68 में से अध्याय 23

परमेश्वर के साथ, और उसके जीवित बोध को बनाए रखना चाहते हैं।

यह हिन्दी संस्करण अंग्रेज़ी मूल से पूर्ण रूप से, अनुच्छेद-दर-अनुच्छेद, कृत्रिम बुद्धि (AI) की सहायता से अनुवादित है; मानवीय समीक्षा जारी है। अध्ययन के लिए अंग्रेज़ी मूल पाठ ही प्रामाणिक है। कोई त्रुटि दिखे तो [email protected] पर लिखें।

परमेश्वर के साथ, और उसके जीवित बोध को बनाए रखना चाहते हैं।

4. अब मैं उन लोगों को कुछ प्रोत्साहन देना चाहता हूँ जिनके पास यह आशा रखने का उचित कारण है कि उन्हें परमेश्वर के साथ शान्ति मिली है—परन्तु जो सन्देहों और भयों से व्याकुल रहते हैं।

तुम्हारे मन में सन्देह और भय हैं! परन्तु तुम क्या आशा करते हो? तुम क्या चाहते हो? तुम्हारी आत्मा एक ऐसी देह से जुड़ी है जो निर्बलताओं, वासनाओं और दुर्बलताओं से भरी है। तुम उस संसार में रहते हो जो दुष्टता में पड़ा है, ऐसा संसार जिसमें अधिकांश लोग मसीह से प्रेम नहीं रखते। तुम पर शैतान की परीक्षाएँ निरन्तर आती रहती हैं। वह व्यस्त शत्रु, यदि तुम्हें स्वर्ग से बाहर न रख सके, तो तुम्हारी यात्रा को कष्टदायक बनाने का भरसक प्रयास करेगा। निश्चय ही इन सब बातों पर विचार करना उचित है।

मैं हर विश्वासी से कहता हूँ कि तुम्हारे मन में सन्देह और भय होने पर चकित होने की बात तो दूर रही; यदि तुम्हारे मन में ये न होते तो मुझे तुम्हारी शान्ति की वास्तविकता पर सन्देह होता। जो अनुग्रह किसी भीतरी संघर्ष के बिना आता है, उसे मैं बहुत कम महत्त्व देता हूँ। जब सब कुछ शान्त, स्थिर और एक ही ढर्रे का हो, तब हृदय में जीवन कम ही होता है। मेरा विश्वास करो, सच्चा मसीही जितना अपनी शान्ति से पहचाना जाता है, उतना ही अपने संघर्ष से भी। ये ही सन्देह और भय जो अब तुम्हें व्याकुल करते हैं, भलाई के चिह्न हैं। ये मुझे आश्वस्त करते हैं कि तुमने वास्तव में कुछ ऐसा पाया है जिसे खो देने से तुम डरते हो।

सावधान रहो कि तुम स्वयं पर अन्यायपूर्ण दोष लगानेवाले बनकर और परमेश्वर के अनुग्रह के कार्य की वास्तविकता पर अविश्वास करके शैतान की सहायता न करो। मैं तुम्हें सलाह देता हूँ कि अपने हृदय की, यीशु की परिपूर्णता की, और शैतान की युक्तियों की और अधिक समझ के लिए प्रार्थना करो। सन्देह और भय तुम्हें अनुग्रह के सिंहासन की ओर ले जाएँ, तुम्हें और अधिक प्रार्थना के लिए उभारें, तुम्हें बार-बार मसीह के पास भेजें। परन्तु सन्देह और भय को अपनी शान्ति छीनने मत दो। मेरा विश्वास करो, तुम्हें अनुग्रह से उद्धार पाए हुए पापी के रूप में ही स्वर्ग जाने से सन्तुष्ट रहना होगा। और जब तक तुम जीवित हो, प्रतिदिन इसका प्रमाण पाकर कि तुम सचमुच पापी हो, तुम्हें चकित नहीं होना चाहिए।

5. अन्त में, मैं उन सब को कुछ सम्मति देना चाहता हूँ जिन्हें परमेश्वर के साथ शान्ति मिली है, और जो उसके जीवित बोध को बनाए रखना चाहते हैं।

यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि विश्वासी को अपने धर्मी ठहराए जाने और परमेश्वर के यहाँ ग्रहण किए जाने का जो बोध होता है, उसकी अनेक मात्राएँ और भिन्नताएँ होती हैं। किसी समय वह उज्ज्वल और स्पष्ट हो सकता है; किसी और समय धुँधला और मन्द। किसी समय वह ज्वार की बाढ़ के समान ऊँचा और भरपूर हो सकता है; किसी और समय भाटे के समान नीचा। हमारा धर्मी ठहराया जाना एक स्थिर, अटल और अचल बात है। परन्तु धर्मी ठहराए जाने का हमारा बोध अनेक परिवर्तनों के अधीन है।

तो फिर विश्वासी के हृदय में धर्मी ठहराए जाने के उस जीवित बोध को बनाए रखने के सर्वोत्तम साधन क्या हैं, जो उस आत्मा के लिए इतना बहुमूल्य है जो उसे जानती है? मैं विश्वासियों को कुछ संकेत देता हूँ। इन संकेतों को लिखने में मैं अचूक होने का दावा नहीं करता, क्योंकि मैं केवल एक मनुष्य हूँ। परन्तु जैसे भी हैं, मैं इन्हें प्रस्तुत करता हूँ।

(क) शान्ति के जीवित बोध को बनाए रखने के लिए निरन्तर यीशु की ओर देखते रहना आवश्यक है। जैसे नाविक उस चिह्न पर अपनी दृष्टि जमाए रखता है जिसकी ओर वह नाव खेता है, वैसे ही हमें मसीह पर अपनी दृष्टि जमाए रखनी चाहिए।

(ख) यीशु के साथ निरन्तर सहभागिता होनी चाहिए। हमें उसे प्रतिदिन अपनी आत्मा के वैद्य और महायाजक के रूप में काम में लेना चाहिए। प्रतिदिन उससे बातचीत, प्रतिदिन पाप-अंगीकार और प्रतिदिन क्षमा होनी चाहिए।

(ग) अपनी आत्मा के शत्रुओं के विरुद्ध निरन्तर चौकसी होनी चाहिए। जो शान्ति चाहता है, उसे सदा युद्ध के लिए तैयार रहना चाहिए।

(घ) जीवन के हर सम्बन्ध में—हमारे स्वभाव में, हमारी जीभ में, घर से बाहर और घर में—पवित्रता का निरन्तर पीछा करना चाहिए। दूरबीन के लेंस पर एक छोटा-सा धब्बा भी दूर की वस्तुओं को साफ़ देखने से रोकने के लिए काफ़ी है। थोड़ी-सी धूल घड़ी को शीघ्र ही गलत चलाने लगती है।

(ङ) दीनता के लिए निरन्तर परिश्रम होना चाहिए। अभिमान विनाश से पहले आता है। आत्म-विश्वास प्रायः आलस्य, जल्दबाज़ी में बाइबल पढ़ने और उनींदी प्रार्थनाओं की जननी होता है। पतरस ने पहले कहा कि चाहे सब छोड़ दें, वह अपने प्रभु को कभी न छोड़ेगा—फिर जब उसे प्रार्थना करनी चाहिए थी, तब वह सो गया—फिर उसने तीन बार उसका इन्कार किया, और कड़वे आँसू बहाने के बाद ही उसे बुद्धि मिली।

(च) लोगों के सामने अपने प्रभु का अंगीकार करने में निरन्तर साहस होना चाहिए। जो मसीह का आदर करते हैं, मसीह उन्हें अपनी संगति से बहुत सम्मानित करेगा। जब चेलों ने हमारे प्रभु को छोड़ दिया तो वे दुःखी और अभागे थे। जब उन्होंने महासभा के सामने उसका अंगीकार किया, तो वे आनन्द और पवित्र आत्मा से भर गए।

(छ) अनुग्रह के साधनों के विषय में निरन्तर परिश्रम होना चाहिए। ये वे मार्ग हैं जिनमें यीशु चलना पसन्द करता है। जो चेला सार्वजनिक आराधना, बाइबल पढ़ने और व्यक्तिगत प्रार्थना में आनन्दित नहीं होता, उसे अपने स्वामी का अधिक दर्शन पाने की आशा नहीं रखनी चाहिए।

(ज) अन्त में, अपनी आत्मा के विषय में निरन्तर सतर्क जलन और बार-बार आत्म-परीक्षा होनी चाहिए। हमें धर्मी ठहराए जाने और पवित्रीकरण के बीच भेद करने में सावधान रहना चाहिए। हमें सचेत रहना चाहिए कि हम पवित्रता को ही मसीह न बना लें।

मैं ये संकेत सब विश्वासी पाठकों के सामने रखता हूँ। मैं इनमें सरलता से और भी जोड़ सकता था। परन्तु मुझे निश्चय है कि सच्चे मसीही विश्वासियों को, यदि वे अपने धर्मी ठहराए जाने और परमेश्वर के यहाँ ग्रहण किए जाने का जीवित बोध बनाए रखना चाहते हैं, तो सबसे पहले इन्हीं बातों पर ध्यान देना चाहिए।

मैं यह सब अपने हृदय की इच्छा और प्रार्थना प्रकट करके समाप्त करता हूँ कि इन पृष्ठों के सब पाठक अपनी आत्मा में परमेश्वर की उस शान्ति को जानें जो सारी समझ से परे है।

यदि तुम्हें अब तक "शान्ति" नहीं मिली, तो परमेश्वर की पुस्तक में यह लिखा जाए कि इस वर्ष तुमने मसीह में शान्ति को ढूँढ़ा और पाया!

यदि तुमने "शान्ति" का स्वाद चख लिया है—तो तुम्हारी शान्ति का बोध सामर्थ्य के साथ बढ़ता जाए!

मसीह का क्रूस

"पर ऐसा न हो कि मैं और किसी बात का घमण्ड करूँ, केवल अपने प्रभु यीशु मसीह के क्रूस का जिस के द्वारा संसार मेरी दृष्टि में और मैं संसार की दृष्टि में क्रूस पर चढ़ाया गया हूँ।" गलातियों 6:14

मसीह के क्रूस के विषय में हम क्या सोचते और अनुभव करते हैं? हम एक मसीही देश में रहते हैं। सम्भवतः हम किसी मसीही कलीसिया की आराधना में जाते हैं। हममें से अधिकांश ने मसीह के नाम में बपतिस्मा लिया है। हम अपने आपको मसीही मानते और कहते हैं। यह सब भला है—संसार के करोड़ों लोगों के विषय में यह भी नहीं कहा जा सकता। परन्तु मसीह के क्रूस के विषय में हम क्या सोचते और अनुभव करते हैं?

मैं यह जाँचना चाहता हूँ कि अब तक हुए सबसे महान मसीहियों में से एक ने मसीह के क्रूस के विषय में क्या सोचा। उसने अपनी राय लिख छोड़ी है—उसने अपना निर्णय ऐसे शब्दों में दिया है जिन्हें ग़लत नहीं समझा जा सकता। जिस व्यक्ति की मैं बात कर रहा हूँ वह प्रेरित पौलुस है। उसकी राय आपको उस पत्री में मिलेगी जो पवित्र आत्मा की प्रेरणा से उसने गलातियों को लिखी। जिन शब्दों में उसका निर्णय दर्ज है वे ये हैं, "पर ऐसा न हो कि मैं और किसी बात का घमण्ड करूँ, केवल हमारे प्रभु यीशु मसीह के क्रूस का।"

अब पौलुस के ऐसा कहने का क्या अर्थ था? उसका अर्थ यह दृढ़ता से घोषित करना था कि अपने पापों की क्षमा और अपनी आत्मा के उद्धार के लिए वह "क्रूस पर चढ़ाए गए यीशु मसीह" को छोड़ और किसी पर भरोसा नहीं रखता। दूसरे चाहें तो उद्धार के लिए कहीं और देखें; दूसरे यदि चाहें तो क्षमा और शान्ति के लिए अन्य बातों पर भरोसा रखें—जहाँ तक प्रेरित का सम्बन्ध था, उसने ठान लिया था कि वह "यीशु मसीह के क्रूस" को छोड़ और किसी पर न टिकेगा, न सहारा लेगा, न अपनी आशा की नींव रखेगा, न भरोसा करेगा, और न घमण्ड करेगा।

मैं इस पुस्तक के पाठकों से "क्रूस" के विषय में कुछ कहना चाहता हूँ। मेरा विश्वास कीजिए, यह विषय अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। यह केवल वाद-विवाद का प्रश्न नहीं है। यह उन बातों में से नहीं है जिन पर लोग असहमत रहने को सहमत हो जाएँ, और यह समझें कि मतभेद उन्हें स्वर्ग से बाहर नहीं करेंगे। मनुष्य को इस विषय में सही होना ही चाहिए, नहीं तो वह सदा के लिए नाश हो गया। स्वर्ग या नरक, सुख या दुःख, जीवन या मृत्यु, अन्तिम दिन में आशीष या श्राप—सब कुछ इस प्रश्न के उत्तर पर टिका है, "आप मसीह के क्रूस के विषय में क्या सोचते हैं?"

I. सबसे पहले मैं आपको दिखाता हूँ कि प्रेरित पौलुस ने किस बात का घमण्ड नहीं किया।

ऐसी बहुत-सी बातें थीं जिन पर पौलुस घमण्ड कर सकता था, यदि वह भी आज के कुछ लोगों की तरह सोचता। यदि पृथ्वी पर कभी कोई ऐसा था जिसके पास अपने ही में घमण्ड करने के लिए कुछ था, तो वह अन्यजातियों का वही महान प्रेरित था। अब जब उसने घमण्ड करने का साहस नहीं किया, तो और कौन करेगा?

उसने अपने जातीय विशेषाधिकारों पर कभी घमण्ड नहीं किया। वह जन्म से यहूदी था, और जैसा वह स्वयं बताता है, "इब्रानियों में से इब्रानी।" (फिलिप्पियों 3:5।) वह अपने बहुत से भाइयों की तरह कह सकता था, "मेरे पूर्वज अब्राहम हैं; मैं अन्धकार में पड़ा अज्ञानी अन्यजाति नहीं हूँ; मैं परमेश्वर की कृपापात्र प्रजा में से हूँ—खतने के द्वारा मुझे परमेश्वर की वाचा में सम्मिलित किया गया है। मैं अज्ञानी अन्यजातियों से कहीं अच्छा मनुष्य हूँ।" परन्तु उसने कभी ऐसा नहीं कहा। उसने ऐसी किसी बात पर कभी घमण्ड नहीं किया। एक क्षण के लिए भी नहीं!

उसने अपने कर्मों पर कभी घमण्ड नहीं किया। परमेश्वर के लिए उसके जितना परिश्रम किसी ने नहीं किया। वह सब प्रेरितों से बढ़कर "परिश्रम" करनेवाला था। (2 कुरिन्थियों 11:23।) मसीह के काम के लिए इतना प्रचार, इतनी यात्राएँ और इतने कष्ट किसी मनुष्य ने नहीं सहे। इतने प्राणों को मन फिराव में लाने का साधन कोई नहीं बना, न किसी ने संसार का इतना भला किया, न अपने आप को मनुष्यों के लिए इतना उपयोगी बनाया। आरम्भिक कलीसिया का कोई पिता, कोई धर्म-सुधारक, कोई प्यूरिटन, कोई मिशनरी, कोई सेवक, कोई साधारण विश्वासी—ऐसा एक भी मनुष्य नहीं गिनाया जा सकता जिसने प्रेरित पौलुस जितने भले कर्म किए हों। परन्तु क्या उसने कभी उन पर इस प्रकार घमण्ड किया मानो वे ज़रा भी पुण्य के योग्य हों और उसकी आत्मा को बचा सकें? कभी नहीं! एक क्षण के लिए भी नहीं!

उसने अपने ज्ञान पर कभी घमण्ड नहीं किया। वह स्वभाव से ही बड़ी योग्यताओं का मनुष्य था, और मन फिराने के बाद पवित्र आत्मा ने उसे और भी बड़ी योग्यताएँ दीं। वह एक सामर्थी प्रचारक, एक सामर्थी वक्ता और एक प्रभावशाली लेखक था। वह कलम से भी उतना ही महान था जितना अपनी जीभ से। वह यहूदियों और अन्यजातियों दोनों से समान रूप से तर्क कर सकता था। वह कुरिन्थ में अविश्वासियों से, यरूशलेम में फरीसियों से, या गलातिया में अपने ही को धर्मी माननेवालों से वाद-विवाद कर सकता था। वह बहुत-सी गूढ़ बातें जानता था। वह तीसरे स्वर्ग तक पहुँच चुका था और उसने "अकथनीय बातें सुनी थीं।" (2 कुरिन्थियों 12:4।) उसे भविष्यद्वाणी की आत्मा मिली थी, और वह आनेवाली बातें पहले से बता सकता था। परन्तु क्या उसने कभी अपने ज्ञान पर इस प्रकार घमण्ड किया मानो वह परमेश्वर के सामने उसे धर्मी ठहरा सकता हो? कभी नहीं—कभी नहीं! एक क्षण के लिए भी नहीं!

उसने अपने गुणों पर कभी घमण्ड नहीं किया। यदि कभी कोई गुणों में बढ़ा हुआ था, तो वह पौलुस था। वह प्रेम से भरा था। वह कितनी कोमलता और स्नेह से लिखा करता था! वह आत्माओं के लिए वैसे ही तरस खा सकता था जैसे माता या दाई अपने बच्चे के लिए। वह साहसी मनुष्य था। जब सत्य का प्रश्न होता, तब वह इसकी चिन्ता नहीं करता था कि किसका विरोध कर रहा है। जब आत्माओं को जीतना होता, तब वह इसकी चिन्ता नहीं करता था कि कितना जोखिम उठाना पड़ेगा। वह आत्म-त्यागी मनुष्य था—अकसर भूख-प्यास में, ठण्ड और नंगेपन में, जागरण और उपवासों में। वह नम्र मनुष्य था। वह अपने आप को सब पवित्र लोगों में छोटे से भी छोटा, और पापियों में सबसे बड़ा समझता था। वह प्रार्थनामय मनुष्य था। उसकी सब पत्रियों के आरम्भ में यह कैसे प्रकट होता है, देखिए। वह धन्यवादी मनुष्य था। उसके धन्यवाद और उसकी प्रार्थनाएँ साथ-साथ चलती थीं। परन्तु उसने इस सब पर कभी घमण्ड नहीं किया, इसके आधार पर कभी अपना मूल्य नहीं आँका—कभी अपनी आत्मा की आशा इस पर नहीं टिकाई। अरे नहीं—एक क्षण के लिए भी नहीं!

उसने अपनी कलीसियाई स्थिति पर कभी घमण्ड नहीं किया। यदि कभी कोई अच्छा कलीसियाई मनुष्य था, तो वह पौलुस था। वह स्वयं चुना हुआ प्रेरित था। वह कलीसियाओं का स्थापक और सेवकों को नियुक्त करनेवाला था—तीमुथियुस, तीतुस और बहुत-से प्राचीनों को उसी के हाथों से पहली सेवाकाई मिली। बहुत-से अन्धकारमय स्थानों में उसी ने आराधना और संस्कार आरम्भ किए। उसने बहुतों को बपतिस्मा दिया; बहुतों को प्रभु-भोज में सम्मिलित किया; प्रार्थना, स्तुति और प्रचार की कितनी ही सभाएँ उसने आरम्भ कीं और चलाईं। बहुत-सी नई कलीसियाओं में उसी ने अनुशासन स्थापित किया। बहुत-सी कलीसियाओं में जो भी विधियाँ, नियम और रीतियाँ मानी जाती थीं, उनका सुझाव पहले उसी ने दिया था। परन्तु क्या उसने कभी अपने पद और कलीसिया में अपनी स्थिति पर घमण्ड किया? क्या वह कभी ऐसे बोलता है मानो उसका कलीसियाई होना उसे बचाएगा, धर्मी ठहराएगा, उसके पाप दूर करेगा और उसे परमेश्वर के सामने ग्रहणयोग्य बनाएगा? अरे नहीं! कभी नहीं—कभी नहीं! एक क्षण के लिए भी नहीं!

अब यदि प्रेरित पौलुस ने इन बातों में से किसी पर कभी घमण्ड नहीं किया, तो आज संसार के एक छोर से दूसरे छोर तक किसे इन पर घमण्ड करने का अधिकार है? यदि पौलुस ने कहा, "परमेश्वर न करे कि मैं क्रूस को छोड़ और किसी बात का घमण्ड करूँ," तो कौन यह कहने का साहस करेगा, "मेरे पास घमण्ड करने को कुछ है—मैं पौलुस से अच्छा मनुष्य हूँ"?

इस लेख के पाठकों में कौन है जो अपनी किसी भलाई पर भरोसा रखता है? कौन है जो अपने सुधारों—अपनी नैतिकता—अपने कलीसियाई सम्बन्ध—अपने कर्मों और कामों पर, चाहे वे किसी भी प्रकार के हों, भरोसा किए बैठा है? कौन है जो अपनी आत्मा का बोझ अपनी ही किसी वस्तु पर, चाहे बहुत ही थोड़ा सही, टिकाए हुए है? जान लो, मैं कहता हूँ, कि तुम प्रेरित पौलुस से बहुत भिन्न हो। जान लो कि तुम्हारा धर्म प्रेरितों का धर्म नहीं है।

इस लेख के पाठकों में कौन है जो उद्धार के लिए अपने धार्मिक दावे पर भरोसा रखता है? कौन है जो अपने बपतिस्मा, या प्रभु-भोज में अपनी उपस्थिति—रविवार को अपने कलीसिया जाने, या सप्ताह भर की अपनी दैनिक सेवाओं पर गर्व करता है—और अपने मन में कहता है, "मुझमें और क्या घटी है?" जान लो, मैं आज कहता हूँ, कि तुम पौलुस से बहुत भिन्न हो। तुम्हारा मसीही धर्म नये नियम का मसीही धर्म नहीं है। पौलुस "क्रूस" को छोड़ किसी और बात पर घमण्ड नहीं करता था। तुम्हें भी नहीं करना चाहिए।

आह, हम आत्म-धार्मिकता से सावधान रहें! खुला पाप हज़ारों आत्माओं को मारता है। आत्म-धार्मिकता दसियों हज़ारों को मारती है! जाओ, अन्यजातियों के उस महान प्रेरित के साथ नम्रता सीखो। जाओ, पौलुस के साथ क्रूस के चरणों में बैठो। अपने गुप्त घमण्ड को छोड़ दो। अपनी भलाई के व्यर्थ विचारों को दूर फेंक दो। यदि तुम्हारे पास अनुग्रह है तो धन्यवादी रहो—परन्तु क्षण भर के लिए भी उस पर घमण्ड मत करो। परमेश्वर और मसीह के लिए पूरे मन, प्राण, बुद्धि और शक्ति से काम करो—परन्तु क्षण भर के लिए भी यह स्वप्न मत देखो कि तुम अपने किसी काम पर भरोसा रख सकते हो।

सोचो, तुम जो अपनी भलाई के कुछ काल्पनिक विचारों में शान्ति पाते हो—सोचो, तुम जो इस धारणा में लिपटे हुए हो कि "यदि मैं अपनी कलीसिया से जुड़ा रहूँ तो सब ठीक है"—क्षण भर सोचो कि तुम कितनी रेतीली नींव पर निर्माण कर रहे हो! सोचो कि मृत्यु की घड़ी में और न्याय के दिन तुम्हारी आशाएँ और तुम्हारी दलीलें कितनी दयनीय रूप से अधूरी दिखाई देंगी! जब तक लोग बलवन्त और स्वस्थ हैं, वे अपनी भलाई के विषय में चाहे जो कहें, जब वे रोगी और मरणासन्न होंगे तब उसके विषय में उनके पास कहने को बहुत कम होगा। यहाँ इस संसार में वे अपने कामों में चाहे जो पुण्य देखें, जब वे मसीह के न्यायासन के सामने खड़े होंगे तब उनमें कुछ भी न पाएँगे। उस महान न्याय के दिन का प्रकाश उनके सब कामों के रूप में आश्चर्यजनक अन्तर ला देगा। वह चमक-दमक को उतार देगा, रंग-रूप को मुरझा देगा, और बहुत से ऐसे कामों का सड़ापन खोल देगा जो अब भले कहलाते हैं। उनका गेहूँ केवल भूसा निकलेगा—उनका सोना केवल मैल पाया जाएगा। लाखों तथाकथित 'भले कर्म' सर्वथा अधूरे और अनुग्रहहीन ठहरेंगे। वे मनुष्यों में चलते थे और मूल्यवान समझे जाते थे—परमेश्वर के तराजू में वे हल्के और निकम्मे ठहरेंगे। वे प्राचीन काल की चूना फिरी हुई कब्रों के समान पाए जाएँगे—बाहर से सुन्दर और शोभायमान—परन्तु भीतर से सड़ाहट से भरे हुए। हाय उस मनुष्य पर जो न्याय के दिन की ओर देख सकता है, और फिर भी अब अपनी किसी वस्तु पर अपनी आत्मा को थोड़ा भी टिकाता है!

"जब लोग चैन से बैठे होते हैं, तब वे चाहे जैसे अपने मन को इस मनमानी कल्पना से गुदगुदाते रहें कि उनके पुण्य और उनके प्रतिफल के बीच न जाने कैसा समानुपातिक मेल है, जिसे वे अपने ऊँचे चिन्तन की तन्द्रा में स्वप्न देखते हैं कि परमेश्वर ने मानो उनके लिए गठरियों में नापकर रख छोड़ा है—तौभी हम प्रतिदिन के अनुभव से देखते हैं कि उन्हीं में से बहुतों के लिए, जब मृत्यु की घड़ी निकट आती है, जब वे भीतर ही भीतर सुनते हैं कि उन्हें उस न्यायी के न्यायालय में उपस्थित होने के लिए बुलाया जा रहा है, जिसके तेज से स्वर्गदूतों की आँखें भी चौंधिया जाती हैं, तब वे सब निकम्मी कल्पनाएँ अपना मुँह छिपाने लगती हैं। तब पुण्यों का नाम लेना अपनी आत्माओं को यन्त्रणा पर चढ़ाना है। अपने ही कामों की स्मृति उन्हें घृणित लगती है। जिन-जिन वस्तुओं पर उन्होंने कुछ भी भरोसा रखा था, वे उन सब को छोड़ देते हैं। तब सहारा लेने को कोई लाठी नहीं, कोई विश्राम नहीं, कोई चैन नहीं, कोई शान्ति नहीं—केवल यीशु मसीह में।"—रिचर्ड हूकर, 1585।

मैं फिर कहता हूँ, आओ हम आत्म-धार्मिकता से उसके हर सम्भव रूप और आकार में सावधान रहें। कुछ लोगों को अपने काल्पनिक गुणों से उतनी ही हानि पहुँचती है जितनी औरों को अपने पापों से। तब तक चैन न लो, चैन न लो, जब तक तुम्हारा हृदय पौलुस के हृदय के सुर में न धड़कने लगे। तब तक चैन न लो जब तक तुम उसके साथ यह न कह सको, "मुझ से यह कदापि न हो कि मैं अपने प्रभु यीशु मसीह के क्रूस को छोड़ और किसी बात का घमण्ड करूँ!"

II. दूसरे स्थान पर मैं समझाता हूँ कि "मसीह के क्रूस" से हमें क्या समझना चाहिए।

'क्रूस' ऐसा शब्द है जो बाइबल में एक से अधिक अर्थों में प्रयोग हुआ है। जब पौलुस ने गलातियों की पत्री में कहा, "मैं मसीह के क्रूस पर घमण्ड करता हूँ," तो उसका क्या अर्थ था? यही वह बात है जिसकी मैं अब निकटता से जाँच करना और स्पष्ट करना चाहता हूँ।

क्रूस कभी-कभी उस लकड़ी के क्रूस को कहते हैं, जिस पर प्रभु यीशु मसीह को कलवरी पर कीलों से जड़कर मार डाला गया। फिलिप्पियों से जब पौलुस ने कहा कि मसीह "यहाँ तक आज्ञाकारी रहा कि मृत्यु, हाँ, क्रूस की मृत्यु भी सह ली," (फिलिप्पियों 2:8) तब उसके मन में यही था। यह वह क्रूस नहीं है जिस पर पौलुस घमण्ड करता था। वह लकड़ी के एक टुकड़े पर घमण्ड करने के विचार से भय से सिकुड़ जाता। मुझे कोई सन्देह नहीं कि वह रोमन कैथोलिकों द्वारा क्रूसित मूर्ति की आराधना को अपवित्र, निन्दापूर्ण और मूर्तिपूजा कहकर धिक्कारता।

क्रूस कभी-कभी उन क्लेशों और परीक्षाओं को कहते हैं जिनमें से मसीह में विश्वास करनेवालों को अपने धर्म के कारण होकर निकलना पड़ता है, यदि वे विश्वासयोग्यता से मसीह के पीछे चलें। हमारा प्रभु इसी अर्थ में इस शब्द का प्रयोग करता है जब वह कहता है, "जो अपना क्रूस लेकर मेरे पीछे नहीं चलता, वह मेरे योग्य नहीं।" (मत्ती 10:38।) जब पौलुस गलातियों को लिखता है तब वह इस शब्द को इस अर्थ में प्रयोग नहीं करता। वह उस क्रूस को भली-भाँति जानता था—उसने उसे धीरज से उठाया। परन्तु यहाँ वह उसकी बात नहीं कर रहा।

परन्तु कुछ स्थानों पर क्रूस का अर्थ वह सिद्धान्त भी है कि मसीह क्रूस पर पापियों के लिये मरा—वह प्रायश्चित जो उसने पापियों के लिये क्रूस पर दु:ख उठाकर किया—पाप के लिये वह पूर्ण और सिद्ध बलिदान जो उसने तब चढ़ाया जब उसने अपनी देह को क्रूस पर चढ़ाए जाने के लिये सौंप दिया। संक्षेप में, यही एक शब्द "क्रूस" क्रूस पर चढ़ाए गए मसीह के लिये, अर्थात् एकमात्र उद्धारकर्ता के लिये आया है। इसी अर्थ में पौलुस इस वाक्यांश का प्रयोग करता है जब वह कुरिन्थियों से कहता है, "क्रूस की कथा नाश होनेवालों के लिये मूर्खता है।" (1 कुरिन्थियों 1:18।) इसी अर्थ में उसने गलातियों को लिखा, "परन्तु ऐसा न हो कि मैं और किसी बात का घमण्ड करूँ, केवल क्रूस का।" उसका अभिप्राय केवल यह था, "मैं अपनी आत्मा के उद्धार के लिये क्रूस पर चढ़ाए गए मसीह को छोड़ और किसी बात का घमण्ड नहीं करता।"

"मसीह के क्रूस से प्रेरित का तात्पर्य क्रूस पर मसीह के उस सर्वसमर्थ, प्रायश्चित्त करनेवाले और सन्तुष्टि देनेवाले बलिदान से है, हमारे छुटकारे के सम्पूर्ण कार्य सहित; जिसके उद्धारकारी ज्ञान में वह कहता है कि वह घमण्ड करेगा और गर्व करता है।"—कडवर्थ, गलातियों पर। 1613।

"इन शब्दों के विषय में, मुझे कोई टीकाकार, चाहे प्राचीन हो या आधुनिक, रोमन कैथोलिक हो या प्रोटेस्टेंट, जिसने इस स्थान पर लिखा हो, ऐसा नहीं मिलता जो यहाँ उल्लिखित क्रूस की व्याख्या क्रूस के चिह्न से करता हो—परन्तु उसमें विश्वास के अंगीकार से करता है जो क्रूस पर लटकाया गया।"—मेयर की टीका। 1631।

"इसे उस क्रूस के विषय में समझना अधिक उचित है जो मसीह ने हमारे लिये सहा, न कि उसके जो हम उसके लिये सहते हैं।"—लेह की टिप्पणियाँ। 1650।

क्रूस पर चढ़ाया गया यीशु मसीह पौलुस की आत्मा का आनन्द और प्रसन्नता, शान्ति और चैन, आशा और भरोसा, नींव और विश्रामस्थल, जहाज़ और शरण, भोजन और औषधि था। वह यह नहीं सोचता था कि स्वयं उसने क्या किया और क्या सहा। वह अपनी भलाई और अपनी धार्मिकता पर मनन नहीं करता था। उसे यह सोचना प्रिय था कि मसीह ने क्या किया और मसीह ने क्या सहा—मसीह की मृत्यु, मसीह की धार्मिकता, मसीह का प्रायश्चित, मसीह का लहू, मसीह का पूरा किया हुआ कार्य। इसी पर वह घमण्ड करता था। यही उसकी आत्मा का सूर्य था।

यही वह विषय है जिसका प्रचार करना उसे प्रिय था। वह ऐसा मनुष्य था जो पृथ्वी पर इधर-उधर जाकर पापियों को घोषणा करता था कि परमेश्वर के पुत्र ने उनकी आत्माओं को बचाने के लिये अपने हृदय का लहू बहाया। वह संसार में घूमता-फिरता लोगों को बताता था कि यीशु मसीह ने उनसे प्रेम किया और उनके पापों के लिये क्रूस पर मरा। ध्यान दो कि वह कुरिन्थियों से कैसे कहता है, "मैंने सबसे पहले तुम्हें वही सौंप दिया जो मुझे भी पहुँचा था, कि मसीह पवित्रशास्त्र के अनुसार हमारे पापों के लिये मरा।" (1 कुरिन्थियों 15:3।) "मैंने ठान लिया था कि तुम्हारे बीच यीशु मसीह, वरन् क्रूस पर चढ़ाए हुए मसीह को छोड़ और किसी बात को न जानूँगा।" (1 कुरिन्थियों 2:2।) वह, निन्दा करनेवाला और सतानेवाला फरीसी, मसीह के लहू से धोया गया था। वह इसके विषय में चुप नहीं रह सकता था। वह क्रूस की कथा सुनाते कभी थकता न था।

यही वह विषय है जिस पर वह विश्वासियों को लिखते समय विशेष रूप से ठहरना चाहता था। यह देखना आश्चर्यजनक है कि उसकी पत्रियाँ सामान्यतः मसीह के दु:खभोग और मृत्यु से कितनी भरी हैं—मसीह के मरते हुए प्रेम और सामर्थ्य के विषय में वे "साँस लेते विचारों और जलते शब्दों" से कैसे छलकती हैं। उसका हृदय इस विषय से भरा हुआ प्रतीत होता है। वह इस पर निरन्तर विस्तार से कहता है—वह बार-बार इसी की ओर लौटता है। यह वह सुनहरा धागा है जो उसकी समस्त सैद्धान्तिक शिक्षाओं और व्यावहारिक उपदेशों में पिरोया हुआ है। उसे ऐसा प्रतीत होता है कि सबसे उन्नत मसीही भी क्रूस के विषय में कभी अधिक नहीं सुन सकता।

"क्रूस पर चढ़ाया गया मसीह सुसमाचार का सार है और उसकी सारी सम्पत्ति उसमें समाई है। पौलुस मसीह पर इतना मुग्ध था कि यीशु से मधुर कुछ भी उसकी लेखनी और होंठों से नहीं टपक सकता था। देखा गया है कि उसकी पत्रियों में "यीशु" शब्द पाँच सौ बार आया है।"—चार्नॉक। 1684।

यही वह था जिस पर वह अपने मन फिराव के समय से जीवन भर जीवित रहा। वह गलातियों से कहता है, "अब मैं जो शरीर में जीवित हूँ तो केवल उस विश्वास से जीवित हूँ जो परमेश्वर के पुत्र पर है, जिसने मुझसे प्रेम किया और मेरे लिये अपने आप को दे दिया।" (गलातियों 2:20।) किस बात ने उसे परिश्रम के लिये इतना सामर्थी बनाया? किस बात ने उसे काम करने के लिये इतना तत्पर बनाया? किस बात ने उसे कुछ को बचाने के प्रयत्न में इतना अथक बनाया? किस बात ने उसे इतना दृढ़ और धैर्यवान बनाया? मैं तुम्हें इस सबका भेद बताता हूँ। वह सदा विश्वास के द्वारा मसीह की देह और मसीह के लहू से पोषण पाता रहता था। क्रूस पर चढ़ाया गया यीशु उसकी आत्मा का खान-पान था।

और हम निश्चिन्त रह सकते हैं कि पौलुस सही था। निश्चय जानो कि मसीह का क्रूस—पापियों के प्रायश्चित के लिये क्रूस पर मसीह की मृत्यु—समस्त बाइबल का केन्द्रीय सत्य है। जब हम उत्पत्ति खोलते हैं तो इसी सत्य से आरम्भ करते हैं। स्त्री के वंश का सर्प के सिर को कुचलना क्रूस पर चढ़ाए गए मसीह की भविष्यद्वाणी के सिवा और कुछ नहीं। यही सत्य मूसा की व्यवस्था और यहूदियों के इतिहास में आवरण के साथ ही चमकता है। प्रतिदिन का बलिदान, फसह का मेम्ना, तम्बू और मन्दिर में लहू का निरन्तर बहाया जाना—ये सब क्रूस पर चढ़ाए गए मसीह के प्रतीक थे। यही सत्य है जिसे हम प्रकाशितवाक्य की पुस्तक बन्द करने से पहले स्वर्ग के दर्शन में सम्मानित देखते हैं। हमें बताया गया है, "सिंहासन और चारों प्राणियों के बीच में, और पुरनियों के बीच में, मानो एक मेम्ना जिसका वध किया गया था, खड़ा था।" (प्रकाशितवाक्य 5:6।) स्वर्गीय महिमा के बीच भी हमें क्रूस पर चढ़ाए गए मसीह का दर्शन होता है। मसीह का क्रूस हटा दो, तो बाइबल एक अन्धकारमय पुस्तक रह जाती है। वह उन मिस्री चित्रलिपियों के समान है जिनका अर्थ बतानेवाली कुंजी न हो—कौतूहलजनक और अद्भुत—परन्तु वास्तव में किसी काम की नहीं।

इस लेख का हर पाठक मेरी बात पर ध्यान दे। हो सकता है कि तुम बाइबल के विषय में बहुत कुछ जानते हो। हो सकता है कि तुम उसमें दिए गए इतिहास की रूपरेखा और वर्णित घटनाओं की तिथियाँ वैसे ही जानते हो जैसे कोई मनुष्य इंग्लैंड का इतिहास जानता है। हो सकता है कि तुम उसमें उल्लिखित स्त्री-पुरुषों के नाम वैसे ही जानते हो जैसे कोई मनुष्य कैसर, सिकन्दर महान या नेपोलियन को जानता है। हो सकता है कि तुम बाइबल की अलग-अलग आज्ञाओं को जानते हो और उनकी प्रशंसा करते हो, जैसे कोई मनुष्य प्लेटो, अरस्तू या सेनेका की प्रशंसा करता है। परन्तु यदि तुमने अब तक यह नहीं पहचाना कि क्रूस पर चढ़ाया गया मसीह पूरी पुस्तक की नींव है, तो अब तक तुमने अपनी बाइबल बहुत थोड़े लाभ के साथ पढ़ी है। तुम्हारा धर्म सूर्य के बिना स्वर्ग है, मध्यशिला के बिना मेहराब है, सुई के बिना दिशासूचक है, कमानी या बाटों के बिना घड़ी है, तेल के बिना दीपक है। वह तुम्हें शान्ति नहीं देगा। वह तुम्हारी आत्मा को नरक से नहीं छुड़ाएगा।

मेरी बात पर फिर ध्यान दो। हो सकता है कि तुम एक प्रकार के मस्तिष्क के ज्ञान से मसीह के विषय में बहुत कुछ जानते हो। तुम जानते हो कि वह कौन था, कहाँ जन्मा और उसने क्या किया। तुम उसके चमत्कारों, उसके वचनों, उसकी भविष्यद्वाणियों और उसकी विधियों को जानते हो। तुम जानते हो कि वह कैसे जिया, कैसे दुःख उठाया और कैसे मरा। परन्तु जब तक तुम मसीह के क्रूस की सामर्थ्य को अनुभव से नहीं जानते—जब तक तुम भीतर यह नहीं जानते और अनुभव नहीं करते कि उस क्रूस पर बहाए गए लहू ने तुम्हारे अपने विशेष पापों को धो डाला है—जब तक तुम यह मानने को तैयार नहीं कि तुम्हारा उद्धार पूरी तरह उस कार्य पर निर्भर है जो मसीह ने क्रूस पर किया—जब तक ऐसा नहीं है, मसीह तुम्हें कुछ लाभ नहीं पहुँचाएगा। केवल मसीह का नाम जान लेने से तुम्हारा उद्धार कभी नहीं होगा। तुम्हें उसके क्रूस और उसके लहू को जानना होगा, नहीं तो तुम अपने पापों में मरोगे।

"यदि हमारा विश्वास मसीह के जीवन पर ही रुक जाए और उसके लहू को न थामे, तो वह धर्मी ठहरानेवाला विश्वास न होगा। उसके चमत्कार, जिन्होंने संसार को उसके सिद्धान्तों के लिए तैयार किया; उसकी पवित्रता, जिसने उसे अपने दुःख उठाने के योग्य बनाया, क्रूस के जुड़े बिना हमारे लिए पर्याप्त न होते।" चार्नॉक। 1684।

जब तक तुम जीवित हो, ऐसे धर्म से सावधान रहो जिसमें क्रूस की बहुत चर्चा न हो। तुम ऐसे समय में जी रहे हो जब यह चेतावनी बहुत आवश्यक है। मैं फिर कहता हूँ, क्रूस के बिना धर्म से सावधान रहो।

आज सैकड़ों आराधनालय ऐसे हैं जिनमें क्रूस को छोड़कर लगभग सब कुछ है। वहाँ नक्काशीदार लकड़ी और तराशे हुए पत्थर हैं; रंगीन काँच और चमकदार चित्रकारी है; गम्भीर आराधना-सभाएँ और विधियों का निरन्तर क्रम है; परन्तु मसीह का सच्चा क्रूस वहाँ नहीं है। मंच से क्रूस पर चढ़ाए गए यीशु का प्रचार नहीं होता। परमेश्वर के मेम्ने को ऊँचा नहीं उठाया जाता, और उस पर विश्वास के द्वारा उद्धार की स्वतंत्रता से घोषणा नहीं की जाती। और इसलिए सब कुछ गलत है। ऐसे आराधनालयों से सावधान रहो। वे प्रेरितों की रीति के नहीं हैं। वे पौलुस को सन्तुष्ट नहीं करते।

"पौलुस ने ठान लिया था कि यीशु मसीह, और वह भी क्रूस पर चढ़ाए हुए, को छोड़ और कुछ न जानूँगा। परन्तु बहुत से लोग सेवकाई को ऐसे चलाते हैं मानो उन्होंने इसके विपरीत ठान लिया हो—कि यीशु मसीह, और वह भी क्रूस पर चढ़ाए हुए, को छोड़ और सब कुछ जानेंगे।"—ट्रेल। 1690।

हमारे समय में हज़ारों धार्मिक पुस्तकें छपती हैं, जिनमें क्रूस को छोड़कर सब कुछ है। वे संस्कारों के विषय में निर्देशों और कलीसिया की स्तुति से भरी हैं। उनमें पवित्र जीवन के विषय में उपदेश और सिद्धता पाने के नियम भरे पड़े हैं। उनमें भीतर और बाहर बहुत से बपतिस्मा-कुण्ड और क्रूस हैं। परन्तु मसीह का सच्चा क्रूस छोड़ दिया गया है। उद्धारकर्ता और उसके प्रायश्चित तथा सम्पूर्ण उद्धार के कार्य का या तो उल्लेख ही नहीं होता, या पवित्रशास्त्र के विरुद्ध रीति से होता है। और इसलिए वे व्यर्थ से भी बुरी हैं। ऐसी पुस्तकों से सावधान रहो। वे प्रेरितों की रीति की नहीं हैं। वे पौलुस को कभी सन्तुष्ट न करतीं।

पौलुस क्रूस को छोड़ और किसी बात पर घमण्ड नहीं करता था। उसके समान बनने का प्रयत्न करो। क्रूस पर चढ़ाए गए यीशु को अपनी आत्मा की आँखों के सामने पूरी रीति से रखो। ऐसी किसी शिक्षा को न सुनो जो तुम्हारे और उसके बीच किसी वस्तु को खड़ा करे। गलातियों की पुरानी भूल में मत पड़ो—यह न सोचो कि आज कोई प्रेरितों से अच्छा मार्गदर्शक है। "पुराने मार्गों" से लज्जित मत हो, जिन पर वे लोग चले जो पवित्र आत्मा की प्रेरणा से भरे थे। आधुनिक शिक्षकों की अस्पष्ट बातें, जो "सार्वभौमिकता" और "कलीसिया" के विषय में बड़े-बड़े फूले हुए शब्द कहते हैं, तुम्हारी शान्ति भंग न करें और तुम्हारे हाथों को क्रूस से ढीला न करें। कलीसियाएँ, सेवक और संस्कार, सब अपनी रीति से उपयोगी हैं—परन्तु वे क्रूस पर चढ़ाया गया मसीह नहीं हैं। मसीह की महिमा किसी और को मत दो। "जो घमण्ड करे, वह प्रभु पर घमण्ड करे।" (1 कुरिन्थियों 1:31।)

III. अन्त में मैं यह दिखाता हूँ कि सब मसीहियों को मसीह के क्रूस पर क्यों घमण्ड करना चाहिए।

मैं अनुभव करता हूँ कि इस बात पर मुझे कुछ कहना ही चाहिए, क्योंकि इसके विषय में अज्ञानता फैली हुई है। मुझे सन्देह है कि बहुतों को मसीह के क्रूस के विषय में कोई विशेष महिमा और सुन्दरता दिखाई नहीं देती। इसके विपरीत वे इसे पीड़ादायक, दीन करनेवाला और अपमानजनक समझते हैं। उन्हें उसकी मृत्यु और दुःखों की कथा में कोई विशेष लाभ नहीं दिखता। वे उससे अप्रिय वस्तु के समान मुँह फेर लेते हैं।

अब मैं मानता हूँ कि ऐसे लोग बिलकुल गलत हैं। मैं उनसे सहमत नहीं हो सकता। मेरा विश्वास है कि हम सब के लिए मसीह के क्रूस पर निरन्तर ध्यान लगाए रखना उत्तम बात है। यह भली बात है कि हमें बार-बार स्मरण कराया जाए कि यीशु कैसे दुष्ट मनुष्यों के हाथों पकड़वाया गया— कैसे उन्होंने अत्यन्त अन्यायपूर्ण न्याय से उसे दोषी ठहराया—कैसे उन्होंने उस पर थूका, उसे कोड़े मारे, उसे पीटा और उसे काँटों का मुकुट पहनाया —कैसे वे उसे वध होनेवाले मेम्ने की नाईं ले गए, और उसने न कुड़कुड़ाया न विरोध किया—कैसे उन्होंने उसके हाथों और पाँवों में कीलें ठोंकीं और उसे दो चोरों के बीच कलवरी पर खड़ा किया—कैसे उन्होंने भाले से उसका पंजर बेधा, उसके दुःख में उसका उपहास किया, और उसे वहाँ नंगा और लहूलुहान लटका रहने दिया जब तक वह मर न गया। मैं कहता हूँ, इन सब बातों का स्मरण दिलाया जाना भला है। यह व्यर्थ नहीं कि नए नियम में क्रूस पर चढ़ाए जाने का वर्णन चार बार हुआ है। बहुत कम बातें हैं जिनका वर्णन सुसमाचार के चारों लेखकों ने किया है। साधारणतः यदि हमारे प्रभु के इतिहास की कोई बात मत्ती, मरकुस और लूका बताते हैं, तो यूहन्ना उसे नहीं बताता। परन्तु एक बात ऐसी है जिसे चारों ने पूरे विस्तार से हमें दिया है, और वह एक बात क्रूस की कथा है। यह एक बताने वाला तथ्य है, और अनदेखा करने योग्य नहीं।

लोग यह भूल जाते प्रतीत होते हैं कि क्रूस पर मसीह के सारे दुःख पहले से ठहराए हुए थे। वे उस पर संयोग या दुर्घटना से नहीं आए—वे सब अनादि काल से योजित, विचारित और निश्चित थे। अनन्त त्रिएकता ने पापियों के उद्धार के लिए जो भी प्रबन्ध किए, उन सब में क्रूस पहले से देखा गया था। परमेश्वर की योजनाओं में क्रूस अनादिकाल से खड़ा किया गया था। यीशु ने पीड़ा की एक धड़कन भी न सही, और उसका एक भी अनमोल लहू-बिन्दु न बहा, जो बहुत पहले से ठहराया हुआ न था। अनन्त बुद्धि ने ठहराया कि छुटकारा क्रूस के द्वारा हो। अनन्त बुद्धि ही यीशु को ठीक समय पर क्रूस तक ले आई। वह "परमेश्वर की ठहराई हुई योजना और पूर्वज्ञान के अनुसार" क्रूस पर चढ़ाया गया। (प्रेरितों के काम 2:23।)

लोग यह भूल जाते प्रतीत होते हैं कि क्रूस पर मसीह के सारे दुःख मनुष्य के उद्धार के लिए आवश्यक थे। यदि हमारे पाप कभी उठाए जाने थे, तो उसे ही उन्हें उठाना था। केवल उसके कोड़ों से ही हम चंगे हो सकते थे। हमारे ऋण का यही एक भुगतान था जिसे परमेश्वर स्वीकार करता—यही वह महान बलिदान था जिस पर हमारा अनन्त जीवन निर्भर था। यदि मसीह क्रूस पर न जाता और हमारी सन्ती दुःख न उठाता, अर्थात् धर्मी अधर्मियों के लिए, तो हमारे लिए आशा की एक चिंगारी भी न होती। हमारे और परमेश्वर के बीच एक विशाल खाई होती, जिसे कोई मनुष्य कभी पार न कर पाता।

"मसीह की दीनता में हमारी महिमा, उसकी दुर्बलता में हमारा बल, उसकी लज्जा में हमारा गौरव, और उसकी मृत्यु में हमारा जीवन निहित है।"—कडवर्थ। 1613।

"विश्वास की आँख मसीह को क्रूस की चोटी पर विजय-रथ में विराजमान देखती है, और शैतान को उसी क्रूस के सबसे निचले भाग से बँधा हुआ और मसीह के पाँवों तले रौंदा हुआ।"—डेवनेन्ट, कुलुस्सियों पर टीका। 1627।

लोग यह भूल जाते प्रतीत होते हैं कि मसीह के सारे दुःख स्वेच्छा से, अपनी ही इच्छा से सहे गए थे। उस पर कोई दबाव न था। उसने अपनी ही पसन्द से अपना प्राण दिया—अपनी ही पसन्द से वह क्रूस पर गया, ताकि वह कार्य पूरा करे जिसके लिए वह आया था। वह एक वचन से स्वर्गदूतों की सेना की सेनाएँ बुला सकता था, और पिलातुस, हेरोदेस तथा उनकी सारी सेनाओं को पवन के आगे भूसे के समान उड़ा सकता था। परन्तु वह स्वेच्छा से दुःख उठानेवाला था। उसका हृदय पापियों के उद्धार में लगा था। उसने ठान लिया था कि अपना ही लहू बहाकर "पाप और अशुद्धता धोने के लिए एक सोता" खोल दे। (जकर्याह 13:1।)

जब मैं यह सब सोचता हूँ, तो मसीह के क्रूस के विषय में मुझे कुछ भी दुःखद या अप्रिय नहीं दिखता। इसके विपरीत, मैं उसमें बुद्धि और सामर्थ्य, शान्ति और आशा, आनन्द और उल्लास, सान्त्वना और ढाढ़स देखता हूँ। जितना अधिक मैं क्रूस को अपने मन की आँखों के सामने रखता हूँ, उतनी ही अधिक परिपूर्णता मुझे उसमें दिखाई देती है। जितना अधिक मैं अपने विचारों में क्रूस पर ठहरता हूँ, उतना ही अधिक मुझे सन्तोष होता है कि संसार में और कहीं की अपेक्षा क्रूस के चरणों में सीखने को अधिक है।

(क) क्या मैं जानना चाहता हूँ कि एक पापी संसार के प्रति पिता परमेश्वर के प्रेम की लम्बाई और चौड़ाई कितनी है? उसे सबसे अधिक कहाँ प्रकट देखूँगा? क्या उसके तेजस्वी सूर्य को देखूँ, जो कृतघ्न और बुरे लोगों पर भी प्रतिदिन चमकता है? क्या बोने और काटने के समय को देखूँ, जो हर वर्ष नियम से लौटते हैं? अरे नहीं! इस प्रकार की किसी भी बात से बढ़कर प्रेम का प्रमाण मुझे मिल सकता है। मैं मसीह के क्रूस को देखता हूँ। उसमें मैं पिता के प्रेम का कारण नहीं—वरन् उसका परिणाम देखता हूँ। वहाँ मैं देखता हूँ कि परमेश्वर ने इस दुष्ट संसार से ऐसा प्रेम रखा कि उसने अपना एकलौता पुत्र दे दिया—उसे दुःख उठाने और मरने के लिए दे दिया—ताकि "जो कोई उस पर विश्वास करे, वह नाश न हो—परन्तु अनन्त जीवन पाए।" (यूहन्ना 3:16।) मैं जानता हूँ कि पिता हम से प्रेम रखता है, क्योंकि उसने हम से अपने पुत्र को, अपने एकलौते पुत्र को, नहीं रख छोड़ा। कभी-कभी मैं यह कल्पना कर सकता हूँ कि पिता परमेश्वर हम जैसे दीन, भ्रष्ट प्राणियों की चिन्ता करने के लिए बहुत ऊँचा और पवित्र है! परन्तु जब मैं मसीह के क्रूस को देखता हूँ, तो मैं ऐसा सोच नहीं सकता, मुझे ऐसा सोचना नहीं चाहिए, मैं ऐसा सोचने का साहस नहीं कर सकता।

"जिस संसार में हम रहते हैं, वह हमारे सिरों पर गिर पड़ता, यदि क्रूस का खम्भा उसे थामे न रहता; यदि मसीह बीच में आकर मनुष्य के पाप के लिए प्रायश्चित का वचन न देता। इसी से सब वस्तुएँ बनी रहती हैं—हमारा कोई आशीर्वाद ऐसा नहीं जो हमें इसकी स्मृति न दिलाए; वे सब पाप के कारण खो दिए गए थे—परन्तु उसके लहू के पुण्य से फिर मिले। यदि हम इस पर भली-भाँति मनन करें, तो हम समझेंगे कि परमेश्वर ने पाप से कितना बैर और संसार से कितना प्रेम रखा।"—चार्नॉक।

(ख) क्या मैं जानना चाहता हूँ कि परमेश्वर की दृष्टि में पाप कितना अत्यन्त पापमय और घिनौना है? उसे सबसे पूर्ण रूप से कहाँ प्रकट देखूँगा? क्या जल-प्रलय के इतिहास की ओर मुड़ूँ, और पढ़ूँ कि पाप ने कैसे संसार को डुबो दिया? क्या मृत सागर के तट पर जाकर देखूँ कि पाप ने सदोम और अमोरा पर क्या विपत्ति डाली? क्या भटकते हुए यहूदियों की ओर मुड़ूँ, और देखूँ कि पाप ने उन्हें पृथ्वी के कोने-कोने में कैसे बिखेर दिया? नहीं! इससे भी स्पष्ट प्रमाण मुझे मिल सकता है! मैं मसीह के क्रूस को देखता हूँ। वहाँ मैं देखता हूँ कि पाप इतना काला और दण्ड के योग्य है कि परमेश्वर के अपने पुत्र के लहू को छोड़ और कुछ उसे धो नहीं सकता। वहाँ मैं देखता हूँ कि पाप ने मुझे मेरे पवित्र सृजनहार से इतना अलग कर दिया है कि स्वर्ग के सारे स्वर्गदूत भी हमारे बीच मेल नहीं करा सकते थे। मसीह की मृत्यु से कम कोई बात हमारा मेल-मिलाप नहीं करा सकती थी। यदि मैं घमण्डी लोगों की तुच्छ बातें सुनूँ, तो कभी-कभी मैं सोच सकता हूँ कि पाप इतना भी पापमय नहीं है! परन्तु जब मैं मसीह के क्रूस को देखता हूँ, तो पाप को हल्का नहीं समझ सकता।

(ग) क्या मैं उस उद्धार की परिपूर्णता और सम्पूर्णता को जानना चाहता हूँ जो परमेश्वर ने पापियों के लिये ठहराया है? मैं उसे सबसे स्पष्ट रूप से कहाँ देखूँगा? क्या मैं परमेश्वर की दया के विषय में बाइबल की सामान्य घोषणाओं के पास जाऊँ? क्या मैं इस सामान्य सत्य पर टिक जाऊँ कि परमेश्वर "प्रेम का परमेश्वर" है? अरे नहीं! मैं मसीह के क्रूस को देखूँगा। मुझे उसके समान कोई प्रमाण नहीं मिलता। घायल विवेक और व्याकुल हृदय के लिये मुझे वैसी कोई औषधि नहीं मिलती जैसी यह देखने में मिलती है कि यीशु उस श्रापित काठ पर मेरे लिये मर रहा है। वहाँ मैं देखता हूँ कि मेरे सारे भारी ऋणों का पूरा मूल्य चुका दिया गया है। उस व्यवस्था का श्राप, जिसे मैंने तोड़ा है, उस एक पर आ पड़ा जिसने वहाँ मेरे स्थान पर दुःख उठाया। उस व्यवस्था की सारी माँगें पूरी हो गई हैं। मेरे लिये अन्तिम कौड़ी तक चुका दी गई है। वह दो बार नहीं माँगी जाएगी। आह, कभी-कभी मैं कल्पना कर सकता हूँ कि मैं इतना बुरा हूँ कि क्षमा नहीं पा सकता! मेरा अपना मन कभी-कभी मुझसे कानाफूसी करता है कि मैं इतना दुष्ट हूँ कि मेरा उद्धार नहीं हो सकता। परन्तु अपने अच्छे क्षणों में मैं जानता हूँ कि यह सब मेरा मूर्खतापूर्ण अविश्वास है। मैं अपने सन्देहों का उत्तर कलवरी पर बहाए गए लहू में पढ़ता हूँ। जब मैं क्रूस को देखता हूँ, तो मुझे निश्चय हो जाता है कि अत्यन्त नीच से नीच मनुष्यों के लिये भी स्वर्ग का एक मार्ग है।

(घ) क्या मैं पवित्र मनुष्य होने के लिये प्रबल कारण खोजना चाहता हूँ? उनके लिये मैं किसकी ओर मुड़ूँ? क्या मैं केवल दस आज्ञाओं को सुनूँ? क्या मैं बाइबल में दिये गए उन उदाहरणों का अध्ययन करूँ कि अनुग्रह क्या कर सकता है? क्या मैं स्वर्ग के प्रतिफलों और नरक के दण्डों पर मनन करूँ? क्या इससे भी प्रबल कोई प्रेरणा नहीं है? है! मैं मसीह के क्रूस को देखूँगा! वहाँ मैं मसीह के प्रेम को देखता हूँ जो मुझे विवश करता है कि मैं "अपने लिये नहीं—परन्तु उसके लिये जीऊँ।" वहाँ मैं देखता हूँ कि अब मैं अपना नहीं हूँ— मैं "दाम देकर मोल लिया गया हूँ।" (2 कुरिन्थियों 5:15; 1 कुरिन्थियों 6:20।) मैं अत्यन्त गम्भीर बन्धनों में बंधा हूँ कि शरीर और आत्मा दोनों से, जो उसी के हैं, यीशु की महिमा करूँ। वहाँ मैं देखता हूँ कि यीशु ने अपने आप को मेरे लिये दे दिया, केवल इसलिये नहीं कि मुझे सब अधर्म से छुड़ा ले—परन्तु इसलिये भी कि मुझे शुद्ध करे, और मुझे "भले कामों के लिये उत्तेजित" एक "निज प्रजा" में से एक बना दे। (तीतुस 2:14।) उसने मेरे पापों को अपनी देह पर क्रूस के काठ पर उठा लिया, "ताकि मैं पापों के लिये मरकर धार्मिकता के लिये जीऊँ।" (1 पतरस 2:24।) मसीह के क्रूस के स्पष्ट दर्शन के समान पवित्र करनेवाली कोई वस्तु नहीं! यह संसार को हमारे लिये और हमें संसार के लिये क्रूस पर चढ़ा देता है। जब हम स्मरण करते हैं कि हमारे पापों के कारण यीशु मरा, तो हम पाप से प्रेम कैसे रख सकते हैं? निश्चय ही क्रूस पर चढ़ाए गए प्रभु के चेलों के समान पवित्र कोई नहीं होना चाहिये।

(ङ) क्या मैं यह सीखना चाहता हूँ कि जीवन की सब चिन्ताओं और विषयों में सन्तुष्ट और आनन्दित कैसे रहूँ? मैं किस पाठशाला में जाऊँ? इस मनोदशा को सबसे सरलता से कैसे पाऊँ? क्या मैं परमेश्वर की सर्वसत्ता, परमेश्वर की बुद्धि, परमेश्वर के विधान, परमेश्वर के प्रेम को देखूँ? ऐसा करना अच्छा है। परन्तु मेरे पास इससे भी उत्तम युक्ति है। मैं मसीह के क्रूस को देखूँगा। मैं अनुभव करता हूँ कि "जिसने अपने निज पुत्र को भी न रख छोड़ा, परन्तु उसे मेरे लिये मरने को सौंप दिया, वह उसके साथ मुझे और सब कुछ भी क्यों न देगा" जिसकी मुझे सचमुच आवश्यकता है। (रोमियों 8:32।) जिसने मेरी आत्मा के लिये ऐसी पीड़ा, ऐसे दुःख और ऐसी वेदना सही, वह निश्चय ही मुझसे कोई ऐसी वस्तु नहीं रोकेगा जो सचमुच भली है। जिसने मेरे लिये बड़े-बड़े काम किये हैं, वह निःसन्देह छोटे काम भी करेगा। जिसने मेरे लिये स्वर्ग में घर मोल लेने को अपना लहू दे दिया, वह निस्सन्देह मार्ग में मेरे लिये सचमुच लाभदायक सब कुछ जुटाएगा। सन्तोष सीखने के लिये क्रूस के चरणों से तुलना करने योग्य कोई पाठशाला नहीं है!

(च) क्या मैं इस आशा के लिये तर्क इकट्ठे करना चाहता हूँ कि मैं कभी त्यागा न जाऊँगा? उन्हें पाने के लिये मैं कहाँ जाऊँ? क्या मैं अपने ही गुणों और वरदानों को देखूँ? क्या मैं अपने ही विश्वास, प्रेम, पश्चात्ताप, उत्साह और प्रार्थना में शान्ति ढूँढ़ूँ? क्या मैं अपने ही मन की ओर मुड़कर कहूँ, "यही मन कभी विश्वासघाती और ठंडा न होगा"? अरे नहीं! परमेश्वर न करे! मैं मसीह के क्रूस को देखूँगा। यही मेरा महान तर्क है। यही मेरा मुख्य आधार है। मैं यह नहीं सोच सकता कि जिसने मेरी आत्मा को छुड़ाने के लिये ऐसे दुःख सहे, वह उस आत्मा को अन्त में नाश होने देगा, जब वह एक बार उसी पर निर्भर हो चुकी। अरे नहीं! यीशु ने जिसका मूल्य चुकाया है, यीशु उसे निश्चय ही बचाए रखेगा। उसने उसके लिये भारी मूल्य चुकाया। वह उसे सहज ही खोने नहीं देगा। जब मैं अन्धकार में पड़ा पापी था, तब उसने मुझे अपने पास बुलाया—मेरे विश्वास करने के बाद वह मुझे कभी न छोड़ेगा। जब शैतान हमें इस सन्देह में डालता है कि मसीह के लोग गिरने से बचे रहेंगे या नहीं, तो हमें शैतान से कहना चाहिये कि वह क्रूस को देखे।

"विश्वासी अनन्त क्रोध से ऐसा छूट गया है कि यदि शैतान और विवेक कहें, 'तू पापी है, और व्यवस्था के श्राप के अधीन है,' तो वह कह सकता है, 'यह सच है, मैं पापी हूँ; परन्तु मैं काठ पर टाँगा गया और मरा, और अपने शिरोमणि और व्यवस्था-दाता मसीह में श्रापित ठहराया गया, और उसका चुकाया हुआ मूल्य और उसका सहा हुआ दुःख मेरा चुकाया हुआ मूल्य और मेरा सहा हुआ दुःख है।'"—रदरफर्ड की 'मरता हुआ मसीह', 1647।

और अब, क्या तुम्हें आश्चर्य होगा कि मैंने कहा कि सब मसीहियों को क्रूस पर घमण्ड करना चाहिये? क्या तुम्हें इसके बदले यह आश्चर्य न होगा कि कोई क्रूस की बात सुनकर भी अप्रभावित रह सके? मैं घोषणा करता हूँ कि मनुष्य की भ्रष्टता का इससे बड़ा कोई प्रमाण मैं नहीं जानता कि हज़ारों तथाकथित मसीही क्रूस में कुछ भी नहीं देखते। हमारे हृदय पत्थर के कहे जाएँ तो ठीक है—हमारे मन की आँखें अन्धी कही जाएँ तो ठीक है—हमारा सारा स्वभाव रोगी कहा जाए तो ठीक है—हम सब मरे हुए कहे जाएँ तो ठीक है, जब मसीह के क्रूस की बात सुनकर भी उसकी उपेक्षा की जाती है। निश्चय ही हम भविष्यद्वक्ता के शब्द उठाकर कह सकते हैं, "हे आकाश, सुन, और हे पृथ्वी, कान लगा; एक भयंकर और चौंका देनेवाली बात हुई है,"—मसीह पापियों के लिये क्रूस पर चढ़ाया गया, और फिर भी बहुत से मसीही ऐसे जीते हैं मानो वह कभी क्रूस पर चढ़ाया ही नहीं गया!

(क) क्रूस मसीही धर्म की सबसे बड़ी विशेषता है। अन्य धर्मों में व्यवस्थाएँ और नैतिक उपदेश, रीतियाँ और विधियाँ, प्रतिफल और दण्ड हैं। परन्तु अन्य धर्म हमें मरते हुए उद्धारकर्ता के विषय में नहीं बता सकते। वे हमें क्रूस नहीं दिखा सकते। यही सुसमाचार का मुकुट और महिमा है। यही वह विशेष शान्ति है जो केवल उसी की है। वह धार्मिक शिक्षा सचमुच अभागी है जो अपने आप को मसीही कहती है, और फिर भी जिसमें क्रूस की कोई बात नहीं। जो मनुष्य इस प्रकार शिक्षा देता है, वह भी सौरमण्डल को समझाने का दावा कर सकता है और फिर भी अपने सुननेवालों को सूर्य के विषय में कुछ न बताए।

(ब) क्रूस सेवक का बल है। मैं तो सारे संसार के बदले भी इसे नहीं छोड़ूँगा। इसके बिना मैं ऐसा अनुभव करूँगा जैसे हथियारों के बिना सैनिक, तूलिका के बिना चित्रकार, दिशासूचक के बिना नाविक, या औज़ारों के बिना मज़दूर। दूसरे लोग, यदि चाहें, तो व्यवस्था और नैतिकता का प्रचार करें; दूसरे नरक की भयानकताओं और स्वर्ग के आनन्दों का वर्णन करें; दूसरे अपनी मण्डलियों को संस्कारों और कलीसिया की शिक्षाओं से सराबोर कर दें; मुझे तो मसीह का क्रूस दीजिए! यही एकमात्र उोलक है जिसने अब तक संसार को उलट-पुलट किया है और लोगों से पाप छुड़वाया है। और यदि यह नहीं कर सकता, तो कुछ भी नहीं कर सकता। कोई मनुष्य लातीनी, यूनानी और इब्रानी भाषाओं के पूर्ण ज्ञान के साथ प्रचार आरम्भ कर सकता है; परन्तु यदि वह क्रूस के विषय में कुछ नहीं जानता, तो अपने श्रोताओं में उससे थोड़ा या कोई भी भला नहीं होगा। ऐसा कोई सेवक कभी नहीं हुआ जिसने आत्माओं के मन फिराव के लिये बहुत कुछ किया हो और जो क्रूस पर चढ़ाए गए मसीह पर अधिक न ठहरा हो। लूथर, रदरफ़ोर्ड, व्हाइटफ़ील्ड और मैक्चेन, ये सब अत्यन्त उत्कृष्ट रूप से क्रूस के प्रचारक थे। पवित्र आत्मा ऐसे ही प्रचार को आशीष देने से प्रसन्न होता है। वह उन्हें आदर देना चाहता है जो क्रूस का आदर करते हैं।

(क) क्रूस सब मिशनरी सफलता का भेद है। केवल इसी ने कभी अन्यजातियों के मन को छुआ है। जितना यह ऊँचा उठाया गया, उतनी ही मिशनों की उन्नति हुई। यही वह हथियार है जिसने पृथ्वी के हर कोने में, हर प्रकार के मनों पर जय पाई है। ग्रीनलैण्डवासी, अफ्रीकी, दक्षिण-सागर के द्वीपवासी, हिन्दू, चीनी, सब ने समान रूप से इसकी शक्ति को अनुभव किया है। जैसे मेनाई जलडमरूमध्य को पार करने वाली वह विशाल लोहे की नली उसमें रखे सारे मृत भार से उतनी नहीं झुकती जितनी आधे घण्टे की धूप से झुक जाती है, वैसे ही जंगली लोगों के मन क्रूस के सामने पिघल गए हैं, जबकि और कोई तर्क उन्हें पत्थरों से अधिक नहीं हिला सका। एक उत्तर अमरीकी इण्डियन ने मन फिराने के बाद कहा, “भाइयो, मैं अन्यजाति था। मैं जानता हूँ कि अन्यजाति कैसे सोचते हैं। एक बार एक प्रचारक आया और हमें समझाने लगा कि परमेश्वर है; परन्तु हमने उससे कहा कि जहाँ से आया है वहीं लौट जाए। एक और प्रचारक आया और कहने लगा कि झूठ मत बोलो, चोरी मत करो, मदिरा मत पियो; परन्तु हमने उसकी ओर ध्यान न दिया। अन्त में एक और दिन मेरी झोपड़ी में आया और बोला, ‘मैं स्वर्ग और पृथ्वी के प्रभु के नाम से तुम्हारे पास आया हूँ। उसने मुझे भेजा है कि तुम्हें बताऊँ कि वह तुम्हें सुखी करेगा और दुःख से छुड़ाएगा। इसी कारण वह मनुष्य बना, उसने अपना प्राण छुड़ौती के रूप में दिया और पापियों के लिये अपना लहू बहाया।’ मैं उसकी बातें न भूल सका। मैंने उन्हें अन्य इण्डियनों को सुनाया, और हमारे बीच जागृति आरम्भ हुई।” इसलिये मैं कहता हूँ कि यदि तुम चाहते हो कि तुम्हारे शब्द अन्यजातियों में प्रवेश पाएँ, तो हमारे उद्धारकर्ता मसीह के दुःखभोग और मृत्यु का प्रचार करो। शैतान ने कभी इतनी पूरी विजय नहीं पाई जितनी तब, जब उसने चीन के जेसुइट मिशनरियों को क्रूस की कथा छिपा रखने के लिये मना लिया!

(ख) क्रूस कलीसिया की उन्नति की नींव है। जिस कलीसिया में क्रूस पर चढ़ाए गए मसीह को निरन्तर ऊँचा नहीं उठाया जाता, वह कभी आदर नहीं पाएगी; क्रूस की कमी की पूर्ति कोई भी वस्तु नहीं कर सकती। इसके बिना सब कुछ शोभा और क्रम से किया जा सकता है; इसके बिना भव्य रीतियाँ, सुन्दर संगीत, ऊँचे-ऊँचे गिरजे, विद्वान सेवक, प्रभु-भोज की भरी हुई मेज़ें और गरीबों के लिये बड़े-बड़े चन्दे हो सकते हैं। परन्तु क्रूस के बिना कोई भलाई नहीं होगी; अन्धकारमय मन ज्योतिर्मय न होंगे, घमण्डी मन दीन न होंगे, शोकित मन शान्ति न पाएँगे, मूर्छित मन ढाढ़स न बाँधेंगे। कलीसिया और प्रेरितीय सेवकाई पर उपदेश, बपतिस्मा और प्रभु-भोज पर उपदेश, एकता और फूट पर उपदेश, उपवासों और सहभागिता पर उपदेश, आदि पिताओं और सन्तों पर उपदेश, ऐसे उपदेश मसीह के क्रूस के उपदेशों की कमी को कभी पूरा नहीं करेंगे। वे कुछ लोगों का मनोरंजन कर सकते हैं, परन्तु किसी का पेट नहीं भरेंगे। भव्य भोजन-कक्ष और मेज़ पर सोने के बर्तन भूखे मनुष्य के लिये भोजन की कमी पूरी नहीं कर सकते। क्रूस पर चढ़ाया गया मसीह मनुष्यों की भलाई करने के लिये परमेश्वर की ठहराई हुई विधि है। जब कभी कोई कलीसिया क्रूस पर चढ़ाए गए मसीह को छिपाती है, या किसी भी और वस्तु को उस प्रमुख स्थान पर रखती है जो सदा क्रूस पर चढ़ाए गए मसीह का होना चाहिए, उसी क्षण से वह कलीसिया उपयोगी नहीं रहती। अपने मंचों पर क्रूस पर चढ़ाए गए मसीह के बिना कलीसिया भूमि को व्यर्थ घेरने वाली, मरी हुई लोथ, बिना जल का कुआँ, बंजर अंजीर का पेड़, सोया हुआ पहरुआ, मौन तुरही, गूँगा गवाह, सन्धि की शर्तों के बिना राजदूत, समाचार के बिना सन्देशवाहक, ज्वाला के बिना प्रकाश-स्तम्भ, निर्बल विश्वासियों के लिये ठोकर, अविश्वासियों के लिये सुख, रीतिवाद की क्यारी, शैतान का आनन्द और परमेश्वर के लिये अप्रिय वस्तु से कुछ ही अच्छी है।

(ग) क्रूस सच्चे मसीहियों की एकता का परम केन्द्र है। निःसन्देह हमारे बाहरी भेद बहुत हैं। कोई एपिस्कोपल है, कोई प्रेस्बिटेरियन; कोई इण्डिपेण्डेण्ट है, कोई बैपटिस्ट; कोई कैल्विनवादी है, कोई आर्मीनियवादी; कोई लूथरवादी है, कोई प्लिमथ ब्रदरन; कोई राजकीय कलीसिया का मित्र है, कोई स्वैच्छिक प्रणाली का; कोई लिखित प्रार्थना-विधियों का मित्र है, कोई तात्कालिक प्रार्थना का। परन्तु अन्त में स्वर्ग में इन भेदों में से अधिकांश के विषय में हम क्या सुनेंगे? सम्भवतः कुछ भी नहीं, बिलकुल कुछ भी नहीं। क्या कोई मनुष्य सचमुच और सच्चाई से मसीह के क्रूस पर घमण्ड करता है? यही प्रमुख प्रश्न है। यदि करता है, तो वह मेरा भाई है; हम एक ही मार्ग पर यात्रा कर रहे हैं; हम उस घर की ओर बढ़ रहे हैं जहाँ मसीह ही सब कुछ है, और धर्म की सब बाहरी बातें भुला दी जाएँगी। परन्तु यदि वह मसीह के क्रूस पर घमण्ड नहीं करता, तो मैं उसके विषय में निश्चिन्त नहीं हो सकता। केवल बाहरी बातों पर एकता तो बस कुछ समय की एकता है; क्रूस पर एकता अनन्त काल की एकता है। बाहरी बातों में भ्रम केवल त्वचा का रोग है; क्रूस के विषय में भ्रम हृदय का रोग है। बाहरी बातों पर एकता केवल मनुष्य की बनाई हुई एकता है; मसीह के क्रूस पर एकता केवल पवित्र आत्मा ही उत्पन्न कर सकता है।

मैं नहीं जानता कि इस सब के विषय में आप क्या सोचते हैं। मुझे ऐसा लगता है कि जो कुछ कहा जा सकता था, उसकी तुलना में मैंने कुछ भी नहीं कहा। मुझे ऐसा लगता है कि क्रूस के विषय में जो कुछ मैं आपको बताना चाहता हूँ उसका आधा भाग अनकहा ही रह गया। परन्तु मुझे आशा है कि मैंने आपको सोचने के लिए कुछ दिया है। मुझे भरोसा है कि मैंने आपको दिखा दिया है कि इस लेख के आरम्भ में मैंने जो प्रश्न पूछा था, "मसीह के क्रूस के विषय में आप क्या सोचते और अनुभव करते हैं?" उसके पीछे मेरे पास कारण था। अब कुछ क्षण मेरी बात सुनिए, जब मैं इस सारे विषय को आपके विवेक पर लागू करने के लिए कुछ कहता हूँ।

(क) क्या आप किसी प्रकार के पाप में जी रहे हैं? क्या आप इस संसार की चाल पर चल रहे हैं और अपनी आत्मा की उपेक्षा कर रहे हैं? मैं विनती करता हूँ, आज जो मैं आपसे कहता हूँ उसे सुनिए, "मसीह के क्रूस को देखिए।" वहाँ देखिए कि यीशु ने आपसे कैसा प्रेम किया! वहाँ देखिए कि आपके लिए उद्धार का मार्ग तैयार करने को यीशु ने क्या-क्या सहा! हाँ—असावधान स्त्री-पुरुषो, आप ही के लिए वह लहू बहाया गया! आप ही के लिए उन हाथों और पाँवों में कीलें ठोंकी गईं! आप ही के लिए वह देह क्रूस पर पीड़ा में लटकी रही! आप ही वे लोग हैं जिनसे यीशु ने प्रेम किया और जिनके लिए मरा! निश्चय ही उस प्रेम को आपको पिघला देना चाहिए। निश्चय ही क्रूस का विचार आपको मन फिराव की ओर खींचे। ओह, यह इसी दिन हो जाए! ओह, आप इसी क्षण उस उद्धारकर्ता के पास आ जाएँ जो आपके लिए मरा और बचाने को तैयार है! आइए, और विश्वास की प्रार्थना के साथ उसे पुकारिए, और मैं जानता हूँ कि वह सुनेगा। आइए, और क्रूस को थाम लीजिए, और मैं जानता हूँ कि वह आपको निकाल न देगा। आइए, और उस पर विश्वास कीजिए जो क्रूस पर मरा, और आज ही आपको अनन्त जीवन मिलेगा। यदि आप इतने बड़े उद्धार की उपेक्षा करें तो कैसे बच निकलेंगे? निश्चय ही नरक में उनसे अधिक गहरे कोई न होंगे जो क्रूस को तुच्छ जानते हैं!

(ख) क्या आप स्वर्ग का मार्ग पूछ रहे हैं? क्या आप उद्धार को ढूँढ़ रहे हैं—परन्तु सन्देह में हैं कि वह मिल सकेगा या नहीं? क्या आप मसीह में अपना भाग पाना चाहते हैं—परन्तु सन्देह करते हैं कि मसीह आपको ग्रहण करेगा या नहीं? आपसे भी मैं आज कहता हूँ, "मसीह के क्रूस को देखिए।" यदि आप सचमुच चाहते हैं तो यहाँ प्रोत्साहन है। प्रभु यीशु के निकट साहस के साथ आइए, क्योंकि आपको रोकने के लिए कुछ भी नहीं है। उसकी बाहें आपको ग्रहण करने के लिए खुली हैं—उसका हृदय आपके प्रति प्रेम से भरा है। उसने ऐसा मार्ग बना दिया है जिससे आप भरोसे के साथ उसके पास पहुँच सकें। क्रूस का ध्यान कीजिए। निकट आइए, और मत डरिए।

(ग) क्या आप अनपढ़ व्यक्ति हैं? क्या आप स्वर्ग पहुँचना चाहते हैं, और बाइबल की उन कठिनाइयों से चकराकर रुक गए हैं जिन्हें आप समझा नहीं सकते? आपसे भी मैं आज कहता हूँ, "मसीह के क्रूस को देखिए।" वहाँ पिता का प्रेम और पुत्र की करुणा पढ़ लीजिए। निश्चय ही वे बड़े और साफ़ अक्षरों में लिखे हैं, जिन्हें कोई भली भाँति ग़लत नहीं समझ सकता। चाहे आप अभी चुनाव के सिद्धान्त से उलझन में हों, चाहे अभी आप अपनी पूर्ण भ्रष्टता और अपनी ज़िम्मेदारी का मेल न बैठा पाते हों, तो भी क्रूस को देखिए। क्या वह क्रूस आपको नहीं बताता कि यीशु सामर्थी, प्रेमी और तत्पर उद्धारकर्ता है? क्या वह एक बात को स्पष्ट नहीं कर देता, कि यदि आप उद्धार नहीं पाते तो यह पूरी तरह आपका अपना दोष है? ओह, इस सत्य को पकड़ लीजिए और दृढ़ता से थामे रहिए!

(घ) क्या आप दुःखी विश्वासी हैं? क्या आपका हृदय बीमारी से दबा है, निराशाओं से परखा गया है, चिन्ताओं से लदा है? आपसे भी मैं आज कहता हूँ, "मसीह के क्रूस को देखिए।" सोचिए कि आपको ताड़ना देनेवाला हाथ किसका है; सोचिए कि जो कड़वा प्याला आप अभी पी रहे हैं उसे आपके लिए नापनेवाला हाथ किसका है। यह उसका हाथ है जो क्रूस पर चढ़ाया गया! यह वही हाथ है जो आपकी आत्मा के प्रति प्रेम में उस श्रापित काठ पर कीलों से जड़ा गया। निश्चय ही यह विचार आपको शान्ति और साहस दे। निश्चय ही आप अपने से कहें, "क्रूस पर चढ़ाया गया उद्धारकर्ता मुझ पर कभी कुछ ऐसा नहीं डालेगा जो मेरे भले के लिए न हो। इसकी आवश्यकता है। सब कुछ भला ही होगा।"

(ङ) क्या आप ऐसे विश्वासी हैं जो अधिक पवित्र होने की लालसा रखते हैं? क्या आप ऐसे हैं जिनका हृदय सांसारिक वस्तुओं से प्रेम करने को बहुत तत्पर पाया जाता है? आपसे भी मैं कहता हूँ, "मसीह के क्रूस को देखिए।" क्रूस को देखिए, क्रूस का विचार कीजिए, क्रूस पर मनन कीजिए, और तब यदि हो सके तो जाकर संसार से मन लगाइए। मेरा विश्वास है कि पवित्रता कलवरी पर जितनी अच्छी तरह सीखी जाती है उतनी कहीं नहीं। मेरा विश्वास है कि आप क्रूस को बहुत देखें और अपनी इच्छा को पवित्र किया जाता और अपनी रुचियों को अधिक आत्मिक बनाया जाता अनुभव न करें, यह नहीं हो सकता। जैसे सूर्य को देखने पर बाक़ी सब कुछ अंधकारमय और धुँधला दिखता है, वैसे ही क्रूस इस संसार की झूठी चमक को मद्धम कर देता है। जैसे शहद चखने पर और सब वस्तुएँ बेस्वाद लगती हैं, वैसे ही विश्वास से देखा गया क्रूस संसार के सुखों की सारी मिठास छीन लेता है। प्रतिदिन दृढ़ता से मसीह के क्रूस को देखते रहिए, और आप शीघ्र ही संसार के विषय में वही कहेंगे जो कवि कहता है—

इसके सुख अब मुझे नहीं भाते, अब ये तृप्ति नहीं देते; ऐसे आनन्द मेरे हृदय से दूर हों, अब जब मैंने प्रभु को देख लिया है।

जैसे प्रभात की किरण से तारे सब छिप जाते हैं, वैसे ही जब यीशु प्रकट होता है तो सांसारिक सुख मिट जाते हैं।

(च) क्या आप मरणासन्न विश्वासी हैं? क्या आप उस बिछौने पर पड़े हैं जिसके विषय में आपके भीतर कुछ कहता है कि आप उससे जीवित न उठेंगे? क्या आप उस गम्भीर घड़ी के निकट आ रहे हैं, जब आत्मा और शरीर कुछ समय के लिए अलग होंगे, और आपको एक अनजाने लोक में प्रवेश करना होगा? ओह, विश्वास से मसीह के क्रूस को स्थिर होकर देखिए, और आप शान्ति में रखे जाएँगे! अपने मन की आँखें मनुष्य के बनाए क्रूसाकार चिन्ह पर नहीं—परन्तु क्रूस पर चढ़ाए गए यीशु पर दृढ़ता से टिका दीजिए, और वह आपको आपके सब भयों से छुड़ाएगा। चाहे आप अंधेरे स्थानों से होकर चलें, वह आपके साथ रहेगा। वह आपको कभी न छोड़ेगा—कभी न त्यागेगा। अन्त तक क्रूस की छाया तले बैठे रहिए, और उसका फल आपके स्वाद के लिए मीठा होगा। एक मरणासन्न मिशनरी ने कहा, "आह, मृत्यु-शय्या पर केवल एक ही बात आवश्यक है, और वह यह कि अपनी बाहों को क्रूस के चारों ओर अनुभव करना!"

ये विचार मैं आपके मन के सामने रखता हूँ। मसीह के क्रूस के विषय में आप अभी क्या सोचते हैं, यह मैं नहीं बता सकता। परन्तु मैं आपके लिए इससे उत्तम कामना नहीं कर सकता—कि आप मरने या प्रभु से मिलने से पहले प्रेरित पौलुस के साथ कह सकें, "परमेश्वर न करे कि मैं और किसी बात का घमण्ड करूँ, केवल हमारे प्रभु यीशु मसीह के क्रूस का!"

पवित्र आत्मा

"यदि किसी में मसीह का आत्मा नहीं तो वह उसका नहीं।" (रोमियों 8:9)

इस पत्रिका का विषय हमारी आत्माओं के लिये अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। यह विषय परमेश्वर पवित्र आत्मा का कार्य है। इस पृष्ठ के आरम्भ में दिये गये पद के गम्भीर शब्द उन सब का ध्यान माँगते हैं जो पवित्रशास्त्र को परमेश्वर की जीवित वाणी मानते हैं। "यदि किसी में मसीह का आत्मा नहीं तो वह उसका जन नहीं।"

सम्भव है कि जिनके हाथों में यह पत्रिका पहुँचेगी उनमें से अधिकांश ने बपतिस्मा लिया है। और आपने किस नाम में बपतिस्मा लिया? वह "पिता, और पुत्र, और पवित्र आत्मा के नाम में" था।

सम्भव है कि इस पत्रिका के बहुत से पाठक विवाहित हैं। और आप दोनों को किस नाम में पति और पत्नी घोषित किया गया? फिर वही, "पिता, और पुत्र, और पवित्र आत्मा के नाम में।"

यह भी असम्भव नहीं कि इस पत्रिका के बहुत से पाठक इंग्लैंड की कलीसिया के सदस्य हों। और जब आप प्रत्येक रविवार को विश्वास-वचन दोहराते हैं तब आप किस पर अपना विश्वास प्रकट करते हैं? आप कहते हैं कि आप "परमेश्वर पिता पर, और परमेश्वर पुत्र पर, और परमेश्वर पवित्र आत्मा पर विश्वास करते हैं।"

सम्भव है कि इस पत्रिका के बहुत से पाठक किसी दिन इंग्लैंड की कलीसिया की अन्त्येष्टि-विधि से दफनाये जायेंगे। और शोक करनेवालों के घर लौटने से पहले, तथा कब्र के आपके ऊपर बन्द होने से पहले, आपके ताबूत के ऊपर अन्तिम शब्द कौन से कहे जायेंगे? वे ये होंगे, "हमारे प्रभु यीशु मसीह का अनुग्रह, और परमेश्वर का प्रेम, और पवित्र आत्मा की सहभागिता तुम सब के साथ होती रहे।" (2 कुरिन्थियों 13:14।)

अब मैं इस पत्रिका के प्रत्येक पाठक से एक सीधा प्रश्न पूछता हूँ: क्या आप जानते हैं कि इन बार-बार दोहराये जानेवाले शब्दों—पवित्र आत्मा—से आपका क्या अभिप्राय है? आपके धर्म में परमेश्वर पवित्र आत्मा का क्या स्थान है? उसके पद, उसके कार्य, उसके निवास, उसकी सहभागिता और उसकी सामर्थ्य के विषय में आप क्या जानते हैं? यही वह विषय है जिस पर मैं आज आपका ध्यान चाहता हूँ। मैं चाहता हूँ कि आप गम्भीरता से विचार करें कि परमेश्वर पवित्र आत्मा के कार्य के विषय में आप क्या जानते हैं।

मेरा विश्वास है कि हमारे समय को इस महान विषय पर बार-बार और स्पष्ट गवाही की आवश्यकता है। मेरा विश्वास है कि मसीही धर्म के थोड़े ही सत्य ऐसे हैं जो पवित्र आत्मा सम्बन्धी सत्य के समान झूठी शिक्षा से इतनी बार धुँधले और बिगड़े जाते हैं। मेरा विश्वास है कि कोई विषय ऐसा नहीं जिसकी निन्दा करने को अज्ञानी संसार पवित्र आत्मा के कार्य के विषय के समान "पाखण्ड, कट्टरता और उन्माद" कहकर इतना तत्पर रहता हो। मेरे मन की अभिलाषा और परमेश्वर से मेरी प्रार्थना यह है कि इस विषय पर मैं "वह सत्य जो यीशु में है" उसके सिवाय और कुछ न लिखूँ, और उस सत्य को प्रेम से लिखूँ। सुविधा के लिये मैं अपने विषय को चार भागों में बाँटूँगा। मैं क्रम से इनकी जाँच करूँगा—

I. पहला—पवित्रशास्त्र में पवित्र आत्मा के कार्य को दिया गया महत्त्व।

II. दूसरा—मनुष्य के उद्धार के लिये पवित्र आत्मा के कार्य की आवश्यकता।

III. तीसरा—वह रीति जिससे पवित्र आत्मा मनुष्य के हृदय में कार्य करता है।

IV. अन्तिम—वे चिह्न और प्रमाण जिनसे मनुष्य के हृदय में पवित्र आत्मा की उपस्थिति पहचानी जा सकती है।

I. पहली बात जिस पर मैं विचार करना चाहता हूँ वह पवित्रशास्त्र में पवित्र आत्मा के कार्य को दिया गया महत्त्व है। मेरे विषय के इस भाग को सँभालते हुए यह जानना कठिन है कि कहाँ से आरम्भ करूँ और कहाँ समाप्त। इस पूरी पत्रिका को इसके विषय में पदों का हवाला देकर भर देना सरल होता। नए नियम में पवित्र आत्मा का उल्लेख इतनी बार हुआ है कि मेरी कठिनाई प्रमाण खोजने में उतनी नहीं जितनी पदों को चुनने में है। रोमियों की पत्री के आठवें अध्याय में पौलुस अठारह बार परमेश्वर आत्मा की चर्चा करता है। वास्तव में अधिकांश मसीही कहलानेवालों के मन में पवित्र आत्मा को जो स्थान प्राप्त है वह उस स्थान के अनुपात में कुछ भी नहीं जो उसे परमेश्वर के वचन में प्राप्त है।

"परमेश्वर के सन्तों में एक सामान्य चूक यह है कि वे पवित्र आत्मा को वह महिमा नहीं देते जो उसके व्यक्तित्व के कारण, और हम में उसके उद्धार के महान कार्य के कारण उसे मिलनी चाहिये; यहाँ तक कि हमने अपने हृदयों में इस तीसरे व्यक्ति को प्राय: खो ही दिया है। हम प्रतिदिन अपने विचारों, प्रार्थनाओं, भावनाओं और वचनों में पिता और पुत्र का आदर करते हैं। पर कौन है जो अपनी स्तुति का लक्ष्य परमेश्वर पवित्र आत्मा की ओर करता है (उस सामान्य स्तुतिगान के सिवाय जिससे हम अपनी प्रार्थनाओं को समाप्त करते हैं)? वह ईश्वरत्व में एक व्यक्ति है, पिता और पुत्र के समान। हमारे लिये जो कार्य वह करता है, अपनी रीति में, पिता या पुत्र के कार्यों के समान ही महान है। इसलिये सारी व्यवस्था की न्यायसंगति के अनुसार, उसे भी उचित अनुपात में आदर मिलना चाहिये।"—थॉमस गुडविन, पवित्र आत्मा के कार्य पर। 1704।

मैं पवित्र आत्मा की ईश्वरता और व्यक्तित्व को प्रमाणित करने में अधिक समय नहीं लगाऊँगा। ये बातें पवित्रशास्त्र में मानो सूर्य की किरण से लिखी हैं। मैं यह समझ ही नहीं पाता कि बाइबल का कोई सच्चे मन का पाठक इन्हें देखने में कैसे चूक सकता है। सबसे बढ़कर, मैं यह समझने में असमर्थ हूँ कि बाइबल का कोई निष्पक्ष पाठक आत्मा को केवल "एक प्रभाव या सिद्धान्त" से बढ़कर कुछ और क्यों नहीं मानता। नए नियम में लिखा है कि पवित्र आत्मा "देह के रूप में उतरता देखा गया।" (लूका 3:22।) उसने चेलों को कार्य करने की आज्ञा दी, और उन्हें अपनी ही सामर्थ्य से आकाश में उठा लिया। (प्रेरितों के काम 8:29-39।) उसी ने अन्यजातियों के पास पहले प्रचारकों को भेजा। (प्रेरितों के काम 13:2।) उसने कलीसियाओं से बातें कीं। (प्रकाशित वाक्य 2:7।) वह मध्यस्थता की प्रार्थना करता है। (रोमियों 8:26।) वह सब बातों का भेद लेता, सब बातें सिखाता, और सारे सत्य में मार्ग दिखाता है। (1 कुरिन्थियों 2:10; यूहन्ना 14:26; 16:13।) वह मसीह से भिन्न एक और सहायक है। (यूहन्ना 14:16।) उसमें व्यक्तिगत भावनाएँ बताई गई हैं। (यशायाह 63:10; इफिसियों 4:30; रोमियों 15:30।) उसका अपना मन, इच्छा और सामर्थ्य है। (रोमियों 8:27; 1 कुरिन्थियों 12:11; रोमियों 15:13।) पिता और पुत्र के साथ उसके नाम में भी बपतिस्मा दिया जाता है। (मत्ती 28:19।) और जो कोई उसकी निन्दा करे उसका कभी क्षमा नहीं होता, और वह अनन्त दण्ड के जोखिम में है। (मरकुस 3:29।)

मैं इन पदों पर कोई टिप्पणी नहीं करता। वे स्वयं बोलते हैं। मैं केवल एम्ब्रोस सर्ल के शब्दों में इतना ही कहता हूँ कि "दो और दो का चार होना उतना स्पष्ट और निर्णायक नहीं जान पड़ता जितना यह कि पवित्र आत्मा चेतना, इच्छा और सामर्थ्य के साथ कार्य करनेवाला जीवित ईश्वरीय कर्ता है। यदि लोग इन गवाहियों से न मानें, तो वे तब भी नहीं मानेंगे चाहे कोई मरे हुओं में से जी उठे।"

मैं फिर कहता हूँ कि मैं पवित्र आत्मा के ईश्वरत्व और उसके व्यक्तित्व के प्रमाणों पर समय नहीं लगाऊँगा। मैं अपने विषय के इस भाग पर जो कुछ कहना है, उसे दो सामान्य बातों तक ही सीमित रखूँगा।

पहली बात यह कि मैं अपने पाठकों से निवेदन करता हूँ कि वे ध्यान से देखें कि मनुष्य के छुटकारे के इस महान कार्य के हर चरण में बाइबल परमेश्वर पवित्र आत्मा को प्रमुख स्थान देती है।

मसीह के देहधारण के विषय में आप क्या सोचते हैं? आप जानते हैं कि उसके महत्त्व को आवश्यकता से अधिक नहीं आँका जा सकता। तो लिखा है कि जब हमारे प्रभु का गर्भ कुँवारी मरियम में ठहरा, तब "पवित्र आत्मा तुझ पर उतरेगा, और परमप्रधान की सामर्थ्य तुझ पर छाया करेगी।" (लूका 1:35।)

हमारे प्रभु यीशु मसीह की पृथ्वी की सेवकाई के विषय में आप क्या सोचते हैं? आप जानते हैं कि जो उसने किया वह किसी ने कभी नहीं किया, जैसा वह जिया वैसा कोई नहीं जिया, और जैसा वह बोला वैसा कोई नहीं बोला। तो लिखा है कि आत्मा "कबूतर के रूप में स्वर्ग से उतरा और उस पर ठहर गया,"—कि "परमेश्वर ने यीशु को पवित्र आत्मा से अभिषेक किया,"—कि "पिता आत्मा को नाप-नापकर नहीं देता," और कि वह "पवित्र आत्मा से परिपूर्ण" था। (यूहन्ना 1:32; प्रेरितों के काम 10:38; यूहन्ना 3:34; लूका 4:1।)

क्रूस पर मसीह के प्रतिनिधि बलिदान के विषय में आप क्या सोचते हैं? उसका मूल्य अवर्णनीय है। इसमें आश्चर्य नहीं कि पौलुस कहता है, "भला न हो कि मैं और किसी बात का घमण्ड करूँ, केवल क्रूस का।" (गलातियों 6:14।) तो लिखा है, "उसने सनातन आत्मा के द्वारा अपने आप को परमेश्वर के सामने निर्दोष चढ़ाया।" (इब्रानियों 9:14।)

मसीह के पुनरुत्थान के विषय में आप क्या सोचते हैं? वह उसके सारे कार्य की मुहर और शिखर-पत्थर था। वह "हमारे धर्मी ठहरने के लिये जिलाया भी गया।" (रोमियों 4:25।) तो लिखा है कि "वह शरीर के भाव से तो घात किया गया, पर आत्मा के भाव से जिलाया गया।" (1 पतरस 3:18।)

मसीह के इस संसार से चले जाने के विषय में, जब वह स्वर्ग पर उठा लिया गया, आप क्या सोचते हैं? यह उसके चेलों के लिये एक भयंकर परीक्षा थी। वे क्रूर शत्रुओं के बीच एक छोटे अनाथ परिवार की नाईं छोड़ दिए गए थे। तो अपनी मृत्यु से पहली रात हमारे उद्धारकर्ता ने किस महान प्रतिज्ञा से उन्हें ढाढ़स बँधाया? "मैं पिता से बिनती करूँगा, और वह तुम्हें एक और सहायक देगा, अर्थात् सत्य का आत्मा।" (यूहन्ना 14:16, 17।)

सुसमाचार का प्रचार करने के लिये प्रेरितों के भेजे जाने के विषय में आप क्या सोचते हैं? हम अन्यजातियों का सारा धार्मिक प्रकाश और ज्ञान उसी का ऋणी है। तो उन्हें यरूशलेम में ठहरकर "पिता की उस प्रतिज्ञा की बाट जोहनी" पड़ी। जब तक पिन्तेकुस्त के दिन वे "पवित्र आत्मा से परिपूर्ण" न हो गए, तब तक वे बाहर जाने के योग्य नहीं थे। (प्रेरितों के काम 1:4; 2:4।)

पवित्रशास्त्र के विषय में आप क्या सोचते हैं, जो हमारी शिक्षा के लिये लिखा गया है? आप जानते हैं कि सूर्य के बिना पृथ्वी बाइबल के बिना संसार का एक धुँधला-सा प्रतीक मात्र होती। तो हमें बताया गया है कि उस पवित्रशास्त्र के लिखे जाने में "भक्त जन पवित्र आत्मा के द्वारा उभारे जाकर बोलते थे।" (2 पतरस 1:21।) पौलुस कहता है, "जिन बातों को हम बोलते हैं, वे पवित्र आत्मा की सिखाई हुई बातों के शब्दों में बोलते हैं।" (1 कुरिन्थियों 2:13।)

उस सारी व्यवस्था-काल के विषय में आप क्या सोचते हैं जिसके अधीन हम मसीही जीवन बिताते हैं? आप जानते हैं कि उसके विशेषाधिकार यहूदियों के विशेषाधिकारों से उतने ही बढ़कर हैं जितना दोपहर का प्रकाश भोर की धुँधली रोशनी से बढ़कर होता है। तो हमें विशेष रूप से बताया गया है कि यह "आत्मा की सेवा" है। (2 कुरिन्थियों 3:8।)

मैं एक क्षण के लिये भी यह नहीं चाहूँगा कि कोई यह समझे कि मैं सोचता हूँ कि पुराने नियम के विश्वासियों के पास पवित्र आत्मा नहीं था। इसके विपरीत मेरा मानना है कि पवित्र आत्मा को छोड़ मनुष्यों में आत्मिक जीवन का कभी लेश भी नहीं रहा—और कि पवित्र आत्मा ने हाबिल और नूह को वह बनाया जो वे थे, उतना ही सचमुच जितना उसने पौलुस को बनाया। मैं केवल यह कहना चाहता हूँ कि पुराने नियम की अपेक्षा नए नियम के अधीन पवित्र आत्मा कहीं अधिक पूर्णता से प्रकट किया गया और अधिक भरपूरी से उँडेला गया है, इसलिये नए नियम की व्यवस्था को विशेष और अनोखे रूप से "आत्मा की सेवा" कहा गया है। दोनों व्यवस्थाओं का अन्तर केवल मात्रा का है।

मैं ये वचन अपने पाठकों के सामने निजी मनन के लिये रखता हूँ। अब मैं उस दूसरी सामान्य बात की ओर बढ़ता हूँ जिसे कहने की मैंने प्रतिज्ञा की थी।

तो मैं आपसे निवेदन करता हूँ कि ध्यान से देखें कि संसारी और अपरिवर्तित लोगों से भिन्न, व्यक्तिगत मसीहियों के पास जो कुछ है, वे जो कुछ हैं और जिसका वे आनन्द लेते हैं, वह सब वे परमेश्वर पवित्र आत्मा के कार्य के ऋणी हैं। उसी के द्वारा वे पहले बुलाए जाते हैं, जिलाए जाते हैं और जीवित किए जाते हैं। उसी के द्वारा वे नया जन्म पाते हैं और नई सृष्टि बनते हैं। उसी के द्वारा वे पाप के विषय में कायल किए जाते हैं, सब सत्य में मार्ग दिखाए जाते हैं और मसीह के पास लाए जाते हैं। उसी के द्वारा उन पर छुटकारे के दिन के लिये मुहर लगाई जाती है। वह उनमें अपने जीवित मन्दिरों के रूप में वास करता है। वह उनकी आत्माओं के साथ गवाही देता है—उन्हें लेपालकपन की आत्मा देता है, उनसे 'हे अब्बा, हे पिता' कहलवाता है, और उनके लिये मध्यस्थता की प्रार्थना करता है। उसी के द्वारा वे पवित्र किए जाते हैं। उसी के द्वारा परमेश्वर का प्रेम उनके हृदयों में उँडेला जाता है। उसी की सामर्थ्य से वे आशा में बढ़ते जाते हैं। उसी के द्वारा वे विश्वास से धार्मिकता की आशा की बाट जोहते हैं। उसी के द्वारा वे शरीर के कामों को मार डालते हैं। उसी के पीछे वे चलते हैं। उसी में वे जीवित हैं। एक शब्द में, विश्वासियों के पास अनुग्रह से लेकर महिमा तक जो कुछ है—विश्वास करने के पहले क्षण से उस दिन तक जब वे मसीह के साथ रहने को विदा होते हैं, वे जो कुछ हैं—सब, सब, सब परमेश्वर पवित्र आत्मा के कार्य में खोजा जा सकता है। (यूहन्ना 6:63; 3:8; 16:9, 10; इफिसियों 4:30; 1 कुरिन्थियों 6:19; रोमियों 8:15, 16, 26; 2 थिस्सलुनीकियों 2:13; रोमियों 5:5; 15:13; गलातियों 5:5, 25; रोमियों 8:1, 13।)

मैं अपने विषय के इस भाग पर और अधिक नहीं ठहर सकता। मुझे भरोसा है कि मैंने यह सिद्ध करने के लिये पर्याप्त कह दिया है कि जब मैंने पवित्रशास्त्र में परमेश्वर के आत्मा के कार्य को दिए गए महत्त्व की बात की, तो मैंने बिना अर्थ के शब्द नहीं कहे थे।

आगे बढ़ने से पहले मैं इस लेख के सब पढ़नेवालों से विनती करता हूँ कि वे निश्चय कर लें कि पवित्र आत्मा के कार्य के विषय में उनकी शिक्षा खरी है। उसके नाम का जो आदर उचित है वह उसे दीजिए। अपने धर्म में उसे वही स्थान और वही प्रतिष्ठा दीजिए जो पवित्रशास्त्र उसे देता है। अपने मन में यह बात पक्की कर लीजिए कि धन्य त्रिएकता के तीनों व्यक्तियों का कार्य हर बचाए हुए आत्मा के उद्धार के लिए पूर्णतः और समान रूप से आवश्यक है। पिता परमेश्वर का चुनाव और पुत्र परमेश्वर का प्रायश्चित का लहू हमारे विश्वास की नींव के पत्थर हैं। परन्तु इनसे पवित्र आत्मा परमेश्वर के लागू करनेवाले कार्य को कभी अलग नहीं करना चाहिए। पिता चुनता है। पुत्र मध्यस्थता करता है, क्षमा दिलाता है, धर्मी ठहराता है और मध्यस्थता की प्रार्थना करता है। पवित्र आत्मा इस सारे कार्य को मनुष्य की आत्मा पर लागू करता है। पवित्रशास्त्र में सदा एक साथ और कभी अलग नहीं, इसलिए त्रिएकता के तीनों व्यक्तियों के कार्यों को अपने मसीही जीवन में कभी फाड़कर अलग-अलग न होने दीजिए। जिसे परमेश्वर ने इतनी सुन्दरता से जोड़ा है उसे अलग करने का साहस कोई मनुष्य न करे।

"यदि पवित्र आत्मा परमेश्वर नहीं है तो उसकी ईश्वरीय आराधना करना मूर्तिपूजा है; और यदि वह परमेश्वर है तो उसे आराधना न देना घोर पाप है। इस विषय में भली-भाँति जानकारी रखना अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।"—हरियन, पवित्र आत्मा पर। 1731।

हर उस तथाकथित मसीही शिक्षा के विरुद्ध भाईचारे की यह चेतावनी स्वीकार कीजिए जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से पवित्र आत्मा के कार्य का अनादर करती है। एक ओर उस भ्रम से सावधान रहिए जो व्यवहार में पवित्र आत्मा के स्थान पर कलीसिया की सदस्यता और संस्कारों में भाग लेने को रख देता है। कोई आपको यह विश्वास न दिलाए कि बपतिस्मा लेना और प्रभु की मेज़ पर जाना इस बात का पक्का प्रमाण है कि आप में मसीह का आत्मा है। दूसरी ओर उस भ्रम से भी सावधान रहिए जो अभिमान के साथ तथाकथित भीतरी ज्योति को और पतन के बाद हर मनुष्य में बचे हुए विवेक के टुकड़ों को पवित्र आत्मा के उद्धार करनेवाले अनुग्रह के स्थान पर रख देता है। कोई आपको यह विश्वास न दिलाए कि मसीह के मरने के कारण सब स्त्री-पुरुषों में अपने आप ही मसीह का आत्मा है। मैं इन बातों को कोमलता से छूता हूँ। मुझे एक भी अनावश्यक विवाद का शब्द लिखने का खेद होगा। परन्तु आज के दिनों में जो कोई सच्चे मसीही जीवन को बहुमूल्य समझता है, उससे मैं कहता हूँ, "त्रिएकता के तीसरे व्यक्ति के वास्तविक कार्य और पद के विषय में बहुत सतर्क रहिए।" आत्माओं को परखिए कि वे परमेश्वर की ओर से हैं या नहीं। उन अनेक भिन्न-भिन्न और विचित्र शिक्षाओं को ध्यान से जाँचिए जो अब कलीसिया में फैल रही हैं। और आज जो विषय आपके सामने रखा गया है वह आपकी मुख्य कसौटियों में से एक हो। इन पिछले दिनों की हर नई शिक्षा को दो सरल प्रश्नों से परखिए। पहले पूछिए, "मेम्ना कहाँ है?" और फिर पूछिए, "पवित्र आत्मा कहाँ है?"

"विवेक की स्वाभाविक ज्योति, या वचन से सुधरी हुई वह ज्योति भी, किसी मनुष्य को परमेश्वर की ओर नहीं फेरती, यद्यपि अधिकतर मनुष्यों के धर्म के व्यावहारिक भाग का सबसे उत्तम स्रोत यही है। परन्तु यह विश्वास है, जो विवेक में नई ज्योति लाता है, और तब विवेक अपनी दीपक-ज्योति उस सूर्य से जलाता है जो पाप के विषय में दूसरे ही प्रकार से दीन करता है, लोगों को मसीह की ओर ले जाता है, पवित्र करता है, बदलता है और व्यवस्था को हृदय पर लिखता है। और आप पाएँगे कि अगस्तीन और पेलेगियस के अनुयायियों तथा अर्ध-पेलेगियसवादियों के बीच यही भेद है, जिसे उसके उनके विरुद्ध लिखे सारे लेखों की पूरी धारा प्रकट करती है। वे चाहते थे कि लोगों में विवेक की स्वाभाविक ज्योति और स्वाभाविक गुणों के बीज (जैसे दार्शनिकों में) वचन के प्रकाशन से सुधरकर वही अनुग्रह ठहरें जिसकी चर्चा पवित्रशास्त्र करता है। वह उनके सब गुणों और स्वाभाविक ज्योति के उनके प्रयोग को पाप घोषित करता है, क्योंकि उनमें पवित्रता की कमी है, और वह हमारे लिए न केवल विश्वास के विषयों का प्रकाशन आवश्यक ठहराता है, जिसे स्वाभाविक ज्योति अन्यथा खोज नहीं सकती थी, वरन् उन्हें देखने के लिए एक नई ज्योति भी।"—थॉमस गुडविन, पवित्र आत्मा के कार्य पर। 1704।

II. जिस दूसरी बात पर मैं विचार करना चाहता हूँ, वह मनुष्य के उद्धार के लिए पवित्र आत्मा के कार्य की आवश्यकता है।

मैं इस भाग की ओर विशेष ध्यान दिलाता हूँ। हमारे मन में यह बात पक्की हो जाए कि जिस विषय पर हम इस लेख में विचार कर रहे हैं वह धर्म का कोई केवल अनुमान पर टिका प्रश्न नहीं है, जिसमें हम क्या विश्वास करते हैं इसका कोई महत्त्व न हो। इसके विपरीत, यह उद्धार देनेवाले सारे मसीही जीवन की नींव में ही है। पवित्र आत्मा और उसके कार्यों के विषय में हम चूके, तो हम अनन्तकाल तक चूक गए!

पवित्र आत्मा के कार्य की आवश्यकता मानव स्वभाव की पूर्ण भ्रष्टता से उत्पन्न होती है। हम सब स्वभाव से "अपने पापों में मरे हुए" हैं। (इफिसियों 2:1।) इस संसार की बातों में हम चाहे कितने ही चतुर, होशियार और बुद्धिमान हों, परमेश्वर की ओर से हम सब मरे हुए हैं। हमारी समझ की आँखें अन्धी हैं। हम कुछ भी ठीक नहीं देखते। हमारी इच्छाएँ, भावनाएँ और झुकाव उस से दूर हो गए हैं जिसने हमें बनाया। "शारीरिक मन परमेश्वर से बैर रखता है।" (रोमियों 8:7।) स्वभाव से हम में न विश्वास है, न भय, न प्रेम, न पवित्रता। संक्षेप में, यदि हम अपने ही भरोसे छोड़ दिए जाएँ तो हमारा उद्धार कभी न होगा।

पवित्र आत्मा के बिना कोई भी मनुष्य कभी परमेश्वर की ओर नहीं फिरता, मन फिराव नहीं करता, विश्वास नहीं करता और आज्ञा नहीं मानता। केवल बौद्धिक प्रशिक्षण और सांसारिक शिक्षा से कोई सच्चा मसीही नहीं बनता। ललित कलाओं और विज्ञान की जानकारी किसी को स्वर्ग नहीं पहुँचाती। चित्रों और मूर्तियों ने कभी एक भी आत्मा को परमेश्वर तक नहीं पहुँचाया। "कला के कोमल स्पर्श" ने किसी भी स्त्री या पुरुष को न्याय के दिन के लिए तैयार नहीं किया। वे टूटे हुए मन पर पट्टी नहीं बाँधते; वे घायल विवेक को चंगा नहीं करते। यूनानियों के पास ज़ेउक्सिस और पारहेसियस, फ़ीदियास और प्राक्सितेलीस थे, जो अपने समय में उतने ही महान गुरु थे जितने आधुनिक काल में कोई भी हों; फिर भी यूनानी परमेश्वर के साथ मेल-मिलाप के मार्ग के विषय में कुछ नहीं जानते थे। वे घोर मूर्तिपूजा में डूबे हुए थे और अपने ही हाथों की बनाई वस्तुओं के सामने दण्डवत् करते थे। केवल सेवकों के अत्यन्त उत्साहपूर्ण प्रयास भी लोगों को मसीही नहीं बना सकते। पवित्रशास्त्र पर आधारित सबसे सक्षम तर्क का मन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता; वेदी से दिया गया अत्यन्त उत्साही वाक्पटु उपदेश भी हृदय को नहीं हिलाएगा; अकेला नग्न सत्य इच्छा को नहीं चला सकता। हम जो सेवक हैं, इसे दुःखद अनुभव से भली-भाँति जानते हैं। हम लोगों को जीवन के जल का सोता दिखा सकते हैं—परन्तु उन्हें पिला नहीं सकते। हम बहुतों को वर्ष-दर-वर्ष अपने मंच के नीचे बैठे और सुसमाचार के सत्य से भरे सैकड़ों उपदेश सुनते हुए देखते हैं, पर उसका रत्ती भर परिणाम नहीं होता। हम उसे वर्ष-दर-वर्ष देखते हैं, पवित्रशास्त्र के हर तर्क से अप्रभावित और अडिग—उन पत्थरों के समान ठंडा जिन पर वह हमारे गिरजाघर में प्रवेश करते समय चलता है, उस संगमरमर की मूर्ति के समान अविचल जो दीवार के सहारे बनी कब्र को सुशोभित करती है—उस पुराने सूखे बलूत के समान मृत जिससे उसकी बैठने की बेंच बनी है, उन रंगीन काँचों के समान संवेदनहीन जिनमें से होकर सूर्य का प्रकाश उसके सिर पर पड़ता है। हम उसे आश्चर्य और शोक से देखते हैं, और ज़ेवियर के वे शब्द स्मरण करते हैं जो उसने चीन को देखकर कहे थे, "हे चट्टान, चट्टान! तू कब खुलेगी?" और ऐसे उदाहरणों से हम सीखते हैं कि हृदय में एक नया स्वभाव, एक नया सिद्धान्त और ऊपर से आया हुआ दिव्य बीज बोए जाने के सिवाय कोई और बात किसी को मसीही नहीं बना सकती।

तो मनुष्य को किस बात की आवश्यकता है? हमें "नया जन्म" लेने की आवश्यकता है, और यह नया जन्म हमें पवित्र आत्मा से प्राप्त करना है। जीवन के आत्मा को हमें जिलाना होगा। आत्मा को हमें नया करना होगा। आत्मा को हमारा पत्थर का हृदय निकालना होगा। आत्मा को हम में माँस का हृदय रखना होगा। सृष्टि का एक नया कार्य होना अवश्य है। एक नया प्राणी अस्तित्व में बुलाया जाना है। इन सब के बिना हमारा उद्धार नहीं हो सकता। पवित्र आत्मा की हमारी आवश्यकता का मुख्य भाग यहीं निहित है। "जब तक कोई नये सिरे से न जन्मे तब तक परमेश्वर का राज्य देख नहीं सकता।" (यूहन्ना 3:3।) नये जन्म के बिना कोई उद्धार नहीं!

"यही बात सुसमाचार की सेवकाई को उसकी महिमा और उसकी प्रभावशीलता दोनों देती है। सुसमाचार से आत्मा को हटा दो, तो तुम उसे मृत अक्षर बना देते हो, और नया नियम मसीहियों के लिए उससे अधिक काम का नहीं रहता जितना पुराना नियम यहूदियों के लिए है।"—ओवेन, पवित्र आत्मा पर।

"परमेश्वर को जानने और उसे प्रसन्न करने की समस्त सामर्थ्य पवित्र आत्मा की शक्ति में निहित है। वही अपने गुप्त कार्य से मन को शुद्ध करता है। वही मन को प्रकाशित करता है कि वह सर्वशक्तिमान परमेश्वर के विषय में योग्य विचार कर सके।"— होमिली

आइए हम अपने मन से यह प्रचलित धारणा सदा के लिए निकाल दें कि स्वाभाविक धर्मशास्त्र, नैतिक समझाइश, तर्कसंगत दलीलें, या सुसमाचार के सत्य का प्रदर्शन भी, पापी पर एक बार लागू होने पर उसे उसके पापों से फेरने के लिए अपने आप में पर्याप्त हैं। यह एक बड़ा भ्रम है। वे ऐसा नहीं करेंगे। मनुष्य का हृदय हमारी कल्पना से कहीं अधिक कठोर है—'पुराना आदम' हमारे अनुमान से कहीं अधिक बलवान है। जो जहाज़ आधे भाटे में रेत पर चढ़ जाते हैं, वे ज्वार चढ़ने तक नहीं हिलते—मनुष्य का हृदय भी तब तक मसीह की ओर नहीं देखेगा, मन फिराव नहीं करेगा और विश्वास नहीं करेगा जब तक पवित्र आत्मा उस पर नहीं उतरता। जब तक ऐसा नहीं होता, हमारा भीतरी स्वभाव उस पृथ्वी के समान है जैसी वह वर्तमान सृष्टि-क्रम के आरम्भ से पहले थी, "बेडौल और सुनसान, और गहरे जल के ऊपर अन्धियारा।" (उत्पत्ति 1:2।) जिस सामर्थ्य ने आरम्भ में कहा, "उजियाला हो—और उजियाला हो गया," उसी को हम में सृजन का कार्य करना होगा, नहीं तो हम कभी नये जीवन में नहीं उठेंगे।

परन्तु मुझे अपने विषय की इस शाखा पर अभी कुछ और कहना है। मनुष्य के उद्धार के लिए आत्मा के कार्य की आवश्यकता एक विस्तृत क्षेत्र है, और इस पर मुझे एक और बात कहनी है।

इसलिए मैं कहता हूँ कि पवित्र आत्मा के कार्य के बिना कोई भी मनुष्य आने वाले जगत में परमेश्वर के साथ रहने के योग्य कभी नहीं हो सकता। किसी न किसी प्रकार की योग्यता हम में होनी आवश्यक है। केवल हमारे पापों की क्षमा एक व्यर्थ दान होता, यदि उसके साथ नये स्वभाव का दान न होता, ऐसा स्वभाव जो स्वयं परमेश्वर के स्वभाव के साथ मेल और सुर में हो। हमें स्वर्ग के अधिकार के साथ-साथ स्वर्ग के योग्य होने की भी आवश्यकता है, और यह योग्यता हमें पवित्र आत्मा से प्राप्त करनी है। पवित्र आत्मा के भीतर वास करने से हमें "ईश्वरीय स्वभाव के सहभागी" बनाया जाना है। (2 पतरस 1:4।) आत्मा को हमारे शारीरिक स्वभाव को पवित्र करना होगा और उन्हें आत्मिक बातों से प्रेम करना सिखाना होगा। आत्मा को हमारे मनों को नीचे की वस्तुओं से छुड़ाकर ऊपर की वस्तुओं में लगाना सिखाना होगा। आत्मा को हमारी हठीली इच्छाओं को झुकाना होगा और उन्हें परमेश्वर की इच्छा के अधीन होना सिखाना होगा। आत्मा को हमारे भीतरी मनुष्य पर परमेश्वर की व्यवस्था फिर से लिखनी होगी और अपना भय हमारे भीतर रखना होगा। आत्मा को हमारे मन के प्रतिदिन नये होने के द्वारा हमें बदलना होगा और हम में उसके स्वरूप को रोपना होगा जिसके सेवक होने का हम दावा करते हैं। पवित्र आत्मा के कार्य की हमारी आवश्यकता का दूसरा बड़ा भाग यहीं निहित है। हमें धर्मी ठहराए जाने के साथ-साथ पवित्रीकरण की भी उतनी ही आवश्यकता है, "बिना पवित्रता के कोई प्रभु को न देखेगा।" (इब्रानियों 12:14।)

मैं अपने पाठकों से एक बार फिर विनती करता हूँ कि वे अपने मन से उस प्रचलित धारणा को निकाल दें कि परमेश्वर से भेंट करने की तैयारी के लिए स्त्री-पुरुषों को केवल क्षमा और पापमोचन की आवश्यकता है। यह एक प्रबल भ्रम है, और मैं अपने पूरे मन से चाहता हूँ कि आप इससे सावधान रहें। जैसा कि बहुत-से अज्ञानी मसीही अपनी मृत्यु-शय्या पर मान लेते हैं कि यदि परमेश्वर "हमारे पाप क्षमा करके हमें विश्राम में ले जाए," तो वह पर्याप्त है, वह पर्याप्त नहीं है। मैं फिर पूरे ज़ोर से कहता हूँ, यह पर्याप्त नहीं है। पाप का दोष हटाया जाना ही काफ़ी नहीं, पाप का प्रेम भी हमसे दूर किया जाना चाहिए; परमेश्वर के न्याय का भय दूर किया जाना ही काफ़ी नहीं, परमेश्वर को प्रसन्न करने की इच्छा भी हममें डाली जानी चाहिए; दण्ड का भय दूर किया जाना ही काफ़ी नहीं, पवित्रता के प्रति प्रेम भी हममें रोपा जाना चाहिए। यदि हम नए हृदय के बिना स्वर्ग में प्रवेश करें, तो स्वयं स्वर्ग भी हमारे लिए स्वर्ग न रहेगा।

अनन्त विश्रामदिन और पवित्र लोगों तथा स्वर्गदूतों की संगति हमें स्वर्ग में कोई सुख नहीं दे सकती, जब तक कि विश्रामदिनों और पवित्र संगति का प्रेम पहले पृथ्वी पर हमारे हृदयों में उण्डेला न गया हो। चाहे लोग सुनें या न सुनें, जो मनुष्य स्वर्ग में प्रवेश करता है, उसमें आत्मा का पवित्रीकरण होना चाहिए, और साथ ही यीशु मसीह के लहू का छिड़काव भी। ओवेन के शब्दों में, "जब परमेश्वर ने पतित मनुष्य को पुनः प्राप्त करने और पापियों का उद्धार करने का महान और महिमामय कार्य ठहराया, तो उसने अपनी अनन्त बुद्धि से दो बड़े साधन नियुक्त किए। एक था अपने पुत्र को उनके लिए देना; और दूसरा था अपनी आत्मा को उन्हें देना। और इस प्रकार सारी धन्य त्रिएकता की महिमा के प्रकट होने का मार्ग तैयार हुआ।"

"पिता परमेश्वर के पास देने के लिए केवल दो ही बड़े दान थे; और जब वे दे दिए गए, तो उसके पास (तुलनात्मक रूप से) कोई बड़ी वस्तु देने को न बची, क्योंकि उनमें सब भलाई समाई हुई थी। ये दो दान थे उसका पुत्र, जो पुराने नियम में उसकी प्रतिज्ञा था, और आत्मा, जो नए नियम की प्रतिज्ञा है।"—थॉमस गुडविन, पवित्र आत्मा के कार्य पर। 1704।

मुझे आशा है कि मैंने मनुष्य की आत्मा के उद्धार के लिए पवित्र आत्मा के कार्य की पूर्ण आवश्यकता दिखाने के लिए पर्याप्त कह दिया है। आत्मा के बिना मनुष्य की परमेश्वर की ओर फिरने की पूर्ण असमर्थता, और आत्मा के बिना मनुष्य की स्वर्ग के आनन्दों के लिए पूर्ण अयोग्यता—ये प्रकाशित धर्म की दो बड़ी नींव की शिलाएँ हैं, जो सदा एक मसीही के मन में गहरी जमी रहनी चाहिए। भली-भाँति समझी जाएँ तो वे एक ही निष्कर्ष की ओर ले जाती हैं: "आत्मा के बिना कोई उद्धार नहीं!"

क्या आप जानना चाहेंगे कि हम जो सुसमाचार का प्रचार करते हैं, इतनी बार मन-परिवर्तन के विषय में क्यों प्रचार करते हैं? हम ऐसा मनुष्यों की आत्माओं की आवश्यकताओं के कारण करते हैं। हम ऐसा इसलिए करते हैं कि हम परमेश्वर के वचन से स्पष्ट देखते हैं कि हृदय के पूर्ण परिवर्तन से कम कुछ भी आपकी आवश्यकता को कभी पूरा नहीं करेगा। आपकी दशा स्वभाव से ही निराशाजनक है। आपका संकट बड़ा है। आपको केवल यीशु मसीह के प्रायश्चित की ही नहीं—वरन् पवित्र आत्मा के जिलानेवाले और पवित्र करनेवाले कार्य की भी आवश्यकता है, कि वह आपको सच्चा मसीही बनाए और नरक से छुड़ाए। मैं आनन्द से उन सब को स्वर्ग पहुँचाता जो इस पुस्तक को पढ़ते हैं! मेरे हृदय की इच्छा और परमेश्वर से मेरी प्रार्थना है कि आप उद्धार पाएँ। परन्तु मैं जानता हूँ कि कोई भी स्वर्ग में प्रवेश नहीं करता जिसके पास स्वर्ग का आनन्द लेने वाला हृदय न हो, और यह हृदय हमें परमेश्वर की आत्मा से ही प्राप्त करना है।

क्या मैं आपको साफ़-साफ़ बताऊँ कि कुछ लोग इन सत्यों को इतने ठण्डे मन से क्यों ग्रहण करते हैं और उनसे इतने कम प्रभावित क्यों होते हैं? आप हमें उदासीन और बेपरवाह होकर सुनते हैं। आप सोचते हैं कि हम अपने कथनों में अति और अत्युक्ति करते हैं। और ऐसा क्यों है? केवल इसलिए कि आप अपनी ही आत्मा के रोग को न देखते हैं न जानते हैं। आप अपनी पापमयता और दुर्बलता से अनजान हैं। अपने आत्मिक रोग के विषय में तुच्छ और अपर्याप्त विचार निश्चय ही सुसमाचार में दिए गए उपचार के विषय में भी तुच्छ और अपर्याप्त विचारों के साथ चलते हैं। मैं आपसे क्या कहूँ? मैं केवल इतना कह सकता हूँ, "प्रभु आपको जगाए! प्रभु आपकी आत्मा पर दया करे!" वह दिन आ सकता है जब आपकी आँखों से पपड़ियाँ गिर जाएँगी, जब पुरानी बातें जाती रहेंगी और सब कुछ नया हो जाएगा। और उस दिन मैं निश्चय के साथ आपको पहले से बताता और चेतावनी देता हूँ कि मसीह के कार्य के बाद, पहला सत्य जो आप पकड़ेंगे वह पवित्र आत्मा के कार्य की पूर्ण आवश्यकता होगी।

III. तीसरी बात जिस पर मैं विचार करना चाहता हूँ, वह उस रीति की है जिससे पवित्र आत्मा उद्धार पानेवालों के हृदयों में कार्य करता है।

मैं अपने विषय की इस शाखा के पास बड़ी कठिनाई के साथ आता हूँ। मैं भली-भाँति जानता हूँ कि यह कठिनाइयों से घिरी है और इसमें परमेश्वर की अनेक अत्यन्त गहरी बातें सम्मिलित हैं। परन्तु नश्वर मनुष्य के लिए मसीही धर्म के किसी सत्य से केवल कठिनाइयों के कारण मुँह फेर लेना मूर्खता है। हज़ार गुना अच्छा है कि जिसे हम पूरी तरह समझा नहीं सकते उसे नम्रता से ग्रहण करें, और विश्वास करें कि जो हम अभी नहीं जानते वह आगे जान जाएँगे। एक पुराने धर्मवेत्ता ने कहा है, "हमारे लिए यही बहुत है कि हम परमेश्वर के दरबार में बैठें, और परमेश्वर की मंत्रणा में सहभागी होने का ढोंग न करें।"

पवित्र आत्मा के कार्य करने की रीति के विषय में बोलते हुए मैं केवल कुछ प्रमुख बड़े तथ्यों को रखूँगा। ये ऐसे तथ्य हैं जिन्हें पवित्रशास्त्र और अनुभव दोनों प्रमाणित करते हैं। ये ऐसे तथ्य हैं जो हर निष्पक्ष और सुशिक्षित दर्शक की आँखों के सामने प्रत्यक्ष हैं। ये ऐसे तथ्य हैं जिनका खण्डन करना, मेरा विश्वास है, असम्भव है।

(क) तो मैं कहता हूँ कि पवित्र आत्मा मनुष्य के हृदय में रहस्यमय रीति से कार्य करता है। हमारे प्रभु यीशु मसीह ने स्वयं इन सुप्रसिद्ध शब्दों में हमें यह बताया है, "हवा जिधर चाहती है उधर बहती है, और तू उसका शब्द सुनता है, परन्तु नहीं जानता कि वह कहाँ से आती और कहाँ को जाती है; जो कोई आत्मा से जन्मा है वह ऐसा ही है।" (यूहन्ना 3:8।) हम यह नहीं समझा सकते कि सर्वशक्तिमान आत्मा किस प्रकार और किस रीति से मनुष्य में आता और उस पर कार्य करता है; परन्तु हम उन हज़ारों बातों को भी नहीं समझा सकते जो प्राकृतिक जगत में निरन्तर घटित होती रहती हैं। हम यह नहीं समझा सकते कि हमारी इच्छाएँ प्रतिदिन हमारे शरीर के अंगों पर कैसे कार्य करती हैं, और उन्हें हमारे विवेक के अनुसार चलाती, हिलाती या विश्राम कराती हैं; फिर भी इस तथ्य पर कोई विवाद करने की सोचता तक नहीं। आत्मा के कार्य के विषय में भी ऐसा ही होना चाहिए। हमें इस तथ्य पर विश्वास करना चाहिए, चाहे हम रीति को न समझा सकें।

(ख) मैं यह भी कहता हूँ कि पवित्र आत्मा मनुष्य के हृदय में अपनी सर्वसत्ता के अनुसार कार्य करता है। वह एक के पास आता है और दूसरे के पास नहीं आता। वह प्रायः एक परिवार में से एक को मन फिराव देता है, जबकि दूसरे जैसे के तैसे छोड़ दिए जाते हैं। कलवरी पर हमारे प्रभु यीशु मसीह के साथ दो चोर क्रूस पर चढ़ाए गए थे। उन्होंने उसी उद्धारकर्ता को मरते देखा और उसके होठों से निकले वही वचन सुने। फिर भी केवल एक ने मन फिराया और परादीस में गया, जबकि दूसरा अपने पापों में मर गया। स्तिफनुस की हत्या में हाथ बँटानेवाले शाऊल के सिवा और भी बहुत से फरीसी थे; परन्तु प्रेरित केवल शाऊल ही बना। जॉन न्यूटन के समय में दास-व्यापारी जहाज़ों के बहुत से कप्तान थे; फिर भी सुसमाचार का प्रचारक उसके सिवा कोई न बना। हम इसका कारण नहीं बता सकते। परन्तु हम इसका भी कारण नहीं बता सकते कि

चीन क्यों अन्यजातियों का देश है और इंग्लैंड क्यों मसीही देश—हम केवल इतना जानते हैं कि ऐसा ही है।

(ग) मैं यह भी कहता हूँ कि पवित्र आत्मा मनुष्य के हृदय में सदा इस रीति से कार्य करता है कि वह अनुभव किया जाए। मैं एक क्षण के लिए भी यह नहीं कहता कि जो भावनाएँ वह उत्पन्न करता है, उन्हें वह मनुष्य जिसमें वे उत्पन्न होती हैं सदा समझ भी लेता है। इसके विपरीत, वे प्रायः चिन्ता, संघर्ष और भीतरी कलह का कारण होती हैं। मैं केवल इतना कहता हूँ कि पवित्रशास्त्र में हमें यह मानने का कोई आधार नहीं मिलता कि आत्मा का ऐसा वास भी होता है जो बिलकुल अनुभव न हो। जहाँ वह है, वहाँ उसके अनुरूप भावनाएँ सदा होंगी।

(घ) मैं यह भी कहता हूँ कि पवित्र आत्मा मनुष्य के हृदय में सदा इस रीति से कार्य करता है कि वह उस मनुष्य के जीवन में दिखाई दे। मैं यह नहीं कहता कि जैसे ही वह किसी मनुष्य में आता है, वह मनुष्य तुरन्त एक सुदृढ़ मसीही बन जाता है, ऐसा मसीही जिसके जीवन और चाल-चलन में आत्मिकता के सिवा कुछ दिखाई ही न दे। परन्तु मैं यह अवश्य कहता हूँ कि सर्वशक्तिमान आत्मा किसी मनुष्य की आत्मा में उपस्थित हो और उसके आचरण में कोई दिखाई देनेवाला फल उत्पन्न न करे—ऐसा कभी नहीं होता! वह कभी सोता नहीं—वह कभी निष्क्रिय नहीं रहता। "सुप्त अनुग्रह" की बात करने का पवित्रशास्त्र में हमें कोई आधार नहीं है। "जो कोई परमेश्वर से जन्मा है वह पाप नहीं करता, क्योंकि उसका बीज उसमें बना रहता है।" (1 यूहन्ना 3:9)। जहाँ पवित्र आत्मा है, वहाँ कुछ न कुछ दिखाई देगा।

(ङ) मैं यह भी कहता हूँ कि पवित्र आत्मा मनुष्य के हृदय में अप्रतिरोध्य रीति से कार्य करता है। मैं एक क्षण के लिए भी इससे इनकार नहीं करता कि अपरिवर्तित लोगों के मन में कभी-कभी आत्मिक संघर्ष और विवेक की हलचल होती है, जो अन्त में कुछ नहीं बनती। परन्तु मैं निश्चय के साथ कहता हूँ कि जब आत्मा सचमुच मन फिराव का कार्य आरम्भ करता है, तो वह उस कार्य को सदा पूर्णता तक पहुँचाता है। वह आश्चर्यजनक परिवर्तन करता है। वह चरित्र को उलट-पलट देता है। वह पुरानी बातों को जाता रहने देता है और सब कुछ नया कर देता है। एक शब्द में, पवित्र आत्मा सर्वशक्तिमान है। उसके लिए कुछ भी असम्भव नहीं।

(च) अन्त में, इसी विषय के अन्तर्गत मैं यह कहता हूँ कि पवित्र आत्मा सामान्यतः साधनों के उपयोग के द्वारा मनुष्य के हृदय में कार्य करता है। परमेश्वर का वचन, चाहे प्रचार किया जाए या पढ़ा जाए, सामान्यतः किसी आत्मा के मन फिराव में उसका साधन होता है। वह उस वचन को विवेक पर लागू करता है—वह उस वचन को मन तक पहुँचाता है। यही उसकी सामान्य कार्य-पद्धति है। निस्सन्देह ऐसे उदाहरण भी हैं जिनमें लोग "वचन के बिना" मन फिराते हैं। (1 पतरस 3:1)। परन्तु सामान्य नियम के रूप में परमेश्वर का सत्य आत्मा की तलवार है। उसी के द्वारा वह सिखाता है, और जो वचन में लिखा है उसके सिवा और कुछ नहीं सिखाता।

मैं इन छः बातों को अपने सब पाठकों के ध्यान के लिए प्रस्तुत करता हूँ। इन्हें ठीक-ठीक समझना उन अनेक झूठे और बनावटी सिद्धान्तों का सर्वोत्तम उपचार है जिनके द्वारा शैतान आत्मा के धन्य कार्य को धुँधला करने का यत्न करता है।

(क) क्या इस लेख को पढ़नेवाला कोई घमण्डी, ऊँचे मनवाला व्यक्ति है, जो अपनी बुद्धि के अभिमान में पवित्र आत्मा के कार्य को उसके रहस्यमय और सर्वसत्ता-सम्पन्न होने के कारण अस्वीकार करता है? मैं तुझसे साहसपूर्वक कहता हूँ कि हमारे सिद्धान्त का विरोध और खण्डन करने से पहले तुझे इसके सिवा कोई और आधार लेना होगा। अपने ऊपर के आकाश और अपने नीचे की पृथ्वी को देख, और यदि कर सके तो इनकार कर कि वहाँ रहस्य हैं। जिस संसार में तू रहता है उसके मानचित्र को देख, और एक जाति तथा दूसरी जाति के विशेषाधिकारों में जो अद्भुत भेद है उसे देख, और यदि कर सके तो इनकार कर कि वहाँ सर्वसत्ता है। जा और संगत होना सीख। अपने उस अभिमानी मन को स्पष्ट, अकाट्य तथ्यों के आगे झुका। उस दीनता को धारण कर जो नश्वर और दीन मनुष्य को शोभा देती है। तर्क का वह दिखावा उतार फेंक जिसके नीचे तू अब अपने विवेक का गला घोंटने का यत्न करता है। यह मानने का साहस कर कि आत्मा का कार्य रहस्यमय और सर्वसत्ता-सम्पन्न हो सकता है, और फिर भी वह सत्य है।

(ख) क्या इस लेख को पढ़नेवाला कोई रोमन कैथोलिक, या अर्ध-रोमन कैथोलिक है, जो अपने को यह समझाने का यत्न करता है कि सब बपतिस्मा-प्राप्त लोगों और कलीसिया के सदस्यों में स्वभावतः आत्मा होता ही है? मैं तुझसे स्पष्ट कहता हूँ कि यदि तू यह स्वप्न देखता है कि किसी मनुष्य में आत्मा है जबकि उसकी उपस्थिति दिखाई ही नहीं देती, तो तू अपने आपको धोखा दे रहा है। आज यह सीख ले कि पवित्र आत्मा की उपस्थिति की परख पंजिका में लिखे नाम से, या पारिवारिक बेंच में बैठने के स्थान से नहीं, बल्कि मनुष्य के जीवन में दिखाई देनेवाले फलों से होती है।

(ग) क्या इस लेख को पढ़नेवाला कोई संसारी मनुष्य है, जो आत्मा के वास के सब दावों को निरी उमंग और कट्टरता समझता है? मैं तुझे भी चेतावनी देता हूँ कि सावधान रह कि तू क्या कर रहा है। इसमें सन्देह नहीं कि कलीसियाओं में कपट और झूठे दावे बहुत हैं; इसमें सन्देह नहीं कि हज़ारों ऐसे हैं जिनकी धार्मिक भावनाएँ केवल भ्रम हैं। परन्तु नकली सिक्का इस बात का प्रमाण नहीं कि खरा सिक्का होता ही नहीं—किसी वस्तु का दुरुपयोग उसकी उपयोगिता को नष्ट नहीं करता। बाइबल हमें स्पष्ट बताती है कि कुछ आशाएँ, आनन्द, शोक और भीतरी भावनाएँ ऐसी हैं जो परमेश्वर के आत्मा के कार्य से अलग नहीं की जा सकतीं। आज यह सीख ले कि यदि तेरे भीतर उसकी उपस्थिति का अनुभव नहीं हुआ, तो तूने आत्मा को प्राप्त नहीं किया।

(घ) क्या इस लेख को पढ़नेवाला कोई बहाने बनानेवाला आलसी व्यक्ति है, जो यह सोचकर अपने आपको सान्त्वना देता है कि दृढ़ मसीही जीवन असम्भव बात है और इस जैसे संसार में वह मसीह की सेवा नहीं कर सकता? तुम्हारे बहाने तुम्हारे कुछ काम न आएँगे। पवित्र आत्मा की सामर्थ्य तुम्हें बिना मोल और बिना दाम दी जाती है। आज ही जाकर सीखो कि माँगने से ही बल मिल सकता है। उस आत्मा के द्वारा, जिसे प्रभु यीशु तुम्हें देने को तैयार है, सब कठिनाइयों पर जय पाई जा सकती है।

(ङ) क्या इस लेख को पढ़नेवाला कोई उन्मादी है, जो यह समझता है कि मनुष्य घर में रहे या कलीसिया में जाए, इससे कुछ अन्तर नहीं पड़ता, और यदि किसी का उद्धार होना है तो वह अपनी इच्छा के विरुद्ध भी हो ही जाएगा? मैं तुमसे भी आज कहता हूँ कि तुम्हें अभी बहुत कुछ सीखना है। जाकर सीखो कि पवित्र आत्मा साधारणतः अनुग्रह के साधनों के उपयोग के द्वारा कार्य करता है, और यह कि विश्वास सामान्यतः "सुनने" से ही आत्मा में आता है।" (रोमियों 10:17।)

मैं अपने विषय की इस शाखा को यहीं छोड़कर आगे बढ़ता हूँ। इसे मैं इस दुःखद प्रतीति के साथ छोड़ता हूँ कि धर्म में और कोई बात स्वाभाविक मनुष्य के अन्धेपन को इतना प्रकट नहीं करती जितना पवित्र आत्मा के कार्य करने की रीति के विषय में पवित्रशास्त्र की शिक्षा को ग्रहण करने में उसकी असमर्थता। हमारे दिव्य स्वामी के वचन को उद्धृत करें तो, "संसार उसे ग्रहण नहीं कर सकता।" (यूहन्ना 14:17।) एम्ब्रोस सर्ल के शब्दों में, "आत्मा का यह कार्य उन लोगों के लिए, जिन्होंने इसे अपने भीतर अनुभव नहीं किया, सदा से एक समझ से परे की बात रहा है और रहेगा। नीकुदेमुस और इस्राएल के अन्य गुरुओं के समान वे तर्क पर तर्क करते रहेंगे, जब तक कि अज्ञानता की बातों से युक्ति को धुँधला करके अपने आपको उलझन में न डाल लें; और जब वे बात को समझ नहीं पाते, तो झुँझलाने, बकझक करने, कठोर नाम धरने और अन्त में यह कहने के द्वारा कि ऐसी कोई वस्तु है ही नहीं, इस बात का सबसे पक्का प्रमाण दे देते हैं कि वे उसके विषय में कुछ नहीं जानते।"

IV. अन्त में मैं उन चिह्नों और प्रमाणों पर विचार करना चाहता हूँ जिनसे मनुष्य के हृदय में पवित्र आत्मा की उपस्थिति पहचानी जा सकती है।

यद्यपि यह बात क्रम में अन्तिम आती है, फिर भी महत्त्व में यह किसी प्रकार अन्तिम नहीं है। वास्तव में पवित्र आत्मा का यही पक्ष है जिस पर हर मसीही कहलानेवाले को सबसे अधिक ध्यान देना चाहिए। हम देख चुके हैं कि बाइबल में पवित्र आत्मा का क्या स्थान है। हम देख चुके हैं कि मनुष्य के उद्धार के लिए पवित्र आत्मा कितना अनिवार्य है। हम देख चुके हैं कि पवित्र आत्मा किस रीति से कार्य करता है। और अब वह महान प्रश्न आता है, जो हर पाठक के लिए रुचिकर होना चाहिए, "हम कैसे जानें कि हम पवित्र आत्मा के सहभागी हैं या नहीं? किन चिह्नों से हम पता लगा सकते हैं कि हममें मसीह का आत्मा है?"

मैं पहले यह मानकर चलता हूँ कि जो प्रश्न मैंने अभी पूछा है, उसका उत्तर दिया जा सकता है। यदि हम यह पता ही न लगा सकें कि हम स्वर्ग के मार्ग पर हैं या नहीं, तो हमारी बाइबलों का क्या उपयोग? हमारे मसीही विश्वास में यह एक स्थिर सिद्धान्त रहे कि मनुष्य जान सकता है कि उसमें पवित्र आत्मा है या नहीं। आत्मा की उपस्थिति के जिन अनेक पवित्रशास्त्र-विरुद्ध प्रमाणों से हज़ारों लोग अपने को सन्तुष्ट कर लेते हैं, उन्हें हम अपने मन से सदा के लिए निकाल दें। संस्कारों को ग्रहण करना और दृश्य कलीसिया का सदस्य होना इस बात का कोई प्रमाण नहीं कि हममें "मसीह का आत्मा" है। संक्षेप में, जब तक मनुष्य पाप और संसार की सेवा करता है, तब तक उसके विषय में यह कहना कि उसमें पवित्र आत्मा है, घोर अनैतिकतावाद की ओर जाने का छोटा मार्ग है।

मनुष्य के हृदय में पवित्र आत्मा की उपस्थिति केवल उन फलों और प्रभावों से जानी जा सकती है जिन्हें वह उत्पन्न करता है। यद्यपि उसका कार्य रहस्यमय है और नश्वर आँख से अदृश्य है, तथापि वह सदा कुछ दिखाई देनेवाले और ठोस परिणामों तक पहुँचाता है। जैसे तुम कुतुबनुमा की सुई के उत्तर की ओर घूमने से जान लेते हो कि वह चुम्बकित है—जैसे तुम किसी वृक्ष में रस, कलियों, पत्तों और फलों से जान लेते हो कि उसमें जीवन है—जैसे तुम किसी जहाज़ के स्थिर और नियमित मार्ग पर चलने से जान लेते हो कि उस पर कोई खेनेवाला है—वैसे ही तुम किसी मनुष्य के हृदय में आत्मा की उपस्थिति को उस प्रभाव से जान सकते हो जो वह उसके विचारों, भावनाओं, मतों, आदतों और जीवन पर डालता है। मैं इसे खुले शब्दों में और बिना झिझक कहता हूँ। इसके सिवा मुझे खड़े होने के लिए कोई सुरक्षित भूमि नहीं मिलती। इस स्थिति के सिवा अत्यन्त उग्र उन्माद से बचने का मुझे कोई उपाय नहीं दिखता। और हमारे प्रभु यीशु मसीह के इन वचनों में यह मुझे स्पष्ट रूप से दिखाई देता है, "हर एक पेड़ अपने फल से पहचाना जाता है।" (लूका 6:44।)

परन्तु वे विशेष फल कौन से हैं जिनसे हृदय में आत्मा की उपस्थिति जानी जा सकती है? इस प्रश्न का उत्तर देने में मुझे कोई कठिनाई नहीं। पवित्र आत्मा सदा एक निश्चित ढंग पर कार्य करता है। जैसे मधुमक्खी अपने छत्ते के खाने सदा एक ही नियमित षट्कोणीय आकार में बनाती है, वैसे ही परमेश्वर का आत्मा मनुष्य के हृदय पर एक ही समान परिणाम के साथ कार्य करता है। उसका कार्य एक निपुण कारीगर का कार्य है। संसार को उसमें कोई सुन्दरता नहीं दिखती—वह स्वाभाविक मनुष्य के लिए मूर्खता है। परन्तु "आत्मिक जन सब कुछ जाँचता है।" (1 कुरिन्थियों 2:15।) भली-भाँति सिखाया हुआ मसीही परमेश्वर के आत्मा के फलों को अच्छी तरह जानता है। मैं उन्हें संक्षेप में क्रम से तुम्हारे सामने रखता हूँ। वे सब स्पष्ट और असंदिग्ध हैं, "समझनेवाले के लिए वे सब सहज, और ज्ञान पानेवालों के लिए सीधे हैं।" (नीतिवचन 8:9।)

(1) जहाँ पवित्र आत्मा है, वहाँ पाप का गहरा बोध और उसके लिए सच्चा मन फिराव सदा होगा। पाप का बोध कराना उसका विशेष कार्य है। (यूहन्ना 16:8।) वह परमेश्वर की अत्यन्त पवित्रता को दिखाता है। वह हमारे स्वभाव की अत्यन्त भ्रष्टता और दुर्बलता सिखाता है। वह हमारी अन्धी आत्म-धार्मिकता को उतार फेंकता है। वह हमारी आँखें खोलकर हमारे भयानक दोष, मूर्खता और संकट को दिखाता है। वह हृदय को पाप के लिए शोक, पश्चात्ताप और घृणा से भर देता है, क्योंकि पाप वह घृणित वस्तु है जिससे परमेश्वर बैर रखता है। जो इन सब बातों के विषय में कुछ नहीं जानता, और पाप के प्रति विचारहीन होकर, अपनी आत्मा की ओर से उदासीन और निश्चिन्त होकर लापरवाही से जीवन बिताता फिरता है, वह परमेश्वर के सामने मरा हुआ मनुष्य है! उसमें मसीह का आत्मा नहीं है।

(2) जहाँ पवित्र आत्मा है, वहाँ यीशु मसीह पर, जो एकमात्र उद्धारकर्ता है, सजीव विश्वास सदैव होगा। मसीह की गवाही देना, मसीह की बातों में से लेकर मनुष्य को दिखाना, यह उसका विशेष कार्य है। (यूहन्ना 16:15।) जो आत्मा अपने पाप को अनुभव करती है, उसे वह यीशु के पास और उसके लहू से किए गए प्रायश्चित के पास ले जाता है। वह आत्मा को दिखाता है कि मसीह ने पाप के लिये दुःख उठाया, अर्थात् धर्मी ने अधर्मियों के लिये, ताकि हमें परमेश्वर के पास पहुँचाए। वह पाप-रोगी आत्मा को बताता है कि हमें केवल मसीह को ग्रहण करना, मसीह पर विश्वास करना, अपने आपको मसीह को सौंप देना है, और क्षमा, शान्ति तथा अनन्त जीवन उसी क्षण हमारे हो जाते हैं। वह हमें दिखाता है कि हमारी आत्मिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये मसीह के छुटकारे के सिद्ध कार्य में कैसी सुन्दर उपयुक्तता है। वह हमें इस बात के लिये तैयार करता है कि हम अपने किसी भी पुण्य का दावा त्याग दें और सब कुछ यीशु पर दाँव पर लगा दें; न किसी और की ओर देखें, न किसी और पर टिकें, न किसी और पर भरोसा रखें, केवल मसीह पर, उस मसीह पर जो "हमारे अपराधों के लिये पकड़वाया गया, और हमारे धर्मी ठहरने के लिये जिलाया भी गया।" (रोमियों 4:25।) जो इन बातों के विषय में कुछ नहीं जानता और किसी और नींव पर निर्माण करता है, वह परमेश्वर की दृष्टि में मरा हुआ है। उसमें मसीह का आत्मा नहीं है।

(3) जहाँ पवित्र आत्मा है, वहाँ जीवन और चाल-चलन में पवित्रता सदैव होगी। वह पवित्रता का आत्मा है। (रोमियों 1:4।) वह पवित्र करनेवाला आत्मा है। वह मनुष्य के कठोर, शारीरिक और संसारी मन को दूर करके उसके स्थान पर कोमल, विवेकशील और आत्मिक मन देता है, जो परमेश्वर के वचन में प्रसन्न रहता है। वह मनुष्य को परमेश्वर की ओर मुँह फेरने, सब बातों से बढ़कर उसे प्रसन्न करने की इच्छा रखने, और संसार की रीति से मुँह मोड़ने के योग्य बनाता है, ताकि वह उस रीति को फिर अपना परमेश्वर न बनाए। वह मनुष्य के हृदय में "प्रेम, आनन्द, नम्रता, धीरज, कृपा, भलाई, विश्वास, संयम" के धन्य बीज बोता है, और इन बीजों को उगाकर सुखद फल लगवाता है। (गलातियों 5:22।) जिसमें ये बातें नहीं हैं और जो प्रतिदिन के व्यावहारिक भक्तिमय जीवन के विषय में कुछ नहीं जानता, वह परमेश्वर की दृष्टि में मरा हुआ है। उसमें मसीह का आत्मा नहीं है।

(4) जहाँ पवित्र आत्मा है, वहाँ गम्भीर निजी प्रार्थना की आदत सदैव होगी। वह अनुग्रह और गिड़गिड़ाहट का आत्मा है। (जकर्याह 12:10।) वह हृदय में लेपालकपन के आत्मा के रूप में कार्य करता है, जिससे हम "हे अब्बा, हे पिता" कहकर पुकारते हैं। वह मनुष्य को अनुभव कराता है कि उसे परमेश्वर को पुकारना और परमेश्वर से बोलना ही है; चाहे दुर्बलता से, लड़खड़ाते हुए, कमज़ोर स्वर में ही सही, पर अपनी आत्मा के विषय में उसे पुकारना ही पड़ता है। वह मनुष्य के लिये प्रार्थना करना उतना ही स्वाभाविक बना देता है जितना शिशु के लिये साँस लेना; बस एक अन्तर के साथ, कि शिशु बिना प्रयास के साँस लेता है, जबकि नया जन्म पाई हुई आत्मा बड़े संघर्ष और जूझने के साथ प्रार्थना करती है। जो सच्ची, सजीव, उत्साहपूर्ण निजी प्रार्थना के विषय में कुछ नहीं जानता, और किसी पुरानी रीति से या बिना प्रार्थना के ही सन्तुष्ट है, वह परमेश्वर की दृष्टि में मरा हुआ है। उसमें मसीह का आत्मा नहीं है।

(5) अन्त में, जहाँ पवित्र आत्मा है, वहाँ परमेश्वर के वचन के प्रति प्रेम और श्रद्धा सदैव होगी। वह नया जन्म पाई हुई आत्मा में वचन के निर्मल दूध की लालसा उत्पन्न करता है, जैसे शिशु अपने स्वाभाविक भोजन की लालसा करता है। वह उसे "यहोवा की व्यवस्था से प्रसन्न" करता है। (1 पतरस 2:2; भजन संहिता 1:2।) वह मनुष्य को पवित्रशास्त्र की ऐसी परिपूर्णता, गहराई, बुद्धि और पर्याप्तता दिखाता है, जो स्वाभाविक मनुष्य की आँखों से पूरी तरह छिपी रहती है। वह उसे अदम्य बल से वचन की ओर खींचता है, मानो वह प्रकाश और दीपक, मन्ना और तलवार है, जो इस संसार की यात्रा को सुरक्षित बनाने के लिये अनिवार्य हैं। यदि वह मनुष्य पढ़ नहीं सकता, तो वह उसे सुनने से प्रेम कराता है; यदि सुन नहीं सकता, तो मनन से प्रेम कराता है। पर आत्मा उसे सदैव वचन की ओर ही ले जाता है। जिसे परमेश्वर की बाइबल में कोई विशेष सुन्दरता नहीं दिखती, और जो उसे पढ़ने, सुनने और समझने में आनन्द नहीं पाता, वह परमेश्वर की दृष्टि में मरा हुआ है। उसमें मसीह का आत्मा नहीं है।

मैं आत्मा की उपस्थिति के ये पाँच महान चिह्न अपने पाठकों के सामने रखता हूँ और विश्वास के साथ उनकी ओर ध्यान दिलाता हूँ। मेरा विश्वास है कि वे जाँच में खरे उतरेंगे। मुझे इसका भय नहीं कि उन्हें खोजा, परखा और उनसे जिरह की जाए। परमेश्वर की ओर मन फिराव, हमारे प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास, हृदय और जीवन की पवित्रता, सच्ची निजी प्रार्थना की आदतें, परमेश्वर के वचन के प्रति प्रेम और श्रद्धा, ये मनुष्य की आत्मा में पवित्र आत्मा के वास के सच्चे प्रमाण हैं। जहाँ वह है, वहाँ ये चिह्न दिखाई देंगे। जहाँ वह नहीं है, वहाँ ये चिह्न नहीं होंगे।

मैं खुले मन से मानता हूँ कि कुछ छोटे ब्योरों में आत्मा की अगुवाई सदैव एक-सी नहीं होती। जिन मार्गों से वह आत्माओं को ले जाता है, वे सदैव ठीक एक ही नहीं होते। सच्चे मसीही अपने आरम्भ में जिन अनुभवों से होकर निकलते हैं, वे प्रायः कुछ भिन्न होते हैं। मैं केवल यह मानता हूँ कि जिस मुख्य मार्ग पर आत्मा लोगों को ले जाता है, और जो अन्तिम परिणाम वह उत्पन्न करता है, वे सदैव एक-से होते हैं। सब सच्चे मसीहियों में वे पाँच महान चिह्न, जिनका मैं पहले उल्लेख कर चुका हूँ, सदैव पाए जाएँगे।

मैं खुले मन से मानता हूँ कि हृदय में आत्मा के कार्य की मात्रा और गहराई में बहुत अन्तर हो सकता है। दुर्बल विश्वास और दृढ़ विश्वास होता है; दुर्बल प्रेम और दृढ़ प्रेम; उज्ज्वल आशा और धुँधली आशा; मसीह की इच्छा का क्षीण पालन और प्रभु के पीछे निकट से चलना। मैं केवल यह मानता हूँ कि जिनमें आत्मा है, उन सब के धार्मिक चरित्र की मुख्य रूपरेखा पूरी तरह मेल खाती है। जीवन जीवन ही है, चाहे वह सबल हो या दुर्बल। गोद में पड़ा शिशु, यद्यपि कमज़ोर और दूसरों पर निर्भर है, आदम के महान परिवार का उतना ही सच्चा और वास्तविक प्रतिनिधि है जितना संसार का सबसे बलवान मनुष्य।

जहाँ कहीं तुम ये पाँच महान चिह्न देखो, वहाँ तुम एक सच्चे मसीही को देखते हो। यह कभी न भूलना। जो लोग उनके अपने सम्प्रदाय के नहीं हैं और उनकी अपनी विशेष रीति से आराधना नहीं करते, उन्हें बहिष्कृत करना और कलीसिया से बाहर ठहराना मैं दूसरों पर छोड़ता हूँ। ऐसी संकीर्णता से मेरी कोई सहानुभूति नहीं। मुझे ऐसा मनुष्य दिखाओ जो मन फिराता है, और क्रूस पर चढ़ाए गए मसीह पर विश्वास करता है, जो पवित्र जीवन जीता है, और अपनी बाइबल तथा प्रार्थना में आनन्दित रहता है, और मैं उसे भाई मानना चाहूँगा। मैं उसमें सार्वभौमिक मसीही कलीसिया का एक सदस्य देखता हूँ, जिससे बाहर कोई उद्धार नहीं। मैं उसमें महिमा के उस मुकुट का उत्तराधिकारी देखता हूँ जो अविनाशी है और मुर्झाता नहीं। यदि उसमें पवित्र आत्मा है, तो उसके पास मसीह है। यदि उसके पास मसीह है, तो उसके पास परमेश्वर है। यदि उसके पास परमेश्वर पिता, परमेश्वर पुत्र और परमेश्वर आत्मा हैं, तो सब कुछ उसका है। मैं कौन होता हूँ कि उससे मुँह फेर लूँ, केवल इसलिये कि हम सब बातों में एक-सी दृष्टि नहीं रखते?

जहाँ कहीं आत्मा के ये पाँच बड़े चिह्न नहीं हैं, वहाँ हमारे पास किसी मनुष्य की आत्मा के विषय में डरने का उचित कारण है। दृश्य कलीसियाएँ उसका समर्थन कर सकती हैं, उसे संस्कार दिए जा सकते हैं, उस पर प्रार्थना के निर्धारित रूप पढ़े जा सकते हैं, सेवक दयालुता से उसे "भाई" कह सकते हैं, परन्तु इन सब से वास्तविक स्थिति नहीं बदलती। वह मनुष्य उस चौड़े मार्ग पर है जो विनाश की ओर ले जाता है। आत्मा के बिना वह मसीह के बिना है। मसीह के बिना वह परमेश्वर के बिना है। परमेश्वर पिता, परमेश्वर पुत्र और परमेश्वर पवित्र आत्मा के बिना वह भारी संकट में है। प्रभु उसकी आत्मा पर दया करे!

अब मैं निष्कर्ष की ओर शीघ्रता से बढ़ता हूँ। जो कुछ मैं कहता आया हूँ, उसे मैं सीधे व्यक्तिगत प्रयोग के कुछ शब्दों के साथ समाप्त करना चाहता हूँ।

(1) पहले, मैं इस लेख के सब पाठकों से एक प्रश्न पूछता हूँ। यह छोटा और सरल है, और इस विषय से स्वाभाविक रूप से निकलता है। "क्या आप में मसीह का आत्मा है, या नहीं है?"

मुझे यह प्रश्न पूछने में कोई भय नहीं है। इस साधारण टिप्पणी से मैं नहीं रुकूँगा कि आज के समय में ऐसे प्रश्न पूछना बेतुका, उन्माद-भरा और अनुचित है। मैं पवित्रशास्त्र के एक स्पष्ट कथन पर खड़ा हूँ। मैं एक प्रेरित को, जो परमेश्वर की प्रेरणा से बोलता है, यह कहते पाता हूँ, "यदि किसी में मसीह का आत्मा नहीं तो वह उसका जन नहीं।" मैं जानना चाहता हूँ कि इससे अधिक उचित बात और क्या हो सकती है कि आपके विवेक पर यह पूछताछ डाली जाए, "क्या आप में मसीह का आत्मा है?"

मैं इस मूर्खतापूर्ण टिप्पणी से भी नहीं रुकूँगा कि इस संसार में कोई मनुष्य नहीं बता सकता कि उसमें आत्मा है या नहीं। कोई नहीं बता सकता! तो फिर बाइबल हमें किसलिए दी गई? यदि हम यह नहीं जान सकते कि हम स्वर्ग जा रहे हैं या नरक, तो पवित्रशास्त्र का क्या उपयोग है? जो मैं पूछता हूँ वह जाना जा सकता है। आत्मा की उपस्थिति के प्रमाण आत्मा में सरल, स्पष्ट और समझने योग्य हैं। कोई सच्चा खोजी इस विषय में मार्ग नहीं चूक सकता। आप जान सकते हैं कि आप में पवित्र आत्मा है या नहीं।

मैं आपसे विनती करता हूँ कि जो प्रश्न मैंने अभी पूछा है, उससे बचिए नहीं। मैं आपसे अनुरोध करता हूँ कि इसे अपने हृदय में भीतर काम करने दीजिए। यदि आप कभी उद्धार पाना चाहते हैं तो मैं आपको आज्ञा देता हूँ कि इसका सच्चा उत्तर दीजिए। बपतिस्मा, कलीसिया की सदस्यता, प्रतिष्ठा, नैतिकता, बाहरी शुद्धता, ये सब उत्तम वस्तुएँ हैं। परन्तु इन्हीं से सन्तुष्ट न हो जाइए। और गहरे जाइए, और आगे देखिए। "क्या आपने पवित्र आत्मा पाया है? क्या आप में मसीह का आत्मा है?"

"यह अनुग्रह का अच्छा चिह्न है जब कोई मनुष्य अपने आप को खोजने और जाँचने को तैयार होता है कि वह अनुग्रह पाया हुआ है या नहीं। परमेश्वर की सन्तान में एक ऐसी सहज प्रवृत्ति होती है जिससे वह स्वाभाविक रूप से चाहता है कि उसके वैध पुत्र होने का अधिकार परखा जाए; जबकि कपटी को अपनी सड़ाहट की खोजबीन से अधिक किसी बात का भय नहीं होता।"—हॉपकिन्स।

(2) फिर, मैं उन सब को एक गम्भीर चेतावनी देता हूँ जो अपने विवेक में अनुभव करते हैं कि उनमें मसीह का आत्मा नहीं है। वह चेतावनी छोटी और सरल है। यदि आप में आत्मा नहीं है, तो आप अब तक मसीह के लोग नहीं हैं—आप "उसके जन नहीं" हैं।

क्षण भर सोचिए कि इन थोड़े शब्दों, "उसके जन नहीं," में कितना कुछ समाया है। आप मसीह के लहू से धोए नहीं गए! आप उसकी धार्मिकता का वस्त्र नहीं पहने हैं! आप धर्मी ठहराए नहीं गए! आपके लिए मध्यस्थता की प्रार्थना नहीं की जाती! आपके पाप अब भी आप पर हैं! शैतान आपको अपना कहता है! गड्ढा आपके लिए अपना मुँह खोले हुए है! नरक की यातनाएँ आपकी प्रतीक्षा कर रही हैं!

मेरी इच्छा व्यर्थ भय उत्पन्न करने की नहीं है। मैं केवल इतना चाहता हूँ कि समझदार लोग बातों को शान्ति से वैसा ही देखें जैसी वे हैं। मैं केवल पवित्रशास्त्र के एक स्पष्ट पद को उचित रीति से तौलवाना चाहता हूँ। लिखा है, "यदि किसी में मसीह का आत्मा नहीं तो वह उसका जन नहीं।" और मैं ऐसे पद के सामने कहता हूँ, यदि आप आत्मा के बिना मरें, तो आपके लिए अच्छा होता कि आप कभी जन्मे ही न होते।

(3) फिर, मैं उन सब को एक हार्दिक निमन्त्रण देता हूँ जो अनुभव करते हैं कि उनमें आत्मा नहीं है। वह निमन्त्रण छोटा और सरल है। आज ही जाइए और प्रभु यीशु मसीह के नाम से परमेश्वर को पुकारिए, और प्रार्थना कीजिए कि पवित्र आत्मा आपकी आत्मा पर उण्डेला जाए। ऐसा करने के लिए हर प्रकार का प्रोत्साहन है। इसके लिए पवित्रशास्त्र की अनुमति है। "तुम मेरी डाँट सुनकर मन फिराओ; सुनो, मैं अपनी आत्मा तुम्हारे लिये उण्डेल दूँगा; मैं तुम को अपने वचन बताऊँगा।" "तो जब तुम बुरे होकर अपने लड़केबालों को अच्छी वस्तुएँ देना जानते हो, तो स्वर्गीय पिता अपने माँगनेवालों को पवित्र आत्मा क्यों न देगा?"

(नीतिवचन 1:23; लूका 11:13।) ऐसा करने के लिए हज़ारों के अनुभव की भी अनुमति है। अन्तिम दिन हज़ारों उठकर गवाही देंगे कि जब उन्होंने प्रार्थना की तो उनकी सुनी गई, और जब उन्होंने अनुग्रह ढूँढ़ा तो उन्होंने उसे पाया। सबसे बढ़कर, हमारे प्रभु यीशु मसीह के व्यक्तित्व और स्वभाव में इसकी अनुमति है। वह अनुग्रह करने को प्रतीक्षा करता है। वह पापियों को अपने पास आने का न्योता देता है। जो उसके पास आते हैं उनमें से किसी को वह नहीं ठुकराता। वह "उन्हें जिन्होंने उसे ग्रहण किया, और जो उसके नाम पर विश्वास रखते हैं, उन्हें परमेश्वर की सन्तान होने का अधिकार" देता है। (यूहन्ना 1:12।)

तो यीशु के पास एक दीन, अभावग्रस्त, नम्र और पछतानेवाले पापी के रूप में जाइए, और आप व्यर्थ नहीं जाएँगे। अपनी आत्मा के विषय में उसे गहरे भाव से पुकारिए, और आपकी पुकार निष्फल नहीं होगी। अपनी आवश्यकता, दोष, भय और संकट उसके सामने मान लीजिए, और वह आपको तुच्छ नहीं जानेगा। माँगिए, तो आपको दिया जाएगा। ढूँढ़िए, तो आप पाएँगे। खटखटाइए, तो आपके लिए खोला जाएगा। मैं आज पापियों में सबसे बड़े पापी के सामने भी गवाही देता हूँ कि आपकी आत्मा के लिए मसीह में बहुतायत से, बल्कि बचे रहने तक, पर्याप्त है। आइए, आइए—आज ही आइए। मसीह के पास आइए!

(4) अन्त में, इस लेख के उन सब पाठकों को, जिन्होंने मसीह का आत्मा पाया है—पछतानेवालों, विश्वास करनेवालों, पवित्रों, प्रार्थना करनेवालों और परमेश्वर के वचन से प्रेम रखनेवालों को—मैं विदाई का एक उपदेश देता हूँ। वह उपदेश तीन सरल बातों से बना होगा।

(क) एक तो, पवित्र आत्मा के लिये धन्यवादी हो। किसने तुझे औरों से भिन्न किया है? तेरे हृदय में ये सब भावनाएँ कहाँ से आईं, जिन्हें तेरे आस-पास के हज़ारों लोग नहीं जानते, और जिन्हें तू स्वयं भी किसी समय नहीं जानता था? पाप का वह बोध, मसीह की ओर वह खिंचाव, धार्मिकता की वह भूख और प्यास, और बाइबल और प्रार्थना के प्रति वह रुचि, जो तू अपने सारे सन्देहों और दुर्बलताओं के बावजूद अपनी आत्मा में पाता है, किसकी देन है? क्या ये बातें स्वभाव से आईं? नहीं! क्या तूने ये बातें इस संसार की पाठशालाओं में सीखीं? नहीं, कदापि नहीं! ये सब अनुग्रह ही की देन हैं। अनुग्रह ने इन्हें बोया, अनुग्रह ने इन्हें सींचा, अनुग्रह ने इन्हें आरम्भ किया, अनुग्रह ही ने इन्हें बनाए रखा है। और अधिक धन्यवादी होना सीख। जितने दिन तू जीवित रहे, प्रतिदिन परमेश्वर की और स्तुति कर—एकान्त में उसकी और स्तुति कर, सब के सामने उसकी और स्तुति कर, अपने ही परिवार में उसकी स्तुति कर, और सबसे बढ़कर अपने ही हृदय में उसकी स्तुति कर। स्वर्ग के लिये ठीक सुर में रहने का यही मार्ग है। वहाँ का गीत यह होगा, "परमेश्वर ने क्या ही कार्य किया है!"

(ख) दूसरी बात यह कि पवित्र आत्मा से परिपूर्ण हो जा। उसके धन्य प्रभाव के अधीन अधिकाधिक रहने का प्रयत्न कर। यह यत्न कर कि तेरा हर विचार, हर वचन, हर कार्य और हर आदत पवित्र आत्मा की अगुआई की आज्ञाकारिता में आ जाए। असंगतियों और संसार के अनुरूप चलने के द्वारा उसे शोकित न कर। छोटी-छोटी दुर्बलताओं और छोटे-छोटे सहज ही उलझानेवाले पापों से खिलवाड़ करके उसे बुझा न दे। इसके बजाय यह खोज कि जितने सप्ताह तू जीवित रहे, उतना अधिक पूर्णता से वह तुझ पर शासन और राज्य करे। प्रार्थना कर कि तू प्रति वर्ष अनुग्रह में और मसीह की पहचान में बढ़ता जाए। संसार का भला करने का यही मार्ग है। एक प्रतिष्ठित मसीही एक प्रकाश-स्तम्भ के समान है—जिसे दूर-दूर तक औरों द्वारा देखा जाता है, और जो उन असंख्य लोगों का भला करता है जिन्हें वह कभी जानता भी नहीं। इस संसार में गहरी आन्तरिक शान्ति का आनन्द पाने, मृत्यु के समय उज्ज्वल निश्चयता रखने, अपने पीछे विस्तृत प्रमाण छोड़ जाने, और अन्त में एक बड़ा मुकुट पाने का यही मार्ग है।

(ग) अन्त में, कलीसिया पर और संसार पर पवित्र आत्मा की बड़ी वर्षा के लिये प्रतिदिन प्रार्थना कर। आज की सबसे बड़ी आवश्यकता यही है—यह वह वस्तु है जिसकी हमें धन, साधनों और मनुष्यों से कहीं अधिक आवश्यकता है। मसीही जगत् में "प्रचारकों की मण्डली" पौलुस के दिनों से कहीं अधिक बड़ी है; परन्तु प्रयुक्त साधनों के अनुपात में पृथ्वी पर जो वास्तविक आत्मिक कार्य हो रहा है, वह निःसन्देह बहुत कम है। हमें पवित्र आत्मा की उपस्थिति और अधिक चाहिए—मंच पर और अधिक, और मण्डली में और अधिक—पास्टरीय भेंट में और अधिक, और पाठशाला में और अधिक। जहाँ वह है, वहाँ जीवन, स्वास्थ्य, वृद्धि और फलवन्तता होगी। जहाँ वह नहीं है—वहाँ सब कुछ मृत, नीरस, औपचारिक, निद्रालु और ठण्डा होगा। इसलिये जो कोई शुद्ध और निर्मल धर्म की वृद्धि देखना चाहता है, वह प्रतिदिन प्रार्थना करे कि मसीह की दृश्य कलीसिया की हर शाखा में पवित्र आत्मा की उपस्थिति और अधिक हो।

पवित्र आत्मा का होना

"ये वे हैं जो सांसारिक हैं और जिनमें पवित्र आत्मा नहीं।" - यहूदा 19

मैं यह मानकर चलता हूँ कि इस लेख का हर पाठक पवित्र आत्मा में विश्वास करता है। इस देश में जो लोग नास्तिक, ईश्वरवादी या सोसिनीय हैं और त्रिएकता के सिद्धान्त का खुला इनकार करते हैं, उनकी संख्या सौभाग्य से बहुत बड़ी नहीं है। अधिकांश लोगों ने पिता, और पुत्र, और पवित्र आत्मा के नाम से बपतिस्मा लिया है। कलीसिया के ऐसे सदस्य तो बहुत ही कम होंगे जिन्होंने हमारी पुरानी प्रश्नोत्तरी के ये सुपरिचित शब्द बार-बार न सुने हों, "मैं परमेश्वर पवित्र आत्मा में विश्वास करता हूँ, जो मुझे और परमेश्वर के सब चुने हुए लोगों को पवित्र करता है।"

परन्तु इस सब के होते हुए भी, बहुतों के लिये भला होगा कि वे विचार करें कि पवित्र आत्मा के नाम के अतिरिक्त वे उसके विषय में और क्या जानते हैं। आत्मा के कार्य से तुम्हारी अनुभव की जान-पहचान क्या है? उसने तुम्हारे लिये क्या किया है? तुम्हें उससे क्या लाभ मिला है? परमेश्वर पिता के विषय में तुम कह सकते हो, "उसने मुझे और सारे संसार को बनाया।" परमेश्वर पुत्र के विषय में तुम कह सकते हो, "वह मेरे लिये और सारी मनुष्य-जाति के लिये मरा।" परन्तु क्या तुम पवित्र आत्मा के विषय में कुछ कह सकते हो? क्या तुम कुछ भी भरोसे के साथ कह सकते हो, "वह मुझ में बसता है, और मुझे पवित्र करता है"? एक शब्द में, क्या तुम में पवित्र आत्मा है? इस लेख के आरम्भ का पद तुम्हें बताएगा कि "पवित्र आत्मा का न होना" भी कोई बात होती है। यही वह बात है जिस पर मैं तुम्हारा ध्यान दिलाना चाहता हूँ।

मेरा विश्वास है कि यह बात सब समयों में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। मैं इसे वर्तमान समय में विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण मानता हूँ। मेरा मत है कि पवित्र आत्मा के कार्य के विषय में स्पष्ट विचार हमारे समय में फैली हुई अनेक झूठी शिक्षाओं से बचाव के सर्वोत्तम उपायों में से हैं। इसलिये मुझे अनुमति दो कि मैं तुम्हारे सामने कुछ बातें रखूँ, जो परमेश्वर की आशीष से पवित्र आत्मा के होने के विषय पर प्रकाश डालें।

I. मैं पवित्र आत्मा के होने का अत्यधिक महत्त्व समझाऊँ।

II. मैं वह बड़ा सामान्य सिद्धान्त बताऊँ जिसके द्वारा ही इस प्रश्न की जाँच हो सकती है, "क्या तुम में पवित्र आत्मा है?"

III. मैं उन विशेष प्रभावों का वर्णन करूँ जो पवित्र आत्मा उन आत्माओं में सदा उत्पन्न करता है जिनमें वह बसता है।

I. सबसे पहले मैं पवित्र आत्मा के होने का अत्यधिक महत्त्व समझाऊँ।

इस बात को स्पष्ट करना नितान्त आवश्यक है। जब तक तुम इसे नहीं देखते, मैं इस सारे लेख में हवा को मारनेवाले के समान जान पड़ूँगा। एक बार यह बात तुम्हारे मन में बैठ जाए, तो जो कार्य मैं करना चाहता हूँ उसका आधा तुम्हारी आत्मा के लिये हो चुका।

मैं सहज ही कल्पना कर सकता हूँ कि कोई पाठक कहे, मुझे इस प्रश्न का उपयोग समझ में नहीं आता! मान लो कि मुझ में पवित्र आत्मा नहीं है, तो इसमें भारी हानि क्या है? मैं इस संसार में अपना कर्तव्य निभाने का प्रयत्न करता हूँ—मैं नियमित रूप से अपनी कलीसिया में जाता हूँ—कभी-कभी संस्कार ग्रहण करता हूँ—मेरा विश्वास है कि मैं अपने पड़ोसियों के समान ही अच्छा मसीही हूँ। मैं प्रार्थना करता हूँ—मुझे भरोसा है कि परमेश्वर मसीह के कारण मेरे पाप क्षमा करेगा। मुझे समझ नहीं आता कि पवित्र आत्मा के विषय के कठिन प्रश्नों से अपने आपको कष्ट दिये बिना मैं अन्त में स्वर्ग क्यों न पहुँचूँ।

यदि तुम्हारे विचार ऐसे हैं, तो मैं तुमसे विनती करता हूँ कि कुछ मिनट मुझे अपना ध्यान दो, जब तक मैं तुम्हें भिन्न रीति से सोचने के कारण बताने का यत्न करता हूँ। मेरा विश्वास करो, "पवित्र आत्मा के होने" पर तुम्हारी आत्मा का उद्धार निर्भर है, इससे कम कुछ नहीं। जीवन या मृत्यु; स्वर्ग या नरक; अनन्त सुख या अनन्त दुःख; सब इस लेख के विषय से जुड़े हुए हैं।

(क) एक तो यह स्मरण रख कि यदि तुझ में पवित्र आत्मा नहीं है, तो मसीह में तेरा कोई भाग नहीं, और स्वर्ग पर तेरा कोई अधिकार नहीं।

पौलुस के वचन स्पष्ट और असंदिग्ध हैं, "यदि किसी में मसीह का आत्मा नहीं तो वह उसका जन नहीं।" (रोमियों 8:9।) यूहन्ना के वचन भी उतने ही स्पष्ट हैं, "इसी से हम जानते हैं, कि वह हम में बना रहता है, अर्थात् उस आत्मा से जो उस ने हमें दिया है।" (1 यूहन्ना 3:24।) परमेश्वर पवित्र आत्मा का भीतर वास करना मसीह में सब सच्चे विश्वासियों का साझा चिह्न है। यह प्रभु यीशु की भेड़-बकरियों के झुण्ड पर चरवाहे की छाप है, जो उन्हें संसार के शेष लोगों से अलग पहचान देती है। यह परमेश्वर के खरे पुत्रों पर सुनार की मुहर है, जो उन्हें झूठे अंगीकार करनेवालों के मैल और भीड़ से अलग करती है। यह उन लोगों पर राजा की अपनी मुहर है जो उसकी निज प्रजा हैं, और यह प्रमाणित करती है कि वे उसकी अपनी सम्पत्ति हैं। यह वह "बयाना" है जो छुड़ानेवाला अपने विश्वासी चेलों को उनके देह में रहते हुए देता है, कि पुनरुत्थान की भोर में आनेवाले पूर्ण और सम्पूर्ण "छुटकारे" का चिह्न बना रहे। (इफिसियों 1:14।) सब विश्वासियों की यही दशा है। उन सब में आत्मा है।

यह भली-भाँति समझ लिया जाए कि जिसमें आत्मा नहीं, उसमें मसीह नहीं। जिसमें मसीह नहीं, उसके पापों की क्षमा नहीं, परमेश्वर के साथ मेल नहीं, स्वर्ग पर कोई अधिकार नहीं, और उद्धार पाने की कोई दृढ़ नींववाली आशा नहीं। उसका धर्म उस घर के समान है जो रेत पर बना हो। अच्छे मौसम में वह सुन्दर दिख सकता है। स्वास्थ्य और समृद्धि के समय वह उसे सन्तुष्ट कर सकता है। परन्तु जब बाढ़ चढ़ेगी और आँधी चलेगी, जब रोग और संकट उस पर टूट पड़ेंगे, तब वह गिर पड़ेगा और उसे अपने खण्डहरों के नीचे दबा लेगा। वह बिना किसी अच्छी आशा के जीता है, और बिना किसी अच्छी आशा के मरता है। वह फिर जी उठेगा, परन्तु केवल दुःख भोगने के लिए। वह न्याय में खड़ा होगा, परन्तु केवल दोषी ठहराए जाने के लिए; वह पवित्र लोगों और स्वर्गदूतों को देखेगा और स्मरण करेगा कि वह भी उनके बीच हो सकता था, परन्तु बहुत देर हो चुकी होगी; वह अपने चारों ओर असंख्य खोए हुए लोगों को देखेगा और पाएगा कि वे उसे सान्त्वना नहीं दे सकते, परन्तु बहुत देर हो चुकी होगी। जो मनुष्य आत्मा के बिना स्वर्ग पहुँचने की सोचता है, उसका अन्त यही होगा।

इन बातों को अपनी स्मृति में बैठा लो, और इन्हें कभी न भूलो। क्या ये स्मरण रखने योग्य नहीं हैं? तुम में पवित्र आत्मा नहीं—तो मसीह में कोई भाग नहीं! मसीह में कोई भाग नहीं—तो पापों की क्षमा नहीं! पापों की क्षमा नहीं—तो परमेश्वर के साथ मेल नहीं! परमेश्वर के साथ मेल नहीं—तो स्वर्ग पर कोई अधिकार नहीं! स्वर्ग पर कोई अधिकार नहीं—तो स्वर्ग में प्रवेश नहीं! स्वर्ग में प्रवेश नहीं—तो फिर क्या? हाँ—तो फिर क्या? तुम यह पूछ सकते हो। तुम कहाँ भागोगे? किधर मुड़ोगे? किस शरण में दौड़ोगे? कोई भी शरण नहीं है। केवल नरक ही बचा रहता है। स्वर्ग में प्रवेश न पाकर तुम्हें अन्त में नरक में डूबना ही पड़ेगा।

मैं इस लेख के हर पाठक से कहता हूँ कि जो मैं कहता हूँ उसे भली-भाँति ध्यान में रखो। शायद यह तुम्हें चौंका दे—परन्तु क्या चौंकना तुम्हारे लिए भला नहीं हो सकता? क्या मैंने तुम्हें पवित्रशास्त्र के सीधे-सादे सत्य से अधिक कुछ बताया है? तुमने जो तर्क-शृंखला सुनी है उसकी कौन-सी कड़ी कमज़ोर है? तर्क में दोष कहाँ है? मेरे विवेक में मेरा विश्वास है कि कोई नहीं है। आत्मा के न होने से नरक में पहुँचने तक नीचे जाती सीढ़ियों की केवल एक लम्बी कतार है। आत्मा के बिना जीते हुए तुम पहले से ही सबसे ऊपर खड़े हो; आत्मा के बिना मरते हुए तुम सबसे नीचे पहुँच जाओगे!

(ख) दूसरी बात यह भी स्मरण रखो कि यदि तुम में आत्मा नहीं है तो तुम्हारे हृदय में पवित्रता नहीं है, और तुम स्वर्ग के योग्य नहीं हो।

स्वर्ग वह स्थान है जहाँ सब लोग मरने के बाद जाने की आशा रखते हैं। बहुतों के लिए भला होता यदि वे शान्ति से विचार करते कि स्वर्ग कैसा निवासस्थान है। वह राजाओं के राजा का निवासस्थान है, जो "ऐसा शुद्ध है कि बुराई को देख ही नहीं सकता," और इसलिए उसका एक पवित्र स्थान होना अनिवार्य है। यह वह स्थान है जिसके विषय में पवित्रशास्त्र हमें बताता है कि उसमें कोई ऐसी वस्तु "जो अशुद्ध है, या जो घृणित काम करती है," कभी प्रवेश न करेगी। (प्रकाशितवाक्य 21:27।) यह वह स्थान है जहाँ कुछ भी दुष्ट, पापमय या विषयासक्त नहीं होगा—कुछ भी सांसारिक, मूर्खतापूर्ण, ओछा या अपवित्र नहीं होगा। वहाँ, लोभी मनुष्य स्मरण रखे, धन नहीं रहेगा। वहाँ, सुख-विलास खोजनेवाला स्मरण रखे, न घुड़दौड़ें होंगी, न नाट्यशालाएँ, न उपन्यास पढ़ना, न नाच-रंग। वहाँ, पियक्कड़ और जुआरी स्मरण रखें, न मदिरा होगी, न पासे, न दाँव, न ताश। परमेश्वर, पवित्र लोगों और स्वर्गदूतों की सदा की उपस्थिति—परमेश्वर की इच्छा का निरन्तर पालन—हर उस वस्तु का पूर्ण अभाव जिसे परमेश्वर स्वीकार नहीं करता—यही प्रमुख बातें स्वर्ग को बनाएँगी। वह एक अनन्त विश्रामदिन होगा।

इस स्वर्ग के लिए हम सब स्वभाव से सर्वथा अयोग्य हैं। उसके आनन्द को भोगने की हम में सामर्थ्य नहीं। उसकी आशीषों की हम में रुचि नहीं। उसकी सुन्दरता देखने के लिए हमारे पास आँख नहीं। उसकी शान्ति अनुभव करने के लिए हमारे पास हृदय नहीं। स्वतन्त्रता के स्थान पर हम उसे बन्धन पाएँगे। महिमामय स्वतन्त्रता के स्थान पर हम उसे निरन्तर रोक-थाम पाएँगे। भव्य राजभवन के स्थान पर हम उसे अँधेरा बन्दीगृह पाएँगे। सूखी भूमि पर मछली, पानी में भेड़, पिंजरे में उक़ाब—ये सब स्वर्ग में एक अपवित्र मनुष्य की अपेक्षा अधिक सहज और अपने स्थान पर होते। "बिना पवित्रता के कोई प्रभु को कदापि न देखेगा।" (इब्रानियों 12:14।)

मनुष्यों की आत्माओं को इस स्वर्ग के लिए तैयार करना पवित्र आत्मा का विशेष कार्य है। केवल वही सांसारिक हृदय को बदल सकता है, और आदम की सन्तान की बिगड़ी हुई सांसारिक कामनाओं को शुद्ध कर सकता है। केवल वही उनके मनों को परमेश्वर के अनुरूप ला सकता है, और उन्हें पवित्र लोगों, स्वर्गदूतों और मसीह की अनन्त संगति के योग्य बना सकता है। केवल वही उन्हें वह प्रेम करना सिखा सकता है जिससे परमेश्वर प्रेम करता है, और उससे घृणा करना जिससे परमेश्वर घृणा करता है, और परमेश्वर की उपस्थिति में आनन्दित होना। केवल वही मानव स्वभाव के उन अंगों को, जो आदम के पतन से टूट गए और अपने स्थान से उखड़ गए थे, बिठा सकता है, और मनुष्य की इच्छा और परमेश्वर की इच्छा के बीच सच्ची एकता ला सकता है। और जो कोई उद्धार पाता है, उसके लिए वह यही करता है। विश्वासियों के विषय में लिखा है कि वे "परमेश्वर की दया के अनुसार" बचाए गए हैं, परन्तु "नए जन्म के स्नान और पवित्र आत्मा के हमें नया बनाने के द्वारा।" वे उद्धार के लिए चुने गए हैं—परन्तु "आत्मा के द्वारा पवित्र बनाए जाने" के साथ-साथ "सत्य पर विश्वास" के द्वारा भी। (तीतुस 3:5; 2 थिस्सलुनीकियों 2:13।)

यह भी अपनी स्मरण-पट्टी पर लिख रखो। पहले पृथ्वी पर पवित्र आत्मा के हृदय में आए बिना स्वर्ग में प्रवेश नहीं! इस जीवन में पवित्रीकरण हुए बिना आने वाले जीवन में महिमा में प्रवेश नहीं! यदि इस संसार में तुम में पवित्र आत्मा नहीं, तो आने वाले संसार में स्वर्ग भी नहीं! तुम उसके योग्य न होगे! तुम उसके लिए तैयार न होगे! तुम्हें वह अच्छा न लगेगा! तुम उसका आनन्द न ले सकोगे! आजकल "पवित्र" शब्द का बहुत प्रयोग किया जाता है। "पवित्र कलीसिया," "पवित्र बपतिस्मा," "पवित्र दिन," "पवित्र जल," "पवित्र सेवाएँ" और "पवित्र याजक" सुनते-सुनते हमारे कान थक गए हैं। परन्तु एक बात इन सबसे हज़ार गुणा अधिक महत्त्वपूर्ण है, और वह यह कि आत्मा के द्वारा मनुष्य सचमुच पवित्र बनाया जाए। जीते जी हमें ईश्वरीय स्वभाव के सहभागी बनना होगा। यदि हम कभी अनन्त जीवन की कटनी काटना चाहते हैं तो हमें "आत्मा के लिए बोना" होगा। (2 पतरस 1:4; गलातियों 6:8।)

(ग) एक और बात स्मरण रखो: यदि तुम में आत्मा नहीं है, तो तुम्हें सच्चा मसीही समझे जाने का कोई अधिकार नहीं, और न तुम में मसीही बनने की कोई इच्छा या सामर्थ्य है।

संसार के मापदण्ड के अनुसार किसी को 'मसीही' बनाने के लिए बहुत थोड़ा चाहिए। मनुष्य बपतिस्मा ले ले और किसी आराधना-स्थल में जाए, तो संसार की माँगें पूरी हो जाती हैं। हो सकता है उसका विश्वास किसी तुर्क जितना भी समझदारी भरा न हो, और वह बाइबल से बिलकुल अनजान हो। हो सकता है उसका आचरण किसी विधर्मी से बेहतर न हो; कितने ही सम्मानित हिन्दू उसे लज्जित कर दें। पर इससे क्या? वह अंग्रेज़ है! उसका बपतिस्मा हो चुका है! वह गिरजे या प्रार्थनालय में जाता है और वहाँ शिष्टता से व्यवहार करता है! और क्या चाहिए? यदि तुम उसे मसीही न कहो तो तुम्हें बड़ा निर्दयी समझा जाता है!

परन्तु बाइबल के मापदण्ड के अनुसार किसी को सच्चा मसीही बनाने के लिए इससे कहीं अधिक चाहिए। इसके लिए धन्य त्रिएकता के तीनों व्यक्तियों का सहकार्य चाहिए। जिस आत्मा का उद्धार होना है, उस पर पिता परमेश्वर का चुनाव, पुत्र परमेश्वर का लहू और मध्यस्थता की प्रार्थना, और पवित्र आत्मा परमेश्वर का पवित्रीकरण, ये सब मिलकर कार्य करें। आदम की किसी भी सन्तान को सच्चा मसीही बनाने का कार्य पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा मिलकर पूरा करते हैं।

यह गहरा विषय है, और इसे श्रद्धा के साथ ही सँभालना चाहिए। पर जहाँ बाइबल निश्चयपूर्वक बोलती है, वहाँ हम भी निश्चयपूर्वक बोल सकते हैं; और यदि मनुष्य को सच्चा मसीही बनाने में पवित्र आत्मा का कार्य उतना ही आवश्यक न हो जितना पिता का कार्य या पुत्र का कार्य, तो बाइबल के वचनों का कोई अर्थ नहीं रह जाता। हमें बताया गया है, "कोई पवित्र आत्मा के बिना यह नहीं कह सकता कि यीशु प्रभु है।" (1 कुरिन्थियों 12:3।) पवित्रशास्त्र हमें सिखाता है कि सच्चे मसीही "आत्मा से जन्मे" हैं। वे आत्मा में जीते हैं; वे आत्मा के चलाए चलते हैं; आत्मा के द्वारा वे शरीर के कामों को मारते हैं; एक ही आत्मा के द्वारा यीशु के द्वारा उनकी पिता तक पहुँच है। उनके सब गुण आत्मा के फल हैं; वे पवित्र आत्मा का मन्दिर हैं; वे आत्मा के द्वारा परमेश्वर का निवास-स्थान हैं; वे आत्मा के अनुसार चलते हैं; वे आत्मा के द्वारा सामर्थी बनाए जाते हैं। आत्मा के द्वारा वे विश्वास से धार्मिकता की आशा की बाट जोहते हैं। (यूहन्ना 3:6; गलातियों 5:25; रोमियों 8:13, 14; इफिसियों 2:18; गलातियों 5:22; 1 कुरिन्थियों 6:19; इफिसियों 2:22; रोमियों 8:4; इफिसियों 3:16; गलातियों 5:5।) ये पवित्रशास्त्र के स्पष्ट वचन हैं। इनका खण्डन करने का साहस कौन करेगा?

सच यह है कि मानव स्वभाव की गहरी भ्रष्टता के कारण यदि पवित्र आत्मा का कार्य न होता तो उद्धार असम्भव होता। उसके बिना पिता का प्रेम और पुत्र का छुटकारा हमारे सामने व्यर्थ ही रखा गया है। आत्मा को उन्हें प्रकट करना होगा, आत्मा को उन्हें लागू करना होगा, नहीं तो हम खोए हुए प्राण हैं!

सृष्टि के दिन जल के ऊपर मण्डराने वाले की सामर्थ्य से कम कुछ भी हमें हमारी नीची दशा से कभी नहीं उठा सकता। जिसने कहा, "उजियाला हो, तो उजियाला हो गया," उसी को वचन कहना होगा, तभी हम में से कोई नए जीवन में जी उठेगा। जो पिन्तेकुस्त के दिन उतरा था, उसे हमारी इन मरी हुई आत्माओं पर उतरना होगा, तभी वे परमेश्वर का राज्य देखेंगी। दया और विपत्तियाँ हमारे हृदय की सतह को तो हिला सकती हैं, पर केवल उनसे भीतरी मनुष्य तक कभी न पहुँचा जा सकेगा। संस्कार, सेवाएँ और उपदेश बाहरी औपचारिकता उत्पन्न कर सकते हैं और हमें 'धर्म की खाल' पहना सकते हैं, पर उनमें जीवन न होगा। सेवक लोगों को प्रभु-भोज में सहभागी बना सकते हैं और गिरजों को नियमित आराधकों से भर सकते हैं, पर सच्चे मसीही बनाना और स्वर्ग को महिमावन्त पवित्र लोगों से भरना केवल पवित्र आत्मा की सर्वशक्तिमान सामर्थ्य का काम है।

यह भी अपनी स्मृति में लिख लो और कभी न भूलो। पवित्र आत्मा नहीं, तो सच्चा मसीही जीवन नहीं! यदि तुम्हें कभी उद्धार पाना है तो जैसे तुम्हारे लिए मसीह चाहिए, वैसे ही तुम में आत्मा भी चाहिए। परमेश्वर को तुम्हारा प्रेमी पिता होना चाहिए, यीशु को तुम्हारा जाना-पहचाना छुड़ानेवाला होना चाहिए, पवित्र आत्मा को तुम्हारा अनुभव किया हुआ पवित्र करनेवाला होना चाहिए, नहीं तो तुम्हारे लिए जन्म ही न लेना कहीं अच्छा होता!

मैं इन पृष्ठों के सब पाठकों से आग्रह करता हूँ कि इस विषय पर गम्भीरता से विचार करें। मुझे आशा है कि मैंने इतना कह दिया है कि तुम समझ सको कि तुम्हारी आत्मा के लिए "आत्मा पाना" अत्यन्त आवश्यक है। यह कोई गूढ़ और रहस्यमय धर्म-सिद्धान्त नहीं है; यह कोई ऐसा बारीक प्रश्न नहीं जिसका हल इधर हो या उधर, कोई अन्तर न पड़ता हो। यह ऐसा विषय है जिससे तुम्हारी आत्मा की अनन्त शान्ति जुड़ी है।

हो सकता है तुम्हें यह समाचार अच्छा न लगे। तुम इसे उन्माद, कट्टरता या अतिशयोक्ति कह सकते हो। मैं बाइबल की स्पष्ट शिक्षा पर दृढ़ खड़ा हूँ। मैं कहता हूँ कि पृथ्वी पर आत्मा के द्वारा परमेश्वर को तुम्हारे हृदय में वास करना होगा, नहीं तो तुम कभी स्वर्ग में परमेश्वर के साथ वास न करोगे।

तुम कह सकते हो, "अरे, मैं इस बारे में अधिक नहीं जानता। मुझे भरोसा है कि परमेश्वर दयालु होगा। मुझे आशा है कि मैं अन्त में स्वर्ग जाऊँगा।" मैं उत्तर देता हूँ: आज तक किसी ने मसीह की दया का स्वाद नहीं चखा जिसने उसका आत्मा भी न पाया हो। कोई कभी धर्मी न ठहरा जो पवित्र भी न किया गया हो। कोई कभी स्वर्ग न गया जिसे आत्मा वहाँ न ले गया हो।

II. दूसरे, मैं वह बड़ा सामान्य नियम और सिद्धान्त बताता हूँ जिससे यह प्रश्न सुलझाया जा सकता है कि हम में आत्मा है या नहीं।

मैं भली-भाँति समझ सकता हूँ कि यह विचार कि हम जानें कि हम में "पवित्र आत्मा है" या नहीं, बहुत-से लोगों के मन को अप्रिय लगता है। मैं उन आपत्तियों से अनजान नहीं हूँ जिन्हें शैतान स्वभाविक मन में तुरन्त उठा देता है। एक व्यक्ति कहता है, "इसे जानना असम्भव है, यह गूढ़ बात है और हमारी पहुँच से बाहर है।" दूसरा कहता है, "यह इतनी रहस्यमय बात है कि इसकी छानबीन नहीं की जा सकती; हमें इस विषय को अनिश्चित ही छोड़कर सन्तुष्ट रहना चाहिए।" तीसरा कहता है, "इसके विषय में कुछ जानने का दावा करना ठीक नहीं; हमें ऐसे प्रश्नों में पड़ना ही नहीं चाहिए। पवित्र आत्मा के होने की बात तो केवल कट्टरपंथी और उन्मादी लोग ही करते हैं।" मैं ऐसी आपत्तियाँ सुनता हूँ, परन्तु उनसे विचलित नहीं होता। मैं कहता हूँ कि यह जाना जा सकता है कि किसी मनुष्य में पवित्र आत्मा है या नहीं। यह जाना जा सकता है—यह जाना जा सकता है, और यह जाना जाना चाहिए। इसे परखने के लिए न स्वर्ग से कोई दर्शन चाहिए, न किसी स्वर्गदूत का कोई प्रकाशन; इसके लिए केवल परमेश्वर के वचन के प्रकाश में शान्त होकर छानबीन करना ही काफ़ी है। आइए, हम उस छानबीन में प्रवेश करें।

सब लोगों में पवित्र आत्मा नहीं है। मैं इस सिद्धान्त को कि 'सारी मानवजाति के पास एक भीतरी आत्मिक ज्योति है' पवित्रशास्त्र-विरुद्ध भ्रम मानता हूँ। मेरा विश्वास है कि सर्वव्यापी उद्धार की आधुनिक धारणा एक निराधार स्वप्न है। निस्सन्देह परमेश्वर ने अपने आप को पतित मनुष्य के हृदय में बिना गवाही के नहीं छोड़ा। उसने हर मन में भले-बुरे का इतना ज्ञान रख छोड़ा है कि सब लोग उत्तरदायी और जवाबदेह ठहरें। उसने आदम की हर सन्तान को विवेक दिया है—परन्तु आदम की हर सन्तान को पवित्र

आत्मा नहीं दिया है। कोई मनुष्य बिलाम के समान अच्छी इच्छाएँ रख सकता है, हेरोदेस के समान बहुत-से काम कर सकता है, अग्रिप्पा के समान लगभग मना लिया जा सकता है, और फेलिक्स के समान काँप सकता है, फिर भी वह पवित्र आत्मा के अनुग्रह से उतना ही सर्वथा वंचित हो सकता है जितने वे लोग थे। पौलुस हमें बताता है कि मन फिराव से पहले लोग एक अर्थ में "परमेश्वर को जान" सकते हैं, और उनके विचार "एक दूसरे पर दोष लगाते या उन्हें निर्दोष ठहराते" हैं। परन्तु वह यह भी बताता है कि मन फिराव से पहले लोग "परमेश्वर से रहित" और "मसीह से रहित" होते हैं, उन्हें "कोई आशा नहीं" होती, और वे स्वयं "अन्धकार" ही होते हैं। (रोमियों 1:21; 2:15; इफिसियों 2:12; 5:8।) प्रभु यीशु स्वयं पवित्र आत्मा के विषय में कहता है, "जगत उसे ग्रहण नहीं कर सकता, क्योंकि वह न उसे देखता है और न उसे जानता है; तुम उसे जानते हो, क्योंकि वह तुम्हारे साथ रहता है, और वह तुम में होगा।" (यूहन्ना 14:17।)

कलीसियाओं के सब सदस्यों और बपतिस्मा पाए हुए सब लोगों में पवित्र आत्मा नहीं है। मुझे पवित्रशास्त्र में इस कथन का कोई आधार नहीं दिखता कि जो भी बपतिस्मा लेता है वह पवित्र आत्मा पाता है, और हमें उसे आत्मा से जन्मा हुआ मानना चाहिए। मैं बपतिस्मा पाए हुए लोगों से यह कहने का साहस नहीं करता कि उन सब में पवित्र आत्मा है, और उद्धार पाने के लिए उन्हें केवल अपने भीतर के "परमेश्वर के वरदान को उभारना" है। इसके विपरीत मैं देखता हूँ कि यहूदा अपने समय के दृश्य कलीसिया के सदस्यों के विषय में कहता है कि वे "आत्मा से रहित" हैं। सम्भव है उनमें से कुछ का बपतिस्मा प्रेरितों के हाथों हुआ हो और उन्हें अंगीकार करनेवाली कलीसिया की पूर्ण सहभागिता में लिया गया हो। कोई बात नहीं! उनमें "आत्मा नहीं" था। (यहूदा 19।)

इस एक वाक्यांश की शक्ति से बच निकलने का प्रयत्न व्यर्थ है। यह साफ़ सिखाता है कि "आत्मा का होना" हर मनुष्य का भाग नहीं है, और मसीह की दृश्य कलीसिया के हर सदस्य का भी भाग नहीं है। यह ऐसा कोई सामान्य नियम और सिद्धान्त खोज निकालने की आवश्यकता दिखाता है जिससे किसी मनुष्य में पवित्र आत्मा की उपस्थिति जानी जा सके। वह हर किसी में नहीं बसता। बपतिस्मा और कलीसिया की सदस्यता उसकी उपस्थिति का प्रमाण नहीं हैं। तब मैं कैसे जानूँ कि किसी मनुष्य में पवित्र आत्मा है?

किसी मनुष्य की आत्मा में पवित्र आत्मा की उपस्थिति केवल उन प्रभावों से जानी जा सकती है जो वह उत्पन्न करता है। वह मनुष्य के हृदय और जीवन में जो फल उत्पन्न करवाता है, वे ही एकमात्र प्रमाण हैं जिन पर भरोसा किया जा सकता है। यदि हम जानना चाहें कि किसी मनुष्य में पवित्र आत्मा है या नहीं, तो हमें उसके विश्वास, उसके विचारों और उसके आचरण रूपी गवाहों की जाँच करनी होगी। यह प्रभु यीशु का नियम है, "हर एक पेड़ अपने फल से पहचाना जाता है।" (लूका 6:44।)

पवित्र आत्मा जो प्रभाव उत्पन्न करता है वे सदा दिखाई दे सकते हैं। संसारी मनुष्य उन्हें भले न समझे—बहुत-से मामलों में वे दुर्बल और धुँधले भी हो सकते हैं; परन्तु जहाँ पवित्र आत्मा है, वहाँ वह छिपा नहीं रहेगा। जब वह हृदय में प्रवेश करता है तब निष्क्रिय नहीं रहता। वह चुपचाप पड़ा नहीं रहता। वह सोता नहीं। वह अपनी उपस्थिति को प्रकट करेगा। वह धीरे-धीरे मनुष्य की दिनचर्या और बातचीत रूपी खिड़कियों से चमक उठेगा, और संसार पर प्रकट करेगा कि वह उसमें है। आत्मा का सुषुप्त, जड़ और मौन निवास एक ऐसी धारणा है जो बहुतों के मन को भाती है। मुझे परमेश्वर के वचन में इस धारणा के लिए कोई अधिकार नहीं दिखता। मैं पिन्तेकुस्त के रविवार के उपदेश से पूर्णतः सहमत हूँ, "जैसे पेड़ अपने फल से पहचाना जाता है, वैसे ही पवित्र आत्मा भी।"

जिस मनुष्य में मैं पवित्र आत्मा के प्रभाव और फल देखता हूँ, उसमें मैं ऐसा व्यक्ति देखता हूँ जिसमें पवित्र आत्मा है। मैं मानता हूँ कि ऐसा सोचना केवल प्रेमपूर्ण ही नहीं—उस पर सन्देह करना दुस्साहस है। मैं यह आशा नहीं रखता कि पवित्र आत्मा को शरीर की आँखों से देखूँ या अपने हाथों से छूऊँ। परन्तु मुझे यह दिखाने के लिए कि वह कहाँ बसता है किसी स्वर्गदूत के उतरने की आवश्यकता नहीं। मुझे यह बताने के लिए कि वह कहाँ मिलेगा स्वर्ग से किसी दर्शन की आवश्यकता नहीं। बस मुझे ऐसा मनुष्य दिखा दो जिसमें आत्मा के फल दिखाई देते हों, और मैं उसे देखूँगा जिसमें "पवित्र आत्मा है।" जब मैं एक प्रत्यक्ष प्रभाव का बाहरी तथ्य देखता हूँ, तब मैं उस सर्वशक्तिमान कारण की भीतरी उपस्थिति पर सन्देह नहीं करूँगा।

क्या मैं आँधी के दिन हवा को देख सकता हूँ? नहीं देख सकता—परन्तु उसके बल और शक्ति के प्रभाव देख सकता हूँ। जब मैं बादलों को उसके आगे उड़ते और वृक्षों को उसके नीचे झुकते देखता हूँ—जब मैं उसे द्वारों और खिड़कियों में सनसनाते या चिमनियों के सिरों पर गरजते सुनता हूँ, तब मैं क्षण-भर के लिए भी उसके अस्तित्व पर सन्देह नहीं करता। मैं कहता हूँ, "हवा चल रही है।" ठीक ऐसा ही आत्मा में पवित्र आत्मा की उपस्थिति के विषय में भी है।

क्या मैं ग्रीष्म की संध्या में गिरती हुई आकाश की ओस को देख सकता हूँ? नहीं देख सकता। वह धीरे और कोमलता से, बिना आहट और अनजाने उतरती है। परन्तु जब मैं बिना बादल की रात के बाद सुबह बाहर निकलता हूँ, और हर पत्ती को नमी से झिलमिलाते और घास की हर पत्ती को गीली और भीगी हुई पाता हूँ, तो मैं तुरन्त कहता हूँ, "ओस पड़ी है।" ठीक ऐसा ही आत्मा में पवित्र आत्मा की उपस्थिति के विषय में भी है।

क्या जुलाई के महीने में अनाज के खेतों में से गुज़रते समय मैं बोनेवाले का हाथ देख सकता हूँ? नहीं देख सकता। मुझे केवल लाखों बालें दिखाई देती हैं जो दानों से भरी हुई हैं और पकने के कारण भूमि की ओर झुकी जाती हैं—परन्तु क्या मैं यह मान लूँ कि वह फ़सल संयोग से आ गई, और अपने आप उग आई? मैं ऐसा कुछ नहीं मानता। जब मैं उन खेतों को देखता हूँ तो जानता हूँ कि किसी दिन वहाँ हल और पटेला चला था, और किसी हाथ ने वहाँ बीज बोया था। ठीक यही बात आत्मा में पवित्र आत्मा के कार्य की भी है।

क्या मैं कुतुबनुमा की सुई में चुम्बकत्व को देख सकता हूँ? नहीं देख सकता। वह गुप्त और रहस्यमय रीति से काम करता है—परन्तु जब मैं लोहे के उस छोटे से टुकड़े को सदा उत्तर की ओर घूमते देखता हूँ, तो तुरन्त जान लेता हूँ कि वह चुम्बकीय शक्ति के गुप्त प्रभाव में है। ठीक यही बात आत्मा में पवित्र आत्मा के कार्य की भी है।

क्या अपनी घड़ी का मुँह देखते समय मैं उसकी मुख्य कमानी को देख सकता हूँ? नहीं देख सकता। परन्तु जब मैं सुइयों को घूमते और दिन के घण्टे और मिनट क्रम से बताते देखता हूँ, तो कमानी के होने पर कुछ भी सन्देह नहीं करता। ठीक यही बात पवित्र आत्मा के कार्य की भी है।

घर लौटते जहाज़ के पहली बार दिखाई देने पर, जब उसके पाल क्षितिज पर चमकने लगते हैं, क्या मैं उसके खेनेवाले को देख सकता हूँ? नहीं देख सकता। परन्तु जब मैं घाट के सिरे पर खड़ा होकर उस जहाज़ को किसी जीवित वस्तु के समान समुद्र पर से बन्दरगाह के मुहाने की ओर बढ़ते देखता हूँ, तो भली-भाँति जानता हूँ कि पतवार पर कोई है जो उसे चला रहा है। ठीक यही बात पवित्र आत्मा के कार्य की भी है।

मैं अपने सब पाठकों को चेताता हूँ कि इसे स्मरण रखें। इसे अपने मन में एक पक्के सिद्धान्त के रूप में स्थिर कर लें कि यदि पवित्र आत्मा सचमुच किसी व्यक्ति में है, तो वह उन प्रभावों से प्रकट होगा जो वह उसके हृदय और जीवन में उत्पन्न करता है।

यह सोचने से सावधान रहो कि जब आत्मा में उसकी उपस्थिति का कोई बाहरी प्रमाण नहीं है, तब भी मनुष्य में पवित्र आत्मा हो सकता है। ऐसा सोचना एक खतरनाक और पवित्रशास्त्र के विरुद्ध भ्रम है। पवित्रशास्त्र में हमारे लिए जो व्यापक सिद्धान्त रखे गए हैं उन्हें हमें कभी दृष्टि से ओझल नहीं होने देना चाहिए, "यदि हम कहें, कि उसके साथ हमारी सहभागिता है, और फिर अन्धकार में चलें, तो हम झूठे हैं, और सत्य पर नहीं चलते।" "इसी से परमेश्वर की सन्तान और शैतान की सन्तान जाने जाते हैं; जो कोई धर्म के काम नहीं करता, वह परमेश्वर से नहीं।" (1 यूहन्ना 1:6; 3:10।)

तुमने, मुझे सन्देह नहीं, मसीही होने का दावा करनेवालों के एक अभागे वर्ग के विषय में सुना होगा जो एण्टीनोमियन कहलाते हैं। ये वे लोग हैं जो मसीह में उद्धार देनेवाला भाग होने का घमण्ड करते और कहते हैं कि हम क्षमा और पापमुक्ति पा चुके हैं, जबकि साथ ही वे जान-बूझकर पाप में जीते और परमेश्वर की आज्ञाओं को खुले रूप में तोड़ते हैं। मैं कह सकता हूँ कि ऐसे लोग बड़ी दयनीय रीति से धोखे में हैं। वे अपने दाहिने हाथ में झूठ लिए नरक की ओर जा रहे हैं! मसीह का सच्चा विश्वासी "पाप के लिये मरा हुआ" है। जो कोई मसीह में सच्ची आशा रखता है, वह "अपने आप को वैसा ही पवित्र करता है जैसा वह पवित्र है।" (1 यूहन्ना 3:3।)

परन्तु मैं तुम्हें एक ऐसे भ्रम के विषय में बताता हूँ जो एण्टीनोमियन के भ्रम जितना ही खतरनाक है, और उससे कहीं अधिक भुलावे में डालनेवाला है। वह भ्रम यह है—अपने आप को यह कहकर बहलाना कि पवित्र आत्मा तुम्हारे हृदय में वास करता है, जबकि तुम्हारे जीवन में आत्मा का कोई फल दिखाई नहीं देता। मुझे दृढ़ विश्वास है कि यह भ्रम हज़ारों को उतने ही निश्चित रूप से नाश कर रहा है जितना एण्टीनोमियनवाद। पवित्र आत्मा का अनादर करना उतना ही संकटपूर्ण है जितना मसीह का अनादर करना। पवित्र आत्मा के कार्य में भाग होने का ढोंग करना परमेश्वर को उतना ही अप्रिय है जितना मसीह के कार्य में भाग होने का ढोंग करना।

एक बार और सदा के लिए मैं अपने पाठकों को चेताता हूँ कि स्मरण रखें: जो प्रभाव पवित्र आत्मा उत्पन्न करता है वही उसकी उपस्थिति के एकमात्र विश्वसनीय प्रमाण हैं। यह कहना कि पवित्र आत्मा तुम में वास करता है और फिर भी तुम्हारे जीवन में दिखाई नहीं देता, सचमुच एक उन्मत्त बात है। यह सुसमाचार के मूल सिद्धान्तों को उलझा देती है—यह ज्योति और अन्धकार को, स्वभाव और अनुग्रह को, मन फिराव और अपरिवर्तन को, विश्वास और अविश्वास को, परमेश्वर की सन्तान और शैतान की सन्तान को एक में मिला देती है।

इस विषय में केवल एक ही सुरक्षित स्थान है। इस प्रश्न का कि "हम कैसे निर्णय करें कि किसमें पवित्र आत्मा है?" केवल एक ही सुरक्षित उत्तर है। हमें उस पुराने सिद्धान्त पर दृढ़ रहना चाहिए जो हमारे प्रभु यीशु मसीह ने ठहराया है, "उनके फलों से तुम उन्हें पहचान लोगे।" (मत्ती 7:20।) जहाँ पवित्र आत्मा है वहाँ फल होगा—जिसमें पवित्र आत्मा का फल नहीं, उसमें पवित्र आत्मा नहीं। पवित्र आत्मा का ऐसा कार्य जो अनुभव न हो, दिखाई न दे, और जिसका कोई प्रभाव न हो, एक बड़ा भ्रम है। जहाँ पवित्र आत्मा सचमुच है वहाँ वह अनुभव किया जाएगा, दिखाई देगा और जाना जाएगा।

III. अब अन्त में मैं उन विशेष प्रभावों का वर्णन करता हूँ जो पवित्र आत्मा उन आत्माओं में उत्पन्न करता है जिनमें वह वास करता है।

मैं इस विषय के इस भाग को सबसे महत्त्वपूर्ण मानता हूँ। अब तक मैंने उन बड़े प्रमुख सिद्धान्तों के विषय में सामान्य रूप से कहा है जो पवित्र आत्मा के कार्य के विषय में पूछताछ करने में हमारा मार्गदर्शन करें। अब मुझे और निकट आकर उन विशेष चिह्नों के विषय में कहना चाहिए जिनसे किसी व्यक्ति के हृदय में पवित्र आत्मा की उपस्थिति पहचानी जा सकती है। सौभाग्य से, बाइबल को अपनी ज्योति बनाकर इन चिह्नों को खोज निकालना कठिन नहीं है।

इस विषय में पूरी तरह प्रवेश करने से पहले मैं कुछ बातें कह देना चाहता हूँ। मार्ग साफ करने के लिए यह आवश्यक है।

(क) मैं खुले मन से मानता हूँ कि पवित्र आत्मा के कार्य में कुछ गहरे रहस्य हैं। मैं उसके हृदय में आने की रीति को नहीं समझा सकता। "हवा जिधर चाहती है उधर बहती है, और तू उसका शब्द सुनता है, परन्तु नहीं जानता, कि वह कहाँ से आती और कहाँ को जाती है; जो कोई आत्मा से जन्मा है वह ऐसा ही है।" (यूहन्ना 3:8।) मैं यह नहीं समझा सकता कि वह एक हृदय में क्यों आता है और दूसरे में क्यों नहीं—वह इस मनुष्य में क्यों वास करने को नीचे उतरता है और उस में क्यों नहीं। मैं केवल इतना जानता हूँ कि ऐसा ही है। वह सर्वसत्ताधारी की रीति से काम करता है। कलीसिया की प्रश्नोत्तरी के शब्दों में, वह "परमेश्वर के चुने हुए लोगों" को पवित्र करता है। परन्तु मुझे यह भी स्मरण है कि मैं यह नहीं समझा सकता कि मैं मूर्तिपूजक अफ्रीका में नहीं बल्कि मसीही इंग्लैण्ड में क्यों जन्मा। मैं इस बात से सन्तुष्ट हूँ कि परमेश्वर का सारा कार्य भली रीति से किया गया है। मेरे लिए इतना ही बहुत है कि मैं राजा के दरबार में हूँ, चाहे राजा की मन्त्रणा में न होऊँ।

(ख) मैं खुले मन से मानता हूँ कि जिन कार्यों के द्वारा पवित्र आत्मा मनुष्यों की आत्माओं में अपना काम करता है, उनमें बड़ी-बड़ी भिन्नताएँ होती हैं। जिन अवस्थाओं में वह हृदय में प्रवेश करना आरम्भ करता है, उनमें अन्तर होता है। किसी में वह छोटी अवस्था में ही आरम्भ करता है, जैसे यूहन्ना बपतिस्मा देनेवाले और तीमुथियुस में; किसी में वह बुढ़ापे में आरम्भ करता है, जैसे मनश्शे और जक्काई में। जो भावनाएँ वह हृदय में सबसे पहले जगाता है, उनमें भी अन्तर होता है। किसी को वह गहरे भय और घबराहट के द्वारा ले चलता है, जैसे फिलिप्पी के जेलर को; किसी को वह सत्य को ग्रहण करने के लिये उसका हृदय कोमलता से खोलकर ले चलता है, जैसे लुदिया को। चरित्र के इस पूर्ण परिवर्तन को पूरा करने में जो समय लगता है, उसमें भी अन्तर होता है। किसी में परिवर्तन तुरन्त और अचानक होता है, जैसे शाऊल में जब वह दमिश्क की यात्रा कर रहा था; दूसरों में वह धीरे-धीरे और मन्द गति से होता है, जैसे फरीसी नीकुदेमुस में। उन साधनों में भी अन्तर होता है जिन्हें वह आत्मा को उसकी स्वाभाविक मृत्यु से पहले-पहल जगाने में काम में लाता है। किसी के लिये वह उपदेश को काम में लाता है, किसी के लिये बाइबल को, किसी के लिये एक छोटी पुस्तिका को, किसी के लिये मित्र की सलाह को, किसी के लिये रोग या विपत्ति को, और किसी के लिये ऐसी कोई एक विशेष बात नहीं होती जिसका स्पष्ट रूप से पता लगाया जा सके। इन सब बातों को समझना अत्यन्त आवश्यक है। सब लोगों से यह अपेक्षा करना कि वे सब एक ही प्रकार के अनुभव के साँचे में ढाले जाएँ, बहुत ही गम्भीर भूल है!

(ग) मैं खुले मन से मानता हूँ कि पवित्र आत्मा के कार्य का आरम्भ प्रायः छोटा और अदृश्य होता है। जिस बीज से आत्मिक चरित्र बनता है, वह आरम्भ में प्रायः बहुत ही छोटा होता है। आत्मिक जीवन का स्रोत, अनेक बड़ी नदियों के स्रोत के समान, अपने आरम्भ में प्रायः केवल एक पतली-सी बहती धारा होता है। इसलिये किसी आत्मा में पवित्र आत्मा के कार्य के आरम्भ को संसार प्रायः अनदेखा कर देता है; अन्य मसीही लोग भी बहुधा उसका उचित मूल्य नहीं आँकते और उसे प्रोत्साहन नहीं देते; और जिस आत्मा में वह कार्य हो रहा होता है, वह स्वयं भी बिना किसी अपवाद के उसे पूरी तरह गलत समझती है। इसे कभी न भूलना चाहिये। जिस मनुष्य में पवित्र आत्मा काम करना आरम्भ करता है, उसे बहुत समय बाद तक शायद ही पता चलता है कि अपने मन फिराव के समय के आसपास उसके मन की जो दशा थी, वह पवित्र आत्मा के प्रवेश करने से उत्पन्न हुई थी।

परन्तु इन सब मानी हुई बातों और छूटों के बाद भी कुछ बड़े और मुख्य प्रभाव हैं जिन्हें पवित्र आत्मा उस आत्मा में उत्पन्न करता है जिसमें वह वास करता है, और वे सदा एक ही समान होते हैं।

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