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अध्याय चार: विश्वास के विषय में, जिसमें प्रेरितों के विश्वास-वचन की व्याख्या की गई है (भाग 1/6)
अध्याय चार
विश्वास के विषय में, जिसमें प्रेरितों के विश्वास-वचन की व्याख्या की गई है
पिछली चर्चा से अब यह समझना सरल है कि प्रभु अपनी व्यवस्था में हमसे क्या माँगता है। यदि हम छोटे-से-छोटे बिन्दु में भी चूक जाएँ, तो वह हमारे विरुद्ध अपना क्रोध और अनन्त मृत्यु का भयानक दण्ड सुनाता है। इसके अतिरिक्त यह भी दिखाया जा चुका है कि मनुष्यों के लिए व्यवस्था को पूरा करना केवल कठिन ही नहीं, वरन् उनकी सामर्थ्य से सर्वथा बाहर है। इसलिए यदि हम केवल अपनी ओर देखें और यह विचार करें कि हम किसके योग्य हैं, तो हमारे लिए भली आशा की एक बूँद भी शेष नहीं रहती, केवल मृत्यु का निश्चित विनाश ही रह जाता है, क्योंकि हम परमेश्वर की ओर से पूर्णतः ठुकराए हुए हैं।
तब यह दिखाया गया कि इस विपत्ति से बच निकलने का केवल एक ही मार्ग है: अर्थात् परमेश्वर की दया, बशर्ते कि हम उसे दृढ़ विश्वास के साथ ग्रहण करें और पक्की आशा के साथ उसी में विश्राम करें। अब हमें यह समझाना शेष है कि यह विश्वास कैसा होना चाहिए, जिसके द्वारा वे सब, जिन्हें हमारे प्रभु ने अपनी सन्तान होने के लिए चुना है, स्वर्ग के राज्य के अधिकारी बनते हैं। क्योंकि यह प्रत्यक्ष है कि परमेश्वर के विषय में कोई भी मत या धारणा इतने बड़े आशीर्वाद को उत्पन्न करने के लिए पर्याप्त नहीं होगी।
इसलिए हमें विश्वास का सच्चा स्वरूप खोज निकालने में और भी अधिक परिश्रम करना चाहिए, क्योंकि हम देखते हैं कि आजकल लोग इसके विषय में कितने घातक अज्ञान में हैं। संसार का एक बड़ा भाग विश्वास शब्द से एक साधारण-सी सहज-विश्वासिता के सिवा और कुछ नहीं समझता, जिसके द्वारा मनुष्य सुसमाचार में बताई गई बातों से सहमत हो जाता है। यह बुराई, अन्य असंख्य बुराइयों की नाईं, सोफिस्टों और सॉरबोन के विद्वानों के सिर मढ़ी जानी चाहिए। क्योंकि वे अपनी धुँधली और अस्पष्ट परिभाषा से विश्वास की सामर्थ्य को घटाने के अतिरिक्त, "रूपयुक्त" और "अरूप" विश्वास का कोई निरर्थक भेद भी गढ़ लेते हैं, और परमेश्वर के भय तथा सब प्रकार की भक्ति से रहित एक खोखली धारणा को विश्वास का नाम दे देते हैं। इसके विरुद्ध सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र साक्षी देता है।
मैं उनकी परिभाषा का खण्डन किसी और रीति से नहीं, वरन् केवल इस प्रकार करना चाहता हूँ कि विश्वास का स्वरूप जैसा प्रभु के वचन में हमें दिखाया गया है, वैसा ही सीधे-सीधे बता दूँ। इससे स्पष्ट हो जाएगा कि वे इसके विषय में कितनी मूर्खता से बकवाद करते हैं। उनका वह भेद तिनके भर भी मूल्य नहीं रखता। क्योंकि यद्यपि शिक्षा की एक रीति के रूप में हम यह मान लेते हैं कि जब हमें यह दिखाना हो कि दुष्टों के पास परमेश्वर का कौन-सा ज्ञान है, तब विश्वास दो प्रकार का होता है, तथापि हम पौलुस के साथ परमेश्वर की सन्तानों में केवल एक ही विश्वास को मानते और स्वीकार करते हैं।
यह सच है कि बहुत-से लोग मानते हैं कि परमेश्वर है, और समझते हैं कि सुसमाचार और पवित्रशास्त्र में जो कुछ लिखा है वह सच है, उसी प्रकार के निर्णय से, जिससे लोग प्रायः उसे सच मान लेते हैं जो इतिहासों में पढ़ते हैं या जिसे उन्होंने अपनी आँखों से देखा है। दूसरे और भी आगे बढ़ जाते हैं, क्योंकि वे परमेश्वर के वचन को अकाट्य आकाशवाणी मानते हैं, उसकी आज्ञाओं को सर्वथा तुच्छ नहीं जानते, और उसकी प्रतिज्ञाओं से कुछ-कुछ प्रभावित भी होते हैं। हम कहते हैं कि ऐसे लोग विश्वास से रहित नहीं हैं, परन्तु केवल अनुचित बोलचाल के अर्थ में, क्योंकि वे परमेश्वर के वचन पर अधर्म के साथ खुलकर आक्रमण नहीं करते, न उसे ठुकराते या तुच्छ जानते हैं, वरन् आज्ञाकारिता का कुछ दिखावा प्रदर्शित करते हैं।
तथापि जैसे विश्वास की यह छाया या प्रतिमा किसी काम की नहीं है, वैसे ही वह इस नाम के योग्य भी नहीं है। और यद्यपि हम शीघ्र ही और अधिक पूर्णता से देखेंगे कि वह सच्चे विश्वास से कितनी भिन्न है, तथापि अभी उसे संक्षेप में दिखा देने में कोई हानि न होगी।
शमौन जादूगर के विषय में कहा गया है:
"शमौन ने भी विश्वास किया।"
फिर भी उसने शीघ्र ही अपना अविश्वास प्रकट कर दिया। जब पवित्रशास्त्र उसे विश्वास की यह साक्षी देता है, तो हम उसे इस प्रकार नहीं समझेंगे, जैसा कुछ लोग समझते हैं, कि उसने केवल शब्दों में विश्वास का ढोंग किया जबकि उसके हृदय में उसका लेश भी न था। वरन् हम समझते हैं कि सुसमाचार की महिमा से अभिभूत होकर उसने उसे किसी प्रकार की मान्यता दे दी थी, और मसीह को जीवन और उद्धार का कर्ता इस रीति से स्वीकार किया था कि उसे स्वेच्छा से वैसा ग्रहण भी कर लिया।
इसी रीति से हमारा प्रभु लूका के आठवें अध्याय में कहता है:
"वे कुछ समय तक विश्वास रखते हैं।"
ये वे लोग हैं जिनमें वचन का बीज फल लाने से पहले ही दब जाता है, या जड़ पकड़ने से पहले ही मुरझाकर नष्ट हो जाता है। हमें इसमें सन्देह नहीं कि ऐसे लोग वचन के किसी स्वाद से छुए जाते हैं, इसलिए वे उसे उत्सुकता से ग्रहण करते हैं, और उसकी सामर्थ्य से इस प्रकार प्रभावित होते हैं कि अपने कपट में वे न केवल दूसरे मनुष्यों को, वरन् अपने ही हृदयों को भी धोखा देते हैं। क्योंकि वे अपने आप को समझा लेते हैं कि परमेश्वर के वचन के प्रति जो श्रद्धा वे रखते हैं वही उनकी सबसे सच्ची भक्ति है, क्योंकि वे संसार में किसी बात को अधर्म नहीं मानते, सिवा तब के जब उस वचन की खुलकर निन्दा या अवहेलना की जाए।
फिर भी सुसमाचार का यह ग्रहण चाहे जैसा हो, वह हृदय में इस प्रकार प्रवेश नहीं करता कि वहाँ दृढ़ता से जमा रहे। और यद्यपि कभी-कभी ऐसा दिखाई देता है कि उसने जड़ पकड़ ली है, तथापि वे जड़ें जीवित नहीं होतीं। मानव-हृदय व्यर्थता से ऐसा भरा है, झूठ के असंख्य छिपने के स्थानों से ऐसा पटा है, और कपट से ऐसा ढका है कि वह स्वयं को धोखा देता है।
तथापि जो लोग विश्वास की ऐसी नकल पर घमण्ड करते हैं, वे समझ लें कि इस विषय में वे शैतान से किसी प्रकार श्रेष्ठ नहीं हैं। वरन् जिस पहले समूह की हमने चर्चा की, वे तो शैतानों से बहुत हीन हैं, क्योंकि वे उन बातों को सुनकर जड़-से बने रहते हैं जिन पर शैतान थरथराते हैं। दूसरे इस बात में उनके समान हैं कि उनकी जो भी अनुभूति है, वह अन्त में आतंक और भय में ही समाप्त होती है।
इसके विपरीत, सच्चा मसीही विश्वास, जो अकेला ही विश्वास कहलाने के योग्य है, इतिहास के नंगे ज्ञान से सन्तुष्ट नहीं होता। वह मानव-हृदय में अपना आसन जमाता है, उसे दिखावे, झूठ और कपट से शुद्ध करता है, और उस पर इस प्रकार अधिकार कर लेता है कि वह उससे सहज ही नहीं मिटता।
सबसे पहले, उसकी सामर्थ्य और यथार्थ स्वभाव को ठीक-ठीक समझने के लिए हमें चेतावनी दी जाती है कि हम परमेश्वर के वचन की शरण लें। विश्वास का वचन के साथ ऐसा सम्बन्ध और मेल है कि उसे कहीं और से ठीक-ठीक परखा नहीं जा सकता। क्योंकि वचन मानो उसका लक्ष्य और उद्देश्य है, जिस पर उसे निरन्तर दृष्टि रखनी चाहिए। यदि वह उस वचन से मुड़ जाए, तो वह विश्वास नहीं रहता, वरन् अनिश्चित सहज-विश्वासिता और भटकती हुई भूल बन जाता है। वही वचन वह नींव है जिससे विश्वास थमा और टिका रहता है; यदि विश्वास को उससे हटा लिया जाए, तो वह तुरन्त लड़खड़ा जाता है। इसलिए वचन को हटा दो, तो कोई विश्वास शेष न रहेगा।
हम यहाँ यह चर्चा नहीं कर रहे कि जिस वचन से विश्वास उत्पन्न होता है, उसे बोने के लिए मनुष्य की सेवकाई आवश्यक है या नहीं। उस पर हम अन्यत्र विचार करेंगे। हम यह कह रहे हैं कि वचन, चाहे जिस ओर से हमारे पास आए, एक दर्पण के समान है जिसमें विश्वास को परमेश्वर को निहारना और उस पर ध्यान करना चाहिए। इसलिए चाहे परमेश्वर इस काम में मनुष्य की सेवा का उपयोग करे या केवल अपनी सामर्थ्य से कार्य करे, वह उन लोगों के सम्मुख, जिन्हें वह अपनी ओर खींचना चाहता है, सदा अपने वचन के द्वारा ही अपने आप को प्रस्तुत करता है।
क्योंकि विश्वास केवल इतना जान लेने में नहीं है कि परमेश्वर है। मुख्य बात यह है कि हम समझें कि हमारे प्रति उसकी इच्छा क्या है। हमारे लिए यह जानना लाभदायक है कि वह स्वयं में क्या है, परन्तु उससे बढ़कर यह कि वह हमारे प्रति क्या होना चाहता है। अब हम जान गए हैं कि विश्वास परमेश्वर की इच्छा का वह ज्ञान है जो उसके वचन से प्राप्त होता है।
विश्वास की नींव परमेश्वर की सत्यता के विषय में हमारा वह निश्चय है जो हम रखते हैं। जब तक तुम्हारे हृदय में इसका स्थिर निश्चय नहीं है, तब तक वचन का तुम पर बहुत ही कम अधिकार है, या बिलकुल नहीं है। इसके अतिरिक्त, यह मान लेना भी पर्याप्त नहीं कि परमेश्वर सत्यवादी है और न झूठ बोल सकता है न धोखा दे सकता है, जब तक तुम इस बात में दृढ़ न हो कि उसकी ओर से जो कुछ भी आता है वह निश्चित और अटल सत्य है।
परन्तु चूँकि मानव-हृदय परमेश्वर के हर एक वचन से समान रूप से विश्वास में स्थिर नहीं होता, इसलिए हमें और आगे यह खोजना चाहिए कि विश्वास वचन में वास्तव में क्या ढूँढ़ता है। यह परमेश्वर की ही वाणी थी जिसने आदम से कहा:
"तू निश्चय मर जाएगा।"
यह भी परमेश्वर की ही वाणी थी जिसने कैन से कहा:
"तेरे भाई का लहू भूमि में से मेरी ओर चिल्ला रहा है।" —उत्पत्ति 4:10
फिर भी ऐसी घोषणाएँ विश्वास को केवल हिला ही सकती थीं; उसे स्थिर करना तो दूर की बात थी। फिर भी हम यह इनकार नहीं करते कि जब कभी परमेश्वर बोले, जो कुछ भी कहे, और जिस भी रीति से कहे, उसकी सच्चाई से सहमत होना विश्वास का कार्य है। परन्तु हम अभी यह पूछ रहे हैं कि उस वचन में विश्वास को ऐसा क्या मिलता है जिस पर वह टिक सके और विश्राम पा सके।
यदि हमारा विवेक केवल क्रोध और बदले को ही देखे, तो वह भय से काँपे बिना कैसे रह सकता है? और यदि एक बार वह परमेश्वर को भय की दृष्टि से देखे, तो उससे भागे बिना कैसे रह सकता है? फिर भी विश्वास को परमेश्वर को ढूँढ़ना चाहिए, उससे भागना नहीं। इसलिए यह प्रत्यक्ष है कि हमारे पास अभी तक पूरी परिभाषा नहीं है, क्योंकि परमेश्वर की इच्छा की हर एक अभिव्यक्ति को मात्र जान लेना विश्वास नहीं गिना जाना चाहिए।
तब क्या हो यदि हम "इच्छा" के स्थान पर "सद्भावना" या "दया" रख दें? निश्चय ही इस प्रकार हम विश्वास के स्वरूप के अधिक निकट आते हैं। क्योंकि जब हम यह जान लेते हैं कि हमारा भला उसी में है, तब हम परमेश्वर को ढूँढ़ने के लिए प्रेरित होते हैं—यह वह हमें इस रीति से बताता है कि वह हमारे उद्धार की चिन्ता रखता है, यह आश्वासन देता है। इसलिए हमें उसके अनुग्रह की प्रतिज्ञा चाहिए, जिसमें वह हमारे लिए साक्षी देता है कि वह हमारे प्रति कृपालु पिता है, क्योंकि मानव-हृदय केवल उसी प्रतिज्ञा पर विश्राम कर सकता है।
इसके अतिरिक्त, चूँकि परमेश्वर की भलाई का ज्ञान तब तक बहुत मूल्य का नहीं हो सकता जब तक वह हमें उस भलाई में विश्राम न करवाए, इसलिए हमें हर ऐसी समझ को निकाल देना चाहिए जिसमें सन्देह मिला हो, जो दृढ़ न रहे, वरन् मानो विषय के विषय में अनिश्चित होकर डगमगाती हो। फिर भी मानव-बुद्धि, अन्धी और अँधेरी होने के कारण, परमेश्वर की इच्छा के ज्ञान में प्रवेश करके उसे पाने से इतनी दूर है, और हृदय—जो सन्देह और अनिश्चितता में डगमगाने का अभ्यस्त है—ऐसे निश्चय में विश्राम पाने के लिए आश्वस्त होने से इतना दूर है, कि मानव-बुद्धि को कहीं और से प्रकाशित किया जाना और हृदय को दृढ़ किया जाना आवश्यक है, तभी परमेश्वर का वचन हममें पूर्ण विश्वास पा सकता है।
अब हमारे पास विश्वास की पूरी परिभाषा है, यदि हम यह ठहराएँ कि वह हमारे प्रति परमेश्वर की सद्भावना का दृढ़ और निश्चित ज्ञान है, जो, यीशु मसीह में दी गई निःशुल्क प्रतिज्ञा पर आधारित होकर, पवित्र आत्मा के द्वारा हमारी बुद्धि पर प्रकट किया जाता और हमारे हृदय पर मुहर किया जाता है।
अब हम एक-एक शब्द को क्रम से जाँचें। जब हम उन पर भली-भाँति विचार कर लेंगे, तो मेरे विचार में कोई कठिनाई शेष न रहेगी।
जब हम विश्वास को परमेश्वर की इच्छा का ज्ञान कहते हैं, तो हमारा तात्पर्य उस बोध से नहीं जो मनुष्यों को अपनी इन्द्रियों के अधीन वस्तुओं का होता है। क्योंकि वह हर मानवीय इन्द्रिय से इतना ऊपर है कि मन को उस तक पहुँचने के लिए अपने से ऊपर उठना पड़ता है। और जब वह पहुँच भी जाता है, तब भी जो वह अनुभव करता है उसे पूरी तरह समझ नहीं पाता। फिर भी, जिसे वह समझ नहीं सकता उसके विषय में पूर्ण निश्चय और विश्वास रखकर, वह इस विश्वास की निश्चितता से उससे अधिक समझता है जितना वह अपनी क्षमता के अनुसार किसी मानवीय वस्तु को समझकर समझता।
इसलिए पौलुस बहुत ठीक कहता है जब वह कहता है कि हमें लम्बाई, चौड़ाई, गहराई और ऊँचाई को समझना और मसीह के उस प्रेम को जानना चाहिए जो ज्ञान से परे है:
"कि तुम समझ सको कि चौड़ाई, लम्बाई, गहराई और ऊँचाई कितनी है, और मसीह के उस प्रेम को जान सको जो ज्ञान से परे है।"
क्योंकि उसका आशय एक साथ दोनों बातों को सूचित करना था: अर्थात् यह कि हमारी बुद्धि विश्वास के द्वारा परमेश्वर के विषय में जो ग्रहण करती है वह सर्वथा अनन्त है, और यह कि जानने की यह रीति सब बुद्धि से परे है। फिर भी, क्योंकि हमारे प्रभु ने अपने सेवकों पर अपनी इच्छा का वह भेद प्रकट किया है जो सब युगों और पीढ़ियों से छिपा रहा, इसलिए विश्वास को ठीक ही ज्ञान कहा जाता है।
यूहन्ना भी इसे ज्ञान कहता है जब वह कहता है कि विश्वासी जानते हैं कि वे परमेश्वर की सन्तान हैं:
"हम जानते हैं कि हम परमेश्वर की सन्तान हैं।"
वास्तव में वे इसे निश्चय के साथ जानते हैं, किसी मानवीय प्रमाण या तर्क से शिक्षा पाकर नहीं, वरन् परमेश्वर की सच्चाई के निश्चय से दृढ़ होकर। पौलुस के इन शब्दों से भी यही सूचित होता है:
"जब तक हम इस देह में रहते हैं, हम प्रभु से दूर परदेशी हैं, क्योंकि हम रूप को देखकर नहीं, वरन् विश्वास से चलते हैं।"
इससे वह दिखाता है कि जिन बातों को हम विश्वास से समझते हैं वे हमसे दूर हैं और हमारी दृष्टि से छिपी हैं। इसलिए हम निष्कर्ष निकालते हैं कि विश्वास की समझ बोध की अपेक्षा निश्चय में अधिक है।
हम यह जोड़ते हैं कि यह ज्ञान निश्चित और दृढ़ है, ताकि यह बताया जा सके कि उसकी स्थिरता कितनी ठोस है। क्योंकि जैसे विश्वास किसी सन्देहपूर्ण और डगमगाती धारणा से सन्तुष्ट नहीं होता, वैसे ही वह किसी धुँधले और उलझे हुए विचार से भी सन्तुष्ट नहीं होता। वरन् वह पूर्ण और स्थिर निश्चय माँगता है, जैसा लोग प्रायः उन बातों के विषय में रखते हैं जो भली-भाँति प्रमाणित और समझी हुई हों।
बहुत-से लोग परमेश्वर की दया की कल्पना इस प्रकार करते हैं कि उससे उन्हें बहुत ही थोड़ी सान्त्वना मिलती है। इसी बीच वे दुखदायी पीड़ा में जकड़े रहते हैं, क्योंकि उन्हें सन्देह रहता है कि वह उन पर दयालु होगा या नहीं, क्योंकि वे उस कृपा को, जिसे वे जानते हैं, बहुत संकुचित सीमा में बाँध देते हैं। वे उसे इस प्रकार देखते हैं: वे उसे महान और प्रचुर, बहुतों तक फैली और सब को दी गई मानते हैं; फिर भी, दूसरी ओर, उन्हें सन्देह रहता है कि वह उन तक पहुँचेगी या नहीं, या यों कहें कि वे उस तक पहुँच पाएँगे या नहीं। चूँकि यह विचार बीच में ही रुक जाता है, यह केवल आधा विचार है। इसलिए आत्मा को शान्ति और निश्चय में स्थिर करने के बदले वह उसे सन्देह और चिन्ता से व्याकुल कर देता है।
जो निश्चय पवित्रशास्त्र सदा विश्वास के साथ जोड़ता है, वह बिलकुल भिन्न प्रकार का है: अर्थात् परमेश्वर की भलाई को, जैसी वह हमारे सामने रखी गई है, सन्देह से परे कर देना। यह तब तक नहीं हो सकता जब तक हम सचमुच उसकी मधुरता को चख न लें और अपने भीतर उसका अनुभव न कर लें। इसी कारण प्रेरित विश्वास से भरोसा और भरोसे से हियाव निकालता है, और कहता है:
"मसीह के द्वारा हमें यीशु मसीह पर विश्वास के कारण हियाव और भरोसे के साथ पहुँच प्राप्त है।"
यह इतना सत्य है कि विश्वास शब्द प्रायः भरोसे के अर्थ में प्रयुक्त होता है। विश्वास का मुख्य बिन्दु यही है: कि हम यह न समझें कि प्रभु की ओर से हमें दी गई दया की प्रतिज्ञाएँ केवल हमारे बाहर सच हैं और हमारे भीतर नहीं, वरन् उन्हें अपने हृदयों में ग्रहण करके हम उन्हें अपना बना लें।
ऐसे ग्रहण से वह भरोसा उत्पन्न होता है जिसे पौलुस अन्यत्र शान्ति कहता है—जब तक कोई उस शान्ति को भरोसे के परिणाम के रूप में उससे निकालना न चाहे:
"विश्वास से धर्मी ठहरकर हमें परमेश्वर के साथ मेल है।"
यह शान्ति एक ऐसा आश्वासन है जो परमेश्वर के न्याय के सम्मुख विवेक को विश्राम और आनन्द देता है। इसके बिना विवेक अनिवार्य रूप से अद्भुत रीति से व्याकुल और लगभग छिन्न-भिन्न हो जाता है, जब तक कि वह परमेश्वर को और अपने आप को भूलकर थोड़ी देर के लिए सो न जाए। मैं ठीक ही कहता हूँ "थोड़ी देर के लिए", क्योंकि वह इस दयनीय विस्मृति का सुख देर तक नहीं भोगता कि तुरन्त परमेश्वर के न्याय से मर्म तक बेधा और डंक खाया जाता है, जिसकी स्मृति घड़ी-घड़ी उसके सामने आती रहती है।
संक्षेप में, कोई भी सचमुच विश्वासी नहीं है सिवा उस व्यक्ति के, जो स्थिर निश्चय से आश्वस्त होकर कि परमेश्वर उसके प्रति कृपालु और उदार पिता है, अपनी सारी आशाएँ उसकी भलाई से रखता है; सिवा उस व्यक्ति के जो परमेश्वर की सद्भावना की प्रतिज्ञाओं पर भरोसा रखकर अपने उद्धार की निःसन्देह आशा बाँध लेता है। प्रेरित यह इन शब्दों में दिखाता है:
"यदि हम अपने भरोसे और आशा के घमण्ड को अन्त तक दृढ़ता से थामे रहें।"
यह कहकर वह साक्षी देता है कि कोई भी परमेश्वर में ठीक रीति से आशा नहीं रखता जब तक वह निडर होकर इस बात पर घमण्ड करने का साहस न करे कि वह स्वर्ग के राज्य का वारिस है।
मैं फिर कहता हूँ, कोई भी विश्वासी नहीं है सिवा उस व्यक्ति के, जो अपने उद्धार के निश्चय पर टिका हुआ, बिना सन्देह किए शैतान और मृत्यु को ललकारने का साहस करे, जैसा प्रेरित रोमियों में अपने निष्कर्ष में सिखाता है:
"मुझे निश्चय है कि न मृत्यु, न जीवन, न स्वर्गदूत, न प्रधानताएँ, न शक्तियाँ, न वर्तमान, न भविष्य की बातें, हमें उस प्रेम से, जो परमेश्वर हमसे यीशु मसीह में रखता है, अलग कर सकेंगी।"
इसी कारण वह हमारी बुद्धि की आँखों को तब तक ठीक रीति से प्रकाशित नहीं मानता जब तक हम उस अनन्त मीरास की आशा को न देख लें जिसके लिए हम बुलाए गए हैं:
"कि तुम्हारे मन की आँखें ज्योतिर्मय हों, जिससे तुम जान सको कि उसके बुलाए जाने की आशा क्या है और पवित्र लोगों में उसकी मीरास की महिमा का धन कैसा है।"
अपनी पूरी शिक्षा में वह यह स्थापित करता है कि हम परमेश्वर की भलाई को ठीक रीति से तब तक नहीं समझते जब तक हमें उसमें बड़ा निश्चय प्राप्त न हो।
परन्तु कोई यह आपत्ति करेगा कि विश्वासियों का अनुभव बहुत भिन्न होता है। क्योंकि वे न केवल अपने प्रति परमेश्वर के अनुग्रह को स्वीकार करते हुए भी सन्देहों से व्याकुल और विचलित होते हैं—जो उन्हें प्रायः होता ही है—वरन् कभी-कभी वे बहुत चकित और भयभीत भी हो जाते हैं, इतनी प्रचण्ड होती हैं वे परीक्षाएँ जो उन्हें हिला देती हैं। यह उस विश्वास के निश्चय से, जिसकी हमने चर्चा की, बहुत मेल खाता नहीं दिखता। इसलिए यदि हम चाहते हैं कि ऊपर प्रस्तुत सिद्धान्त अक्षुण्ण रहे, तो हमें इस कठिनाई का समाधान करना होगा।
जब हम यह सिखाते हैं कि विश्वास निश्चित और आश्वस्त होना चाहिए, तब हम ऐसे निश्चय की कल्पना नहीं करते जिसे किसी सन्देह ने छुआ न हो, या ऐसे आश्वासन की जिस पर कोई चिन्ता आक्रमण न करे। इसके विपरीत हम कहते हैं कि विश्वासी अपने ही अविश्वास के विरुद्ध निरन्तर युद्ध करते रहते हैं। उनके विवेक को किसी शान्त विश्राम में रखना, जिसे कोई आँधी भंग न करे, यह तो दूर रहा, हम यह दृढ़ता से कहते हैं कि वे निरन्तर बेचैनी से अभ्यास पाते रहते हैं। फिर भी, उन पर चाहे जैसे आक्रमण हों, हम इनकार करते हैं कि वे कभी उस पक्के भरोसे से गिरते या हटते हैं जो उन्होंने एक बार परमेश्वर की दया में बाँध लिया है।
इसे और अच्छी तरह समझने के लिए हमें आत्मा और शरीर के उस विभाजन की ओर लौटना होगा जिसकी चर्चा हम अन्यत्र कर चुके हैं और जो यहाँ स्पष्ट प्रकट होता है। इसलिए विश्वासी का हृदय अपने भीतर इस विभाजन को अनुभव करता है: एक ओर वह परमेश्वर की भलाई के उस ज्ञान से, जो उसके पास है, आनन्द से भरा रहता है, और दूसरी ओर अपनी दुर्दशा की अनुभूति से कड़वाहट में बेधा जाता है; एक ओर वह सुसमाचार की प्रतिज्ञा पर विश्राम करता है, और दूसरी ओर अपने अधर्म को देखकर काँपता है; एक ओर वह जीवन को आनन्द से ग्रहण करता है, और दूसरी ओर मृत्यु से भयभीत होकर सिकुड़ जाता है।
यह संघर्ष विश्वास की अपूर्णता से उत्पन्न होता है, क्योंकि इस वर्तमान जीवन में हम कभी उस धन्य अवस्था तक नहीं पहुँचते जिसमें सब अविश्वास से शुद्ध होकर हम अपने भीतर विश्वास की पूर्णता रखें। इसी से युद्ध उठता है: शरीर में अब भी शेष अविश्वास उठकर विश्वास पर आक्रमण करता और उसे उलट देना चाहता है।
परन्तु यहाँ कोई कहेगा: यदि विश्वासी के हृदय में ऐसा सन्देह निश्चय के साथ मिला है, तो क्या हम सदा इसी निष्कर्ष पर नहीं लौटते कि विश्वास के पास परमेश्वर की इच्छा का कोई निश्चित और स्पष्ट ज्ञान नहीं है, केवल एक धुँधला और उलझा हुआ ज्ञान है? मैं उत्तर देता हूँ, नहीं। क्योंकि यद्यपि हम भाँति-भाँति के विचारों से विचलित होते हैं, इससे यह नहीं निकलता कि हम विश्वास से अलग हो गए। यदि हम अविश्वास के आक्रमणों से इधर-उधर धकेले जाते हैं, तो इससे यह नहीं निकलता कि हम उसकी अथाह खाई में फेंक दिए गए। यदि हम हिलाए जाते हैं, तो इसका अर्थ यह नहीं कि हम गिर जाते हैं। क्योंकि इस युद्ध का परिणाम सदा यही होता है कि विश्वास उन कठिनाइयों से ऊपर उठ जाता है जिनसे वह घेरा जाता है, तब भी जब वह संकट में दिखाई देता है।
संक्षेप में, जैसे ही हमारे प्राणों में विश्वास की कल्पनीय सबसे छोटी बूँद भी डाली जाती है, हम तुरन्त परमेश्वर के मुख को अपने प्रति कृपालु और अनुकूल देखने लगते हैं। यह सच है कि हम उसे दूर से देखते हैं, फिर भी ऐसी निश्चित दृष्टि से कि हम जानते हैं कि उसमें कोई धोखा नहीं है। इसके पश्चात्, जैसे-जैसे हम उन्नति करते हैं—और हमें निरन्तर उन्नति करनी चाहिए—हम आगे बढ़ते और निकट आते हैं, ताकि हमारी दृष्टि और निश्चित होती जाए। इसके अतिरिक्त, निरन्तर मनन से यह ज्ञान हमारे लिए अधिक परिचित हो जाता है।
इस प्रकार हम देखते हैं कि बुद्धि, जब पहले-पहल परमेश्वर के ज्ञान से प्रकाशित होती है, तब बड़े अज्ञान में लिपटी रहती है, जो धीरे-धीरे दूर होता जाता है। फिर भी न तो उसका अज्ञान और न उसकी दृष्टि की धुँधलाहट उसे परमेश्वर की इच्छा के स्पष्ट ज्ञान का आनन्द लेने से रोकती है। यह विश्वास का पहला और मुख्य बिन्दु है।
यह ऐसा है मानो कोई गहरे बन्दीगृह में बन्द मनुष्य सूर्य का प्रकाश केवल ऊँची और संकरी खिड़की से परोक्ष और अधूरे रूप में पाता हो। उसे सूर्य का पूरा और बेरोक दर्शन तो न होगा, फिर भी उसके पास उसका निश्चित प्रकाश होगा और वह उसका लाभ पाएगा। इसी प्रकार, यद्यपि हम इस पार्थिव देह के बन्दीगृह में बन्द हैं और चारों ओर से बहुत अन्धकार से घिरे हैं, तथापि यदि हमारे पास परमेश्वर के प्रकाश की छोटी-से-छोटी चिंगारी भी है जो हम पर उसकी दया को प्रकट करती है, तो हम दृढ़ निश्चय रखने के लिए पर्याप्त रूप से प्रकाशित हैं।
ये दोनों बातें प्रेरित के द्वारा अनेक स्थानों पर हमें स्पष्ट दिखाई गई हैं। क्योंकि जब वह कहता है:
"हम अंश-अंश में जानते हैं, और अंश-अंश में भविष्यद्वाणी करते हैं," और, "अब हम दर्पण में धुँधला-सा देखते हैं।"
—1 कुरिन्थियों 13:9, 12 तो वह सूचित करता है कि इस वर्तमान जीवन में हमें ईश्वरीय बुद्धि का कितना छोटा अंश दिया गया है। फिर भी अन्यत्र वह दिखाता है कि ऐसे ज्ञान की छोटी-से-छोटी बूँद में भी कितना बड़ा निश्चय निहित है, और साक्षी देता है कि सुसमाचार के द्वारा:
"हम खुले मुख और बिना रुकावट परमेश्वर की महिमा को देखते हैं, और उसी स्वरूप में बदलते जाते हैं।" —2 कुरिन्थियों 3:18
ऐसे अज्ञान के बीच बहुत-से सन्देहों और भयों का होना वास्तव में अनिवार्य है, विशेषकर इसलिए कि हमारा हृदय स्वभाव से अविश्वास की ओर झुका हुआ है। इसके अतिरिक्त, असंख्य और भाँति-भाँति की परीक्षाएँ उठती हैं, जो घड़ी-घड़ी हम पर आश्चर्यजनक आक्रमण करती हैं। सबसे बढ़कर विवेक, अपने पापों के भार से दबा हुआ, कभी अपने भीतर शिकायत और कराह करता है, कभी अपने आप को दोषी ठहराता है, कभी चुपचाप बेधा जाता है, और कभी खुलकर पीड़ित किया जाता है।
इसलिए चाहे विपत्तियाँ परमेश्वर के क्रोध का कुछ आभास दें या विवेक को अपने भीतर ही उसका कारण मिल जाए, अविश्वास इन्हीं बातों से शस्त्र सज्जित होकर विश्वास से लड़ता है। वह अपने सारे हथियार इसी ओर साधता है: कि हम यह सोचें कि परमेश्वर हमारे विरुद्ध है और हम पर क्रोधित है, ताकि हम उससे किसी भलाई की आशा न रखें और उसे अपना प्राणघातक शत्रु जानकर उससे डरें।
ऐसे आक्रमणों का सामना करने के लिए विश्वास परमेश्वर के वचन से सज्जित होता है। जब उस पर यह परीक्षा आती है कि परमेश्वर हमारे विरुद्ध और हमारा शत्रु है क्योंकि वह हमें दुःख देता है, तब विश्वास उसके विरुद्ध यह बचाव खड़ा करता है: कि हमें दुःख देते हुए भी वह दयालु है, क्योंकि उसकी ताड़नाएँ क्रोध से नहीं, प्रेम से उत्पन्न होती हैं। जब उस पर इस विचार से आक्रमण होता है कि परमेश्वर धर्मी न्यायी है जो सब अधर्म को दण्ड देता है, तब वह यह ढाल ऊँची करता है: कि हर पाप के लिए दया तैयार है, जब कभी पापी प्रभु की कृपा की ओर फिरता है।
इस रीति से, विश्वासी प्राण चाहे कितनी ही कठोरता से पीड़ित किया जाए, अन्त में वह हर कठिनाई पर जयवन्त होता है। वह कभी अपने भरोसे को, जो परमेश्वर की दया पर है, अपने से छिनने या हिलाए जाने नहीं देता। वरन् वे सब सन्देह जिनसे वह जाँचा जाता है, उस भरोसे के और भी बड़े निश्चय में बदल जाते हैं।
हम इसका अनुभव सन्तों में करते हैं, जो जब अपने आप को परमेश्वर के बदले से कठोरता से दबा हुआ देखते हैं, तब भी अपनी शिकायतें उसी से कहते रहते हैं। जब ऐसा दिखाई देता है कि उनकी सुनी ही नहीं जाएगी, तब भी वे उसे पुकारते रहते हैं। क्योंकि वे उससे शिकायत क्यों करते जिससे वे कोई राहत की आशा नहीं रखते? और वे उसे पुकारने के लिए कैसे प्रेरित होते यदि उन्हें उससे कुछ सहायता पाने की आशा न होती?
इसी प्रकार, वे चेले जिनके विश्वास की दुर्बलता को यीशु मसीह ने डाँटा, चिल्ला उठे कि हम नाश हुए जाते हैं, फिर भी उन्होंने उससे सहायता की विनती की:
"हे प्रभु, हमें बचा, हम नाश हुए जाते हैं।"
इसलिए हम फिर वही कहते हैं जो ऊपर कहा गया: कि विश्वास की जड़ विश्वासी के हृदय से कभी पूरी तरह उखाड़ी नहीं जाती, वरन् सदा वहाँ दृढ़ता से जमी रहती है, यद्यपि हिलाए जाने पर वह इधर-उधर झुकती दिखाई दे सकती है। उसकी ज्योति कभी इतनी पूरी तरह नहीं बुझती कि कम-से-कम कोई चिंगारी सदा बची न रहे। अय्यूब यह दिखाता है जब वह कहता है:
"चाहे वह मुझे घात भी करे, तौभी मैं उस पर आशा रखूँगा।"
क्योंकि सन्तों के पास निराश होने का इससे बड़ा कारण कभी नहीं होता जितना तब, जब वे परमेश्वर के हाथ को अपने नाश के लिए उठा हुआ अनुभव करते हैं, जैसा कि वे वस्तुओं की वर्तमान दशा से निर्णय कर सकते हैं।
भय और थरथराहट की एक और प्रकार भी है, जिससे विश्वास का निश्चय घटने से तो दूर, उलटा दृढ़ होता है। ऐसा तब होता है जब विश्वासी दुष्टों पर परमेश्वर के प्रतिशोध के उदाहरणों को अपने लिए चेतावनी समझते हैं, ताकि वे वही अपराध करके परमेश्वर का क्रोध न भड़काएँ, और इसलिए बुराई करने से और अधिक सावधानी से बचे रहें।
या फिर, जब वे अपनी दुर्दशा को पहचानते हैं, तब वे पूर्णतः परमेश्वर पर निर्भर रहना सीखते हैं, जिसके बिना वे अपने आप को हवा के झोंके से भी अधिक निर्बल और अस्थिर देखते हैं। क्योंकि जब प्रेरित, उन ताड़नाओं को बताकर जो परमेश्वर ने इस्राएल के लोगों पर भेजी थीं, कुरिन्थियों को चेतावनी देता है कि वे उन्हीं पापों में न पड़ें, तो वह किसी रीति से उनके भरोसे को नहीं उलटता। वह केवल उन्हें उनके आलस्य से जगाता है, जो प्रायः विश्वास को स्थिर करने के बदले उसे दबा देता है।
इसी प्रकार, जब वह यहूदियों के विनाश से अवसर लेकर उस व्यक्ति को जो खड़ा है चेताता है कि सावधान रहे कि कहीं गिर न पड़े, तब वह हमें यह आज्ञा नहीं देता कि हम अपनी स्थिरता के विषय में अनिश्चित होकर डगमगाएँ। वह केवल अपनी सामर्थ्य पर सब अहंकार और उतावले भरोसे को दूर करता है, ताकि हम अन्यजाति के लोग उन यहूदियों पर, जिनका स्थान हमने लिया है, डींग न मारें:
"अभिमानी न बन, परन्तु भय मान।"
इसी प्रकार, जब वह हमें सिखाता है कि अपने उद्धार का कार्य भय और थरथराहट के साथ पूरा करो:
"अपने उद्धार का कार्य भय और थरथराहट के साथ पूरा करते जाओ।"
तो वह इसके सिवा और कुछ नहीं माँगता कि हम अपने विषय में गहरी दीनता रखकर प्रभु की सामर्थ्य पर भरोसा रखने के अभ्यस्त हो जाएँ।
कोई बात हमें अपने विश्वास के निश्चय और भरोसे को परमेश्वर पर स्थिर करने के लिए उतने बल से प्रेरित नहीं कर सकती जितना अपने आप पर अविश्वास और अपनी दुर्दशा को पहचानने के बाद अनुभव की गई व्यथा। इसी अर्थ में हमें भविष्यद्वक्ता के इन शब्दों को समझना चाहिए:
"मैं तो तेरी अपार करुणा के कारण तेरे भवन में आऊँगा, और भय के साथ वहाँ दण्डवत् करूँगा।"
यहाँ वह बहुत उचित रीति से विश्वास के उस साहस को, जो परमेश्वर की दया पर टिका है, उस भय और पवित्र थरथराहट से जोड़ता है जिससे हमें प्रभावित होना चाहिए जब कभी हम परमेश्वर की महिमा के सम्मुख आते हैं और उसके तेज से अपने भीतर की अशुद्धता को देखते हैं।
इसलिए सुलैमान सच कहता है:
"क्या ही धन्य है वह मनुष्य जो निरन्तर अपने हृदय में भय रखता है, परन्तु जो अपना हृदय कठोर कर लेता है वह विपत्ति में पड़ेगा।"
उसका अर्थ ऐसे भय से है जो हमें और अधिक चौकस और विवेकी बनाता है, ऐसे भय से नहीं जो हमें निराशा की हद तक पीड़ित करे। यह तब होता है जब हमारा साहस, अपने भीतर घबराया हुआ, परमेश्वर में सान्त्वना पाता है; अपने में गिराया हुआ, उसमें उठाया जाता है; अपने आप पर अविश्वास करता हुआ, उस आशा में दृढ़ खड़ा रहता है जो वह उसमें रखता है। इसलिए विश्वासियों के लिए भय और थरथराहट का अनुभव करना और साथ ही सबसे निश्चित सान्त्वना का आनन्द लेना कोई बाधा नहीं है, क्योंकि एक ओर वे अपनी व्यर्थता पर विचार करते हैं और दूसरी ओर परमेश्वर की सच्चाई को देखते हैं।
परमेश्वर का भय, जो सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र में विश्वासियों के विषय में कहा गया है और जिसे कभी बुद्धि का आरम्भ और कभी स्वयं बुद्धि कहा जाता है, एक ही है, फिर भी वह दोहरी भावना से उत्पन्न होता है। क्योंकि परमेश्वर पिता और स्वामी, दोनों के योग्य आदर रखता है। इसलिए जो कोई ठीक रीति से उसका सम्मान करना चाहे, वह उसके प्रति आज्ञाकारी पुत्र और अपना कर्तव्य निभाने को तत्पर दास के समान चलने का यत्न करेगा।
अपने भविष्यद्वक्ता के द्वारा परमेश्वर उस आज्ञाकारिता को, जो हमारे पिता के रूप में उसे दी जाती है, "आदर" कहता है, और उस सेवा को, जो हमारे स्वामी के रूप में उसकी की जाती है, "भय" कहता है:
"पुत्र पिता का आदर करता है, और दास अपने स्वामी का। यदि मैं पिता हूँ, तो मेरा आदर कहाँ है? और यदि मैं स्वामी हूँ, तो मेरा भय कहाँ है?"
फिर भी, यद्यपि वह दोनों में भेद करता है, तथापि आरम्भ में उन्हें "आदर" शब्द के अन्तर्गत दोनों को समेटकर जोड़ देता है। इसलिए परमेश्वर का भय हमारे लिए ऐसे आदर और भय से मिली हुई श्रद्धा हो। यह आश्चर्य की बात नहीं कि एक ही हृदय दोनों भावनाओं को एक साथ ग्रहण करे।
यह सच है कि जो व्यक्ति विचार करता है कि परमेश्वर हमारे लिए कैसा पिता है, उसके पास यथेष्ट कारण है—चाहे नरक होता ही नहीं—कि वह उसे अप्रसन्न करने से मृत्यु से भी अधिक डरे। फिर भी, दूसरी ओर, क्योंकि हमारा शरीर बुराई करने में सब रोक-टोक उतार फेंकने की ओर प्रवृत्त है, इसलिए उसे रोकने के लिए यह विचार मन में रखना आवश्यक है: कि प्रभु, जिसके अधिकार में हम हैं, सब अधर्म से घृणा करता है, और जो दुष्टता से जीकर उसका क्रोध भड़काते हैं वे उसके प्रतिशोध से न बचेंगे।
यूहन्ना जो कहता है वह इसके विरुद्ध नहीं है:
"प्रेम में भय नहीं होता, वरन् सिद्ध प्रेम भय को दूर कर देता है।"
क्योंकि वह उस थरथराहट की बात कर रहा है जो अविश्वास से उत्पन्न होती है, जिससे विश्वासियों का भय बहुत दूर है। दुष्ट परमेश्वर से इसलिए नहीं डरते कि उसे अप्रसन्न करने से घबराते हैं, यदि वे बिना दण्ड के ऐसा कर सकते। वरन् इसलिए कि वे जानते हैं कि उसके पास प्रतिशोध लेने की सामर्थ्य है, जब कभी उनके सामने उसके क्रोध की चर्चा होती है, वे भय से सिकुड़ जाते हैं। वास्तव में वे उसके क्रोध से इसलिए डरते हैं कि वे उसे निकट समझते हैं और घड़ी-घड़ी आशंका करते हैं कि वह उन पर पड़कर उन्हें कुचल देगा।
इसके विपरीत विश्वासी, जैसा कहा गया है, दण्ड से अधिक उसे अप्रसन्न करने से डरते हैं। वे दण्ड के भय से इस प्रकार आतंकित नहीं होते मानो नरक पहले से उपस्थित होकर उन्हें निगलने को हो, परन्तु उस भय से वे अपने आप को संकट में डालने से पीछे हट जाते हैं। इसलिए जब प्रेरित विश्वासियों से बात करता है, तो कहता है:
"कोई तुम्हें इन बातों के विषय में धोखा न दे, क्योंकि इन्हीं के कारण परमेश्वर का क्रोध आज्ञा न माननेवाली सन्तानों पर भड़कता है।"
वह यह धमकी नहीं देता कि परमेश्वर का क्रोध उन पर उतरेगा। वरन् वह उन्हें विचार करने को उभारता है कि परमेश्वर का क्रोध उन पापों के कारण दुष्टों के लिए तैयार है जिनका उसने अभी वर्णन किया, ताकि वे उनके पीछे चलने का साहस न करें और इस प्रकार उसी विनाश में न पड़ें।
इसके अतिरिक्त, परमेश्वर की उस सद्भावना से, जिस पर हम कहते हैं कि विश्वास दृष्टि रखता है, हमें यह समझना चाहिए कि हम उद्धार और अनन्त जीवन का अधिकार पाते हैं। क्योंकि यदि परमेश्वर के हम पर कृपालु होने पर हमें किसी बात की घटी नहीं हो सकती, तो हमारे उद्धार के निश्चय के लिए इतना ही पर्याप्त होना चाहिए कि परमेश्वर हमें अपने प्रेम का आश्वासन देता है। जैसा भविष्यद्वक्ता कहता है:
"अपने मुख का प्रकाश चमका, तब हमारा उद्धार होगा।"
इसलिए पवित्रशास्त्र हमारे उद्धार का सार इसी में रखता है: कि प्रभु ने सब बैर को मिटाकर हमें अपने अनुग्रह में ग्रहण कर लिया है:
"वही हमारी शान्ति है, जिसने बैर को मिटा दिया, ताकि हमें परमेश्वर से मिला दे।"
इससे वह सूचित करता है कि जब परमेश्वर हमसे मेल कर चुका, तो कोई ऐसा संकट शेष नहीं रहता जो सब बातों को हमारी भलाई के लिए बदलने से रोक सके। इसलिए परमेश्वर के प्रेम को ग्रहण करके विश्वास अपने भीतर इस वर्तमान और आनेवाले जीवन की प्रतिज्ञाओं को, और हर भली वस्तु के दृढ़ आश्वासन को समेट लेता है—ऐसे आश्वासन को, अर्थात्, जैसा सुसमाचार के वचन से प्राप्त हो सकता है।
क्योंकि विश्वास निश्चय ही इस वर्तमान जीवन में न लम्बी आयु, न बड़े मान-सम्मान, न धन की बहुतायत अपने लिए वचन देता है, क्योंकि प्रभु ने इनमें से किसी की गारण्टी हमें देना नहीं चाहा। वरन् वह इस निश्चय से सन्तुष्ट है: कि यद्यपि इस जीवन के बहुत-से सहारे हमसे छूट जाएँ, परमेश्वर हमें कभी न छोड़ेगा। उसका मुख्य आश्वासन आनेवाले जीवन की आशा पर टिका है, जिसे परमेश्वर के वचन ने हमारे लिए सब अनिश्चितता से परे कर दिया है।
जो विपत्ति और दुर्दशा उन पर आए जिन्हें हमारे प्रभु ने एक बार अपने प्रेम में ग्रहण कर लिया, वह इसमें बाधा नहीं बन सकती कि केवल परमेश्वर की सद्भावना ही उनका पूर्ण परमानन्द हो। इसलिए जब हम सब परमानन्द का सार व्यक्त करना चाहते थे, तब हमने परमेश्वर के अनुग्रह को उस सोते के रूप में प्रस्तुत किया जिससे हर प्रकार की भलाई हमारी ओर बहती है। यह सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र में सहज ही देखा जाता है, जो सदा हमें परमेश्वर के प्रेम की ओर लौटा ले जाता है, चाहे वह केवल अनन्त उद्धार की नहीं, वरन् हमारे पास की किसी भी भली वस्तु की बात करे। इसी कारण दाऊद साक्षी देता है कि परमेश्वर की भलाई, जब विश्वासी हृदय के द्वारा अनुभव की जाती है, जीवन से भी अधिक मधुर और वांछनीय है:
"तेरी करुणा जीवन से भी उत्तम है।"
हम निःशुल्क प्रतिज्ञा को विश्वास की नींव इसलिए बनाते हैं कि विश्वास वास्तव में उसी पर टिकता है। क्योंकि यद्यपि विश्वास परमेश्वर को हर बात में और हर स्थान पर सत्यवादी मानता है—चाहे वह आज्ञा दे, मना करे, प्रतिज्ञा करे या धमकी दे—और यद्यपि वह उसकी आज्ञाओं को आज्ञाकारिता से ग्रहण करता, उसके निषेधों का पालन करता और उसकी धमकियों से डरता है, तथापि, ठीक-ठीक कहें तो, वह प्रतिज्ञा से आरम्भ होता है, उसी पर टिकता है और उसी में समाप्त होता है। क्योंकि विश्वास परमेश्वर में जीवन खोजता है, और जीवन आज्ञाओं या धमकियों में नहीं मिलता, वरन् केवल दया की प्रतिज्ञा में—और वह प्रतिज्ञा निःशुल्क होनी चाहिए।
क्योंकि सशर्त प्रतिज्ञाएँ, जहाँ तक वे हमें हमारे कर्मों की ओर लौटाती हैं, जीवन की प्रतिज्ञा तभी करती हैं जब हम उसे अपने भीतर पाएँ। इसलिए यदि हम नहीं चाहते कि विश्वास काँपे और इधर-उधर डगमगाए, तो हमें उसे उद्धार की ऐसी प्रतिज्ञा पर थामना चाहिए जो हमारी दुर्दशा को देखकर, हमारी योग्यता को नहीं, प्रभु की ओर से हमें निःशुल्क और निरे उदार भाव से दी गई हो।
इसी कारण प्रेरित सुसमाचार को "विश्वास का वचन" यह विशेष उपाधि देता है:
"यह विश्वास का वचन है जो हम प्रचार करते हैं।"
वह यह उपाधि न व्यवस्था की आज्ञाओं को देता है, न प्रतिज्ञाओं को, क्योंकि विश्वास को कोई बात दृढ़ नहीं कर सकती सिवा इस सन्देश के जो परमेश्वर की भलाई से भेजा गया है, जिसके द्वारा वह जगत को अपने साथ मिलाता है। इसी से वह मेल उत्पन्न होता है जो वह प्रायः विश्वास और सुसमाचार के बीच स्थापित करता है, जैसे जब वह कहता है:
"उसके द्वारा हमें अनुग्रह और प्रेरिताई मिली, कि विश्वास से आज्ञाकारिता उत्पन्न हो।"
फिर:
"सुसमाचार हर एक विश्वास करनेवाले के लिए उद्धार के निमित्त परमेश्वर की सामर्थ्य है।"
और फिर:
"उसमें परमेश्वर की धार्मिकता विश्वास से विश्वास के लिए प्रगट होती है।"
इसमें आश्चर्य नहीं। क्योंकि चूँकि सुसमाचार परमेश्वर के साथ हमारे मेल-मिलाप की सेवकाई है, इसलिए हमारे प्रति परमेश्वर की सद्भावना की, जिसका ज्ञान विश्वास में अपेक्षित है, कोई दूसरी पर्याप्त साक्षी नहीं है:
"परमेश्वर ने हमें मेल-मिलाप की सेवकाई सौंपी है, यह घोषणा करते हुए कि परमेश्वर मसीह में होकर जगत को अपने साथ मिला रहा था।" —2 कुरिन्थियों 5:18–19
इसलिए जब हम कहते हैं कि विश्वास को निःशुल्क प्रतिज्ञाओं पर टिकना चाहिए, तब हम इससे इनकार नहीं करते कि विश्वासी परमेश्वर के वचन को उसके सब भागों में ग्रहण करते और उसका आदर करते हैं। वरन् हम दया की प्रतिज्ञा को विश्वास का उचित विषय ठहराते हैं।
विश्वासियों को निश्चय ही परमेश्वर को कुकर्मियों का न्यायी और दण्ड देनेवाला मानना चाहिए। फिर भी वे विशेषकर उसकी कृपा पर दृष्टि रखते हैं, क्योंकि उसका वर्णन उनके सामने इस प्रकार किया गया है:
"वह भला और दयालु है, क्रोध करने में धीमा और भलाई में अति प्रचुर, सब पर अनुग्रहकारी, और अपने सब कामों पर दया करनेवाला।"
—भजन संहिता 86:5, 15; 145:8–9
इसके अतिरिक्त, हम सब प्रतिज्ञाओं को मसीह में समेटते हैं तो बिना कारण नहीं, क्योंकि प्रेरित सम्पूर्ण सुसमाचार को उसके ज्ञान में समाविष्ट कर लेता है। एक अन्य स्थान पर वह सिखाता है:
"परमेश्वर की सब प्रतिज्ञाएँ उसी में 'हाँ' और उसी में 'आमीन' हैं।"
अर्थात् वे उसी में पक्की ठहरती हैं। इसका कारण स्पष्ट है। क्योंकि प्रभु जो कोई भलाई की प्रतिज्ञा करता है, उससे वह अपनी सद्भावना की साक्षी देता है, ऐसा कि उसकी ओर से कोई प्रतिज्ञा नहीं जो उसके प्रेम की साक्षी न हो।
इससे यह खण्डित नहीं होता कि दुष्ट लोग उसके हाथ से जितने अधिक लाभ पाते हैं, उतने ही अधिक दोषी बनते हैं और उतना ही कठोर न्याय अपने ऊपर लाते हैं। क्योंकि चूँकि वे न तो इस पर विचार करते हैं और न मानते हैं कि जो आशीषें उनके पास हैं वे परमेश्वर के हाथ से उन्हें मिलती हैं—या यदि मानते भी हैं, तो उसकी भलाई पर अपने हृदय में मनन नहीं करते—इसलिए वे उसकी सच्चाई को उससे अधिक नहीं समझ सकते जितना पशु, जो अपने दिए गए स्वभाव के अनुसार उसकी उदारता का वही फल बिना कुछ माने पा लेते हैं।
न ही हमारे कहे का यह खण्डन करता है कि अपने लिए कही गई प्रतिज्ञाओं को ठुकराकर वे अपने विरुद्ध और कठोर प्रतिशोध इकट्ठा करते हैं। क्योंकि यद्यपि प्रतिज्ञाओं की सामर्थ्य अन्ततः तब प्रकट होती है जब हम उन्हें ग्रहण करते हैं, तथापि उनकी सच्चाई और यथार्थ स्वरूप हमारे अविश्वास या कृतघ्नता से कभी नहीं बुझता।
इसलिए, क्योंकि प्रभु अपनी प्रतिज्ञाओं से मनुष्यों को न केवल अपनी भलाई के फल ग्रहण करने के लिए, वरन् उन्हें पहचानने और मूल्यवान जानने के लिए भी बुलाता और आमन्त्रित करता है, वह उसी प्रकार उनके प्रति अपने प्रेम की घोषणा भी करता है। इसलिए हमें इसी बिन्दु पर लौटना चाहिए: हर प्रतिज्ञा हमारे प्रति परमेश्वर के प्रेम की साक्षी है।
अब यह निर्विवाद है कि मसीह से बाहर परमेश्वर किसी से प्रेम नहीं करता, क्योंकि वह प्रिय पुत्र है जिसमें पिता का स्नेह ठहरा है:
"यह मेरा प्रिय पुत्र है, जिससे मैं अति प्रसन्न हूँ।" —मत्ती 17:5
इसलिए यह प्रेम हमारे पास उसी के द्वारा आना चाहिए। इसी कारण प्रेरित उसे हमारी शान्ति कहता है:
"वही हमारी शान्ति है।"
और एक अन्य स्थान पर वह उसे उस बन्धन के रूप में प्रस्तुत करता है जिससे पिता की सद्भावना हमसे जुड़ती है:
"कोई वस्तु हमें परमेश्वर के उस प्रेम से, जो हमारे प्रभु मसीह यीशु में है, अलग न कर सकेगी।"
इससे यह निकलता है कि जब कभी हमें कोई प्रतिज्ञा दी जाए, हमें सदा मसीह की ओर देखना चाहिए। इसलिए पौलुस ठीक कहता है जब वह सिखाता है कि परमेश्वर की सब प्रतिज्ञाएँ उसी में पक्की और पूरी होती हैं।
यह नंगी घोषणा कि हमारे पास परमेश्वर का वचन है, निश्चय ही हमारे भीतर विश्वास उत्पन्न करने के लिए पर्याप्त होनी चाहिए थी, यदि हमारा अन्धापन और हठ उसे न रोकता। परन्तु क्योंकि हमारा मन व्यर्थता की ओर झुका है, वह परमेश्वर की सच्चाई से कभी चिपक नहीं सकता; और क्योंकि वह जड़ हो गया है, वह उसके प्रकाश को नहीं देख सकता। इसलिए पवित्र आत्मा के प्रकाश के बिना वचन अपने आप कुछ लाभ नहीं पहुँचाता। इससे प्रत्यक्ष है कि विश्वास सारी मानवीय बुद्धि से ऊपर है।
न ही यह पर्याप्त है कि बुद्धि परमेश्वर के आत्मा से प्रकाशित हो, जब तक हृदय भी उसकी सामर्थ्य से दृढ़ न किया जाए। इस विषय में सॉरबोन के धर्मशास्त्री अत्यन्त गम्भीर भूल करते हैं, क्योंकि वे सोचते हैं कि विश्वास केवल परमेश्वर के वचन से वह सहमति है जो बुद्धि में रहती है, और हृदय के भरोसे और निश्चय को पीछे छोड़ देते हैं।
इसलिए विश्वास दो बातों में परमेश्वर का अनुपम दान है: पहला, क्योंकि मानव-बुद्धि को परमेश्वर की सच्चाई को समझने के लिए प्रकाशित किया जाता है; और फिर क्योंकि हृदय उस सच्चाई में दृढ़ किया जाता है।
यह कहना कि कोई मसीह पर विश्वास नहीं कर सकता सिवा उस व्यक्ति के जिसे यह विशेष रूप से दिया गया हो, वास्तव में संसार के लिए बहुत अनोखा मत है। यह कुछ तो इसलिए है कि मनुष्य यह नहीं सोचते कि स्वर्गीय बुद्धि कितनी ऊँची और समझने में कठिन है, और न यह कि परमेश्वर के भेदों को समझने में उनकी मन्दता और दुर्बलता कितनी बड़ी है। यह कुछ इसलिए भी है कि वे हृदय की उस दृढ़ता का ध्यान नहीं रखते जो विश्वास का प्रमुख अंग है।
इस भूल का खण्डन सहज है। क्योंकि, जैसा पौलुस कहता है:
"मनुष्यों में से कौन किसी मनुष्य की बातें जानता है, केवल मनुष्य की आत्मा जो उसमें है?"
तब कोई सृजा हुआ प्राणी परमेश्वर की इच्छा के विषय में निश्चित कैसे हो सकता है? और यदि परमेश्वर की सच्चाई उन बातों में भी हमें सन्देहपूर्ण लगती है जिन्हें हम अभी अपनी आँखों से देखते हैं, तो वह तब दृढ़ और निःसन्देह कैसे हो सकती है जब प्रभु हमसे ऐसी बातों की प्रतिज्ञा करता है जिन्हें आँख नहीं देखती और बुद्धि समझ नहीं सकती?
मानवीय बुद्धि यहाँ इतनी जड़ और भौंचक्की है कि प्रभु की पाठशाला में उन्नति करने का पहला कदम उसका त्याग करना है। क्योंकि उसके कारण, बीच में पड़े परदे के समान, हम परमेश्वर के उन भेदों को समझने से रोके जाते हैं जो केवल बच्चों पर प्रकट किए जाते हैं:
"तूने इन बातों को ज्ञानियों और समझदारों से छिपाया और बच्चों पर प्रगट किया।" —मत्ती 11:25; लूका 10:21
वास्तव में, मांस और लहू उन्हें प्रकट नहीं करते:
"मांस और लहू ने नहीं, परन्तु मेरे स्वर्गीय पिता ने यह तुझ पर प्रकट किया है।"
और स्वाभाविक मनुष्य आत्मिक बातों को समझने में असमर्थ है। वरन् परमेश्वर की शिक्षा उसके लिए मूर्खता है, क्योंकि वह केवल आत्मिक रीति से ही जानी जा सकती है:
"शारीरिक मनुष्य परमेश्वर के आत्मा की बातों को ग्रहण नहीं करता, क्योंकि वे उसके लिए मूर्खता की बातें हैं, और न वह उन्हें जान सकता है क्योंकि उनकी जाँच आत्मिक रीति से होती है।"
इसलिए यहाँ हमें पवित्र आत्मा की सहायता आवश्यक है—या यों कहें कि यहाँ केवल उसी की सामर्थ्य राज्य करती है।
"प्रभु का मन किसने जाना, या कौन उसका सलाहकार हुआ?"
परन्तु:
"आत्मा सब बातों को, वरन् परमेश्वर की गूढ़ बातों को भी जाँचता है," और उसी के द्वारा "हम में मसीह का मन है।" —1 कुरिन्थियों 2:10, 16
प्रभु यीशु कहता है:
"कोई मेरे पास नहीं आ सकता जब तक पिता, जिसने मुझे भेजा है, उसे खींच न ले। इसलिए हर एक जिसने पिता से सुना और सीखा है, वह मेरे पास आता है—यह नहीं कि किसी ने पिता को देखा है, केवल उसने जो परमेश्वर की ओर से भेजा गया है।"
इसलिए, जैसे हम मसीह के पास तब तक नहीं पहुँच सकते जब तक परमेश्वर के आत्मा से खींचे न जाएँ, वैसे ही जब हम खींचे जाते हैं तो अपनी ही समझ से पूरी तरह ऊपर उठा लिए जाते हैं। क्योंकि प्राण, उसके द्वारा प्रकाशित होकर, मानो एक नई आँख पाता है जिससे वह स्वर्गीय भेदों को निहारता है, जिनके तेज से पहले उसकी आँखें चौंधिया जाती थीं।
इस प्रकार जब मानव-बुद्धि पवित्र आत्मा के प्रकाश से ज्योतिर्मय होती है, तब वह परमेश्वर के राज्य की उन बातों का स्वाद चखने लगती है जिनका पहले उसे कोई बोध नहीं हो सकता था। इसलिए यद्यपि हमारे प्रभु यीशु मसीह ने लूका द्वारा बताए गए उन दो चेलों को अपने राज्य के भेद अत्यन्त स्पष्ट और यथार्थ रीति से समझाए, तथापि वह कुछ सिद्ध नहीं कर पाया जब तक कि:
"उसने उनकी बुद्धि खोल न दी कि वे पवित्रशास्त्र को समझें।" —लूका 24:45
इसी प्रकार, जब प्रेरित उसके दिव्य मुख से शिक्षा पा चुके थे, तब भी आवश्यक था कि सत्य का आत्मा उनके पास भेजा जाए, ताकि वह उस शिक्षा को, जो उन्होंने पहले कानों से सुनी थी, उनकी बुद्धि में प्रवेश दिलाए:
"जब सत्य का आत्मा आएगा, तो वह तुम्हें सारे सत्य का मार्ग बताएगा।"
परमेश्वर का वचन सूर्य के समान है, क्योंकि वह उन सब पर चमकता है जिन्हें उसका प्रचार किया जाता है, परन्तु अन्धों के बीच निष्फल रहता है। अब हम सब इस विषय में स्वभाव से अन्धे हैं। इसलिए वचन हमारे मनों में प्रवेश नहीं कर सकता जब तक परमेश्वर का आत्मा, जो भीतरी शिक्षक है, अपने प्रकाश से उसे प्रवेश न दिलाए।
अतः शेष यह रहता है कि जो बुद्धि ने ग्रहण किया है वह हृदय में रोपा जाए। क्योंकि यदि परमेश्वर का वचन केवल सिर में फड़फड़ाता रहे, तो वह अभी विश्वास के द्वारा ग्रहण नहीं हुआ है। उसका सच्चा ग्रहण तभी होता है जब वह हृदय की गहराई में जड़ पकड़ ले, ताकि परीक्षा के हर आक्रमण का सामना करने और उसे हटाने के लिए अजेय गढ़ बन जाए।
अब, यदि यह सच है कि हमारे मन की उचित समझ परमेश्वर के आत्मा के प्रकाश से आती है, तो हृदय की ऐसी दृढ़ता में उसकी सामर्थ्य कहीं अधिक स्पष्टता से प्रकट होती है। क्योंकि हृदय में अविश्वास मन के अन्धेपन से अधिक है, और हृदय को आश्वासन देना बुद्धि को शिक्षा देने से अधिक कठिन है।
इसलिए पवित्र आत्मा मुहर का काम करता है, कि जो प्रतिज्ञाएँ उसने पहले हमारी बुद्धि पर अंकित कीं, उन्हीं को हमारे हृदयों पर अंकित करे, और बयाने के रूप में उन्हें पक्का और स्थिर करे। जैसा प्रेरित कहता है:
"विश्वास करने के बाद तुम पर प्रतिज्ञा किए हुए पवित्र आत्मा की छाप लगी, जो हमारी मीरास का बयाना है।"
क्या तुम देखते हो कि वह कैसे दिखाता है कि विश्वासियों के हृदयों पर पवित्र आत्मा की मानो मुहर लगाई गई है, और वह उसे प्रतिज्ञा का आत्मा क्यों कहता है, क्योंकि वह सुसमाचार को हमारे लिए निश्चित बनाता है? इसी प्रकार वह कुरिन्थियों से कहता है:
"परमेश्वर ही ने हमें अभिषेक किया, और हम पर छाप भी लगाई, और बयाने में आत्मा को हमारे हृदयों में दिया।"
फिर, एक अन्य स्थान पर, हमारी आशा के भरोसे और साहस की चर्चा करते हुए वह उसकी नींव आत्मा के बयाने में रखता है:
"जिसने हमें इसी बात के लिए तैयार किया वह परमेश्वर है, जिसने हमें आत्मा का बयाना दिया।"
इससे हम जान सकते हैं कि सोफिस्ट धर्मशास्त्रियों की शिक्षा कितनी घातक है जब वे सिखाते हैं कि हम अपने भीतर परमेश्वर के अनुग्रह के विषय में नैतिक अनुमान के सिवा और कुछ निश्चित नहीं कर सकते, उसी के अनुसार कि हर कोई अपने आप को उसके अयोग्य नहीं समझता।
निश्चय ही, यदि हमें अपने कर्मों से यह निर्णय करना हो कि परमेश्वर का हमारे प्रति कैसा भाव है, तो मैं मानता हूँ कि हम उसे छोटे-से-छोटे अनुमान से भी नहीं समझ सकते। परन्तु क्योंकि विश्वास को परमेश्वर की सरल और निःशुल्क प्रतिज्ञा के अनुरूप होना चाहिए, इसलिए सन्देह के लिए कोई स्थान नहीं रह जाता। क्योंकि यदि हम यह सोचें कि परमेश्वर हम पर तभी कृपालु है जब हम उसकी कृपा के योग्य ठहरें, तो शैतान के विरुद्ध हम किस भरोसे से शस्त्र-सज्जित होंगे?
परन्तु क्योंकि हमने इस विषय के लिए अलग चर्चा रख छोड़ी है, इसलिए अभी हम इसे और आगे नहीं बढ़ाएँगे, विशेषकर इसलिए कि यह प्रत्यक्ष है कि विश्वास के लिए अनुमान, या सन्देह और अनिश्चितता के निकट किसी अन्य धारणा से अधिक विपरीत कुछ नहीं है।
इस भूल को पक्का करने के लिए वे सदा सभोपदेशक का एक अंश अपने होंठों पर रखते हैं, जिसे वे दुष्टता से बिगाड़ते हैं:
"कोई नहीं जानता कि वह बैर के योग्य है या प्रेम के।" —सभोपदेशक 9:1
यदि मैं इस बात को छोड़ भी दूँ कि इस वाक्य का प्रचलित अनुवाद में बुरा अनुवाद हुआ है, तब भी छोटे बच्चे देख सकते हैं कि सुलैमान क्या कहना चाहता था। उसका आशय यह है कि यदि कोई वर्तमान परिस्थितियों से यह निर्णय करने का यत्न करे कि परमेश्वर किससे प्रेम करता है और किससे बैर, तो वह व्यर्थ परिश्रम करेगा, क्योंकि सम्पन्नता और विपत्ति धर्मी और दुष्ट दोनों के लिए, परमेश्वर की सेवा करनेवाले और उसकी परवाह न करनेवाले दोनों के लिए, साझी हैं।
इससे यह निकलता है कि परमेश्वर उन लोगों के प्रति सदा अपना प्रेम प्रकट नहीं करता जिन्हें वह लौकिक रीति से समृद्ध करता है, न उन लोगों के प्रति अपना बैर घोषित करता है जिन्हें वह दुःख देता है। सुलैमान यह इसलिए कहता है कि मानव-बुद्धि की व्यर्थता को डाँटे, क्योंकि वह अत्यन्त महत्त्वपूर्ण विषयों पर विचार करते समय इतनी जड़ हो जाती है। जैसा उसने थोड़ी ही देर पहले कहा था, कोई यह नहीं पहचान सकता कि मनुष्य का प्राण पशु के प्राण से कैसे भिन्न है, क्योंकि प्रतीत होता है कि दोनों एक ही मृत्यु मरते हैं:
"जैसे एक मरता है, वैसे ही दूसरा भी मरता है।"
यदि कोई इससे यह निष्कर्ष निकालना चाहे कि मानव की अमरता के विषय में हमारी शिक्षा केवल अनुमान पर टिकी है, तो क्या हम उसे ठीक ही पागल नहीं ठहराएँगे? तो क्या ये लोग स्वस्थ बुद्धि के हैं जब वे यह तर्क देते हैं कि मनुष्यों में परमेश्वर के अनुग्रह का कोई निश्चय नहीं है, केवल इसलिए कि वह वर्तमान परिस्थितियों की शारीरिक जाँच से समझा नहीं जा सकता?
परन्तु वे यह दावा करते हैं कि ईश्वरीय इच्छा का निःसन्देह ज्ञान अपने लिए ठहराना उतावला दुस्साहस है। मैं उन्हें यह मान लेता यदि हम परमेश्वर की अथाह योजना को अपनी समझ की संकरी सीमाओं के अधीन करने का प्रयास करते। परन्तु जब हम केवल पौलुस के साथ कहते हैं:
"हमने इस संसार की आत्मा नहीं, परन्तु वह आत्मा पाया है जो परमेश्वर की ओर से है, कि हम उन बातों को जानें जो परमेश्वर ने हमें दी हैं।"
तो वे परमेश्वर के आत्मा का अपमान किए बिना इसके विरुद्ध क्या बुड़बुड़ा सकते हैं? यदि उसकी ओर से आनेवाले किसी भी प्रकाशन पर झूठ, अनिश्चितता या अस्पष्टता का सन्देह करना भयंकर अपवित्रता है, तो उसने जो हम पर प्रकट किया उसके निश्चय की पुष्टि करने में हम क्या भूल करते हैं?
परन्तु वे फिर यह दावा करते हैं कि हम इस प्रकार मसीह के आत्मा पर घमण्ड करने का साहस करके उतावली करते हैं। इसमें वे अपनी गहन मूर्खता प्रदर्शित करते हैं।
कौन कल्पना करेगा कि जो सारे संसार के शिक्षक बनना चाहते हैं, वे इतने अज्ञानी हो सकते हैं कि मसीही धर्म के प्रथम अक्षरों में ही इतनी भारी भूल करें? वास्तव में, यदि उनके लेख इसकी साक्षी न देते, तो मुझे यह अविश्वसनीय लगता।
पौलुस घोषणा करता है कि परमेश्वर की सन्तान वही हैं जो उसके आत्मा के चलाए चलते हैं:
"जितने परमेश्वर के आत्मा के चलाए चलते हैं, वे ही परमेश्वर के पुत्र हैं।"
ये लोग चाहते हैं कि परमेश्वर की सन्तान अपने ही आत्माओं से चलाई जाए जबकि वे परमेश्वर के आत्मा से खाली हों।
पौलुस सिखाता है कि हम परमेश्वर को अपना पिता नहीं कह सकते जब तक आत्मा यह पुकार हमारे भीतर अंकित न करे, क्योंकि केवल वही हमारे प्राणों को साक्षी दे सकता है कि हम परमेश्वर की सन्तान हैं:
"तुमने लेपालकपन का आत्मा पाया है, जिससे हम 'हे अब्बा, हे पिता' कहकर पुकारते हैं। आत्मा आप ही हमारी आत्मा के साथ गवाही देता है कि हम परमेश्वर की सन्तान हैं।"
ये लोग, यद्यपि हमें परमेश्वर को पुकारने से मना नहीं करते, हमें उस आत्मा से वंचित करते हैं जिसकी अगुवाई में हमें उसे पुकारना है।
पौलुस इनकार करता है कि जो मसीह के आत्मा से चलाया नहीं जाता, वह उसका है:
"यदि किसी में मसीह का आत्मा नहीं, तो वह उसका नहीं।" —रोमियों 8:9
ये लोग एक ऐसा मसीही धर्म गढ़ते हैं जिसे मसीह के आत्मा की आवश्यकता ही नहीं।
पौलुस हमें धन्य पुनरुत्थान की कोई आशा नहीं देता जब तक हम न जानें कि पवित्र आत्मा हमारे भीतर वास करता है:
"यदि उसका आत्मा, जिसने यीशु को मरे हुओं में से जिलाया, तुम में वास करता है, तो जिसने मसीह को मरे हुओं में से जिलाया, वह तुम्हारी मरणहार देहों को भी अपने उस आत्मा के द्वारा जिलाएगा जो तुम में बसा हुआ है।" —रोमियों 8:11
ये लोग ऐसे किसी भी ज्ञान से रिक्त आशा की कल्पना करते हैं।
सम्भवतः वे उत्तर देंगे कि वे पवित्र आत्मा की आवश्यकता से इनकार नहीं करते, परन्तु यह कि दीनता और नम्रता से हमें यह मान लेना चाहिए कि वह हमारे पास नहीं है। तो फिर प्रेरित का क्या अर्थ है जब वह कुरिन्थियों को आज्ञा देता है:
"अपने आप को जाँचो कि तुम में यीशु मसीह वास करता है या नहीं,"
और जोड़ता है कि जिसके पास यह ज्ञान नहीं, वह निकम्मा ठहरता है?
"क्या तुम अपने विषय में नहीं जानते कि यीशु मसीह तुम में है, यदि न हो कि तुम निकम्मे ठहरे हो?"
यूहन्ना भी इसी प्रकार कहता है:
"उस आत्मा से जो उसने हमें दिया है, हम जानते हैं कि वह हम में बना रहता है।"
और जब हम उसके आत्मा के बिना उसके सेवक होना चाहते हैं, तब हम यीशु मसीह की प्रतिज्ञाओं को सन्देह में डालने के सिवा और क्या करते हैं, जबकि उसने घोषणा की कि वह अपने सब लोगों पर उसे उण्डेलेगा?
"मैं अपना आत्मा सब प्राणियों पर उण्डेलूँगा।"
जब हम विश्वास को पवित्र आत्मा से अलग करते हैं, तो उसकी महिमा लूटने के सिवा और क्या करते हैं, जबकि विश्वास ठीक-ठीक उसी का कार्य है?
चूँकि ये बातें वे पहले पाठ हैं जो हमें अपने धर्म में सीखने चाहिए, इसलिए मसीहियों पर अहंकार का आरोप लगाना बड़ा अन्धापन है जब वे पवित्र आत्मा की उपस्थिति पर घमण्ड करते हैं, जिसके बिना कोई मसीही धर्म नहीं। वास्तव में, ये लोग अपने ही उदाहरण से प्रभु के उस कथन की सच्चाई प्रदर्शित करते हैं: कि उसका आत्मा संसार के लिए अज्ञात है और केवल उन्हीं के द्वारा जाना जाता है जिनमें वह वास करता है:
"संसार उसे ग्रहण नहीं कर सकता, क्योंकि वह न उसे देखता है और न जानता है; परन्तु तुम उसे जानते हो, क्योंकि वह तुम्हारे साथ रहता है और तुम में होगा।"
और ताकि वे विश्वास की नींवों को हर ओर से उलट दें, वे एक और दिशा से उन पर आक्रमण करते हैं। वे कहते हैं कि यद्यपि हम परमेश्वर के अनुग्रह का निर्णय उस धार्मिकता के अनुसार कर सकते हैं जिसमें हम अभी खड़े हैं, तथापि हमारी आशा का निश्चय फिर भी अधर में ही रहना चाहिए।
हमारे पास उद्धार का क्या ही सुन्दर भरोसा रहेगा यदि हम इससे अधिक कुछ न कर सकें कि उसे, जिसे वे "नैतिक अनुमान" कहते हैं, उसके द्वारा मान लें कि हम अभी परमेश्वर के अनुग्रह में हैं, जबकि हम नहीं जानते कि कल क्या होगा। प्रेरित इससे बहुत भिन्न रीति से बोलता है:
"मुझे निश्चय है कि न स्वर्गदूत, न शक्तियाँ, न प्रधानताएँ, न मृत्यु, न जीवन, न वर्तमान, न भविष्य की बातें, हमें उस प्रेम से, जिससे परमेश्वर यीशु मसीह में हमें गले लगाता है, अलग कर सकेंगी।"
वे एक निरर्थक उत्तर से बच निकलने का प्रयास करते हैं, यह कहकर कि प्रेरित को यह निश्चय किसी विशेष प्रकाशन से प्राप्त था। परन्तु वे उसके शब्दों में इतनी दृढ़ता से जकड़े हैं कि इतनी सरलता से नहीं निकल सकते। क्योंकि वहाँ वह उन आशीषों की चर्चा सामान्य रूप से सब विश्वासियों के लिए करता है जो विश्वास से उत्पन्न होती हैं, किसी ऐसी बात की नहीं जिसका अनुभव उसने केवल अपने ही व्यक्ति में किया।
"हाँ," वे कहते हैं, "परन्तु वह स्वयं हमारी दुर्बलता और अस्थिरता की याद दिलाकर हमें डराने का यत्न करता है, जब वह कहता है":
"जो समझता है कि मैं स्थिर हूँ, वह चौकस रहे कि कहीं गिर न पड़े।" —1 कुरिन्थियों 10:12
यह सच है। फिर भी वह हमें ऐसा भय नहीं देता जो हमें आतंकित करने के लिए हो, परन्तु केवल यह सिखाने के लिए कि हम परमेश्वर के सामर्थी हाथ के नीचे अपने आप को दीन करें, जैसा पतरस घोषणा करता है:
"इसलिए परमेश्वर के सामर्थी हाथ के नीचे दीन बनो।" —1 पतरस 5:6
इसके अतिरिक्त, विश्वास के निश्चय को समय की एक छोटी अवधि तक सीमित कर देना कैसी पागलपन की बात है, जबकि विश्वास का यही गुण है कि वह वर्तमान जीवन से आगे निकलकर भावी अमरता तक फैल जाता है?
इसलिए जब विश्वासी यह स्वीकार करते हैं कि यह परमेश्वर के अनुग्रह से है कि वे उसके आत्मा से प्रकाशित होकर विश्वास के द्वारा आनेवाले जीवन के दर्शन का आनन्द लेते हैं, तब ऐसा घमण्ड अहंकार के आरोप के योग्य होने से इतना दूर है कि जो कोई इसे मानने में लज्जित होता है वह नम्रता या दीनता से अधिक चरम कृतघ्नता प्रदर्शित करता है, क्योंकि वह परमेश्वर की उस भलाई को दबाता और धुँधला करता है जिसकी उसे बड़ाई करनी चाहिए।
इसी तर्क से सोफिस्टों के दो अन्य झूठ भी उलट जाते हैं। पहला उनका यह विचार है कि जब परमेश्वर के ज्ञान में कोई भली भावना जोड़ दी जाती है तब विश्वास "रूपयुक्त" होता है। दूसरा यह कि परमेश्वर के विषय में अज्ञान और ज्ञान की कमी को विश्वास का नाम देकर वे साधारण लोगों को धोखा देते हैं, और उन्हें समझाते हैं कि अज्ञान किसी को उसके पास होने से नहीं रोकता जिसे वे "अप्रकट विश्वास" कहते हैं।
जहाँ तक पहली बात का सम्बन्ध है, वे यथेष्ट स्पष्टता से दिखाते हैं कि वे परमेश्वर की सच्चाई को ग्रहण करने में विश्वास की सहमति का स्वभाव नहीं समझते, क्योंकि वे एक "अरूप विश्वास" गढ़ते हैं जो नंगी और निरर्थक सहमति से बना है। क्योंकि हम पहले ही घोषित कर चुके हैं कि विश्वास की सहमति मन की अपेक्षा हृदय की है, और केवल समझ की अपेक्षा भावनाओं की है।
इसी कारण विश्वास को आज्ञाकारिता कहा गया है, जिससे बढ़कर प्रभु और कोई सेवा नहीं ठहराता:
"यीशु मसीह के द्वारा हमें अनुग्रह और प्रेरिताई मिली, कि विश्वास से आज्ञाकारिता उत्पन्न हो।"
