68 में से अध्याय 43

ये पवित्र आत्मा की उपस्थिति के बड़े चिह्न हैं। यह प्रश्न

यह हिन्दी संस्करण अंग्रेज़ी मूल से पूर्ण रूप से, अनुच्छेद-दर-अनुच्छेद, कृत्रिम बुद्धि (AI) की सहायता से अनुवादित है; मानवीय समीक्षा जारी है। अध्ययन के लिए अंग्रेज़ी मूल पाठ ही प्रामाणिक है। कोई त्रुटि दिखे तो [email protected] पर लिखें।

ये पवित्र आत्मा की उपस्थिति के बड़े चिह्न हैं। यह प्रश्न

मुझे आशा है कि आप मुझसे यह नहीं कहेंगे कि आप नहीं जानते कि आत्मा के चिह्न क्या हैं। मैंने उन्हें स्पष्ट रूप से बताया है। अब मैं उन्हें संक्षेप में दोहराता हूँ, और आपके ध्यान में रखने का आग्रह करता हूँ।

1. आत्मा मनुष्यों के हृदयों को जिलाता है।

2. आत्मा मनुष्यों के मन को सिखाता है।

3. आत्मा वचन की ओर ले जाता है।

4. आत्मा पाप का कायल करता है।

5. आत्मा मसीह की ओर खींचता है।

6. आत्मा पवित्र करता है।

7. आत्मा लोगों को आत्मिक मन वाला बनाता है।

8. आत्मा भीतरी संघर्ष उत्पन्न करता है।

9. आत्मा लोगों को भाइयों से प्रेम करना सिखाता है।

10. आत्मा प्रार्थना करना सिखाता है।

ये पवित्र आत्मा की उपस्थिति के बड़े चिह्न हैं। अपने विवेक से पुरुषार्थ के साथ यह प्रश्न पूछिए—क्या आत्मा ने आपकी आत्मा के लिये इस प्रकार का कुछ किया है?

मैं आपको चिताता हूँ कि मेरे प्रश्न का उत्तर देने का प्रयत्न किए बिना बहुत दिन बीतने न दें। एक विश्वासयोग्य पहरेदार की भाँति आपके हृदय के द्वार पर खटखटाते हुए मैं आपको बुलाता हूँ कि इस बात का निपटारा कर लीजिए। हम एक पुराने, थके हुए, पाप के बोझ से दबे हुए संसार में रहते हैं। कौन जान सकता है कि "एक दिन में क्या होगा?" कौन दूसरा वर्ष देखने के लिये जीवित रहेगा? क्या आपके पास आत्मा है? (नीतिवचन 27:1।)

(ख) क्या आप आगे यह जानना चाहेंगे कि हमारे समय के मसीही धर्म की सबसे बड़ी त्रुटि क्या है? मेरी सुनिए, मैं आपको बताता हूँ।

जिस बड़ी त्रुटि की मैं बात करता हूँ वह केवल यह है कि बहुत से लोगों का मसीही धर्म वास्तव में मसीही धर्म है ही नहीं। मैं जानता हूँ कि ऐसी राय कठोर और चौंकाने वाली रीति से निर्दयी लगती है। मैं इसमें कुछ नहीं कर सकता—मुझे विश्वास है कि यह दुःख के साथ सत्य है। मैं केवल यह चाहता हूँ कि लोगों का मसीही धर्म वैसा हो जैसा बाइबल का है; परन्तु मुझे बहुत सी दशाओं में अत्यन्त सन्देह है कि ऐसा है।

मेरा विश्वास है कि अंग्रेज़ों की एक बड़ी भीड़ ऐसी है जो हर रविवार को केवल रीति के रूप में गिरजे या चैपल में जाती है। उनके पिता या माता जाते थे, इसलिये वे जाते हैं; देश में जाने का चलन है, इसलिये वे जाते हैं; धार्मिक सभा में उपस्थित होना और उपदेश सुनना रिवाज है, इसलिये वे जाते हैं। परन्तु सच्चे, जीवित, उद्धार देनेवाले धर्म के विषय में—वे न कुछ जानते हैं न कुछ परवाह करते हैं। वे सुसमाचार के विशेष सिद्धान्तों का कोई विवरण नहीं दे सकते। धर्मी ठहराया जाना, नया जन्म और पवित्रीकरण ऐसे "शब्द और नाम" हैं जिन्हें वे समझा नहीं सकते। उनके मन में शायद एक प्रकार का धुंधला विचार हो कि उन्हें प्रभु-भोज में जाना चाहिए, और वे मसीह के विषय में कुछ धुंधले शब्द कह भी लें—परन्तु उद्धार के मार्ग की उन्हें कोई समझदारी भरी धारणा नहीं है। पवित्र आत्मा के विषय में वे इससे अधिक शायद ही कुछ कह सकें कि उन्होंने उसका नाम सुना है।

अब यदि इस लेख का कोई पाठक यह जानता है कि उसका धर्म वैसा ही है जैसा मैंने वर्णन किया, तो मैं उसे केवल प्रेम से चेतावनी दूँगा कि स्मरण रखे कि ऐसा धर्म बिलकुल व्यर्थ है। यह न उसकी आत्मा को बचाएगा, न शान्ति देगा, न सन्तुष्ट करेगा, न पवित्र करेगा। और मेरी स्पष्ट सलाह यह है कि वह बिना देर किए इसे किसी उत्तम वस्तु से बदल ले। मेरे शब्द स्मरण रखिए। अन्त में यह काम न आएगा।

(ग) क्या आप आगे सुसमाचार के एक ऐसे सत्य के विषय में जानना चाहेंगे जिसके लिये आज हमें विशेष रूप से सजग रहने की आवश्यकता है? सुनिए, मैं आपको बताता हूँ।

जिस सत्य की मैं बात करता हूँ वह पवित्र आत्मा के कार्य का सत्य है। निस्सन्देह सारा सत्य शैतान के आक्रमणों का निरन्तर निशाना रहता है। मेरी कोई इच्छा नहीं कि एक क्षण के लिये भी आत्मा के पद को बढ़ा-चढ़ाकर कहूँ—और उसे सुसमाचार के सूर्य और केन्द्र—यीशु मसीह—से ऊपर ठहराऊँ। परन्तु

मेरा विश्वास है कि मसीह के याजकीय पद के बाद आज के समय में कोई सत्य इतनी बार आँखों से ओझल नहीं किया जाता, और इतने छल से उस पर आक्रमण नहीं किया जाता, जितना आत्मा के कार्य पर। कुछ लोग अज्ञानता से उसकी उपेक्षा करके उसे हानि पहुँचाते हैं—उनकी सारी बातें मसीह के विषय में होती हैं। वे आपको "उद्धारकर्ता" के विषय में कुछ बता सकते हैं; परन्तु यदि आप उनसे आत्मा के उस भीतरी कार्य के विषय में पूछें जिसका अनुभव वे सब करते हैं जो सचमुच उद्धारकर्ता को जानते हैं, तो उनके पास कहने को एक शब्द नहीं।

कुछ लोग आत्मा के कार्य को हानि पहुँचाते हैं यह मानकर कि वह तो हो ही चुका है। कलीसिया की सदस्यता और संस्कारों में भाग लेना उनके लिये मन फिराव और आत्मिक नए जन्म का स्थान ले लेता है। कुछ लोग आत्मा के कार्य को स्वाभाविक विवेक की क्रिया के साथ घालमेल करके हानि पहुँचाते हैं। इस निम्न दृष्टि के अनुसार केवल मनुष्यों में सबसे कठोर और पतित लोग ही पवित्र आत्मा से रहित हैं। सत्य से ऐसे सब भटकावों के विरुद्ध हम चौकसी करें और सावधान रहें। हम सुसमाचार के कथनों के अनुपात को छोड़ देने से सावधान रहें। आज के समय में हमारा एक मुख्य नारा यह हो—आत्मा के भीतरी कार्य के बिना कोई उद्धार नहीं! पवित्र आत्मा का कोई भीतरी कार्य नहीं जब तक वह देखा, अनुभव किया और जाना न जा सके! आत्मा का कोई उद्धार देनेवाला कार्य नहीं जो परमेश्वर की ओर मन फिराव और यीशु मसीह की ओर जीवित विश्वास में प्रकट न हो!

(घ) क्या आप आगे यह जानना चाहेंगे कि हम जो सुसमाचार के सेवक हैं, जब तक कोई जीवित है और हमारी सुनता है, उसके विषय में कभी निराश क्यों नहीं होते? सुनिए, मैं आपको बताता हूँ।

हम कभी निराश नहीं होते, क्योंकि हम पवित्र आत्मा की सामर्थ्य में विश्वास करते हैं। जब हम अपने कामों को देखते हैं तो हमारे पास निराश होने का पूरा कारण है—हम अक्सर स्वयं से ऊब जाते हैं! जब हम अपनी सभाओं के कुछ लोगों को देखते हैं तो भी निराश होने का कारण है—वे नीचे की चक्की के पाट के समान कठोर और संवेदनहीन लगते हैं। परन्तु हम पवित्र आत्मा को स्मरण करते हैं, और जो कुछ उसने किया है उसे स्मरण करते हैं; हम पवित्र आत्मा को स्मरण करते हैं, और सोचते हैं कि वह बदला नहीं है। वह आग की नाईं उतरकर सबसे कठोर हृदयों को पिघला सकता है! वह हमारे सुननेवालों में सबसे बुरे पुरुष या स्त्री को भी परिवर्तित कर सकता है, और उसके पूरे चरित्र को नए साँचे में ढाल सकता है। और इसलिये हम प्रचार करते रहते हैं। हम पवित्र आत्मा के कारण आशा रखते हैं। ओह, कि हमारे सुननेवाले समझ जाएँ कि सच्चे धर्म की उन्नति "न तो बल से, और न शक्ति से," वरन् प्रभु के आत्मा से होती है! ओह, कि उनमें से बहुत से सेवकों पर कम निर्भर रहना, और पवित्र आत्मा के लिये अधिक प्रार्थना करना सीख लें! ओह, कि सब पाठशालाओं, पर्चों और कलीसियाई तंत्र से कम आशा रखना सीखें, और सब साधनों का परिश्रम से उपयोग करते हुए आत्मा के उण्डेले जाने के लिये अधिक गम्भीरता से खोज करें। (जकर्याह 4:6।)

(ङ) क्या आप आगे यह जानना चाहेंगे कि यदि आपका विवेक आपसे कहता है कि आपके पास आत्मा नहीं है तो आपको क्या करना चाहिए? सुनिए, मैं आपको बताता हूँ।

यदि तुम्हारे पास आत्मा नहीं है, तो तुम्हें तुरन्त प्रार्थना में प्रभु यीशु मसीह के पास जाना चाहिए, और उससे विनती करनी चाहिए कि वह तुम पर दया करे और तुम्हें आत्मा भेजे। जो लोग यह कहते हैं कि पहले पवित्र आत्मा के लिए प्रार्थना करो, ताकि दूसरे स्थान पर मसीह के पास जा सको, उनसे मुझे ज़रा भी सहानुभूति नहीं है। ऐसा कहने के लिए मुझे पवित्रशास्त्र में कोई आधार नहीं दिखता। मुझे तो केवल यह दिखता है कि जब लोग अनुभव करें कि वे दीन और नाश होते हुए पापी हैं, तो उन्हें सबसे पहले सीधे और प्रत्यक्ष रूप से यीशु मसीह के पास जाना चाहिए। मैं देखता हूँ कि वह स्वयं कहता है, "यदि कोई प्यासा हो तो मेरे पास आकर पीए।" (यूहन्ना 7:37।) मैं जानता हूँ कि लिखा है, "तू ने मनुष्यों से, वरन हठीलों से भी भेंटें लीं, ताकि याह परमेश्वर उनके बीच निवास करे।" (भजन संहिता 68:18।) मैं जानता हूँ कि पवित्र आत्मा से बपतिस्मा देना उसका विशेष कार्य है, और यह भी कि "उसमें सारी परिपूर्णता का वास है।" मैं यह दिखावा करने का साहस नहीं करता कि मैं बाइबल से अधिक व्यवस्थित हूँ। मैं विश्वास करता हूँ कि मसीह परमेश्वर और आत्मा के मिलन का स्थान है, और जो कोई आत्मा चाहता है उसे मेरी पहली सलाह सदा यही होगी, "यीशु के पास जा, और अपनी आवश्यकता उसे बता!" (कुलुस्सियों 1:19।)

इसके अतिरिक्त मैं यह भी कहूँगा कि यदि तुम्हारे पास आत्मा नहीं है, तो तुम्हें अनुग्रह के उन साधनों में परिश्रम से उपस्थित रहना चाहिए जिनके द्वारा आत्मा कार्य करता है। तुम्हें नियमित रूप से उस वचन को सुनना चाहिए जो उसकी तलवार है; तुम्हें आदतन उन सभाओं में जाना चाहिए जहाँ उसकी उपस्थिति की प्रतिज्ञा है। संक्षेप में, यदि तुम चाहते हो कि आत्मा तुम्हारा भला करे, तो तुम्हें आत्मा के मार्ग में पाया जाना चाहिए। अंधा बरतिमाई यदि आलस्य से घर में बैठा रहता और निकलकर मार्ग के किनारे न बैठता, तो उसे कभी दृष्टि न मिलती। यदि जकई आगे दौड़कर गूलर के पेड़ पर न चढ़ता, तो शायद वह कभी यीशु को न देखता और अब्राहम का पुत्र न बनता। आत्मा प्रेममय और भला आत्मा है। परन्तु जो अनुग्रह के साधनों को तुच्छ जानता है, वह पवित्र आत्मा का विरोध करता है।

इन दो बातों को स्मरण रखो। मैं दृढ़ता से विश्वास करता हूँ कि जिस किसी मनुष्य ने इन दोनों सलाहों पर सच्चाई और लगन से चलकर काम किया, उसे देर-सबेर आत्मा अवश्य मिला।

(च) अब क्या तुम जानना चाहोगे कि यदि तुम अपनी दशा के विषय में सन्देह में हो, और यह न कह सको कि तुम्हारे पास आत्मा है या नहीं, तो तुम्हें क्या करना चाहिए? सुनो, मैं तुम्हें बताता हूँ।

यदि तुम्हें सन्देह है कि तुम्हारे पास आत्मा है या नहीं, तो तुम्हें शान्ति से जाँचना चाहिए कि तुम्हारे सन्देह उचित आधार पर हैं या नहीं। मुझे भय है कि बहुत से सच्चे विश्वासी ऐसे हैं जिन्हें अपनी दशा के विषय में कोई दृढ़ निश्चयता नहीं है—सन्देह करना ही उनका जीवन है। मैं ऐसे लोगों से कहता हूँ कि अपनी बाइबल उठाओ, और अपनी चिन्ताओं के कारणों पर शान्ति से विचार करो। मैं उनसे कहता हूँ कि विचार करो कि तुम्हारा पाप का बोध, चाहे कितना ही दुर्बल हो—मसीह के प्रति तुम्हारा प्रेम, चाहे कितना ही मन्द हो—पवित्रता की तुम्हारी लालसा, चाहे कितनी ही निर्बल हो—परमेश्वर के लोगों की संगति में तुम्हारा आनन्द—प्रार्थना और वचन की ओर तुम्हारा झुकाव, ये सब कहाँ से आए? मैं पूछता हूँ, ये बातें कहाँ से आईं? क्या ये तुम्हारे अपने हृदय से आईं? निश्चय ही नहीं! पापी मानव स्वभाव ऐसा फल नहीं लाता। क्या ये शैतान से आईं? निश्चय ही नहीं! शैतान शैतान के विरुद्ध युद्ध नहीं करता। तो फिर मैं दोहराकर पूछता हूँ, ये बातें कहाँ से आईं? मैं तुम्हें चिताता हूँ कि सावधान रहो, कहीं ऐसा न हो कि पवित्र आत्मा के कार्यों की सच्चाई पर सन्देह करके तुम उसे शोकित करो। मैं तुमसे कहता हूँ कि अब समय आ गया है कि तुम विचार करो कि कहीं तुम किसी ऐसी 'आन्तरिक सिद्धता' की आशा तो नहीं करते रहे जिसकी आशा करने का तुम्हें कोई अधिकार नहीं था, और साथ ही उस वास्तविक कार्य को कृतघ्नता से तुच्छ तो नहीं ठहरा रहे जो पवित्र आत्मा ने तुम्हारी आत्माओं में सचमुच किया है।

एक महान राजनेता ने एक बार कहा था कि यदि कोई विदेशी पहली बार इंग्लैंड आए, उसकी आँखों पर पट्टी बँधी हो और कान खुले हों—वह सब कुछ सुने—परन्तु कुछ न देखे—तो वह भली-भाँति सोच सकता है कि इंग्लैंड विनाश के मार्ग पर है; अंग्रेज़ लोगों की कुड़कुड़ाहट इतनी अधिक है। फिर भी यदि वही विदेशी इंग्लैंड आए और उसके कान बन्द हों और आँखें खुली हों—वह सब कुछ देखे और कुछ न सुने—तो वह सम्भवतः सोचेगा कि इंग्लैंड संसार का सबसे धनी और समृद्ध देश है, क्योंकि उसे समृद्धि के इतने चिह्न दिखाई देंगे।

मैं प्रायः इस टिप्पणी को सन्देह करनेवाले मसीहियों पर लागू करने को प्रवृत्त होता हूँ। यदि मैं उनकी अपने विषय में कही सारी बातों पर विश्वास कर लूँ, तो निश्चय ही मैं सोचूँगा कि उनकी दशा बुरी है। परन्तु जब मैं उन्हें वैसा जीवन जीते देखता हूँ जैसा वे जीते हैं—धार्मिकता के भूखे और प्यासे, मन के दीन, पवित्रता की लालसा रखनेवाले, मसीह के नाम से प्रेम करनेवाले, बाइबल पढ़ने और प्रार्थना की आदतों को बनाए रखनेवाले—जब मैं ये बातें देखता हूँ तो मेरा भय जाता रहता है। मैं अपने कानों से अधिक अपनी आँखों पर भरोसा करता हूँ। मैं आत्मा की उपस्थिति के स्पष्ट चिह्न देखता हूँ, और केवल इस बात का शोक करता हूँ कि वे स्वयं उन्हें देखने से इनकार करते हैं। मैं देखता हूँ कि शैतान उनके मन में ये सन्देह डालकर उनकी शान्ति छीन रहा है, और मैं शोक करता हूँ कि वे उसका विश्वास करके अपनी ही हानि करते हैं। कुछ अगुवे, निस्सन्देह, यह सन्देह करने में उचित हो सकते हैं कि उनके पास "आत्मा है" या नहीं, क्योंकि उनमें अनुग्रह का कोई चिह्न नहीं है। परन्तु बहुत से लोग अपने मन में सन्देह की ऐसी आदत पालते हैं जिसका उनके पास कोई कारण नहीं है, और जिस पर उन्हें लज्जित होना चाहिए।

(छ) अन्त में, क्या तुम जानना चाहोगे कि यदि तुम्हारे पास सचमुच आत्मा है, तो तुम्हें क्या करना चाहिए? मेरी सुनो, मैं तुम्हें बताता हूँ।

यदि तुम्हारे पास आत्मा है, तो "आत्मा से परिपूर्ण होते जाओ।" (इफिसियों 5:18।) जीवित जल को गहराई से पीओ। थोड़े से धर्म से सन्तुष्ट न हो। प्रार्थना करो कि आत्मा तुम्हारे हृदय के हर कोने और कक्ष को भर दे, और उसमें संसार और शैतान के लिए एक इंच भी स्थान शेष न रहे।

यदि तुम्हारे पास आत्मा है, तो "पवित्र आत्मा को शोकित मत करो।" (इफिसियों 4:30।) विश्वासियों के लिए उसकी उपस्थिति के बोध को दुर्बल कर देना और अपने आप को उसकी शान्ति से वंचित कर लेना सरल है। छोटे पाप जिन्हें मारा न गया, स्वभाव या जीभ की छोटी बुरी आदतें जिन्हें सुधारा न गया, संसार के साथ छोटे समझौते—ये सब पवित्र आत्मा को अप्रसन्न करने की सम्भावना रखते हैं। ओह, कि विश्वासी इसे स्मरण रखते! "पृथ्वी पर स्वर्ग" का आनन्द उससे कहीं अधिक उठाया जा सकता है जितना उनमें से बहुत से उठा पाते हैं—और वे उसे क्यों नहीं पाते? वे अपने दैनिक आचरण पर पर्याप्त चौकसी नहीं रखते, और इस कारण आत्मा का कार्य मन्द पड़ता और रुकता है। यदि आत्मा को तुम्हारी आत्मा का शान्तिदाता होना है, तो उसे पूर्ण रूप से पवित्र करनेवाला आत्मा होना होगा।

यदि तुम में पवित्र आत्मा है, तो आत्मा के सब फल उत्पन्न करने के लिए परिश्रम करो। "पर आत्मा का फल प्रेम, आनन्द, शान्ति, धीरज, कृपा, भलाई, विश्वास, नम्रता, और संयम हैं; ऐसे ऐसे कामों के विरोध में कोई भी व्यवस्था नहीं। और जो मसीह यीशु के हैं, उन्होंने शरीर को उसकी लालसाओं और अभिलाषाओं समेत क्रूस पर चढ़ा दिया है।" (गलातियों 5:22-24)

प्रेरित ने जो सूची बनाई है उसे पढ़ो, और देखो कि इन फलों में से एक भी उपेक्षित न रह जाए। आह, कि विश्वासी और अधिक "प्रेम" और अधिक "आनन्द" के लिए यत्न करते! तब वे सब मनुष्यों का और अधिक भला करते; तब वे स्वयं और अधिक सुखी होते; तब वे संसार की दृष्टि में धर्म को और अधिक सुन्दर बनाते!

मैंने जो बातें लिखी हैं, उन्हें मैं इन पृष्ठों के प्रत्येक पाठक के गम्भीर ध्यान के लिए सौंपता हूँ। ऐसा न हो कि वे व्यर्थ ही लिखी गई हों। मेरे साथ मिलकर प्रार्थना करो कि पवित्र आत्मा ऊपर से पहले की किसी भी बार से अधिक भरपूरी के प्रभाव के साथ उण्डेला जाए। प्रार्थना करो कि वह देश और परदेश के सब विश्वासियों पर उण्डेला जाए, कि वे और अधिक एक और अधिक पवित्र हों। प्रार्थना करो कि वह यहूदियों, मुसलमानों और अन्यजातियों पर उण्डेला जाए, कि उनमें से बहुत से मन फिराएँ।

प्रार्थना करो कि वह रोमन कैथोलिकों पर, और विशेष करके इटली और आयरलैंड में, उण्डेला जाए। प्रार्थना करो कि वह तुम्हारे अपने देश पर उण्डेला जाए, और वह उन न्यायदण्डों से बचा रहे जिनके वह योग्य है। प्रार्थना करो कि वह सब विश्वासयोग्य सेवकों और मिशनरियों पर उण्डेला जाए, और उनकी संख्या सौ गुनी बढ़ जाए। सबसे बढ़कर यह प्रार्थना करो कि वह भरपूर सामर्थ्य के साथ तुम्हारी अपनी आत्मा पर उण्डेला जाए—कि यदि तुम सत्य को नहीं जानते, तो तुम्हें उसे जानना सिखाया जाए, और यदि जानते हो, तो उसे और भी अच्छी रीति से जानो।

मन फिराव और परिवर्तन

"इसलिए मन फिराओ और लौट आओ।" प्रेरितों के काम 3:19

"मैं तुम से सच कहता हूँ, यदि तुम न फिरो और बालकों के समान न बनो, तो स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने न पाओगे।" मत्ती 18:3

इस लेख का जो विषय है, वह सारी मनुष्य-जाति को छूता है। यह सब श्रेणियों और वर्गों के लोगों को, ऊँचे हों या नीचे, धनी हों या निर्धन, बूढ़े हों या जवान, कुलीन हों या साधारण, सबको अपना ही विषय जान पड़ना चाहिए। कोई भी मनुष्य बिना धन, पद या विद्या के स्वर्ग पहुँच सकता है। परन्तु कोई भी, चाहे कितना ही बुद्धिमान, धनवान, कुलीन या सुन्दर क्यों न हो, परिवर्तन के बिना कभी स्वर्ग नहीं पहुँचेगा।

छः दृष्टिकोण हैं जिनसे मैं इस लेख के विषय पर विचार करना चाहता हूँ। मैं यह दिखाने का यत्न करूँगा कि परिवर्तन—

I. एक पवित्रशास्त्रीय बात है

II. एक वास्तविक बात है

III. एक आवश्यक बात है

IV. एक सम्भव बात है

V. एक आनन्दमय बात है

VI. एक ऐसी बात है जो देखी जा सकती है

I. सबसे पहले मैं यह दिखाता हूँ कि परिवर्तन एक पवित्रशास्त्रीय बात है।

इससे मेरा तात्पर्य यह है कि परिवर्तन ऐसी बात है जिसका स्पष्ट उल्लेख बाइबल में है। धर्म में किसी भी बात के विषय में सबसे पहले हमें यही निश्चित करना होता है। इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता कि कौन कोई बात कहता है और उसे धर्म का सत्य बताता है; इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता कि हमें कोई सिद्धान्त अच्छा लगता है या बुरा। क्या वह बाइबल में है? केवल यही प्रश्न है। यदि है, तो हमें उसे अस्वीकार करने का कोई अधिकार नहीं। यदि हम बाइबल के किसी सत्य को इसलिए ठुकराते हैं कि वह हमें अच्छा नहीं लगता, तो हम अपनी आत्मा को जोखिम में डालकर ऐसा करते हैं, और हमारे लिए यही अच्छा होगा कि हम तुरन्त अविश्वासी बन जाएँ। यह ऐसा सिद्धान्त है जिसे कभी नहीं भूलना चाहिए।

आओ, हम बाइबल की ओर फिरें। सुनो, दाऊद क्या कहता है, "यहोवा की व्यवस्था खरी है, वह प्राण को बहाल कर देती है", "पापी तेरी ओर फिरेंगे।" (भजन संहिता 19:7; 51:13) सुनो, हमारा प्रभु यीशु मसीह क्या कहता है, "जब तक तुम न फिरो और बालकों के समान न बनो, तब तक स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने न पाओगे।" (मत्ती 18:3) सुनो, पतरस क्या कहता है, "इसलिए मन फिराओ और लौट आओ कि तुम्हारे पाप मिटाए जाएँ।" (प्रेरितों के काम 3:19) सुनो, याकूब क्या कहता है, "जो कोई किसी पापी को उसके भटके हुए मार्ग से फेर लाएगा, वह एक प्राण को मृत्यु से बचाएगा, और बहुत से पापों पर परदा डालेगा।" (याकूब 5:20)

मैं पवित्रशास्त्र के इस प्रमाण में सरलता से और बढ़ा सकता हूँ। मैं ऐसे बहुत से अंश उद्धृत कर सकता हूँ जिनमें परिवर्तन का विचार तो है, पर शब्द स्वयं प्रयुक्त नहीं हुआ। नया किया जाना—बदला जाना—नए सिरे से रचा जाना—मरे हुओं में से जिलाया जाना—ज्योति पाना—मृत्यु से जीवन में पार होना—नया जन्म पाना—पुराने मनुष्यत्व को उतार फेंकना और नए मनुष्यत्व को पहिन लेना—ये सब पवित्रशास्त्र की ऐसी अभिव्यक्तियाँ हैं जिनका अर्थ वही है जो परिवर्तन का है। ये सब एक ही बात हैं, जो भिन्न दृष्टिकोण से देखी गई है। परन्तु इन विषयों में जितना पर्याप्त है वही भोज के बराबर है। मेरी पहली स्थापना की सच्चाई में कोई सन्देह नहीं हो सकता—कि परिवर्तन एक पवित्रशास्त्रीय बात है। यह मनुष्य की गढ़ी हुई कोई युक्ति नहीं है—यह बाइबल में है।

तुम मुझसे शायद कहो कि तुम्हें "पदों" की परवाह नहीं। तुम कह सकते हो कि तुम अपने धर्म के प्रश्नों का निर्णय अलग-अलग पदों से करने के आदी नहीं हो। यदि तुम्हारी दशा ऐसी है, तो मुझे तुम्हारे लिए खेद है। हमारा प्रभु यीशु मसीह और उसके प्रेरित अकसर अलग-अलग पदों को उद्धृत करते थे, और अपने तर्कों में सब कुछ उन्हीं पर टिकाते थे। उनके लिए एक स्पष्ट पद किसी बात को निपटाने के लिए पर्याप्त था। क्या यह गम्भीर बात नहीं कि जब प्रभु यीशु और उसके प्रेरित अलग-अलग पदों का ऐसा उपयोग करते थे, तब तुम्हें उनकी परवाह नहीं?

मैं इन पन्नों के हर पाठक से विनती करता हूँ कि धार्मिक विषयों में अज्ञानता-भरे पूर्वाग्रहों से सावधान रहे। मैंने ऐसे लोगों को देखा है जो सिद्धान्तों और मतों में यह कहकर दोष निकालते हैं कि वे उन्मादपूर्ण, कट्टर और बेतुके हैं, जबकि उन्हें इसका बिलकुल पता नहीं होता कि वे स्वयं पवित्रशास्त्र में ही दोष निकाल रहे हैं! उन्होंने यह दुःखद प्रमाण दिया है कि वे ऐसी बातों के विषय में बोले जिन्हें वे समझते न थे, और बाइबल की विषय-वस्तु के विषय में वे तुलनात्मक रूप से कुछ भी नहीं जानते थे। लिखा है कि सौ वर्ष पहले समरसेटशायर में एक बड़े प्रचारक को मजिस्ट्रेटों के सामने बुलाया गया, क्योंकि उस पर आरोप था कि उसने मंच पर गाली दी। उसने अपने उपदेश में यह प्रसिद्ध पद लिया था, "जो विश्वास न करेगा वह दोषी ठहराया जाएगा" (मरकुस 16:16); और सिपाही इतना अज्ञानी था कि वह यह भी न जानता था कि प्रचारक परमेश्वर के वचन का ही हवाला दे रहा है! मुझे स्वयं एक कुलीन महिला याद है जो इस बात पर बहुत क्रोधित हुई कि मिशनरी सभा में एक वक्ता ने अन्यजातियों के विषय में कहा कि वे "आशारहित हैं।" फिर भी वक्ता ने केवल वही शब्द कहे थे जो पौलुस ने इफिसियों की उस दशा का वर्णन करने में कहे थे जब तक सुसमाचार उन तक नहीं पहुँचा था! (इफिसियों 2:12।) ऐसी ही भूल करने से सावधान रहो। चौकस रहो कि मन फिराव के विरुद्ध बोलकर तुम अपनी ही अज्ञानता प्रकट न करो। पवित्रशास्त्र में खोजो। मन फिराव पवित्रशास्त्र की बात है।

II. अब दूसरे स्थान पर मैं यह दिखाऊँगा कि मन फिराव एक वास्तविक बात है।

मुझे इस विषय में कुछ कहना अत्यन्त आवश्यक लगता है। हम छल-कपट, धोखे, भ्रम और ठगी के युग में रहते हैं। यह चूना-पुताई, वार्निश, पॉलिश और ऊपरी लेप का युग है। यह प्लास्टर, मुलम्मे और सुनहरे पानी का युग है। यह मिलावटी भोजन, नकली हीरों, झूठे बाटों और मापों, कमज़ोर लकड़ी और घटिया कपड़े का युग है। यह धर्म में हवा से भरी थैलियों, चूना फिरी हुई कब्रों और झाँझों का युग है। यदि बहुत-से लोग सब मसीही कहलानेवालों को संदिग्ध चरित्र का, बल्कि कपटी मानते हैं, और मन फिराव जैसी किसी भी वस्तु की वास्तविकता से इनकार करते हैं, तो मुझे इस पर शायद ही आश्चर्य हो।

फिर भी, ऐसे लोग चाहे जो कहें, मैं पूरे भरोसे के साथ कहता हूँ कि मन फिराव नाम की वस्तु अवश्य है। मनुष्यों के बीच यहाँ-वहाँ ऐसे निस्सन्देह उदाहरण देखे जा सकते हैं जिनमें हृदय, चरित्र, रुचियों और जीवन का पूरा परिवर्तन हुआ है—ऐसे उदाहरण जिनका मन फिराव के सिवाय कोई और नाम नहीं हो सकता। मैं कहता हूँ कि जब कोई मनुष्य पाप से परमेश्वर की ओर मुड़ जाता है—संसारिकता से पवित्रता की ओर—स्वधार्मिकता से अपने ऊपर अविश्वास की ओर—धर्म के विषय में लापरवाही से गहरे मन फिराव की ओर—अविश्वास से विश्वास की ओर—मसीह के प्रति उदासीनता से मसीह के प्रति दृढ़ प्रेम की ओर—प्रार्थना और बाइबल की उपेक्षा से अनुग्रह के सब साधनों के परिश्रमपूर्वक उपयोग की ओर—तो मैं निडर होकर कहता हूँ कि ऐसा मनुष्य मन फिराया हुआ मनुष्य है। जब किसी मनुष्य का हृदय उस रीति से, जिसका मैंने वर्णन किया, ऐसा उलट जाए कि जिससे वह पहले घृणा करता था उससे अब प्रेम करे, और जिससे पहले प्रेम करता था उससे अब घृणा करे, तो मैं निडर होकर कहता हूँ कि यह मन फिराव का उदाहरण है। इससे इनकार करना केवल हठ और दिखावा है। ऐसे परिवर्तन का वर्णन किसी और प्रकार से नहीं हो सकता। इसे जो सबसे उपयुक्त नाम दिया जा सकता है वह पवित्रशास्त्र का नाम है—मन फिराव।

ऐसे परिवर्तनों के बाइबल में अनेक निस्सन्देह नमूने दिए गए हैं। कोई भी ध्यान से यहूदा के राजा मनश्शे का, प्रेरित मत्ती का, सामरी स्त्री का, चुंगी लेनेवाले जक्कई का, मरियम मगदलीनी का, तरसुस के शाऊल का, फिलिप्पी के दारोगा का, बैंगनी कपड़े बेचनेवाली लुदिया का, उन यहूदियों का जिन्हें पतरस ने पिन्तेकुस्त के दिन प्रचार किया, और उन कुरिन्थियों का जिन्हें पौलुस ने प्रचार किया, इतिहास पढ़ ले। (2 इतिहास 33:1-19। मत्ती 9:9। यूहन्ना 4:1-29। लूका 19:1-10; 8:2। प्रेरितों के काम 9:1-22; 16:14-34; 2:37-41। 1 कुरिन्थियों 6:9-11।) इनमें से हर एक में एक महान परिवर्तन हुआ। उस परिवर्तन को मन फिराव के सिवाय और क्या कहा जा सकता है?

ऐसे परिवर्तनों के अनेक सुप्रसिद्ध उदाहरण हर युग में कलीसिया के इतिहास में मिलते हैं। कोई भी आगस्टीन, मार्टिन लूथर, ह्यूग लैटिमर, जॉन बनयन, कर्नल गार्डिनर, जॉन न्यूटन और थॉमस स्कॉट के जीवन का अध्ययन कर ले। इनमें से हर एक जीवन में उसे परमेश्वर की ओर हृदय, मत और आचरण के एक महान मोड़ का वर्णन मिलेगा। उस मोड़ को मन फिराव से बेहतर और क्या नाम दिया जा सकता है?

ऐसे परिवर्तनों के अनेक नमूने हर मनुष्य को अपने ही पड़ोस और जान-पहचान के दायरे में मिल जाएँगे। कोई भी निष्कपट मन का सूक्ष्मदर्शी व्यक्ति अपने आसपास देखे और मेरे कथन पर विचार करे। यदि हो सके तो वह इससे इनकार करे कि वह अपनी ही आयु और हैसियत के ऐसे स्त्री-पुरुषों की ओर उँगली उठा सकता है जो धर्म के विषय में अब उससे बिलकुल भिन्न हैं जैसे वे पहले थे। अपनी आत्माओं और उद्धार पाने के महत्त्व के विषय में—पाप, परमेश्वर, मसीह, मन फिराव, विश्वास और पवित्रता के विषय में—बाइबल पढ़ने और प्रार्थना करने के विषय में—इन सब बातों में वे पूरी तरह बदल गए हैं। मैं किसी भी समझदार मनुष्य को चुनौती देता हूँ कि वह इससे इनकार करे कि वह ऐसे लोगों को जानता है। वे राज्य के हर भाग में यहाँ-वहाँ मिलते हैं। मैं फिर पूछता हूँ, ऐसे परिवर्तनों को मन फिराव के सिवाय और क्या कहा जा सकता है?

इस बात पर इतनी देर तक ठहरने में मुझे लगभग लज्जा आती है। यह ऐसा लगता है मानो यह प्रमाणित करने में समय बिताया जा रहा हो कि दो और दो चार होते हैं, या सूर्य पूर्व में उगता है। परन्तु हाय, ऐसे बहुत-से लोग हैं जो धर्म में किसी भी बात को स्वीकार नहीं करेंगे और हर बात पर विवाद करेंगे! वे जानते हैं कि वे स्वयं अभी तक मन नहीं फिराए हुए हैं, और इसलिए वे कठिन प्रयत्न करते हैं कि यह सिद्ध कर दें कि कभी किसी का मन फिरा ही नहीं! मुझे आशा है कि मैंने ऐसे सब लोगों को पर्याप्त उत्तर दे दिया है। मैंने तुम्हें दिखा दिया है कि मन फिराव एक वास्तविक, सच्ची बात है।

III. अब तीसरे स्थान पर मैं यह दिखाऊँगा कि मन फिराव एक आवश्यक बात है।

यह बहुत महत्त्व की बात है। कुछ भले लोग यह मानने को तो तैयार हैं कि मन फिराव पवित्रशास्त्र की सच्चाई और एक वास्तविकता है — परन्तु ऐसी बात नहीं जिस पर अधिकतर अंग्रेज़ों को ज़ोर देकर कहने की आवश्यकता हो। वे मानते हैं कि अन्यजातियों को मन फिराव की आवश्यकता है। यहाँ तक कि चोरों, गिरे हुए चरित्रवालों और कारागार के निवासियों को भी, वे मानते हैं, मन फिराव की आवश्यकता हो सकती है। परन्तु कलीसिया जानेवाले लोगों के लिए मन फिराव को आवश्यक कहना उन बातों को कहना है जो उन्हें बिलकुल दिखाई ही नहीं देतीं। "ऐसे लोगों को, कुछ मामलों में, थोड़ा जगाने और सुधारने की आवश्यकता हो सकती है। वे उतने अच्छे नहीं होंगे जितना उन्हें होना चाहिए — यह अच्छा होता कि वे धर्म पर अधिक ध्यान देते; परन्तु आपको यह कहने का कोई अधिकार नहीं कि उन्हें मन फिराव की आवश्यकता है! उनसे यह कहना कि उन्हें मन फिराव चाहिए, निर्दयता है, कठोरता है, संकीर्णता है, कड़वाहट है, अनुचित है!"

यह खेदजनक रूप से सामान्य धारणा पूरी तरह भ्रम है। यह मनुष्य की शुद्ध कल्पना है, जिसकी परमेश्वर के वचन में तिनके भर भी नींव नहीं है। बाइबल स्पष्ट सिखाती है कि हृदय का वह परिवर्तन, जिसे मन फिराव कहते हैं, हर एक के लिए नितान्त आवश्यक है। यह इसलिए आवश्यक है कि मानव स्वभाव सर्वथा भ्रष्ट है। यह इसलिए आवश्यक है कि हर मनुष्य का स्वाभाविक हृदय जैसा है वैसा है। संसार में जन्मे सब लोगों को, चाहे वे किसी भी पद या जाति के हों, स्वर्ग जाने से पहले पालने से कब्र तक के बीच अपने हृदय का बदला जाना आवश्यक है। सबको, बिना किसी अपवाद के, मन फिराना होगा।

हृदय के मन फिराव के बिना हम पृथ्वी पर परमेश्वर की सेवा नहीं कर सकते। स्वभाव से हममें परमेश्वर और उसके पुत्र यीशु मसीह के प्रति न विश्वास है, न भय, न प्रेम। हमें उसके वचन में कोई आनन्द नहीं। प्रार्थना या उसके साथ सहभागिता में हमें कोई सुख नहीं मिलता। उसकी विधियों, उसके भवन, उसके लोगों या उसके दिन में हमें कोई रस नहीं। हमारे पास मसीही धर्म का बाहरी रूप हो सकता है, और हम रीतियों और धार्मिक कृत्यों का चक्र चलाते रह सकते हैं। परन्तु मन फिराव के बिना हमारे धर्म में उतना भी हृदय नहीं जितना ईंट या पत्थर में। क्या एक मृत शव परमेश्वर की सेवा कर सकता है? हम जानते हैं कि नहीं कर सकता। ठीक है, मन फिराव के बिना हम परमेश्वर के प्रति मरे हुए हैं।

उस मण्डली को चारों ओर देखिए जिसके साथ आप हर रविवार आराधना करते हैं। देखिए कि जो कुछ हो रहा है उसमें उनमें से अधिकांश कितनी कम रुचि लेते हैं। ध्यान दीजिए कि वे सारे कार्य के प्रति कितने उदासीन, भावशून्य और बेपरवाह दिखाई देते हैं। साफ़ है कि उनके हृदय वहाँ नहीं हैं! वे किसी और बात के बारे में सोच रहे हैं, धर्म के बारे में नहीं। वे व्यापार, या धन, या सुख-विलास, या सांसारिक योजनाओं, या टोपियों, या गाउनों, या नए पहनावों, या मनोरंजनों के बारे में सोच रहे हैं। उनके शरीर वहाँ हैं — पर उनके हृदय नहीं। और इसका कारण क्या है? उन सबको किस चीज़ की आवश्यकता है? उन्हें मन फिराव की आवश्यकता है। इसके बिना वे केवल रीति और दिखावे के लिए कलीसिया आते हैं, और कलीसिया से जाकर संसार या अपने पापों की सेवा करते हैं।

परन्तु बात इतनी ही नहीं है। हृदय के मन फिराव के बिना, यदि हम स्वर्ग पहुँच भी जाएँ तो उसका आनन्द नहीं ले सकेंगे। स्वर्ग वह स्थान है जहाँ पवित्रता का सर्वोच्च राज्य है और पाप तथा संसार का कोई स्थान नहीं। वहाँ की संगति सब पवित्र होगी; वहाँ के कार्य सब पवित्र होंगे; वह एक अनन्त विश्राम-दिन होगा। निश्चय ही, यदि हम स्वर्ग जाएँ, तो हमारा हृदय उसके अनुकूल और उसका आनन्द लेने योग्य होना चाहिए, नहीं तो हम सुखी न होंगे। हमारा स्वभाव उस वातावरण और उस स्थान के अनुरूप होना चाहिए जहाँ हम रहेंगे। क्या मछली पानी के बाहर सुखी हो सकती है? हम जानते हैं कि नहीं हो सकती। ठीक है, हृदय के मन फिराव के बिना हम स्वर्ग में सुखी नहीं हो सकते।

अपने आस-पास के मोहल्ले और अपने परिचित लोगों को देखिए। सोचिए कि उनमें से बहुत से क्या करेंगे यदि वे सदा के लिए धन, व्यापार, समाचार-पत्रों, ताश, नाच-रंग, घुड़दौड़, शिकार, और सांसारिक मनोरंजनों से कट जाएँ! क्या उन्हें यह अच्छा लगेगा? सोचिए कि वे कैसा अनुभव करेंगे यदि उन्हें सदा के लिए यीशु मसीह, पवित्र लोगों और स्वर्गदूतों के साथ बन्द कर दिया जाए! क्या वे सुखी होंगे? क्या मूसा, दाऊद और पौलुस की अनन्त संगति उन्हें भाएगी जो उन पवित्र जनों के लिखे को पढ़ने का कष्ट कभी नहीं उठाते? क्या स्वर्ग की अनन्त स्तुति उनकी रुचि के अनुकूल होगी जो सप्ताह में निजी भक्ति, यहाँ तक कि प्रार्थना, के लिए भी मुश्किल से कुछ मिनट निकाल पाते हैं? इन सभी प्रश्नों का एक ही उत्तर दिया जा सकता है। स्वर्ग का आनन्द लेने से पहले हमारा मन फिराना आवश्यक है। मन फिराव के बिना स्वर्ग आदम की किसी भी सन्तान के लिए स्वर्ग न रहेगा।

कोई हमें धोखा न दे। पृथ्वी पर हर स्त्री-पुरुष के उद्धार के लिए दो बातें नितान्त आवश्यक हैं। एक है हमारे लिए मसीह का मध्यस्थता का कार्य — उसका प्रायश्चित, उसकी सन्तुष्टि और उसकी मध्यस्थता की प्रार्थना। दूसरा है हममें आत्मा का परिवर्तन करनेवाला कार्य — उसका मार्गदर्शन करनेवाला, नया करनेवाला और पवित्र करनेवाला अनुग्रह। स्वर्ग के लिए हमारे पास अधिकार भी चाहिए और हृदय भी। संस्कार उद्धार के लिए आवश्यक नहीं हैं — मनुष्य उनके बिना भी बच सकता है, जैसे पश्चात्तापी चोर। मसीह में हिस्सेदारी और मन फिराव नितान्त आवश्यक हैं — इनके बिना कोई भी किसी भी प्रकार नहीं बच सकता। सब, सब समान रूप से, ऊँचे या नीचे, धनी या निर्धन, वृद्ध या युवा, कुलीन या साधारण, कलीसिया के लोग या असहमत, बपतिस्मा-प्राप्त या बिना बपतिस्मा के, सबको मन फिराना होगा या नाश होना होगा। मन फिराव के बिना कोई उद्धार नहीं। यह एक आवश्यक बात है।

IV. अब मैं चौथे स्थान पर यह दिखाता हूँ कि मन फिराव एक सम्भव बात है।

मैं समझता हूँ कि इस लेख में जो बातें मैं लिख रहा हूँ उन्हें पढ़कर बहुतों के मन में कैसे विचार आते हैं। वे इस धारणा की शरण लेते हैं कि मन फिराव जैसा परिवर्तन चुने हुए थोड़े लोगों को छोड़कर और किसी के लिए असम्भव है। वे तर्क देते हैं, "पादरियों के लिए मन फिराव की बातें करना तो बहुत अच्छा है; परन्तु यह हो नहीं सकता; हमें काम देखना है, परिवारों का पालन करना है, व्यापार सँभालना है। आज के समय में चमत्कारों की आशा करना व्यर्थ है। हम मन नहीं फिरा सकते।" ऐसे विचार बहुत सामान्य हैं। शैतान इन्हें हमारे सामने रखना पसन्द करता है, और हमारे अपने आलसी हृदय इन्हें स्वीकार करने को बहुत तैयार रहते हैं — परन्तु ये जाँच के आगे ठहर नहीं सकते। मैं यह कहने से नहीं डरता कि मन फिराव एक सम्भव बात है। यदि ऐसा न होता तो मैं एक शब्द भी और न कहता।

परन्तु यह कहते हुए मैं नहीं चाहूँगा कि कोई मुझे गलत समझे। मेरा तनिक भी यह अर्थ नहीं है कि कोई मनुष्य अपने आप को मन फिरा सकता है, अपना हृदय आप बदल सकता है, अपना भ्रष्ट स्वभाव आप दूर कर सकता है, अपने भीतर नई आत्मा आप डाल सकता है। मेरा ऐसा कोई अर्थ नहीं है। मैं तो यहेजकेल के दर्शन की सूखी हड्डियों से भी यह आशा नहीं करूँगा कि वे अपने आप को जीवन दे लें। (यहेजकेल 37:3।) मेरा केवल इतना ही कहना है कि पवित्रशास्त्र में, परमेश्वर में, या मनुष्य की दशा में ऐसा कुछ भी नहीं है जो किसी को यह कहने का अधिकार दे कि "मैं कभी मन नहीं फिरा सकता।" पृथ्वी पर ऐसा कोई स्त्री या पुरुष नहीं जीवित है जिसके विषय में यह कहा जा सके कि "उसका मन फिरना असम्भव है।" कोई भी, चाहे वह कितना ही पापी और कठोर क्यों न हो, मन फिरा सकता है।

मैं इतने विश्वास से क्यों बोलता हूँ? ऐसा कैसे है कि मैं संसार में चारों ओर देखता हूँ, उसमें व्याप्त भयंकर दुष्टता को देखता हूँ, फिर भी किसी जीवित मनुष्य की आत्मा के विषय में निराश नहीं होता? ऐसा कैसे है कि मैं किसी से भी, चाहे वह कितना ही कठोर, गिरा हुआ और बुरा क्यों न हो, कह सकता हूँ, "तेरी दशा निराशाजनक नहीं है—तू भी, हाँ तू भी, मन फिरा सकता है?" मैं यह इसलिए कह सकता हूँ कि मसीह के

सुसमाचार में जो बातें निहित हैं, वे ऐसी हैं। उस सुसमाचार की महिमा यही है कि उसके अधीन कुछ भी असम्भव नहीं है।

हमारे प्रभु यीशु मसीह की सर्वशक्तिमान सामर्थ्य के कारण मन फिराव सम्भव है। उसी में जीवन है। उसके हाथ में मृत्यु और अधोलोक की कुंजियाँ हैं। स्वर्ग और पृथ्वी का सारा अधिकार उसी को दिया गया है। वह जिन्हें चाहता है उन्हें जिलाता है। (यूहन्ना 1:4; प्रकाशितवाक्य 1:18; मत्ती 28:18; यूहन्ना 5:21।) उसके लिए शून्य में से नए हृदय उत्पन्न करना उतना ही सहज है जितना शून्य में से संसार की सृष्टि करना। पथरीले, मृत हृदय में आत्मिक जीवन फूँक देना उसके लिए उतना ही सहज है जितना उस मिट्टी में स्वाभाविक जीवन फूँक देना, जिससे आदम रचा गया था, और उसे जीवित मनुष्य बना देना। पृथ्वी पर कोई ऐसी बात न थी जो वह न कर सका। आँधी, समुद्र, रोग, मृत्यु, शैतान—सब उसके वचन के आज्ञाकारी थे। स्वर्ग में परमेश्वर के दाहिने हाथ पर ऐसा कुछ भी नहीं जो वह न कर सके। उसका हाथ अब भी वैसा ही सामर्थी है—उसका प्रेम अब भी वैसा ही महान है। प्रभु यीशु मसीह जीवित है, इसलिए मन फिराव असम्भव नहीं है।

परन्तु इसके अतिरिक्त, पवित्र आत्मा की सर्वशक्तिमान सामर्थ्य के कारण भी मन फिराव सम्भव है। मसीह जिन सब का उद्धार करने का बीड़ा उठाता है, उनके हृदयों में वह पवित्र आत्मा को भेजता है। जिस दिव्य आत्मा ने सृष्टि के काम में पिता और पुत्र के साथ मिलकर कार्य किया, वही मन फिराव के काम में विशेष रूप से कार्य करता है। वही जीवन के महान स्रोत मसीह से जीवन को पापियों के हृदयों में पहुँचाता है। जो उन अद्भुत वचनों के कहे जाने से पहले जल के ऊपर मण्डलाता था, "उजियाला हो," वही पापियों की आत्माओं के ऊपर मण्डलाता है और उनके स्वाभाविक अन्धकार को दूर करता है। पवित्र आत्मा की अदृश्य सामर्थ्य सचमुच बड़ी है! वह कठोर को कोमल कर सकता है। वह अकड़े हुए और हठीले को झुका सकता है। वह आत्मिक रूप से अन्धों को आँखें, आत्मिक रूप से बहरों को कान, आत्मिक रूप से गूँगों को जीभ, आत्मिक रूप से लँगड़ों को पाँव, आत्मिक रूप से ठण्डों को गर्मी, आत्मिक रूप से अज्ञानियों को ज्ञान और आत्मिक रूप से मृतकों को जीवन दे सकता है। "उसके समान कौन सिखानेवाला है?" (अय्यूब 36:22।) उसने हज़ारों अज्ञानी पापियों को सिखाया है और उन्हें "उद्धार के लिए बुद्धिमान" बनाने में कभी विफल नहीं हुआ। पवित्र आत्मा जीवित है, इसलिए मन फिराव कभी असम्भव नहीं।

इन बातों के उत्तर में तुम क्या कह सकते हो? यह विचार सदा के लिए दूर हो कि मन फिराव सम्भव नहीं है। इसे अपने पीछे फेंक दो—यह शैतान का एक प्रलोभन है। अपनी ओर और अपने निर्बल हृदय की ओर मत देखो—क्योंकि तब तुम्हारा निराश होना स्वाभाविक है। ऊपर मसीह और पवित्र आत्मा की ओर देखो, और जान लो कि उनके लिए कुछ भी असम्भव नहीं। हाँ! आत्मिक चमत्कारों का युग अभी बीता नहीं है! हमारी मण्डलियों में मरी हुई आत्माएँ अब भी जिलाई जा सकती हैं; अन्धी आँखें अब भी देखने लग सकती हैं; मूक, प्रार्थनाहीन जीभें अब भी प्रार्थना करना सीख सकती हैं। किसी को भी कभी निराश नहीं होना चाहिए। जब मसीह स्वर्ग को छोड़ दे और पापियों के उद्धारकर्ता का अपना पद त्याग दे—जब पवित्र आत्मा हृदयों में वास करना छोड़ दे और परमेश्वर न रहे—तब, और केवल तब, स्त्री-पुरुष कह सकते हैं, "हम मन नहीं फिरा सकते।" तब तक मैं निडर होकर कहता हूँ कि मन फिराव सम्भव है। यदि लोग मन नहीं फिराते, तो इसलिए कि वे "जीवन पाने के लिए मसीह के पास आना नहीं चाहते।" (यूहन्ना 5:40।) मन फिराव सम्भव है।

5. पाँचवें स्थान पर मुझे यह दिखाने दीजिए कि मन फिराव एक सुखदायी बात है।

यदि मैं इस बात को अछूता छोड़ दूँ तो मेरा लिखना व्यर्थ ही होगा। मुझे दृढ़ विश्वास है कि हज़ारों लोग ऐसे हैं जो अब तक कही गई सारी बातों की सच्चाई मानने को तैयार हैं। पवित्रशास्त्रीय, वास्तविक, आवश्यक, सम्भव—मन फिराव को वे यह सब मानने को सहर्ष तैयार हैं। वे कहते हैं, "निश्चय ही, हम जानते हैं कि यह सब सच है। लोगों को मन फिराना चाहिए।" परन्तु क्या मन फिराने से मनुष्य का सुख बढ़ेगा? क्या मन फिराने से मनुष्य के आनन्द बढ़ेंगे और उसके दुःख घटेंगे? हाय, यही वह बिन्दु है जहाँ बहुत लोग अटक जाते हैं। उनके मन में एक छिपा हुआ, दबा हुआ भय है कि यदि वे मन फिराएँगे तो उन्हें उदास, दुखी और खिन्न मन का हो जाना पड़ेगा। मन फिराव और खट्टा चेहरा—मन फिराव और उदास माथा—मन फिराव और जवानों को झिड़कने तथा सारी हँसी-खुशी को दबा देने की चिड़चिड़ी तत्परता—मन फिराव और शोकग्रस्त मुख—मन फिराव और आहें भरना तथा कराहना—ये सब बातें उन्हें लगता है कि साथ-साथ चलनी ही हैं! तो आश्चर्य नहीं कि ऐसे लोग मन फिराव के विचार से कतराते हैं!

जो धारणा मैंने अभी बताई है वह बहुत आम है और बहुत हानिकारक है। मैं अपने सारे हृदय, प्राण, मन और शक्ति से इसका विरोध करना चाहता हूँ। मैं बिना हिचकिचाहट के कहता हूँ कि पवित्रशास्त्र में वर्णित मन फिराव एक सुखदायी बात है, दुखदायी नहीं; और यदि मन फिराए हुए लोग सुखी नहीं हैं, तो दोष स्वयं उन्हीं का होगा। सच्चे मसीही का सुख निःसन्देह संसारी मनुष्य के सुख के ठीक समान नहीं होता। वह शान्त, ठोस, गहरा बहनेवाला, सारयुक्त आनन्द है। वह उत्तेजना, चंचलता और शोरगुल भरी, झटके से उठनेवाली हँसी-ठिठोली से नहीं बना है। वह उस मनुष्य का गम्भीर, शान्त आनन्द है जो अपने सबसे बड़े आनन्द में भी मृत्यु, न्याय, अनन्तकाल और आनेवाले संसार को नहीं भूलता। परन्तु कुल मिलाकर मुझे विश्वास है कि मन फिराया हुआ मनुष्य ही सबसे सुखी मनुष्य है।

पवित्रशास्त्र क्या कहता है? जो लोग मन फिराकर परमेश्वर की ओर फिरे हैं, उनकी भावनाओं और अनुभव का वह कैसा वर्णन करता है? क्या वह इस विचार को तनिक भी समर्थन देता है कि मन फिराव कोई दुःखद और उदासी भरी बात है? आइए सुनें कि लेवी ने क्या अनुभव किया, जब वह चुंगी की चौकी छोड़कर मसीह के पीछे हो लिया। हम पढ़ते हैं कि "उसने अपने घर में उसके लिये एक बड़ी दावत की", मानो वह आनन्द का अवसर हो। (लूका 5:29।) आइए सुनें कि चुंगी लेनेवाले जक्कई ने क्या अनुभव किया, जब यीशु ने उसके घर आने की बात कही। हम पढ़ते हैं कि "उसने आनन्द से उसे ग्रहण किया।" (लूका 19:6।) आइए सुनें कि सामरियों ने क्या अनुभव किया, जब वे फिलिप्पुस के प्रचार से मन फिराकर परमेश्वर की ओर फिरे। हम पढ़ते हैं कि "उस नगर में बड़ा आनन्द हुआ।" (प्रेरितों के काम 8:8।) आइए सुनें कि कूश देश के खोजे ने अपने मन फिराव के दिन क्या अनुभव किया। हम पढ़ते हैं कि "वह आनन्द करता हुआ अपने मार्ग चला गया।" (प्रेरितों के काम 8:39।) आइए सुनें कि फिलिप्पी के बन्दीगृह के दारोगा ने अपने मन फिराव की घड़ी में क्या अनुभव किया। हम पढ़ते हैं कि "उसने अपने सारे घराने समेत परमेश्वर पर विश्वास करके आनन्द मनाया।" (प्रेरितों के काम 16:34।) वास्तव में इस विषय पर पवित्रशास्त्र की साक्षी सदा एक ही है। मन फिराव को सदा आनन्द का कारण बताया गया है, शोक का नहीं; सुख का, दुःख का नहीं।

सीधी सच्चाई यह है कि लोग मन फिराव की बुराई इसलिए करते हैं कि वे वास्तव में उसके विषय में कुछ नहीं जानते। वे मन फिराए हुए स्त्री-पुरुषों को दुःखी कहकर नीचा दिखाते हैं, क्योंकि वे उन्हें उनकी बाहरी शान्ति, गम्भीरता और चुप्पी के आधार पर आँकते हैं, और उनकी भीतरी शान्ति के विषय में कुछ नहीं जानते। वे भूल जाते हैं कि जो लोग अपने कामों का सबसे अधिक बखान करते हैं, वे सबसे अधिक काम नहीं करते; और जो अपने सुख की सबसे अधिक बातें करते हैं, वे वास्तव में सबसे सुखी लोग नहीं होते।

मन फिराया हुआ मनुष्य सुखी है, क्योंकि उसे परमेश्वर के साथ मेल-मिलाप है। उसके पाप क्षमा हो गए हैं; उसका विवेक दोष की भावना से मुक्त है, और वह मृत्यु, न्याय और अनन्तकाल की ओर बिना भय के देख सकता है। क्षमा पाने और मुक्त होने का अनुभव कितना बड़ा आशीर्वाद है! वह सुखी है, क्योंकि वह अपने हृदय में व्यवस्था पाता है। उसकी लालसाएँ वश में हैं, उसके प्रेम सही दिशा में लगे हैं। उसके भीतर का सब कुछ, चाहे कितना ही निर्बल और दुर्बल क्यों न हो, अपने ठीक स्थान पर है, अव्यवस्था में नहीं। व्यवस्था कितना बड़ा आशीर्वाद है! वह सुखी है, क्योंकि वह परिस्थितियों से स्वतंत्र अनुभव करता है। जो भी हो, उसकी आवश्यकता पूरी की जाएगी; बीमारी, हानि और मृत्यु कभी स्वर्ग में उसके धन को छू नहीं सकती, न उससे मसीह को छीन सकती है। स्वतंत्र अनुभव करना कितना बड़ा आशीर्वाद है! वह सुखी है, क्योंकि वह तैयार अनुभव करता है। जो कुछ भी हो, वह किसी न किसी रूप में तैयार है; सबसे बड़ा काम निपट चुका है, जीवन की सबसे बड़ी चिन्ता सुलझ चुकी है। तैयार होने का अनुभव कितना बड़ा आशीर्वाद है! ये सचमुच सुख के सच्चे सोते हैं। ये सोते अपरिवर्तित मनुष्य के लिए पूरी तरह बन्द और मुहरबन्द हैं। पापों की क्षमा के बिना, आनेवाले संसार की आशा के बिना, सुख के लिए इस संसार पर निर्भर रहते हुए, परमेश्वर से भेंट करने के लिए अप्रस्तुत होकर वह सचमुच सुखी नहीं हो सकता। मन फिराव सच्चे सुख का अनिवार्य भाग है।

आज ही अपने मन में यह बात पक्की कर लीजिए कि जो मित्र आपके परमेश्वर की ओर फिरने के लिए परिश्रम करता है, वही आपका सबसे अच्छा मित्र है। वह केवल आनेवाले जीवन के लिए ही नहीं, वरन् इस वर्तमान जीवन के लिए भी मित्र है। वह आपके वर्तमान सुख का भी मित्र है और नरक से आपके भावी छुटकारे का भी। वह समय के लिए भी मित्र है और अनन्तकाल के लिए भी। मन फिराव एक सुखद बात है।

6. अब अन्त में मैं आपको दिखाना चाहता हूँ कि मन फिराव ऐसी बात है जो देखी जा सकती है।

यह मेरे विषय का वह भाग है जिसे कभी अनदेखा नहीं करना चाहिए। कलीसिया और संसार के लिए कितना अच्छा होता, यदि हर युग में इस पर अधिक ध्यान दिया जाता। हज़ारों लोग मसीही धर्म से घृणा करके दूर हट गए हैं, क्योंकि उसे माननेवाले अनेक लोग दुष्ट हैं। सैकड़ों ने अपने आप को मन फिराया हुआ कहने के बाद जो जीवन जीया, उससे मन फिराव के नाम से ही दुर्गन्ध उठने लगी। उन्होंने कल्पना कर ली कि कुछ क्षणिक अनुभूतियाँ और कायलता ही परमेश्वर का सच्चा अनुग्रह है। उन्होंने अपने आपको मन फिराया हुआ समझ लिया, क्योंकि उनकी शारीरिक भावनाएँ उत्तेजित हुई थीं। उन्होंने अपने आपको "मन फिराए हुए" कहा, जबकि उस सम्मानित नाम पर उनका तनिक भी अधिकार या हक़ नहीं था। इस सबसे बहुत बड़ी हानि हुई है, और आज के दिनों में यह विशेष हानि कर रहा है। आज का समय इस महान सिद्धान्त की बहुत स्पष्ट घोषणा की माँग करता है कि सच्चा मन फिराव ऐसी बात है जो सदा देखी जा सकती है।

मैं पूरी तरह मानता हूँ कि आत्मा के कार्य करने का ढंग अदृश्य है। वह वायु के समान है। वह चुम्बक की आकर्षण शक्ति के समान है। वह ज्वार-भाटे पर चन्द्रमा के प्रभाव के समान है। उसमें कुछ ऐसा है जो मनुष्य की आँखों या समझ की पहुँच से बहुत परे है। परन्तु इसे दृढ़ता से मानते हुए भी मैं उतनी ही दृढ़ता से कहता हूँ कि मन फिराव में आत्मा के कार्य के प्रभाव सदा दिखाई देंगे। वे प्रभाव आरम्भ में निर्बल और दुर्बल हो सकते हैं; स्वाभाविक मनुष्य को वे शायद ही दिखाई दें, और समझ में न आएँ। परन्तु प्रभाव सदा होंगे; जहाँ सच्चा मन फिराव है वहाँ कुछ न कुछ फल अवश्य दिखाई देगा। जहाँ कोई प्रभाव नहीं दिखता, वहाँ निश्चय जानिए कि अनुग्रह नहीं है। जहाँ कोई दिखाई देनेवाला फल नहीं मिलता, वहाँ निश्चय जानिए कि मन फिराव नहीं है।

क्या कोई मुझसे पूछता है कि सच्चे मन फिराव में हमें क्या देखने की आशा करनी चाहिए? मैं उत्तर देता हूँ कि मन फिराए हुए मनुष्य के चरित्र, भावनाओं, आचरण, विचारों और दैनिक जीवन में सदा कुछ न कुछ दिखाई देगा। आप उसमें सिद्धता नहीं देखेंगे; परन्तु उसमें कुछ अनोखी बात देखेंगे, जो दूसरे लोगों से अलग और भिन्न है। आप उसे पाप से घृणा करते, मसीह से प्रेम रखते, पवित्रता के पीछे चलते, अपनी बाइबल में आनन्द लेते और प्रार्थना में लगे रहते देखेंगे। आप उसे पछतानेवाला, नम्र, विश्वास करनेवाला, संयमी, उदार, सच्चा, सुशील, धीरजवन्त, खरा, आदरणीय और दयालु पाएँगे। कम से कम उसके लक्ष्य तो ये ही होंगे; सिद्धता से चाहे वह कितना ही पीछे रह जाए, वह इन्हीं बातों के पीछे चलेगा। कुछ मन फिराए हुए लोगों में आप ये बातें अधिक स्पष्ट देखेंगे, औरों में कम। मैं केवल इतना कहता हूँ कि जहाँ कहीं मन फिराव है, वहाँ इसी प्रकार की कोई न कोई बात अवश्य दिखाई देगी।

मुझे ऐसे परिवर्तन की कोई परवाह नहीं जिसके कोई चिन्ह या प्रमाण न हों। मैं सदा यही कहूँगा, "यदि मुझे यह मानना है कि तुम्हारा मन फिराव हुआ है तो मुझे कोई चिन्ह दिखाओ। यदि दिखा सकते हो तो बिना किसी चिन्ह के अपना मन फिराव दिखाओ! मैं उसे नहीं मानता। उसका कुछ भी मूल्य नहीं।" यदि चाहो तो ऐसी शिक्षा को व्यवस्थावादी कह लो। व्यवस्था-विरोधी होने से तो व्यवस्थावादी कहलाना कहीं अच्छा है। मैं कभी, कभी यह नहीं मानूँगा कि धन्य आत्मा किसी मनुष्य के हृदय में है, जबकि उसके जीवन में आत्मा का कोई फल दिखाई नहीं देता। जो मन फिराव मनुष्य को पाप में जीने, झूठ बोलने, मतवाला होने और गाली देने की छूट देता है, वह बाइबल का मन फिराव नहीं है। वह नकली मन फिराव है, जो केवल शैतान को प्रसन्न कर सकता है, और जो मनुष्य उससे सन्तुष्ट रहता है उसे स्वर्ग नहीं, बल्कि नरक में ले जाएगा।

इस अन्तिम बात को अपने हृदय में गहरे उतरने दो और कभी न भूलो। मन फिराव केवल पवित्रशास्त्र की बात, वास्तविक बात, आवश्यक बात, सम्भव बात और आनन्द की बात ही नहीं है; उसकी एक और बड़ी विशेषता शेष है: वह ऐसी बात है जो सदा दिखाई देगी।

अनुप्रयोग

अब मैं इस लेख को कुछ सीधी-सादी अपीलों के साथ समाप्त करता हूँ, जो इसके सब पाठकों के विवेक से की जाती हैं। मैंने अपनी पूरी सामर्थ्य से मन फिराव का स्वरूप खोलने और समझाने का प्रयत्न किया है। मैंने उसे हर दृष्टिकोण से प्रस्तुत करने का यत्न किया है। अब केवल इतना शेष है कि जिस किसी के हाथ में यह पुस्तक आए, उसके हृदय तक इसे पहुँचाने का प्रयत्न करूँ।

(1) सबसे पहले, मैं इस लेख के हर पाठक से आग्रह करता हूँ कि वह जाँचे कि क्या उसका मन फिराव हुआ है। मैं दूसरे लोगों के विषय में नहीं पूछ रहा। अन्यजातियों को निःसन्देह मन फिराव की आवश्यकता है। कारागारों और सुधारगृहों के अभागे निवासियों को मन फिराव की आवश्यकता है। तुम्हारे अपने घर के पास ऐसे लोग हो सकते हैं जो खुले पापी और अविश्वासी हैं, और जिन्हें मन फिराव की आवश्यकता है। परन्तु यह सब प्रश्न से बाहर की बात है। मैं पूछता हूँ: क्या तुम्हारा अपना मन फिराव हुआ है?

क्या तुम्हारा मन फिराव हुआ है? यह उत्तर नहीं है कि बहुत से लोग कपटी और झूठे दावेदार हैं। यह कोई तर्क नहीं कि बहुत से नकली जागृति और दिखावटी मन फिराव हैं। यह सब बहुत सच हो सकता है, परन्तु किसी वस्तु के दुरुपयोग से उसका उपयोग नष्ट नहीं हो जाता। खोटे सिक्कों के चलन का यह कारण नहीं कि खरे सिक्के न हों। दूसरे जैसे भी हों, क्या तुम्हारा अपना मन फिराव हुआ है?

क्या तुम्हारा मन फिराव हुआ है? यह उत्तर नहीं कि तुम गिरजाघर या प्रार्थनालय जाते हो, तुम्हारा बपतिस्मा हुआ है और तुम्हें प्रभु-भोज में सम्मिलित किया गया है। इससे बहुत कम सिद्ध होता है; यही सब मैं यहूदा इस्करियोती, देमास, शमौन जादूगर, हनन्याह और सफीरा के विषय में भी कह सकता था। प्रश्न का उत्तर फिर भी नहीं मिला। क्या तुम्हारा हृदय बदला है? क्या सचमुच तुम्हारा मन फिराव परमेश्वर की ओर हुआ है?

(2) फिर, इस पुस्तक के हर उस पाठक से, जिसका मन फिराव नहीं हुआ, मैं आग्रह करता हूँ कि जब तक वह न हो जाए, चैन न ले। जल्दी करो, अपने संकट को जानने के लिए जाग उठो। प्राण बचाकर भागो! आनेवाले क्रोध से भागो! समय थोड़ा है! अनन्तकाल निकट है! जीवन अनिश्चित है! न्याय निश्चित है! उठो और परमेश्वर को पुकारो। अनुग्रह का सिंहासन अब भी स्थिर है; प्रभु यीशु मसीह अब भी अनुग्रह करने को ठहरा हुआ है। सुसमाचार की प्रतिज्ञाएँ विस्तृत, व्यापक, परिपूर्ण और मुफ़्त हैं; आज ही उन्हें थाम लो। मन फिराओ और सुसमाचार पर विश्वास करो; मन फिराओ और फिर जाओ। तब तक चैन न लो, चैन न लो, चैन न लो, जब तक तुम जान और अनुभव न कर लो कि तुम मन फिराए हुए मनुष्य हो।

(3) अन्त में, मैं हर उस पाठक को एक उपदेश देता हूँ जिसके पास यह सोचने का कारण है कि वह उस धन्य परिवर्तन से होकर निकला है जिसकी चर्चा मैं इस लेख में करता आया हूँ। तुम्हें वह समय स्मरण है जब तुम वैसे नहीं थे जैसे अब हो। तुम्हें अपने जीवन का वह समय स्मरण है जब पुरानी बातें जाती रहीं और सब कुछ नया हो गया। तुमसे भी मुझे कुछ कहना है। मित्रता से दी गई सलाह को स्वीकार करो और उसे अपने मन में रखो।

(क) क्या तुम समझते हो कि तुम्हारा मन फिराव हुआ है? तो अपने बुलाए जाने और मन फिराव को निश्चित करने का पूरा यत्न करो। जो बात तुम्हारी अमर आत्मा से सम्बन्ध रखती है, उसमें कुछ भी अनिश्चित न छोड़ो। परिश्रम करो कि तुम्हारी आत्मा के साथ पवित्र आत्मा की गवाही मिले कि तुम परमेश्वर की सन्तान हो। निश्चयता इसी संसार में पाई जा सकती है, और निश्चयता खोजने के योग्य है। आशा रखना अच्छा है; निश्चित होना उससे कहीं अच्छा है।

(ख) क्या तुम समझते हो कि तुम्हारा मन फिराव हुआ है? तो इस संसार में असम्भव बातों की आशा न रखो। यह न समझो कि कभी वह दिन आएगा जब तुम्हारे हृदय में कोई निर्बल पक्ष न रहेगा, एकान्त प्रार्थना में मन भटकेगा नहीं, बाइबल पढ़ने में ध्यान नहीं बँटेगा, परमेश्वर की सार्वजनिक आराधना में इच्छाएँ ठंडी न पड़ेंगी, मारने के लिए कोई शरीर न रहेगा, परीक्षा देनेवाला कोई शैतान न होगा, और गिराने के लिए कोई सांसारिक फंदा न होगा। ऐसी कोई आशा न रखो। मन फिराव सिद्धता नहीं है! मन फिराव स्वर्ग नहीं है! तुम्हारे भीतर का पुराना मनुष्य अब भी जीवित है; तुम्हारे चारों ओर का संसार अब भी संकटों से भरा है; शैतान मरा नहीं है। अपनी सर्वोत्तम दशा में भी स्मरण रखो कि मन फिराया हुआ पापी अब भी दुर्बल और दीन पापी है, जिसे प्रतिदिन मसीह की आवश्यकता है। यह स्मरण रखोगे तो निराश न होगे।

(ग) क्या तुम समझते हो कि तुम्हारा मन फिराव हुआ है? तो जितने वर्ष तुम जीवित रहो, उनमें हर वर्ष अनुग्रह में बढ़ने का परिश्रम और अभिलाषा करो। पीछे की बातों की ओर न देखो; पुराने अनुभव, पुराने अनुग्रह और धर्म में पुरानी उपलब्धियों से सन्तुष्ट न हो जाओ। वचन के निर्मल दूध की लालसा करो, कि उसके द्वारा बढ़ते जाओ। (1 पतरस 2:2।) प्रभु से विनती करो कि वह तुम्हारी आत्मा में मन फिराव के कार्य को और अधिक बढ़ाए, और तुम्हारे भीतर आत्मिक प्रभावों को और गहरा करे। हर वर्ष अपनी बाइबल को और ध्यान से पढ़ो; हर वर्ष अपनी प्रार्थनाओं की और सावधानी से चौकसी करो। अपने धर्म में ऊँघने और आलसी होने से सावधान रहो। मसीह की पाठशाला की सबसे निचली और सबसे ऊँची कक्षाओं में बहुत बड़ा अन्तर है। ज्ञान, विश्वास, आशा, प्रेम और धीरज में आगे बढ़ने का यत्न करो। अपने जीवन की अन्तिम घड़ी तक तुम्हारा वार्षिक आदर्श-वाक्य हो, "आगे, और आगे, ऊपर और ऊपर!"

(द) क्या आप समझते हैं कि आपका मन फिराव हो चुका है? तो दूसरों की भलाई करने में अपनी लगन से दिखाइए कि आप मन फिराव को कितना मूल्यवान समझते हैं। क्या आप सचमुच मानते हैं कि अपरिवर्तित मनुष्य होना एक भयानक बात है? क्या आप सचमुच समझते हैं कि मन फिराव एक अवर्णनीय आशीष है? तो इसे प्रमाणित कीजिए, प्रमाणित कीजिए, प्रमाणित कीजिए, दूसरों के मन फिराव के लिए निरन्तर उत्साहपूर्वक प्रयत्न करके। अपने आस-पड़ोस में दृष्टि डालिए—उन भीड़ों पर तरस खाइए जो अब तक अपरिवर्तित हैं। उन्हें केवल अपनी कलीसिया या प्रार्थनालय में ले आने से सन्तुष्ट न हों; परमेश्वर की ओर उनके पूर्ण मन फिराव से कम किसी बात का लक्ष्य न रखें। उनसे बात कीजिए, उन्हें पढ़कर सुनाइए, उनके लिए प्रार्थना कीजिए, दूसरों को उनकी सहायता के लिए उभारिए। परन्तु कभी नहीं, कभी नहीं—यदि आप परिवर्तित मनुष्य हैं, तो अकेले स्वर्ग जाने से कभी सन्तुष्ट न हों!

हृदय

"हे मेरे पुत्र, अपना हृदय मुझे दे।" नीतिवचन 23:26

"तेरा मन परमेश्वर के आगे सीधा नहीं।" प्रेरितों के काम 8:21

सच्चे धर्म में हृदय ही मुख्य बात है। मैं अपने पाठकों से विशेष ध्यान माँगने में कोई संकोच नहीं करता, जब मैं हृदय के विषय में कुछ बातें कहने का प्रयत्न करता हूँ।

सिर मुख्य वस्तु नहीं है। आप उस सम्पूर्ण सत्य को जान सकते हैं जो यीशु में है, और मान सकते हैं कि वह अच्छा है। आप अपने धार्मिक विचारों में स्पष्ट, यथार्थ और खरे हो सकते हैं। परन्तु इस सारे समय आप उस चौड़े मार्ग पर चल रहे हो सकते हैं जो विनाश की ओर ले जाता है। आपका हृदय ही मुख्य बात है। "क्या आपका हृदय परमेश्वर की दृष्टि में सीधा है?"

आपका बाहरी जीवन मनुष्यों की दृष्टि में नैतिक, शिष्ट और आदरणीय हो सकता है। आपके सेवक, मित्र और पड़ोसी आपके सामान्य आचरण में कुछ बहुत बुरा न देखते हों। परन्तु इस सारे समय आप अनन्त विनाश के कगार पर लटक रहे हो सकते हैं। आपका हृदय ही मुख्य बात है। क्या वह हृदय परमेश्वर की दृष्टि में सीधा है?

केवल इच्छाएँ और अभिलाषाएँ किसी को मसीही नहीं बना देतीं। आपके मन में अपनी आत्मा के विषय में बहुत अच्छी भावनाएँ हो सकती हैं। आप बिलाम की नाईं "धर्मियों की मृत्यु मरने" की लालसा कर सकते हैं। (गिनती 23:10।) आप कभी आने वाले न्याय की सोचकर काँप सकते हैं, या मसीह के प्रेम का समाचार सुनकर आँसुओं से पिघल सकते हैं। परन्तु इस सारे समय आप धीरे-धीरे नीचे नरक की ओर बह रहे हो सकते हैं। आपका हृदय ही मुख्य बात है। क्या वह हृदय परमेश्वर की दृष्टि में सीधा है?

इस लेख के विषय को आपके मन पर अंकित करने के लिए मैं तीन काम करना चाहता हूँ।

I. पहले, मैं आपको दिखाऊँगा कि धर्म में हृदय का कितना अत्यधिक महत्त्व है।

II. दूसरे, मैं आपको वह हृदय दिखाऊँगा जो परमेश्वर की दृष्टि में सीधा नहीं है।

III. अन्त में, मैं आपको वह हृदय दिखाऊँगा जो परमेश्वर की दृष्टि में सीधा है।

परमेश्वर इस सारे विषय को हर उस व्यक्ति की आत्मा के लिए आशीष का कारण बनाए जिसके हाथ में यह पुस्तक पहुँचे! पवित्र आत्मा, जिसके बिना सारा प्रचार और लेखन कुछ नहीं कर सकता, इस लेख को अनेक विवेकों पर लागू करे, और इसे ऐसा तीर बना दे जो अनेक हृदयों को बेध डाले!

I. पहले, मैं धर्म में हृदय के अत्यधिक महत्त्व को दिखाऊँगा।

मैं इस बात को कैसे प्रमाणित करूँ? अपने तर्क कहाँ से लाऊँ? मुझे परमेश्वर के वचन की ओर मुड़ना होगा। इस प्रकार के प्रश्नों में इससे कुछ अन्तर नहीं पड़ता कि संसार क्या सही या गलत समझता है। सत्य की परख केवल एक ही निश्चित है। पवित्रशास्त्र क्या कहता है? बाइबल में क्या लिखा है? पवित्र आत्मा का मन क्या है? यदि हम अपने निर्णयों को इस अचूक निर्णायक के अधीन नहीं कर सकते, तो यह दिखावा करना व्यर्थ है कि हमारे पास कोई धर्म है भी।

एक बात तो यह कि बाइबल सिखाती है कि हृदय हमारा वह भाग है जिस पर हमारी आत्मा की दशा निर्भर करती है। "उसी में से जीवन का स्रोत निकलता है।" (नीतिवचन 4:23।) तर्क-बुद्धि, समझ, विवेक और भावनाएँ, सब हृदय से महत्त्व में दूसरे स्थान पर हैं। हृदय ही मनुष्य है। वह सारे आत्मिक जीवन, स्वास्थ्य, बल और बढ़ने का आसन है। वह मनुष्य की आत्मा की दशा का कब्जा और मोड़ का बिन्दु है। यदि हृदय परमेश्वर के लिए जीवित है और आत्मा के द्वारा जिलाया गया है, तो मनुष्य जीवित मसीही है। यदि हृदय मरा हुआ है और उसमें आत्मा नहीं है, तो मनुष्य परमेश्वर के सामने मरा हुआ है। हृदय ही मनुष्य है! मुझे केवल यह मत बताइए कि मनुष्य क्या कहता और मानता है, और रविवार को कहाँ जाता है, और दान-पात्र में कितना धन डालता है। मुझे बताइए कि उसका हृदय कैसा है, और मैं बता दूँगा कि वह कैसा है। "क्योंकि जैसे वह अपने मन में विचार करता है, वैसा ही वह है।" (नीतिवचन 23:7।)

दूसरी बात यह कि बाइबल सिखाती है कि हृदय हमारा वह भाग है जिस पर परमेश्वर विशेष रूप से दृष्टि करता है। "मनुष्य तो बाहरी रूप को देखता है, परन्तु यहोवा हृदय को देखता है।" (1 शमूएल 16:7।) "मनुष्य का सारा चालचलन अपनी दृष्टि में तो ठीक होता है, परन्तु यहोवा हृदयों को जाँचता है।" (नीतिवचन 21:2।) मनुष्य स्वभाव से धर्म के बाहरी भाग से, बाहरी नैतिकता से, बाहरी शुद्धता से, अनुग्रह के साधनों में बाहरी नियमित उपस्थिति से सन्तुष्ट रहता है। परन्तु प्रभु की आँखें इससे कहीं आगे देखती हैं। वह हमारे उद्देश्यों को देखता है। वह "आत्माओं को तौलता है।" (नीतिवचन 16:2।) वह स्वयं कहता है, "मैं यहोवा मन की खोज करता और हृदय को जाँचता हूँ।" (यिर्मयाह 17:10।)

तीसरी बात यह कि बाइबल सिखाती है कि हृदय ही पहली और सबसे मुख्य वस्तु है जो परमेश्वर मनुष्य से माँगता है। वह कहता है, "हे मेरे पुत्र, अपना हृदय मुझे दे।" (नीतिवचन 23:26।) हम परमेश्वर को झुका हुआ सिर और गम्भीर चेहरा, उसके भवन में अपनी शारीरिक उपस्थिति और ऊँचे स्वर में आमीन दे सकते हैं। परन्तु जब तक हम परमेश्वर को अपना हृदय नहीं देते, हम उसे कुछ भी मूल्यवान नहीं देते। यशायाह के समय में यहूदियों के बलिदान बहुत और महँगे थे। वे अपने मुँह से परमेश्वर के पास आते और अपने होठों से उसका आदर करते थे। परन्तु वे सब पूरी तरह व्यर्थ थे, क्योंकि आराधना करनेवालों का हृदय परमेश्वर से दूर था। (मत्ती 15:8।) मूर्तिपूजा के विरुद्ध येहू का उत्साह बहुत बड़ा था, और मूर्तियों को गिराने में उसकी सेवा से उसे अनेक सांसारिक प्रतिफल मिले। परन्तु उसके चरित्र पर एक बड़ा धब्बा था जिसने सब कुछ बिगाड़ दिया। वह परमेश्वर की व्यवस्था पर "पूरे मन से" नहीं चला। (2 राजाओं 10:31।) पति अपनी पत्नी में, माता-पिता अपने बच्चे में, और स्वामी अपने सेवक में जो पाना चाहता है, वह हृदय ही है। और परमेश्वर मसीही होने का दावा करनेवालों में जो पाना चाहता है, वह भी हृदय ही है।

मनुष्य की देह में हृदय क्या है? वह पूरे शरीर का सबसे प्रमुख और सबसे महत्वपूर्ण अंग है। मनुष्य ज्वर, घावों और अंगों के कट जाने पर भी बहुत वर्षों तक जी सकता है। परन्तु यदि उसके हृदय को चोट पहुँचे तो वह जीवित नहीं रह सकता। धर्म में हृदय का भी ठीक यही स्थान है। वह आत्मा के लिये जीवन का सोता है।

वृक्ष के लिये जड़ क्या है? वह सारे जीवन, वृद्धि और फलदायकता का स्रोत है। तुम डालियाँ काट सकते हो, तने को घायल कर सकते हो, फिर भी वृक्ष बचा रह सकता है। परन्तु यदि जड़ को हानि पहुँचे तो वृक्ष मर जाएगा। धर्म में हृदय का भी ठीक यही स्थान है। वह आत्मा के जीवन की जड़ है।

घड़ी के लिये मुख्य कमानी क्या है? वह उसकी सारी गतियों का कारण और उसकी सारी उपयोगिता का रहस्य है। उसका खोल बहुमूल्य और सुन्दर हो सकता है। उसका मुख और अंक कुशलता से बने हो सकते हैं। परन्तु यदि मुख्य कमानी में कोई दोष हो तो घड़ी नहीं चलेगी। धर्म में हृदय का भी ठीक यही स्थान है। वह आत्मा के जीवन की मुख्य कमानी है।

भाप के इंजन के लिये भट्ठी क्या है? वह उसकी सारी गति और शक्ति का कारण है। कलपुर्जे ठीक से बने हो सकते हैं। हर पेंच, कपाट, जोड़, धुरी और छड़ अपने सही स्थान पर हो सकती है। परन्तु यदि भट्ठी ठंडी हो और पानी भाप न बने, तो इंजन कुछ नहीं करेगा। धर्म में हृदय का भी ठीक यही स्थान है। जब तक हृदय ऊपर से आई आग से प्रज्वलित न हो, आत्मा नहीं हिलेगी।

क्या तुम जानना चाहते हो कि तुम्हारे आस-पास के इतने लोग सच्चे धर्म में कोई रुचि क्यों नहीं लेते? उन्हें परमेश्वर, या मसीह, या बाइबल, या स्वर्ग, या नरक, या न्याय, या अनन्तकाल की कोई सच्ची चिन्ता नहीं। उन्हें केवल इसकी चिन्ता है कि क्या खाएँगे, क्या पीएँगे, क्या पहनेंगे, कितना धन कमा सकते हैं, या कौन-सा सुख पा सकते हैं। दोष उनके हृदय का है! उन्हें परमेश्वर की बातों की तनिक भी भूख नहीं। आत्मिक बातों के लिये उनमें कोई रुचि या झुकाव नहीं। उन्हें नई कमानी चाहिए। उन्हें नया हृदय चाहिए। "बुद्धि मोल लेने के लिये मूर्ख के हाथ में दाम का क्या काम, जब कि उसका मन उसमें नहीं लगता?" (नीतिवचन 17:16।)

क्या तुम जानना चाहते हो कि इतने लोग वर्ष-दर-वर्ष सुसमाचार सुनते हैं, फिर भी उससे अप्रभावित क्यों रहते हैं? उनके मन बनयन के "निराशा के दलदल" जैसे लगते हैं। उनमें गाड़ी-भर-भर कर अच्छी शिक्षा उँडेली जाती है, परन्तु कोई भला प्रभाव नहीं पड़ता। उनकी बुद्धि कायल हो जाती है। उनका मन सत्य को मान लेता है। उनका विवेक कभी-कभी चुभता है। उनकी भावनाएँ कभी-कभी जाग उठती हैं। तो फिर वे अटके क्यों रहते हैं? वे रुके क्यों रहते हैं? दोष उनके हृदयों का है! कोई गुप्त मूर्ति उन्हें पृथ्वी से जकड़े रखती है और हाथ-पाँव बाँधे रखती है, कि वे हिल नहीं पाते। उन्हें नया हृदय चाहिए। यहेजकेल ने उनका चित्र सच्चाई से खींचा है, "वे मेरी प्रजा के समान तेरे सामने बैठते हैं, और तेरी बातें सुनते हैं, परन्तु उन पर नहीं चलते; क्योंकि वे अपने मुँह से तो बहुत प्रेम दिखाते हैं, परन्तु उनका मन लालच ही में लगा रहता है।" (यहेजकेल 33:31।)

क्या तुम जानना चाहते हो कि कहलानेवाले हज़ारों मसीही अन्त में क्यों खो जाएँगे और नरक में बुरी दशा में नाश होंगे? वे यह नहीं कह सकेंगे कि परमेश्वर ने उन्हें उद्धार नहीं दिया। वे यह दलील नहीं दे सकेंगे कि मसीह ने उन्हें निमंत्रण नहीं भेजे। नहीं! उन्हें मानना पड़ेगा कि उनके लिये "सब कुछ तैयार था," केवल उनके अपने हृदय तैयार न थे। उनके अपने ही हृदय उनके विनाश का कारण ठहरेंगे! जीवन-नौका टूटे जहाज़ के पास ही थी, परन्तु वे उसमें न चढ़े। मसीह ने तो उन्हें इकट्ठा करना "चाहा," परन्तु उन्होंने इकट्ठा होना "न चाहा।" (मत्ती 23:37।) मसीह उन्हें बचाना चाहता था, परन्तु वे बचना न चाहते थे। "उन्होंने अन्धकार को ज्योति से अधिक प्रिय जाना।" उनके हृदयों का दोष था। "तुम जीवन पाने के लिये मेरे पास आना नहीं चाहते।" (यूहन्ना 3:19; 5:40।)

मैं अपने विषय की इस शाखा को यहीं छोड़ता हूँ। मुझे आशा है कि मैंने धर्म में हृदय का अत्यन्त महत्व दिखाने के लिये पर्याप्त कह दिया है। निश्चय ही इस पत्र का विषय तुम्हारे सामने रखने का मेरे पास उचित कारण है। क्या तुम्हारा हृदय ठीक है? क्या वह परमेश्वर की दृष्टि में ठीक है?

II. अब दूसरे स्थान पर मैं तुम्हें वह हृदय दिखाऊँगा जो परमेश्वर की दृष्टि में ग़लत है। हृदय केवल दो प्रकार के होते हैं, एक ठीक और एक ग़लत। ग़लत हृदय कैसा होता है?

ग़लत हृदय वही स्वाभाविक हृदय है जिसके साथ हम सब जन्म लेते हैं। स्वभाव से कोई हृदय ठीक नहीं होता। जन्म से "अच्छे हृदय" जैसी कोई वस्तु नहीं, चाहे कुछ अज्ञानी लोग "भीतर से अच्छा हृदय होने" के विषय में जो चाहें कहें। जब से आदम और हव्वा गिरे और पाप संसार में आया, तब से स्त्री-पुरुष बुराई की ओर झुकाव के साथ जन्म लेते हैं। हर स्वाभाविक हृदय ग़लत है। यदि जन्म से अब तक पवित्र आत्मा ने तुम्हारे हृदय को नहीं बदला, तो आज ही जान लो कि तुम्हारा हृदय ग़लत है।

पवित्रशास्त्र स्वाभाविक हृदय के विषय में क्या कहता है? वह बहुत-सी बातें कहता है जो अत्यन्त गम्भीर और पीड़ादायक रूप से सच हैं। वह कहता है कि "मन तो सब वस्तुओं से अधिक धोखा देनेवाला होता है, उसमें असाध्य रोग लगा है।" (यिर्मयाह 17:9।) वह कहता है कि "उसके मन के विचार में जो कुछ उत्पन्न होता है वह निरन्तर बुरा ही होता है।" (उत्पत्ति 6:5।) वह कहता है कि "मनुष्यों के मन बुराई से भरे रहते हैं।" (सभोपदेशक 9:3।) वह कहता है कि "भीतर से, अर्थात् मनुष्य के मन से," मानो सोते से, "बुरे बुरे विचार, व्यभिचार, चोरी, हत्या, परस्त्रीगमन, लोभ, दुष्टता, छल, लुचपन, कुदृष्टि, निन्दा, अभिमान और मूर्खता निकलती हैं। ये सब बुरी बातें भीतर ही से निकलती हैं।" (मरकुस 7:21।) निश्चय ही यह चित्र हमें दीन बनानेवाला है! इन बातों के बीज संसार में जन्मे हर मनुष्य के हृदय में हैं। इसलिये मैं तुम्हें ठीक ही कहता हूँ कि स्वाभाविक हृदय ग़लत है।

परन्तु क्या गलत हृदय का कोई ऐसा एक सामान्य चिन्ह नहीं है, जो उन सब में दिखाई देता है जिन्हें परमेश्वर ने नहीं बदला? हाँ! है; और गलत हृदय के उसी सामान्य चिन्ह की ओर मैं अब आपका ध्यान दिलाना चाहता हूँ। एक अत्यन्त उल्लेखनीय और शिक्षाप्रद अलंकार है, जिसे पवित्र आत्मा ने स्वाभाविक हृदय का वर्णन करने के लिए उचित समझा है। वह उसे "पत्थर का हृदय" कहता है। (यहेजकेल 11:19।) बाइबल में मैं इससे अधिक शिक्षा से भरा, और इससे अधिक उपयुक्त तथा सटीक कोई प्रतीक नहीं जानता। स्वाभाविक हृदय को पत्थर का हृदय कहनेवाले वचन से अधिक सच्चा वचन कभी नहीं लिखा गया। जो मैं कहने जा रहा हूँ उसे भली-भाँति ध्यान दीजिए; और प्रभु आपको समझ दे!

(क) पत्थर कठोर होता है। यह सब लोग जानते हैं। वह न झुकता है, न मुड़ता है, न उस पर कोई प्रभाव पड़ता है। वह टूट तो सकता है—परन्तु कभी मुड़ेगा नहीं। "पत्थर जैसा कठोर" यह कहावत सारे संसार में प्रचलित है। कॉर्नवॉल के तट पर खड़ी ग्रेनाइट की चट्टानों को देखिए। चार हज़ार वर्ष से अटलांटिक महासागर की लहरें उनसे व्यर्थ टकराती रही हैं। वे अपनी पुरानी कठोरता में अटूट और अडिग खड़ी हैं। स्वाभाविक हृदय का भी ठीक यही हाल है। विपत्तियाँ, दया के काम, हानियाँ, क्रूस, उपदेश, सम्मतियाँ, पुस्तकें, पर्चे, बोलना, लिखना—सब के सब उसे नरम करने में असमर्थ हैं। जब तक वह दिन नहीं आता कि परमेश्वर उसे बदलने के लिए उतरे, वह अडिग ही रहता है। स्वाभाविक हृदय को पत्थर का हृदय कहना ठीक ही है!

(ख) पत्थर ठण्डा होता है। उसमें एक सर्द, बर्फ़ीला-सा अनुभव होता है, जिसे आप छूते ही जान लेते हैं। वह शरीर, लकड़ी, यहाँ तक कि मिट्टी के अनुभव से भी बिलकुल भिन्न है। "पत्थर जैसा ठण्डा" यह कहावत हर किसी की ज़बान पर है। अनेक गिरजाघरों की पुरानी संगमरमर की मूर्तियों ने हज़ारों उपदेशों का सार सुना है। फिर भी वे कोई भावना प्रकट नहीं करतीं। उनके संगमरमरी चेहरों की एक पेशी भी कभी सिकुड़ती या हिलती नहीं। स्वाभाविक हृदय का भी ठीक यही हाल है। वह आत्मिक भावना से सर्वथा रहित है। मसीह की क्रूस पर मृत्यु की कथा की उसे उतनी भी चिन्ता नहीं जितनी नवीनतम उपन्यास की, या संसद की अन्तिम बहस की, या रेल दुर्घटना, जहाज़ के डूबने या फाँसी के समाचार की होती है। जब तक परमेश्वर स्वर्ग से आग भेजकर उसे गर्म नहीं करता, मनुष्य के स्वाभाविक हृदय को धर्म के विषय में कोई भावना नहीं होती। उसे पत्थर का हृदय कहना ठीक ही है!

(ग) पत्थर बंजर होता है। किसी भी प्रकार की चट्टान से आप कोई फसल नहीं काटेंगे। स्नोडन या बेन नेविस की चोटी के अनाज से आप अपने खत्ते कभी नहीं भरेंगे। ग्रेनाइट, स्लेट या चकमक पत्थर पर आप कभी गेहूँ नहीं काटेंगे। नॉरफ़ॉक की रेत, कैम्ब्रिजशायर के दलदल या सफ़ोक की चिकनी मिट्टी में आप धीरज, परिश्रम, धन और अच्छी खेती से अच्छी फसल पा सकते हैं। परन्तु पत्थर से आपको कौड़ी भर की भी फसल कभी नहीं मिलेगी। स्वाभाविक हृदय का भी ठीक यही हाल है। वह मन फिराव, विश्वास, प्रेम, भय, पवित्रता या नम्रता से सर्वथा बंजर है। जब तक परमेश्वर उसे तोड़कर उसमें कोई नया सिद्धान्त नहीं डालता, वह परमेश्वर की स्तुति के लिए कोई फल नहीं लाता। स्वाभाविक हृदय को पत्थर का हृदय कहना ठीक ही है!

(घ) पत्थर मृत होता है। वह न देखता है, न सुनता है, न हिलता है, न बढ़ता है। उसे स्वर्ग की महिमा दिखाइए, तो वह प्रसन्न न होगा। उसे नरक की आग के विषय में बताइए, तो वह न घबराएगा। उसे दहाड़ते सिंह या भूकम्प से भागने को कहिए, तो वह न हिलेगा। बास रॉक और मॉन्ट ब्लॉँ ठीक वैसे ही हैं जैसे 4000 वर्ष पहले थे। उन्होंने राज्यों को उठते और गिरते देखा है, और वे सर्वथा अपरिवर्तित बने रहे। जब नूह जहाज़ से निकला था तब से वे न ऊँचे हुए हैं, न चौड़े, न बड़े। स्वाभाविक हृदय का भी ठीक यही हाल है। उसमें आत्मिक जीवन की एक चिंगारी भी नहीं है। जब तक परमेश्वर उसमें पवित्र आत्मा को नहीं रोपता, वह सच्चे धर्म के विषय में मृत और निश्चल रहता है। स्वाभाविक हृदय को पत्थर का हृदय कहना ठीक ही है!

गलत हृदय अब आपके सामने रखा गया है। उसे देखिए। उसके विषय में सोचिए। मेरे बनाए इस चित्र के प्रकाश में अपने आप को परखिए। सम्भव है आपका हृदय अब तक कभी नहीं बदला। सम्भव है आपका हृदय अब भी वैसा ही है जैसा आपके जन्म के समय था। यदि ऐसा है, तो आज जो मैं आपसे कहता हूँ उसे स्मरण रखिए। आपका हृदय परमेश्वर की दृष्टि में गलत है!

क्या आप जानना चाहेंगे कि संसार में भलाई करना इतना कठिन क्यों है? क्या आप जानना चाहेंगे कि इतने थोड़े लोग सुसमाचार पर विश्वास क्यों करते हैं और सच्चे मसीहियों की तरह क्यों जीते हैं? कारण है मनुष्य के स्वाभाविक हृदय की कठोरता। वह न देखता है, न जानता है कि उसके लिए क्या भला है। मेरी दृष्टि में आश्चर्य इस बात का इतना नहीं कि थोड़े लोग मन फिराते हैं, जितना इस चमत्कारिक तथ्य का कि कोई भी मन फिराता है। जब मैं अविश्वास को देखता या सुनता हूँ तो मुझे अधिक अचम्भा नहीं होता। मुझे स्मरण रहता है कि स्वाभाविक हृदय गलत है।

क्या आप जानना चाहेंगे कि यदि लोग अपने पापों में मरें तो उनकी दशा इतनी भयंकर रूप से असहाय क्यों है? क्या आप जानना चाहेंगे कि सेवक हर उस व्यक्ति के विषय में इतने भयभीत क्यों रहते हैं जो परमेश्वर से मिलने के लिए तैयार हुए बिना उठा लिया जाता है? कारण है मनुष्य के स्वाभाविक हृदय की कठोरता। यदि कोई मनुष्य अपने बिना बदले हृदय के साथ स्वर्ग में पहुँच भी जाए तो वह वहाँ क्या करेगा? वह किस सन्त के पास बैठेगा? परमेश्वर की उपस्थिति और संगति में उसे क्या आनन्द मिलेगा? नहीं, नहीं! इसे छिपाना व्यर्थ है। यदि कोई मनुष्य गलत हृदय के साथ मरता है तो उसकी दशा के विषय में कोई सच्ची आशा नहीं हो सकती।

मैं इस बिन्दु को यहीं छोड़ता हूँ। एक बार फिर मैं अपने इस पूरे लेख का विषय आपके विवेक पर रखता हूँ। निश्चय ही आपको मानना पड़ेगा कि यह अत्यन्त गम्भीर विषय है। क्या आपका हृदय सही है? क्या वह परमेश्वर की दृष्टि में सही है?

III. अब अन्त में मैं आपको सही हृदय दिखाऊँगा। यह ऐसा हृदय है जिसके अनेक चित्र बाइबल में मिलते हैं। उनमें से कुछ चित्र मैं आपके सामने रखने का यत्न करूँगा। ऐसे प्रश्न पर मैं चाहता हूँ कि आप यह देखें कि परमेश्वर क्या कहता है, न कि यह कि मनुष्य क्या कहता है। आइए, अब सही हृदय के चिन्हों और लक्षणों को देखें।

(क) सही हृदय एक "नया हृदय" होता है। (यहेजकेल 36:26।) यह वह हृदय नहीं जिसके साथ मनुष्य जन्म लेता है—परन्तु दूसरा हृदय है जो पवित्र आत्मा उसमें रखता है। यह ऐसा हृदय है जिसकी नई रुचियाँ, नए आनन्द, नए शोक, नई अभिलाषाएँ, नई आशाएँ, नए भय, नई पसन्दें और नई नापसन्दें होती हैं। आत्मा, पाप, परमेश्वर, मसीह, उद्धार, बाइबल, प्रार्थना, स्वर्ग, नरक, संसार और पवित्रता के विषय में उसके विचार नए होते हैं। वह उस खेत के समान है जिसे एक नया और अच्छा किसान मिला हो। "पुरानी बातें बीत गई हैं; देखो, वे सब नई हो गई हैं।" (2 कुरिन्थियों 5:17।)

(ख) सही हृदय "टूटा और पिसा हुआ हृदय" है। (भजन संहिता 51:17।) वह अभिमान, आत्म-अहंकार और अपनी धार्मिकता के भरोसे से टूटकर अलग हो चुका होता है। अपने विषय में उसके पहले के ऊँचे विचार चटक गए, चूर-चूर हो गए और टुकड़े-टुकड़े हो गए हैं। वह अपने आप को दोषी, अयोग्य और भ्रष्ट समझता है। उसकी पहले की हठीली प्रवृत्ति, भारीपन और संवेदनहीनता पिघलकर जाती रही है। अब वह परमेश्वर को अप्रसन्न करने को हल्की बात नहीं समझता। वह कोमल, संवेदनशील है और पाप में पड़ने से सतर्कता से डरता है। (2 राजाओं 22:19।) वह नम्र, दीन और अपने आप को तुच्छ जाननेवाला है, और अपने में कोई भली बात नहीं देखता।

(ग) सही हृदय वह हृदय है जो उद्धार के लिये केवल मसीह पर विश्वास करता है, और जिसमें मसीह विश्वास के द्वारा बसता है। (रोमियों 10:10;

इफिसियों 3:17।) वह क्षमा और अनन्त जीवन की अपनी सारी आशा मसीह के प्रायश्चित, मसीह की मध्यस्थता और मसीह की मध्यस्थता की प्रार्थना पर टिकाता है। वह मसीह के लहू के छिड़काव से बुरे विवेक से शुद्ध किया गया है। (इब्रानियों 10:22।) वह मसीह की ओर वैसे ही मुड़ता है जैसे दिशासूचक यन्त्र की सुई उत्तर की ओर मुड़ती है। वह प्रतिदिन शान्ति, दया और अनुग्रह के लिये मसीह की ओर वैसे ही देखता है जैसे सूरजमुखी सूर्य की ओर देखता है। वह अपने दैनिक पोषण के लिये मसीह से वैसे ही पोषण पाता है जैसे इस्राएल जंगल में मन्ना से पोषित होता था। वह मसीह में अपनी सारी घटियों और आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये एक विशेष योग्यता देखता है। वह अपने वैद्य, रखवाले, पति और मित्र के रूप में उस पर टेक लगाता है, उस पर लटका रहता है, उस पर अपनी नींव रखता है और उससे लिपटा रहता है।

(घ) सही हृदय शुद्ध किया हुआ हृदय है। (प्रेरितों के काम 15:9; मत्ती 5:8।) वह पवित्रता से प्रेम करता है और पाप से घृणा करता है। वह प्रतिदिन अपने आप को शरीर और आत्मा की सब मलिनता से शुद्ध करने का प्रयत्न करता है। (2 कुरिन्थियों 7:1।) वह बुराई से घृणा करता है और भलाई में लगा रहता है। वह परमेश्वर की व्यवस्था से प्रसन्न रहता है, और वह व्यवस्था उस पर खुदी हुई है कि वह उसे भूल न जाए। (भजन संहिता 119:11।) वह व्यवस्था का और अधिक सिद्धता से पालन करने की लालसा रखता है, और व्यवस्था से प्रेम रखनेवालों से प्रसन्न होता है। वह परमेश्वर और मनुष्य से प्रेम करता है। उसका मन ऊपर की वस्तुओं पर लगा है। वह अपने आप को सबसे अधिक हल्का और सुखी तभी पाता है जब वह सबसे अधिक पवित्र होता है; और वह आनन्द के साथ स्वर्ग की बाट जोहता है, क्योंकि वहीं वह स्थान है जहाँ अन्त में सिद्ध पवित्रता प्राप्त होगी।

(ङ) सही हृदय प्रार्थना करनेवाला हृदय है। उसके भीतर "लेपालकपन की आत्मा" है, "जिससे हम हे अब्बा, हे पिता कहकर पुकारते हैं।" (रोमियों 8:15।) उसकी दैनिक भावना यही है, "हे प्रभु, मैं तेरे मुख का दर्शन करूँगा।" (भजन संहिता 27:8।) उसमें आदतन झुकाव होता है कि वह आत्मिक बातों के विषय में परमेश्वर से बातें करे—शायद निर्बलता, दुर्बलता और अधूरेपन से—परन्तु वह बोले बिना रह नहीं सकता। वह परमेश्वर के सामने ऐसे अपना मन उण्डेलना आवश्यक पाता है जैसे किसी मित्र के सामने, और अपनी सब आवश्यकताएँ और इच्छाएँ उसके आगे रखता है। वह उसे अपने सब भेद बताता है। वह उससे कुछ भी नहीं छिपाता। तुम किसी मनुष्य को बिना साँस लिये जीने के लिये जितना मना सकते हो, उतना ही सही हृदय रखनेवाले को बिना प्रार्थना किये जीने के लिये मना सकते हो।

(च) सही हृदय वह हृदय है जो अपने भीतर संघर्ष का अनुभव करता है। (गलातियों 5:17।) वह अपने भीतर दो विरोधी सिद्धान्तों को प्रभुता के लिये लड़ते हुए पाता है—शरीर आत्मा के विरुद्ध लालसा करता है, और आत्मा शरीर के विरुद्ध। वह अनुभव से जानता है कि पौलुस का क्या अर्थ है जब वह कहता है, "मैं अपने अंगों में दूसरे प्रकार की व्यवस्था देखता हूँ जो मेरी बुद्धि की व्यवस्था से लड़ती है।" (रोमियों 7:23।) गलत हृदय इस संघर्ष के विषय में कुछ नहीं जानता। हथियारबन्द बलवन्त अपने महल की रखवाली करता है तो उसकी संपत्ति कुशल से रहती है। (लूका 11:21।) परन्तु जब सच्चा राजा हृदय पर अधिकार कर लेता है, तब ऐसा संघर्ष आरम्भ होता है जो मृत्यु तक समाप्त नहीं होता। सही हृदय अपनी शान्ति से जितना पहचाना जाता है, उतना ही अपने युद्ध से भी पहचाना जाता है।

(छ) अन्त में—परन्तु कम महत्त्व का नहीं—सही हृदय ईमानदार, एकचित्त और सच्चा होता है। (लूका 8:15; 1 इतिहास 12:33; इब्रानियों 10:22।) उसमें झूठ, कपट या दिखावे का नाम तक नहीं। वह दो मन का या बँटा हुआ नहीं होता। वह सचमुच वही है जैसा वह अपने आप को बताता है, वही अनुभव करता है जो वह अनुभव करने का दावा करता है, और वही मानता है जो वह मानने का दावा करता है। उसका विश्वास निर्बल हो सकता है। उसकी आज्ञाकारिता बहुत अधूरी हो सकती है। परन्तु एक बात सही हृदय को सदा अलग दिखाएगी। उसका धर्म वास्तविक, खरा, पूर्ण और सच्चा होगा।

जैसा हृदय मैंने अभी वर्णन किया है, वह सब सच्चे मसीहियों का रहा है, चाहे वे किसी भी नाम, जाति, लोग या भाषा के हों। वे बहुत सी बातों में एक दूसरे से भिन्न रहे हैं—परन्तु वे सब "सही हृदय" के रहे हैं। उनमें से कुछ दाऊद और पतरस की तरह कुछ समय के लिये गिरे भी हैं—परन्तु उनके हृदय कभी प्रभु से पूरी तरह नहीं हटे। उन्होंने अक्सर अपने आप को दुर्बलताओं से लदे हुए स्त्री-पुरुष सिद्ध किया है—परन्तु उनके हृदय परमेश्वर की दृष्टि में सही रहे हैं। वे पृथ्वी पर एक दूसरे को समझते रहे हैं। उन्होंने पाया है कि उनका अनुभव हर जगह एक ही है। आनेवाले जगत में वे एक दूसरे को और भी अच्छी तरह समझेंगे। जिन्होंने पृथ्वी पर "सही हृदय" पाया है, वे सब स्वर्ग में प्रवेश करते समय पाएँगे कि उन सब का एक ही हृदय है।

निष्कर्ष

(1) अब निष्कर्ष में मैं इस लेख के हर पाठक के सामने आत्म-परीक्षा के लिये एक प्रश्न रखना चाहता हूँ। मैं आज तुमसे सीधे पूछता हूँ, "तुम्हारा हृदय कैसा है? क्या तुम्हारा हृदय सही है या गलत?"

मैं नहीं जानता कि तुम कौन हो जिसके हाथ में यह लेख पड़ा है। परन्तु मैं यह जानता हूँ कि आत्म-परीक्षा से तुम्हारी कोई हानि नहीं हो सकती। यदि तुम्हारा हृदय सही है, तो इसे जानना तुम्हारे लिये सांत्वना होगा। "यदि हमारा मन हमें दोषी न ठहराए, तो हमें परमेश्वर के सम्मुख हियाव होता है।" (1 यूहन्ना 3:21।) परन्तु यदि तुम्हारा हृदय गलत है, तो इसका पता लगाने और परिवर्तन की खोज करने का अब बहुत अवसर है। समय थोड़ा है। वह रात आती है जिसमें कोई काम नहीं कर सकता। आज ही अपने आप से कहो, "क्या मेरा हृदय सही है या गलत?"

अपने मन में यह न कहो, "ऐसे प्रश्नों की कोई आवश्यकता नहीं। हृदय के विषय में इतना हल्ला मचाने की कोई आवश्यकता नहीं। मैं नियमित रूप से कलीसिया या प्रार्थनालय जाता हूँ। मैं आदरणीय जीवन जीता हूँ। मुझे आशा है कि अन्त में मैं ठीक निकलूँगा।" मैं तुमसे विनती करता हूँ कि ऐसे विचारों से सावधान रहो—यदि तुम कभी उद्धार पाना चाहते हो तो इनसे सावधान रहो। तुम पृथ्वी की सबसे अच्छी कलीसिया में जा सकते हो, और सबसे अच्छे प्रचारकों को सुन सकते हो। तुम सबसे अच्छे कलीसिया-सदस्य, या प्रार्थनालय के सबसे खरे सदस्य हो सकते हो। परन्तु इस सारे समय में, यदि परमेश्वर की दृष्टि में तुम्हारा हृदय सही नहीं है, तो तुम विनाश के राजमार्ग पर हो। अपने सामने के प्रश्न पर शान्ति से विचार करने बैठो। उसे साहस से आँख मिलाकर देखो, और इधर-उधर न मुड़ो। क्या तुम्हारा हृदय सही है या गलत?

अपने मन में यह न सोचो, "कोई नहीं जान सकता कि उसका हृदय कैसा है। हमें अच्छे की आशा रखनी चाहिए। कोई भी अपनी आत्मा की दशा को निश्चय के साथ नहीं जान सकता।" फिर कहता हूँ, ऐसे विचारों से सावधान रहो! यह बात जानी जा सकती है। यह बात पता लगाई जा सकती है। अपने साथ सच्चाई और निष्पक्षता से व्यवहार करो। अपने भीतरी मनुष्य की दशा पर एक 'मुकदमा' खड़ा करो। एक जूरी बुलाओ। बाइबल को न्यायाधीश के आसन पर बैठने दो। गवाहों को सामने लाओ। पूछो कि तुम्हारी रुचियाँ क्या हैं, तुम्हारा प्रेम कहाँ लगा है, तुम्हारा धन कहाँ है, तुम किससे सबसे अधिक घृणा करते हो, किससे सबसे अधिक प्रेम करते हो, किस बात से सबसे अधिक प्रसन्न होते हो, किस बात से सबसे अधिक दुःखी होते हो। इन सब बातों की निष्पक्ष होकर जाँच करो, और देखो कि उत्तर क्या मिलते हैं। "जहाँ तेरा धन है वहीं तेरा मन भी लगा रहेगा।" (मत्ती 6:21)। वृक्ष अपने फल से सदा पहचाना जा सकता है, और सच्चा मसीही अपनी आदतों, रुचियों और प्रेम से सदा पहचाना जा सकता है। हाँ! यदि तुम ईमानदार, सच्चे और निष्पक्ष हो, तो तुम शीघ्र जान लोगे कि तुम्हारा हृदय कैसा है। वह ठीक है या ग़लत?

अपने मन में यह न सोचो, "जो कुछ आप कहते हैं उससे मैं पूरी तरह सहमत हूँ, और आशा है कि किसी दिन अपने हृदय की दशा की जाँच करूँगा। पर अभी मेरे पास समय नहीं है। मुझे अवकाश नहीं मिलता। मैं किसी सुविधाजनक समय की प्रतीक्षा में हूँ।" ओह, ऐसे विचारों से सावधान रहो! फिर कहता हूँ, सावधान रहो! जीवन अनिश्चित है, फिर भी तुम "सुविधाजनक समय" की बात करते हो। (प्रेरितों के काम 24:25)। अनन्तकाल निकट है, फिर भी तुम परमेश्वर से भेंट करने की तैयारी को टालने की बात करते हो। हाय, टालने की यह आदत लाखों आत्माओं का सदा के लिए विनाश है! अभागे मनुष्य! इस टालने के शैतान से तुम्हें कौन छुड़ाएगा? कर्तव्य के बोध के लिए जाग उठो। उन ज़ंजीरों को उतार फेंको जो घमण्ड, आलस्य और संसार के प्रेम तुम्हारे चारों ओर बुन रहे हैं। उठो, अपने पाँवों पर खड़े हो जाओ, और अपने सामने के प्रश्न को स्थिर दृष्टि से देखो। चाहे तुम कलीसिया के सदस्य हो या उससे अलग, मैं आज तुमसे पूछता हूँ: क्या तुम्हारा हृदय ठीक है या ग़लत?

(2) अब मैं उन सब लोगों को एक गम्भीर चेतावनी देना चाहता हूँ जो जानते हैं कि उनका हृदय ग़लत है, परन्तु बदलने की कोई इच्छा नहीं रखते। मैं यह पूरी दयालुता और स्नेह की भावना से करता हूँ। मैं व्यर्थ का भय उत्पन्न करना नहीं चाहता। पर मैं नहीं जानता कि तुम्हारी दशा के संकट को बढ़ा-चढ़ाकर कैसे कहूँ। मैं तुम्हें चेतावनी देता हूँ कि यदि परमेश्वर की दृष्टि में तुम्हारा हृदय ग़लत है, तो तुम नरक के कगार पर लटके हुए हो! तुम्हारे और अनन्त मृत्यु के बीच केवल एक ही पग का अन्तर है!

क्या तुम सचमुच मान सकते हो कि कोई भी पुरुष या स्त्री बिना ठीक हृदय के कभी स्वर्ग में प्रवेश करेगा? क्या तुम अपने आप को यह धोखा देते हो कि कोई भी अपरिवर्तित व्यक्ति कभी उद्धार पाएगा? ऐसे दयनीय भ्रम को दूर करो! उसे अभी और सदा के लिए अपने से दूर फेंक दो। पवित्रशास्त्र क्या कहता है? "जब तक कोई नये सिरे से जन्म न ले तब तक वह परमेश्वर का राज्य देख नहीं सकता।" "जब तक तुम न फिरो और बालकों के समान न बनो, तुम स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने न पाओगे।" "बिना पवित्रता के कोई प्रभु को न देखेगा।" (यूहन्ना 3:3; मत्ती 18:3; इब्रानियों 12:14)। जैसा कि बहुत लोग मान बैठे हैं, केवल हमारे पापों का क्षमा हो जाना ही काफ़ी नहीं है। क्षमा के साथ एक और बात की भी आवश्यकता है, और वह है नया हृदय। हमें नया बनाने के लिए पवित्र आत्मा चाहिए, और धोने के लिए मसीह का लहू। किसी के उद्धार पाने के लिए नया बनाया जाना और धोया जाना, दोनों आवश्यक हैं।

क्या तुम एक क्षण के लिए भी मान सकते हो कि यदि तुम बिना ठीक हृदय के स्वर्ग में प्रवेश करो, तो वहाँ सुखी होगे? ऐसे दयनीय भ्रम को दूर करो! उसे अभी और सदा के लिए अपने से दूर फेंक दो! उस मीरास का आनन्द लेने से पहले तुम्हारे भीतर "पवित्र लोगों की मीरास" के योग्य होने की तैयारी होनी चाहिए। (कुलुस्सियों 1:12)। पवित्र लोगों और स्वर्गदूतों की संगति में आनन्दित होने से पहले तुम्हारी रुचियाँ उनकी रुचियों के साथ मेल में आनी चाहिए। भेड़ पानी में फेंकी जाए तो सुखी नहीं होती। मछली सूखी भूमि पर डाली जाए तो सुखी नहीं होती। वैसे ही स्त्री-पुरुष भी यदि बिना ठीक हृदय के स्वर्ग में प्रवेश करें तो वहाँ सुखी न होंगे।

मेरी चेतावनी तुम्हारे सामने है। अपने हृदय को उसके विरुद्ध कठोर न करो। उस पर विश्वास करो। उसके अनुसार चलो। उसे अपने लाभ में लगाओ। बिना देर किए जागो और नये जीवन के लिए उठ खड़े हो। एक बात निश्चित है। चाहे तुम चेतावनी सुनो या न सुनो, परमेश्वर अपनी कही हुई बात से पीछे नहीं हटेगा। "यदि हम विश्वासघाती भी हों तो भी वह विश्वासयोग्य बना रहता है, क्योंकि वह आप अपना इन्कार नहीं कर सकता।" (2 तीमुथियुस 2:13)।

(3) तीसरी बात, मैं उन सब लोगों को सम्मति देना चाहता हूँ जो जानते हैं कि उनका हृदय ग़लत है, परन्तु उसे ठीक करवाना चाहते हैं। वह सम्मति छोटी और सरल है। मैं तुम्हें सलाह देता हूँ कि तुरन्त प्रभु यीशु मसीह के पास जाओ और पवित्र आत्मा का दान माँगो। एक खोए हुए और नाश हुए पापी के रूप में उससे विनती करो कि वह तुम्हें ग्रहण करे और तुम्हारी आत्मा की आवश्यकताओं को पूरा करे। मैं भली-भाँति जानता हूँ कि तुम अपना हृदय आप ठीक नहीं कर सकते। पर मैं जानता हूँ कि प्रभु यीशु मसीह कर सकता है। और मैं तुमसे विनती करता हूँ कि बिना देर किए प्रभु यीशु मसीह के पास जाओ।

यदि इस लेख का कोई पाठक सचमुच ठीक हृदय चाहता है, तो मैं परमेश्वर का धन्यवाद करता हूँ कि मैं उसे अच्छा प्रोत्साहन दे सकता हूँ। मैं परमेश्वर का धन्यवाद करता हूँ कि मैं मसीह को तुम्हारे सामने ऊँचा उठाकर साहस के साथ कह सकता हूँ: मसीह की ओर देखो, मसीह को खोजो, मसीह के पास जाओ। वह धन्य प्रभु यीशु संसार में किसलिए आया? उसने अपनी बहुमूल्य देह को क्रूस पर चढ़ने के लिए क्यों दिया? वह क्यों मरा और फिर जी उठा? वह स्वर्ग पर क्यों चढ़ गया और परमेश्वर के दाहिने हाथ क्यों बैठा? मसीह ने यह सब किसलिए किया, सिवाय इसके कि तुम्हारे और मेरे जैसे बेचारे पापियों के लिए पूरा उद्धार तैयार करे, पाप के दोष से उद्धार और पाप की शक्ति से उद्धार, उन सबके लिए जो विश्वास करते हैं! हाँ! मसीह आधा उद्धारकर्ता नहीं है। उसने "मनुष्यों में, वरन् हठीलों में भी दान लिए हैं।" (भजन संहिता 68:18)। वह उन सब पर आत्मा उंडेलने की प्रतीक्षा में है जो उसके पास आएँगे। दया और अनुग्रह, क्षमा और नया हृदय, यह सब यीशु अपने आत्मा के द्वारा तुम पर लागू करने को तैयार है, यदि तुम केवल उसके पास आओ। तो आओ, बिना देर किए मसीह के पास आओ।

ऐसा क्या है जो मसीह नहीं कर सकता? वह सृष्टि कर सकता है। आदि में सब कुछ उसी के द्वारा बनाया गया। उसने अपनी आज्ञा से सारे जगत को अस्तित्व में बुलाया। वह जिला सकता है। जब वह पृथ्वी पर था, तब उसने मरे हुओं को जिलाया और एक वचन से जीवन लौटा दिया। वह बदल सकता है। उसने बीमारी को चंगाई में और दुर्बलता को सामर्थ्य में, अकाल को भरपूरी में, आँधी को शान्ति में और शोक को आनन्द में बदल दिया है। उसने हृदयों में पहले ही हज़ारों आश्चर्यकर्म किए हैं। उसने अनपढ़ मछुए पतरस को प्रेरित पतरस बना दिया। उसने लोभी चुंगी लेनेवाले मत्ती को सुसमाचार का लेखक मत्ती बना दिया। उसने आत्मधर्मी फरीसी शाऊल को सारे जगत के सुसमाचार प्रचारक पौलुस बना दिया। जो मसीह ने एक बार किया है, वह फिर कर सकता है। मसीह और पवित्र आत्मा सदा एक-से रहते हैं। तेरे हृदय में ऐसा कुछ नहीं जिसे प्रभु यीशु ठीक न कर सके। बस मसीह के पास आ।

यदि तू फिलिस्तीन में उन दिनों रहता जब यीशु पृथ्वी पर था, तो बीमार होने पर तू मसीह से सहायता माँगता। यदि तू कफरनहूम की किसी पिछली गली में, या गलील की नीली झील के किनारे किसी झोपड़ी में हृदय के रोग से दबा पड़ा होता, तो निश्चय ही चंगाई के लिये यीशु के पास जाता। तू दिन-दिन मार्ग के किनारे बैठकर उसके आने की बाट जोहता। यदि वह संयोग से तेरे घर के निकट न आता, तो तू उसे ढूँढ़ता, और जब तक वह मिल न जाता तब तक चैन न लेता। हे भाई, तू आज ही अपनी आत्मा के रोग के लिये ऐसा क्यों नहीं करता? तू तुरन्त स्वर्ग के महान वैद्य के पास क्यों नहीं जाता, और उससे क्यों नहीं माँगता कि वह "तेरी देह में से पत्थर का हृदय निकालकर माँस का हृदय दे"? (यहेजकेल 11:19।) मैं तुझे एक बार फिर बुलाता हूँ। यदि तुझे "सीधा हृदय" चाहिए, तो उसे अपने बल से सुधारने में समय नष्ट न कर। यह तेरी सामर्थ्य से बहुत बाहर है। आत्माओं के महान वैद्य के पास आ। अभी यीशु मसीह के पास आ।

(4) अन्त में मैं उन सब के लिये एक उपदेश देना चाहता हूँ जिनके हृदय परमेश्वर की दृष्टि में सीधे किए गए हैं। मैं इसे सब सच्चे मसीहियों के लिये उचित समय का वचन जानकर कहता हूँ। हे हर एक विश्वासी भाई और बहिन, मेरी सुन। मैं विशेष करके तुझ से कहता हूँ।

क्या तेरा हृदय सीधा है? तो धन्यवादी हो। उसकी विशेष दया के लिये प्रभु की स्तुति कर, कि उसने "तुझे अन्धकार से अपनी अद्भुत ज्योति में बुला लिया।" (1 पतरस 2:9।) सोच कि स्वभाव से तू क्या था। सोच कि मुफ़्त और अनुचित अनुग्रह से तेरे लिये क्या किया गया है। हो सकता है तेरा हृदय अभी वैसा न हो जैसा होना चाहिए, और न वैसा जैसा तू आशा करता है कि वह होगा। परन्तु किसी भी प्रकार से तेरा हृदय वह पुराना कठोर हृदय नहीं रहा जिसे लेकर तू जन्मा था। निश्चय ही जिस मनुष्य का हृदय बदल गया है, उसे स्तुति से भरपूर होना चाहिए।

क्या तेरा हृदय सीधा है? तो दीन और चौकस रह। तू अभी स्वर्ग में नहीं, संसार में है। तू देह में है। शैतान तेरे निकट है, और कभी नहीं सोता। हे भाई, अपने हृदय की पूरी चौकसी रख! जागता और प्रार्थना करता रह कि तू परीक्षा में न पड़े। स्वयं मसीह से माँग कि वह तेरे लिये तेरे हृदय की रखवाली करे। उससे माँग कि वह उसमें वास करे, उसमें राज्य करे, उसकी चौकीदारी करे, और हर शत्रु को अपने पाँवों तले कुचल दे। गढ़ की कुंजियाँ राजा के ही हाथों में दे दे, और वहीं छोड़ दे। सुलैमान का यह वचन गम्भीर है, "जो अपने ऊपर भरोसा रखता है, वह मूर्ख है।" (नीतिवचन 28:26।)

क्या तेरा हृदय सीधा है? तो दूसरे लोगों के हृदयों के विषय में आशावान रह। तुझ में और उन में भेद किसने किया? संसार में कोई भी क्यों न बदल सके, जब तेरे जैसा मनुष्य नई सृष्टि बनाया गया है? काम करता रह। प्रार्थना करता रह। बोलता रह। लिखता रह। आत्माओं की भलाई के लिये जो कुछ तुझ से हो सके, उसके लिये परिश्रम कर। जब तक कोई जीवित है, तब तक उसके उद्धार से कभी निराश न हो। जिस मनुष्य को अनुग्रह ने बदला है, उसे निश्चय ही यह अनुभव होना चाहिए कि कोई मामला निराशाजनक नहीं है। ऐसा कोई हृदय नहीं जिसे चंगा करना मसीह के लिये असम्भव हो।

क्या तेरा हृदय सीधा है? तो उससे बहुत अधिक आशा न रख। यदि तू उसे दुर्बल और हठीला, मूर्छित और अस्थिर, और प्रायः सन्देह और भय के लिये तैयार पाए, तो आश्चर्य न कर। जब तक तेरा प्रभु और उद्धारकर्ता फिर न आए, तब तक तेरा छुटकारा पूरा नहीं है। तेरा पूरा उद्धार अभी प्रगट होना बाकी है। (लूका 21:28; 1 पतरस 1:5।) तेरे पास दो स्वर्ग नहीं हो सकते—एक यहाँ और एक आगे। तेरा हृदय बदला हुआ, नया किया हुआ, परिवर्तित और पवित्र किया हुआ है—फिर भी यह कभी न भूल कि वह अन्त में 'मनुष्य का हृदय' ही है—और ऐसे मनुष्य का हृदय जो दुष्ट संसार के बीच रहता है।

अन्त में, मैं सब सीधे हृदयवाले पाठकों से विनती करता हूँ कि वे मसीह के दूसरे आगमन के दिन की ओर आगे दृष्टि करें। वह समय निकट आता है जब शैतान बाँधा जाएगा और मसीह के पवित्र लोग बदल दिए जाएँगे—जब पाप हमें फिर न सताएगा, और पापियों को देखकर हमारे मन फिर उदास न होंगे—जब विश्वासी अन्त में बिना विघ्न के परमेश्वर की सेवा करेंगे, और पूरे हृदय से उससे प्रेम रखेंगे। उस दिन के लिये हम बाट जोहें, जागते रहें और प्रार्थना करें। वह बहुत दूर नहीं हो सकता। रात बहुत बीत चुकी है। दिन निकट है। निश्चय ही यदि हमारे हृदय सीधे हैं, तो हमें बार-बार पुकारना चाहिए, "हाँ, शीघ्र आ—हे प्रभु यीशु, आ!"

मसीह का निमन्त्रण

"हे सब परिश्रम करनेवालो और बोझ से दबे हुए लोगो, मेरे पास आओ; मैं तुम्हें विश्राम दूँगा।" मत्ती 11:28

इस लेख के आरम्भ में जो वचन है, वह सोने के अक्षरों में लिखे जाने के योग्य है। पवित्रशास्त्र के बहुत कम पदों ने हमारे प्रभु यीशु मसीह के इस पुराने जाने-पहचाने निमन्त्रण से अधिक मनुष्यों की आत्माओं का भला किया है। आओ, हम इसकी ध्यान से जाँच करें और देखें कि इसमें क्या है।

हमारे सामने के वचन में चार बातें हैं, जिन पर मैं ध्यान दिलाना चाहता हूँ। इन में से हर एक के विषय में मुझे कुछ कहना है।

पहली। इस निमन्त्रण को देनेवाला कौन है?

दूसरी। यह निमन्त्रण किसको दिया गया है?

तीसरी। देनेवाला हम से क्या करने को कहता है?

अन्तिम। देनेवाला क्या देने की प्रतिज्ञा करता है?

I. पहले, इस लेख के आरम्भ के निमन्त्रण का देनेवाला कौन है? वह कौन है जो इतने खुले मन से बुलाता है और इतना बड़ा प्रस्ताव रखता है? वह कौन है जो आज तेरे विवेक से कहता है, "आ—मेरे पास आ"?

हमें ये प्रश्न पूछने का अधिकार है। हम झूठ से भरे संसार में रहते हैं। पृथ्वी छल, ढोंग, धोखे, ठगी और झूठ से भरी है। किसी वचन-पत्र का मूल्य पूरी तरह उस नाम पर निर्भर है जो नीचे हस्ताक्षर किया गया है। जब हम किसी बड़े प्रतिज्ञा करनेवाले के विषय में सुनते हैं, तो हमें पूछने का अधिकार है, यह कौन है? और उसका नाम क्या है?

आपके सामने जो निमंत्रण है, उसके कहनेवाले मनुष्य के अब तक के सबसे महान और सर्वोत्तम मित्र हैं। वे प्रभु यीशु मसीह हैं, अनन्त

परमेश्वर के पुत्र।

वे सर्वशक्तिमान हैं। वे परमेश्वर पिता के सहभागी और बराबर हैं। वे सच्चे परमेश्वर से सच्चे परमेश्वर हैं। उन्हीं के द्वारा सब कुछ रचा गया। उनके हाथ में बुद्धि और ज्ञान के सारे भण्डार हैं। स्वर्ग और पृथ्वी का सारा अधिकार उन्हीं को दिया गया है। उन्हीं में सारी परिपूर्णता वास करती है। मृत्यु और नरक की कुंजियाँ उन्हीं के पास हैं। वे अभी परमेश्वर और मनुष्य के बीच ठहराए हुए मध्यस्थ हैं—और एक दिन वे सारी पृथ्वी के न्यायी और राजा होंगे। जब ऐसे व्यक्ति बोलते हैं, तो आप निश्चिन्त होकर उन पर भरोसा कर सकते हैं। जो प्रतिज्ञा वे करते हैं, उसे पूरा करने में वे समर्थ हैं। (जकर्याह 13:7; यूहन्ना 1:3; कुलुस्सियों 2:3; मत्ती 28:18; कुलुस्सियों 1:19; प्रकाशितवाक्य 1:18।)

वे अत्यन्त प्रेम करनेवाले हैं। उन्होंने हमसे ऐसा प्रेम किया कि हमारे लिये स्वर्ग को छोड़ दिया, और जो महिमा उनकी पिता के साथ थी उसे कुछ समय के लिये त्याग दिया। उन्होंने हमसे ऐसा प्रेम किया कि हमारे लिये स्त्री से जन्म लिया, और तैंतीस वर्ष इस पापमय संसार में बिताए। उन्होंने हमसे ऐसा प्रेम किया कि परमेश्वर के प्रति हमारे भारी ऋण को चुकाने का भार अपने ऊपर लिया, और हमारे पापों का प्रायश्चित करने के लिये क्रूस पर मरे। जब ऐसे व्यक्ति बोलते हैं, तो वे सुने जाने के योग्य हैं। जब वे कोई प्रतिज्ञा करते हैं, तो उन पर भरोसा करने से डरने की कोई आवश्यकता नहीं।

वे मनुष्य के हृदय को भली-भाँति जानते हैं। उन्होंने हमारे समान देह धारण की, और सब बातों में मनुष्य के समान बने, केवल पाप को छोड़कर। मनुष्य को किन-किन बातों से होकर गुज़रना पड़ता है, यह वे अनुभव से जानते हैं। उन्होंने निर्धनता, थकान, भूख, प्यास, पीड़ा और परीक्षा का स्वाद चखा है। पृथ्वी पर हमारी सारी दशा से वे परिचित हैं। उन्होंने "परीक्षा की दशा में दुःख उठाया।" जब ऐसे व्यक्ति कोई निमंत्रण देते हैं, तो वे उसे पूर्ण बुद्धि के साथ देते हैं। वे ठीक-ठीक जानते हैं कि आपको और मुझे किस बात की आवश्यकता है। (इब्रानियों 2:18।)

वे अपना वचन कभी नहीं तोड़ते। वे अपनी प्रतिज्ञाओं को सदा पूरा करते हैं। जो कुछ वे करने का भार लेते हैं, उसे करने में कभी नहीं चूकते। जो आत्मा उन पर भरोसा रखती है, उसे वे कभी निराश नहीं करते। वे चाहे कितने ही सामर्थी हैं, फिर भी एक बात है जो वे नहीं कर सकते—उनके लिये झूठ बोलना असम्भव है। (इब्रानियों 6:18।) जब ऐसे व्यक्ति कोई प्रतिज्ञा करते हैं, तो आपको इसमें सन्देह करने की आवश्यकता नहीं कि वे उस पर स्थिर रहेंगे। आप उनके वचन पर पूरे विश्वास के साथ भरोसा रख सकते हैं।

अब आपने सुन लिया कि आज आपके सामने जो निमंत्रण है, उसे भेजनेवाले कौन हैं। वे प्रभु यीशु मसीह हैं। उनके नाम को वह आदर दीजिए जो उसे मिलना चाहिए। उन्हें पूरी और निष्पक्ष सुनवाई दीजिए। विश्वास कीजिए कि उनके मुँह से निकली प्रतिज्ञा आपके पूरे ध्यान के योग्य है। सावधान रहिए कि बोलनेवाले से मुँह न मोड़ें। लिखा है, "सावधान रहो, कि तुम उस कहनेवाले से मुँह न फेरो; क्योंकि जब वे लोग उसकी न सुनकर, जिसने पृथ्वी पर उन्हें चेतावनी दी, न बच सके, तो हम स्वर्ग से चेतावनी देनेवाले से मुँह फेरकर कैसे बच सकेंगे?" (इब्रानियों 12:25।)

II. अब मैं दूसरी बात में आपको दिखाऊँगा कि आपके सामने जो निमंत्रण है, वह किसको सम्बोधित है।

प्रभु यीशु मसीह "सब परिश्रम करनेवालों और बोझ से दबे हुओं" को सम्बोधित करते हैं। यह वाक्य बहुत सांत्वना देनेवाला और शिक्षा से भरा है। यह व्यापक, विस्तृत और सर्वसमावेशी है। यह संसार के हर भाग के लाखों लोगों की दशा का वर्णन करता है।

परिश्रम करनेवाले और बोझ से दबे हुए लोग कहाँ हैं? वे हर कहीं हैं। वे एक ऐसी भीड़ हैं जिसे मनुष्य गिन भी नहीं सकता; वे हर जलवायु में और सूर्य के नीचे हर देश में पाए जाते हैं। वे यूरोप में, एशिया में, अफ्रीका में और अमेरिका में रहते हैं। वे सेन नदी के किनारे भी बसते हैं और टेम्स नदी के किनारे भी—मिसिसिपी के किनारे भी और नाइजर के किनारे भी। वे गणराज्यों में भी बहुत हैं और राजतन्त्रों में भी—उदार सरकारों के अधीन भी और तानाशाही के अधीन भी। हर कहीं आपको कष्ट, चिन्ता, शोक, व्याकुलता, बड़बड़ाहट, असन्तोष और बेचैनी मिलेगी। इसका क्या अर्थ है? यह सब किस बात की ओर संकेत करता है? लोग "परिश्रम करनेवाले और बोझ से दबे हुए" हैं।

परिश्रम करनेवाले और बोझ से दबे हुए लोग किस वर्ग के हैं? वे हर वर्ग के हैं—कोई अपवाद नहीं। वे स्वामियों में भी पाए जाते हैं और सेवकों में भी—धनवानों में भी और निर्धनों में भी—राजाओं में भी और प्रजा में भी—विद्वानों में भी और अज्ञानी लोगों में भी। हर वर्ग में आपको कष्ट, चिन्ता, शोक, व्याकुलता, बड़बड़ाहट, असन्तोष और बेचैनी मिलेगी। इसका क्या अर्थ है? यह सब किस बात की ओर संकेत करता है? लोग "परिश्रम करनेवाले और बोझ से दबे हुए" हैं।

इसे हम कैसे समझाएँ? जिस दशा का वर्णन मैंने अभी करने का प्रयत्न किया, उसका कारण क्या है? क्या परमेश्वर ने आरम्भ में मनुष्य को दुःखी रहने के लिये रचा था? निश्चय ही नहीं। क्या लोगों के सुखी न होने के लिये मानवीय सरकारें दोषी हैं? अधिक से अधिक बहुत थोड़ी मात्रा में। दोष इतनी गहराई में है कि मनुष्य के बनाए नियम वहाँ तक पहुँच ही नहीं सकते। एक और कारण है, ऐसा कारण जिसे बहुत से लोग दुर्भाग्य से देखना ही नहीं चाहते। वह कारण है पाप।

पाप और परमेश्वर से दूर हो जाना ही वे सच्चे कारण हैं जिनसे लोग हर कहीं परिश्रम करनेवाले और बोझ से दबे हुए हैं। पाप वह सार्वभौमिक रोग है जो सारी पृथ्वी में फैला है। पाप ही आरम्भ में काँटे और ऊँटकटारे ले आया, और मनुष्य को अपने माथे के पसीने की रोटी खाने के लिये विवश किया। पाप ही इसका कारण है कि "सारी सृष्टि अब तक मिलकर कराहती और पीड़ा में पड़ी तड़पती है," और "पृथ्वी की सब नींवें हिल गई हैं।" (रोमियों 8:22; भजन संहिता 82:5।) पाप ही उन सब बोझों का कारण है जो अब मानवजाति को दबाए हुए हैं। अधिकांश लोग यह नहीं जानते, और अपने चारों ओर की दशा को समझाने के प्रयास में व्यर्थ ही थकते रहते हैं। परन्तु अभिमानी मनुष्य चाहे जो सोचे, सारे शोक की बड़ी जड़ और नींव पाप ही है। मनुष्य को पाप से कितनी घृणा करनी चाहिए!

क्या तुम उनमें से एक हो जो परिश्रम करते और बोझ से दबे हैं? मुझे बहुत सम्भव लगता है कि तुम हो। मुझे पक्का विश्वास है कि संसार में हज़ारों स्त्री-पुरुष ऐसे हैं जो भीतर से बेचैन हैं, फिर भी इसे मानना नहीं चाहते। वे अपने हृदय पर एक बोझ अनुभव करते हैं जिसे वे सहर्ष उतार फेंकना चाहेंगे, पर मार्ग नहीं जानते। उन्हें भीतर यह प्रतीति रहती है कि उनके अन्तर्मन में सब कुछ ठीक नहीं है, जिसे वे किसी से नहीं कहते। पति अपनी पत्नियों से नहीं कहते, और पत्नियाँ अपने पतियों से नहीं कहतीं; बच्चे अपने माता-पिता से नहीं कहते, और मित्र अपने मित्रों से नहीं कहते। परन्तु भीतर का यह बोझ बहुतों के हृदयों पर भारी पड़ा रहता है! संसार जितना देखता है, उससे कहीं अधिक दुःख है। कुछ लोग चाहे इसे कितना ही छिपाएँ, पर अनगिनत लोग इसलिए बेचैन हैं कि वे जानते हैं कि वे परमेश्वर से भेंट करने के लिए तैयार नहीं हैं। और तुम, जो यह पुस्तक पढ़ रहे हो, शायद उनमें से एक हो।

यदि इस लेख का कोई पाठक "परिश्रम करनेवाला और बोझ से दबा हुआ" है, तो तुम वही व्यक्ति हो जिसे प्रभु यीशु मसीह आज निमंत्रण भेजता है। यदि तुम्हारा हृदय व्यथित है और विवेक घायल है; यदि तुम थकी हुई आत्मा के लिए विश्राम चाहते हो और नहीं जानते कि कहाँ पाओगे; यदि तुम दोषी हृदय के लिए शान्ति चाहते हो और समझ नहीं पा रहे कि किधर मुड़ें, तो तुम वही पुरुष हो, तुम वही स्त्री हो, जिससे यीशु आज बात करता है। तुम्हारे लिए आशा है। मैं तुम्हारे पास शुभ समाचार लाया हूँ। प्रभु यीशु कहता है, "मेरे पास आओ, और मैं तुम्हें विश्राम दूँगा।"

तुम मुझसे कह सकते हो कि यह निमंत्रण तुम्हारे लिए नहीं हो सकता, क्योंकि तुम इतने अच्छे नहीं हो कि मसीह तुम्हें बुलाए। मैं उत्तर देता हूँ कि यीशु भले लोगों से नहीं, बल्कि "परिश्रम करनेवालों और बोझ से दबे हुओं" से बात करता है। क्या तुम इस अनुभूति को कुछ भी जानते हो? तो तुम उन्हीं में से हो जिनसे वह बात करता है।

तुम मुझसे कह सकते हो कि यह निमंत्रण तुम्हारे लिए नहीं हो सकता, क्योंकि तुम पापी हो और धर्म के विषय में कुछ नहीं जानते। मैं उत्तर देता हूँ कि इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता कि तुम क्या हो या क्या रहे हो। क्या इस क्षण तुम अपने को "परिश्रम करनेवाला और बोझ से दबा हुआ" अनुभव करते हो? तो तुम उन्हीं में से हो जिनसे यीशु बात करता है।

तुम मुझसे कह सकते हो कि तुम्हें नहीं लगता कि यह निमंत्रण तुम्हारे लिए है, क्योंकि तुम अभी तक मन-परिवर्तित नहीं हुए और तुम्हें नया हृदय नहीं मिला। मैं उत्तर देता हूँ कि मसीह का निमंत्रण मन-परिवर्तित लोगों के लिए नहीं, बल्कि "परिश्रम करनेवालों और बोझ से दबे हुओं" के लिए है। क्या तुम ऐसा ही अनुभव करते हो? क्या तुम्हारे हृदय पर कोई बोझ है? तो तुम उन्हीं में से हो जिनसे मसीह बात करता है।

तुम मुझसे कह सकते हो कि तुम्हें इस निमंत्रण को स्वीकार करने का कोई अधिकार नहीं, क्योंकि तुम नहीं जानते कि तुम परमेश्वर के चुने हुओं में से हो। मैं उत्तर देता हूँ कि तुम्हें मसीह के मुँह में वे शब्द डालने का कोई अधिकार नहीं जो उसने नहीं कहे। वह यह नहीं कहता, "हे सब चुने हुओ, मेरे पास आओ।" वह बिना किसी अपवाद के सब "परिश्रम करनेवालों और बोझ से दबे हुओं" को पुकारता है। क्या तुम उनमें से एक हो? क्या तुम्हारी आत्मा पर भीतर कोई भार है? तुम्हें बस यही एक प्रश्न तय करना है। यदि हो, तो तुम उन्हीं में से हो जिनसे मसीह बात करता है।

यदि तुम उन "परिश्रम करनेवालों और बोझ से दबे हुओं" में से एक हो, तो मैं फिर तुमसे विनती करता हूँ कि जो निमंत्रण मैं आज तुम्हारे पास लाया हूँ उसे अस्वीकार न करो। अपनी ही दया को न त्यागो। शरण का बन्दरगाह तुम्हारे सामने मुफ़्त खुला है; उससे मुँह न मोड़ो। सर्वोत्तम मित्र तुम्हारी ओर अपना हाथ बढ़ाए है; अभिमान, या आत्म-धार्मिकता, या मनुष्य के उपहास का भय तुम्हें उसके प्रस्तावित प्रेम को ठुकराने न दे। उसके वचन पर विश्वास करो। उससे कहो, "हे प्रभु यीशु मसीह, मैं उन्हीं में से हूँ जिनके लिए आपका निमंत्रण है; मैं परिश्रम करनेवाला और बोझ से दबा हुआ हूँ। हे प्रभु, आप मुझसे क्या कराना चाहते हैं?"

III. अब मैं तीसरे स्थान पर तुम्हें दिखाऊँगा कि प्रभु यीशु मसीह तुमसे क्या करने को कहता है। तीन शब्द उस निमंत्रण का सार और सारांश हैं जो वह आज तुम्हारे पास भेजता है। यदि तुम "परिश्रम करनेवाले और बोझ से दबे हुए" हो, तो यीशु कहता है, "मेरे पास आओ।"

तुम्हारे सामने इन तीन शब्दों में एक महान सादगी है। यह वाक्य चाहे जितना छोटा और सरल दिखे, इसमें गहरे सत्य और ठोस सान्त्वना की खान है। इसे तौलो, इसे देखो, इस पर विचार करो, इसे भली-भाँति मन में उतारो। मेरा विश्वास है कि जब यीशु कहता है, "मेरे पास आओ," तो उसका आशय समझ लेना उद्धार देनेवाले मसीही जीवन का आधा भाग है।

भली-भाँति ध्यान दो कि प्रभु यीशु परिश्रम करनेवालों और बोझ से दबे हुओं से यह नहीं कहता कि "जाओ और काम करो।" ये शब्द बोझिल विवेक वालों को कोई सान्त्वना नहीं देते; यह थके-माँदे मनुष्य से और श्रम माँगने के समान होगा। नहीं, वह उनसे कहता है, "आओ!" वह यह नहीं कहता, "जो तुम पर मेरा ऋण है उसे चुकाओ।" यह माँग टूटे हुए हृदय को निराशा में धकेल देती; यह बर्बाद हो चुके दिवालिये से कर्ज़ वसूलने के समान होती। नहीं, वह कहता है, "आओ!" वह यह नहीं कहता, "ठहरो और प्रतीक्षा करो।" यह आज्ञा तो केवल उपहास होती; यह मरणासन्न व्यक्ति से कहने के समान होती कि सप्ताह के अन्त में तुम्हें दवा दी जाएगी। नहीं, वह कहता है, "आओ!" आज ही, तुरन्त, बिना किसी विलम्ब के, "मेरे पास आओ।"

परन्तु आख़िर मसीह के पास आने का अर्थ क्या है? यह वाक्यांश प्रायः प्रयोग होता है, पर प्रायः ग़लत समझा जाता है। सावधान रहो कि इस बिन्दु पर तुम कोई भूल न करो। यहीं पर दुर्भाग्य से हज़ारों लोग सही मार्ग से भटक जाते हैं और सत्य से चूक जाते हैं। सावधान रहो कि बन्दरगाह के मुहाने पर ही तुम्हारा जहाज़ न डूब जाए।

(क) ध्यान दो कि मसीह के पास आने का अर्थ कलीसिया और चैपल में आने से कुछ अधिक है। तुम आराधना-स्थल में नियमित रूप से अपना स्थान ग्रहण कर सकते हो और अनुग्रह के सब बाहरी साधनों में भाग ले सकते हो, फिर भी उद्धार न पाओ। यह सब मसीह के पास आना नहीं है।

(ख) ध्यान दो कि मसीह के पास आना प्रभु-भोज की मेज़ पर आने से कुछ अधिक है। तुम नियमित सदस्य और प्रभु-भोज में भाग लेनेवाले हो सकते हो; तुम उन लोगों की सूची में कभी अनुपस्थित न पाए जाओ जो उस रोटी को खाते और उस दाखरस को पीते हैं जिसे ग्रहण करने की प्रभु ने आज्ञा दी, फिर भी तुम कभी उद्धार न पाओ। यह सब मसीह के पास आना नहीं है।

(ग) ध्यान दो कि मसीह के पास आना सेवकों के पास आने से कुछ अधिक है। तुम किसी लोकप्रिय प्रचारक के निरन्तर श्रोता और उसके सब मतों के उत्साही समर्थक हो सकते हो, फिर भी कभी उद्धार न पाओ। यह सब मसीह के पास आना नहीं है।

(घ) एक बार फिर ध्यान दो कि मसीह के पास आना उसके विषय में केवल मस्तिष्क का ज्ञान पा लेने से कुछ अधिक है। तुम सुसमाचारीय सिद्धान्त की पूरी प्रणाली जान सकते हो और उसके एक-एक अंश पर बोल, तर्क और विवाद कर सकते हो, फिर भी कभी उद्धार न पाओ। यह सब मसीह के पास आना नहीं है।

मसीह के पास आने का अर्थ है सरल विश्वास के द्वारा हृदय से उसके पास आना। मसीह पर विश्वास करना उसके पास आना है, और मसीह के पास आना उस पर विश्वास करना है। यह आत्मा का वह कार्य है जो तब होता है जब मनुष्य अपने पापों को अनुभव करके और अन्य सब आशाओं से निराश होकर उद्धार के लिये अपने आप को मसीह को सौंप देता है, उस पर जोखिम उठाता है, उस पर भरोसा रखता है, और अपने आप को पूरी तरह उसी पर डाल देता है। जब मनुष्य मसीह की ओर इसलिये खाली होकर फिरता है कि वह भरा जाए, इसलिये रोगी होकर कि वह चंगा किया जाए, इसलिये भूखा होकर कि वह तृप्त हो, इसलिये प्यासा होकर कि उसे ताज़गी मिले, इसलिये कंगाल होकर कि वह धनी बनाया जाए, इसलिये मरता हुआ कि उसे जीवन मिले, इसलिये खोया हुआ कि वह बचाया जाए, इसलिये दोषी होकर कि वह क्षमा पाए, इसलिये पाप से अशुद्ध होकर कि वह शुद्ध किया जाए, और यह मानते हुए कि केवल मसीह ही उसकी घटी को पूरा कर सकता है—तब वह मसीह के पास आता है। जब वह मसीह का उपयोग वैसे करता है जैसे यहूदियों ने शरणनगर का किया, जैसे भूखे मरते मिस्रियों ने यूसुफ का किया, जैसे मरते हुए इस्राएलियों ने पीतल के सर्प का किया—तब वह मसीह के पास आता है। यह खाली आत्मा का परिपूर्ण उद्धारकर्ता पर जोखिम उठाना है। यह डूबते हुए मनुष्य का उस हाथ को पकड़ लेना है जो उसकी सहायता के लिये बढ़ाया गया है। यह रोगी का चंगा करनेवाली औषधि को ग्रहण करना है। मसीह के पास आना यही है, और इससे अधिक कुछ नहीं।

इस पत्र का प्रत्येक पाठक इस स्थान पर एक चेतावनी स्वीकार करे। मसीह के पास आने की इस बात में भूलों से सावधान रहो। किसी आधे रास्ते के पड़ाव पर मत रुक जाओ। शैतान और संसार को अपने आप को अनन्त जीवन से वंचित करके ठगने न दो। यह मत समझो कि तुम्हें मसीह से कभी कोई भलाई मिलेगी, जब तक तुम सीधे, एकदम, पूरी रीति से और सम्पूर्ण मन से स्वयं मसीह के पास न जाओ। थोड़ी सी बाहरी रीति-रस्म पर भरोसा मत रखो; बाहरी साधनों के नियमित उपयोग से सन्तुष्ट मत हो जाओ। अँधेरी रात में लालटेन बहुत अच्छी सहायक है—परन्तु वह घर नहीं है। अनुग्रह के साधन उपयोगी सहायक हैं—परन्तु वे मसीह नहीं हैं। नहीं, कदापि नहीं! आगे, और आगे, ऊपर की ओर बढ़ते जाओ, जब तक कि तुम्हारा स्वयं मसीह से व्यक्तिगत और हार्दिक व्यवहार न हो जाए।

मसीह के पास आने के ढंग के विषय में भूलों से सावधान रहो। अपने भीतर की योग्यता, पुण्य और उपयुक्तता के सब विचार सदा के लिये अपने मन से निकाल दो। भलाई, धार्मिकता और अपनी पात्रता की सब धारणाएँ फेंक दो। यह मत सोचो कि तुम अपनी सिफ़ारिश के लिये, या अपने आप को मसीह की दृष्टि के योग्य ठहराने के लिये कुछ ला सकते हो। तुम्हें उसके पास एक दीन, दोषी और अयोग्य पापी की रीति से आना होगा, नहीं तो तुम आ ही नहीं सकते। "परन्तु जो काम नहीं करता वरन् भक्तिहीन के धर्मी ठहरानेवाले पर विश्वास करता है, उसका विश्वास उसके लिये धार्मिकता गिना जाता है।" (रोमियों 4:5।) जो विश्वास धर्मी ठहराता और बचाता है उसकी यही विशेष पहचान है कि वह मसीह के पास केवल एक खाली हाथ लाता है।

अन्त में—पर कम महत्त्व का नहीं—उस मनुष्य के विशेष स्वरूप के विषय में तुम्हारे मन में कोई भूल न रहे जो मसीह के पास आया है और सच्चा मसीही है। वह कोई स्वर्गदूत नहीं है; वह कोई अर्द्ध-स्वर्गीय प्राणी नहीं है जिसमें कोई निर्बलता, या दोष, या दुर्बलता नहीं—वह ऐसा कुछ भी नहीं है। वह केवल एक पापी है जिसने अपनी पापमयता को पहचान लिया है और मसीह पर विश्वास के द्वारा जीवित रहने का धन्य भेद सीख लिया है। प्रेरितों और भविष्यद्वक्ताओं की वह महिमामय मण्डली क्या थी? शहीदों की वह श्रेष्ठ सेना क्या थी? यशायाह, दानिय्येल, पतरस, याकूब, यूहन्ना, पौलुस, पॉलीकार्प, क्रिसोस्टम, ऑगस्टीन, लूथर, रिडले, लैटिमर, बनयन, बैक्स्टर, व्हाइटफ़ील्ड, वेन, चामर्स, बिकर्स्टेथ, मैक्चेन—ये सब क्या थे? पापियों के सिवा और क्या, जो अपने पापों को जानते और अनुभव करते थे और केवल मसीह पर भरोसा रखते थे? वे उन लोगों के सिवा और क्या थे जिन्होंने वह निमंत्रण स्वीकार किया जो मैं आज तुम्हारे सामने लाया हूँ, और विश्वास के द्वारा मसीह के पास आए? इसी विश्वास से वे जीए—इसी विश्वास में वे मरे। अपने आप में और अपने कामों में उन्होंने उल्लेख के योग्य कुछ न देखा; परन्तु मसीह में उन्होंने वह सब देखा जिसकी उनकी आत्माओं को आवश्यकता थी।

मसीह का निमंत्रण अब तुम्हारे सामने है। यदि तुमने इसे पहले कभी नहीं सुना, तो आज सुनो। विशाल, भरपूर, मुफ़्त, व्यापक, सरल, कोमल, दयालु—यदि तुम इसे स्वीकार करने से इनकार करोगे तो यह निमंत्रण तुम्हें निरुत्तर छोड़ देगा। कुछ निमंत्रण ऐसे होते हैं जिन्हें ठुकरा देना शायद अधिक बुद्धिमानी और भलाई की बात है। एक निमंत्रण ऐसा है जो सदा स्वीकार किया जाना चाहिए—वही आज तुम्हारे सामने है। यीशु मसीह कह रहा है, "आओ—मेरे पास आओ।"

4. अब मैं अन्त में तुम्हें दिखाऊँगा कि प्रभु यीशु मसीह क्या देने की प्रतिज्ञा करता है। वह "परिश्रम करनेवालों और बोझ से दबे हुओं" को अपने पास केवल यूँ ही आने को नहीं कहता। वह अनुग्रहपूर्ण प्रेरणाएँ सामने रखता है—वह मधुर प्रस्तावों से उन्हें लुभाता है। वह कहता है, "मेरे पास आओ, मैं तुम्हें विश्राम दूँगा।"

विश्राम एक सुखद वस्तु है। इस थके हुए संसार में थोड़े ही स्त्री-पुरुष होंगे जो इसकी मधुरता को न जानते हों। जिस मनुष्य ने सारे सप्ताह अपने हाथों से कठिन परिश्रम किया है, लोहे, पीतल, पत्थर, लकड़ी या मिट्टी का काम किया है—खोदते, उठाते, पीटते, काटते हुए—वह जानता है कि शनिवार की रात घर जाकर एक दिन का विश्राम पाना कितना सुखद है। जिस मनुष्य ने सारे दिन अपने मस्तिष्क से कठिन परिश्रम किया है

—लिखते, नकल करते, गणना करते, रचना करते, युक्तियाँ बनाते, योजनाएँ बनाते हुए—वह जानता है कि अपने कागज़ एक ओर रखकर थोड़ा विश्राम पाना कितना सुखद है। हाँ! विश्राम एक सुखद वस्तु है।

और विश्राम उन प्रमुख प्रस्तावों में से एक है जो सुसमाचार मनुष्य के सामने रखता है। संसार कहता है, "मेरे पास आओ, मैं तुम्हें धन और सुख दूँगा।" शैतान कहता है, "मेरे साथ आओ, मैं तुम्हें बड़ाई, सामर्थ्य और बुद्धि दूँगा।" प्रभु यीशु मसीह कहता है, "मेरे पास आओ, मैं तुम्हें विश्राम दूँगा।"

परन्तु उस विश्राम का स्वरूप क्या है जो प्रभु यीशु देने की प्रतिज्ञा करता है? यह केवल शरीर का आराम नहीं है। मनुष्य को वह मिल सकता है और फिर भी वह दुखी हो सकता है। तुम उसे किसी राजभवन में रख सकते हो और उसे हर सम्भव सुख-सुविधा से घेर सकते हो। तुम उसे बहुत धन दे सकते हो और वह सब कुछ जो धन से खरीदा जा सकता है। तुम उसे कल की शारीरिक आवश्यकताओं की सब चिन्ता से मुक्त कर सकते हो, और एक घण्टे भी परिश्रम करने की आवश्यकता दूर कर सकते हो। यह सब तुम किसी मनुष्य के लिये कर सकते हो, और फिर भी उसे सच्चा विश्राम नहीं दे सकते। हज़ारों लोग कड़वे अनुभव से यह बात भली-भाँति जानते हैं। उनके हृदय संसारिक सम्पन्नता के बीच भूखे मर रहे हैं। उनका भीतरी मनुष्य रोगी और थका हुआ है, जबकि उनका बाहरी मनुष्य बैंजनी और महीन वस्त्र पहने हुए प्रतिदिन भोग-विलास करता है! हाँ—मनुष्य के पास घर, भूमि, धन, घोड़े, गाड़ियाँ, कोमल बिछौने, उत्तम भोजन और सेवा करनेवाले सेवक हो सकते हैं—और फिर भी उसे सच्चा विश्राम न मिले।

जो विश्राम मसीह देता है वह आन्तरिक और आत्मिक वस्तु है। यह हृदय का विश्राम है, विवेक का विश्राम, मन का विश्राम, भावनाओं का विश्राम, इच्छा का विश्राम। यह उस सुखद बोध से मिलने वाला विश्राम है कि पाप सब क्षमा हो गए और दोष सब दूर कर दिया गया। यह आनेवाली भली वस्तुओं की दृढ़ आशा से मिलने वाला विश्राम है, जो रोग, मृत्यु और कब्र की पहुँच से परे रखी हैं। यह इस सुदृढ़ अनुभूति से मिलने वाला विश्राम है कि जीवन का बड़ा काम निपट गया, उसके बड़े उद्देश्य का प्रबन्ध हो गया, इस जीवन में सब कुछ भली रीति से पूरा हुआ, और अनन्तकाल में स्वर्ग हमारा घर होगा।

(क) ऐसा विश्राम प्रभु यीशु अपने पास आनेवालों को इस प्रकार देता है कि वह उन्हें क्रूस पर अपना पूरा किया हुआ कार्य दिखाता है, उन्हें अपनी सिद्ध धार्मिकता का वस्त्र पहनाता है, और अपने बहुमूल्य लहू से उन्हें धोता है। जब मनुष्य देखने लगता है कि परमेश्वर का पुत्र सचमुच उसके पापों के लिये मरा, तब उसकी आत्मा भीतरी शान्ति और चैन का कुछ स्वाद चखने लगती है।

(ख) ऐसा विश्राम प्रभु यीशु अपने पास आनेवालों को इस प्रकार देता है कि वह स्वर्ग में अपने आपको उनके सदा जीवित महायाजक के रूप में प्रकट करता है, और यह कि परमेश्वर उसके द्वारा उनसे मेल कर चुका है। जब मनुष्य देखने लगता है कि परमेश्वर का पुत्र सचमुच उसके लिये मध्यस्थता की प्रार्थना करने को जीवित है, तब वह भीतरी शान्ति और चैन का कुछ अनुभव करने लगेगा।

(ग) ऐसा विश्राम प्रभु यीशु अपने पास आनेवालों को इस प्रकार देता है कि वह अपना आत्मा उनके हृदयों में बसाता है, जो उनकी आत्माओं के साथ गवाही देता है कि वे परमेश्वर की सन्तान हैं, और पुरानी बातें जाती रहीं, देखो, सब बातें नई हो गई हैं। जब मनुष्य पिता के रूप में परमेश्वर की ओर भीतर से खिंचाव अनुभव करने लगता है, और अपने आपको गोद लिया हुआ और क्षमा पाया हुआ बालक जानने लगता है, तब उसकी आत्मा शान्ति और चैन का कुछ अनुभव करने लगती है।

(घ) ऐसा विश्राम प्रभु यीशु अपने पास आनेवालों को इस प्रकार देता है कि वह उनके हृदयों में राजा होकर निवास करता है, भीतर की सब बातों को क्रम में रखता है, और हर क्षमता को उसका स्थान और काम देता है। जब मनुष्य अपने हृदय में विद्रोह और उथल-पुथल के स्थान पर व्यवस्था पाने लगता है, तब उसकी आत्मा शान्ति और चैन का कुछ अर्थ समझने लगती है। जब तक सच्चा राजा सिंहासन पर न बैठे, तब तक कोई सच्चा आन्तरिक सुख नहीं।

(ङ) ऐसा विश्राम मसीह के सब विश्वासियों का विशेषाधिकार है। कोई इसे अधिक जानते हैं, कोई कम; कोई इसे कभी-कभार दूर-दूर के अन्तराल पर ही अनुभव करते हैं, और कोई लगभग सदा करते हैं। इसके बोध का आनन्द बहुत कम लोग अविश्वास से बहुत-सी लड़ाइयों और भय से बहुत-सी जूझ के बिना उठाते हैं। परन्तु जो सचमुच मसीह के पास आते हैं, वे सब इस विश्राम के बारे में कुछ न कुछ जानते हैं। उनसे, उनकी सब शिकायतों और शंकाओं के होते हुए भी, पूछो कि क्या वे मसीह को छोड़कर संसार में लौट जाएँगे। तुम्हें केवल एक ही उत्तर मिलेगा। उनका विश्राम का बोध चाहे कितना ही निर्बल हो, उन्होंने कुछ ऐसा पकड़ लिया है जो उन्हें लाभ पहुँचाता है, और उस वस्तु को वे छोड़ नहीं सकते।

(च) ऐसा विश्राम उन सब की पहुँच में है जो उसे खोजने और ग्रहण करने को तैयार हैं। कंगाल मनुष्य इतना कंगाल नहीं कि उसे पा न सके; अनपढ़ मनुष्य इतना अनपढ़ नहीं कि उसे जान न सके; रोगी मनुष्य इतना निर्बल और असहाय नहीं कि उसे थाम न सके। मसीह का विश्राम पाने के लिये केवल एक ही बात आवश्यक है, अर्थात् सीधा-सादा विश्वास। मसीह में विश्वास सुख का बड़ा भेद है। निर्धनता, अज्ञान, क्लेश या संकट, कोई भी स्त्री-पुरुषों को आत्मा का विश्राम अनुभव करने से नहीं रोक सकता, यदि वे केवल मसीह के पास आएँ और विश्वास करें।

(छ) ऐसा विश्राम वह धन है जो लोगों को सांसारिक उलट-फेरों से स्वतन्त्र कर देता है। बैंक टूट सकते हैं, और धन पंख लगाकर उड़ जा सकता है। युद्ध, महामारी और अकाल किसी देश पर टूट पड़ सकते हैं, और पृथ्वी की नींवें डिग सकती हैं। स्वास्थ्य और बल जाता रह सकता है, और घृणित रोग से देह चूर हो सकती है। मृत्यु पत्नी, बच्चों और मित्रों को काट गिरा सकती है, यहाँ तक कि जिसने कभी उनका सुख पाया था वह अकेला रह जाए। परन्तु जो मनुष्य विश्वास से मसीह के पास आया है, उसके पास फिर भी कुछ ऐसा रहेगा जो उससे कभी छीना नहीं जा सकता। पौलुस और सीलास के समान वह बन्दीगृह में गाएगा। अय्यूब के समान, जो सन्तान और सम्पत्ति से वंचित हुआ, वह प्रभु का नाम धन्य कहेगा। (प्रेरितों के काम 16:25; अय्यूब 1:21।) सच्चे अर्थ में स्वतन्त्र वही मनुष्य है जिसके पास वह है जिसे कोई छीन नहीं सकता।

(ज) ऐसा विश्राम वह धन है जो लोगों को सचमुच धनवान बनाता है। यह टिकता है; यह घिसता नहीं; यह स्थिर रहता है। यह अकेले घर को उजाला देता है। यह मृत्यु-शय्या के तकिये को कोमल करता है। यह लोगों के साथ चलता है जब वे ताबूतों में रखे जाते हैं। यह उनके साथ रहता है जब वे कब्र में रखे जाते हैं। जब मित्र हमारी और सहायता नहीं कर सकते, और धन किसी काम का नहीं रहता, जब वैद्य हमारी पीड़ा दूर नहीं कर सकते, और परिचारिकाएँ हमारी आवश्यकताओं की सेवा नहीं कर सकतीं, जब इन्द्रियाँ जवाब देने लगती हैं, और आँख-कान अपना काम नहीं कर पाते, तब भी, तब भी, जो “विश्राम” मसीह देता है वह विश्वासी के हृदय में उमड़ता रहेगा। “धनी” और “निर्धन” शब्द एक दिन अपना अर्थ पूरी तरह बदल लेंगे। एकमात्र धनी वही है जो विश्वास से मसीह के पास आया और मसीह से विश्राम पाया। यही वह विश्राम है जिसे मसीह उन सब को देने का प्रस्ताव करता है जो “थके और बोझ से दबे” हैं।

यही वह विश्राम है जिसके लिये वह उन्हें अपने पास आने का निमन्त्रण देता है। यही वह विश्राम है जिसका आनन्द मैं चाहता हूँ कि आप उठाएँ, और इसी का निमन्त्रण मैं आज आपके पास लाया हूँ। परमेश्वर करे कि यह निमन्त्रण आपके लिये व्यर्थ न लाया गया हो!

(1) क्या इस लेख के किसी पाठक को उस “विश्राम” का कोई बोध नहीं जिसकी मैं चर्चा करता आया हूँ? यदि ऐसा है, तो आपको अपने धर्म से क्या मिला है? आप मसीही देश में रहते हैं; आप अपने को मसीही मानते और कहते हैं। आप सम्भवतः बहुत वर्षों से किसी मसीही आराधनालय में जाते रहे हैं। आप यह पसन्द न करेंगे कि आपको अविश्वासी या मूर्तिपूजक कहा जाए। फिर भी इस सारे समय में आपने अपने मसीही होने से क्या लाभ पाया है! उससे कौन-सा ठोस भला प्राप्त किया है? जहाँ तक कोई देख सकता है, आप तुर्क या यहूदी भी होते तो उतना ही ठीक होता।

आज ही सलाह मानो, और ठान लो कि तुम मसीही विश्वास के केवल नाम ही के नहीं, वरन् उसकी वास्तविकताओं के, और केवल रूप ही के नहीं, वरन् उसके सार के भी अधिकारी बनोगे। जब तक तुम उस शान्ति, आशा, आनन्द और सान्त्वना के विषय में कुछ न जान लो जो पहले के समय में मसीही लोग भोगते थे, तब तक सन्तुष्ट न हो जाओ। अपने आप से पूछो कि तुम उन भावनाओं से अपरिचित क्यों हो जिनका अनुभव प्रेरितों के दिनों में स्त्री-पुरुषों ने किया था। अपने आप से पूछो कि तुम रोमियों और फिलिप्पियों के समान, जिन्हें पौलुस ने लिखा, "प्रभु में आनन्दित" क्यों नहीं होते और "परमेश्वर के साथ मेल" का अनुभव क्यों नहीं करते। निःसन्देह धार्मिक भावनाएँ प्रायः धोखा देनेवाली होती हैं; परन्तु निश्चय ही जो धर्म कोई भावना उत्पन्न ही नहीं करता, वह नए नियम का धर्म नहीं है। जो धर्म मनुष्य को भीतर का कोई चैन नहीं देता, वह कभी परमेश्वर की ओर से आया हुआ धर्म नहीं हो सकता। अपने विषय में सावधान रहो। जब तक तुम "उस विश्राम" के विषय में, जो मसीह में है, कुछ न जान लो, तब तक कभी सन्तुष्ट न हो।

(2) क्या इस लेख का कोई पाठक आत्मा का विश्राम चाहता है, फिर भी नहीं जानता कि उसके लिए कहाँ जाए? आज स्मरण रखो कि केवल एक ही स्थान है जहाँ वह मिल सकता है। सरकारें उसे नहीं दे सकतीं; शिक्षा उसे प्रदान नहीं करेगी; संसारिक मनोरंजन उसकी पूर्ति नहीं कर सकते; धन से वह मोल नहीं लिया जा सकता। वह केवल यीशु मसीह के हाथ में मिल सकता है—और यदि तुम भीतर की शान्ति पाना चाहते हो तो तुम्हें उसी के हाथ की ओर मुड़ना होगा।

आत्मा के विश्राम का कोई राजमार्ग नहीं है। यह बात कभी न भूली जाए। पिता के पास पहुँचने का केवल एक ही मार्ग है—यीशु मसीह; स्वर्ग में प्रवेश का केवल एक ही द्वार है—यीशु मसीह; और हृदय की शान्ति का केवल एक ही पथ है—यीशु मसीह। सब "थके और बोझ से दबे हुओं" को, चाहे उनका पद या दशा कुछ भी हो, उसी मार्ग से जाना होगा। अपने महलों में राजा और कंगालों के गृह में कंगाल, इस विषय में सब बराबर हैं। यदि वे आत्मा में थके और प्यासे हैं, तो सबको समान रूप से मसीह के पास आना होगा। यदि वे चाहते हैं कि उनकी प्यास बुझे, तो सबको एक ही सोते से पीना होगा।

हो सकता है कि जो मैं अब लिख रहा हूँ उस पर तुम विश्वास न करो। समय ही बताएगा कि कौन सही है और कौन गलत। यदि चाहो तो यही कल्पना करते चले जाओ कि सच्चा सुख इस संसार की अच्छी वस्तुओं में मिलता है। यदि चाहो तो उसे रंगरलियों और भोजों में, नाच-गान और आमोद-प्रमोद में, दौड़ों और नाट्यशालाओं में, खेलों और ताश में ढूँढ़ो। यदि चाहो तो उसे पढ़ने और विज्ञान की खोजों में, संगीत और चित्रकला में, राजनीति और व्यापार में ढूँढ़ो। ढूँढ़ते रहो—परन्तु जब तक तुम अपनी योजना नहीं बदलोगे, तब तक उसे कभी न पकड़ पाओगे। हृदय का सच्चा विश्राम यीशु मसीह के साथ हृदय के मेल के सिवाय और कहीं नहीं मिलता।

चार्ल्स प्रथम की पुत्री राजकुमारी एलिज़ाबेथ आइल ऑफ़ वाइट के न्यूपोर्ट कलीसिया में दफ़नाई गई है। हमारी दयालु महारानी विक्टोरिया द्वारा बनवाया गया एक संगमरमर का स्मारक मर्मस्पर्शी रीति से उसकी मृत्यु का वृत्तान्त बताता है। वह दुःखद राष्ट्रमण्डल-युद्धों के दिनों में कैरिसब्रुक दुर्ग में बन्दी बनी, अपनी युवावस्था के सब साथियों से अलग और अकेली, मुरझाती रही, जब तक मृत्यु ने उसे छुड़ा न लिया। एक दिन वह मृत पाई गई, उसका सिर उसकी बाइबल पर टिका था और बाइबल इन शब्दों पर खुली थी, "हे सब परिश्रम करनेवालो और बोझ से दबे हुए लोगो, मेरे पास आओ; मैं तुम्हें विश्राम दूँगा।" न्यूपोर्ट के कलीसिया में बना स्मारक इसी घटना को अंकित करता है। वह एक स्त्री की मूर्ति है जो संगमरमर की एक पुस्तक पर सिर टिकाए लेटी है, और उस पुस्तक पर वही उद्धृत पद खुदा है। सोचो कि वह स्मारक पत्थर में कैसा उपदेश सुनाता है। सोचो कि वह इस बात का कैसा स्थायी स्मारक है कि पद और ऊँचा कुल निश्चित सुख देने में सर्वथा असमर्थ हैं! सोचो कि आज जो पाठ तुम्हारे सामने है, उसकी वह कैसी गवाही देता है—वह महान पाठ कि मसीह को छोड़ किसी के लिए सच्चा विश्राम नहीं है! तुम्हारी आत्मा के लिए यह कितने सौभाग्य की बात होगी यदि वह पाठ तुम कभी न भूलो!

(3) क्या इस लेख का कोई पाठक उस विश्राम को पाना चाहता है जो मसीह ही दे सकता है, फिर भी उसे ढूँढ़ने से डरता है? मैं एक ऐसे मित्र के नाते जो तुम्हारी आत्मा की चिन्ता करता है, तुमसे विनती करता हूँ कि इस व्यर्थ भय को दूर कर दो। क्योंकि मसीह क्रूस पर पापियों को बचाने के लिए नहीं तो और किस कारण मरा? वह परमेश्वर के दाहिने हाथ पर पापियों को ग्रहण करने और उनके लिए मध्यस्थता की प्रार्थना करने के लिए नहीं तो और किस कारण बैठा है? जब मसीह तुम्हें इतने स्पष्ट रूप से बुलाता है, और इतने उदार भाव से प्रतिज्ञा करता है, तो तुम अपनी ही आत्मा को क्यों वंचित करते हो और उसके पास आने से क्यों इनकार करते हो?

इस लेख के सब पाठकों में से कौन मसीह के द्वारा उद्धार पाना चाहता है, और फिर भी अभी तक उद्धार नहीं पाया? मैं तुमसे विनती करता हूँ—आओ, बिना देर किए मसीह के पास आओ। चाहे तुम बड़े पापी रहे हो, आओ! चाहे तुमने चेतावनियों, सम्मतियों और उपदेशों का बहुत समय तक विरोध किया हो, आओ! चाहे तुमने ज्योति और ज्ञान के विरुद्ध, पिता की सलाह और माता के आँसुओं के विरुद्ध पाप किया हो, आओ! चाहे तुम दुष्टता की हर अति में डूब गए हो और बिना प्रार्थना के जीवन बिताया हो, तो भी आओ! द्वार बन्द नहीं हुआ है, सोता अभी सूखा नहीं है। यीशु मसीह तुम्हें बुलाता है। इतना ही पर्याप्त है कि तुम अपने को परिश्रम से थका और बोझ से दबा हुआ अनुभव करते हो और उद्धार पाना चाहते हो। आओ! बिना देर किए मसीह के पास आओ!

विश्वास के द्वारा उसके पास आओ, और प्रार्थना में उसके सामने अपना हृदय उँडेल दो। उसे अपने जीवन की पूरी कथा सुना दो, और उससे कहो कि वह तुम्हें ग्रहण करे। जैसे पश्चाताप करनेवाले चोर ने उसे क्रूस पर देखकर उसे पुकारा था, वैसे ही तुम भी उसे पुकारो। उससे कहो, "हे प्रभु, मुझे भी बचा! हे प्रभु, मुझे स्मरण कर!" आओ! बिना देर किए मसीह के पास आओ!

यदि तुम अब तक इस स्थान पर नहीं पहुँचे हो, तो यदि तुम उद्धार पाना चाहते हो, तो अन्त में तुम्हें यहाँ पहुँचना ही होगा। तुम्हें एक पापी के रूप में मसीह के पास जाना होगा; तुम्हें उस महान वैद्य के साथ व्यक्तिगत व्यवहार करना होगा, और उससे चंगाई की विनती करनी होगी। इसे अभी क्यों न करो? आज ही उस महान निमन्त्रण को क्यों न स्वीकार कर लो? मैं फिर अपनी वही विनती दोहराता हूँ। आओ! बिना देर किए मसीह के पास आओ!

(4) क्या इस लेख के किसी पाठक ने वह विश्राम पा लिया है जो मसीह देता है? क्या तुमने उसके पास आकर और अपनी आत्मा को उस पर डालकर सच्ची शान्ति का स्वाद चखा है? तो अपने जीवन के अन्त तक जैसे आरम्भ किया है वैसे ही चलते रहो, यीशु की ओर देखते हुए और उसी पर जीवन निर्वाह करते हुए। विश्राम और शान्ति के उस महान सोते से प्रतिदिन विश्राम, शान्ति, दया और अनुग्रह की भरपूर आपूर्ति लेते रहो। स्मरण रखो कि यदि तुम मतूशेलह की आयु तक भी जीवित रहो, तो भी तुम एक कंगाल और रीते पापी के सिवाय और कुछ न होगे, और जो कुछ तुम्हारे पास है और जिसकी तुम आशा रखते हो, उस सब के लिए तुम केवल मसीह के ऋणी रहोगे।

मसीह में विश्वास का जीवन जीने से कभी लज्जित न हो। लोग तुम्हारी हँसी उड़ा सकते और तुम्हारा उपहास कर सकते हैं, यहाँ तक कि वाद-विवाद में तुम्हें चुप भी करा सकते हैं; परन्तु मसीह में विश्वास जो अनुभूतियाँ देता है, उन्हें वे तुमसे कभी छीन नहीं सकते। वे तुम्हें यह अनुभव करने से कभी नहीं रोक सकते, "मैं थका-माँदा था—जब तक मुझे मसीह न मिला—परन्तु अब मेरे विवेक को विश्राम मिल गया है। मैं अन्धा था—परन्तु अब देखता हूँ। मैं मरा हुआ था—परन्तु अब फिर जी उठा हूँ। मैं खोया हुआ था—परन्तु अब मिल गया हूँ।"

अपने आस-पास के सब लोगों को मसीह के पास आने का निमन्त्रण दो। पिता, माता, पति, पत्नी, बच्चों, भाइयों, बहनों, मित्रों, सम्बन्धियों, साथियों, सहकर्मियों, सेवकों—सब को, एक-एक को, प्रभु यीशु की पहचान तक पहुँचाने के लिए हर उचित प्रयत्न करो। कोई कसर न छोड़ो। उनसे मसीह के विषय में बात करो—मसीह से उनके विषय में बात करो। समय और असमय तैयार रहो। उनसे वही कहो जो मूसा ने होबाब से कहा था, "तू हमारे संग चल, और हम तेरी भलाई करेंगे।" (गिनती 10:29।) दूसरों की आत्माओं के लिए तुम जितना परिश्रम करोगे, उतनी ही अधिक आशिष तुम्हें अपनी आत्मा के लिए मिलेगी।

अन्त में, परन्तु कम महत्त्वपूर्ण नहीं, आनेवाले संसार में एक उत्तम विश्राम की ओर पूरे भरोसे से दृष्टि रखो। थोड़ा ही समय और, और जो आनेवाला है वह आएगा, और देर न करेगा। वह उन सब को इकट्ठा करेगा जिन्होंने उस पर विश्वास किया, और अपने लोगों को उस घर में ले जाएगा जहाँ दुष्ट फिर सताना छोड़ देंगे, और थके-माँदे पूर्ण विश्राम पाएँगे। वह उन्हें महिमामय देह देगा, जिसमें वे बिना ध्यान बँटे उसकी सेवा करेंगे और बिना थके उसकी स्तुति करेंगे। वह सब के मुख से आँसू पोंछ डालेगा, और सब कुछ नया कर देगा। (यशायाह 25:8।)

उन सब के लिए एक उत्तम समय आनेवाला है जो मसीह के पास आए हैं और अपनी आत्माओं को उसकी रखवाली में सौंप चुके हैं। वे "उस सारे मार्ग को स्मरण करेंगे जिससे वे चलाए गए," और मार्ग के हर कदम की बुद्धि को देखेंगे। वे आश्चर्य करेंगे कि उन्होंने कभी अपने चरवाहे की कृपा और प्रेम पर सन्देह कैसे किया। सबसे बढ़कर, वे आश्चर्य करेंगे कि वे उसके बिना इतने समय तक कैसे जी सके, और उसके विषय में सुनकर भी उसके पास आने में कैसे हिचकिचाए।

स्कॉटलैंड में ग्लेनको नाम का एक दर्रा है, जो इस बात का सुन्दर उदाहरण देता है कि जो मनुष्य मसीह के पास आता है, उसके लिए स्वर्ग कैसा होगा। ग्लेनको का मार्ग यात्री को एक लम्बी और खड़ी चढ़ाई पर ले जाता है, जिसमें अनेक छोटे-छोटे घुमाव और मोड़ आते हैं। परन्तु जब दर्रे की चोटी आती है, तो मार्ग के किनारे एक पत्थर दिखाई देता है, जिस पर ये सीधे-सादे शब्द खुदे हैं, "विश्राम करो, और धन्यवादी बनो।" ये शब्द उन भावनाओं का वर्णन करते हैं जिनके साथ मसीह के पास आनेवाला हर व्यक्ति अन्त में स्वर्ग में प्रवेश करेगा। सकरे मार्ग की चोटी पा ली जाएगी। हमारी थका देनेवाली यात्रा समाप्त होगी, और हम परमेश्वर के राज्य में बैठेंगे। हम जीवन के सारे मार्ग को धन्यवाद के साथ पीछे मुड़कर देखेंगे, और उस खड़ी चढ़ाई के, जिससे हम ले जाए गए, हर छोटे घुमाव और मोड़ की पूर्ण बुद्धि को देखेंगे। उस महिमामय विश्राम में हम ऊपर की यात्रा के परिश्रम को भूल जाएँगे। यहाँ इस संसार में मसीह में विश्राम की हमारी अनुभूति अधिक से अधिक निर्बल और अधूरी है—परन्तु, "जब सिद्ध आएगा, तो अधूरा जाता रहेगा।" (1 कुरिन्थियों 13:10।) परमेश्वर का धन्यवाद हो—वह दिन आ रहा है जब विश्वासी पूर्ण विश्राम पाएँगे, और धन्यवादी होंगे।

विश्वास

"परमेश्वर ने जगत से ऐसा प्रेम रखा कि उसने अपना एकलौता पुत्र दे दिया, ताकि जो कोई उस पर विश्वास करे, वह नाश न हो, परन्तु अनन्त जीवन पाए।" यूहन्ना 3:16

ऐसे पद बहुत कम हैं जो इस पृष्ठ के शीर्षक के पद से अधिक प्रसिद्ध हों। इसके शब्द सम्भवतः आपके कानों के लिए परिचित हैं। आपने बहुत सम्भव है इन्हें सौ बार सुना, पढ़ा या उद्धृत किया होगा। परन्तु क्या आपने कभी विचार किया है कि इस पद में कितना विशाल ईश्वर-विज्ञान समाया है? इसमें आश्चर्य नहीं कि लूथर ने इसे "लघु रूप में बाइबल" कहा! और क्या आपने कभी विचार किया है कि इस पद से कितना गम्भीर प्रश्न उठता है? प्रभु यीशु कहता है, "जो कोई विश्वास करे, वह नाश न होगा।" तो पाठक, क्या आप विश्वास करते हैं?

धर्म सम्बन्धी प्रश्न शायद ही कभी लोकप्रिय होते हैं। वे लोगों को डराते हैं। वे उन्हें भीतर झाँकने और सोचने को विवश करते हैं। दिवालिया व्यापारी नहीं चाहता कि उसकी बहियों की जाँच हो। विश्वासघाती भण्डारी नहीं चाहता कि उसके हिसाब की परख हो। और जो मसीही होने का दावा करता है पर परिवर्तित नहीं हुआ, उसे यह पसन्द नहीं कि कोई उसकी आत्मा के विषय में उससे सीधे प्रश्न पूछे।

परन्तु धर्म सम्बन्धी प्रश्न बहुत उपयोगी होते हैं। प्रभु यीशु मसीह ने पृथ्वी पर अपनी सेवकाई के दौरान अनेक प्रश्न पूछे। मसीह के सेवक को भी ऐसा करने में लज्जित नहीं होना चाहिए। उद्धार के लिए आवश्यक बातों के विषय में प्रश्न—ऐसे प्रश्न जो विवेक को भेदते हैं और मनुष्यों को परमेश्वर के आमने-सामने ला खड़ा करते हैं—ऐसे प्रश्न अक्सर आत्माओं के लिए जीवन और स्वास्थ्य लाते हैं। मैं ऐसे कुछ ही प्रश्न जानता हूँ जो आज आपके सामने रखे इस प्रश्न से अधिक महत्त्वपूर्ण हों: क्या आप विश्वास करते हैं?

पाठक, आपके सामने जो प्रश्न है उसका उत्तर देना सरल नहीं है। यह सोचकर इसे एक ओर न धकेल दें कि झट से कह दें, "मैं तो निश्चय ही विश्वास करता हूँ।" मैं आज आपसे कहता हूँ कि सच्चा विश्वास कोई ऐसी "स्वाभाविक बात" नहीं जैसा आप मानते हैं। मैं आपसे कहता हूँ कि असंख्य प्रोटेस्टेंट और रोमन कैथोलिक रविवार को निरन्तर कहते हैं, "मैं विश्वास करता हूँ," जबकि वे विश्वास करने के विषय में कुछ भी नहीं जानते। वे समझा नहीं सकते कि उनका क्या अर्थ है। वे न तो यह जानते हैं कि वे किस बात पर विश्वास करते हैं, न यह कि किस पर। वे अपने विश्वास का कोई लेखा नहीं दे सकते। पाठक, इस प्रकार का विश्वास पूरी तरह व्यर्थ है। वह न सन्तुष्ट कर सकता है, न पवित्र, न उद्धार दे सकता है।

मैं पूरे स्नेह से आपको इस पुस्तिका के शीर्षक के प्रश्न पर विचार करने का निमन्त्रण देता हूँ। मैं आपसे निवेदन करता हूँ कि मैं जब इसे उसके पूरे विस्तार में आपके सामने रखने का प्रयत्न करूँ, तब आप मुझ पर ध्यान दें। "विश्वास करने" का महत्त्व स्पष्ट देखने के लिए आपको मसीह के उन शब्दों पर भली-भाँति मनन करना चाहिए जिनका मैं पहले उल्लेख कर चुका हूँ। इन्हीं शब्दों को खोलकर मैं

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