अध्याय 9

अध्याय छह: विश्वास द्वारा और कर्मों के पुण्य द्वारा धर्मी ठहराए जाने के विषय में (भाग 1/4)

Institutes of the Christian Religion (1541) · John Calvin

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अध्याय छह: विश्वास द्वारा और कर्मों के पुण्य द्वारा धर्मी ठहराए जाने के विषय में (भाग 1/4)

अध्याय छह

विश्वास द्वारा धर्मी ठहराए जाने और कर्मों के पुण्य के विषय में

मुझे लगता है कि मैं पहले ही पर्याप्त सावधानी से समझा चुका हूँ कि जब सब मनुष्य व्यवस्था के द्वारा दोषी ठहराए जा चुके हैं, तो उनके लिए उद्धार का केवल एक ही शरणस्थान बचता है—अर्थात् विश्वास। मेरा यह भी मानना है कि मैंने पर्याप्त रूप से बता दिया है कि विश्वास क्या है, वह मनुष्य को परमेश्वर के कौन-कौन से अनुग्रह प्रदान करता है, और उसमें कौन-कौन से फल उत्पन्न करता है। जो कुछ कहा गया उसका सार यह है: विश्वास के द्वारा हम यीशु मसीह को ग्रहण करते हैं और अपना बना लेते हैं, जैसा कि वह परमेश्वर की भलाई से हमारे सामने प्रस्तुत किया गया है; और उसमें सहभागी होने से हमें दोहरा अनुग्रह मिलता है। पहला यह कि उसकी निर्दोषता के कारण परमेश्वर से मेल-मिलाप पाकर, स्वर्ग में हमें दोषी ठहरानेवाला न्यायी रखने के स्थान पर हमारा परम दयालु पिता है। दूसरा यह कि हम उसके आत्मा के द्वारा पवित्र किए जाते हैं, ताकि हम पवित्रता और निर्दोष जीवन का अनुसरण करें।

नया जन्म के विषय में, जो दूसरा अनुग्रह है, मैंने उतना कह दिया जितना उचित प्रतीत हुआ। धर्मी ठहराए जाने का वर्णन अधिक संक्षेप में किया गया, क्योंकि पहले यह समझना आवश्यक था कि विश्वास न तो निष्क्रिय है और न भले कर्मों से रहित, यद्यपि उसी के द्वारा हम परमेश्वर की दया से मुफ़्त की धार्मिकता प्राप्त करते हैं। यह समझना भी आवश्यक था कि पवित्र लोगों के भले कर्मों का स्वरूप क्या है, क्योंकि हमारे सामने जो प्रश्न है उसका एक अंश इसी पर निर्भर है।

इसलिए अब हमें विश्वास द्वारा धर्मी ठहराए जाने पर अधिक विस्तार से विचार करना चाहिए। और ऐसा करते समय हमें स्मरण रखना चाहिए कि यह मसीही धर्म का प्रधान अनुच्छेद है, ताकि प्रत्येक जन इसकी स्थिर समझ तक पहुँचने में अधिक सावधानी और परिश्रम करे। क्योंकि जैसे यदि हम परमेश्वर की इच्छा को, जो हमारे प्रति है, न जानें तो हमारे पास अपने उद्धार को स्थापित करने के लिए कोई नींव नहीं रहती, वैसे ही भक्तिमय जीवन और परमेश्वर के भय की इमारत खड़ी करने के लिए भी कोई नींव नहीं रहती। फिर भी इस विषय को सही रीति से समझने की आवश्यकता तब और स्पष्ट हो जाएगी जब स्वयं यह शिक्षा समझाई जाएगी।

इसलिए ऐसा न हो कि हम पहले ही कदम पर ठोकर खाएँ—जैसा तब होता जब हम ऐसे विषय पर वाद-विवाद आरम्भ कर देते जिसका अर्थ ही निश्चित न हुआ हो—हमें पहले यह समझाना चाहिए कि इन वाक्यांशों का क्या अर्थ है: परमेश्वर के सामने धर्मी ठहराया जाना और विश्वास से या कर्मों से धर्मी ठहराया जाना।

कहा जाता है कि मनुष्य परमेश्वर के सामने तब धर्मी ठहराया जाता है जब परमेश्वर के न्याय में वह धर्मी गिना जाता है और अपनी धार्मिकता के कारण ग्रहण किया जाता है। क्योंकि जैसे अधर्म परमेश्वर के लिए घृणित है, वैसे ही पापी उसके सम्मुख अनुग्रह नहीं पा सकता। इसलिए जहाँ कहीं पाप पाया जाता है, वहाँ परमेश्वर का क्रोध और बदला प्रकट होता है। अतः जो धर्मी ठहराया जाता है वह पापी नहीं, वरन् धर्मी गिना जाता है, और इसी कारण वह परमेश्वर के न्याय-आसन के सामने खड़ा रह सकता है, जहाँ सब पापी लड़खड़ाते और घबरा जाते हैं।

यदि किसी झूठे अभियुक्त की न्यायी के द्वारा जाँच हो, वह छोड़ दिया जाए और निर्दोष घोषित किया जाए, तो हम कहते हैं कि वह न्यायालय में धर्मी ठहराया गया। इसी प्रकार हम कहते हैं कि मनुष्य परमेश्वर के सामने तब धर्मी ठहराया जाता है जब पापियों की गिनती से अलग होकर वह परमेश्वर को अपनी धार्मिकता का साक्षी और समर्थक पाता है।

इसी के अनुसार हम कहेंगे कि मनुष्य परमेश्वर के सामने कर्मों से धर्मी ठहराया जाता है जब उसके जीवन में ऐसी शुद्धता और पवित्रता हो कि वह परमेश्वर के सामने धार्मिकता की उपाधि के योग्य ठहरे, या जब अपने कर्मों की खराई के कारण वह परमेश्वर के न्याय का उत्तर दे सके और उसे सन्तुष्ट कर सके। इसके विपरीत, कहा जाता है कि मनुष्य विश्वास से धर्मी ठहराया जाता है जब कर्मों की धार्मिकता से बहिष्कृत होकर वह विश्वास के द्वारा यीशु मसीह की धार्मिकता को थाम लेता है, और उसी धार्मिकता का वस्त्र पहनकर परमेश्वर के सम्मुख पापी के रूप में नहीं, वरन् धर्मी के रूप में उपस्थित होता है।

फिर भी, क्योंकि अधिकांश लोग विश्वास और कर्मों के मेल से बनी हुई किसी धार्मिकता की कल्पना करते हैं, इसलिए आगे बढ़ने से पहले हमें यह भी दिखाना चाहिए कि विश्वास की धार्मिकता कर्मों की धार्मिकता से इतनी पूरी तरह भिन्न है कि यदि एक स्थापित हो तो दूसरी गिर जाती है। प्रेरित कहता है:

“मैं ने सब वस्तुओं को कूड़ा समझा है, ताकि मैं मसीह को प्राप्त करूँ और उसमें पाया जाऊँ; और मेरी अपनी धार्मिकता नहीं, जो व्यवस्था से है, वरन् वह जो यीशु मसीह पर विश्वास करने के द्वारा है—अर्थात् वह धार्मिकता जो परमेश्वर की ओर से विश्वास के आधार पर है।”

—फिलिप्पियों 3:8–9

यहाँ हम देखते हैं कि वह इन दोनों को परस्पर विरोधी वस्तुओं के रूप में आमने-सामने रखता है और दिखाता है कि जो कोई मसीह की धार्मिकता पाना चाहता है, उसे अपनी धार्मिकता छोड़नी होगी। इसीलिए वह अन्यत्र कहता है कि यहूदियों के विनाश का यही कारण था:

“वे अपनी ही धार्मिकता स्थापित करने की खोज में रहकर परमेश्वर की धार्मिकता के अधीन न हुए।”

—रोमियों 10:3

यदि अपनी धार्मिकता को स्थापित करने से हम परमेश्वर की धार्मिकता को ठुकरा देते हैं, तो उसे पाने के लिए पहली का पूरी तरह मिट जाना आवश्यक है। यही उसका आशय भी है जब वह कहता है कि हमारा घमण्ड व्यवस्था से नहीं, वरन् विश्वास से दूर किया गया है। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि जब तक हमारे कर्मों में धार्मिकता की ज़रा-सी बूँद भी शेष है, तब तक हमारे पास घमण्ड करने का कुछ आधार बचा रहता है। इसलिए यदि विश्वास सब घमण्ड को दूर कर देता है, तो विश्वास की धार्मिकता किसी भी प्रकार कर्मों की धार्मिकता के साथ नहीं रह सकती।

यह झूठा मत, जो सामान्यतः माना जाता है, सोरबोन के धर्मशास्त्रियों ने ही संसार में फैलाया; परन्तु वे दो प्रकार से भूल करते हैं। पहला, वे विश्वास को परमेश्वर से प्रतिफल पाने की आशा का निश्चय कहते हैं। दूसरा, अनुग्रह शब्द से उनका आशय उस मुफ़्त की धार्मिकता के दान से नहीं है जो हम पाते हैं, वरन् भले और पवित्र जीवन जीने के लिए पवित्र आत्मा की सहायता से है। वे प्रेरित में पढ़ते हैं:

“जो परमेश्वर के पास आता है उसे विश्वास करना चाहिए कि वह है, और अपने खोजनेवालों को प्रतिफल देता है।”

—इब्रानियों 11:6

परन्तु वे इस पर विचार नहीं करते कि उसे किस रीति से खोजना चाहिए, जिसे हम शीघ्र ही समझाएँगे।

कि वे अनुग्रह शब्द के विषय में भूल में हैं, यह उनकी पुस्तकों से स्पष्ट है। क्योंकि उनका सेन्टेन्सेज़ का गुरु उस धार्मिकता की, जो हमें मसीह के द्वारा मिलती है, दो प्रकार से व्याख्या करता है। पहला, वह कहता है कि मसीह की मृत्यु हमें तब धर्मी ठहराती है जब वह हमारे हृदयों में प्रेम उत्पन्न करती है, जिससे हम धर्मी बनाए जाते हैं। दूसरा, वह हमें इस सीमा तक धर्मी ठहराती है कि उसके द्वारा पाप मिटा दिया गया है—वह पाप जिसकी शक्ति के अधीन शैतान ने हमें बन्दी बना रखा था—ताकि वह अब हम पर प्रबल न हो सके।

हम देखते हैं कि वह परमेश्वर के अनुग्रह को केवल इसी दृष्टि से मानता है कि पवित्र आत्मा की सामर्थ्य से हम भले कर्मों की ओर प्रेरित किए जाते हैं। उसने संत अगस्तीन के मत का अनुसरण करना चाहा, परन्तु वह उससे बहुत दूर रहकर चलता है और विश्वासयोग्य अनुकरण से भी बहुत भटक जाता है। क्योंकि उस पवित्र जन ने जो बात स्पष्ट कही थी, उसे वह धुँधला कर देता है; और जिस बात में उसमें थोड़ा-सा दोष था, उसे वह पूरी तरह बिगाड़ देता है। सोरबोन के विद्यालय निरन्तर बुरे से और बुरे होते गए, यहाँ तक कि अन्त में वे पेलागियस की भूल में जा गिरे।

फिर भी संत अगस्तीन की स्थिति को भी बिना किसी शर्त के स्वीकार नहीं करना चाहिए। क्योंकि यद्यपि वह बहुत उचित रीति से मनुष्य से धार्मिकता की सारी प्रशंसा छीनकर उसे पूरी तरह परमेश्वर को देता है, तथापि वह अनुग्रह को उस पवित्रीकरण से जोड़ता है जिसके द्वारा हम नए जीवन के लिए नया जन्म पाते हैं। परन्तु जब पवित्रशास्त्र विश्वास की धार्मिकता की बात करता है, तो वह हमें कहीं और ले जाता है: वह सिखाता है कि हम अपनी दृष्टि अपने कर्मों से हटाकर केवल परमेश्वर की दया और मसीह की सिद्ध पवित्रता की ओर लगाएँ।

क्योंकि पवित्रशास्त्र हमारे सामने धर्मी ठहराए जाने का यह क्रम रखता है: आरम्भ में परमेश्वर पापी को अपनी निरी और मुफ़्त भलाई से ग्रहण करता है, और उसमें ऐसा कुछ नहीं देखता जो उसे दया करने के लिए प्रेरित करे, सिवाय उसकी दुर्दशा के, क्योंकि वह उसे भले कर्मों से पूरी तरह वंचित और रिक्त देखता है। इसलिए वह उसका भला करने का कारण केवल अपने ही भीतर से लेता है। फिर वह पापी को अपनी भलाई का बोध कराकर छूता है, ताकि वह अपने पास की हर वस्तु पर अविश्वास करके अपने सम्पूर्ण उद्धार को उस दया पर टिका दे जो परमेश्वर उस पर दिखाता है।

यह विश्वास का वह निश्चय है जिसके द्वारा मनुष्य अपने उद्धार का अधिकारी बनता है: सुसमाचार की शिक्षा के द्वारा वह जानता है कि परमेश्वर से उसका मेल-मिलाप हो गया है, क्योंकि मसीह की धार्मिकता के द्वारा अपने पापों की क्षमा पाकर वह धर्मी ठहराया गया है। और यद्यपि वह परमेश्वर के आत्मा से नया जन्म पाता है, तथापि वह अपने किए हुए भले कर्मों पर भरोसा नहीं रखता, वरन् निश्चित रहता है कि उसकी स्थायी धार्मिकता मसीह की धार्मिकता में है।

जब इन सब बातों की एक-एक करके जाँच हो जाएगी, तो इस विषय पर हमारी शिक्षा सरलता से समझाई जा सकेगी। यदि हम इन्हें उस क्रम से भिन्न क्रम में रखें जिसमें हमने इन्हें प्रस्तावित किया था, तो वे और अच्छी रीति से व्यवस्थित हो सकती हैं; परन्तु इससे कोई विशेष अन्तर नहीं पड़ता, बशर्ते उन्हें इस प्रकार प्रस्तुत किया जाए कि सारा विषय ठीक रीति से समझ में आ जाए।

यहाँ हमें उस सम्बन्ध को स्मरण करना चाहिए जो हमने ऊपर विश्वास और सुसमाचार के बीच स्थापित किया था। क्योंकि हम कहते हैं कि विश्वास इसलिए धर्मी ठहराता है कि वह उस धार्मिकता को ग्रहण करता है जो सुसमाचार में प्रस्तुत की गई है। अब यदि धार्मिकता हमें सुसमाचार में दी जाती है, तो कर्मों का हर विचार उससे बाहर हो जाता है। संत पौलुस यह बात बार-बार दिखाता है, परन्तु विशेष रूप से दो स्थलों में। रोमियों की पत्री में, व्यवस्था की तुलना सुसमाचार से करते हुए, वह कहता है:

“जो धार्मिकता व्यवस्था से है, वह यह है कि जो मनुष्य परमेश्वर की आज्ञाओं को मानता है वह उन्हीं के द्वारा जीवित रहेगा। परन्तु विश्वास की धार्मिकता उस मनुष्य के लिए उद्धार की घोषणा करती है जो अपने मन से विश्वास करता और अपने मुँह से यीशु मसीह को स्वीकार करता है, और यह कि पिता ने उसे मरे हुओं में से जिलाया।”

—रोमियों 10:5, 9–10

क्या हम नहीं देखते कि वह व्यवस्था और सुसमाचार के बीच यह भेद स्थापित करता है: व्यवस्था धार्मिकता को कर्मों से जोड़ती है, जबकि सुसमाचार उसे कर्मों का विचार किए बिना मुफ़्त में देता है? यह निश्चय ही एक उल्लेखनीय स्थल है, जो हमें बहुत-सी कठिनाइयों से छुड़ा सकता है। क्योंकि यह समझना छोटी बात नहीं कि सुसमाचार में हमें जो धार्मिकता दी जाती है वह व्यवस्था की शर्तों से मुक्त है।

इसी कारण वह इतनी बार व्यवस्था और प्रतिज्ञा को परस्पर विरोधी वस्तुओं के रूप में सामने रखता है:

“यदि मीरास व्यवस्था से है, तो फिर प्रतिज्ञा से नहीं।”

—गलातियों 3:18

उसी अध्याय में ऐसे और भी कथन हैं। यह निश्चित है कि व्यवस्था की भी अपनी प्रतिज्ञाएँ हैं। इसलिए सुसमाचार की प्रतिज्ञाओं में कुछ विशिष्ट और भिन्न होना चाहिए, नहीं तो हमें कहना पड़ेगा कि यह तुलना निरर्थक है। और यह भेद इसके सिवा और क्या हो सकता है कि सुसमाचार की प्रतिज्ञाएँ मुफ़्त हैं और केवल परमेश्वर की दया पर टिकी हैं, जबकि व्यवस्था की प्रतिज्ञाएँ कर्मों की शर्त पर निर्भर हैं?

दूसरा स्थल यह है:

“यह प्रत्यक्ष है कि व्यवस्था के द्वारा परमेश्वर के सामने कोई धर्मी नहीं ठहरता, क्योंकि धर्मी जन विश्वास से जीवित रहेगा। परन्तु व्यवस्था का आधार विश्वास नहीं है, क्योंकि लिखा है: जो इन आज्ञाओं को मानेगा वह इन्हीं के द्वारा जीवित रहेगा।”

—गलातियों 3:11–12

यदि पहले यह स्थापित न हो कि कर्मों का हिसाब नहीं लिया जाता, तो यह तर्क कैसे टिक सकता? वह कहता है कि व्यवस्था विश्वास से भिन्न है। किस बात में? वह जोड़ता है कि इसलिए कि व्यवस्था मनुष्य को धर्मी ठहराने के लिए कर्मों की माँग करती है। अतः इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि जब मनुष्य को विश्वास से धर्मी ठहराया जाना है, तब कर्मों की आवश्यकता नहीं। इस तुलना से स्पष्ट है कि जो कोई विश्वास से धर्मी ठहराया जाता है वह अपने कर्मों के किसी पुण्य के बिना—वरन् सब पुण्य से बिलकुल अलग होकर—धर्मी ठहराया जाता है।

क्योंकि विश्वास उस धार्मिकता को ग्रहण करता है जो सुसमाचार प्रस्तुत करता है; और कहा जाता है कि सुसमाचार व्यवस्था से इसी बात में भिन्न है कि वह धार्मिकता को कर्मों से नहीं बाँधता, वरन् उसे केवल परमेश्वर की दया में रखता है। संत पौलुस रोमियों की पत्री में ऐसा ही तर्क देता है जब वह कहता है कि अब्राहम को घमण्ड करने का कोई आधार नहीं, क्योंकि उसके लिए विश्वास धार्मिकता गिना गया। वह तुरन्त कारण जोड़ देता है: विश्वास की धार्मिकता वहीं अपना स्थान रखती है जहाँ ऐसे कर्म नहीं हैं जिनके लिए कोई प्रतिफल देय हो।

“काम करनेवाले की मज़दूरी दान नहीं, वरन् हक़ गिनी जाती है। परन्तु जो काम नहीं करता, परन्तु भक्तिहीन को धर्मी ठहरानेवाले पर विश्वास करता है, उसका विश्वास धार्मिकता गिना जाता है।”

—रोमियों 4:4–5

आगे जो कहा गया है वह भी इसी लक्ष्य की ओर जाता है: हम स्वर्गीय मीरास विश्वास से पाते हैं ताकि समझें कि वह हमें अनुग्रह से मिलती है। वह निष्कर्ष निकालता है कि स्वर्गीय मीरास मुफ़्त है क्योंकि हम उसे विश्वास से पाते हैं। इसका कारण इसके सिवा और क्या है कि विश्वास, जिसे कर्मों में कोई सहारा नहीं मिलता, पूरी तरह परमेश्वर की दया पर टिका रहता है?

पाठक अब स्वयं निर्णय कर सकते हैं कि सोफ़िस्ट लोग हमारी इस शिक्षा पर, कि मनुष्य केवल विश्वास से धर्मी ठहराया जाता है, जो आपत्तियाँ उठाते हैं, उनमें वे कितना न्याय करते हैं। वे यह तो नकारने का साहस नहीं करते कि मनुष्य विश्वास से धर्मी ठहराया जाता है; परन्तु क्योंकि केवल शब्द स्पष्ट रूप से नहीं कहा गया, इसलिए वे हम पर दोष लगाते हैं कि हमने उसे अपनी ओर से जोड़ दिया है। यदि ऐसा है, तो वे संत पौलुस के उन शब्दों का क्या उत्तर देंगे जहाँ वह तर्क देता है कि यदि धार्मिकता मुफ़्त न हो तो वह विश्वास से नहीं हो सकती? जो मुफ़्त है वह कर्मों से कैसे मेल खा सकता है? और उसके उस अन्य कथन से वे किस निन्दा के सहारे बचेंगे कि परमेश्वर की धार्मिकता सुसमाचार में प्रकट होती है? यदि वह वहाँ प्रकट होती है, तो वह आधी-अधूरी या अंश में नहीं, वरन् पूरी और सिद्ध रूप से प्रकट होती है। इसलिए यह निष्कर्ष निकलता है कि व्यवस्था उससे बाहर है।

वास्तव में उनकी यह टालमटोल केवल झूठी ही नहीं, वरन् पूरी तरह हास्यास्पद है कि केवल विश्वास कहकर हम अपनी ओर से कुछ जोड़ते हैं। क्योंकि क्या जो जन कर्मों से धर्मी ठहराने की सारी शक्ति छीन लेता है, वह उसे पूरी तरह विश्वास को नहीं सौंपता? संत पौलुस के इन कथनों का और क्या अर्थ है कि धार्मिकता हमें व्यवस्था से अलग दी जाती है, और मनुष्य अपने कर्मों की सहायता के बिना मुफ़्त में धर्मी ठहराया जाता है?

यहाँ उनके पास भागने का एक बहुत सूक्ष्म उपाय है: वे कहते हैं कि रस्मी कर्म बहिष्कृत हैं, नैतिक कर्म नहीं। यह सर्वथा मूर्खता है, यद्यपि उन्होंने इसे ओरिजन और कुछ अन्य प्राचीन लेखकों से लिया है। विद्यालयों में अपनी अन्तहीन भौंक से वे इतना लाभ उठाते हैं कि तर्कशास्त्र की पहली मूल बातें भी नहीं जानते। क्या वे समझते हैं कि प्रेरित अपनी शिक्षा को स्थापित करने के लिए ये साक्ष्य प्रस्तुत करते समय होश खो बैठा है?

“जो मनुष्य इन्हें करेगा वह इन्हीं के द्वारा जीवित रहेगा।”

—रोमियों 10:5; गलातियों 3:12

और फिर:

“शापित है हर एक जो इन सब बातों पर, जो यहाँ लिखी हैं, बना नहीं रहता।”

—गलातियों 3:10

जब तक वे पूरी तरह पागल न हों, वे यह नहीं कहेंगे कि अनन्त जीवन की प्रतिज्ञा रस्मों को माननेवालों से की गई है, या केवल रस्मों का उल्लंघन करनेवाले ही शापित हैं। यदि इन वचनों को नैतिक व्यवस्था के विषय में समझना ही होगा, तो इसमें कोई सन्देह नहीं कि नैतिक कर्म भी धर्मी ठहराने की शक्ति से बाहर हैं।

संत पौलुस जो तर्क देता है वे भी इसी निष्कर्ष की ओर जाते हैं। उदाहरण के लिए:

“यदि पाप का ज्ञान व्यवस्था के द्वारा आता है, तो धार्मिकता उसके द्वारा नहीं आती।”

—रोमियों 3:20

व्यवस्था परमेश्वर का क्रोध उत्पन्न करती है; इसलिए वह हमें उद्धार नहीं देती। क्योंकि व्यवस्था विवेक को निश्चयता नहीं दे सकती, इसलिए वह धार्मिकता भी नहीं दे सकती। और क्योंकि विश्वास धार्मिकता गिना जाता है, इसलिए धार्मिकता हमें कर्मों की मज़दूरी के रूप में नहीं, वरन् परमेश्वर के मुफ़्त दान के रूप में दी जाती है।

फिर, यदि हम विश्वास से धर्मी ठहराए जाते हैं, तो सब घमण्ड गिरा दिया जाता है। फिर:

“यदि ऐसी व्यवस्था दी जाती जो जीवन दे सकती, तो सचमुच धार्मिकता व्यवस्था से होती। परन्तु परमेश्वर ने सब कुछ पाप के अधीन बन्द कर दिया, ताकि प्रतिज्ञा किया हुआ उद्धार विश्वास करनेवालों को दिया जाए।”

—गलातियों 3:21–22

वे साहस करके कहें कि यह रस्मों के विषय में कहा गया है, नैतिक कर्मों के विषय में नहीं; छोटे बच्चे भी उनकी इस ढिठाई पर हँसेंगे। इसलिए यह बात स्थिर रहे: जब व्यवस्था से धर्मी ठहराने की शक्ति छीन ली जाती है, तो पूरी व्यवस्था को समझना चाहिए।

यदि कोई सोचे कि प्रेरित ने सीधे कर्मों की बात करने के बजाय व्यवस्था के शब्द क्यों जोड़े, तो हमारे पास उत्तर तैयार है। क्योंकि कर्मों का मूल्य उनकी अपनी गरिमा से इतना नहीं, जितना इस बात से है कि परमेश्वर ने उन्हें स्वीकार किया। परमेश्वर के सामने किसी धार्मिकता पर घमण्ड करने का साहस कौन करेगा, यदि उसने उसे स्वीकार न किया हो? और उससे किसी प्रतिफल की माँग करने का साहस कौन करेगा, यदि उसने उसकी प्रतिज्ञा न की हो? इसलिए यह परमेश्वर की उदारता ही है कि कर्मों को धार्मिकता की उपाधि का सम्मान मिलता है और वे प्रतिफल पाते हैं, यदि वे किसी भी प्रकार इन दोनों के योग्य हो सकें। कर्मों का सारा मूल्य इसी पर टिका है: उनके द्वारा मनुष्य परमेश्वर की आज्ञाकारिता दिखाना चाहता है।

इसलिए जब प्रेरित अन्यत्र यह प्रमाणित करना चाहता है कि अब्राहम अपने कर्मों से धर्मी नहीं ठहर सकता था, तो वह यह तर्क देता है कि व्यवस्था उस वाचा के लगभग चार सौ वर्ष बाद प्रकाशित हुई जो अनुग्रह से उसे दी गई थी। अज्ञानी लोग इस तर्क पर हँस सकते हैं, यह सोचकर कि व्यवस्था के प्रकाशित होने से पहले भी भले कर्म अवश्य हो सकते थे। परन्तु क्योंकि संत पौलुस भली-भाँति जानता था कि कर्मों में कोई गरिमा तभी है जब परमेश्वर उन्हें स्वीकार करे, इसलिए वह इसे स्पष्ट मानता है कि व्यवस्था की प्रतिज्ञाएँ दिए जाने से पहले वे धर्मी नहीं ठहरा सकते थे।

इस प्रकार हम देखते हैं कि जब वह कर्मों से धर्मी ठहराने की शक्ति छीनना चाहता है, तो वह विशेष रूप से व्यवस्था के कर्मों की बात क्यों करता है: क्योंकि केवल वही कर्म विचार में आ सकते थे जिन्हें व्यवस्था ने अधिकृत किया था। फिर भी वह कभी-कभी सब कर्मों को बिना किसी विशेषण के साधारण रूप से बहिष्कृत कर देता है। उदाहरण के लिए, वह कहता है कि दाऊद उस मनुष्य के धन्य होने की घोषणा करता है जिसे परमेश्वर कर्मों के बिना धार्मिकता गिनता है। इसलिए अपनी सब आपत्तियों के बावजूद वे हमें इस बहिष्कार को उसके पूर्ण और सार्वभौमिक अर्थ में समझने से नहीं रोक सकते।

वे एक और सूक्ष्म बचाव ढूँढ़ते हैं, यह भी व्यर्थ है; वे कहते हैं कि हम केवल विश्वास से धर्मी ठहराए जाते हैं, परन्तु ऐसे विश्वास से जो प्रेम के द्वारा कार्य करता है, और इससे वे यह दर्शाना चाहते हैं कि धार्मिकता प्रेम पर टिकी है। हम संत पौलुस के साथ सहर्ष मानते हैं कि कोई विश्वास धर्मी नहीं ठहराता सिवाय उसके जो प्रेम से जुड़ा हो। फिर भी विश्वास अपनी धर्मी ठहराने की शक्ति प्रेम से नहीं पाता। वह तो इसी कारण धर्मी ठहराता है कि वह हमें मसीह की धार्मिकता में सहभागी बनाता है।

नहीं तो प्रेरित का वह तर्क, जिसे वह इतने ज़ोर से रखता है, गिर जाएगा:

“काम करनेवाले की मज़दूरी अनुग्रह से नहीं, वरन् ऋण के रूप में गिनी जाती है। परन्तु जो काम नहीं करता, परन्तु भक्तिहीन को धर्मी ठहरानेवाले पर विश्वास करता है, उसका विश्वास धार्मिकता गिना जाता है।”

—रोमियों 4:4–5

क्या वह इससे अधिक स्पष्ट बोल सकता था? वह घोषणा करता है कि विश्वास की धार्मिकता वहीं है जहाँ ऐसे कर्म नहीं हैं जिनके लिए कोई प्रतिफल देय हो, और विश्वास तभी धार्मिकता गिना जाता है जब धार्मिकता हमें बिना योग्यता के अनुग्रह से दी जाती है।

अब हम विचार करें कि हमारी परिभाषा में जो कहा गया था वह सच है या नहीं: कि विश्वास की धार्मिकता और कुछ नहीं, वरन् परमेश्वर के साथ मेल-मिलाप है, जो पापों की क्षमा में निहित है। हमें इस सिद्धान्त पर सदा लौटना चाहिए: परमेश्वर का क्रोध उन सब के लिए तैयार है जो पापी बने रहते हैं। यशायाह ने इसे भली-भाँति कहा जब उसने कहा:

“देखो, यहोवा का हाथ ऐसा छोटा नहीं हो गया कि वह उद्धार न कर सके, न उसका कान ऐसा भारी हो गया कि वह सुन न सके। परन्तु तुम्हारे अधर्म के कामों ने तुम्हें तुम्हारे परमेश्वर से अलग कर दिया है, और तुम्हारे पापों के कारण उसने अपना मुँह तुमसे छिपा लिया है, ताकि वह न सुने।”

—यशायाह 59:1–2

हम सुनते हैं कि पाप परमेश्वर और मनुष्य के बीच विभाजन उत्पन्न करता है और परमेश्वर के मुख को पापी की ओर से फेर देता है। वास्तव में ऐसा ही होना चाहिए, क्योंकि पाप के साथ संगति रखना उसकी धार्मिकता से सर्वथा असंगत है। इसी कारण संत पौलुस कहता है कि मनुष्य परमेश्वर का शत्रु है जब तक वह मसीह के द्वारा उसकी कृपा में बहाल नहीं हो जाता। इसलिए जिसे परमेश्वर अपने प्रेम में ग्रहण करता है उसके विषय में कहा जाता है कि वह धर्मी ठहराया गया, क्योंकि परमेश्वर किसी को अपनी संगति में ग्रहण नहीं कर सकता जब तक वह उसे, जो पहले पापी था, धर्मी न बना दे।

हम जोड़ते हैं कि यह पापों की क्षमा के द्वारा पूरा होता है। क्योंकि यदि परमेश्वर से मेल-मिलाप पाए हुए लोगों को उनके कर्मों के अनुसार देखा जाए, तो वे अब भी पापी ही पाए जाएँगे; जबकि उन्हें सर्वथा शुद्ध और पाप से मुक्त होना चाहिए।

इसलिए यह स्पष्ट है कि जिन्हें परमेश्वर कृपा में ग्रहण करता है वे और किसी रीति से धर्मी नहीं बनाए जाते, सिवाय इसके कि वे शुद्ध किए जाते हैं, इस अर्थ में कि परमेश्वर की दी हुई क्षमा से उनके दाग मिटा दिए जाते हैं। इस प्रकार ऐसी धार्मिकता को एक ही शब्द में पापों की क्षमा कहा जा सकता है।

ये दोनों बातें संत पौलुस के इन शब्दों में बहुत स्पष्ट रूप से घोषित की गई हैं:

“परमेश्वर मसीह में होकर जगत का अपने साथ मेल-मिलाप कर रहा था, और उनके अपराधों का दोष उन पर नहीं लगाता था, और उसने मेल-मिलाप का वचन हमें सौंप दिया है।”

—2 कुरिन्थियों 5:19

फिर वह अपने दूतपन का सार जोड़ता है:

“जो पवित्र और पाप से रहित था, उसे उसने हमारे लिए पाप ठहराया”—अर्थात् वह बलिदान जिस पर हमारे सब पाप डाल दिए गए—“ताकि हम उसमें परमेश्वर के सामने धर्मी बन जाएँ।”

—2 कुरिन्थियों 5:21

इस स्थल में वह धार्मिकता और मेल-मिलाप को एक-दूसरे के स्थान पर प्रयोग करता है, ताकि हम समझें कि एक दूसरे में समाया हुआ है। इस धार्मिकता को पाने की रीति भी तब समझाई जाती है जब वह कहता है कि वह इसमें है कि परमेश्वर हमारे पापों का दोष हम पर नहीं लगाता।

इसी प्रकार रोमियों की पत्री में वह दाऊद की साक्षी से सिद्ध करता है कि धार्मिकता मनुष्य के लिए कर्मों के बिना गिनी जाती है:

“धन्य वे हैं जिनके अधर्म क्षमा हुए, और जिनके पाप ढाँपे गए; धन्य है वह मनुष्य जिसके अपराध का हिसाब प्रभु उससे न लेगा।”

—रोमियों 4:6–8

इसमें कोई सन्देह नहीं कि दाऊद धन्यता शब्द से धार्मिकता को सूचित करता है। क्योंकि वह घोषित करता है कि वह पापों की क्षमा में है, इसलिए हमें उसे और किसी प्रकार परिभाषित करने की आवश्यकता नहीं। इसीलिए यूहन्ना बपतिस्मा देनेवाले का पिता जकर्याह उद्धार का ज्ञान पापों की क्षमा में रखता है। इसी नियम का पालन करते हुए संत पौलुस अन्ताकियावासियों को दिए अपने उपदेश का समापन उनके उद्धार के सार के विषय में इस प्रकार करता है:

“यीशु मसीह के द्वारा तुम्हें पापों की क्षमा का समाचार दिया जाता है, और जिन बातों से तुम मूसा की व्यवस्था के द्वारा धर्मी नहीं ठहर सकते थे, उन सब से हर एक जो उस पर विश्वास करता है, धर्मी ठहरता है।”

—प्रेरितों के काम 13:38–39

वह धार्मिकता को पापों की क्षमा से इतनी निकटता से जोड़ता है कि दिखाता है कि वे एक ही वस्तु हैं। इसलिए वह आदि से अन्त तक ठीक ही तर्क देता है कि जो धार्मिकता हम परमेश्वर की भलाई से पाते हैं वह मुफ़्त है।

इससे यह भी निष्कर्ष निकलता है कि हम परमेश्वर के सामने केवल मसीह की धार्मिकता से धर्मी ठहराए जाते हैं। यह कहने के समान है कि मनुष्य अपने आप में धर्मी नहीं है, वरन् इसलिए कि मसीह की धार्मिकता आरोपण के द्वारा उसे दी जाती है। यह विषय सावधानी से ध्यान देने योग्य है। क्योंकि इससे वह धारणा मिट जाती है कि मनुष्य विश्वास से इस अर्थ में धर्मी ठहराया जाता है कि विश्वास के द्वारा वह परमेश्वर का आत्मा पाता है, जिससे वह धर्मी बनाया जाता है।

यह धारणा ऊपर स्थापित शिक्षा के सर्वथा विपरीत है, क्योंकि इसमें कोई सन्देह नहीं कि जिस मनुष्य को धार्मिकता अपने से बाहर खोजनी पड़ती है, वह अपनी धार्मिकता से रहित है। प्रेरित यह स्पष्ट दिखाता है जब वह कहता है:

“जो निर्दोष था उसने हमारे अपराधों को उठा लिया, और हमारे लिए बलिदान के रूप में प्रस्तुत किया गया, ताकि हम उसमें परमेश्वर के सामने धर्मी बन जाएँ।”

—2 कुरिन्थियों 5:21

हम देखते हैं कि वह हमारी धार्मिकता को मसीह में रखता है, हम में नहीं, और यह धार्मिकता हमारी इसी अधिकार से है कि हम मसीह के सहभागी हैं। क्योंकि उसे पाकर हम उसके साथ उसकी सारी सम्पत्ति भी पाते हैं।

और जो वह अन्यत्र कहता है उससे भी इसका कोई विरोध नहीं:

“पाप को मसीह के शरीर में दोषी ठहराया गया, ताकि परमेश्वर की धार्मिकता हम में पूरी हो।”

—रोमियों 8:3–4

यहाँ वह उसी पूर्ति को सूचित करता है जो हम आरोपण के द्वारा पाते हैं। क्योंकि प्रभु यीशु अपनी धार्मिकता हमें इस रीति से देता है कि एक अकथनीय सामर्थ्य से वह परमेश्वर के न्याय के विषय में हमें हस्तान्तरित कर दी जाती है।

कि उसका आशय इससे भिन्न नहीं था, यह उस कथन से स्पष्ट है जो उसने कुछ ही पहले कहा था:

“जैसे एक मनुष्य की अनाज्ञाकारिता से हम पापी ठहरे, वैसे ही एक की आज्ञाकारिता से हम धर्मी ठहराए जाते हैं।”

—रोमियों 5:19

हमारी धार्मिकता को मसीह की आज्ञाकारिता में रखने का और क्या अर्थ है, सिवाय यह कहने के कि हम इसलिए धर्मी हैं कि मसीह की आज्ञाकारिता हमारे लिए गिनी जाती है और भुगतान के रूप में स्वीकार की जाती है, मानो वह हमारी अपनी ही हो?

इसलिए मुझे लगता है कि संत अम्ब्रोस ने इस धार्मिकता का एक उत्तम उदाहरण याकूब की आशीष में पाया। याकूब ने जेठा होने का अधिकार अपने आप में अर्जित नहीं किया था, परन्तु अपने भाई के रूप में छिपकर और उसके वस्त्र पहनकर, जिससे सुहावनी सुगन्ध आती थी, वह अपने पिता के पास पहुँचा और दूसरे के रूप में आशीष पाई। इसी प्रकार हमें भी अपने ज्येष्ठ भाई मसीह के वस्त्र के नीचे छिपना चाहिए, ताकि हम अपने स्वर्गीय पिता के सम्मुख धार्मिकता की साक्षी पाएँ।

यह निश्चय ही शुद्ध सत्य है। क्योंकि परमेश्वर के सामने सुरक्षित रूप से उपस्थित होने के लिए हमें मसीह की सुगन्ध की मिठास धारण करनी चाहिए, और हमारे दोष उसकी सिद्धता के नीचे दबे होने चाहिए।

यद्यपि स्पष्ट साक्ष्य दिखाते हैं कि ये सब बातें पूर्णतः सत्य हैं, फिर भी उनकी आवश्यकता को ठीक रीति से तब तक नहीं समझा जा सकता जब तक हम अपनी आँखों के सामने स्पष्ट रूप से न रख लें कि इस सारे विवाद की नींव क्या होनी चाहिए।

पहले हम स्मरण रखें कि हम इस पर विचार नहीं कर रहे कि मनुष्य किसी पार्थिव न्यायी के न्यायालय में धर्मी कैसे दिखाई दे, वरन् परमेश्वर के स्वर्गीय सिंहासन के सामने। इसलिए हमें परमेश्वर के न्याय को सन्तुष्ट करने के लिए आवश्यक खराई को अपने पैमाने से नहीं मापना चाहिए। फिर भी आश्चर्य की बात है कि इस विषय में मनुष्य कितनी उतावली और धृष्टता से आगे बढ़ते हैं। वास्तव में यह स्पष्ट है कि कर्मों की धार्मिकता के विषय में उनसे अधिक निडरता और घमण्ड से कोई नहीं बोलता जो खुले रूप से दुष्ट हैं या भीतर से दोषों और पापमय वासनाओं से भरे हुए हैं।

ऐसा इसलिए होता है कि वे परमेश्वर की धार्मिकता के विषय में कुछ सोचते ही नहीं। यदि उन्हें उसका ज़रा-सा भी बोध होता, तो वे उसका इस प्रकार कभी उपहास न करते। फिर भी जब उसे इतना सिद्ध नहीं माना जाता कि उसे वही स्वीकार हो जो पूर्ण, हर दाग से शुद्ध और अपनी सिद्धता में निर्दोष हो, तब उसकी अत्यधिक अवहेलना और उपहास होता है। ऐसी धार्मिकता किसी जीवित मनुष्य में कभी नहीं पाई गई, न कभी पाई जाएगी।

किसी के लिए भी किसी विद्यालय के कोने में यह बकबक करना सरल है कि कर्मों में मनुष्य को धर्मी ठहराने का कितना मूल्य है। परन्तु जब हम परमेश्वर के सम्मुख आते हैं, तब ऐसा सारा कूड़ा-करकट पीछे छोड़ देना पड़ता है, क्योंकि वहाँ विषय गम्भीरता से लिया जाता है, तुच्छ वाद-विवादों से नहीं। यदि हम सच्ची धार्मिकता की लाभदायक खोज करना चाहते हैं, तो हमें अपनी समझ वहीं लगानी चाहिए। मैं कहता हूँ कि वहीं हमें सोचना चाहिए कि जब वह स्वर्गीय न्यायी हमें हिसाब देने के लिए बुलाएगा तब हम उसे क्या उत्तर देंगे।

इसलिए हमें उसे उसके सिंहासन पर स्थापित करना चाहिए—उस रूप में नहीं जैसी हमारी बुद्धि कल्पना करती है, वरन् जैसा वह पवित्रशास्त्र में हमारे लिए चित्रित किया गया है: वह जिसका तेज तारों को धुँधला कर देता है; जिसकी सामर्थ्य से पहाड़ सूर्य के नीचे बर्फ़ की नाईं पिघल जाते हैं; जिसके क्रोध से पृथ्वी हिल जाती है; जिसकी बुद्धि से बुद्धिमान अपनी ही चतुराई में फँस जाते हैं; जिसकी पवित्रता इतनी है कि उसकी तुलना में सब वस्तुएँ अशुद्ध और अपवित्र हैं; जिसकी धार्मिकता को स्वर्गदूत भी सह नहीं सकते; जो दुष्ट को निर्दोष नहीं ठहराता; और जिसका बदला, जब भड़क उठता है, पृथ्वी की गहराइयों तक पहुँच जाता है।

तब वह न्याय करने बैठे और मनुष्यों के कर्मों की जाँच करे। कौन बिना काँपे उसके सिंहासन के निकट जाने का साहस करेगा? भविष्यद्वक्ता उसके विषय में इस प्रकार कहता है:

“हम में से कौन उस भस्म करनेवाली आग के साथ रह सकेगा? कौन उस अनन्त ज्वाला के साथ रह सकेगा? वह जो धर्म से चलता और सच्चाई से बोलता है, और जो अपने सारे जीवन में शुद्ध और सीधा है।”

—यशायाह 33:14–15

जो कोई इस वर्णन पर खरा उतरे, वह आगे आए।

परन्तु यह उत्तर सुनिश्चित करता है कि कोई भी अपने आप को प्रस्तुत करने का साहस न करे। क्योंकि दूसरी ओर, यह भयानक घोषणा हमें कँपा देनी चाहिए:

“हे यहोवा, यदि तू अधर्म का हिसाब रखे, तो हे प्रभु, कौन खड़ा रह सकेगा?”

—भजन संहिता 130:3

निश्चय ही सारा संसार तुरन्त नष्ट हो जाता। क्योंकि अन्यत्र लिखा है:

“क्या मनुष्य अपने परमेश्वर से अधिक धर्मी, या अपने सृष्टिकर्ता से अधिक पवित्र ठहर सकता है? देखो, वह अपने सेवकों पर भरोसा नहीं रखता, और अपने स्वर्गदूतों में भी दोष पाता है।

फिर उनका क्या, जो मिट्टी के घरों में रहते हैं और जिनकी नींव धूल में है, और जो पृथ्वी के तम्बुओं में बन्द हैं—वे कितना अधिक गिराए जाएँगे?”

—अय्यूब 4:17–19

और फिर:

“देखो, वह अपने पवित्र लोगों पर भी भरोसा नहीं करता, और स्वर्ग भी उसकी दृष्टि में शुद्ध नहीं। फिर मनुष्य कितना अधिक घिनौना और निकम्मा है, जो अधर्म को पानी की नाईं पीता है?”

—अय्यूब 15:15–16

इसलिए हमें अपनी आँखें वहीं लगानी चाहिए, ताकि हम व्यर्थ भरोसा करने के बजाय काँपना सीखें। क्योंकि जब तक हम में से हर एक अपने को दूसरे मनुष्यों से तुलना तक सीमित रखता है, तब तक यह कल्पना करना सरल है कि हमारे पास कुछ ऐसा है जिसे दूसरों को तुच्छ नहीं समझना चाहिए। परन्तु जैसे ही हम अपनी आँखें परमेश्वर की ओर उठाते हैं, यह भरोसा तुरन्त नष्ट होकर शून्य हो जाता है।

वास्तव में हमारे प्राणों के साथ परमेश्वर के सामने वही होता है जो हमारी देह के साथ आकाश के नीचे होता है। जब तक मनुष्य अपने आसपास की वस्तुओं को देखने तक सीमित रहता है, वह मानता है कि उसकी दृष्टि अच्छी और सबल है। परन्तु यदि वह अपनी आँखें सूर्य की ओर उठाए, तो उसकी चमक से वह इतना चौंधिया जाता है कि यह दृश्य उसे अपनी दृष्टि की निर्बलता का उससे कहीं अधिक तीव्र अनुभव कराता है जितना पहले छोटी वस्तुओं को देखने में उसे अपनी दृष्टि की सबलता का हुआ था।

इसलिए हम व्यर्थ भरोसे से अपने आप को धोखा न दें। यदि हम हर दूसरे मनुष्य के बराबर या उससे श्रेष्ठ भी हों, तो भी परमेश्वर के सामने यह कुछ नहीं, जिससे हमारी अपनी जाँच को सम्बद्ध किया जाना है। यदि हमारी धृष्टता ऐसी चेतावनियों से भी वश में न आए, तो वह हमें वैसा ही उत्तर देगा जैसा उसने फरीसियों को दिया:

“तुम वे हो जो मनुष्यों के सामने अपने आप को धर्मी ठहराते हो, परन्तु जो मनुष्यों की दृष्टि में महत्त्व रखता है वह परमेश्वर के सामने घृणित है।”

—लूका 16:15

तो जाओ, और मनुष्यों के बीच अपनी धार्मिकता पर गर्व से घमण्ड करो, जबकि परमेश्वर स्वर्ग में उसे घृणित जानता है।

परन्तु इसके विपरीत, परमेश्वर के सेवक जब उसके आत्मा से सचमुच शिक्षा पा चुके होते हैं, तब क्या करते हैं? वे निश्चय ही दाऊद के साथ कहेंगे:

“अपने दास के साथ न्याय करने न बैठ, क्योंकि तेरे सामने कोई भी जीवित मनुष्य धर्मी नहीं ठहर सकता।”

—भजन संहिता 143:2

और अय्यूब के साथ:

“मनुष्य परमेश्वर के सामने धर्मी कैसे ठहरे? यदि वह उससे वाद-विवाद करना चाहे, तो हज़ार बातों में से एक का भी उसे उत्तर न दे सकेगा।”

—अय्यूब 9:2–3

अब हम स्पष्ट सुनते हैं कि परमेश्वर की धार्मिकता क्या है: यह ऐसी धार्मिकता है जिसे कोई मानवीय कर्म सन्तुष्ट नहीं कर सकता, और जो हम पर हज़ार अपराधों का दोष लगाएगी, जबकि हम उनमें से एक से भी अपने को निर्दोष सिद्ध न कर सकेंगे। संत पौलुस ने, जो परमेश्वर का चुना हुआ पात्र था, इसे अपने हृदय में ठीक रीति से समझ लिया था जब उसने स्वीकार किया:

“यद्यपि मेरा मन मुझे किसी बात में दोषी नहीं ठहराता, तो भी इससे मैं धर्मी नहीं ठहरता।”

—1 कुरिन्थियों 4:4

क्योंकि यदि तारे, जो रात में बहुत उजले और चमकीले दिखाई देते हैं, सूर्य के उदय होने पर अपना सारा प्रकाश खो देते हैं, तो हम क्या सोचें कि मनुष्य में जो सबसे बड़ी निर्दोषता कल्पना की जा सकती है, वह परमेश्वर की शुद्धता की तुलना में कैसी ठहरेगी?

क्योंकि तब ऐसी चकित कर देनेवाली कठोरता की जाँच होगी जो हृदय के गुप्त से गुप्त विचारों तक पहुँचेगी। जैसा संत पौलुस कहता है, वह अन्धकार में छिपी हर बात को प्रकट करेगी और हृदय की गहराइयों में दबी बातों को उजागर करेगी, और विवेक को—चाहे वह कितना ही विरोध करे या पीछे हटे—उन बातों को भी सामने लाने के लिए विवश करेगी जिन्हें वह अब भूल चुका है। इसके अतिरिक्त शैतान अभियोक्ता बनकर दोष लगाएगा, मनुष्य को कसकर दबाएगा, और भली-भाँति जानता होगा कि उन सब अपराधों को उसके विरुद्ध कैसे प्रस्तुत करे जिनके लिए उसने उसे उकसाया था।

वहाँ भले कर्मों की वह सारी चमक-दमक और बाहरी दिखावट, जिसका अब केवल आदर किया जाता है, किसी काम न आएगी। केवल हृदय की सच्चाई का प्रश्न रहेगा। इसलिए सारा कपट घबराकर गिर जाएगा—केवल वह कपट नहीं जिससे वे लोग, जो भीतर ही भीतर अपने को दुष्ट जानते हैं, मनुष्यों के सामने स्वयं को छिपाते हैं, वरन् वह भी जिससे हर कोई परमेश्वर के सामने अपनी चापलूसी करता है, क्योंकि हम अपने बारे में बहुत ऊँचा सोचकर अपने आप को धोखा देने की ओर झुके रहते हैं। यद्यपि ऐसा कपट अब घमण्ड और धृष्टता से मतवाला है, तब वह उलट दिया जाएगा।

जो लोग इस दृश्य की ओर अपना मन और विचार नहीं उठाते, वे अपने आप में धार्मिकता का आरोप करके क्षण भर अपने को बहला सकते हैं। परन्तु परमेश्वर के न्याय में वह धार्मिकता तुरन्त उनसे छीन ली जाएगी, ठीक वैसे ही जैसे वह मनुष्य जिसने बड़ी सम्पत्ति के स्वामी होने का स्वप्न देखा हो, जागने पर अपने को खाली हाथ पाता है।

इसके विपरीत, जो सब परमेश्वर के सामने खड़े होकर धार्मिकता का सच्चा नियम खोजते हैं, वे निश्चय पाएँगे कि मनुष्यों के सब कर्म, यदि अपने ही मूल्य के अनुसार आँके जाएँ, तो मैल और नीचता के सिवा कुछ नहीं हैं; कि जो सामान्यतः धार्मिकता समझी जाती है वह परमेश्वर के सामने निरा अधर्म है; जिसे खराई समझा जाता है वह केवल अशुद्धता है; और जिसे महिमा समझा जाता है वह केवल लज्जा है।

परमेश्वर की इस सिद्धता पर मनन करने के बाद हमें नीचे उतरकर अपनी जाँच करनी चाहिए, स्वप्रेम के कारण अपनी चापलूसी या अपने को धोखा दिए बिना। यह आश्चर्य की बात नहीं कि हम इस विषय में अन्धे हैं, क्योंकि हम में से कोई उस मूर्खतापूर्ण और खतरनाक स्वप्रेम से सावधान नहीं रहता जो पवित्रशास्त्र के अनुसार हम में स्वभावतः जड़ पकड़े हुए है। सुलैमान कहता है:

“मनुष्य का हर एक चालचलन उसकी अपनी दृष्टि में ठीक होता है।”

—नीतिवचन 21:2

और फिर:

“मनुष्य अपने सब चालचलन को पवित्र जानते हैं।”

—नीतिवचन 16:2

परन्तु फिर क्या? क्या इस भ्रम के कारण हर कोई निर्दोष ठहरा दिया जाता है? बिलकुल नहीं, क्योंकि सुलैमान तुरन्त जोड़ता है:

“यहोवा हृदयों को तौलता है।”

—नीतिवचन 21:2

अर्थात् जब मनुष्य अपनी धार्मिकता के बाहरी रूप के कारण अपनी चापलूसी करता है, तब प्रभु अपने तराज़ू में हृदय के भीतर छिपे सब अधर्म और अशुद्धता को तौलता है। इसलिए जब आत्म-चापलूसी से कोई लाभ नहीं, तो हम अपने ही विनाश के लिए जानबूझकर अपने को धोखा न दें।

अपनी जाँच ठीक रीति से करने के लिए हमें अपने विवेक को सदा परमेश्वर के न्याय-आसन के सामने बुलाना चाहिए। क्योंकि अपनी विकृति के गुप्त स्थानों को, जो अन्यथा बहुत गहरे और अन्धकारमय रहते हैं, प्रकट और उजागर करने के लिए उसका प्रकाश आवश्यक है। यदि हम ऐसा करें, तो हम इस घोषणा का अर्थ समझेंगे:

“मनुष्य परमेश्वर के सामने धर्मी ठहरने से कितना दूर है, जब वह केवल भ्रष्टता है, कीड़ा है, निकम्मा और घिनौना है, जो अधर्म को पानी की नाईं पीता है! अशुद्ध बीज से जो उत्पन्न हुआ है उसे शुद्ध और निर्मल कौन कर सकता है? कोई नहीं।”

—अय्यूब 15:14–16

हम वह भी अनुभव करेंगे जो अय्यूब ने अपने विषय में कहा:

“यदि मैं अपने को निर्दोष ठहराना चाहूँ, तो मेरा ही मुँह मुझे दोषी ठहराएगा; यदि मैं अपने को खरा कहूँ, तो वह मुझे कुटिल सिद्ध करेगा।”

—अय्यूब 9:20

क्योंकि भविष्यद्वक्ता का अपने समय के विषय में विलाप केवल एक युग का नहीं, वरन् सामान्यतः हर पीढ़ी पर लागू होता है:

“हम सब भेड़ों की नाईं भटक गए थे; हम में से हर एक अपने अपने मार्ग की ओर फिर गया।”

—यशायाह 53:6

क्योंकि वहाँ वह उन सब को सम्मिलित करता है जिन्हें छुटकारे का अनुग्रह दिया जाना है। इस जाँच की कठोरता तब तक बनी रहनी चाहिए जब तक वह हमें अपने ही प्रति भय से वश में न कर ले और इस प्रकार हमें प्रभु का अनुग्रह पाने के लिए तैयार न कर दे। जो कोई सोचता है कि वह पहले हृदय का सारा घमण्ड त्यागे बिना उस अनुग्रह का आनन्द ले सकता है, वह अपने आप को बहुत धोखा देता है। यह कहावत सुप्रसिद्ध है:

“परमेश्वर अभिमानियों से विरोध करता है, परन्तु दीनों पर अनुग्रह करता है।”

—1 पतरस 5:5

परन्तु हम अपने को दीन कैसे करें, जब तक कि हम पूरी तरह रिक्त और कंगाल होकर परमेश्वर की दया को स्थान न दें? क्योंकि यदि हम कल्पना करें कि हम में अब भी कुछ शेष है, तो मैं उसे दीनता नहीं कहता। वास्तव में पहले इन दो बातों को जोड़कर एक घातक कपट सिखाया गया है: कि हमें परमेश्वर के सामने अपने विषय में दीनता से सोचना चाहिए, फिर भी अपनी धार्मिकता का कुछ मान बनाए रखना चाहिए। क्योंकि यदि हम परमेश्वर के सामने कुछ ऐसा स्वीकार करें जो हमारे हृदय की सोच से भिन्न हो, तो हम दुष्टता से उससे झूठ बोलते हैं।

हम अपने विषय में वैसा नहीं सोच सकते जैसा हमें सोचना चाहिए जब तक कि जो कुछ हम में उत्तम दिखाई देता है वह पूरी तरह पाँवों तले न रौंदा जाए। इसलिए, जब हम भविष्यद्वक्ता के मुख से सुनते हैं कि उद्धार दीनों के लिए तैयार है, परन्तु घमण्डियों के अभिमान के लिए विनाश, तो हम पहले यह समझें कि जब तक हम सारा घमण्ड त्यागकर सच्ची दीनता को न अपनाएँ, तब तक हमारे लिए उद्धार तक पहुँच नहीं है।

दूसरे, हम यह समझें कि यह दीनता ऐसी विनम्रता नहीं है जिसमें हम परमेश्वर के सामने अपने को नीचा दिखाने के लिए अपने उचित अधिकार का छोटा-सा अंश भी छोड़ दें। मनुष्यों के बीच हम उन्हें दीन कहते हैं जो घमण्ड से अपने को ऊँचा नहीं उठाते और दूसरों को तुच्छ नहीं जानते, यद्यपि वे स्वयं में कुछ मूल्य होना मानते हों। परन्तु सच्ची दीनता हमारे हृदयों का निष्कपट नम्र होना है, जो हमारी दुर्दशा और कंगालपन के सही बोध से उत्पन्न होती है, और जिससे हमारे हृदय झुक जाते हैं। क्योंकि परमेश्वर के वचन में दीनता का वर्णन सदा इसी प्रकार किया गया है।

जब प्रभु सपन्याह के द्वारा इस प्रकार कहता है:

“मैं तेरे बीच से सब घमण्ड से प्रसन्न होनेवालों को दूर करूँगा, और तेरे बीच केवल दुःखी और कंगाल लोगों को रहने दूँगा; और वे परमेश्वर पर भरोसा रखेंगे।”

—सपन्याह 3:11–12

क्या वह स्पष्ट नहीं दिखाता कि दीन कौन हैं—अर्थात् वे जो अपनी कंगालता के ज्ञान से दुःखी हैं? इसके विपरीत, वह घमण्डियों को ऐसे लोग बताता है जो आनन्द मनाते हैं, क्योंकि सम्पन्नता में मनुष्य प्रायः फूले नहीं समाते। इसके अतिरिक्त, जिन दीनों का वह उद्धार करना चाहता है उनके लिए वह केवल परमेश्वर पर आशा के सिवा कुछ नहीं छोड़ता।

इसी प्रकार यशायाह में:

“मैं उस मनुष्य को छोड़ और किसकी ओर दृष्टि करूँगा जो दीन और खेदित मनवाला है और मेरे वचन से थरथराता है?”

—यशायाह 66:2

और फिर:

“वह जो महान और ऊँचा है, जो अनन्तकाल तक विराजमान रहता है और जिसका नाम पवित्र है, वह अपनी महिमा के सिंहासन पर रहता है, और उनके साथ भी रहता है जो खेदित और दीन मनवाले हैं, ताकि दीनों के मन और खेदितों के हृदय को जीवित करे।”

—यशायाह 57:15

जब हम खेद शब्द को इतनी बार दोहराया हुआ सुनते हैं, तो हमें उसे ऐसा घाव समझना चाहिए जिससे हृदय इतना गहरा बिंध जाता है कि सारा मनुष्य भूमि पर गिर जाता है और अपने को उठा नहीं सकता। यदि हम दीनों के साथ ऊँचा उठाया जाना चाहते हैं, तो हमारे हृदयों को ऐसे खेद से घायल होना चाहिए। यदि ऐसा न हो, तो हम परमेश्वर के सामर्थी हाथ के नीचे अपनी ही लज्जा के लिए दीन किए जाएँगे।

इसके अतिरिक्त, हमारे भले गुरु ने केवल शब्दों से सन्तुष्ट न होकर एक दृष्टान्त में, मानो चित्र में, दीनता की सच्ची छवि हमारे लिए उकेरी है। वह हमारे सामने उस चुंगी लेनेवाले को रखता है जो दूर खड़ा था और स्वर्ग की ओर आँखें उठाने का साहस नहीं कर रहा था, वरन् गहरी कराहों के साथ प्रार्थना करता था:

“हे परमेश्वर, मुझ पापी पर दया कर।”

—लूका 18:13

हम यह न समझें कि उसका स्वर्ग की ओर न देखना या निकट न आना, और अपने को पापी स्वीकार करते हुए छाती पीटना, बनावटी विनम्रता के चिह्न थे। वे उसके हृदय की भीतरी भावना की साक्षियाँ थीं।

दूसरी ओर, मसीह हमारे सामने उस फरीसी को रखता है जिसने परमेश्वर का धन्यवाद किया कि वह अन्य मनुष्यों के समान—चोर, अन्यायी या व्यभिचारी—नहीं है, कि वह सप्ताह में दो बार उपवास करता है और अपनी सारी कमाई का दसवाँ अंश देता है। उसने खुलकर स्वीकार किया कि वह अपनी धार्मिकता परमेश्वर के अनुग्रह से पाता है। फिर भी, क्योंकि उसने अपने कर्मों के कारण अपने आप पर धर्मी होने का भरोसा किया, वह परमेश्वर के सामने घृणित ठहरकर घर लौटा। इसके विपरीत, चुंगी लेनेवाला अपने अधर्म को स्वीकार करने के द्वारा धर्मी ठहराया गया।

इससे हम देख सकते हैं कि हमारी दीनता परमेश्वर को कितनी प्रिय है: जब तक हृदय अपने मूल्य की हर धारणा से रिक्त न हो जाए, वह परमेश्वर की दया ग्रहण करने के योग्य नहीं होता। जब कभी हृदय ऐसी धारणा से भरा होता है, तो परमेश्वर के अनुग्रह का प्रवेश-द्वार बन्द हो जाता है।

इस विषय में सब सन्देह दूर करने के लिए प्रभु यीशु को उसके पिता ने इस आज्ञा के साथ संसार में भेजा:

“कि कंगालों को सुसमाचार सुनाऊँ, खेदित मनवालों को चंगा करूँ, बन्दियों को छुटकारे का और कैदियों को छूट जाने का प्रचार करूँ, सब शोक करनेवालों को शान्ति दूँ, और उन्हें राख के बदले सुन्दर मुकुट, रोने के बदले हर्ष का तेल, और उदासी के बदले स्तुतिरूपी वस्त्र दूँ।”

—यशायाह 61:1–3

इसी आज्ञा के अनुसार वह अपनी कृपा पाने के लिए केवल उन्हीं को बुलाता है जो थके और बोझ से दबे हैं। इसलिए यदि हम मसीह की बुलाहट का उत्तर देना चाहते हैं, तो सब अहंकार और धृष्टता हमसे दूर होनी चाहिए।

अहंकार से मेरा आशय उस घमण्ड से है जो धार्मिकता की मूर्खतापूर्ण धारणा से उत्पन्न होता है, जब मनुष्य कल्पना करता है कि उसके पास कुछ ऐसा है जिससे वह परमेश्वर को स्वीकार्य होने के योग्य ठहरता है। धृष्टता से मेरा आशय उस शारीरिक निश्चिन्तता से है जो कर्मों पर किसी भरोसे के बिना भी हो सकती है। क्योंकि बहुत-से पापी अपने दोषों की मिठास में मतवाले होकर परमेश्वर के न्याय की कुछ चिन्ता नहीं करते। मानो सुन्न होकर वे उस दया को खोजने का कोई प्रयत्न नहीं करते जो उन्हें दी जा रही है।

ऐसी लापरवाही को उतना ही दूर भगाना चाहिए जितना अपने ऊपर के सब भरोसे को गिराना, यदि हम मसीह के पास दौड़ने के लिए स्वतन्त्र होना चाहते हैं ताकि वह हमें अपनी सम्पत्ति से भर दे। क्योंकि जब तक हम अपने आप पर पूरी तरह अविश्वास न करें, तब तक हम उस पर ठीक रीति से भरोसा नहीं कर सकेंगे। जब तक हमारे हृदय पहले हमारे भीतर नीचे न गिराए जाएँ, हम उन्हें उसकी ओर ठीक रीति से नहीं उठा सकेंगे। जब तक हम अपने आप में पूरी तरह रिक्त न हों, हम उससे सच्ची शान्ति नहीं पाएँगे।

इसलिए हम परमेश्वर का अनुग्रह ग्रहण करने और पाने के लिए तब तैयार होते हैं जब हम अपने ऊपर का सारा भरोसा त्यागकर केवल उसकी भलाई पर टिकते हैं। जैसा संत अगस्तीन कहता है, अपने पुण्यों को भुलाकर हम मसीह के अनुग्रह पाते हैं।

यहाँ अधिक न रुकते हुए हम इस नियम को थामे रहें, जो संक्षिप्त है परन्तु सार्वभौमिक और सर्वथा निश्चित है: जिस मनुष्य ने अपने आप को पूरी तरह शून्य कर लिया है और त्याग दिया है—अपनी धार्मिकता को नहीं, क्योंकि उसके पास वह है ही नहीं, वरन् धार्मिकता की उस छाया को जो हमें धोखा देती है—वह परमेश्वर की दया के फल पाने के लिए ठीक रीति से तैयार है। क्योंकि मनुष्य जितना अपने आप पर टिकता है, उतना ही वह परमेश्वर के अनुग्रह में बाधा डालता है।

यहाँ हमारे सामने विचार करने के लिए दो प्रधान बातें हैं: कि परमेश्वर की महिमा पूरी बनी रहे, और कि हमारे विवेक को उसके न्याय-आसन के सामने विश्राम और निश्चयता मिले।

हम देखते हैं कि जब कभी धार्मिकता का प्रश्न उठता है, तब पवित्रशास्त्र हमें परमेश्वर को स्तुति की स्वीकारोक्ति देने के लिए कितनी बार और कितनी गम्भीरता से उभारता है। वास्तव में प्रेरित साक्षी देता है कि जब परमेश्वर ने हमें मसीह में धार्मिकता प्रदान की, तब उसका यही उद्देश्य था: अपनी धार्मिकता प्रकट करना। फिर वह जोड़ता है कि यह प्रकटीकरण किसमें है—अर्थात् इसमें कि केवल परमेश्वर ही धर्मी और यीशु मसीह में विश्वास रखनेवाले का धर्मी ठहरानेवाला माना जाए।

तो क्या हम नहीं देखते कि परमेश्वर की धार्मिकता की पर्याप्त महिमा तब तक नहीं होती जब तक केवल वही धर्मी न माना जाए और उन्हें धार्मिकता का दान न दे जिन्होंने उसे कमाया नहीं? इसी कारण वह चाहता है कि हर एक मुँह बन्द किया जाए और सारा संसार उसका ऋणी घोषित किया जाए, क्योंकि जब तक मनुष्य के पास अपने बचाव के लिए कुछ भी है, तब तक उतना ही परमेश्वर की महिमा घट जाती है।

इसलिए परमेश्वर यहेजकेल में दिखाता है कि जब हम अपने अधर्म को स्वीकार करते हैं तब उसका नाम कैसे महिमा पाता है:

“तुम अपनी चाल-चलन और अपने सब अपराधों को स्मरण करोगे जिनसे तुम ने अपने को अशुद्ध किया है, और अपने किए हुए सब पापों के कारण तुम अपने आप से घृणा करोगे। तब तुम जान लोगे कि मैं यहोवा हूँ, जब मैं तुम्हारे साथ तुम्हारे बुरे चालचलन और बिगड़े हुए कामों के अनुसार नहीं, परन्तु अपने नाम के निमित्त व्यवहार करूँगा।”

—यहेजकेल 20:43–44

यदि परमेश्वर का सच्चा ज्ञान इसी में है—कि अपने अधर्म के ज्ञान से गिराए और मानो कुचले जाकर हम पहचानें कि परमेश्वर हमारे अयोग्य होते हुए भी हमारा भला करता है—तो हम अपनी ही बड़ी हानि करके उसकी मुफ़्त भलाई की इस स्तुति में से एक छोटी-सी बूँद भी परमेश्वर से क्यों छीनने का प्रयत्न करें?

इसी प्रकार जब यिर्मयाह पुकारता है:

“बुद्धिमान अपनी बुद्धि पर घमण्ड न करे, न धनवान अपने धन पर, न बलवान अपने बल पर; परन्तु जो घमण्ड करे वह परमेश्वर पर घमण्ड करे।”

—यिर्मयाह 9:23–24

क्या वह इससे यह नहीं दर्शाता कि यदि मनुष्य अपने आप पर घमण्ड करे तो परमेश्वर की महिमा का कुछ अंश नष्ट हो जाता है? निश्चय ही हम परमेश्वर पर ठीक रीति से तभी घमण्ड करते हैं जब हमने अपनी महिमा त्याग दी हो। वास्तव में हमें इसे एक सार्वभौमिक नियम मानना चाहिए: जो कोई अपने आप पर घमण्ड करता है वह परमेश्वर के विरुद्ध घमण्ड करता है। क्योंकि संत पौलुस कहता है कि मनुष्य अन्ततः परमेश्वर के अधीन तभी होते हैं जब उनसे घमण्ड का हर आधार छीन लिया जाए।

इसलिए जब यशायाह घोषणा करता है कि इस्राएल अपनी धार्मिकता परमेश्वर में पाएगा, तब वह जोड़ता है कि इस्राएल अपनी प्रशंसा भी उसी में पाएगा। मानो वह कह रहा हो कि परमेश्वर के चुने हुए इसी उद्देश्य से धर्मी ठहराए जाते हैं: कि वे उसी में घमण्ड करें, और कहीं नहीं। उसने पिछले कथन में सिखाया था कि हमारी प्रशंसा परमेश्वर में कैसे पाई जाती है:

“निश्चय यहोवा ही में मेरी धार्मिकता और बल है।”

—यशायाह 45:24–25

हम ध्यान दें कि जो माँगा गया है वह मात्र स्वीकारोक्ति नहीं, वरन् शपथ से पक्की की हुई स्वीकारोक्ति है, ताकि हम यह न सोचें कि किसी बनावटी दीनता से हम अपना कर्तव्य पूरा कर सकते हैं।

और कोई यह भी न कहे कि जब वह बिना अहंकार के अपनी धार्मिकता का मान करता है तो वह घमण्ड नहीं करता। क्योंकि ऐसा मान भरोसा उत्पन्न किए बिना नहीं रह सकता, और भरोसा घमण्ड को जन्म दिए बिना नहीं रह सकता।

इसलिए हम स्मरण रखें कि धार्मिकता की हर चर्चा में हमें सदा यह लक्ष्य सामने रखना चाहिए: कि उसकी सारी प्रशंसा पूरी तरह और बिना घटे परमेश्वर ही के पास रहे। क्योंकि जैसा प्रेरित कहता है, परमेश्वर ने अपनी धार्मिकता दिखाने के लिए हम पर अपना अनुग्रह उँडेला:

“कि वह आप धर्मी रहे और मसीह पर विश्वास करनेवाले का धर्मी ठहरानेवाला भी हो।”

—रोमियों 3:26

इसलिए अन्यत्र, यह कहने के बाद कि परमेश्वर ने अपने नाम की महिमा को ऊँचा करने के लिए हमें उद्धार दिया है, वह वही शिक्षा दोहराता है:

“तुम को अनुग्रह ही से उद्धार मिला है, और यह परमेश्वर का दान है, और कर्मों के कारण नहीं, ऐसा न हो कि कोई घमण्ड करे।”

—इफिसियों 2:8–9

संक्षेप में, हमें यह निष्कर्ष निकालना चाहिए कि मनुष्य अपने आप में धार्मिकता की एक बूँद भी आरोपित करके पवित्र वस्तु का अपमान किए बिना नहीं रह सकता, क्योंकि ऐसा करना परमेश्वर की धार्मिकता की महिमा को घटाना और नीचा दिखाना है।

अब, यदि हम पूछें कि विवेक परमेश्वर के सामने विश्राम और आनन्द कैसे पा सकता है, तो हमें इसके सिवा और कोई मार्ग नहीं मिलेगा कि वह अपनी मुफ़्त भलाई से हमें धार्मिकता प्रदान करे।

हम सुलैमान के इस वचन को सदा स्मरण रखें:

“कौन कह सकता है, ‘मैं ने अपने हृदय को पवित्र किया है; मैं अपने पाप से शुद्ध हो गया हूँ’?”

—नीतिवचन 20:9

निश्चय ही कोई ऐसा मनुष्य नहीं जो असंख्य अशुद्धताओं से लदा न हो। अत्यन्त सिद्ध मनुष्य भी अपने विवेक में उतरकर अपने कर्मों का लेखा करें। वे क्या परिणाम पाएँगे? क्या वे विश्राम पा सकेंगे और मन की प्रसन्नता रख सकेंगे, मानो उन्होंने परमेश्वर के साथ अपना हिसाब चुका लिया हो? या यदि उनका न्याय उनके कर्मों के अनुसार हो, तो क्या वे अपने भीतर दोषी ठहराए जाने का हर आधार देखकर भयानक पीड़ाओं से फटे नहीं जाएँगे?

यदि विवेक परमेश्वर की ओर देखता है, तो उसे या तो उसके न्याय के साथ शान्ति और सहमति पानी होगी या नरक के भय उसे घेर लेंगे। इसलिए धार्मिकता की चर्चा करने से हमें कुछ प्राप्त नहीं होता जब तक हम ऐसी दृढ़ धार्मिकता स्थापित न करें कि उस पर आधारित होकर आत्मा परमेश्वर के न्याय के सामने खड़ी रह सके। जब हमारी आत्माओं के पास कुछ ऐसा हो जिससे वे बिना भय के परमेश्वर के सामने उपस्थित हो सकें और बिना सन्देह या डर के उसके न्याय की प्रतीक्षा और उसे ग्रहण कर सकें, तब हम मान सकते हैं कि हमने ऐसी धार्मिकता पाई है जो नकली नहीं है।

इसलिए प्रेरित का इस तर्क को इतनी गम्भीरता से रखना अकारण नहीं है। मैं अपने शब्दों के बजाय उसके ही शब्दों का प्रयोग करना पसन्द करता हूँ:

“यदि मीरास की प्रतिज्ञा व्यवस्था से होती, तो विश्वास व्यर्थ ठहरता और प्रतिज्ञा निष्फल हो जाती।”

—रोमियों 4:14

वह पहले यह निष्कर्ष निकालता है कि यदि धार्मिकता हमारे कर्मों के पुण्य का हिसाब रखे या व्यवस्था के पालन पर निर्भर हो, तो विश्वास खाली और शून्य हो जाता है। क्योंकि कोई उसमें निश्चिन्त विश्राम नहीं पा सकता, क्योंकि कभी कोई ऐसा न मिलेगा जो यह प्रतिज्ञा करने का साहस करे कि उसने व्यवस्था को पूरा कर दिया है; वास्तव में कोई भी अपने कर्मों से उसे पूरी तरह पूरा नहीं करता। इसके प्रमाण ढूँढ़ने के लिए हमें दूर जाने की आवश्यकता नहीं, क्योंकि यदि हर कोई ईमानदारी से अपनी जाँच करना चाहे तो वह स्वयं अपना साक्षी हो सकता है।

इसलिए हर मनुष्य पहले सन्देह से पीड़ित होगा और फिर निराशा से दब जाएगा, जब वह अपने ऊपर लदे ऋण के विशाल बोझ और अपने ऊपर थोपी गई शर्त से अपनी दूरी पर विचार करेगा। इस प्रकार विश्वास पहले ही दब और बुझ चुका होगा। क्योंकि डगमगाना, इधर-उधर होना, ऊपर-नीचे धकेले जाना, सन्देह करना, लड़खड़ाना, अधर में लटके रहना और अन्त में निराश हो जाना भरोसा रखना नहीं है। भरोसा का अर्थ है हृदय को एक स्थिर और निश्चित दृढ़ता में स्थापित करना और ऐसा अटल सहारा पाना जिस पर वह टिक सके।

प्रेरित दूसरी बात यह जोड़ता है कि प्रतिज्ञा निष्फल और रद्द हो जाएगी। क्योंकि यदि उसकी पूर्ति हमारे पुण्य पर निर्भर होती, तो हम कब उस अवस्था तक पहुँचते कि परमेश्वर के अनुग्रह के योग्य ठहरें? वास्तव में यह दूसरी बात पहली से निकाली जा सकती है, क्योंकि प्रतिज्ञा केवल उन्हीं में पूरी होती है जो उसे विश्वास से ग्रहण करते हैं। इसलिए यदि विश्वास गिर जाए, तो प्रतिज्ञा में कोई सामर्थ्य नहीं रहती।

इसलिए:

“इसी कारण यह विश्वास से है, कि अनुग्रह की रीति पर हो, और प्रतिज्ञा निश्चित ठहरे।”

—रोमियों 4:16

क्योंकि प्रतिज्ञा तब दृढ़ता से पक्की होती है जब वह केवल परमेश्वर की दया पर टिकी हो, क्योंकि उसकी दया और सच्चाई एक अनन्त बन्धन से जुड़ी हैं। अर्थात् प्रभु अपनी भलाई से हमसे जो कुछ प्रतिज्ञा करता है, उसे विश्वासयोग्यता से पूरा करता है।

इसलिए यहीं हमें विश्राम करना चाहिए और अपनी सारी आशा गहराई से स्थापित करनी चाहिए। हमें अपनी आँखें कर्मों की ओर नहीं फेरनी चाहिए कि उनसे कोई सहायता खोजें। संक्षेप में हमें इस प्रकार निष्कर्ष निकालना चाहिए: पवित्रशास्त्र घोषित करता है कि परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं में कोई सामर्थ्य या प्रभाव नहीं जब तक वे हृदय के स्थिर भरोसे से ग्रहण न की जाएँ। दूसरी ओर, वह घोषित करता है कि जहाँ हृदय में सन्देह या अनिश्चितता है वहाँ वे व्यर्थ हो जाती हैं। फिर वह सिखाता है कि यदि वे प्रतिज्ञाएँ हमारे कर्मों पर टिकी हों, तो हम डगमगाने और काँपने के सिवा कुछ नहीं कर सकते।

इसलिए या तो कर्मों से सारी धार्मिकता छीन लेनी चाहिए, या कर्मों को विचार से पूरी तरह बाहर कर देना चाहिए, ताकि केवल विश्वास का स्थान रहे। विश्वास का स्वभाव यह है कि वह आँखें बन्द करे और कान खोले—अर्थात् मनुष्य में किसी योग्यता या पुण्य का विचार किए बिना अपने आप को पूरी तरह केवल परमेश्वर की प्रतिज्ञा पर टिकाए।

इस प्रकार जकर्याह की यह सुन्दर प्रतिज्ञा पूरी होती है:

“जब उस देश का अधर्म मिटा दिया जाएगा, तब तुम में से हर एक अपने पड़ोसी को अपनी दाखलता और अपने अंजीर के वृक्ष के नीचे बुलाएगा।”

—जकर्याह 3:9–10

इस स्थल में भविष्यद्वक्ता सूचित करता है कि विश्वासी तब तक सच्ची शान्ति का आनन्द नहीं पाते जब तक वे अपने पापों की क्षमा न पा लें।

विषय को और स्पष्ट करने के लिए आइए देखें कि मनुष्य अपने सारे जीवन-काल में कौन-सी धार्मिकता रख सकता है। हमें चार वर्गों में भेद करना चाहिए। मनुष्य या तो परमेश्वर के ज्ञान से रहित और मूर्तिपूजा में उलझा हुआ है; या, वचन और संस्कार पाकर भी वह उच्छृंखल जीवन जीता है और अपने कर्मों से उस प्रभु का इनकार करता है जिसे वह मुँह से मानता है, और इस प्रकार केवल नाम और दावे का मसीही है; या वह कपटी है जो अपनी कुटिलता को खराई के दिखावे के नीचे छिपाता है; या, परमेश्वर के आत्मा से नया जन्म पाकर, वह निष्कपट रूप से पवित्रता और निर्दोषता का अनुसरण करने में लग जाता है।

पहले वर्ग के विषय में, यदि ऐसे लोगों को उनकी स्वाभाविक दशा में सिर की चोटी से पाँव के तलवे तक देखा जाए, तो उनमें भलाई का एक कण भी नहीं मिलेगा—जब तक हम पवित्रशास्त्र पर झूठ का दोष न लगाना चाहें, जब वह आदम की सब सन्तानों को ये वर्णन देता है: कि उनके हृदय कुटिल और कठोर हैं; कि वे जो कुछ अपनी बाल्यावस्था से सोचते हैं वह बुराई के सिवा कुछ नहीं; कि उनके सब विचार व्यर्थ हैं; कि उनकी आँखों के सामने परमेश्वर का भय नहीं; कि उन में से कोई समझदार नहीं और कोई परमेश्वर को नहीं खोजता; और संक्षेप में, कि वे शरीर हैं।

शरीर शब्द के अन्तर्गत वे सब कर्म आ जाते हैं जिन्हें संत पौलुस गिनाता है:

“व्यभिचार, अशुद्धता, निर्लज्जता, लुचपन, मूर्तिपूजा, टोना, बैर, झगड़ा, डाह, क्रोध की उमंगें, विरोध, फूट, दलबन्दी, ईर्ष्या, हत्या,”

और वह सब कुछ जिसकी कल्पना नीच और घृणित रूप में की जा सकती है।

—गलातियों 5:19–21

देखो, वह कैसी उत्तम प्रतिष्ठा है जिसके भरोसे पर उन्हें घमण्डी हो जाना चाहिए!

यदि उनमें से कुछ के आचरण में ईमानदारी का बाहरी रूप है, जिससे वे मनुष्यों में पवित्रता की ख्याति पा सकते हैं, तो भी हमें स्मरण रखना चाहिए कि परमेश्वर बाहरी दिखावे को नहीं देखता। इसलिए यदि हम चाहते हैं कि ऐसी ईमानदारी का उन्हें धर्मी ठहराने में कुछ मूल्य हो, तो हमें उनके कर्मों के सोते और स्रोत तक जाना होगा। मैं कहता हूँ कि हमें उस भीतरी भावना की सूक्ष्म जाँच करनी चाहिए जिससे ऐसे कर्म निकलते हैं।

यद्यपि यह विषय चर्चा के लिए बहुत विस्तृत क्षेत्र खोलता है, तथापि क्योंकि मामला थोड़े शब्दों में निपटाया जा सकता है, मैं यथासम्भव संक्षेप में कहूँगा।

आरम्भ में, मैं इससे इनकार नहीं करता कि अविश्वासियों और मूर्तिपूजकों के जीवन में दिखाई देनेवाले सब गुण परमेश्वर के दान हैं। न मैं साधारण मानवीय विवेक से इतना दूर हूँ कि कहूँ कि अच्छे रोमी सम्राट तीतुस और त्राजान की न्यायप्रियता, संयम और निष्पक्षता में, और जंगली पशुओं के समान राज्य करनेवाले कालिगुला, नीरो और दोमितियान के क्रोध, असंयम और क्रूरता में कोई अन्तर नहीं; या तिबेरियुस की घृणित कामुकता और वेस्पासियान के आत्मसंयम में कोई अन्तर नहीं। और हर दोष और गुण की अलग-अलग जाँच न करते हुए भी, कानूनों का पालन करने और उन्हें तुच्छ जानने में भी अन्तर है।

भले और बुरे में ऐसा भेद है कि वह धार्मिकता की इस मृत छवि में भी प्रकट होता है। क्योंकि यदि ये बातें आपस में घुल-मिल जातीं तो संसार में कौन-सी व्यवस्था बचती? इसलिए प्रभु ने न केवल हर हृदय पर आदरणीय और लज्जाजनक कर्मों का यह भेद अंकित किया है, वरन् अपने विधान से भी बार-बार उसकी पुष्टि की है। क्योंकि हम देखते हैं कि जो मनुष्यों के बीच सद्गुण में लगे रहते हैं उन्हें वह इस वर्तमान जीवन की बहुत-सी आशीषें देता है।

इसका अर्थ यह नहीं कि सद्गुण की ऐसी छाया और छवि उसके अनुग्रहों में से थोड़े की भी योग्य है। वरन् उसे यह दिखाना भाता है कि वह सच्चे सद्गुण से कितना प्रेम करता है, इसलिए वह उसके बाहरी और नकली रूप को भी सांसारिक प्रतिफल से पूरी तरह वंचित नहीं छोड़ता। इससे वह निष्कर्ष निकलता है जिसे हमने अभी स्वीकार किया: ऐसे सद्गुण, जैसे भी हों—या यों कहें, सद्गुणों की ऐसी छवियाँ—उसी से निकले हुए दान हैं, क्योंकि कोई भी प्रशंसनीय वस्तु ऐसी नहीं जो उससे न आती हो।

फिर भी जो संत अगस्तीन लिखता है वह सत्य बना रहता है: वे सब जो एक सच्चे परमेश्वर के धर्म से अपरिचित हैं, अपनी खराई की ख्याति के कारण चाहे कितने ही प्रशंसित हों, किसी प्रतिफल के योग्य नहीं, वरन् दण्ड के योग्य हैं, क्योंकि वे अपने हृदयों की अशुद्धता से परमेश्वर के दानों को दूषित करते हैं।

क्योंकि यद्यपि वे न्याय, आत्मसंयम, मित्रता, विवेक, संयम और साहस के द्वारा मानव समाज को बनाए रखने और टिकाए रखने में परमेश्वर के साधन हैं, तथापि वे परमेश्वर के इन भले कार्यों को बहुत बुरी रीति से करते हैं। वे बुराई करने से रोके जाते हैं, ईमानदारी या न्याय के शुद्ध प्रेम से नहीं, वरन् महत्त्वाकांक्षा, स्वप्रेम या किसी अन्य अप्रत्यक्ष और विकृत विचार से।

क्योंकि उनके कर्म अपने उद्गम में ही हृदय की अशुद्धता से बिगड़े हुए हैं, इसलिए वे सद्गुणों में गिने जाने के उतने ही योग्य हैं जितने वे दोष जो गुणों से किसी समानता या सम्बन्ध के कारण मनुष्यों को धोखा देते हैं। संक्षेप में कहें तो: क्योंकि हम जानते हैं कि धार्मिकता और खराई का एकमात्र स्थायी उद्देश्य यह है कि परमेश्वर का आदर हो, इसलिए जो कुछ इसके अतिरिक्त कहीं और लक्ष्य रखता है वह उचित ही खराई का नाम खो देता है।

क्योंकि ऐसे लोग उस उद्देश्य पर ध्यान नहीं देते जो परमेश्वर की बुद्धि ने ठहराया है, इसलिए यद्यपि उनके कार्य बाहर से अच्छे दिखें, तथापि वे अपने बुरे उद्देश्य के कारण पापमय हैं। इसके अतिरिक्त, यदि संत यूहन्ना का यह कथन सत्य है—

“जिसके पास परमेश्वर का पुत्र नहीं, उसके पास जीवन नहीं,”

—1 यूहन्ना 5:12

तो वे सब जिनका मसीह में कोई भाग नहीं, वे कोई भी हों और जो कुछ भी करें या करने का प्रयत्न करें, अपने सारे जीवन-काल को केवल विनाश, उलझन और अनन्त मृत्यु के दण्ड की ओर बढ़ते हुए बिताते हैं।

इसलिए संत अगस्तीन ऐसे लोगों के जीवन की तुलना भटकी हुई दौड़ से करके बहुत उचित कहता है। क्योंकि मनुष्य सही मार्ग से बाहर जितनी तेज़ी से दौड़ता है, उतना ही वह अपने गन्तव्य से दूर होता जाता है और उतना ही अधिक दुर्दशा में पड़ता है। इसलिए वह निष्कर्ष निकालता है कि सही मार्ग पर लँगड़ाते हुए चलना उससे बाहर तेज़ दौड़ने से उत्तम है।

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