कॉटलैंड ने अब तक जितने भी बौद्धिक और गहन चिन्तन करनेवाले धर्मविज्ञानी उत्पन्न किए हैं, उनमें सबसे प्रमुख। आइए

शब्द-शब्द करके बोले गए जैसे आत्मा ने उनके मुँह में डाले, उससे भिन्न नहीं, जैसे वीणा या सितार उस व्यक्ति के हाथों के निर्देश के अनुसार स्वर देता है जो उसे थामे रहता और कुशलता से बजाता है।"- हूकर की रचनाएँ। खण्ड 3, पृ. 537, 540।

3. जॉन ओवन, जो ऑक्सफ़ोर्ड के क्राइस्ट चर्च के डीन थे, प्यूरिटनों में सबसे अधिक विद्वान और तर्कशील थे। आइए सुनें कि वे क्या कहते हैं:-

"परमेश्वर के पवित्र जन पवित्र आत्मा के द्वारा उभारे जाकर बोलते थे। जब वचन इस प्रकार उनके पास लाया गया, तब उसे उनकी अपनी समझ, बुद्धि, मन और स्मृति पर नहीं छोड़ा गया कि वे उसे सजाएँ, व्यवस्थित करें और प्रस्तुत करें; परन्तु पवित्र आत्मा उन्हें उठाए, प्रेरित किए और आगे बढ़ाए रहा कि वे वही सब बोलें, सुनाएँ और लिखें, और केवल वही,-एक-एक बिन्दु तक,-जो इस प्रकार उन्हें दिया गया था। उन्होंने सीखी हुई बातों के अनुकूल शब्द स्वयं नहीं गढ़े, परन्तु केवल उसी वचन को व्यक्त किया जो उन्होंने पाया था। यद्यपि शब्दों के चुनाव में उनके मन और समझ का उपयोग हुआ (जिससे उनकी अभिव्यक्ति के ढंग में सब भेद उत्पन्न होते हैं), तौभी वे ऐसे संचालित किए गए कि उनके शब्द उनके अपने नहीं थे, परन्तु सीधे उन्हें दिए गए थे। जो सिद्धान्त उन्होंने सिखाया वह न केवल सत्य का वचन था,-स्वयं सत्य था,-परन्तु जिन शब्दों से उन्होंने उसे सिखाया वे भी स्वयं परमेश्वर की ओर से सत्य के शब्द थे। इस प्रकार, भविष्यद्वक्ताओं के मन और जीभ के अनुरूप शब्दों को ग्रहण करने और प्रस्तुत करने के लिए उपयुक्त साधनों के योगदान को मानते हुए, जब परमेश्वर की वाणी उन तक पहुँची,- लिखित वचन का हर एक बिन्दु समान रूप से ईश्वरीय है, और उतना ही सीधे परमेश्वर की ओर से है जितनी वह वाणी जिससे, या जिसके द्वारा, वह भविष्यद्वक्ताओं में होकर हम से बोला; और इसलिए वह अपने में और हमारे लिए उसी अधिकार से युक्त है।" -ओवन, पवित्रशास्त्र की ईश्वरीय उत्पत्ति पर। खण्ड 16, पृ. 305।

4. डॉ. चाल्मर्स सम्भवतः स्कॉटलैंड के अब तक के सबसे बौद्धिक और गहन चिन्तन करनेवाले धर्मविज्ञानी थे। आइए सुनें कि वे क्या कहते हैं:

(क) "बाइबल की विषय-वस्तु को चुने हुए भविष्यद्वक्ताओं और प्रेरितों के मन से होकर निकलना था, और वहाँ से भाषा में ढलकर तब कहीं पवित्रशास्त्र के रूप में संसार के सामने आनी थी। यहीं हमारी भेंट अंशतः या घटाई हुई प्रेरणा के पक्षधरों से होती है, और हम उन सब के विरुद्ध एक साथ खड़े होना चाहेंगे। कोई भी सिद्धान्त, जो पूर्ण और सिद्ध प्रेरणा से तनिक भी कम पड़ता है, ऐसा नहीं जिस पर यह परिणाम न आता हो कि प्रकाशन की विषय-वस्तु अपनी यात्रा के अन्तिम चरणों में हानि उठाती और बिगड़ जाती है; और ठीक उस स्थान पर पहुँचने से पहले जहाँ वह संसार को मार्ग दिखाने और प्रकाशित करने के लिए खड़ी होती है। वह विशुद्ध रूप से स्वर्ग में थी। वह विशुद्ध रूप से स्वर्ग से पृथ्वी पर उतरी। प्रकाशन के महान कर्ता ने उसे विशुद्ध रूप से प्रेरितों के मनों में रखा। परन्तु तब हमें बताया जाता है कि अन्तिम ठिकाने से थोड़ी ही दूर पहले, उसे विशुद्ध रूप से उस स्थान तक ले जाने के बदले जहाँ सारी प्रक्रिया का महान उद्देश्य पूरा होना था, उसे अपने ही भरोसे छोड़ दिया गया, और मानवीय दुर्बलताओं को उसमें मिल जाने और उसकी चमक को बिगाड़ने दिया गया। कैसी विचित्र बात है कि ठीक तभी, जब वह मनुष्यों के लिए अधिकारपूर्ण मार्गदर्शक और अगुवे का काम सँभालने जा रही थी, तभी और उससे पहले नहीं, मानवता की मैल और दुर्बलता उसके आसपास जमने दी जाए। कैसी विचित्र बात है कि विचारों की प्रेरणा के साथ वह प्रेरितों के मनों में तो विशुद्ध रूप से प्रवेश करे; परन्तु शब्दों की प्रेरणा के बिना उस संसार की ओर विशुद्ध रूप से बाहर न निकले जिसके ही हित के लिए, और जिसकी ही चेतावनी के लिए, यह महान कार्य स्वर्ग में आरम्भ हुआ और पृथ्वी पर आकर पूरा हुआ। और विशेष रूप से विचित्र, इस घोषणा के रहते कि उन्होंने ये बातें अपने लिए नहीं परन्तु हमारे लिए सेवा के रूप में दीं,-फिर भी विचित्र कि यह प्रकाशन उन्हीं के पास तो विशुद्ध रूप से आए, परन्तु हमारे पास अशुद्ध रूप से निकले, और उस पर, जान पड़ता है, मानवीय दुर्बलता का कुछ कलंक और धुँधलापन लगा हो।-इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता कि इस स्वर्गीय सत्य की हमारे संसार तक की यात्रा में किस बिन्दु पर उस पर यह धुँधलापन डाला गया। वह अन्ततः हमारे पास एक धुँधली और अपवित्र की हुई वस्तु होकर पहुँचता है; और मनुष्य, परमेश्वर की निष्कलंक साक्षी से बातचीत करने के बदले, अपने हाथों में एक अपूर्ण, खण्डित बाइबल पाता है।"

(b) "जब हमारे विचार ऐसे हैं, तो इसका अनिवार्य परिणाम यह है कि हम बाइबल को प्रकाशन के सब उद्देश्यों के लिए उसकी भाषा में भी उतना ही सिद्ध मानें जितना उसके सिद्धान्त में। और इस निष्कर्ष के लिए यह आवश्यक नहीं कि हम निगरानी के सिद्धान्त और प्रेरणा-प्रदान के सिद्धान्त के बीच निर्णय करें। जो निगरानी केवल भ्रम की प्रगति को रोक भर दे, उसे हम सर्वथा अस्वीकार करते हैं; क्योंकि यदि यह शब्द प्रेरणा की प्रक्रिया पर लागू होता भी है, तो वह ऐसी प्रभावशाली निगरानी होनी चाहिए जो न केवल नकारात्मक रूप से यह सुनिश्चित करे कि कुछ भी गलत न हो, वरन् सकारात्मक रूप से यह भी सुनिश्चित करे कि पवित्र लेखकों की ओर से सदैव सबसे उपयुक्त विषय निकलें, और वे सबसे उपयुक्त और सबसे सटीक शब्दों में व्यक्त हों। यह कार्य अंशतः निगरानी से और अंशतः प्रेरणा-प्रदान से हुआ, या पूर्णतः प्रेरणा-प्रदान से, इसकी हमें चिन्ता नहीं। हमें इन भेदों की न कोई रुचि है, न कोई चाह। हमारा पक्ष इन पर निर्भर नहीं है; और जो चिन्ताजनक लोग समझते हैं कि इन भेदों से हमारे पक्ष को भारी हानि पहुँचती है, उनके भय में हम पूरी तरह साझी नहीं हो सकते। हमारे लिए महत्त्वपूर्ण प्रश्न निर्माण की प्रक्रिया नहीं, वरन् उससे बनी वस्तु के गुण हैं। पहली बात को हम प्रासंगिक नहीं मानते, और हमें निश्चय नहीं कि वह कोई उचित खोज भी है। हम दूसरी बात पर ही खड़े हैं; और पवित्रशास्त्र की वचन के मूल्य, सिद्धता और परम अधिकार के विषय में बहुतायत की गवाहियाँ, ये उस तर्क के गढ़ हैं जो वह सब स्थापित कर देता है जो पूर्ण और अचूक प्रेरणा के कट्टर से कट्टर पक्षधरों को चाहिए। हमारा सरोकार कृति से है, कारीगरी से नहीं; और यदि पवित्रशास्त्र की स्पष्ट गवाहियों से हमें निश्चय है कि उस प्रक्रिया की उपज सार और शब्द दोनों में विश्वास और आचरण का एक सिद्ध मार्गदर्शक है, तो हमें उस गुप्त कार्य के रहस्यों में घुसने की आवश्यकता नहीं। हम विश्वास करते हैं कि उस लेख की रचना में मनुष्यों ने न केवल वैसा सोचा जैसी उन्हें प्रेरणा मिली, वरन् वैसा ही बोला भी जैसा पवित्र आत्मा ने उन्हें उभारा। परन्तु पवित्र लेख की परम सिद्धता के लिए हमारा तर्क उन लोगों की पहुँच से भी पूरी तरह परे है जिन्होंने भौगोलिक सटीकता से वह रेखा खींचने का प्रयत्न किया है जो चमत्कारिक को स्वाभाविक से अलग करती है; और जो हमें बताते हैं कि प्रेरितों ने कब वे शब्द लिखे जो आत्मा ने उन्हें सुझाए, और कब वे शब्द लिखे जिनकी आत्मा ने उन्हें अनुमति दी।

हमारी दीन समझ में परिणाम के लिए इससे कुछ भी अन्तर नहीं पड़ता। यदि उन्होंने वे शब्द कहे जो आत्मा ने सुझाए, तो वे शब्द इसीलिए सर्वोत्तम थे। यदि उन्होंने वे शब्द कहे जिनकी आत्मा ने अनुमति दी, तो इसलिए कि वे शब्द सर्वोत्तम थे। बाइबल की सर्वोत्तमता इन दोनों ही रीतियों से सुरक्षित रहती है; और आत्मा की स्वीकृति, विचारों और कथनों दोनों के विषय में, उसके हर वाक्यांश तक पहुँचती है। दोनों ही रीतियों से वे वास्तव में आत्मा के ही वचन हैं; और परमेश्वर बाइबल के द्वारा सत्य को दूसरों की भाषा के माध्यम से नहीं दे रहा। उसने उसे वस्तुतः अपनी ही भाषा बना लिया है; और परमेश्वर बाइबल के द्वारा हमसे बोल रहा है।"

(c) "मसीहियों का यह कर्तव्य है कि वे पवित्रशास्त्र की अखण्डता और प्रेरणा के चारों ओर आग की दीवार की नाईं खड़े हों; और उन्हें ऐसे अक्षत और अलंघ्य मानें मानो उनके चारों ओर कोई गढ़ खड़ा कर दिया गया हो जिसकी नींव पृथ्वी पर और जिसके कंगूरे स्वर्ग में हों। सीमाओं के साथ यही छेड़छाड़ है जो सब कुछ नष्ट और विकृत कर देती है; इसलिए ठीक तब जब सीमा टूटे, तभी चेतावनी की घण्टी बजनी चाहिए। यदि युद्ध की पुकार उठानी ही है, तो आरम्भ में ही उठानी चाहिए; और जब पहली बार, चाहे कितने ही थोड़े मेल से, मानवीय बातें ईश्वरीय बातों में मिलाई जाएँ, तब बाइबल के सब मित्रों को ऐसे घृणित और भयानक अपवित्रीकरण के विरुद्ध तन-मन से एक हो जाना चाहिए।"—चामर्स की क्रिश्चियन एविडेन्सेज़, भाग 2, पृ. 371, 372, 375, 376, 396.

पाद-टिप्पणियाँ

1 कार्लाइल ने "हीरो-वरशिप" में कुरान के विषय में अपना आकलन इन शब्दों में दिया है: "यह एक थकाऊ, उलझी हुई खिचड़ी है, कच्ची, दुर्बोध, अन्तहीन पुनरुक्तियों, लम्बे-चौड़े वर्णनों, गुत्थियों और असहनीय मूर्खता से भरी हुई। संक्षेप में, कर्तव्य-बोध के सिवा और कुछ किसी यूरोपीय को कुरान के उन अपठनीय कूड़े-करकट के ढेरों में से पार नहीं करा सकता।"

जॉन ओवेन कहता है, "संसार में बाइबल को छोड़ और कोई ऐसा लेख नहीं जिसने ईश्वरीय उत्पत्ति का दावा किया हो, परन्तु वे सब, न केवल अपनी विषय-वस्तु से, वरन् अपनी लेखन-शैली से भी, और उसमें मनुष्य की कारीगरी और दुर्बलता के स्पष्ट चिह्नों से, अपने ही दोष सिद्ध करने के लिए पर्याप्त हैं, और अपने व्यर्थ दावों को खुले रूप से प्रकट कर देते हैं।" (द रीज़न ऑफ़ फेथ। वर्क्स, भाग 4, पृ. 34, जॉन्सटन का संस्करण।)

2 "मैं सदैव धर्मशास्त्र-रहित शिक्षा के अर्थ में लौकिक शिक्षा का प्रबल पक्षधर रहा हूँ। परन्तु मुझे स्वीकार करना होगा कि मैं इस बात से भी उतना ही गम्भीर रूप से उलझन में पड़ा हूँ कि इन विषयों पर विचारों की वर्तमान अस्तव्यस्त दशा में, बाइबल का उपयोग किए बिना, वह धार्मिक भावना जो आचरण का अनिवार्य आधार है, किन व्यावहारिक उपायों से बनाए रखी जा सकती है।"

"इस महान ऐतिहासिक तथ्य पर विचार कीजिए कि तीन शताब्दियों से यह पुस्तक अंग्रेज़ी इतिहास की सब श्रेष्ठ और उत्तम बातों के जीवन में बुनी हुई है; कि यह ब्रिटेन का राष्ट्रीय महाकाव्य बन गई है, और जॉन ओ' ग्रोट्स होम से लेकर लैंड्स एण्ड तक कुलीन और साधारण जन को उतनी ही परिचित है जितने दान्ते और तासो कभी इतालवियों को थे; कि यह सर्वोत्तम और विशुद्ध अंग्रेज़ी में लिखी गई है, और केवल साहित्यिक रूप की उत्कृष्ट सुन्दरताओं से भरपूर है; और अन्त में यह कि यह उस साधारण से साधारण किसान को भी, जिसने कभी अपना गाँव नहीं छोड़ा, अन्य देशों और अन्य सभ्यताओं से, और संसार की सबसे प्राचीन जातियों की अन्तिम सीमाओं तक फैले एक महान अतीत से, अनजान नहीं रहने देती। और किस पुस्तक के अध्ययन से बालक इतने मानवीय बनाए जा सकते, और इतना अनुभव कर सकते कि उस विशाल ऐतिहासिक जुलूस की प्रत्येक आकृति, उन्हीं के समान, दो अनन्तताओं के बीच के अन्तराल में केवल एक क्षणिक स्थान भरती है, और भलाई करने तथा बुराई से घृणा करने के अपने प्रयास के अनुसार सब काल का आशीर्वाद या शाप पाती है, ठीक जैसे वे भी अपने काम का प्रतिफल कमा रहे हैं?"—स्कूल बोर्डों पर प्रोफेसर हक्सले (हक्सले की समीक्षाएँ और निबन्ध, पृ. 51)।

3 "बाइबल राज्यों में सच्ची देशभक्ति और राजभक्ति का सोता है; यह सीनेटों, मंत्रणा-सभाओं और न्यायालयों में सच्ची बुद्धि, खरी नीति और न्यायशीलता का स्रोत है; यह सच्चे अनुशासन और आज्ञापालन का, तथा सेनाओं और जहाज़ी बेड़ों में, रणभूमि में और विशाल समुद्र पर सब शौर्य और वीरता का सोता है; यह व्यापार और वाणिज्य में, बाज़ारों और दुकानों में, बैंकों और मंडियों में, मनुष्यों के सार्वजनिक स्थानों में और हृदय के गुप्त मौन में सब सच्चाई और खरेपन का मूल है; यह परिवारों और घरानों में सब प्रेम और शान्ति, सुख, चैन और आनन्द का शुद्ध और निष्कलंक सोता है। जहाँ कहीं इसका ठीक रीति से पालन होता है, वहाँ यह संसार के रेगिस्तान को आनन्दित करके गुलाब के समान फुलवाता है।"—वर्ड्सवर्थ, प्रेरणा पर, पृ. 113।

4 "यहूदी साहित्य की छोटी सी नौका अब भी काल की लहरों के ऊपर तैर रही है, जबकि विशाल पूर्वी साम्राज्यों के, और यहूदिया के आसपास के छोटे राज्यों के भी, डूबे हुए अभिलेखागारों के केवल टुकड़े ही कभी-कभी हमारे दूर के तटों पर आ पड़ते हैं।"—रॉजर्स, बाइबल की अलौकिक उत्पत्ति पर, पृ. 311।

5 "हम दृढ़ता से कहते हैं कि बाइबल परमेश्वर का वचन है, और वह मनुष्य की दुर्बलताओं से कलंकित नहीं है। हम कुछ लोगों के समान यह नहीं मानते कि बाइबल एक खलिहान के समान है जिस पर गेहूँ और भूसा मिले-जुले पड़े हैं, और पाठक पर छोड़ दिया गया है कि वह अपनी बुद्धि के सूप और छलनी से गेहूँ को भूसे से फटक कर अलग करे।"—वर्ड्सवर्थ, "प्रेरणा" पर (पृ. 11)।

6 इस बात के प्रमाण में पदों की संख्या बढ़ाना सरल होगा। मैं केवल इन्हीं का उल्लेख करूँगा: इब्रानियों 2:8; 3:7-19; 4:2-11; 12:27।

7 "पवित्रशास्त्र की भाषा अनिवार्यतः मनुष्य की बौद्धिक उन्नति की साधारण अवस्था के अनुकूल है, जिसमें यह नहीं माना जाता कि वह विज्ञान से सम्पन्न है। इसीलिए पवित्रशास्त्र में प्रयुक्त वाक्यांश ठीक वैसे ही हैं जिन्हें विज्ञान शीघ्र ही मनुष्य को अशुद्ध मानना सिखा देता है। फिर भी वे इस कारण अपने प्रयोजन के लिए कम उपयुक्त नहीं हैं; क्योंकि यदि ज्ञान की अधिक उन्नत अवस्था के अनुकूल शब्द प्रयोग किए जाते, तो वे उन लोगों के लिए बोधगम्य न होते जिनसे पवित्रशास्त्र पहले-पहल कहा गया था।"—ह्वीवेल, आगमनात्मक विज्ञान का दर्शन, भाग 1, पृ. 636।

हमारी आत्माएँ

यदि मनुष्य सारे जगत को प्राप्त करे, और अपने प्राण की हानि उठाए, तो उसे क्या लाभ होगा?" मरकुस 8:36

हमारे प्रभु यीशु मसीह का यह वचन, जो इस पृष्ठ के शीर्ष पर है, तुरही की ध्वनि के समान हमारे कानों में गूँजना चाहिए। यह हमारे सबसे ऊँचे और उत्तम हितों से सम्बन्ध रखता है। यह हमारी आत्माओं से सम्बन्ध रखता है।

पवित्रशास्त्र के इन शब्दों में कैसा गम्भीर प्रश्न है! ये हमारे सामने गणना के लिए कितना बड़ा लाभ-हानि का योग रखते हैं! वह लेखाकार कहाँ है जो इसका हिसाब लगा सके? वह चतुर गणितज्ञ कहाँ है जो इस योग से हार न मान जाए? "यदि मनुष्य सारे जगत को प्राप्त करे, और अपने प्राण की हानि उठाए, तो उसे क्या लाभ होगा?"

मैं प्रभु यीशु ने इस खंड में जो प्रश्न पूछा है, उसे दृढ़ करने और समझाने के लिए कुछ सीधी-सादी बातें कहना चाहता हूँ। जो कोई यह पुस्तक पढ़े, उन सब से मैं गम्भीर ध्यान देने का निवेदन करता हूँ। जो कोई इसे हाथ में ले, वह अमर आत्मा के मूल्य को उससे अधिक गहराई से अनुभव करे जितना उसने पहले कभी किया हो! अपनी आत्माओं का सच्चा मूल्य जान लेना स्वर्ग की ओर पहला कदम है। मेरी पहली बात यह है—

I. हम में से प्रत्येक की एक अमर आत्मा है।

मुझे अपने लेख का आरम्भ इन शब्दों से करने में लज्जा नहीं। मैं कह सकता हूँ कि कुछ पाठकों को ये अनोखे और मूर्खतापूर्ण लगेंगे। मैं कह सकता हूँ कि कुछ लोग पुकार उठेंगे, "ऐसी बातें कौन नहीं जानता? इसमें कौन कभी सन्देह करता है कि हमारी आत्माएँ हैं?" परन्तु मैं यह नहीं भूल सकता कि संसार इन दिनों अपना ध्यान भौतिक वस्तुओं पर अत्यधिक सीमा तक लगाए हुए है। हम उन्नति के युग में जीते हैं—भाप के इंजनों और मशीनों का, गमनागमन और आविष्कारों का युग। हम ऐसे युग में जीते हैं जब जनसमूह बढ़ती हुई मात्रा में सांसारिक वस्तुओं में डूबा जा रहा है—रेलमार्गों में, गोदियों में, खानों में, वाणिज्य और व्यापार में, बैंकों और दुकानों में, कपास और अन्न में, लोहे और सोने में। हम ऐसे युग में जीते हैं जब समय की वस्तुओं पर एक झूठी चमक है, और अनन्तकाल की वस्तुओं पर घना कोहरा छाया है। ऐसे युग में मसीह के सेवकों का यह परम कर्तव्य है कि वे मूल सिद्धान्तों की ओर लौट आएँ। हम पर आवश्यकता लादी गई है। यदि हम आत्मा के विषय में अपने प्रभु का प्रश्न मनुष्यों के हृदय पर न बैठाएँ तो हम पर हाय! यदि हम ऊँचे स्वर से न पुकारें, "यही वर्तमान संसार सब कुछ नहीं है। जो जीवन हम अब शरीर में जी रहे हैं वही एकमात्र जीवन नहीं है। एक आनेवाला जीवन है। हमारी आत्माएँ हैं!" तो हम पर हाय!

आओ, हम इस बात को एक महान सत्य के रूप में अपने मन में बैठा लें कि हम सब के हृदय के भीतर कुछ ऐसा है जो कभी नहीं मरेगा। हमारी यह देह, जो हमारे इतने विचारों और समय को ले लेती है, कि इसे गर्म रखें, पहनाएँ, खिलाएँ और आराम दें—यह देह अकेली पूरा मनुष्य नहीं है। यह तो एक महान किराएदार का निवास-स्थान मात्र है, और वह किराएदार अमर आत्मा है! जो मृत्यु हम में से हर एक को एक दिन मरनी है, वह मनुष्य का अन्त नहीं कर देती। जब अन्तिम साँस ली जा चुकी हो, और चिकित्सक की अन्तिम भेंट हो चुकी हो—जब ताबूत में कीलें ठोक दी गई हों, और अन्तिम संस्कार की तैयारियाँ हो रही हों—जब कब्र पर "मिट्टी से मिट्टी और धूल से धूल" का वचन कह दिया गया हो—जब संसार में हमारे स्थान को किसी और ने भर लिया हो, और समाज में हमारी अनुपस्थिति से बनी रिक्ति का किसी को ध्यान भी न रहे—तब भी सब कुछ समाप्त नहीं हो जाता! मनुष्य की आत्मा तब भी जीवित रहती है! हर एक के भीतर एक अमर आत्मा है!

मैं इसे प्रमाणित करने में नहीं रुकता। यह केवल समय की बर्बादी होगी। सब मनुष्यों में एक विवेक है, जो हज़ार तात्त्विक तर्कों के बराबर है। भीतर एक आवाज़ है, जो कभी-कभी ऊँचे स्वर में बोलती है, और सुनी जाकर रहती है—एक ऐसी आवाज़ जो हमें बताती है, चाहे हम चाहें या न चाहें, कि हम में से हर एक के पास एक अमर आत्मा है। तो क्या हुआ यदि हम अपनी आत्माओं को देख नहीं सकते? क्या संसार में ऐसी लाखों वस्तुएँ नहीं हैं जिन्हें हम खुली आँखों से नहीं देख सकते? जिसने कभी दूरबीन या सूक्ष्मदर्शी से देखा है, वह कौन इसमें सन्देह कर सकता है?

तो क्या हुआ यदि हम अपनी आत्माओं को देख नहीं सकते? हम उन्हें अनुभव तो कर सकते हैं! जब हम बीमारी की खाट पर अकेले होते हैं, और संसार बाहर छूट गया होता है—जब हम किसी मित्र की मृत्यु-शय्या के पास जागते हैं—जब हम अपने प्रियजनों को कब्र में उतारे जाते देखते हैं—ऐसे समयों में, कौन उन भावनाओं को नहीं जानता जो मनुष्य के मन में उमड़ आती हैं? कौन नहीं जानता कि ऐसी घड़ियों में हृदय में कुछ उठता है, जो हमें बताता है कि आने वाला एक जीवन है, और ऊँचे से ऊँचे से लेकर नीचे से नीचे तक, सब के पास अमर आत्माएँ हैं?

तुम सारे संसार में घूम आओ, और हर युग और काल की साक्षी ले लो। इस विषय में तुम्हें केवल एक ही उत्तर मिलेगा। तुम्हें कुछ जातियाँ अपमानजनक अन्धविश्वास में डूबी और मूर्तियों के पीछे पागल मिलेंगी। कुछ अन्य सबसे गहरे अज्ञान में पड़ी और सच्चे परमेश्वर से बिलकुल अपरिचित मिलेंगी। परन्तु तुम्हें ऐसी कोई जाति या लोग न मिलेंगे जिनमें इस बात का कुछ बोध न हो कि आने वाला एक जीवन है। मिस्र, यूनान और रोम के उजड़े हुए मन्दिर, हमारे अपने देश के ड्रुइड अवशेष, हिन्दुस्तान के भव्य मन्दिर, अफ्रीका की जादू-टोने की पूजा, न्यूज़ीलैंड के सरदारों के अन्तिम संस्कार, उत्तरी अमेरिका के इंडियन कबीलों के ओझाओं के तम्बू—सब के सब एक ही स्वर में बोलते हैं, और एक ही कथा सुनाते हैं। मानव-हृदय की गहराई में, पतन से जमा हुए कूड़े-कचरे के नीचे, एक ऐसा लेख है जिसे कोई मिटा नहीं सकता—जो हमें बताता है कि यह संसार ही सब कुछ नहीं है, और हम में से हर एक के पास एक अमर आत्मा है!

मैं यह प्रमाणित करने में नहीं रुकता कि मनुष्यों के पास आत्माएँ हैं, परन्तु इस लेख के हर पाठक से मैं यह अवश्य कहता हूँ कि इसे सदा अपने मन के सामने रखे। सम्भव है तुम्हारा भाग्य किसी व्यस्त नगर के बीच पड़ा हो। तुम अपने चारों ओर सांसारिक वस्तुओं के लिए अन्तहीन संघर्ष देखते हो। भाग-दौड़, हलचल और कारोबार तुम्हें हर ओर से घेरे हुए हैं। मैं भली-भाँति मान सकता हूँ कि तुम्हें कभी-कभी यह सोचने का प्रलोभन होता है कि यही संसार सब कुछ है, और देह ही एकमात्र वस्तु है जिसकी चिन्ता करना योग्य है। परन्तु उस प्रलोभन का सामना करो, और उसे अपने पीछे फेंक दो। हर सुबह जब उठो, और हर रात जब लेटो, तो अपने आप से कहो, "यह संसार जाता रहेगा। यह जीवन जो मैं अब जी रहा हूँ, सब कुछ नहीं है। व्यापार, धन, सुख-विलास, वाणिज्य और लेन-देन के अतिरिक्त भी कुछ है। आने वाला एक जीवन है। मेरे पास एक अमर आत्मा है!"

मैं इस बात को प्रमाणित करने में नहीं रुकता, परन्तु हर पाठक से यह अवश्य कहता हूँ कि आत्मा रखने की गरिमा और उत्तरदायित्व को समझे। हाँ—इस तथ्य को समझो कि तुम्हारी आत्मा में वह सबसे बड़ा धन है जो परमेश्वर ने तुम्हारे हाथ में सौंपा है। जान लो कि तुम्हारी आत्मा में एक ऐसा अनमोल मोती है जिसकी तुलना में सारी सांसारिक सम्पत्ति हवा की तरह हल्की तुच्छ वस्तुएँ हैं। जो घोड़ा डर्बी या लेजर की दौड़ जीतता है, वह हज़ारों का ध्यान खींचता है—चित्रकार उसके चित्र बनाते हैं, नक्काशीकार उसे उकेरते हैं, और उसकी सफलताओं पर बड़ी-बड़ी रकमों के दाँव लगते हैं। फिर भी एक मज़दूर के परिवार का सबसे दुर्बल शिशु परमेश्वर की दृष्टि में उस घोड़े से कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण है। उस पशु का प्राण नीचे की ओर जाता है; परन्तु उस शिशु के पास एक अमर आत्मा है।

हमारी बड़ी-बड़ी प्रदर्शनियों के चित्रों को देखने प्रशंसक भीड़ें आती हैं—लोग उन्हें विस्मय से निहारते हैं, और रूबेन्स, टिशियन तथा अन्य महान चित्रकारों की "अमर कृतियों" की चर्चा आनन्द-विभोर होकर करते हैं। परन्तु इन वस्तुओं में कोई अमरता नहीं है। पृथ्वी और उसके सब काम जलाकर भस्म कर दिए जाएँगे! वह नन्हा शिशु जो किसी अटारी में रोता है, और ललित कला के विषय में कुछ नहीं जानता, उन सब चित्रों से अधिक जीवित रहेगा, क्योंकि उसके पास एक आत्मा है जो कभी नहीं मरेगी! एक समय आएगा जब पिरामिड और पार्थेनन दोनों ही चूर-चूर होकर कुछ न रहेंगे—जब विंडसर कासल और वेस्टमिंस्टर एबे गिरा दिए जाएँगे और मिट जाएँगे—जब सूर्य चमकना बन्द कर देगा, और चन्द्रमा अपना प्रकाश न देगा। परन्तु सबसे विनम्र मज़दूर की आत्मा कहीं अधिक स्थायी सार की है। वह नष्ट होते हुए ब्रह्माण्ड के विनाश से भी बच निकलेगी, और अनन्त काल तक जीवित रहेगी। मैं एक बार फिर कहता हूँ, कभी न मरने वाली आत्मा रखने के उत्तरदायित्व और गरिमा को समझो।

तुम इस संसार में निर्धन हो सकते हो—परन्तु तुम्हारे पास एक आत्मा है। तुम शरीर से रोगी और दुर्बल हो सकते हो—परन्तु तुम्हारे पास एक आत्मा है। तुम राजा, या रानी, या ड्यूक, या अर्ल न हो सकते हो—फिर भी तुम्हारे पास एक आत्मा है। आत्मा ही हम में वह भाग है जिस पर परमेश्वर मुख्य रूप से दृष्टि रखता है। आत्मा ही "मनुष्य" है। मनुष्य के भीतर जो आत्मा है, वही उसके विषय में सबसे महत्त्वपूर्ण वस्तु है।

मैं यह प्रमाणित करने के लिए नहीं रुकता कि मनुष्यों में आत्मा है, परन्तु सब मनुष्यों से यह अवश्य कहता हूँ कि वे ऐसे जीएँ मानो वे इस पर विश्वास करते हों। ऐसे जीएँ मानो आप सचमुच यह मानते हों कि हम संसार में केवल कपास कातने, अन्न उगाने और सोना जमा करने के लिए नहीं भेजे गए, परन्तु "परमेश्वर की महिमा करने और सदा उसका आनन्द लेने" के लिए भेजे गए हैं। अपनी बाइबल पढ़ें और उसकी विषय-वस्तु से परिचित हों। प्रभु को प्रार्थना में खोजें और अपना हृदय उसके सामने उँडेलें। नियमित रूप से आराधना-स्थान में जाएँ और सुसमाचार का प्रचार सुनें। और यदि कोई आपसे इसका कारण पूछे—यदि पत्नी, या बच्चा, या साथी कहे, "तुम यह क्या कर रहे हो?"—तो उन्हें निडर होकर, पुरुष की भाँति उत्तर दें, "मैं ये काम इसलिए करता हूँ क्योंकि मेरी एक आत्मा है।" मेरी दूसरी बात यह है–

II. कोई भी मनुष्य अपनी आत्मा को खो सकता है।

मेरे विषय का यह भाग दुःखद है। परन्तु यह ऐसा है जिसे मैं छोड़ने का साहस नहीं कर सकता, छोड़ ही नहीं सकता। जो लोग केवल शान्ति की भविष्यद्वाणी करते हैं और मनुष्यों से यह भयानक सत्य छिपाए रखते हैं कि वे अपनी आत्मा को खो सकते हैं, उनके साथ मेरी कोई सहानुभूति नहीं है। मैं उन पुराने ढंग के सेवकों में से हूँ जो सारी बाइबल पर और जो कुछ उसमें लिखा है उस सब पर विश्वास करते हैं। उस मीठी-मीठी बातों वाले धर्मविज्ञान की मुझे पवित्रशास्त्र में कोई नींव नहीं मिलती, जो आजकल बहुतों को भाता है और जिसके अनुसार अन्त में सब लोग स्वर्ग पहुँच जाएँगे। मैं मानता हूँ कि एक सचमुच का शैतान है। मैं मानता हूँ कि एक सचमुच का नरक है। मैं मानता हूँ कि मनुष्यों से यह छिपाए रखना कि वे खो सकते हैं, प्रेम नहीं है। प्रेम!—क्या मैं इसे प्रेम कहूँ? यदि आप अपने भाई को विष पीते देखें, तो क्या आप चुप रहेंगे? प्रेम!—क्या मैं इसे प्रेम कहूँ? यदि आप किसी अन्धे को खड्ड की ओर डगमगाते हुए जाते देखें, तो क्या आप चिल्लाकर नहीं कहेंगे, "रुक जा!" प्रेम की ऐसी झूठी धारणाएँ दूर हों! उस धन्य अनुग्रह का नाम झूठे अर्थ में लेकर उसकी निन्दा न करें। मनुष्यों के सामने पूरा सत्य रखना ही सबसे ऊँचा प्रेम है। जब वे संकट में हों तब उन्हें साफ़-साफ़ चेतावनी देना ही सच्ची दयालुता है। उनके मन में यह बात बैठा देना प्रेम है कि वे अपनी आत्मा को नरक में सदा के लिए खो सकते हैं।

मनुष्य में बुराई करने की अद्भुत सामर्थ्य है। भलाई के सब कामों में हम चाहे कितने ही निर्बल हों, अपनी ही हानि करने की हमारी सामर्थ्य बहुत बड़ी है। हे मेरे भाई, आप अपनी उस आत्मा को बचा नहीं सकते—यह स्मरण रखें! आप अपने आप परमेश्वर से मेल नहीं कर सकते। आप एक भी पाप को मिटा नहीं सकते। परमेश्वर की पुस्तक में आपके विरुद्ध जो काले लेख हैं, उनमें से एक को भी आप मिटा नहीं सकते। आप अपना हृदय नहीं बदल सकते। परन्तु एक काम आप कर सकते हैं—आप अपनी आत्मा को खो सकते हैं!

परन्तु बात यहीं समाप्त नहीं होती। हम सब न केवल अपनी आत्मा को खो सकते हैं, वरन् हम सब ऐसा करने के निकट संकट में हैं! पाप में जन्मे और क्रोध की सन्तान होने के कारण, हममें अपनी आत्मा के उद्धार की कोई स्वाभाविक इच्छा नहीं है। निर्बल, भ्रष्ट और पाप की ओर झुके हुए हम "बुरे को भला और भले को बुरा" कहते हैं। अन्धकार में, अन्धे और अपराधों में मरे हुए होने के कारण, हमारे पास वह आँख नहीं कि अपने पाँवों के नीचे मुँह फैलाए हुए गड्ढे को देख सकें, और न हमें अपने दोष और संकट का कोई बोध है। फिर भी हमारी आत्माएँ इस सारे समय भयानक संकट में हैं!

यदि कोई रिसते हुए जहाज़ में, बिना दिशासूचक यन्त्र, बिना पानी और बिना भोजन-सामग्री के अमेरिका की यात्रा करे, तो कौन नहीं देखता कि उसके अटलांटिक पार सुरक्षित पहुँचने की बहुत कम आशा है? यदि आप कोहिनूर हीरा किसी छोटे बच्चे के हाथ में रखकर उससे कहें कि इसे टावर हिल से ब्रिस्टल तक ले जा, तो कौन नहीं समझता कि उस हीरे के यात्रा के अन्त तक सुरक्षित पहुँचने में कितना सन्देह है? फिर भी ये उस अपार संकट की धुँधली छवियाँ ही हैं जिसमें हम स्वभाव से अपनी आत्मा को खोने के कारण पड़े हैं।

परन्तु कोई पूछ सकता है, मनुष्य अपनी आत्मा को कैसे खो सकता है? इस प्रश्न के अनेक उत्तर हैं। जैसे शरीर पर आक्रमण करके उसे हानि पहुँचानेवाले अनेक रोग हैं, वैसे ही आत्मा पर आक्रमण करके उसे हानि पहुँचानेवाली अनेक बुराइयाँ हैं। फिर भी मनुष्य अपनी आत्मा को चाहे कितने ही प्रकार से खोए, उन्हें तीन सामान्य शीर्षकों में रखा जा सकता है। मुझे संक्षेप में बताने दें कि वे क्या हैं।

एक तो, आप खुले पाप में भागकर और वासनाओं तथा सुखों की सेवा करके अपनी आत्मा की हत्या कर सकते हैं। व्यभिचार और लंपटता, मतवालापन और रंगरलियाँ, बेईमानी और झूठ बोलना—ये सब नरक के छोटे रास्ते हैं। "कोई तुम्हें व्यर्थ बातों से धोखा न दे; क्योंकि इन ही कामों के कारण परमेश्वर का क्रोध आज्ञा न माननेवालों पर भड़कता है।" (इफिसियों 5:6।)

दूसरे, आप कोई झूठा धर्म अपनाकर अपनी आत्मा को विष दे सकते हैं। आप उसे मनुष्य की गढ़ी हुई परम्पराओं और रीतियों तथा विधियों के उस चक्र से नशे में डाल सकते हैं जो कभी स्वर्ग से नहीं उतरा। आप उसे उन अफ़ीमों से सुला सकते हैं जो विवेक को सुन्न कर देती हैं पर हृदय को चंगा नहीं करतीं। स्ट्रिकनीन और संखिया भी अपना काम उतनी ही प्रभावशाली रीति से कर देते हैं जितना पिस्तौल या तलवार, यद्यपि कम शोर के साथ। कोई आपको धोखा न दे। "झूठे भविष्यद्वक्ताओं से सावधान रहो।" जब मनुष्य अपनी आत्मा को अन्धे अगुवों को सौंप देते हैं, तो दोनों गड्ढे में गिरते हैं। झूठा धर्म उतना ही विनाशकारी है जितना कोई धर्म न होना!

तीसरे, आप ढिलाई और अनिश्चय से अपनी आत्मा को भूखा मारकर मार सकते हैं। आप बपतिस्मे के रजिस्टर में एक नाम लिखवाकर जीवन भर समय गँवा सकते हैं, पर मेमने की जीवन की पुस्तक में दर्ज न होकर—भक्ति का भेष तो रखते हुए, परन्तु उसकी सामर्थ्य के बिना। आप वर्ष-पर-वर्ष खिलवाड़ करते रह सकते हैं, जो भला है उसमें कोई रुचि न लेकर, दिखावटी मसीहियों की असंगतियों पर हँसकर ही सन्तुष्ट रहकर, और यह कहकर अपने को बहला सकते हैं कि मैं कट्टर या दलबन्दीवाला या धार्मिक होने का दावेदार नहीं हूँ, इसलिए अन्त में आत्मा के विषय में "सब ठीक" ही होगा। "कोई तुम्हें व्यर्थ बातों से धोखा न दे।" अनिश्चय आत्मा के लिए उतना ही विनाशकारी है जितना झूठा धर्म या कोई धर्म न होना। जीवन की धारा कभी रुक नहीं सकती। आप सोते हों या जागते, आप उसी धारा में बहते जा रहे हैं। आप तेज़ बहाव के और निकट आते जा रहे हैं। शीघ्र ही आप झरने के पार हो जाएँगे, और यदि आप बिना दृढ़ विश्वास के मरे, तो सदा के लिए निकाल फेंके जाएँगे!

तो अपनी आत्मा को खोने के मुख्य तीन ढंग ये ही हैं। क्या इसे पढ़नेवाला कोई जानता है कि वह इनमें से किस मार्ग पर चल रहा है? खोजकर देखें कि क्या मैंने आपकी ही दशा का वर्णन किया है। पता लगाएँ कि आप अपनी आत्मा को खो रहे हैं या नहीं।

परन्तु क्या एक आत्मा को नाश करने में बहुत परिश्रम करना पड़ता है? अरे नहीं! यह तो ढलान की यात्रा है। तुम्हारी ओर से कुछ भी करने की आवश्यकता नहीं है। किसी प्रयत्न की ज़रूरत नहीं है। तुम्हें बस चुपचाप बैठे रहना है, और धारा के साथ बहते जाना है, लहरों पर तैरते हुए नीचे चले जाना है, भीड़ के साथ चलते जाना है—और थोड़े ही समय में दया का समय सदा के लिए समाप्त हो जाएगा! "चौड़ा है वह फाटक जो विनाश की ओर ले जाता है!"

परन्तु क्या बहुत से लोग अपनी आत्मा को खो रहे हैं? हाँ, निश्चय ही बहुत से हैं! यदि तुम इस प्रश्न का सच्चा उत्तर पाना चाहते हो, तो कब्र के पत्थरों पर लिखे लेखों और समाधि-लेखों को मत देखो! जैसा कि डॉ. वॉट्स कहते हैं, वे "चापलूसी करते और झूठ बोलते हैं।"

मरते ही सब मनुष्य आदरणीय और "भले लोग" समझे जाने लगते हैं। परन्तु परमेश्वर के वचन को देखो, और ध्यान से देखो कि वह क्या कहता है। प्रभु यीशु मसीह घोषणा करता है, "क्योंकि सकेत है वह फाटक और सकरा है वह मार्ग जो जीवन को पहुँचाता है, और थोड़े हैं जो उसे पाते हैं—चौड़ा है वह मार्ग जो विनाश को पहुँचाता है, और बहुत हैं जो उसमें से प्रवेश करते हैं।" (मत्ती 7:13, 14।)

परन्तु हमारी आत्मा के खो जाने का उत्तरदायी कौन है? हमारे सिवा और कोई नहीं! हमारा लहू हमारे ही सिर पर होगा। दोष हमारे ही द्वार पर रहेगा। अन्तिम दिन, जब हम बड़े श्वेत सिंहासन के सामने खड़े होंगे और पुस्तकें खोली जाएँगी, तब हमारे पास कहने को कुछ भी न होगा। जब राजा अपने अतिथियों को देखने भीतर आएगा, और कहेगा, "हे मित्र, तू विवाह का वस्त्र पहने बिना यहाँ क्योंकर आ गया?" तब हम निरुत्तर हो जाएँगे। अपनी आत्मा के खो जाने के लिए हमारे पास कोई बहाना न होगा।

परन्तु खोई हुई आत्मा कहाँ जाती है? इस प्रश्न का केवल एक ही गम्भीर उत्तर है। जाने के लिए केवल एक ही स्थान है, और वह नरक है। सर्वनाश जैसी कोई बात नहीं है। खोई हुई आत्मा उस स्थान को जाती है जहाँ कीड़ा नहीं मरता और आग नहीं बुझती—जहाँ अन्धकार और घोर अन्धकार है, दुर्दशा और निराशा सदा के लिए है। क्योंकि वह स्वर्ग के योग्य नहीं है, इसलिए वह नरक को जाती है—जो एकमात्र स्थान है जिसके वह योग्य है। "दुष्ट अधोलोक में लौट जाएँगे, और वे सब जातियाँ भी जो परमेश्वर को भूल जाती हैं।" "उन बातों का अन्त तो मृत्यु है!" (रोमियों 6:21।)

मैं साफ़ कह दूँ कि हम सेवक उन बहुतों के विषय में भय से भरे हैं जो अपने को मसीही कहते और मानते हैं। हमें डर है कि कहीं वे अन्त में अपनी बहुमूल्य आत्माओं को खो न दें। हमें डर है कि वह महाठग शैतान उन्हें उद्धार से धोखा देकर अपनी इच्छा के अनुसार बन्दी न बना ले। हमें डर है कि वे अनन्तकाल में जागकर अपने आप को सदा के लिए खोया हुआ न पाएँ! हम इसलिए डरते हैं कि हम देखते हैं कि इतने लोग पापमय आदतों में जी रहे हैं, इतने लोग उन रीतियों और विधियों में टिके हैं जिनकी आज्ञा परमेश्वर ने कभी दी ही नहीं, इतने लोग सारे धर्म को हल्के में लेते हैं—संक्षेप में, इतने लोग अपनी ही आत्माओं का नाश कर रहे हैं! हम यह सब देखते हैं, और भयभीत होते हैं।

ठीक इसीलिए कि मैं अनुभव करता हूँ कि आत्माएँ संकट में हैं, मैं यह लेख लिखता हूँ और लोगों को इसे पढ़ने का निमन्त्रण देता हूँ। यदि मैं समझता कि नरक जैसा कोई स्थान नहीं है तो मैं ऐसा न लिखता। यदि मैं समझता कि स्वाभाविक रूप से सब लोग अन्त में स्वर्ग पहुँच ही जाएँगे, तो मैं चुप रहता और उन्हें अकेला छोड़ देता। पर मैं ऐसा करने का साहस नहीं कर सकता। मैं आगे संकट देखता हूँ, और मैं सच्चे मन से हर मनुष्य को चेतावनी देना चाहता हूँ कि आनेवाले क्रोध से भाग निकले। मैं जहाज़ के डूबने का खतरा देखता हूँ, और मैं एक प्रकाश-स्तम्भ जलाकर हर मनुष्य से विनती करना चाहता हूँ कि वह सुरक्षा के बन्दरगाह की खोज करे। मेरी चेतावनी को तुच्छ मत जानो। अपने ही मन को जाँचो—पता लगाओ कि तुम खोए जाने के मार्ग पर हो या उद्धार पाने के मार्ग पर। खोजकर देखो कि तुम्हारे और परमेश्वर के बीच कैसा सम्बन्ध है—अपनी ही आत्मा को खो देने की घोर मूर्खता मत करो। हम बड़ी परीक्षा के युग में जी रहे हैं। शैतान इधर-उधर घूम रहा है और बहुत व्यस्त है। रात बहुत बीत चुकी है। समय थोड़ा है। अपनी आत्मा को मत खोओ!

III. किसी भी मनुष्य की आत्मा की हानि सबसे भारी हानि है जो वह उठा सकता है।

मैं अनुभव करता हूँ कि मैं इस बात को वैसे प्रस्तुत करने में असमर्थ हूँ जैसा करना चाहिए। कोई भी जीवित मनुष्य आत्मा की हानि की पूरी सीमा को नहीं दिखा सकता। कोई भी उस हानि का सच्चा चित्र नहीं खींच सकता। हम इसे तब तक कभी नहीं समझेंगे जब तक हम मृत्यु की छाया की तराई से होकर नहीं निकल जाते और अनन्त जगत में जाग नहीं उठते! उसके पहले हम कभी नहीं जानेंगे कि एक अमर आत्मा का मूल्य क्या है।

मैं कह सकता हूँ कि इस वर्तमान जीवन में कोई भी वस्तु आत्मा की हानि की पूर्ति नहीं कर सकती। तुम्हारे पास संसार की सारी धन-सम्पत्ति हो सकती है—ऑस्ट्रेलिया और कैलिफ़ोर्निया का सारा सोना, और वे सारे सम्मान जो तुम्हारा देश तुम्हें दे सकता है। तुम आधे महाद्वीप के स्वामी हो सकते हो। तुम ऐसे हो सकते हो जिसे राजा आदर देने में प्रसन्न हों, और जाति-जाति के लोग प्रशंसा से देखें। परन्तु इस सारे समय में, यदि तुम अपनी आत्मा को खो रहे हो, तो तुम परमेश्वर की दृष्टि में कंगाल हो। तुम्हारे सम्मान केवल कुछ ही वर्षों के हैं। तुम्हारी सम्पत्ति को अन्त में छोड़ना ही पड़ेगा। तुम नंगे संसार में आए थे, और नंगे ही जाओगे। यदि तुम्हारी आत्मा का उद्धार नहीं हुआ है, तो जीवन में तुम्हारा मन न हलका होगा, न तुम्हारा विवेक प्रसन्न रहेगा। अपने सारे धन या विशाल भूमि में से तुम मरने पर अपने साथ कुछ भी नहीं ले जाओगे। जब जीवन समाप्त होगा, तब तुम्हारी उस देह को ढाँपने के लिए भूमि के कुछ ही फुट काफ़ी होंगे। और तब, यदि तुम्हारी आत्मा खो गई, तो तुम अपने आप को सारे अनन्तकाल के लिए कंगाल पाओगे। सचमुच यदि मनुष्य सारा जगत प्राप्त करे और अपनी आत्मा को खो दे, तो उसे कुछ लाभ नहीं होगा।

मैं कह सकता हूँ कि जब आत्मा खो जाती है, तो यह ऐसी हानि है जिसकी पूर्ति नहीं हो सकती। एक बार खो गई तो सदा के लिए खो गई। सम्पत्ति की हानि की पूर्ति इस संसार में हो सकती है। स्वास्थ्य और चरित्र की हानि कभी-कभी सुधारी जा सकती है। परन्तु जो मनुष्य एक बार अन्तिम साँस ले चुका, वह अपनी खोई हुई आत्मा को कभी वापस नहीं पा सकता। पवित्रशास्त्र हमें कब्र के पार किसी शुद्धिकरण-स्थान (पर्गेटरी) की बात नहीं बताता। पवित्रशास्त्र हमें सिखाता है कि एक बार खो जाने पर हम सदा के लिए खो जाते हैं! सचमुच मनुष्य पाएगा कि उसके पास देने को कुछ भी नहीं जिससे वह अपनी आत्मा को मोल लेकर छुड़ा सके।

परन्तु मैं गहराई से अनुभव करता हूँ कि इस प्रकार के तर्क विषय के स्तर से बहुत नीचे रह जाते हैं। वह समय अभी नहीं आया है जब हम पूरी तरह समझेंगे कि आत्मा का मूल्य क्या है। हमें बहुत आगे की ओर देखना होगा। जिस वस्तु पर हम विचार कर रहे हैं उसका सही मूल्यांकन करने से पहले हमें कल्पना में अपने आप को उस स्थिति से भिन्न स्थिति में रखना होगा जिसमें हम अभी हैं। अन्धा मनुष्य सुन्दर दृश्यों को नहीं समझ सकता। बहरा मनुष्य उत्तम संगीत की सराहना नहीं कर सकता। जीवित मनुष्य आनेवाले जगत के अद्भुत महत्त्व को पूरी तरह नहीं समझ सकता।

क्या इस लेख का कोई पाठक आत्मा के मूल्य का धुँधला-सा भी अनुमान लगाना चाहता है? तो जाकर उसे मरते हुए लोगों की राय से नापे। अन्तिम घड़ी की गम्भीरता चीज़ों के सारे दिखावे और बनावट को उतार फेंकती है, और मनुष्य को वे वैसी ही दिखाई देती हैं जैसी वे वास्तव में हैं। तब मनुष्य अपनी आत्मा के लिए क्या न करेंगे? एक मसीही सेवक के रूप में मैंने इसमें से कुछ देखा है। मृत्यु की घड़ी में शायद ही कभी, बहुत ही कम, मैंने लोगों को आनेवाले संसार के विषय में लापरवाह, बेपरवाह और उदासीन पाया है। जो मनुष्य अपने हँसमुख साथियों को अच्छे-अच्छे किस्से सुना सकता और अच्छे-अच्छे गीत गा सकता है, वह भी बहुत गम्भीर हो जाता है जब उसे अनुभव होने लगता है कि प्राण उसकी देह को छोड़ रहे हैं। डींग हाँकनेवाले अविश्वासी ने ऐसे समय में अक्सर अपना अविश्वास त्याग दिया है। पेन और वोल्टेयर जैसे लोगों ने भी बार-बार दिखाया है कि जब कब्र दिखाई देने लगती है तो उनका बखाना हुआ दर्शन-शास्त्र ढह जाता है। मुझे यह मत बताओ कि मनुष्य भरे-पूरे स्वास्थ्य में आत्मा के विषय में क्या सोचता है; मुझे यह बताओ कि जब संसार उसके पाँव तले से खिसक रहा हो, और मृत्यु, न्याय और अनन्तकाल सामने खड़े दिखाई दे रहे हों, तब वह क्या सोचता है। तब हमारे अस्तित्व की महान वास्तविकताएँ ध्यान की माँग करेंगी, और उन पर विचार करना ही पड़ेगा। समय के प्रकाश में आत्मा का मूल्य एक बात है, परन्तु अनन्तकाल के प्रकाश में देखने पर वह बिलकुल दूसरी बात है। जीवित मनुष्य आत्मा का मूल्य कभी इतनी अच्छी तरह नहीं जानता जितना तब जब वह मर रहा होता है और संसार को और थामे नहीं रख सकता।

क्या कोई आत्मा के मूल्य का और भी स्पष्ट अनुमान लगाना चाहता है? तो जाकर उसे मरे हुओं की राय से नापे। लूका के सोलहवें अध्याय में धनी मनुष्य और लाज़र का दृष्टान्त पढ़ो। जब धनी मनुष्य नरक में पीड़ाओं के बीच जागा, तो उसने अब्राहम से क्या कहा? "तू लाज़र को मेरे पिता के घर भेज, क्योंकि मेरे पाँच भाई हैं; वह उनके सामने इन बातों की गवाही दे, ऐसा न हो कि वे भी इस पीड़ा की जगह में आएँ।" उस धनी मनुष्य ने पृथ्वी पर जीते-जी शायद दूसरों की आत्माओं के विषय में कम ही या कुछ भी नहीं सोचा होगा। मरने के बाद, पीड़ा की जगह में, वह चीज़ों को उनके सच्चे रंग में देखता है। तब उसे अपने भाइयों का ध्यान आता है और वह उनके उद्धार की चिन्ता करने लगता है। तब वह पुकारता है, "तू लाज़र को मेरे पिता के घर भेज। मेरे पाँच भाई हैं। वह उनके सामने गवाही दे।" यदि वह अद्भुत दृष्टान्त और कुछ न करता, तो भी यह तो सिखाता कि अगले संसार में जागने पर मनुष्य क्या सोचते हैं। वह आनेवाले संसार पर पड़े परदे का एक कोना उठाता है, और हमें झलक देता है कि मरे हुए लोग आत्मा के मूल्य के विषय में क्या सोचते हैं।

क्या कोई आत्मा के मूल्य का सबसे स्पष्ट अनुमान पाना चाहता है? तो जाकर उसे उस दाम से नापे जो 1800 वर्ष पहले उसके लिए चुकाया गया। कितना विशाल और अनगिनत दाम चुकाया गया! छुटकारे का प्रबन्ध करने के लिए न सोना, न चाँदी, न हीरे पर्याप्त पाए गए, स्वर्ग का कोई स्वर्गदूत भी फिरौती नहीं ला सका। केवल मसीह का लहू, केवल परमेश्वर के अनन्त पुत्र की क्रूस पर मृत्यु ही आत्मा को नरक से छुड़ाने के लिए पर्याप्त पाई गई। मन ही मन कलवरी पर जाओ और विचार करो कि जब प्रभु यीशु मरा तो वहाँ क्या हुआ। धन्य उद्धारकर्ता को क्रूस पर दुःख उठाते देखो। ध्यान दो कि वहाँ क्या होता है जब

वह मरता है। देखो कि सारी पृथ्वी पर तीन घंटे तक अन्धकार कैसे छाया रहा। पृथ्वी काँप उठती है। चट्टानें फट जाती हैं। कब्रें खुल जाती हैं। उसके अन्तिम वचन सुनो, "हे मेरे परमेश्वर, हे मेरे परमेश्वर, तूने मुझे क्यों छोड़ दिया?" फिर उस सारी अद्भुत घटना में कुछ ऐसा देखो जो तुम्हें आत्मा के मूल्य का अनुमान दे सके। उस भयानक दृश्य में हम वह एकमात्र दाम चुकाया जाता देखते हैं जो मनुष्यों की आत्माओं को छुड़ाने के लिए पर्याप्त पाया गया।

यदि हम अभी नहीं समझते, तो किसी दिन हम सब आत्मा का मूल्य समझ जाएँगे। परमेश्वर करे कि इस लेख को पढ़नेवाला कोई भी इसे बहुत देर से न समझे। पागलखाना एक दयनीय दृश्य है। उस उदास इमारत में किसी ऐसे मनुष्य को देखकर, जिसके पास कभी राजसी धन-सम्पत्ति थी पर जिसने उसे उड़ा दिया और नशे की लत से अपने को निराशाजनक पागलपन तक पहुँचा लिया, हृदय कचोट उठता है। जहाज़ का डूबना एक दयनीय दृश्य है। किसी वीर जलयान को, जो कभी "जीवित प्राणी के समान लहरों पर चलता था," चट्टानी किनारे पर अटका हुआ, और उसके चारों ओर तट पर डूबे हुए नाविक और बिखरा हुआ माल पड़ा देखकर मन उदास हो जाता है। परन्तु आँख को प्रभावित करनेवाले और हृदय को दुखानेवाले सब दृश्यों में मैं ऐसा कोई नहीं जानता जो उस मनुष्य के दृश्य जितना दयनीय हो जो अपनी ही आत्मा का नाश कर रहा हो। कोई आश्चर्य नहीं कि जब यीशु अन्तिम बार यरूशलेम के निकट आया तो वह रोया। लिखा है कि "उसने नगर को देखा और उस पर रोया!" (लूका 19:41)। वह आत्माओं का मूल्य जानता था, चाहे शास्त्री और फरीसी न जानते हों। उसके उन आँसुओं से, और कुछ न सही, हम मनुष्य की आत्मा का मूल्य, और उस हानि की मात्रा सीख सकते हैं जो उसे उठानी पड़ेगी यदि वह आत्मा खो जाए।

इस लेख के हर पाठक से मेरा आग्रह है, जब तक यह "आज" कहलाता है, अपनी आँखें खोलकर अपनी आत्मा का मूल्य देखो। आत्मा के खो जाने की भयावहता का बोध करने के लिए जागो। उस महान धन का सच्चा मोल जानने का यत्न करो जो तुम्हें सौंपा गया है। एक दिन सब वस्तुओं का मूल्य बहुत बदल जाएगा। वह घड़ी आती है जब धन रद्दी कागज़ से अधिक मूल्य का न होगा, और सोना और हीरे गलियों की धूल के समान होंगे; जब कुलीन का महल और किसान की झोपड़ी दोनों समान रूप से भूमि पर गिर पड़ेंगे; जब सब शेयर और कोष बिकाऊ न रहेंगे; और अनुग्रह, विश्वास और अच्छी आशा को फिर कम न आँका जाएगा और तुच्छ न जाना जाएगा। उस घड़ी में तुम ऐसे ढंग से, जैसे पहले कभी नहीं जाना, अमर आत्मा का मूल्य जान लोगे। तब आत्मा की हानि सबसे बड़ी हानि और आत्मा का लाभ सबसे बड़ा लाभ दिखाई देगा। आत्मा का मूल्य अभी जानने का यत्न करो। उस मिस्री रानी के समान मत बनो, जिसने मूर्खतापूर्ण दिखावे में एक बहुमूल्य मोती लिया, उसे तेज़ाब में घोला और पी गई। उसके समान उस "बहुमूल्य मोती" को मत फेंको जो परमेश्वर ने तुम्हें सौंपा है। एक बार खो जाने पर कोई हानि आत्मा की हानि की बराबरी नहीं कर सकती।

IV. किसी भी मनुष्य की आत्मा का उद्धार हो सकता है।

मैं परमेश्वर का धन्यवाद करता हूँ कि मसीह का सुसमाचार मुझे इस आनन्द के समाचार की घोषणा करने योग्य बनाता है, और उसे इन पन्नों के प्रत्येक पाठक के लिये स्वतन्त्रता से और बिना किसी शर्त के सुनाने योग्य बनाता है। मैं परमेश्वर का धन्यवाद करता हूँ कि इतनी गम्भीर बातें कहने के बाद भी मैं शान्ति के सन्देश के साथ समाप्त कर सकता हूँ। मैं यह भयानक उत्तरदायित्व नहीं उठा सकता था कि मनुष्यों से कहूँ कि हर एक की एक आत्मा है, कि कोई भी अपनी आत्मा खो सकता है, और आत्मा की हानि ऐसी हानि है जिसकी भरपाई कोई वस्तु नहीं कर सकती — यदि मैं यह भी घोषणा न कर पाता कि किसी भी मनुष्य की आत्मा का उद्धार हो सकता है।

मुझे लगता है कि इस पत्र के कुछ पाठकों को यह घोषणा चौंकानेवाली लगे। मुझे वह समय स्मरण है जब यह मुझे भी चौंकानेवाली लगती। परन्तु मुझे दृढ़ विश्वास है कि यह न कम और न अधिक, सनातन सुसमाचार की ही वाणी है, और मैं इसे उन सब पर प्रकट करने में लज्जित नहीं हूँ जिनके सुनने के कान हैं। मैं निडर होकर कहता हूँ कि सुसमाचार में सबसे बड़े पापी के लिये भी उद्धार है। मैं पूरे भरोसे से कहता हूँ कि किसी भी और प्रत्येक मनुष्य की आत्मा का उद्धार हो सकता है!

मैं जानता हूँ कि हम सब स्वभाव से पापी हैं — गिरे हुए, दोषी, भ्रष्ट, पाप से ढके हुए। मैं जानता हूँ कि जिस परमेश्वर से हमारा काम है वह परम पवित्र है; उसकी आँखें ऐसी शुद्ध हैं कि अधर्म को देख नहीं सकतीं, और वह बुराई पर दृष्टि नहीं कर सकता। मैं यह भी जानता हूँ कि जिस संसार में हमारा भाग्य डाला गया है, वह धर्म के लिये कठिन संसार है। यह चिन्ताओं और कष्टों, अविश्वास और अशुद्धता, और परमेश्वर के प्रति विरोध और घृणा से भरा संसार है। यह ऐसा संसार है जिसमें सच्चा धर्म किसी परदेशी पौधे के समान है — ऐसा संसार जिसका वातावरण धर्म को मुरझा देता है। फिर भी, इस सब के होते हुए भी, यह संसार चाहे जितना कठिन हो, परमेश्वर चाहे जितना पवित्र हो, और हम स्वभाव से चाहे जितने पापी हों — मैं कहता हूँ कि किसी भी और प्रत्येक मनुष्य का उद्धार हो सकता है। कोई भी पुरुष या स्त्री पाप के दोष, पाप की शक्ति और पाप के परिणामों से बचाया जा सकता है, और अन्त में परमेश्वर के दाहिने हाथ अनन्त महिमा में पाया जा सकता है!

मुझे लगता है कि कोई पाठक कह उठे, "ये बातें कैसे हो सकती हैं?" आपका यह प्रश्न पूछना आश्चर्य की बात नहीं। यह वह बड़ी गाँठ है जिसे अन्यजाति के दार्शनिक कभी न खोल सके। यह वह समस्या है जिसे यूनान और रोम के सारे ज्ञानी हल न कर सके। यह वह प्रश्न है जिसका उत्तर प्रभु यीशु मसीह के सुसमाचार के सिवा कोई नहीं दे सकता। सुसमाचार का वही उत्तर मैं अब आपके सामने रखना चाहता हूँ। इसलिये मैं पूरे भरोसे से घोषणा करता हूँ कि किसी भी मनुष्य की आत्मा का उद्धार हो सकता है, (1) क्योंकि मसीह एक बार मर चुका है। परमेश्वर के पुत्र यीशु मसीह ने क्रूस पर मनुष्यों के पापों का प्रायश्चित करने के लिये प्राण दिये। "मसीह ने भी, अर्थात् अधर्मियों के लिये धर्मी ने, पापों के कारण एक बार दुःख उठाया, ताकि हमें परमेश्वर के पास पहुँचाए।" (1 पतरस 3:18।) मसीह ने हमारे पापों को अपनी देह पर लिये हुए क्रूस पर चढ़ना स्वीकार किया, और जो श्राप हमारे योग्य था उसे अपने सिर पर पड़ने दिया। मसीह ने अपनी मृत्यु से परमेश्वर की उस पवित्र व्यवस्था की माँग पूरी की जिसे हमने तोड़ा था। वह मृत्यु कोई साधारण मृत्यु नहीं थी — वह आत्म-त्याग का केवल एक उदाहरण नहीं थी; वह किसी शहीद की मृत्यु मात्र नहीं थी, जैसी रिडले, लैटिमर या क्रैन्मर की मृत्यु थी। मसीह की मृत्यु सारे जगत के पाप के लिये बलिदान और प्रायश्चित थी। वह मनुष्यों के सर्वशक्तिमान प्रतिनिधि, जमानतदार और स्थानापन्न की प्रतिनिधिक मृत्यु थी। उसने परमेश्वर के प्रति हमारा भारी ऋण चुका दिया। उसने सब विश्वासियों के लिये स्वर्ग का मार्ग खोल दिया। उसने सब पाप और अशुद्धता के लिये एक सोता उपलब्ध कराया। उसने परमेश्वर के लिये यह सम्भव किया कि वह धर्मी भी रहे और भक्तिहीन को धर्मी भी ठहराए। उसने परमेश्वर के साथ मेल-मिलाप मोल लिया। उसने उन सबके लिये परमेश्वर के साथ पूर्ण शान्ति प्राप्त की जो यीशु के द्वारा उसके पास आते हैं। जब यीशु मरा तो बन्दीगृह के द्वार खुल गये। उन सबके लिये स्वतन्त्रता की घोषणा हुई जो पाप की दासता का अनुभव करते और छूटना चाहते हैं।

आपके विचार में यीशु ने कलवरी पर जो सारा दुःख सहा, वह किसके लिये था? परमेश्वर के पवित्र पुत्र के साथ अपराधी जैसा व्यवहार क्यों किया गया, उसे अपराधियों में गिना क्यों गया, और ऐसी क्रूर मृत्यु का दण्ड क्यों दिया गया? वे हाथ और पाँव किसके लिये क्रूस में ठोके गये? वह पंजर किसके लिये भाले से बेधा गया? वह बहुमूल्य लहू किसके लिये इतनी उदारता से बहा? यह सब क्यों किया गया? यह आपके लिये किया गया! यह पापियों के लिये — भक्तिहीनों के लिये किया गया! यह सेंतमेंत, अपनी इच्छा से किया गया — किसी विवशता से नहीं — पापियों के प्रति प्रेम के कारण, और पाप का प्रायश्चित करने के लिये। तब निश्चय ही, जब मसीह भक्तिहीनों के लिये मरा, तो मुझे यह घोषणा करने का अधिकार है कि किसी का भी उद्धार हो सकता है।

इसके अतिरिक्त, मैं पूरे भरोसे से घोषणा करता हूँ कि किसी का भी उद्धार हो सकता है, (2) क्योंकि मसीह अब भी जीवित है। वही यीशु जो एक बार पापियों के लिये मरा, अब भी परमेश्वर के दाहिने हाथ जीवित है, ताकि उद्धार का वह कार्य चलाता रहे जिसे पूरा करने वह स्वर्ग से उतरा था। वह इसलिये जीवित है कि उन सबको ग्रहण करे जो उसके द्वारा परमेश्वर के पास आते हैं, और उन्हें परमेश्वर की सन्तान बनने का अधिकार दे। वह इसलिये जीवित है कि हर बोझिल विवेक का अंगीकार सुने, और सर्वशक्तिमान महायाजक के रूप में पूर्ण क्षमा प्रदान करे। वह इसलिये जीवित है कि अपने ऊपर विश्वास करनेवालों पर लेपालकपन का आत्मा उण्डेले, और उन्हें "हे अब्बा, हे पिता" पुकारने योग्य बनाए। वह परमेश्वर और मनुष्य के बीच एकमात्र मध्यस्थ, कभी न थकनेवाला विनती करनेवाला, कोमल चरवाहा, बड़ा भाई, सामर्थी वकील, और उन सबका कभी न चूकनेवाला याजक और मित्र होने के लिये जीवित है जो उसके द्वारा परमेश्वर के पास आते हैं। वह अपने सब लोगों के लिये बुद्धि, धार्मिकता, पवित्रीकरण और छुटकारा होने के लिये जीवित है — कि उन्हें जीवन में बचाए रखे, मृत्यु में सँभाले, और अन्त में अनन्त महिमा तक पहुँचाए।

आपके विचार में यीशु परमेश्वर के दाहिने हाथ किसके लिये बैठा है? मनुष्यों के लिये। स्वर्ग में ऊँचे पर, अकथनीय महिमा से घिरा हुआ भी, वह उस महान कार्य की चिन्ता करता है जो उसने तब हाथ में लिया था जब वह बैतलहम की चरनी में जन्मा। वह रत्ती भर भी नहीं बदला। वह सदा एक ही मन का है। वह वही है जो गलील की झील के किनारे चलते समय था। वह वही है जो तब था जब उसने फरीसी शाऊल को क्षमा किया और उसे उस विश्वास का प्रचार करने भेजा जिसे उसने कभी नष्ट करना चाहा था। वह वही है जो तब था जब उसने मरियम मगदलीनी को ग्रहण किया — चुंगी लेनेवाले मत्ती को बुलाया — और जकइयाह को पेड़ से उतारा, और उन्हें इस बात के उदाहरण बनाया कि उसका अनुग्रह क्या कर सकता है। और वह बदला नहीं है। वह कल और आज और युगानुयुग एक सा है। तब निश्चय ही मुझे कहने का अधिकार है कि किसी का भी उद्धार हो सकता है, क्योंकि यीशु जीवित है।

मैं एक बार फिर पूरे भरोसे के साथ यह घोषणा करता हूँ कि कोई भी उद्धार पा सकता है, (3) क्योंकि मसीह के सुसमाचार की प्रतिज्ञाएँ पूर्ण, मुफ़्त और बिना किसी शर्त की हैं। उद्धारकर्ता कहता है, "हे सब परिश्रम करनेवालो और बोझ से दबे हुए लोगो, मेरे पास आओ; मैं तुम्हें विश्राम दूँगा"—"जो पुत्र पर विश्वास करता है वह नाश न होगा, परन्तु अनन्त जीवन पाएगा।"—"जो उस पर विश्वास करता है उस पर दण्ड की आज्ञा नहीं होती।"—"जो मेरे पास आएगा उसे मैं कभी न निकालूँगा।"—"जो कोई पुत्र को देखे और उस पर विश्वास करे, वह अनन्त जीवन पाए।"—"जो मुझ पर विश्वास करता है, अनन्त जीवन उसका है।"—"यदि कोई प्यासा हो तो मेरे पास आकर पीए।" "जो कोई चाहे वह जीवन का जल सेंतमेंत ले।" (मत्ती 11:28; यूहन्ना 3:15, 18; 6:37, 40, 47; 7:37; प्रकाशितवाक्य 22:17।)

तुम्हारे विचार में ये वचन किनके लिये कहे गए थे? क्या ये केवल यहूदियों के लिये थे? नहीं—अन्यजातियों के लिये भी! क्या ये केवल प्राचीन काल के लोगों के लिये थे? नहीं—हर युग के लोगों के लिये! क्या ये केवल फिलिस्तीन और सीरिया के लिये थे? नहीं—सारे संसार के लिये—हर नाम, हर जाति, हर कुल और हर भाषा के लिये! क्या ये केवल धनवानों के लिये थे? नहीं—ग़रीबों के लिये भी, धनवानों के समान! क्या ये केवल अत्यन्त नैतिक और सदाचारी लोगों के लिये थे? नहीं—ये सब के लिये थे—सबसे बड़े पापी के लिये—सबसे नीच अपराधी के लिये, हर उस जन के लिये जो इन्हें ग्रहण करे! जब मैं इन प्रतिज्ञाओं को स्मरण करता हूँ, तो मुझे यह कहने का पूरा अधिकार है कि हर कोई उद्धार पा सकता है। जो कोई इन वचनों को पढ़े और फिर भी उद्धार न पाए, वह सुसमाचार को कभी दोष नहीं दे सकता। यदि तुम खो जाओ, तो इसलिये नहीं कि तुम्हारा उद्धार हो ही नहीं सकता था। यदि तुम खो जाओ, तो इसलिये नहीं कि पापियों के लिये क्षमा न थी, कोई मध्यस्थ न था, कोई महायाजक न था, पाप और अशुद्धता के लिये कोई खुला हुआ सोता न था, कोई खुला द्वार न था। यह इसलिये होगा कि तुम अपनी ही इच्छा पर चलना चाहते थे, इसलिये कि तुम अपने पापों से चिपके रहना चाहते थे, इसलिये कि तुम मसीह के पास आना नहीं चाहते थे कि मसीह में तुम्हें जीवन मिले।

इस पुस्तक को भेजने का मेरा उद्देश्य कोई छिपी हुई बात नहीं है। तुम्हारे लिये मेरे मन की इच्छा और परमेश्वर से मेरी प्रार्थना यह है कि तुम्हारी आत्मा का उद्धार हो। यही वह महान उद्देश्य है जिसके लिये हर विश्वासयोग्य सेवक नियुक्त किया जाता है। इसी के लिये हम प्रचार करते हैं, बोलते हैं और लिखते हैं। हम चाहते हैं कि आत्माओं का उद्धार हो। जो हम पर सांसारिक उद्देश्यों का आरोप लगाते हैं, और कहते हैं कि हम केवल अपनी कलीसिया को बढ़ाना और याजकों की चालाकी को आगे बढ़ाना चाहते हैं, वे नहीं जानते कि क्या कह रहे हैं। हम ऐसी भावनाओं को जानते ही नहीं। परमेश्वर उन्हें क्षमा करे जो हम पर ये बातें थोपते हैं! हम ऊँचे उद्देश्यों के लिये परिश्रम करते हैं। हम चाहते हैं कि आत्माओं का उद्धार हो! हम इंग्लैंड की कलीसिया से प्रेम रखते हैं—हमें उसकी प्रार्थना-पुस्तक, उसके धर्म-सूत्रों, उसके उपदेशों और परमेश्वर की आराधना के उसके विधानों से गहरा लगाव है। परन्तु एक बात हम और भी गहराई से अनुभव करते हैं—हम चाहते हैं कि आत्माओं का उद्धार हो। हम चाहते हैं कि कुछ जलती हुई लकड़ियों को आग में से खींच निकालें। हम चाहते हैं कि परमेश्वर के हाथ में सम्मानित साधन बनें, जिनके द्वारा कुछ आत्माएँ हमारे प्रभु यीशु मसीह की पहचान तक पहुँचाई जाएँ।

और अब मैं इस लेख को तीन स्नेहपूर्ण उपयोग की बातों के साथ समाप्त करता हूँ, जिन्हें परमेश्वर बहुत सी आत्माओं की आत्मिक भलाई के लिये आशीष दे, यह मेरी हार्दिक प्रार्थना है। मैं नहीं जानता कि ये पन्ने किन के हाथों में पड़ेंगे। मैं अनिश्चित निशाने पर अपना धनुष खींचता हूँ। मैं केवल परमेश्वर से प्रार्थना कर सकता हूँ कि वह किन्हीं विवेकों में तीर को ठीक बैठा दे, और जो बहुत से लोग इस पुस्तक को पढ़ें, वे इसे रखते समय अपनी छाती पीटते हुए कहें, "उद्धार पाने के लिये मुझे क्या करना चाहिए?"

(1) उपयोग की मेरी पहली बात एक स्नेहपूर्ण चेतावनी की बात होगी। वह चेतावनी छोटी और सीधी है—अपनी आत्मा की उपेक्षा मत करो!

मुझे इसमें कोई सन्देह नहीं कि यह पुस्तक कुछ ऐसे लोगों के हाथों में पड़ेगी जो इस जीवन की बातों की चिन्ता से बार-बार परीक्षा में पड़ते हैं। तुम "बहुत सी बातों के लिये चिन्ता करते और घबराते हो।" तुम व्यापार, भाग-दौड़ और कष्ट के निरन्तर चक्कर में जीते दिखाई देते हो। तुम अपने चारों ओर हज़ारों को देखते हो जिन्हें बस इसी की चिन्ता है कि क्या खाएँगे, क्या पीएँगे और क्या पहनेंगे। तुम अक्सर इस विचार से कठिन परीक्षा में पड़ते हो कि कोई धर्म रखने का प्रयत्न करना व्यर्थ है। मैं परमेश्वर के नाम से तुमसे कहता हूँ—इस परीक्षा का सामना करो। यह शैतान की ओर से आती है। मैं तुमसे कहता हूँ—उस एक आवश्यक बात को कभी न भूलो! अपनी अमर आत्मा को कभी न भूलो!

हो सकता है तुम मुझसे कहो कि समय कठिन है। वह कठिन हो सकता है; परन्तु तुम्हें यह स्मरण दिलाना मेरा कर्तव्य है कि समय थोड़ा है, और शीघ्र ही अनन्तकाल में बदल जाएगा। तुम मुझसे कह सकते हो कि तुम्हें जीना तो है ही; परन्तु तुम्हें यह स्मरण दिलाना मेरा कर्तव्य है कि तुम्हें मरना भी है, और अपने परमेश्वर से मिलने के लिये तैयार रहना है। उस मनुष्य के विषय में हम क्या सोचेंगे जो अकाल के समय अपने कुत्ते को खिलाए—और अपने बच्चे को भूखा मारे? क्या हम न कहेंगे कि वह निर्दयी और अस्वाभाविक पिता है? तो सावधान रहो कि तुम स्वयं कुछ ऐसा ही न करो। अपने शरीर की चिन्ता में अपनी आत्मा को न भूलो। इस वर्तमान जीवन की चिन्ता में आनेवाले जीवन को न भूलो। अपनी आत्मा की उपेक्षा मत करो!

बीते समय में तुम जैसे भी रहे हो, मैं तुमसे विनती करता हूँ कि आगे के लिये ऐसे जन के समान जियो जो अनुभव करता है कि उसकी एक अमर आत्मा है! इस पुस्तक को पवित्र दृढ़ निश्चय के साथ रखो कि परमेश्वर की सहायता से तुम "बुराई करना छोड़ दोगे और भलाई करना सीखोगे।" अब से अपनी आत्मा के हित की चिन्ता करने में लज्जित न हो। बाइबल पढ़ने, प्रार्थना करने, सब्त के दिन को पवित्र मानने और सुसमाचार का प्रचार सुनने में लज्जित न हो। पाप और अभक्ति पर तो तुम्हें लज्जित होना ही चाहिए। परन्तु अपनी आत्मा की चिन्ता करने पर तुम्हें कभी लज्जित होने की आवश्यकता नहीं। दूसरे चाहे हँसें—एक दिन वे तुम पर नहीं हँसेंगे। इसे धीरज से सहो। चुपचाप सह लो। उनसे कहो कि तुमने अपना मन बना लिया है, और बदलने का तुम्हारा कोई विचार नहीं। उनसे कहो कि तुमने और कुछ नहीं तो एक बात अवश्य सीख ली है, और वह यह कि तुम्हारी एक अनमोल आत्मा है। और उनसे कहो कि तुमने ठान लिया है कि चाहे जो हो, तुम उस आत्मा की उपेक्षा अब और नहीं करोगे।

(2) उपयोग की मेरी दूसरी बात उन सब के लिये एक स्नेहपूर्ण निमंत्रण होगी जो चाहते हैं कि उनकी आत्मा का उद्धार हो। इस लेख का हर पाठक, जो अपनी आत्मा का मूल्य अनुभव करता है और उद्धार चाहता है, उसे मैं निमंत्रण देता हूँ कि बिना देर किए मसीह के पास आए और उद्धार पाए। मैं उसे निमंत्रण देता हूँ कि विश्वास के द्वारा मसीह के पास आए और अपनी आत्मा उसे सौंप दे, ताकि वह पाप के दोष, पाप की सामर्थ्य और पाप के परिणामों से छुड़ाया जाए।

पापियों के प्रति परमेश्वर के प्रेम की पूरी सीमा को बताने में मेरी जीभ असमर्थ है, और उसे समझाने के लिए मेरा मन बहुत निर्बल है; और मसीह के आत्माओं को ग्रहण करने और बचाने की इच्छा को भी मैं पूरा बता नहीं सकता। तुम मसीह में तंग नहीं हो, परन्तु अपने ही में तंग हो। यदि तुम मसीह की उद्धार करने की तत्परता पर सन्देह करते हो तो तुम बड़ी भूल करते हो। मैं जानता हूँ कि तुम्हारी उस आत्मा और अनन्त जीवन के बीच तुम्हारी अपनी इच्छा को छोड़ कोई बाधा नहीं है। "एक मन फिरानेवाले पापी के विषय में परमेश्वर के स्वर्गदूतों के साम्हने आनन्द होता है।" (लूका

15:10) तुमने क्रिस्टल पैलेस के संगीत-समारोहों के गायक-दलों के आश्चर्यकर्मों के विषय में कुछ सुना होगा। परन्तु "हल्लेलूयाह कोरस" में जो सुरों की धूम मचती है, वह उस आनन्द की धूम के आगे क्या है जो स्वर्ग में तब सुनाई देती है जब कोई आत्मा अन्धकार से ज्योति की ओर फिरती है? एक ऐसे पापी के विषय में, जिसे पाप की मूर्खता दिखाई गई और जिसने मसीह को ढूँढ़ा, "स्वर्गदूतों के आनन्द" की तुलना में वह सब मात्र एक फुसफुसाहट नहीं तो और क्या है? आओ, और बिना देर किए उस आनन्द को और बढ़ाओ!

यदि तुम जीवन से प्रेम रखते हो तो मैं तुमसे विनती करता हूँ कि तुरन्त मसीह को थाम लो, ताकि तुम्हारी आत्मा का उद्धार हो। आज ही क्यों नहीं? आज ही के दिन तुम प्रभु यीशु से एक ऐसी अनन्त वाचा में क्यों न जुड़ जाओ जो टूट नहीं सकती? कल का सूर्य उगने से पहले ही पाप की सेवा से फिरकर मसीह की ओर मुड़ने का निश्चय क्यों न कर लो? आज ही मसीह के पास क्यों न जाओ, और अपनी आत्मा को उसके सब पापों और सारे अविश्वास के साथ, सब सन्देहों और सब भयों के साथ, उस पर डाल दो?

क्या तुम निर्धन हो? स्वर्ग में धन खोजो और धनी बनो। क्या तुम बूढ़े हो? जल्दी करो, जल्दी करो कि अपने अन्त के लिए तैयार हो जाओ, और अपने परमेश्वर से मिलने की तैयारी करो। क्या तुम जवान हो? अच्छी शुरुआत करो, और मसीह में एक ऐसा मित्र खोजो जो कभी न घटनेवाला है और जो तुम्हें कभी न छोड़ेगा। क्या तुम संकट में हो, इस जीवन की चिन्ता में हो? उसे खोजो जो अकेला तुम्हारी सहायता कर सकता और तुम्हारे बोझ उठा सकता है—उसे खोजो जो तुम्हें कभी निराश न करेगा। जब और लोग तुमसे मुँह फेर लेंगे, तब प्रभु यीशु मसीह तुम्हें अपना लेगा। क्या तुम पापी हो, बड़े पापी, निकृष्टतम प्रकार के पापी? यदि तुम केवल मसीह के पास आओ तो वह सब फिर कभी स्मरण न किया जाएगा—उसका लहू सब पाप धो डालेगा। तुम्हारे पाप चाहे लाल रंग के हों, वे हिम के समान उजले कर दिए जाएँगे।

इसलिए जाओ, और प्रभु यीशु मसीह को पुकारो। अपनी आत्मा के मूल्य पर और उद्धार के उस एकमात्र मार्ग पर विचार करो। गम्भीर प्रार्थना में प्रभु को पुकारो। पश्चात्ताप करनेवाले चोर के समान करो—उसके सामने अपना हृदय उण्डेल दो—पुकारो, "हे प्रभु, मुझे, हाँ मुझे भी स्मरण कर!" उससे कहो कि तुम उसके पास इसलिए आए हो कि तुमने सुना है कि वह "पापियों को ग्रहण करता है," और इसलिए कि तुम पापी हो और उद्धार पाना चाहते हो। उसे अपने बीते जीवन की पूरी कहानी सुना दो। चाहो तो उससे कहो कि तुम अविश्वासी रहे हो, व्यभिचारी, सब्त तोड़नेवाले, परमेश्वर को न माननेवाले, लापरवाह और चिड़चिड़े मनुष्य रहे हो। वह तुम्हें तुच्छ न जानेगा। वह तुम्हें निकाल न देगा। वह तुमसे मुँह न फेरेगा। वह कुचले हुए सरकण्डे को नहीं तोड़ता और धुआँ देती हुई बत्ती को नहीं बुझाता। कोई भी मनुष्य उसके पास आकर निकाला नहीं गया। आह, मसीह के पास आओ, तो तुम्हारी आत्मा जीवित रहेगी!

(3) अनुप्रयोग का मेरा अन्तिम वचन इस पत्र के हर उस पाठक के लिए स्नेहपूर्ण आग्रह है जिसने अपनी आत्मा का मूल्य जान लिया है और यीशु मसीह पर विश्वास किया है। वह आग्रह छोटा और सरल होगा। मैं तुमसे विनती करता हूँ कि अपने सारे मन से प्रभु से लिपटे रहो, और अपने ऊँचे बुलावे के प्रतिफल के लक्ष्य की ओर बढ़ते जाओ।

मैं भली-भाँति समझ सकता हूँ कि तुम्हें अपना मार्ग बहुत सकरा लगता है। तुम्हारे साथ थोड़े हैं—और विरोध में बहुत। जीवन में तुम्हारा भाग कठिन और तुम्हारी स्थिति विकट लग सकती है। फिर भी प्रभु से लिपटे रहो, और वह तुम्हें कभी न छोड़ेगा। सताव के बीच प्रभु से लिपटे रहो। प्रभु से लिपटे रहो, चाहे लोग तुम पर हँसें और तुम्हारा उपहास करें और तुम्हें लज्जित करने का यत्न करें। प्रभु से लिपटे रहो, चाहे क्रूस भारी हो और लड़ाई कठिन। वह कलवरी के क्रूस पर तुम्हारे लिए लज्जित न हुआ—तो तुम भी पृथ्वी पर उससे लज्जित न हो, ऐसा न हो कि वह अपने स्वर्गीय पिता के सामने तुमसे लज्जित हो। प्रभु से लिपटे रहो, और वह तुम्हें कभी न छोड़ेगा। इस संसार में निराशाएँ बहुत हैं—सम्पत्ति में, परिवार में, घरों और भूमि में, और पदों में निराशाएँ। परन्तु मसीह में आज तक कोई निराश नहीं हुआ। ऐसा कोई मनुष्य नहीं हुआ जिसने मसीह को वैसा न पाया हो जैसा बाइबल कहती है, और जो कुछ उसे पहले बताया गया था उससे हज़ार गुना उत्तम!

आगे देखो, अन्त की ओर आगे और आगे देखो! तुम्हारी सबसे उत्तम वस्तुएँ अभी आनेवाली हैं। समय थोड़ा है। अन्त निकट आ रहा है। संसार के अन्तिम दिन हम पर हैं। अच्छी कुश्ती लड़ो। परिश्रम करते जाओ। काम करते जाओ। यत्न करते जाओ। प्रार्थना करते जाओ। पढ़ते जाओ। अपनी आत्मा की उन्नति के लिए कड़ा परिश्रम करो। दूसरों की आत्माओं की उन्नति के लिए कड़ा परिश्रम करो। यत्न करो कि कुछ और लोगों को अपने साथ स्वर्ग में ले चलो, और किसी भी प्रकार से कुछ को बचा लो। परमेश्वर की सहायता से कुछ ऐसा करो कि स्वर्ग और भरे और नरक और खाली हो। अपने पास के उस जवान से बोलो, और अपने घर के पास रहनेवाले उस वृद्ध से बोलो। उस पड़ोसी से बोलो जो कभी आराधनालय नहीं जाता। उस सम्बन्धी से बोलो जो कभी एकान्त में बाइबल नहीं पढ़ता और गम्भीर धर्म का उपहास करता है। सब से विनती करो कि अपनी आत्माओं के विषय में सोचें। उनसे आग्रह करो कि रविवार को जाकर कुछ ऐसा सुनें जो अनन्त जीवन के लिए उनके भले का हो। उन्हें मनाने का यत्न करो कि वे नाश होनेवाले पशुओं के समान नहीं, परन्तु उन मनुष्यों के समान जीएँ जो उद्धार पाना चाहते हैं। यदि तुम आत्माओं का भला करने का यत्न करो तो स्वर्ग में तुम्हारा प्रतिफल बड़ा है। उन सब का प्रतिफल बड़ा है जो मनुष्यों के सामने मसीह को मान लेते हैं।

इस संसार के सम्मान शीघ्र ही सदा के लिए समाप्त हो जाएँगे। हमारी दयालु महारानी जो पुरस्कार देती हैं वे केवल थोड़े वर्षों तक भोगे जाते हैं। "विक्टोरिया क्रॉस" उन वीर सैनिकों के पास, जिन्होंने उसे इतनी वीरता से जीता और जो उसके इतने योग्य हैं, अधिक समय तक नहीं रहेगा। जिस स्थान पर वे अब जाने जाते हैं वह शीघ्र ही उन्हें फिर नहीं जानेगा—कुछ और वर्षों में वे अपने पूर्वजों में जा मिलेंगे। परन्तु जो मुकुट मसीह देता है, वह कभी मुर्झाता नहीं। हे विश्वासी पाठक, उसी मुकुट को खोजो। उसी मुकुट के लिए परिश्रम करो। इस कष्टमय संसार में तुम्हें जो कुछ सहना पड़े, वह उसकी भरपाई कर देगा। मसीह के सैनिकों के प्रतिफल सदा-सर्वदा के हैं। उनका घर अनन्त है। उनकी महिमा का कभी अन्त नहीं होता!

थोड़े लोग बचाए जाते हैं

मैं मानकर चलता हूँ कि इस लेख का हर पाठक स्वयं को मसीही कहता है। आप नास्तिक या अविश्वासी गिने जाना नहीं चाहेंगे। आप मानते हैं कि बाइबल सच्ची है। उद्धारकर्ता मसीह का जन्म, उद्धारकर्ता मसीह की मृत्यु, उद्धारकर्ता मसीह द्वारा किया गया उद्धार का प्रबन्ध — ये सब ऐसे तथ्य हैं जिन पर आपने शायद कभी सन्देह नहीं किया। परन्तु क्या अन्त में इस प्रकार का मसीही धर्म आपको कुछ लाभ पहुँचाएगा? जब आप मरेंगे तब क्या इससे आपकी आत्मा का कुछ भला होगा? एक शब्द में — क्या आपका उद्धार होगा?

हो सकता है कि आप अभी जवान, स्वस्थ और बलवान हों। शायद आप जीवन में कभी एक दिन भी बीमार नहीं पड़े, और कमज़ोरी तथा पीड़ा का अनुभव कैसा होता है, यह मुश्किल से जानते हों। आप आने वाले वर्षों के लिए योजनाएँ और उपाय बनाते हैं, और ऐसा अनुभव करते हैं मानो मृत्यु बहुत दूर और आँखों से ओझल है। फिर भी याद रखिए, मृत्यु कभी-कभी जवानों को उनके जीवन के फूल-से दिनों में ही उठा ले जाती है। परिवार के बलवान और स्वस्थ लोग सदा सबसे अधिक दिन नहीं जीते। हो सकता है आपका सूर्य आपके जीवन की दोपहरी तक पहुँचने से पहले ही अस्त हो जाए। थोड़े ही दिनों में आप किसी सँकरे, चुप घर में पड़े हों, और आपकी कब्र पर घास के फूल उग रहे हों। तब विचार कीजिए — क्या आपका उद्धार होगा?

हो सकता है कि आप इस संसार में धनी और सम्पन्न हों। आपके पास धन है, और वह सब कुछ है जो धन से मिल सकता है। आपके पास "मान-सम्मान, प्रेम, आज्ञाकारिता और मित्रों का झुण्ड" है। परन्तु याद रखिए, "धन सदा नहीं ठहरता।" आप उसे कुछ ही वर्ष रख सकते हैं। "जैसे मनुष्यों के लिये एक बार मरना और उसके बाद न्याय का होना नियुक्त है।" (नीतिवचन 27:24; इब्रानियों 9:27।) तब विचार कीजिए — क्या आपका उद्धार होगा?

हो सकता है कि आप गरीब और अभावग्रस्त हों। आपके पास अपने और अपने परिवार के लिए भोजन और वस्त्र जुटाने भर को भी मुश्किल से होता है। जिन सुख-सुविधाओं को पाने की आपमें सामर्थ्य नहीं, उनके अभाव में आप प्रायः दुःखी रहते हैं। लाज़र की तरह आपको केवल "बुरी वस्तुएँ" ही मिलती दिखती हैं, भली नहीं। फिर भी आप इस विचार से सान्त्वना पाते हैं कि इस सबका अन्त होगा। एक आनेवाला संसार है, जहाँ दरिद्रता और अभाव का नाम भी न होगा। फिर भी, क्षण भर विचार कीजिए — क्या आपका उद्धार होगा?

हो सकता है कि आपका शरीर निर्बल और रोगी हो। आप मुश्किल से जानते हैं कि पीड़ा से मुक्त होना क्या होता है। आपने स्वास्थ्य का साथ छोड़े इतना समय बीत गया कि आप लगभग भूल ही गए कि वह कैसा होता है। आपने सुबह प्रायः कहा है, "काश कि साँझ हो जाती," — और साँझ को, "काश कि सुबह हो जाती।" ऐसे दिन भी आते हैं जब थकावट के मारे आपका मन यूनुस के साथ पुकार उठने को ललचाता है, "मेरे लिये जीवित रहने से मरना ही भला है।" (योना 4:3।) परन्तु याद रखिए, मृत्यु ही सब कुछ नहीं है। कब्र के पार कुछ और भी है। तब विचार कीजिए — क्या आपका उद्धार होगा?

यदि उद्धार पाना सरल बात होती, तो मैं इस पुस्तक में ऐसा न लिखता जैसा लिख रहा हूँ। परन्तु क्या ऐसा है? आइए देखें।

यदि उद्धार पाने वालों की गिनती के विषय में संसार की साधारण धारणा सही होती, तो मैं लोगों को खोजी और कठिन प्रश्नों से कष्ट न देता। परन्तु क्या ऐसा है? आइए देखें।

यदि परमेश्वर ने बाइबल में उद्धार पाने वालों की गिनती के विषय में कभी स्पष्ट रूप से न कहा होता, तो मेरा चुप रहना ही ठीक होता। परन्तु क्या ऐसा है? आइए देखें।

यदि अनुभव और तथ्य इस बात को सन्देह में छोड़ देते कि बहुत लोग उद्धार पाएँगे या थोड़े, तो मैं चुप रह सकता था। परन्तु क्या ऐसा है? आइए देखें।

हमारे सामने के इस विषय पर विचार करते हुए मैं चार बातों की जाँच करना चाहता हूँ।

I. पहली बात: मैं समझाऊँ कि उद्धार पाने का अर्थ क्या है। II. दूसरी बात: मैं उन भूलों को दिखाऊँ जो उद्धार पाने वालों की गिनती के विषय में संसार में प्रचलित हैं। III. तीसरी बात: मैं दिखाऊँ कि बाइबल उद्धार पाने वालों की गिनती के विषय में क्या कहती है।

IV. चौथी बात: मैं उद्धार पाने वालों की गिनती के विषय में कुछ सीधे-सादे तथ्य सामने रखूँ।

सच्चे धर्म के प्रति व्यापक लापरवाही के इस युग में इन चार बातों की शान्त जाँच हमारी आत्माओं के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण ठहरेगी।

I. सबसे पहले मैं समझाता हूँ कि उद्धार पाने का अर्थ क्या है।

यह ऐसी बात है जिसे स्पष्ट कर लेना आवश्यक है। जब तक हम यह न जानें, हम आगे नहीं बढ़ सकते। "उद्धार पाने" से मैं कुछ और समझ सकता हूँ और आप कुछ और। मैं आपको दिखाता हूँ कि बाइबल के अनुसार "उद्धार पाना" क्या है, तब कोई गलतफ़हमी न रहेगी।

उद्धार पाने का अर्थ केवल इतना नहीं कि हम स्वयं को मसीही कहें और मानें। हमारे पास मसीही धर्म के सब बाहरी अंग हो सकते हैं, फिर भी हम अन्त में खोए हुए हो सकते हैं। हम मसीह की कलीसिया में बपतिस्मा पा सकते हैं, — मसीह की मेज़ पर आ सकते हैं, — मसीही ज्ञान रख सकते हैं, — मसीही स्त्री-पुरुष गिने जा सकते हैं — फिर भी जीवन भर मृत आत्माएँ बने रह सकते हैं, — और अन्त में न्याय के दिन मसीह की बाईं ओर, बकरियों के बीच पाए जा सकते हैं। नहीं: यह उद्धार नहीं है! उद्धार इससे कहीं ऊँची और गहरी बात है। तो वह क्या है?

(क) उद्धार पाना यह है कि इस वर्तमान जीवन में उद्धारकर्ता यीशु मसीह पर विश्वास के द्वारा पाप के दोष से छुटकारा मिले। यह है क्षमा पाना, धर्मी ठहराया जाना, और मसीह के लहू और मध्यस्थता पर विश्वास के द्वारा पाप के हर आरोप से मुक्त होना। जो कोई मन से प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास करता है, वह उद्धार पाई हुई आत्मा है। वह नष्ट न होगा। उसे अनन्त जीवन मिलेगा। यह उद्धार का पहला भाग है, और शेष सबकी जड़ है। परन्तु बात यहीं समाप्त नहीं होती।

(ख) उद्धार पाना यह है कि इस वर्तमान जीवन में नया जन्म पाकर और मसीह के आत्मा के द्वारा पवित्र किए जाकर पाप की सामर्थ्य से छुटकारा मिले। यह है पवित्र आत्मा के द्वारा हममें नया स्वभाव डाले जाने से पाप, संसार और शैतान के घृणित अधिकार से मुक्त होना। जो कोई इस प्रकार अपने मन के आत्मिक स्वभाव में नया किया गया और मन फिराया हुआ है, वह उद्धार पाई हुई आत्मा है। वह नष्ट न होगा। वह परमेश्वर के महिमामय राज्य में प्रवेश करेगा। यह उद्धार का दूसरा भाग है। परन्तु बात यहीं समाप्त नहीं होती।

(ग) उद्धार पाने का अर्थ है न्याय के दिन पाप के सब भयानक परिणामों से छुड़ाया जाना। इसका अर्थ है मसीह में निर्दोष, निष्कलंक, निष्कपट और सिद्ध ठहराया जाना, जबकि दूसरे दोषी पाए जाकर सदा के लिये दण्ड के भागी ठहराए जाते हैं। इसका अर्थ है ये सान्त्वना भरे वचन सुनना, — "आओ, तुम धन्य हो!" जबकि दूसरे ये भयानक वचन सुन रहे होते हैं, — "हे स्रापित लोगो, चले जाओ!" (मत्ती 25:34,41।) इसका अर्थ है मसीह के द्वारा अपनाया और स्वीकार किया जाना, उसके प्रिय बच्चों और सेवकों में से एक के रूप में, जबकि दूसरे ठुकराकर सदा के लिये निकाल दिए जाते हैं। इसका अर्थ है दुष्टों के भाग से मुक्त घोषित किया जाना, — उस कीड़े से जो कभी नहीं मरता, — उस आग से जो कभी नहीं बुझती, — उस रोने, विलाप करने और दाँत पीसने से जिसका कभी अन्त नहीं होता। इसका अर्थ है मसीह के दूसरे आगमन के दिन धर्मियों के लिये तैयार किया गया प्रतिफल पाना; — महिमामय देह, — अविनाशी राज्य, — कभी न मुरझानेवाला मुकुट, — और सदा बना रहनेवाला आनन्द। यही पूर्ण उद्धार है। यही वह "छुटकारा" है जिसकी बाट जोहने और लालसा रखने की आज्ञा सच्चे मसीहियों को दी गई है। (लूका 21:28।) यही उन सब स्त्री-पुरुषों की विरासत है जो विश्वास करते और नया जन्म पाते हैं। विश्वास के द्वारा वे अभी से उद्धार पा चुके हैं। परमेश्वर की दृष्टि में उनका अन्तिम उद्धार एक निश्चित बात है। उनके नाम जीवन की पुस्तक में हैं। स्वर्ग में उनके निवास-स्थान अभी से तैयार हैं। फिर भी छुटकारे और उद्धार की एक ऐसी परिपूर्णता है जिसे वे तब तक नहीं पाते जब तक देह में हैं। वे पाप के दोष और बल से बचाए गए हैं; — परन्तु उसके विरुद्ध जागते रहने और प्रार्थना करने की आवश्यकता से नहीं। वे संसार के भय और प्रेम से बचाए गए हैं; — परन्तु प्रतिदिन उससे लड़ने की आवश्यकता से नहीं। वे शैतान की सेवा से बचाए गए हैं; — परन्तु उसके प्रलोभनों से सताए जाने से नहीं बचाए गए। परन्तु जब मसीह आएगा तब विश्वासियों का उद्धार पूर्ण हो जाएगा। वे उसे अभी कली के रूप में पा चुके हैं। तब वे उसे फूल के रूप में देखेंगे।

उद्धार ऐसा ही है। इसका अर्थ है पाप के दोष, बल और परिणामों से बचाया जाना। इसका अर्थ है अभी विश्वास करना और पवित्र किया जाना, और अन्तिम दिन परमेश्वर के क्रोध से छुड़ाया जाना। जिसका इस वर्तमान जीवन में पहला भाग है, उसका आनेवाले जीवन में दूसरा भाग निश्चय ही होगा। इसके दोनों भाग आपस में जुड़े हुए हैं। जिसे परमेश्वर ने जोड़ा है, उसे कोई मनुष्य अलग करने का साहस न करे। कोई यह स्वप्न न देखे कि यदि वह पहले नया जन्म नहीं पाता तो अन्त में उसका उद्धार होगा। और यदि कोई यहाँ नया जन्म पा चुका है तो वह इस में कोई सन्देह न करे कि आगे अवश्य उसका उद्धार होगा।

यह कभी न भूला जाए कि सुसमाचार के सेवक का मुख्य उद्देश्य आत्माओं के उद्धार को आगे बढ़ाना है। मैं इसे एक निश्चित तथ्य के रूप में कहता हूँ कि जो ऐसा अनुभव नहीं करता वह सच्चा सेवक नहीं है। किसी मनुष्य की नियुक्ति की बात मत करो! हो सकता है सब कुछ ठीक रीति से और नियम के अनुसार किया गया हो। वह काला कोट पहने और "आदरणीय" कहलाए। परन्तु यदि आत्माओं का उद्धार उसके हृदय की सबसे बड़ी रुचि — उसकी प्रबल लालसा — उसका सर्वोपरि विचार नहीं है, — तो वह सुसमाचार का सच्चा सेवक नहीं: वह मज़दूर है, चरवाहा नहीं।

हो सकता है मण्डलियों ने उसे बुलाया हो, — परन्तु उसे पवित्र आत्मा ने नहीं बुलाया। हो सकता है बिशपों ने उसे नियुक्त किया हो, — परन्तु मसीह ने नहीं।

लोग क्या समझते हैं कि सेवक किस उद्देश्य से भेजे जाते हैं? क्या केवल सर्प्लिस पहनने, — सेवाएँ पढ़ने, — और निश्चित संख्या में उपदेश देने के लिये? क्या केवल संस्कार कराने, और विवाहों और अन्त्येष्टियों में कार्य करने के लिये? क्या केवल सुख-सुविधा की आजीविका पाने और एक प्रतिष्ठित पेशे में रहने के लिये? नहीं, कदापि नहीं! हम इन से भिन्न उद्देश्यों के लिये भेजे गए हैं। हम मनुष्यों को अन्धकार से ज्योति की ओर और शैतान के अधिकार से परमेश्वर की ओर फेरने के लिये भेजे गए हैं। हम इसलिये भेजे गए हैं कि लोगों को आनेवाले क्रोध से भागने के लिये समझाएँ। हम इसलिये भेजे गए हैं कि लोगों को संसार की सेवा से खींचकर परमेश्वर की सेवा में लाएँ, — सोतों को जगाएँ, — लापरवाहों को सचेत करें, — और "किसी न किसी रीति से कुछ का उद्धार करें।" (1 कुरिन्थियों 9:22।)

यह न सोचो कि जब हम नियमित सेवाएँ स्थापित कर लेते हैं और लोगों को उनमें आने के लिये मना लेते हैं तब सब कुछ हो चुका। यह न सोचो कि जब पूरी मण्डलियाँ इकट्ठी हो जाती हैं, प्रभु-भोज की मेज़ पर भीड़ लग जाती है, और गाँव की पाठशाला भर जाती है, तब सब कुछ हो चुका। हम लोगों के बीच आत्मा का प्रकट कार्य देखना चाहते हैं, — पाप का स्पष्ट बोध, — मसीह में जीवित विश्वास, — हृदय का निर्णायक परिवर्तन, — संसार से स्पष्ट अलगाव, — परमेश्वर के साथ पवित्र चाल-चलन। एक शब्द में, हम आत्माओं का उद्धार होते देखना चाहते हैं; और यदि हम इससे कम किसी बात में सन्तुष्ट रहें तो हम मूर्ख और ढोंगी हैं, — अन्धों के अन्धे अगुवे हैं।

आख़िरकार धर्म रखने का मुख्य उद्देश्य उद्धार पाना है। यही वह बड़ा प्रश्न है जिसे हमें अपने विवेक के साथ सुलझाना है। हमारे विचार करने की बात यह नहीं कि हम गिरजे में जाते हैं या प्रार्थनालय में, — कुछ रीतियों और विधियों का पालन करते हैं या नहीं, — कुछ दिनों को मानते हैं और धार्मिक कर्त्तव्यों की एक निश्चित संख्या पूरी करते हैं या नहीं। बात यह है कि क्या अन्त में हमारा "उद्धार" होगा। इसके बिना हमारे सारे धार्मिक कार्य थका देनेवाले और व्यर्थ परिश्रम हैं।

कभी नहीं, कभी नहीं, हम उद्धार देनेवाले धर्म से कम किसी बात में सन्तुष्ट न हों। निश्चय ही ऐसे धर्म से सन्तुष्ट रहना बचपना और मूर्खता है जो न जीवन में शान्ति देता है, न मृत्यु में आशा, न आनेवाले संसार में महिमा।

II. अब दूसरी बात यह कि मैं उन भूलों को बताऊँ जो संसार में उद्धार पानेवालों की संख्या के विषय में आम हैं।

इस विषय में प्रमाण के लिये मुझे दूर जाने की आवश्यकता नहीं। मैं उन बातों की चर्चा करूँगा जिन्हें हर मनुष्य अपनी आँखों से देख और अपने कानों से सुन सकता है।

मैं दिखाने का प्रयत्न करूँगा कि इस विषय में एक व्यापक भ्रान्ति फैली हुई है, और यही भ्रान्ति उन सबसे बड़े संकटों में से एक है जिनके सामने हमारी आत्माएँ खड़ी हैं।

(क) तो लोग दूसरों की आत्मिक दशा के विषय में, जब तक वे जीवित हैं, सामान्यतः क्या सोचते हैं? वे अपने रिश्तेदारों, मित्रों, पड़ोसियों और परिचितों की आत्माओं के विषय में क्या सोचते हैं? आइए देखें कि इस प्रश्न का उत्तर कैसे दिया जा सकता है।

वे जानते हैं कि उनके आस-पास के सब लोग मरनेवाले हैं और उनका न्याय होनेवाला है। वे जानते हैं कि उनकी आत्माएँ हैं जो खो जाएँगी या बचाई जाएँगी। और प्रत्यक्ष रूप से वे क्या समझते हैं कि उनका अन्त क्या होगा?

क्या वे सोचते हैं कि उनके आस-पास के लोग नरक के खतरे में हैं? ऐसा कुछ भी नहीं है जिससे प्रकट हो कि वे ऐसा सोचते हैं। वे साथ खाते-पीते हैं; साथ हँसते, बातें करते, घूमते और काम करते हैं। वे परमेश्वर और अनन्तकाल की, स्वर्ग और नरक की चर्चा आपस में कभी-कभार ही करते हैं, या कभी नहीं करते। मैं हर उस व्यक्ति से, जो संसार को जानता है, परमेश्वर की दृष्टि में पूछता हूँ: क्या ऐसा ही नहीं है?

क्या वे मानेंगे कि कोई मनुष्य दुष्ट या अभक्त है? उसकी जीवन-शैली चाहे जैसी हो, लगभग कभी नहीं। वह विश्रामदिन का तोड़नेवाला हो सकता है; वह बाइबल की उपेक्षा करनेवाला हो सकता है; उसमें सच्चे धर्म का कोई प्रमाण तक न हो। कोई बात नहीं! उसके मित्र प्रायः आपसे कहेंगे कि वह कुछ अन्य लोगों के समान इतना दिखावा भले ही न करता हो, परन्तु भीतर से उसका "हृदय अच्छा" है, और वह दुष्ट मनुष्य नहीं है। मैं हर उस व्यक्ति से, जो संसार को जानता है, परमेश्वर की दृष्टि में पूछता हूँ: क्या ऐसा ही नहीं है?

और इस सबसे क्या सिद्ध होता है? यह सिद्ध होता है कि मनुष्य अपने आप को यह कहकर भुलावे में रखते हैं कि स्वर्ग पहुँचने में कोई बड़ी कठिनाई नहीं है। यह स्पष्ट सिद्ध करता है कि मनुष्यों की यह धारणा है कि अधिकांश लोगों का उद्धार हो जाएगा।

(ब) परन्तु मनुष्य मरे हुए लोगों की आत्मिक दशा के विषय में सामान्यतः क्या सोचते हैं? आइए देखें कि इस प्रश्न का उत्तर कैसे दिया जा सकता है।

जो नास्तिक नहीं हैं, वे मानते हैं कि जो भी मरते हैं वे सब या तो सुख के स्थान में गए हैं, या दुःख के स्थान में। और इन दोनों में से किस स्थान में वे समझते हैं कि अधिकांश लोग इस संसार को छोड़कर जाते हैं?

मैं बिना किसी खण्डन के भय के कहता हूँ कि इस संसार से विदा हुए सब लोगों की दशा के विषय में अच्छी बातें कहने की एक खेदजनक रूप से प्रचलित रीति है। जान पड़ता है कि इससे बहुत अन्तर नहीं पड़ता कि मनुष्य ने जीवित रहते कैसा आचरण किया। हो सकता है उसने मन फिराव या मसीह पर विश्वास का कोई चिह्न न दिखाया हो; वह सुसमाचार में बताई गई उद्धार की योजना से अनजान रहा हो; उसने मन-परिवर्तन या पवित्रीकरण का कोई प्रमाण न दिखाया हो; वह बिना आत्मा वाले प्राणी के समान जिया और मरा हो। फिर भी, जैसे ही यह मनुष्य मरता है, लोग यह कहने का साहस करते हैं कि "वह सम्भवतः अब अपने जीवन-काल से अधिक सुखी है।" वे सन्तोष से आपसे कहेंगे कि उन्हें "आशा है वह किसी उत्तम लोक में चला गया है।" वे गम्भीरता से सिर हिलाकर कहेंगे कि उन्हें "आशा है वह स्वर्ग में है।" वे बिना भय और थरथराहट के उसके पीछे कब्र तक जाएँगे, और बाद में उसकी मृत्यु को "उसके लिए एक धन्य परिवर्तन" कहेंगे। हो सकता है उसके जीवित रहते उन्होंने उसे नापसन्द किया हो और बुरा मनुष्य समझा हो; परन्तु जैसे ही वह मरता है वे अपनी राय पलटकर कहते हैं कि उन्हें भरोसा है कि वह स्वर्ग चला गया है! मेरी इच्छा किसी की भावनाओं को ठेस पहुँचाने की नहीं है। मैं केवल हर उस व्यक्ति से, जो संसार को जानता है, पूछता हूँ: क्या यह सच नहीं है?

और इस सबसे क्या सिद्ध होता है? यह एक और भयानक प्रमाण देता है कि मनुष्य यह मानने पर अड़े हुए हैं कि स्वर्ग पहुँचना सरल काम है। मनुष्य यही मानते हैं कि अधिकांश लोगों का उद्धार हो जाता है।

(स) परन्तु फिर, मनुष्य उन सेवकों के विषय में सामान्यतः क्या सोचते हैं जो नए नियम की शिक्षाओं का पूरा प्रचार करते हैं? आइए देखें कि इस प्रश्न का उत्तर कैसे दिया जा सकता है।

किसी ऐसे पादरी को किसी इलाके में भेजिए जो "परमेश्वर की सारी मनसा" बताए, और "कोई लाभदायक बात बिना बताए न छोड़े।" वह ऐसा हो जो विश्वास से धर्मी ठहराए जाने, आत्मा द्वारा नए जन्म, और जीवन की पवित्रता का स्पष्ट प्रचार करे। वह ऐसा हो जो मन-फिराए हुओं और न फिराए हुओं के बीच स्पष्ट रेखा खींचे, और पापियों तथा सन्तों दोनों को उनका-अपना भाग दे। वह बार-बार नए नियम में से सच्चे मसीही के चरित्र का ऐसा सीधा और अकाट्य वर्णन सामने रखे। वह दिखाए कि जिस मनुष्य में वह चरित्र नहीं है, उसे उद्धार पाने की कोई उचित आशा नहीं हो सकती। वह निरन्तर उस वर्णन को अपने श्रोताओं के विवेक पर दबाए, और उनसे बार-बार आग्रह करे कि जो भी प्राण उस चरित्र के बिना मरेगा वह नाश हो जाएगा। वह यह सब योग्यता और प्रेम के साथ करे; और इस सबके बाद परिणाम क्या होगा?

परिणाम यह होगा कि जहाँ कुछ थोड़े मन फिराकर उद्धार पाएँगे, वहाँ उसके अधिकांश श्रोता उसकी शिक्षा को ग्रहण नहीं करेंगे और न उस पर विश्वास करेंगे। हो सकता है वे खुलेआम उसका विरोध न करें। वे उसका आदर भी कर सकते हैं, और उसे एक सच्चा, निष्कपट, भले हृदय वाला मनुष्य मान सकते हैं जिसकी मनसा अच्छी है। परन्तु वे इससे आगे नहीं जाएँगे। वह उन्हें मसीह और उसके प्रेरितों के स्पष्ट वचन दिखा सकता है; वह पद पर पद और अंश पर अंश उद्धृत कर सकता है: सब व्यर्थ होगा। उसके अधिकांश श्रोता उसे "अत्यधिक कठोर," "अत्यधिक तंग," और "अत्यधिक नुक्ताचीं" समझेंगे। वे आपस में कहेंगे कि संसार उतना बुरा नहीं है जितना सेवक को लगता है, और लोग उतने भले नहीं हो सकते जितना सेवक उन्हें चाहता है, और अन्त में उन्हें आशा है कि सब ठीक ही रहेगा! मैं सुसमाचार के हर उस सेवक से, जो कुछ भी समय से सेवकाई में रहा है, पूछता हूँ कि क्या मैं सत्य नहीं कह रहा? क्या ये बातें ऐसी ही नहीं हैं?

और इससे क्या सिद्ध होता है? इससे एक और प्रमाण मिलता है कि मनुष्य सामान्यतः यही सोचने का निश्चय किए हुए हैं कि उद्धार कोई बहुत कठिन बात नहीं है, और अन्त में अधिकांश लोगों का उद्धार हो ही जाएगा।

अब मनुष्य इन प्रचलित मतों के लिए हमें कौन-सा ठोस कारण दिखा सकते हैं? वे किस पवित्रशास्त्र के आधार पर यह धारणा बनाते हैं कि उद्धार सरल बात है और अधिकांश लोगों का उद्धार होगा? परमेश्वर का कौन-सा प्रकाशन वे हमें दिखा सकते हैं जिससे हमें सन्तोष हो कि ये मत खरे और सत्य हैं?

उनके पास कुछ नहीं है, सचमुच कुछ भी नहीं। उनके पास पवित्रशास्त्र का एक भी पद नहीं है जो उचित रीति से समझाने पर उनके विचारों का समर्थन करे। उनके पास कोई ऐसा कारण नहीं है जो जाँच में टिक सके। वे एक-दूसरे की आत्मिक दशा के विषय में मीठी-मीठी बातें इसलिए कहते हैं कि वे यह मानना नहीं चाहते कि खतरा है। वे एक-दूसरे को निश्चिन्त, आत्म-सन्तुष्ट दशा में इसलिए बढ़ाते हैं कि अपने विवेक को शान्त करें और बातों को सुखद बनाए रखें। वे एक-दूसरे की कब्रों पर "शान्ति, शान्ति" पुकारते हैं, क्योंकि वे चाहते हैं कि ऐसा ही हो, और अपने आप को मनवाना चाहते हैं कि ऐसा ही है। निश्चय ही ऐसे खोखले, बिना नींव के मतों के विरुद्ध सुसमाचार का सेवक भली-भाँति विरोध प्रकट कर सकता है।

सीधी बात यह है कि धर्म के विषय में संसार की राय का कोई मूल्य नहीं है। बैल, घोड़े या खेत के दाम के विषय में, या मज़दूरी की क़ीमत के विषय में, — वेतन और काम के विषय में, — रुपये-पैसे, कपास, कोयले, लोहे और अनाज के विषय में, — कला, विज्ञान और उद्योग-धंधों के विषय में, — रेलों, व्यापार, वाणिज्य और राजनीति के विषय में, — ऐसी सब बातों के विषय में संसार के लोग शायद सही राय दे सकते हैं। परन्तु यदि हमें अपने प्राण प्यारे हैं तो उद्धार से सम्बन्ध रखनेवाली बातों में मनुष्य के न्याय से मार्गदर्शन पाने से हमें सावधान रहना चाहिए। "परन्तु शारीरिक मनुष्य परमेश्वर के आत्मा की बातें ग्रहण नहीं करता, क्योंकि वे उसकी दृष्टि में मूर्खता की बातें हैं।" (1 कुरिन्थियों 2:14।)

सबसे बढ़कर हम यह स्मरण रखें कि यदि हम स्वर्ग पहुँचना चाहते हैं तो दूसरों की तरह सोचने से कभी काम नहीं चलेगा। इसमें कोई सन्देह नहीं कि धर्म के विषय में "भीड़ के साथ चलना" सरल काम है। धारा और लहर के साथ बहने से हमारा बहुत कष्ट बच जाएगा। हम बहुत उपहास से बचे रहेंगे; बहुत-सी अप्रिय बातों से हमारा छुटकारा हो जाएगा। परन्तु आइए, हम एक बार सदा के लिए स्मरण रखें कि उद्धार के विषय में संसार की भूलें बहुत हैं और संकटपूर्ण हैं। जब तक हम उनसे सावधान न रहें, हमारा उद्धार कभी न होगा।

III. तीसरे स्थान पर मैं यह दिखाना चाहता हूँ कि उद्धार पानेवालों की संख्या के विषय में बाइबल क्या कहती है।

सत्य और भ्रम की जाँच के लिए केवल एक ही कसौटी है, जिसकी ओर हमें देखना चाहिए। वह कसौटी पवित्रशास्त्र है। जो कुछ वहाँ लिखा है, उसे हमें ग्रहण करना और मानना चाहिए; और जो कुछ पवित्रशास्त्र से प्रमाणित नहीं किया जा सकता, उसे हमें अस्वीकार कर देना चाहिए।

क्या इस लेख का कोई भी पाठक इससे सहमत हो सकता है? यदि वह सहमत नहीं हो सकता, तो मेरे किसी भी शब्द से उसके प्रभावित होने की आशा थोड़ी ही है। यदि वह सहमत हो सकता है, तो कुछ क्षण मेरी ओर ध्यान दे, और मैं उसे कुछ गम्भीर बातें बताऊँगा।

तो आइए, पहले तो हम पवित्रशास्त्र के एक ही पद को देखें और उसकी भली-भाँति जाँच करें। वह हमें मत्ती 7:13, 14 में मिलेगा: — "सकरे फाटक से प्रवेश करो, क्योंकि चौड़ा है वह फाटक और चाकल है वह मार्ग जो विनाश को पहुंचाता है; और बहुत से हैं जो उस से प्रवेश करते हैं। क्योंकि सकरा है वह फाटक और सकरा है वह मार्ग जो जीवन को पहुंचाता है, और थोड़े हैं जो उसे पाते हैं।" अब ये हमारे प्रभु यीशु मसीह के वचन हैं। ये उसी के वचन हैं जो सचमुच परमेश्वर था, और जिसके वचन कभी टल नहीं सकते। ये उसी के वचन हैं जो जानता था कि मनुष्य के मन में क्या है, — जो आनेवाली और बीती हुई बातों को जानता था, — जो जानता था कि वह अन्तिम दिन सब मनुष्यों का न्याय करेगा। और इन वचनों का अर्थ क्या है? क्या ये ऐसे वचन हैं जिन्हें इब्रानी या यूनानी भाषा जाने बिना कोई नहीं समझ सकता? नहीं, ऐसे नहीं हैं! क्या ये किसी गूढ़, अपूर्ण भविष्यद्वाणी के समान हैं, जैसे प्रकाशित वाक्य के दर्शन या यहेजकेल के मन्दिर का वर्णन? नहीं, ऐसे नहीं हैं! क्या ये कोई गहरी रहस्यमयी बात हैं जिसकी थाह मनुष्य की बुद्धि नहीं पा सकती? नहीं, ऐसे नहीं हैं! ये वचन स्पष्ट, सीधे और असन्दिग्ध हैं। किसी भी पढ़ना जाननेवाले मज़दूर से पूछ लीजिए, वह आपको यही बताएगा। इनका केवल एक ही अर्थ हो सकता है। इनका अर्थ यह है कि बहुत लोग नाश होंगे और थोड़े लोग उद्धार पाए हुए पाए जाएँगे।

फिर, दूसरे स्थान पर, आइए धर्म के विषय में मनुष्य जाति का सारा इतिहास देखें, जैसा वह बाइबल में दिया गया है। आइए, उन पूरे चार हज़ार वर्षों पर दृष्टि डालें जिन तक बाइबल का इतिहास फैला हुआ है। यदि हम पा सकें तो ऐसा एक भी समय ढूँढ़ें जब भक्त लोग बहुत थे और अभक्त लोग थोड़े।

नूह के दिनों में कैसा था? हमें स्पष्ट बताया गया है कि पृथ्वी "उपद्रव से भर गई थी।" मनुष्य के मन के विचार केवल "बुरे ही होते थे और निरन्तर बुरे" ही होते थे। (उत्पत्ति 6:5, 12।) "सब प्राणियों ने पृथ्वी पर अपनी अपनी चाल बिगाड़ ली थी।" अदन की वाटिका की हानि भुला दी गई थी। नूह के मुँह से दी गई परमेश्वर की चेतावनियों को तुच्छ जाना गया। और अन्त में जब जल-प्रलय संसार पर आया और हर एक जीवित प्राणी को डुबा दिया, तब केवल आठ प्राणी थे जिनमें इतना विश्वास था कि शरण के लिए जहाज़ की ओर भाग गए! और क्या उन दिनों बहुत लोगों का उद्धार हुआ? बाइबल का कोई भी निष्कपट पाठक इस प्रश्न का उत्तर दे। इसमें कोई सन्देह नहीं कि उत्तर क्या होना चाहिए।

अब्राहम, इसहाक और लूत के दिनों में कैसा था? यह प्रत्यक्ष है कि धर्म के विषय में वे बहुत अकेले ही खड़े थे। जिस घराने में से वे बुलाए गए थे वह मूरतपूजकों का घराना था। जिन जातियों के बीच वे रहते थे वे घोर अन्धकार और पाप में डूबी हुई थीं। जब सदोम और अमोरा जलाए गए तब मैदान के उन चार नगरों में पाँच धर्मी जन भी नहीं मिले। जब अब्राहम और इसहाक ने अपने पुत्रों के लिए पत्नियाँ ढूँढ़नी चाहीं, तब उस देश में, जहाँ वे परदेशी होकर रहते थे, एक भी स्त्री न थी जिससे वे उनका विवाह होते देखना चाहते। और क्या उन दिनों बहुत लोगों का उद्धार हुआ? बाइबल का कोई भी निष्कपट पाठक इस प्रश्न का उत्तर दे। इसमें कोई सन्देह नहीं कि उत्तर क्या होना चाहिए।

न्यायियों के दिनों में इस्राएल की दशा कैसी थी? न्यायियों की पुस्तक को पढ़कर कोई भी मनुष्य की भ्रष्टता के उन दुःखद उदाहरणों से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता जो उसमें मिलते हैं। बार-बार हमें बताया जाता है कि लोग परमेश्वर को छोड़कर मूरतों के पीछे चले। स्पष्टतम चेतावनियों के होते हुए भी वे कनानियों से सम्बन्ध जोड़ बैठे और उनके कामों को सीख लिया। बार-बार हम पढ़ते हैं कि उनके पापों के कारण परदेशी राजाओं ने उन पर अत्याचार किया, और तब चमत्कारिक रीति से उनका छुटकारा हुआ। बार-बार हम पढ़ते हैं कि उस छुटकारे को भुला दिया गया और लोग अपने पहले पापों में ऐसे लौट गए जैसे नहलाई हुई सूअरनी कीचड़ में लोटने को लौट जाती है। और क्या उन दिनों बहुत लोगों का उद्धार हुआ? बाइबल का कोई भी निष्कपट पाठक इस प्रश्न का उत्तर दे। इसमें कोई सन्देह नहीं कि उत्तर क्या होना चाहिए।

राजाओं के दिनों में इस्राएल की दशा कैसी थी? पहले राजा शाऊल से लेकर अन्तिम राजा सिदकिय्याह तक उनका इतिहास पीछे हटने, गिरावट और मूर्तिपूजा का एक दुखभरा वृत्तान्त है — बीच-बीच में केवल कुछ उज्ज्वल अपवाद-काल हैं। सबसे अच्छे राजाओं के समय में भी अविश्वास और अभक्ति की एक बड़ी मात्रा दिखाई देती है, जो केवल कुछ समय के लिए छिपी रहती थी और पहला अनुकूल अवसर मिलते ही फूट पड़ती थी। बार-बार हम पाते हैं कि अत्यन्त उत्साही राजाओं के अधीन भी "ऊँचे स्थान नहीं गिराए गए।" ध्यान दो कि दाऊद भी अपने चारों ओर की दशा के विषय में कैसा कहता है: "हे यहोवा बचा ले, क्योंकि भक्त जन नहीं रहे; और विश्वासयोग्य लोग मनुष्यों में से मिट गए हैं।" (भजन संहिता 12:1।) ध्यान दो कि यशायाह यहूदा और यरूशलेम की दशा का वर्णन कैसे करता है: "सारा सिर रोगी और सारा हृदय उदास है। नख से सिर तक कहीं भी कुछ आरोग्यता नहीं।" — "यदि सेनाओं का यहोवा हमारे थोड़े से लोगों को न बचा रखता, तो हम सदोम के समान हो जाते, और अमोरा के समान ठहरते।" (यशायाह 1:5-9।) ध्यान दो कि यिर्मयाह अपने समय का वर्णन कैसे करता है: "यरूशलेम की सड़कों पर इधर-उधर दौड़कर देखो, और जानो, और उसके चौकों में खोजो कि कोई मनुष्य मिल सकता है या नहीं, जो न्याय से काम करता और सच्चाई का खोजी हो; और मैं उसका पाप क्षमा करूँगा।" (यिर्मयाह 5:1।) ध्यान दो कि यहेजकेल अपने समय के लोगों के विषय में क्या कहता है: "यहोवा का यह वचन मेरे पास पहुँचा, हे मनुष्य के सन्तान, इस्राएल का घराना मेरे लिये धातु का मैल हो गया है; वे सब भट्ठी के बीच पीतल, राँगा, लोहा और सीसा ही रह गए हैं; वे चाँदी का मैल ही हैं।" (यहेजकेल 22:17,18।) ध्यान दो कि अपनी भविष्यद्वाणी के सोलहवें और तेईसवें अध्याय में वह यहूदा और इस्राएल के राज्यों के विषय में क्या कहता है। और क्या उन दिनों में बहुत लोग उद्धार पाए? बाइबल का कोई भी ईमानदार पाठक इस प्रश्न का उत्तर दे। इसमें कोई सन्देह नहीं कि उत्तर क्या होगा।

जब हमारे प्रभु यीशु मसीह पृथ्वी पर थे, तब यहूदियों की दशा कैसी थी? उनकी आत्मिक दशा का सबसे उत्तम वर्णन यूहन्ना के ये शब्द हैं: "वह अपने घर आया और उसके अपनों ने उसे ग्रहण नहीं किया।" (यूहन्ना 1:11।)

वह ऐसा जीवन जिया जैसा स्त्री से जन्मे किसी ने पहले कभी नहीं जिया था — निर्दोष, निष्कलंक, पवित्र जीवन। "वह भलाई करता फिरा।" (प्रेरितों के काम 10:38।) उसने ऐसा प्रचार किया जैसा किसी ने पहले कभी नहीं किया। उसके शत्रुओं के सिपाहियों ने भी माना, "किसी मनुष्य ने कभी ऐसी बातें नहीं कीं।" (यूहन्ना 7:46।) उसने अपनी सेवकाई की पुष्टि के लिए ऐसे चमत्कार किए जिनसे पहली दृष्टि में हम सोच सकते थे कि अत्यन्त कठोर मनवाले भी मान लेंगे। परन्तु इस सब के होते हुए भी यहूदियों के बहुत बड़े भाग ने उस पर विश्वास करने से इनकार कर दिया। हमारे प्रभु के पूरे फिलिस्तीन के सब भ्रमणों में उसके पीछे चलो, तो तुम सदा वही कहानी पाओगे। नगर में उसके पीछे चलो, और जंगल में उसके पीछे चलो; कफरनहूम और नासरत में उसके पीछे चलो, और यरूशलेम में उसके पीछे चलो; शास्त्रियों और फरीसियों के बीच उसके पीछे चलो, और सदूकियों और हेरोदियों के बीच उसके पीछे चलो: सब जगह तुम इसी परिणाम पर पहुँचोगे। वे चकित हुए; — वे चुप हो गए; — वे अचम्भे में पड़े; — उन्होंने आश्चर्य किया; — पर बहुत थोड़े ही चेले बने! जाति का बहुत बड़ा भाग उसकी शिक्षा को किसी भी प्रकार नहीं चाहता था, और उन्होंने उसे मार डालकर अपनी सारी दुष्टता का मुकुट पहना दिया। और क्या उन दिनों में बहुत लोग उद्धार पाए? बाइबल का कोई भी ईमानदार पाठक इस प्रश्न का उत्तर दे। इसमें कोई सन्देह नहीं कि उत्तर क्या होगा।

प्रेरितों के दिनों में संसार की दशा कैसी थी? यदि कभी कोई ऐसा समय था जब सच्चा धर्म फला-फूला, तो वह वही समय था। पवित्र आत्मा ने इतने कम समय में कभी इतनी आत्माओं को मसीह के झुण्ड में नहीं बुलाया। सुसमाचार के प्रचार से इतने मन-परिवर्तन कभी नहीं हुए जितने तब हुए जब पौलुस और उसके सहकर्मी प्रचारक थे। फिर भी प्रेरितों के काम से स्पष्ट है कि सच्चे मसीही धर्म के विरोध में "हर जगह लोग बोलते" थे। (प्रेरितों के काम 28:22।) यह प्रत्यक्ष है कि हर नगर में, यहाँ तक कि स्वयं यरूशलेम में भी, सच्चे मसीही थोड़े ही थे। हम सब प्रकार के संकटों के विषय में पढ़ते हैं जिनमें से प्रेरितों को निकलना पड़ा — न केवल बाहर के संकट, वरन् भीतर के संकट भी, — न केवल अन्यजातियों की ओर से संकट, वरन् झूठे भाइयों की ओर से भी। पौलुस जिस किसी नगर में गया, शायद ही किसी का वर्णन हमें मिलता हो जहाँ वह खुली हिंसा और सताव के खतरे में न पड़ा हो। उसकी कुछ पत्रियों से स्पष्ट दिखता है कि मसीही होने का दावा करनेवाली कलीसियाएँ मिली-जुली मण्डलियाँ थीं, जिनमें बहुत से सड़े हुए सदस्य थे। हम उसे फिलिप्पियों को अपने अनुभव का एक पीड़ादायक भाग बताते हुए पाते हैं, —

"क्योंकि बहुत से ऐसे चलते हैं, जिनकी चर्चा मैं ने तुम से बार बार की है और अब भी रोकर कहता हूँ, कि वे अपने चाल-चलन से मसीह के क्रूस के बैरी हैं। उनका अन्त विनाश है, उनका ईश्वर पेट है, और वे अपनी लज्जा की बातों पर महिमा करते हैं, और पृथ्वी की वस्तुओं पर मन लगाए रहते हैं।" (फिलिप्पियों 3:18,19।) और क्या उन दिनों में बहुत लोग उद्धार पाए? बाइबल का कोई भी ईमानदार पाठक इस प्रश्न का उत्तर दे। इसमें कोई सन्देह नहीं कि वह उत्तर क्या होगा।

मैं इस पुस्तक के हर ईमानदार, निष्पक्ष पाठक से कहता हूँ कि बाइबल की उन शिक्षाओं को भली-भाँति तौले जो मैं ने अभी प्रस्तुत की हैं। निश्चय ही वे गम्भीर और गम्भीरतापूर्वक विचार करने योग्य हैं।

कोई यह कहकर उनके बल से बचने का प्रयत्न न करे कि बाइबल केवल यहूदियों की कहानी कहती है। यह कहकर अपने को तसल्ली देने की न सोचो कि "शायद यहूदी अन्य जातियों से अधिक दुष्ट थे, और अन्य जातियों में बहुत लोग उद्धार पाए होंगे, चाहे यहूदियों में थोड़े ही उद्धार पाए।" तुम भूल जाते हो कि यह तर्क तुम्हारे ही विरुद्ध जाता है। तुम भूल जाते हो कि यहूदियों के पास ज्योति और विशेषाधिकार थे जो अन्यजातियों के पास नहीं थे, और अपने सब पापों और दोषों के होते हुए भी वे सम्भवतः पृथ्वी की सबसे पवित्र और सबसे नीतिमान जाति थे। अश्शूरियों, मिस्रियों, यूनानियों और रोमियों के लोगों की नैतिक दशा कैसी रही होगी, यह सोचकर भय लगता है। परन्तु इतना हम निश्चित जान सकते हैं — कि यदि यहूदियों में बहुत लोग अभक्त थे, तो अन्यजातियों में उनकी संख्या कहीं अधिक थी। यदि हरे वृक्ष में थोड़े ही बचे, तो हाय, सूखे में कितने और भी थोड़े बचे होंगे!

सारी बात का सार यह है: बाइबल और संसार के लोग उद्धार पानेवालों की संख्या के विषय में बहुत भिन्न बातें कहते हैं। बाइबल के अनुसार थोड़े ही लोग उद्धार पाएँगे; संसार के लोगों के अनुसार बहुत से। — संसार के लोगों के अनुसार थोड़े ही नरक जा रहे हैं; बाइबल के अनुसार थोड़े ही स्वर्ग जा रहे हैं। — संसार के लोगों के अनुसार उद्धार एक सहज बात है; बाइबल के अनुसार मार्ग सकरा है और फाटक सकेत है। — संसार के लोगों के अनुसार अन्त में बहुत थोड़े लोग ऐसे मिलेंगे जो बहुत देर हो जाने पर स्वर्ग में प्रवेश माँगेंगे; बाइबल के अनुसार बहुत से लोग उस शोचनीय दशा में होंगे, और व्यर्थ पुकारेंगे, "हे प्रभु, हे प्रभु, हमारे लिये खोल दे।" फिर भी बाइबल कभी ग़लत नहीं निकली। सोर, मिस्र, बाबुल और नीनवे के विषय में सबसे अनहोनी और असम्भव जान पड़नेवाली भविष्यद्वाणियाँ अक्षर-अक्षर पूरी हो चुकी हैं। और जैसे अन्य बातों में, वैसे ही उद्धार पानेवालों की संख्या के विषय में भी होगा। बाइबल बिलकुल सही और संसार के लोग बिलकुल ग़लत ठहरेंगे।

IV. अन्त में मैं उद्धार पानेवालों की संख्या के विषय में कुछ सीधे-सादे तथ्य दिखाना चाहता हूँ।

मैं इस विषय के इस भाग पर विशेष ध्यान दिलाता हूँ।

मैं भली-भाँति जानता हूँ कि लोग अपने आप को यह कहकर बहलाते हैं कि संसार अठारह सौ वर्ष पहले की अपेक्षा कहीं अधिक अच्छा और बुद्धिमान हो गया है। हमारे पास कलीसियाएँ, पाठशालाएँ और पुस्तकें हैं। हमारे पास सभ्यता, स्वतंत्रता और अच्छे नियम हैं। समाज में नैतिकता का स्तर उस स्तर से कहीं ऊँचा है जो कभी प्रचलित था। हम ऐसे सुख-सुविधाओं और आनन्द के साधन पा सकते हैं जिनके विषय में हमारे पूर्वज कुछ नहीं जानते थे। भाप, गैस, बिजली और रसायन-विज्ञान ने हमारे लिये आश्चर्यकर्म कर दिखाए हैं। यह सब पूरी तरह सच है। मैं इसे देखता हूँ और धन्यवादी हूँ। परन्तु इस सब से इस प्रश्न का महत्त्व कम नहीं होता — क्या हम में से थोड़े उद्धार पाएँगे या बहुत?

मुझे पूरा निश्चय है कि इस प्रश्न के महत्त्व की दुखद रीति से उपेक्षा की जाती है। मुझे विश्वास है कि संसार में अविश्वास और पाप की मात्रा के विषय में अधिकतर लोगों के विचार नितान्त अपर्याप्त और अशुद्ध हैं। मुझे प्रतीति है कि बहुत कम लोग, चाहे वे सेवक हों या साधारण मसीही, इस बात को समझते हैं कि उद्धार के मार्ग पर कितने थोड़े लोग हैं। मैं इस विषय की ओर ध्यान खींचना चाहता हूँ, इसलिये इसके विषय में कुछ सीधे-सादे तथ्य सामने रखूँगा।

परन्तु ये तथ्य मैं कहाँ से लाऊँ? मैं आसानी से उन करोड़ों अन्यजातियों की ओर मुड़ सकता हूँ, जो संसार के भिन्न-भिन्न भागों में उसकी आराधना कर रहे हैं जिसे वे जानते नहीं। परन्तु मैं ऐसा नहीं करूँगा। — मैं आसानी से उन करोड़ों मुसलमानों की ओर मुड़ सकता हूँ जो बाइबल से अधिक कुरान का और मसीह से अधिक मक्का के झूठे भविष्यद्वक्ता का आदर करते हैं। परन्तु मैं ऐसा नहीं करूँगा। — मैं आसानी से उन करोड़ों रोमन कैथोलिकों की ओर मुड़ सकता हूँ जो अपनी परम्पराओं से परमेश्वर के वचन को निष्फल कर रहे हैं। परन्तु मैं ऐसा नहीं करूँगा। मैं अपने अधिक निकट देखूँगा। मैं अपने तथ्य उसी देश से लूँगा जिसमें मैं रहता हूँ, और फिर हर ईमानदार पाठक से पूछूँगा कि क्या यह बिलकुल सच नहीं कि थोड़े ही उद्धार पाते हैं।

मैं इन पृष्ठों के किसी भी समझदार पाठक को आमन्त्रित करता हूँ कि वह अपने आप को आज के प्रोटेस्टेंट इंग्लैंड या स्कॉटलैंड के किसी भी गाँव या नगर की बस्ती में कल्पना करे। जो चाहे चुन लो, नगर की बस्ती या देहात की बस्ती, — बड़ी या छोटी। आओ हम अपने हाथों में अपना-अपना नया नियम लें। आओ हम इस बस्ती के निवासियों के मसीही जीवन को परिवार-परिवार और मनुष्य-मनुष्य करके छानें। जिस किसी के पास सच्चे मसीही होने का नए नियम का प्रमाण न हो, उसे एक ओर रख दें। आओ हम जाँच में खरे और निष्पक्ष रहें, और किसी को सच्चा मसीही न मानने दें जो विश्वास और आचरण के नए नियम के स्तर तक न पहुँचता हो। आओ हम हर उस मनुष्य को उद्धार पाई हुई आत्मा गिनें जिसमें हम मसीह की कुछ झलक देखें, — सच्चे मन फिराव का कुछ प्रमाण, — यीशु में उद्धार दिलानेवाले विश्वास का कुछ प्रमाण, — सच्ची सुसमाचारीय पवित्रता का कुछ प्रमाण। आओ हम हर उस मनुष्य को, जिसमें अत्यन्त उदार दृष्टि से देखने पर भी हम ये प्रमाण न देख सकें, उसके समान ठुकरा दें जो "तराजू में तौला गया और घटी में निकला।" आओ हम इस छानने की रीति को इस देश की किसी भी बस्ती पर लगाएँ, और देखें कि परिणाम क्या निकलेगा।

(क) आओ हम सबसे पहले बस्ती के उन लोगों को अलग करें जो किसी भी प्रकार के खुले पाप में जी रहे हैं। इनसे मेरा अभिप्राय व्यभिचारियों, परस्त्रीगामियों, झूठों, चोरों, पियक्कड़ों, ठगों, निन्दकों और अन्धेर करनेवालों से है। इनके विषय में मैं समझता हूँ कि कोई मतभेद नहीं हो सकता। बाइबल साफ़ कहती है, कि "ऐसे ऐसे काम करनेवाले परमेश्वर के राज्य के वारिस न होंगे।" (गलातियों 5:21।) अब क्या ये लोग उद्धार पाएँगे? मेरे अपने मन में उत्तर स्पष्ट है: अपनी वर्तमान दशा में वे उद्धार नहीं पाएँगे।

(ख) आओ हम अगले स्थान पर उन लोगों को अलग करें जो विश्रामदिन को तोड़नेवाले हैं। इस शब्द से मेरा अभिप्राय उनसे है जो सामर्थ्य रहते हुए भी आराधना के स्थान में कभी-कभार ही जाते हैं या कभी नहीं जाते, — जो विश्रामदिन परमेश्वर को नहीं, अपने आप को देते हैं, — जो रविवार को अपनी ही चाल चलने और अपना ही सुख ढूँढ़ने के सिवाय और कुछ नहीं सोचते। वे साफ़ दिखाते हैं कि वे स्वर्ग के योग्य नहीं हैं! स्वर्ग के निवासियों की संगति उन्हें अच्छी नहीं लगेगी। स्वर्ग के काम उनके लिये आनन्द नहीं, थकान होंगे। अब क्या ये लोग उद्धार पाएँगे? मेरे मन में उत्तर स्पष्ट है: अपनी वर्तमान दशा में वे उद्धार नहीं पाएँगे।

(ग) आओ हम अगले स्थान पर उन सब लोगों को अलग करें जो लापरवाह और विचारहीन मसीही हैं। इस शब्द से मेरा अभिप्राय उनसे है जो धर्म की बहुत सी बाहरी विधियों में भाग लेते हैं, परन्तु उसके सिद्धान्तों और सार में सच्ची रुचि लेने का कोई चिह्न नहीं दिखाते। उन्हें इसकी थोड़ी ही चिन्ता है कि सेवक सुसमाचार का प्रचार करता है या नहीं। उन्हें इसकी थोड़ी ही चिन्ता है कि वे कोई अच्छा उपदेश सुनें या नहीं। यदि संसार की सारी बाइबलें जला दी जाएँ तो उन्हें थोड़ी ही चिन्ता होगी। यदि संसद में कोई ऐसा अधिनियम पारित हो जाए जो किसी को प्रार्थना करने से रोके, तो उन्हें थोड़ी ही चिन्ता होगी। संक्षेप में, उनके लिये धर्म "एक ही बात जो आवश्यक है" नहीं है। उनका धन पृथ्वी पर है। वे बिलकुल गल्लियो के समान हैं, जिसके लिये इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता था कि लोग यहूदी हैं या मसीही; उसने "इन बातों की कुछ चिन्ता न की।" (प्रेरितों के काम 18:17।) अब क्या ये लोग उद्धार पाएँगे? मेरे अपने मन में उत्तर स्पष्ट है: अपनी वर्तमान दशा में वे उद्धार नहीं पाएँगे।

(घ) आगे, उन सब लोगों को भी अलग कर दें जो कर्मकाण्डी और आत्म-धर्मी हैं। इस शब्द से मेरा तात्पर्य उनसे है जो मसीही धर्म के रीति-रिवाजों के नियमित पालन पर अपने आप को गौरवान्वित मानते हैं, और परमेश्वर के सम्मुख ग्रहण किए जाने के लिए सीधे या परोक्ष रूप से अपने ही कामों पर भरोसा रखते हैं। मेरा तात्पर्य उन सब से है जो अपनी आत्मा को मसीह के कार्य को छोड़ किसी और कार्य पर, या मसीह की धार्मिकता को छोड़ किसी और धार्मिकता पर टिकाते हैं। ऐसे लोगों के विषय में प्रेरित पौलुस ने स्पष्ट गवाही दी है, "व्यवस्था के कामों से कोई प्राणी उसके सामने धर्मी नहीं ठहरेगा।" — "उस नींव को छोड़ जो पड़ी है, और वह यीशु मसीह है, कोई दूसरी नींव नहीं डाल सकता।" (रोमियों 3:20; 1 कुरिन्थियों 3:11)। और ऐसे वचनों के सामने क्या हम कह सकते हैं कि ऐसे लोग उद्धार पाएँगे? मेरे अपने मन में उत्तर स्पष्ट है: अपनी वर्तमान दशा में वे उद्धार नहीं पाएँगे।

(ङ) आगे, उन सब लोगों को भी अलग कर दें जो सुसमाचार को सिर से तो जानते हैं, पर हृदय से उसका पालन नहीं करते। ये वे अभागे लोग हैं जिनके पास जीवन का मार्ग देखने के लिए आँखें तो हैं, पर उस पर चलने की इच्छा या साहस नहीं। वे खरी शिक्षा को अच्छा मानते हैं। जिस प्रचार में वह न हो, उसे वे नहीं सुनेंगे। परन्तु मनुष्य का भय, या संसार की चिन्ताएँ, या धन का लोभ, या सम्बन्धियों को अप्रसन्न करने का डर उन्हें निरन्तर पीछे खींचता रहता है। वे साहस के साथ आगे नहीं आएँगे, न क्रूस उठाएँगे, न मनुष्यों के सामने मसीह को मानेंगे। इनके विषय में भी बाइबल स्पष्ट कहती है: "विश्वास यदि कर्म सहित न हो तो अपने स्वभाव में मरा हुआ है।" — "जो कोई भलाई करना जानता है और नहीं करता, उसके लिये यह पाप है।" — "जो कोई मुझ से और मेरी बातों से लजाएगा, मनुष्य का पुत्र भी जब अपनी और अपने पिता की, और पवित्र स्वर्गदूतों की महिमा में आएगा, तो उस से लजाएगा।" (याकूब 2:17; 4:17; लूका 9:26)। क्या हम कहें कि ऐसे लोग उद्धार पाएँगे? मेरे अपने मन में उत्तर स्पष्ट है: अपनी वर्तमान दशा में वे उद्धार नहीं पाएँगे।

(च) अन्त में, उन सब लोगों को भी अलग कर दें जो कपटी अंगीकार करनेवाले हैं। इस शब्द से मेरा तात्पर्य उन सब से है जिनका धर्म बातों और ऊँचे अंगीकार में ही सीमित है, और कुछ नहीं। ये वे लोग हैं जिनके विषय में भविष्यद्वक्ता यहेजकेल कहता है, "वे अपने मुँह से तो बहुत प्रेम दिखाते हैं, परन्तु उनका मन लालच ही में लगा रहता है।" — "वे कहते हैं कि हम परमेश्वर को जानते हैं, पर अपने कामों से उसका इन्कार करते हैं।" — वे "भक्ति का भेष तो रखते हैं, पर उसकी शक्ति को नहीं मानते।" (यहेजकेल 33:31; तीतुस 1:16; 2 तीमुथियुस 3:5)। वे कलीसिया में सन्त हैं, और सार्वजनिक रूप से बात करने में सन्त हैं। परन्तु वे एकान्त में और अपने घरों में सन्त नहीं हैं; और सबसे बुरी बात यह कि वे हृदय में सन्त नहीं हैं। ऐसे लोगों के विषय में कोई विवाद नहीं हो सकता। क्या हम कहें कि वे उद्धार पाएँगे? केवल एक ही उत्तर हो सकता है: अपनी वर्तमान दशा में वे उद्धार नहीं पाएँगे।

और अब, इन वर्गों को जिनका मैंने वर्णन किया अलग कर देने के बाद, मैं किसी भी समझदार, विचारशील पाठक से पूछता हूँ कि इंग्लैण्ड के किसी भी पल्ली में कितने लोग बच रहेंगे? किसी पल्ली को भली-भाँति और ईमानदारी से छान लेने के बाद कितने स्त्री-पुरुष ऐसे रह जाएँगे जो उद्धार के मार्ग पर हैं? कितने सच्चे पश्चात्तापी, कितने मसीह में सच्चे विश्वासी, कितने सच्चे पवित्र लोग मिलेंगे? मैं इस पुस्तक के हर पाठक के विवेक से यह बात रखता हूँ कि वह परमेश्वर की दृष्टि में ईमानदारी से उत्तर दे। मैं तुम से पूछता हूँ कि बाइबल लेकर इस रीति से किसी पल्ली को छान लेने के बाद क्या तुम इसके सिवाय किसी और निष्कर्ष पर पहुँच सकते हो कि बहुत थोड़े लोग, खेदजनक रूप से बहुत थोड़े लोग, उद्धार के मार्ग पर हैं?

इस निष्कर्ष पर पहुँचना पीड़ादायक है, परन्तु मैं नहीं जानता कि इससे कैसे बचा जाए। यह भयानक और झकझोर देनेवाला विचार है कि इंग्लैण्ड में इतने कलीसिया के लोग हों, और इतने असहमत सम्प्रदायों के लोग, इतने स्थान-धारक और इतने बैठक-भाड़ा देनेवाले, इतने सुननेवाले और इतने प्रभु-भोज में सम्मिलित होनेवाले, और फिर भी अन्त में उद्धार के मार्ग पर इतने थोड़े! परन्तु केवल एक ही प्रश्न है: क्या यह सच नहीं है? — तथ्यों की ओर से आँखें मूँद लेना व्यर्थ है। अपने आसपास जो हो रहा है उसे न देखने का बहाना करना निरर्थक है। बाइबल के कथन और जिस संसार में हम रहते हैं उसके तथ्य हमें एक ही निष्कर्ष की ओर ले जाते हैं: बहुत से नाश हो रहे हैं, और थोड़े उद्धार पा रहे हैं!

(क) मैं भली-भाँति जानता हूँ कि बहुत से लोग मेरी बात पर विश्वास नहीं करते, क्योंकि वे सोचते हैं कि मृत्यु-शय्या पर मन फिराव बहुत बड़ी संख्या में होता है। वे अपने आप को यह कहकर बहलाते हैं कि जो बहुत से लोग धार्मिक जीवन नहीं जीते, वे फिर भी धार्मिक मृत्यु मरेंगे। वे इस विचार से तसल्ली पाते हैं कि बहुत बड़ी संख्या में लोग अपनी अन्तिम बीमारी में परमेश्वर की ओर फिरते हैं और ग्यारहवें घण्टे में उद्धार पाते हैं। मैं ऐसे लोगों को केवल इतना स्मरण दिलाऊँगा कि सेवकों का सारा अनुभव इस धारणा के बिलकुल विरुद्ध है। लोग प्रायः वैसे ही मरते हैं जैसे वे जीए हैं। सच्चा मन फिराव कभी देर से नहीं होता; परन्तु जीवन के अन्तिम घण्टों तक टाला गया मन फिराव शायद ही कभी सच्चा होता है। मनुष्य का जीवन उसकी आत्मिक दशा का सबसे पक्का प्रमाण है, और यदि जीवन ही गवाह ठहरें तो थोड़े ही लोगों के उद्धार पाने की सम्भावना है।

(ख) मैं भली-भाँति जानता हूँ कि बहुत से लोग मेरी बात पर विश्वास नहीं करते, क्योंकि वे कल्पना करते हैं कि यह परमेश्वर की दया के विरुद्ध है। वे उस प्रेम पर ध्यान लगाते हैं जो सुसमाचार पापियों के प्रति प्रकट करता है।

वे उन क्षमा और पापमोचन की प्रस्तावनाओं की ओर संकेत करते हैं जो बाइबल में भरपूर हैं। वे हमसे पूछते हैं कि क्या इस सब के रहते हुए भी हम यह मानते हैं कि केवल थोड़े ही लोग उद्धार पाएँगे। मैं उत्तर देता हूँ, कि मसीह में परमेश्वर की दया को ऊँचा ठहराने में मैं किसी से पीछे नहीं हूँ, परन्तु मैं इस तथ्य की ओर से आँखें बन्द नहीं कर सकता कि जब तक यह दया जान-बूझकर ठुकराई जाती है तब तक वह किसी मनुष्य को कोई लाभ नहीं पहुँचाती। मनुष्य के उद्धार के लिए परमेश्वर की ओर से मुझे कोई कमी दिखाई नहीं देती। मैं स्वर्ग में सबसे बड़े पापी के लिए भी स्थान देखता हूँ। मैं मसीह में अत्यन्त अधर्मी को भी ग्रहण करने की इच्छा देखता हूँ। मैं पवित्र आत्मा में अत्यन्त अधर्मी को भी नया बनाने की सामर्थ्य देखता हूँ। परन्तु दूसरी ओर मैं मनुष्य में भयंकर अविश्वास देखता हूँ: जो कुछ परमेश्वर उसे बाइबल में बताता है, उस पर वह विश्वास नहीं करेगा। मैं मनुष्य में भयंकर अभिमान देखता हूँ: वह सुसमाचार को छोटे बालक के समान ग्रहण करने के लिए अपना हृदय नहीं झुकाएगा। मैं मनुष्य में भयंकर आलस्य देखता हूँ: वह उठकर परमेश्वर को पुकारने का कष्ट नहीं उठाएगा। मैं मनुष्य में भयंकर संसारिकता देखता हूँ: वह समय की इन तुच्छ नाशमान वस्तुओं पर से अपनी पकड़ ढीली नहीं करेगा और अनन्तकाल का विचार नहीं करेगा। संक्षेप में, मैं अपने प्रभु के वचनों को निरन्तर सच होते देखता हूँ: "तुम जीवन पाने के लिये मेरे पास आना नहीं चाहते" (यूहन्ना 5:40), और इसलिए मैं इस दुःखद निष्कर्ष पर पहुँचने को विवश हूँ कि थोड़े ही लोगों के उद्धार पाने की सम्भावना है।

(ग) मैं भली-भाँति जानता हूँ कि बहुत से लोग मेरी बात पर विश्वास नहीं करेंगे, क्योंकि वे उस बुराई को देखने से इनकार करते हैं जो संसार में है। वे भले लोगों के एक छोटे से घेरे के बीच रहते हैं; उस घेरे के बाहर संसार में जो कुछ होता है उसके विषय में वे बहुत कम जानते हैं। वे हमसे कहते हैं कि संसार ऐसा संसार है जो तेज़ी से सुधर रहा है और सिद्धता की ओर बढ़ रहा है। वे अपनी उँगलियों पर गिनते हैं कि पिछले वर्ष उन्होंने कितने भले सेवकों को सुना और देखा। वे हमारा ध्यान धार्मिक संस्थाओं और धार्मिक सभाओं की संख्या की ओर, चन्दे में दिए गए धन की ओर, और निरन्तर बाँटी जा रही बाइबलों और पत्रिकाओं की ओर दिलाते हैं। वे हमसे पूछते हैं कि क्या इस सब के रहते हुए भी हम सचमुच यह कहने का साहस करते हैं कि थोड़े ही लोग उद्धार के मार्ग पर हैं। उत्तर में मैं इन भले लोगों को केवल यह स्मरण दिलाऊँगा कि संसार में उनके अपने छोटे घेरे के अतिरिक्त और भी लोग हैं, और उन थोड़े चुने हुए लोगों के अतिरिक्त, जिन्हें वे अपनी मण्डली में जानते हैं, और भी स्त्री-पुरुष हैं। मैं उनसे विनती करता हूँ कि अपनी आँखें खोलें और वस्तुओं को वैसा ही देखें जैसी वे वास्तव में हैं। मैं उन्हें विश्वास दिलाता हूँ कि हमारे इस देश में ऐसी बातें हो रही हैं जिनसे वे इस समय सुखद अनजान हैं। मैं उनसे कहता हूँ कि मुझे उतावली से दोषी ठहराने से पहले इंग्लैंड के किसी भी पल्ली या मण्डली को बाइबल के साथ परखकर देखें। मैं उनसे कहता हूँ, यदि वे यह ईमानदारी से करेंगे, तो वे शीघ्र ही पाएँगे कि जब मैं यह कहता हूँ कि थोड़े ही लोगों के उद्धार पाने की सम्भावना है, तो मैं सत्य से बहुत दूर नहीं हूँ।

(घ) मैं भली-भाँति जानता हूँ कि बहुत से लोग मुझ पर विश्वास नहीं करेंगे, क्योंकि वे सोचते हैं कि ऐसा सिद्धान्त बहुत संकीर्ण और बहिष्कारक है। मैं इस आरोप का पूर्णतः खण्डन करता हूँ। मैं उन मसीहियों से कोई सहानुभूति नहीं रखता जो अपनी संगति से बाहर के सब लोगों को दोषी ठहराते हैं, और जान पड़ता है कि उन सब के लिए स्वर्ग का द्वार बन्द कर देते हैं जो हर बात को उनकी आँखों से नहीं देखते। चाहे वह रोमन कैथोलिक हो, या एपिस्कोपल, या फ्री चर्च का, या बैपटिस्ट, या प्लायमाउथ ब्रदरन का जन हो, जो कोई भी ऐसा करता है, मैं उसे बहिष्कारक मनुष्य गिनता हूँ। मेरी कोई इच्छा नहीं कि मैं किसी के लिए भी स्वर्ग के राज्य को बन्द करूँ। मैं केवल इतना कहता हूँ कि उस राज्य में केवल वही प्रवेश करेंगे जो मन फिराए हुए, विश्वास करनेवाले और पवित्र आत्माएँ हैं; और मैं केवल इतना कहने का उत्तरदायित्व अपने ऊपर लेता हूँ कि बाइबल और तथ्य दोनों मिलकर यह प्रमाणित करते हैं कि ऐसे लोग थोड़े हैं।

(ङ) मैं भली-भाँति जानता हूँ कि बहुत से लोग मेरी बात पर विश्वास नहीं करेंगे, क्योंकि वे इसे एक निराशाजनक, निर्दय सिद्धान्त समझते हैं। इस प्रकार के अस्पष्ट, सामान्य कथन कर देना सरल है। यह दिखाना इतना सरल नहीं कि जो सिद्धान्त पवित्रशास्त्र के अनुसार और सत्य है वह "निराशाजनक और निर्दय" कहलाने योग्य है। मुझे भय है कि एक नकली प्रेम है जो धर्म की सब दृढ़ बातों को नापसन्द करता है, ऐसा प्रेम जो चाहता है कि किसी के काम में हस्तक्षेप न किया जाए, ऐसा प्रेम जो चाहता है कि हर एक को उसके पापों में अकेला छोड़ दिया जाए, ऐसा प्रेम जो बिना किसी प्रमाण के मान लेता है कि हर कोई उद्धार के मार्ग पर है, ऐसा प्रेम जिसे कभी सन्देह नहीं होता कि सब लोग स्वर्ग जा रहे हैं, और जो नरक जैसे किसी स्थान के अस्तित्व को ही नकारता जान पड़ता है। परन्तु ऐसा प्रेम नए नियम का प्रेम नहीं है, और वह इस नाम के योग्य नहीं है। मुझे वह प्रेम दीजिए जो हर बात को बाइबल की कसौटी पर परखता है, और ऐसी किसी बात पर विश्वास नहीं करता और आशा नहीं रखता जिसे वचन की स्वीकृति प्राप्त न हो। मुझे वह प्रेम दीजिए जिसका वर्णन पौलुस ने कुरिन्थियों को लिखी पत्री में किया है (1 कुरिन्थियों 13:1 आदि): वह प्रेम जो अन्धा, बहरा और मूर्ख नहीं है, परन्तु जिसके पास देखने की आँखें हैं और परमेश्वर का भय माननेवाले और उसका भय न माननेवाले के बीच भेद करने की समझ है। ऐसा प्रेम केवल "सत्य" से आनन्दित होगा, और दुःख के साथ मान लेगा कि जब मैं कहता हूँ कि थोड़े ही लोगों के उद्धार पाने की सम्भावना है तो मैं सत्य के सिवा और कुछ नहीं कहता।

(च) मैं भली-भाँति जानता हूँ कि बहुत से लोग मुझ पर विश्वास नहीं करेंगे, क्योंकि वे सोचते हैं कि उद्धार पानेवालों की संख्या के विषय में कोई भी राय रखना धृष्टता है। परन्तु क्या ये लोग हमसे यह कहने का साहस करेंगे कि बाइबल ने उद्धार पाई हुई आत्माओं के चरित्र के विषय में स्पष्ट रूप से नहीं कहा है? और क्या वे यह कहने का साहस करेंगे कि बाइबल को छोड़ सत्य का कोई और मापदण्ड है? निश्चय ही उस बात को कहने में कोई धृष्टता नहीं हो सकती जो बाइबल के अनुकूल है। मैं उनसे स्पष्ट कहता हूँ कि धृष्टता का आरोप मुझ पर नहीं लगता। मैं कहता हूँ कि सचमुच धृष्ट मनुष्य वह है जो, जब बाइबल ने किसी बात को स्पष्ट और असंदिग्ध रूप से कह दिया है, उसे ग्रहण करने से इनकार करता है।

(छ) अन्त में मैं यह जानता हूँ कि बहुत लोग मेरी बात पर विश्वास नहीं करेंगे, क्योंकि वे मेरे कथन को अतिशयोक्तिपूर्ण और अनुचित समझते हैं। वे इसे धर्मोन्माद की बात मानते हैं, जो किसी विवेकशील मनुष्य के ध्यान के योग्य नहीं। वे ऐसी बातें कहनेवाले सेवकों को निर्बल बुद्धिवाला और सामान्य समझ से रहित ठहराते हैं। मैं ऐसे दोषारोपणों को शान्त मन से सह सकता हूँ। मैं बस उनसे जो ये दोष लगाते हैं, इतना माँगता हूँ कि वे मुझे कोई स्पष्ट प्रमाण दिखाएँ कि वे सही हैं और मैं भूल पर हूँ। वे यदि दिखा सकें तो दिखाएँ कि कोई ऐसा व्यक्ति भी स्वर्ग पहुँचने की आशा रख सकता है जिसका हृदय नया नहीं किया गया, जो यीशु मसीह पर विश्वास करनेवाला नहीं, जो आत्मिक मन और पवित्र जीवन का मनुष्य नहीं। वे यदि दिखा सकें तो दिखाएँ कि ऐसे लोग उन लोगों की तुलना में बहुत हैं जो ऐसे नहीं हैं। एक शब्द में, वे पृथ्वी पर कोई ऐसा स्थान बताएँ जहाँ के अधिकांश लोग भक्तिहीन न हों, और सच्चे भक्त एक छोटा झुण्ड न हों। यदि वे यह कर दिखाएँ तो मैं मान लूँगा कि मेरी कही बात पर अविश्वास करना उन्होंने ठीक ही किया। जब तक वे यह नहीं करते, मुझे इस शोकजनक निष्कर्ष पर दृढ़ रहना होगा कि थोड़े ही लोगों के उद्धार पाने की आशा है।

अब केवल इतना शेष रह गया है कि इस निबन्ध के विषय का कुछ व्यावहारिक उपयोग किया जाए। मैंने जितना स्पष्ट कर सका, उद्धार पाए हुए लोगों का स्वरूप बताया है। — मैंने उद्धार पानेवालों की संख्या के विषय में संसार के पीड़ादायक भ्रमों को दिखाया है। — मैंने इस विषय पर बाइबल की साक्षी प्रस्तुत की है। — मैंने अपने आसपास के संसार से स्पष्ट तथ्य लेकर अपने कथनों की पुष्टि की है। — प्रभु करे कि ये सब गम्भीर सत्य व्यर्थ न बताए गए हों!

मैं भली-भाँति जानता हूँ कि मैंने इस निबन्ध में बहुत सी ऐसी बातें कही हैं जो ठेस पहुँचा सकती हैं। मैं यह जानता हूँ। ऐसा होना अनिवार्य है। जिस विषय को यहाँ उठाया गया है, वह इतना गम्भीर और हृदय को परखनेवाला है कि कुछ लोगों को ठेस पहुँचाए बिना नहीं रह सकता। परन्तु मुझे बहुत समय से यह गहरा विश्वास रहा है कि इस विषय की दुःखद उपेक्षा हुई है, और खोए हुओं और उद्धार पाए हुओं की सापेक्ष संख्या को बहुत कम समझा जाता है। मैंने जो कुछ लिखा है, इसलिए लिखा है कि मुझे दृढ़ विश्वास है कि वह परमेश्वर का सत्य है। मैंने जो कुछ कहा है, शत्रु के रूप में नहीं, वरन् आत्माओं के प्रेमी के रूप में कहा है। जो तुम्हारे प्राण बचाने के लिए तुम्हें कड़वी औषधि देता है, उसे तुम शत्रु नहीं गिनते। जब तुम्हारे घर में आग लगी हो और कोई तुम्हें नींद से झकझोरकर जगाए, तो उसे तुम शत्रु नहीं गिनते। निश्चय ही, तुम्हारी आत्मा की भलाई के लिए कठोर सत्य बताने पर तुम मुझे शत्रु न गिनोगे। मैं एक मित्र के नाते हर उस स्त्री-पुरुष से निवेदन करता हूँ जिसके हाथ में यह पुस्तक पहुँची है। थोड़ी देर मेरे साथ धीरज रखो, जब तक मैं कुछ अन्तिम शब्द कहकर इस सारे विषय को तुम्हारे विवेक पर अंकित करूँ।

(क) क्या उद्धार पानेवाले थोड़े हैं? तो क्या तू उन थोड़ों में से एक होगा? काश तू देख पाता कि उद्धार ही एक आवश्यक वस्तु है! स्वास्थ्य, धन और पदवियाँ आवश्यक वस्तुएँ नहीं हैं। मनुष्य इनके बिना भी स्वर्ग पा सकता है। परन्तु जो उद्धार पाए बिना मरता है, वह क्या करेगा! काश तू देख पाता कि तुझे उद्धार अभी, इसी वर्तमान जीवन में चाहिए, और अपनी आत्मा के लिए उसे थाम लेना चाहिए! काश तू देख पाता कि "उद्धार पाया" या "उद्धार नहीं पाया" — धर्म में यही सबसे बड़ा प्रश्न है! उच्च कलीसिया या निम्न कलीसिया, कलीसिया का सदस्य या विरोधी — ये सब इसकी तुलना में तुच्छ प्रश्न हैं। स्वर्ग पहुँचने के लिए मनुष्य को मसीह के उद्धार में अपना व्यक्तिगत और वास्तविक भाग चाहिए। निश्चय ही, यदि तूने उद्धार नहीं पाया, तो अन्त में यही अच्छा होता कि तू कभी जन्मा ही न होता।

(ख) क्या उद्धार पानेवाले थोड़े हैं? तो यदि तू अब तक उन थोड़ों में से एक नहीं है, तो बिना देर किए उनमें से एक होने का यत्न कर। मैं नहीं जानता कि तू कौन है और कैसा है, परन्तु मैं निडर होकर कहता हूँ: मसीह के पास आ, और तू उद्धार पाएगा। जीवन की ओर ले जानेवाला फाटक सकरा हो सकता है, परन्तु वह मनश्शे और तरसुस के शाऊल को भीतर आने देने के लिए पर्याप्त चौड़ा था; फिर तुझे क्यों नहीं? जीवन की ओर ले जानेवाला मार्ग सकरा हो सकता है, परन्तु उस पर तेरे ही जैसे हज़ारों पापियों के पद-चिह्न बने हैं। सबने उसे अच्छा मार्ग पाया है। सब अन्त तक चलते रहे और अन्त में सुरक्षित घर पहुँच गए। यीशु मसीह तुझे बुलाता है। सुसमाचार की प्रतिज्ञाएँ तुझे प्रोत्साहित करती हैं। ओह, बिना देर किए भीतर प्रवेश करने का यत्न कर!

(ग) क्या उद्धार पानेवाले थोड़े हैं? तो यदि तुझे सन्देह है कि तू उन थोड़ों में से एक है या नहीं, तो अभी इस बात को पक्का कर ले, और फिर सन्देह में न रह। अपनी आत्मिक दशा जानने के लिए कोई उपाय अधूरा न छोड़। अस्पष्ट आशाओं और भरोसों से सन्तुष्ट न हो। उष्ण भावनाओं और परमेश्वर की ओर कुछ समय की लालसाओं पर विश्राम न कर। अपने बुलाए जाने और चुने जाने को निश्चित करने का यत्न कर। ओह, मुझे कहने दे कि यदि तू उद्धार के विषय में अनिश्चित रहकर जीने से सन्तुष्ट है, तो तू संसार का सबसे पागलपन भरा जीवन जी रहा है! नरक की आग तेरे सामने है, और तू निश्चित नहीं कि तेरी आत्मा सुरक्षित है या नहीं। इस संसार को शीघ्र छोड़ना होगा, और तू निश्चित नहीं कि ऊपर के लोक में तेरे लिए कोई निवास-स्थान तैयार है या नहीं। न्याय शीघ्र होनेवाला है, और तू निश्चित नहीं कि तेरा मुकद्दमा लड़ने के लिए कोई सहायक तेरे पास है या नहीं। अनन्तकाल शीघ्र आरम्भ होगा, और तू निश्चित नहीं कि तू परमेश्वर से मिलने के लिए तैयार है या नहीं। ओह, आज बैठकर उद्धार के विषय का अध्ययन कर! जब तक अनिश्चितता मिट न जाए और तुझे यह उचित आशा न मिल जाए कि तू उद्धार पा चुका है, तब तक परमेश्वर को चैन न लेने दे।

(घ) क्या उद्धार पानेवाले थोड़े हैं? तो यदि तू उनमें से एक है, तो धन्यवादी हो। जब तेरे आसपास हज़ारों लोग अविश्वास में डूबे हैं, तब तू परमेश्वर द्वारा चुना और बुलाया गया है; जब तेरे आसपास असंख्य लोग पूरी तरह अन्धे हैं, तब तू परमेश्वर का राज्य देख रहा है; जब भीड़ की भीड़ इस वर्तमान बुरे संसार के प्रेम और भय से दबी है, तब तू उससे छुड़ाया गया है; जब कितने ही लोग, जो देखने में तेरे ही जैसे भले हैं, अज्ञान और अन्धकार में जी रहे हैं, तब तुझे पाप, परमेश्वर और मसीह को जानना सिखाया गया है — ओह, तेरे पास प्रतिदिन परमेश्वर को धन्य कहने और उसकी स्तुति करने का कारण है! पाप का यह बोध, जो तू अब अनुभव करता है, कहाँ से आया? मसीह के लिए यह प्रेम, पवित्रता की यह लालसा, धार्मिकता की यह भूख, वचन में यह आनन्द कहाँ से आया? क्या यह सब मुफ़्त अनुग्रह ने नहीं किया, जबकि तेरी जवानी का कितना ही साथी अब भी इसके विषय में कुछ नहीं जानता, या अपने पापों में ही कट गया? तुझे सचमुच परमेश्वर को धन्य कहना चाहिए! निश्चय ही व्हाइटफ़ील्ड का यह कहना ठीक था कि स्वर्ग में सन्तों का एक गीत यह होगा: "हे प्रभु, मैं ही क्यों? तूने मुझे ही क्यों चुना?"

(इ) क्या उद्धार पानेवाले थोड़े ही हैं? तो यदि तू उनमें से एक है, तो इस पर आश्चर्य न कर कि तू प्राय: अपने आप को अकेला खड़ा पाता है। मुझे विश्वास है कि संसार में जो भ्रष्टता और दुष्टता तू अपने चारों ओर देखता है, उससे तू कभी-कभी लगभग रुक सा जाता है। तू झूठा सिद्धान्त फैलता हुआ देखता है। तू हर प्रकार का अविश्वास और अधर्म देखता है। तुझे कभी-कभी यह कहने का प्रलोभन होता है, "क्या वास्तव में मैं अपने धर्म में सही हूँ? क्या यह सचमुच हो सकता है कि ये सब लोग गलत हैं?" ऐसे विचारों के आगे झुकने से सावधान रह। स्मरण रख कि तू केवल अपने स्वामी के वचनों की सच्चाई का व्यावहारिक प्रमाण पा रहा है। यह न सोच कि उसके उद्देश्य विफल हो रहे हैं। यह न सोच कि उसका काम संसार में आगे नहीं बढ़ रहा। वह अब भी अपनी स्तुति के लिये एक प्रजा को निकाल रहा है। वह अब भी सारे संसार में यहाँ-वहाँ अपने गवाह खड़े कर रहा है। जब सब अन्त में एकत्र किए जाएँगे, तब उद्धार पाए हुए लोग "एक ऐसी बड़ी भीड़ जिसे कोई गिन नहीं सकता" पाए जाएँगे। (प्रका. 7:9।) पृथ्वी प्रभु के ज्ञान से भर जाएगी। सब जातियाँ उसकी सेवा करेंगी; सब राजा उसका आदर करने में आनन्दित होंगे। परन्तु रात अभी बीती नहीं है। प्रभु की सामर्थ्य का दिन अभी आनेवाला है। इस बीच सब कुछ वैसा ही हो रहा है जैसा उसने 1800 वर्ष पहले कहा था। बहुत से नाश हो रहे हैं और थोड़े ही उद्धार पा रहे हैं।

(ई) क्या उद्धार पानेवाले थोड़े हैं? तो यदि तू उनमें से एक है, तो बहुत अधिक धर्म होने से मत डर। अपने मन में यह ठान ले कि तू पवित्रता, आत्मिक-मनस्कता और परमेश्वर के प्रति समर्पण की सर्वोच्च श्रेणी का लक्ष्य रखेगा, कि तू पवित्रीकरण की किसी निम्न श्रेणी से सन्तुष्ट न होगा। दृढ़ निश्चय कर कि परमेश्वर के अनुग्रह से तू संसार की दृष्टि में मसीही जीवन को सुन्दर बनाएगा। स्मरण रख कि संसार की सन्तानों के सामने सच्चे धर्म के बहुत थोड़े ही नमूने हैं। जहाँ तक तुझसे हो सके, यह प्रयत्न कर कि वे थोड़े नमूने तेरे स्वामी की सेवा की सिफारिश करें। अहा, काश हर सच्चा मसीही स्मरण रखता कि वह अन्धकारमय संसार के बीच एक प्रकाशस्तम्भ के रूप में खड़ा किया गया है, और इस प्रकार जीने का परिश्रम करता कि उसका हर अंग प्रकाश को प्रतिबिम्बित करे और कोई भी पक्ष धुँधला न रहे!

(उ) क्या उद्धार पानेवाले थोड़े हैं? तो यदि तू उनमें से एक है, तो आत्माओं का भला करने का प्रयत्न करने का हर अवसर काम में ला। अपने मन में यह ठान ले कि तेरे आसपास के लोगों में से अधिकांश अनन्त काल के लिये खो जाने के भयानक संकट में हैं। उन पर सुसमाचार का प्रभाव डालने के लिये हर साधन का उपयोग कर। आग में से जलती लकड़ियों को खींच निकालने के हर मसीही प्रयास में सहायता कर। हर उस संस्था को उदारता से दान दे जिसका उद्देश्य अनन्त सुसमाचार को फैलाना है। आत्माओं का भला करने के कार्य में अपना सारा प्रभाव हृदय से और बिना किसी संकोच के लगा दे। उस मनुष्य के समान जी जो पूरी तरह विश्वास करता है कि समय थोड़ा है और अनन्तकाल निकट है, कि शैतान बलवन्त है और पाप बढ़ रहा है, कि अन्धकार बहुत गहरा है और ज्योति बहुत थोड़ी, कि अधर्मी बहुत हैं और धर्मी बहुत थोड़े, कि संसार की वस्तुएँ केवल क्षणिक छायाएँ हैं, और स्वर्ग और नरक ही बड़ी ठोस वास्तविकताएँ हैं। हाय, बहुत से विश्वासियों के जीवन कैसे हैं! कितने ठंडे हैं, कितने जमे हुए, धर्म के विषय में निर्णायक कदम उठाने में कितने धीमे, और बहुत आगे बढ़ जाने से कितने डरते हैं, कोई नया काम करने में कितने पीछे हटनेवाले, किसी अच्छे आन्दोलन को हतोत्साहित करने को कितने तैयार, यह कारण खोजने में कितने चतुर कि चुपचाप बैठे रहना ही उत्तम है, यह मानने को कितने अनिच्छुक कि सक्रिय परिश्रम का "समय" आ गया है, दोष निकालने में कितने बुद्धिमान, और बढ़ती बुराइयों का सामना करने की योजनाएँ बनाने में कितने निकम्मे! सचमुच, जब कोई उन बहुतों की चाल देखता है जो विश्वासी गिने जाते हैं, तो उसे कभी-कभी लग सकता है कि सारा संसार स्वर्ग जा रहा है और नरक केवल एक झूठ है।

हम सब इस मनःस्थिति से सावधान रहें! हम इसे मानना चाहें या न चाहें, नरक तेजी से भर रहा है, मसीह प्रतिदिन एक आज्ञा न माननेवाली प्रजा की ओर अपना हाथ बढ़ाए हुए है, बहुत से, बहुत से विनाश के मार्ग पर हैं, थोड़े, बहुत थोड़े जीवन के मार्ग पर हैं। बहुतों, बहुतों के खो जाने की सम्भावना है। थोड़ों, बहुत थोड़ों के उद्धार पाने की सम्भावना है।

मैं हर पाठक से एक बार फिर वही पूछता हूँ जो इस लेख के आरम्भ में पूछा था, क्या तू उद्धार पाएगा? यदि तूने अभी तक उद्धार नहीं पाया है, तो मेरे हृदय की इच्छा और परमेश्वर से मेरी प्रार्थना है कि तू बिना विलम्ब उद्धार की खोज करे। यदि तू उद्धार पा चुका है, तो मेरी इच्छा है कि तू एक उद्धार पाई हुई आत्मा के समान जिए, और ऐसे जन के समान जो जानता है कि उद्धार पाई हुई आत्माएँ थोड़ी हैं।

हमारी आशा

"अनुग्रह से उत्तम आशा।" 2 थिस्सलुनीकियों 2:16

"भक्तिहीन की आशा टूट जाएगी।" अय्यूब 8:13

"जब परमेश्वर भक्तिहीन का प्राण ले लेता है, तब उसकी क्या आशा रह जाती है?" अय्यूब 27:8

"मुझे आशा है," यह बहुत प्रचलित कथन है। हर कोई कह सकता है, "मुझे आशा है।" किसी भी विषय के बारे में यह कथन उतना अधिक नहीं कहा जाता जितना धर्म के बारे में। विवेक पर किए गए किसी सीधे प्रहार को इस सुविधाजनक वाक्य, "मुझे आशा है," से टाल देना सुनने में सबसे आम बात है। "मुझे आशा है अन्त में सब ठीक हो जाएगा।" "मुझे आशा है किसी दिन मैं एक अच्छा मनुष्य बनूँगा।" "मुझे आशा है कि अन्त में मैं स्वर्ग पहुँचूँगा।" पर वे आशा क्यों रखते हैं? उनकी आशा किस पर टिकी है? प्राय: वे बता नहीं सकते! प्राय: यह किसी अप्रिय विषय से बचने का केवल एक बहाना होता है। "आशा रखते हुए" वे जीते जाते हैं। "आशा रखते हुए" वे बूढ़े होते हैं। "आशा रखते हुए" वे अन्त में मर जाते हैं, और प्राय: पाते हैं कि वे सदा के लिये नरक में खो गए हैं!

मैं इस लेख को पढ़नेवाले सब लोगों से गम्भीर ध्यान की विनती करता हूँ। यह विषय अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। "हम को आशा के द्वारा उद्धार मिला है।" (रोमियों 8:24।) इसलिये आओ, हम निश्चित कर लें कि हमारी आशा खरी है। क्या हमें यह आशा है कि हमारे पाप क्षमा हो गए हैं, हमारे हृदय नए किए गए हैं और हमारी आत्माएँ परमेश्वर के साथ मेल में हैं? तो आओ, हम देखें कि हमारी आशा "उत्तम" है, "जीवित" है और ऐसी है जो "लज्जित नहीं होने देती।" (2 थिस्सलुनीकियों 2:16; 1 पतरस 1:3; रोमियों 5:5।) आओ, हम अपनी चाल पर ध्यान दें। हम अपनी आत्माओं की दशा की ईमानदार और गहरी जाँच से पीछे न हटें। यदि हमारी आशा उत्तम है, तो जाँच से उसकी कोई हानि नहीं होगी। यदि हमारी आशा बुरी है, तो इसे जान लेने और एक उत्तम आशा खोजने का अब ठीक समय है।

वास्तव में "उत्तम आशा" के पाँच चिह्न हैं। मैं उन्हें अपने पाठकों के सामने क्रम से रखना चाहता हूँ। आओ, हम अपने आप से पूछें कि हम उनके विषय में क्या जानते हैं। आओ, हम उनसे अपनी दशा को परखें। धन्य है वह जो इनमें से हर एक चिह्न के विषय में कह सके, "मैं इसे अनुभव से जानता हूँ। मेरी आत्मा के विषय में मेरी आशा यही है।"

I. पहली बात, उत्तम आशा वह आशा है जिसे मनुष्य समझा सके। पवित्रशास्त्र क्या कहता है? "जो कोई तुम से तुम्हारी आशा के विषय में कुछ पूछे, तो उसे उत्तर देने के लिये सर्वदा तैयार रहो।" (1 पतरस 3:15।)

यदि हमारी आशा दृढ़ है तो हमें उसका कुछ लेखा देने में समर्थ होना चाहिए। हमें यह बता सकना चाहिए कि हम किस आधार पर, किस कारण से और क्यों यह आशा रखते हैं कि मरने पर स्वर्ग जाएँगे। अब क्या हम ऐसा कर सकते हैं?

कोई मेरा आशय गलत न समझे। मैं यह नहीं कहता कि उद्धार के लिये गहरी विद्या और बड़ा ज्ञान नितान्त आवश्यक है। कोई मनुष्य बीस भाषाएँ जानता हो और सारा ईश्वरविज्ञान उसकी उँगलियों पर हो, फिर भी वह खो सकता है; और कोई मनुष्य पढ़ना न जानता हो और उसकी समझ बहुत कम हो, फिर भी वह उद्धार पा सकता है। परन्तु मैं यह अवश्य कहता हूँ कि मनुष्य को यह जानना चाहिए कि उसकी आशा क्या है, और उसका स्वरूप हमें बता सकना चाहिए। मैं यह नहीं मान सकता कि किसी मनुष्य के पास कोई वस्तु है, जबकि वह उसके विषय में कुछ जानता ही नहीं।

फिर कहता हूँ, कोई मेरा आशय गलत न समझे। मैं यह नहीं कहता कि उद्धार के लिये अच्छा बोल सकने की शक्ति आवश्यक है। किसी मनुष्य के होठों पर सुन्दर शब्द हो सकते हैं और उसके हृदय में रत्ती भर अनुग्रह नहीं; और किसी के शब्द थोड़े और लड़खड़ाते हो सकते हैं, फिर भी उसके भीतर गहरी अनुभूति हो, जिसे पवित्र आत्मा ने वहाँ रोपा है। कुछ लोग मसीह के लिये बहुत शब्द नहीं बोल सकते, फिर भी उसके लिये प्राण दे सकते हैं। तो भी मैं यह अवश्य कहता हूँ कि जिस मनुष्य के पास उत्तम आशा है, उसे यह बता सकना चाहिए कि क्यों। यदि वह इससे अधिक कुछ न बता सके कि "वह अपने को पापी अनुभव करता है, और मसीह को छोड़ उसकी कोई आशा नहीं," तो भी यह कुछ है। परन्तु यदि वह कुछ भी न बता सके, तो मुझे सन्देह होगा कि उसके पास कोई सच्ची आशा नहीं है।

मैं जानता हूँ कि अभी कही गई यह बात बहुतों को अप्रिय लगती है। हज़ारों लोग उस स्पष्ट ज्ञान की कोई आवश्यकता नहीं देखते जिसे मैं उद्धार देनेवाली आशा के लिये अनिवार्य मानता हूँ। जब तक मनुष्य रविवार को कलीसिया जाता है और अपने बच्चों का बपतिस्मा करवाता है, वे समझते हैं कि हमें सन्तुष्ट रहना चाहिए। वे हमसे कहते हैं, "ज्ञान पादरियों और ईश्वरविज्ञान के पण्डितों के लिये ठीक हो सकता है; पर साधारण लोगों से इसकी अपेक्षा करना बहुत अधिक है।"

ऐसे सब लोगों को मेरा उत्तर छोटा और सीधा है। सारे नए नियम में कहाँ पाया जाता है कि लोग मसीही कहलाए जबकि वे मसीही धर्म के विषय में कुछ जानते न थे? क्या कोई मुझे समझाएगा कि कुरिन्थ का, या कुलुस्से का, या थिस्सलुनीके का, या फिलिप्पी का, या इफिसुस का कोई मसीही यह नहीं बता सकता था कि अपनी आत्मा के विषय में उसकी आशा क्या है? जो चाहे इसे माने—मैं तो नहीं मान सकता। मैं विश्वास करता हूँ कि जब मैं मनुष्य से यह जानने की माँग करता हूँ कि उसकी आशा का आधार क्या है, तो मैं केवल नए नियम का मानक स्थापित कर रहा हूँ। अज्ञान रोमन कैथोलिक के लिये शायद ठीक बैठता हो। वह उसका है जिसे वह सच्ची कलीसिया मानता है! वह वही करता है जो उसका याजक उससे कहता है! वह और कुछ नहीं पूछता! परन्तु अज्ञान कभी मसीही की पहचान नहीं होना चाहिए। उसे जानना चाहिए कि वह क्या विश्वास करता है, और यदि वह नहीं जानता तो वह बुरी दशा में है।

इस लेख के हर पाठक से मैं कहता हूँ कि अपना हृदय जाँचो और देखो कि तुम्हारी आत्मा की दशा कैसी है। क्या तुम इससे अधिक कुछ नहीं बता सकते कि "तुम आशा रखते हो कि तुम्हारा उद्धार होगा"? क्या तुम अपने भरोसे के आधार की कोई व्याख्या नहीं दे सकते? क्या तुम अपनी ही धुँधली अपेक्षा से अधिक सन्तोषजनक कुछ नहीं दिखा सकते? यदि ऐसा है तो तुम सदा के लिये खो जाने के निकट संकट में हो। पिलग्रिम्स प्रोग्रेस के अज्ञान की तरह तुम भी बिना अधिक कष्ट के अपनी यात्रा के अन्त तक पहुँच सकते हो, और व्यर्थ-आशा के द्वारा नदी पार पहुँचाए जा सकते हो। परन्तु अज्ञान की तरह तुम भी दुख के साथ पाओगे कि स्वर्गीय नगर में तुम्हारे लिये प्रवेश नहीं है। वहाँ केवल वे ही प्रवेश करते हैं जो "जानते हैं कि उन्होंने किस पर, और क्या विश्वास किया है।"

"अब जब मैं इन सब बातों को देख रहा था, तो मैंने सिर घुमाकर पीछे देखा, और अज्ञान को नदी के किनारे आते देखा—पर वह सहज ही पार हो गया, और उन दो मनुष्यों को जितनी कठिनाई हुई थी उसकी आधी भी उसे न हुई। क्योंकि संयोग से उस स्थान पर व्यर्थ-आशा नाम का एक मल्लाह था, जिसने अपनी नाव से उसे पार पहुँचाया; सो उसने भी, जैसे मैंने दूसरे को देखा था, पहाड़ी पर चढ़कर फाटक तक पहुँचने का यत्न किया, केवल वह अकेला आया; और किसी ने थोड़ा भी प्रोत्साहन देकर उसका स्वागत न किया। जब वह फाटक पर पहुँचा, तो उसने ऊपर लिखे हुए लेख को देखा, और खटखटाने लगा, यह सोचकर कि उसे तुरन्त प्रवेश मिल जाएगा। परन्तु फाटक के ऊपर से झाँकनेवाले मनुष्य ने उससे पूछा, 'तुम कहाँ से आए हो? और तुम क्या चाहते हो?' उसने उत्तर दिया, 'मैंने राजा के सामने खाया-पिया है, और उसने हमारी सड़कों में उपदेश दिया है।' तब उन्होंने उससे उसका प्रमाणपत्र माँगा, कि वे भीतर जाकर राजा को दिखाएँ। तब वह अपनी छाती में टटोलने लगा, और कोई प्रमाणपत्र न मिला। तब उन्होंने कहा, 'क्या तुम्हारे पास कुछ नहीं?' परन्तु उस मनुष्य ने एक शब्द भी उत्तर न दिया।

"सो उन्होंने राजा को बताया; पर वह उसे देखने नीचे न आया—वरन् उन दो तेजस्वी जनों को, जो मसीही और आशावान् को नगर तक ले गए थे, आज्ञा दी कि अज्ञान को हाथ-पाँव बाँधकर ले जाओ। तब उन्होंने उसे उठाया, और आकाश-मार्ग से उस द्वार तक ले गए जो मैंने पहाड़ी की बगल में देखा था, और उसे वहाँ डाल दिया। तब मैंने देखा कि स्वर्ग के फाटक से भी नरक का एक मार्ग है, जैसे विनाश के नगर से है।"—बनयन की पिलग्रिम्स प्रोग्रेस।

मैं यह सिद्धान्त आरम्भ-बिन्दु के रूप में रखता हूँ, और अपने पाठकों से कहता हूँ कि इस पर भली-भाँति विचार करें। मैं पूरी तरह मानता हूँ कि सच्चे मसीहियों में अनुग्रह के अलग-अलग स्तर होते हैं। मैं यह नहीं भूलता कि परमेश्वर के परिवार में बहुत से ऐसे हैं जिनका विश्वास बहुत निर्बल और आशा बहुत छोटी है। परन्तु मैं दृढ़ता से विश्वास करता हूँ कि जो माँग का मानक मैंने रखा है वह रत्ती भर भी बहुत ऊँचा नहीं है। मैं विश्वास करता हूँ कि जिस मनुष्य के पास "उत्तम आशा" है, वह सदा उसका कुछ लेखा दे सकेगा।

II. दूसरी बात, उत्तम आशा वह आशा है जो पवित्रशास्त्र से ली गई हो। दाऊद क्या कहता है? "मैं तेरे वचन पर आशा रखता हूँ।" "अपने दास को दिए हुए वचन को स्मरण कर, जिसके कारण तूने मुझे आशा दी है।" पौलुस क्या कहता है? "जितनी बातें पहले से लिखी गईं, वे हमारी शिक्षा के लिये लिखी गईं, कि हम धीरज और पवित्रशास्त्र की शान्ति के द्वारा आशा रखें।" (भजन संहिता 119:81, 49। रोमियों 15:4।)

यदि हमारी आशा खरी है तो हमें परमेश्वर के वचन के किसी पद, या किसी तथ्य, या किसी सिद्धान्त की ओर संकेत करने में समर्थ होना चाहिए, जो उसका स्रोत हो। हमारा भरोसा किसी ऐसी बात से उत्पन्न होना चाहिए जो परमेश्वर ने हमारी शिक्षा के लिये बाइबल में लिखवाई है, और जिसे हमारे हृदय ने ग्रहण किया और जिस पर विश्वास किया है।

अपनी आत्मा की दशा के विषय में अच्छी भावनाएँ रखना ही पर्याप्त नहीं है। हम अपने आप को यह कहकर बहला सकते हैं कि सब ठीक है और मरने पर हम स्वर्ग जाएँगे, फिर भी अपनी आशा के पक्ष में हमारे पास कल्पना और मन की उपज के सिवा कुछ भी न हो। "मन तो सब वस्तुओं से अधिक धोखा देनेवाला होता है।" "जो अपने ऊपर भरोसा रखता है, वह मूर्ख है।" (यिर्मयाह 17:9; नीतिवचन 28:26)। मैंने मरते हुए लोगों को प्रायः यह कहते सुना है कि "हम बहुत प्रसन्न हैं और जाने को तैयार हैं।" मैंने उन्हें यह कहते सुना है कि "हमें इस संसार की किसी वस्तु की लालसा नहीं रही।" और इस सारे समय मैंने देखा कि वे पवित्रशास्त्र से बिलकुल अनजान थे, और सुसमाचार के किसी एक सत्य को भी दृढ़ता से थामे हुए नहीं जान पड़ते थे! ऐसे लोगों के विषय में मुझे कभी चैन नहीं मिलता। मुझे विश्वास है कि उनकी दशा में कुछ न कुछ चूक है। पवित्रशास्त्र के किसी आधार के बिना अच्छी भावनाएँ खरी आशा नहीं बन सकतीं।

अपनी आत्मा की दशा के विषय में दूसरों की अच्छी राय पर्याप्त नहीं है। हमारी मृत्यु-शय्या पर लोग हमसे कह सकते हैं कि "हिम्मत रखो," और "डरो मत।" वे हमें स्मरण दिला सकते हैं कि हमने "भला जीवन बिताया है—या हमारा हृदय अच्छा था—या हमने किसी की हानि नहीं की—या हम बहुतों के समान बुरे नहीं थे।" और इस सारे समय हमारे मित्र पवित्रशास्त्र का एक शब्द भी सामने न रखें, और हमें विष खिलाते रहें! ऐसे मित्र दुखदायी शान्ति देनेवाले हैं। चाहे उनका मन कितना ही अच्छा हो, वे हमारी आत्मा के सीधे शत्रु हैं। परमेश्वर के वचन के आधार के बिना दूसरों की अच्छी राय कभी खरी आशा नहीं बन सकती।

यदि कोई मनुष्य अपनी आशा की दृढ़ता जानना चाहे, तो वह अपने हृदय में खोजकर और टटोलकर देखे कि परमेश्वर की पुस्तक का कोई पद, या सिद्धान्त, या तथ्य उसके पास है या नहीं। यदि तू परमेश्वर की सच्ची सन्तान है, तो सदा एक या अधिक ऐसी बातें होंगी जिन पर तेरी आत्मा टिकी है। लन्दन में मरता हुआ वह चोर, जिससे एक नगर-प्रचारक मिलने गया और जो

मसीही विश्वास से बिलकुल अनजान पाया गया, लूका के सुसमाचार के एक अध्याय में पढ़कर सुनाए गए एक ही तथ्य को थाम बैठा, और उसमें उसे शान्ति मिली। वह तथ्य पश्चात्तापी चोर की कथा थी। जब प्रचारक दूसरी बार उससे मिलने गया, तो उसने पूछा, "महोदय, क्या उस पुस्तक में, जिसे आपने कल पढ़ा था, और भी चोर हैं?" मार्ग के किनारे एक मिशनरी को मिले मरते हुए हिन्दू ने 1 यूहन्ना की पत्री के एक ही पद को पकड़ लिया था, और उसी में उसे शान्ति मिली। वह पद यह अनमोल वचन था, "उसके पुत्र यीशु मसीह का लहू हमें सब पापों से शुद्ध करता है।" (1 यूहन्ना 1:7)। सब सच्चे मसीहियों का यही अनुभव है। वे चाहे कितने ही अनपढ़, दीन और निर्धन हों, उन्होंने बाइबल की कोई न कोई बात थाम रखी है, और इसी से उन्हें आशा मिलती है। जो आशा "लज्जित नहीं होने देती" वह परमेश्वर के वचन से कभी अलग नहीं होती।

लोग कभी-कभी आश्चर्य करते हैं कि सेवक उन्हें बाइबल पढ़ने पर इतना बल क्यों देते हैं। वे अचम्भा करते हैं कि हम प्रचार के महत्त्व के विषय में इतना कहते हैं और उन्हें बार-बार उपदेश सुनने का आग्रह करते हैं। वे आश्चर्य करना छोड़ दें, और अचम्भा न करें। हमारा उद्देश्य है कि आप परमेश्वर के वचन से परिचित हों। हम चाहते हैं कि आपकी आशा खरी हो, और हम जानते हैं कि खरी आशा पवित्रशास्त्र से ही मिलती है। पढ़े या सुने बिना आपको अज्ञान में ही जीना और मरना पड़ेगा। इसीलिये हम पुकारते हैं, "पवित्रशास्त्र में ढूँढ़ो।" "सुनो, कि तुम जीवित रहो।" (यूहन्ना 5:39; यशायाह 55:3)।

मैं हर एक को चिताता हूँ कि जो आशा पवित्रशास्त्र से नहीं ली गई उससे सावधान रहो। वह झूठी आशा है, और बहुत से लोग अपनी हानि उठाकर यह जान लेंगे। वह महिमामय और सिद्ध पुस्तक, बाइबल, लोग उसे चाहे कितना ही तुच्छ जानें, वही एकमात्र सोता है जिससे मनुष्य की आत्मा शान्ति पा सकती है। बहुत से लोग जीते जी इस पुरानी पुस्तक का उपहास करते हैं, पर मरते समय उन्हें इसकी आवश्यकता का बोध होता है। महल में रानी और दीनशाला में कंगाल, अध्ययन-कक्ष में दार्शनिक और झोपड़ी में बालक—सब को, यदि उन्हें कोई भी आशा रखनी है, बाइबल से जीवित जल की खोज करने में सन्तुष्ट होना होगा। अपनी बाइबल का आदर करो—अपनी बाइबल पढ़ो—अपनी बाइबल से लगे रहो। पृथ्वी पर कब्र के उस पार के लिये ठोस आशा का एक कण भी ऐसा नहीं जो वचन से न निकला हो।

III. तीसरे, खरी आशा वह है जो पूर्ण रूप से यीशु मसीह पर टिकी हो। पौलुस तीमुथियुस से क्या कहता है? वह कहता है कि यीशु मसीह "हमारी आशा है।" कुलुस्सियों से वह क्या कहता है? वह कहता है, "तुम में मसीह, जो महिमा की आशा है।" (1 तीमुथियुस 1:1; कुलुस्सियों 1:27)।

जिसकी आशा खरी है, वह क्षमा और उद्धार की अपनी सारी अपेक्षाओं को परमेश्वर के पुत्र यीशु की मध्यस्थता और छुटकारे के कार्य की नींव पर रखता है। वह अपनी पापमयता को जानता है; वह अनुभव करता है कि वह स्वभाव से दोषी, दुष्ट और खोया हुआ है—पर वह देखता है कि मसीह में विश्वास के द्वारा क्षमा और परमेश्वर के साथ मेल उसे सेंतमेंत दिया जाता है। वह उस प्रस्ताव को ग्रहण करता है—वह अपने सारे पापों समेत अपने आप को यीशु पर डाल देता है, और उसी पर ठहरता है। यीशु और क्रूस पर उसका प्रायश्चित—यीशु और उसकी धार्मिकता—यीशु और उसका पूरा किया हुआ कार्य—यीशु और उसकी सर्वसामर्थी मध्यस्थता की प्रार्थना—यीशु, और केवल यीशु, उसकी आत्मा के भरोसे की नींव है।

हम यह मान बैठने से सावधान रहें कि जो आशा मसीह पर नहीं टिकी, वह भी खरी हो सकती है। अन्य सब आशाएँ रेत पर बनी हैं। स्वास्थ्य और समृद्धि की ग्रीष्म-ऋतु में वे अच्छी दिख सकती हैं—पर रोग के दिन और मृत्यु की घड़ी में वे विफल हो जाएँगी। "क्योंकि उस नींव को छोड़ जो पड़ी है, और वह यीशु मसीह है, कोई दूसरी नींव नहीं डाल सकता।" (1 कुरिन्थियों 3:11)।

कलीसिया की सदस्यता आशा की नींव नहीं है। हम सबसे अच्छी कलीसिया के सदस्य हो सकते हैं, और फिर भी कभी मसीह के न हों। हम प्रत्येक रविवार नियमित रूप से अपनी बैठक की जगह भर सकते हैं, और सच्चे विश्वास को माननेवाले, अभिषिक्त पादरियों के उपदेश सुन सकते हैं, और फिर भी यीशु का शब्द कभी न सुनें, न उसके पीछे चलें। यदि कलीसिया की सदस्यता से बढ़कर हमारे पास टिकने को कुछ नहीं है, तो हमारी दशा दयनीय है—हमारे पाँवों के नीचे कुछ भी ठोस नहीं है।

संस्कारों को ग्रहण करना आशा की कोई नींव नहीं है। हम बपतिस्मा के जल में धोए जा सकते हैं, फिर भी जीवन के जल के विषय में कुछ न जानते हों। हम अपने जीवन के हर रविवार को प्रभु की मेज़ पर जा सकते हैं, फिर भी विश्वास के द्वारा मसीह की देह कभी न खाएँ और मसीह का लहू कभी न पिएँ। यदि हम इससे अधिक कुछ नहीं कह सकते, तो हमारी दशा सचमुच अति दयनीय है! हमारे पास मसीही धर्म का केवल बाहरी आवरण है—हम एक सरकण्डे का सहारा ले रहे हैं।

एक अच्छी आशा की एकमात्र सच्ची नींव स्वयं मसीह है। वही चट्टान है, उसका काम सिद्ध है। वही पत्थर है—वह निश्चित पत्थर, परखा हुआ कोने का पत्थर। जितना भार हम उस पर डालें, वह सब उठाने में समर्थ है। जो उस पर बनाता है और "उस पर विश्वास करता है, वह लज्जित न होगा।" (व्यवस्थाविवरण 32:4; यशायाह 28:16; 1 पतरस 2:6।)

यही वह बात है जिस पर हर युग में परमेश्वर के सब सच्चे सन्त पूरी तरह सहमत रहे हैं। अन्य विषयों में भिन्न मत रखते हुए भी वे इस पर सदा एकमत रहे हैं। कलीसिया के शासन, अनुशासन और आराधना-पद्धतियों के विषय में वे एक-सा नहीं देख सके, परन्तु आशा की नींव के विषय में सदा एक-सा देखते रहे। उनमें से किसी ने भी अपनी धार्मिकता पर भरोसा रखते हुए संसार नहीं छोड़ा। मसीह ही उन सबका भरोसा रहा है—उन्होंने उस पर आशा रखी, और लज्जित न हुए।

"विचार कीजिए कि मरते समय सबसे पवित्र और श्रेष्ठ सन्तों की दशा कैसी होती है। क्या आपने कभी उन्हें अपने कामों और उपलब्धियों पर घमण्ड करते देखा या सुना? वे परमेश्वर के अनुग्रह की स्तुति के लिए यह स्वीकार कर सकते हैं, और करते भी हैं, कि वे क्या बनाए गए हैं, और मसीह के निमित्त उन्हें क्या करने या सहने में सहायता मिली है। परन्तु जब वे उस गम्भीर न्यायासन के निकट पहुँचते हैं, तब उनकी आँखों और हृदय में और क्या होता है—केवल सेंतमेंत का अनुग्रह, छुड़ौती का लहू, और मध्यस्थ मसीह में सुव्यवस्थित वाचा। उन्हें यह सहन नहीं होता कि कोई उनके सामने उनकी पवित्रता, उनके अपने अनुग्रह और उपलब्धियों का उल्लेख करे।

"वह मनुष्य बुद्धिमान और सुखी है जो अपनी आत्मा का लंगर उस चट्टान पर डाल सकता है जिस पर वह मृत्यु की आँधी को झेल सके। लोग अपने जीवन-भर उस बात के लिए क्यों झगड़ते हैं जिसे वे जानते हैं कि मृत्यु के समय उन्हें छोड़ना पड़ेगा? या उस सत्य की उपेक्षा अभी क्यों करते हैं जिसकी शरण उन्हें तब लेनी पड़ेगी? उद्धार के मार्ग के सिद्धान्त के सत्य की यह एक बड़ी कसौटी है कि समझदार मरणासन्न लोग प्रायः उसे स्वीकार करते हैं।"—ट्रेल।

क्या कोई जानना चाहेगा कि सुसमाचार के सेवक को किस प्रकार के मृत्यु-शय्या के पास जाकर सान्त्वना मिलती है? क्या आप जानना चाहेंगे कि कैसे अन्तिम दृश्य हमें प्रोत्साहित करते हैं और हमारे मन पर अच्छा प्रभाव छोड़ जाते हैं? हमें वे मरणासन्न लोग प्रिय लगते हैं जो मसीह को बहुत महत्त्व देते हैं। जब तक वे केवल "सर्वशक्तिमान", "विधान", "परमेश्वर" और "दया" की बातें करते हैं, तब तक हमारे मन में सन्देह बना रहता है। इस दशा में मरनेवाले कोई सन्तोषजनक चिह्न नहीं देते। हमें ऐसे स्त्री-पुरुष चाहिए जो अपने पापों को गहराई से अनुभव करते हैं और यीशु से लिपटे रहते हैं, जो उसके मरते हुए प्रेम पर बहुत विचार करते हैं—जिन्हें उसके प्रायश्चित के लहू की चर्चा सुनना भला लगता है—जो उसके क्रूस की कथा सुनने के लिए बार-बार लौटते हैं। ऐसी ही मृत्यु-शय्याएँ अपने पीछे अच्छा प्रमाण छोड़ जाती हैं। मेरे लिए तो यही अच्छा है कि किसी मरते हुए सम्बन्धी के होंठों से यीशु का नाम सच्चे मन से निकलता सुनूँ, बजाय इसके कि वह मसीह के विषय में एक शब्द भी कहे बिना मर जाए और फिर कोई स्वर्गदूत मुझे बताए कि उसका उद्धार हो गया।

पूरितान मिस्टर ऐश के अन्तिम शब्द ध्यान देने योग्य हैं। उन्होंने कहा, "जब मैं अपने सर्वोत्तम कर्तव्यों पर विचार करता हूँ, तो मैं डूब जाता हूँ, मर जाता हूँ, निराश हो जाता हूँ। परन्तु जब मैं मसीह का विचार करता हूँ, तो मेरे लिए वही बहुत है। वही सब कुछ है और सब में है।"

मिस्टर सेसिल के अपनी मृत्यु से कुछ पहले कहे गए शब्द बहुत उल्लेखनीय हैं। उन्होंने कहा, "मैं जानता हूँ कि मैं एक अभागा, निकम्मा पापी हूँ, जिसके पास अपने में दरिद्रता और पाप के सिवा कुछ नहीं। मैं जानता हूँ कि यीशु मसीह एक महिमामय और सर्वशक्तिमान उद्धारकर्ता है। मैं उसके प्रायश्चित और अनुग्रह की पूरी सामर्थ्य को देखता हूँ; और अपने आपको पूरी तरह उसी पर डालता हूँ, और उसके चरणों की चौकी पर प्रतीक्षा करता हूँ।" अपनी मृत्यु से थोड़ा पहले उन्होंने अपने परिवार के एक सदस्य से कहा कि उनके लिए एक पुस्तक में यह वाक्य लिख दे, "'मसीह के सिवा कोई नहीं, मसीह के सिवा कोई नहीं,' लैम्बर्ट ने खूँटे पर जलते हुए कहा—उसी प्रकार मरते समय पूरे हृदय से रिचर्ड सेसिल भी यही कहता है।"

4. चौथी बात, अच्छी आशा वह आशा है जिसे हृदय के भीतर अनुभव किया जाता है। पौलुस क्या कहता है? वह उस "आशा" की चर्चा करता है "जिससे लज्जा नहीं होती, क्योंकि परमेश्वर का प्रेम हमारे हृदयों में उण्डेला गया है।" वह "आशा में आनन्दित रहने" की भी चर्चा करता है। (रोमियों 5:5; 12:12।)

जिस मनुष्य में अच्छी आशा है, उसे उसका बोध होता है। वह अपने भीतर कुछ ऐसा अनुभव करता है जो दूसरे मनुष्य नहीं करते—उसे आनेवाली भली बातों की एक सुदृढ़ अपेक्षा रखने का बोध होता है। यह बोध अलग-अलग लोगों में बहुत भिन्न हो सकता है। एक में यह प्रबल और स्पष्ट हो सकता है; दूसरे में दुर्बल और धुँधला। एक ही व्यक्ति के अनुभव की भिन्न-भिन्न अवस्थाओं में भी यह बहुत भिन्न हो सकता है। किसी समय वह "विश्वास करने में आनन्द और शान्ति" से भरा हो सकता है; किसी और समय वह उदास और निराश हो सकता है। परन्तु सब लोगों में जिनमें "अच्छी आशा" है, यह बोध कम या अधिक मात्रा में अवश्य रहता है।

मैं जानता हूँ कि इस सत्य का भयानक दुरुपयोग और विकृतीकरण हुआ है। कुछ मसीही कहलानेवालों के कट्टरपन, उन्माद और अतिवाद के कारण यह बहुत बदनाम हो गया है। केवल शारीरिक उत्तेजना को पवित्र आत्मा का कार्य समझ लिया गया है। दुर्बल और घबराहट-भरे लोगों की अतिशय भावनाओं को शीघ्रता और अविचार से अनुग्रह का फल मान लिया गया है। स्त्री-पुरुषों को जल्दबाज़ी में "मन फिराया हुआ" घोषित कर दिया गया, जो शीघ्र ही संसार में लौट गए और पूरी तरह "मन न फिराए हुए" तथा पापों में मरे हुए प्रमाणित हुए। और तब शैतान ने अपनी चाल चली। हर प्रकार की धार्मिक भावनाओं पर घृणा उँडेली गई—उनके अस्तित्व तक को नकारा और ठुकराया गया; और परिणाम यह है कि धर्म में "भावनाओं" के नाम से ही अनेक स्थानों पर भय और अरुचि है।

परन्तु किसी सत्य के दुरुपयोग और विकृति के कारण हमें उसके सदुपयोग से कभी वंचित नहीं होना चाहिए। कट्टरता और उन्माद के विरुद्ध जो कुछ कहा जा सकता है, वह सब कह लेने पर भी यह अस्वीकार नहीं किया जा सकता कि धार्मिक भावनाओं का पवित्रशास्त्र में स्पष्ट उल्लेख और वर्णन मिलता है। परमेश्वर का वचन हमें बताता है कि सच्चे मसीही के पास "शान्ति", "विश्राम", "आनन्द" और "भरोसा" होता है। वह हमें ऐसे लोगों के विषय में बताता है जिनके पास "आत्मा की गवाही" है—जो "किसी विपत्ति से नहीं डरते"—जो "निश्चयता" का आनन्द लेते हैं—जो "जानते हैं कि उन्होंने किस पर विश्वास किया है"—जो "निश्चय जानते हैं कि वे मसीह में परमेश्वर के प्रेम से कभी अलग न किए जाएँगे।" मैं इन्हीं भावनाओं का पक्ष लेता हूँ—यह वही संयमित, आन्तरिक अनुभव है जिसमें मुझे कुछ भी अतिरंजित, उन्मादपूर्ण या कट्टर नहीं दिखता। ऐसी भावनाओं के विषय में मैं निडर होकर कहता हूँ कि किसी मनुष्य को इनसे लज्जित होने की आवश्यकता नहीं। मैं और आगे बढ़कर कहता हूँ कि जिस मनुष्य को अपने हृदय में इन भावनाओं का थोड़ा-सा भी, चाहे धुँधला ही सही, अनुभव नहीं है, उसके पास "उत्तम आशा" नहीं है। मैं इससे भी आगे कहता हूँ कि इसके अतिरिक्त कोई और सिद्धान्त मानना पवित्र आत्मा के सम्पूर्ण कार्य का अनादर करना है।

क्या कोई हमें बताएगा कि परमेश्वर ने कभी यह चाहा कि सच्चे मसीही को अपने मसीही होने की कोई आन्तरिक चेतना न हो? क्या कोई कहेगा कि बाइबल सिखाती है कि लोग मृत्यु से जीवन में पार हो जाएँ, क्षमा पाएँ, नए किए जाएँ और पवित्र ठहरें, फिर भी भीतर इस महान परिवर्तन का कुछ भी अनुभव न करें? जो चाहे ऐसा सोचे—मैं ऐसा कोई सिद्धान्त नहीं मान सकता। यह मानना कि लाज़र को पता नहीं था कि वह कब्र से जिलाया गया, या बरतिमाई को पता नहीं था कि उसकी आँखों की ज्योति लौट आई, मेरे लिए उतना ही कठिन है जितना यह मानना कि मनुष्य अपने भीतर परमेश्वर के आत्मा को अनुभव नहीं कर सकता।

क्या थका हुआ मनुष्य बिछौने पर लेटे और विश्राम का अनुभव न करे? क्या अफ्रीका के मरुस्थल में प्यास से व्याकुल यात्री ठंडा जल पिए और ताज़गी न पाए? क्या उत्तरी ध्रुव के प्रदेशों में ठिठुरता हुआ नाविक आग के पास आए और गर्मी न पाए? क्या हमारी गलियों में भटकने वाला अधनंगा, भूखा और बेघर मनुष्य वस्त्र, भोजन और आश्रय पाए और सान्त्वना का अनुभव न करे? क्या मूर्छित रोगी जीवनदायी औषधि पाए और फिर से जी न उठे? मैं इसे नहीं मान सकता। मेरा विश्वास है कि हर स्थिति में कुछ न कुछ अनुभव अवश्य होगा। ठीक इसी प्रकार मैं यह नहीं मान सकता कि कोई मनुष्य सच्चा मसीही हो और भीतर कुछ अनुभव न करे। नया जन्म, पापों की क्षमा, मसीह के लहू से छिड़का हुआ विवेक, और पवित्र आत्मा का वास—ये उतनी छोटी बातें नहीं हैं जितनी लोग समझते हैं। जो इन्हें जानता है, वह इन्हें अनुभव करेगा। उसके भीतरी मनुष्य में एक वास्तविक और स्पष्ट गवाही होगी।

आओ, हम ऐसी आशा से सावधान रहें जिसका अनुभव नहीं होता, और ऐसे मसीही जीवन से जिसमें कोई आन्तरिक अनुभव नहीं। ये आज के युग की मूर्तियाँ हैं, और हज़ारों इनके आगे दण्डवत् कर रहे हैं। हज़ारों अपने आप को समझाने का प्रयत्न कर रहे हैं कि लोग नया जन्म पा सकते हैं और आत्मा पा सकते हैं, फिर भी उन्हें इसका बोध न हो—या कि लोग मसीह के अंग हो सकते हैं और उससे लाभ पा सकते हैं, जबकि उनमें न उसके नाम के प्रति विश्वास है, न प्रेम। आधुनिक युग के प्रिय सिद्धान्त यही हैं! ये वे देवता हैं जिन्होंने डायना और मरकुरियुस की, और "उस मूर्ति की जो ज्यूपिटर की ओर से गिर पड़ी थी" जगह ले ली है! ये दुर्बल, मूर्तिपूजक और तुच्छ मनुष्य के गढ़े हुए नवीनतम देवता हैं! ऐसी सब मूर्तियों से हम पूरी सतर्कता से अपने आप को बचाए रखें। उनके सिर चाहे सोने के हों—उनके पाँव मिट्टी से बेहतर नहीं! वे खड़ी नहीं रह सकतीं—देर-सबेर उन्हें गिरना ही होगा। जो उनकी उपासना करते हैं उनका भविष्य सचमुच दयनीय है! उनकी आशा बाइबल की आशा नहीं—वह एक मृत शव की आशा है। जहाँ मसीह और पवित्र आत्मा हैं, वहाँ उनकी उपस्थिति का अनुभव अवश्य होगा!

क्या कोई सचेत मनुष्य यह मान सकता है कि प्रेरित पौलुस ऐसे मसीहियों से सन्तुष्ट होता जो आन्तरिक भावनाओं के विषय में कुछ नहीं जानते थे? क्या हम कल्पना कर सकते हैं कि परमेश्वर का वह सामर्थी जन ऐसे धर्म को मान्यता देता जो किसी के पास हो और फिर भी भीतर कुछ अनुभव न हो? क्या हम उसकी स्थापित कलीसियाओं में से किसी ऐसे सदस्य की कल्पना कर सकते हैं जो परमेश्वर के प्रति शान्ति, आनन्द या भरोसे से बिलकुल अपरिचित हो, फिर भी उस महान प्रेरित द्वारा सच्चा विश्वासी माना गया हो! ऐसे विचार को दूर करो! वह क्षणभर भी विचार की कसौटी पर नहीं टिकता। पवित्रशास्त्र की गवाही स्पष्ट और सुनिश्चित है। लोग उन्माद और उत्तेजना के विषय में चाहे जो कहें, धर्म में भावनाएँ होती ही हैं। जो मसीही इनके विषय में कुछ नहीं जानता, उसका अभी मन फिराव नहीं हुआ, और उसे सब कुछ सीखना बाकी है। यूनानी मूर्ति का ठंडा संगमरमर निर्विकार हो तो आश्चर्य नहीं। मिस्र की सूखी ममी कठोर और निश्चल दिखे तो आश्चर्य नहीं। संग्रहालय में रखा भुस भरा पशु गतिहीन और ठंडा हो तो आश्चर्य नहीं। ये सब निर्जीव वस्तुएँ हैं। परन्तु जहाँ जीवन है वहाँ कुछ न कुछ अनुभूति अवश्य होगी। "उत्तम आशा" वह आशा है जिसका अनुभव किया जा सकता है।

5. अन्त में, उत्तम आशा वह आशा है जो जीवन में बाहर प्रकट होती है। एक बार फिर देखें कि पवित्रशास्त्र क्या कहता है: "जो कोई उस पर यह आशा रखता है, वह अपने आप को वैसा ही पवित्र करता है जैसा वह पवित्र है।" (1 यूहन्ना 3:3।) जिस मनुष्य के पास उत्तम आशा है, वह अपने सारे चाल-चलन में उसे प्रकट करेगा। वह उसके जीवन, चरित्र और दैनिक आचरण पर प्रभाव डालेगी; वह उसे एक पवित्र, भक्त, विवेकशील और आत्मिक मनुष्य बनने का प्रयत्न करने को प्रेरित करेगी। वह उसकी सेवा करने और उसे प्रसन्न करने के लिए, जिससे उसकी आशा है, अपने ऊपर निरन्तर एक ऋण अनुभव करेगा। वह अपने आप से कहेगा, "मैं प्रभु के सब उपकारों का बदला उसे क्या दूँ?" वह अनुभव करेगा, "मैं दाम देकर मोल लिया गया हूँ—मैं अपने शरीर और आत्मा दोनों से परमेश्वर की महिमा करूँ, जो उसी के हैं।" "जिसने मुझे अन्धकार से अपनी अद्भुत ज्योति में बुलाया है, मैं उसके गुण प्रकट करूँ।" मैं सिद्ध करूँ कि मैं मसीह का मित्र हूँ, "उसकी आज्ञाओं को मानकर।" (भजन संहिता 116:12; 1 कुरिन्थियों 6:20; 1 पतरस 2:9; यूहन्ना 15:14।)

यह एक ऐसी बात है जो कलीसिया के हर युग में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण रही है। यह ऐसा सत्य है जिस पर शैतान सदा आक्रमण करता रहता है, और जिसकी बड़ी सावधानी से रखवाली करनी पड़ती है। आइए, हम इसे दृढ़ता से थाम लें और इसे अपने धर्म का एक स्थिर सिद्धान्त बना लें। यदि घर में उजियाला हो तो वह खिड़कियों से बाहर चमकता है—यदि मनुष्य की आत्मा में कोई सच्ची आशा है तो वह उसके चाल-चलन में दिखाई देगी। मुझे अपनी आशा अपने जीवन और प्रतिदिन के व्यवहार में दिखाओ। वह कहाँ है? किस बात में प्रकट होती है? यदि तुम उसे दिखा नहीं सकते, तो निश्चय जानो कि वह एक धोखे और फन्दे से अधिक कुछ नहीं है।

आज के समय की माँग है कि इस विषय पर सब सेवक स्पष्ट गवाही दें। इस विषय में सत्य को बहुत साफ़ शब्दों में कहना आवश्यक है। आइए, हम इसे अपने मन में गहराई से बैठा लें, और इसे हाथ से जाने देने से सावधान रहें। कोई हमें व्यर्थ बातों से धोखा न दे। "जो धर्म के काम करता है वही धर्मी है।" "जो कहता है कि मैं उस में बना रहता हूँ, उसे चाहिए कि आप भी वैसा ही चले जैसा वह चलता था।" (1 यूहन्ना 2:6; 3:7।) जो आशा मनुष्य को जीवन के सब सम्बन्धों में ईमानदार, आदरणीय, सच्चा, संयमी, परिश्रमी, निःस्वार्थ, प्रेमी, नम्र, कृपालु और विश्वासयोग्य नहीं बनाती, वह परमेश्वर की ओर से नहीं है। वह केवल "होंठों की बातचीत है जिस से केवल घटी होती है।" "जो झूठा दान देने का घमण्ड करता है, वह उन बादलों और पवन के समान है जिन में वर्षा नहीं होती।" (नीतिवचन 14:23; 25:14।)

झूठी आशाएँ

(क) आज के समय में कुछ लोग यह सोचकर अपने आप को बहलाते हैं कि उनके पास अच्छी आशा है क्योंकि उनके पास धार्मिक ज्ञान है। वे अपनी बाइबल के अक्षर से परिचित हैं; वे सिद्धान्त की बातों पर तर्क-वितर्क कर सकते हैं—वे अपने धर्मशास्त्रीय मतों के समर्थन में पवित्रशास्त्र के पद दर्जनों की संख्या में सुना सकते हैं। वे वाद-विवाद में पक्के बिन्यामीनी हैं—वे "बाल भर के अन्तर पर भी गोफन से पत्थर चला सकते हैं, और चूकते नहीं।" (न्यायियों 20:16।) फिर भी उनमें आत्मा के फल नहीं हैं, न प्रेम, न नम्रता, न कोमलता, न दीनता, और वह मन तो बिलकुल नहीं जो मसीह में था। तो क्या इन लोगों के पास सच्ची आशा है? जो चाहे इस पर विश्वास करे, मैं तो ऐसा कहने का साहस नहीं करता। मैं पौलुस के साथ यह मानता हूँ, "यदि मैं मनुष्यों और स्वर्गदूतों की बोलियाँ बोलूँ, और प्रेम न रखूँ, तो मैं ठनठनाता हुआ पीतल और झंझनाती हुई झाँझ हूँ। और यदि मैं भविष्यद्वाणी कर सकूँ, और सब भेदों और सब प्रकार के ज्ञान को समझूँ, और मुझे यहाँ तक पूरा विश्वास हो कि मैं पहाड़ों को हटा दूँ, परन्तु प्रेम न रखूँ, तो मैं कुछ भी नहीं। और यदि मैं अपनी सम्पूर्ण सम्पत्ति कंगालों को खिला दूँ, या अपनी देह जलाने के लिये दे दूँ, परन्तु प्रेम न रखूँ, तो मुझे कुछ भी लाभ नहीं। प्रेम धीरजवन्त है, और कृपालु है; प्रेम डाह नहीं करता; प्रेम अपनी बड़ाई नहीं करता, और फूलता नहीं। वह अनरीति नहीं चलता, वह अपना भला नहीं चाहता, झुँझलाता नहीं, बुरा नहीं मानता। कुकर्म से आनन्दित नहीं होता, परन्तु सत्य से आनन्दित होता है। वह सब बातें सह लेता है, सब बातों की प्रतीति करता है, सब बातों की आशा रखता है, सब बातों में धीरज धरता है।" हाँ—प्रेम के बिना आशा, आशा है ही नहीं।

(ख) फिर कुछ लोग ऐसे हैं जो परमेश्वर के अनन्त चुनाव के कारण यह मान बैठते हैं कि उनके पास अच्छी आशा है। वे निर्भीकता से अपने आप को समझाते हैं कि वे कभी उद्धार के लिये परमेश्वर द्वारा बुलाए और चुने गए थे। वे यह मान लेते हैं कि उनके हृदय में कभी आत्मा का सच्चा कार्य हुआ था, और इसलिये सब कुछ ठीक ही होगा। वे दूसरों को हीन दृष्टि से देखते हैं जो उतना दावा करने से डरते हैं जितना वे करते हैं। वे मानो यह सोचते हैं, "हम परमेश्वर के लोग हैं, हम प्रभु का मन्दिर हैं, हम परमप्रधान के कृपापात्र सेवक हैं—हम वे हैं जो स्वर्ग में राज्य करेंगे, और कोई दूसरा नहीं।" फिर भी ये ही लोग झूठ बोल सकते हैं, छल कर सकते हैं, ठग सकते हैं, और अनादरपूर्ण काम कर सकते हैं! इनमें से कुछ तो एकान्त में पीकर मतवाले भी हो जाते हैं, और गुप्त में ऐसे पाप करते हैं जिनका नाम लेना भी लज्जा की बात है! तो क्या इनके पास अच्छी आशा है? परमेश्वर न करे कि मैं ऐसा कहूँ! जो चुनाव "पवित्रीकरण के लिये" नहीं है, वह परमेश्वर की ओर से नहीं—शैतान की ओर से है। जो आशा मनुष्य को पवित्र नहीं बनाती, वह आशा है ही नहीं।

(ग) आज के दिनों में कुछ लोग यह सोचते हैं कि उनके पास अच्छी आशा है क्योंकि उन्हें सुसमाचार सुनना भाता है। उन्हें अच्छे उपदेश सुनना प्रिय है। वे अपने किसी प्रिय प्रचारक को सुनने के लिये मीलों चलकर जाते हैं, और उसकी बातों से रोते हैं और बहुत प्रभावित होते हैं। उन्हें कलीसिया में देखकर कोई सोचेगा, "निश्चय ही ये मसीह के चेले हैं, निश्चय ही ये उत्तम मसीही हैं!" फिर भी ये ही लोग संसार की हर मूर्खता और रंगरलियों में डूब सकते हैं। रात पर रात वे पूरे मन से नाचघर, नाटकघर या नाच-रंग की सभाओं में जाते हैं। वे घुड़दौड़ के मैदान में दिखाई देते हैं। संसारी आमोद-प्रमोद में वे सबसे आगे रहते हैं। रविवार को उनकी आवाज़ याकूब की आवाज़ होती है—परन्तु सप्ताह के दिनों में उनके हाथ एसाव के हाथ होते हैं। तो क्या इन लोगों के पास अच्छी आशा है? मैं ऐसा कहने का साहस नहीं करता। "संसार से मित्रता करना परमेश्वर से बैर करना है;" जो आशा संसार के सदृश बनने से नहीं रोकती, वह आशा है ही नहीं। "जो कोई परमेश्वर से उत्पन्न हुआ है, वह संसार पर जय प्राप्त करता है।" (याकूब 4:4; 1 यूहन्ना 5:4।)

आइए, हम ऐसी किसी भी आशा से सावधान रहें जो हमारे हृदय, जीवन, रुचियों, आचरण और बातचीत पर पवित्र करनेवाला प्रभाव नहीं डालती। वह ऐसी आशा है जो कभी ऊपर से नहीं उतरी। वह केवल घटिया धातु और खोटा सिक्का है। उस पर पवित्र आत्मा की टकसाल की छाप नहीं है, और वह स्वर्ग में कभी नहीं चलेगा। जिस मनुष्य के पास सच्ची आशा है, वह निस्सन्देह किसी दोष में पकड़ा जा सकता है; वह अपने आचरण में कभी-कभी लड़खड़ा सकता है, और कुछ समय के लिये सही मार्ग से भटक सकता है। परन्तु जो मनुष्य परमेश्वर की व्यवस्था के किसी जान-बूझकर किए गए और आदतन उल्लंघन की अपने आप को छूट दे सकता है, वह हृदय से सड़ा हुआ है। वह अपनी आशा के विषय में जितना चाहे बोल ले—परन्तु वास्तव में उसके पास कोई आशा नहीं है। उसका धर्म शैतान के लिये आनन्द, संसार के लिये ठोकर, सच्चे मसीहियों के लिये शोक, और परमेश्वर के लिये अपमान है। आह, कि लोग इन बातों पर विचार करें! आह, कि बहुत से लोग कोई ऐसी प्रार्थना करें, "हे भले प्रभु, मुझे व्यवस्था-विरोधी शिक्षा और कपट से बचा!"

अब मैंने वह कर दिया जो मैंने करने को ठहराया था। मैंने खरी, अच्छी आशा के पाँच मुख्य चिह्न दिखा दिए हैं।

(1) यह वह आशा है जिसे मनुष्य समझा सकता है।

(2) यह वह आशा है जो पवित्रशास्त्र से ली गई है।

(3) यह वह आशा है जो मसीह पर आधारित है।

(4) यह वह आशा है जिसे हृदय के भीतर अनुभव किया जाता है।

(5) यह वह आशा है जो जीवन में बाहर प्रकट होती है।

मेरा दृढ़ विश्वास है कि हर सच्चे मसीही की आशा ऐसी ही होती है — चाहे वह किसी भी नाम, कलीसिया, सम्प्रदाय, जाति और भाषा का हो। हमारी आशा ऐसी ही होनी चाहिए, यदि हम स्वर्ग जाने का इरादा रखते हैं। मेरा दृढ़ विश्वास है कि इस आशा के बिना कोई मनुष्य उद्धार नहीं पा सकता। यही "अनुग्रह से उत्तम आशा" है।

अब मुझे अनुमति दें कि मैं इस सारे विषय को हर पाठक के विवेक पर व्यावहारिक रीति से लागू करूँ। यदि हम सत्य को जानकर भी उसका उपयोग न करें, तो उससे हमें क्या लाभ? यदि उत्तम आशा का वास्तविक स्वरूप देखकर भी वह बात हमारी अपनी आत्मा तक न पहुँचे, तो उससे हमें क्या फल मिलेगा? यदि परमेश्वर ने चाहा, तो इस लेख के शेष भाग में मैं यही करने का प्रस्ताव रखता हूँ। परमेश्वर का आत्मा मेरे शब्दों को इन पृष्ठों के हर पाठक के हृदय पर सामर्थ्य के साथ लागू करे! मनुष्य बोल सकता है, प्रचार कर सकता है और लिख सकता है — परन्तु मन फिराव केवल परमेश्वर ही करा सकता है!

(1) मेरे प्रयोग का पहला शब्द एक प्रश्न है। मैं इसे उन सब के सामने रखता हूँ जो यह लेख पढ़ते हैं, और हर पाठक से विनती करता हूँ कि वह इसका उत्तर दे। वह प्रश्न यह है: "अपनी आत्मा के विषय में आपकी अपनी आशा क्या है?"

मैं यह प्रश्न व्यर्थ की जिज्ञासा से नहीं पूछता। मैं इसे मसीह के राजदूत के रूप में और आपके परम हित के मित्र के रूप में पूछता हूँ। मैं इसे इसलिए पूछता हूँ कि आप में आत्म-परीक्षा जागे और आपकी आत्मिक भलाई बढ़े। मैं पूछता हूँ, "अपनी आत्मा के विषय में आपकी आशा क्या है?"

मैं यह नहीं जानना चाहता कि आप गिरजे में जाते हैं या किसी और उपासना-स्थल में — स्वर्ग में इन भेदों का कोई लेखा न होगा। मैं यह नहीं जानना चाहता कि आप सुसमाचार को अच्छा मानते हैं, और यह उचित समझते हैं कि लोगों का अपना धर्म हो और वे प्रार्थना करें; यह सब निशाने से बाहर की बात है — असली बात यह नहीं है। जिस बात पर मैं आपका ध्यान दिलाना चाहता हूँ वह यह है: "अपनी आत्मा के विषय में आपकी आशा क्या है?"

इससे कुछ नहीं बनता कि आपके सम्बन्धी क्या सोचते हैं। इससे कुछ नहीं बनता कि मुहल्ले या नगर के और लोग किस बात को अच्छा समझते हैं। परमेश्वर का लेखा नगरों, मुहल्लों या परिवारों के हिसाब से नहीं लिया जाएगा — हर एक को अलग खड़ा होकर अपना उत्तर देना होगा। "हम में से हर एक परमेश्वर को अपना अपना लेखा देगा।" (रोमियों 14:12।) और आप अपने बचाव में क्या कहना चाहते हैं? आपकी दलील क्या होगी? "अपनी आत्मा के विषय में आपकी आशा क्या है?"

समय थोड़ा है और तेज़ी से बीत रहा है — कुछ ही वर्षों में हम सब मर जाएँगे और चले जाएँगे! शायद वे वृक्ष कट चुके हैं जिनसे हमारे ताबूत बनेंगे — शायद वे कफ़न बुने जा चुके हैं जो हमारी देहों को लपेटेंगे — शायद वे फावड़े बन चुके हैं जो हमारी कब्रें खोदेंगे। अनन्तकाल निकट आ रहा है! इसमें कोई खिलवाड़ नहीं होना चाहिए। "अपनी आत्मा के विषय में आपकी आशा क्या है, क्या है?"

एक और संसार शीघ्र आरम्भ होने वाला है। व्यापार, राजनीति, धन, भूमि, झोपड़ियाँ, महल, खाना, पीना, पहनना, पढ़ना, खेलना, काम करना, नाचना, भोज करना — सब सदा के लिए समाप्त हो जाएँगे। रह जाएगा तो केवल किसी के लिए स्वर्ग, और किसी के लिए नरक! "अपनी आत्मा के विषय में आपकी आशा क्या है, क्या है?"

मैंने अपना प्रश्न पूछ लिया। और अब मैं हर पाठक से परमेश्वर की दृष्टि में पूछता हूँ: आपका उत्तर क्या है?

बहुत से लोग — यदि सच बोलें तो — कहेंगे, "मैं इसके बारे में कुछ नहीं जानता। मुझे लगता है कि मैं वैसा नहीं हूँ जैसा मुझे होना चाहिए। मैं मानता हूँ कि मुझे जितनी धार्मिकता मुझमें है उससे अधिक होनी चाहिए। मुझे भरोसा है कि किसी दिन मुझमें अधिक होगी। परन्तु अभी किसी आशा के विषय में — मैं सचमुच नहीं जानता!"

मैं पूरी तरह मान सकता हूँ कि बहुतों की यही दशा है। मैंने लोगों की आत्मिक अज्ञानता इतनी देखी है कि मेरा मन गहरे शोक से भर गया है। मुझे विश्वास है कि कोई ऐसा भ्रम, या झूठा मत, या "वाद" नहीं है जो इतनी आत्माओं का नाश कर रहा हो जितना अज्ञानता का झूठा मत कर रहा है। मुझे विश्वास है कि इंग्लैंड में लाखों ऐसे लोग हैं जो अपने को मसीही कहते हैं, पर मसीहियत की वर्णमाला तक नहीं जानते, और बपतिस्मा पाए हुए अन्यजातियों से अधिक कुछ नहीं हैं! मैंने एक मनुष्य के विषय में सुना है, जिसकी अन्तिम घड़ियों में उसकी एकमात्र आशा यह थी, "कि उसने सदा अपनी कलीसिया का साथ दिया और नीले दल को वोट दिया।" मैंने एक स्त्री के विषय में सुना है, जिससे मृत्यु-शय्या पर पूछा गया कि वह कहाँ जाने की आशा रखती है, तो उसने कहा, "वह आशा रखती है कि भीड़ के साथ चली जाएगी।" मुझे इसमें थोड़ा भी सन्देह नहीं कि इस देश में हज़ारों लोग लगभग ऐसी ही दशा में हैं, जिन्हें परमेश्वर के सामने अपनी दशा के विषय में कुछ भी नहीं पता। यदि इस लेख के किसी पाठक की यही दशा है, तो मैं केवल इतना कह सकता हूँ: परमेश्वर तुम्हारा मन फिराए! परमेश्वर तुम्हें जगाए! परमेश्वर बहुत देर होने से पहले तुम्हारी आँखें खोल दे!

"जब हम उन शारीरिक, निश्चिन्त, लापरवाह पापियों से (और वे एक विशाल भीड़ हैं) बात करते हैं, और उनसे उस स्वर्ग की आशा का कारण पूछते हैं जिसका वे दावा करते हैं, तो क्या उनका सामान्य उत्तर यह नहीं होता, 'मैं किसी को ठेस पहुँचाए बिना जीता हूँ; परमेश्वर की व्यवस्था को जितना हो सके मानता हूँ; जब भी चूकता हूँ, तो पछताता हूँ और मसीह के नाम पर परमेश्वर से दया माँगता हूँ — मेरा हृदय सच्चा है, चाहे मेरा ज्ञान और उपलब्धि औरों से कम हो'? यदि हम आगे पूछें कि यीशु मसीह से उनकी कितनी जान-पहचान है? उनकी आत्माओं ने उसके पास कैसे आवेदन किया है? उस पर उनके विश्वास ने कैसे काम किया है? धर्मी ठहराए जाने के लिए उन्होंने उसकी धार्मिकता का, और पवित्रीकरण के लिए उसके आत्मा का क्या उपयोग किया है? यीशु मसीह पर विश्वास से जीने के विषय में वे क्या जानते हैं? — तो हम उन्हें असभ्य जंगली लगते हैं! और इसी दयनीय दशा में इंग्लैंड के हज़ारों लोग जीते हैं, मरते हैं और सदा के लिए नाश होते हैं। फिर भी इस युग का अन्धकार इतना घना है कि उनमें से बहुत से यहाँ अच्छे मसीही होने की प्रतिष्ठा के साथ जीते हैं और उसी प्रतिष्ठा के साथ यहाँ से जाते हैं; और उनमें से कुछ के लिए कोई अज्ञानी चापलूस सेवक अन्तिम संस्कार का उपदेश और प्रशंसा भी सुना देता है; जबकि हो सकता है कि उन बेचारे प्राणियों ने जीवन भर, और मृत्यु के समय भी, स्वर्ग में प्रवेश के लिए — जो उसके लहू से मोल लिया गया है और उस पर विश्वास से मिल सकता है — यीशु मसीह का उतना भी उपयोग न किया हो जितना एक बेचारा तुर्क अपने घिनौने स्वर्ग में एक कोठरी पाने के लिए मुहम्मद का करता है!" — ट्रेल।

उस मनुष्य को देखो जो लाभांश के दिन बैंक ऑफ इंग्लैंड में जाकर एक बड़ी रकम चुकाए जाने की माँग करता है। क्या उसका नाम भुगतान पानेवालों की सूची में है? नहीं! क्या उसके पास माँग करने का कोई अधिकार या हक़ है? नहीं! उसके पास कुछ भी नहीं है! वह केवल इतना जानता है कि दूसरे लोग धन पा रहे हैं, और वह भी कुछ पाना चाहेगा। तुम भली-भाँति जानते हो कि तुम उस मनुष्य को "बुद्धि-भ्रष्ट" कहोगे; तुम कहोगे कि वह पागल के सिवा और कुछ नहीं है। परन्तु ठहरो! सोच-समझकर बोलो! यदि तुम अन्त में स्वर्ग पर अपना अधिकार जताना चाहते हो, जबकि तुम्हारे पास दिखाने के लिए न कोई हक़ है, न कोई अधिकार-पत्र, न आशा का कोई आधार, तो असली पागल तुम ही हो। मैं फिर कहता हूँ—परमेश्वर तुम्हारी आँखें खोले!

परन्तु मेरा विश्वास है कि बहुत से लोग मेरे प्रश्न के उत्तर में कहेंगे कि "हमें आशा है।" वे कहेंगे, "कम से कम मैं कुछ लोगों जितना बुरा तो नहीं हूँ। मैं अन्यजाति नहीं हूँ। मैं अविश्वासी नहीं हूँ। मुझे अपनी आत्मा के विषय में कुछ आशा है।"

यदि तुम्हारी दशा ऐसी है, तो मैं तुमसे विनती करता हूँ कि शान्ति से विचार करो कि तुम्हारी आशा वास्तव में क्या है। मैं तुमसे आग्रह करता हूँ कि तोते की तरह "मुझे आशा है—मुझे आशा है—मुझे आशा है" कहकर सन्तुष्ट मत हो जाओ; बल्कि अपने भरोसे के स्वरूप की गम्भीरता से जाँच करो, और निश्चित कर लो कि वह दृढ़ नींव पर टिका है। क्या यह ऐसी आशा है जिसे तुम समझा सकते हो? क्या यह पवित्रशास्त्र के अनुसार है? क्या यह मसीह पर बनी है? क्या यह तुम्हारे हृदय में अनुभव होती है? क्या यह तुम्हारे जीवन को पवित्र करती है? जो कुछ चमकता है वह सब सोना नहीं होता। मैं तुम्हें पहले ही चेता चुका हूँ कि सच्ची आशा के साथ झूठी आशा भी होती है—मैं यह चेतावनी फिर देता हूँ। मैं तुमसे विनती करता हूँ कि सावधान रहो कि धोखा न खाओ। भूलों से सावधान रहो।

लन्दन के बन्दरगाह में शान्त खड़े जहाज़ हैं, जो पृथ्वी के हर भाग के लिए रवाना होनेवाले हैं। जब तक वे बन्दरगाह में हैं, सब एक समान भरोसेमन्द दिखते हैं; सबके नाम एक-से अच्छे हैं, और सब एक-से सुसज्जित और रंगे हुए हैं—परन्तु वे सब एक समान मज़बूत बने और एक समान सुरक्षित नहीं हैं। जब वे समुद्र में उतरें और तूफ़ानी मौसम से उनका सामना हो, तब मज़बूत और कमज़ोर जहाज़ों का अन्तर शीघ्र ही प्रकट हो जाएगा। बन्दरगाह में अच्छा दिखनेवाला कितना ही जहाज़ गहरे पानी में पहुँचकर समुद्र की यात्रा के योग्य नहीं ठहरा, और अन्त में अपने सारे यात्रियों समेत डूब गया! ठीक यही बहुत सी झूठी आशाओं का हाल है। जब उसकी सबसे अधिक आवश्यकता थी तभी वह पूरी तरह विफल हो गई—वह अन्त में टूट पड़ी, और अपने स्वामी की आत्मा को नष्ट कर गई। तुम्हें भी शीघ्र समुद्र में उतरना होगा। मैं फिर कहता हूँ, भूलों से सावधान रहो!

मैं अपना प्रश्न यहीं छोड़ता हूँ। मैं हृदय से प्रार्थना करता हूँ कि परमेश्वर इसे उन सब के हृदयों पर लागू करे जो इस लेख को पढ़ें। मुझे निश्चय है कि इसकी बड़ी आवश्यकता है। मेरा विश्वास है कि ऐसा समय कभी नहीं था जब इतना नक़ली धर्म चल रहा हो, और इतनी "झूठी आशाएँ" सच्ची बनकर चल रही हों। ऐसा समय कभी नहीं था जब इतना ऊँचा अंगीकार हो और आत्मिक आचरण इतना कम, उपदेशकों, दलों और कलीसियाओं की इतनी ऊँची चर्चा हो और परमेश्वर के साथ इतना कम निकट चलना तथा आत्मा का सच्चा कार्य। मसीही जगत में फूलों की कमी नहीं—परन्तु पके फल का शोचनीय अभाव है। वाद-विवाद के धर्मविज्ञान की भरमार है—परन्तु व्यावहारिक पवित्रता का अकाल है। ऐसे असंख्य लोग हैं जिनका नाम तो जीवित होने का है—परन्तु थोड़े ही हैं जिनके हृदय सचमुच यीशु मसीह को दिए गए हैं—थोड़े ही हैं जिनका प्रेम सचमुच ऊपर की वस्तुओं में लगा है। बहुत से स्थानों में अभी कुछ भयानक विफलताएँ होंगी—और अन्तिम दिन उससे भी अधिक भयानक प्रकटीकरण होंगे। आजकल ऐसी बहुत सी आशाएँ हैं जो पूरी तरह नींव-रहित हैं। मैं अन्तिम बार कहता हूँ, भूलों से सावधान रहो।

(2) मेरा दूसरा शब्द, जो प्रयोग के लिए है, एक निवेदन होगा। मैं इसे इस लेख के उन सब पाठकों से करता हूँ जो अनुभव करते हैं कि उनके पास आशा नहीं है और उसे पाना चाहते हैं। यह एक छोटा और सीधा निवेदन है। मैं उनसे आग्रह करता हूँ कि जब तक "उत्तम आशा" मिल सकती है, उसे खोजें।

उत्तम आशा किसी भी मनुष्य की पहुँच के भीतर है, यदि वह उसे खोजने को तैयार हो। पवित्रशास्त्र में इसे विशेष रूप से "अनुग्रह से उत्तम आशा" कहा गया है। यह सेंतमेंत दी जाती है, जैसे यह सेंतमेंत मोल ली गई थी—यह "बिना रुपये और बिना दाम" मिल सकती है। हमारा बीता जीवन, चाहे वह कितना ही बुरा रहा हो, इसे पाना असम्भव नहीं बनाता; हमारी वर्तमान निर्बलताएँ और दुर्बलताएँ, चाहे कितनी ही बड़ी हों, हमें इससे बाहर नहीं करतीं। जिस अनुग्रह ने मनुष्यों को आशा दी, वही एक निःशुल्क, पूर्ण और असीम निमंत्रण देता है। "जो कोई चाहे वह जीवन का जल सेंतमेंत ले।" "माँगो, तो तुम्हें दिया जाएगा; ढूँढ़ो, तो तुम पाओगे।" (प्रकाशितवाक्य 22:17; मत्ती 7:7।)

प्रभु यीशु मसीह उन सबको "उत्तम आशा" देने में समर्थ और इच्छुक हैं जो सचमुच उसे चाहते हैं। पिता परमेश्वर ने उन्हें ठहराया और मुहर लगाई है कि वे सब भूखों को जीवन की रोटी और सब प्यासों को जीवन का जल दें। "पिता की यह प्रसन्नता थी कि उसमें सारी परिपूर्णता वास करे।" (कुलुस्सियों 1:19।) उसमें क्षमा और परमेश्वर के साथ मेल है, जो उस बहुमूल्य लहू से मोल लिया गया जो उसने क्रूस पर बहाया। उसमें हर विश्वासी के लिए आनन्द और शान्ति है, और आनेवाली भली बातों की ठोस, सुदृढ़ अपेक्षा है। उसमें थके हुए के लिए विश्राम, डरे हुओं के लिए शरण, अशुद्धों के लिए शुद्ध करनेवाला सोता, रोगियों के लिए औषधि, टूटे हृदयवालों के लिए चंगाई और खोए हुओं के लिए आशा है। जो कोई पाप के बोझ से थका और दबा हुआ महसूस करता है, जो कोई अपनी आत्मा के विषय में चिन्तित और व्याकुल है, जो कोई मृत्यु से डरता और मरने के लिए अपने को अयोग्य पाता है—वह जो कोई भी हो, मसीह के पास जाए और उस पर भरोसा रखे। यही करने की बात है—यही चलने का मार्ग है। जो कोई "आशा" चाहता है, वह मसीह के पास जाए।

यदि इस लेख का कोई पाठक सचमुच उत्तम आशा का आनन्द पाना चाहता है, तो वह उसे प्रभु यीशु मसीह से माँगे। ऐसा करने के लिए हर प्रकार का प्रोत्साहन है। प्राचीन काल के थिस्सलोनीकियों के लोग, इफिसियों के समान, अपराधों और पापों में मरे हुए थे, उनके पास कोई आशा नहीं थी, और वे संसार में परमेश्वर से रहित थे; परन्तु जब पौलुस ने उन्हें यीशु का प्रचार किया, तो वे अपनी दयनीय दशा से उठ खड़े हुए और नए मनुष्य बन गए। परमेश्वर ने उन्हें "अनुग्रह से उत्तम आशा" दी। जिस द्वार से मनश्शे और मरियम मगदलीनी भीतर आए, वह अब भी खुला है! जिस सोते में जक्कई और मत्ती धोए गए, वह अब भी बन्द नहीं हुआ है! मसीह से आशा माँगो, और तुम उसे पाओगे।

इसे ईमानदारी से खोजो, और मन में कोई गुप्त बात छिपाकर न रखो। बहुतों के नाश का कारण यह है कि वे निष्कपट और सीधे नहीं होते। वे कहते हैं कि वे "जितना हो सकता है उतना प्रयत्न करते हैं," और सचमुच "उद्धार पाना चाहते हैं," और सचमुच "मसीह की ओर देखते हैं;" फिर भी उनके हृदय की कोठरी में कोई प्रिय पाप बैठा रहता है, जिससे वे चुपके-चुपके चिपके रहते हैं और उसे छोड़ने का मन नहीं बनाते। वे उस ऑगस्टीन के समान हैं जिसने कहा था, "हे प्रभु, मुझे बदल दे—पर अभी नहीं।" यदि तुम एक अच्छी आशा पाना चाहते हो तो ईमानदारी से खोजो।

इसे नम्र प्रार्थना में खोजो। प्रभु यीशु के सामने अपना मन उँडेल दो, और अपनी आत्मा की सब आवश्यकताएँ उसे बता दो। वैसा ही करो जैसा तुम तब करते यदि तुम अठारह सौ वर्ष पहले गलील में रहते और तुम्हें कुष्ठ रोग होता—सीधे मसीह के पास जाओ, और अपनी चिन्ताएँ उसके सामने रख दो! उससे कहो कि तुम एक दीन, पापी प्राणी हो—परन्तु तुमने सुना है कि वह एक अनुग्रहकारी उद्धारकर्ता है, और तुम अपनी आत्मा के लिये "आशा" माँगने उसके पास आए हो। उससे कहो कि तुम्हारे पास अपने पक्ष में कहने को कुछ नहीं—कोई बहाना नहीं, अपना कुछ भी प्रस्तुत करने को नहीं—परन्तु तुमने सुना है कि वह "पापियों से मिलता है," और इसलिये उसी रूप में तुम उसके पास आते हो। (लूका 15:2।)

इसे अभी खोजो, देर न करो। अब दो विचारों के बीच न लड़खड़ाओ—एक दिन भी और मत ठहरो। घमण्ड के उन अवशेषों को दूर फेंक दो जो अब भी तुम्हें रोके हुए हैं—एक बोझ से दबे पापी की नाईं यीशु के निकट आओ, और "उस आशा को जो तुम्हारे सामने रखी है, दृढ़ता से पकड़ लो।" (इब्रानियों 6:18।) यही वह स्थान है जहाँ सबको अन्त में आना ही पड़ेगा यदि वे उद्धार पाना चाहते हैं। देर-सबेर उन्हें अनुग्रह के द्वार को खटखटाकर भीतर आने की प्रार्थना करनी ही होगी। अभी क्यों नहीं? जीवन की रोटी को ताकते हुए क्यों खड़े हो? आगे बढ़कर उसे खाते क्यों नहीं? शरण-नगर के बाहर क्यों ठहरे हो? भीतर जाकर सुरक्षित क्यों नहीं हो जाते? अभी आशा क्यों नहीं खोजते, और जब तक पा न लो विश्राम क्यों नहीं करते? जिस मार्ग का मैंने संकेत किया है, उस पर चलकर जिस किसी आत्मा ने ईमानदारी से खोजा, वह खोजकर पाए बिना न रही।

मसीह के पास विश्वास से आने के इस विषय पर ट्रेल के शब्द बहुत मनन के योग्य हैं। वे एक ऐसे विषय पर प्रकाश डालते हैं जिसे निरन्तर गलत समझा जाता है। वह कहता है, "जब हमारा सामना एक दीन, जागे हुए पापी से होता है, जो अपनी खोई हुई दशा को देखता है, और यह कि वह परमेश्वर की व्यवस्था से दोषी ठहराया गया है, तब हम उसमें वही सिद्धान्त (घमण्ड और अज्ञानता) कार्य करते पाते हैं। हम उसे रोगी और घायल देखते हैं—हम उसे बताते हैं कि उसकी सहायता कहाँ है, अर्थात् यीशु मसीह में; और उसका उचित कार्य क्या है, अर्थात् विश्वास से उसकी शरण लेना। उसका उत्तर क्या होता है—वह मनुष्य कहता है, 'हाय, मैं ऐसा नीच पापी रहा हूँ, और हूँ, मेरा हृदय इतना बुरा है, और विपत्तियों और भ्रष्टताओं से इतना भरा है, कि मैं मसीह पर विश्वास करने की सोच भी नहीं सकता। परन्तु यदि मुझमें मन फिराव होता, और हृदय और जीवन में कुछ पवित्रता होती, और अमुक-अमुक अनुग्रह के गुण होते—तो मैं तब विश्वास करता।' उसका यह उत्तर मूर्खता, अज्ञानता और घमण्ड से इतना भरा है जितना शब्दों में समा सके या व्यक्त हो सके। इसका अर्थ यह है—

(1) यदि मैं भली-भाँति चंगा हो जाता, तो मैं वैद्य मसीह को काम में लगाता।

(2) इन अच्छी बातों को मैं स्वयं, मसीह के बिना, पूरा कर लूँगा, इसकी कुछ आशा है।

(3) जब मैं हाथ में दाम लेकर मसीह के पास आऊँगा तब मेरा स्वागत होगा।

(4) मैं जब चाहूँ मसीह के पास आ सकता हूँ।

यीशु मसीह पर विश्वास के विषय में लोग स्वभाव से ऐसे अज्ञानी हैं; और कोई शब्द, या चेतावनी, या सबसे सीधी शिक्षा भी मनुष्यों के सिर और हृदय में यह बात नहीं बैठा सकती कि मसीह के पास विश्वास से पहली बार आना, और उस पर विश्वास करना, यह विश्वास करना नहीं है कि हम उसके द्वारा उद्धार पाएँगे—परन्तु उस पर इसलिये विश्वास करना है कि हम उसके द्वारा उद्धार पाएँ।"—ट्रेल की रचनाएँ।

(3) मेरा अन्तिम शब्द, प्रयोग के रूप में, परामर्श होगा। मैं इसे उन सब के सामने रखता हूँ जिन्होंने सचमुच "अनुग्रह के द्वारा उत्तम आशा" पाई है। मैं इसे उन सब के सामने रखता हूँ जो सचमुच मसीह पर टिके हैं, सकरे मार्ग पर चल रहे हैं, और परमेश्वर के आत्मा की अगुवाई में हैं। मैं उनसे ऐसे व्यक्ति की सलाह मानने को कहता हूँ जो आशा करता है कि वह "यीशु मसीह के राज्य और धीरज में उनका भाई और सहभागी है।" (प्रकाशितवाक्य 1:9।) मेरा विश्वास है कि यह सलाह खरी और अच्छी है।

(क) यदि तुम्हारे पास उत्तम आशा है तो उसके विषय में उत्साही और सचेत रहो। चौकस रहो कि शैतान उसे कुछ समय के लिये चुरा न ले जाए, जैसा उसने दाऊद और पतरस से किया। चौकस रहो कि असंगतियों के आगे झुककर और संसार के अनुरूप होकर तुम उसे दृष्टि से ओझल न कर दो। उसे बार-बार जाँचते रहो, और निश्चित कर लो कि वह धुँधली तो नहीं पड़ रही। अपने स्वभाव, विचारों और वचनों के विषय में प्रतिदिन सावधान रहकर उसे उजला बनाए रखो। मन से, उत्साह से और निरन्तर प्रार्थना करके उसे स्वस्थ रखो। मसीही की आशा एक बहुत नाजुक पौधा है। यह ऊपर से आया हुआ विदेशी पौधा है—यह स्वाभाविक रूप से उगने वाला पौधा नहीं है। इस संसार के ठण्डे पाले से यह सहज ही ठिठुर जाता और झुलस जाता है। यदि इसे सावधानी से सींचा और सँभाला न जाए, तो यह शीघ्र ही घटकर कुछ भी न रह जाएगा, और मुश्किल से अनुभव या दिखाई देगा। यह बात उन मरते हुए विश्वासियों को सबसे अधिक पीड़ा के साथ मालूम होती है जो परमेश्वर के साथ बहुत निकटता से नहीं चले। वे पाते हैं कि उन्होंने अपने मृत्यु-शय्या के तकियों में काँटे बो दिए हैं, और अपने तथा सूर्य के बीच बादल ले आए हैं।

(ख) एक और बात, यदि तुम्हारे पास उत्तम आशा है, तो उसे सदा तैयार रखो। उसे अपने दाहिने हाथ में रखो, तुरन्त काम में लाने के लिये तैयार—उसे बार-बार देखो, और ध्यान रखो कि वह ठीक दशा में है। परीक्षाएँ अकसर हथियारबन्द मनुष्य की नाईं अचानक हम पर टूट पड़ती हैं। बीमारियाँ और हमारी नश्वर देह की चोटें कभी-कभी बिना किसी चेतावनी के हमें बिछौने पर गिरा देती हैं। धन्य है वह जो अपना दीया भली-भाँति सँवारे रखता है, और प्रतिदिन मसीह की सहभागिता के बोध में जीता है!

क्या तुमने कभी किसी पुराने देहाती घर में आग बुझाने का यन्त्र देखा है? क्या तुमने कभी ध्यान दिया कि वह कितने ही महीनों तक किसी अँधेरी कोठरी में पड़ा रहता है, बिना छुए, बिना जाँचे और बिना साफ़ किए? उसके वाल्व बिगड़े हुए हैं; चमड़े की नली में छेद ही छेद हैं; पम्प जंग लगे और अकड़े हुए हैं। घर लगभग जलकर राख हो सकता है और वह एक बाल्टी पानी भी नहीं उठा सकता। अपनी इस दशा में वह लगभग निकम्मी मशीन है।

क्या आपने कभी बन्दरगाह के गोदी में खड़ा कोई जहाज़ देखा है? हो सकता है उसका ढाँचा अच्छा और मज़बूत हो; उसकी पेंदी, बग़लें, लकड़ियाँ, धरनें और तख़्ते सब वैसे ही हों जैसे आप चाहें। परन्तु वह न तो मस्तूलों और रस्सों से सुसज्जित है, न उसमें रसद भरी है, न शस्त्र लगे हैं, और न वह सेवा के योग्य है। उसे समुद्र के लिए तैयार करने में सप्ताह और महीने लग जाएँगे। अपनी वर्तमान दशा में वह अपने देश की रक्षा के लिए बहुत कम कर सकता है। बहुत-से विश्वासियों की आशा उसी दमकल और उसी जहाज़ के समान है। वह है, वह जीवित है, वह वास्तविक है, वह सच्ची है, वह खरी है—वह भली है—वह स्वर्ग से उतरी है—उसे पवित्र आत्मा ने बोया है। परन्तु हाय, वह काम में लाने के लिए तैयार नहीं है! उसका स्वामी जब मृत्यु-शय्या पर पहुँचेगा, तब अपने आनन्द और अनुभव होनेवाली सान्त्वना की कमी से यह जान लेगा। सावधान रहिए कि आपकी आशा इस प्रकार की आशा न हो। यदि आपके पास आशा है तो उसे काम में लाने के लिए तैयार रखिए, और अपने हाथ की पहुँच में रखिए।

(ग) दूसरी बात यह कि यदि आपके पास भली आशा है, तो खोजिए और प्रार्थना कीजिए कि वह प्रति वर्ष अधिक से अधिक दृढ़ होती जाए। "छोटी बातों के दिन" से सन्तुष्ट न हो जाइए; उत्तम वरदानों की लालसा कीजिए—पूरी निश्चयता का आनन्द लेने की इच्छा कीजिए। पौलुस के स्तर तक पहुँचने का यत्न कीजिए, ताकि आप कह सकें, "मैं जानता हूँ कि मैं ने किस पर विश्वास किया है।" "मैं निश्चय जानता हूँ कि न मृत्यु, न जीवन हमें परमेश्वर के उस प्रेम से, जो हमारे प्रभु यीशु मसीह में है, अलग कर सकेगा।" (2 तीमुथियुस 1:12; रोमियों 8:38।)

मेरी बात मानिए, मेरी सम्मति का यह भाग ध्यानपूर्वक विचार करने के योग्य है। मेरी बात मानिए, हम सब के सामने जो बातें आनेवाली हैं वे हमारी आशा को परखेंगी कि वह किस प्रकार की है। बीमारी और मृत्यु गम्भीर बातें हैं। वे मनुष्य के धर्म से सारा दिखावटी साज-सिंगार उतार देती हैं; वे हमारे मसीही जीवन के निर्बल स्थानों को प्रकट कर देती हैं; वे हमारी आशाओं को अन्तिम सीमा तक खींचती हैं, और प्रायः हमें निराशा के निकट ले आती हैं। "पिलग्रिम्स प्रोग्रेस" का बूढ़ा मसीही स्वर्गीय नगर में प्रवेश करने से पहले ठण्डी नदी पार करते समय अपने अन्त के दिनों में कठिन परीक्षा से गुज़रा। विश्वासयोग्य और सच्चा होने पर भी वह चिल्ला उठा, "तेरी सब लहरें मुझ पर से बह गईं," और पाँव टिकाए रखने में उसे कड़ा संघर्ष करना पड़ा। हम सब इसे अपने मन में बैठा लें! हम यह जानने और अनुभव करने का यत्न करें कि हम मसीह के साथ एक हैं और मसीह हम में है! जिसके पास आशा है वह अच्छा करता है; परन्तु जिसके पास निश्चयता है वह और भी अच्छा करता है। धन्य हैं वे जो "पवित्र आत्मा की सामर्थ्य से आशा में बढ़ते जाते हैं।" (रोमियों 15:13।)

(घ) अन्त में, यदि आपके पास भली आशा है, तो उसके लिए धन्यवादी रहिए और प्रतिदिन परमेश्वर की स्तुति कीजिए। आपके चारों ओर के नाश होते संसार से आपको किसने भिन्न किया है? आपको क्यों सिखाया गया कि अपने पापों और अपनी तुच्छता का बोध करें, जबकि दूसरे अनजान और अपनी धार्मिकता पर घमण्ड करनेवाले हैं? आपको क्यों सिखाया गया कि यीशु की ओर देखें, जबकि दूसरे अपनी भलाई की ओर देख रहे हैं, या धर्म के किसी निरे रूप पर टिके हुए हैं? आप पवित्र होने की लालसा और यत्न क्यों कर रहे हैं, जबकि दूसरों को इस संसार के सिवाय किसी बात की चिन्ता नहीं? ये बातें ऐसी क्यों हैं? इसका एक ही उत्तर है: अनुग्रह, अनुग्रह, मुफ़्त अनुग्रह ने यह सब किया है। उस अनुग्रह के लिए परमेश्वर की स्तुति कीजिए। उस अनुग्रह के लिए धन्यवादी रहिए।

तो अपनी यात्रा के अन्त तक आगे बढ़ते चलिए, "परमेश्वर की महिमा की आशा पर आनन्दित होते हुए।" (रोमियों 5:2।) इस विचार से आनन्दित होकर आगे बढ़िए कि यद्यपि आप एक दीन पापी हैं, फिर भी यीशु अत्यन्त दयालु उद्धारकर्ता हैं, और यद्यपि यहाँ थोड़े समय के लिए आप पर क्लेश हैं, स्वर्ग शीघ्र ही सब की क्षतिपूर्ति कर देगा।

आगे बढ़ते चलिए, और जीवन के सब युद्धों में आशा को टोप के समान धारण किए रहिए—क्षमा की आशा, अन्त तक स्थिर रहने की आशा, न्याय के दिन दोषमुक्त होने की आशा, अन्तिम महिमा की आशा। धार्मिकता की झिलम पहन लीजिए; विश्वास की ढाल ले लीजिए; सत्य से अपनी कमर कसे रहिए; आत्मा की तलवार वीरता से चलाइए। परन्तु कभी न भूलिए—यदि आप कभी सुखी मसीही होना चाहते हैं—कभी न भूलिए कि "आशा का टोप" पहनें। (1 थिस्सलुनीकियों 5:8।)

एक कठोर संसार के होते हुए भी आगे बढ़ते चलिए, और उसकी हँसी या सताव, उसकी निन्दा या ठट्ठों से विचलित न होइए। अपने मन को इस विचार से सान्त्वना दीजिए कि समय थोड़ा है, उत्तम बातें अभी आनेवाली हैं, रात बहुत बीत चुकी है, और "बिना बादल का प्रातःकाल" निकट है। (2 शमूएल 23:4।) जब दुष्ट मनुष्य मरता है तो उसकी आशा नष्ट हो जाती है; परन्तु आपकी आशा आपको धोखा न देगी—आपका प्रतिफल निश्चित है।

आगे बढ़ते चलिए, और इस कारण निराश न होइए कि आप सन्देहों और भयों से व्याकुल हैं। आप अभी देह में हैं—यह संसार आपका विश्रामस्थान नहीं है। शैतान आपसे बैर रखता है क्योंकि आप उसके हाथ से छूट आए हैं, और वह आपकी शान्ति छीनने के लिए जो कुछ कर सकता है करेगा। आपके मन में भय का होना ही इस बात का प्रमाण है कि आप अनुभव करते हैं कि आपके पास खोने के लिए कुछ है। सच्चे मसीही की पहचान जितनी उसकी शान्ति से होती है उतनी ही उसके संघर्ष से; और जितनी उसकी आशाओं से उतनी ही उसके भयों से। लंगर डाले हुए जहाज़ ज्वार के साथ इधर-उधर झूल सकते हैं, और दक्खिन-पूर्वी आँधी में बुरी तरह हिचकोले खा सकते हैं; परन्तु जब तक उनके लंगर तल को पकड़े रहते हैं वे सुरक्षित टिके रहते हैं, और उन्हें डरने का कोई कारण नहीं। सच्चे मसीही की आशा "उसकी आत्मा का लंगर है, जो स्थिर और दृढ़ है।" (इब्रानियों 6:19।) उसका मन कभी-कभी इधर-उधर डोल सकता है—परन्तु वह मसीह में सुरक्षित है। लहरें उठ सकती हैं और उसे ऊपर-नीचे उछाल सकती हैं—परन्तु उसका जहाज़ डूबेगा नहीं।

आगे बढ़ते चलिए, और "उस अनुग्रह की पूरी आशा रखिए जो यीशु मसीह के प्रकट होने के समय आप पर होनेवाला है।" (1 पतरस 1:13।) थोड़ा समय और, और विश्वास दर्शन में, और आशा निश्चय में बदल जाएगी—आप वैसा ही देखेंगे जैसा आप देखे गए हैं, और वैसा ही जानेंगे जैसा आप जाने गए हैं। इस कष्टमय संसार की लहरों पर थोड़े और हिचकोले—हमारे आत्मिक शत्रु के साथ थोड़े और युद्ध और संघर्ष—आँसुओं और बिछोहों, परिश्रम और दुःख-सहन, क्रूसों और चिन्ताओं, निराशाओं और झुँझलाहटों के थोड़े और वर्ष, और फिर—फिर हम घर पहुँच जाएँगे! बन्दरगाह की बत्तियाँ पहले ही दिखाई देने लगी हैं—विश्राम का घाट दूर नहीं है। वहाँ हमें वह सब मिलेगा जिसकी हमने आशा की है, और पाएँगे कि वह हमारी आशाओं से लाखों गुना उत्तम था। वहाँ हमें सब पवित्र लोग मिलेंगे, और न पाप, न इस संसार की चिन्ताएँ, न धन, न बीमारी, न मृत्यु, न शैतान। वहाँ, सबसे बढ़कर, हमें यीशु मिलेंगे, और हम सदा प्रभु के साथ रहेंगे! (1 थिस्सलुनीकियों 4:17।) आइए, हम आशा रखे रहें। क्रूस उठाना और मसीह के पीछे चलना सार्थक है। संसार चाहे तो हँसे और ठट्ठा करे; "अनुग्रह के द्वारा भली आशा" रखना और पूरी तरह दृढ़ मसीही होना सार्थक है। मैं फिर कहता हूँ—आइए, हम आशा रखे रहें!

जीवित या मृत?

"और उसने तुम्हें भी जिलाया, जो अपने अपराधों और पापों के कारण मरे हुए थे।" इफिसियों 2:1

इस लेख का शीर्षक जो प्रश्न है, वह हज़ार विचारों के योग्य है। मैं इस पुस्तक के हर पाठक को आमन्त्रित करता हूँ कि इसे ध्यान से देखे और भली भाँति मन में विचार करे। अपने ही मन को खोजिए, और गम्भीर आत्म-परीक्षा किए बिना इस पुस्तक को नीचे न रखिए। क्या आप जीवितों में हैं, या मृतकों में?

जब मैं उत्तर पाने में आपकी सहायता करने का प्रयत्न करूँ, तब मेरी सुनिए। जब मैं इस विषय को खोलकर समझाऊँ और आपको दिखाऊँ कि पवित्रशास्त्र में परमेश्वर ने इसके विषय में क्या कहा है, तब मुझ पर ध्यान दीजिए। यदि मैं कठोर बातें कहूँ, तो इसलिए नहीं कि मैं आपसे प्रेम नहीं रखता। मैं जैसा लिखता हूँ वैसा इसलिए लिखता हूँ कि मैं आपका उद्धार चाहता हूँ। वही आपका सबसे अच्छा मित्र है जो आपको सबसे अधिक सत्य बताता है।

I. सबसे पहले, मैं आपको बताऊँ कि हम सब स्वभाव से क्या हैं। हम आत्मिक रीति से मरे हुए हैं!

"मरा हुआ" एक कड़ा शब्द है—परन्तु यह मेरा अपना गढ़ा हुआ या आविष्कार किया हुआ शब्द नहीं है। इसे मैंने नहीं चुना। पवित्र आत्मा ने पौलुस को इफिसियों के विषय में इसे लिखना सिखाया, "और उसने तुम्हें भी जिलाया, जो अपने अपराधों और पापों के कारण मरे हुए थे।" प्रभु यीशु मसीह ने उड़ाऊ पुत्र के दृष्टान्त में इसका प्रयोग किया, "यह मेरा पुत्र मर गया था, फिर जी गया है।" (लूका 15:24, 32।) आप इसे तीमुथियुस की पहली पत्री में भी पढ़ेंगे, "जो logon भोग-विलास में पड़ी रहती है, वह जीते जी मर गई है।" (1 तीमुथियुस 5:6।) क्या कोई नश्वर मनुष्य उससे अधिक बुद्धिमान हो सकता है जो लिखा है? क्या मुझे सावधान न रहना चाहिए कि मैं वही कहूँ जो बाइबल में पाता हूँ, न उससे कम न अधिक?

"मरा हुआ" एक भयानक विचार है, और ऐसा विचार है जिसे मनुष्य ग्रहण करने को सबसे कम तैयार है। वह अपनी आत्मा के रोग का पूरा विस्तार मानना नहीं चाहता—वह अपने संकट की वास्तविक मात्रा की ओर से आँखें मूँद लेता है। बहुत से लोग हमें यह कहने देंगे कि स्वभाव से अधिकांश लोग "वैसे नहीं हैं जैसे उन्हें होना चाहिए—वे अविचारी हैं—वे अस्थिर हैं—वे हँसमुख हैं—वे उच्छृंखल हैं—वे पर्याप्त गम्भीर नहीं हैं।" परन्तु मरे हुए? अरे नहीं! इसका उल्लेख हमें नहीं करना चाहिए। ऐसा कहना तो बहुत आगे बढ़ जाना है। यह विचार ठोकर का पत्थर और ठेस की चट्टान है।

"हम इसीलिए अच्छे नहीं हैं कि हमारा रोग भली भाँति ज्ञात नहीं है—हम इसीलिए अच्छे नहीं हैं कि हम नहीं जानते कि हम कितने बुरे हैं।"—अशर के उपदेश, ऑक्सफ़ोर्ड में प्रचारित, 1650।

परन्तु धर्म में हमें क्या अच्छा लगता है, इसका बहुत कम महत्त्व है। एकमात्र प्रश्न यह है कि क्या लिखा है? प्रभु क्या कहता है? परमेश्वर के विचार मनुष्य के विचार नहीं हैं, और परमेश्वर के वचन मनुष्य के वचन नहीं हैं। परमेश्वर हर उस जीवित व्यक्ति के विषय में, जो सच्चा, पूर्ण, खरा और दृढ़ मसीही नहीं है, चाहे वह ऊँचा हो या नीचा, धनी हो या निर्धन, बूढ़ा हो या जवान, यह कहता है कि वह आत्मिक रीति से मरा हुआ है।

इसमें, जैसे और सब बातों में, परमेश्वर के वचन सही हैं। इससे अधिक ठीक, इससे अधिक यथार्थ, इससे अधिक विश्वासयोग्य, इससे अधिक सत्य कुछ नहीं कहा जा सकता। थोड़ा ठहरिए, और मुझे इस बात को आपके साथ तर्क करके समझाने दीजिए। आइए और देखिए।

यदि आप यूसुफ को अपने पिता याकूब पर रोते हुए देखते, तो आप क्या कहते? "वह अपने पिता के मुँह पर गिरकर रोया और उसे चूमा।" (उत्पत्ति 50:1।) परन्तु उसके स्नेह का कोई उत्तर न मिला। उस वृद्ध मुख पर सब कुछ अचल, मौन और स्थिर था। निःसन्देह आप कारण का अनुमान लगा लेते। याकूब मर चुका था।

यदि आप उस लेवी को अपनी पत्नी से बातें करते सुनते, जब उसने उसे गिबा में द्वार के सामने पड़ी पाया, तो आप क्या कहते? "उठ," उसने कहा, "हम चलें। परन्तु उसने कोई उत्तर न दिया।" (न्यायियों 19:28।) उसके शब्द व्यर्थ गए। वह वहाँ निश्चल, अकड़ी हुई और ठंडी पड़ी थी। आप कारण जानते हैं। वह मर चुकी थी।

यदि आप उस अमालेकी को गिलबो पर्वत पर शाऊल के राजसी आभूषण उतारते देखते, तो आप क्या सोचते? उसने "उसके सिर का मुकुट और उसकी बाँह का कंगन" ले लिया। (2 शमूएल 1:10।) कोई प्रतिरोध न हुआ। उस गर्वीले मुख की एक नस भी न हिली—उसे रोकने के लिए एक उँगली भी न उठी। और क्यों? शाऊल मर चुका था।

यदि आप नाईन के फाटक पर उस विधवा के पुत्र से मिलते, जो अर्थी में पड़ा था, कफ़न में लिपटा हुआ, और उसकी रोती हुई माता उसके पीछे चल रही थी और वह धीरे-धीरे कब्र की ओर ले जाया जा रहा था, तो आप क्या सोचते? (लूका 7:12।) निःसन्देह यह सब आपको स्पष्ट होता। इसके लिए किसी व्याख्या की आवश्यकता न होती। वह जवान मर चुका था।

अब मैं कहता हूँ कि अपनी आत्मा के विषय में स्वभाव से हर मनुष्य की यही दशा है। मैं कहता हूँ कि आत्मिक बातों में हमारे आस-पास के लोगों की अधिकांश संख्या की यही स्थिति है। परमेश्वर उन्हें निरन्तर पुकारता है—दयाओं के द्वारा, दुःखों के द्वारा, सेवकों के द्वारा, अपने वचन के द्वारा—परन्तु वे उसका शब्द नहीं सुनते। प्रभु यीशु मसीह उन पर विलाप करता है, उनसे विनती करता है, उन्हें अनुग्रह भरे निमन्त्रण भेजता है, उनके मन के द्वार पर खटखटाता है—परन्तु वे ध्यान नहीं देते। उनके अस्तित्व का मुकुट और महिमा, वह बहुमूल्य रत्न, उनकी अमर आत्मा, पकड़ी जा रही है, लूटी जा रही है और छीनी जा रही है—और वे बिलकुल बेपरवाह हैं। शैतान उन्हें दिन-प्रतिदिन उस चौड़े मार्ग पर ले जा रहा है जो विनाश को पहुँचाता है—और वे बिना संघर्ष किए उसे अपना बन्दी बनाने देते हैं। और यह सब कहीं भी हो रहा है—हमारे चारों ओर—सब वर्गों में—देश की लम्बाई-चौड़ाई में। जब आप यह लेख पढ़ते हैं तो अपने विवेक में यह जानते हैं—आप इससे अनजान नहीं हो सकते। आप इसका इनकार नहीं कर सकते। तब मैं पूछता हूँ कि उससे अधिक पूर्णतः सत्य और क्या कहा जा सकता है जो परमेश्वर कहता है—कि हम सब स्वभाव से आत्मिक रीति से मरे हुए हैं?

हाँ! जब किसी मनुष्य का मन धर्म के विषय में ठंडा और बेपरवाह है—जब उसके हाथ कभी परमेश्वर का काम करने में नहीं लगते—जब उसके पाँव परमेश्वर के मार्गों से परिचित नहीं हैं—जब उसकी जीभ प्रार्थना और स्तुति में कभी या बहुत कम प्रयोग होती है—जब उसके कान सुसमाचार में मसीह की वाणी के प्रति बहरे हैं—जब उसकी आँखें स्वर्ग के राज्य की सुन्दरता के प्रति अन्धी हैं—जब उसका मन संसार से भरा है और आत्मिक बातों के लिए उसमें स्थान नहीं है—जब ये चिह्न किसी मनुष्य में पाए जाएँ, तब उसके विषय में बाइबल का वचन ही सही वचन है—और वह वचन है, "मरा हुआ।"

शायद हमें यह अच्छा न लगे। हम संसार के तथ्यों और परमेश्वर के वचन के पदों की ओर से अपनी आँखें मूँद लें। परन्तु परमेश्वर का सत्य तो बोला ही जाना चाहिए, और उसे दबा रखना सचमुच हानि पहुँचाता है। सत्य बोला जाना चाहिए, चाहे वह कितना ही दोषी ठहराने वाला क्यों न हो। जब तक मनुष्य देह, आत्मा और प्राण से परमेश्वर की सेवा नहीं करता, तब तक वह सचमुच जीवित नहीं है। जब तक वह पहली बातों को पीछे और पिछली बातों को आगे रखता है, निकम्मे दास के समान अपना तोड़ा मिट्टी में गाड़ देता है, और प्रभु को आदर की कोई उपज नहीं लौटाता, तब तक परमेश्वर की दृष्टि में वह मरा हुआ है। वह सृष्टि में उस स्थान को नहीं भर रहा है जिसके लिये वह ठहराया गया था; वह अपनी शक्तियों और क्षमताओं का उस रीति से उपयोग नहीं कर रहा है जैसा परमेश्वर ने चाहा था। कवि के शब्द पूर्णतः सत्य हैं—

"वही जीवित है, जो परमेश्वर के लिये जीता है, और बाकी सब मरे हुए हैं।"

यही उस पाप की सच्ची व्याख्या है जो अनुभव नहीं होता, उन उपदेशों की जिन पर विश्वास नहीं किया जाता—और उस भली सलाह की जिसे माना नहीं जाता—और उस सुसमाचार की जिसे ग्रहण नहीं किया जाता—और उस संसार की जिसे छोड़ा नहीं जाता—और उस क्रूस की जिसे उठाया नहीं जाता—और उस स्वेच्छाचार की जिसे मारा नहीं जाता—और उन बुरी आदतों की जिन्हें त्यागा नहीं जाता—और उस बाइबल की जो कभी-कभार ही पढ़ी जाती है—और उस घुटने की जो प्रार्थना में कभी नहीं झुकता। यह सब चारों ओर क्यों है? उत्तर सरल है—मनुष्य मरे हुए हैं!

यही उस बहानों की सेना का सच्चा कारण है, जिसे इतने लोग "एक मन होकर" प्रस्तुत करते हैं। किसी के पास विद्या नहीं, और किसी के पास समय नहीं। कुछ लोग व्यापार और धन की चिन्ता में डूबे हैं, और कुछ निर्धनता में। कुछ को अपने ही परिवार में कठिनाइयाँ हैं, और कुछ को अपने स्वास्थ्य की। कुछ के व्यवसाय में ऐसी विशेष बाधाएँ हैं जिन्हें, वे कहते हैं, दूसरे नहीं समझ सकते; और दूसरों के घर में विशेष रुकावटें हैं, और वे उनके दूर होने की प्रतीक्षा में हैं। परन्तु बाइबल में परमेश्वर का एक और छोटा शब्द है, जो इन सब लोगों का वर्णन एक साथ कर देता है। वह कहता है, वे मरे हुए हैं। यदि इन लोगों के हृदय में आत्मिक जीवन आरम्भ हो जाए, तो इनके बहाने शीघ्र ही मिट जाएँगे।

यही उन बहुत सी बातों की सच्ची व्याख्या है जो एक विश्वासयोग्य सेवक के हृदय को व्यथित करती हैं। उसके आस-पास के बहुत से लोग उपासना के स्थान में कभी आते ही नहीं। बहुत से इतने अनियमित आते हैं कि स्पष्ट है कि वे इसे महत्त्वहीन समझते हैं। बहुत से रविवार को एक बार आते हैं जो उतनी ही सरलता से दो बार आ सकते थे। बहुत से कभी प्रभु की मेज़ पर नहीं आते—और सप्ताह के दिनों में अनुग्रह के किसी भी साधन में दिखाई नहीं देते। और यह सब क्यों है? प्रायः, बहुत बार, इन लोगों के विषय में केवल एक ही उत्तर हो सकता है—वे मरे हुए हैं।

अब देखो कि सब मसीही कहलाने वालों को अपने आप को कैसे जाँचना और अपनी दशा को परखना चाहिए। मरे हुए केवल कब्रिस्तानों में ही नहीं पाए जाते; हमारी कलीसियाओं के भीतर, और हमारे मंचों के पास भी बहुत से हैं—बेंचों पर भी बहुत, और बैठने के स्थानों में भी बहुत। देश उस घाटी के समान है जो यहेजकेल के दर्शन में थी, "हड्डियों से भरी, बहुत ही हड्डियाँ, और बहुत सूखी हुई।" (यहेजकेल 37:2) हमारे सब मण्डलों में मरी हुई आत्माएँ हैं, और हमारी सब गलियों में मरी हुई आत्माएँ हैं। शायद ही कोई ऐसा परिवार हो जिसमें सब परमेश्वर के लिये जीवित हों; शायद ही कोई ऐसा घर हो जिसमें कोई न कोई मरा हुआ न हो। ओह, आओ हम सब अपने ही घर में खोजें और देखें! हम अपने आप को परखें। क्या हम जीवित हैं या मरे हुए?

यह भी देखो कि उन सब की दशा कितनी शोचनीय है जिनमें कोई आत्मिक परिवर्तन नहीं हुआ, जिनके हृदय अब भी वैसे ही हैं जैसे जन्म के दिन थे। उनके और स्वर्ग के बीच विभाजन का एक पहाड़ खड़ा है। उन्हें अभी "मृत्यु से पार होकर जीवन में प्रवेश" करना है। (1 यूहन्ना 3:14) ओह, कि वे अपना संकट देख और जान पाते! हाय, आत्मिक मृत्यु का यह एक भयानक चिह्न है कि स्वाभाविक मृत्यु के समान यह भी अनुभव नहीं होती! हम अपने प्रियजनों को कोमलता और धीरज से उनकी सँकरी शय्या में लिटा देते हैं—परन्तु जो हम करते हैं उसका उन्हें कुछ अनुभव नहीं होता। बुद्धिमान पुरुष कहता है, "मरे हुए कुछ भी नहीं जानते।" (सभोपदेशक 9:5) और मरी हुई आत्माओं का भी ठीक यही हाल है।

यह भी देखो कि सेवकों को अपनी मण्डलियों के विषय में चिन्तित रहने का कितना कारण है। हम जानते हैं कि समय थोड़ा है और जीवन अनिश्चित। हम जानते हैं कि आत्मिक मृत्यु वह राजमार्ग है जो अनन्त मृत्यु की ओर ले जाता है। हमें डर है कि कहीं हमारे सुनने वालों में से कोई अपने पापों में मर न जाए—अप्रस्तुत, बिना नया बने, बिना मन फिराए, बिना बदले। ओह, यदि हम प्रायः कठोरता से बोलते और गर्मजोशी से विनती करते हैं तो अचम्भा न करो! जब जीवन और मृत्यु का प्रश्न है, और इससे कम कुछ नहीं, तब हम तुम्हें चापलूसी के नाम देने, तुच्छ बातों से तुम्हारा मन बहलाने, मीठी बातें कहने और "शान्ति, शान्ति" पुकारने का साहस नहीं कर सकते। महामारी तुम्हारे बीच है। हम अनुभव करते हैं कि हम जीवितों और मरे हुओं के बीच खड़े हैं। हमें "बड़ी स्पष्टवादिता" से बोलना ही होगा, और हम बोलेंगे। "यदि तुरही का शब्द अस्पष्ट हो, तो कौन लड़ाई के लिये तैयार होगा?" (2 कुरिन्थियों 3:12; 1 कुरिन्थियों 14:8)

II. दूसरे स्थान पर मैं तुम्हें बताता हूँ कि जो मनुष्य उद्धार पाना चाहता है, उसे क्या चाहिए। उसे जिलाया जाना और आत्मिक रीति से जीवित किया जाना चाहिए।

जीवन सब सम्पत्तियों में सबसे बड़ी है। मृत्यु से जीवन में आना सब परिवर्तनों में सबसे बड़ा है। और इससे कम कोई परिवर्तन मनुष्य की आत्मा को स्वर्ग के योग्य बनाने में कभी काम नहीं आएगा। हाँ! थोड़ी मरम्मत और फेरबदल—थोड़ी सफाई और शुद्धि—थोड़ा रंग-रोगन और पैबन्द—थोड़ी चूनाकारी और पॉलिश—थोड़ा नया पन्ना पलटना और नया बाहरी रूप धारण करना—यह आवश्यक नहीं है। आवश्यक है कुछ बिलकुल नया भीतर लाना—हमारे भीतर एक नया स्वभाव, एक नया अस्तित्व—एक नया सिद्धान्त—एक नया मन रोपा जाना। केवल यही, और इससे कम कुछ नहीं, मनुष्य की आत्मा की आवश्यकताओं को कभी पूरा करेगा। हमें केवल नई खाल नहीं—परन्तु नया हृदय चाहिए।

"थोड़ा सुधार मनुष्य को नहीं बचाएगा, और न संसार की सारी नैतिकता, न परमेश्वर की आत्मा के सब सामान्य अनुग्रह, न जीवन का बाहरी परिवर्तन; ये काम न आएँगे, जब तक हम जिलाए न जाएँ, और हमारे भीतर नया जीवन उत्पन्न न किया जाए।"—उशर के उपदेश।

संगमरमर की चट्टान को खान से काटकर उसे एक भव्य मूर्ति में गढ़ना; उजाड़ जंगल को तोड़कर उसे फूलों की बाड़ी बना देना; लोहे के पत्थर को पिघलाकर उससे घड़ी की कमानियाँ बनाना—ये सब बड़े भारी परिवर्तन हैं। फिर भी ये सब उस परिवर्तन के सामने कुछ नहीं हैं जिसकी आवश्यकता आदम की हर सन्तान को है, क्योंकि ये तो केवल वही वस्तु है जो नए रूप में आ गई, और वही पदार्थ है जो नया आकार पा गया। परन्तु मनुष्य को तो उस वस्तु की कलम लगाने की आवश्यकता है जो उसमें पहले थी ही नहीं। उसे ऐसे परिवर्तन की आवश्यकता है जो मरे हुओं में से जी उठने के बराबर हो—उसे नई सृष्टि बनना ही होगा। "पुरानी बातें बीत गई हैं, देखो, वे सब नई हो गई हैं।" उसे "फिर से जन्म लेना" होगा, ऊपर से जन्म लेना होगा, परमेश्वर से जन्म लेना होगा। शरीर के जीवन के लिए स्वाभाविक जन्म जितना आवश्यक है, आत्मा के जीवन के लिए आत्मिक जन्म उससे रत्ती भर भी कम आवश्यक नहीं। (2 कुरिन्थियों 5:17. यूहन्ना 3:3.)

मैं भली-भाँति जानता हूँ कि यह कठोर बात है। मैं जानता हूँ कि इस संसार के लोगों को यह सुनना अच्छा नहीं लगता कि उन्हें फिर से जन्म लेना होगा। यह उनके विवेक को चुभता है—उन्हें अनुभव कराता है कि वे स्वर्ग से उससे कहीं अधिक दूर हैं जितना वे मानना चाहते हैं। यह उन्हें एक ऐसे सकरे द्वार के समान लगता है जिसमें घुसने के लिए वे अभी तक झुके नहीं हैं, और वे प्रसन्नता से उस द्वार को चौड़ा कर लेते, या किसी और मार्ग से चढ़ जाते। परन्तु इस विषय में मैं दबकर अधीन होने का साहस नहीं कर सकता। मैं किसी भ्रम को बढ़ावा नहीं दूँगा, और लोगों से यह नहीं कहूँगा कि सच्चे मसीही बनने के लिए उन्हें बस थोड़ा मन फिराना और अपने भीतर के किसी वरदान को जगाना ही काफ़ी है। मैं बाइबल की भाषा को छोड़ किसी और भाषा का प्रयोग करने का साहस नहीं कर सकता; और मैं उन्हीं शब्दों में कहता हूँ जो हमारी शिक्षा के लिए लिखे गए हैं: "हम सबको फिर से जन्म लेने की आवश्यकता है—हम सब स्वभाव से मरे हुए हैं, और हमें जिलाया जाना अनिवार्य है।"

यदि हम यहूदा के राजा मनश्शे को देखते, कि एक समय वह यरूशलेम को मूरतों से भर रहा है और झूठे देवताओं के सम्मान में अपने बच्चों की हत्या कर रहा है—और फिर दूसरे समय वह मन्दिर को शुद्ध कर रहा है, मूर्तिपूजा को मिटा रहा है और भक्तिपूर्ण जीवन बिता रहा है; यदि हम यरीहो के चुंगी लेनेवाले जक्कई को देखते, कि एक समय वह छल, लूट और लोभ में लगा है—और दूसरे समय वह मसीह के पीछे चल रहा है और अपनी आधी सम्पत्ति कंगालों को दे रहा है; यदि हम नीरो के घराने के सेवकों को देखते, कि एक समय वे अपने स्वामी के दुराचारी चालचलन के अनुसार चलते हैं—और दूसरे समय वे प्रेरित पौलुस के साथ एक मन और एक चित्त हैं; यदि हम प्राचीन पिता आगस्टीन को देखते, कि एक समय वह व्यभिचार में जी रहा है—और दूसरे समय वह परमेश्वर के साथ निकटता से चल रहा है; यदि हम अपने ही धर्म-सुधारक लैटिमर को देखते, कि एक समय वह यीशु में जो सत्य है उसके विरुद्ध उत्साह से प्रचार कर रहा है—और दूसरे समय वह मसीह के कार्य में अपने आपको खपा रहा है, यहाँ तक कि मृत्यु तक; यदि हम न्यूज़ीलैंड के निवासियों, या तिन्नेवेली के हिन्दुओं को देखते, कि एक समय वे रक्त के प्यासे, अनैतिक या घृणित अन्धविश्वासों में डूबे हैं—और दूसरे समय वे पवित्र, शुद्ध और विश्वासी मसीही हैं; यदि हमने ये आश्चर्यजनक परिवर्तन, या इनमें से कोई भी देखा होता, तो मैं किसी भी समझदार मसीही से पूछता हूँ कि हम क्या कहते? क्या हम इन्हें सुधार और फेर-बदल से अधिक कुछ न कहकर सन्तुष्ट हो जाते? क्या हम यह कहकर सन्तुष्ट हो जाते कि आगस्टीन ने "अपना चालचलन सुधार लिया," और लैटिमर ने "नया पन्ना पलट लिया"? सच तो यह है कि यदि हम इससे अधिक न कहते तो पत्थर तक चिल्ला उठते। मैं कहता हूँ कि इन सब उदाहरणों में नए जन्म से कुछ कम नहीं था, मानव स्वभाव का पुनरुत्थान था, मरे हुओं का जिलाया जाना था। प्रयोग करने के लिए सही शब्द यही हैं। अन्य सब भाषा निर्बल, तुच्छ, दीन, पवित्रशास्त्र-विरुद्ध और सत्य से घटकर है।

अब मैं स्पष्ट कहने से पीछे नहीं हटूँगा कि यदि हमें उद्धार पाना है, तो हम सबको उसी प्रकार के परिवर्तन की आवश्यकता है। हममें और उन लोगों में जिनका मैंने अभी नाम लिया, अन्तर उतना नहीं है जितना दिखाई देता है। बाहर की पपड़ी हटा दो, तो हममें और उनमें नीचे वही स्वभाव मिलेगा—एक बुरा स्वभाव, जिसे पूरी तरह बदलने की आवश्यकता है। पृथ्वी की सतह भिन्न-भिन्न जलवायु में बहुत भिन्न होती है—परन्तु पृथ्वी का हृदय, मैं मानता हूँ, सब जगह एक-सा है। जहाँ चाहो जाओ, एक छोर से दूसरे छोर तक, यदि तुम पर्याप्त गहराई तक खोदो तो अपने पैरों के नीचे सदा ग्रेनाइट या अन्य आदिम चट्टानें ही पाओगे। मनुष्यों के हृदयों के विषय में भी ठीक यही बात है। उनके रीति-रिवाज और रंग, उनके ढंग और उनके नियम, सब एक-दूसरे से सर्वथा भिन्न हो सकते हैं; परन्तु भीतरी मनुष्य सदा एक ही है। उनके हृदय तल पर सब एक-से हैं—सब पथरीले, सब कठोर, सब भक्तिहीन, सब ऐसे जिन्हें पूरी तरह नया किए जाने की आवश्यकता है। इस विषय में अंग्रेज़ और न्यूज़ीलैंड का निवासी एक ही स्तर पर खड़े हैं। दोनों स्वभाव से मरे हुए हैं, और दोनों को जिलाए जाने की आवश्यकता है। दोनों उसी पिता आदम की सन्तान हैं जो पाप से गिर गया, और दोनों को "फिर से जन्म लेने" और परमेश्वर की सन्तान बनाए जाने की आवश्यकता है।

पृथ्वी के जिस भाग में भी हम रहें, हमारी आँखें खोली जानी आवश्यक हैं—स्वभाव से हम अपनी पापमयता, दोष और संकट को कभी नहीं देखते। हम जिस भी जाति के हों, हमारी समझ को ज्योति मिलनी आवश्यक है—स्वभाव से हम उद्धार की योजना के विषय में बहुत कम या कुछ भी नहीं जानते—बाबुल के निर्माताओं के समान हम सोचते हैं कि अपने ही मार्ग से स्वर्ग पहुँच जाएँगे। हम जिस भी कलीसिया के हों, हमारी इच्छा को सही दिशा में मोड़ा जाना आवश्यक है—स्वभाव से हम कभी वे बातें न चुनते जो हमारी शान्ति की हैं; हम कभी मसीह के पास न आते। जीवन में हमारी जो भी श्रेणी हो, हमारे मन के लगाव को ऊपर की बातों की ओर फेरा जाना आवश्यक है—स्वभाव से हम उन्हें केवल नीचे की बातों पर लगाते हैं, जो सांसारिक, शारीरिक, क्षणिक और व्यर्थ हैं। घमण्ड को नम्रता के लिए, अपनी धार्मिकता को अपने आपको तुच्छ जानने के लिए, लापरवाही को गम्भीरता के लिए, सांसारिकता को पवित्रता के लिए, अविश्वास को विश्वास के लिए स्थान देना होगा। हमारे भीतर शैतान का राज्य गिराया जाना और परमेश्वर का राज्य स्थापित किया जाना आवश्यक है। स्वयं को क्रूस पर चढ़ाना और मसीह को राज्य करना होगा। जब तक ये बातें पूरी नहीं होतीं, हम पत्थरों के समान मरे हुए हैं। जब ये बातें होने लगती हैं, और उससे पहले नहीं, तब हम आत्मिक रूप से जीवित हैं।

"मनुष्य की समझ ऐसी अंधेरी हो गई है कि वह परमेश्वर में परमेश्वर का कुछ भी नहीं देखता, पवित्रता में पवित्रता का कुछ भी नहीं, भलाई में भलाई का कुछ भी नहीं, बुराई में बुराई का कुछ भी नहीं, और न पाप में पापमयता का कुछ भी। वरन् वह इतनी अंधेरी हो गई है कि वह बुराई में भलाई, और भलाई में बुराई, पाप में सुख, और पवित्रता में दुःख देखने की कल्पना करता है।"—बेरिज

मैं कह सकता हूँ कि यह कुछ लोगों को मूर्खता की बात लगेगी। परन्तु बहुत से जीवित मनुष्य आज खड़े होकर गवाही दे सकते हैं कि यह सच है। बहुत से लोग हमें बता सकते हैं कि वे यह सब अनुभव से जानते हैं, और सचमुच अपने आपको एक नया मनुष्य अनुभव करते हैं। जिन बातों से वह कभी घृणा करता था, उनसे अब प्रेम करता है, और जिनसे कभी प्रेम करता था, उनसे अब घृणा करता है। उसकी नई आदतें, नए साथी, नई चाल-चलन, नई रुचियाँ, नई भावनाएँ, नए विचार, नए दुःख, नए आनन्द, नई चिन्ताएँ, नए सुख, नई आशाएँ और नए भय हैं। संक्षेप में, उसके सम्पूर्ण अस्तित्व का झुकाव और धारा ही बदल गई है। उसके निकटतम सम्बन्धियों और मित्रों से पूछो, तो वे इसकी गवाही देंगे। चाहे यह उन्हें अच्छा लगे या न लगे, उन्हें मानना ही पड़ेगा कि वह अब पहले जैसा नहीं रहा।

"नया जन्म पाई हुई आत्मा अपने पुराने रूप से कितनी अद्भुत रीति से भिन्न होती है। वह एक नया जीवन जीती है, एक नई राह पर चलती है, एक नए दिशासूचक से अपनी दिशा ठहराती है, और एक नए तट की ओर बढ़ती है। उसका सिद्धान्त नया है, उसका आदर्श नया है, उसके आचरण नए हैं, उसकी योजनाएँ नई हैं, सब कुछ नया है। जो कुछ उसने पहले बुना था, उसे वह उधेड़ डालती है, और अपने आपको पूरी तरह किसी और ही काम में लगा देती है।"—जॉर्ज स्विनोक, 1660।

बहुत से लोग तुम्हें बता सकते हैं कि पहले वह अपने आपको इतना बड़ा अपराधी नहीं समझता था। कम से कम वह यह तो मानता ही था कि वह दूसरों से बुरा नहीं है। अब वह प्रेरित पौलुस के साथ कहेगा कि वह अपने आपको "सब पापियों में सबसे बड़ा" अनुभव करता है। (1 तीमुथियुस 1:15।)

"मैं प्रार्थना नहीं कर सकता—परन्तु पाप करता हूँ—मैं उपदेश न सुन सकता हूँ, न सुना सकता हूँ—परन्तु पाप करता हूँ—मैं न दान दे सकता हूँ, न प्रभु-भोज में भाग ले सकता हूँ—परन्तु पाप करता हूँ—वरन् मैं अपने पापों को मान तक नहीं सकता—परन्तु मेरे पाप-स्वीकार भी उन पापों को और बढ़ा देते हैं। मेरे मन फिराव के लिए भी मन फिराव की आवश्यकता है, मेरे आँसुओं को भी धोने की आवश्यकता है, और मेरे आँसुओं के धोने को भी फिर से अपने छुड़ानेवाले के लहू से धोया जाना चाहिए।"—बेवरिज।

"मुझ पर हाय, कि कोई मनुष्य सोचे कि मुझ में कुछ है! वह मेरा साक्षी है, जिसके सामने मैं काँच के समान साफ़ हूँ, कि वे गुप्त घरेलू दुष्टात्माएँ जो अकसर मेरे साथ रहती हैं, और वह भ्रष्टता जो मैं अपने भीतर पाता हूँ, मुझे नम्र पाल बाँधकर चलने को विवश करती हैं।"—रदरफ़ोर्ड के पत्र, 1637।

पहले वह यह नहीं समझता था कि उसका हृदय बुरा है। उसमें कुछ दोष हो सकते थे, और वह बुरी संगति और परीक्षाओं में बह सकता था—परन्तु 'भीतर से उसका हृदय अच्छा था'। अब वह तुम्हें बताएगा कि वह अपने हृदय से बुरा कोई हृदय नहीं जानता। वह उसे "सब वस्तुओं से अधिक धोखा देनेवाला, और असाध्य रोग से ग्रस्त" पाता है। (यिर्मयाह 17:9।)

पहले वह यह नहीं मानता था कि स्वर्ग पहुँचना बहुत कठिन बात है। वह सोचता था कि उसे केवल मन फिराना, कुछ प्रार्थनाएँ करना और जो हो सके वह करना है, और जो कमी रहेगी उसे मसीह पूरा कर देगा। अब वह विश्वास करता है कि मार्ग सकरा है, और थोड़े ही उसे पाते हैं। उसे निश्चय है कि वह अपने बल से परमेश्वर के साथ कभी मेल नहीं कर सकता था। उसे विश्वास है कि मसीह के लहू को छोड़ और कुछ उसके पापों को धो नहीं सकता था। उसकी एकमात्र आशा यह है कि वह "व्यवस्था के कामों के बिना विश्वास के द्वारा धर्मी ठहराया जाए।" (रोमियों 3:28।)

पहले उसे प्रभु यीशु मसीह में कोई सुन्दरता और उत्तमता दिखाई नहीं देती थी। वह यह नहीं समझ पाता था कि कुछ सेवक उनके विषय में इतना क्यों बोलते हैं। अब वह तुम्हें बताएगा कि वही सब मूल्यवान वस्तुओं से बढ़कर मोती है, दस हज़ार में उत्तम है, उसका छुड़ानेवाला, उसका सहायक, उसका महायाजक, उसका राजा, उसका वैद्य, उसका चरवाहा, उसका मित्र, उसका सब कुछ है।

पहले वह पाप को हल्की बात समझता था। उसे इस बात की आवश्यकता नहीं दिखती थी कि इस विषय में इतना सावधान रहा जाए। वह नहीं सोच सकता था कि मनुष्य के शब्द, विचार और कर्म इतने महत्त्वपूर्ण हैं कि उनकी इतनी चौकसी की जाए। अब वह तुम्हें बताएगा कि पाप वह घृणित वस्तु है जिससे वह बैर रखता है, उसके जीवन का दुःख और बोझ है। वह और अधिक पवित्र होने की लालसा रखता है। वह व्हिटफ़ील्ड की इस इच्छा में पूरे मन से सहभागी हो सकता है, "मैं वहाँ जाना चाहता हूँ जहाँ न मैं स्वयं पाप करूँगा, न दूसरों को पाप करते देखूँगा।"

"मैं अपने सब कामों से तंग आ गया हूँ, और चकित हूँ कि छुड़ानेवाला फिर भी मुझे काम में लाता और आशीष देता है। निश्चय ही मैं किसी भी मनुष्य से अधिक मूर्ख हूँ—किसी को इतना कुछ नहीं मिलता और कोई इतना कम नहीं करता।"—व्हिटफ़ील्ड के पत्र।

पहले उसे अनुग्रह के साधनों में कोई आनन्द नहीं मिलता था। बाइबल उपेक्षित रहती थी। उसकी प्रार्थनाएँ, यदि कोई होती भी थीं, केवल दिखावा थीं। रविवार एक उबाऊ दिन था। उपदेश उसके लिए थकाऊ थे, और अकसर उसे सुला देते थे। अब सब कुछ बदल गया है। ये बातें उसकी आत्मा का भोजन, सांत्वना और आनन्द हैं।

पहले वह गम्भीर मनवाले मसीहियों को पसन्द नहीं करता था। वह उनसे उदास, निराश और दुर्बल लोग जानकर दूर रहता था। अब वे पृथ्वी के उत्तम जन हैं, जिन्हें वह जितना देखे उतना कम है। उनकी संगति में उसे जैसा आनन्द मिलता है, वैसा और कहीं नहीं मिलता। वह अनुभव करता है कि यदि सब स्त्री-पुरुष पवित्र जन होते, तो पृथ्वी पर ही स्वर्ग होता।

पहले उसे केवल इस संसार की चिन्ता थी—इसके सुख, इसके व्यापार, इसके कामकाज, इसके प्रतिफल। अब वह इसे एक खोखला, असन्तोषजनक स्थान समझता है; एक सराय—एक ठिकाना—आनेवाले जीवन के लिए एक प्रशिक्षण-शाला। उसका धन स्वर्ग में है। उसका घर क़ब्र के पार है।

मैं फिर पूछता हूँ, यह सब नए जीवन के सिवा और क्या है? जो परिवर्तन मैंने बताया है वह कोई स्वप्न या कल्पना नहीं है। यह एक वास्तविक, सच्ची बात है, जिसे इस संसार में बहुतों ने जाना और अनुभव किया है। यह मेरी अपनी कल्पना का चित्र नहीं है। यह सच्ची बात है, जिसे हम में से कुछ लोग इसी क्षण अपने ही द्वार के निकट पा सकते हैं। परन्तु जहाँ कहीं ऐसा परिवर्तन होता है, वहाँ तुम वही बात देखते हो जिसकी मैं अब चर्चा कर रहा हूँ—तुम मरे हुओं को जीवित किया गया देखते हो, एक नई सृष्टि, एक आत्मा जो नए सिरे से जन्मी है। "इसलिए यदि कोई मसीह में है तो वह नई सृष्टि है: पुरानी बातें बीत गई हैं; देखो, वे सब नई हो गईं।" (2 कुरिन्थियों 5:17)

काश परमेश्वर करे कि ऐसे परिवर्तन और अधिक सामान्य होते! काश ऐसी भीड़ न होती, जिनके विषय में हमें रोते हुए कहना पड़ता है कि वे इस बात को बिलकुल नहीं जानते। परन्तु चाहे यह सामान्य हो या न हो, मैं एक बात स्पष्ट कहता हूँ, यही वह परिवर्तन है जिसकी हम सबको आवश्यकता है। मैं यह नहीं मानता कि सबका अनुभव ठीक एक जैसा होना चाहिए। मैं पूरी तरह मानता हूँ कि भिन्न-भिन्न लोगों में यह परिवर्तन मात्रा, विस्तार और तीव्रता में भिन्न होता है। अनुग्रह दुर्बल हो सकता है, फिर भी सच्चा—जीवन निर्बल हो सकता है, फिर भी वास्तविक। परन्तु मैं पूरे विश्वास से कहता हूँ कि यदि हम उद्धार पाना चाहते हैं तो हम सबको इस प्रकार की किसी न किसी बात से होकर निकलना होगा। जब तक इस प्रकार का परिवर्तन न हो, हम में कोई जीवन है ही नहीं। हम जीवित कलीसिया के सदस्य हो सकते हैं—परन्तु मरे हुए मसीही हैं।

"यदि हम अब भी वही पुराने मनुष्य हैं, बिलकुल नहीं बदले, वही जो हम संसार में आते समय थे, न अपनी भ्रष्टताओं का दमन किया, न अनुग्रह और पवित्रीकरण में कुछ बढ़े, तो निश्चय ही हमें कोई दूसरा पिता ढूँढ़ना होगा, हम अभी परमेश्वर के पुत्र नहीं हैं।"—हॉल, 1652।

"यदि तुम्हारे पास नया जन्म से कुछ भी कम है, तो मेरा विश्वास करो, तुम स्वर्ग को कभी नहीं देख सकते। तब तक स्वर्ग की कोई आशा नहीं, जब तक तुम नए सिरे से जन्म न लो।"—अशर के उपदेश।

इसे घर ले जाओ, इस पत्र को पढ़नेवाले हर स्त्री-पुरुष, इसे अपने विवेक के सामने ले जाओ और भली-भाँति देखो। पालने से कब्र तक के बीच किसी न किसी समय, जो उद्धार पाना चाहते हैं उन सब को जिलाया जाना अवश्य है। भले बूढ़े बेरिज की कब्र के पत्थर पर जो शब्द खुदवाए गए थे वे सच्चे और विश्वासयोग्य हैं, "पाठक! क्या तू नए सिरे से जन्मा है? स्मरण रख! नए जन्म के बिना उद्धार नहीं।"

अब देखो कि नाम और रूप के मसीही तथा कर्म और सत्य के मसीही के बीच कितनी भारी खाई है। यह अन्तर ऐसा नहीं कि एक अपने पड़ोसी से थोड़ा अच्छा और दूसरा थोड़ा बुरा है, यह तो जीवन की दशा और मृत्यु की दशा का अन्तर है। हाइलैंड के पहाड़ पर उगनेवाली घास की सबसे छोटी पत्ती भी अब तक बने सबसे सुन्दर मोम के फूल से अधिक श्रेष्ठ वस्तु है; क्योंकि उसमें वह है जो मनुष्य का कोई विज्ञान नहीं दे सकता, अर्थात् जीवन। यूनान या इटली की सबसे भव्य संगमरमर की मूर्ति भी झोपड़ी के फर्श पर रेंगनेवाले उस दुर्बल बीमार बच्चे के सामने कुछ नहीं; क्योंकि अपनी सारी सुन्दरता के बावजूद वह मृत है। और मसीह के परिवार का सबसे निर्बल सदस्य भी परमेश्वर की दृष्टि में संसार के सबसे गुणी मनुष्य से कहीं ऊँचा और बहुमूल्य है। एक परमेश्वर के लिये जीता है और सदा जीवित रहेगा; दूसरा अपनी सारी बुद्धि के होते हुए भी अब तक पापों में मरा हुआ है।

हे तुम जो मृत्यु से पार होकर जीवन में आ गए हो, तुम्हारे पास सचमुच धन्यवाद देने का कारण है! स्मरण करो कि स्वभाव से तुम क्या थे, मृत। सोचो कि अनुग्रह से अब तुम क्या हो, जीवित। कब्रों से बाहर फेंकी गई सूखी हड्डियों को देखो। तुम भी वैसे ही थे; और तुम में और उनमें भेद किसने किया? जाओ और अपने परमेश्वर के चरणों की चौकी के आगे दण्डवत् करो। उसके अनुग्रह के लिये, उसके सेंतमेत के विशेष अनुग्रह के लिये उसे धन्य कहो। उससे बार-बार कहो, "हे प्रभु, मैं कौन हूँ कि तू मुझे यहाँ तक ले आया? मैं ही क्यों? तूने मुझ पर ही दया क्यों की?"

III. तीसरी बात मैं तुम्हें यह बताता हूँ, कि यह जिलाया जाना किस रीति से ही हो सकता है, किन साधनों से एक मृत आत्मा आत्मिक रूप से जीवित की जा सकती है।

निश्चय ही यदि मैं यह तुम्हें न बताऊँ, तो जो कुछ मैंने लिखा है उसे लिखना क्रूरता होगी। यह तुम्हें एक उदास जंगल में ले जाकर बिना रोटी और पानी के छोड़ देने जैसा होगा। यह तुम्हें लाल समुद्र तक ले जाकर कहना होगा कि चलकर पार हो जाओ। यह फिरौन के समान तुम्हें ईंटें बनाने की आज्ञा देना और फिर भी तिनके न देना होगा। यह तुम्हारे हाथ-पाँव बाँधकर तुमसे कहना होगा कि "अच्छी कुश्ती लड़ो" और "ऐसे दौड़ो कि इनाम पाओ।" मैं ऐसा नहीं करूँगा। जब तक मैं उस फाटक की ओर संकेत न कर दूँ जिसकी ओर तुम्हें दौड़ना है, मैं तुम्हें नहीं छोड़ूँगा। परमेश्वर की सहायता से मैं तुम्हारे सामने वह पूरा प्रबन्ध रखूँगा जो मृत आत्माओं के लिये किया गया है। थोड़ी देर और मेरी सुनो, और मैं एक बार फिर तुम्हें दिखाऊँगा कि सत्य के पवित्रशास्त्र में क्या लिखा है।

एक बात बहुत स्पष्ट है, यह महान परिवर्तन हम स्वयं नहीं कर सकते। यह हम में नहीं है। इसे करने की हम में न शक्ति है न सामर्थ्य। हम अपने पाप बदल सकते हैं, पर अपना हृदय नहीं बदल सकते। हम नया मार्ग अपना सकते हैं, पर नया स्वभाव नहीं पा सकते। हम काफी सुधार और परिवर्तन कर सकते हैं। हम बाहरी बुरी आदतों में से बहुत-सी छोड़ सकते हैं और बाहरी कर्तव्य निभाने लग सकते हैं। परन्तु अपने भीतर कोई नया सिद्धान्त उत्पन्न नहीं कर सकते। हम शून्य में से कुछ नहीं निकाल सकते। न कूशी अपनी चमड़ी बदल सकता है, न चीता अपने धब्बे। वैसे ही हम भी अपनी आत्माओं में जीवन नहीं डाल सकते। (यिर्मयाह 13:23।)

"ऐसा कोई एक भी भला कर्तव्य नहीं जो स्वाभाविक मनुष्य कर सके। यदि उससे कहा जाए, केवल एक भला विचार सोच ले और उसके बदले तू स्वर्ग जाएगा, तो वह उसे भी नहीं सोच सकता। जब तक परमेश्वर उसे पाप के गड्ढे में से वैसे न उठाए जैसे उसने लाज़र को कब्र में से उठाया, वह कुछ भी ऐसा नहीं कर सकता जिससे परमेश्वर प्रसन्न हो। वह एक नैतिक मनुष्य के काम कर सकता है, पर जिलाए गए और प्रकाशित मनुष्य के काम करना उसकी सामर्थ्य से बाहर है।"—अशर के उपदेश।

"स्वभाव स्वभाव को उतना ही नहीं निकाल सकता, जितना शैतान शैतान को नहीं निकाल सकता।"—थॉमस वॉटसन, 1653।

"स्वभाव अपने आप को इस तक नहीं उठा सकता, जैसे मनुष्य अपने आप को स्वाभाविक अस्तित्व नहीं दे सकता।"—लेटन।

एक और बात भी उतनी ही स्पष्ट है; कोई दूसरा मनुष्य भी यह हमारे लिये नहीं कर सकता। सेवक हमें उपदेश दे सकते हैं और हमारे साथ प्रार्थना कर सकते हैं, बपतिस्मा में हमें जलकुण्ड पर ग्रहण कर सकते हैं, प्रभु की मेज़ पर आने दे सकते हैं और हमें रोटी और दाखरस दे सकते हैं, परन्तु वे आत्मिक जीवन नहीं दे सकते। वे अव्यवस्था की जगह व्यवस्था और खुले पाप की जगह बाहरी शिष्टता ला सकते हैं। परन्तु वे सतह के नीचे नहीं जा सकते। वे हमारे हृदयों तक नहीं पहुँच सकते। पौलुस रोप सकता है और अपुल्लोस सींच सकता है, परन्तु बढ़ानेवाला केवल परमेश्वर है। (1 कुरिन्थियों 3:6।) तो फिर मृत आत्मा को कौन जिला सकता है? परमेश्वर के सिवा कोई नहीं कर सकता। केवल वही जिसने आदम के नथुनों में जीवन का श्वास फूँका, एक मरे हुए पापी को जीवित मसीही बना सकता है। केवल वही जिसने सृष्टि के दिन जगत को शून्य में से रचा, मनुष्य को नई सृष्टि बना सकता है। केवल वही जिसने कहा, "उजियाला हो, और उजियाला हो गया," मनुष्य के हृदय में आत्मिक ज्योति चमका सकता है। केवल वही जिसने मनुष्य को मिट्टी से रचा और उसकी देह को जीवन दिया, उसकी आत्मा को जीवन दे सकता है। यह कार्य अपने आत्मा के द्वारा करना उसी का विशेष कार्य है, और सामर्थ्य भी उसी की है। (उत्पत्ति 1:2, 3।)

"सृजन करना या शून्य में से कुछ निकालना सबसे सामर्थी प्राणी की शक्ति से बाहर है। घास की सबसे छोटी पत्ती को रचना भी सब मनुष्यों और स्वर्गदूतों की शक्ति से परे है; परमेश्वर इसे अपना राजकीय अधिकार ठहराकर चुनौती देता है। (यशायाह 40:26।) आगस्टीन ने सच कहा, इस छोटे जगत् 'मनुष्य' को परिवर्तित करना बड़े जगत् को रचने से भी बढ़कर है।"—जॉर्ज स्विनॉक, 1660।

महिमामय सुसमाचार में हमारे आत्मिक जीवन के साथ-साथ अनन्त जीवन का भी प्रबन्ध है। प्रभु यीशु एक सिद्ध उद्धारकर्ता है। वह सामर्थी जीवित सिर है जिसका कोई अंग मरा हुआ नहीं। उसके लोग केवल धर्मी ठहराए और क्षमा ही नहीं किए गए—परन्तु उसके साथ जिलाए गए और उसके पुनरुत्थान के भागी बनाए गए हैं। आत्मा पापी को उसी से जोड़ता है, और उस मिलन के द्वारा उसे मृत्यु से जीवन में उठाता है। विश्वास करने के बाद पापी उसी में जीवित रहता है। उसकी सारी जीवन-शक्ति का स्रोत मसीह और उसकी आत्मा के बीच का वह मिलन है, जिसे आत्मा आरम्भ करता और बनाए रखता है। मसीह समस्त आत्मिक जीवन का ठहराया हुआ सोता है, और पवित्र आत्मा वह ठहराया हुआ कर्ता है जो वह जीवन हमारी आत्माओं तक पहुँचाता है।

"तब हम जीना आरम्भ करते हैं, जब हम जीवन के सोते मसीह के साथ, उसकी आत्मा के द्वारा जो हमें दी जाती है, मिलन पाने लगते हैं—इसी समय से हमें अपना जीवन गिनना चाहिए।"—फ्लैवेल।

"मसीह समस्त जीवन का सार्वभौमिक मूल-सिद्धान्त है।"—सिब्स। 1635।

यदि तुम जीवन चाहते हो, तो प्रभु यीशु मसीह के पास आओ। वह तुम्हें न निकालेगा। उसके पास विद्रोहियों के लिए भी दान हैं। जैसे ही उस मरे हुए मनुष्य ने एलीशा की हड्डियों को छुआ, वह जी उठा और अपने पाँवों पर खड़ा हो गया। (2 राजाओं 13:21)—जैसे ही तुम विश्वास के हाथ से प्रभु यीशु को छूते हो, तुम परमेश्वर के लिए जीवित हो जाते हो, और तुम्हारे सब अपराध भी क्षमा हो जाते हैं। आओ, और तुम्हारी आत्मा जीवित रहेगी।

मैं किसी के भी निश्चित मसीही बनने से कभी निराश नहीं होता, चाहे वह बीते दिनों में कैसा ही क्यों न रहा हो। मैं जानता हूँ कि मृत्यु से जीवन में आना कितना बड़ा परिवर्तन है। मैं जानता हूँ कि हम में से कुछ लोगों और स्वर्ग के बीच विभाजन के कैसे पहाड़ खड़े दिखाई देते हैं। मैं स्वाभाविक हृदय की कठोरता, पक्षपात और भयंकर पापमयता को जानता हूँ। परन्तु मुझे स्मरण है कि पिता परमेश्वर ने इस सुन्दर और सुव्यवस्थित जगत को शून्य में से रचा। मुझे स्मरण है कि प्रभु यीशु की वाणी चार दिन के मरे हुए लाज़र तक पहुँची, और उसे कब्र तक से लौटा लाई। मुझे स्मरण है कि परमेश्वर के आत्मा ने स्वर्ग के नीचे हर जाति में कैसी अद्भुत विजयें पाई हैं। यह सब स्मरण करके मैं अनुभव करता हूँ कि मुझे कभी निराश होने की आवश्यकता नहीं। हाँ! हम में से जो लोग अभी पापों में सबसे अधिक मरे हुए दिखाई देते हैं, वे भी एक नए अस्तित्व में उठाए जा सकते हैं, और परमेश्वर के सामने नए जीवन की सी चाल चल सकते हैं।

ऐसा क्यों न हो? पवित्र आत्मा दयालु और प्रेमी आत्मा है। वह किसी मनुष्य की नीचता के कारण उससे मुँह नहीं फेरता। वह किसी के पास से इसलिए होकर नहीं निकल जाता कि उसके पाप काले और लाल रंग के हैं। कुरिन्थियों में ऐसा कुछ न था कि वह उतरकर उन्हें जिलाए। पौलुस उनके विषय में बताता है कि वे "व्यभिचारी, मूर्तिपूजक, परस्त्रीगामी, पुरुषगामी, चोर, लोभी, पियक्कड़, गाली देनेवाले, अन्धेर करनेवाले" थे। वह कहता है, "तुम में से कितने ऐसे ही थे।" फिर भी आत्मा ने उन्हें भी जिलाया। वह लिखता है, "तुम प्रभु यीशु के नाम से और हमारे परमेश्वर के आत्मा से धोए गए, पवित्र किए गए और धर्मी ठहराए गए।" (1 कुरिन्थियों 6:9-11)

कुलुस्सियों में भी ऐसा कुछ न था कि वह उनके हृदयों में आए। पौलुस हमें बताता है कि वे "व्यभिचार, अशुद्धता, बुरी कामना, बुरी लालसा और लोभ में, जो मूर्तिपूजा के बराबर है, चलते थे।" फिर भी आत्मा ने उन्हें भी जिलाया। उसने उनसे "पुराने मनुष्यत्व को उसके कामों समेत उतरवाया, और नए मनुष्यत्व को पहिनवाया, जो अपने सृजनहार के स्वरूप के अनुसार ज्ञान प्राप्त करने के लिए नया बनता जाता है।" (कुलुस्सियों 3:5-10)

मरियम मगदलीनी में ऐसा कुछ न था कि आत्मा उसकी आत्मा को जिलाए। कभी उसमें "सात दुष्टात्माएँ" थीं। यदि कही हुई बात सच है, तो एक समय वह नीचता और अधर्म में कहावत बन चुकी स्त्री थी। फिर भी आत्मा ने उसे भी नई सृष्टि बनाया, उसे उसके पापों से अलग किया, मसीह के पास लाया, और उसे "क्रूस पर सबसे अन्त में और कब्र पर सबसे पहले" पहुँचनेवाली बनाया।

आत्मा किसी आत्मा के भ्रष्टाचार के कारण उससे कभी मुँह नहीं मोड़ेगा। उसने कभी ऐसा नहीं किया—और कभी करेगा भी नहीं। यह उसकी महिमा है कि उसने अत्यन्त अशुद्ध लोगों के मनों को शुद्ध किया, और उन्हें अपने निवास के लिए मन्दिर बनाया। वह हम में से सबसे बुरे को भी लेकर उसे अनुग्रह का पात्र बना सकता है।

वास्तव में ऐसा क्यों न हो? आत्मा सर्वशक्तिमान आत्मा है। वह पत्थर के हृदय को मांस के हृदय में बदल सकता है। वह सबसे दृढ़ बुरी आदतों को आग में पड़ी रस्सी की तरह तोड़कर नष्ट कर सकता है। वह सबसे कठिन बातों को सहज बना सकता है, और सबसे बड़ी आपत्तियों को वसन्त की बर्फ की तरह पिघला सकता है। वह पीतल के बेंड़ों को काट सकता है, और पक्षपात के फाटकों को पूरा खोल सकता है। वह हर तराई को भर सकता है, और हर ऊबड़-खाबड़ स्थान को चौरस कर सकता है। उसने यह बार-बार किया है, और वह फिर कर सकता है।

"मनुष्यों को नया जन्म देने, और मानो उन्हें फिर से उत्पन्न करने में पवित्र आत्मा की ऐसी सामर्थ्य है, कि वे अपने पहले रूप से बिलकुल भिन्न हो जाते हैं।"

आत्मा एक यहूदी को ले सकता है—जो मसीही विश्वास का सबसे कटु शत्रु, सच्चे विश्वासियों का सबसे उग्र सतानेवाला, फरीसियों की धारणाओं का सबसे हठी पक्षधर, और सुसमाचार की शिक्षा का सबसे पूर्वाग्रही विरोधी था—और उस मनुष्य को उसी विश्वास का उत्साही प्रचारक बना सकता है जिसे उसने कभी नष्ट किया था। वह यह कर चुका है। उसने यह प्रेरित पौलुस के साथ किया।

आत्मा एक रोमन कैथोलिक भिक्षु को ले सकता है, जो रोमी अन्धविश्वास के बीच पला—बचपन से झूठी शिक्षा पर विश्वास करने और पोप की आज्ञा मानने का प्रशिक्षण पाया—जो भ्रम में आँखों तक डूबा था, और उस मनुष्य को विश्वास से धर्मी ठहराए जाने का वह सबसे स्पष्ट समर्थक बना सकता है जो जगत ने कभी देखा। वह यह कर चुका है। उसने यह मार्टिन लूथर के साथ किया।

आत्मा एक अंग्रेज ठठेरे को ले सकता है, जिसके पास न विद्या थी, न संरक्षक, न धन—जो कभी निन्दा और गाली देने के सिवा किसी बात के लिए कुख्यात न था—और उस मनुष्य से एक भक्तिमय पुस्तक लिखवा सकता है, जो अपनी तरह से, प्रेरितों के समय से लेकर आज तक किसी भी पुस्तक से अतुलनीय और बेजोड़ ठहरे। वह यह कर चुका है। उसने यह "यात्री की प्रगति" के लेखक जॉन बनियन के साथ किया।

आत्मा एक नाविक को ले सकता है, जो संसारिकता और पाप में डूबा था—दासों के जहाज़ का एक दुराचारी कप्तान—और उस मनुष्य को सुसमाचार का अत्यन्त सफल सेवक बना सकता है—भक्तिमय पत्रों का ऐसा लेखक जिनमें अनुभव-सिद्ध धर्म का भण्डार है—और ऐसे भजनों का रचयिता जो जहाँ-जहाँ अंग्रेज़ी बोली जाती है वहाँ जाने और गाए जाते हैं। वह यह कर चुका है। उसने यह जॉन न्यूटन के साथ किया।

यह सब पवित्र आत्मा ने किया है, और इससे भी बहुत कुछ किया है, जिसके विषय में मैं विस्तार से नहीं कह सकता। और पवित्र आत्मा का हाथ छोटा नहीं हो गया है। उसकी सामर्थ्य घटी नहीं है। वह प्रभु यीशु के समान है, जो कल और आज और युगानुयुग एकसा है। (इब्रानियों 13:8।) वह अब भी आश्चर्यकर्म कर रहा है, और अन्त तक करता रहेगा।

इसलिए मैं फिर कहता हूँ, मैं किसी भी मनुष्य की आत्मा के जीवित किए जाने से कभी निराश नहीं होता। यदि यह मनुष्य ही पर निर्भर होता, तो मैं निराश हो जाता। कुछ लोग इतने कठोर दिखाई देते हैं कि मुझे कोई आशा न रहती। यदि यह सेवकों के कार्य पर निर्भर होता, तो भी मैं निराश हो जाता। हाय, हम में जो सबसे अच्छे हैं वे भी दीन और निर्बल प्राणी हैं! परन्तु जब मुझे स्मरण आता है कि परमेश्वर पवित्र आत्मा ही वह कर्ता है जो आत्मा में जीवन पहुँचाता है, तब मैं निराश नहीं हो सकता, क्योंकि मैं जानता हूँ और मुझे निश्चय है कि उसके लिये कुछ भी अनहोना नहीं।

यदि इसी जीवन में मैं यह सुनूँ कि मेरे परिचितों की सूची में जो सबसे कठोर मनुष्य है वह नम्र हो गया है, और जो सबसे अभिमानी था वह दूध छुड़ाए हुए बच्चे के समान यीशु के चरणों में आ बैठा है, तो मुझे आश्चर्य न होगा।

न्याय के दिन दाहिनी ओर बहुतों को देखकर मुझे आश्चर्य न होगा, जिन्हें मैं अपनी मृत्यु के समय चौड़े मार्ग पर चलते हुए छोड़ जाऊँगा

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