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लिखा है कि "विश्वास प्रेम के द्वारा कार्य करता है" (गलातियों 5:6)। सच्चा विश्वास कभी
उस पर, अपने आप को पवित्र करता है।" (प्रेरितों के काम 15:9; 26:18; 1 यूहन्ना 3:3)। विश्वासी उससे प्रेम करता है जिससे परमेश्वर प्रेम करता है, और उससे घृणा करता है जिससे परमेश्वर घृणा करता है। उसके हृदय की अभिलाषा यह है कि वह परमेश्वर की आज्ञाओं के मार्ग पर चले, और हर प्रकार की बुराई से दूर रहे। उसकी इच्छा है कि वह उन बातों का अनुसरण करे जो सत्य, पवित्र, धर्ममय, सुहावनी और अच्छी चर्चा की हैं, और अपने आप को शरीर और आत्मा की हर प्रकार की मलिनता से शुद्ध करे। वह अपने लक्ष्य से बहुत बातों में पीछे रह जाता है। वह पाता है कि उसका प्रतिदिन का जीवन अपने भीतर बसी भ्रष्टता के विरुद्ध एक निरन्तर संघर्ष है। परन्तु वह संघर्ष करता रहता है, और दृढ़ता से पाप की सेवा करने से इनकार करता है। जहाँ पवित्रता नहीं है, वहाँ निश्चय जानो कि उद्धार करनेवाला विश्वास भी नहीं है! अपवित्र मनुष्य सच्चा विश्वासी नहीं है!
4. जो सचमुच मसीह पर विश्वास करता है, वह भक्ति के कर्म करता है। लिखा है कि "विश्वास प्रेम के द्वारा कार्य करता है" (गलातियों 5:6)। सच्चा विश्वास मनुष्य को कभी आलसी नहीं बनाएगा, और न उसे अपने ही धर्म में सन्तुष्ट होकर चुपचाप बैठे रहने देगा। वह उसे प्रेरित करेगा कि अवसर मिलते ही प्रेम, दया और उदारता के काम करे। वह उसे विवश करेगा कि अपने स्वामी के पदचिह्नों पर चले, जो "भलाई करता हुआ फिरा।" किसी न किसी रीति से वह उससे काम करवाएगा। उसके किए हुए कामों पर संसार ध्यान न दे। बहुत लोगों को वे तुच्छ और महत्वहीन लगें। परन्तु वे उसकी दृष्टि से नहीं छूटते जो अपने नाम से दिए गए ठण्डे पानी के एक कटोरे को भी देखता है। जहाँ कर्म करनेवाला प्रेम नहीं, वहाँ विश्वास नहीं। आलसी और स्वार्थी अंगीकार करनेवाले मसीही को अपने आप को सच्चा विश्वासी समझने का कोई अधिकार नहीं!
5. जो सचमुच मसीह पर विश्वास करता है, वह संसार पर जय पाता है। लिखा है कि "जो कोई परमेश्वर से उत्पन्न हुआ है, वह संसार पर जय प्राप्त करता है; और वह विजय जिससे संसार पर जय प्राप्त होती है, हमारा विश्वास है" (1 यूहन्ना 5:4)। सच्चा विश्वासी सही और गलत, या सत्य और भ्रम के विषय में संसार के मापदण्ड से शासित नहीं होता। वह संसार की राय से स्वतंत्र है। उसे संसार की प्रशंसा की थोड़ी ही चिन्ता है। संसार की निन्दा उसे विचलित नहीं करती। वह संसार के सुखों को नहीं खोजता। वह संसार के पुरस्कारों की लालसा नहीं रखता। वह अनदेखी बातों पर दृष्टि रखता है। वह एक अनदेखे उद्धारकर्ता को, आनेवाले न्याय को, और महिमा के उस मुकुट को देखता है जो कभी मुरझाता नहीं। इन बातों को देखकर वह इस वर्तमान संसार को अपेक्षाकृत बहुत कम महत्व देता है। जहाँ संसार राज्य करता है, वहाँ
