अध्याय 68 / 68

जिनके हाथों में यह पुस्तिका पड़े। मैं उन्हें संगी-

यह हिन्दी संस्करण अंग्रेज़ी मूल से पूर्ण रूप से, अनुच्छेद-दर-अनुच्छेद, कृत्रिम बुद्धि (AI) की सहायता से अनुवादित है; मानवीय समीक्षा जारी है। अध्ययन के लिए अंग्रेज़ी मूल पाठ ही प्रामाणिक है। कोई त्रुटि दिखे तो [email protected] पर लिखें।

जिनके हाथों में यह पुस्तिका पड़े। मैं उन्हें संगी-

स्वर्ग के मार्ग पर लाने की कोई शक्ति नहीं है? क्या कोई कहेगा कि यह उचित है कि मनुष्य परमेश्वर के विरुद्ध खुले विद्रोह में चुपचाप शैतान की सेवा करता रहे—और मसीह की ओर फिरने का कोई प्रयत्न, कोई संघर्ष, कोई चेष्टा न करे?

दूसरे चाहें तो ये बातें कहें। मैं इन्हें नहीं कह सकता। पवित्रशास्त्र में मुझे इनका कोई आधार नहीं मिलता। जो समझाया नहीं जा सकता उसे समझाने में, और जो सुलझाया नहीं जा सकता उसे सुलझाने में मैं समय नष्ट नहीं करूँगा। मैं दार्शनिक रीति से यह दिखाने का प्रयत्न नहीं करूँगा कि अपरिवर्तित मनुष्य किस प्रकार मसीह की ओर देख सकता, या मन फिरा सकता, या विश्वास कर सकता है। परन्तु यह मैं जानता हूँ कि हर अविश्वासी से यह कहना कि मन फिराओ और विश्वास करो, मेरा स्पष्ट कर्तव्य है। और यह भी मैं जानता हूँ कि जो मनुष्य इस निमन्त्रण को स्वीकार नहीं करेगा, वह अन्त में पाएगा कि उसने अपनी ही आत्मा को नाश कर डाला है!

पाठक, यदि तूने अब तक अपनी आत्मा के विषय में विश्वास नहीं किया, तो मसीह पर भरोसा रख, मसीह की ओर देख, प्रभु यीशु मसीह को पुकार। यदि तेरी भावनाएँ अभी ठीक नहीं हैं, तो उससे कह कि वह तुझे ठीक भावनाएँ दे। यदि तू अभी यह सोचने का साहस नहीं करता कि तुझमें सच्चा विश्वास है, तो उससे कह कि वह तुझे विश्वास दे। परन्तु किसी भी दशा में हाथ पर हाथ धरे मत बैठ। अज्ञानता और पवित्रशास्त्र-विरुद्ध आलस्य में अपनी आत्मा को नरक में मत गँवा। निर्बुद्धि निष्क्रियता में मत जी—न जाने किसकी बाट जोहता हुआ, जिसे तू समझा नहीं सकता उसकी आशा रखता हुआ—प्रतिदिन अपना दोष बढ़ाता हुआ—आलसी अविश्वास में बने रहकर परमेश्वर को अप्रसन्न करता हुआ—और घड़ी-घड़ी अपनी ही आत्मा के लिये नरक में कब्र खोदता हुआ। उठ और मसीह को पुकार! जाग और अपनी आत्मा के विषय में यीशु से गिड़गिड़ा! विश्वास करने में चाहे जो कठिनाइयाँ हों, एक बात तो भली-भाँति स्पष्ट है—क्रूस के चरणों से कोई मनुष्य कभी नाश होकर नरक में नहीं गया। यदि तू और कुछ नहीं कर सकता, तो क्रूस के चरणों में लेट जा!

3. मैं सब कुछ समाप्त करता हूँ उन सब विश्वासियों के लिये एक उपदेश के वचन के साथ, जिनके हाथों में यह पुस्तिका पड़े। मैं उन्हें संगी-यात्रियों और क्लेश में साथियों के रूप में सम्बोधित करता हूँ। यदि वे जीवन से प्रेम रखते हैं, और विश्वास करने में उन्हें कुछ शान्ति मिली है, तो मैं उनसे आग्रह करता हूँ कि विश्वास की बढ़ती के लिये प्रतिदिन प्रार्थना करें। तुम्हारी प्रार्थना निरन्तर यही हो, "हे प्रभु, मेरा विश्वास बढ़ा।"

सच्चा विश्वास कई श्रेणियों का होता है। सबसे निर्बल विश्वास भी आत्मा को मसीह से जोड़ने और उद्धार को सुनिश्चित करने के लिये पर्याप्त है। काँपता हुआ हाथ भी चंगा करनेवाली औषधि ले सकता है। सबसे दुर्बल शिशु भी सबसे धनी सम्पत्ति का उत्तराधिकारी हो सकता है। छोटे से छोटा सच्चा विश्वास भी पापी को स्वर्ग का उतना ही निश्चित अधिकार देता है जितना सबसे दृढ़ विश्वास। परन्तु थोड़ा विश्वास कभी उतनी अनुभव होनेवाली सान्त्वना नहीं दे सकता जितनी दृढ़ विश्वास देता है। हमारे विश्वास की मात्रा के अनुसार ही हमारी शान्ति, हमारी आशा, कर्तव्य के लिये हमारा बल, और परीक्षा में हमारा धीरज होगा। निश्चय ही हमें निरन्तर प्रार्थना करनी चाहिए, "हमारा विश्वास बढ़ा।"

विश्वासी पाठक, क्या तू और अधिक विश्वास चाहता है? क्या तुझे विश्वास करना इतना मधुर लगता है कि तू और अधिक विश्वास करना चाहे? तो सावधान रह कि तू अनुग्रह के हर साधन के उपयोग में परिश्रमी हो—परमेश्वर के साथ अपनी निजी सहभागिता में परिश्रमी—समय, स्वभाव और जीभ पर अपनी प्रतिदिन की चौकसी में परिश्रमी—अपने निजी बाइबल-पठन में परिश्रमी—अपनी निजी प्रार्थनाओं में परिश्रमी। जब हम इन बातों के विषय में लापरवाह हैं, तब आत्मिक उन्नति की आशा रखना व्यर्थ है। जो चाहें वे इन बातों में बारीकी बरतने को अति-कठोर और व्यवस्थावादी कहें। मैं तो केवल यही उत्तर देता हूँ कि ऐसा कोई प्रतिष्ठित सन्त कभी नहीं हुआ जिसने इनकी उपेक्षा की हो।

पाठक, क्या तू और अधिक विश्वास चाहता है? तो यीशु मसीह से और अधिक परिचित होने का प्रयत्न कर। अपने धन्य उद्धारकर्ता का अधिकाधिक अध्ययन कर, और उसके प्रेम की लम्बाई, चौड़ाई और ऊँचाई को और अधिक जानने का यत्न कर। उसे उसके सब पदों में देख—याजक, वैद्य, छुड़ानेवाला, वकील, मित्र, शिक्षक, और अपने विश्वासी लोगों का चरवाहा। उसे ऐसे के रूप में देख जो केवल तेरे लिये मरा ही नहीं—परन्तु परमेश्वर के दाहिने हाथ पर तेरे लिये जीवित भी है; जिसने केवल तेरे लिये अपना लहू ही नहीं बहाया—परन्तु परमेश्वर के दाहिने हाथ पर प्रतिदिन तेरे लिये मध्यस्थता की प्रार्थना करता है; जो शीघ्र तेरे लिये फिर आनेवाला है, और एक बार फिर इस पृथ्वी पर खड़ा होगा। जिस खननकर्ता को पूरा निश्चय है कि गड्ढे से उसे ऊपर खींचनेवाली रस्सी नहीं टूटेगी, वह बिना चिन्ता और भय के ऊपर खींच लिया जाता है। जो विश्वासी यीशु मसीह की परिपूर्णता से भली-भाँति परिचित है, वही विश्वासी अनुग्रह से महिमा तक सबसे अधिक सान्त्वना और शान्ति के साथ यात्रा करता है।

पाठक, मैं इन बातों को तेरे ध्यानपूर्वक विचार के लिये सौंपता हूँ।

मन फिराव

"यदि तुम मन न फिराओगे, तो तुम सब भी इसी रीति से नाश होगे।" लूका 13:3

इस पृष्ठ के शीर्ष पर जो वचन है, वह पहली दृष्टि में कठोर और कड़ा लगता है, "यदि तुम मन न फिराओगे, तो तुम सब नाश होगे।" मैं कल्पना कर सकता हूँ कि कोई कहे, "क्या यही सुसमाचार है?" "क्या यही शुभ समाचार हैं? क्या यही वे अच्छे समाचार हैं जिनकी चर्चा सेवक करते हैं?" "यह तो कठिन बात है, इसे कौन सुन सकता है?" (यूहन्ना 6:60।)

परन्तु ये शब्द किसके मुख से निकले? ये उसके मुख से निकले जो हमसे ऐसा प्रेम करता है जो ज्ञान से परे है, अर्थात् परमेश्वर के पुत्र यीशु मसीह के मुख से। ये उसने कहे जिसने हमसे ऐसा प्रेम किया कि हमारे लिये स्वर्ग को छोड़ा—हमारे लिये पृथ्वी पर उतर आया—हमारे लिये पृथ्वी पर तैंतीस वर्ष तक दीन, नम्र जीवन जिया—हमारे लिये क्रूस पर गया, हमारे लिये कब्र में गया, और हमारे पापों के लिये मरा। ऐसे मुख से निकले हुए शब्द अवश्य ही प्रेम के शब्द होंगे।

और फिर, किसी मित्र को आनेवाले खतरे से सचेत करने से बढ़कर प्रेम का और क्या प्रमाण हो सकता है? जो पिता अपने पुत्र को खड्ड के किनारे लड़खड़ाते हुए देखता है, और उसे देखकर ज़ोर से पुकार उठता है, "रुक जा, रुक जा!"—क्या वह पिता अपने पुत्र से प्रेम नहीं करता? जो कोमल माता अपने नन्हे बच्चे को कोई विषैला फल खाने को तैयार देखती है, और तेज़ आवाज़ में कहती है, "रुक, रुक! इसे रख दे!"—क्या वह माता उस बच्चे से प्रेम नहीं करती? लोगों को अकेला छोड़ देना और उन्हें अपनी-अपनी राह चलने देना तो उदासीनता है। चेतावनी देना और खतरे की पुकार लगाना कोमल प्रेम का काम है। आधी रात को "आग—आग!" की पुकार कभी-कभी मनुष्य को उसकी नींद से कठोरता और रूखेपन से, अप्रिय रीति से, चौंका देती है। परन्तु यदि वही पुकार उसके प्राण बचाने का कारण बने, तो कौन शिकायत करेगा? ये शब्द, "यदि तुम मन न फिराओ तो तुम सब नाश हो जाओगे," पहली दृष्टि में कठोर और कड़े जान पड़ सकते हैं। परन्तु ये प्रेम के शब्द हैं, और अनमोल आत्माओं को नरक से छुड़ाने का साधन बन सकते हैं।

पवित्रशास्त्र के इस पद पर विचार करते हुए मैं आपका ध्यान तीन बातों की ओर दिलाता हूँ।

सबसे पहले, मैं मन फिराव के स्वरूप के विषय में कहूँगा—वह क्या है?

दूसरे, मैं मन फिराव की आवश्यकता के विषय में कहूँगा—मन फिराव क्यों आवश्यक है?

तीसरे, मैं मन फिराव के प्रोत्साहनों के विषय में कहूँगा—लोगों को मन फिराने के लिए क्या बात प्रेरित करती है?

I. सबसे पहले, मन फिराव का स्वरूप—वह क्या है?

आइए, हम इस बात पर अपने पाँव दृढ़ता से जमाएँ। इस जाँच के महत्त्व को बढ़ाकर नहीं आँका जा सकता। मन फिराव मसीही धर्म की नींव के पत्थरों में से एक है। नए नियम में कम से कम साठ बार मन फिराव की चर्चा मिलती है। हमारे प्रभु यीशु मसीह ने सबसे पहले कौन-सा सिद्धान्त प्रचार किया? हमें बताया गया है कि उसने कहा, "मन फिराओ और सुसमाचार पर विश्वास करो।" (मरकुस 1:15।) जब प्रभु ने प्रेरितों को पहली बार भेजा तो उन्होंने क्या घोषणा की? उन्होंने "प्रचार किया कि मन फिराओ।" (मरकुस 6:12।) जब यीशु ने संसार से विदा ली तो अपने चेलों को क्या आज्ञा दी? कि "यरूशलेम से लेकर सब जातियों में उसके नाम से मन फिराव और पापों की क्षमा का प्रचार किया जाए।" (लूका 24:47।) पतरस ने जो पहले उपदेश दिए उनका समापन आह्वान क्या था? "मन फिराओ और बपतिस्मा लो।" "इसलिये मन फिराओ और लौट आओ।" (प्रेरितों के काम 2:38; 3:19।) जब पौलुस इफिसुस के प्राचीनों से विदा हुआ तो उसने उन्हें सिद्धान्त का सार क्या दिया? उसने उनसे कहा कि उसने उन्हें सब के सामने और घर-घर सिखाया, "यहूदियों और यूनानियों को चिता दिया कि परमेश्वर की ओर मन फिराना और हमारे प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास करना चाहिए।" (प्रेरितों के काम 20:21।) जब पौलुस ने फेस्तुस और अग्रिप्पा के सामने अपना प्रत्युत्तर दिया तो अपनी सेवकाई का वर्णन कैसे किया? उसने उनसे कहा कि उसने सब लोगों को सिखाया कि "मन फिराकर परमेश्वर की ओर लौटें और मन फिराव के योग्य काम करें।" (प्रेरितों के काम 26:20।)

यरूशलेम के विश्वासियों ने अन्यजातियों के मन-परिवर्तन का क्या वृत्तान्त दिया? जब उन्होंने इसके विषय में सुना तो कहा, "तब तो परमेश्वर ने अन्यजातियों को भी जीवन के लिये मन फिराव का दान दिया है।" (प्रेरितों के काम 11:18।) जो भी प्रभु-भोज में आना चाहे, उससे इंग्लैंड की कलीसिया सबसे पहले कौन-सी योग्यताओं में से एक माँगती है? उन्हें "अपने आप को जाँचना चाहिए कि वे अपने पिछले पापों से सचमुच मन फिराते हैं या नहीं।" इंग्लैंड की कलीसिया के अनुसार, किसी भी मन न फिरानेवाले व्यक्ति को कभी प्रभु-भोज में नहीं आना चाहिए। निश्चय ही हम सब मानेंगे कि ये गम्भीर विचार हैं। ये दिखाते हैं कि जो जाँच मैं अब कर रहा हूँ वह कितनी महत्त्वपूर्ण है। मन फिराव के विषय में भूल करना अत्यन्त खतरनाक भूल है। मन फिराव के विषय में भ्रम हमारे धर्म की जड़ों में बैठा हुआ भ्रम है। तो फिर मन फिराव क्या है? किस मनुष्य के विषय में कहा जा सकता है कि वह मन फिराता है?

मन फिराव पाप के विषय में मनुष्य के स्वाभाविक हृदय का पूरा बदल जाना है। हम सब पाप में जन्मे हैं। हम स्वभाव से पाप से प्रेम करते हैं। जैसे ही हम कुछ करने और सोचने योग्य होते हैं, हम पाप की ओर झुक जाते हैं—जैसे पक्षी उड़ने की ओर और मछली तैरने की ओर झुकती है। ऐसा कोई बच्चा कभी नहीं हुआ जिसे छल, स्वार्थ, क्रोध, हठ, पेटूपन, घमण्ड और मूर्खता सीखने के लिए पाठशाला या शिक्षा की आवश्यकता पड़ी हो। ये बातें बुरी संगति से नहीं उठाई जातीं, न ही लम्बी और उबाऊ शिक्षा-प्रणाली से धीरे-धीरे सीखी जाती हैं। ये अपने आप उग आती हैं, चाहे लड़के-लड़कियाँ अकेले ही क्यों न पाले जाएँ। इनके बीज स्पष्ट रूप से हृदय की स्वाभाविक उपज हैं। इन बुरी बातों की ओर सब बच्चों का झुकाव मनुष्य की भ्रष्टता और पतन का अकाट्य प्रमाण है। अब जब हमारे इस हृदय को पवित्र आत्मा बदल देता है, जब पाप के प्रति यह स्वाभाविक प्रेम निकाल दिया जाता है, तब वह परिवर्तन होता है जिसे परमेश्वर का वचन "मन फिराव" कहता है। जिस मनुष्य में यह परिवर्तन किया जाता है, उसके विषय में कहा जाता है कि वह "मन फिराता" है। उसे एक शब्द में "पश्चातापी" मनुष्य कहा जा सकता है।

परन्तु मैं विषय को यहीं छोड़ने का साहस नहीं करता। यह अधिक निकट और गहन जाँच के योग्य है। जब इस प्रकार के सिद्धान्तों पर विचार हो तो केवल सामान्य कथनों से काम चलाना सुरक्षित नहीं है। मैं मन फिराव को खोलकर, आपकी आँखों के सामने उसकी चीर-फाड़ और विश्लेषण करने का प्रयत्न करूँगा। मैं आपको वे अंग और भाग दिखाऊँगा जिनसे मन फिराव बना है। मैं हर सच्चे पश्चातापी मनुष्य के अनुभव का कुछ अंश आपके सामने रखने का यत्न करूँगा।

(क) सच्चा मन फिराव पाप के ज्ञान से आरम्भ होता है। पश्चातापी मनुष्य की आँखें खुल जाती हैं। वह परमेश्वर की पवित्र व्यवस्था की लम्बाई-चौड़ाई, और अपने अपराधों की विशालता को—बहुत बड़ी विशालता को—घबराहट और लज्जा के साथ देखता है। उसे आश्चर्य के साथ पता चलता है कि अपने आप को "भला आदमी" और "अच्छे हृदयवाला" मनुष्य समझकर वह एक बहुत बड़े भ्रम में पड़ा था। वह जान लेता है कि वास्तव में वह परमेश्वर की दृष्टि में दुष्ट, दोषी, भ्रष्ट और बुरा है। उसका घमण्ड टूट जाता है। उसके ऊँचे विचार पिघल जाते हैं। वह देखता है कि वह एक बड़ा पापी है। सच्चे मन फिराव का यह पहला कदम है।

(ख) सच्चा मन फिराव पाप के लिये शोक उत्पन्न करता है। पश्चातापी मनुष्य का हृदय अपने बीते अपराधों के कारण गहरे पछतावे से भर जाता है। यह सोचकर उसका हृदय बिंध जाता है कि वह इतनी मूर्खता और इतनी दुष्टता से जीवन बिताता रहा। वह व्यर्थ गँवाए समय पर, बुरी रीति से लगाई गई प्रतिभाओं पर, अनादर पाए हुए परमेश्वर पर और अपनी हानि उठाई हुई आत्मा पर विलाप करता है। इन बातों का स्मरण उसके लिये दुखदायी होता है। इन बातों का बोझ कभी-कभी लगभग असहनीय हो जाता है। जब कोई मनुष्य इस प्रकार शोक करता है, तब सच्चे मन फिराव का दूसरा चरण तुम्हारे सामने होता है।

(ग) सच्चा मन फिराव आगे बढ़कर पाप का अंगीकार भी उत्पन्न करता है। पश्चातापी मनुष्य की जीभ खुल जाती है। वह अनुभव करता है कि जिस परमेश्वर के विरुद्ध उसने पाप किया है, उसी से उसे बात करनी है। उसके भीतर कुछ उससे कहता है कि उसे अपनी आत्मा की दशा के विषय में परमेश्वर को पुकारना, उससे प्रार्थना करना और उससे बातें करना है। उसे अनुग्रह के सिंहासन के सामने अपना हृदय उंडेलना और अपने अधर्म मान लेने हैं। वे उसके भीतर भारी बोझ हैं, और वह अब चुप नहीं रह सकता। वह कुछ भी छिपाकर नहीं रख सकता। वह कुछ भी नहीं छिपाएगा। वह परमेश्वर के सामने जाता है, अपने पक्ष में कुछ नहीं कहता, और यह कहने को तैयार रहता है, “मैंने स्वर्ग के विरुद्ध और तेरी दृष्टि में पाप किया है—मेरा अधर्म बड़ा है। हे परमेश्वर, मुझ पापी पर दया कर!” जब कोई मनुष्य इस प्रकार अंगीकार करता हुआ परमेश्वर के पास जाता है, तब सच्चे मन फिराव का तीसरा चरण तुम्हारे सामने होता है।

(घ) इसके अतिरिक्त, सच्चा मन फिराव पाप से पूरी तरह छूट जाने में प्रकट होता है। पश्चातापी मनुष्य का जीवन बदल जाता है। उसके दैनिक आचरण की दिशा पूरी तरह बदल जाती है। उसके हृदय में एक नया राजा राज्य करता है। वह पुराने मनुष्यत्व को उतार फेंकता है। परमेश्वर जिसकी आज्ञा देता है, उसे अब वह करना चाहता है; और जिसे परमेश्वर मना करता है, उससे अब वह बचना चाहता है। वह हर प्रकार से पाप से दूर रहने, पाप से लड़ने, पाप से युद्ध करने और पाप पर जय पाने का प्रयत्न करता है। वह बुराई करना छोड़ देता है। वह भलाई करना सीखता है। वह बुरे मार्गों और बुरी संगति से तुरन्त नाता तोड़ लेता है। वह चाहे कितनी ही निर्बलता से सही, पर नया जीवन जीने के लिये परिश्रम करता है। जब कोई मनुष्य ऐसा करता है, तब सच्चे मन फिराव का चौथा चरण तुम्हारे सामने होता है।

(ङ) अन्त में, सच्चा मन फिराव हृदय में सब पापों के प्रति गहरी घृणा की स्थिर आदत उत्पन्न करके प्रकट होता है। पश्चातापी मनुष्य का मन स्वभाव से पवित्र बन जाता है। वह बुराई से घृणा करता है और भलाई में लगा रहता है। वह परमेश्वर की व्यवस्था से आनन्दित होता है। वह प्रायः अपनी ही इच्छाओं से चूक जाता है। वह अपने भीतर एक बुरा सिद्धान्त पाता है जो परमेश्वर के आत्मा के विरुद्ध लड़ता है। जब वह उत्साह से भरना चाहता है तब अपने को ठंडा पाता है; जब आगे बढ़ना चाहता है तब पीछे पाता है; जब परमेश्वर की सेवा में सजीव रहना चाहता है तब अपने को सुस्त पाता है। वह अपनी निर्बलताओं के प्रति गहराई से सचेत रहता है। भीतर बसी भ्रष्टता के बोध से वह कराहता है। फिर भी, इस सबके होते हुए, उसके हृदय का सामान्य झुकाव परमेश्वर की ओर और बुराई से दूर रहता है। वह दाऊद के साथ कह सकता है, “इसलिये मैं तेरे सब उपदेशों को सब विषयों में ठीक जानता हूँ, और सब मिथ्या मार्गों से बैर रखता हूँ।” (भजन संहिता 119:128।) जब कोई मनुष्य यह कह सकता है, तब सच्चे मन फिराव का पाँचवाँ, अर्थात् मुकुटरूप चरण तुम्हारे सामने होता है।

परन्तु अब, क्या मन फिराव का चित्र पूरा हो गया? क्या मैं इस विषय को यहीं छोड़कर आगे बढ़ सकता हूँ? मैं ऐसा नहीं कर सकता। अब भी एक बात शेष है जिसे कभी भुलाना नहीं चाहिए। यदि मैं इस एक बात का उल्लेख न करूँ, तो मैं ऐसे हृदयों को उदास कर सकता हूँ जिन्हें परमेश्वर उदास नहीं करना चाहता, और मनुष्यों की आत्माओं और स्वर्ग के बीच ऊपरी बाधाएँ खड़ी कर सकता हूँ। सच्चा मन फिराव, जैसा मैंने अभी वर्णन किया है, किसी भी मनुष्य के हृदय में कभी अकेला नहीं होता। उसका सदा एक साथी होता है—एक धन्य साथी। उसके साथ सदा हमारे प्रभु और उद्धारकर्ता यीशु मसीह पर सजीव विश्वास रहता है। जहाँ विश्वास है, वहाँ मन फिराव है; जहाँ मन फिराव है, वहाँ सदा विश्वास है। मैं यह निर्णय नहीं करता कि पहले कौन आता है—मन फिराव विश्वास से पहले या विश्वास मन फिराव से पहले। परन्तु मैं साहस के साथ कहता हूँ कि ये दोनों अनुग्रह कभी एक-दूसरे से अलग नहीं पाए जाते। जैसे तुम प्रकाश के बिना सूर्य, या ठंड के बिना बर्फ, या ताप के बिना आग, या नमी के बिना जल नहीं पा सकते—वैसे ही तुम सच्चे मन फिराव के बिना सच्चा विश्वास कभी नहीं पाओगे, और सजीव विश्वास के बिना सच्चा मन फिराव कभी नहीं पाओगे। ये दोनों सदा साथ-साथ चलेंगे।

और अब, आगे बढ़ने से पहले, आओ हम अपने-अपने हृदय को जाँचें और परखें, और देखें कि हम सच्चे मन फिराव के विषय में क्या जानते हैं। मैं यह नहीं कहता कि सब पश्चातापी लोगों का अनुभव ठीक-ठीक, बिल्कुल और सूक्ष्म रूप से एक जैसा होता है। मैं यह नहीं कहता कि कोई मनुष्य कभी पाप को, या पाप पर शोक करने को, या पाप का अंगीकार करने को, या पाप को छोड़ने को, या पाप से घृणा करने को, पूर्ण रूप से, पूरी तरह, सम्पूर्णता से और जैसा चाहिए वैसा जानता है। परन्तु यह मैं अवश्य कहता हूँ कि सब सच्चे मसीही उन बातों में, जो मैंने अभी कही हैं, कुछ ऐसा पहचान लेंगे जिसे उन्होंने जाना और अनुभव किया है। मन फिराव, जैसा मैंने वर्णन किया है, मुख्य रूप से हर सच्चे विश्वासी का अनुभव होगा। इसलिये खोजो, और देखो कि तुम अपनी आत्मा में इसके विषय में क्या जानते हो।

सावधान रहो कि तुम सच्चे मन फिराव के स्वरूप के विषय में कोई भूल न करो। शैतान उस बहुमूल्य अनुग्रह का मूल्य भली-भाँति जानता है, इसलिये वह उसकी झूठी नकलें सजाकर प्रस्तुत करता है। जहाँ खरा सिक्का होता है, वहाँ खोटा धन भी सदा रहता है। जहाँ कोई मूल्यवान अनुग्रह है, वहाँ शैतान उस अनुग्रह की नकली वस्तुएँ और दिखावे चला देगा, और उन्हें मनुष्यों की आत्माओं पर थोपने का प्रयत्न करेगा। निश्चित कर लो कि तुम धोखा नहीं खा रहे।

(क) सावधान रहो कि तुम्हारा मन फिराव तुम्हारे हृदय का मामला हो। गम्भीर चेहरा, या पवित्र दिखनेवाला मुख, या अपने ऊपर लगाई गई कठोर तपस्याओं का चक्र—केवल इसी से परमेश्वर के प्रति सच्चा मन फिराव नहीं बनता। वास्तविक अनुग्रह मात्र चेहरे, वस्त्रों, दिनों और रीतियों के विषय से कहीं अधिक गहरी बात है। अहाब ने जब अपना काम निकालना था तब टाट ओढ़ लिया। परन्तु अहाब ने कभी मन फिराव नहीं किया।

(ख) सावधान रहो कि तुम्हारा मन फिराव ऐसा हो जिसमें तुम परमेश्वर की ओर फिरो। रोमन कैथोलिक लोग जब डर जाते हैं, तब याजकों और पाप-स्वीकार के स्थानों की ओर दौड़ सकते हैं। फेलिक्स पौलुस प्रेरित का प्रचार सुनकर काँप सकता था। परन्तु यह सब सच्चा मन फिराव नहीं है। देखो कि तुम्हारा मन फिराव तुम्हें परमेश्वर की ओर ले चले, और तुम्हें उसकी ओर, अपने सबसे उत्तम मित्र के रूप में, भागने को विवश करे।

(ग) चौकस रहो कि तुम्हारा मन फिराव ऐसा हो जिसके साथ पाप का पूरी तरह त्याग भी हो। भावुक लोग रविवार को मार्मिक उपदेश सुनकर रो पड़ते हैं, और फिर भी अगले ही सप्ताह नाच-रंग, रंगशाला और संगीत-नाटक में लौट जाते हैं। हेरोदेस को यूहन्ना बपतिस्मा देनेवाले का प्रचार सुनना अच्छा लगता था, और उसने उसे आनन्द से सुना, "और बहुत से काम किए"। परन्तु धर्म में केवल भावनाएँ निकम्मी से भी बुरी हैं, जब तक उनके साथ आचरण न हो। पाप से पूरी तरह छूटे बिना केवल भावुक उत्तेजना वह मन फिराव नहीं है जिसे परमेश्वर स्वीकार करता है। (मरकुस 6:20।)

(घ) सब बातों से बढ़कर चौकस रहो कि तुम्हारा मन फिराव प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास के साथ घनिष्ठ रूप से जुड़ा हो। देखो कि तुम्हारे कायल होने की दशा ऐसी हो जो उस क्रूस के चरणों के सिवा कहीं विश्राम न पाए जिस पर यीशु मसीह ने प्राण दिए। यहूदा इस्करियोती कह सका, "मैं ने पाप किया है," परन्तु यहूदा कभी यीशु की ओर नहीं फिरा। यहूदा ने कभी विश्वास से यीशु की ओर नहीं देखा, और इसलिए यहूदा अपने पापों में मरा। मुझे पाप का वह बोध दो जो मनुष्य को मसीह की ओर भागने के लिए प्रेरित करे, और इस बात का शोक कराए कि अपने पापों से उसने उस प्रभु को बेधा है जिसने उसे मोल लिया। मुझे आत्मा की वह पश्चाताप-भरी दशा दो जिसमें मनुष्य मसीह के विषय में बहुत कुछ अनुभव करे, और यह सोचकर दुःखी हो कि उसने ऐसे अनुग्रहकारी उद्धारकर्ता का कितना अपमान किया है। सीनै पर जाना, दस आज्ञाओं की बातें सुनना, नरक को देखना, दण्ड के भयंकर दृश्यों पर विचार करना—यह सब लोगों को भयभीत कर सकता है, और इसका भी अपना उपयोग है। परन्तु ऐसा कोई मन फिराव स्थायी नहीं होता जिसमें मनुष्य सीनै से अधिक गोलगोता को न देखे, और लहू बहाते हुए यीशु में पश्चाताप का सबसे प्रबल कारण न पाए। ऐसा मन फिराव स्वर्ग से उतरता है। ऐसा मन फिराव परमेश्वर पवित्र आत्मा ही मनुष्य के हृदय में बोता है।

II. अब मैं उस दूसरी बात पर आता हूँ जिस पर विचार करने का मैंने प्रस्ताव रखा था। मैं मन फिराव की आवश्यकता पर विचार करूँगा। मन फिराव क्यों आवश्यक है?

इस लेख के शीर्ष पर जो वचन है, वह मन फिराव की आवश्यकता को स्पष्ट दिखाता है। हमारे प्रभु यीशु मसीह के शब्द सुस्पष्ट, सीधे और ज़ोरदार हैं, "यदि तुम मन न फिराओगे तो सब इसी रीति से नष्ट होगे।" सब के सब, बिना किसी अपवाद के, परमेश्वर की ओर मन फिराने के मोहताज हैं। यह केवल चोरों, हत्यारों, पियक्कड़ों, व्यभिचारियों, लुच्चों और कारागारों तथा बन्दीगृहों के निवासियों के लिए ही आवश्यक नहीं है। नहीं—आदम से जन्मे सब लोगों को, बिना किसी अपवाद के, परमेश्वर की ओर मन फिराना आवश्यक है। सिंहासन पर बैठी रानी और दरिद्रालय का कंगाल, बैठक में बैठा धनवान और रसोई में काम करती दासी, विश्वविद्यालय में विज्ञान का आचार्य और हल के पीछे चलता निर्धन अनपढ़ लड़का—सब स्वभाव से मन फिराव के मोहताज हैं। सब पाप में जन्मे हैं, और यदि उद्धार पाना है तो सब को मन फिराना और फिरना होगा। सब के हृदय पाप के विषय में बदलने चाहिए। सब को सुसमाचार पर विश्वास करने के साथ-साथ मन भी फिराना होगा। "यदि तुम न फिरो और बालकों के समान न बनो, तो स्वर्ग के राज्य में कभी प्रवेश करने न पाओगे।" "यदि तुम मन न फिराओगे तो सब इसी रीति से नष्ट होगे।" (मत्ती 18:3; लूका 13:3।)

परन्तु मन फिराव की यह आवश्यकता कहाँ से आती है? इस आवश्यकता के विषय में इतनी अत्यन्त प्रबल भाषा क्यों प्रयोग की गई है? वे कौन-से कारण हैं, कौन-सी वजहें हैं, जिनसे मन फिराव इतना आवश्यक है?

(क) एक तो यह कि मन फिराव के बिना पापों की क्षमा नहीं है। यह कहते हुए मुझे अपने को ग़लत समझे जाने से बचाना होगा। मैं ज़ोर देकर कहता हूँ कि मुझे ग़लत मत समझो। मन फिराव के आँसू किसी पाप को नहीं धोते। यह कहना कि वे धोते हैं, बुरा धर्मविज्ञान है। यह तो केवल मसीह के लहू का काम है, उसी का कार्य। पश्चाताप अपराध का प्रायश्चित नहीं करता। यह कहना कि करता है, घटिया धर्मविज्ञान है। वह ऐसा कुछ नहीं कर सकता। हमारा सबसे अच्छा मन फिराव भी एक दीन, अधूरी वस्तु है—और उस पर फिर से मन फिराने की आवश्यकता रहती है। हमारे सबसे अच्छे पश्चाताप में इतनी त्रुटियाँ हैं कि वे हमें नरक में डुबो दें। "हम परमेश्वर के सामने केवल अपने प्रभु यीशु मसीह के कारण, विश्वास के द्वारा धर्मी गिने जाते हैं, अपने कर्मों या योग्यता के कारण नहीं," न अपने मन फिराव, पवित्रता, दान-पुण्य, संस्कार ग्रहण करने या ऐसी किसी बात के कारण। यह सब बिलकुल सच है।

तो भी यह उतना ही सच है कि धर्मी ठहराए गए लोग सदा पश्चातापी लोग होते हैं, और क्षमा पाया हुआ पापी सदा ऐसा मनुष्य होगा जो अपने पापों पर शोक करता और उनसे घृणा करता है। मसीह में परमेश्वर विद्रोही मनुष्य को ग्रहण करने और उसे शान्ति देने को तैयार है, चाहे वह कितना ही दुष्ट रहा हो, बस वह मसीह के नाम से उसके पास आए। परन्तु परमेश्वर माँग करता है, और उचित ही माँग करता है, कि विद्रोही अपने हथियार डाल दे। प्रभु यीशु मसीह तरस खाने, क्षमा करने, छुड़ाने, शुद्ध करने, धोने, पवित्र करने और स्वर्ग के योग्य बनाने को तत्पर है। परन्तु प्रभु यीशु मसीह यह देखना चाहता है कि मनुष्य उन पापों से घृणा करे जिनकी वह क्षमा चाहता है। कुछ लोग चाहें तो इसे "व्यवस्थावाद" कह लें। कुछ चाहें तो इसे "बन्धन" कह दें। मैं पवित्रशास्त्र पर दृढ़ खड़ा हूँ। परमेश्वर के वचन की गवाही स्पष्ट और असंदिग्ध है। धर्मी ठहराए गए लोग सदा पश्चातापी लोग होते हैं। मन फिराव के बिना पापों की क्षमा नहीं है।

(ख) दूसरी बात यह कि मन फिराव के बिना इस वर्तमान जीवन में सुख नहीं है। जब तक स्वास्थ्य अच्छा है और जेब में पैसा है, तब तक उमंग, उत्तेजना, हँसी और आमोद-प्रमोद हो सकता है। परन्तु ये ठोस सुख नहीं हैं। सब लोगों में एक विवेक है, और उस विवेक को सन्तुष्ट होना ही होगा। जब तक विवेक यह अनुभव करता है कि पाप से न मन फिराया गया है, न उसे छोड़ा गया है, तब तक वह शान्त नहीं रहेगा, और मनुष्य को भीतर से सुखी नहीं होने देगा। हम सब के भीतर एक अन्तर्मन है, जो संसार को अज्ञात है—एक ऐसा अन्तर्मन जिससे हमारे साथियों और मित्रों का प्रायः कोई परिचय नहीं होता। जब तक पाप से मन नहीं फिराया जाता, उस अन्तर्मन पर एक बोझ रहता है; और जब तक वह बोझ उतर न जाए, उस अन्तर्मन को सच्चा चैन नहीं मिलता। जब हम उचित स्थिति में नहीं हैं, तब क्या तुम और मैं चैन से रह सकते हैं? यह असम्भव है। और मनुष्य की सच्ची स्थिति क्या है? वह तब तक अपनी उचित स्थिति में नहीं होता जब तक वह पाप की ओर से पीठ फेरकर परमेश्वर की ओर मुँह न कर ले।

जब तक सब कुछ व्यवस्थित न हो, तब तक मनुष्य का घर कभी सुखदायक नहीं होता। और भीतरी मनुष्य का घर कब व्यवस्थित होता है? कभी नहीं, जब तक परमेश्वर राजा न हो और संसार दूसरे स्थान पर न रखा जाए; कभी नहीं, जब तक परमेश्वर सिंहासन पर न हो और पाप को गिराकर बाहर न निकाल दिया जाए। जैसे सूर्य के बिना सौरमण्डल का ठीक चलना असम्भव है, वैसे ही जब परमेश्वर अपने स्थान पर न हो तो तुम्हारे हृदय का सुखी होना भी असम्भव है। परमेश्वर के साथ का बड़ा हिसाब चुकाना ही होगा। राजा को अपने सिंहासन पर विराजमान होना होगा। तभी, और उससे पहले नहीं, भीतर शान्ति होगी। मन फिराव के बिना सच्चा सुख नहीं हो सकता। यदि हम सुखी होना चाहते हैं तो हमें मन फिराना ही होगा।

(ग) एक और बात यह है कि मन फिराव के बिना आने वाले संसार में स्वर्ग के योग्य होना सम्भव नहीं। स्वर्ग एक तैयार किया हुआ स्थान है, और जो स्वर्ग में जाते हैं उन्हें तैयार किए हुए लोग होना चाहिए। हमारे हृदय स्वर्ग के कार्यों के अनुकूल सुर में होने चाहिए, नहीं तो स्वयं स्वर्ग ही एक दुखदायी निवास होगा। हमारा मन स्वर्ग के निवासियों के मन से मेल खाता हो, नहीं तो स्वर्ग की संगति हमारे लिए शीघ्र ही असह्य हो जाएगी। जिस किसी के हाथ में यह पत्र पहुँचे, उस हर एक को स्वर्ग तक पहुँचाने में मुझे आनन्द होगा। परन्तु मैं नहीं चाहता कि तुम इस बात से अनजान रहो कि यदि तुम मन न फिराए हुए हृदय के साथ वहाँ गए, तो स्वर्ग तुम्हारी आत्मा के लिए स्वर्ग न रहेगा। यदि तुम पाप से प्रेम करने वाले हृदय के साथ वहाँ पहुँचे, तो वहाँ तुम क्या करोगे? सब सन्तों में से तुम किससे बात करोगे? किसके पास बैठोगे? निश्चय ही परमेश्वर के स्वर्गदूत उस मनुष्य के हृदय को कोई मधुर संगीत न सुनाएँगे जो पृथ्वी पर सन्तों को सहन नहीं कर सकता और जिसने कभी छुटकारे के प्रेम के लिए मेम्ने की स्तुति नहीं की! निश्चय ही पूर्वजों, प्रेरितों और भविष्यद्वक्ताओं की मण्डली उस मनुष्य के लिए कोई आनन्द न होगी जो अभी अपनी बाइबल नहीं पढ़ता और यह जानने की परवाह नहीं करता कि प्रेरितों और भविष्यद्वक्ताओं ने क्या लिखा।

अरे नहीं! नहीं! यदि हम मन न फिराए हुए हृदय के साथ वहाँ पहुँचे तो स्वर्ग में कोई सुख नहीं हो सकता। मछली पानी से बाहर सुखी नहीं होती। पक्षी पिंजरे में बन्द होकर सुखी नहीं होता। और क्यों? वे सब अपने उचित वातावरण और स्वाभाविक स्थिति से बाहर होते हैं। और मनुष्य, अपरिवर्तित मनुष्य, मन न फिराया हुआ मनुष्य, यदि पवित्र आत्मा द्वारा बदले हुए हृदय के बिना स्वर्ग पहुँच भी जाए तो सुखी न होगा। वह अपने उचित वातावरण से बाहर एक प्राणी होगा। उसके पास ऐसी कोई क्षमता न होगी जिससे वह उस पवित्र निवास का आनन्द ले सके। पश्चाताप करने वाले हृदय के बिना "ज्योति में पवित्र लोगों के भाग के भागी होने" की कोई योग्यता नहीं। यदि हम स्वर्ग जाना चाहते हैं तो हमें मन फिराना ही होगा। (कुलुस्सियों 1:12)।

मैं परमेश्वर की दया के नाम पर तुमसे विनती करता हूँ कि जो बातें मैंने अभी कही हैं उन्हें अपने मन में रखो और भली भाँति उन पर विचार करो। तुम छल, धोखे और बहकावे के संसार में रहते हो। मन फिराव की आवश्यकता के विषय में किसी को तुम्हें धोखा न देने दो। ओह, यदि मसीह का नाम लेने वाले लोग परमेश्वर के प्रति सच्चे मन फिराव की आवश्यकता को, उसकी पूर्ण आवश्यकता को, जितना अब देखते, जानते और अनुभव करते हैं उससे कहीं अधिक देखते, जानते और अनुभव करते! बहुत सी बातें ऐसी हैं जो आवश्यक नहीं। धन आवश्यक नहीं। स्वास्थ्य आवश्यक नहीं। सुन्दर वस्त्र आवश्यक नहीं। कुलीन मित्र आवश्यक नहीं। संसार की कृपा आवश्यक नहीं। वरदान और विद्या आवश्यक नहीं। लाखों लोग इन बातों के बिना स्वर्ग पहुँच चुके हैं। हर वर्ष हज़ारों इनके बिना स्वर्ग पहुँच रहे हैं। परन्तु "परमेश्वर के प्रति मन फिराव और हमारे प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास" के बिना कोई कभी स्वर्ग नहीं पहुँचा।

कोई मनुष्य तुम्हें कभी यह न समझाए कि जिस धर्म में परमेश्वर के प्रति मन फिराव को सबसे प्रमुख स्थान नहीं मिला, वह सुसमाचार कहलाने के योग्य है। वह भी कोई सुसमाचार है! जिसमें मन फिराव प्रमुख बात नहीं, वह सुसमाचार नहीं है। वह सुसमाचार! वह मनुष्य का सुसमाचार है, परमेश्वर का नहीं। वह सुसमाचार! वह पृथ्वी से आता है, स्वर्ग से नहीं। वह सुसमाचार! वह सुसमाचार है ही नहीं; वह तो घोर अव्यवस्थावाद है, और कुछ नहीं। जब तक तुम अपने पापों को गले लगाए रहते हो, अपने पापों से चिपके रहते हो, और अपने पाप रखना ही चाहते हो, तब तक तुम सुसमाचार के विषय में जो चाहो कहते रहो, परन्तु तुम्हारे पाप क्षमा नहीं हुए हैं। चाहो तो इसे व्यवस्थावाद कह लो। चाहो तो कह लो कि तुम "आशा करते हो कि अन्त में सब ठीक हो जाएगा, परमेश्वर दयालु है, परमेश्वर प्रेम है, मसीह मर चुका है, आशा है कि मैं अन्त में स्वर्ग जाऊँगा।" नहीं! मैं तुमसे कहता हूँ, सब ठीक नहीं है। इस प्रकार तो कभी ठीक नहीं होगा। तुम प्रायश्चित के लहू को पैरों तले रौंद रहे हो। अभी मसीह में तुम्हारा कोई भाग या अंश नहीं है। जब तक तुम पाप से मन नहीं फिराते, हमारे प्रभु यीशु मसीह का सुसमाचार तुम्हारी आत्मा के लिए सुसमाचार नहीं है। मसीह पाप से बचाने वाला उद्धारकर्ता है, पाप में पड़े मनुष्य का उद्धारकर्ता नहीं। यदि मनुष्य अपने पाप रखना ही चाहे, तो वह दिन आएगा जब वह दयालु उद्धारकर्ता उससे कहेगा, "हे कुकर्म करनेवालो, मेरे पास से चले जाओ! उस अनन्त आग में जाओ जो शैतान और उसके दूतों के लिये तैयार की गई है।" (मत्ती 25:41)।

कोई मनुष्य तुम्हें कभी यह भ्रम न दे कि तुम मन फिराव के बिना इस संसार में सुखी हो सकते हो। अरे नहीं! तुम हँस सकते हो, नाच सकते हो, छुट्टियाँ मनाने जा सकते हो, अच्छे चुटकुले सुना सकते हो, अच्छे गीत गा सकते हो, और कह सकते हो, "हुर्रे, साथियो, हुर्रे!" और "अच्छा समय आने वाला है!" परन्तु इससे यह प्रमाणित नहीं होता कि तुम सुखी हो। जब तक तुम पाप से झगड़ा नहीं करते, तब तक तुम कभी सचमुच सुखी मनुष्य नहीं होगे। हज़ारों लोग कुछ समय तक इसी प्रकार चलते रहते हैं और दूसरों की आँखों के सामने प्रसन्न दिखाई देते हैं, फिर भी अपने हृदय में छिपा हुआ दुःख लिए फिरते हैं। जब वे अकेले होते हैं तब दुखी होते हैं। जब वे हँसमुख संगति में नहीं होते तब उदास होते हैं। विवेक उन्हें कायर बना देता है। उन्हें अकेले रहना अच्छा नहीं लगता। वे शान्त मन से सोचने से घृणा करते हैं। उन्हें निरन्तर कोई नई उत्तेजना चाहिए। हर वर्ष उन्हें उससे अधिक चाहिए। जैसे अफ़ीमची को अधिकाधिक मात्रा चाहिए, वैसे ही जो मनुष्य परमेश्वर को छोड़ किसी और वस्तु में सुख खोजता है, उसे जितने वर्ष वह जीता है उतनी ही अधिक उत्तेजना की आवश्यकता होती है, और अन्त में वह कभी सचमुच सुखी नहीं होता।

हाँ! और सबसे बुरी बात यह है कि जितना अधिक समय तुम बिना मन फिराव के बिताओगे, उतना ही तुम्हारा मन अधिक दुखी होता जाएगा। जब बुढ़ापा तुम पर आएगा, और तुम्हारे सिर पर पके बाल दिखाई देंगे—जब तुम वहाँ जा न सकोगे जहाँ पहले जाते थे, और उन बातों में आनन्द न ले सकोगे जिनमें पहले आनन्द लेते थे—तब तुम्हारी दुर्दशा और व्याकुलता सशस्त्र पुरुष की नाईं तुम पर टूट पड़ेगी। मनुष्य जितना अधिक मन न फिरानेवाला होता है, उतना ही अधिक दुखी होता जाता है। क्या तुमने लन्दन के सेंट पॉल गिरजाघर की उस बड़ी घड़ी के विषय में सुना है? दोपहर को, कामकाज के कोलाहल में, जब गाड़ियाँ, छकड़े, बग्घियाँ और बसें सड़कों पर घर्र-घर्र करती दौड़ती हैं, तब कितने ही लोग उस बड़ी घड़ी का घण्टा सुनते ही नहीं, जब तक कि वे उसके बहुत निकट न रहते हों। परन्तु जब दिन का काम समाप्त हो जाता है, और कामकाज का कोलाहल थम जाता है—जब लोग सो जाते हैं, और लन्दन में सन्नाटा छा जाता है—तब बारह बजे, एक, दो, तीन, चार बजे, उस घड़ी की ध्वनि मीलों दूर तक सुनाई देती है। बारह! एक! दो! तीन! चार! कितने ही जागते पड़े मनुष्य उस घड़ी को सुनते हैं! वह घड़ी ठीक मन न फिरानेवाले मनुष्य के विवेक के समान है। जब तक उसमें स्वास्थ्य और बल है, और वह कामकाज की भाग-दौड़ में लगा रहता है, तब तक वह विवेक की नहीं सुनता। वह संसार में डूबकर उसकी आवाज़ को दबा और चुप कर देता है। वह भीतरी मनुष्य को अपने से बोलने नहीं देता। परन्तु वह दिन आएगा जब विवेक की आवाज़ सुनी जाएगी, चाहे वह चाहे या न चाहे। वह दिन आएगा जब उसकी आवाज़ उसके कानों में गूँजेगी और तलवार की नाईं उसे छेद डालेगी। वह समय आएगा जब उसे संसार से अलग होकर रोग-शय्या पर लेटना और मृत्यु को आँखों के सामने देखना पड़ेगा। और तब विवेक की वह घड़ी, वह गम्भीर घड़ी, उसके हृदय में बजेगी, और यदि उसने मन न फिराया हो तो उसकी आत्मा में दुर्दशा और व्याकुलता ले आएगी। अरे नहीं! इसे अपने हृदय की पट्टियों पर लिख लो—बिना मन फिराव के शान्ति नहीं!

सबसे बढ़कर, कोई मनुष्य तुम्हें यह स्वप्न न दिखाने पाए कि परमेश्वर की ओर मन फिराए बिना स्वर्ग पहुँचना सम्भव है। हम सब स्वर्ग जाना चाहते हैं। जो मनुष्य कहे कि वह नरक जाना चाहता है, उसे उचित ही पागल गिना जाएगा। परन्तु यह कभी न भूला जाए कि स्वर्ग में केवल वे ही जाते हैं जिन्हें पवित्र आत्मा ने उसके योग्य बनाया है। मैं उन आधुनिक भ्रमों के विरुद्ध गम्भीरता से विरोध प्रकट करता हूँ कि "अन्त में सब लोग स्वर्ग जाएँगे—इससे कुछ अन्तर नहीं पड़ता कि तुम कैसे जीवन बिताते हो—चाहे तुम पवित्र हो या अपवित्र, कुछ फ़र्क नहीं पड़ता—चाहे तुम अभक्त हो या परमेश्वर का भय माननेवाले, सब एक ही बात है, अन्त में सब स्वर्ग पहुँचेंगे।" मुझे ऐसी शिक्षा बाइबल में नहीं मिलती। मैं तो बाइबल को इसका सीधा खण्डन करते पाता हूँ। इस नए विचार को चाहे कितनी ही चतुराई से प्रस्तुत किया जाए, और चाहे कितने ही मनभावने ढंग से इसका समर्थन किया जाए, यह परमेश्वर के वचन की कसौटी पर नहीं टिक सकता। नहीं! परमेश्वर सच्चा ठहरे, और हर एक मनुष्य झूठा। स्वर्ग वैसा स्थान नहीं है जैसा कुछ लोग कल्पना करते हैं। स्वर्ग के निवासी वैसी मिली-जुली भीड़ नहीं हैं जैसा बहुत से लोग मानने का यत्न करते हैं। वे सब एक मन और एक चित्त के हैं। स्वर्ग वह स्थान है जहाँ परमेश्वर के लोग जाएँगे। परन्तु जो मन न फिरानेवाले और अविश्वासी हैं, और मसीह के पास नहीं आना चाहते, उनके लिये बाइबल स्पष्ट और निस्सन्देह कहती है कि नरक को छोड़ और कुछ नहीं रह जाता।

यह एक गम्भीर विचार है कि मन न फिरानेवाला मनुष्य स्वर्ग के योग्य नहीं है। यदि वह वहाँ पहुँच भी जाता, तो वहाँ सुखी न होता। मुझे एक पादरी के विषय में सुनना याद है जो बहुत वर्ष पहले बग्घी में यात्रा कर रहा था। वह कोचवान के पास बैठा था। वह कोचवान उन अभागे लोगों में से था जो समझते हैं कि बिना गाली-गलौज के कोई काम होता ही नहीं। वह कितने ही मील तक निरन्तर गाली देता, कसमें खाता, निन्दा करता और परमेश्वर का नाम व्यर्थ लेता रहा। वह हाँकता चला गया—कभी क्रोध में आग-बबूला होता, कभी घोड़ों को पीटता, कभी फिर गाली और कसमें बकने लगता। कोचवान के ढंग ऐसे ही थे। अन्त में पादरी ने उससे शान्ति से कहा, "कोचवान, मुझे तुम्हारे विषय में बहुत डर लगता है।" कोचवान बोला, "महाशय, आपको किस बात का डर? सब ठीक चल रहा है, हमारे उलटने की कोई सम्भावना नहीं।" पादरी ने फिर कहा, "कोचवान, मुझे तुम्हारे विषय में बहुत डर लगता है; क्योंकि मैं सोच नहीं पाता कि यदि तुम स्वर्ग पहुँच भी गए तो वहाँ क्या करोगे। स्वर्ग में गाली-गलौज नहीं होगी; स्वर्ग में कसमें नहीं खाई जाएँगी; स्वर्ग में क्रोध नहीं होगा; स्वर्ग में पीटने के लिये घोड़े नहीं होंगे।" सेवक ने एक बार फिर कहा, "कोचवान, मैं सोच नहीं पाता कि तुम स्वर्ग में क्या करोगे।" कोचवान बोला, "अजी, यह तो आपकी राय है," और इससे अधिक कुछ न कहा गया। वर्ष बीत गए। एक दिन किसी ने उसी पादरी को बताया कि एक रोगी उससे मिलना चाहता है। वह अजनबी था। उसने कहा था कि वह इस बस्ती में इसलिये आया है कि वह यहीं मरना चाहता है। पादरी उससे मिलने गया। वह एक कमरे में गया और वहाँ एक मरणासन्न मनुष्य को पाया, जिसका चेहरा वह पहचानता नहीं था। मरणासन्न मनुष्य ने कहा, "महाशय, आपको मैं याद नहीं?" पादरी ने कहा, "नहीं, मुझे याद नहीं।" वह बोला, "महाशय, मुझे आप याद हैं। मैं वही कोचवान हूँ जिससे आपने बहुत वर्ष पहले कहा था, 'कोचवान, मुझे तुम्हारे विषय में डर लगता है, क्योंकि मैं नहीं जानता कि यदि तुम स्वर्ग पहुँच गए तो क्या करोगे।' महाशय, उन शब्दों ने मुझे पकड़ लिया। मैंने देखा कि मैं मरने के योग्य नहीं हूँ। वे शब्द मेरे हृदय में काम करते रहे, करते रहे, करते रहे, और मुझे तब तक चैन न मिला जब तक मैंने पाप से मन न फिराया, और मसीह की शरण न ली, और उसमें शान्ति न पाई, और नया मनुष्य न बन गया। और अब," उसने कहा, "परमेश्वर के अनुग्रह से मुझे भरोसा है कि मैं अपने सृजनहार से मिलने को तैयार हूँ, और ज्योति में पवित्र लोगों के भाग के योग्य हूँ।"

एक बार फिर मैं तुम्हें चिताता हूँ कि स्मरण रखो—परमेश्वर के प्रति मन फिराव के बिना स्वर्ग के योग्य होना सम्भव नहीं। किसी अपश्चातापी मनुष्य को वहाँ रखना उसे पीड़ा देना होगा। यह उसके लिये कोई दया न होगी। वह सुखी न होगा। वह सुखी हो ही नहीं सकता। जो मनुष्य पाप से घृणा करनेवाले और परमेश्वर से प्रेम रखनेवाले मन के बिना वहाँ पहुँचे, उसके लिये स्वर्ग में कोई आनन्द न होगा। मैं अन्तिम दिन बहुत से आश्चर्य देखने की आशा रखता हूँ। मैं कुछ लोगों को प्रभु यीशु मसीह के दाहिने हाथ पर देखने की आशा रखता हूँ जिन्हें कभी मुझे बायीं ओर देखने का भय था। मैं कुछ लोगों को बायीं ओर देखने की आशा रखता हूँ जिन्हें मैं भले मसीही समझता था और दाहिनी ओर देखने की आशा करता था। परन्तु एक बात मुझे निश्चय है। मैं यीशु मसीह के दाहिने हाथ पर एक भी अपश्चातापी मनुष्य को न देखूँगा। मैं वहाँ अब्राहम को देखूँगा, जिसने कहा, "मैं मिट्टी और राख हूँ।" मैं वहाँ याकूब को देखूँगा, जिसने कहा, "मैं तेरी सब कृपा के कामों में से किसी के योग्य नहीं।" मैं वहाँ अय्यूब को देखूँगा, जिसने कहा, "मैं नीच हूँ।" मैं वहाँ दाऊद को देखूँगा, जिसने कहा, "मैं अधर्म के साथ उत्पन्न हुआ, और पाप के साथ मेरी माता ने मुझे गर्भ में धारण किया।" मैं वहाँ यशायाह को देखूँगा, जिसने कहा, "मैं अशुद्ध होंठवाला मनुष्य हूँ।" मैं वहाँ पौलुस को देखूँगा, जिसने कहा, "मैं पापियों में सब से बड़ा हूँ।" (उत्पत्ति 18:27; 32:10; अय्यूब 40:4; भजन संहिता 51:5; यशायाह 6:5; 1 तीमुथियुस 1:15।) मैं वहाँ शहीद जॉन ब्रैडफ़ोर्ड को देखूँगा, जो अपने पत्रों के अन्त में प्रायः यों हस्ताक्षर करता था, "वह अभागा पापी, वह दीन पापी, जॉन ब्रैडफ़ोर्ड," वही जॉन ब्रैडफ़ोर्ड जो किसी मनुष्य को फाँसी पर चढ़ने जाते देखकर कहा करता था, "वह जाता है जॉन ब्रैडफ़ोर्ड—यदि परमेश्वर का अनुग्रह न होता।" मैं वहाँ अशर को देखूँगा, जिसके अन्तिम शब्द थे, "मेरे बहुत से पाप क्षमा कर, विशेषकर चूक के मेरे पाप।" मैं वहाँ ग्रिमशॉ को देखूँगा, जिसके अन्तिम शब्द थे, "लो, एक निकम्मा दास जाता है।" परन्तु वे सब एक मन, एक विचार और एक अनुभव के होंगे। उन सब ने पाप से घृणा की होगी। उन सब ने पाप के लिये शोक किया होगा। उन सब ने पाप का अंगीकार किया होगा। उन सब ने पाप को त्यागा होगा। उन सब ने विश्वास के साथ मन फिराव भी किया होगा, परमेश्वर के प्रति मन फिराया होगा और यीशु मसीह पर विश्वास भी किया होगा। वे सब एक स्वर से कहेंगे, "परमेश्वर ने क्या ही बड़े काम किए हैं!" वे सब कहेंगे, "परमेश्वर के अनुग्रह से मैं जहाँ हूँ वहाँ हूँ," और यह भी, "परमेश्वर के अनुग्रह से मैं जो हूँ सो हूँ।"

III. अब मैं तीसरी और अन्तिम बात पर आता हूँ जिसके विषय में कहने की मैंने प्रतिज्ञा की थी। मैं मन फिराव के लिये प्रोत्साहनों पर विचार करूँगा। मनुष्य को मन फिराने के लिये क्या बात प्रेरित कर सकती है?

मुझे इस विषय में कुछ कहना बहुत आवश्यक लगता है। मैं जानता हूँ कि जब मन फिराव का विषय हमारे सामने आता है तो मार्ग में बहुत सी कठिनाइयाँ उठती हैं। मैं जानता हूँ कि मनुष्य पाप को छोड़ने में कितना धीमा है। उससे अपने प्रिय पापों को छोड़ने को कहना ऐसा है मानो उससे दाहिना हाथ काट डालने, या दाहिनी आँख निकाल फेंकने, या दाहिना पाँव काट डालने को कहा जाए। मैं पुरानी आदतों और धर्म के विषय में आरम्भ के विचारों की शक्ति को जानता हूँ। आरम्भ में वे सब मकड़ी के जालों के समान होते हैं। अन्त में वे लोहे की जंजीरें बन जाते हैं। मैं अभिमान की शक्ति को, और उस "मनुष्य के भय" को जानता हूँ "जो फंदा बन जाता है।" मैं जानता हूँ कि लोग सन्त समझे जाने और धर्म की चिन्ता करनेवाले माने जाने से कितना कतराते हैं। मैं जानता हूँ कि सैकड़ों-हजारों लोग युद्ध में जाने से कभी न हिचकेंगे—फिर भी इस कारण हँसी का पात्र बनना और उपहास सहना नहीं सह सकते कि वे अपनी आत्मा की चिन्ता करते हैं। और मैं हमारे बड़े शत्रु शैतान की द्वेषपूर्णता को भी जानता हूँ। क्या वह अपने "वैध बन्दियों" को बिना संघर्ष छोड़ देगा? कभी नहीं! क्या वह अपने शिकार को बिना लड़े छोड़ देगा? कभी नहीं! मैंने एक बार चिड़ियाघर में एक सिंह को भोजन दिए जाते देखा। मैंने उसके आगे उसका भोजन डाले जाते देखा। मैंने रखवाले को वह भोजन हटाने का प्रयत्न करते देखा। मुझे सिंह की दहाड़, उसकी छलाँग, और अपना भोजन बचाने का उसका संघर्ष स्मरण है। और मुझे स्मरण है वह "गर्जनेवाला सिंह जो इस खोज में रहता है कि किसे फाड़ खाए।" (1 पतरस 5:8।) क्या वह किसी मनुष्य को बिना संघर्ष छोड़ देगा कि वह मन फिराए? कभी नहीं, कभी नहीं, कभी नहीं! मनुष्य को मन फिराने के लिये बहुत से प्रोत्साहनों की आवश्यकता है।

परन्तु प्रोत्साहन हैं—महान, विस्तृत, व्यापक, भरपूर और निःशुल्क। परमेश्वर के वचन में ऐसी बातें हैं जो हर मन को दृढ़ करें और हर एक को बिना विलम्ब मन फिराने के लिये जगाएँ। मैं इस पुस्तक के पाठकों के सामने ये बातें रखना चाहता हूँ। मैं नहीं चाहता कि कोई भी आत्मा इस पन्ने को रखकर कहे, "यह हो ही नहीं सकता—यह असम्भव है।" मैं चाहता हूँ कि सब कहें, "आशा है—आशा है! खुला द्वार है! यह सम्भव है—यह हो सकता है! परमेश्वर के अनुग्रह से मनुष्य मन फिरा सकता है!"

(क) सबसे पहले यह सुनो कि प्रभु यीशु मसीह कैसा अनुग्रहकारी उद्धारकर्ता है। मैं उसे सबसे पहले और सबसे ऊपर रखता हूँ, मनुष्य को मन फिराव के लिये प्रोत्साहित करने वाले महान प्रमाण के रूप में। मैं हर सन्देह करनेवाली आत्मा से कहता हूँ, मसीह को देखो, मसीह का विचार करो। वह "उन का जो उसके द्वारा परमेश्वर के पास आते हैं पूरा पूरा उद्धार करने में सर्वदा समर्थ है।" वह वही है जिसे "अधिपति और उद्धारकर्ता" होने के लिये अभिषिक्त किया गया, कि "मन फिराव और पापों की क्षमा" दोनों प्रदान करे। वह वही है जो "खोए हुओं को ढूँढ़ने और उनका उद्धार करने आया।" वह वही है जिसने कहा, "मैं धर्मियों को नहीं, परन्तु पापियों को मन फिराने के लिये बुलाने आया हूँ।" वह वही है जो पुकारता है, "हे सब परिश्रम करनेवालो और बोझ से दबे हुए लोगो, मेरे पास आओ; मैं तुम्हें विश्राम दूँगा।" वह वही है जिसने अपना राजकीय वचन दिया है, "जो कोई मेरे पास आएगा उसे मैं कभी न निकालूँगा।" और उसी के विषय में लिखा है, "जितनों ने उसे ग्रहण किया, उसने उन्हें परमेश्वर के सन्तान होने का अधिकार दिया, अर्थात् उन्हें जो उसके नाम पर विश्वास रखते हैं।" मैं सब सन्देहों, प्रश्नों, कठिनाइयों, आपत्तियों और भयों का उत्तर इसी सरल प्रमाण से देता हूँ। मैं हर उस व्यक्ति से जिसे प्रोत्साहन चाहिए, कहता हूँ, मसीह को देखो, मसीह का विचार करो। प्रभु यीशु मसीह पर विचार करो; और फिर मन फिराव के विषय में सन्देह न करो। (इब्रानियों 7:25; प्रेरितों के काम 5:31; लूका 19:10; मरकुस 2:17; मत्ती 11:28; यूहन्ना 6:37; यूहन्ना 1:12।)

(ख) एक और बात के लिए सुनिए कि परमेश्वर के वचन में कैसी महिमामय प्रतिज्ञाएँ हैं। लिखा है, "जो उन्हें मान लेता और छोड़ भी देता है, उस पर दया की जाएगी।" फिर लिखा है, "यदि हम अपने पापों को मान लें, तो वह हमारे पापों को क्षमा करने और हमें सब अधर्म से शुद्ध करने में विश्वासयोग्य और न्यायी है।" फिर लिखा है, "धन्य हैं वे, जो मन के दीन हैं, क्योंकि स्वर्ग का राज्य उन्हीं का है। धन्य हैं वे, जो शोक करते हैं, क्योंकि वे शान्ति पाएँगे। धन्य हैं वे, जो धार्मिकता के भूखे और प्यासे हैं, क्योंकि वे तृप्त किए जाएँगे।" निश्चय ही ये प्रतिज्ञाएँ प्रोत्साहन देनेवाली हैं। मैं फिर कहता हूँ, मन फिराव के विषय में अब और संदेह न कीजिए। (नीतिवचन 28:13; 1 यूहन्ना 1:9; मत्ती 5:3, 4, 6।)

(ग) एक और बात के लिए सुनिए कि परमेश्वर के वचन में कैसी अनुग्रहपूर्ण घोषणाएँ हैं: "जब दुष्ट जन अपनी दुष्टता से, जो उसने की है, फिरकर न्याय और धर्म के काम करने लगे, तो वह अपने प्राण को जीवित रखेगा।" "टूटा मन ही परमेश्वर के योग्य बलिदान है; हे परमेश्वर, तू टूटे और पिसे हुए मन को तुच्छ नहीं जानता।" "परमेश्वर नहीं चाहता कि कोई नाश हो, वरन् यह कि सब को मन फिराव का अवसर मिले।" "प्रभु यहोवा की यह वाणी है, मैं जीवित हूँ, मैं दुष्टों के मरने से प्रसन्न नहीं होता, इसलिए लौट आओ, लौट आओ; तुम क्यों मरो?" "परमेश्वर के स्वर्गदूतों के सामने एक मन फिरानेवाले पापी के विषय में आनन्द होता है।" (यहेजकेल 18:27; भजन संहिता 51:17; 2 पतरस 3:9; यहेजकेल 33:11; लूका 15:10।) निश्चय ही यदि कोई वचन प्रोत्साहन दे सकते हैं, तो ये वचन अवश्य देते हैं! मैं फिर कहता हूँ, मन फिराव के विषय में अब और संदेह न कीजिए।

(घ) एक और बात के लिए सुनिए कि हमारे प्रभु यीशु ने इस विषय पर कैसे अद्भुत दृष्टान्त कहे। "दो मनुष्य मन्दिर में प्रार्थना करने गए, एक फरीसी और दूसरा चुंगी लेनेवाला। फरीसी खड़ा होकर अपने मन में यह प्रार्थना करने लगा, 'हे परमेश्वर, मैं तेरा धन्यवाद करता हूँ कि मैं और मनुष्यों की नाईं लोभी, अन्यायी और व्यभिचारी नहीं, और न इस चुंगी लेनेवाले के समान हूँ। मैं सप्ताह में दो बार उपवास करता हूँ; मैं अपनी सब कमाई का दसवाँ अंश देता हूँ।' परन्तु चुंगी लेनेवाले ने दूर खड़े होकर स्वर्ग की ओर आँख उठाना भी न चाहा, वरन् अपनी छाती पीट-पीटकर कहा, 'हे परमेश्वर, मुझ पापी पर अपना क्रोध शान्त कर।' मैं तुम से कहता हूँ कि वह दूसरे की अपेक्षा धर्मी ठहराया जाकर अपने घर गया; क्योंकि जो कोई अपने आप को बड़ा बनाएगा, वह छोटा किया जाएगा, और जो अपने आप को छोटा बनाएगा, वह बड़ा किया जाएगा।" (लूका 23:10-14।)

फिर वह दूसरा अद्भुत दृष्टान्त सुनिए, अर्थात् उड़ाऊ पुत्र का दृष्टान्त। "किसी मनुष्य के दो पुत्र थे। उनमें से छोटे ने पिता से कहा, 'हे पिता, सम्पत्ति में से जो भाग मेरा हो, वह मुझे दे दीजिए।' तब उसने उन्हें अपनी सम्पत्ति बाँट दी। थोड़े दिन बाद छोटा पुत्र सब कुछ इकट्ठा करके एक दूर देश को चला गया, और वहाँ लुचपन में अपनी सम्पत्ति उड़ा दी। जब वह सब कुछ खर्च कर चुका, तो उस देश में भारी अकाल पड़ा, और वह कंगाल हो गया। तब वह उस देश के एक निवासी के यहाँ जा पड़ा; उसने उसे अपने खेतों में सूअर चराने भेजा। वह चाहता था कि उन फलियों से, जो सूअर खाते थे, अपना पेट भरे, परन्तु कोई उसे कुछ न देता था। जब वह अपने आपे में आया, तो कहने लगा, 'मेरे पिता के कितने ही मजदूरों को भोजन से अधिक रोटी मिलती है, और मैं यहाँ भूखा मर रहा हूँ! मैं उठकर अपने पिता के पास जाऊँगा और उससे कहूँगा, पिता जी, मैंने स्वर्ग के विरोध में और आपकी दृष्टि में पाप किया है। अब इस योग्य नहीं रहा कि फिर आपका पुत्र कहलाऊँ। मुझे अपने एक मजदूर के समान रख लीजिए।' तब वह उठकर अपने पिता के पास चला। वह अभी दूर ही था कि उसके पिता ने उसे देखकर तरस खाया, और दौड़कर उसे गले लगाया और चूमा। पुत्र ने उससे कहा, 'पिता जी, मैंने स्वर्ग के विरोध में और आपकी दृष्टि में पाप किया है। अब इस योग्य नहीं रहा कि फिर आपका पुत्र कहलाऊँ।' परन्तु पिता ने अपने दासों से कहा, 'झट अच्छे से अच्छा वस्त्र निकालकर उसे पहनाओ, और उसके हाथ में अँगूठी और पाँवों में जूते पहनाओ। और पला हुआ बछड़ा लाकर मारो ताकि हम खाएँ और आनन्द मनाएँ, क्योंकि मेरा यह पुत्र मर गया था, फिर जी गया है; खो गया था, अब मिल गया है!' तब वे आनन्द मनाने लगे।"

(लूका 15:11-24।) निश्चय ही ये मन फिराव के लिए बड़े प्रोत्साहन हैं। मैं फिर कहता हूँ, मन फिराव के विषय में अब और संदेह न कीजिए।

(ङ) अन्त में सुनिए कि पश्चाताप करनेवाले लोगों पर परमेश्वर की दया और कृपा के कैसे अद्भुत उदाहरण परमेश्वर के वचन में हैं। दाऊद की कथा पढ़िए। दाऊद के पाप से बड़ा पाप और कौन सा हो सकता है? परन्तु जब दाऊद ने प्रभु की ओर फिरकर कहा, "मैंने यहोवा के विरुद्ध पाप किया है," तब उत्तर आया, "यहोवा ने तेरा पाप दूर किया है।" मनश्शे की कथा पढ़िए। उससे बड़ी दुष्टता और कौन सी हो सकती थी? उसने अपने ही पुत्रों को मार डाला। उसने अपने पिता के परमेश्वर से मुँह मोड़ लिया। उसने मन्दिर में मूरतें स्थापित कीं। फिर भी, जब मनश्शे बन्दीगृह में था और उसने अपने आप को दीन किया और प्रभु से प्रार्थना की, तब प्रभु ने उसकी प्रार्थना सुनी और उसे बन्धुआई से निकाल लाया। पतरस का इतिहास पढ़िए। उससे बड़ा विश्वासघात और कौन सा हो सकता था? उसने शपथ खाकर अपने स्वामी का तीन बार इन्कार किया! फिर भी, जब पतरस फूट-फूटकर रोया और अपने पाप पर शोक किया, तब पतरस पर भी दया हुई, और पश्चाताप करनेवाला पतरस अपने स्वामी के अनुग्रह में फिर लौटा लिया गया। पश्चाताप करनेवाले डाकू की कथा पढ़िए। उससे अधिक निराशाजनक दशा और किसकी हो सकती थी? वह मरता हुआ मनुष्य था, नरक के कगार पर। फिर भी जब उसने यीशु से कहा, "हे प्रभु, जब तू अपने राज्य में आए, तो मुझे स्मरण करना," तब तुरन्त वह अद्भुत उत्तर आया, "मैं तुझ से सच कहता हूँ, आज ही तू" (हाँ, तू भी) "मेरे साथ स्वर्गलोक में होगा।" (2 शमूएल 12:13; 2 इतिहास 33:1-19; मरकुस 16:7; लूका 23:39-43।)

मन फिराव के लिए इससे बड़े प्रोत्साहन की कल्पना या धारणा और क्या हो सकती है? ये सब उदाहरण हमारी शिक्षा के लिए क्यों लिखे गए हैं? ये इसलिए हैं कि लोगों को मन फिराव की ओर ले जाएँ। ये सब परमेश्वर की धीरजवन्तता के नमूने हैं, परमेश्वर की दया के नमूने हैं, पश्चाताप करनेवाले पापियों को ग्रहण करने की परमेश्वर की इच्छा के नमूने हैं। ये इस बात के प्रमाण हैं कि परमेश्वर का अनुग्रह क्या कर सकता है। ये गवाहों के एक बड़े बादल के समान हैं, जो प्रमाणित करते हैं कि मनुष्य का मन फिराना सार्थक है, कि परमेश्वर की ओर फिरने के लिए मनुष्य को प्रोत्साहन है, और जो अब भी अपने पापों में बना रहता है, वह पूर्णतः निरुत्तर है। "परमेश्वर की भलाई तुझे मन फिराव को सिखाती है।" (रोमियों 2:4।)

मुझे एक माता के विषय में सुनना याद है जिसकी बेटी उसके पास से भाग गई और पाप का जीवन बिताने लगी। बहुत समय तक कोई नहीं बता सका कि वह कहाँ है। फिर भी वह बेटी लौट आई और उसे फिर से अपना लिया गया। वह सच्चे मन से पछतानेवाली हो गई। उसे पाप पर विलाप करना सिखाया गया। वह मसीह की ओर फिरी और उस पर विश्वास किया। पुरानी बातें बीत गईं, और सब कुछ नया हो गया। एक दिन उसकी माता से पूछा गया कि उसने अपनी बेटी को वापस लाने के लिये क्या किया था। उसने कौन-से साधन अपनाए? कौन-से कदम उठाए? उसका उत्तर बहुत ही प्रभावशाली था। उसने कहा, "मैं रात-दिन उसके लिये प्रार्थना करती रही।" परन्तु बात यहीं समाप्त नहीं हुई। वह आगे कहने लगी, "मैं रात को कभी अपने सामने का द्वार बिना खुला छोड़े और सिटकिनी पर रखे नहीं सोई। मैंने सोचा कि यदि मेरी बेटी किसी रात लौटे जब मैं सोई हुई हूँ, तो वह कभी यह न कह सके कि उसने द्वार बन्द पाया। वह कभी यह न कह सके कि वह अपनी माँ के घर आई—परन्तु भीतर न आ सकी।" और ऐसा ही हुआ। उसकी बेटी एक रात लौट आई, और द्वार को हाथ लगाया, तो द्वार खुला पाया, और तुरन्त भीतर आ गई, ताकि फिर कभी पाप न करे। उस खुले द्वार ने उसकी आत्मा को बचा लिया।

वह खुला द्वार पापियों के प्रति परमेश्वर के हृदय का कितना सुन्दर चित्र है! दया का द्वार पूरा खुला पड़ा है। द्वार पर अभी ताला नहीं लगा है। द्वार सदा सिटकिनी पर ही रहता है। परमेश्वर का हृदय प्रेम से भरा है। परमेश्वर का हृदय करुणा से भरा है। मनुष्य चाहे कोई भी रहा हो, और चाहे कैसा भी रहा हो, आधी रात को, किसी भी समय, जब कभी वह परमेश्वर के पास लौटेगा, परमेश्वर को उसे ग्रहण करने के लिये तैयार, उसे क्षमा करने के लिये तत्पर, और उसे घर में पाकर आनन्दित पाएगा। सब कुछ तैयार है। जो कोई चाहे, भीतर आ सकता है।

और उन लाखों में से जो परमेश्वर की ओर फिरे और मन फिराया, किसने कभी मन फिराव पर पछतावा किया? मैं निडर होकर उत्तर देता हूँ, एक ने भी नहीं! हर वर्ष हजारों लोग मूर्खता और अविश्वास पर पछताते हैं। हजारों बिताए हुए समय पर विलाप करते हैं। हजारों अपनी मतवालेपन, जुए, व्यभिचार, शपथों, आलस्य और गँवाए हुए अवसरों पर खेद करते हैं। परन्तु किसी ने कभी उठकर संसार के सामने यह घोषणा नहीं की कि उसे मन फिराने और परमेश्वर की ओर फिरने का पछतावा है। जीवन के सकरे मार्ग के सब कदम एक ही दिशा में हैं। उस सकरे मार्ग में आप कभी किसी ऐसे मनुष्य के पग-चिह्न नहीं देखेंगे जो इसलिये लौट गया हो कि सकरा मार्ग अच्छा नहीं था।

मुझे एक अद्भुत घटना पढ़ना याद है जो उस आराधना-स्थल में घटी जहाँ दो सौ वर्ष पहले एक प्यूरिटन सेवक, श्री डूलिटल, प्रचार कर रहे थे। जैसे ही वे अपना उपदेश आरम्भ करने को थे, उन्होंने एक युवक को, जो अपरिचित था, अपनी कलीसिया में आते देखा। उन्होंने उस युवक के हाव-भाव से अनुमान लगाया कि वह अपनी आत्मा के विषय में चिन्तित है, फिर भी धर्म के विषय में अनिश्चित है। उन्होंने उसके साथ एक अनोखा मार्ग अपनाया। उन्होंने एक विचित्र प्रयोग किया—परन्तु परमेश्वर ने उसे उस युवक की आत्मा के लिये आशीषमय ठहराया। अपना पाठ बताने से पहले श्री डूलिटल एक वृद्ध मसीही की ओर मुड़े जिसे उन्होंने अपनी कलीसिया के एक ओर देखा। उन्होंने उसे नाम लेकर पुकारा और कहा, "भाई, क्या तुम्हें परमेश्वर की सेवा करने का पछतावा है?" वह वृद्ध मसीही मण्डली के सामने साहस के साथ खड़ा हुआ और बोला, "श्रीमान, मैंने अपनी जवानी से प्रभु की सेवा की है, और उसने मेरे साथ भलाई के सिवा कभी कुछ नहीं किया।" वे बाईं ओर मुड़े, जहाँ उन्होंने एक और मसीही को देखा, और उसे भी उसी प्रकार सम्बोधित किया। उन्होंने उसका नाम लेकर कहा, "भाई, क्या तुम्हें मसीह की सेवा करने का पछतावा है?" वह मनुष्य भी मण्डली के सामने साहस के साथ खड़ा हुआ और बोला, "श्रीमान, जब तक मैंने क्रूस नहीं उठाया और प्रभु यीशु मसीह की सेवा नहीं की, तब तक मैं सचमुच कभी सुखी नहीं था।" तब श्री डूलिटल उस युवक की ओर मुड़े और कहा, "जवान, क्या तू मन फिराएगा? जवान, क्या तू क्रूस उठाएगा? जवान, क्या तू आज ही से मसीह की सेवा आरम्भ करेगा?" परमेश्वर ने इन शब्दों के साथ सामर्थ्य भेजी। वह युवक मण्डली के सामने खड़ा हुआ और दीन स्वर में बोला, "हाँ श्रीमान, मैं करूँगा।" वही दिन उस युवक की आत्मा में अनन्त जीवन का आरम्भ था। हम निश्चित मान सकते हैं कि उस दिन श्री डूलिटल को जो दो उत्तर मिले, वही सब सच्चे मसीहियों का अनुभव है।

हम पूरी तरह निश्चित हो सकते हैं कि किसी मनुष्य ने कभी मन फिराव पर पछतावा नहीं किया। किसी मनुष्य को कभी इस बात का खेद नहीं हुआ कि उसने प्रभु की सेवा की। किसी ने अपने जीवन के अन्त में कभी यह नहीं कहा, "मैंने अपनी बाइबल बहुत अधिक पढ़ी, मैंने परमेश्वर के विषय में बहुत अधिक सोचा, मैंने बहुत अधिक प्रार्थना की, मैं अपनी आत्मा के विषय में बहुत अधिक चिन्तित रहा।" अरे नहीं! परमेश्वर के लोग सदा यही कहेंगे, "यदि मुझे अपना जीवन फिर से जीना हो, तो मैं परमेश्वर के साथ उससे कहीं अधिक निकटता से चलूँगा जितना मैं अब तक चला हूँ। मुझे खेद है कि मैंने परमेश्वर की सेवा और अच्छी रीति से नहीं की—परन्तु मुझे इस बात का खेद नहीं कि मैंने उसकी सेवा की। मसीह के मार्ग में क्रूस हो सकता है। परन्तु वह आनन्द का मार्ग और शान्ति की डगर है।" निश्चय ही यह तथ्य अपने आप में बहुत कुछ कह देता है। यह वह तथ्य है जो मेरे अब तक दिये गये हर तर्क पर मुहर लगा देता है। निश्चय ही मनुष्य के लिये मन फिराना सार्थक है। प्रोत्साहन हैं। मन न फिरानेवाले मनुष्य के पास कोई बहाना नहीं है।

और अब मैंने अपने पाठकों के सामने वे तीन बातें रख दी हैं जिन पर विचार करने का प्रस्ताव मैंने इस निबन्ध के आरम्भ में रखा था। मैंने आपको परमेश्वर की ओर मन फिराव का स्वरूप, मन फिराव की आवश्यकता, और मन फिराव के लिये प्रोत्साहन दिखाए हैं। अब केवल इतना शेष है कि इस निबन्ध का समापन उन सब की आत्माओं के लिये, जो इसे पढ़ते हैं, कुछ व्यावहारिक और स्नेहपूर्ण उपयोग के शब्दों से करूँ।

(1) मेरा पहला शब्द चेतावनी का शब्द होगा। यह पुस्तक जिस किसी मन फिराव न करनेवाली आत्मा के हाथ में पड़े, उसे मैं स्नेहपूर्वक चेतावनी देता हूँ। मैं क्षण भर के लिये भी यह नहीं मान सकता कि इसके पन्ने पढ़नेवाले सब लोग परमेश्वर की ओर सचमुच मन फिरानेवाले और यीशु मसीह में जीवित विश्वासी हैं। मैं ऐसा सोचने का साहस नहीं करता। मैं ऐसा सोच नहीं सकता। और मेरा पहला शब्द चेतावनी का शब्द होगा—कोमल, स्नेहपूर्ण चेतावनी, उन सब मन न फिरानेवाले और अपरिवर्तित लोगों के लिये जो संयोग से इस निबन्ध को पढ़ें।

मैं आपको उससे बढ़कर कौन-सी कड़ी चेतावनी दे सकता हूँ जो मेरे पाठ में है? मैं अपने प्रभु और स्वामी के शब्दों से अधिक गम्भीर और हृदय को परखनेवाले कौन-से शब्द काम में ला सकता हूँ, "यदि तुम मन न फिराओगे, तो तुम सब इसी रीति से नाश होगे!" हाँ! आप जो पढ़ रहे हैं, और पढ़ते हुए जानते हैं कि आप अभी परमेश्वर के साथ मेल-मिलाप में नहीं हैं, आप जो ठिठक रहे हैं, देर कर रहे हैं, धर्म के विषय में अनिश्चित हैं—आप ही वह मनुष्य हैं जिसके पास पाठ के शब्द सामर्थ्य के साथ आने चाहिये, "यदि तुम मन न फिराओगे, तो तुम," हाँ तुम भी, "नाश होगे!"

ओह, ये कैसे भयानक शब्द हैं! इनमें जो कुछ समाया है उसका पूरा माप कौन ले सकता है? "नष्‍ट होगे!" देह में नष्‍ट होना—आत्मा में नष्‍ट होना—अन्त में नरक में दुर्दशा के साथ नष्‍ट होना! इस विचार की भयानकता का चित्र खींचने का साहस मैं नहीं करता। वह कीड़ा जो कभी नहीं मरता, वह आग जो कभी नहीं बुझती, सदा के लिए घोर अन्धकार, आशाहीन कारागार, अथाह कुण्ड, आग और गन्धक से जलती हुई झील—ये सब नरक की वास्तविकता के केवल निर्बल प्रतीक हैं। और इसी नरक की ओर सब अपश्‍चातापी लोग प्रतिदिन बढ़ते चले जा रहे हैं! हाँ—गिरजाघरों और उपासनालयों से, धनवानों की हवेलियों और निर्धनों की झोपड़ियों से, ज्ञान, धन और प्रतिष्ठा के बीच से भी—वे सब जो मन नहीं फिराएँगे, निश्‍चय ही नरक की ओर बढ़ रहे हैं। "यदि तुम मन न फिराओगे तो तुम सब नष्‍ट होगे!"

सोचो कि तुम्हारा संकट कितना बड़ा है! तुम्हारे पाप कहाँ हैं, तुम्हारे बहुत से पाप? तुम जानते हो कि तुम पापी हो। तुम्हें इसका भान अवश्य होगा। यह दिखावा करना व्यर्थ है कि तुमने कोई पाप नहीं किया। और यदि तुमने अब तक मन नहीं फिराया, पाप के लिए शोक नहीं किया, पाप को अंगीकार नहीं किया, मसीह की ओर नहीं भागे, और मसीह के लहू के द्वारा क्षमा नहीं पाई, तो तुम्हारे पाप कहाँ हैं? ओह, अपने विषय में सावधान हो जाओ। गड्ढा तुम्हारे लिए अपना मुँह खोले हुए है। शैतान तुम्हारे विषय में कह रहा है, "वह मेरा होगा!" अपने विषय में सावधान हो जाओ। पाठ के वचन स्मरण रखो, "यदि तुम मन न फिराओगे तो तुम सब इसी रीति से नष्‍ट होगे।" ये मेरे शब्द नहीं हैं—मसीह के शब्द हैं। यह मेरा कहना नहीं है—मसीह का कहना है। मसीह कहता है। दयालु मसीह, अनुग्रहकारी मसीह कहता है, "यदि तुम मन न फिराओगे तो निश्‍चय ही नष्‍ट होगे।"

फिर अपने दोष पर विचार करो। हाँ, मैं सोच-समझकर कहता हूँ, अपने दोष पर विचार करो। जब मनुष्य मन नहीं फिराता तो यह दोष है। मन फिराने के विषय में हम परमेश्वर के सामने उत्तरदायी और जवाबदेह हैं। यह कहना व्यर्थ है कि हम नहीं हैं। पौलुस एथेन्सवासियों से क्या कहता है, "परमेश्वर सब मनुष्यों को हर जगह मन फिराने की आज्ञा देता है।" (प्रेरितों के काम 17:30।) हमारा प्रभु खुराजीन और बैतसैदा के विषय में क्या कहता है? वे इतने दोषी क्यों थे? नरक में उनकी दशा इतनी असह्य क्यों होनी थी? इसलिए कि उन्होंने मन नहीं फिराया और विश्वास नहीं किया। यह परमेश्वर के पुत्र की स्पष्ट साक्षी है कि जो अपश्‍चातापी मनुष्य मन फिराने के लिए बुलाया गया और जिसने बुलावे को मानने से इनकार किया, वह उस मनुष्य से अधिक दोषी है जिससे कभी मन फिराने का आग्रह नहीं किया गया।

अपश्‍चातापी बने रहने की मूर्खता पर विचार करो! हाँ, मैं कहता हूँ मूर्खता। जिस संसार से तुम चिपके हुए हो वह तुम्हारे पाँवों तले अभी से पिघल रहा है। आनेवाले जीवन में बैंक-नोट तुम्हारे किस काम आएँगे? सौ वर्ष बाद तुम्हारे सोने का तुम्हारे लिए क्या मूल्य होगा? जब तुम्हारी अन्तिम घड़ी आएगी, तब यदि तुम अपश्‍चातापी मरो तो पृथ्वी भर का सोना भी तुम्हारे लिए क्या कर सकेगा? सम्भव है तुम अभी संसार के लिए जीते हो। तुम व्यापार में सफल होने के लिए कठोर और उग्र परिश्रम करते हो। तुम भूमि में भूमि जोड़ने या कोष में पूँजी जमा करने के लिए समुद्र और थल का चक्कर लगाते हो। तुम धन कमाने, सम्पत्ति बटोरने, अपने को सुख-सुविधा में रखने, आनन्द पाने और मरते समय पत्नी-बच्चों के लिए कुछ छोड़ जाने के लिए जो कुछ बन पड़ता है करते हो। परन्तु ओह, स्मरण रखो! स्मरण रखो, यदि तुम्हारे पास परमेश्वर का अनुग्रह और सच्चा मन फिराव नहीं है, तो तुम परमेश्वर की दृष्‍टि में कंगाल हो, भिखारी हो।

कुछ वर्ष पहले जब मैंने उस भयानक जहाज़ी दुर्घटना, 'सेण्ट्रल अमेरिका' के डूबने, का समाचार पढ़ा तो मेरे अपने मन पर जो प्रभाव पड़ा उसे मैं कभी नहीं भूलूँगा—यह एक बड़ा भाप-जहाज़ था जो हवाना से न्यूयॉर्क की यात्रा में डूब गया। वह जहाज़ कैलिफ़ोर्निया से तीन-चार सौ सोना खोदनेवालों को घर ला रहा था। उन सब ने अपना सोना पा लिया था और घर लौट रहे थे, यह सोचकर कि अपने ही देश में अपने अन्तिम दिन चैन से बिताएँगे। परन्तु मनुष्य योजना बनाता है—और परमेश्वर निर्णय करता है।

सेण्ट्रल अमेरिका के हवाना से चलने के लगभग चौबीस घण्टे बाद एक भारी तूफ़ान उठा। लगातार तीन-चार ऊँची लहरें जहाज़ से टकराईं और उसे गम्भीर क्षति पहुँचाई। इंजन बिगड़कर बेकार हो गए और जहाज़ उफनते समुद्र में इधर-उधर उछलने लगा। उसमें छेद हो गया और हर प्रयत्न के बावजूद जहाज़ में पानी भरने लगा। और कुछ समय बाद, जब जहाज़ पर सबने पम्प किया और पानी उलीचा, उलीचा और पम्प किया, यहाँ तक कि थककर चूर हो गए, तब यह स्पष्ट हो गया कि सेण्ट्रल अमेरिका अपने तीन-चार सौ यात्रियों और सारे कर्मचारियों समेत गहरे, गहरे समुद्र में डूबने वाला है और लगभग सब को अपने साथ ले जाएगा। कर्मचारियों ने अपनी एकमात्र नावें उतारीं। उन्होंने स्त्री यात्रियों को इन नावों में बैठाया और उन्हें चलाने के लिए केवल आवश्यक संख्या में मल्लाह रखे। ऐसे समय में निर्बलों और असहायों के प्रति उनकी इस दयालुता के लिए उन्हें सब सम्मान मिले! नावें जहाज़ से चल पड़ीं; परन्तु जब सेण्ट्रल अमेरिका डूबा तब दो-तीन सौ लोग पीछे रह गए, जिनमें बहुत से सोना खोदनेवाले थे। जो स्त्रियों को ले जानेवाली अन्तिम नावों में से एक में जहाज़ से निकला, उसने बताया कि जब सब आशा जाती रही और बड़ा जहाज़ डूबने ही वाला था तब जहाज़ के केबिन में उसने क्या देखा। लोगों ने अपना सोना निकाल लिया। एक ने चमड़े की थैली पकड़े हुए, जिसमें उसकी लम्बे परिश्रम की कमाई थी, कहा, "लो—जिसे चाहिए ले ले! जिसे चाहिए ले ले। अब यह मेरे किसी काम का नहीं—जहाज़ डूब रहा है। जिसे चाहिए ले ले।" औरों ने अपना सोना निकालकर चारों ओर बिखेर दिया। "लो," उन्होंने कहा, "लो—जिसे चाहिए ले ले! हम सब डूब रहे हैं। हमारे लिए अब कोई आशा नहीं। सोना हमारे किसी काम का नहीं!"

ओह, जब मनुष्य परमेश्वर के निकट पहुँचता है तब धन की सचमुच व्यर्थ प्रकृति पर यह कितनी बड़ी टिप्पणी है! "क्रोध के दिन धन से तो कुछ लाभ नहीं होता, परन्तु धार्मिकता मृत्यु से बचाती है।" (नीतिवचन 11:4।) अपनी मूर्खता पर विचार करो—यदि तुम अपने पापों से चिपके रहोगे तो तुम्हारी मूर्खता भी और तुम्हारा संकट भी, तुम्हारी मूर्खता भी और तुम्हारा दोष भी। यदि तुम आज मेरी दी हुई चेतावनी न सुनोगे तो अपनी मूर्खता पर विचार करो। अपने स्वामी के नाम से मैं तुमसे एक बार फिर कहता हूँ, "यदि तुम मन न फिराओगे," तो तुम, हाँ तुम भी जो यह पत्र पढ़ रहे हो, "इसी रीति से नष्‍ट होगे!"

(2) मेरा दूसरा उपयोगी वचन उन सब के लिए एक निमन्त्रण होगा जो अपने पापों को अनुभव करते हैं और मन फिराना चाहते हैं, फिर भी नहीं जानते कि क्या करें। मैं इसे खुलकर और पूरे मन से उन सब को देता हूँ जो मुझसे पूछते हैं, "यदि मुझे आपकी सलाह माननी है तो आज ही मैं क्या करूँ?" मैं इस प्रश्न का उत्तर बिना किसी झिझक के देता हूँ। मैं अपने स्वामी के नाम से तुमसे कहता हूँ, मन फिराओ, मन फिराओ, मन फिराओ—आज ही मन फिराओ। बिना देर किए मन फिराओ।

मुझे यह कहने में कोई कठिनाई नहीं। मैं उन लोगों से सहमत नहीं हो सकता जो कहते हैं कि अपरिवर्तित लोगों से मन फिराने या प्रार्थना करने को नहीं कहना चाहिए। मैं पाता हूँ कि प्रेरित पतरस शमौन जादूगर से कहता है, "अपनी इस बुराई से मन फिरा।" मैं पाता हूँ कि वह कहता है, "प्रभु से प्रार्थना कर, सम्भव है तेरे मन का विचार क्षमा किया जाए।" (प्रेरितों के काम 8:22।) मैं प्रेरित के पदचिह्नों पर चलने में सन्तुष्ट हूँ। मैं हर उस व्यक्ति से यही कहता हूँ जो अपनी आत्मा के विषय में चिन्तित है। मैं कहता हूँ, मन फिराओ, मन फिराओ, बिना देर किए मन फिराओ। वह समय शीघ्र आएगा जब तुम्हें निश्चय करना ही होगा, यदि कभी करना है। आज ही क्यों नहीं? आज रात ही क्यों नहीं? उपदेश सुनने का यह सिलसिला सदा नहीं चल सकता। गिरजाघरों और प्रार्थनालयों में जाने का भी अन्त होना है। इस सेवक को पसन्द करना और उस सेवक को पसन्द करना, इस कलीसिया का सदस्य होना और उस प्रार्थनालय का सदस्य होना, ये मत रखना और वे मत रखना, इस प्रचारक को खरा और उस प्रचारक को खोटा मानना, किसी आत्मा को बचाने के लिए पर्याप्त नहीं है। यदि मनुष्य स्वर्ग जाना चाहता है तो उसे अन्त में सोचने के साथ-साथ कर्म भी करना होगा। यदि मनुष्य नरक में नहीं पड़ना चाहता तो उसे अपने पापों को छोड़कर प्रभु यीशु की ओर भागना होगा। मनुष्य को संसार में से निकलकर क्रूस उठाना होगा। मनुष्य को दृढ़ निश्चय करना, मन फिराना और विश्वास करना होगा। यदि मनुष्य उद्धार पाना चाहता है तो उसे अपना रंग प्रकट करना और प्रभु यीशु मसीह के पक्ष में खड़ा होना होगा। और यह सब आज ही आरम्भ क्यों न करो? ओह, मन फिराओ, मन फिराओ, बिना देर किए मन फिराओ!

क्या तुम फिर पूछते हो कि तुम्हें क्या करना चाहिए? मैं तुमसे कहता हूँ, जाओ और आज ही प्रभु यीशु मसीह को पुकारो। जाओ और अपना मन उसके सामने उँडेल दो। जाओ और उसे बताओ कि तुम क्या हो, और उसे बताओ कि तुम क्या चाहते हो। उससे कहो कि तुम पापी हो; वह तुमसे लज्जित नहीं होगा। उससे कहो कि तुम उद्धार पाना चाहते हो; वह तुम्हारी सुनेगा। उससे कहो कि तुम निर्बल प्राणी हो; वह तुम्हारी ओर कान लगाएगा। उससे कहो कि तुम नहीं जानते कि क्या करो या मन कैसे फिराओ; वह तुम्हें अपना अनुग्रह देगा। वह अपना आत्मा तुम पर उँडेलेगा। वह तुम्हारी सुनेगा। वह तुम्हारी प्रार्थना पूरी करेगा। वह तुम्हारी आत्मा का उद्धार करेगा। मसीह में सारे संसार की सब आवश्यकताओं के लिए, और हर उस हृदय की आवश्यकताओं के लिए जो अपरिवर्तित, अपवित्र, अविश्वासी, अपश्चातापी और अनवीकृत है, बहुतायत से बल्कि आवश्यकता से अधिक है।

"तुम्हारी आशा क्या है?" एक मनुष्य ने एक गरीब वेल्श लड़के से पूछा, जो अंग्रेज़ी अधिक नहीं बोल सकता था और एक दिन एक सराय में मरता हुआ पाया गया था। "तुम्हारी आत्मा के विषय में तुम्हारी आशा क्या है?" उसका उत्तर क्या था? उसने प्रश्न करनेवाले की ओर मुड़कर टूटी-फूटी अंग्रेज़ी में कहा, "यीशु मसीह सबके लिए बहुत है! यीशु मसीह सबके लिए बहुत है!" उन शब्दों में सत्य की एक खान थी। और एक नहर-मज़दूर ने भी, जो प्रभु में मरा, ठीक ही कहा, "उन सबको बता दो, हर उस मनुष्य को बताओ जिससे तुम मिलो: मसीह हर मनुष्य के लिए है! यीशु मसीह हर मनुष्य के लिए है!" आज ही उस उद्धारकर्ता के पास जाओ और उसे अपनी आत्मा की आवश्यकताएँ बताओ। उस सुन्दर भजन के शब्दों में उसके पास जाओ जो कहता है:

"जैसा हूँ वैसा ही, कोई दलील नहीं, सिवा इसके कि तेरा लहू मेरे लिए बहाया गया,

और तू मुझे अपने पास आने को कहता है, हे परमेश्वर के मेमने, मैं आता हूँ!

"जैसा हूँ वैसा ही, और रुके बिना अपनी आत्मा के एक भी काले धब्बे को मिटाने के लिए, तेरे पास, जिसका लहू हर धब्बे को धो सकता है, हे परमेश्वर के मेमने, मैं आता हूँ!"

उसी आत्मा से प्रभु यीशु के पास जाओ, और वह तुम्हें ग्रहण करेगा। वह तुम्हें अस्वीकार नहीं करेगा। वह तुम्हें तुच्छ नहीं जानेगा। वह तुम्हें क्षमा, शान्ति और अनन्त जीवन देगा, और पवित्र आत्मा का अनुग्रह प्रदान करेगा।

क्या तुम मुझसे पूछते हो कि क्या तुम्हें और भी कुछ करना चाहिए? हाँ! मैं उत्तर देता हूँ। जाओ और हर ज्ञात पाप को छोड़ने का संकल्प करो। जो चाहें ऐसी सलाह को व्यवस्थावादी कहें; मुझे आशा है कि मैं इसे देने से कभी पीछे नहीं हटूँगा। बुराई में बैठे रहना कभी उचित नहीं हो सकता। यशायाह के साथ यह कहना कभी अनुचित नहीं हो सकता, "बुराई करना छोड़ दो।" (यशायाह 1:16।) तुम्हारा पाप चाहे जो हो, परमेश्वर की सहायता से यह संकल्प करो कि कल सवेरे तुम बदले हुए मनुष्य होकर उठोगे और उस पाप को छोड़ दोगे। चाहे वह मद्यपान हो या शपथ खाना, या क्रोध, या झूठ, या छल, या लोभ; तुम्हारा जो भी पाप या दोष हो, परमेश्वर के अनुग्रह से निश्चय करो कि तुम उसे तुरन्त छोड़ दोगे। उसे बिना देर किए त्याग दो, और परमेश्वर की सहायता से अपने शेष जीवन भर उससे मुड़ जाओ। उसे अपने से दूर फेंक दो; वह साँप है जो तुम्हें डसकर मार डालेगा। उसे अपने से फेंक दो; वह बेकार बोझ है, वह जहाज़ को विनाश में डुबो देगा। अपने उलझानेवाले पाप को दूर कर दो, उसे छोड़ दो, उससे मुड़ जाओ, उसे तोड़ डालो। परमेश्वर की सहायता से संकल्प करो कि उस विषय में तुम फिर पाप नहीं करोगे।

पर मुझे लगता है कि इस पुस्तक का कोई पाठक मन फिराव से लज्जित भी हो सकता है। मैं तुमसे विनती करता हूँ कि ऐसी लज्जा को सदा के लिए दूर कर दो। परमेश्वर की ओर मन फिराने से कभी लज्जित न हो। पाप से तुम लज्जित हो सकते हो। झूठ, शपथ, मतवालेपन और जुए से मनुष्य को लज्जित होना चाहिए। परन्तु मन फिराव, प्रार्थना, मसीह में विश्वास, परमेश्वर को खोजने और आत्मा की चिन्ता करने से जब तक जीवित रहो, कभी, कभी लज्जित न हो। मुझे बहुत पहले की एक बात याद है जो मेरी अपनी जानकारी में आई थी, जिससे मुझे कुछ अनुमान हुआ कि मनुष्य का भय क्या कर सकता है। मैं एक मरते हुए मनुष्य की सुधि ले रहा था, जो गार्ड्स में सार्जेंट रह चुका था। उसने शराब पीकर अपना स्वास्थ्य बिगाड़ लिया था। वह अपनी आत्मा के विषय में लापरवाह और विचारहीन मनुष्य रहा था। उसने अपनी मृत्यु-शय्या पर मुझे बताया कि जब उसने पहले-पहल प्रार्थना करना आरम्भ किया तो वह अपनी पत्नी के जान लेने से इतना लज्जित था कि जब वह ऊपर प्रार्थना करने जाता तो जूते उतारकर केवल मोज़ों में चुपके से ऊपर चढ़ता, ताकि उसकी पत्नी को पता न चले कि वह अपना समय कैसे बिता रहा है। सचमुच, मुझे डर है कि उसके जैसे बहुत से लोग हैं! तुम उनमें से एक न बनो। तुम्हें चाहे किसी भी बात से लज्जा आए, परमेश्वर को खोजने से कभी लज्जित न हो।

परन्तु मुझे यह सम्भव लगता है कि इस पुस्तक का कोई पाठक मन फिराने से डरता हो। तुम सोचते हो कि तुम इतने बुरे और अयोग्य हो कि मसीह तुम्हें ग्रहण नहीं करेगा। मैं तुमसे एक बार फिर विनती करता हूँ कि ऐसे भय को सदा के लिये त्याग दो। मन फिराने से कभी, कभी न डरो। प्रभु यीशु मसीह बड़ा अनुग्रहकारी है। वह कुचले हुए नरकट को न तोड़ेगा, और धुँआ देती हुई बत्ती को न बुझाएगा। उसके निकट आने से मत डरो। तुम्हारे लिये एक पाप-स्वीकार का स्थान तैयार है। तुम्हें मनुष्य के बनाए हुए किसी स्थान की आवश्यकता नहीं। अनुग्रह का सिंहासन ही सच्चा पाप-स्वीकार का स्थान है। तुम्हारे लिये एक याजक तैयार है। तुम्हें तुम्हारे और परमेश्वर के बीच खड़े होने के लिये किसी ठहराए हुए मनुष्य की, किसी याजक, अध्यक्ष या सेवक की आवश्यकता नहीं। प्रभु यीशु ही सच्चा महायाजक है। उसके समान न कोई बुद्धिमान है, न कोई प्रेम करनेवाला। उसके सिवा कोई तुम्हें क्षमा-दान नहीं दे सकता, और हल्के मन से तथा पूर्ण शान्ति के साथ तुम्हें विदा नहीं कर सकता। आह, जो निमन्त्रण मैं तुम्हारे पास लाया हूँ उसे ग्रहण करो। किसी बात से मत डरो। मसीह कोई "कठोर मनुष्य" नहीं है। वह "किसी को तुच्छ नहीं जानता।" (अय्यूब 36:5।) आज ही उठो और उसकी ओर भागो। बिना विलम्ब किये आज ही रात मसीह के पास जाओ और मन फिराओ।

(3) मेरा अन्तिम उपयोग-वचन उन सब के लिये एक उपदेश है जो अनुभव से जानते हैं कि मन फिराव क्या है। मैं उन सब से कहता हूँ जिन्होंने परमेश्वर के अनुग्रह से अपने पापों को अनुभव किया, अपने पापों के लिये शोक किया, अपने पाप मान लिये, अपने पापों को छोड़ दिया, और यीशु मसीह के लहू में शान्ति पाई है। मैं तुमसे इसके सिवा और क्या कहूँ कि अपने मन फिराव को बनाए रखो! अपने मन फिराव को बनाए रखो। यह तुम्हारे मन की ऐसी आदत हो जिसकी तुम अपने जीवन के अन्तिम दिन तक चौकसी करते रहो। यह ऐसी आग हो जिसे तुम कभी धीमी या मन्द न होने दो। यदि तुम जीवन से प्रेम रखते हो तो अपने मन फिराव को बनाए रखो।

मैं नहीं चाहता कि तुम मन फिराव को ही मसीह बना लो, या उसे अपनी आत्मा के लिये बन्धन बना दो। मैं तुमसे यह नहीं कहता कि अपने धर्मी ठहराए जाने की मात्रा को अपने मन फिराव से नापो, या यह मान लो कि तुम्हारे पाप क्षमा नहीं हुए क्योंकि तुम्हारा मन फिराव अधूरा है। धर्मी ठहराया जाना एक बात है और मन फिराव दूसरी। जो बातें भिन्न हैं उन्हें आपस में न मिलाओ। केवल विश्वास ही धर्मी ठहराता है। केवल विश्वास ही मसीह को थामता है। परन्तु इतने पर भी अपने मन फिराव की सतर्कता से रखवाली करो। उसे बनाए रखो, बनाए रखो, और आग को मन्द न होने दो। जब कभी तुम अपनी आत्मा पर शिथिलता आती देखो, जब कभी तुम अपने को सुस्त, मन्द, भारी, ठंडा और छोटे पापों के विषय में लापरवाह पाओ, तब अपने ही हृदय को देखो, और चौकस रहो कि कहीं गिर न पड़ो। अपनी आत्मा से कहो, "हे मेरे प्राण, तू क्या कर रहा है? क्या तू दाऊद का गिरना भूल गया? क्या तू पतरस का भटक जाना भूल गया? क्या तू दाऊद का उसके बाद का दुःख भूल गया? क्या तू पतरस के आँसू भूल गया? जाग, हे मेरे प्राण, एक बार फिर जाग। ईंधन डाल, आग को प्रज्वलित कर। अपने परमेश्वर की ओर फिर लौट, तेरा मन फिराव फिर से जीवित हो। अपने मन फिराव के लिये फिर से मन फिरा।" हाय, एक मसीही के सर्वोत्तम दिनों में भी ऐसे घण्टे कितने कम होते हैं जिनमें वह "मन फिराव के लिये काम नहीं बनाता!"

अपने जीवन के अन्तिम दिन तक अपने मन फिराव को बनाए रखो। सदा ऐसे पाप होंगे जिन पर शोक करना है, और ऐसी निर्बलताएँ होंगी जिन्हें मानना है। उन्हें प्रतिदिन प्रभु यीशु मसीह के पास ले जाओ, और उससे प्रतिदिन दया और अनुग्रह की आपूर्ति पाओ। प्रतिदिन उस महान महायाजक के सामने अपने पाप मानो, और उससे प्रतिदिन क्षमा-दान पाओ। प्रतिदिन फसह के मेम्ने को खाओ। परन्तु यह कभी न भूलो कि उसे कड़वे सागपात के साथ खाना था। एक जवान ने फिलिप हेनरी से पूछा, "महाशय, मनुष्य को कब तक मन फिराते रहना चाहिये?" बूढ़े फिलिप हेनरी ने क्या उत्तर दिया? "महाशय, मैं आशा करता हूँ कि अपने मन फिराव को स्वर्ग के फाटकों तक ले जाऊँगा। प्रतिदिन मैं अपने को पापी पाता हूँ, और प्रतिदिन मुझे मन फिराने की आवश्यकता है। परमेश्वर की सहायता से मैं अपने मन फिराव को स्वर्ग के फाटकों तक ले जाने का निश्चय रखता हूँ।"

यही हमारा धर्मविज्ञान हो, तुम्हारा धर्मविज्ञान, मेरा धर्मविज्ञान; तुम्हारी ईश्वर-विद्या, मेरी ईश्वर-विद्या! परमेश्वर की ओर मन फिराव और हमारे प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास, हमारे धर्म के मन्दिर के सामने के दो बड़े खम्भे हों, हमारी मसीही प्रणाली के कोने के पत्थर हों! (2 इतिहास 3:17।) ये दोनों कभी अलग न हों! हम मन फिराते हुए विश्वास करें, और विश्वास करते हुए मन फिराएँ! और मन फिराव और विश्वास, विश्वास और मन फिराव, हमारी आत्माओं के विश्वास-वचन में सदा सर्वोपरि, अग्रणी और प्रमुख तथा मुख्य अंग बने रहें!

बचाने में मसीह की सामर्थ्य

"इसलिये जो उसके द्वारा परमेश्वर के पास आते हैं, उन्हें वह पूरी रीति से उद्धार कर सकता है, क्योंकि वह उनके लिये बिनती करने को सर्वदा जीवित है।" इब्रानियों 7:25

धर्म में एक विषय ऐसा है जिसके विषय में हम कभी बहुत अधिक नहीं जान सकते। वह विषय प्रभु यीशु मसीह है। यही महान विषय है जिसे इस पृष्ठ के शीर्ष का पद खोलता है: यीशु मसीह, और यीशु मसीह की मध्यस्थता की प्रार्थना।

मैंने एक पुस्तक के विषय में सुना है जिसका नाम था "बिना अन्त की कहानी।" मैं कोई कहानी नहीं जानता जो इस नाम के योग्य उतनी हो जितना सनातन सुसमाचार; यही सचमुच और सत्य में बिना अन्त की कहानी है। मसीह में एक असीम "परिपूर्णता" है। उसमें "अगम धन" है। उसमें एक "ऐसा प्रेम है जो ज्ञान से परे है।" वह एक "वर्णन से बाहर दान" है। (कुलुस्सियों 1:19; इफिसियों 3:8; 3:19; 2 कुरिन्थियों 9:15।) उन सब धनों का कोई अन्त नहीं जो उसमें संचित हैं: उसके व्यक्तित्व में, उसके कार्य में, उसके पदों में, उसके वचनों में, उसके कामों में, उसके जीवन में, उसकी मृत्यु में, उसके पुनरुत्थान में। आज मैं इस महान विषय की केवल एक शाखा लेता हूँ। मैं हमारे प्रभु यीशु मसीह की मध्यस्थता की प्रार्थना और उसके याजक-पद पर विचार करने जा रहा हूँ।

इस लेख के शीर्ष के पद को खोलते हुए मैं तीन बातों की जाँच करना चाहता हूँ।

I. यहाँ तुम्हें सब सच्चे मसीहियों का वर्णन मिलता है: वे ऐसे लोग हैं जो "मसीह के द्वारा परमेश्वर के पास आते हैं"

II. यहाँ तुम्हें वह कार्य मिलता है जो यीशु मसीह सच्चे मसीहियों के पक्ष में सदा करता रहता है: वह "उनके लिये बिनती करने को सर्वदा जीवित है।"

III. यहाँ तुम्हें वह सुखदायक निष्कर्ष मिलता है जो पौलुस ने मसीह की मध्यस्थता की प्रार्थना के कार्य पर खड़ा किया है। वह कहता है, "जो उसके द्वारा परमेश्वर के पास आते हैं, उन्हें वह पूरी रीति से उद्धार कर सकता है, क्योंकि वह उनके लिये बिनती करने को सर्वदा जीवित है।"

I. पहले, आपके सामने सब सच्चे मसीहियों का एक वर्णन है। यह अत्यन्त सरल, अत्यन्त सुन्दर और अत्यन्त सच्चा है। पवित्र आत्मा द्वारा दिए गए मसीही के वर्णन और मनुष्य द्वारा दिए गए वर्णन में कितना बड़ा अन्तर है! मनुष्य के लिए प्रायः यह कह देना ही पर्याप्त होता है कि अमुक व्यक्ति "कलीसिया जाता है," या अमुक व्यक्ति "मसीहियों के इस दल का या उस दल का है।" जब पवित्र आत्मा चित्र खींचता है तब ऐसा नहीं होता। पवित्र आत्मा मसीही को ऐसे मनुष्य के रूप में वर्णित करता है जो "मसीह के द्वारा परमेश्वर के पास आता है।"

सच्चे मसीही परमेश्वर के पास आते हैं। वे उन बहुतों के समान नहीं हैं जो उससे पीठ फेर लेते हैं—जो उड़ाऊ पुत्र के समान "दूर देश चले जाते हैं," जो कैन के समान "यहोवा के सम्मुख से निकल जाते हैं,"—जो "बुरे कामों के कारण मन से पराए और बैरी" हैं। (कुलुस्सियों 1:21।) वे परमेश्वर से मेल-मिलाप किए हुए और परमेश्वर के मित्र हैं। वे उन बहुतों के समान नहीं हैं जिन्हें परमेश्वर की हर वस्तु अप्रिय लगती है—उसका वचन, उसका दिन, उसकी विधियाँ, उसके लोग, उसका भवन। वे अपने स्वामी की हर वस्तु से प्रेम करते हैं। उसके पाँवों के चिन्ह भी उन्हें प्रिय हैं। "तेरा नाम उंडेले हुए सुगन्ध-द्रव्य के समान है।" (श्रेष्ठगीत 1:3।) वे उन बहुतों के समान नहीं हैं जो कलीसिया में आने, या प्रार्थनालय में आने, या प्रभु-भोज की मेज़ पर आने से ही सन्तुष्ट हो जाते हैं। वे इससे आगे जाते हैं। वे "परमेश्वर के पास आते हैं," और परमेश्वर की सहभागिता में जीवन बिताते हैं।

परन्तु इससे भी बढ़कर, सच्चे मसीही एक विशेष रीति से परमेश्वर के पास आते हैं। वे मसीह के द्वारा परमेश्वर के पास आते हैं—कोई और विनती नहीं करते, कोई और नाम नहीं लेते, किसी और धार्मिकता पर भरोसा नहीं रखते, इसके सिवाय किसी और नींव पर नहीं टिकते कि यीशु उनकी आत्माओं के लिए जिया, यीशु उनके लिए मरा, यीशु उनके लिए फिर जी उठा।

"मैं पापियों में सबसे बड़ा पापी हूँ, पर यीशु मेरे लिए मरा!"

सच्चा मसीही इसी मार्ग से परमेश्वर के निकट आता है।

जिस मार्ग की मैं चर्चा कर रहा हूँ वह एक पुराना मार्ग है। यह लगभग 6,000 वर्ष पुराना है। जितनों का भी कभी उद्धार हुआ है, सब इसी मार्ग से परमेश्वर के निकट आए हैं। "कोई मसीह के बिना पिता के पास नहीं आता।" (यूहन्ना 14:6।)

यह एक अच्छा मार्ग है। संसारी बुद्धिमानों के लिए इसका उपहास और तिरस्कार करना सहज है। परन्तु मनुष्य की सारी चतुराई और बुद्धि ने कभी इससे अधिक सिद्ध, हमारी आवश्यकताओं के अधिक अनुकूल, और हर उचित तथा निष्पक्ष जाँच में अधिक खरा उतरनेवाला कोई मार्ग नहीं निकाला। यह यहूदियों के लिए ठोकर का कारण और यूनानियों के लिए मूर्खता रहा है। परन्तु जिन्होंने अपने हृदय को जाना और समझा कि परमेश्वर क्या माँगता है, उन्होंने यीशु मसीह के द्वारा बने मार्ग को अच्छा मार्ग पाया, और ऐसा मार्ग जो अपनी बुद्धिमत्ता के विषय में की जा सकनेवाली हर पूरी जाँच में खरा उतरता है। उसमें वे दया और सत्य को आपस में मिलते, धार्मिकता और शान्ति को आपस में चूमते देखते हैं—परमेश्वर पवित्र परमेश्वर है, फिर भी प्रेमी, कृपालु और दयालु है—मनुष्य अपने को एक दीन, निर्बल पापी जानता है, फिर भी साहस के साथ परमेश्वर के निकट आता है, भरोसे के साथ पहुँच पाता है, निडर होकर उसके मुख की ओर देखता है, और उसे मसीह में अपना पिता और अपना मित्र देखता है।

और सबसे बढ़कर यह एक परखा हुआ मार्ग है। हज़ारों और लाखों इस पर चले हैं, और उन सबमें से एक भी स्वर्ग से चूका नहीं। प्रेरित, भविष्यद्वक्ता, कुलपिता, शहीद, आरम्भिक पिता, धर्म-सुधारक, प्यूरिटन, हर युग में और हर जाति और भाषा के परमेश्वर के लोग—हमारे अपने दिनों के पवित्र लोग, जैसे सिमियन, बिकरस्टेथ, हैवलॉक—सब इसी मार्ग पर चले हैं। उन्हें अपनी लड़ाइयाँ लड़नी पड़ीं और अपने शत्रुओं का सामना करना पड़ा। उन्हें क्रूस उठाना पड़ा, और अपने मार्ग में सिंह मिले। उन्हें मृत्यु की छाया की तराई से होकर चलना पड़ा, और अपुल्लयोन से जूझना पड़ा। अन्त में उन्हें ठण्डी अँधेरी नदी पार करनी पड़ी; परन्तु वे सुरक्षित पार पहुँचे और आनन्द के साथ स्वर्गीय नगर में प्रवेश किया। और अब वे सब हमारी बाट जोह रहे हैं कि हम उनके पदचिन्हों पर चलें, उनके पीछे आएँ और उनकी महिमा में सहभागी हों।

यही वह मार्ग है जिस पर मैं इस लेख के हर पाठक को चलते देखना चाहता हूँ। मैं चाहता हूँ कि आप "यीशु मसीह के द्वारा परमेश्वर के पास आएँ।" इस विषय में कोई भूल न हो कि सुसमाचार के सच्चे सेवकों का उद्देश्य क्या है। हमें केवल कुछ रीतियों का चक्र पूरा करने के लिए अलग नहीं किया गया है—प्रार्थनाएँ पढ़ने, बपतिस्मा-प्राप्तों को बपतिस्मा देने, दफ़नाए हुओं को दफ़नाने, ब्याहे हुओं का ब्याह कराने के लिए। हमें उस महान उद्देश्य के लिए अलग किया गया है कि हम उस एकमात्र सच्चे जीवित मार्ग का प्रचार करें और आपको उस पर चलने का निमन्त्रण दें। हम चाहते हैं कि परमेश्वर की आशीष से हम आपको मना लें कि आप उस मार्ग पर चलें—उस परखे हुए, अच्छे और पुराने मार्ग पर—और उस "शान्ति को जानें जो समझ से बाहर है," जो केवल उसी मार्ग में मिलती है।

II. अब मैं दूसरे बिन्दु पर आता हूँ जिस पर मैं विचार करना चाहता हूँ। इस लेख के शीर्ष का पद उस कार्य की चर्चा करता है जो प्रभु यीशु मसीह सच्चे मसीहियों की ओर से निरन्तर करता रहता है। मैं इस बिन्दु पर विशेष ध्यान चाहता हूँ। यह हमारी शान्ति और मसीही विश्वास में हमारी आत्माओं को दृढ़ करने के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।

एक बड़ा कार्य है जो प्रभु यीशु मसीह ने पूरा कर दिया और सम्पन्न कर चुका है। वह कार्य प्रायश्चित, बलिदान और प्रतिनिधि बनने का कार्य है। यह वही कार्य है जो उसने तब किया जब उसने "पापों के कारण, अर्थात् अधर्मियों के लिये धर्मी ने दुःख उठाया, ताकि हमें परमेश्वर के पास पहुँचाए।" (1 पतरस 3:18)। उसने हमें पतन के कारण बर्बाद हुआ देखा—बेचारे, खोए हुए, जहाज़ टूटे हुए पापियों का संसार। उसने देखा और उसे हम पर तरस आया; और अनन्त त्रिएकता की अनादि योजनाओं के अनुसार वह हमारे बदले दुःख उठाने और हमें बचाने के लिये संसार में उतर आया। वह स्वर्ग में बैठा दूर से हम पर तरस नहीं खाता रहा। वह किनारे पर खड़ा होकर जहाज़ के टूटने और डूबते हुए बेचारे पापियों को किनारे तक पहुँचने का व्यर्थ संघर्ष करते हुए नहीं देखता रहा। वह स्वयं जल में कूद पड़ा! वह उस टूटे जहाज़ तक उतर आया, और हमारी निर्बलता और दुर्बलता में हमारे साथ सहभागी हुआ, और हमारी आत्माओं को बचाने के लिये मनुष्य बना। मनुष्य के रूप में उसने हमारे पापों को उठाया और हमारे अपराधों का बोझ ढोया। मनुष्य के रूप में उसने वह सब सहा जो मनुष्य सह सकता है, और मनुष्य के अनुभव की हर बात से होकर गुज़रा, केवल पाप को छोड़कर। मनुष्य के रूप में वह जिया; मनुष्य के रूप में वह क्रूस पर गया; मनुष्य के रूप में उसने प्राण दिए। मनुष्य के रूप में उसने अपना लहू बहाया, ताकि वह हम बेचारे जहाज़ टूटे पापियों को बचाए और पृथ्वी और स्वर्ग के बीच सम्बन्ध स्थापित करे! मनुष्य के रूप में वह हमारे लिये श्रापित बना, ताकि वह उस खाई पर पुल बाँधे, और ऐसा मार्ग बनाए जिससे तू और मैं साहस के साथ परमेश्वर के निकट आ सकें, और निडर होकर परमेश्वर तक पहुँच पा सकें। मसीह के इस सारे कार्य में, स्मरण रख, असीम पुण्य था, क्योंकि जिसने यह किया वह केवल मनुष्य ही नहीं—परन्तु परमेश्वर भी था। इसे कभी न भूलना! जिसने हमारा छुटकारा सिद्ध किया वह सिद्ध मनुष्य था; परन्तु वह एक क्षण के लिये भी सिद्ध परमेश्वर होना नहीं छोड़ा।

परन्तु एक और बड़ा कार्य है जो प्रभु यीशु मसीह अब भी कर रहा है। वह कार्य मध्यस्थता की प्रार्थना का कार्य है। प्रायश्चित का पहला कार्य उसने एक ही बार सदा के लिये कर दिया—उसमें कुछ जोड़ा नहीं जा सकता; उसमें से कुछ घटाया नहीं जा सकता। जब मसीह ने क्रूस पर बलिदान चढ़ाया, तब वह एक सम्पन्न और सिद्ध कार्य था। परमेश्वर के मेम्ने ने जब कलवरी पर अपना लहू बहाया, तब जो बलिदान एक बार दिया गया उसके अतिरिक्त और कोई बलिदान चढ़ाने की आवश्यकता नहीं। परन्तु दूसरा कार्य वह निरन्तर परमेश्वर के दाहिने हाथ पर करता रहता है, जहाँ वह अपने लोगों के लिये मध्यस्थता की प्रार्थना करता है। पहला कार्य उसने पृथ्वी पर तब किया जब वह क्रूस पर मरा—दूसरा कार्य वह स्वर्ग में, परमेश्वर पिता के दाहिने हाथ पर करता रहता है। पहला कार्य उसने सारी मानवजाति के लिये किया, और उसका लाभ सारे संसार को देता है। दूसरा कार्य वह केवल और पूरी तरह अपने चुने हुए लोगों, अपने लोगों, अपने विश्वासी सेवकों और अपने बच्चों के लिये करता और पूरा करता है।

हमारा प्रभु यीशु मसीह यह कार्य कैसे करता है? हम मसीह की मध्यस्थता की प्रार्थना का अर्थ कैसे समझें और ग्रहण करें? हमें अनदेखी बातों में उतावली से नहीं झाँकना चाहिए। हमें वहाँ "नहीं घुसना चाहिए जहाँ स्वर्गदूत भी पैर रखने से डरते हैं।" तौभी उस निरन्तर मध्यस्थता की प्रार्थना के स्वभाव का कुछ धुँधला-सा विचार हम पा सकते हैं जिसे मसीह अपने विश्वासी लोगों के लिये करने को सदा जीवित है।

हमारा प्रभु यीशु मसीह अपने लोगों के लिये वही कार्य कर रहा है जो प्राचीन काल में यहूदी महायाजक इस्राएलियों के लिये करता था। वह अपने लोगों और परमेश्वर के बीच सब बातों में प्रबन्धक, प्रतिनिधि और मध्यस्थ का काम कर रहा है। वह उनकी ओर से अपना सिद्ध बलिदान और अपना पर्याप्त पुण्य परमेश्वर पिता के सामने निरन्तर प्रस्तुत करता रहता है। वह अपने दीन, निर्बल सेवकों के लिये, जिन्हें प्रतिदिन के पापों के लिये प्रतिदिन दया और प्रतिदिन की आवश्यकताओं के लिये प्रतिदिन अनुग्रह चाहिए, नई दया और नए अनुग्रह की प्रतिदिन की आपूर्ति निरन्तर प्राप्त करता रहता है। वह उनके लिये निरन्तर प्रार्थना करता है। जैसे उसने पृथ्वी पर शमौन पतरस के लिये प्रार्थना की, वैसे ही, किसी रहस्यमय अर्थ में, मैं विश्वास करता हूँ कि वह अब भी अपने लोगों के लिये प्रार्थना करता है। वह उनके नाम परमेश्वर पिता के सामने प्रस्तुत करता है। वह उनके नाम अपने हृदय पर, जो प्रेम का स्थान है, और अपने कन्धे पर, जो सामर्थ्य का स्थान है, उठाए रहता है—जैसे महायाजक अपने पद के वस्त्र पहनकर इस्राएल के सब गोत्रों के नाम, छोटे से बड़े तक, उठाए रहता था। वह उनकी प्रार्थनाएँ परमेश्वर के सामने प्रस्तुत करता है। वे मसीह की सर्वसमर्थ मध्यस्थता की प्रार्थना में मिलकर परमेश्वर पिता के सामने पहुँचती हैं, और इस प्रकार परमेश्वर की दृष्टि में ग्रहणयोग्य ठहरती हैं। संक्षेप में, वह जीवित है कि पृथ्वी पर अपने सब अंगों का मित्र, पक्षसमर्थक, याजक और सर्वसमर्थ प्रतिनिधि बने। वह ज्येष्ठ भाई के रूप में उनके लिये कार्य करता है; और उनकी आत्माओं को जो कुछ चाहिए, उसके लिये वह स्वर्ग की न्यायसभा में सदा उनकी मध्यस्थता की प्रार्थना करने को जीवित है।

क्या इस लेख के किसी पाठक को मित्र की आवश्यकता है? ऐसे संसार में कितने ही हृदय हैं जिन्हें इस पुकार का उत्तर देना चाहिए! कितने ही हैं जो अनुभव करते हैं, "मैं बिलकुल अकेला हूँ!" कितनों ने इस संसार के जंगल से होकर यात्रा करते हुए एक के बाद एक मूर्ति को टूटते, एक के बाद एक लाठी को विफल होते, एक के बाद एक सोते को सूखते पाया है। यदि कोई मित्र चाहता है, तो वह परमेश्वर के दाहिने हाथ पर एक अटल मित्र, प्रभु यीशु मसीह को देखे। वह अपना दुखता सिर और थका हुआ हृदय उस अटल मित्र, प्रभु यीशु मसीह की छाती पर टिका दे। परमेश्वर के दाहिने हाथ पर एक अनुपम कोमलता वाला जीवित है। वह एक है जो कभी नहीं मरता। वह एक है जो कभी विफल नहीं करता, कभी निराश नहीं करता, कभी त्यागता नहीं, कभी अपना मन नहीं बदलता, कभी मित्रता नहीं तोड़ता। उसी एक, प्रभु यीशु को मैं उन सब को सौंपता हूँ जिन्हें मित्र की आवश्यकता है। ऐसे संसार में, पतित संसार में, जो हर वर्ष जैसे-जैसे हम जीते हैं, हमें और अधिक सूना लगता जाता है—जब तक प्रभु यीशु मसीह परमेश्वर के दाहिने हाथ पर मध्यस्थता की प्रार्थना करने को जीवित है, तब तक किसी को कभी मित्रहीन होने की आवश्यकता नहीं।

क्या इस लेख के किसी पाठक को याजक की आवश्यकता है? याजक के बिना कोई सच्चा धर्म नहीं हो सकता, और पाप-स्वीकार के स्थान के बिना कोई उद्धार देनेवाली मसीही मण्डली नहीं हो सकती। परन्तु सच्चा याजक कौन है? सच्चा पाप-स्वीकार का स्थान कहाँ है? केवल एक ही सच्चा याजक है—और वह प्रभु यीशु मसीह है। केवल एक ही वास्तविक पाप-स्वीकार का स्थान है—और वह अनुग्रह का सिंहासन है, जहाँ प्रभु यीशु उन लोगों को ग्रहण करने के लिए प्रतीक्षा करता है जो अपने मन का बोझ उसकी उपस्थिति में उतारने उसके पास आते हैं। हमें मसीह से उत्तम कोई याजक नहीं मिल सकता। हमें किसी और याजक की आवश्यकता नहीं। जब यीशु पिता परमेश्वर की ओर से मुहरबन्द, अभिषिक्त, नियुक्त, ठहराया हुआ और अधिकार-प्राप्त है, और उसका कान सुनने के लिए सदा तत्पर है तथा उसका हृदय दीन पापी मनुष्यों के लिए सहानुभूति रखने को सदा तैयार है, तब हमें पृथ्वी के किसी भी याजक की ओर क्यों मुड़ना चाहिए? याजकपद उसका वैध अधिकार है। उसने वह पद किसी और को नहीं सौंपा। धिक्कार है पृथ्वी पर उस किसी भी मनुष्य को जो मसीह को उसके इस अधिकार से वंचित करने का साहस करता है! धिक्कार है उस मनुष्य को जो उस पद को अपने ऊपर ले लेता है जिसे मसीह ने अपने ही हाथों में रखा है, और जिसे उसने पृथ्वी पर आदम से उत्पन्न किसी भी मनुष्य को कभी नहीं सौंपा!

आइए, हम सुसमाचार के इस महान सत्य को कभी आँखों से ओझल न होने दें—हमारे प्रभु और उद्धारकर्ता यीशु मसीह की मध्यस्थता की प्रार्थना और उसका याजकीय पद। मेरा विश्वास है कि इस सत्य को दृढ़ता से थामे रहना रोम की कलीसिया की भ्रान्तियों के विरुद्ध एक बड़ी सुरक्षा है। मेरा विश्वास है कि इस महान सत्य को भूल जाना ही एक प्रमुख कारण है कि कुछ स्थानों में इतने लोग विश्वास से भटक गए हैं, अपने प्रोटेस्टेंट पूर्वजों के धर्म-सिद्धान्त को त्याग बैठे हैं, और रोम के अन्धकार में लौट गए हैं। जब हम इस महान सत्य पर दृढ़ता से स्थापित हो जाते हैं—कि हमारा एक ही याजक और एक ही वेदी है—कि हमारा एक कभी न चूकनेवाला, कभी न मरनेवाला, सदा जीवित मध्यस्थ है, जिसने अपना पद किसी को नहीं सौंपा—तो हम देखेंगे कि हमें और कहीं मुड़ने की आवश्यकता नहीं। जब मसीह यीशु में हमारे पास जीवित जल का सोता है, जो सदा बहता है और सब के लिए मुफ़्त है, तब हमें अपने लिए ऐसे फूटे हुए हौद खोदने की आवश्यकता नहीं जो जल नहीं रोक सकते। जब स्वर्ग में हमारे लिए जीवित एक ईश्वरीय याजक विद्यमान है, तब हमें पृथ्वी पर किसी मनुष्य-याजक को ढूँढ़ने की आवश्यकता नहीं।

आइए, हम प्रभु यीशु मसीह को केवल एक मरे हुए के रूप में देखने से सावधान रहें। यहाँ, मेरा विश्वास है, बहुतेरे बड़ी भूल करते हैं। वे उसकी प्रायश्चित्त की मृत्यु के विषय में बहुत सोचते हैं, और ऐसा करना उचित भी है। परन्तु हमें वहीं रुक नहीं जाना चाहिए। हमें स्मरण रखना चाहिए कि वह केवल मरा और कब्र में नहीं गया—वरन् वह फिर जी उठा, और ऊँचे पर चढ़ गया, और बन्दियों को बाँध ले गया। हमें स्मरण रखना चाहिए कि वह अब परमेश्वर के दाहिने हाथ बैठा है, हमारी आत्माओं के लिए ऐसा काम करने को जो उतना ही वास्तविक, उतना ही सच्चा और उतना ही महत्त्वपूर्ण है जितना वह काम जो उसने अपना लहू बहाते समय किया था। मसीह जीवित है, मरा हुआ नहीं। वह उतना ही सचमुच जीवित है जितना हम में से कोई भी। मसीह हमें देखता है, हमारी सुनता है, हमें जानता है, और स्वर्ग में अपने विश्वासी लोगों की ओर से याजक का कार्य कर रहा है। उसके जीवित होने का विचार हमारी आत्माओं में उतना ही बड़ा और महत्त्वपूर्ण स्थान रखना चाहिए जितना क्रूस पर उसकी मृत्यु का विचार।

III. अब मैं तीसरे स्थान पर उन सांत्वनादायक निष्कर्षों पर विचार करूँगा जो प्रेरित ने प्रभु यीशु मसीह की सदा की मध्यस्थता की प्रार्थना पर आधारित किए हैं। इस जैसे संसार में हमें बहुत सांत्वना और ढाढ़स की आवश्यकता है। मनुष्य के लिए क्रूस उठाकर स्वर्ग तक पहुँचना कोई सरल बात नहीं। बहुत से शत्रुओं का सामना करना और उन पर जय पाना होता है। हमें प्रायः अकेले खड़ा होना पड़ता है। उत्तम से उत्तम समय में भी हमारे साथ थोड़े और हमारे विरुद्ध बहुत होते हैं। हमें ऐसी शक्तिवर्धक औषधियों और "दृढ़ सांत्वना" की आवश्यकता है जो मिस्र से कनान की यात्रा में हमें सम्भाले और हर्षित रखे, और मार्ग में मूर्छित होने से बचाए। प्रेरित अपने प्रयुक्त शब्दों में इस सब के प्रति गहराई से सचेत प्रतीत होता है। वह कहता है, "वह उनका पूरा पूरा उद्धार कर सकता है"—पूर्ण रूप से, सम्पूर्ण रूप से, सदा के लिए उद्धार करने में समर्थ है, "जो उसके द्वारा परमेश्वर के पास आते हैं, क्योंकि वह उनके लिये बिनती करने को सर्वदा जीवित है।"

हमारे सामने के इस महिमामय वचन पर मैं बहुत कुछ कह सकता था। परन्तु मैं संयम रखता हूँ। जब हम मसीह की "पूरा पूरा उद्धार" करने की सामर्थ्य के विषय में सुनते हैं, तब हमारे मन में जो थोड़े-से विचार उठने चाहिए, केवल उन्हीं की ओर मैं संकेत करूँगा। उन पर विस्तार से ठहरने के लिए मेरे पास स्थान नहीं है। मैं उन्हें सुझावों के रूप में रख देता हूँ, ताकि इस लेख के हर पाठक के निजी मनन के लिए सामग्री मिले।

(1) पहली बात यह सोचें कि मसीह किसी भी विश्वासी के पिछले पापों के होते हुए भी पूरा पूरा उद्धार करने में समर्थ है। वे पुराने पाप फिर कभी जी नहीं उठेंगे, और न परमेश्वर की सन्तान को दोषी ठहराने के लिए खड़े होंगे। क्योंकि पवित्रशास्त्र क्या कहता है, "मसीह ने उस हाथ के बनाए हुए पवित्र स्थान में, जो सच्चे पवित्र स्थान का नमूना है, प्रवेश नहीं किया, पर स्वर्ग ही में प्रवेश किया, ताकि हमारे लिये अब परमेश्वर के सामने दिखाई दे।" (इब्रानियों 9:24)। मसीह, कानूनी भाषा में कहें तो, स्वर्ग के न्यायालय में उन लोगों की ओर से जो उस पर विश्वास करते हैं, सदा "उपस्थित होता" रहता है। ऐसा कोई वर्ष, न कोई महीना, न कोई दिन, न कोई घण्टा, न कोई क्षण है, जिसमें परमेश्वर की उपस्थिति में एक जन जीवित न हो, जो वहाँ सब पवित्र लोगों की ओर से "उपस्थित" हो। मसीह उन स्त्रियों और पुरुषों की ओर से जो उस पर विश्वास करते हैं, पिता परमेश्वर के सामने सदा उपस्थित रहता है। उसका लहू और उसका बलिदान सदा परमेश्वर की दृष्टि में हैं। उसका कार्य, उसकी मृत्यु, उसकी मध्यस्थता की प्रार्थना, सदा पिता परमेश्वर के कानों में गूँजती रहती हैं।

मुझे प्राचीन इतिहास की एक कथा याद आती है, जो उस सत्य को समझाने में सहायक हो सकती है जिस पर मैं अभी विचार कर रहा हूँ। यह उस व्यक्ति की कथा है जिस पर मैराथन के महायुद्ध के कुछ ही समय बाद एथेन्स में प्राणदण्ड योग्य अभियोग लगा कर मुकद्दमा चलाया गया था। उस प्रसिद्ध युद्ध में एथेन्सवासियों ने अपने शौर्य से अपने छोटे से राज्य की स्वतंत्रता को फ़ारसियों की विशाल सेनाओं के सामने बचा रखा था। जिन्होंने उस युद्ध में बड़ी वीरता दिखाई थी, उनमें उस बन्दी का भाई भी था, जो लड़ाई में गम्भीर रूप से घायल हो गया था। उस मनुष्य पर मुकद्दमा चला। उसके विरुद्ध प्रमाण सशक्त और अकाट्य थे; ऐसा प्रतीत होता था कि बन्दी के दोषी ठहराए जाने से बच निकलने की कोई आशा नहीं है। अचानक एक व्यक्ति आगे आया और उसने उसकी ओर से बोलने की अनुमति माँगी। यह कौन था? यह उसका अपना भाई था। जब उससे पूछा गया कि उसके पास देने को कौन-सा प्रमाण है, या यह दिखाने को कौन-सा कारण है कि कटघरे में खड़े बन्दी को दोषी नहीं ठहराया जाना चाहिए, तो उसने केवल अपनी कटी हुई भुजाएँ ऊपर उठा दीं, जो केवल ठूँठ थीं; हाथ पूरी तरह कट चुके थे और केवल घायल ठूँठ ही बचे थे। लोगों ने उसे पहचान लिया कि यह वही मनुष्य है जिसने मैराथन के युद्ध में अद्भुत वीरता के काम किए थे और राज्य की सेवा में अपने हाथ खो दिए थे। उन्हीं घावों के द्वारा उसने उस विजय को पाने में सहायता की थी जिसकी गूँज अब तक एथेन्सवासियों के कानों में थी। वे घाव ही वह एकमात्र प्रमाण थे जो उसने प्रस्तुत किया। वे घाव ही वह एकमात्र निवेदन थे जो उसने इस बात के लिए रखा कि उसके भाई को छोड़ दिया जाए और उस पर दण्ड की आज्ञा न दी जाए। और कथा कहती है कि उन घावों के कारण, उसके भाई ने जो कुछ सहा था उस सब के कारण, उस बन्दी को निर्दोष ठहरा दिया गया। मुकद्दमा तुरन्त खारिज कर दिया गया और बन्दी को स्वतंत्रता मिल गई।

इसी प्रकार प्रभु यीशु मसीह के घाव सदा परमेश्वर पिता के सामने रहते हैं। उसके हाथों और पाँवों में कीलों के चिह्न, उसकी पसली में भाले का चिह्न, उसके माथे पर काँटों के चिह्न, उन सब यातनाओं के चिह्न जो उसने बलि किए गए मेम्ने के रूप में सहीं, एक अर्थ में स्वर्ग में परमेश्वर पिता के सामने सदा रहते हैं। जब तक मसीह स्वर्ग में है, विश्वासी के पुराने पाप न्याय के समय उसके विरुद्ध कभी खड़े न होंगे। मसीह जीवित है, और वे पुराने पाप उसे दोषी न ठहराएँगे। हमारा एक सदा जीवित, सदा मध्यस्थता करनेवाला याजक है। मसीह मरा हुआ नहीं, जीवित है।

(2) फिर यह भी सोचें कि अपने विश्वासी लोगों की सारी वर्तमान दुर्बलता के होते हुए भी मसीह पूर्ण उद्धार करने में समर्थ है। वह दुर्बलता कितनी बड़ी है, यह दिखाने के लिए समय कम पड़ जाएगा। परमेश्वर की सन्तानों में बहुत-से हैं जो अपने मन की कड़वाहट को जानते हैं, जो अपनी कमियों, अपनी निष्फलता और अपने थोड़े फल पर ऊँचे स्वर से रोते और आँसू बहाते हैं। परन्तु आइए, हम यूहन्ना के इन वचनों से शान्ति पाएँ, "यदि कोई पाप करे तो पिता के पास हमारा एक सहायक है," जो सदा पिता के पास उपस्थित है, "अर्थात् धार्मिक यीशु मसीह; और वही हमारे पापों का प्रायश्चित्त है।" (1 यूहन्ना 2:1।) वे दुर्बलताएँ हमें नम्र करें, यह उचित ही है। वे निर्बलताएँ हमें अपने परमेश्वर के सामने सावधानी से चलाएँ, यह भी उचित है। परन्तु जब तक प्रभु यीशु मसीह जीवित है, तब तक वे निर्बलताएँ हमें पूरी तरह निराश करने का कारण नहीं होनी चाहिएँ। हमारा एक सदा जीवित, सदा मध्यस्थता करनेवाला याजक है। मसीह मरा हुआ नहीं, जीवित है।

(3) फिर यह भी सोचें कि उन सब परीक्षाओं के होते हुए भी, जिनमें से विश्वासियों को गुज़रना पड़ता है, यीशु मसीह पूर्ण उद्धार करने में समर्थ है। सुनिए, प्रेरित पौलुस तीमुथियुस से क्या कहता है, "मैं दुःख भोगता हूँ, तौभी लज्जित नहीं, क्योंकि मैं जानता हूँ कि मैंने किस पर विश्वास किया है, और मुझे निश्चय है कि वह मेरी धरोहर की उस दिन तक रखवाली कर सकता है।" (2 तीमुथियुस 1:12।) जब तक यीशु मसीह जीवित है, प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास करनेवाला निश्चिन्त रह सकता है कि कोई भी क्लेश उसके और उसके जी उठे सिर के बीच के मेल को तोड़ने नहीं दिया जाएगा। वह बहुत दुःख उठा सकता है और कड़ी परीक्षा में पड़ सकता है। परन्तु जब तक मसीह जीवित है, वह कभी त्यागा न जाएगा। न दरिद्रता, न रोग, न शोक, न बिछोह, कभी यीशु को और उसके विश्वासी लोगों को अलग करेंगे। हमारा एक सदा जीवित, सदा मध्यस्थता करनेवाला याजक है। मसीह मरा हुआ नहीं, जीवित है।

(4) फिर यह भी सोचें कि उन सब सतावों के होते हुए भी, जिनसे विश्वासियों को गुज़रना पड़ता है, मसीह पूर्ण उद्धार करने में समर्थ है। देखिए पौलुस के विषय में क्या कहा गया है, जब कुरिन्थुस में उसका बहुत विरोध हुआ। हमें बताया गया है कि प्रभु ने रात को उसके पास खड़े होकर कहा, "मत डर, बोलता जा और चुप न रह; क्योंकि मैं तेरे साथ हूँ, और कोई तुझ पर चढ़ाई करके तेरी हानि न करेगा, क्योंकि इस नगर में मेरे बहुत-से लोग हैं।"

(प्रेरितों के काम 18:9-10।) स्मरण कीजिए कि पौलुस के मन फिराव से पहले, जब दमिश्क के मार्ग में प्रभु उससे मिला, तब उसने उससे क्या कहा था, "हे शाऊल, हे शाऊल, तू मुझे क्यों सताता है?" (प्रेरितों के काम 9:4।) विश्वासी को पहुँचाई गई हर हानि स्वर्ग में विराजमान जीवित सिर को पहुँचाई गई हानि है। यहाँ परमेश्वर की दीन सन्तान के सिर पर बरसाया गया हर सताव हमारे महान ज्येष्ठ भाई को ज्ञात है, उसके द्वारा अनुभव किया जाता है, और पूरे आदर के साथ मैं यह भी कह सकता हूँ कि उसे अखरता है, जो हमारे लिए मध्यस्थता करने को सदा जीवित है। मसीह जीवित है, इसलिए विश्वासी, सताए जाने पर भी, नाश न होंगे। "इन सब बातों में हम उसके द्वारा जिसने हम से प्रेम किया, जयवन्त से भी बढ़कर हैं।" (रोमियों 8:37।) हमारा एक सदा जीवित, सदा मध्यस्थता करनेवाला याजक है। मसीह मरा हुआ नहीं, जीवित है।

(5) फिर यह भी सोचें कि शैतान की सब परीक्षाओं के होते हुए भी मसीह पूर्ण उद्धार करने में समर्थ है। लूका के सुसमाचार के उस प्रसिद्ध अंश को स्मरण कीजिए, जहाँ हमारा प्रभु पतरस से कहता है, "हे शमौन, हे शमौन, देख, शैतान ने तुम लोगों को माँग लिया है कि गेहूँ की तरह फटके, परन्तु मैंने तेरे लिए प्रार्थना की कि तेरा विश्वास जाता न रहे।" (लूका 22:32।) हम निश्चय ही विश्वास कर सकते हैं कि ऐसी मध्यस्थता अब भी होती रहती है। वे वचन इस बात के चिह्न के रूप में कहे गए थे कि प्रभु अपने विश्वासी लोगों के लिए सदा क्या करता रहता है। शैतान, इस संसार का सरदार, सदा "गर्जनेवाले सिंह की नाईं इस खोज में रहता है कि किसको फाड़ खाए।" (1 पतरस 5:8।) परन्तु मसीह जीवित है; और परमेश्वर का धन्यवाद हो, जब तक मसीह जीवित है, शैतान उस आत्मा पर जय न पा सकेगा जो उस पर विश्वास करती है। हमारा एक सदा जीवित, सदा मध्यस्थता करनेवाला याजक है। मसीह मरा हुआ नहीं, जीवित है।

(6) फिर यह भी सोचें कि मृत्यु के डंक और उसके साथ आनेवाली सब बातों के होते हुए भी मसीह पूरी रीति से उद्धार करने में समर्थ है। दाऊद भी कह सका, "चाहे मैं घोर अन्धकारमय तराई में होकर चलूं, तौभी हानि से न डरूंगा, क्योंकि तू मेरे साथ रहता है; तेरी छड़ी और तेरी लाठी से मुझे शान्ति मिलती है।" (भजन संहिता 23:4।) फिर भी दाऊद ने एक विश्वासी मसीही की तुलना में धुंधले शीशे में से देखा था। ऐसी घड़ी आ सकती है जब मित्र हमारी और कुछ भलाई न कर सकें, जब विश्वासयोग्य सेवक हमारी आवश्यकताओं की पूर्ति न कर सकें, जब प्रेम, कृपा और स्नेह जो कुछ पीड़ा घटाने और अन्तिम यात्रा को यथासम्भव सरल बनाने के लिए कर सकते हैं, वह भी हमारे किसी काम न आ सके। परन्तु तब यह विचार कि मसीह जीवित है, मसीह मध्यस्थता की प्रार्थना कर रहा है, मसीह हमारी चिन्ता करता है, मसीह हमारे लिए परमेश्वर के दाहिने हाथ पर है, हमें ढाढ़स बंधानेवाला होना चाहिए। जो मनुष्य एक मरे हुए और साथ ही जीवित उद्धारकर्ता पर टेक लगाता है, उसके लिए मृत्यु का डंक निकाल दिया जाएगा। मसीह कभी नहीं मरता। उस जीवित उद्धारकर्ता पर विश्वास के द्वारा हमें पूर्ण विजय मिलेगी। हमारा एक सदा जीवित, सदा मध्यस्थता की प्रार्थना करनेवाला याजक है। मसीह मरा हुआ नहीं, जीवित है।

(7) फिर यह भी सोचें कि न्याय के दिन के भयों के होते हुए भी मसीह पूरी रीति से उद्धार करने में समर्थ है। देखिए, पौलुस रोमियों की पत्री के आठवें अध्याय में, उस अद्भुत अध्याय के अद्भुत समापन में, इसी पर कैसे भरोसा रखता है। परमेश्वर के वचन में विशेषाधिकारों के विषय में यह अध्याय अद्वितीय है, जो "कोई दण्ड की आज्ञा नहीं" से आरम्भ होता है और "कोई अलगाव नहीं" पर समाप्त होता है! देखिए, वह अन्तिम दिन के न्याय के सम्बन्ध में मसीह की मध्यस्थता की प्रार्थना पर कैसे ठहरता है। यह कहने के बाद कि "परमेश्वर के चुने हुओं पर दोष कौन लगाएगा? परमेश्वर ही तो धर्मी ठहरानेवाला है," वह आगे कहता है, "फिर कौन है जो दण्ड की आज्ञा देगा? मसीह ही है जो मर गया, वरन् मरे हुओं में से जी भी उठा, और परमेश्वर के दाहिनी ओर है, और हमारे लिये निवेदन भी करता है।" (रोमियों 8:33, 34।) अन्तिम दिन की ओर दृष्टि करते हुए प्रेरित पौलुस के भरोसे का एक आधार मसीह की मध्यस्थता की प्रार्थना भी थी, जैसे उसका मरना और जी उठना। उसकी दृढ़ शान्ति एक जीवित मसीह का स्मरण थी। वह शान्ति पौलुस के लिए ही नहीं, हमारे लिए भी है। हमारा एक सदा जीवित, सदा मध्यस्थता की प्रार्थना करनेवाला याजक है। मसीह मरा हुआ नहीं, जीवित है।

(8) अन्त में, और सबसे बढ़कर, यह सोचें कि मसीह सारी अनन्तता में पूरी रीति से उद्धार करने में समर्थ है। वह कहता है, "मैं वही हूं जो जीवित था, और मर गया था; और देख, मैं युगानुयुग जीवित हूं।" (प्रकाशित वाक्य 1:18।) मसीह, जो विश्वासी की जड़ है, कभी नहीं मरता, इसलिए डालियां भी कभी नहीं मरेंगी। मसीह "मरे हुओं में से जी उठकर फिर कभी नहीं मरता; उस पर फिर मृत्यु की प्रभुता नहीं होने की।" (रोमियों 6:9।) वह जीवित है, ताकि जो कोई उस पर भरोसा रखे, वह सारी अनन्तता तक आदर और महिमा पाए; और क्योंकि वह जीवित है, उसके विश्वासी लोग कभी नहीं मरेंगे। उसी के शब्दों में, "इसलिये कि मैं जीवित हूं, तुम भी जीवित रहोगे।" (यूहन्ना 14:19।) हमारा एक सदा जीवित, सदा मध्यस्थता की प्रार्थना करनेवाला याजक है। मसीह मरा हुआ नहीं, जीवित है।

क्या आप परमेश्वर के अपने लोगों के अन्त तक स्थिर रहने की सुरक्षा का भेद जानना चाहते हैं? क्या आप जानना चाहते हैं कि मसीह की भेड़ें कभी नाश क्यों नहीं होंगी, और कोई उन्हें उसके हाथ से क्यों नहीं छीन सकेगा? यह एक चमत्कार है। जब आप विश्वासी के हृदय को देखते हैं, उसकी प्रार्थनाएं सुनते हैं, उसके अंगीकार पर ध्यान देते हैं, जब आप देखते हैं कि धर्मी जन कभी-कभी सात बार गिर जाता है, और इन सबके होते हुए भी विश्वासी का स्थिर रहना देखते हैं, तो यह सचमुच एक आश्चर्य है। तूफानी रात में, जब चारों ओर से आंधी और झोंके चल रहे हों, दीया लेकर चलना और उसे जलता हुआ, स्थिरता से जलता हुआ, गली में लिए जाना, यह एक अद्भुत उपलब्धि है। छोटी नाव में तूफानी समुद्र पार करना, लहर पर लहर चढ़ना, और लहरों को नाव पर टूटते और उसे उलटते न देखना, यह लगभग चमत्कार ही है। तीन-चार वर्ष के एक नन्हे बच्चे को भीड़-भरी सड़क पर लड़खड़ाते हुए चलते और कुशलता से नगर के एक छोर से दूसरे छोर तक पहुंचते देखना, यह बड़ा आश्चर्य है।

परन्तु अन्त में यह है क्या, सिवाय हर सच्चे मसीही के जीवन, इतिहास और अनुभव के? वह गिरता है तो फिर उठता है; वह गिराया जाता है तो नष्ट नहीं होता। वह तूफानी रात के चन्द्रमा के समान एक स्थिति से दूसरी स्थिति में बढ़ता जाता है, एक बादल से दूसरे बादल में डूबता है, फिर भी थोड़ी देर में फिर चमक उठता है और उजियाले में चलता है। इस सबका भेद क्या है? वह परमेश्वर के दाहिने हाथ पर एक सामर्थी मित्र की निरन्तर मध्यस्थता की प्रार्थना है, एक ऐसा मित्र जो न ऊंघता है न सोता है, एक ऐसा मित्र जो विश्वासी की चिन्ता प्रातः, दोपहर और रात करता है। मसीह की मध्यस्थता की प्रार्थना ही मसीही के अन्त तक स्थिर रहने का भेद है।

हमारे लिए अच्छा होगा कि हम रोमियों के पांचवें अध्याय में प्रेरित के शब्दों का अध्ययन करें। वह कहता है, "सो जब कि हम अब उसके लोहू के कारण धर्मी ठहरे, तो उसके द्वारा क्रोध से क्यों न बचेंगे? क्योंकि बैरी होने की दशा में जब उसके पुत्र की मृत्यु के द्वारा हमारा परमेश्वर के साथ मेल हो गया, तो मेल हो जाने पर हम उसके जीवन के कारण उद्धार क्यों न पाएंगे?" इस सम्बन्ध पर ध्यान दीजिए, "उसकी मृत्यु के द्वारा पहले ही धर्मी ठहराए जाने पर हम उद्धार पाएंगे", और किस के द्वारा उद्धार पाएंगे? "उसके जीवन के कारण", अर्थात् उसके सदा हमारे लिए मध्यस्थता की प्रार्थना करने के लिए जीवित रहने के कारण। (रोमियों 5:10।)

"पिलग्रिम्स प्रोग्रेस" में रूपक-कथा के उस महान लेखक जॉन बनियन ने जो तुलना की है, वह बुद्धिमानी से भरी और सुन्दर है। वह हमें बताता है कि मसीही को किस प्रकार व्याख्याकार के घर में ले जाया गया, और व्याख्याकार ने उसे कितनी ही अद्भुत और शिक्षाप्रद बातें दिखाईं। एक स्थान पर वह उसे एक कमरे में ले गया जहाँ आग जल रही थी, और उसे एक ऐसा व्यक्ति दिखाया जो उस आग पर निरन्तर पानी उँडेल रहा था, फिर भी पानी आग को बुझा नहीं पाता था। वह चाहे कितना ही पानी डालता, आग फिर भी स्थिरता से जलती ही रहती! तब व्याख्याकार ने कहा, "क्या तू जानता है कि इसका क्या अर्थ है?" जब मसीही न जान सका, तो वह उसे आग के पीछे ले गया और उसे एक व्यक्ति दिखाया जो एक पात्र से तेल उँडेल रहा था। यह तेल आग को ईंधन देता और उसे और भी प्रचण्डता से जलाता था, चाहे उस पर कितना ही पानी डाला जाए। तब व्याख्याकार ने उसे बताया कि यह यीशु मसीह की मध्यस्थता की प्रार्थना का चित्र है। वह आग विश्वासी के हृदय में अनुग्रह की आग थी। जो पानी उँडेल रहा था वह आत्माओं का बैरी, अर्थात् शैतान था। परन्तु जो आग के पीछे खड़ा होकर तेल उँडेल रहा था, वह प्रभु यीशु मसीह था, जो निरन्तर मध्यस्थता की प्रार्थना करके और अपनी आत्मा की आपूर्ति देकर, गुप्त रूप से और मनुष्य की दृष्टि से अदृश्य रहकर, विश्वासी के हृदय में अपने ही कार्य को जीवित रखता है, और शैतान तथा उसके सब दूतों को अपने ऊपर जयवन्त होने नहीं देता।

क्या आप प्रार्थना में विश्वासी के साहस का भेद जानना चाहते हैं? यह आश्चर्य की बात है कि जो मनुष्य अपने पाप को इतनी गहराई से अनुभव करता है जितना विश्वासी करता है, वह कभी-कभी ऐसे भरोसे के साथ कैसे बोल सकता है। जो यह मानता है कि वह "अभागा, तुच्छ, कंगाल, अन्धा और नंगा" है, नष्ट और बर्बाद है; जो प्रायः वह करता है जो उसे नहीं करना चाहिए, और वह छोड़ देता है जो उसे करना चाहिए, और जिसमें कोई आत्मिक स्वास्थ्य नहीं पाया जाता, ऐसा मनुष्य परमेश्वर के सामने भरोसे के साथ कैसे जा सकता है, अपना हृदय उसके सामने खुलकर कैसे उँडेल सकता है, दिन-प्रतिदिन जो कुछ उसे चाहिए वह उससे कैसे माँग सकता है और डरता नहीं, यह सचमुच अद्भुत है। इसका भेद क्या है? यह हमारे प्रभु और उद्धारकर्ता यीशु मसीह की मध्यस्थता की प्रार्थना है, जिसके द्वारा सच्चा मसीही जानता है कि उसकी प्रार्थनाएँ स्वीकार्य ठहरती हैं और स्वर्ग की सभा में ग्रहण की जाती हैं। विश्वासी की प्रार्थना अपने आप में क्या है? एक दीन, निर्बल वस्तु, जो भूमि से ऊपर उठने के योग्य नहीं। मैं नहीं जानता कि वह किससे अधिक मिलती-जुलती है, सिवाय उस बैंक-नोट के जिस पर नीचे हस्ताक्षर न हों। हस्ताक्षर के बिना उस बैंक-नोट का क्या मूल्य है? कुछ भी नहीं। परन्तु उस बैंक-नोट के नीचे स्याही से कुछ अक्षर खींच दिए जाएँ, तो जो कुछ क्षण पहले रद्दी कागज़ का टुकड़ा था, वह हस्ताक्षर लगने से शायद कई सौ पाउण्ड का हो जाता है। मसीह की मध्यस्थता की प्रार्थना का भी यही हाल है। वह विश्वासी की विनतियों पर हस्ताक्षर करता, उनका समर्थन करता और उन्हें प्रस्तुत करता है; और उसकी सर्वसामर्थी मध्यस्थता के द्वारा वे ऊपर सुनी जाती हैं और मसीही की आत्मा पर आशीषें उतार लाती हैं।

क्या आप उस सारे परिश्रम, कामकाज और विकर्षणों में, जिनसे हमें होकर गुज़रना पड़ता है, प्रतिदिन की शान्ति का भेद जानना चाहते हैं? हम सब जानते हैं कि जिन्हें किसी सांसारिक व्यवसाय में काम करना पड़ता है, वे प्रायः उस काम को अपनी आत्मा पर एक कठिन बोझ पाते हैं। प्रायः सुबह वे अनुभव करते हैं, "मैं यह दिन बिना अशुद्ध विवेक के, बिना बहुत कष्ट पाए और अपने परमेश्वर को भूलने की परीक्षा में पड़े कैसे बिताऊँगा?" मनुष्य दिन को शान्ति के साथ कैसे बिताए, संसार में अपना पद कैसे निभाए, और जिस स्थिति में परमेश्वर ने उसे बुलाया है उसमें अपना कर्तव्य कैसे पूरा करे? वह यीशु मसीह की मध्यस्थता की प्रार्थना को थाम ले। वह इस महान विचार को पकड़ ले कि मसीह केवल उसके लिए मरा ही नहीं, वरन् जी भी उठा और अब भी उसके लिए जीवित है।

राष्ट्रमण्डल के युद्धों में मरनेवाले एक मसीही सैनिक के विषय में लिखा है कि अपने तम्बू से निकलने से पहले उसकी एक साधारण प्रार्थना कुछ इस प्रकार की होती थी, "प्रभु, मैं आज वह कर्तव्य निभाने जा रहा हूँ जिसके लिए मैं बुलाया गया हूँ। हो सकता है मैं कभी तुझे भूल जाऊँ। मैं अपने विचारों को हर समय उतनी पूर्णता से तुझ पर स्थिर नहीं रख सकता जितनी मैं चाहता हूँ। परन्तु प्रभु, यदि मैं आज तुझे भूल जाऊँ, तो तू मुझे न भूलना।" यही वह विचार है जिसे हर उस विश्वासी को थामे रहना चाहिए जिसे इस संसार के कामकाज में बहुत कुछ करना पड़ता है। प्रतिदिन सुबह बिछौने से उठते हुए, प्रतिदिन अपने कमरे से निकलते हुए, प्रतिदिन अपने घर से बाहर जाते हुए, वह स्मरण रखे, "स्वर्ग में एक जीवित है जो मेरे लिए मध्यस्थता की प्रार्थना करता है, जब मैं अपना उचित व्यवसाय कर रहा हूँ। चाहे मैं कामकाज में डूबा रहूँ, और अपने इस दीन निर्बल मन की सारी शक्तियाँ उसी में लगाने को विवश होऊँ, तो भी एक जीवित है जो मुझे कभी नहीं भूलता।" वह उस पुराने सैनिक की तरह कह सकता है, "प्रभु, यदि मैं आज तुझे भूल जाऊँ, तो तू मुझे न भूलना।"

अन्त में, क्या आप उस स्वर्ग की ओर देखते हुए, जहाँ हर विश्वासी जाना चाहता है, शान्ति का भेद जानना चाहते हैं? मुझे विश्वास है कि परमेश्वर की सन्तानों में थोड़े ही ऐसे हैं जो कभी-कभी चिन्तित, व्याकुल और उदास न हो जाते हों, जब वे उस अनन्त निवास के विषय में चुपचाप सोचते हैं जिसकी ओर वे यात्रा कर रहे हैं। उसका स्वरूप, उसका ढंग, उसके कार्य, उसके लिए उनकी अपनी प्रत्यक्ष अयोग्यता, कभी-कभी उनके मन को उलझा देती है। ये विचार कभी-कभी विश्वासी के मन में आ जाते हैं, विशेषकर बीमारी के समय, और उसे भारीपन से भर देते और उसके हृदय को डुबा देते हैं। अब मैं इन विचारों के विरुद्ध कोई ऐसा उपाय नहीं जानता जो प्रभु और उद्धारकर्ता यीशु मसीह की निरन्तर मध्यस्थता की प्रार्थना के स्मरण की बराबरी कर सके। मसीह स्वर्ग में गया है कि उन लोगों का "अग्रदूत" बने जो उसके पीछे चलनेवाले हैं। वह "उनके लिए स्थान तैयार करने" गया है, और वह स्थान जहाँ वह गया है वही है जहाँ उसके लोग शीघ्र ही जानेवाले हैं। जब वे वहाँ पहुँचेंगे तो सब कुछ तैयार पाएँगे, हर एक के लिए एक स्थान, और अपने प्रभु और उद्धारकर्ता की मध्यस्थता की प्रार्थना के द्वारा एक योग्य और उचित स्थान भी।

ऐसा कोई समय कभी नहीं आएगा जब स्वर्ग में उनकी संगति को पसन्द न किया जाए। ऐसा कोई दिन कभी नहीं आएगा जब उनके पुराने पाप—उनकी जवानी के और पीछे हट जाने के पाप, मन फिराव से पहले की उनकी दुष्टता, और सम्भव है कि परमेश्वर का अनुग्रह उनके हृदय में आने से पहले का उनका उच्छृंखल जीवन—ये सब पाप उनके विरुद्ध उठ खड़े हों, और उन्हें स्वर्ग में लज्जित और शर्मिन्दा कर दें। मसीह बीच में होगा। मसीह सदा उनके लिए मध्यस्थता की प्रार्थना करता रहेगा। जहाँ मसीह है, वहाँ उसके लोग भी होंगे। जहाँ वह जीवित है, वहाँ उसका सिद्ध पुण्य, उसकी निष्कलंक धार्मिकता और उसकी मध्यस्थता उन्हें पिता परमेश्वर की दृष्टि में सिद्ध ठहराएगी। वे स्वर्ग में मसीह में देखे जाते हुए, मसीह को पहने हुए, मसीह के अंग और मसीह के भाग होकर खड़े होंगे, और इस प्रकार आगे आनेवाले अनन्त आनन्द पर उनका दृढ़, पक्का और अनन्त अधिकार होगा।

अब मैं इस लेख को उन सब लोगों के लिए, जिनके हाथ में यह पहुँचे, कुछ शब्दों में लागू करने की बातें कहकर समाप्त करता हूँ। मेरे हृदय की अभिलाषा और परमेश्वर से मेरी प्रार्थना है कि जो शब्द मैंने लिखे हैं वे अब भी कुछ आत्माओं में फल लाएँ। इसलिए कि वे फल लाएँ, मैं विश्वासयोग्यता और स्नेह के साथ थोड़ी सी चेतावनी और आग्रह प्रस्तुत करता हूँ।

(1) मैं सबसे पहले उन सब को सलाह देना चाहता हूँ जो अपनी आत्मा के उद्धार के विषय में चिन्तित और व्याकुल हैं, फिर भी नहीं जानते कि क्या करें। यदि तुम ऐसे ही मनुष्य हो, तो मैं तुम्हें आदेश देता हूँ और तुमसे विनती करता हूँ, तुमसे आग्रह करता हूँ और तुम्हें न्यौता देता हूँ—कि उस मार्ग पर आओ जिसके विषय में मैं इस लेख में कहता आया हूँ। मैं तुमसे विनती करता हूँ कि पुराने और परखे हुए मार्ग से परमेश्वर के पास आओ—यीशु मसीह पर विश्वास के मार्ग से। यीशु का नाम लेकर परमेश्वर के निकट आओ। आज ही से यीशु के नाम में अपनी आत्मा के लिए परमेश्वर को ज़ोर से पुकारना आरम्भ करो। यह मत कहो कि अपने पक्ष में तुम्हारे पास कुछ कहने को है। तुम्हारे पास कहने को कुछ नहीं है। तुम्हारा जीवन, तुम्हारे विचार, तुम्हारे चालचलन—सब एक समान तुम्हें दोषी ठहराते हैं। अपने विषय में बस इतना ही कहो—कि तुम पापी हो, बड़े पापी हो, दोषी पापी हो, दण्ड के योग्य ठहराए हुए पापी हो; परन्तु पापी होने के कारण ही तुम परमेश्वर की ओर फिरते हो। यीशु के नाम में उसके पास आओ, और कहो कि तुमने सुना है कि यीशु के द्वारा पापी उसके निकट आ सकता है। उससे कहो कि तुम पापी हो, बड़े पापी हो, और अयोग्य हो। परन्तु उससे यह भी कहो कि तुम उसकी प्रतिज्ञाओं पर विश्वास करके, उसके अपने बाइबल के न्यौते पर भरोसा करके आए हो; और यीशु के नाम में, यीशु के निमित्त और यीशु के कारण तुम माँगते हो कि तुम ग्रहण किए जाओ, तुम्हारी सुनी जाए, तुम्हें क्षमा और क्षमादान मिले, और तुम स्वीकार किए जाओ। उससे कहो कि तुम चाहते हो कि तुम्हारा नाम—वही नाम जो अब तक संसारिकता, विचारहीनता, लापरवाही और पाप से जुड़ा रहा है—परमेश्वर की प्रिय सन्तानों की सूची में जोड़ दिया जाए।

क्या तुम कहोगे कि तुम परमेश्वर के पास आने से डरते हो? तुम्हारा भय व्यर्थ है। यदि तुम केवल मसीह पर विश्वास के मार्ग से आओ, तो तुम निकाले नहीं जाओगे। हमारा परमेश्वर "कठोर मनुष्य" नहीं है। स्वर्ग में हमारा पिता दया, प्रेम और अनुग्रह से परिपूर्ण है। पिता परमेश्वर के प्रेम, दया और कोमलता को ऊँचा उठाने की इच्छा में मैं किसी से पीछे नहीं हूँ। मैं एक क्षण के लिए भी यह नहीं मानूँगा कि जिसे सुसमाचारीय सेवकाई कहा जाता है वह पिता परमेश्वर की दया, प्रेम और करुणा को पृथ्वी की किसी भी सेवकाई से कम बड़ा करके दिखाती है। हम जानते हैं कि परमेश्वर पवित्र है। हम जानते हैं कि वह न्यायी है। हम मानते हैं कि जो अब भी पाप में बने रहते हैं उन पर वह क्रोधित है। परन्तु हम यह भी मानते हैं कि जो मसीह यीशु में उसके निकट आते हैं उनके प्रति वह अत्यन्त दयालु, अत्यन्त प्रेमी, अत्यन्त कोमल और अत्यन्त करुणामय है। हम तुमसे कहते हैं कि यीशु मसीह का क्रूस उसी प्रेम का परिणाम और फल था। क्रूस परमेश्वर की दया का कारण या आधार नहीं था—वरन् एक दीन, खोए हुए और दिवालिया संसार के प्रति पिता परमेश्वर, पुत्र परमेश्वर और पवित्र आत्मा परमेश्वर के सनातन प्रेम का परिणाम और फल था। उस जीवते मार्ग, मसीह यीशु, के द्वारा विश्वास में पिता के निकट आओ। एक क्षण के लिए भी यह मत सोचो—यह अनुचित विचार कभी सच नहीं ठहरेगा—कि इस प्रकार मसीह के द्वारा परमेश्वर पिता के निकट आने पर पिता परमेश्वर तुम्हें ग्रहण नहीं करेगा। वह तुम्हें आनन्द के साथ ग्रहण करेगा। जैसे उस पिता ने उड़ाऊ पुत्र से मिलने को दौड़कर उसके गले से लिपटकर उसे चूमा, वैसे ही पिता परमेश्वर उस आत्मा के साथ करेगा जो मसीह के नाम में उसके निकट आती है।

(2) अगली बात यह कि मैं उन पाठकों को ढाढ़स बँधाना चाहता हूँ जो परमेश्वर के मार्ग पर चल चुके हैं, फिर भी गिर पड़ने से डरते हैं। तुम क्यों डरते हो? किस बात से तुम्हें भय होना चाहिए? जब तक यीशु मसीह परमेश्वर के दाहिने हाथ पर तुम्हारे लिए मध्यस्थता की प्रार्थना करने को जीवित है, तब तक यह क्यों सोचो कि तुम्हें कभी गिर जाने दिया जाएगा? प्रभु यीशु मसीह की सारी सामर्थ्य तुम्हारे पक्ष में बँधी हुई है। उसने उस सारे झुण्ड की देखभाल का उत्तरदायित्व लिया है जिसे पिता परमेश्वर ने उसके हाथ में सौंपा है। वह उसकी देखभाल करेगा। उसने देखभाल की है। वह उसके लिए क्रूस पर गया। वह उसके लिए मरा। वह सदा परमेश्वर के दाहिने हाथ पर है, और उसने उसकी देखभाल करना नहीं छोड़ा। उस झुण्ड का हर एक सदस्य—सबसे निर्बल, सबसे दुर्बल भेड़ या मेम्ना—प्रभु और उद्धारकर्ता को समान रूप से प्रिय है, और कोई भी मसीह की छोटी से छोटी भेड़ को भी परमेश्वर के हाथ से छीन नहीं सकेगा। क्या तुम समुद्र के ज्वार को रोक सकते हो, कि वह तुम्हारे कहने से न चढ़े? क्या ज्वार के आरम्भ होने पर तुम जल को रोक सकते हो? क्या तुम स्वर्ग के सूर्य को पश्चिम में डूबने से रोक सकते हो, या उसी सूर्य को कल सबेरे पूर्व में उगने से रोक सकते हो? तुम यह नहीं कर सकते—ये बातें असम्भव हैं। और शैतानों की सारी सामर्थ्य, संसार की सारी सामर्थ्य और मसीही के सब शत्रु मिलकर भी यीशु मसीह के हाथ से एक भी आत्मा को छीन नहीं सकेंगे, जिसे आत्मा की शिक्षा द्वारा मसीह के साथ सच्चे मेल में लाया गया है और जिसके लिए यीशु मसीह मध्यस्थता की प्रार्थना करता है। मसीह की निर्बलता के दिन बीत गए। वह "निर्बलता के कारण क्रूस पर चढ़ाया गया," और जब वह क्रूस पर गया तो हमारे कारण निर्बल हुआ। (2 कुरिन्थियों 13:4।) उसकी निर्बलता के दिन समाप्त हुए—उसकी सामर्थ्य के दिन आरम्भ हो चुके हैं। पिलातुस अब उसे दोषी नहीं ठहराएगा—वह पिलातुस को दोषी ठहराने आएगा। स्वर्ग और पृथ्वी में सारा अधिकार उसी का है, और वह सारी सामर्थ्य उसके विश्वास करनेवाले लोगों के पक्ष में लगी हुई है।

(3) अन्त में, मैं इस लेख को पढ़नेवाले सब विश्वासियों को यह स्मरण दिलाकर आनन्दित करना चाहता हूँ कि मसीह फिर आनेवाला है। महायाजक को परमपवित्र स्थान से बाहर निकलकर उन सब लोगों को आशीष देनी है जिन्होंने उस पर विश्वास किया है। उसके काम का एक भाग उसने क्रूस पर मरकर पूरा किया; उसके काम का दूसरा भाग वह अब भी कर रहा है—परमेश्वर के दाहिने हाथ पर हमारे लिए मध्यस्थता की प्रार्थना करना। परन्तु महायाजक के पद का तीसरा भाग अभी पूरा होना शेष है। जैसे प्रायश्चित के दिन महायाजक करता था, वैसे ही उसे भी परमपवित्र स्थान से, परदे के भीतर से, बाहर निकलकर लोगों को आशीष देनी है। मसीह के काम का वह भाग अभी आनेवाला है। वह अब स्वर्ग ही में प्रवेश कर चुका है—वह परमपवित्र स्थान में है—वह परदे के पीछे गया है। परन्तु हमारा महान महायाजक—जो हारून से कहीं बड़ा है—एक दिन अवश्य बाहर निकलेगा। वह सामर्थ्य और बड़ी महिमा के साथ आएगा। वह उसी रीति से आएगा जैसे वह संसार को छोड़कर आकाश के बादलों में ऊपर उठा था। वह उत्तर और दक्षिण से, पूर्व और पश्चिम से उन सब को इकट्ठा करने आएगा जिन्होंने उसके नाम से प्रेम किया और मनुष्यों के सामने उसे स्वीकार किया, जिन्होंने उसका शब्द सुना और उसके पीछे चले।

वह उन्हें एक आनन्दित समूह में इकट्ठा करेगा। वहाँ फिर कोई निर्बलता और कोई शोक न होगा, कोई बिछड़ना और कोई अलगाव न होगा, कोई रोग और कोई मृत्यु न होगी, कोई विवाद और कोई झगड़ा न होगा, संसार, शरीर और शैतान से कोई लड़ाई न होगी। और सबसे उत्तम बात यह कि फिर कोई पाप न होगा। वह दिन सचमुच आनन्द का दिन होगा, जब महायाजक अपने काम का तीसरा, अन्तिम और पूर्ण करनेवाला भाग करने—अपने विश्वासी लोगों को आशीष देने—बाहर आएगा। "जो इन बातों की गवाही देता है, वह यह कहता है, हाँ, मैं शीघ्र आनेवाला हूँ। आमीन। हे प्रभु यीशु आ।" (प्रकाशितवाक्य 22:20।)

चुनाव

"हे भाइयो, परमेश्वर के प्यारो, मैं जानता हूँ कि तुम चुने हुए हो।" 1 थिस्सलुनीकियों 1:4

"अपने बुलाए जाने और चुन लिए जाने को पक्का करने का यत्न करते रहो।" 2 पतरस 1:10।

इस पृष्ठ के शीर्ष पर दिए गए पदों में एक विशेष रुचि का शब्द है। यह ऐसा शब्द है जो ग्रेट ब्रिटेन के एक छोर से दूसरे छोर तक लोगों के मन में और उनकी जीभ पर प्रायः रहता है। वह शब्द है "चुनाव।"

ऐसे अंग्रेज बहुत कम हैं जो संसद के आम चुनाव के विषय में कुछ न जानते हों। ऐसे समय में अनेक बुराइयाँ ऊपर आ जाती हैं। बुरी भावनाएँ भड़क उठती हैं। पुराने झगड़े उखाड़े जाते हैं और नए झगड़े बोए जाते हैं। प्रतिज्ञाएँ पाई की पपड़ी के समान केवल तोड़े जाने के लिए की जाती हैं। झूठा दिखावा, झूठ बोलना, मतवालापन, धमकी, अत्याचार और चापलूसी चारों ओर फैल जाते हैं। सम्भवतः किसी और समय मानव स्वभाव अपना इतना बुरा रूप प्रकट नहीं करता जितना आम चुनाव के समय करता है!

फिर भी संसद के चुनाव के सब पक्षों को देखना ही उचित है। इसकी बुराइयों में कुछ भी नया या विशेष रूप से अंग्रेजी नहीं है। हर युग में और संसार के हर भाग में मनुष्य का हृदय प्रायः एक सा ही रहा है। ऐसे लोगों की कभी कमी नहीं रही जो दूसरों को यह समझाने को तैयार रहे हों कि उन पर जैसा शासन होना चाहिए वैसा नहीं हो रहा, और कि वे स्वयं सबसे योग्य शासक हैं जो मिल सकते हैं। मसीह के जन्म से एक हज़ार वर्ष पहले पवित्र आत्मा के अचूक हाथ ने यह चित्र खींचा था—इसके बाद अबशालोम ने अपने लिए एक रथ, घोड़े और अपने आगे आगे दौड़नेवाले पचास पुरुष रख लिए। वह सवेरे उठकर नगर के फाटक की ओर जानेवाले मार्ग के किनारे खड़ा रहता। जब कोई ऐसा मनुष्य आता जिसका कोई मुकद्दमा राजा के पास न्याय के लिए जाता, तब अबशालोम उसे पुकारकर पूछता, "तू किस नगर का है?" यदि वह उत्तर देता, "तेरा दास इस्राएल के अमुक गोत्र का है," तो अबशालोम उससे कहता, "देख, तेरा मुकद्दमा तो अच्छा और ठीक है, परन्तु राजा की ओर से तेरी सुननेवाला कोई नहीं है।" फिर वह कहता, "भला होता कि मैं इस देश में न्यायी ठहराया जाता! तब जिस किसी का कोई मुकद्दमा या झगड़ा होता, वह मेरे पास आता, और मैं उसका न्याय चुकाता।" और जब कोई उसे दण्डवत् करने को निकट आता, तो वह हाथ बढ़ाकर उसे पकड़ लेता और चूम लेता। जितने इस्राएली राजा के पास न्याय के लिए आते, उन सब से अबशालोम ऐसा ही व्यवहार करता। इस प्रकार अबशालोम ने इस्राएली पुरुषों के मन को चुरा लिया। (2 शमूएल 15:1-6)

इस खण्ड को पढ़कर हमें यह सीखना चाहिए कि अपने समय का न्याय अत्यधिक कठोरता से न करें। जो बुराइयाँ हम देखते हैं वे न तो अनोखी हैं और न नई।

फिर भी हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि जन-चुनाव, अपनी सब बुराइयों के होते हुए भी, तानाशाही शासन से कहीं उत्तम है। ऐसे निरंकुश अत्याचारी के अधीन जीना, जो किसी को अपने आप सोचने, बोलने या करने नहीं देता, दयनीय दासता है। स्वतंत्रता के लिए हमें संसद के सदस्यों की वापसी के साथ आनेवाली सब बुराइयाँ सहनी चाहिए। हम में से हर एक को विवेक से अपना कर्तव्य निभाना और किसी भी दल से बहुत कम आशा रखना सीखना चाहिए। यदि हम जिनका समर्थन करते हैं वे सफल हों, तो हम यह न समझें कि वे जो कुछ करेंगे सब ठीक होगा। यदि हम जिनका विरोध करते हैं वे सफल हों, तो हम यह न समझें कि वे जो कुछ करेंगे सब गलत होगा। किसी भी सांसारिक शासक से बहुत कम आशा रखना सन्तोष का एक बड़ा भेद है। उन सब के लिए प्रार्थना करना जो अधिकार में हैं, और उनके सब कामों का न्याय उदारता से करना, मसीही का प्रमुख कर्तव्य है।

परन्तु एक और चुनाव है, जो संसद के किसी भी चुनाव से कहीं अधिक महत्त्व का है—ऐसा चुनाव जिसके परिणाम तब भी बने रहेंगे जब रानी, लार्ड सभा और कॉमन सभा समाप्त हो चुकी होंगी, ऐसा चुनाव जो सब श्रेणियों से सम्बन्ध रखता है, छोटे से भी और बड़े से भी, स्त्रियों से भी और पुरुषों से भी। यह वह चुनाव है जिसे पवित्रशास्त्र "परमेश्वर का चुनाव" कहता है।

मैं इस लेख के पाठकों से विनती करता हूँ कि वे कुछ मिनट मेरी ओर ध्यान दें, जब मैं इस चुनाव का विषय उनके सामने रखने का यत्न करता हूँ। मेरा विश्वास कीजिए, यह आपके अनन्त सुख को अत्यन्त गहराई से प्रभावित करता है। आप संसद में हों या न हों, मतदान करें या न करें, जीतनेवाले पक्ष में हों या न हों, सौ वर्ष बाद इन बातों का बहुत कम महत्त्व रह जाएगा। परन्तु इस बात का बहुत महत्त्व होगा कि आप "परमेश्वर के चुने हुए लोगों" की गिनती में हैं या नहीं।

चुनाव के विषय को संभालने में मैं केवल दो काम करना चाहता हूँ।

पहला, मैं चुनाव का सिद्धान्त बताऊँगा और दिखाऊँगा कि वह क्या है।

दूसरा, मैं इस विषय के चारों ओर चेतावनियों की बाड़ लगाऊँगा और इसे दुरुपयोग से बचाऊँगा।

यदि मैं इन दो बातों को इन पृष्ठों के सब पाठकों के मन में स्पष्ट और सरल कर सकूँ, तो मैं समझूँगा कि मैंने उनकी आत्माओं की एक बड़ी और अत्यावश्यक सेवा की है।

I. पहले मुझे चुनाव के सिद्धान्त को बताना है। यह क्या है? इसका अर्थ क्या है? इस विषय में सटीक कथन बहुत महत्त्वपूर्ण हैं। सम्भवतः पवित्रशास्त्र के किसी भी सिद्धान्त को शत्रुओं की भ्रान्त धारणाओं और मित्रों के अशुद्ध वर्णनों से उतनी हानि नहीं पहुँची, जितनी उस सिद्धान्त को जो अब हमारे सामने है।

मेरा विश्वास है कि चुनाव का सच्चा सिद्धान्त यह है। परमेश्वर ने अनादिकाल से मनुष्यजाति में से कुछ स्त्री-पुरुषों को चुन लेना चाहा, जिन्हें उसने अपनी उस युक्ति से, जो हमारे लिए गुप्त है, यीशु मसीह के द्वारा बचाने का आदेश दिया है। जो इस प्रकार चुने गए हैं उनके सिवाय कोई अन्ततः नहीं बचता। इसीलिए पवित्रशास्त्र कई स्थानों पर परमेश्वर के लोगों को "परमेश्वर के चुने हुए लोग" कहता है, और उनके अनन्त जीवन के लिए चुने या ठहराए जाने को "परमेश्वर का चुनाव" कहा गया है।

जिन स्त्री-पुरुषों को परमेश्वर ने अनादिकाल से चुन लेना चाहा, उन्हें वह समय आने पर अपने आत्मा के द्वारा, जो ठीक समय पर कार्य करता है, बुलाता है। वह उन्हें पाप का कायल करता है। वह उन्हें मसीह के पास ले जाता है। वह उनमें मन फिराव और विश्वास उत्पन्न करता है। वह उन्हें परिवर्तित, नया और पवित्र करता है। वह अपने अनुग्रह से उन्हें पूरी रीति से गिर जाने से बचाए रखता है, और अन्त में उन्हें सुरक्षित महिमा में पहुँचा देता है। संक्षेप में, परमेश्वर का अनन्त चुनाव पापी के उद्धार की उस जंजीर की पहली कड़ी है जिसका अन्त स्वर्गीय महिमा है। चुने हुए लोगों के सिवाय कोई कभी मन फिराता, विश्वास करता और नया जन्म नहीं पाता। उद्धार का मूल और प्रथम कारण परमेश्वर का अनन्त चुनाव है।

यहाँ बताया गया सिद्धान्त निःसन्देह विशेष रूप से गहरा, रहस्यमय और समझने में कठिन है। हमारे पास इसे पूरी रीति से देखने की आँखें नहीं हैं। हमारे पास इसकी थाह लेने की डोरी नहीं है। मसीही धर्म के किसी अंश का इतना विवाद, इतना तिरस्कार और इतनी निन्दा नहीं हुई जितनी इसकी। किसी ने भी परमेश्वर के प्रति उस बैर को इतना नहीं भड़काया, जो शारीरिक मन का सबसे बड़ा चिह्न है। हज़ारों तथाकथित मसीही प्रायश्चित, अनुग्रह से उद्धार और विश्वास से धर्मी ठहराए जाने को मानने का दावा करते हैं, फिर भी चुनाव के सिद्धान्त की ओर देखने से इनकार करते हैं। कुछ लोगों के लिए तो इस शब्द का नाम लेना ही क्रोध, चिड़चिड़ेपन और आवेश की अभिव्यक्ति जगाने के लिए पर्याप्त है।

परन्तु आख़िर, क्या चुनाव का सिद्धान्त पवित्रशास्त्र में स्पष्ट रूप से कहा गया है? एक सच्चे मसीही के लिए सारा प्रश्न यही है। यदि वह परमेश्वर की पुस्तक में नहीं है, तो चाहे कोई भी उसे प्रस्तुत करे, मनुष्य उसे सदा के लिए त्याग दे, ठुकरा दे और अस्वीकार कर दे। यदि वह उसमें है, तो हम उसे परमेश्वरीय प्रकाशन का अंश मानकर श्रद्धा से ग्रहण करें, और जहाँ हम उसे पूरी तरह समझ या समझा नहीं सकते वहाँ भी नम्रता से विश्वास करें। तो पवित्रशास्त्र में क्या लिखा है? "व्यवस्था और चितौनी की ओर! यदि वे इस वचन के अनुसार न बोलें तो भोर का प्रकाश उनके लिये न होगा।" (यशायाह 8:20।) क्या चुनाव बाइबल में है, या नहीं? क्या बाइबल कुछ लोगों को परमेश्वर के चुने हुए लोग कहती है, या नहीं?

सुनिए, हमारा प्रभु यीशु मसीह क्या कहता है,

"परन्तु चुने हुओं के कारण वे दिन घटाए जाएँगे।" (मत्ती 24:22।)

"यदि हो सके तो वे चुने हुओं को भी भरमा दें।" (मरकुस 13:22।)

"वह अपने स्वर्गदूतों को भेजेगा, और वे उसके चुने हुओं को इकट्ठा करेंगे।" (मत्ती 24:31।)

"क्या परमेश्वर अपने चुने हुओं का न्याय न चुकाएगा?" (लूका 18:7।)

सुनिए, पौलुस क्या कहता है। "क्योंकि जिन्हें उसने पहले से जान लिया है उन्हें पहले से ठहराया भी है कि उसके पुत्र के स्वरूप में हों, ताकि वह बहुत भाइयों में पहिलौठा ठहरे। फिर जिन्हें उसने पहले से ठहराया, उन्हें बुलाया भी, और जिन्हें बुलाया, उन्हें धर्मी भी ठहराया है, और जिन्हें धर्मी ठहराया, उन्हें महिमा भी दी है।" (रोमियों 8:29-30)

"परमेश्वर के चुने हुओं पर दोष कौन लगाएगा?" (रोमियों 8:33।)

"उसने हमें जगत की उत्पत्ति से पहले उसमें चुन लिया।" (इफिसियों 1:4।)

"जिसने हमारा उद्धार किया, और पवित्र बुलाहट से हमें बुलाया; यह हमारे कर्मों के अनुसार नहीं, परन्तु अपनी मनसा और उस अनुग्रह के अनुसार है, जो मसीह यीशु में सनातन से हम पर हुआ।" (2 तीमुथियुस 1:9।)

"परमेश्वर ने आरम्भ से तुम्हें चुन लिया, कि आत्मा के द्वारा पवित्र बनकर और सत्य की प्रतीति करके उद्धार पाओ।" (2 थिस्सलुनीकियों

2:13।)

सुनिए, पतरस क्या कहता है, "परमेश्वर पिता के पूर्वज्ञान के अनुसार चुने हुए, आत्मा के पवित्र करने के द्वारा आज्ञाकारी होने और यीशु मसीह के लहू के छिड़के जाने के लिये।" (1 पतरस 1:2।)

"अपने बुलाए जाने और चुन लिये जाने को सुदृढ़ करने का भली-भाँति यत्न करते जाओ।" (2 पतरस 1:10।)

मैं ये ग्यारह वचन अपने पाठकों के सामने रखता हूँ, और उनसे कहता हूँ कि इन पर भली-भाँति विचार करें। यदि शब्दों का कोई अर्थ है, तो मुझे लगता है कि वे व्यक्तिगत चुनाव के सिद्धान्त को अत्यन्त स्पष्ट रूप से सिखाते हैं। ऐसे वचनों के सामने मैं यह मानने से इनकार करने का साहस नहीं करता कि यह पवित्रशास्त्र का सिद्धान्त है। एक ईमानदार मनुष्य के रूप में मैं बाइबल की भाषा के स्पष्ट और प्रत्यक्ष अर्थ से अपनी आँखें बन्द करने का साहस नहीं करता। यदि मैं ऐसा करने लगूँ, तो किसी अपरिवर्तित मनुष्य को सुसमाचार सुनाने में मेरे पास खड़े होने की कोई भूमि न रहेगी। यदि मैं वचनों के एक समूह को सच न मानूँ, तो मैं उससे यह आशा नहीं कर सकता कि वह दूसरे समूह को सच माने। ऊपर उद्धृत ये ग्यारह वचन मेरे मन में निश्चित रूप से यह प्रमाणित करते हैं कि व्यक्तिगत चुनाव पवित्रशास्त्र का सिद्धान्त है। इसलिए मुझे इसे ग्रहण करना और मानना ही होगा, चाहे यह कितना ही कठिन क्यों न हो। इसी रूप में मैं आज अपने पाठकों से कहता हूँ कि इसे शान्त मन से देखें, गम्भीरता से तौलें और परमेश्वर का सत्य मानकर ग्रहण करें।

आख़िर, लोग जो चाहें कहें, इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि परमेश्वर का कुछ स्त्री-पुरुषों को उद्धार के लिए चुनना एक सीधा-सादा तथ्य है। यह कि सब मसीही कहलानेवाले अन्ततः नहीं बचते—केवल कुछ ही बचते हैं—कि जो बचते हैं वे अपने उद्धार के लिए पूरी रीति से परमेश्वर के सेंतमेंत अनुग्रह और उसके आत्मा की बुलाहट के ऋणी हैं—कि कोई मनुष्य यह किसी रीति से नहीं समझा सकता कि कुछ लोग उद्धार के लिए क्यों बुलाए जाते हैं और दूसरे क्यों नहीं बुलाए जाते—ये सब ऐसी बातें हैं जिनका खण्डन अपने आसपास देखनेवाला कोई मसीही क्षण भर भी करने का दिखावा नहीं कर सकता। फिर भी इस सबका निचोड़ चुनाव के सिद्धान्त के सिवा और क्या है?

मानव स्वभाव के सही विचार हमें निश्चय ही इसी निष्कर्ष तक पहुँचाएँगे। एक बार यह मान लीजिए कि हम सब स्वभाव से अपराधों और पापों में मरे हुए हैं, और परमेश्वर की ओर फिरने की हममें कोई सामर्थ्य नहीं—एक बार यह मान लीजिए कि मनुष्य के हृदय में सारा आत्मिक जीवन परमेश्वर ही से आरम्भ होता है—एक बार यह मान लीजिए कि जिसने "उजियाला हो" कहकर जगत की सृष्टि की, वही मनुष्य के हृदय में चमके और उसके भीतर उजियाला उत्पन्न करे, एक बार यह मान लीजिए कि परमेश्वर सब मसीही कहलानेवालों को इस रीति से प्रकाशित नहीं करता—केवल कुछ ही को, और वह इस विषय में पूर्णतः सर्वसत्ताधारी के रूप में कार्य करता है, अपने कामों का लेखा किसी को नहीं देता—यह सब मान लीजिए, और फिर देखिए कि आप कहाँ खड़े हैं। आप जानें या न जानें, आप चुनाव के पूरे सिद्धान्त को स्वीकार कर चुके हैं!

बाइबल में प्रकट की गई परमेश्वर की प्रकृति और चरित्र के सही विचार भी मुझे इसी स्थिति पर ले आते प्रतीत होते हैं। क्या हम विश्वास करते हैं कि परमेश्वर सब कुछ अनादिकाल से जानता है—कि वह अपने विधान से सब कुछ पर शासन करता है, और उसकी इच्छा के बिना एक गौरैया भी भूमि पर नहीं गिरती? क्या हम विश्वास करते हैं कि वह अपने सब काम एक योजना के अनुसार करता है, सिद्ध ज्ञानवाले एक शिल्पकार की नाईं, और कि उसके सन्तों के विषय में, जो उसकी सबसे चुनी हुई और उत्तम कृति हैं, कुछ भी संयोग, दुर्घटना या भाग्य पर नहीं छोड़ा गया? तो यदि हम यह सब मानते हैं, तो हम उस पूरे सिद्धान्त को मानते हैं जिसका समर्थन करना इस लेख का उद्देश्य है। यही चुनाव का सिद्धान्त है।

अब इन बातों के उत्तर में क्या कहा जा सकता है? वे मुख्य तर्क-शस्त्र कौन से हैं जिनसे चुनाव पर आक्रमण किया जाता है? आइए देखें।

कुछ लोग हमें बताते हैं कि पवित्रशास्त्र में लोगों और व्यक्तियों के चुनाव जैसी कोई बात नहीं है। वे कहते हैं कि ऐसा चुनाव मनमाना, अन्यायपूर्ण, पक्षपातपूर्ण और निर्दय होगा। वे केवल जातियों, कलीसियाओं और समुदायों के चुनाव को मानते हैं—जैसे प्राचीन काल में इस्राएल, और हमारे अपने दिनों में अन्यजातियों की तुलना में मसीही जातियाँ। अब क्या इस आपत्ति में कुछ ऐसा है जो टिक सके? मेरा विश्वास है कि इसमें कुछ भी नहीं है। एक तो, पवित्रशास्त्र में जिस चुनाव की चर्चा है वह पवित्र आत्मा के पवित्र करनेवाले प्रभाव के साथ जुड़ा हुआ चुनाव है। यह निश्चय ही जातियों का चुनाव नहीं है। दूसरे, पौलुस स्वयं इस्राएल और चुने हुओं के बीच स्पष्ट और तीक्ष्ण भेद करता है। "जिस की खोज में इस्राएल है, वह उसे न मिला; परन्तु चुने हुओं को मिला।"

(रोमियों 11:7।) अन्तिम बात, पर कम महत्त्व की नहीं, यह कि जातीय चुनाव के सिद्धान्त के पक्षधरों को इससे कुछ भी लाभ नहीं होता। वे इसका क्या कारण बताएँगे कि परमेश्वर ने 35 करोड़ चीनियों से मसीही धर्म का ज्ञान 1800 वर्ष तक रोके रखा, और फिर भी उसे यूरोप महाद्वीप में फैला दिया? वे परमेश्वर की सर्वसत्ताधारी इच्छा और उसके स्वतंत्र चुनाव के आधार के सिवा इसका कोई कारण नहीं बता सकते! इसलिए वास्तव में वे ठीक उसी स्थिति को अपनाने पर विवश हैं जिसके लिए वे हमें दोष देते हैं और जिसे हमारे पक्ष लेने पर वे मनमाना और निर्दय कहकर निन्दा करते हैं।

कुछ लोग हमसे कहते हैं कि चाहे जो हो, चुनाव इंग्लैंड की कलीसिया का सिद्धान्त नहीं है। यह असहमत सम्प्रदायों और प्रेस्बिटेरियन लोगों के लिए ठीक हो सकता है—पर कलीसिया के सदस्यों के लिए नहीं। वे कहते हैं, "यह निरा कैल्विनवाद है, एक अतिवादी धारणा जो जिनेवा से आई, और उन लोगों में इसका कोई आदर नहीं जो प्रार्थना-पुस्तक से प्रेम रखते हैं।" ऐसे लोगों को अपनी प्रार्थना-पुस्तकों के अन्त में देखना और उनतालीस अनुच्छेद पढ़ना भला होगा। वे 17वें अनुच्छेद को देखें, और ये शब्द ध्यान से पढ़ें, "जीवन के लिए पूर्वनियति परमेश्वर का अनन्त उद्देश्य है, जिसके द्वारा (जगत की नींव डाले जाने से पहले) उसने अपनी उस युक्ति से, जो हम से गुप्त है, निरन्तर यह ठहराया है कि जिन्हें उसने मनुष्य-जाति में से मसीह में चुना है, उन्हें श्राप और दण्ड से छुड़ाए, और मसीह के द्वारा अनन्त उद्धार तक पहुँचाए, जैसे आदर के लिए बनाए गए पात्र। इसलिए जिन्हें परमेश्वर की ऐसी उत्तम देन मिली है, वे परमेश्वर के उद्देश्य के अनुसार उसके आत्मा के द्वारा, जो उचित समय पर कार्य करता है, बुलाए जाते हैं—वे अनुग्रह से उस बुलाहट का पालन करते हैं—वे सेंत-मेंत धर्मी ठहराए जाते हैं—वे लेपालकपन के द्वारा परमेश्वर के पुत्र बनाए जाते हैं—वे उसके एकलौते पुत्र यीशु मसीह के स्वरूप में ढाले जाते हैं—वे भक्ति से भले कर्मों में चलते हैं, और अन्त में परमेश्वर की दया से अनन्त आनन्द को पहुँचते हैं।"

मैं उस अनुच्छेद की ओर इंग्लैंड की कलीसिया के सब सदस्यों का विशेष ध्यान दिलाता हूँ। वह आज के दिनों में खरी शिक्षा के सबसे दृढ़ लंगरों में से एक है। उसका बपतिस्मा द्वारा नया जन्म के सिद्धान्त से कभी मेल नहीं बैठ सकता! व्यक्तिगत चुनाव के सच्चे सिद्धान्त का इससे अधिक बुद्धिमत्तापूर्ण कथन किसी अप्रेरित मनुष्य के हाथ से कभी नहीं लिखा गया। यह पूर्णतः सन्तुलित और विवेकपूर्वक अनुपात में रखा गया है। ऐसे अनुच्छेद के रहते हुए यह कहना कि इंग्लैंड की कलीसिया इस लेख के सिद्धान्त को नहीं मानती, केवल हास्यास्पद है।

विवादग्रस्त बातों में मैं विनम्रता और सावधानी से बोलना चाहता हूँ। मैं मनुष्यों के स्वभावों की अनेक भिन्नताओं का, जो अनजाने ही हमारे धार्मिक विचारों पर प्रभाव डालती हैं, और बचपन के पूर्वाग्रहों के स्थायी प्रभाव का भी ध्यान रखना चाहता हूँ। मैं खुले मन से मानता हूँ कि वेस्ली, फ्लेचर और उत्तम मेथोडिस्टों व आर्मीनियनों की एक पूरी सेना ने सदा चुनाव का इनकार किया है, और बहुत से आज भी करते हैं। मैं यह नहीं कहता कि चुनाव को मानना उद्धार के लिए बिलकुल आवश्यक है, यद्यपि परमेश्वर के चुने हुओं में से एक होना निःसन्देह आवश्यक है। परन्तु मैं धर्मशास्त्र के विषयों में किसी मनुष्य को अपना स्वामी नहीं कह सकता। मेरी अपनी आँखें व्यक्तिगत चुनाव के सिद्धान्त को पवित्रशास्त्र और इंग्लैंड की कलीसिया के 17वें अनुच्छेद, दोनों में अत्यन्त स्पष्टता से कहा हुआ देखती हैं। मैं इसे छोड़ नहीं सकता। मैं दृढ़ता से विश्वास करता हूँ कि यह परमेश्वर के सत्य का एक महत्त्वपूर्ण अंश है, और भक्त लोगों के लिए "मधुर, सुखद और अकथनीय शान्ति से भरा हुआ" है।

II. दूसरी बात जो मैं करना चाहता हूँ, वह यह है कि चुनाव के सिद्धान्त को सावधानियों की बाड़ से घेरूँ, और उसे दुरुपयोग से बचाऊँ।

यह विषय का वह भाग है जिसे मैं अत्यन्त महत्त्वपूर्ण मानता हूँ। प्रकट किया हुआ सारा सत्य तोड़े-मरोड़े और बिगाड़े जाने के योग्य है। लोगों को सुसमाचार को विकृत करने के लिए लुभाकर उसे घृणित बना देना शैतान की मुख्य युक्तियों में से एक है। सम्भवतः मसीही धर्मशास्त्र के किसी और भाग को इस रीति से उतनी हानि नहीं पहुँची जितनी व्यक्तिगत चुनाव के सिद्धान्त को। मैं जो कहना चाहता हूँ उसे समझाने दीजिए।

"मैं परमेश्वर के चुने हुए लोगों में से नहीं हूँ," एक मनुष्य कहता है। "धर्म के विषय में मेरा कुछ भी करना व्यर्थ है। सब्त मानना, परमेश्वर की सार्वजनिक आराधना में जाना, अपनी बाइबल पढ़ना, प्रार्थना करना — यह सब मेरे लिए समय की बर्बादी है। यदि मेरा उद्धार होना है, तो होकर रहेगा। यदि मुझे नाश होना है, तो नाश होकर रहूँगा। इस बीच मैं चुपचाप बैठकर प्रतीक्षा करता हूँ।" यह आत्मा का एक भयंकर रोग है। परन्तु मुझे भय है कि यह बहुत ही सामान्य रोग है!

"मैं परमेश्वर के चुने हुए लोगों में से हूँ," दूसरा मनुष्य कहता है। "मैं चाहे जैसे भी जीऊँ और चलूँ, मेरा उद्धार निश्चित है और मैं अन्त में स्वर्ग पहुँचूँगा ही। पवित्रता के लिए उपदेश — व्यवस्था की बातें हैं। जागते रहने और अपने आप को क्रूस पर चढ़ाने की सलाह — बन्धन है। चाहे मैं गिर भी जाऊँ, परमेश्वर मुझमें कोई पाप नहीं देखता और मुझसे वैसा ही प्रेम रखता है। चाहे मैं बार-बार परीक्षा में पड़ जाऊँ, परमेश्वर मुझे पूरी तरह नाश होने नहीं देगा। सन्देहों, भयों और चिन्ताओं का क्या लाभ? मुझे पक्का भरोसा है कि मैं चुने हुए लोगों में से हूँ, और इसी रूप में मैं महिमा में पाया जाऊँगा।" यह भी एक भयंकर रोग है। परन्तु मुझे भय है कि यह भी बिलकुल असामान्य नहीं है।

अब ऐसे बोलनेवाले लोगों से क्या कहा जाए? उन्हें बहुत स्पष्ट रूप से बताने की आवश्यकता है कि वे बाइबल के एक सत्य को तोड़-मरोड़कर अपने ही विनाश का कारण बना रहे हैं, और भोजन को विष बना रहे हैं। उन्हें स्मरण दिलाना आवश्यक है कि चुनाव के विषय में उनकी धारणा अत्यन्त अपवित्रशास्त्रीय है। बाइबल के अनुसार चुनाव वैसा नहीं है जैसा वे समझते हैं। यह उतने ही महत्त्वपूर्ण अन्य सत्यों से अत्यन्त घनिष्ठ रूप से जुड़ा है, और इन सत्यों से इसे कभी अलग नहीं करना चाहिए। जिन सत्यों को परमेश्वर ने जोड़ा है, उन्हें अलग करने का साहस किसी मनुष्य को कभी न करना चाहिए।

(क) पहली बात यह कि चुनाव के सिद्धान्त का उद्देश्य कभी यह नहीं था कि मनुष्य की अपनी आत्मा की दशा के प्रति उसका उत्तरदायित्व समाप्त हो जाए। बाइबल सर्वत्र मनुष्यों को स्वतंत्र कर्ता के रूप में सम्बोधित करती है, ऐसे प्राणियों के रूप में जो परमेश्वर के प्रति उत्तरदायी हैं, न कि मात्र लकड़ी, ईंट और पत्थर के रूप में। यह कहना झूठ है कि लोगों से बुराई छोड़ने, भलाई करना सीखने, मन फिराने, विश्वास करने, परमेश्वर की ओर फिरने और प्रार्थना करने को कहना व्यर्थ है। पवित्रशास्त्र में सर्वत्र यह एक प्रमुख सिद्धान्त है कि मनुष्य अपनी आत्मा को खो सकता है, और यदि वह अन्त में खोया जाए तो यह उसी का दोष होगा, और उसका लहू उसी के सिर पर होगा। जो प्रेरित बाइबल चुनाव के इस सिद्धान्त को प्रकट करती है, वही बाइबल इन वचनों को भी रखती है, "हे इस्राएल के घराने, तुम क्यों मरो?" "तुम जीवन पाने के लिये मेरे पास आना नहीं चाहते।" "और दण्ड की आज्ञा का कारण यह है कि ज्योति जगत में आई है, और मनुष्यों ने अन्धकार को ज्योति से अधिक प्रिय जाना, क्योंकि उनके काम बुरे थे।" (यहेजकेल 18:31; यूहन्ना 5:40; 3:19.) बाइबल कभी नहीं कहती कि पापी इसलिए स्वर्ग से चूकते हैं कि वे चुने हुए नहीं हैं — परन्तु इसलिए कि वे "ऐसे बड़े उद्धार की उपेक्षा" करते हैं, और इसलिए कि वे मन फिराना और विश्वास करना नहीं चाहते। अन्तिम न्याय भली-भाँति प्रमाणित कर देगा कि जो आत्माएँ नाश होती हैं, उनके नाश का कारण परमेश्वर के चुनाव की कमी उतना नहीं, जितना आलस्य, पाप का प्रेम, अविश्वास और मसीह के पास आने की अनिच्छा है।

(ख) दूसरी बात यह कि चुनाव के सिद्धान्त का उद्देश्य कभी यह नहीं था कि प्रत्येक पापी को उद्धार का पूर्ण और निःशुल्क निमन्त्रण देने में बाधा पड़े। प्रचार करने और भलाई करने का प्रयत्न करने में हमें अधिकार है और आज्ञा भी है कि हर पुरुष, स्त्री और बालक के सामने खुला द्वार रखें, और सबको भीतर आने का निमन्त्रण दें। हम नहीं जानते कि परमेश्वर के चुने हुए कौन हैं, और वह किसे बुलाना और परिवर्तित करना चाहता है। हमारा कर्तव्य है कि सबको निमन्त्रण दें। प्रत्येक अपरिवर्तित आत्मा से, बिना किसी अपवाद के, हमें कहना चाहिए, "परमेश्वर तुझ से प्रेम करता है, और मसीह तेरे लिए मरा।" प्रत्येक से हमें कहना चाहिए, "जाग — मन फिरा — विश्वास कर — मसीह के पास आ — परिवर्तित हो — फिर — परमेश्वर को पुकार — सकेत द्वार से प्रवेश करने का यत्न कर — आ, क्योंकि सब कुछ तैयार है।" हमें यह बताना कि चुने हुओं को छोड़ कोई सुनकर उद्धार नहीं पाएगा, बिलकुल अनावश्यक है। हम यह भली-भाँति जानते हैं। परन्तु यह कहना कि इस कारण किसी को भी उद्धार का प्रस्ताव देना व्यर्थ है, सरासर मूर्खता है। हम कौन हैं जो यह जानने का दावा करें कि अन्त में परमेश्वर के चुने हुओं में कौन पाया जाएगा? नहीं, कदापि नहीं! जो अभी पहले दिखते हैं वे पिछले ठहर सकते हैं, और जो पिछले दिखते हैं वे न्याय के दिन पहले ठहर सकते हैं। हम सबको निमन्त्रण देंगे, इस दृढ़ विश्वास के साथ कि निमन्त्रण से कुछ का भला होगा। यदि परमेश्वर आज्ञा दे तो हम सूखी हड्डियों से भी भविष्यद्वाणी करेंगे। हम सबको जीवन का प्रस्ताव देंगे, चाहे बहुत से उसे ठुकरा दें। ऐसा करने में हम विश्वास करते हैं कि हम अपने स्वामी और उसके प्रेरितों के पदचिह्नों पर चलते हैं।

(ग) तीसरी बात यह कि चुनाव केवल अपने फलों से जाना जा सकता है। परमेश्वर के चुने हुओं को उनसे जो चुने हुए नहीं हैं, केवल उनके विश्वास और जीवन से पहचाना जा सकता है। हम परमेश्वर की अनन्त योजनाओं के भेद में चढ़ नहीं सकते। हम जीवन की पुस्तक नहीं पढ़ सकते। किसी मनुष्य के आचरण में दिखाई देनेवाले और प्रकट होनेवाले आत्मा के फल ही वे एकमात्र आधार हैं जिन पर हम निश्चय कर सकते हैं कि वह परमेश्वर के चुने हुओं में से है। जहाँ परमेश्वर के चुने हुओं के चिह्न दिखाई देते हैं, वहीं, और केवल वहीं, हमें यह कहने का अधिकार है कि "यह चुने हुओं में से है।" मैं कैसे जानूँ कि समुद्र के क्षितिज पर वह दूर का जहाज़ कोई मल्लाह या खेवैया चला रहा है? सबसे अच्छी दूरबीन से भी मैं उसके मस्तूलों और पालों के सिवा कुछ नहीं देख सकता। फिर भी मैं उसे एक ही दिशा में स्थिरता से चलते देखता हूँ। मेरे लिए यही पर्याप्त है। इससे मैं जान लेता हूँ कि भीतर कोई मार्गदर्शक हाथ है, चाहे मैं उसे देख न सकूँ। परमेश्वर के चुनाव के साथ ठीक ऐसा ही है। उस अनन्त आदेश को हम किसी रीति से नहीं देख सकते। परन्तु उस आदेश का परिणाम छिप नहीं सकता। जब पौलुस ने थिस्सलुनीकियों के विश्वास, आशा और प्रेम को स्मरण किया, तब वह पुकार उठा, मैं "तुम्हारे चुने जाने को जानता हूँ।" (1 थिस्सलुनीकियों 1:4.) हमारे सामने के इस विषय पर विचार करते समय हम इस सिद्धान्त को सदा दृढ़ता से थामे रहें। जो मनुष्य पाप में जी रहा है, उसके चुने हुए होने की बात करना निन्दा-भरी मूर्खता से अधिक कुछ नहीं। बाइबल "पवित्रीकरण" के बिना कोई चुनाव नहीं जानती; इसके सिवा कोई अनन्त चुनाव नहीं कि हम "पवित्र" हों; इसके सिवा कोई पूर्वनियति नहीं कि हम "परमेश्वर के पुत्र के स्वरूप में हो जाएँ।" जब ये बातें अनुपस्थित हों, तब चुनाव की बात करना केवल समय की बर्बादी है। (1 पतरस 1:2; इफिसियों 1:4; रोमियों 8:29.)

(घ) अन्त में—पर कम महत्त्व का नहीं—चुनाव का उद्देश्य कभी यह नहीं था कि लोग अनुग्रह के साधनों का परिश्रम से उपयोग करना छोड़ दें। इसके विपरीत, साधनों की उपेक्षा बहुत संदेहजनक लक्षण है, और उससे मनुष्य की आत्मा की दशा के विषय में हमें गहरा सन्देह होना चाहिए। जिन्हें पवित्र आत्मा खींचता है, उन्हें वह सदा परमेश्वर के लिखित वचन और प्रार्थना की ओर खींचता है। जब किसी हृदय में परमेश्वर का सच्चा अनुग्रह होता है, तब अनुग्रह के साधनों के प्रति प्रेम भी अवश्य होता है। पवित्रशास्त्र क्या कहता है? रोम के जिन मसीहियों को पौलुस ने पूर्वज्ञान और पूर्वनियति के विषय में लिखा, उन्हीं से वह कहता है, "प्रार्थना में नित्य लगे रहो।" (रोमियों 12:12।) जो इफिसियों "जगत की उत्पत्ति से पहले चुने गए" थे, उन्हीं से कहा गया है, "परमेश्वर के सारे हथियार बाँध लो—आत्मा की तलवार ले लो—हर प्रकार की प्रार्थना के साथ सदा प्रार्थना करते रहो।" (इफिसियों 6:18।) जिन थिस्सलुनीकियों के चुनाव को पौलुस ने "जाना" था, उन्हीं मसीहियों से वह उसी पत्री में पुकारकर कहता है, "निरन्तर प्रार्थना करते रहो।" (1 थिस्सलुनीकियों 5:17।) जिन मसीहियों को पतरस "परमेश्वर पिता के पूर्वज्ञान के अनुसार चुने हुए" कहता है, उन्हीं से वह कहता है, "वचन के निर्मल दूध की लालसा करो—प्रार्थना के लिए सचेत रहो।" (1 पतरस 2:2; 4:7।) इन जैसे वचनों की साक्षी निरुत्तर कर देनेवाली और अकाट्य है। मैं इन पर कोई टिप्पणी करके समय नष्ट नहीं करूँगा। उद्धार के लिए ऐसा चुनाव, जो लोगों को अनुग्रह के सब साधनों के प्रयोग से मुक्त रहना सिखाए, अज्ञानी लोगों, उन्मादियों और व्यवस्था-विरोधियों को भले ही भाए। परन्तु मैं कहने का साहस करता हूँ कि ऐसे चुनाव का उल्लेख मुझे परमेश्वर के वचन में कहीं नहीं मिलता।

इस विषय के इस भाग को समाप्त करने के लिए मैं इंग्लैंड की कलीसिया के सत्रहवें अनुच्छेद के अन्तिम भाग को उद्धृत करने से उत्तम कुछ नहीं जानता। मैं इसे अपने सब पाठकों के विशेष ध्यान के लिए, और विशेषकर इसके अन्तिम अनुच्छेद के लिए, प्रस्तुत करता हूँ। "जैसे पूर्वनियति और मसीह में हमारे चुनाव का भक्तिपूर्ण मनन भक्त लोगों के लिए, अर्थात् उनके लिए जो अपने भीतर मसीह के आत्मा का कार्य अनुभव करते हैं, जो शरीर के कामों और अपने सांसारिक अंगों को मार रहा है और उनके मन को ऊँची और स्वर्गीय बातों की ओर खींच रहा है, मधुर, सुखद और अकथनीय सांत्वना से भरा है—क्योंकि वह मसीह के द्वारा मिलनेवाले अनन्त उद्धार में उनके विश्वास को अत्यन्त दृढ़ और स्थिर करता है, और परमेश्वर के प्रति उनके प्रेम को उत्कट रूप से प्रज्वलित करता है— वैसे ही जिज्ञासु और शारीरिक लोगों के लिए, जिनमें मसीह का आत्मा नहीं है, परमेश्वर की पूर्वनियति के निर्णय को निरन्तर अपनी आँखों के सामने रखना अत्यन्त भयंकर पतन है, जिसके द्वारा शैतान उन्हें या तो निराशा में, या अत्यन्त अशुद्ध जीवन की दुर्दशा में धकेल देता है, जो निराशा से कम खतरनाक नहीं है।

"इसके अतिरिक्त, हमें परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं को उसी रीति से ग्रहण करना चाहिए जैसे वे पवित्रशास्त्र में हमारे सामने सामान्य रूप से रखी गई हैं; और अपने कामों में परमेश्वर की उसी इच्छा का पालन करना चाहिए जो परमेश्वर के वचन में हम पर स्पष्ट रूप से प्रकट की गई है।"

ये बुद्धि की बातें हैं। यह ऐसा खरा वचन है जिस पर दोष नहीं लगाया जा सकता। इस कथन में निहित सिद्धान्त को हम सदा दृढ़ता से थामे रहें। मसीह की कलीसिया के लिए कितना अच्छा होता यदि चुनाव के सिद्धान्त को सदा इसी रीति से सँभाला गया होता। उन सब मसीहियों के लिए कितना अच्छा होगा, जो इस महान सिद्धान्त की ऊँचाइयों और गहराइयों से उलझन में हैं, यदि वे पवित्रशास्त्र के इन शब्दों को स्मरण रखें, "गुप्त बातें हमारे परमेश्वर यहोवा के वश में हैं; परन्तु जो प्रकट की गई हैं वे सदा के लिए हमारे और हमारे वंश के हैं, कि हम इस व्यवस्था की सब बातों पर चलें।" (व्यवस्थाविवरण 29:29।)

अब मैं सम्पूर्ण विषय का समापन कुछ सीधे और व्यक्तिगत शब्दों में उपयोग के साथ करता हूँ।

(1) सबसे पहले मैं इस लेख के प्रत्येक पाठक से विनती करता हूँ कि वह चुनाव के सिद्धान्त को केवल इसलिए अस्वीकार न करे कि वह गूढ़, रहस्यमय और समझने में कठिन है। क्या ऐसा करना श्रद्धापूर्ण है? क्या यह परमेश्वर के वचन के साथ वह आदर है जो प्रकाशन के योग्य है? क्या जो बात हमारी शिक्षा के लिए लिखी गई है उसे अस्वीकार करना, और केवल इसलिए उसे कठोर नाम देना कि कुछ भटके हुए लोगों ने उसका दुरुपयोग करके उसे बुरे उद्देश्य में लगाया, उचित है? ये गम्भीर प्रश्न हैं। ये गम्भीर विचार के योग्य हैं। यदि लोग पवित्रशास्त्र के किसी सत्य को केवल इसलिए ठुकराने लगें कि वह उन्हें अच्छा नहीं लगता, तो वे फिसलन भरी भूमि पर हैं। कहा नहीं जा सकता कि वे कितनी दूर गिरेंगे।

आख़िर चुनाव के सिद्धान्त को अस्वीकार करके लोग पाते क्या हैं? क्या चुनाव को नकारनेवालों की प्रणाली उसे माननेवालों की प्रणाली से एक भी आत्मा अधिक बचाती है? निश्चय नहीं। क्या चुनाव को माननेवाले स्वर्ग का मार्ग संकरा कर देते हैं और उसे नकारनेवालों से उद्धार को अधिक कठिन बना देते हैं? निश्चय नहीं। चुनाव के विरोधी कहते हैं कि केवल वही बचाए जाएँगे जो मन फिराएँ और विश्वास करें। अच्छा—चुनाव के पक्षधर भी ठीक यही कहते हैं! चुनाव के विरोधी ऊँचे स्वर में घोषणा करते हैं कि स्वर्ग में केवल पवित्र लोग ही जाते हैं। अच्छा—चुनाव के पक्षधर भी वही शिक्षा उतने ही ऊँचे स्वर में घोषित करते हैं! तो मैं फिर पूछता हूँ, चुनाव के सत्य को नकारने से क्या मिलता है? मेरा उत्तर है, कुछ भी नहीं। फिर भी, जबकि कुछ नहीं मिलता, बहुत बड़ी सांत्वना खो जाती है। यह सुनना कि परमेश्वर ने मेरे मन फिराने और विश्वास करने से पहले मेरे विषय में कभी सोचा ही नहीं था, ठण्डी सांत्वना है। परन्तु यह जानना और अनुभव करना कि जगत की उत्पत्ति से पहले परमेश्वर की दया की योजनाएँ मेरे लिए थीं, और मेरे हृदय में अनुग्रह का सारा कार्य एक अनन्त वाचा और सनातन चुनाव का परिणाम है—यह विचार मधुर और अकथनीय सांत्वना से भरा है। जो कार्य जगत की उत्पत्ति से पहले सर्वशक्तिमान और परम बुद्धिमान रचनाकार द्वारा रचा गया हो, वह कार्य कभी विफल होने और गिराए जाने नहीं दिया जाएगा।

(2) अगले स्थान पर, मैं इस लेख के हर पाठक से विनती करता हूँ कि वह चुनाव के इस सिद्धान्त के निकट सही सिरे से आए, और सत्य के क्रम को उलटकर अपने मन को उलझन में न डाले। वह मसीही विश्वास के पहले तत्वों से आरम्भ करे—अर्थात् परमेश्वर के प्रति सच्चे मन फिराव और हमारे प्रभु यीशु मसीह के प्रति विश्वास से—और उन्हीं के सहारे चुनाव की ओर बढ़े। वह अपना समय इस बात में न गँवाए कि पहले अपने ही चुनाव के विषय में पूछताछ करे। वह पहले चुने हुए मनुष्य के स्पष्ट चिह्नों पर ध्यान दे, और जब तक वे चिह्न उसके अपने न हो जाएँ तब तक चैन न ले। वह हर जानी हुई पाप से मुँह मोड़े, और क्षमा, शान्ति, दया और अनुग्रह के लिये मसीह की ओर भागे। वह प्रार्थना में परमेश्वर को ज़ोर से पुकारे, और जब तक अपने भीतर आत्मा की सच्ची गवाही न पाए, तब तक प्रभु को चैन न दे। जो इस रीति से आरम्भ करता है, वह किसी दिन परमेश्वर के चुनने वाले अनुग्रह के लिये उसका धन्यवाद करेगा—यदि समय में नहीं तो अनन्तकाल में। एक पुरानी और अनूठी कहावत है, पर बहुत सच्ची है: "मनुष्य को चुनाव और पूर्वनियति के बड़े विश्वविद्यालय में प्रवेश करने से पहले मन फिराव और विश्वास की छोटी पाठशाला में जाना चाहिए।"

सीधी सच्ची बात यह है कि परमेश्वर की उद्धार की योजना एक ऐसी सीढ़ी के समान है जो स्वर्ग से पृथ्वी तक उतारी गई है, कि पवित्र परमेश्वर और पापी प्राणी मनुष्य को आपस में मिला दे। परमेश्वर सीढ़ी के ऊपरी सिरे पर है और मनुष्य निचले सिरे पर। सीढ़ी का ऊपरी सिरा बहुत ऊँचा है, हमारी दृष्टि से परे, और हमारे पास उसे देखने की आँखें नहीं हैं। उस सीढ़ी के ऊपरी सिरे पर परमेश्वर के अनन्त उद्देश्य हैं—उसकी सनातन वाचा, उसका चुनाव, और मसीह के द्वारा उद्धार पाने के लिये एक प्रजा की उसकी पूर्वनियति। उस सीढ़ी के ऊपर से पापियों के लिये दया का वह भरपूर और धनी प्रबन्ध उतरता है, जो हम पर सुसमाचार में प्रकट किया गया है। उस सीढ़ी का निचला सिरा पृथ्वी पर पापी मनुष्य के निकट है, और मन फिराव तथा विश्वास की सीधी-सादी सीढ़ियों से बना है। उन्हीं से उसे ऊपर चढ़ना आरम्भ करना होगा। उनके नम्रतापूर्वक प्रयोग से वह हर वर्ष और ऊपर चढ़ेगा, और आने वाली अच्छी बातों की स्पष्ट झलकें पाता जाएगा। इससे अधिक स्पष्ट बात क्या हो सकती है कि जो सीढ़ियाँ हमारे हाथ के पास हैं उनका प्रयोग करना हमारा कर्तव्य है? इससे अधिक मूर्खता की बात क्या हो सकती है कि कोई कहे, "जब तक मैं ऊपर की सीढ़ियों को स्पष्ट रूप से नहीं समझ लेता, तब तक मैं नीचे की सीढ़ी पर पाँव नहीं रखूँगा"? ऐसे हठीले और बचकाने तर्कों को दूर करो! यदि हम केवल सामान्य बुद्धि से काम लें, तो वही हमें कर्तव्य का मार्ग बता दे। वह कर्तव्य यह है कि सीधी-सादी सच्चाइयों का सच्चे मन से प्रयोग करें, और फिर विश्वास करें कि ऊँची सच्चाइयाँ किसी दिन हमारी आँखों के सामने स्पष्ट कर दी जाएँगी। अनन्त परमेश्वर का प्रेम किस रीति और किस प्रकार हम तक उतरता है, इसमें बहुत कुछ ऐसा हो सकता है जिसे हम जैसे तुच्छ कीड़ों के लिये समझना कठिन है। परन्तु हम पापी परमेश्वर के निकट कैसे आएँ, यह दोपहर के सूर्य के समान स्पष्ट और साफ़ है। यीशु मसीह हमारे सामने खड़ा कह रहा है, "मेरे पास आओ!" हम संदेह करने, बाल की खाल निकालने और विवाद करने में समय न गँवाएँ। हम जैसे हैं वैसे ही तुरन्त मसीह के पास आएँ। हम उसे थाम लें और विश्वास करें!

(3) अन्त में, मैं इस लेख को पढ़ने वाले हर सच्चे मसीही से विनती करता हूँ कि वह पतरस की इस चेतावनी को स्मरण रखे, "अपने बुलाए जाने और चुन लिये जाने को सिद्ध करने का भली भाँति यत्न करते जाओ।" (2 पतरस 1:10)।

तुम अपने चुनाव को परमेश्वर की दृष्टि में उससे अधिक निश्चित नहीं कर सकते जितना वह अनन्तकाल से रहा है। उसके यहाँ कोई अनिश्चितता नहीं है। परमेश्वर अपने लोगों के लिये जो कुछ करता है, उसमें से कुछ भी संयोग पर नहीं छोड़ा जाता, और न ही वह बदल सकता है। परन्तु तुम्हारे अपने लिये और कलीसिया के लिये तुम्हारा चुनाव और अधिक निश्चित और स्पष्ट किया जा सकता है; और यही वह बात है जिस पर मैं तुम्हारा ध्यान दिलाना चाहता हूँ। आशा की ऐसी दृढ़ नींव वाली निश्चयता पाने का यत्न करो कि, जैसा यूहन्ना कहता है, तुम "जान सको कि हम उसे जान गए हैं।" (1 यूहन्ना 2:3)। इस संसार में इस रीति से जीने और चलने का यत्न करो कि सब लोग तुम्हें परमेश्वर की सन्तानों में से एक पहचानें, और उन्हें कोई संदेह न रहे कि तुम स्वर्ग जा रहे हो।

उन लोगों की बात पर एक क्षण के लिये भी कान न दो जो तुमसे कहते हैं कि इस जीवन में हम अपनी आत्मिक दशा के विषय में कभी निश्चित नहीं हो सकते, और हमें सदा संदेह में ही रहना होगा। रोमन कैथोलिक ऐसा कहते हैं। अज्ञानी संसार ऐसा कहता है। शैतान ऐसा कहता है। परन्तु बाइबल ऐसा कुछ नहीं कहती। मसीह में अपने ग्रहण किए जाने की दृढ़ निश्चयता जैसी भी कोई बात होती है, और मसीही को तब तक चैन नहीं लेना चाहिए जब तक वह उसे पा न ले। मैं यह इनकार नहीं करता कि मनुष्य इस दृढ़ निश्चयता के बिना भी उद्धार पा सकता है। परन्तु मुझे पूरा निश्चय है कि उसके बिना वह एक बड़े विशेषाधिकार और बहुत सी शान्ति से वंचित रह जाता है।

इसलिये पूरे यत्न के साथ "अपने बुलाए जाने और चुन लिये जाने को सिद्ध करने" का प्रयत्न करो। "हर एक बोझ और उलझाने वाले पाप को दूर करो।" (इब्रानियों 12:2)। यदि आवश्यकता हो तो दाहिना हाथ काट डालने और दाहिनी आँख निकाल फेंकने को तैयार रहो। अपने मन में यह दृढ़ता से ठान लो कि कब्र के इस पार सबसे बड़ा विशेषाधिकार यही जानना है कि तुम परमेश्वर की सन्तानों में से एक हो।

जो लोग इस संसार में पद और अधिकार के लिये होड़ लगाते हैं, वे निश्चय ही निराश होंगे। जब वे सब कुछ कर चुके और पूरी तरह सफल हो चुके, तब भी उनका सम्मान उन्हें पूरी तरह सन्तुष्ट नहीं करता, और उनके प्रतिफल क्षणिक होते हैं। संसद की कुर्सियाँ और मंत्रिमण्डल के पद एक दिन सब छोड़ने पड़ते हैं। अधिक से अधिक वे कुछ ही वर्षों तक रखे जा सकते हैं। परन्तु जो परमेश्वर के चुने हुओं में से एक है, उसके पास ऐसा धन है जो उससे कभी छीना नहीं जा सकता, और ऐसा स्थान है जहाँ से वह कभी हटाया नहीं जा सकता। धन्य है वह मनुष्य जो इस चुनाव पर अपना मन लगाता है। परमेश्वर के चुनाव जैसा कोई चुनाव नहीं है!

अन्त तक स्थिर रहना

"वे कभी नाश न होंगी।" यूहन्ना 10:28

धर्म में दो बातें ऐसी हैं जिन पर बाइबल की शिक्षा बहुत स्पष्ट और सुनिश्चित है। इनमें से एक बात अधर्मियों का भयानक संकट है; दूसरी धर्मियों की पूर्ण सुरक्षा है। एक बात उन लोगों का आनन्द है जिनका मन फिराव हुआ है; दूसरी उन लोगों का दुःख है जिनका मन नहीं फिरा। एक बात स्वर्ग के मार्ग पर होने का सौभाग्य है; दूसरी नरक के मार्ग पर होने की दुर्दशा है।

मैं इसे अत्यन्त महत्त्वपूर्ण मानता हूँ कि ये दोनों बातें मसीही कहलानेवालों के मन पर निरन्तर अंकित की जाएँ। मेरा विश्वास है कि परमेश्वर की सन्तानों के अपार विशेषाधिकार और संसार की सन्तानों का भयंकर संकट मसीह की कलीसिया के सामने सदैव अत्यन्त स्पष्ट रंगों में रखा जाना चाहिए। मेरा विश्वास है कि मसीह में रहनेवाले मनुष्य और मसीह में न रहनेवाले मनुष्य के बीच के भेद को कभी भी अत्यधिक दृढ़ता और पूर्णता से नहीं कहा जा सकता। इस विषय में संकोच करना लोगों की आत्माओं के लिए निश्चित हानि है। जहाँ ऐसा संकोच किया जाता है, वहाँ लापरवाह जागृत नहीं होते, विश्वासी स्थिर नहीं होते, और परमेश्वर के काम की बड़ी हानि होती है।

मुझे भय है कि बहुत से लोग नहीं जानते कि बाइबल में सच्चे मसीहियों के विशेष लाभ के लिए सांत्वना देनेवाले सत्यों का कितना विशाल भण्डार है। परमेश्वर के वचन में एक आत्मिक कोषागार है जिसमें बहुत से लोग कभी प्रवेश नहीं करते, और कुछ की आँखों ने उसे देखा तक नहीं। वहाँ तुम्हें मन फिराव, विश्वास और मन-परिवर्तन के पुराने मूल सिद्धान्तों के अतिरिक्त अनेक सुनहरे सत्य मिलेंगे। वहाँ तुम्हें महिमामय क्रम में दिखाई देगा: मसीह में पवित्र लोगों का अनन्त चुनाव—वह विशेष प्रेम जिससे परमेश्वर ने जगत की उत्पत्ति से पहले उनसे प्रेम किया—स्वर्ग में अपने जी उठे सिर के साथ उनकी रहस्यमय एकता, और उसके फलस्वरूप उसकी उनके प्रति सहानुभूति—उनके महायाजक यीशु की निरन्तर मध्यस्थता की प्रार्थना में उनका भाग—पिता और पुत्र के साथ प्रतिदिन सहभागिता की उनकी स्वतन्त्रता, आशा की उनकी पूर्ण निश्चयता—और अन्त तक उनका स्थिर रहना। ये उन बहुमूल्य वस्तुओं में से कुछ हैं जो पवित्रशास्त्र में परमेश्वर से प्रेम रखनेवालों के लिए रखी गई हैं। ये ऐसे सत्य हैं जिनकी कुछ लोग अज्ञानता के कारण उपेक्षा करते हैं। उन स्पेनवासियों की तरह, जो कैलिफ़ोर्निया के स्वामी थे, वे अपने पाँवों के नीचे की समृद्ध खानों को नहीं जानते, वे खानें जिनसे अमेरिकियों ने अपार धन निकाला है। ये ऐसे सत्य हैं जिनकी कुछ लोग झूठी नम्रता के कारण उपेक्षा करते हैं। वे उन्हें दूर से भय और काँपते हुए देखते हैं, पर उन्हें छूने का साहस नहीं करते। परन्तु ये ऐसे सत्य हैं जो परमेश्वर ने हमारी शिक्षा के लिए दिए हैं, और जिनका अध्ययन करना हमारा कर्तव्य है। उनकी उपेक्षा करके अपनी ही हानि न करना असम्भव है।

विश्वासी के विशेषाधिकारों की सूची में से एक विशेष सत्य की ओर मैं अब ध्यान आकर्षित करना चाहता हूँ। वह सत्य अन्त तक स्थिर रहने का सिद्धान्त है—यह सिद्धान्त कि सच्चे मसीही कभी नष्ट नहीं होंगे और न त्यागे जाएँगे। यह ऐसा सत्य है जिसका स्वाभाविक मन ने हर युग में कड़ा विरोध किया है। यह ऐसा सत्य है जो अनेक कारणों से वर्तमान समय में विशेष ध्यान का अधिकारी है। सबसे बढ़कर, यह ऐसा सत्य है जिससे परमेश्वर की सब सन्तानों का सुख अत्यन्त निकटता से जुड़ा है।

अन्त तक स्थिर रहने के विषय पर विचार करते हुए मैं चार काम करने का प्रस्ताव करता हूँ।

I. मैं समझाऊँगा कि अन्त तक स्थिर रहने के सिद्धान्त का क्या अर्थ है।

II. मैं उन पवित्रशास्त्रीय आधारों को दिखाऊँगा जिन पर यह सिद्धान्त टिका है।

III. मैं कुछ कारण बताऊँगा कि बहुत से लोग इस सिद्धान्त को क्यों अस्वीकार करते हैं।

IV. मैं कुछ कारण बताऊँगा कि यह सिद्धान्त व्यावहारिक रूप से इतना महत्त्वपूर्ण क्यों है।

मैं इस विषय के निकट संकोच के साथ आता हूँ, क्योंकि मैं जानता हूँ कि यह ऐसा विषय है जिस पर पवित्र लोग एक-सा नहीं देखते। परन्तु परमेश्वर मेरा साक्षी है कि इस लेख को लिखने में मेरी इच्छा पवित्रशास्त्रीय सत्य के अतिरिक्त किसी और उद्देश्य को बढ़ाने की नहीं है। अन्त तक स्थिर रहने का पक्ष लेते हुए मैं शुद्ध विवेक से कह सकता हूँ कि मुझे पूरा विश्वास है कि मैं मसीह के सुसमाचार के एक महत्त्वपूर्ण भाग का पक्ष ले रहा हूँ। परमेश्वर पवित्र आत्मा लेखक और पाठक दोनों को सब सत्य में ले चले! वह धन्य दिन शीघ्र आए जब सब लोग प्रभु को पूर्ण रीति से जानें, और मतभेद और फूट सदा के लिए मिट जाएँ!

I. पहले मैं समझाऊँगा कि अन्त तक स्थिर रहने के सिद्धान्त से मेरा क्या तात्पर्य है।

इस बात को स्पष्ट करना अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। यही इस विषय की नींव है। यह सम्पूर्ण तर्क की देहली पर स्थित है। धर्मविज्ञान के विवादित विषयों की सब चर्चाओं में शब्दों की परिभाषा में अत्यधिक सटीक होना असम्भव है। अन्त तक स्थिर रहने के सिद्धान्त पर जो आधी गाली-गलौज दुर्भाग्य से की गई है, वह इस सिद्धान्त को सर्वथा गलत समझने से उत्पन्न हुई है। इसके विरोधियों ने अपने ही रचे हुए भूतों से युद्ध किया है, और हवा को पीटने में अपना बल व्यर्थ गँवाया है।

जब मैं अन्त तक स्थिर रहने के सिद्धान्त की बात करता हूँ, तो मेरा तात्पर्य यह है। मैं कहता हूँ कि बाइबल सिखाती है कि सच्चे विश्वासी, वास्तविक और सच्चे मसीही, अपने जीवन के अन्त तक अपने धर्म में स्थिर रहेंगे। वे कभी नष्ट नहीं होंगे। वे कभी खोए नहीं जाएँगे। वे कभी त्यागे नहीं जाएँगे। एक बार मसीह में होने पर वे सदा मसीह में रहेंगे। एक बार लेपालकपन और अनुग्रह से परमेश्वर की सन्तान बन जाने पर वे कभी उसकी सन्तान होना बन्द नहीं करेंगे और शैतान की सन्तान नहीं बनेंगे। एक बार आत्मा का अनुग्रह पा लेने पर वह अनुग्रह उनसे कभी छीना नहीं जाएगा। एक बार क्षमा और पापमुक्ति पा लेने पर वे अपनी क्षमा से कभी वंचित नहीं किए जाएँगे। एक बार जीवित विश्वास से मसीह से जुड़ जाने पर उनका यह मेल कभी नहीं टूटेगा। एक बार परमेश्वर द्वारा उस सकरे मार्ग में बुलाए जाने पर, जो जीवन की ओर ले जाता है, उन्हें कभी नरक में गिरने नहीं दिया जाएगा। एक शब्द में, पृथ्वी पर हर पुरुष, स्त्री और बच्चा जो उद्धार करनेवाला अनुग्रह पाता है, देर-सबेर अनन्त महिमा पाएगा। हर आत्मा जो एक बार धर्मी ठहराई गई और मसीह के लहू से धोई गई, अन्ततः न्याय के दिन मसीह के दाहिने हाथ पर सुरक्षित पाई जाएगी।

ऐसे कथन अत्यन्त दृढ़ सुनाई देते हैं। यह मैं भली-भाँति जानता हूँ। परन्तु मैं विषय को यहीं नहीं छोड़ने जा रहा—मुझे इस पर थोड़ी देर और ठहरना है। जिस सिद्धान्त का मैं पक्ष ले रहा हूँ, उसे मैं उस गलत प्रस्तुति के बादल से साफ़ करना चाहता हूँ जिससे बहुत से लोग उसे धुँधला करते हैं। मैं चाहता हूँ कि लोग इसे इसके अपने सही रूप में देखें—उस रूप में नहीं जैसा अज्ञानता और पक्षपात के हाथ इसे चित्रित करते हैं—परन्तु उस रूप में जैसा यह सत्य के पवित्रशास्त्र में प्रस्तुत किया गया है।

(क) अन्त तक स्थिर रहना ऐसा सिद्धान्त है जिससे अभक्त और सांसारिक लोगों का कोई सम्बन्ध नहीं। यह उस विशाल भीड़ से सम्बन्ध नहीं रखता जिनके पास मसीही धर्म के नाम के सिवा न ज्ञान है, न विचार, न विश्वास, न भय, न और कुछ। उनके विषय में यह सच नहीं कि वे "कभी नष्ट न होंगे।" इसके विपरीत, यदि वे मन न फिराएँ तो उनका अन्त दुःखद होगा।

(ख) अन्त तक स्थिर रहना ऐसा सिद्धान्त है जिससे कपटियों और झूठे अंगीकार करनेवालों का कोई सम्बन्ध नहीं है। यह उन अभागे लोगों का नहीं है जिनका धर्म केवल बातों और शब्दों में और भक्ति के दिखावे में है, जबकि उनके हृदय पवित्र आत्मा के अनुग्रह से सर्वथा खाली हैं।

उनके विषय में यह सच नहीं कि वे "कभी नष्ट न होंगे।" इसके विपरीत, यदि वे मन न फिराएँ तो सदा के लिए खो जाएँगे।

"हम यह नहीं मानते कि जिन्हें अत्यन्त विवेकी सेवक या मसीही सच्चे मसीही समझता है, वे सब 'परमेश्वर की सामर्थ्य से विश्वास के द्वारा उद्धार के लिए सुरक्षित रखे जाएँगे।' हृदय को केवल परमेश्वर ही जाँच सकता है, और वह उस विश्वास को मृत और अस्थायी देख सकता है जिसे हम प्रेम के निर्णय में जीवित और स्थायी समझते हैं।"—स्कॉट

(ग) अन्त तक स्थिर रहना सच्चे, यथार्थ आत्मिक मसीहियों का विशेष अधिकार है। यह मसीह की उन भेड़ों का है जो उसका शब्द सुनती और उसके पीछे चलती हैं। यह उनका है जो "प्रभु यीशु के नाम से और हमारे परमेश्वर के आत्मा से धोए गए, और पवित्र हुए, और धर्मी ठहरे।" (1 कुरिन्थियों 6:11।) यह उनका है जो मन फिराते हैं, मसीह पर विश्वास करते हैं और पवित्र जीवन जीते हैं। यह उनका है जो नए सिरे से जन्मे हैं, जिनका मन फिराव हुआ है, और जो पवित्र आत्मा के द्वारा नई सृष्टि बनाए गए हैं। यह उनका है जिनका हृदय टूटा और पिसा हुआ है, जो आत्मा की बातों पर मन लगाते हैं और आत्मा के फल लाते हैं। यह "परमेश्वर के चुने हुओं" का है, "जो रात-दिन उसकी दुहाई देते रहते हैं।" (लूका 18:7।) यह उनका है जो प्रभु यीशु को अनुभव से जानते हैं, और जिनमें विश्वास, आशा और प्रेम है। यह उनका है जो दाखलता की फल लानेवाली डालियाँ हैं—बुद्धिमान कुँवारियाँ—जगत की ज्योति—पृथ्वी का नमक—राज्य के वारिस—मेम्ने के अनुयायी। बाइबल इन्हीं को "पवित्र लोग" कहती है। और जिनके विषय में लिखा है कि वे "कभी नष्ट न होंगे," वे पवित्र लोग ही हैं, केवल वे ही।

"पवित्रशास्त्र के सत्य के सर्वथा विपरीत है यह कल्पना करना कि जो इस प्रकार नए किए गए हैं, वे फिर अनजन्मे हो सकते हैं।"—लेटन

क्या कोई यह समझता है कि मैं जो कह रहा हूँ वह केवल प्रतिष्ठित पवित्र लोगों पर लागू होता है? क्या कोई सोचता है कि प्रेरितों, भविष्यद्वक्ताओं और शहीदों जैसे लोग तो शायद अन्त तक स्थिर रहें—परन्तु साधारण विश्वासियों के विषय में यह नहीं कहा जा सकता? वह जान ले कि वह पूरी तरह भूल में है। वह जान ले कि अन्त तक स्थिर रहने का यह अधिकार परमेश्वर के सारे परिवार का है—छोटे से छोटे का भी और बड़े से बड़े का भी—निर्बल का भी और सबल का भी—अनुग्रह में बच्चों का भी और कलीसिया के पुराने से पुराने स्तम्भों का भी। सबसे छोटा विश्वास भी उतना ही निश्चय अटल रहेगा जितना सबसे बड़ा। अनुग्रह की सबसे छोटी चिंगारी भी उतनी ही न बुझनेवाली ठहरेगी जितनी सबसे प्रज्वलित और चमकती ज्योति। हो सकता है तुम्हारा विश्वास बहुत निर्बल हो, तुम्हारा अनुग्रह बहुत कमज़ोर हो, तुम्हारी शक्ति बहुत थोड़ी हो, और तुम अनुभव करो कि आत्मिक बातों में तुम केवल एक बालक हो। हो सकता है तुम अपने मन फिराव की सच्चाई पर भी सन्देह करो। फिर भी मत डरो, भयभीत न हो। प्रतिज्ञा मनुष्य के अनुग्रह की मात्रा पर नहीं, उसकी सच्चाई और खरेपन पर टिकी है। काँसे का एक पैसा भी राज्य का उतना ही सच्चा चलनेवाला सिक्का है जितनी सोने की मुहर, चाहे उसका मोल उतना न हो। जहाँ कहीं पाप से सच्चा मन फिराव है, मसीह पर सच्चा भरोसा है, और पवित्रता का सच्चा अनुसरण है—वहाँ ऐसा कार्य है जो कभी नहीं उलटा जाएगा। वह तब भी स्थिर रहेगा जब पृथ्वी और उसके सारे कार्य जल जाएँगे।

अन्त तक स्थिर रहने के विषय में अभी कुछ बातें कहनी हैं, जिन पर मैं विशेष ध्यान देने का निवेदन करता हूँ। उनके बिना इस सिद्धान्त का वर्णन अधूरा और अपूर्ण रहेगा। उनके उल्लेख से इस विषय की कुछ कठिनाइयाँ दूर हो सकती हैं, और मसीही अनुभव की कुछ ऐसी बातों पर प्रकाश पड़ सकता है जिन्हें समझना परमेश्वर की सन्तानों को कठिन लगता है।

(क) इसलिए स्मरण रखो कि जब मैं कहता हूँ कि विश्वासी अन्त तक स्थिर रहेंगे, तो मैं क्षण भर के लिए भी यह नहीं कहता कि वे कभी पाप में नहीं गिरेंगे। वे बहुत बुरी, घिनौनी और लज्जाजनक रीति से गिर सकते हैं—सच्चे धर्म की निन्दा के लिए, अपने परिवारों की हानि के लिए, और अपने गहरे और कड़वे शोक के लिए। नूह एक बार मतवालेपन में गिरा। अब्राहम ने दो बार झूठ कहा कि सारा केवल उसकी बहन है। लूत ने सदोम में अपना निवास बना लिया। याकूब ने अपने पिता इसहाक को धोखा दिया। मूसा ने अपने होठों से बिना सोचे-विचारे बात कही। दाऊद ने घोर व्यभिचार किया। सुलैमान अपना पहला प्रेम खो बैठा, और अपनी बहुत सी पत्नियों के द्वारा भटकाया गया। यहोशापात ने अहाब से सम्बन्ध जोड़ा। हिजकिय्याह परमेश्वर को भूल गया और अपनी सम्पत्ति पर घमण्ड किया। पतरस ने शपथ खाकर तीन बार अपने प्रभु का इन्कार किया। सब प्रेरित बारी में मसीह को छोड़कर भाग गए। पौलुस और बरनबास के बीच ऐसा "तीखा मतभेद" हुआ कि उन्हें अलग होना पड़ा। ये सब उदाहरण हैं। ये सब दुःखद प्रमाण हैं कि मसीही गिर सकते हैं।

परन्तु विश्वासी कभी पूरी तरह, अन्तिम रूप से और सर्वथा नहीं गिरेंगे। वे अपने गिरने से सदा मन फिराव के द्वारा फिर उठेंगे, और परमेश्वर के साथ अपनी चाल को नए सिरे से आरम्भ करेंगे। यद्यपि वे बहुत दीन किए और गिराए जाएँ, फिर भी वे अपना अनुग्रह पूरी तरह कभी नहीं खोते। वे उसका आराम खो सकते हैं—परन्तु अनुग्रह का अस्तित्व नहीं। ग्रहण में चन्द्रमा की नाईं, उनकी ज्योति कुछ समय के लिए अन्धकार में बदल जाती है; परन्तु वे त्यागे और निकाले नहीं जाते। शीतकाल के वृक्षों की नाईं, वे कुछ समय तक न पत्ते दिखाते हैं न फल; परन्तु जीवन उनकी जड़ों में बना रहता है। वे किसी दोष में पकड़े जा सकते हैं, और परीक्षा में बह सकते हैं। परन्तु वे कभी नष्ट नहीं होते।

(ब) दूसरी बात यह भी स्मरण रखिए कि जब मैं कहता हूँ कि विश्वासी अन्त तक स्थिर रहेंगे, तो मेरा अर्थ यह नहीं कि उन्हें अपनी सुरक्षा के विषय में कोई सन्देह या भय न होगा। ऐसा तो बिलकुल नहीं है; परमेश्वर के अत्यन्त पवित्र लोग भी कभी-कभी अपनी आत्मिक दशा की चिन्ताओं से बहुत व्याकुल हो जाते हैं। वे अपने हृदय में इतनी निर्बलता देखते हैं, और अपने आचरण को अपनी अभिलाषाओं से इतना कम पाते हैं, कि उन्हें अपने अनुग्रह की सच्चाई पर सन्देह करने और यह सोचने का प्रबल प्रलोभन होता है कि वे केवल कपटी हैं और स्वर्ग तक कभी न पहुँचेंगे। सुरक्षित होना एक बात है, और यह निश्चय होना कि हम सुरक्षित हैं, बिलकुल दूसरी बात है। ऐसे अनेक सच्चे विश्वासी हैं जो जीवन भर आशा की पूर्ण निश्चयता का आनन्द कभी नहीं पाते। उनका विश्वास इतना निर्बल, और उनका पाप-बोध इतना प्रबल होता है कि मसीह में अपने भाग के विषय में वे कभी निश्चिन्त नहीं हो पाते। वे बहुत बार दाऊद के समान कह सकते थे, "मैं एक न एक दिन नाश हो जाऊँगा" (1 शमूएल 27:1); और अय्यूब के समान, "मेरी आशा कहाँ रही?" (अय्यूब 17:15)। "विश्वास करने में आनन्द और शान्ति," जो कुछ लोग अनुभव करते हैं, और "आत्मा की गवाही," जो कुछ लोग पाते हैं, वे ऐसी बातें हैं जिन्हें कुछ विश्वासी, जिनके विश्वास को नकारना असम्भव है, कभी प्राप्त करते नहीं दिखाई देते। परमेश्वर के अनुग्रह से बुलाए गए होने पर भी, वे अपने बुलाए जाने की पूरी शान्ति का स्वाद कभी नहीं चखते। फिर भी वे पूरी तरह सुरक्षित हैं, चाहे वे स्वयं यह मानने से इनकार करें।

"अधिक सुखी तो हैं, पर अधिक सुरक्षित नहीं, स्वर्ग में महिमा पाई हुई आत्माएँ।"

आशा की पूर्ण निश्चयता उद्धार के लिए अनिवार्य नहीं है। उसका न होना किसी मनुष्य के अन्त तक स्थिर रहने के विरुद्ध कोई प्रमाण नहीं है। धर्मविज्ञान के उस महान गुरु जॉन बनियन ने भली-भाँति जानकर लिखा था, जब उसने हमें बताया कि डेस्पॉन्डेन्सी और मच-अफ्रेड भी क्रिस्टियाना और वैलियन्ट-फ़ॉर-द-ट्रुथ के समान अन्त में स्वर्गीय नगर में सुरक्षित पहुँचे। सबसे अधिक सन्देह करनेवाले परमेश्वर की सन्तान के विषय में भी यह उतना ही सत्य है जितना सबसे सामर्थी के विषय में, कि वह "कभी नाश न होगा।" हो सकता है वह इसे कभी अनुभव न करे। परन्तु यह सत्य है।

"हर विश्वासी यह नहीं जानता कि वह विश्वासी है, और इसलिए वह उन सब सौभाग्यों को भी नहीं जान सकता जो विश्वासियों के हैं।"—ट्रेल, 1690।

(ग) अन्त में यह स्मरण रखिए कि विश्वासियों के निश्चित रूप से स्थिर रहने का अर्थ यह नहीं कि उन्हें जागते रहने, प्रार्थना करने और साधनों का उपयोग करने की आवश्यकता नहीं, या उन्हें व्यावहारिक उपदेश देना अनावश्यक है। ऐसा तो बिलकुल नहीं है; परमेश्वर साधनों के उपयोग के द्वारा ही उन्हें विश्वास में बने रहने में समर्थ करता है। वह उन्हें "मनुष्यता की डोरियों" से खींचता है। वह चेतावनियों और सशर्त प्रतिज्ञाओं को उस व्यवस्था के अंग के रूप में काम में लाता है जिसके द्वारा वह उनकी अन्तिम सुरक्षा सुनिश्चित करता है। यही तथ्य कि वे परमेश्वर की ठहराई हुई सहायताओं और विधियों को तुच्छ जानते, इस बात का स्पष्ट प्रमाण होता कि उनमें कोई अनुग्रह नहीं और वे विनाश के मार्ग पर हैं। पौलुस को जहाज़ टूटने से पहले परमेश्वर की ओर से विशेष प्रकाशन मिला था कि वह और जहाज़ के सब लोग सुरक्षित किनारे पहुँचेंगे। परन्तु यह बात उल्लेखनीय है कि उसने सिपाहियों से कहा, "यदि ये मल्लाह जहाज़ पर न रहें तो तुम नहीं बच सकते।" (प्रेरितों के काम 27:31)। वह जानता था कि परिणाम निश्चित है, पर वह यह भी मानता था कि वह परिणाम कुछ साधनों के उपयोग से ही प्राप्त होना है। पवित्रशास्त्र में विश्वासियों के लिए जो चेतावनियाँ, सशर्त प्रतिज्ञाएँ और समझाइशें भरी पड़ी हैं, वे सब उस ईश्वरीय कार्य-विधि का अंग हैं जिससे उनका स्थिर रहना पूरा होता है। एक पुराना लेखक कहता है, "वे यह नहीं दर्शाते कि सन्त गिर सकते हैं, परन्तु वे रक्षा के उपाय हैं जो उन्हें गिरने से बचाए रखते हैं।" जो मनुष्य सोचता है कि वह ऐसी चेतावनियों के बिना भी चल सकता है और उन्हें व्यवस्थावाद कहकर तुच्छ जानता है, उस पर ठग होने का सन्देह करना उचित है, जिसका हृदय अभी तक नया नहीं हुआ। जिसे सचमुच आत्मा ने सिखाया है, उसमें प्रायः अपनी निर्बलता का दीन बोध होगा, और जो कुछ भी उसके विवेक को जगा सके और उसे सावधान रख सके, उसके लिए वह धन्यवादी होगा। जो अन्त तक स्थिर रहते हैं वे किसी साधन के अधीन नहीं हैं, पर फिर भी वे साधनों से स्वतन्त्र भी नहीं हैं। उनका अन्तिम उद्धार व्यावहारिक उपदेशों के पालन पर टिका नहीं है, परन्तु ऐसे उपदेशों पर ध्यान देने से ही वे सदा अन्त तक स्थिर बने रहेंगे। यह प्रतिज्ञा, "वे कभी नाश न होंगे," परिश्रमी, जागरूक, प्रार्थनाशील और दीन लोगों की है।

अब मैंने बता दिया कि जब मैं स्थिर रहने के सिद्धान्त की बात करता हूँ तो मेरा क्या अभिप्राय है। इस लेख में मैं जिस सिद्धान्त का समर्थन करने को तैयार हूँ, वह यही है, और केवल यही। मैं लोगों से कहता हूँ कि जो मैंने कहा है उसे भली-भाँति तौलें, और मेरे कथन को हर पक्ष से जाँचें। मुझे विश्वास है कि वह जाँच में खरा उतरेगा।

(अ) हमें यह बताने से काम नहीं चलेगा कि स्थिर रहने के इस सिद्धान्त में लापरवाह और अभक्त जीवन को बढ़ावा देने की कोई प्रवृत्ति है। ऐसा आरोप बिलकुल असत्य है। इसे न्यायसंगत रूप से सामने नहीं रखा जा सकता। जो जान-बूझकर पाप में जीता है, चाहे उसका अंगीकार कितना ही ऊँचा क्यों न हो, उसके पक्ष में मुझे एक शब्द भी नहीं कहना। वह अपने आप को धोखा दे रहा है। उसके हाथ में झूठ है। उसमें परमेश्वर के चुने हुओं का कोई चिह्न नहीं। जिस स्थिर रहने की मैं वकालत करता हूँ, वह पापियों का नहीं, सन्तों का है। वह शारीरिक और अभक्त मार्गों में स्थिर रहना नहीं, बल्कि विश्वास और अनुग्रह के मार्ग में स्थिर रहना है। मुझे ऐसा मनुष्य दिखाइए जो जान-बूझकर अपवित्र जीवन जीता है, फिर भी डींग मारता है कि वह परिवर्तित हो चुका है और कभी नाश न होगा, तो मैं साफ़ कहता हूँ कि मुझे उसमें कोई आशाजनक बात नहीं दिखती। वह सब भेद जानता हो और स्वर्गदूतों की भाषाएँ बोलता हो, फिर भी जब तक उसका जीवन नहीं बदलता, मुझे वह नरक के राजमार्ग पर दिखाई देता है।

"कोई भी पाप में छूट लेने का साहस न करे, और साधनों के उपयोग के बिना परमेश्वर द्वारा अपनी रक्षा का अनुमान न लगाए। नहीं! जिस चुनाव की योजना पर यह विजय आधारित है, उसने हमें अन्त के साथ-साथ साधनों के लिए भी चुना। जो ऐसा निष्कर्ष निकालता है, मुझे सन्देह है कि वह कभी मसीही था भी। मैं निःसंकोच कह सकता हूँ कि जिस किसी ने ठान लिया है, निश्चय कर लिया है और जान-बूझकर ढिलाई अपना ली है, वह अनुग्रह की वाचा में कभी नहीं था।"—चार्नॉक, निर्बल अनुग्रह पर। 1684।

(ब) हमें यह कह देना काफ़ी न होगा कि अन्त तक स्थिर रहने का यह सिद्धान्त मात्र कैल्विनवाद का एक अंश है। किसी सत्य को बुरा नाम देकर उसके विरुद्ध पूर्वग्रह खड़ा कर देने से सरल कुछ भी नहीं। जो सिद्धान्त लोगों को नहीं भाते, उनके साथ वे वैसा ही व्यवहार करते हैं जैसा नीरो ने आरम्भिक मसीहियों को सताते समय किया था। वे उन्हें एक भयानक पहनावा पहनाकर उपहास के लिए प्रस्तुत करते हैं और उन्हें नीचा दिखाते हैं। सन्तों के अन्त तक स्थिर रहने के साथ भी प्रायः ऐसा ही किया जाता है। लोग कैल्विनवाद पर कोई व्यंग्य कसकर उसे टाल देते हैं। अधिक उचित तो यह होता कि वे जाँचते कि क्या अन्त तक स्थिर रहने की शिक्षा बाइबल में आरम्भ से, और कैल्विन के जन्म से बहुत पहले से नहीं दी गई? निर्णय का प्रश्न यह नहीं कि यह सिद्धान्त कैल्विनवादी है या नहीं, बल्कि यह कि क्या यह पवित्रशास्त्र के अनुसार है। प्रसिद्ध हॉर्स्ली के शब्द व्यापक रूप से जाने जाने के योग्य हैं। वह कहता है, "कैल्विनवाद पर अपने तीर चलाने से पहले विशेष सावधानी रखो कि तुम जानते हो कि कैल्विनवाद क्या है और क्या नहीं है—कि जिस सिद्धान्त-समूह को आजकल कैल्विनवाद के नाम पर बुरा-भला कहने का चलन हो गया है, उसमें तुम निश्चय के साथ भेद कर सकते हो कि उसका कौन-सा भाग केवल कैल्विनवाद है, और कौन-सा भाग हमारे साझे मसीही धर्म और सुधारवादी कलीसियाओं के सामान्य विश्वास का है—ऐसा न हो कि जब तुम केवल कैल्विनवाद पर टूट पड़ना चाहते हो, तब अनजाने में किसी अधिक पवित्र और उच्चतर उद्गम की वस्तु पर आक्रमण कर बैठो।"

(ग) अन्त में—पर कम महत्त्व का नहीं—हमें यह कह देना भी काफ़ी न होगा कि अन्त तक स्थिर रहना इंग्लैंड की कलीसिया का सिद्धान्त नहीं है। लोग इसके विरुद्ध चाहे जो कहें, पर यह ऐसा दावा है जिसे सिद्ध करना उनके लिए कठिन होगा। इंग्लैंड की कलीसिया के सत्रहवें अनुच्छेद में अन्त तक स्थिर रहने की शिक्षा स्पष्ट, सीधे और असंदिग्ध रूप से दी गई है। यह कैंटरबरी के पहले पाँच आर्चबिशपों—पार्कर, ग्रिंडल, विटगिफ्ट, बैंक्रॉफ्ट और एबट—का सिद्धान्त था। यह वही सिद्धान्त था जिसका प्रचार विवेकशील हूकर ने किया, जैसा कि उसके उपदेश पढ़कर कोई भी देख सकता है।*

यही वह सिद्धान्त था जिसे इंग्लैंड की कलीसिया के सभी प्रमुख धर्मशास्त्री चार्ल्स प्रथम के शासनकाल तक मानते रहे। इस समय तक इसके इनकार को मुश्किल से सहन किया जाता था। एक से अधिक सेवकों को, जिन्होंने इस पर प्रश्न उठाया, कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के सामने सार्वजनिक रूप से अपना कथन वापस लेना पड़ा। संक्षेप में, जब तक आर्चबिशप लॉड सत्ता में नहीं आया, तब तक इंग्लैंड की कलीसिया में अन्त तक स्थिर रहना सुसमाचार का एक स्वीकृत सत्य माना जाता था। लॉड अपने साथ जो पोपवादी खमीर लाया, उसके साथ यह दुर्भाग्यपूर्ण शिक्षा भी आई कि सच्चे विश्वासी गिरकर नष्ट हो सकते हैं। यह इतिहास की सीधी-सादी बात है। सन्तों का अन्त तक स्थिर रहना इंग्लैंड की कलीसिया का पुराना सिद्धान्त है; उसका इनकार नया है।

अब इस विषय की इस शाखा को छोड़कर आगे बढ़ने का समय है। अन्त तक स्थिर रहने का इससे अधिक स्पष्ट और सुनिश्चित कथन मुझे नहीं चाहिए जो मेरी अपनी कलीसिया के सत्रहवें अनुच्छेद में मिलता है, जिसका मैं पहले उल्लेख कर चुका हूँ। अनुच्छेद परमेश्वर के चुने हुओं के विषय में कहता है, "जिन्हें परमेश्वर की ओर से ऐसा उत्तम वरदान मिला है, वे परमेश्वर के उद्देश्य के अनुसार उसके आत्मा के द्वारा उचित समय पर बुलाए जाते हैं—वे अनुग्रह से उसकी बुलाहट का पालन करते हैं—वे सेंतमेंत धर्मी ठहराए जाते हैं—वे लेपालकपन के द्वारा परमेश्वर के पुत्र बनाए जाते हैं—वे उसके इकलौते पुत्र यीशु मसीह के स्वरूप के समान बनाए जाते हैं—वे भक्तिपूर्वक भले कर्मों में चलते हैं, और अन्त में परमेश्वर की दया से सनातन आनन्द को प्राप्त करते हैं।" ठीक यही मेरे विचार हैं। यही वह सिद्धान्त है जिस पर मैंने बहुत पहले हस्ताक्षर किए थे। यही वह सत्य है जिसकी रक्षा करना मैं एक पादरी होने के नाते अपना कर्तव्य मानता हूँ। यही वह सत्य है जिसे मैं चाहता हूँ कि मेरे पाठक अब ग्रहण करें और मानें।

"मैं हर उस मनुष्य से, जिसकी आँखें उसके सिर में ठीक बैठी हैं, विनती करूँगा कि वह सत्रहवें अनुच्छेद के शब्दों को, उनके क्रम और उनकी दृढ़ता को पढ़े और विचार करे; और फिर निर्णय करे कि क्या अन्त तक स्थिर रहना इस अनुच्छेद में पूरी दृढ़ता और स्पष्टता से स्थापित और प्रमाणित नहीं किया गया है।"—जॉर्ज कार्लटन

II. अब मैं यह दिखाने लगता हूँ कि अन्त तक स्थिर रहने का सिद्धान्त पवित्रशास्त्र की किन नींवों पर बना है। मुझे शायद ही कहने की आवश्यकता हो कि हर धार्मिक सिद्धान्त के सत्य की परख की एकमात्र कसौटी बाइबल है। इंग्लैंड की कलीसिया के छठे अनुच्छेद के शब्द सोने के अक्षरों में लिखे जाने के योग्य हैं, "जो कुछ पवित्रशास्त्र में पढ़ा नहीं जाता, और न उससे सिद्ध किया जा सकता है, वह किसी मनुष्य से इस रूप में माँगा नहीं जाना चाहिए कि वह उसे विश्वास के अनुच्छेद के रूप में माने।" इस नियम पर मैं स्थिर रहने में सन्तुष्ट हूँ। मैं किसी से यह नहीं कहता कि वह सन्तों के अन्तिम रूप से स्थिर रहने को माने, जब तक कि यह सिद्ध न हो जाए कि यह परमेश्वर के वचन का सिद्धान्त है। पवित्रशास्त्र का एक सीधा पद उन सबसे तर्कसंगत निष्कर्षों से भारी है जहाँ तक मानवीय बुद्धि पहुँच सकती है।

पवित्रशास्त्र के जिन पदों पर यह निबन्ध आधारित है, उन्हें प्रस्तुत करते समय मैं जानबूझकर पुराने नियम से उद्धरण देने से बचता हूँ। मैं ऐसा इसलिए करता हूँ कि कोई यह न कह दे कि पुराने नियम की प्रतिज्ञाएँ केवल यहूदी जाति की हैं और व्यक्तिगत विश्वासियों से सम्बन्धित विवादित प्रश्न में उपयोगी नहीं हैं। मैं इस तर्क की सच्चाई को स्वीकार नहीं करता—परन्तु मैं किसी को इसका प्रयोग करने का अवसर नहीं दूँगा। मुझे नए नियम में प्रचुर प्रमाण मिलते हैं, और मैं स्वयं को उन्हीं तक सीमित रखूँगा।

जो पद मुझे अन्तिम स्थिरता को प्रमाणित करते दिखाई देते हैं, उन्हें मैं बिना टिप्पणी या व्याख्या के लिखूँगा। मैं केवल इतना चाहता हूँ कि मेरे पाठक देखें कि जिस नींव पर यह सिद्धान्त टिका है, वह कितनी गहरी और चौड़ी है। ध्यान दें कि सन्त अन्त तक इसलिए स्थिर नहीं रहेंगे और कभी गिरेंगे नहीं कि उनमें अपनी कोई सामर्थ्य या भलाई है। वे अपने आप में निर्बल और दुर्बल हैं, और औरों की तरह गिर सकते हैं। उनकी सुरक्षा परमेश्वर की प्रतिज्ञा पर आधारित है, जो कभी नहीं टूटी—परमेश्वर के चुनाव पर, जो व्यर्थ नहीं हो सकता—महान मध्यस्थ यीशु मसीह की सामर्थ्य पर, जो सर्वशक्तिमान है—पवित्र आत्मा के भीतरी कार्य पर, जिसे कोई उलट नहीं सकता। मैं आपसे विनती करता हूँ कि नीचे दिए पदों को ध्यान से पढ़ें और देखें कि क्या ऐसा ही नहीं है।

"मेरी भेड़ें मेरी आवाज़ सुनती हैं, और मैं उन्हें जानता हूँ, और वे मेरे पीछे पीछे चलती हैं। और मैं उन्हें अनन्त जीवन देता हूँ; वे कभी नाश न होंगी, और कोई उन्हें मेरे हाथ से छीन न लेगा। मेरा पिता, जिसने उन्हें मुझे दिया है, सब से बड़ा है, और कोई उन्हें पिता के हाथ से छीन नहीं सकता। मैं और पिता एक हैं।" (यूहन्ना 10:27-30)

"कौन हमें मसीह के प्रेम से अलग करेगा? क्या क्लेश, या संकट, या उपद्रव, या अकाल, या नंगाई, या जोखिम, या तलवार? जैसा लिखा है, कि 'हम तेरे लिये दिन भर घात किए जाते हैं; हम वध होनेवाली भेड़ों के समान गिने गए हैं।' परन्तु इन सब बातों में हम उसके द्वारा जिसने हम से प्रेम किया है, जयवन्त से भी बढ़कर हैं। क्योंकि मैं निश्चय जानता हूँ, कि न मृत्यु, न जीवन, न स्वर्गदूत, न प्रधानताएँ, न वर्तमान, न भविष्य, न सामर्थ्य, न ऊँचाई, न गहराई, और न कोई और सृष्टि हमें परमेश्वर के प्रेम से, जो हमारे प्रभु मसीह यीशु में है, अलग कर सकेगी।" (रोमियों 8:35-39)

"वे निकले तो हम ही में से, परन्तु वे हम में के थे नहीं; क्योंकि यदि वे हम में के होते, तो हमारे साथ ही रहते; पर निकल इसलिये गए कि यह प्रगट हो कि वे सब हम में के नहीं हैं।" (1 यूहन्ना 2:19)

"मैं तुम से सच सच कहता हूँ, जो मेरा वचन सुनकर मेरे भेजनेवाले की प्रतीति करता है, अनन्त जीवन उसका है, और उस पर दण्ड की आज्ञा नहीं होती, परन्तु वह मृत्यु से पार होकर जीवन में प्रवेश कर चुका है।" (यूहन्ना 5:24)

"जो जीवन की रोटी स्वर्ग से उतरी, वह मैं हूँ; यदि कोई इस रोटी में से खाए, तो सर्वदा जीवित रहेगा।" (यूहन्ना 6:51)

"इसलिये कि मैं जीवित हूँ, तुम भी जीवित रहोगे।" (यूहन्ना 14:19)

"और जो कोई जीवित है, और मुझ पर विश्वास करता है, वह अनन्तकाल तक न मरेगा।" (यूहन्ना 11:26)

"क्योंकि उसने एक ही चढ़ावे के द्वारा उन्हें, जो पवित्र किए जाते हैं, सर्वदा के लिये सिद्ध कर दिया है।" (इब्रानियों 10:14)

"जो परमेश्वर की इच्छा पर चलता है, वह सर्वदा बना रहेगा।" (1 यूहन्ना 2:17)

"तुम पर पाप की प्रभुता न होगी।" (रोमियों 6:14)

"वह तुम्हें अन्त तक दृढ़ भी करेगा, कि तुम हमारे प्रभु यीशु मसीह के दिन में निर्दोष ठहरो।" (1 कुरिन्थियों 1:8)

"जिनकी रक्षा परमेश्वर की सामर्थ्य से विश्वास के द्वारा उस उद्धार के लिये होती है जो आनेवाले समय में प्रगट होनेवाला है।" (1 पतरस 1:5)

"यीशु मसीह के लिये सुरक्षित रखे गए, और बुलाए हुए।" (यहूदा 1)

"प्रभु मुझे हर एक बुरे काम से छुड़ाएगा, और अपने स्वर्गीय राज्य में उद्धार करके पहुँचाएगा।" (2 तीमुथियुस 4:18)

"परमेश्वर करे कि तुम्हारी सारी आत्मा और प्राण और देह हमारे प्रभु यीशु मसीह के आगमन तक निर्दोष रखे जाएँ। तुम्हारा बुलानेवाला विश्वासयोग्य है, और वह ऐसा ही करेगा।" (1 थिस्सलुनीकियों 5:23, 24)

"परन्तु प्रभु विश्वासयोग्य है; वह तुम्हें दृढ़ करेगा, और उस दुष्ट से बचाए रखेगा।" (2 थिस्सलुनीकियों 3:3)

"परमेश्वर सच्चा है, वह तुम्हें सामर्थ्य से बाहर परखे जाने न देगा, वरन् परीक्षा के साथ निकास भी करेगा, कि तुम सह सको।" (1 कुरिन्थियों 10:13)

"इसलिये जब परमेश्वर ने प्रतिज्ञा के वारिसों पर और भी साफ रीति से प्रगट करना चाहा, कि उसकी मनसा बदल नहीं सकती, तो शपथ को बीच में डाला। ताकि दो बे-बदल बातों के द्वारा, जिनके विषय में परमेश्वर का झूठा ठहरना अनहोना है, हमारा दृढ़ता से ढाढ़स बँधे, जो शरण लेने को इसलिये दौड़े हैं कि उस आशा को जो सामने रखी हुई है प्राप्त करें।" (इब्रानियों 6:17, 18)

"और मेरे भेजनेवाले की इच्छा यह है कि जो कुछ उसने मुझे दिया है, मैं उसमें से कुछ न खोऊँ, परन्तु उसे अन्तिम दिन फिर जिला उठाऊँ।" (यूहन्ना 6:39)

"तौभी परमेश्वर की रखी हुई नींव बनी रहती है, और उस पर यह छाप लगी है: 'प्रभु अपनों को जानता है।'" (2 तीमुथियुस 2:19)

"जिन्हें उसने पहले से ठहराया, उन्हें बुलाया भी; और जिन्हें बुलाया, उन्हें धर्मी भी ठहराया है; और जिन्हें धर्मी ठहराया, उन्हें महिमा भी दी है।" (रोमियों 8:30)

"क्योंकि परमेश्वर ने हमें क्रोध के लिये नहीं, परन्तु इसलिये ठहराया कि हम अपने प्रभु यीशु मसीह के द्वारा उद्धार प्राप्त करें।" (1 थिस्सलुनीकियों 5:9)

"परमेश्वर ने आदि से तुम्हें चुन लिया, कि आत्मा के द्वारा पवित्र बनकर और सत्य पर विश्वास करके उद्धार पाओ।" (2 थिस्सलुनीकियों 2:13)

"दया के बर्तन, जिन्हें उसने पहले से महिमा के लिये तैयार किया।" (रोमियों 9:23)

"क्योंकि परमेश्वर अपने अनुग्रह के दानों और बुलाहट से कभी पीछे नहीं हटता।" (रोमियों 11:29)

"यदि हो सके तो वे चुने हुओं को भी भरमा दें।" (मत्ती 24:24)

"इसी लिये जो उसके द्वारा परमेश्वर के पास आते हैं, उन्हें वह पूरा पूरा उद्धार दे सकता है, क्योंकि वह उनके लिये बिनती करने को सर्वदा जीवित है।" (इब्रानियों 7:25)

"जो तुम्हें ठोकर खाने से बचा सकता है, और अपनी महिमा की भरपूरी के सामने मगन और निर्दोष करके खड़ा कर सकता है।" (यहूदा 24)

"मैं जानता हूँ कि मैंने किस पर विश्वास किया है, और मुझे निश्चय है कि वह मेरी धरोहर की उस दिन तक रखवाली कर सकता है।" (2 तीमुथियुस 1:12)

"मैंने तेरे लिये प्रार्थना की, कि तेरा विश्वास जाता न रहे।" (लूका 22:32)

"हे पवित्र पिता, अपने उस नाम से, जो तूने मुझे दिया है, उनकी रक्षा कर।" (यूहन्ना 17:11)

"मैं यह विनती नहीं करता कि तू उन्हें जगत से उठा ले, परन्तु यह कि तू उन्हें उस दुष्ट से बचाए रख।" (यूहन्ना 17:15)

"हे पिता, मैं चाहता हूँ कि जिन्हें तूने मुझे दिया है, जहाँ मैं हूँ, वहाँ वे भी मेरे साथ हों।" (यूहन्ना 17:24)

"क्योंकि बैरी होने की दशा में जब उसके पुत्र की मृत्यु के द्वारा हमारा परमेश्वर के साथ मेल हो गया, तो मेल हो जाने पर उसके जीवन के कारण हम उद्धार क्यों न पाएँगे?" (रोमियों 5:10)

"अर्थात् सत्य का आत्मा, जिसे जगत ग्रहण नहीं कर सकता, क्योंकि वह न उसे देखता है और न उसे जानता है; तुम उसे जानते हो, क्योंकि वह तुम्हारे साथ रहता है, और वह तुम में होगा।" (यूहन्ना 14:17)

"मुझे इस बात का भरोसा है कि जिसने तुम में अच्छा काम आरम्भ किया है, वही उसे यीशु मसीह के दिन तक पूरा करेगा।" (फिलिप्पियों 1:6)

"और तुम्हारा वह अभिषेक, जो तुम ने उससे पाया, तुम में बना रहता है, और तुम्हें इसका प्रयोजन नहीं कि कोई तुम्हें सिखाए; परन्तु जैसे उसका वह अभिषेक तुम्हें सब बातें सिखाता है, और वह सच्चा है, झूठा नहीं, और जैसा उसने तुम्हें सिखाया है, वैसे ही तुम उसमें बने रहोगे।" (1 यूहन्ना 2:27)

"नाशवान नहीं, परन्तु अविनाशी बीज से नया जन्म पाया है।" (1 पतरस 1:23)

"उसने आप ही कहा है, 'मैं तुझे कभी न छोड़ूँगा, और न कभी तुझे त्यागूँगा।'" (इब्रानियों 13:5)

मैं पवित्रशास्त्र के ये उनतालीस वचन अपने पाठकों के सामने रखता हूँ, और इन पर गम्भीर ध्यान देने का निवेदन करता हूँ। मैं दोहराता हूँ कि मैं इन पर कोई टीका-टिप्पणी नहीं करूँगा। मैं इन्हें उन सब के खरे विवेक पर छोड़ना चाहता हूँ जो बाइबल पढ़ते हैं। इनमें से कुछ वचन निःसन्देह अन्त तक स्थिर रहने के सिद्धान्त को दूसरों की अपेक्षा अधिक स्पष्टता से प्रकट करते हैं। इनमें से कुछ की व्याख्या के विषय में मनुष्यों के विचार बहुत भिन्न हो सकते हैं। परन्तु इन उनतालीस में से कितने ही मुझे इतने स्पष्ट प्रतीत होते हैं कि यदि मैं अपने मत की पुष्टि के लिये शब्द गढ़ता, तो निराश ही होता कि मेरा आशय इतनी निस्सन्देह रीति से प्रकट करनेवाले शब्द मैं कभी गढ़ पाऊँगा।

मैं यह नहीं कह रहा कि केवल ये ही वचन पवित्रशास्त्र का सारा प्रमाण हैं जो प्रस्तुत किया जा सकता है। मुझे विश्वास है कि इस निबन्ध में जिस सिद्धान्त का समर्थन किया गया है, उसकी पुष्टि अत्यन्त भारी और सामर्थी अन्य तर्कों से भी हो सकती है।

(क) मैं बाइबल में प्रकट किए गए परमेश्वर के स्वभाव के गुणों की ओर संकेत कर सकता हूँ, और दिखा सकता हूँ कि उसकी बुद्धि, अपरिवर्तनशीलता, सामर्थ्य, प्रेम और महिमा सब पवित्र लोगों के अन्त तक स्थिर रहने से जुड़े हुए हैं। यदि चुने हुए लोग अन्त में नाश हो सकते हैं, तो अनन्तकाल में उनके विषय में परमेश्वर की युक्ति और समय में उनके लिये उसके कार्यों का क्या होगा? "अब यदि तू इन सब लोगों को एक मनुष्य की नाईं मार डाले, तो जिन जातियों ने तेरा समाचार सुना है वे कहेंगी, कि यहोवा उन लोगों को उस देश में, जिसके देने की उसने उनसे शपथ खाई थी, पहुंचा न सका, इसलिये उसने उन्हें जंगल में घात कर डाला।" गिनती 14:15, 16। "तू अपने बड़े नाम के लिये क्या करेगा?"—यहोशू 7:9। "यदि चुने हुओं में से कोई नाश हो, तो परमेश्वर मनुष्य की हठ से हार गया; परन्तु उनमें से कोई नाश नहीं होता, क्योंकि सर्वशक्तिमान परमेश्वर किसी रीति से हराया नहीं जा सकता।"—ऑगस्टीन।

(ख) मैं उन सब पदों की ओर संकेत कर सकता हूँ जिन्हें प्रभु यीशु निभाता है, और दिखा सकता हूँ कि यदि उसके विश्वास करनेवाले लोगों में से कोई अन्त में खो सकता है, तो उन पदों के निर्वाह पर कितना कलंक लगता है। वह कैसा सिर होता, यदि उसकी रहस्यमय देह का कोई अंग उससे छीना जा सकता? वह कैसा चरवाहा होता, यदि उसके झुण्ड की एक भी भेड़ जंगल में पीछे छूट जाती? वह कैसा वैद्य होता, यदि उसके हाथ का कोई रोगी अन्त में असाध्य निकलता? वह कैसा महायाजक होता, यदि जब वह अपने रत्न एकत्र करे तब उसके हृदय पर लिखा कोई नाम गायब पाया जाता? वह कैसा पति होता, यदि वह और कोई आत्मा, जो विश्वास के द्वारा उससे एक हुई, कभी अलग किए जाते?

"जो कहते हैं कि उसकी भेड़ें अन्त में धर्मत्याग के गड्ढे में मर सकती हैं, वे मसीह के आदर का कितना भला विचार करते हैं!" "मसीह और उसके अंग एक ही बनाते हैं

मसीह। अब क्या यह सम्भव है कि मसीह का कोई अंश अन्त में नरक में जलता हुआ पाया जाए? क्या मसीह अपंग मसीह हो सकता है? क्या यह अंग गिर जाए और वह अंग भी? वह अपने रहस्यमय अंगों को खोकर अपनी महिमा कैसे बचाए रख सकता है?"—गर्नल। 1655।

(ग) अन्त में, मैं इस बड़े तथ्य की ओर संकेत कर सकता हूँ कि सारे पवित्रशास्त्र में परमेश्वर के चुने हुओं में से किसी एक का भी अन्त में जहाज़ डूबकर नरक जाने का एक भी उदाहरण नहीं है। हम झूठे भविष्यद्वक्ताओं और कपटियों के विषय में पढ़ते हैं। हम निष्फल डालियों, पथरीली भूमि और काँटों वाली भूमि के सुननेवालों, उन कुँवारियों के विषय में जिनके दीपकों में तेल न था, और उन दासों के विषय में जिन्होंने अपने तोड़े गाड़ दिए, पढ़ते हैं। हम बिलाम, लूत की पत्नी, शाऊल, यहूदा इस्करियोती, हनन्याह और सफीरा, और देमास के विषय में पढ़ते हैं। हम उनके खोखले चरित्र देखते हैं। उनके अन्त की बात हमें बताई गई है। उनमें जड़ न थी। वे भीतर से सड़े हुए थे। वे थोड़े समय तक टिके रहे। अन्त में वे अपने स्थान को गए। परन्तु सारी बाइबल में एक भी ऐसा उदाहरण नहीं जहाँ किसी ऐसे व्यक्ति ने, जिसमें अनुग्रह के निस्सन्देह प्रमाण दिखाई दिए थे, पीछे हटकर विश्वास छोड़ दिया हो। अब्राहम, मूसा, दाऊद, पतरस और पौलुस जैसे लोग सदा अपने मार्ग पर बने रहते हैं। वे फिसल सकते हैं। वे कुछ समय के लिये गिर सकते हैं। परन्तु वे कभी पूरी तरह परमेश्वर से दूर नहीं हो जाते। वे कभी नाश नहीं होते। निश्चय ही यदि परमेश्वर के पवित्र लोग निकाल फेंके जा सकते हैं, तो यह अनोखा और उल्लेखनीय तथ्य है कि बाइबल ने हमें इसका एक भी स्पष्ट उदाहरण नहीं दिया।

परन्तु जिस क्षेत्र की ओर मैंने अभी संकेत किया है, उसमें प्रवेश करूँ तो समय और स्थान कम पड़ जाएँगे। मैं उचित समझता हूँ कि अपना पक्ष उन्हीं वचनों पर टिकाऊँ जो मैं पहले दे चुका हूँ। जिस मन को ये वचन कायल नहीं करते, उस पर अन्य तर्कों का प्रभाव पड़ने की सम्भावना कम है। मुझे तो ये सब मिलाकर प्रमाण का ऐसा विशाल भण्डार प्रतीत होते हैं कि मैं एक मसीही मनुष्य होकर अन्त तक स्थिर रहने के सत्य होने का इनकार करने का साहस नहीं कर सकता। मैं साहस नहीं कर सकता, क्योंकि मुझे लगता है कि इस हिसाब से तो मैं सुसमाचार के किसी भी सिद्धान्त की सच्चाई पर विवाद कर सकता हूँ। मुझे लगता है कि यदि मैं उद्धृत किए गए कुछ ऐसे स्पष्ट वचनों की व्याख्या यूँ ही टाल सकता, तो मैं मसीही धर्म के लगभग सब मुख्य सत्यों की व्याख्या टाल सकता।

मैं भली-भाँति जानता हूँ कि पवित्रशास्त्र के कुछ वचन और अंश पहली दृष्टि में उस सिद्धान्त के विपरीत शिक्षा देते प्रतीत होते हैं जिसका मैं इस निबन्ध में समर्थन करता हूँ। मैं जानता हूँ कि बहुत से लोग इन वचनों को बड़ा महत्त्व देते हैं और मानते हैं कि इनसे सिद्ध होता है कि परमेश्वर के पवित्र लोग नाश हो सकते और गिर सकते हैं। मैं केवल इतना कह सकता हूँ कि मैंने इन वचनों की ध्यान से जाँच की है—परन्तु अन्त तक स्थिर रहने के विषय में अपना मत बदलने का कोई कारण उनमें नहीं पाया। इनकी संख्या थोड़ी है। मेरे द्वारा उद्धृत उनतालीस वचनों में से बहुतों की अपेक्षा इनका अर्थ निस्सन्देह अधिक विवाद के योग्य है। इन सबकी ऐसी व्याख्या हो सकती है कि वे अन्त तक स्थिर रहने के सिद्धान्त का खण्डन न करें। मैं पवित्रशास्त्र की व्याख्या में इसे अचूक नियम मानता हूँ कि जब दो वचन एक-दूसरे के विरोधी लगें, तो कम स्पष्ट वचन को अधिक स्पष्ट वचन के आगे और निर्बल को सबल के आगे झुकना चाहिए। जो सिद्धान्त पवित्रशास्त्र के अधिकतर वचनों में मेल बैठाता है, उसी के सही होने की सम्भावना अधिक है। जो सिद्धान्त अधिकतर वचनों को आपस में लड़ाता है, उसी के गलत होने की सम्भावना अधिक है।

जिन वचनों पर अन्त तक स्थिर रहने के विरोधी मुख्यतः भरोसा करते हैं, उन पर संक्षिप्त ध्यान देना आवश्यक प्रतीत होता है।

यहेजकेल 3:20 और यहेजकेल 18:24। मुझे इनमें से किसी भी स्थान में इसका प्रमाण नहीं दिखता कि यहाँ जिस "धर्मी" की बात हुई है वह उस व्यक्ति से कुछ अधिक है जिसका बाहरी आचरण धर्ममय है। ऐसा कुछ नहीं दिखाता कि वह विश्वास से धर्मी ठहराया गया और परमेश्वर के सामने धर्मी गिना गया व्यक्ति है।

1 कुरिन्थियों 9:27। मुझे इसमें पाप में गिरने के उस ईश्वरीय भय के सिवा कुछ नहीं दिखता, जो विश्वासी का एक चिह्न है और उसे अपरिवर्तित लोगों से अलग करता है, और उन साधनों की सरल घोषणा जिनसे पौलुस ने स्वयं को निकम्मा ठहरने से बचाए रखा। यह 1 यूहन्ना 5:18 के समान है, "जो परमेश्वर से उत्पन्न हुआ वह अपने आप को बचाए रखता है।"

यूहन्ना 15:2। इससे यह सिद्ध नहीं होता कि सच्चे विश्वासी मसीह से अलग किए जाएँगे। जो डाली "फल नहीं लाती" वह विश्वासी नहीं है। 12वाँ अनुच्छेद कहता है, "जीवित विश्वास भले कर्मों से उतने ही स्पष्ट रूप से पहचाना जा सकता है जितना वृक्ष फल से पहचाना जाता है।"

1 थिस्सलुनीकियों 5:19. यदि यहाँ "आत्मा" का अर्थ हमारे भीतर की आत्मा है, तो इसका अर्थ इफिसियों 4:30 में "आत्मा को शोकित करने" से अधिक कुछ नहीं है। परन्तु अधिकतर अच्छे टीकाकार मानते हैं कि यह दूसरों में आत्मा के वरदानों की बात है, और इसे पद 20 के सम्बन्ध में लिया जाना चाहिए।

गलातियों 5:4. पूरी पत्री का सार यही दिखाता है कि यह "गिरना" आत्मा के भीतरी अनुग्रह से नहीं—वरन् अनुग्रह के सिद्धान्त से है। यही बात 2 कुरिन्थियों 6:1 पर भी लागू होती है।

इब्रानियों 6:4-6. जिस व्यक्ति का यहाँ "भटक जाने" वाले के रूप में वर्णन है, उसमें ऐसा कोई लक्षण नहीं जो अपरिवर्तित लोगों में न पाया जा सके; और यह भी नहीं कहा गया कि उसमें उद्धार देनेवाला विश्वास और प्रेम है, या कि वह चुना हुआ है।

यूहन्ना 8:31; कुलुस्सियों 1:23. इन दोनों पदों में, और ऐसे ही अनेक अन्य पदों में जिनका उल्लेख किया जा सकता है, "यदि" की शर्त उन लोगों के उद्धार के विषय में किसी अनिश्चितता को नहीं जताती जिनका वर्णन किया गया है। इसका केवल यही अर्थ है कि सच्चे अनुग्रह का प्रमाण "स्थिर बने रहना" है। झूठा अनुग्रह नष्ट हो जाता है। सच्चा अनुग्रह बना रहता है। चार्नॉक कहता है, "पवित्रशास्त्र में यह प्रायः मिलता है कि प्रतिज्ञाओं में वे शर्तें रख दी जाती हैं जिनके विषय में अन्य स्थानों पर प्रतिज्ञा की गई है कि वे हम में उत्पन्न की जाएँगी।"—चार्नॉक, सच्चे अनुग्रह पर।

मैं सहर्ष मानता हूँ कि अन्त तक स्थिर रहने के विरोधी जो सब पद प्रायः प्रस्तुत करते हैं, वे ये ही नहीं हैं; परन्तु मेरा विश्वास है कि प्रमुख पद यही हैं। उनके पक्ष की दुर्बलता यह है कि उनके पास ऐसा कोई पद नहीं जो यह सिद्ध करे कि पवित्र लोग गिर सकते हैं, और जिसकी तुलना "मेरी भेड़ें कभी नष्ट न होंगी" जैसे वचन से की जा सके; और हमारे प्रभु की इस महान प्रतिज्ञा का वे कोई ऐसा विवरण नहीं दे पाते जो सन्तोषजनक या बुद्धिसंगत भी हो। प्रसिद्ध आर्मिनियन जॉन गुडविन इस पद की यह व्याख्या देता है: "मसीह द्वारा अपनी भेड़ों को दी गई अनन्त सुरक्षा की प्रतिज्ञा इस वर्तमान संसार की दशा से सम्बन्ध नहीं रखती—वरन् आनेवाले संसार की दशा से रखती है!" जब मनुष्य को ऐसी युक्ति देनी पड़े, तो वह निश्चय ही बहुत संकट में पड़ा होगा।

मैं अपने पाठकों से, जो अब तक मेरी सारी बातों से आश्वस्त नहीं हुए, कहता हूँ कि अन्त तक स्थिर रहने के पक्ष में जो पद मैंने उद्धृत किए हैं, और उसके विरोध में जो पद सामान्यतः उद्धृत किए जाते हैं, उन्हें दो अलग-अलग सूचियों में लिख लें। उन्हें एक-दूसरे के सामने तौलें। निष्पक्ष और ईमानदार विवेक से उनका न्याय करें। किस सूची में सबसे अधिक स्पष्ट, असंदिग्ध कथन हैं? किस सूची में ऐसे वाक्य सबसे अधिक हैं जिनकी व्याख्या करके उन्हें टाला नहीं जा सकता? कौन सी सूची सबसे सुदृढ़ है? कौन सी सबसे दुर्बल? कौन सी सबसे लचीली है? कौन सी सबसे अडिग? यदि इस जैसे संसार में इस प्रश्न को किसी निष्पक्ष, समझदार न्यायपीठ के सामने परखा जाना सम्भव होता, तो मुझे तनिक भी संदेह नहीं कि निर्णय किस ओर जाता। मेरा अपना दृढ़ विश्वास और धारणा है कि पवित्र लोगों का अन्त तक स्थिर रहना पवित्रशास्त्र की नींव पर इतनी गहराई से स्थापित है कि जब तक बाइबल न्यायी है, तब तक इसे उखाड़ा नहीं जा सकता।

III. तीसरी बात जो मैं करना चाहता हूँ, वह यह है कि उन कारणों को बताऊँ जिनसे बहुत से लोग अन्त तक स्थिर रहने के सिद्धान्त को अस्वीकार करते हैं। इस बात का इनकार करना असम्भव है कि मसीही होने का दावा करनेवाले अनेक लोग इस लेख में प्रकट किए गए विचारों से पूरी तरह असहमत हैं। मैं भली-भाँति जानता हूँ कि बहुतेरे इन्हें घृणा की दृष्टि से देखते हैं, इन्हें खतरनाक, उन्मादपूर्ण और कट्टर मानते हैं, और लोगों को इनके विरुद्ध चेताने का कोई अवसर नहीं चूकते। मैं यह भी जानता हूँ कि जो यह मानते हैं कि परमेश्वर के पवित्र लोग गिर सकते हैं और नष्ट हो सकते हैं, उनमें अनेक पवित्र, आत्म-त्यागी, आत्मिक मन के लोग मिलते हैं—ऐसे लोग जिनके चरणों में बैठने में मुझे स्वर्ग में आनन्द होगा, यद्यपि पृथ्वी पर मैं उनकी सारी शिक्षा का समर्थन नहीं कर सकता।

ऐसी स्थिति में यह बहुत रुचिकर विषय बन जाता है कि यदि हम खोज सकें तो यह पता लगाएँ कि अन्त तक स्थिर रहने का सिद्धान्त इतनी बार अस्वीकार क्यों किया जाता है। जिस सिद्धान्त के पक्ष में पवित्रशास्त्र का इतना प्रमाण दिया जा सकता है, उसका इतना डटकर विरोध कैसे होता है? जिस सिद्धान्त पर इंग्लैंड की सुधारवादी कलीसिया के पहले सौ वर्षों में प्रश्न उठाना भी मुश्किल से स्वीकार्य था, वह अब इतनी बार क्यों अस्वीकार किया जाता है? पिछली दो शताब्दियों में कौन से नए विचार उठ खड़े हुए हैं जिनके कारण मसीह के इस पुराने सेवक को विदा करना आवश्यक हो गया? मुझे विश्वास है कि आज के समय में ऐसी पूछताछ बहुत महत्त्वपूर्ण है। इस प्रश्न में पहली दृष्टि में दिखाई देने से कहीं अधिक बात है। मुझे सन्तोष है कि पूरे विषय पर थोड़ा प्रकाश डालने का प्रयास करके मैं समय व्यर्थ नहीं कर रहा हूँ।

मैं मार्ग साफ करने के लिए यह मानता हूँ कि बहुत से भले लोग अन्त तक स्थिर रहने के सिद्धान्त को किसी और कारण से नहीं, केवल इसलिए अस्वीकार करते हैं कि यह उनके लिए बहुत प्रबल है। इस समय सच्चे हृदय वाले मसीहियों की बड़ी संख्या है जो कोई भी प्रबल बात सह नहीं पाते। उनका धार्मिक स्वभाव इतना दुर्बल और उनकी आत्मिक पाचन-शक्ति इतनी कमज़ोर प्रतीत होती है कि उन्हें सदा "दूध पिलाना" पड़ता है, "अन्न" नहीं। उनसे अनुग्रह के विषय में प्रबल बात कहो, तो वे तुम्हें व्यवस्था-विरोधी ठहरा देते हैं! पवित्रता के विषय में प्रबल बात कहो, तो तुम्हें व्यवस्थावादी समझा जाता है! चुनाव के विषय में प्रबल बात कहो, तो तुम संकीर्ण-मन कैल्विनवादी माने जाते हो! उत्तरदायित्व और स्वतंत्र इच्छा के विषय में प्रबल बात कहो, तो तुम्हें निम्न स्तर का आर्मिनियन समझा जाता है! संक्षेप में, वे किसी भी प्रकार की, किसी भी दिशा की प्रबल बात सह नहीं सकते! स्वाभाविक है कि वे अन्त तक स्थिर रहने का सिद्धान्त ग्रहण नहीं कर सकते।

मैं इन लोगों को छोड़ देता हूँ। मुझे इनके लिए खेद है। इस समय मसीह की कलीसियाओं में ऐसे लोग बहुत ही अधिक हैं। मैं केवल यही चाहता हूँ कि उनका आत्मिक स्वास्थ्य सुधरे, उनके विचारों की संकीर्णता घटे, और आत्मिक ज्ञान में उनकी वृद्धि शीघ्र हो। अपने लेख के इस भाग में जिन लोगों को मैं मन की आँखों से देख रहा हूँ, वे दूसरी श्रेणी के हैं, और अब मैं उन्हीं से बात करता हूँ।

(1) मेरा विश्वास है कि बहुत से लोग अन्त तक स्थिर रहने के सिद्धान्त को इसलिए नहीं मानते क्योंकि वे मसीही धर्म की पूरी व्यवस्था से सामान्यतः अनजान हैं। सुसमाचार के विभिन्न सिद्धान्तों के स्वरूप, स्थान और अनुपात का उन्हें कोई स्पष्ट विचार नहीं है। उसकी अलग-अलग सच्चाइयों की उनके मन में कोई निश्चित जगह नहीं है। उसकी सामान्य रूपरेखा उनकी समझ में अंकित नहीं है। उन्हें बस एक धुँधला-सा विचार है कि मसीह की कलीसिया का सदस्य होना और मसीही विश्वास की सब बातों को मानना उचित है। उनके मन में एक अस्थिर, धुँधली-सी धारणा है कि मसीह ने उनके लिए कुछ काम किए हैं, और उन्हें भी उसके लिए कुछ काम करने चाहिए, और यदि वे उन्हें कर लें तो अन्त में सब ठीक हो जाएगा—परन्तु इससे आगे वे वास्तव में कुछ नहीं जानते! रोमियों, गलातियों और इब्रानियों की पत्रियों में दिए गए बड़े क्रमबद्ध कथनों से वे पूरी तरह अनजान हैं। धर्मी ठहराए जाने का स्पष्ट वर्णन माँगना उनसे वैसा ही है जैसे उनसे वृत्त का वर्ग बनाने को कहना, या संस्कृत में पत्र लिखने को कहना। यह ऐसा विषय है जिसे उन्होंने अपनी उँगलियों के पोरों से भी नहीं छुआ। यह एक भयंकर रोग है, और इंग्लैंड में बहुत ही आम है। दुःख की बात है कि यह उन हज़ारों लोगों का रोग है जो उत्तम कलीसिया-सदस्य गिने जाते हैं। ऐसे लोगों से अन्त तक स्थिर रहने के सिद्धान्त को मानने की आशा रखना व्यर्थ है। जब मनुष्य यही नहीं जानता कि धर्मी ठहराया जाना क्या है, तो वह यह कैसे समझ सकता है कि अन्त तक स्थिर रहना क्या है।

(2) मेरा विश्वास है कि बहुत से लोगों के इस सिद्धान्त को न मानने का एक और कारण उस हर धर्म-प्रणाली के प्रति उनकी अरुचि है जो मनुष्य और मनुष्य के बीच भेद करती है। ऐसे लोग कम नहीं जो उस हर मसीही शिक्षा को पूरी तरह अस्वीकार करते हैं जो मण्डलियों को अलग-अलग श्रेणियों में बाँटती है, और एक श्रेणी के लोगों को परमेश्वर के सामने दूसरी श्रेणी से अच्छी और अधिक अनुकूल दशा में बताती है। ऐसे लोग चिल्लाते हैं कि "इस प्रकार की सारी शिक्षा निर्दयी है"; कि "हमें हर किसी के विषय में अच्छी आशा रखनी चाहिए, और मान लेना चाहिए कि हर कोई स्वर्ग जाएगा।" वे सोचते हैं कि यह कहना सरासर गलत है कि एक मनुष्य में विश्वास है और दूसरे में नहीं, एक का मन फिरा है और दूसरे का नहीं, एक परमेश्वर की सन्तान है और दूसरा शैतान की सन्तान, एक सन्त है और दूसरा पापी। वे कहते हैं, "इस विषय में कुछ भी सोचने का हमें क्या अधिकार है? हम निश्चित रूप से जान ही नहीं सकते। जिन्हें हम भला कहते हैं वे बहुत सम्भव है दूसरों से अच्छे न हों—कपटी, ठग और ऐसे ही कुछ। जिनके विषय में हम बुरा सोचते हैं वे बहुत सम्भव है शेष मनुष्यों के समान ही स्वर्ग के मार्ग पर हों, और मन से भले हों।"

जहाँ तक किसी के स्वर्ग के विषय में निश्चित होने, या अपने उद्धार पर भरोसा रखने का प्रश्न है, उसे वे बिलकुल घृणित मानते हैं। "कोई मनुष्य निश्चित नहीं हो सकता। हमें सबके विषय में अच्छी आशा रखनी चाहिए।" आज के समय में ऐसे लोग बहुत हैं। स्वाभाविक है कि अन्त तक स्थिर रहने का सिद्धान्त उनके लिए बिलकुल असहनीय है। जब मनुष्य यह मानने से इनकार कर दे कि कोई चुना हुआ है, या उसमें अनुग्रह है, या वह अपने पड़ोसियों से बढ़कर परमेश्वर की किसी विशेष कृपा का चिह्न भोग रहा है, तो यह स्वतः स्पष्ट है कि वह इससे भी इनकार करेगा कि किसी को अन्त तक स्थिर रहने का अनुग्रह मिल सकता है।

(3) मेरा विश्वास है कि बहुत से लोगों के इस सिद्धान्त को न मानने का एक और आम कारण उद्धार देनेवाले विश्वास के स्वरूप की गलत समझ है। वे विश्वास को एक भावना या प्रभाव से बढ़कर कुछ नहीं मानते। ज्यों ही वे किसी मनुष्य को सुसमाचार के प्रचार से कुछ प्रभावित होते और मसीह की बातें सुनकर कुछ आनन्द प्रकट करते देखते हैं, वे तुरन्त उसे विश्वासी गिन लेते हैं। थोड़े समय बाद उस मनुष्य के प्रभाव मिट जाते हैं, और मसीह तथा उद्धार में उसकी रुचि बिलकुल समाप्त हो जाती है। जो विश्वास उसमें दिखता था वह कहाँ गया? वह चला गया। जिन मित्रों ने उसे विश्वासी ठहराया था वे इसका क्या कारण बताएँ? वे इसे केवल यह कहकर समझा सकते हैं कि "मनुष्य विश्वास से गिर सकता है," और कि "अन्त तक स्थिर रहने जैसी कोई बात नहीं है।" और संक्षेप में, यह उनके धर्म का एक स्थापित सिद्धान्त बन जाता है।

अब यह एक हानिकारक भ्रम है, और मुझे भय है कि यह अनेक स्थानों में दुःखद रूप से आम है। इसका मूल धार्मिक भावनाओं के सच्चे स्वरूप की अज्ञानता में खोजा जा सकता है। लोग भूल जाते हैं कि मानव मन में बहुत-सी धार्मिक भावनाएँ हो सकती हैं जिनसे परमेश्वर के अनुग्रह का कोई सम्बन्ध नहीं। "पथरीली भूमि" के सुननेवालों ने वचन को आनन्द के साथ ग्रहण किया—परन्तु उनमें जड़ न थी। (मत्ती 13:20।) सब जागृतियों का इतिहास सिद्ध करता है कि पवित्र आत्मा के किसी सच्चे कार्य के बिना भी प्रायः बहुत अधिक मात्रा में दिखनेवाले धार्मिक प्रभाव हो सकते हैं। उद्धार देनेवाला विश्वास किसी क्षणिक भावना से कहीं अधिक गहरी और सामर्थी वस्तु है। यह केवल भावनाओं का कार्य नहीं—परन्तु सम्पूर्ण विवेक, इच्छा, समझ और भीतरी मनुष्य का कार्य है। यह स्पष्ट ज्ञान का परिणाम है। यह उस विवेक से उपजता है जो केवल छुआ नहीं गया—परन्तु पूरी तरह जाग उठा है। यह मसीह पर सोचे-समझे, स्वेच्छा से किए गए और नम्र भरोसे में प्रकट होता है। ऐसा विश्वास परमेश्वर का दान है, और कभी उखाड़ा नहीं जाता। विश्वास को केवल भावना का विषय बना दो, तो अन्त तक स्थिर रहने को मानना स्वाभाविक रूप से असम्भव है।

(4) मेरा विश्वास है कि बहुत से लोग अन्त तक स्थिर रहने के सिद्धान्त को इसलिए नहीं मानते, इसका एक और कारण है जो अभी बताए गए कारण से बहुत मिलता-जुलता है। वह है मन फिराव की प्रकृति के विषय में गलत दृष्टिकोण। बहुत से लोग किसी मनुष्य के चरित्र में हुए किसी भी सुधार को तुरन्त मन फिराव घोषित कर देने को तैयार रहते हैं। वे भूल जाते हैं कि बसन्त में पेड़ पर बहुत से फूल लगते हैं, फिर भी पतझड़ में कोई फल नहीं होता, और रंग का नया लेप किसी पुराने द्वार को नया नहीं बना देता। कुछ लोग, यदि किसी को उपदेश के प्रभाव में रोते देखें, तो तुरन्त उसे मन फिराव का उदाहरण ठहरा देते हैं! दूसरे लोग, यदि कोई पड़ोसी अचानक शराब, गाली-गलौज या ताश खेलना छोड़ दे और प्रभु-भोज में सम्मिलित होने लगे तथा बड़ा धर्म-प्रदर्शक बन जाए, तो झट इस निष्कर्ष पर पहुँच जाते हैं कि उसका मन फिराव हो गया है! अनेक अवसरों पर इसका स्वाभाविक परिणाम निराशा होता है। उनका माना हुआ मन फिराव का उदाहरण प्रायः केवल बाहरी सुधार का उदाहरण निकलता है, जिसमें हृदय कभी बदला ही नहीं था। उनका वह मन फिराया हुआ पड़ोसी कभी-कभी अपनी पुरानी बुरी आदतों में लौट जाता है, जैसे नहलाई हुई सूअरनी फिर कीचड़ में लोटने लगती है। परन्तु तब, दुर्भाग्य से, स्वाभाविक हृदय का अभिमान, जो अपने आप को भूल करनेवाला मानना कभी पसन्द नहीं करता, लोगों को उस घटना के विषय में गलत निष्कर्ष निकालने की ओर ले जाता है। यह कहने के बजाय कि उस मनुष्य का तो कभी मन फिराव हुआ ही नहीं था, वे कहते हैं कि "उसका मन फिराव हुआ था—परन्तु बाद में उसने अपना अनुग्रह खो दिया और गिर गया।" इसका सच्चा उपाय मन फिराव की सही समझ है। वह कोई ऐसी सस्ती, सरल और साधारण वस्तु नहीं जैसी बहुत से लोग समझते प्रतीत होते हैं। वह हृदय में होनेवाला एक सामर्थी कार्य है, जिसे जगत के रचनेवाले के सिवा कोई नहीं कर सकता, और ऐसा कार्य जो सदा बना रहेगा और आग की परीक्षा में टिकेगा। परन्तु एक बार मन फिराव के विषय में छिछला और हल्का दृष्टिकोण अपना लो, तो तुम पाओगे कि अन्त तक स्थिर रहने के सिद्धान्त को थामे रखना असम्भव है।

(5) मेरा विश्वास है कि बहुत से लोग अन्त तक स्थिर रहने के सिद्धान्त को इसलिए नहीं मानते, इसका एक और अत्यन्त सामान्य कारण बपतिस्मा के प्रभाव के विषय में गलत दृष्टिकोण है। वे अपने धर्मविज्ञान के मुख्य सिद्धान्त के रूप में यह ठहराते हैं कि जितने बपतिस्मा पाते हैं वे सब बपतिस्मा में नया जन्म पाते हैं, और सब पवित्र आत्मा का अनुग्रह पाते हैं। बाइबल में अपने मत के समर्थन में एक भी स्पष्ट वचन के बिना, और 17वें अनुच्छेद के सामने भी, जिस पर उनमें से बहुतों ने कलीसिया के सदस्य होने के नाते हस्ताक्षर किए हैं, वे फिर भी हमें बताते हैं कि सब बपतिस्मा पाए हुए लोग अनिवार्य रूप से "नया जन्म पाए हुए" होते हैं। निश्चय ही बपतिस्मा का ऐसा दृष्टिकोण इस सिद्धान्त का पूरी तरह नाश कर देता है कि सच्चा अनुग्रह कभी उलटा नहीं जा सकता। यह दिन के उजाले के समान स्पष्ट है कि बपतिस्मा पाए हुए अनगिनत लोग अपने सारे जीवन में अनुग्रह की एक चिनगारी तक नहीं दिखाते, और इस बात का ज़रा-सा भी प्रमाण नहीं देते कि वे परमेश्वर से जन्मे हैं। वे लापरवाह और संसारी जीवन बिताते हैं, और लापरवाह और संसारी ही मरते हैं, और देखने में दयनीय रीति से नाश हो जाते हैं। जिस दृष्टिकोण की मैं यहाँ चर्चा कर रहा हूँ, उसके अनुसार "वे सब अनुग्रह से गिर गए हैं! उन सबके पास वह था! वे सब परमेश्वर की सन्तान बनाए गए थे! परन्तु उन सबने अपना अनुग्रह खो दिया! वे सब शैतान की सन्तान बन गए हैं!" ऐसे सिद्धान्त पर मैं एक भी टिप्पणी करने का साहस नहीं करूँगा। जो इसे बाइबल के साथ मिला सकते हैं, उन्हीं पर छोड़ता हूँ। मैं केवल इतना कहता हूँ कि यदि "बपतिस्मा में नया जन्म" सच है, तो अन्त तक स्थिर रहने का सिद्धान्त समाप्त हो जाता है।

(6) मेरा विश्वास है कि बहुत से लोग अन्त तक स्थिर रहने के सिद्धान्त को इसलिए नहीं मानते, इसका एक और कारण कलीसिया की प्रकृति के विषय में गलत दृष्टिकोण है। वे उस दृश्य कलीसिया के बीच, जिसमें "बुरे और भले" दोनों हैं, और उस अदृश्य कलीसिया के बीच, जो केवल परमेश्वर के चुने हुए और सच्चे विश्वासियों से बनी है, कोई भेद नहीं करते। जो विशेषाधिकार, आशीषें और प्रतिज्ञाएँ दूसरी की हैं, उन्हें वे पहली पर लागू कर देते हैं। वे दृश्य कलीसिया को, उसके अधर्मी सदस्यों और बपतिस्मा पाए हुए अविश्वासियों की भीड़ समेत, "मसीह की रहस्यमय देह, दुल्हिन, मेम्ने की पत्नी, पवित्र कलीसिया" और इसी प्रकार के नाम देते हैं! वे वह देखना नहीं चाहते जो हूकर ने बहुत पहले बताया था, और जिसे उसके प्रशंसक याद रखें तो अच्छा होगा—कि ये सब महिमामय पदवियाँ किसी दृश्य कलीसिया की नहीं हैं, बल्कि परमेश्वर के चुने हुओं की रहस्यमय मण्डली की हैं। इस सारी गड़बड़ी का परिणाम निश्चित और स्पष्ट है। अपनी इस मनुष्य-रचित व्यवस्था पर उन्हें यह मानना पड़ता है कि मसीह की देह के हज़ारों सदस्यों में न जीवन है, न अनुग्रह, न अपने सिर से कोई सहानुभूति, और वे अन्त में सदा के लिए नाश हो जाते हैं और नरक में मसीह के खोए हुए सदस्य बन जाते हैं! स्वाभाविक है कि इस प्रकार वे अन्त तक स्थिर रहने के सिद्धान्त को थामे नहीं रख सकते। एक बार इस पवित्रशास्त्र-विरोधी धारणा को अपना लो कि दृश्य कलीसिया के सब सदस्य अपनी कलीसिया-सदस्यता के कारण ही मसीह के अंग हैं, तो इस पत्र के सिद्धान्त को एक ओर रखना पड़ेगा। अहा, हूकर की यह कितनी बुद्धिमानी की बात है, "परमेश्वर की रहस्यमय और दृश्य कलीसिया के बीच के भेद को ध्यानपूर्वक न देखने के कारण जो भूलें हुई हैं, वे न तो थोड़ी हैं और न हल्की।"

जो बातें मैंने अभी कही हैं, उन्हें मैं इन पृष्ठों के प्रत्येक पाठक के सच्चे और प्रार्थनापूर्ण ध्यान के लिए सौंपता हूँ। उनके महत्त्व के गहरे विश्वास के कारण मैं ऊबाऊ प्रतीत होने का जोखिम उठाकर भी इन पर विस्तार से चला हूँ। मुझे निश्चय है कि इस पत्र का कोई भी भाग विचार के योग्य है, तो यही है।

मैं तुमसे विनती करता हूँ कि देखो, मसीहियों के लिए खरे विश्वास में स्थिर होना और सुसमाचार की सम्पूर्ण व्यवस्था के स्पष्ट पवित्रशास्त्रीय ज्ञान से सुसज्जित होना कितना महत्त्वपूर्ण है। मुझे इस बढ़ती हुई प्रवृत्ति का भय है कि सब सैद्धान्तिक प्रश्नों को केवल राय की बातें माना जाए, और सब "गम्भीर मनवाले" लोगों को चाहे वे कोई भी सिद्धान्त मानते हों, सही समझा जाए। मैं तुम्हें चेतावनी देता हूँ कि इस प्रवृत्ति के आगे झुकने का निश्चित परिणाम एक अस्पष्ट, निम्न और धुँधला धर्मविज्ञान होगा—ऐसा धर्मविज्ञान जिसमें न कोई निश्चित आशा है, न कोई निश्चित प्रेरणा, और न कोई निश्चित शान्ति—ऐसा धर्मविज्ञान जो ठीक तब सबसे अधिक विफल होगा जब उसकी सबसे अधिक आवश्यकता होगी—संकट के दिन, बीमारी की घड़ी में, और मृत्यु की शय्या पर।

मैं भली-भाँति जानता हूँ कि ऐसी चेतावनियाँ देना एक कृतघ्नतापूर्ण कार्य है। मैं यह भी भली-भाँति जानता हूँ कि जो ऐसी चेतावनियाँ देते हैं, उन्हें कट्टर, संकीर्ण-विचार और अनुदार कहा जाएगा। परन्तु अन्त तक स्थिर रहने के विषय में फैले हुए अनेक भ्रमों पर विचार करते हुए मैं पहले से कहीं अधिक यह देखे बिना नहीं रह सकता कि सब लोगों को सिद्धान्त के विषय में सावधान रहने का आग्रह करने की कितनी बड़ी आवश्यकता है। आह, यह जानना सीखो कि जब तुम मसीही सिद्धान्तों पर विश्वास करने की बात करते हो तो उसका अर्थ क्या है! अपनी आशा का कारण बता सकने के योग्य बनो। यह कह सकने के योग्य बनो कि धर्म में तुम किसे सत्य और किसे असत्य मानते हो। और यह कभी, कभी न भूलो कि विश्वास में दृढ़ता की एकमात्र नींव बाइबल का वचन-दर-वचन पूरा ज्ञान है।

अन्त में मैं तुम से विनती करता हूँ कि यह देखो कि धर्म में एक भ्रम किस प्रकार दूसरे भ्रम की ओर ले जाता है। झूठे सिद्धान्तों के बीच गहरा सम्बन्ध होता है। उनमें से केवल एक को अकेले अपनाना लगभग असम्भव है। जब मनुष्य कलीसिया और संस्कारों के विषय में एक बार भटक जाता है, तो कोई नहीं कह सकता कि वह कहाँ तक जाएगा और अन्त में कहाँ जा पहुँचेगा। यह भूल तो स्रोत ही में है, और यह उसके सारे धार्मिक जीवन-क्रम को प्रभावित करती है। बपतिस्मा के विषय की भूल मेरे कथन का एक स्पष्ट उदाहरण है। यह मनुष्य के सारे धर्मविज्ञान पर रंग चढ़ा देती है। यह अनजाने ही धर्मी ठहराए जाने, पवित्रीकरण, चुनाव और अन्त तक स्थिर रहने के विषय में उसके विचारों को प्रभावित करती है। यह उसके मन को विश्वास के सब प्रमुख अंगों के विषय में उलझनों के जाल से भर देती है। वह एक ऐसे सिद्धान्त से आरम्भ करता है जिसके समर्थन में पवित्रशास्त्र का एक भी स्पष्ट वचन नहीं दिया जा सकता, और इस सिद्धान्त के आगे वह बाइबल के बीसियों स्पष्ट खण्डों को रौंद डालता है! वे तो उसके प्रिय सिद्धान्त के आड़े आते हैं, इसलिए उनका अर्थ वह नहीं हो सकता जो साधारण बुद्धि हमें बताती है! हमें थोड़े-से झूठे सिद्धान्त के विषय में भी वैसा ही सतर्क होना चाहिए जैसा हम थोड़े-से पाप के विषय में होते हैं! झूठे सिद्धान्त के विषय में पौलुस के ये वचन स्मरण रखो, "थोड़ा सा ख़मीर पूरे गूँधे हुए आटे को ख़मीर कर डालता है।" (गलातियों 5:9)।

IV. अब अन्त में मैं कुछ ऐसे कारण बताने की ओर बढ़ता हूँ जिनसे अन्त तक स्थिर रहने का सिद्धान्त अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।

जब मैं अन्त तक स्थिर रहने के महत्त्व की बात करता हूँ, तो मेरा तनिक भी यह अर्थ नहीं कि उद्धार पाने के लिए इसे ग्रहण करना आवश्यक है। मैं खुले मन से मानता हूँ कि हज़ारों और लाखों लोग स्वर्ग पहुँचे हैं जो जीवन भर यह मानते रहे कि सन्त गिर सकते हैं। परन्तु इस सब से यह प्रमाणित नहीं होता कि इस लेख में जिस सिद्धान्त का समर्थन किया गया है वह उदासीनता का विषय है। जो इसे नहीं मानता और फिर भी उद्धार पाता है, वह निःसन्देह अच्छा ही करता है; परन्तु मुझे पक्का विश्वास है कि जो इसे मानता है और उद्धार पाता है, वह कहीं अधिक अच्छा करता है। मैं इसे परमेश्वर की सन्तानों के प्रमुख विशेषाधिकारों में से एक मानता हूँ, और मैं समझता हूँ कि सुसमाचार में निहित किसी भी विशेषाधिकार को आँखों से ओझल कर देना आत्मा की हानि के बिना नहीं होता।

(1) अन्त तक स्थिर रहना एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त है, क्योंकि यह सुसमाचार के सम्पूर्ण कथन पर गहरा रंग चढ़ा देता है। सुसमाचार की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह आनन्द का समाचार है। यह विद्रोही संसार के लिए शान्ति का सन्देश है। यह किसी दूर देश से आया हुआ शुभ समाचार है, जो जितना अप्रत्याशित है उतना ही अयोग्य लोगों के लिए। यह इस बात का आनन्द-समाचार है कि हमारे लिए, जो स्वभाव से खोए हुए, नष्ट और दिवालिया हैं, एक आशा है—क्षमा की आशा, परमेश्वर के साथ मेल-मिलाप की आशा, महिमा की आशा। यह इस बात का आनन्द-समाचार है कि इस आशा की नींव सामर्थी, गहरी और चौड़ी है—कि वह एक उद्धारकर्ता की प्रायश्चित्तकारी मृत्यु और अनुग्रहपूर्ण मध्यस्थता पर बनी है। यह इस बात का आनन्द-समाचार है कि यह उद्धारकर्ता एक सचमुच जीवित व्यक्ति है, परमेश्वर का पुत्र यीशु; जो उनका पूरा-पूरा उद्धार करने में समर्थ है जो उसके द्वारा परमेश्वर के पास आते हैं, और जो समर्थ होने के साथ-साथ उतना ही दयालु, करुणामय और उद्धार करने को तत्पर भी है। यह इस बात का आनन्द-समाचार है कि इस उद्धारकर्ता के द्वारा क्षमा और शान्ति का मार्ग सबसे सरल है। यह कोई ऐसी वस्तु नहीं जो स्वर्ग में इतनी ऊँची हो कि हम उस तक पहुँच न सकें, या पाताल में इतनी गहरी हो कि हम उसकी थाह न ले सकें। इसका अर्थ केवल इतना है कि हम विश्वास करें, भरोसा रखें और उद्धार के लिए अपने आप को पूरी तरह यीशु पर डाल दें; और तब उद्धार पूरी तरह हमारा है। यह इस बात का आनन्द-समाचार है कि सब विश्वास करनेवाले तुरन्त धर्मी ठहराए जाते हैं और उनके सब पाप क्षमा किए जाते हैं; उनके पाप, चाहे कितने ही हों, धो डाले जाते हैं; उनकी आत्माएँ, चाहे कितनी ही अयोग्य हों, परमेश्वर के सामने धर्मी गिनी जाती हैं। वे यीशु पर विश्वास करते हैं, इसलिए उनका उद्धार हो गया है। यही शुभ समाचार है। यही आनन्द का सन्देश है। यही वह सत्य है जो सुसमाचार की सबसे बड़ी विलक्षणता है। धन्य है वह जो इसे जानता और इस पर विश्वास करता है!

परन्तु ज़रा एक क्षण के लिए सोचो कि सुसमाचार की ध्वनि में कितना भारी अन्तर आ जाएगा, यदि मैं आगे यह कहूँ कि इन सब दयाओं को पा लेने के बाद तुम कुछ समय बाद इन्हें पूरी तरह खो सकते हो। तुम्हारे मन की क्या दशा होगी यदि मैं तुम से कहूँ कि तुम इन सब विशेषाधिकारों को गँवा देने के, और मसीह के लहू से मुहरबन्द की हुई अपनी क्षमा के फिर से वापस ले लिए जाने के प्रतिदिन संकट में हो? तुम क्या सोचोगे यदि मैं तुम से कहूँ कि तुम्हारी सुरक्षा अभी एक अनिश्चित बात है, और तुम अब भी नाश हो सकते हो तथा स्वर्ग तक कभी पहुँच ही न सको? आह, यह कितना निराशाजनक प्रतीत होगा! आह, महिमामय सुसमाचार के अनुग्रह और सौन्दर्य का कितना बड़ा भाग लुप्त होकर मुरझा जाएगा! फिर भी अन्त तक स्थिर रहने के इनकार से हमें अक्षरशः और ठीक-ठीक इसी निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है।

एक बार यह मान लीजिए कि परमेश्वर के सन्त नाश हो सकते हैं, और मुझे लगता है कि आप सुसमाचार के मुकुट से उसका सबसे उज्ज्वल रत्न नोंच लेते हैं। हम एक खड़ी चट्टान के किनारे पर लटके हैं। जब तक हम मर नहीं जाते, हमें भयानक अनिश्चितता में रखा जाता है। हमसे यह कहना कि हमें प्रोत्साहित करने के लिए अनुग्रह की बहुत सी प्रतिज्ञाएँ हैं—यदि हम केवल स्थिर रहें—तो यह केवल उपहास है। यह उस रोगी से कहने के समान है कि यदि वह केवल चंगा हो जाए, तो वह बलवन्त हो जाएगा। बेचारा रोगी इस बात का कोई भरोसा नहीं पाता कि वह चंगा हो जाएगा, और बेचारा निर्बल विश्वासी अपने भीतर स्थिर रहने की सामर्थ्य जैसी कोई चीज़ नहीं पाता। आज वह कनान में हो सकता है, और कल फिर मिस्र में, दासत्व में। इस सप्ताह वह सकरे मार्ग में हो सकता है; परन्तु जहाँ तक वह जानता है, अगले सप्ताह वह फिर चौड़े मार्ग पर लौट सकता है। इस महीने वह धर्मी ठहराया गया, क्षमा पाया हुआ और छूट पाया हुआ मनुष्य हो सकता है; परन्तु अगले महीने उसकी क्षमा पूरी तरह रद्द हो सकती है, और वह स्वयं दण्ड की दशा में पहुँच सकता है। इस वर्ष उसमें विश्वास हो और वह परमेश्वर की सन्तान हो; अगले वर्ष वह शैतान की सन्तान हो सकता है, और मसीह में उसका कोई भाग या अंश न रहे। इन सब बातों में शुभ समाचार कहाँ है? आनन्द का सन्देश कहाँ गया? सचमुच मुझे ऐसा सिद्धान्त सुसमाचार के आनन्द को जड़ से काट डालनेवाला लगता है। फिर भी यदि हम सन्तों के अन्त तक स्थिर रहने को अस्वीकार करें, तो यही सिद्धान्त हमें मानना पड़ेगा। "वे मसीहियों की शान्ति को निर्बल करते हैं जो विश्वासियों को मसीह के साथ ऐसे चलाते हैं जैसे रस्सी पर नाचनेवाले, कि हर क्षण अपनी गर्दन टूटने के भय में रहें!"—मैन्टन, 1658।

मैं परमेश्वर का धन्यवाद करता हूँ कि मैं परमेश्वर के वचन में इससे भिन्न प्रकार का सुसमाचार देख पाता हूँ। मेरी दृष्टि में बाइबल यह सिखाती है कि जो एक बार मसीह में विश्वास का जीवन आरम्भ करता है, वह निःसन्देह धर्मत्याग से बचाया जाएगा, और महिमामय अन्त तक पहुँचेगा। परमेश्वर के अनुग्रह से एक बार जिलाया जाने के बाद वह सदा जीवित रहेगा। पाप की कब्र से एक बार उठाए जाने और नया मनुष्य बनाए जाने के बाद वह फिर कभी कब्र में नहीं लौटेगा, और फिर से वह पुराना मनुष्य नहीं बनेगा जो "अपराधों और पापों में मरा हुआ" था। वह परमेश्वर की सामर्थ्य से सुरक्षित रखा जाएगा। वह उसके द्वारा जिसने उससे प्रेम किया, जयवन्त से भी बढ़कर होगा। सनातन परमेश्वर उसका शरणस्थान है; उसके नीचे सनातन भुजाएँ हैं। वह प्रेम जिसमें उसका भाग है, सनातन है। वह धार्मिकता जिसे वह पहिने हुए है, सनातन है। वह छुटकारा जिसका वह आनन्द लेता है, सनातन है। उसका बोध और शान्ति वह अपनी लापरवाही से खो सकता है। परन्तु विश्वास करने के बाद वह वस्तु स्वयं सदा के लिए उसी की है।

कोई भी विचारशील मनुष्य उन दो रीतियों को देखे जिनसे थके और बोझ से दबे पापी को सम्बोधित किया जा सकता है, और स्वयं निर्णय करे कि इनमें से कौन सी परमेश्वर के अनुग्रह के सुसमाचार के अधिक समान है। एक ओर वह सिद्धान्त है जो कहता है, "प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास कर, तो तू उद्धार पाएगा। एक बार विश्वास करने पर तू कभी नाश नहीं होगा। तेरे विश्वास को कभी पूरी तरह विफल होने नहीं दिया जाएगा। तू छुटकारे के दिन के लिए पवित्र आत्मा से मुहर लगाया जाएगा।" दूसरी ओर वह सिद्धान्त है जो कहता है, "प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास कर, तो तू उद्धार पाएगा। परन्तु विश्वास करने के बाद—सावधान रह! तेरा विश्वास विफल हो सकता है।

तू गिर सकता है। तू पवित्र आत्मा को अपने से दूर कर सकता है। अन्त में तू सदा के लिए नाश हो सकता है।" इन दोनों सिद्धान्तों में से किसमें अधिक शुभ समाचार है? कौन सा आनन्द के सन्देश के अधिक समान है? क्या इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता कि पापी को किस रीति से सम्बोधित किया जाए? क्या यह उदासीन बात है कि हम उससे कहें कि विश्वास करने पर वह उद्धार पाता है, जब तक वह गिर न जाए; या यह कहें कि विश्वास करने पर वह सदा के लिए उद्धार पाता है? मैं ऐसा नहीं सोच सकता। मैं इन दोनों सिद्धान्तों के बीच के अन्तर को बहुत बड़ा समझता हूँ। यह जनवरी और जून का अन्तर है। यह भोर के धुँधलके और दोपहर का अन्तर है।

मैं अपनी ओर से कहता हूँ। मैं दूसरों के अनुभव का उत्तर नहीं दे सकता। मुझे ठोस शान्ति देने के लिए, मुझे अपनी वर्तमान दशा के साथ-साथ अपने भविष्य की आशाओं के विषय में भी कुछ जानना आवश्यक है। आज अपनी क्षमा को देखना सुखद है—परन्तु मैं कल के विषय में सोचे बिना नहीं रह सकता। मुझसे कहिए कि पवित्र आत्मा, जो मुझे मसीह के पास लाता है, और मुझे उसमें मन फिराव और विश्वास देता है, कभी मुझे न छोड़ेगा न त्यागेगा—और मैं ठोस शान्ति पाता हूँ। मेरे पाँव चट्टान पर हैं। मेरी आत्मा सुरक्षित हाथों में है। मैं सकुशल घर पहुँचूँगा। इसके विपरीत मुझसे कहिए कि मसीह के पास लाए जाने के बाद मुझे अपनी ही चौकसी पर छोड़ दिया जाता है, और यह मेरे जागते रहने, प्रार्थना करने और सावधानी पर निर्भर है कि आत्मा मुझे छोड़ता है या नहीं—और मेरा हृदय भीतर ही भीतर पिघल जाता है। मैं रेत पर खड़ा हूँ। मैं टूटे हुए सरकण्डे पर टेक लगाता हूँ। मैं कभी स्वर्ग नहीं पहुँचूँगा। मुझसे यह कहना व्यर्थ है कि प्रतिज्ञाएँ केवल तभी मेरी हैं जब मैं उनके योग्य चलूँ। मुझसे मसीह की दया की बात करना व्यर्थ है; मैं अपने आलस्य और हठ से उसमें अपना सारा भाग खो सकता हूँ। अन्त तक स्थिर रहने के सिद्धान्त का अभाव मुझे मसीह के सारे सुसमाचार को एक भिन्न रंग देता हुआ दिखता है। यदि मैं इसे बहुत महत्त्वपूर्ण मानता हूँ तो आपको आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

(2) परन्तु अन्त तक स्थिर रहने का सिद्धान्त इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि उन सब पर इसका विशेष प्रभाव पड़ सकता है जो धर्म के विषय में दो विचारों के बीच डगमगाते हैं।

मसीह की कलीसिया में इस प्रकार के बहुत लोग हैं। हर उस मण्डली में, जहाँ मसीह का सुसमाचार प्रचार किया जाता है, ऐसे सैकड़ों पाए जाते हैं जो भली-भाँति जानते हैं कि क्या उचित है, फिर भी अपने ज्ञान के अनुसार चलने का साहस नहीं रखते। उनके विवेक जागे हुए हैं। उनके मन अपेक्षाकृत प्रबुद्ध हैं। उनकी भावनाएँ अपनी आत्माओं के मूल्य के बोध के लिए आंशिक रूप से जागी हैं। वे वह मार्ग देखते हैं जो उन्हें लेना चाहिए। वे आशा करते हैं कि किसी दिन वे उसे ले सकेंगे। परन्तु अभी वे चुपचाप बैठे प्रतीक्षा करते हैं। वे क्रूस उठाकर मसीह को स्वीकार नहीं करेंगे।

और उन्हें कौन-सी बात रोके रखती है? बहुत बड़ी संख्या में वे आरम्भ करने से डरते हैं, कि कहीं आगे चलकर वे असफल होकर गिर न जाएँ। यदि वे मसीह की सेवा करें तो उन्हें अपने सामने अनगिनत कठिनाइयाँ दिखाई देती हैं। वे ठीक ही सोचते हैं। इससे इनकार करना व्यर्थ है कि कठिनाइयाँ हैं, और बहुत हैं और बड़ी भी हैं। जिस विशाल समुद्र में हम उन्हें उतारना चाहते हैं, उसके किनारे वे काँपते खड़े हैं; और लुढ़कती, उछलती लहरों को देखकर उनके मन बैठ जाते हैं। वे उस समुद्र के जल पर अनेक छोटी नावों को देखते हैं जो इधर-उधर डोल रही हैं, पार पहुँचने के लिए कड़ा संघर्ष कर रही हैं, और ऐसी दिखती हैं मानो क्रुद्ध लहरों में डूब जाएँगी और कभी सुरक्षित बन्दरगाह तक न पहुँचेंगी। वे सोचते हैं, “कुछ लाभ नहीं, कुछ लाभ नहीं। हम निश्चय ही गिर जाएँगे। हम अभी मसीह की सेवा नहीं कर सकते। यह काम हो ही नहीं सकता।”

अब इन डगमगाते मनों को साहस देने के लिए सबसे अधिक क्या कारगर होगा? इस यात्रा के लिए उनका मन बढ़ाने में सबसे अधिक क्या कारगर होगा? उनके मन को प्रफुल्लित करने, उनके विचारों में बल भरने और उन्हें निडर होकर नाव खोल देने के बिन्दु तक लाने में सबसे अधिक क्या कारगर होगा? मैं बिना झिझके उत्तर देता हूँ: अन्त तक स्थिर रहने का सिद्धान्त।

मैं उन्हें सहर्ष बताना चाहूँगा कि मसीह की सेवा की कठिनाइयाँ चाहे कितनी ही बड़ी हों, उन सब में से उन्हें विजय के साथ पार ले जाने के लिए अनुग्रह और सामर्थ्य भण्डार में रखा है। मैं उन्हें बताना चाहूँगा कि ये दीन, प्रार्थना करनेवाले, टूटे मनवाले यात्री, जिन्हें वे देखते हैं और जिनके डूब जाने की वे आशा करते हैं, सब ऐसे सुरक्षित हैं मानो वे बन्दरगाह में पहुँच ही चुके हों। हर एक के साथ जहाज़ पर एक खेवनहार है, जो उन्हें हर आँधी में से सुरक्षित पार ले जाएगा। वे हर एक अनन्त परमेश्वर से ऐसे बन्धन में बँधे हैं जो कभी टूट नहीं सकता, और अन्त में सब अपने प्रभु के दाहिने हाथ सुरक्षित दिखाई देंगे। हाँ, और मैं उन्हें सहर्ष बताना चाहूँगा कि यदि वे केवल आरम्भ करें तो वे भी सब का अन्त महिमामय होगा। मैं चाहता हूँ कि वे जानें कि यदि वे अपने आपको केवल मसीह को सौंप दें तो वे कभी त्यागे न जाएँगे। शैतान उन्हें छीन न ले जा सकेगा। वे कभी डूबने और लज्जित होने को न छोड़े जाएँगे। उन पर परीक्षाएँ आ सकती हैं, परन्तु ऐसी कोई नहीं जिसे सहने की सामर्थ्य आत्मा उन्हें न दे। उन्हें प्रलोभन आ सकते हैं, परन्तु ऐसा कोई नहीं जिसका सामना करने के योग्य आत्मा उन्हें न बनाए। वे केवल आरम्भ करें, तो वे जयवन्त होंगे। परन्तु मुख्य बात आरम्भ करना ही है। मेरा दृढ़ विश्वास है कि बहुत से डगमगाते मसीही स्पष्ट रूप से अपना अंगीकार करने से जो पीछे हटते हैं, उसका एक कारण वह प्रोत्साहन न मिलना है जो अन्त तक स्थिर रहने का सिद्धान्त देने के लिए ठहराया गया है।

(3) अन्त तक स्थिर रहने का सिद्धान्त इसलिए महत्त्वपूर्ण है कि सच्चे विश्वासियों के मन पर इसका विशेष प्रभाव पड़ता है।

सच्चे विश्वासियों की संख्या सदा ही बहुत कम रही है। वे एक छोटा झुण्ड हैं। परन्तु उस झुण्ड में भी थोड़े ही ऐसे हैं जिन्हें विश्वास में दृढ़ कहा जा सके, थोड़े ही ऐसे हैं जो विश्वास में निरन्तर आनन्द और शान्ति को बहुत जानते हों, थोड़े ही ऐसे हैं जो प्रायः सन्देहों, चिन्ताओं और भयों से निराश न हो जाते हों।

इससे इनकार करना व्यर्थ है कि स्वर्ग का मार्ग सकरा है। विश्वासियों के विश्वास को परखनेवाली बहुत सी बातें हैं। उन पर ऐसी परीक्षाएँ आती हैं जिन्हें संसार नहीं समझ सकता। उनके भीतर एक निर्बल, कपटी और अविश्वसनीय हृदय है, जो जब वे गर्म होना चाहते हैं तब ठण्डा रहता है, जब वे आगे बढ़ना चाहते हैं तब पीछे रहता है, और जागने की अपेक्षा सोने को अधिक तैयार रहता है। उनके बाहर एक ऐसा संसार है जो मसीह के सत्य और मसीह के लोगों से प्रेम नहीं रखता, निन्दा, उपहास और सताव से भरा संसार, जिसमें उनके अपने प्रियतम सम्बन्धी भी अकसर सम्मिलित हो जाते हैं। उनके निकट सदा एक व्यस्त शैतान है, एक शत्रु जो 6,000 वर्ष से मनुष्यों के हृदय पढ़ता आया है और ठीक जानता है कि अपने प्रलोभनों को कैसे और कब उनके अनुकूल बनाए; एक शत्रु जो उनके मार्ग में फन्दे बिछाना कभी नहीं छोड़ता, कभी नहीं ऊँघता और कभी नहीं सोता। उन्हें औरों की तरह जीवन की चिन्ताएँ भी सँभालनी हैं: बच्चों की चिन्ता, व्यापार की चिन्ता, धन की चिन्ता, सांसारिक योजनाओं और प्रबन्धों की चिन्ता, एक दुर्बल निर्धन शरीर की चिन्ता, जो प्रतिदिन उनकी आत्मा पर आ पड़ती हैं। यदि विश्वासी कभी निराश हो जाते हैं तो कौन आश्चर्य करे? बल्कि आश्चर्य तो इस पर होना चाहिए कि कोई भी विश्वासी उद्धार पाता है। सच तो यह है कि मैं प्रायः सोचता हूँ कि हर एक उद्धार पाए हुए जन का उद्धार इस्राएल के लाल समुद्र पार करने से भी बड़ा चमत्कार है।

“जितने क्षण हैं, उतने ही चमत्कार तब होते हैं जब एक सन्त सुरक्षित रखा जाता है।”—जेन्किन, 1680।

परन्तु विश्वासी के भय और चिन्ताओं की सबसे अच्छी औषधि क्या है? जब वह अनजाने भविष्य की ओर देखता है और थकाऊ बीते हुए समय को स्मरण करता है तब उसे सबसे अधिक क्या प्रफुल्लित करेगा? मैं बिना झिझके उत्तर देता हूँ: परमेश्वर के चुने हुए लोगों के अन्त तक स्थिर रहने का सिद्धान्त। वह जाने कि परमेश्वर ने जो भला काम उसमें आरम्भ किया है, उसे वह कभी उलटने न देगा। वह जाने कि मसीह के छोटे झुण्ड के पाँव सब एक ही दिशा में हैं। वे भटके हैं। वे सताए गए हैं। वे परखे गए हैं। परन्तु उनमें से एक भी खोया नहीं गया। वह जाने कि यीशु जिनसे प्रेम रखता है, उनसे अन्त तक प्रेम रखता है। वह जाने कि वह अपने झुण्ड के सबसे निर्बल मेम्ने को जंगल में नाश न होने देगा, और न अपनी बाड़ी के सबसे कोमल फूल को मुरझाकर मरने देगा! वह जाने कि सिंहों की मांद में दानिय्येल, आग के भट्ठे में तीनों जवान, जहाज़ के टूटने में पौलुस, और जहाज़ में नूह की जितनी देखभाल और सुरक्षा हुई थी, उससे कम आज मसीह में हर विश्वासी की नहीं है। वह जाने कि वह पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा की सर्वशक्तिमान सामर्थ्य से घिरा, चारदीवारी में बन्द, सुरक्षित और रखवाली में है, और नाश नहीं हो सकता। वह जाने कि वर्तमान या भविष्य की कोई वस्तु, मनुष्य या दुष्टात्माएँ, भीतर की चिन्ताएँ या बाहर के क्लेश, परमेश्वर की किसी एक भी सन्तान को उस प्रेम से, जो मसीह यीशु में है, अलग करने की सामर्थ्य नहीं रखते।

यह बड़ी दृढ़ सान्त्वना है! ये वे बातें हैं जो परमेश्वर ने अपने लोगों की स्थापना और दृढ़ता के लिए सुसमाचार में रख छोड़ी हैं। मसीह की कलीसिया में यदि इन बातों को जितना सामने लाया जाता है उससे अधिक लाया जाए, तो उसके लोगों के लिए यह बहुत भला होगा। सचमुच मेरा विश्वास है कि सन्तों की दुर्बलता का एक कारण उन सत्यों से उनकी अनभिज्ञता है जो परमेश्वर ने उन्हें सामर्थी बनाने के लिए प्रकट किए हैं।

दृढ़ता के महत्त्व के विषय को मैं यहीं छोड़ता हूँ। मुझे भरोसा है कि मैंने इतना कह दिया है कि मेरे पाठक देख सकें कि इस लेख में मैंने उनका ध्यान इस ओर बिना उचित कारण के नहीं खींचा है। मुझे दृढ़ता से लगता है कि मनुष्य का हृदय इतना कठोर है कि धार्मिक शिक्षा में कोई भी ऐसी बात छोड़नी नहीं चाहिए जिससे उसका भला होने की आशा हो। मैं सत्य का एक कण भी छोड़ने का साहस नहीं करता, चाहे वह कितना ही कठोर और दुरुपयोग के योग्य क्यों न दिखाई दे। मुझे कोई भी बात छोटी नहीं लगती जो सुसमाचार की सुन्दरता को बढ़ाती है, डगमगानेवालों को प्रोत्साहन देती है, या परमेश्वर के लोगों को दृढ़ करती और उन्हें उन्नत बनाती है। मैं यह सिखाना चाहता हूँ कि सुसमाचार केवल वर्तमान क्षमा और शान्ति ही नहीं देता—वह अनन्त सुरक्षा और अन्त तक निश्चित स्थिरता भी देता है। मेरा विश्वास है कि यही आत्मा का मन है। और जो कुछ आत्मा प्रकट करता है, उसकी मैं घोषणा करना चाहता हूँ।

और अब मैंने अपनी सामर्थ्य के अनुसार दृढ़ता का सारा विषय अपने पाठकों के सामने रख दिया है। यदि मैं आपको कायल करने में असफल रहा, तो मुझे खेद है—परन्तु मुझे सन्तोष है कि दोष उस सिद्धान्त में नहीं जिसका मैं पक्ष लेता हूँ—वरन् उसे प्रस्तुत करने के मेरे ढंग में है। अब इस लेख को कुछ व्यावहारिक उपयोग के शब्दों के साथ समाप्त करना शेष है।

(1) पहली बात, मैं आपसे विनती करता हूँ कि भली-भाँति विचार करें कि क्या यीशु मसीह के उद्धार में आपका कोई भाग है भी या नहीं।

आप दृढ़ता के विषय में क्या विश्वास करते हैं, इससे कुछ नहीं बनता, यदि अन्त में मसीह पर आपका सच्चा विश्वास ही नहीं है। इस सिद्धान्त को मानना या न मानना बहुत महत्त्व नहीं रखता, जब तक आपमें उद्धार देनेवाला विश्वास नहीं है, आपके पाप क्षमा नहीं हुए हैं, और आपका हृदय पवित्र आत्मा द्वारा नया नहीं किया गया है। सबसे स्पष्ट मस्तिष्क का ज्ञान भी किसी को नहीं बचाएगा। सबसे सही और रूढ़िवादी विचार भी मनुष्य को सबसे अज्ञानी अन्यजाति के पास नाश होने से नहीं रोकेंगे—यदि वह नए सिरे से जन्मा नहीं है। ओह, खोजकर देखिए कि आपकी अपनी आत्मा की दशा क्या है!

आप सदा जीवित नहीं रह सकते। एक दिन आपको मरना ही है। मृत्यु के बाद के न्याय से आप बच नहीं सकते। आपको मसीह के न्याय-आसन के सामने खड़ा होना ही होगा। प्रधान स्वर्गदूत की पुकार की अवज्ञा नहीं की जा सकती। उस अन्तिम महासभा में उपस्थित होना ही पड़ेगा। एक दिन आपकी अपनी आत्मा की दशा की पूरी जाँच होगी। एक दिन यह प्रकट हो जाएगा कि परमेश्वर की दृष्टि में आप क्या हैं। आपकी आत्मिक दशा अन्त में सारे संसार के सामने प्रकाश में लाई जाएगी। ओह, अभी पता लगा लीजिए कि वह क्या है! जब तक समय है, जब तक स्वास्थ्य है, अपनी आत्मा की दशा का पता लगा लीजिए।

यदि आपका मन नहीं फिरा है, तो आपका संकट उससे कहीं बड़ा है जितना मैं वर्णन कर सकता हूँ। जितनी पूरी विश्वासी की सुरक्षा है, उतना ही घातक अविश्वासी का संकट है। अविश्वासी और उस कीड़े के बीच जो कभी नहीं मरता, और उस आग के बीच जो कभी नहीं बुझती, केवल एक कदम का अन्तर है। वह सचमुच अथाह कुण्ड के किनारे पर लटका हुआ है। सन्त के लिए अचानक मृत्यु अचानक महिमा है; परन्तु मन न फिराए हुए पापी के लिए अचानक मृत्यु अचानक नरक है। ओह, खोजकर देखिए कि आपकी आत्मा की दशा क्या है!

स्मरण रखिए कि आप यह जान सकते हैं कि सुसमाचार के निमंत्रणों में आपका भाग है या नहीं। यह जानने योग्य बात है। यह कहना व्यर्थ है कि कोई मनुष्य नहीं बता सकता। मैं कभी विश्वास नहीं करूँगा कि हाथ में बाइबल लिए हुआ कोई सच्चा मनुष्य परिश्रम से आत्म-परीक्षा करके अपनी आत्मिक दशा न जान पाए। ओह, सच्चे मनुष्य बनिए! पवित्रशास्त्र में खोजिए। अपने भीतर देखिए। तब तक विश्राम न कीजिए जब तक आप अपनी आत्मा की दशा का पता न लगा लें। आत्मा की दशा को अनिश्चित छोड़कर जीते रहना बुद्धिमान मनुष्य का नहीं—मूर्ख का काम है।

(2) इसके बाद, यदि आप सुसमाचार के विशेषाधिकारों के विषय में कुछ नहीं जानते, तो मैं आपसे विनती करता हूँ कि आज ही मन फिराइए और परिवर्तित होइए, मसीह की वाणी सुनिए और उसके पीछे हो लीजिए।

मुझे कोई कारण नहीं दिखता, न मानवीय न दैवीय, कि यदि आप सचमुच इच्छुक हैं तो आज ही इस निमंत्रण को स्वीकार करके उद्धार क्यों न पाएँ। आपके पापों की मात्रा आपको रोकने न पाए। हर प्रकार का पाप क्षमा किया जा सकता है। यीशु का लहू सब पापों को शुद्ध कर देता है। आपके हृदय की कठोरता आपको रोकने न पाए। परमेश्वर आपको नया हृदय देगा, और नई आत्मा आपके भीतर डालेगा। परमेश्वर के आदेश आपको रोकने न पाएँ। वह पापियों की मृत्यु नहीं चाहता। वह नहीं चाहता कि कोई नाश हो—वरन् यह कि सब मन फिराएँ। मसीह की ओर से इच्छा की कोई कमी आपको रोकने न पाए—वह बहुत समय से मनुष्यों को पुकारता आया है, "जो कोई चाहे वह जीवन का जल सेंतमेंत ले।" "जो मेरे पास आएगा उसे मैं कभी न निकालूँगा।" ओह, आप क्यों उद्धार न पाएँ? (प्रकाशित वाक्य 22:17; यूहन्ना 6:37।)

यदि आपको कभी परमेश्वर की सन्तान होना है, तो एक दिन ऐसा आना ही है जब आप अपनी आत्मा के हितों के साथ खिलवाड़ करना छोड़ देंगे। एक घड़ी आनी ही है जब आप अन्त में सच्ची गम्भीरता से घुटने टेकेंगे और सच्ची प्रार्थना में परमेश्वर के सामने अपना हृदय उँडेल देंगे। एक समय आना ही है जब आपके पापों का बोझ अन्त में असहनीय लगेगा, और आप अनुभव करेंगे कि आपको मसीह में विश्राम मिलना ही चाहिए या आप नाश होंगे। यदि आपको कभी परमेश्वर की सन्तान बनकर उद्धार पाना है, तो यह सब होना ही है। तो आज ही क्यों नहीं? आज ही रात क्यों नहीं? बिना विलम्ब मसीह को ढूँढ़कर जीवित क्यों न हों? यदि आप उत्तर दे सकते हैं तो दीजिए!

(3) इसके बाद, हर उस पाठक से जो अन्त तक दृढ़ता को मानता है, मेरी विनती है कि वह इस अनमोल सिद्धान्त का ऐसा उपयोग करे कि इसका दुरुपयोग न हो।

सब लोगों में परमेश्वर की दया का दुरुपयोग करने की एक भयानक तत्परता है। परमेश्वर की सन्तान भी इस दुःखद संक्रमण से मुक्त नहीं हैं। उत्तम से उत्तम सन्तों के पास भी एक व्यस्त शैतान है, जो उन्हें इस बात के लिए फुसलाना चाहता है कि वे अपने विशेषाधिकारों को लापरवाही से जीने का बहाना बना लें और अपनी आत्मा का भोजन विष में बदल दें। मैं मसीह की कलीसिया के चारों ओर देखकर, और यह देखकर कि बहुत-से ऊँचे दावा करनेवाले किस अन्त को पहुँचते हैं, यह अनुभव किए बिना नहीं रह सकता कि सावधानी की आवश्यकता है। "इसलिए जो समझता है, मैं स्थिर हूँ, वह चौकस रहे कि कहीं गिर न पड़े।" (1 कुरिन्थियों 10:12।)

क्या हम जानना चाहते हैं कि दृढ़ता के सिद्धान्त का दुरुपयोग करना क्या है? इसका दुरुपयोग तब होता है जब विश्वासी अपनी सुरक्षा को आचरण की असंगतियों का बहाना बना लेते हैं। इसका दुरुपयोग तब होता है जब वे अन्तिम विनाश से अपनी सुरक्षा को पवित्रीकरण के निम्न स्तर और परमेश्वर के साथ दूर-दूर की चाल के लिए सफ़ाई बना लेते हैं। इन दोनों दुरुपयोगों से सचेत रहने की मैं विश्वासियों से विनती करता हूँ।

क्या हम जानना चाहते हैं कि अन्त तक स्थिर रहने के सिद्धान्त का सही उपयोग क्या है? आइए हम अपने हृदय की प्रतिदिन की क्रियाओं पर ईर्ष्यापूर्ण चौकसी रखें। आइए हम आत्मिक आलस्य की छोटी से छोटी प्रवृत्ति को भी आरम्भ ही में कुचल डालें और मार दें। आइए हम अपने जीवन के प्रधान सिद्धान्त के रूप में अपने मन में यह ठान लें कि परमेश्वर की दया का सही उपयोग तभी होता है जब वह हमारे हृदय पर पवित्र करने वाला प्रभाव डालती है। आइए हम अपने भीतरी मनुष्यत्व में यह बात दृढ़ता से जमा लें कि मसीह के प्रेम का सच्चा मूल्य तभी जाना जाता है जब वह हमें और अधिक आत्मिक-मनस्कता के लिए विवश करता है। आइए हम अपने मन के सामने यह रखें कि हम जितना अधिक सुरक्षित अनुभव करें—उतना ही अधिक हमें पवित्र होना चाहिए। हम जितना अधिक यह समझें कि परमेश्वर ने हमारे लिए बहुत कुछ किया है, उतना ही अधिक हमें परमेश्वर के लिए करना चाहिए। हमारा ऋण जितना बड़ा, हमारी कृतज्ञता भी उतनी ही बड़ी होनी चाहिए। हम अनुग्रह के धन को जितना अधिक देखें, उतने ही अधिक हम भले कर्मों में धनी हों।

ओह, प्रेरित पौलुस जैसा हृदय पाने के लिए! जैसे उसने मसीह में अपनी पूर्ण सुरक्षा को समझा, वैसे ही समझना—जैसे उसने परमेश्वर की महिमा के लिए परिश्रम किया, मानो हम कभी बहुत अधिक कर ही नहीं सकते—यही वह निशाना है—यही वह आदर्श है जिस पर हमें लक्ष्य साधना चाहिए। आइए हम अन्त तक स्थिर रहने के सिद्धान्त का ऐसा उपयोग करें कि हमारी भलाई की कभी निन्दा न की जाए।

आइए हम अपने जीवन से इस सिद्धान्त को ऐसा सुशोभित करें कि हम उसे दूसरों के लिए सुन्दर बना दें, और लोग यह कहने को विवश हो जाएँ, "यह विश्वास करना कि सन्त कभी नाश न होंगे, एक अच्छी और पवित्र बात है।"

(4) अन्तिम बात यह कि मैं उन सब विश्वासियों से विनती करता हूँ जो अब तक भटक जाने से डरते रहे हैं—कि वे अन्त तक स्थिर रहने के सिद्धान्त को दृढ़ता से थाम लें, और मसीह में अपनी सुरक्षा को समझ लें।

मैं चाहता हूँ कि आप जानें कि मसीह में आपका भाग कितना लम्बा और चौड़ा है। मैं चाहता हूँ कि आप उस खज़ाने की पूरी मात्रा को समझें जिसके अधिकारी यीशु पर विश्वास आपको बनाता है। आपने जान लिया है कि आप एक बड़े पापी हैं। इसके लिए परमेश्वर का धन्यवाद करें। आप क्षमा और परमेश्वर के साथ मेल-मिलाप के लिए मसीह के पास भाग आए हैं। इसके लिए परमेश्वर का धन्यवाद करें। आपने अपने आपको समय और अनन्तकाल के लिए यीशु को सौंप दिया है—आपकी आशा मसीह के लहू, मसीह की धार्मिकता, मसीह की मध्यस्थता, और मसीह की प्रतिदिन की सदा स्थिर रहने वाली मध्यस्थता की प्रार्थना को छोड़ और किसी में नहीं है। इसके लिए परमेश्वर का धन्यवाद करें। आपके हृदय की अभिलाषा और प्रार्थना है कि आप सब प्रकार के चाल-चलन में पवित्र हों। इसके लिए परमेश्वर का धन्यवाद करें। परन्तु ओह, इस महिमामय सत्य को थाम लें—कि यीशु पर विश्वास करने से आप कभी नाश न होंगे, आप कभी त्यागे न जाएँगे, आप कभी भटककर दूर न जाएँगे! यह जितना प्रेरितों के लिए लिखा है उतना ही आपके लिए भी, "मेरी भेड़ें कभी नाश न होंगी।"

हाँ! यीशु ने यह कहा है—और यीशु ने चाहा कि इस पर विश्वास किया जाए। यीशु ने यह कहा है—और वह अपनी प्रतिज्ञाओं को कभी नहीं तोड़ता। यीशु ने यह कहा है—और वह झूठ नहीं बोल सकता। यीशु ने यह कहा है—और स्वर्ग और पृथ्वी का सारा अधिकार उसके पास है कि वह अपना वचन पूरा करे। यीशु ने यह छोटे से छोटे और दीन से दीन विश्वासी के लिए कहा है, "मेरी भेड़ें कभी नाश न होंगी।"

क्या आप जीवन में पूर्ण शान्ति चाहते हैं? तो अन्त तक स्थिर रहने के इस सिद्धान्त को थाम लें। आपकी परीक्षाएँ अनेक और बड़ी हो सकती हैं। आपका क्रूस बहुत भारी हो सकता है। परन्तु आपकी आत्मा का सारा कार्य एक "सनातन वाचा के अनुसार चलता है, जो सब बातों में ठीक की हुई और अटल है।" (2 शमूएल 23:5।) सब बातें मिलकर आपकी भलाई ही के लिए काम कर रही हैं। आपके दुःख केवल आपकी आत्मा को महिमा के लिए शुद्ध कर रहे हैं। आपके वियोग केवल आपको ऊपर के उस मन्दिर के लिए, जो हाथों से बनाया हुआ नहीं है, एक तराशे हुए पत्थर के समान गढ़ रहे हैं। आँधियाँ चाहे जिस दिशा से चलें, वे आपको स्वर्ग के और निकट ही धकेलती हैं। आप चाहे जिस मौसम से गुज़रें, वह आपको परमेश्वर के खत्ते के लिए पका ही रहा है। आपकी सर्वोत्तम वस्तुएँ पूर्णतः सुरक्षित हैं। चाहे जो हो, आप "कभी नाश न होंगे।"

क्या आप बीमारी में दृढ़ सान्त्वना चाहते हैं? तो अन्त तक स्थिर रहने के इस सिद्धान्त को थाम लें। जब आप इस पार्थिव तम्बू की खूँटियों को एक-एक करके ढीला होते अनुभव करें, तो सोचें, "कोई भी वस्तु मसीह के साथ मेरे मेल को तोड़ नहीं सकती।" आपकी देह निकम्मी हो सकती है; आपके अंग अपना काम करने से इनकार कर सकते हैं; आप अपने को एक बूढ़े निकम्मे लट्ठे के समान अनुभव कर सकते हैं—दूसरों के लिए थकान और अपने लिए बोझ। परन्तु आपकी आत्मा सुरक्षित है! यीशु आपकी आत्मा की चिन्ता करते कभी थकता नहीं। आप "कभी नाश न होंगे।"

क्या आप मृत्यु में आशा की पूर्ण निश्चयता चाहते हैं? तो अन्त तक स्थिर रहने के इस सिद्धान्त को थाम लें। वैद्य अपना परिश्रम छोड़ चुके हों; मित्र आपकी आवश्यकताओं की सेवा करने में असमर्थ हों; दृष्टि चली जाए; सुनना चला जाए; स्मरण-शक्ति लगभग जाती रहे—परन्तु परमेश्वर की करुणा आपसे नहीं जाएगी। मसीह में एक बार होने पर आप कभी त्यागे न जाएँगे। यीशु आपके पास खड़ा रहेगा। शैतान आपको हानि न पहुँचाएगा। मृत्यु आपको मसीह में परमेश्वर के सनातन प्रेम से अलग न करेगी। आप "कभी नाश न होंगे!"

पाद-टिप्पणी

स्कॉटलैंड के प्रसिद्ध धर्मशास्त्री ब्रूस की मृत्यु-शय्या मेरे इस विषय के इस भाग का एक प्रभावशाली उदाहरण है। वृद्ध फ्लेमिंग उसका वर्णन इन शब्दों में करता है। "उसकी दृष्टि जाती रही, तब उसने अपनी बाइबल मँगवाई; परन्तु जब देखा कि दृष्टि चली गई है तो उसने कहा, 'रोमियों का आठवाँ अध्याय निकालकर मेरी उँगली इन शब्दों पर रख दो, मुझे निश्चय है कि न मृत्यु, न जीवन, आदि, मुझे परमेश्वर के उस प्रेम से, जो हमारे प्रभु मसीह यीशु में है, अलग कर सकेंगे। अब', उसने कहा, 'क्या मेरी उँगली उन पर है?' जब उन्होंने कहा कि है, तो उसने कहा, 'अब परमेश्वर तुम्हारे साथ रहे, मेरे बच्चो: मैंने तुम्हारे साथ नाश्ता किया है, और आज रात अपने प्रभु यीशु मसीह के साथ भोजन करूँगा', और इस प्रकार उसने प्राण त्याग दिए" - फ्लेमिंग की भविष्यद्वाणी की पूर्ति, 1680।

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