68 में से अध्याय 18

क्षमा-प्राप्त आत्माओ, तुम क्षमा किए गए हो। तो अपने सुविधाओं की पूरी सीमा को जानो।

यह हिन्दी संस्करण अंग्रेज़ी मूल से पूर्ण रूप से, अनुच्छेद-दर-अनुच्छेद, कृत्रिम बुद्धि (AI) की सहायता से अनुवादित है; मानवीय समीक्षा जारी है। अध्ययन के लिए अंग्रेज़ी मूल पाठ ही प्रामाणिक है। कोई त्रुटि दिखे तो [email protected] पर लिखें।

क्षमा-प्राप्त आत्माओ, तुम क्षमा किए गए हो। तो अपने सुविधाओं की पूरी सीमा को जानो।

मनुष्य का विचार यह है कि सुधार करे, नया पन्ना पलटे, और इस प्रकार परमेश्वर के साथ मेल-मिलाप और मित्रता तक अपना मार्ग बनाता चढ़े। सुसमाचार का मार्ग यह है कि पहले मसीह के द्वारा परमेश्वर के मित्र बनो, और तब काम करो। मनुष्य का विचार यह है कि पहाड़ी पर परिश्रम से चढ़े और चोटी पर जीवन पाए। सुसमाचार का मार्ग यह है कि पहले मसीह में विश्वास के द्वारा जीवित हो, और तब उसकी इच्छा पर चलो।

और तुम सब स्वयं न्याय करो, न्याय करो कि सच्चा मसीही धर्म कौन सा है? शुभ समाचार कौन सा है? आनन्द का सन्देश कौन सा है? पहले आत्मा के फल और तब परमेश्वर के साथ शान्ति? या पहले परमेश्वर के साथ शान्ति और तब आत्मा के फल? पहले पवित्रीकरण और तब क्षमा? या पहले क्षमा और तब पवित्रीकरण? पहले सेवा और तब जीवन? या पहले जीवन और तब सेवा? तुम्हारे अपने हृदय इसका उत्तर भली-भाँति दे सकते हैं।

तो आओ, ग्रहण करने की इच्छा लेकर आओ, यह सोचते हुए नहीं कि तुम कितना ला सकते हो। मसीह जो देता है उसे लेने की इच्छा से आओ, यह कल्पना करते हुए नहीं कि बदले में तुम कुछ दे सकते हो। अपने पापों के साथ आओ, और क्षमा की सच्ची अभिलाषा के सिवा और कोई योग्यता न हो, और जैसा बाइबल सच्ची है, वैसे ही निश्चय तुम्हारा उद्धार होगा।

तुम मुझसे कह सकते हो कि तुम योग्य नहीं हो, तुम पर्याप्त भले नहीं हो, तुम चुने हुए नहीं हो। मैं उत्तर देता हूँ, तुम पापी हो, और तुम उद्धार पाना चाहते हो, और इससे अधिक तुम्हें और क्या चाहिए? तुम उन्हीं में से एक हो जिन्हें बचाने यीशु आया। उसके पास आओ तो तुम जीवन पाओगे। अपने साथ शब्द ले जाओ, और वह तुम्हारी कृपापूर्वक सुनेगा। अपनी आत्मा की सब आवश्यकताएँ उसे बताओ, और मैं बाइबल से जानता हूँ कि वह ध्यान देगा। उससे कहो कि तुमने सुना है कि वह पापियों को ग्रहण करता है, और तुम ऐसे ही हो। उससे कहो कि तुमने सुना है कि जीवन की कुंजियाँ उसके हाथ में हैं, और उससे विनती करो कि वह तुम्हें भीतर आने दे। उससे कहो कि तुम उसकी अपनी प्रतिज्ञाओं पर भरोसा करके आते हो, और उससे माँगो कि वह अपना वचन पूरा करे, और "जैसा उसने कहा है वैसा ही करे।" (2 शमूएल 7:25।) यह सरलता और सच्चाई से करो, और मेरी आत्मा तुम्हारी आत्मा के बदले में, तुम्हारा माँगना व्यर्थ न जाएगा। ऐसा करो तो तुम उसे विश्वासयोग्य और धर्मी पाओगे कि तुम्हारे पाप क्षमा करे, और तुम्हें सब अधर्म से शुद्ध करे। (1 यूहन्ना 1:9।)

4. अन्त में, सब क्षमा-प्राप्त आत्माओं से मैं एक उपदेश का वचन कहता हूँ। तुम क्षमा किए गए हो। तो अपनी सुविधाओं की पूरी सीमा को जानो, और प्रभु में आनन्दित होना सीखो। तुम और मैं बड़े पापी हैं, पर हमारा एक बड़ा उद्धारकर्ता है। तुम और मैं ने ऐसे पाप किए हैं जो मनुष्य के ज्ञान से परे हैं, पर हमारे पास "मसीह का वह प्रेम है जो ज्ञान से परे है," जिस पर हम भरोसा रख सकते हैं। (इफिसियों 3:19।) तुम और मैं अनुभव करते हैं कि हमारे हृदय बुराई का उबलता सोता हैं, पर मसीह के लहू में हमारे पास एक और सोता है जो इससे कहीं अधिक सामर्थी है, जिसके पास हम प्रतिदिन जा सकते हैं। तुम और मैं के सामने बलवन्त शत्रु हैं जिनसे लड़ना है, पर "हमारे उद्धार का सरदार" उनसे भी अधिक बलवन्त है, और सदा हमारे साथ है। हमारे हृदय क्यों व्याकुल हों? हम क्यों घबराएँ और निराश हों? हे हम थोड़े विश्वास वालो! हम क्यों सन्देह करते हैं?

आओ हम प्रति वर्ष अनुग्रह में और अपने प्रभु यीशु मसीह की पहचान में बढ़ने का यत्न करें। थोड़ी सी भक्ति से सन्तुष्ट रहना शोक की बात है। सर्वोत्तम वरदानों की लालसा करना आदर की बात है। जैसा सुनना, पढ़ना और प्रार्थना करना बीते वर्षों में हमें सन्तुष्ट करता था, उसी से हमें सन्तुष्ट न होना चाहिए। हमें प्रति वर्ष परिश्रम करना चाहिए कि अपने धर्म की हर बात में अधिक हृदय और वास्तविकता डालें। मसीह से और गहराई से प्रेम करना, पाप से और पूरी तरह घृणा करना, जो भला है उससे और दृढ़ता से लिपटे रहना, अपनी छोटी से छोटी चाल पर और ध्यान से दृष्टि रखना, स्पष्ट रूप से घोषित करना कि हम स्वर्गीय देश की खोज में हैं, प्रभु यीशु मसीह को पहिन लेना और हर स्थान और हर संगति में उसी से ढके रहना, और अधिक देखना, और अधिक अनुभव करना, और अधिक जानना, और अधिक करना, हर नए वर्ष में हमारे लक्ष्य और अभिलाषाएँ ये ही होनी चाहिए। सचमुच हम सब में सुधार की गुंजाइश है।

आओ हम दूसरों की आत्माओं की भलाई करने का यत्न करें, जितना अब तक किया है उससे अधिक। हाय, अपनी ही आत्मिक चिन्ताओं में डूबे रहना, अपने ही आत्मिक रोगों में लगे रहना, और दूसरों के विषय में कभी न सोचना, यह तो बड़ी तुच्छ बात है! हम भूल जाते हैं कि धार्मिक स्वार्थ नाम की भी कोई वस्तु होती है। आओ हम अकेले स्वर्ग जाने को दुःख की बात समझें, और अपने साथ साथियों को खींचने का यत्न करें। हमें कभी न भूलना चाहिए कि हमारे चारों ओर का हर पुरुष, स्त्री और बच्चा शीघ्र ही या तो स्वर्ग में होगा या नरक में। आओ हम औरों से वैसा ही कहें जैसा मूसा ने होबाब से कहा, "हमारे संग चल, और हम तेरी भलाई करेंगे।" (गिनती 10:29।) ओह, यह सचमुच सच्ची बात है, "जो औरों को सींचता है वह आप भी सींचा जाएगा।" (नीतिवचन 11:25।) आलसी, कम काम करनेवाला, स्वार्थी मसीही नहीं जानता कि वह क्या खो रहा है।

परन्तु सबसे बढ़कर, आओ हम यीशु में विश्वास का जीवन जीना सीखें, जितना अब तक जिया है उससे अधिक। सदा सोते के किनारे पाए जाना, सदा विश्वास से मसीह की देह खाना और विश्वास से मसीह का लहू पीना, सदा अपने मन के सामने रखना कि मसीह हमारे पापों के लिए मरा, मसीह हमारे धर्मी ठहराए जाने के लिए जी उठा, मसीह परमेश्वर के दाहिने हाथ पर हमारे लिए मध्यस्थता की प्रार्थना करता है, मसीह शीघ्र फिर आकर हमें अपने पास इकट्ठा करेगा, यही वह लक्ष्य है जो हमारी आँखों के सामने निरन्तर रहना चाहिए। हम चूक सकते हैं, पर आओ ऊँचा निशाना लगाएँ। आओ हम धार्मिकता के सूर्य के पूर्ण प्रकाश में चलें, और तब हमारे अनुग्रह बढ़ेंगे। आओ हम उन वृक्षों के समान न हों जो ठण्डी उत्तरी दीवार के पास हैं, निर्बल, आधे भूखे और निष्फल। हम बल्कि सूरजमुखी के समान होने का यत्न करें, और प्रकाश के उस महान सोते के पीछे जहाँ वह जाए वहाँ चलें, और उसे खुले मुख से देखें। ओह, उसके व्यवहारों को परखने के लिए और तेज़ आँख! ओह, उसका शब्द सुनने के लिए और तत्पर कान!

अन्त में, आओ हम संसार की हर उस वस्तु से जो हमारे और यीशु मसीह के बीच में आती है, कहें, "एक ओर हट जा!" हम अपने आप को छोटी से छोटी बुरी आदतों में भी पड़ने देने से डरें, ऐसा न हो कि वे अनजाने ही कोहरे की नाईं उठकर उसे हमारी आँखों से छिपा लें। "तेरे प्रकाश में हम प्रकाश देखेंगे" और गर्मी पाएँगे; और उससे अलग होकर हम संसार को एक अन्धेरा और ठण्डा जंगल पाएँगे। (भजन संहिता 36:9।) हमें उस एथेन्सवासी दार्शनिक की बिनती स्मरण करनी चाहिए, जब पृथ्वी के सबसे शक्तिशाली सम्राट ने उससे पूछा कि वह सबसे अधिक क्या चाहता है। उसने कहा, "मेरी बस एक ही बिनती है—आप मेरे और सूर्य के बीच से हट जाएँ।" तुम और मैं निरन्तर इसी मनोभाव में पाए जाएँ। हम संसार की देनों को हल्का जानें। हम उसकी चिन्ताओं के नीचे शान्त बैठे रहें। यदि हम केवल राजा का मुख सदा देख सकें, यदि हम केवल सदा मसीह में बने रह सकें, तो हम किसी और बात की चिन्ता न करें।

यदि हमारे पाप क्षमा हो गए हैं, तो हमारी सबसे उत्तम वस्तुएँ अभी आनेवाली हैं। थोड़ा ही समय और, और हम "आमने सामने देखेंगे, और वैसे ही पहचानेंगे जैसे हम पहचाने गए हैं।" हम "राजा को उसकी सुन्दरता में देखेंगे," और "फिर कभी बाहर न जाएँगे।"

(1 कुरिन्थियों 13:12; यशायाह 33:17; प्रकाशित वाक्य 3:12।) "धन्य है वह जिसका अपराध क्षमा किया गया, और जिसका पाप ढाँपा गया।" (भजन संहिता 32:1।)

धर्मी ठहराया जाना

"सो जब हम विश्वास से धर्मी ठहरे, तो अपने प्रभु यीशु मसीह के द्वारा परमेश्वर के साथ मेल रखें।" रोमियों 5:1

इस पृष्ठ के शीर्ष पर दिए गए पद में एक शब्द है जो अंग्रेज़ों की दृष्टि में बहुत मूल्यवान होना चाहिए। वह शब्द है "मेल।"

"आनन्दमय इंग्लैण्ड" में भी हमने पिछले तीस वर्षों में युद्ध की भयानकता का कुछ अनुभव किया है। क्रीमिया का युद्ध, भारतीय विद्रोह, चीन, हबशा और अशान्ती के युद्धों ने हमारे देश के इतिहास पर गहरे चिह्न छोड़े हैं।

हमने उन भयंकर बुराइयों में से कुछ का स्वाद चखा है जो युद्ध अपने पीछे लाता है, चाहे वह कितना ही न्यायसंगत और आवश्यक क्यों न हो। लड़ाई और रोग ने हमारे वीर सैनिकों और नाविकों के बीच अपना घातक काम किया है। दूर-दूर के देशों में कुलीनों और साधारण जनों का लहू पानी की नाईं बहाया गया है। हमारे देशवासियों में से बहुत से सर्वोत्तम और सबसे वीर असमय की कब्रों में ठण्डे पड़े हैं। इंग्लैण्ड के हृदय अचानक, स्तब्ध कर देनेवाले, कुचल देनेवाले वियोगों से टूट गए हैं। कितने ही महलों और कितनी ही झोपड़ियों में शोक के वस्त्र पहने गए हैं। सैकड़ों सुखी चूल्हों का उजियाला बुझ गया है। हज़ारों घरों का आनन्द जाता रहा। हाय, हमने कड़े अनुभव से सीखा है कि मेल कैसी धन्य वस्तु है!

तो भी मैं चाहता हूँ कि इस लेख को पढ़नेवाले सब लोगों का ध्यान सबसे उत्तम मेल की ओर खींचूँ—अर्थात् परमेश्वर के साथ मेल। मैं सहर्ष तुमसे उस मेल के विषय में कहूँगा जिसे यह संसार न दे सकता है और न छीन सकता है—ऐसा मेल जो किसी पृथ्वी की सरकारों पर निर्भर नहीं, और जिसे पाने या बनाए रखने के लिए किसी शारीरिक हथियार की आवश्यकता नहीं—ऐसा मेल जो राजाओं के राजा की ओर से सेंतमेंत दिया जाता है, और उन सब की पहुँच में है जो उसे ग्रहण करने को तैयार हैं।

"परमेश्वर के साथ मेल" नाम की वस्तु सचमुच है। उसे अनुभव किया और जाना जा सकता है। मेरे हृदय की अभिलाषा और प्रार्थना यह है कि तुम भी कह सको, जैसा

प्रेरित पौलुस ने कहा, "विश्वास से धर्मी ठहरकर मैं अपने प्रभु यीशु मसीह के द्वारा परमेश्वर के साथ मेल रखता हूँ।" (रोमियों 5:1।)

पूरे विषय पर प्रकाश डालने के लिए मैं चार बातें तुम्हारे सामने रखना चाहता हूँ।

I. पहले मैं तुम्हें सच्चे मसीही का मुख्य विशेषाधिकार दिखाऊँ: "उसे परमेश्वर के साथ मेल प्राप्त है।"

II. फिर मैं तुम्हें वह सोता दिखाऊँ जिससे वह विशेषाधिकार बहता है: "वह धर्मी ठहराया गया है।"

III. फिर मैं तुम्हें वह चट्टान दिखाऊँ जिससे वह सोता फूटता है: "यीशु मसीह।"

IV. और अन्त में मैं तुम्हें वह हाथ दिखाऊँ जिससे वह विशेषाधिकार हमारा अपना बनता है: "विश्वास।"

इन चारों बातों में से हर एक पर मुझे कुछ कहना है। पवित्र आत्मा करे कि यह पूरा विषय कुछ आत्माओं के लिए शान्ति देनेवाला ठहरे!

I. सबसे पहले मैं सच्चे मसीही का मुख्य विशेषाधिकार दिखाऊँ—उसे परमेश्वर के साथ मेल प्राप्त है।

जब प्रेरित पौलुस ने रोमियों को अपनी पत्री लिखी, तो उसने पाँच ऐसे शब्द काम में लिए जिन्हें अन्यजातियों के बड़े से बड़े ज्ञानी भी कभी नहीं कह सकते थे। सुकरात, प्लेटो, अरस्तू, सिसरो और सेनेका बुद्धिमान मनुष्य थे। बहुत से विषयों में उन्होंने आज के अधिकांश लोगों से अधिक स्पष्ट देखा। वे प्रबल मन और विशाल बुद्धि के मनुष्य थे। परन्तु उनमें से कोई भी वैसा नहीं कह सकता था जैसा प्रेरित ने कहा, "मुझे परमेश्वर के साथ मेल प्राप्त है।" (रोमियों 5:1।)

जब पौलुस ने ये शब्द कहे, तो वह केवल अपनी ओर से नहीं बोल रहा था—परन्तु सब सच्चे मसीहियों की ओर से। उनमें से कुछ को निःसन्देह इस विशेषाधिकार का बोध दूसरों से अधिक है। सब अपने भीतर एक बुरा सिद्धान्त पाते हैं जो दिन-प्रतिदिन उनके आत्मिक कल्याण के विरुद्ध लड़ता है। सब अपने विरोधी, शैतान को, उनकी आत्माओं से अनवरत युद्ध करते पाते हैं।

सब पाते हैं कि उन्हें संसार का बैर सहना ही होगा। तो भी सबको, कम या अधिक मात्रा में, "परमेश्वर के साथ मेल प्राप्त है।"

परमेश्वर के साथ यह मेल स्वर्ग और पृथ्वी के प्रभु के साथ मित्रता का एक शान्त, समझदार बोध है। जिसके पास यह है, उसे ऐसा लगता है मानो उसके और उसके पवित्र सृजनहार के बीच कोई रोक या अलगाव नहीं। वह अपने आपको सर्वदर्शी की दृष्टि के नीचे सोच सकता है, और फिर भी भयभीत नहीं होता। वह विश्वास कर सकता है कि यह सर्वदर्शी उसे देखता है, और फिर भी अप्रसन्न नहीं है।

ऐसा मनुष्य मृत्यु को अपनी बाट जोहते देख सकता है, और फिर भी अधिक विचलित नहीं होता। वह ठण्डी नदी में उतर सकता है—पृथ्वी पर जो कुछ उसका है उस पर से आँखें बन्द कर सकता है—अनजाने संसार में निकल पड़ सकता है, और चुप कब्र में अपना घर बना सकता है—और फिर भी मेल अनुभव करता है।

ऐसा मनुष्य पुनरुत्थान और न्याय की ओर देख सकता है, और फिर भी अधिक विचलित नहीं होता। वह अपने मन की आँख से बड़े श्वेत सिंहासन को—इकट्ठे हुए संसार को—खुली पुस्तकों को—सुनते हुए स्वर्गदूतों को—स्वयं न्यायी को—देख सकता है, और फिर भी मेल अनुभव करता है।

ऐसा मनुष्य अनन्तता के विषय में सोच सकता है, और फिर भी अधिक विचलित नहीं होता। वह परमेश्वर और मेमने की उपस्थिति में कभी समाप्त न होनेवाले जीवन की, निरन्तर सहभागिता की कल्पना कर सकता है—और फिर भी मेल अनुभव करता है।

मैं ऐसे किसी सुख को नहीं जानता जो उस सुख की बराबरी कर सके जो यह शान्ति देती है। तूफ़ान के बाद शान्त समुद्र, काली घनघोर घटा के बाद नीला आकाश—बीमारी के बाद स्वास्थ्य—अन्धकार के बाद उजियाला—परिश्रम के बाद विश्राम—ये सब सुन्दर और मनभावनी बातें हैं। परन्तु इनमें से कोई भी, कोई भी, उस सुख का केवल एक धुँधला-सा अनुमान ही दे सकती है जो उन्हें प्राप्त है जो परमेश्वर के साथ मेल की दशा में लाए गए हैं। यह "ऐसी शान्ति है जो समझ से बिलकुल परे है।" (फिलिप्पियों 4:7।)

संसार में बहुत से लोगों के अप्रसन्न रहने का कारण इसी शान्ति का अभाव है। हज़ारों के पास वह सब कुछ है जो सुख देने में समर्थ माना जाता है, फिर भी वे कभी सन्तुष्ट नहीं होते। उनके मन सदा व्याकुल रहते हैं।

भीतर निरन्तर एक खालीपन का बोध बना रहता है। और इस सबका रहस्य क्या है? उनके पास परमेश्वर के साथ शान्ति नहीं है।

इसी शान्ति की अभिलाषा बहुत से अन्यजातियों से उनके मूर्तिपूजक धर्म में बहुत कुछ करवाती है। उनमें से सैकड़ों को अपने ही हाथों से बनाई किसी तुच्छ मूर्ति की सेवा में अपने शरीर को कष्ट देते और अपने ही शरीर को सताते देखा गया है। और क्यों? क्योंकि वे परमेश्वर के साथ शान्ति के भूखे थे।

मनुष्य के धर्म का मूल्य इसी शान्ति के होने पर निर्भर है। इसके बिना आँखों को भाने और कानों को तृप्त करने वाली सब बातें हो सकती हैं—रीतियाँ, अनुष्ठान, सभाएँ और संस्कार—फिर भी आत्मा का कुछ भला नहीं होता। सबकी परख करने वाला बड़ा प्रश्न मनुष्य के विवेक की दशा है। क्या वह शान्त है? क्या उसे परमेश्वर के साथ शान्ति प्राप्त है?

यही वह शान्ति है जिसके विषय में मैं आज इन पृष्ठों के हर पाठक से बात कर रहा हूँ। क्या यह आपको प्राप्त है? क्या आप इसे अनुभव करते हैं? क्या यह आपकी अपनी है?

यदि यह आपको प्राप्त है, तो आप सचमुच धनी हैं। आपके पास वह है जो सदा बना रहेगा। आपके पास वह धन है जिसे आप मरने और संसार को छोड़ने पर नहीं खोएँगे। आप उसे कब्र के पार भी अपने साथ ले जाएँगे। आप उसे पाए रहेंगे और अनन्तकाल तक उसका आनन्द लेंगे। चाँदी-सोना आपके पास चाहे न हो, मनुष्यों की प्रशंसा आपको चाहे कभी न मिले, परन्तु यदि आपके पास परमेश्वर की शान्ति है तो आपके पास वह है जो इन दोनों से कहीं उत्तम है।

यदि परमेश्वर के साथ यह शान्ति आपके पास नहीं है, तो आप सचमुच कंगाल हैं। आपके पास कुछ भी ऐसा नहीं जो टिकेगा—कुछ भी ऐसा नहीं जो काम आएगा—कुछ भी ऐसा नहीं जिसे आप तब अपने साथ ले जा सकें जब आपके मरने की बारी आए। आप इस संसार में नंगे आए थे, और हर अर्थ में नंगे ही यहाँ से जाएँगे। आपके शरीर को धूमधाम और रीति-रस्म के साथ कब्र तक पहुँचाया जा सकता है। आपके ताबूत पर गम्भीर सभा में पाठ किया जा सकता है। आपके सम्मान में संगमरमर का स्मारक खड़ा किया जा सकता है। परन्तु यदि आप परमेश्वर के साथ शान्ति पाए बिना मरे, तो वह सब होने पर भी एक कंगाल की अन्त्येष्टि ही होगी।

II. अब आगे मैं आपको वह सोता दिखाता हूँ जिससे सच्ची शान्ति प्राप्त होती है। वह सोता धर्मी ठहराया जाना है।

सच्चे मसीही की शान्ति कोई धुँधली, स्वप्न-सी भावना नहीं है, जो बिना कारण और बिना नींव के हो। वह उसका कारण बता सकता है। वह ठोस भूमि पर बनाता है। उसे परमेश्वर के साथ शान्ति इसलिए प्राप्त है कि वह धर्मी ठहराया गया है। धर्मी ठहराए जाने के बिना परमेश्वर के साथ सच्ची शान्ति पाना असम्भव है। विवेक इसकी अनुमति नहीं देता। पाप मनुष्य और परमेश्वर के बीच एक पहाड़ है, और उसका हटाया जाना आवश्यक है। दोष का बोध हृदय पर भारी पड़ता है, और उसका दूर होना आवश्यक है। अक्षमा-प्राप्त पाप शान्ति का गला घोंट देता है। सच्चा मसीही यह सब भली भाँति जानता है। उसकी शान्ति इस बोध से उत्पन्न होती है कि उसके पाप क्षमा हो गए हैं और उसका दोष दूर कर दिया गया है। उसका घर रेतीली भूमि पर नहीं बना है। उसका कुआँ वह टूटा हुआ हौद नहीं है जिसमें जल ठहर नहीं सकता। उसे परमेश्वर के साथ शान्ति इसलिए प्राप्त है कि वह धर्मी ठहराया गया है।

वह धर्मी ठहराया गया है, और उसके पाप क्षमा हो गए हैं। वे चाहे कितने भी हों और कितने भी बड़े हों, वे धो दिए गए, क्षमा कर दिए गए और मिटा दिए गए हैं। वे परमेश्वर की स्मरण-पुस्तक से मिटा दिए गए हैं। वे समुद्र की गहराइयों में डुबा दिए गए हैं। वे परमेश्वर की पीठ के पीछे फेंक दिए गए हैं। उनकी खोज की जाती है, पर वे पाए नहीं जाते। वे फिर स्मरण नहीं किए जाते। चाहे वे लाल कपड़े के समान रहे हों, पर अब हिम के समान श्वेत हो गए हैं; चाहे वे किरमिज़ के समान लाल रहे हों, पर अब ऊन के समान हैं। और इसलिए उसे शान्ति प्राप्त है।

वह धर्मी ठहराया गया है और परमेश्वर की दृष्टि में धर्मी गिना जाता है। पिता उसमें कोई दाग नहीं देखता, और उसे निर्दोष मानता है। वह सिद्ध धार्मिकता का वस्त्र पहने हुए है, और बिना लज्जा अनुभव किए पवित्र परमेश्वर के पास बैठ सकता है। परमेश्वर की पवित्र व्यवस्था, जो मनुष्यों के हृदय के विचारों और अभिप्रायों तक को छूती है, उसे दोषी नहीं ठहरा सकती। शैतान, "भाइयों पर दोष लगानेवाला," उसके पूर्ण निर्दोष ठहराए जाने में बाधा डालने के लिए उस पर कोई दोष नहीं लगा सकता। और इसलिए उसे शान्ति प्राप्त है।

क्या वह स्वभाव से एक दीन, निर्बल, भटकने वाला, अधूरा पापी नहीं है? है! यह बात उससे अच्छी कोई नहीं जानता। फिर भी, इस सब के होते हुए, वह परमेश्वर के सामने पूर्ण, सिद्ध और निर्दोष गिना जाता है, क्योंकि वह धर्मी ठहराया गया है!

क्या वह स्वभाव से एक कर्ज़दार नहीं है? है! यह बात उससे गहराई से कोई अनुभव नहीं करता। उस पर दस हज़ार तोड़े का कर्ज़ है, और चुकाने को उसके पास अपना कुछ भी नहीं। परन्तु उसके सारे ऋण चुका दिए गए, निपटा दिए गए और सदा के लिए काट दिए गए हैं, क्योंकि वह धर्मी ठहराया गया है!

क्या वह स्वभाव से टूटी हुई व्यवस्था के शाप के अधीन नहीं है? है! यह बात उससे अधिक तत्परता से कोई स्वीकार नहीं करेगा। परन्तु व्यवस्था की माँगें पूरी रीति से पूरी हो चुकी हैं—न्याय की माँगें एक-एक बिन्दु तक पूरी हो गई हैं, और वह धर्मी ठहराया गया है!

क्या वह स्वभाव से दण्ड के योग्य नहीं है? है! यह बात उससे अधिक पूर्णता से कोई नहीं मानेगा। परन्तु दण्ड भुगता जा चुका है। पाप के विरुद्ध परमेश्वर का क्रोध प्रगट हो चुका है। फिर भी वह बच निकला है, और धर्मी ठहराया गया है!

क्या इस पत्र को पढ़ने वाला कोई जन इस सबके विषय में कुछ जानता है? क्या आप धर्मी ठहराए गए हैं? क्या आपको ऐसा अनुभव होता है कि परमेश्वर के सामने आप क्षमा किए गए, माफ़ किए गए और ग्रहण किए गए हैं? क्या आप साहस के साथ उसके पास आकर कह सकते हैं, "तू मेरा पिता और मेरा मित्र है, और मैं तेरी मेल-मिलाप पाई हुई सन्तान हूँ"? ओह, मेरी बात मानिए, जब तक आप धर्मी न ठहराए जाएँ, आप सच्ची शान्ति का स्वाद कभी नहीं चखेंगे!

आपके पाप कहाँ हैं? क्या वे आपकी आत्मा पर से हटा दिए और उठा लिए गए हैं? क्या परमेश्वर की उपस्थिति में उनका लेखा चुका दिया गया है? ओह, निश्चित जानिए कि ये प्रश्न अत्यन्त गम्भीर महत्व के हैं! जो विवेक की शान्ति धर्मी ठहराए जाने की नींव पर नहीं बनी, वह एक संकटपूर्ण स्वप्न है। ऐसी झूठी शान्ति से प्रभु आपको बचाए!

मेरे साथ कल्पना में लन्दन के किसी बड़े अस्पताल में चलिए। वहाँ मेरे साथ किसी ऐसे बेचारे प्राणी की खाट के पास खड़े हो जाइए जो असाध्य रोग की अन्तिम अवस्था में है। हो सकता है कि वह शान्त पड़ा हो और कोई छटपटाहट न करता हो। हो सकता है कि वह पीड़ा की शिकायत न करे और उसे अनुभव करता भी न दिखाई दे। वह सोया है और निश्चल है। उसकी आँखें बन्द हैं। उसका सिर तकिये पर टिका है। वह हल्के से मुस्कराता है और कुछ बुदबुदाता है। वह अपने घर, अपनी माँ और अपनी जवानी के सपने देख रहा है। उसके विचार दूर कहीं भटक रहे हैं। परन्तु क्या यह स्वास्थ्य है? अरे नहीं—नहीं! यह तो केवल अफीम की दवाओं का प्रभाव है। उसके लिए कुछ नहीं किया जा सकता। वह प्रतिदिन मर रहा है। एकमात्र उद्देश्य उसकी पीड़ा को कम करना है। उसकी यह शान्ति अस्वाभाविक शान्ति है। उसकी नींद रोगी की नींद है। उस मनुष्य की दशा में आप धर्मी ठहराए जाने के बिना मिलनेवाली शान्ति की स्पष्ट छवि देखते हैं। वह खोखली, भ्रामक और रोगी वस्तु है। उसका अन्त मृत्यु है!

मेरे साथ कल्पना में किसी पागलखाने में चलिए। आइए, असाध्य उन्माद के किसी रोगी को देखें। सम्भव है हमें कोई ऐसा मिले जो समझता हो कि वह धनी और कुलीन है, या राजा है। देखिए, वह भूमि से तिनका उठाकर उसे अपने सिर पर लपेट लेता है और उसे मुकुट कहता है। देखिए, वह कंकड़-पत्थर बटोरकर उन्हें हीरे-मोती कहता है। सुनिए, वह अपने भ्रमों में कैसे हँसता और गाता है और सुखी प्रतीत होता है। परन्तु क्या यह सुख है? अरे नहीं! हम जानते हैं कि यह तो अज्ञानभरे पागलपन का परिणाम मात्र है। उस मनुष्य की दशा में आप उस शान्ति की एक और छवि देखते हैं जो कल्पना पर टिकी है, धर्मी ठहराए जाने पर नहीं। वह निरर्थक और निराधार वस्तु है। उसमें न जड़ है और न जीवन।

अपने मन में यह बात बैठा लीजिए कि जब तक हम यह अनुभव न करें कि हम धर्मी ठहराए गए हैं, तब तक परमेश्वर के साथ कोई शान्ति नहीं हो सकती। हमें जानना चाहिए कि हमारे पापों का क्या हुआ। हमें यह विवेकपूर्ण आशा होनी चाहिए कि वे क्षमा किए गए और दूर कर दिए गए हैं। हमारे विवेक की यह गवाही होनी चाहिए कि परमेश्वर के सामने हम निर्दोष गिने गए हैं। इसके बिना परमेश्वर के साथ शान्ति की बात करना व्यर्थ है। हमारे पास उसका धोखा और नकल ही है। "दुष्टों के लिये शान्ति नहीं है, मेरे परमेश्वर का यही वचन है।" (यशायाह 57:21)।

क्या आपने कभी उन तुरहियों की ध्वनि सुनी है जो न्यायियों के आगे बजाई जाती हैं, जब वे न्यायालय खोलने के लिए किसी नगर में प्रवेश करते हैं? क्या आपने कभी सोचा है कि ये तुरहियाँ भिन्न-भिन्न लोगों के मन में कितनी भिन्न भावनाएँ जगाती हैं? निर्दोष मनुष्य, जिसका कोई मुकद्दमा नहीं है, उन्हें अविचलित होकर सुनता है। वे उसके लिए कोई भय नहीं सुनातीं। वह शान्ति से सुनता और देखता है, और डरता नहीं। परन्तु प्रायः कोई बेचारा अभागा किसी सूनी कोठरी में अपने मुकद्दमे की प्रतीक्षा करता होता है, और उसके लिए वे तुरहियाँ निराशा की मृत्यु-घण्टी हैं। वे उसे चेतावनी देती हैं कि मुकद्दमे का दिन निकट है। थोड़ा ही समय और, और वह न्याय के कटघरे में खड़ा होगा और एक के बाद एक गवाहों से अपने कुकर्मों की कथा सुनेगा। थोड़ा ही समय और, और सब समाप्त हो जाएगा—मुकद्दमा, निर्णय और दण्डाज्ञा—और उसके लिए दण्ड और अपमान के सिवा कुछ न बचेगा। कोई आश्चर्य नहीं कि उस तुरहियों की ध्वनि सुनकर बन्दी का हृदय तेजी से धड़कता है!

एक दिन शीघ्र आ रहा है जब वे सब जो धर्मी नहीं ठहराए गए हैं, इसी प्रकार निराश हो जाएँगे। प्रधान दूत की ध्वनि और परमेश्वर की तुरही उस झूठी शान्ति को हवा में उड़ा देगी जो अब बहुत सी आत्माओं को सहारा दिए हुए है। न्याय का दिन हजारों हठीले लोगों को, बहुत देर से, समझा देगा कि मनुष्य को उसके सृजनहार से मिलाने और उसकी दोषी आत्मा को नरक से छुड़ाने के लिए "परमेश्वर के प्रेम और दया" के कुछ सुन्दर विचारों से कुछ अधिक की आवश्यकता है। उस गम्भीर दिन में कोई आशा टिकेगी तो केवल धर्मी ठहराए गए मनुष्य की आशा। कोई शान्ति ठोस, सारयुक्त और अटूट सिद्ध होगी तो केवल वही जो धर्मी ठहराए जाने पर टिकी है।

क्या यह शान्ति आपकी अपनी है? यदि आप अपने प्राण से प्रेम रखते हैं तो तब तक चैन न लीजिए, चैन न लीजिए, जब तक आप न जान लें और न अनुभव कर लें कि आप धर्मी ठहराए गए मनुष्य हैं। यह न सोचिए कि यह केवल नामों और शब्दों की बात है। अपने आप को इस विचार से न बहलाइए कि धर्मी ठहराया जाना "एक गूढ़ और कठिन विषय" है, और आप उसके विषय में कुछ जाने बिना भी भली-भाँति स्वर्ग पहुँच जाएँगे। इस महान सत्य को अपने मन में बैठा लीजिए कि परमेश्वर के साथ शान्ति के बिना कोई स्वर्ग नहीं, और धर्मी ठहराए जाने के बिना परमेश्वर के साथ कोई शान्ति नहीं। और फिर अपनी आत्मा को तब तक चैन न दीजिए जब तक आप धर्मी ठहराए गए मनुष्य न हो जाएँ।

III. अब मैं तीसरे स्थान पर आपको वह चट्टान दिखाता हूँ जिससे धर्मी ठहराया जाना और परमेश्वर के साथ शान्ति निकलती है। वह चट्टान मसीह है। सच्चा मसीही अपनी किसी भलाई के कारण धर्मी नहीं ठहराया जाता। उसकी शान्ति का स्रोत उसके किसी किए हुए काम में नहीं ढूँढ़ा जा सकता। वह उसकी प्रार्थनाओं और नियमितता से, उसके मन फिराव और सुधार से, उसकी नैतिकता और दानशीलता से मोल नहीं ली जाती। ये सब उसे धर्मी ठहराने में सर्वथा असमर्थ हैं। ये स्वयं बहुत बातों में अधूरे हैं और इन्हें बड़ी क्षमा की आवश्यकता है। और उसे धर्मी ठहराने की तो बात ही नहीं की जा सकती। परमेश्वर की व्यवस्था के सिद्ध मापदण्ड पर परखे जाने पर सबसे उत्तम मसीही भी धर्मी ठहराए गए पापी, क्षमा पाए हुए अपराधी से बढ़कर कुछ नहीं। पुण्य, योग्यता, पात्रता, या परमेश्वर की दया पर किसी अधिकार की बात हो, तो उसके पास कुछ भी नहीं। ऐसी किसी नींव पर बनी शान्ति सर्वथा निकम्मी है। जो मनुष्य इन पर भरोसा रखता है वह बुरी तरह धोखे में है।

इस विषय पर रिचर्ड हूकर ने आज से 280 वर्ष पहले जो शब्द लिखे, उनसे अधिक सच्चे शब्द कभी कागज़ पर नहीं उतारे गए। जो लोग जानना चाहते हैं कि प्राचीन काल में अंग्रेज़ पादरी क्या सोचते थे, वे उसकी बात पर भली-भाँति ध्यान दें। वह कहता है, "यदि परमेश्वर हमारे सामने इतना बड़ा प्रस्ताव रखे—तुम्हारे पिता आदम के पतन के बाद की सब पीढ़ियों के लोगों में खोजो, और ऐसा एक मनुष्य ढूँढ़ निकालो जिसने कोई एक भी ऐसा कार्य किया हो, जो उसके हाथ से शुद्ध, बिना किसी दाग या दोष के निकला हो—और उस एक मनुष्य के उस एकमात्र कार्य के कारण न मनुष्य और न स्वर्गदूत उन यातनाओं को भोगेंगे जो दोनों के लिए तैयार की गई हैं—तो क्या तुम समझते हो कि मनुष्यों और स्वर्गदूतों को छुड़ाने के लिए यह फिरौती मनुष्य की सन्तानों में मिल सकेगी? हमारे श्रेष्ठतम कार्यों में भी कुछ न कुछ ऐसा है जिसके लिए क्षमा चाहिए। तब हम कोई ऐसा कार्य कैसे कर सकते हैं जो पुण्य के योग्य हो और जिसका प्रतिफल मिलना चाहिए?" इन शब्दों से मैं पूरी तरह सहमत होना चाहता हूँ। मेरा विश्वास है कि कोई भी मनुष्य अपने कर्मों से परमेश्वर के सामने ज़रा-सा भी धर्मी नहीं ठहर सकता। मनुष्य के सामने वह धर्मी ठहर सकता है—उसके कर्म उसके मसीही होने की सच्चाई का प्रमाण हो सकते हैं। परमेश्वर के सामने वह अपने किसी भी कार्य से धर्मी नहीं ठहर सकता—जब तक वह जीवित है, वह सदा अधूरा, सदा अपूर्ण, सदा कम पड़नेवाला और लक्ष्य से बहुत नीचे ही रहेगा। किसी को भी अपने कर्मों से कभी शान्ति नहीं मिली और न कोई उनसे धर्मी ठहरा है।

तो फिर एक सच्चा मसीही कैसे धर्मी ठहरता है? उस शान्ति और क्षमा के बोध का रहस्य क्या है जिसका वह आनन्द लेता है? हम यह कैसे समझें कि पवित्र परमेश्वर एक पापी मनुष्य के साथ ऐसा व्यवहार करे मानो वह निर्दोष हो, और उसके बहुत से पापों के होते हुए भी उसे धर्मी गिने?

इन सब प्रश्नों का उत्तर संक्षिप्त और सरल है। सच्चा मसीही परमेश्वर के पुत्र यीशु मसीह के कारण धर्मी गिना जाता है। वह मसीह की मृत्यु और प्रायश्चित के कारण धर्मी ठहरता है। उसे शान्ति इसलिए मिलती है कि "पवित्रशास्त्र के वचन के अनुसार मसीह हमारे पापों के लिए मरा।" यही वह कुंजी है जो इस महान रहस्य का ताला खोलती है। यहीं उस बड़ी समस्या का हल मिलता है कि परमेश्वर कैसे न्यायी भी रहे और अभक्त को धर्मी भी ठहराए। प्रभु यीशु का जीवन और मृत्यु सब कुछ समझा देते हैं। "वही हमारी शान्ति है।" (1 कुरिन्थियों 15:3; इफिसियों 2:14।)

मसीह सच्चे मसीही के स्थान पर खड़ा हुआ है। वह उसका ज़मानती और उसका स्थानापन्न बना है। जो कुछ सहना था वह सब सहने का और जो कुछ करना था वह सब करने का उसने बीड़ा उठाया—और जो उसने उठाया उसे पूरा भी किया। इसीलिए सच्चा मसीही धर्मी ठहराया गया मनुष्य है। (यशायाह 53:6।)

मसीह ने पापों के लिए दुःख उठाया, "अधर्मियों के लिए धर्मी ने।" उसने हमारा दण्ड अपनी ही देह में क्रूस पर सहा। परमेश्वर का जो क्रोध हम पर पड़ना चाहिए था, उसे उसने अपने ही सिर पर पड़ने दिया। इसीलिए सच्चा मसीही धर्मी ठहराया गया मनुष्य है। (1 पतरस 3:18।)

मसीह ने मसीही का सारा कर्ज़ अपने ही लहू से चुका दिया है। उसने उसका हिसाब किया और अपनी मृत्यु से अन्तिम पाई तक उसे चुका दिया। परमेश्वर न्यायी परमेश्वर है, वह अपना कर्ज़ दो बार नहीं माँगेगा। इसीलिए सच्चा मसीही धर्मी ठहराया गया मनुष्य है। (प्रेरितों के काम 20:28; 1 पतरस 1:18, 19।)

मसीह ने परमेश्वर की व्यवस्था का पूर्ण रूप से पालन किया। इस संसार का सरदार शैतान उसमें कोई दोष न पा सका। इस प्रकार उसे पूरा करके उसने सनातन धार्मिकता को स्थापित किया, जिसे परमेश्वर की दृष्टि में उसके सब लोग पहने हुए हैं। इसीलिए सच्चा मसीही धर्मी ठहराया गया मनुष्य है। (दानिय्येल 9:24; रोमियों 10:4।)

एक शब्द में, मसीह सच्चे मसीही के लिए जिया। मसीह उसके लिए मरा। मसीह उसके लिए क़ब्र में गया। मसीह उसके लिए फिर जी उठा। मसीह उसके लिए ऊपर चढ़ गया और उसकी आत्मा के लिए मध्यस्थता करने स्वर्ग में गया। उसके छुटकारे के लिए जो कुछ आवश्यक था, वह सब मसीह ने किया, चुकाया और सहा। इसी से सच्चे मसीही का धर्मी ठहराया जाना उत्पन्न होता है—इसी से उसकी शान्ति। अपने आप में तो उसके पास पाप के सिवा कुछ नहीं—परन्तु मसीह में उसके पास वह सब कुछ है जो उसकी आत्मा को चाहिए। (कुलुस्सियों 2:3; 3:11।)

सच्चे मसीही और प्रभु यीशु मसीह के बीच जो अदला-बदली होती है, उसकी धन्यता कौन बता सकता है! मसीह की धार्मिकता उस पर डाली जाती है—और उसके पाप मसीह पर डाले जाते हैं। मसीह उसके कारण पापी गिना गया—और अब वह मसीह के कारण निर्दोष गिना जाता है। मसीह उसके कारण दोषी ठहराया गया, यद्यपि उसमें कोई दोष न था—और अब वह मसीह के कारण निर्दोष ठहराया गया है, यद्यपि वह पापों, दोषों और कमियों से ढका हुआ है। यही तो सच्ची बुद्धि है! अब परमेश्वर न्यायी भी रह सकता है और अभक्त को क्षमा भी कर सकता है। मनुष्य अनुभव कर सकता है कि वह पापी है, फिर भी स्वर्ग की उसे अच्छी आशा हो और अपने भीतर शान्ति हो। हममें से कौन ऐसी बात की कल्पना कर सकता था? इसे सुनकर कौन इस पर आश्चर्य न करे? (2 कुरिन्थियों 5:21।)

ब्रिटेन के इतिहास में हम पढ़ते हैं कि लॉर्ड निथ्सडेल को एक बड़े राजनीतिक अपराध के लिए मृत्युदण्ड सुनाया गया। मुक़दमे के बाद उसे कारागार में कड़ी निगरानी में रखा गया। उसके प्राणदण्ड का दिन निश्चित हो चुका था। बच निकलने की कोई आशा न दिखती थी। फिर भी दण्ड के कार्यान्वित होने से पहले, अपनी पत्नी की चतुराई और प्रेम के द्वारा वह निकल भागने में सफल हुआ। पत्नी कारागार में उससे मिलने आई और उसने उसके साथ वस्त्र बदल लिए। अपनी पत्नी के वस्त्र पहने हुए वह कारागार से बाहर चला गया और बच निकला, और न पहरेदारों ने न रखवालों ने उसे पहचाना, जबकि पत्नी उसके स्थान पर भीतर ही रही। संक्षेप में, उसने अपने पति के प्राण बचाने के लिए अपने ही प्राण जोखिम में डाले। ऐसी पत्नी की चतुराई और प्रेम की प्रशंसा कौन न करेगा?

परन्तु सुसमाचार के इतिहास में हम प्रेम का एक ऐसा प्रदर्शन पढ़ते हैं, जिसकी तुलना में लेडी निथ्सडेल का प्रेम कुछ भी नहीं। हम पढ़ते हैं कि परमेश्वर का पुत्र यीशु पापियों के संसार में उतर आया, जिन्होंने उसके आने से पहले उसकी चिन्ता न की, और जब वह प्रकट हुआ तब उसका आदर न किया। हम पढ़ते हैं कि वह कारागार में उतर गया और बाँधा जाना स्वीकार किया, ताकि हम बन्दी मुक्त हो सकें। हम पढ़ते हैं कि वह मृत्यु तक, और वह भी क्रूस की मृत्यु तक, आज्ञाकारी रहा, ताकि हम आदम की अयोग्य सन्तानों के लिए अनन्त जीवन का द्वार खुल जाए। हम पढ़ते हैं कि उसने हमारे पाप उठाने और हमारे अपराध ढोने में सन्तोष माना, ताकि हम उसकी धार्मिकता को धारण करें और परमेश्वर के पुत्रों की ज्योति और स्वतंत्रता में चलें। (फिलिप्पियों 2:8।)

इसे भली-भाँति "ज्ञान से परे प्रेम" कहा जा सकता है! मसीह के द्वारा धर्मी ठहराए जाने की रीति के समान मुफ़्त अनुग्रह और किसी रीति से इतना उज्ज्वल कभी न चमक सकता था। (इफिसियों 3:19।)

यही वह पुरानी राह है जिससे आदम की सन्तान में से जो संसार के आरम्भ से धर्मी ठहराए गए हैं, उन्होंने अपना मेल-मिलाप पाया है। हाबिल से लेकर आज तक किसी स्त्री या पुरुष ने मसीह के बिना दया की एक बूँद भी नहीं पाई। मूसा से पहले जितनी वेदियाँ बनाई गईं, उन सब का उद्देश्य उसी की ओर संकेत करना था। यहूदी व्यवस्था का हर बलिदान और हर विधि इस्राएल की सन्तान को उसी की ओर ले जाने के लिये थी। सब भविष्यद्वक्ताओं ने उसी की गवाही दी। एक शब्द में, यदि तुम मसीह के द्वारा धर्मी ठहराए जाने को दृष्टि से ओझल कर दो, तो पुराने नियम के पवित्रशास्त्र का बड़ा भाग एक अर्थहीन उलझी हुई भूलभुलैया बन जाएगा।

सबसे बढ़कर यही धर्मी ठहराए जाने की वह राह है जो मानव स्वभाव की आवश्यकताओं और माँगों को ठीक-ठीक पूरा करती है। मनुष्य पतित प्राणी होने पर भी उसमें विवेक बचा रहता है। उसे अपनी आवश्यकता का एक धुँधला-सा बोध होता है, जो उसके अच्छे क्षणों में सुनाई देने लगता है, और जिसे मसीह को छोड़ और कोई तृप्त नहीं कर सकता। जब तक मनुष्य का विवेक भूखा नहीं होता, तब तक कोई भी धार्मिक खिलौना उसकी आत्मा को सन्तुष्ट करके चुप रख सकता है। परन्तु जब उसका विवेक एक बार भूखा हो जाए, तो सच्चे आत्मिक भोजन के सिवा कुछ उसे शान्त नहीं करेगा—मसीह को छोड़ और कोई भोजन नहीं।

जब मनुष्य का विवेक सचमुच जाग उठता है, तब उसके भीतर कुछ फुसफुसाता है, "मेरी आत्मा के लिये कोई मूल्य चुकाया जाना अवश्य है—नहीं तो शान्ति नहीं।" तुरन्त सुसमाचार मसीह को लेकर उसके सामने आता है। मसीह उसके छुटकारे के लिये पहले ही फिरौती दे चुका है। मसीह ने उसके लिये अपने आप को दे दिया है। मसीह ने उसके लिये स्वयं शापित बनकर उसे व्यवस्था के शाप से छुड़ा लिया है। (गलातियों 2:20; 3:13।)

जब मनुष्य का विवेक सचमुच जाग उठता है, तब उसके भीतर कुछ फुसफुसाता है, "मेरे पास कोई धार्मिकता या स्वर्ग पर अधिकार अवश्य होना चाहिए—नहीं तो शान्ति नहीं।" तुरन्त सुसमाचार मसीह को लेकर उसके सामने आता है। उसने सनातन धार्मिकता को लाकर स्थापित किया है। वह हर एक विश्वास करनेवाले के लिये धार्मिकता के निमित्त व्यवस्था का अन्त है। उसका नाम है 'यहोवा हमारी धार्मिकता'। परमेश्वर ने उसे जो पाप से अज्ञात था, हमारे लिये पाप ठहराया, ताकि हम उसमें होकर परमेश्वर की धार्मिकता बन जाएँ। (2 कुरिन्थियों 5:21; रोमियों 10:4; यिर्मयाह 23:6।)

जब मनुष्य का विवेक सचमुच जाग उठता है, तब उसके भीतर कुछ फुसफुसाता है, "मेरे पापों के कारण दण्ड और दुःख भोगा जाना अवश्य है—नहीं तो शान्ति नहीं।" तुरन्त सुसमाचार मसीह को लेकर उसके सामने आता है। मसीह ने पापों के लिये दुःख उठाया, अर्थात् अधर्मियों के लिये धर्मी ने, ताकि हमें परमेश्वर के पास पहुँचा दे। उसने आप ही हमारे पापों को अपनी देह पर लिए हुए क्रूस पर चढ़ गया। उसके मार खाने से हम चंगे हुए। (1 पतरस 2:24; 3:18।)

जब मनुष्य का विवेक सचमुच जाग उठता है, तब उसके भीतर कुछ फुसफुसाता है, "मेरी आत्मा के लिये कोई याजक अवश्य होना चाहिए—नहीं तो शान्ति नहीं।" तुरन्त सुसमाचार मसीह को लेकर उसके सामने आता है। मसीह को पिता परमेश्वर ने अपने और मनुष्य के बीच मध्यस्थ होने के लिये मुहरबन्द करके ठहराया है। वह पापियों के लिये नियुक्त किया हुआ वकील है। वह रोगी आत्माओं का प्रमाणित सलाहकार और वैद्य है। वह महान महायाजक है, सर्वशक्तिमान क्षमा देनेवाला है, और बोझ से दबे पापियों का दयालु पाप-स्वीकार सुननेवाला है। (1 तीमुथियुस 2:5; इब्रानियों 8:1।)

मैं जानता हूँ कि हजारों नाम के मसीही हैं जिन्हें मसीह के द्वारा धर्मी ठहराए जाने के इस सिद्धान्त में कोई विशेष सुन्दरता नहीं दिखाई देती। उनके हृदय संसार की वस्तुओं में दबे हुए हैं। उनके विवेक सुन्न, जड़ और गूँगे हो गए हैं। परन्तु जब भी किसी मनुष्य का विवेक सचमुच अनुभव करने और बोलने लगता है, तब वह मसीह के प्रायश्चित और याजकपद में कुछ ऐसा देखता है जो उसने पहले कभी नहीं देखा था। न प्रकाश आँख के लिये, न संगीत कान के लिये उतना उचित बैठता है, जितना मसीह एक पापी आत्मा की सच्ची आवश्यकताओं के लिये उचित बैठता है। सैकड़ों लोग गवाही दे सकते हैं कि दक्षिण प्रशान्त महासागर के रायटिया द्वीप के एक मन फिराए हुए मूर्तिपूजक का अनुभव ठीक उनका अपना अनुभव रहा है। उसने कहा, "मैंने एक विशाल पर्वत देखा, जिसकी ढलानें सीधी खड़ी थीं, और मैं उस पर चढ़ने का यत्न कर रहा था—परन्तु जब मैं काफी ऊँचाई पर पहुँच गया, तो मेरी पकड़ छूट गई और मैं नीचे जा गिरा। उलझन और थकान से चूर होकर मैं कुछ दूर जाकर बैठ गया और रोने लगा, और रोते-रोते मैंने देखा कि उस पर्वत पर लहू की एक बूँद गिरी, और पल भर में वह पर्वत गल गया।" उससे पूछा गया कि इसका अर्थ क्या है। उसने कहा, "वह पर्वत मेरे पाप थे, और उस पर जो बूँद गिरी, वह यीशु के बहुमूल्य लहू की एक बूँद थी, जिससे मेरे दोष का पर्वत पिघल गया।" [विलियम्स की दक्षिण सागर मिशन-कथाएँ।]

शान्ति की एकमात्र सच्ची राह यही है—मसीह के द्वारा धर्मी ठहराया जाना। सावधान रहो कि कोई तुम्हें इस राह से भटकाकर रोमी कलीसिया के किसी झूठे सिद्धान्त में न ले जाए। हाय, यह देखकर आश्चर्य होता है कि उस झूठी कलीसिया ने सत्य के घर के निकट ही भ्रम का घर खड़ा कर लिया है! धर्मी ठहराए जाने के विषय में परमेश्वर के सत्य को दृढ़ता से थामे रहो, और धोखा न खाओ। शान्ति के लिये अन्य मध्यस्थों और सहायकों के विषय में जो कुछ सुनो, उस पर कान मत दो। स्मरण रखो कि मध्यस्थ केवल एक ही है—यीशु मसीह। स्मरण रखो कि पापियों के लिये शुद्धिकरण-स्थान केवल एक ही है—मसीह का लहू। स्मरण रखो कि पाप के लिये बलिदान केवल एक ही है—वह बलिदान जो क्रूस पर एक ही बार चढ़ाया गया। स्मरण रखो कि कोई कर्म पुण्य नहीं कमा सकता—केवल मसीह का कर्म। स्मरण रखो कि कोई याजक सचमुच पाप क्षमा नहीं कर सकता—केवल मसीह। यहीं दृढ़ रहो और चौकस रहो। जो महिमा मसीह की है, वह किसी और को न दो।

तुम मसीह के विषय में क्या जानते हो? मुझे सन्देह नहीं कि तुमने कानों से उसके विषय में सुना है और किसी धर्मसार में उसका नाम दोहराया है। सम्भवतः तुम उसके जीवन और मृत्यु की कथा से परिचित हो। परन्तु तुम्हें उसका अनुभव से क्या ज्ञान है? तुम व्यवहार में उसका क्या उपयोग करते हो? तुम्हारी आत्मा और उसके बीच क्या लेन-देन और व्यवहार हुए हैं?

ओह, मेरा विश्वास करो, मसीह के बिना परमेश्वर के साथ कोई शान्ति नहीं! शान्ति उसी का विशेष दान है। शान्ति वही विरासत है जिसे संसार से जाते समय पीछे छोड़ जाने की सामर्थ्य केवल उसी में थी। इसके सिवा और सब शान्ति एक उपहास और भ्रम है। जब बिना भोजन के भूख मिट सकेगी, बिना पानी के प्यास बुझ सकेगी, और बिना विश्राम के थकान दूर हो सकेगी—तभी, और उससे पहले नहीं, लोग मसीह के बिना शान्ति पाएँगे।

अब, क्या यह शान्ति तुम्हारी अपनी है? मसीह ने अपने ही लहू से मोल ली हुई, और मसीह ने उन सब को सेंतमेंत दी हुई जो उसे ग्रहण करने को तैयार हैं—क्या यह शान्ति तुम्हारी अपनी है? ओह, तब तक चैन न लो—चैन न लो—जब तक मेरे प्रश्न का सन्तोषजनक उत्तर न दे सको: क्या तुम्हें परमेश्वर के साथ सच्ची शान्ति मिली है?

IV. अन्त में मैं आपको वह हाथ दिखाऊँगा जिसके द्वारा शान्ति का यह विशेषाधिकार प्राप्त किया जाता है—अर्थात् विश्वास।

जो भी इन पृष्ठों को पढ़ते हैं, उन सबसे मैं विनती करता हूँ कि हमारे विषय के इस भाग पर विशेष ध्यान दें। मसीही विश्वास में शायद ही कोई बात इतनी महत्वपूर्ण हो जितना वह साधन जिसके द्वारा मसीह, धर्मी ठहराया जाना और शान्ति मनुष्य की आत्मा की अपनी सम्पत्ति बन जाते हैं। मुझे भय है कि बहुत से लोग इस लेख में जहाँ तक मैं आया हूँ वहाँ तक मेरे साथ चलेंगे—परन्तु यहाँ आकर साथ छोड़ देंगे। आइए, हम सत्य को दृढ़ता से थाम लेने का यत्न करें।

जिस साधन से मनुष्य मसीह और उसके सब लाभों में भागी होता है, वह केवल सीधा-सादा विश्वास है। उसके लहू के द्वारा धर्मी ठहराए जाने और परमेश्वर के साथ शान्ति पाने के लिए केवल एक ही बात आवश्यक है। वह एक बात है उस पर विश्वास करना। यही सच्चे मसीही की विशेष पहचान है। वह अपने उद्धार के लिए प्रभु यीशु पर विश्वास करता है। "प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास कर तो तू और तेरा घराना उद्धार पाएगा।" "जो कोई उस पर विश्वास करे वह नाश न हो परन्तु अनन्त जीवन पाए।" (प्रेरितों के काम 16:31; यूहन्ना 3:16।)

इस विश्वास के बिना उद्धार पाना असम्भव है। मनुष्य नैतिक, सुशील, भला-मानस और प्रतिष्ठित हो सकता है। परन्तु यदि वह मसीह पर विश्वास नहीं करता, तो उसके लिए न क्षमा है, न धर्मी ठहराया जाना, न स्वर्ग पर कोई अधिकार। "जो उस पर विश्वास करता है, उसकी निन्दा नहीं की जाती; परन्तु जो उस पर विश्वास नहीं करता, वह दोषी ठहर चुका।" "जो पुत्र पर विश्वास नहीं करता, वह जीवन को नहीं देखेगा, परन्तु परमेश्वर का क्रोध उस पर बना रहता है।" "जो विश्वास न करेगा वह दोषी ठहराया जाएगा।" (यूहन्ना 3:18, 36; मरकुस 16:16।)

मनुष्य के धर्मी ठहराए जाने के लिए इस विश्वास के सिवाय और कुछ भी आवश्यक नहीं। निःसन्देह, धर्मी ठहराए गए मनुष्य में मन फिराव, पवित्रता, प्रेम, नम्रता और प्रार्थनाशीलता सदा दिखाई देंगे। परन्तु वे परमेश्वर की दृष्टि में उसे ज़रा भी धर्मी नहीं ठहराते। मनुष्य को मसीह से जोड़नेवाला और धर्मी ठहरानेवाला केवल सीधा-सादा विश्वास ही है। "परन्तु जो कर्म नहीं करता परन्तु उस पर विश्वास करता है जो भक्तिहीन को धर्मी ठहराता है, उसका विश्वास उसके लिए धार्मिकता गिना जाता है।" "हम इस परिणाम पर पहुँचते हैं कि मनुष्य व्यवस्था के कामों के बिना विश्वास के द्वारा धर्मी ठहरता है।" (रोमियों 4:5; 3:28।)

यह विश्वास रखने पर मनुष्य उसी क्षण पूरी रीति से धर्मी ठहराया जाता है। उसके पाप उसी क्षण दूर कर दिए जाते हैं। उसके अधर्म उसी क्षण मिटा दिए जाते हैं। जिस घड़ी वह विश्वास करता है, उसी घड़ी परमेश्वर उसे पूरी तरह क्षमा किया हुआ और धर्मी गिनता है। उसका धर्मी ठहराया जाना कोई भविष्य का विशेषाधिकार नहीं है जो लम्बे समय और बड़े परिश्रम के बाद मिले। वह तत्काल वर्तमान में प्राप्त अधिकार है। यीशु कहता है, "जो मुझ पर विश्वास करता है, अनन्त जीवन उसका है।" पौलुस कहता है, "जो कोई विश्वास करता है, वह उसके द्वारा हर एक बात से जिन से तुम मूसा की व्यवस्था के द्वारा निर्दोष नहीं ठहर सकते थे, निर्दोष ठहरता है।" (यूहन्ना 6:47; प्रेरितों के काम 13:39।)

मुझे शायद ही कहने की आवश्यकता हो कि सच्चे उद्धारकारी विश्वास के स्वभाव के विषय में स्पष्ट विचार रखना अत्यन्त आवश्यक है। नए नियम के मसीहियों की पहचान का मुख्य लक्षण उसी को बताया गया है। वे "विश्वासी" कहलाते हैं। अकेले यूहन्ना के सुसमाचार में "विश्वास करना" अस्सी-नब्बे बार आया है। ऐसा कोई विषय शायद ही हो जिसके विषय में इतनी भूलें की जाती हों। और ऐसा भी कोई नहीं जिसकी भूलें आत्मा के लिए इतनी हानिकारक हों। बहुत से सच्चे खोजियों का अन्धकार विश्वास के विषय में उलझे हुए विचारों से जुड़ा पाया जा सकता है। आइए, हम उसके वास्तविक स्वभाव का स्पष्ट बोध पाने का यत्न करें।

सच्चा उद्धारकारी विश्वास सबके पास नहीं होता। यह मत कि जो मसीही कहलाते हैं वे स्वाभाविक रूप से विश्वासी हैं, एक अत्यन्त हानिकारक भ्रम है। मनुष्य शमौन जादूगर की तरह बपतिस्मा पाकर भी मसीह में "न भाग और न अंश" रख सकता है। दृश्य कलीसिया में विश्वासी भी हैं और अविश्वासी भी। "क्योंकि हर एक में विश्वास नहीं।" (2 थिस्सलुनीकियों 3:2।)

सच्चा उद्धारकारी विश्वास केवल भावना की बात नहीं है। मनुष्य के मन में मसीह के प्रति बहुत सी अच्छी भावनाएँ और अभिलाषाएँ हो सकती हैं, फिर भी वे सब प्रातःकाल के बादल और भोर की ओस के समान क्षणिक और अल्पकालिक निकल सकती हैं। बहुत से पथरीली भूमि के सुननेवालों के समान हैं, जो "वचन को सुनकर तुरन्त आनन्द के साथ मान लेते हैं।" बहुत से क्षणिक उत्तेजना में कह देंगे, "जहाँ कहीं तू जाएगा, मैं तेरे पीछे पीछे हो लूँगा," फिर भी संसार में लौट जाते हैं। (मत्ती 8:19; 13:20।)

सच्चा उद्धारकारी विश्वास बुद्धि की इस बात के लिए मात्र स्वीकृति नहीं है कि मसीह पापियों के लिए मरा। यह दुष्टात्माओं के विश्वास से तनिक भी अच्छा नहीं। वे जानते हैं कि यीशु कौन है। "वे विश्वास करते हैं," और इससे अधिक यह कि "वे थरथराते हैं।" (याकूब 2:19।)

सच्चा उद्धारकारी विश्वास सम्पूर्ण भीतरी मनुष्य का कार्य है। यह मस्तिष्क, हृदय और इच्छा का कार्य है, जो सब एक साथ मिले हुए हैं। यह आत्मा का वह कार्य है जिसमें मनुष्य अपना दोष, अपना संकट और अपनी निराशाजनक दशा देखकर, और साथ ही मसीह को उद्धार देने के लिए उपस्थित देखकर, मसीह पर साहस करके भरोसा करता है—मसीह की ओर भागता है—मसीह को अपनी एकमात्र आशा के रूप में ग्रहण करता है, और उद्धार के लिए स्वेच्छा से उस पर निर्भर हो जाता है। यह ऐसा कार्य है जो तुरन्त एक आदत को जन्म देता है। जिसके पास यह है, वह अपने विश्वास के प्रति सदा समान रूप से सचेत न हो; परन्तु मुख्यतः वह विश्वास से जीता है और विश्वास से चलता है।

सच्चे विश्वास में पुण्य की कोई बात है ही नहीं, और सर्वोच्च अर्थ में उसे "कर्म" नहीं कहा जा सकता। यह तो केवल उद्धारकर्ता का हाथ थामना, पति की बाँह पर टेक लगाना और वैद्य की औषधि ग्रहण करना है। यह मसीह के पास एक पापी मनुष्य की आत्मा के सिवाय और कुछ नहीं लाता। यह न कुछ देता है, न योगदान करता है, न कुछ चुकाता है, न कुछ करता है। यह केवल उस महिमामय दान को लेता, ग्रहण करता, स्वीकार करता, पकड़ता और अपनाता है जो मसीह धर्मी ठहराए जाने के रूप में देता है, और प्रतिदिन नए कार्यों के द्वारा उस दान का आनन्द उठाता है।

सब मसीही गुणों में विश्वास सबसे महत्वपूर्ण है। सब में यह वास्तव में सबसे सरल है। सब में लोगों को व्यवहार में समझाना इसी को सबसे कठिन है। इसके विषय में लोग जो भूलें करते हैं, वे अनगिनत हैं। कुछ जिनके पास विश्वास नहीं है, वे एक क्षण के लिए भी सन्देह नहीं करते कि वे विश्वासी हैं। दूसरे, जिनके पास सच्चा विश्वास है, उन्हें कभी यह समझाया नहीं जा सकता कि वे विश्वासी हैं भी। परन्तु विश्वास के विषय में लगभग हर भूल की जड़ स्वाभाविक अभिमान की पुरानी जड़ तक पहुँचती है। लोग इस विचार से चिपके रहते हैं कि उद्धार पाने के लिए उन्हें अपनी ओर से कुछ चुकाना है। जो विश्वास केवल ग्रहण करने में है और कुछ भी चुकाने में नहीं, उसे वे मानो समझ ही नहीं सकते।

उद्धारकारी विश्वास आत्मा का हाथ है। पापी उस डूबते मनुष्य के समान है जो डूबने के कगार पर है। वह प्रभु यीशु मसीह को अपनी ओर सहायता बढ़ाते देखता है। वह उसे पकड़ लेता है और बच जाता है। यही विश्वास है। (इब्रानियों 6:18।)

उद्धार देनेवाला विश्वास आत्मा की आँख है। पापी उस इस्राएली के समान है जिसे जंगल में आग के से सर्प ने डसा हो और जो मरने पर हो। प्रभु यीशु मसीह उसके सामने पीतल के सर्प के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जो उसके चंगा होने के लिये खड़ा किया गया है। वह देखता है और चंगा हो जाता है। यही विश्वास है। (यूहन्ना 3:14, 15।)

उद्धार देनेवाला विश्वास आत्मा का मुँह है। पापी भोजन के अभाव में भूखों मर रहा है और किसी गम्भीर रोग से पीड़ित है। प्रभु यीशु मसीह उसके सामने जीवन की रोटी और सर्वव्यापी औषधि के रूप में रखा गया है। वह उसे ग्रहण करता है, और चंगा तथा बलवन्त हो जाता है। यही विश्वास है। (यूहन्ना 6:35।)

उद्धार देनेवाला विश्वास आत्मा का पाँव है। पापी का एक प्राणघातक शत्रु पीछा कर रहा है, और उसे पकड़े जाने का भय है। प्रभु यीशु मसीह उसके सामने दृढ़ गढ़, छिपने के स्थान और शरणस्थान के रूप में रखा गया है। वह उसमें भाग जाता है और सुरक्षित हो जाता है। यही विश्वास है। (नीतिवचन 18:10।)

यदि तुम जीवन से प्रेम रखते हो तो विश्वास से धर्मी ठहराए जाने के सिद्धान्त को दृढ़ता से थामे रहो। यदि तुम आन्तरिक शान्ति चाहते हो तो विश्वास के विषय में अपने विचार बहुत सरल रखो। मसीही धर्म के प्रत्येक अंश का आदर करो। पवित्रता की आवश्यकता के लिये मरते दम तक संघर्ष करो। अनुग्रह के प्रत्येक ठहराए हुए साधन को परिश्रम और श्रद्धा से उपयोग में लाओ—परन्तु इन बातों को अपनी आत्मा को तनिक भी धर्मी ठहराने का काम मत सौंपो। यदि तुम शान्ति पाना और उसे बनाए रखना चाहते हो, तो स्मरण रखो कि केवल विश्वास ही धर्मी ठहराता है, और वह भी किसी पुण्य कर्म के रूप में नहीं—परन्तु उस कार्य के रूप में जो आत्मा को मसीह से जोड़ता है। मेरा विश्वास करो, सुसमाचार का मुकुट और महिमा व्यवस्था के कामों के बिना विश्वास से धर्मी ठहराया जाना है।

विश्वास से धर्मी ठहराए जाने के सिद्धान्त जितना सुन्दर रीति से सरल कोई सिद्धान्त सोचा नहीं जा सकता। यह कोई अँधेरा रहस्यमय सत्य नहीं है जो केवल बड़ों, धनवानों और विद्वानों की समझ में आए। यह अनन्त जीवन को अत्यन्त अनपढ़ व्यक्ति की, और देश के सबसे निर्धन जन की पहुँच के भीतर रखता है। यह परमेश्वर की ओर से ही होगा।

कोई सिद्धान्त ऐसा नहीं सोचा जा सकता जो परमेश्वर की इतनी महिमा करनेवाला हो। यह उसके सब गुणों का आदर करता है—उसके न्याय, उसकी दया और उसकी पवित्रता का। यह पापी के उद्धार का पूरा श्रेय उस उद्धारकर्ता को देता है जिसे उसने ठहराया है। यह पुत्र का आदर करता है, और इस प्रकार उस पिता का भी जिसने उसे भेजा। (यूहन्ना 5:23।) यह मनुष्य को उसके छुटकारे में कोई साझेदारी नहीं देता—परन्तु उद्धार को पूर्ण रूप से प्रभु की ओर से ठहराता है। यह परमेश्वर की ओर से ही होगा।

कोई सिद्धान्त ऐसा नहीं सोचा जा सकता जो मनुष्य को उसके उचित स्थान पर रखने में इतना सक्षम हो। यह उसे उसका अपना पाप, उसकी निर्बलता, और अपने कर्मों से अपनी आत्मा को बचाने में उसकी असमर्थता दिखाता है। यदि वह अन्त में उद्धार न पाए तो यह उसे निरुत्तर छोड़ देता है। यह उसे "बिना रुपये और बिना दाम" शान्ति और क्षमा देता है। यह परमेश्वर की ओर से ही होगा। (यशायाह 55:1।)

कोई सिद्धान्त ऐसा नहीं सोचा जा सकता जो टूटे मनवाले और पश्चात्ताप करनेवाले पापी के लिये इतना सान्त्वनादायक हो। यह ऐसे जन के लिये आनन्द का समाचार लाता है। यह उसे दिखाता है कि उसके लिये भी आशा है। यह उससे कहता है कि चाहे वह बड़ा पापी है, उसके लिये एक बड़ा उद्धारकर्ता तैयार है; और यद्यपि वह अपने आप को धर्मी नहीं ठहरा सकता, परमेश्वर मसीह के कारण उसे धर्मी ठहरा सकता है और ठहराएगा। यह परमेश्वर की ओर से ही होगा।

कोई सिद्धान्त ऐसा नहीं सोचा जा सकता जो सच्चे मसीही को इतना सन्तुष्ट करनेवाला हो। यह उसे सान्त्वना की एक ठोस नींव देता है—मसीह का पूरा किया हुआ कार्य। यदि मसीही के करने के लिये कुछ भी शेष रह जाता, तो उसकी सान्त्वना कहाँ होती? उसे कभी पता न चलता कि उसने पर्याप्त कर लिया है और वह सचमुच सुरक्षित है। परन्तु यह सिद्धान्त कि मसीह सब कुछ अपने ऊपर ले लेता है, और हमें केवल विश्वास करना और शान्ति ग्रहण करना है, हर भय को दूर कर देता है। यह परमेश्वर की ओर से ही होगा।

कोई सिद्धान्त ऐसा नहीं सोचा जा सकता जो इतना पवित्र करनेवाला हो। यह लोगों को सब डोरियों में सबसे दृढ़ डोरी—प्रेम की डोरी—से खींचता है। यह उन्हें अनुभव कराता है कि वे ऋणी हैं, और जब बहुत क्षमा किया गया है तो कृतज्ञता में उन पर बहुत प्रेम करना अनिवार्य है। कर्मों का प्रचार करने से कभी ऐसा फल नहीं निकलता जैसा उन्हें घटाकर प्रचार करने से निकलता है। मनुष्य की भलाई और पुण्य को ऊँचा उठाने से लोग कभी उतने पवित्र नहीं होते जितने मसीह को ऊँचा उठाने से। पेरिस के सबसे उग्र पागल भी कोमल, नम्र और आज्ञाकारी हो गए जब आब्बे पिनेल ने उन्हें स्वतंत्रता और आशा दी। मसीह का मुफ्त अनुग्रह मनुष्यों के जीवन पर व्यवस्था की कठोरतम आज्ञाओं से कहीं अधिक प्रभाव उत्पन्न करेगा। निश्चय ही यह सिद्धान्त परमेश्वर की ओर से है।

कोई सिद्धान्त ऐसा नहीं सोचा जा सकता जो सेवक के हाथों को इतना सामर्थ्य देनेवाला हो। यह उसे अधम से अधम लोगों के पास जाकर यह कहने में समर्थ करता है, "तुम्हारे लिये भी आशा का द्वार खुला है!" यह उसे यह अनुभव करने में समर्थ करता है, "जब तक जीवन है, मेरी देखरेख में जो आत्माएँ हैं उनमें कोई असाध्य नहीं।" कितने ही सेवक इस सिद्धान्त के प्रयोग से आत्माओं के विषय में कह सकते हैं, "मैंने उन्हें स्वाभाविक दशा में पाया। मैंने उन्हें अनुग्रह की दशा में प्रवेश करते देखा। मैंने उन्हें महिमा की दशा की ओर बढ़ते देखा।" सचमुच यह सिद्धान्त परमेश्वर की ओर से ही होगा।

कोई सिद्धान्त ऐसा नहीं सोचा जा सकता जो इतना टिकाऊ हो। यह लोगों के लिये तब उपयुक्त है जब वे आरम्भ करते हैं, फिलिप्पी के जेलर के समान पुकारते हुए, "उद्धार पाने के लिये मैं क्या करूँ?" यह तब भी उपयुक्त है जब वे युद्ध के अग्रिम मोर्चे पर लड़ते हैं। प्रेरित पौलुस के समान वे कहते हैं, "जो जीवन मैं जीता हूँ वह परमेश्वर के पुत्र के विश्वास से जीता हूँ।" (गलातियों 2:20।) यह तब भी उपयुक्त है जब वे मरते हैं, जैसे स्तिफनुस के लिये था जब उसने पुकारा, "हे प्रभु यीशु, मेरी आत्मा को ग्रहण कर।" (प्रेरितों के काम 7:59।) हाँ—कितनों ने जीवन भर इस सिद्धान्त का उग्र विरोध किया, फिर भी मृत्यु-शय्या पर विश्वास से धर्मी ठहराए जाने को आनन्द से अपनाया, और यह कहते हुए विदा हुए कि "वे मसीह को छोड़ और किसी पर भरोसा नहीं रखते।" यह परमेश्वर की ओर से ही होगा।

क्या तुम्हारे पास यह विश्वास है? क्या तुम यीशु पर सरल, बच्चे जैसे भरोसे के विषय में कुछ जानते हो? क्या तुम जानते हो कि अपनी आत्मा की आशा को पूरी रीति से मसीह पर टिकाना क्या है? ओह, स्मरण रखो कि जहाँ विश्वास नहीं, वहाँ मसीह में उद्धार देनेवाला कोई भाग नहीं। जहाँ मसीह में उद्धार देनेवाला भाग नहीं, वहाँ धर्मी ठहराया जाना नहीं। जहाँ धर्मी ठहराया जाना नहीं, वहाँ परमेश्वर के साथ मेल नहीं हो सकता। जहाँ परमेश्वर के साथ मेल नहीं, वहाँ स्वर्ग नहीं! और तब क्या? नरक के सिवाय कुछ भी शेष नहीं रहता।

और अब, जिन गम्भीर बातों पर हमने विचार किया है उन्हें मैं इस लेख के सब पाठकों के गम्भीर और प्रार्थनापूर्ण ध्यान के लिये सौंपता हूँ। मैं तुम्हें आमन्त्रित करता हूँ कि परमेश्वर के साथ मेल पर—धर्मी ठहराए जाने पर—मसीह पर—विश्वास पर शान्त मन से मनन करने से आरम्भ करो। ये केवल कल्पना के विषय नहीं हैं, जो एकान्तवासी विद्यार्थियों के ही योग्य हों। ये मसीही धर्म की जड़ों में बसे हैं। ये अनन्त जीवन से जुड़े हैं। कुछ क्षण मेरे साथ धीरज रखो, जब मैं इन्हें तुम्हारे हृदय और विवेक के और निकट लाने के लिये कुछ शब्द और जोड़ता हूँ।

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