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अध्याय ग्यारह: बपतिस्मा का अर्थ (भाग 1/2)
अध्याय ग्यारह
बपतिस्मा के विषय में
बपतिस्मा हमें परमेश्वर की ओर से इसलिए दिया गया है कि पहले, वह उसके प्रति हमारे विश्वास की सेवा करे, और दूसरे, मनुष्यों के सामने हमारे अंगीकार की सेवा करे। हम इसकी स्थापना के इन दोनों उद्देश्यों और कारणों पर क्रम से विचार करेंगे।
जहाँ तक पहले की बात है, बपतिस्मा हमारे विश्वास के लिए तीन बातें लाता है, जिनमें से प्रत्येक पर अलग-अलग विचार करना आवश्यक है।
पहली बात यह कि परमेश्वर उसे हमारे सामने हमारे शुद्ध किए जाने के चिह्न और प्रतीक के रूप में रखता है। इसे और स्पष्ट रूप से समझाने के लिए कहें तो वह उसे हमारे पास एक सन्देश के रूप में भेजता है, जिसके द्वारा वह हमें घोषणा करता, पक्का करता और निश्चय दिलाता है कि हमारे सब पाप ऐसे क्षमा किए, ढाँप दिए, मिटा दिए और धो डाले गए हैं कि वह उन्हें कभी न देखेगा, न उन्हें फिर स्मरण करेगा, और न हम पर आरोपित करेगा। क्योंकि वह चाहता है कि जितने विश्वास करते हैं वे सब पापों की क्षमा के लिए बपतिस्मा लें।
इसलिए जिन्होंने यह लिखने का साहस किया है कि बपतिस्मा इससे अधिक कुछ नहीं कि वह एक चिह्न और प्रतीक है, जिसके द्वारा हम मनुष्यों के सामने अपने धर्म का अंगीकार करते हैं, जैसे कोई सिपाही अपने राजकुमार की वर्दी पहनकर अपनी स्वामिभक्ति प्रकट करता है, उन्होंने इस बात पर ध्यान ही नहीं दिया कि बपतिस्मा में मुख्य बात क्या है: कि हमें उसे इस प्रतिज्ञा के साथ ग्रहण करना है:
“जो कोई विश्वास करे और बपतिस्मा ले, उसका उद्धार होगा।”
इसी अर्थ में हमें सन्त पौलुस का यह कथन समझना चाहिए कि कलीसिया अपने दूल्हे यीशु मसीह के द्वारा जीवन के वचन के साथ जल के स्नान से पवित्र और शुद्ध की गई। इसी प्रकार दूसरे स्थान पर यह कि उसने अपनी दया के अनुसार नया जन्म देनेवाले स्नान और पवित्र आत्मा के द्वारा नए किए जाने के द्वारा हमारा उद्धार किया। इसी रीति से हमें सन्त पतरस का यह कथन भी समझना चाहिए कि बपतिस्मा हमें बचाता है।
सन्त पौलुस का आशय यह नहीं था कि हमारा शुद्ध किया जाना और उद्धार जल के द्वारा सम्पन्न होता है, या जल में शुद्ध करने, नया जन्म देने अथवा नया करने की सामर्थ्य है। न सन्त पतरस का आशय यह था कि जल हमारे उद्धार का कारण है। उनका अभिप्राय केवल यह बताना था कि इस संस्कार में हम ऐसे अनुग्रहों का निश्चय पाते हैं।
यह उनके अपने ही शब्दों से भली-भाँति स्पष्ट है। सन्त पौलुस जीवन के वचन को, जो सुसमाचार है, और जल के बपतिस्मा को एक साथ जोड़ता है। मानो वह कह रहा हो कि हमारा शुद्ध किया जाना और पवित्र किया जाना हमें सुसमाचार के द्वारा सुनाया जाता है, जबकि बपतिस्मा के द्वारा उस सुनाई गई बात और सन्देश पर चिह्न और मुहर लगाई जाती है।
इसी प्रकार, यह कहने के तुरन्त बाद कि बपतिस्मा हमें बचाता है, सन्त पतरस यह जोड़ता है कि यह बपतिस्मा शरीर के मैल का दूर करना नहीं, वरन् परमेश्वर के सम्मुख एक अच्छे विवेक का वह उत्तर है, जो विश्वास से उत्पन्न होता है।
बपतिस्मा हमें उस शुद्धि के सिवाय और कोई शुद्धि प्रतिज्ञा नहीं करता जो मसीह के लहू के छिड़काव से मिलती है। यह लहू जल के द्वारा दर्शाया जाता है, क्योंकि धोने और शुद्ध करने में वह जल के समान है। तब कौन कहेगा कि हम स्वयं जल के द्वारा शुद्ध होते हैं, जबकि वही गवाही देता है कि मसीह का लहू ही हमारा सच्चा और एकमात्र धोना है? इस प्रकार उन लोगों की भूल का खण्डन करने के लिए, जो जल की सामर्थ्य को इतना अधिक मानते हैं, इससे उत्तम कोई तर्क नहीं मिल सकता कि यह समझा दिया जाए कि बपतिस्मा किस बात का चिह्न है।
न हमें यह कल्पना करनी चाहिए कि बपतिस्मा हमें केवल बीते हुए समय के विषय में दिया गया है, कि बपतिस्मा के बाद जिन पापों में हम फिर गिरें उनके लिए हमें कोई और नया उपाय खोजना पड़े। इसी भूल के कारण प्राचीन काल में कुछ लोग जीवन के अन्त और मृत्यु की घड़ी तक बपतिस्मा लेने से इनकार करते रहे, यह कल्पना करके कि इस प्रकार वे अपने सारे जीवन के लिए पूरी क्षमा पा लेंगे। इस मूर्खतापूर्ण धारणा को बिशप अपने लेखों में बार-बार डाँटते हैं।
हमें समझना चाहिए कि जब कभी हम बपतिस्मा पाते हैं, हम अपने जीवन के सारे काल के लिए एक ही बार धोए और शुद्ध किए जाते हैं। इसलिए जब कभी हम फिर पाप में गिरें, तो हमें अपने बपतिस्मा के स्मरण की ओर लौटना चाहिए और इस प्रकार उस विश्वास में स्वयं को दृढ़ करना चाहिए, ताकि हम अपने पापों की क्षमा के विषय में निश्चित और आश्वस्त बने रहें।
क्योंकि यद्यपि बपतिस्मा, एक बार हमें दिया जा चुकने पर, बीते समय का प्रतीत हो सकता है, तो भी बाद के पापों से वह मिट नहीं जाता। उसमें यीशु मसीह की पवित्रता हमारे सामने रखी जाती है, और वह पवित्रता सदा अपनी सामर्थ्य बनाए रखती है, सदा बनी रहती है, और किसी भी दाग से कभी परास्त नहीं हो सकती। वरन् वह हमारी सब अशुद्धताओं और मलिनताओं को मिटाती और धो डालती है।
हमें इससे आगे को और सरलता से पाप करने का कोई अवसर या छूट नहीं लेनी चाहिए, क्योंकि हमें ऐसी ढिठाई के लिए प्रोत्साहित नहीं किया गया है। यह शिक्षा केवल उन्हें दी गई है जो पाप करने के बाद उजड़े हुए और शोकित हैं, अपने पापों के बोझ तले थके और दबे हुए हैं, कि उनके पास कुछ ऐसा हो जिससे वे अपने आप को उठा सकें और सान्त्वना दे सकें, और घबराहट तथा निराशा में न पड़ें।
इसी कारण सन्त पौलुस कहता है कि यीशु मसीह पिछले पापों की क्षमा के लिए हमारा प्रायश्चित्त ठहराया गया। उसका यह अर्थ नहीं कि मृत्यु तक हमें मसीह में निरन्तर और लगातार पापों की क्षमा नहीं मिलती। वरन् वह यह बताता है कि मसीह पिता की ओर से उन बेचारे पापियों को दिया गया, जो विवेक के जलते हुए डंक से घायल होकर वैद्य के लिए आहें भरते हैं। ऐसे लोगों के लिए परमेश्वर की दया प्रस्तुत की गई है।
इसके विपरीत, जो दण्ड से बचे रहने की धृष्टता करते हैं और उसमें से पाप करने का अवसर और छूट खोजते और लेते हैं, वे अपने ही विरुद्ध परमेश्वर के क्रोध और न्याय को भड़काने के सिवाय और कुछ नहीं करते।
दूसरी सान्त्वना जो बपतिस्मा हमें देता है, वह यह है कि वह यीशु मसीह में हमारे मरने (मारे जाने) को और उसमें हमारे नए जीवन को भी प्रकट करता है। क्योंकि जैसा सन्त पौलुस कहता है, हम उसकी मृत्यु में बपतिस्मा पाकर उसके साथ उसकी मृत्यु की समानता में गाड़े गए, ताकि हम नए जीवन की सी चाल चलें।
इन शब्दों से वह हमें केवल मसीह का अनुकरण करने के लिए ही नहीं उकसाता, मानो वह यह कह रहा हो कि बपतिस्मा हमें चेताता है कि हम मसीह की मृत्यु की समानता और उदाहरण पर अपनी पापमय अभिलाषाओं के लिए मरें और उसके पुनरुत्थान के उदाहरण पर धार्मिकता के लिए जी उठें। वह बात को कहीं ऊँचाई पर ले जाता है: यीशु मसीह ने बपतिस्मा के द्वारा हमें अपनी मृत्यु का भागी बनाया है, ताकि हम उसमें कलम की भाँति जोड़े जाएँ।
जैसे कलम उस जड़ से, जिसमें वह लगाई जाती है, अपना सार और पोषण पाती है, वैसे ही जो लोग जैसा चाहिए वैसे विश्वास के साथ बपतिस्मा ग्रहण करते हैं, वे अपने शरीर के मारे जाने में मसीह की मृत्यु की प्रभावशीलता का, और वैसे ही अपनी आत्माओं के जिलाए जाने में उसके पुनरुत्थान की प्रभावशीलता का सचमुच अनुभव करते हैं। इसी से सन्त पौलुस हमें यह उपदेश देने का अवसर लेता है कि यदि हम मसीही हैं, तो हमें पाप के लिए मरा हुआ और धार्मिकता के लिए जीवित होना चाहिए।
वह यही तर्क अन्यत्र भी काम में लाता है, जहाँ वह कहता है कि हमारा खतना हो चुका और हमने पुराने मनुष्यत्व को उतार डाला है, क्योंकि हम बपतिस्मा के द्वारा मसीह के साथ गाड़े गए। इसी अर्थ में, पहले उद्धृत स्थान पर, उसने उसे नया जन्म देनेवाला और नया करनेवाला स्नान कहा।
अन्त में, हमारा विश्वास बपतिस्मा से यह सान्त्वना भी पाता है: वह हमें न केवल यह निश्चय दिलाता है कि हम यीशु मसीह की मृत्यु और जीवन में कलम की भाँति जोड़े गए हैं, वरन् यह भी कि हम उससे ऐसे एक किए गए हैं कि वह हमें अपनी सब आशीषों का भागी बनाता है। इसी कारण उसने बपतिस्मा को अपनी ही देह में समर्पित और पवित्र किया, ताकि वह उस संगति और एकता का, जो वह हमारे साथ रखना चाहता था, एक दृढ़ बन्धन ठहरे।
इस प्रकार सन्त पौलुस प्रमाणित करता है कि हम परमेश्वर की सन्तान हैं, क्योंकि बपतिस्मा के द्वारा हमने मसीह को पहन लिया है। अतः हम देखते हैं कि बपतिस्मा अपनी पूर्णता उसी में पाता है। इसी कारण हम उसे वह उचित लक्ष्य और उद्देश्य कहते हैं जिसकी ओर बपतिस्मा निर्देशित है।
इसलिए यह कोई आश्चर्य की बात नहीं कि प्रेरितों ने उसके नाम से बपतिस्मा दिया, यद्यपि उन्हें पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा के नाम से बपतिस्मा देने की आज्ञा मिली थी। क्योंकि परमेश्वर के वरदानों के विषय में बपतिस्मा में जो कुछ प्रस्तुत किया जाता है, वह सब केवल मसीह में पाया जाता है। फिर भी जो मसीह के नाम से बपतिस्मा देता है, उसे उसी प्रकार पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा का नाम भी लेना चाहिए।
हमें शुद्धि मसीह के लहू में प्राप्त है, क्योंकि पिता ने अपनी भलाई और दया उँडेलना चाहकर मसीह के द्वारा हमें अपने साथ मिला लिया। और हम नया जन्म मसीह की मृत्यु और जीवन में पाते हैं, जब आत्मा के पवित्र करने के द्वारा हमारे भीतर एक नया आत्मिक स्वभाव रचा जाता है। इसलिए हमारी शुद्धि और नए जन्म, दोनों का कारण परमेश्वर पिता में, सार पुत्र में, और प्रभावशीलता पवित्र आत्मा में स्वीकार करनी चाहिए।
इस प्रकार पहले यूहन्ना ने, और उसके बाद प्रेरितों ने, पापों की क्षमा के लिए मन फिराव के बपतिस्मा के साथ बपतिस्मा दिया, मन फिराव से नया जन्म और पापों की क्षमा से शुद्धि को समझते हुए। इससे यह भी पूर्णतः निश्चित हो जाता है कि यूहन्ना का बपतिस्मा देना उसी बपतिस्मा के समान सर्वथा एक ही था जो बाद में प्रेरितों ने दिया। क्योंकि बपतिस्मा इस कारण भिन्न नहीं हो जाता कि वह भिन्न हाथों से दिया गया; वही शिक्षा उसे वही बपतिस्मा बनाती है।
यूहन्ना और प्रेरित एक ही शिक्षा में सहमत थे। सब ने मन फिराव के लिए और पापों की क्षमा के लिए बपतिस्मा दिया। यूहन्ना ने घोषणा की कि यीशु मसीह परमेश्वर का मेम्ना है, जिसके द्वारा जगत के पाप उठा लिए गए और मिटा दिए गए। इससे उसने अंगीकार किया, स्वीकार किया और गवाही दी कि मसीह पिता को ग्रहणयोग्य बलिदान, प्रायश्चित्त करनेवाला और उद्धारकर्ता है। प्रेरित इस अंगीकार में और क्या जोड़ सकते थे? निश्चय ही कुछ नहीं, क्योंकि वह पूर्ण और सम्पूर्ण है।
इसलिए कोई इस बात से विचलित न हो कि प्राचीन लेखक एक बपतिस्मा को दूसरे से अलग करने का प्रयत्न करते हैं। उनका अधिकार हमारे लिए इतना भारी न हो कि वह पवित्रशास्त्र के तर्क को डगमगा दे। कौन क्रिसोस्तम से सहमत होगा, जो इनकार करता है कि यूहन्ना के बपतिस्मा में पापों की क्षमा सम्मिलित थी, बजाय सन्त लूका के, जो इसके विपरीत पुष्टि करता है कि यूहन्ना ने पापों की क्षमा के लिए मन फिराव के बपतिस्मा का प्रचार किया?
यदि कोई परमेश्वर के वचन से कोई भेद खोजे, तो उसे इसके सिवाय और कोई न मिलेगा: यूहन्ना ने उसके नाम से बपतिस्मा दिया जो आनेवाला था, जबकि प्रेरितों ने उसके नाम से दिया जो प्रकट हो चुका था। पुनरुत्थान के बाद पवित्र आत्मा के अनुग्रह अधिक प्रचुरता से दिए गए, इससे दोनों बपतिस्माओं के बीच कोई भेद स्थापित नहीं होता।
क्योंकि जो बपतिस्मा प्रेरितों ने तब दिया जब मसीह अभी पृथ्वी पर रह रहा था, वह उसी के नाम पर कहलाता था, फिर भी उसमें आत्मा की यूहन्ना के बपतिस्मा से अधिक प्रचुरता नहीं थी। स्वर्गारोहण के बाद भी, यद्यपि सामरियों ने यीशु के नाम से बपतिस्मा लिया था, उन्हें उन अनुग्रहों से अधिक कुछ नहीं मिला जो विश्वासियों को पहले मिल चुके थे, जब तक कि पतरस और यूहन्ना उन पर हाथ रखने को नहीं भेजे गए।
प्राचीनों ने सोचा कि यूहन्ना का बपतिस्मा मसीह के बपतिस्मा की केवल एक तैयारी था। मेरा विश्वास है कि वे इस कारण भ्रम में पड़े कि उन्होंने पढ़ा कि जिन्होंने यूहन्ना का बपतिस्मा पाया था उन्हें सन्त पौलुस ने फिर बपतिस्मा दिया। परन्तु उनकी समझ कितनी भूल भरी थी, यह आगे प्रकट होगा।
तो फिर यूहन्ना का क्या आशय है जब वह कहता है कि मैं जल से बपतिस्मा देता हूँ, पर यीशु मसीह आकर पवित्र आत्मा और आग से बपतिस्मा देगा? इसकी व्याख्या संक्षेप में हो सकती है। उसका उद्देश्य एक बपतिस्मा को दूसरे से अलग करना नहीं था, वरन् अपने व्यक्तित्व की तुलना यीशु मसीह के व्यक्तित्व से करना था। उसने अपने आप को जल का सेवक, और यीशु को पवित्र आत्मा का देनेवाला घोषित किया। मसीह इस सामर्थ्य को एक दृश्य चमत्कार के द्वारा उस दिन प्रकट करता, जब उसने अपने प्रेरितों पर आग की जीभों के रूप में पवित्र आत्मा भेजा। प्रेरित अपने लिए इससे अधिक क्या दावा कर सकते थे? और आज बपतिस्मा देनेवाले क्या दावा कर सकते हैं? वे तो केवल बाहरी चिह्न के सेवक हैं, परन्तु भीतरी अनुग्रह का कर्ता यीशु मसीह है।
जो बातें हमने पहले मरने (मारे जाने) के विषय में और फिर धोने या शुद्ध किए जाने के विषय में कही हैं, वे इस्राएल के लोगों में पहले से दर्शाई गई थीं। इसी कारण सन्त पौलुस कहता है कि उन्होंने बादल और समुद्र में बपतिस्मा लिया।
मारे जाने का पूर्वचित्रण तब हुआ जब परमेश्वर ने उन्हें फिरौन के बल और क्रूर दासत्व से छुड़ाया, लाल समुद्र में से उनके लिए मार्ग बनाया, और फिरौन तथा मिस्रियों को, जो उनके शत्रु थे और उनका पीछा कर रहे थे, डुबो दिया। उसी रीति से बपतिस्मा में परमेश्वर हमसे प्रतिज्ञा करता है, और चिह्न के द्वारा हमें दिखाता और निश्चय दिलाता है कि उसकी सामर्थ्य और शक्ति से हम मिस्र की बन्धुवाई से, अर्थात् पाप की दासता से, छुड़ाए गए हैं, और हमारा फिरौन, शैतान, डुबो दिया गया है, यद्यपि वह अब भी हमें सताने और तंग करने से नहीं रुकता। परन्तु जैसे वह डूबा हुआ मिस्री समुद्र की तह में नहीं पड़ा रहा, वरन् किनारे पर फेंक दिया गया और इस्राएलियों को डरा दिया, जिन्होंने देखा कि वह कितना भयंकर दिखता था, यद्यपि वह अब उन्हें हानि नहीं पहुँचा सकता था, वैसे ही सचमुच हमारा शत्रु हमें धमकाता है, अपने हथियार दिखाता है और अपनी उपस्थिति जताता है, परन्तु प्रबल नहीं हो सकता।
शुद्धि का पूर्वचित्रण बादल में हुआ। क्योंकि जैसे हमारे प्रभु ने तब उन्हें बादल से ढाँपा और ताज़ा किया कि वे सूर्य की अत्यन्त प्रचण्ड और जलाने वाली गर्मी में मूर्छित होकर नाश न हो जाएँ, वैसे ही बपतिस्मा में हमें दिखाया जाता है कि हम यीशु मसीह के लहू से ढाँपे और सुरक्षित रखे गए हैं, ताकि परमेश्वर के न्याय की कठोरता, जो सचमुच एक असह्य आग और ताप है, हम पर न पड़े।
अब हम स्पष्ट देख सकते हैं कि कुछ लोगों की यह शिक्षा कितनी झूठी है कि बपतिस्मा के द्वारा हम आदिपाप से और उस भ्रष्टता से, जो आदम से उसकी सारी सन्तान पर उतरी, छुड़ाए और मुक्त किए जाते हैं, और उसी आदि धार्मिकता और स्वभाव की शुद्धता में पुनःस्थापित किए जाते हैं जो आदम को प्राप्त होती यदि वह उस खरेपन में सदा बना रहता जिसमें वह पहले रचा गया था। इस प्रकार के शिक्षकों ने कभी नहीं समझा कि आदिपाप क्या है, आदि धार्मिकता क्या है, और बपतिस्मा का अनुग्रह क्या है।
अब ऊपर दिखाया जा चुका है कि आदिपाप हमारे स्वभाव की विकृति और भ्रष्टता है। यह भ्रष्टता पहले हमें परमेश्वर के क्रोध के सम्मुख दोषी और दण्ड के योग्य बनाती है; और फिर वह हममें वे कार्य भी उत्पन्न करती है जिन्हें पवित्रशास्त्र शरीर के कार्य कहता है।
इसलिए इन दो बातों पर अलग-अलग विचार किया जाना चाहिए। पहली यह कि जब हम अपने स्वभाव के हर अंग में इस प्रकार भ्रष्ट और बिगड़े हुए हैं, तो केवल उस भ्रष्टता के कारण ही हम परमेश्वर के सम्मुख पहले से न्यायसंगत रूप से दण्डित और दोषी ठहरे हैं, क्योंकि उसे धार्मिकता, निर्दोषता और पवित्रता के सिवाय कुछ भी ग्रहणयोग्य नहीं। इसलिए शिशु भी अपनी माता के गर्भ से अपना दण्ड साथ लाते हैं। यद्यपि उन्होंने अभी अपनी अधर्मिता के फल नहीं उत्पन्न किए, तथापि उसका बीज उनके भीतर बन्द है; वरन् उनका सारा स्वभाव ही पाप का बीज है। इसी कारण वह परमेश्वर के लिए घृणित और कुत्सित हुए बिना नहीं रह सकता।
बपतिस्मा के द्वारा विश्वासियों को निश्चय दिलाया जाता है कि यह दण्ड उनसे हटा दिया और दूर कर दिया गया है। क्योंकि, जैसा हम कह चुके हैं, इस चिह्न के द्वारा हमारा प्रभु हमसे प्रतिज्ञा करता है कि हमने पापों की पूर्ण और सम्पूर्ण क्षमा पाई है, उस दोष की भी जो अन्यथा हम पर आरोपित होता, और उस दण्ड की भी जो हमें उस दोष के लिए सहना और भोगना पड़ता। वे धार्मिकता भी पाते हैं, परन्तु ऐसी धार्मिकता जैसी परमेश्वर के लोग इस जीवन में पा सकते हैं: अर्थात् केवल आरोपण के द्वारा, क्योंकि अपनी दया में हमारा प्रभु उन्हें धर्मी और निर्दोष गिनता है।
विचार करने की दूसरी बात यह है कि यह भ्रष्टता हमारे भीतर कभी थमती नहीं, वरन् निरन्तर हममें नए फल उत्पन्न करती है, अर्थात् ऊपर वर्णित शरीर के कार्य, ठीक वैसे ही जैसे जलती हुई भट्ठी निरन्तर आग और चिंगारियाँ उगलती रहती है, या बहता हुआ सोता निरन्तर अपना जल बहाता रहता है। क्योंकि पापमय अभिलाषा मनुष्यों में तब तक न मरती है और न पूरी तरह बुझती है, जब तक वे मृत्यु के द्वारा मृत्यु की देह से छूटकर अपने पुराने मनुष्यत्व को पूरी तरह उतार न दें।
बपतिस्मा सचमुच हमसे प्रतिज्ञा करता है कि हमारा फिरौन डुबो दिया गया है और हमारा शरीर मारा गया है, पर इस रीति से नहीं कि वह अब रहा ही नहीं या अब हमें सताता ही नहीं, केवल इस रीति से कि वह हम पर प्रबल न हो। क्योंकि जब तक हम अपने शरीर के बन्दीगृह में बन्द जीते हैं, तब तक पाप के बचे-खुचे अंश और अवशेष हमारे भीतर बसे रहेंगे। परन्तु यदि हम विश्वास के द्वारा उस प्रतिज्ञा को थामे रहें जो परमेश्वर ने हमें बपतिस्मा में दी है, तो उनका हम पर प्रभुत्व या राज्य न होगा।
तो भी, जब कोई यह सुने कि पाप सदा हमारे भीतर बसा रहता है, तो वह अपने आप को धोखा न दे और अपनी दुष्टता में अपने को न बहलाए। यह इसलिए नहीं कहा जाता कि पापी अपने पापों में निश्चिन्त होकर सो जाएँ, केवल इसलिए कि जो अपने शरीर से व्याकुल, आक्रान्त और पीड़ित हैं वे निराश न हों और साहस तथा आशा न खो बैठें। वरन् उन्हें पहचानना चाहिए कि वे अब भी मार्ग में हैं, और जब वे अनुभव करें कि उनकी पापमय अभिलाषाएँ दिन-प्रतिदिन कुछ घटती जा रही हैं, तब अपने आप को उन्नति करता हुआ समझें, जब तक कि वे उस लक्ष्य तक न पहुँच जाएँ जिसकी ओर वे बढ़ रहे हैं: अर्थात् अपने शरीर का अन्तिम उन्मूलन, जो इस नश्वर जीवन के अन्त में पूरा होगा।
इसलिए हमें जानना और दृढ़ता से थामे रहना चाहिए कि हम अपने शरीर के मारे जाने के लिए बपतिस्मा पाते हैं। यह मारा जाना बपतिस्मा से हममें आरम्भ होता है और इस जीवन के हर दिन चलता रहता है, परन्तु वह तब सिद्ध होगा जब हम इस जीवन से कूच करके अपने प्रभु के पास जाएँगे।
बपतिस्मा मनुष्यों के सामने हमारे अंगीकार की सेवा इस प्रकार करता है: वह एक ऐसा चिह्न और प्रतीक है जिसके द्वारा हम सब के सामने घोषणा करते हैं कि हम परमेश्वर के लोगों में गिने जाना चाहते हैं; जिसके द्वारा हम गवाही देते हैं कि सब मसीहियों के साथ हम एक ही परमेश्वर की सेवा और एक ही धर्म के लिए सहमत और एकमत हैं; और जिसके द्वारा, अन्त में, हम सब के सामने घोषणा और पुष्टि करते हैं कि हमारा विश्वास क्या है। इस प्रकार परमेश्वर की महिमा केवल हमारे हृदयों में ही नहीं होती, वरन् हमारी जीभें और हमारी देह के सब अंग भी, जहाँ तक उनसे बन पड़े, बाहर से उसकी स्तुति गाते हैं। क्योंकि इसी रीति से, जैसा उचित है, जो कुछ हमारा है वह सब परमेश्वर की महिमा की सेवा में लगाया जाता है, जिसमें से किसी बात को अलग नहीं रखना चाहिए; और दूसरे हमारे उदाहरण से उभरकर वैसे ही अपने आप को समर्पित करते हैं।
सन्त पौलुस के मन में यही बात थी जब उसने कुरिन्थियों से पूछा कि क्या उन्होंने मसीह के नाम से बपतिस्मा लिया था। इससे वह यह जताता है कि उन्होंने अपने आप को उसे दे दिया और समर्पित कर दिया था, उसे अपना प्रभु और स्वामी माना था, और मनुष्यों के सामने उससे विश्वास की प्रतिज्ञा की थी, ताकि वे उसके सिवाय और किसी का अंगीकार, बपतिस्मा में किए गए अपने अंगीकार का इनकार किए बिना, न कर सकें।
अब जब हम समझा चुके कि हमारे प्रभु ने किस उद्देश्य से बपतिस्मा की स्थापना और नियुक्ति की, तो यह दिखाना सरल होगा कि हमें उसे कैसे काम में लाना और ग्रहण करना चाहिए। जहाँ तक वह हमारे विश्वास को दृढ़ करने, सान्त्वना देने और पक्का करने के लिए दिया गया है, हमें उसे परमेश्वर के हाथ से मिला हुआ मानकर ग्रहण करना चाहिए, और यह निश्चित और निस्सन्देह मानना चाहिए कि वही इस चिह्न के द्वारा हमसे बोलता है; वही हमें धोता और शुद्ध करता है और हमारे पापों की स्मृति मिटा देता है; वही हमें अपने पुत्र की मृत्यु का भागी बनाता है; वही शैतान की और हमारी पापमय अभिलाषा की सामर्थ्य को नष्ट करता और मार डालता है; और सचमुच वही हमें अपने पुत्र को पहनाता है।
इसलिए हमें विश्वास करना और निश्चित रहना चाहिए कि वह ये सब कार्य हमारी आत्माओं में भीतर ही भीतर उतनी ही सच्चाई और निश्चय से करता है जितना हम अपनी देहों को बाहर से जल में धुलता, डूबता और घिरा हुआ देखते हैं। क्योंकि संस्कारों के विषय में यही सादृश्य या अनुरूपता सबसे निश्चित नियम है: कि भौतिक वस्तुओं में हम आत्मिक वस्तुओं को देखें और विचारें, क्योंकि प्रभु को यही भाया है कि वह उन्हें हमारे सामने ऐसे रूपों में प्रस्तुत करे।
इसका अर्थ यह नहीं कि ऐसे अनुग्रह संस्कार में बँधे और बन्द हैं, या उसकी अपनी सामर्थ्य से हमें दिए जाते हैं, वरन् केवल यह कि इस चिह्न और निशान के द्वारा प्रभु हमें अपनी इच्छा की गवाही देता है, अर्थात् यह कि वह हमें ये सब बातें देना चाहता है। यह सूबेदार कुरनेलियुस के उदाहरण से प्रकट है, जिसने पापों की क्षमा और पवित्र आत्मा के दृश्य अनुग्रह पाने के बाद भी बपतिस्मा लिया, इसलिए नहीं कि बपतिस्मा से अधिक पूर्ण क्षमा पाए, वरन् इसलिए कि अपने विश्वास को और निश्चित पुष्टि दे।
कोई शायद यह आपत्ति करे: यदि पाप बपतिस्मा से शुद्ध नहीं होते, तो हनन्याह ने सन्त पौलुस से क्यों कहा कि वह बपतिस्मा लेकर अपने पाप धो डाले? मैं उत्तर देता हूँ कि हम उसे पाने, प्राप्त करने या हासिल करने वाले कहे जाते हैं जिसके विषय में हम मानते हैं कि वह परमेश्वर की ओर से हमें दिया गया है, चाहे हम उसे तब पहली बार जानने लगें या पहले जानते हुए उसका और अधिक निश्चित निश्चय पा लें। इसलिए इन शब्दों में हनन्याह का आशय केवल यही था:
“पौलुस, इसलिए कि तुझे निश्चय हो कि तेरे पाप क्षमा हो गए हैं, बपतिस्मा ले।”
क्योंकि प्रभु बपतिस्मा में पापों की क्षमा की प्रतिज्ञा करता है। इसलिए उसे ग्रहण करो और निश्चय के साथ थामे रहो।
इसके अतिरिक्त, हम इस संस्कार से कुछ नहीं पाते, सिवाय उतने के जितना हम उसे विश्वास से ग्रहण करते हैं। यदि विश्वास न हो, तो बपतिस्मा परमेश्वर के सामने हम पर दोष लगानेवाली गवाही का काम करेगा कि हमने उसमें दी गई प्रतिज्ञा के प्रति अविश्वास दिखाया। परन्तु जहाँ तक बपतिस्मा हमारे अंगीकार का चिह्न और प्रतीक है, हमें उसके द्वारा गवाही देनी चाहिए कि हमारा भरोसा परमेश्वर की दया पर टिका है; कि हमारी पवित्रता यीशु मसीह के द्वारा प्राप्त पापों की क्षमा में है; और कि हम परमेश्वर की कलीसिया में इसलिए प्रवेश करते हैं कि विश्वास और प्रेम की एकता और सहमति में हम सब विश्वासियों के बीच एक मन होकर जीवन बिताएँ। सन्त पौलुस का यही आशय था जब उसने कहा:
“हम सब ने एक ही आत्मा के द्वारा एक देह होने के लिए बपतिस्मा लिया।”
अब यदि जो हमने स्थापित किया है वह सच है, कि संस्कार को उसे देनेवाले के हाथ से नहीं, वरन् स्वयं परमेश्वर के हाथ से ग्रहण करना चाहिए, जिसकी ओर से वह निस्सन्देह भेजा जाता है, तो हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि जिसके हाथ से वह दिया जाता है उसकी प्रतिष्ठा से उसमें न कुछ जुड़ता है न घटता है। मनुष्यों के बीच, जब कोई पत्र भेजा जाता है, तो यदि लिखनेवाले का हस्ताक्षर और मुहर भली-भाँति पहचान ली जाए, तो इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता कि सन्देशवाहक कौन है या कैसा मनुष्य है। इसी प्रकार हमारे लिए इतना ही पर्याप्त होना चाहिए कि हम अपने प्रभु के संस्कारों में उसका हस्ताक्षर और मुहर पहचान लें, चाहे वे किसी भी सन्देशवाहक के द्वारा लाए जाएँ।
इससे दोनात्सवादियों की भूल का पूरा खण्डन और नाश हो जाता है, जो संस्कार की सामर्थ्य और मूल्य को सेवक की प्रतिष्ठा और मूल्य के अनुसार नापते और आँकते थे। आज के हमारे पुनर्बपतिस्मावादी भी ऐसे ही हैं, जो इनकार करते हैं कि हमारा बपतिस्मा ठीक रीति से हुआ, क्योंकि हमने पोप के राज्य में अविश्वासियों और मूर्तिपूजकों के हाथ से बपतिस्मा पाया था। इसलिए वे उग्र होकर माँग करते हैं कि हम फिर से बपतिस्मा लें।
उनकी मूर्खताओं के विरुद्ध हम पर्याप्त सबल तर्क से सुसज्जित हैं, यदि हम स्मरण रखें कि हमने बपतिस्मा किसी मनुष्य के नाम से नहीं, वरन् पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा के नाम से पाया। इसलिए बपतिस्मा मनुष्य का नहीं, परमेश्वर का है, चाहे वह जिसके द्वारा दिया गया हो। हमें बपतिस्मा देनेवालों में जो भी अज्ञानता या परमेश्वर की तुच्छता रही हो, उन्होंने हमें अपनी अज्ञानता और अधर्म की संगति में नहीं, वरन् यीशु मसीह के विश्वास में बपतिस्मा दिया। क्योंकि उन्होंने अपना नाम नहीं, परमेश्वर का नाम लिया, और किसी और नाम से हमें बपतिस्मा नहीं दिया।
अब यदि बपतिस्मा परमेश्वर का था, तो उसमें निश्चय ही पापों की क्षमा, शरीर के मारे जाने, आत्मिक नवीनीकरण और मसीह की सहभागिता की प्रतिज्ञा थी। इसके अतिरिक्त, वे हमसे पूछते हैं कि हमारे बपतिस्मा के बाद आनेवाले अनेक वर्षों में कौन-सा विश्वास रहा, और इससे वे यह निष्कर्ष निकालना चाहते हैं कि हमारा बपतिस्मा व्यर्थ था, क्योंकि जब तक प्रतिज्ञा का वचन विश्वास से ग्रहण न किया जाए, तब तक वह हमारे लिए पवित्र नहीं ठहरता। हम उत्तर देते हैं कि हम सचमुच बहुत समय तक अन्धे और अविश्वासी रहे और बपतिस्मा में हमें दी गई प्रतिज्ञा को ग्रहण नहीं किया।
तो भी, क्योंकि वह प्रतिज्ञा परमेश्वर की ओर से थी, वह आरम्भ से ही, तत्काल और सदा के लिए दृढ़ और सच्ची बनी रही। चाहे सब मनुष्य झूठे और विश्वासघाती हों, तो भी परमेश्वर सच्चा ठहरता है। चाहे सब मनुष्य खोए हुए और दोषी ठहरे हों, तो भी यीशु मसीह उद्धार बना रहता है।
इसलिए हम मानते हैं कि उस समय बपतिस्मा से हमें कुछ लाभ नहीं हुआ, क्योंकि उसमें हमें दी गई प्रतिज्ञा तुच्छ जानी गई, और उस प्रतिज्ञा के बिना बपतिस्मा कुछ नहीं। परन्तु अब, जब परमेश्वर के अनुग्रह से हमने अपना जीवन सुधारना आरम्भ किया है, हम अपने अन्धेपन और हृदय की कठोरता को दोषी ठहराते हैं, जिसके कारण हम इतने समय तक उसकी भलाई के प्रति कृतघ्न बने रहे। फिर भी हम यह नहीं मानते कि प्रतिज्ञा लुप्त हो गई। वरन् हम इस प्रकार तर्क करते हैं: परमेश्वर बपतिस्मा में पापों की क्षमा की प्रतिज्ञा करता है, और वह निस्सन्देह उन सब के लिए, जो विश्वास करते हैं, उस प्रतिज्ञा को पूरा करेगा। वह प्रतिज्ञा हमें बपतिस्मा में दी गई थी; इसलिए अब हम उसे विश्वास से थाम लें। वह हमारे अविश्वास के कारण हमसे बहुत समय तक छिपी रही; अब उसे विश्वास से फिर पा लें।
इसी कारण, जब प्रभु यहूदी लोगों को मन फिराव के लिए उपदेश देता है, तो जिनका खतना दुष्ट और अपवित्र मनुष्यों के हाथों हुआ था, और जो स्वयं भी कुछ समय तक उसी अधर्म में जीते रहे थे, उन्हें वह फिर से खतना करवाने की आज्ञा नहीं देता। वह केवल हृदय का मन फिराना माँगता है। क्योंकि उनके द्वारा उसकी वाचा कितनी ही भंग क्यों न की गई हो, उसका चिह्न, जैसा उसने ठहराया था, सदा दृढ़ और अटूट बना रहा। इसलिए उसने उन्हें केवल इसी शर्त पर फिर ग्रहण किया कि वे मन फिराव की ओर लौट आएँ। ऐसा करके उसने उस वाचा की पुष्टि की जो उसने उनके साथ खतने के द्वारा एक बार बाँधी थी, यद्यपि वह दुष्ट याजकों के हाथों उन्हें दिया गया था और उनके अपने अधर्म से बिगाड़ दिया गया था।
परन्तु पुनर्बपतिस्मावादी समझते हैं कि वे हम पर जलता हुआ तीर चला रहे हैं जब वे यह दलील देते हैं कि सन्त पौलुस ने उन्हें फिर बपतिस्मा दिया जिन्होंने एक बार सन्त यूहन्ना का बपतिस्मा पाया था। क्योंकि यदि, जैसा हम मानते हैं, सन्त यूहन्ना का बपतिस्मा सर्वथा वही बपतिस्मा था जो आज हमारा है, तो जैसे वे लोग, पहले गलत शिक्षा पाए हुए, खरी शिक्षा पाने के बाद सच्चे विश्वास में फिर बपतिस्मा पाए, वैसे ही जो बपतिस्मा हमने सच्ची शिक्षा के बिना पाया वह भी कुछ नहीं गिना जाना चाहिए, और अब हमें उस सच्चे धर्म में नए सिरे से बपतिस्मा लेना चाहिए जिसका स्वाद हमने अभी हाल में चखना आरम्भ किया है।
कुछ लोग मानते हैं कि उन लोगों को पहले सन्त यूहन्ना के किसी मूर्ख नकलची ने बपतिस्मा दिया था, जो सत्य की अपेक्षा खोखले अन्धविश्वासों में अधिक था। उनका कारण यह अनुमान है कि इन चेलों ने मान लिया कि वे पवित्र आत्मा के विषय में नहीं जानते, जबकि सन्त यूहन्ना उन्हें ऐसी अज्ञानता में न छोड़ता। परन्तु यह भी विश्वास के योग्य नहीं कि बिना बपतिस्मा पाए यहूदियों को भी आत्मा का कोई ज्ञान न होता, क्योंकि पवित्रशास्त्र में उनके सामने उसका इतनी बार उल्लेख हुआ था। इसलिए जब वे उत्तर देते हैं कि वे नहीं जानते थे कि पवित्र आत्मा है भी या नहीं, तो इसका अर्थ यही समझना चाहिए कि उन्होंने इस विषय में कुछ नहीं सुना था कि पवित्र आत्मा के वे अनुग्रह, जिनके विषय में सन्त पौलुस ने उनसे पूछा, मसीह के चेलों में बाँटे जा रहे थे या नहीं।
मैं अपनी ओर से मान लेता हूँ कि इन लोगों को दिया गया पहला बपतिस्मा सन्त यूहन्ना का सच्चा बपतिस्मा था और वह यीशु मसीह के बपतिस्मा के साथ एक ही था। परन्तु मैं इनकार करता हूँ कि उन्हें फिर बपतिस्मा दिया गया। तब इन शब्दों का क्या अर्थ है: “उन्होंने प्रभु यीशु के नाम से बपतिस्मा लिया”? कुछ लोग इसका अर्थ केवल यह करते हैं कि सन्त पौलुस ने उन्हें शुद्ध और खरी शिक्षा दी। परन्तु मैं इसे अधिक सीधे ढंग से पवित्र आत्मा के बपतिस्मा के विषय में समझना पसन्द करता हूँ, अर्थात् यह कि हाथ रखने के द्वारा उन्हें पवित्र आत्मा के दृश्य अनुग्रह दिए गए।
पवित्रशास्त्र में इन अनुग्रहों को प्रायः बपतिस्मा कहा गया है। इसीलिए पिन्तेकुस्त के दिन प्रेरितों को आत्मा और आग के बपतिस्मा के विषय में प्रभु के शब्द स्मरण आए। सन्त पतरस भी बताता है कि जो अनुग्रह उसने कुरनेलियुस और उसके घराने पर उँडेले जाते देखे, उन्होंने उसे वही शब्द स्मरण करा दिए।
न ही जो आगे आता है वह इसके विरुद्ध है:
“जब पौलुस ने उन पर हाथ रखे, तब पवित्र आत्मा उन पर उतरा।”
क्योंकि सन्त लूका दो भिन्न बातों का वर्णन नहीं कर रहा, वरन् इब्रानियों के परिचित वर्णन-रूप का अनुसरण करता है: वे पहले बात को संक्षेप में कहते हैं और फिर उसे और विस्तार से समझाते हैं। कोई भी इसे शब्दों के क्रम से ही समझ सकता है:
“यह सुनकर उन्होंने प्रभु यीशु के नाम से बपतिस्मा लिया; और जब पौलुस ने उन पर हाथ रखे, तब पवित्र आत्मा उन पर उतरा।”
यह पिछला कथन बताता है कि वह बपतिस्मा क्या था।
परन्तु यदि पहला बपतिस्मा पानेवालों की अज्ञानता से अमान्य और निरस्त हो जाता, जिससे दूसरा बपतिस्मा देना पड़ता, तो सबसे पहले स्वयं प्रेरितों को फिर बपतिस्मा मिलना चाहिए था। क्योंकि अपने बपतिस्मा के बाद के तीन वर्षों में उन्हें खरी शिक्षा का कोई बड़ा ज्ञान नहीं था। और हमारे बीच, कौन-से समुद्र पर्याप्त जल दे सकेंगे कि उस सारी अज्ञानता के अनुरूप सब बपतिस्मा दोहराए जाएँ, जिसे हमारा प्रभु प्रतिदिन हममें सुधारता है?
अब, जब हम देखते हैं कि शिशुओं को बपतिस्मा देने की प्रथा पर कुछ दुष्ट आत्माएँ आक्रमण करती और वाद-विवाद करती हैं, मानो वह परमेश्वर की ओर से स्थापित नहीं, वरन् मनुष्यों की हाल की गढ़ी हुई हो, या कम से कम प्रेरितों के समय के कुछ वर्ष बाद चलाई गई हो, तो हमने अपना कर्तव्य समझा कि इस विषय में निर्बल विवेकों को दृढ़ करें और उन झूठी आपत्तियों का खण्डन करें जो ऐसे छली लोग भोले-भाले लोगों के हृदय में परमेश्वर के सत्य को उलटने के लिए उठा सकते हैं, जो शायद उनकी चतुराइयों और हुज्जतों का उत्तर देने में पर्याप्त अभ्यस्त न हों।
वे सामान्यतः एक ऐसा तर्क काम में लाते हैं जो पहली दृष्टि में काफी विश्वसनीय लगता है। वे कहते हैं कि वे और कुछ नहीं चाहते, सिवाय इसके कि परमेश्वर का वचन अपनी शुद्धता में सुरक्षित और अपनी सम्पूर्णता में बनाए रखा जाए, उसमें न कुछ जोड़ा जाए न कुछ घटाया जाए, जबकि जिन्होंने पहले-पहल शिशु-बपतिस्मा गढ़ा उन्होंने कथित रूप से बिना किसी आज्ञा के इसे अपनाकर यह प्रथा जोड़ दी। यदि वे अपना दावा सिद्ध कर सकें कि यह बपतिस्मा मनुष्य की उपज से निकला, परमेश्वर की विधि से नहीं, तो हम मान लेते कि यह तर्क पर्याप्त था। परन्तु जब, इसके विपरीत, हमने स्पष्ट दिखा दिया है कि वे इस विधि पर झूठा और अन्यायपूर्ण दोष लगाते हैं, उसे मनुष्य की परम्परा कहते हुए जब कि वह परमेश्वर के वचन पर दृढ़ता से स्थापित है, तो इसके सिवाय क्या बचता है कि वह बहाना, जो वे व्यर्थ आगे रखते हैं, धुएँ में उड़ जाए?
यहाँ हमें वह नियम स्मरण रखना चाहिए जो सन्त पौलुस हमें पवित्रशास्त्र को ठीक रीति से समझने के लिए देता है: कि उसकी व्याख्या करते समय हमें सदा विश्वास की समानुपातिकता और संगति का अनुसरण करना चाहिए। मानो वह हमें आज्ञा देता है कि अपनी दृष्टि इस लक्ष्य पर टिकाए रखें: कि पवित्रशास्त्र में जो कुछ सिखाया गया है, उस सब को विश्वास की शिक्षा से सम्बन्धित करें, और उसी शिक्षा से, मानो सच्चे स्रोत से, सब आत्मिक शिक्षा की व्याख्या निकालें।
यदि हम इस वर्तमान विषय में एक बार यह नींव स्थापित कर लें, ऐसी नींव जो मसीहियों में स्थिर रहनी चाहिए और परमेश्वर के सारे वचन में लागू होनी चाहिए, तो हमारे लिए यह पहचानना सरल होगा कि बपतिस्मा शिशुओं को प्रभु की इच्छा और विधि से अलग नहीं दिया जाता। हम उन सब कठिनाइयों से भी अपने को मुक्त और निश्चिन्त कर सकेंगे जिनमें कुछ लोग इस आवश्यक नियम पर ध्यान न देने के कारण उलझ गए हैं।
अब, वर्तमान विषय को विशेष रूप से लेते हुए, विश्वासियों के बीच यह बात निश्चित होनी चाहिए: उन चिह्नों या संस्कारों पर, जो प्रभु ने अपनी कलीसिया को छोड़े और सौंपे हैं, ठीक विचार केवल उनके बाहरी रूप या बाहरी रीति में नहीं, वरन् मुख्यतः उन प्रतिज्ञाओं और आत्मिक भेदों पर निर्भर करता है जिन्हें हमारे प्रभु ने ऐसी रीतियों के द्वारा दर्शाना चाहा है।
इसलिए यह भली-भाँति समझने के लिए कि बपतिस्मा क्या है और वह क्या पहुँचाता है, हमें अपना ध्यान पूरी तरह जल और बाहरी क्रिया पर नहीं लगाना चाहिए। वरन् हमें अपने विचारों को उन प्रतिज्ञाओं तक उठाना चाहिए जो बपतिस्मा में हमें दी गई हैं, और वहाँ दिखाई गई भीतरी तथा आत्मिक वास्तविकताओं तक। यदि हम इन्हें समझ लें, तो हमारे पास बपतिस्मा का सार और सत्य है। इन्हीं से हम यह भी समझेंगे कि जल से यह छिड़कना क्यों ठहराया गया और इससे हमें क्या लाभ होता है।
दूसरी ओर, यदि हम इन बातों को तुच्छ जानें और उनकी उपेक्षा करें और अपने मन को पूरी तरह तथा केवल बाहरी पालन पर लगा दें, तो हम बपतिस्मा की सामर्थ्य या महत्त्व को कभी न समझेंगे, और यह भी न जानेंगे कि उसमें प्रयोग किए गए जल का क्या अर्थ या संकेत है। हमें इस पर विस्तार से चलने की आवश्यकता नहीं, क्योंकि पवित्रशास्त्र में यह इतने स्पष्ट रूप से और इतनी बार दिखाया गया है कि मसीहियों के बीच यह सन्देहजनक या अस्पष्ट नहीं हो सकता।
इसलिए अब शेष यह है कि हम बपतिस्मा में दी गई प्रतिज्ञाओं में उसका उचित सार खोजें। पवित्रशास्त्र हमें सिखाता है कि बपतिस्मा पहले हमारे पापों की क्षमा और शुद्धि को दर्शाता है, जो हमें यीशु मसीह के लहू बहाए जाने के द्वारा प्राप्त है; और फिर हमारे शरीर के मारे जाने को, जो हमें उसकी मृत्यु की सहभागिता से मिलता है, ताकि हम नए जीवन में जी उठें, अर्थात् निर्दोषता, पवित्रता और शुद्धता में।
इससे हम पहले यह समझते हैं कि दिखाई देनेवाला और भौतिक चिह्न उच्चतर और अधिक श्रेष्ठ वास्तविकताओं का प्रदर्शन मात्र है। उन्हें समझने के लिए हमें परमेश्वर के वचन की शरण लेनी चाहिए, जिसमें चिह्न की सारी सामर्थ्य है। उस वचन से हम देखते हैं कि जिन बातों को चिह्न दर्शाता है वे हमारे पापों की शुद्धि और हमारे शरीर का मारा जाना है, ताकि हम उस आत्मिक नए जन्म के भागी बनें जो परमेश्वर की सब सन्तानों में अवश्य होना चाहिए। अन्त में, हम देखते हैं कि ये सब बातें यीशु मसीह में पूरी होती हैं, जो इनकी नींव है।
संक्षेप में यही बपतिस्मा का अर्थ है, जिस पर पवित्रशास्त्र में उसके विषय में कही गई सब बातें लाई और घटाई जा सकती हैं, केवल एक बात को छोड़कर जिसका अभी उल्लेख नहीं हुआ: बपतिस्मा एक ऐसा चिह्न भी है जिसके द्वारा हम मनुष्यों के सामने प्रभु को अपना परमेश्वर स्वीकार करते हैं और उसके लोगों में गिने जाते हैं।
क्योंकि बपतिस्मा की स्थापना से पहले परमेश्वर के लोगों के पास उसके स्थान पर खतना था, जो पुराने नियम के अधीन काम करता था, इसलिए अब हमें विचार करना चाहिए कि इन दोनों चिह्नों में क्या समानता और क्या भिन्नता है। इस प्रकार हम यह भी समझ सकेंगे कि एक से दूसरे के विषय में क्या निष्कर्ष निकाला जा सकता है।
जब हमारे प्रभु ने अब्राहम के लिए खतना ठहराया, तब उसने पहले उसे यह प्रतिज्ञा दी कि वह उसका और उसके वंश का परमेश्वर होगा, यह घोषणा करते हुए कि वह सर्वसामर्थी है और सब कुछ अपने हाथ में रखता है, ताकि वह उसके लिए हर भली वस्तु की परिपूर्णता और सोता ठहरे। इन शब्दों में अनन्त जीवन की प्रतिज्ञा निहित है, जैसा हमारे प्रभु यीशु मसीह ने समझाया, जब इस बात से कि उसके पिता ने अपने आप को अब्राहम का परमेश्वर कहा, उसने सदूकियों को विश्वासियों की अमरता और पुनरुत्थान के विषय में कायल करने का तर्क निकाला:
“वह मरे हुओं का नहीं, वरन् जीवितों का परमेश्वर है।”
इसी कारण सन्त पौलुस, इफिसियों की दूसरी पत्री में, जब उन्हें वह दयनीय दशा दिखाता है जिससे हमारे प्रभु ने उन्हें छुड़ाया, इस बात से कि वे खतनारहित थे यह निष्कर्ष निकालता है कि वे मसीह से रहित, प्रतिज्ञाओं से अपरिचित, परमेश्वर से रहित और आशा से रहित थे, क्योंकि खतना इन सब बातों की गवाही था।
अब पहला कदम, जिससे हम परमेश्वर के निकट आते और अनन्त जीवन में प्रवेश करते हैं, हमारे पापों की क्षमा है। इसलिए यह निष्कर्ष निकलता है कि यह प्रतिज्ञा बपतिस्मा की उस प्रतिज्ञा के अनुरूप है जो हमारी शुद्धि और धुलाई के विषय में है।
इसके बाद हमारा प्रभु अब्राहम को बताता है कि वह उसे अपने सम्मुख किस प्रकार खरेपन और निर्दोषता में चलाना चाहता है। यह मारे जाने के सिवाय और कुछ नहीं, ताकि नए जीवन में जी उठा जाए। और इसमें कोई सन्देह न रहे कि खतना मारे जाने का चिह्न और प्रतीक था, मूसा व्यवस्थाविवरण के दसवें अध्याय में इसे और स्पष्ट रूप से समझाता है, जब वह इस्राएल के लोगों को उपदेश देता है कि वे प्रभु के लिए अपने हृदय का खतना करें, क्योंकि वे वह लोग हैं जिन्हें उसने पृथ्वी की सब जातियों में से चुना है।
जैसे हमारा प्रभु, अब्राहम के वंशजों को अपने लोग मानकर ग्रहण करते हुए, उन्हें खतना करवाने की आज्ञा देता है, वैसे ही मूसा घोषणा करता है कि उन्हें हृदय में खतना करना चाहिए, ताकि वह दिखाए कि इस शारीरिक खतने का सत्य क्या है। इसके अतिरिक्त, ऐसा न हो कि लोग इस मारे जाने को अपनी ही सामर्थ्य से पाने का प्रयत्न करें, वह उन्हें सिखाता है कि यह हमारे भीतर परमेश्वर के अनुग्रह का कार्य है। ये सब बातें भविष्यद्वक्ताओं में इतनी बार दोहराई गई हैं कि उन पर विस्तार से चर्चा करने की आवश्यकता नहीं।
अतः हमने स्थापित किया है कि खतना पूर्वजों के पास वही आत्मिक प्रतिज्ञा लाया जो बपतिस्मा लाता है, उन्हें उनके पापों की क्षमा और उनके शरीर के मारे जाने को दर्शाते हुए, ताकि वे धार्मिकता के लिए जीएँ। इसके अतिरिक्त, जैसा हम कह चुके कि मसीह, इन बातों की पूर्ति होकर, बपतिस्मा की नींव है, वैसे ही वह खतने की भी नींव है। इसी कारण वह अब्राहम से प्रतिज्ञा किया गया, और उसमें पृथ्वी की सब जातियों की आशीष, मानो हमारा प्रभु कह रहा हो कि सारी पृथ्वी, जो अपने आप में शापित है, उसके द्वारा आशीष पाएगी। फिर खतने का चिह्न इस प्रतिज्ञा पर मुहर लगाने और उसे दृढ़ करने के लिए जोड़ा जाता है।
अब यह जाँचना और परखना अत्यन्त सरल है कि इन दोनों चिह्नों, खतना और बपतिस्मा, में किन बातों में समानता है और किन में भिन्नता। वह प्रतिज्ञा, जिसे हमने संस्कारों की सामर्थ्य कहा है, दोनों में एक ही है: अर्थात् परमेश्वर की दया, पापों की क्षमा और अनन्त जीवन की प्रतिज्ञा। जिस वास्तविकता को दर्शाया जाता है वह भी सदा एक ही है: हमारी शुद्धि और हमारा मारा जाना। इन बातों का कारण और नींव, जो मसीह है, दोनों में उनकी पुष्टि और पूर्ति के लिए विद्यमान है।
इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि भीतरी भेद के विषय में, जिसमें संस्कारों का सारा सार है, जैसा कहा जा चुका, दोनों में कोई अन्तर नहीं। उनके बीच सारा अन्तर केवल बाहरी रीति में है, जो संस्कारों का छोटा भाग है, क्योंकि मुख्य विचार वचन पर और उस वास्तविकता पर निर्भर है जो चिह्नित और प्रदर्शित की जाती है।
इसलिए हम निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि खतने का जो कुछ है वह सब बपतिस्मा का भी है, सिवाय बाहरी और दिखाई देनेवाले अन्तर के। हम इस निष्कर्ष पर पहले बताए गए नियम से पहुँचते हैं: कि सारा पवित्रशास्त्र विश्वास की समानुपातिकता और सादृश्य के अनुसार समझा जाना चाहिए, जो सदा प्रतिज्ञाओं पर दृष्टि रखता है। निस्सन्देह इस विषय में सत्य लगभग हाथ से छूने योग्य है।
क्योंकि जैसे खतना यहूदियों को दिया गया एक चिह्न था, जो मानता था कि परमेश्वर ने उन्हें अपने लोग स्वीकार किया और उन्होंने उसे अपना परमेश्वर माना, और इस प्रकार उनके लिए परमेश्वर की कलीसिया में पहला बाहरी प्रवेश था, वैसे ही बपतिस्मा के द्वारा हम पहले हमारे प्रभु की कलीसिया में ग्रहण किए जाते हैं कि उसके लोगों में पहचाने जाएँ, और हम सब के सामने घोषणा करते हैं कि हम उसे अपना परमेश्वर मानने का इरादा रखते हैं। इससे प्रकट है कि बपतिस्मा खतने का उत्तराधिकारी हुआ है।
अब, यदि कोई पूछे कि क्या बपतिस्मा शिशुओं को परमेश्वर की विधि के अनुसार उनका अधिकार मानकर दिया जाना चाहिए, तो कौन इतना बुद्धिहीन होगा कि आत्मिक भेद पर विचार करने के बजाय अपना उत्तर केवल जल और दिखाई देनेवाले पालन पर आधारित करे? यदि हम उस भेद पर ध्यान दें, तो इसमें कोई सन्देह नहीं कि बपतिस्मा उचित रीति से शिशुओं का है।
क्योंकि जब हमारे प्रभु ने पहले शिशुओं के लिए खतना ठहराया, तब उसने स्पष्ट दिखाया कि वह उन्हें उस सब का भागी बनाता है जिसे वह दर्शाता है। नहीं तो हमें कहना पड़ेगा कि ऐसी विधि झूठ और ढोंग के सिवाय कुछ नहीं थी, वरन् एक धोखा देनेवाली चाल थी, जिसे विश्वासियों के बीच न सुना जा सकता है न सहा जा सकता है। क्योंकि प्रभु स्पष्ट घोषणा करता है कि शिशु को दिया गया खतना उसके लिए उस वाचा की पुष्टि करेगा जो पहले कही जा चुकी है।
इसलिए यदि वाचा सदा एक ही रहती है, तो यह पूर्णतः निश्चित है कि मसीहियों के बच्चे उसके भागी उससे कम नहीं हैं जितने पुराने नियम के अधीन यहूदियों के बच्चे थे। और यदि वे चिह्नित वास्तविकता के भागी हैं, तो संस्कार, जो केवल उसका रूप और प्रदर्शन है, उन्हें क्यों न दिया जाए?
यदि बाहरी चिह्न को वचन से अलग करके देखना हो, तो दोनों में से किसे बड़ा और श्रेष्ठ माना जाए? निश्चय ही, चूँकि चिह्न वचन की सेवा करता है, वह स्पष्टतः निम्न और कम मूल्य का है। अब बपतिस्मा का वचन शिशुओं से कहा गया है। तब वह चिह्न, जो उस वचन पर निर्भर है, उनसे क्यों रोका जाए? यदि यही एक अकेला तर्क होता, तो भी वह हर विरोधी का मुँह बन्द करने के लिए आवश्यकता से अधिक होता।
खतने के लिए ठहराए गए विशेष दिन से जो आपत्ति ली जाती है, वह सर्वथा असंगत है। यह सच है कि प्रभु ने हमें किसी विशेष दिन से नहीं बाँधा, जैसा उसने यहूदियों को बाँधा था, परन्तु उस विषय में हमें स्वतन्त्र छोड़ते हुए भी उसने घोषणा की है कि शिशुओं को गम्भीरता से उसकी वाचा में ग्रहण किया जाना चाहिए। हमें और क्या चाहिए?
तो भी पवित्रशास्त्र हमें सत्य के और भी स्पष्ट ज्ञान की ओर ले जाता है। क्योंकि यह निश्चित है कि वह वाचा जो प्रभु ने एक बार अब्राहम से बाँधी, जब उसने घोषणा की कि वह उसका और उसके वंश का परमेश्वर होगा, आज मसीहियों के बीच उससे कम प्रभावी नहीं है जितनी तब यहूदी लोगों के बीच थी, और यह वचन आज हमसे उससे कम नहीं कहा जाता जितना पुराने नियम के पूर्वजों से कहा गया था। नहीं तो इससे यह निकलेगा कि यीशु मसीह के आने ने परमेश्वर के अनुग्रह और दया को घटा और सीमित कर दिया है, जो बोलने और सुनने दोनों में भयानक निन्दा है।
वरन् जैसे यहूदियों के बच्चे पवित्र वंश कहलाए क्योंकि वे इस वाचा के उत्तराधिकारी थे और इसके द्वारा अविश्वासियों और मूर्तिपूजकों के बच्चों से अलग किए गए थे, वैसे ही मसीहियों के बच्चे उसी कारण पवित्र कहलाते हैं, चाहे केवल एक माता-पिता, पिता या माता, विश्वासी हो; और पवित्रशास्त्र की गवाही से वे सब औरों से अलग पहचाने जाते हैं।
अब, अब्राहम से इस वाचा की प्रतिज्ञा करने के बाद, प्रभु चाहता है कि शिशुओं के लिए बाहरी संस्कार के द्वारा इसकी गवाही दी जाए और इस पर मुहर लगाई जाए।
तब आज इसकी गवाही देने और इस पर मुहर लगाने से बचने के लिए हमारे पास क्या बहाना है, जैसा तब किया जाता था?
यह आपत्ति नहीं उठाई जा सकती कि इस वाचा की गवाही के लिए खतने के सिवाय और कोई संस्कार नहीं ठहराया गया था, जो अब रद्द हो चुका है। उत्तर तैयार है: उस समय के लिए हमारे प्रभु ने खतना ठहराया; तो भी, यद्यपि खतना रद्द हो गया है, वाचा की पुष्टि करने का कारण सदा बना रहता है, क्योंकि वह जितना यहूदियों का है उतना ही हमारा भी है। इसलिए हमें ध्यान से विचार करना चाहिए कि उनके साथ हमारा क्या साझा है और क्या भिन्न। वाचा दोनों के लिए साझी है, और उसकी पुष्टि का कारण भी वही है। एकमात्र अन्तर यह है कि उनके पास उसकी पुष्टि के लिए खतना था, जबकि आज बपतिस्मा हमारे लिए उस रूप में काम करता है।
नहीं तो, मसीह के आने से परमेश्वर की दया हम पर यहूदियों की तुलना में कम पूर्णता से प्रकट होती, यदि वह गवाही जो उनके पास अपने बच्चों के लिए थी हमसे छीन ली जाती। क्योंकि यह बात यीशु मसीह का बहुत अपमान किए बिना नहीं कही जा सकती, जिसके द्वारा प्रभु की असीम भलाई पृथ्वी पर पहले से अधिक पूर्णता और समृद्धि से उँडेली और प्रकट की गई है, इसलिए हमें मानना चाहिए कि परमेश्वर का अनुग्रह अब व्यवस्था की छायाओं के अधीन की तुलना में अधिक छिपा या कम दृढ़ता से निश्चित नहीं होना चाहिए।
इसी कारण हमारे प्रभु यीशु ने, यह दिखाना चाहते हुए कि वह अपने पिता के अनुग्रहों को सीमित करने के बजाय बढ़ाने और बहुगुणित करने आया था, उसके पास लाए गए बच्चों को प्रेम से ग्रहण किया और गले लगाया। उसने अपने प्रेरितों को डाँटा कि वे उन्हें रोकने का प्रयत्न कर रहे थे, क्योंकि वे उन्हें, जिनका स्वर्ग का राज्य है, उसके पास आने से रोक रहे थे जो उसमें जाने का मार्ग और प्रवेश-द्वार है:
“क्योंकि स्वर्ग का राज्य ऐसों ही का है।”
परन्तु कोई पूछेगा: बच्चों को मसीह के गले लगाने और बपतिस्मा में क्या समानता है? क्योंकि यह नहीं कहा गया कि उसने उन्हें बपतिस्मा दिया, केवल यह कि उसने उन्हें ग्रहण किया, गले लगाया और उनके लिए प्रार्थना की। इसलिए यदि हम अपने प्रभु के उदाहरण का ठीक अनुसरण करना चाहें, तो हमें शिशुओं को बपतिस्मा देने के बजाय उनके लिए प्रार्थना करनी चाहिए, क्योंकि उसने ऐसा नहीं किया।
फिर भी हमें पवित्रशास्त्र की शिक्षा को ऐसे लोगों से कुछ अधिक ध्यान से तौलना चाहिए। यह छोटी बात नहीं कि यीशु मसीह चाहता है कि बच्चे उसके पास लाए जाएँ, और कारण जोड़ता है कि स्वर्ग का राज्य ऐसों का है। फिर वह अपने कार्यों से अपनी इच्छा और प्रकट करता है, कि वह उन्हें गले लगाता है और उनके लिए प्रार्थना करता है।
यदि बच्चों को यीशु मसीह के पास लाना उचित है, तो उन्हें बपतिस्मा में ग्रहण करना क्यों वैध न हो, जो वह बाहरी चिह्न है जिसके द्वारा यीशु मसीह हमें उस सहभागिता की घोषणा करता है जो हमारी उसमें है? यदि स्वर्ग का राज्य उनका है, तो उन्हें वह चिह्न क्यों न दिया जाए जिसके द्वारा हमें मानो कलीसिया में प्रवेश दिया जाता है और परमेश्वर के राज्य के उत्तराधिकारी घोषित किए जाते हैं? क्या हम बड़े अन्यायी न होंगे यदि उन्हें भगाएँ जिन्हें हमारा प्रभु अपने पास बुलाता है, उन्हें वह देने से इनकार करें जो वह उन्हें देता है, और जब वह द्वार खोलता है तब उनके विरुद्ध द्वार बन्द कर दें?
और यदि कोई यह हठ करे कि यीशु मसीह ने जो किया उसे बपतिस्मा से अलग करना चाहिए, तो दोनों में से किसे बड़ा माना जाए: यह कि यीशु मसीह उन्हें ग्रहण करता है, पवित्र किए जाने के चिह्न के रूप में उन पर हाथ रखता है और उनके लिए प्रार्थना करता है, और इस प्रकार दिखाता है कि वे उसके हैं; या यह कि बपतिस्मा के द्वारा हम गवाही देते हैं कि वे उसकी वाचा के हैं? इस अंश से बच निकलने के लिए जो और हुज्जतें उठाई जाती हैं वे सर्वथा निरर्थक हैं।
क्योंकि यह तर्क देना कि वे पहले से बड़े बच्चे थे, केवल इसलिए कि यीशु मसीह कहता है कि उन्हें आने दिया जाए, पवित्रशास्त्र का बहुत स्पष्ट विरोध करता है, जो उन्हें छोटे शिशु कहता है जिन्हें उठाकर लाना पड़ा। इसलिए आने दो शब्द की व्याख्या सीधे पास आने दो के रूप में करनी चाहिए। इसी प्रकार जो हठपूर्वक सत्य का विरोध करते हैं, वे हर शब्दांश में बच निकलने का कोई बहाना ढूँढ़ते हैं।
औरों की यह आपत्ति भी कि यह नहीं कहा गया कि स्वर्ग का राज्य शिशुओं का है, वरन् केवल उनका जो उनके समान हैं, एक निरा बहाना है। क्योंकि यदि वह व्याख्या मान ली जाए, तो बच्चों को अपने पास आने देने के हमारे प्रभु के कारण में क्या बल रहेगा? जब वह कहता है, “बच्चों को मेरे पास आने दो,” तो इससे अधिक निश्चित कुछ नहीं कि वह उन बच्चों के विषय में बोल रहा है जो आयु में छोटे हैं। फिर यह दिखाने के लिए कि यह उचित है, वह जोड़ता है, “क्योंकि स्वर्ग का राज्य ऐसों ही का है।” बच्चे इन शब्दों में अनिवार्यतः सम्मिलित हैं। इसलिए ऐसों का पद इस प्रकार समझना चाहिए: स्वर्ग का राज्य उनका और उनके समान लोगों का है।
अब ऐसा कोई नहीं जो यह न देख सके कि शिशु-बपतिस्मा मनुष्यों का उतावला गढ़ा हुआ नहीं है, क्योंकि उसे पवित्रशास्त्र की ऐसी स्पष्ट स्वीकृति प्राप्त है। न ही कुछ लोगों की इस आपत्ति में कोई बल है कि पवित्रशास्त्र यह नहीं दिखा सकता कि प्रेरितों ने कभी किसी शिशु को बपतिस्मा दिया। क्योंकि यद्यपि हम मानते हैं कि यह स्पष्ट रूप से नहीं कहा गया, इससे यह नहीं निकलता कि प्रेरितों ने शिशुओं को बपतिस्मा नहीं दिया, क्योंकि जब सारे घराने के बपतिस्मा लेने का उल्लेख होता है तब शिशु कभी बाहर नहीं किए जाते।
इसी तर्क से हम यह दावा कर सकते हैं कि स्त्रियों को हमारे प्रभु के भोज में सम्मिलित नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि पवित्रशास्त्र में कहीं स्पष्ट नहीं कहा गया कि उन्होंने प्रेरितों के समय में उसमें भाग लिया। परन्तु इस विषय में हम ठीक ही विश्वास के नियम का अनुसरण करते हैं, केवल यह विचारते हुए कि क्या प्रभु-भोज की विधि उन पर लागू होती है और क्या हमारे प्रभु के अभिप्राय के अनुसार वह उन्हें दिया जाना चाहिए। हम बपतिस्मा के साथ भी इसी प्रकार चलते हैं। क्योंकि जब हम उन पर विचार करते हैं जिनके लिए वह ठहराया गया, तो पाते हैं कि वह शिशुओं का उतना ही है जितना वयस्कों का। इसलिए उन्हें उससे बाहर रखना प्रभु के अभिप्राय को निष्फल करना होगा।
किसी भी दशा में, जो वे फैलाते हैं वह निरा झूठ है: कि शिशु-बपतिस्मा प्रेरितों के समय के बहुत बाद आरम्भ हुआ। क्योंकि हमारे पास आरम्भिक कलीसिया के समय का ऐसा कोई इतिहास नहीं जो इतना प्राचीन हो और यह गवाही न देता हो कि वह उस समय भी प्रचलित था।
अब यह दिखाना शेष है कि विश्वासियों को अपने बच्चों को बपतिस्मा देने की इस प्रथा से क्या लाभ मिलता है, और स्वयं बच्चों को इतनी आयु में बपतिस्मा पाने से क्या लाभ मिलता है। क्योंकि कुछ लोग इसे निरर्थक और महत्त्वहीन कहकर ठुकराते हैं। इसमें वे बहुत भूल करते हैं।
यदि और कोई विचार न भी होता, केवल इतना कि ऐसा करके वे प्रभु की ठहराई हुई खतने की विधि का उपहास करते हैं, जिसका वही मूल्य और महत्त्व है, तो यही उनकी उतावली और धृष्टता को रोकने के लिए पर्याप्त कारण होता, क्योंकि वे मूर्खता और अविवेक से हर उस बात की निन्दा करते हैं जिसे उनकी शारीरिक समझ नहीं समझ सकती।
परन्तु हमारे प्रभु ने उनके मूर्ख अहंकार को गिराने का और भी पूर्ण प्रबन्ध किया है। क्योंकि उसने अपनी इच्छा को इतना छिपा नहीं रखा कि अपनी विधि का स्पष्ट लाभ न दिखाया हो। शिशुओं को दिया गया चिह्न एक मुहर है जो उस प्रतिज्ञा की पुष्टि करती और मानो अनुमोदन करती है जो हमारे प्रभु ने अपने विश्वासियों से की है: कि वह अपनी दया न केवल उन पर, वरन् उनकी सन्तान पर भी, हज़ार पीढ़ियों तक उँडेलेगा।
इसमें, पहला, परमेश्वर की भलाई की गवाही दी जाती है कि उसका नाम बड़ा और ऊँचा किया जाए। दूसरा, विश्वासी को सान्त्वना मिलती है और उसे अपने आप को पूरी तरह परमेश्वर को समर्पित करने का और साहस मिलता है, जब वह देखता है कि वह कृपालु प्रभु न केवल उसकी, वरन् उसके बच्चों और उसकी सन्तान की भी चिन्ता करता है।
न कोई यह कहे कि केवल प्रतिज्ञा ही हमें अपने बच्चों के उद्धार का निश्चय दिलाने के लिए पर्याप्त होती। परमेश्वर ने अन्यथा ठहराया है, और हमारे विश्वास की निर्बलता को जानकर इस विषय में उसे सहारा देना चाहा है। इसलिए जो सब इस प्रतिज्ञा पर, कि परमेश्वर उनकी सन्तान पर दया करना चाहता है, पक्के भरोसे के साथ टिके हैं, उनका कर्तव्य है कि अपने बच्चों को उस दया का चिह्न पाने के लिए प्रस्तुत करें। इसमें वे सान्त्वना और बल पा सकते हैं जब वे अपनी आँखों से अपने बच्चों की देहों पर प्रभु की वाचा की मुहर लगी देखते हैं।
बच्चे को जो लाभ पहुँचता है वह यह है कि मसीही कलीसिया, उसे अपनी देह का अंग पहचानकर, उसकी विशेष देखभाल करती है। और जब वह बड़ा होता है, तो उसके पास उस प्रभु की सेवा के प्रति अधिक झुकाव का कारण होता है, जिसने बच्चे के उसे जानने से पहले ही अपने आप को उसका पिता घोषित किया और उसे उसकी माता के गर्भ से ही अपने लोगों में ग्रहण किया।
अन्त में, हमें इस चेतावनी से सदा डरना चाहिए: यदि हम अपने बच्चों को वाचा के चिह्न से चिह्नित करना उपेक्षित करें, तो प्रभु हमसे बदला लेगा, क्योंकि ऐसा करके हम उस लाभ को ठुकराते हैं जो वह हमें देता है।
अब हम उन तर्कों पर आएँ जिनके द्वारा दुष्ट आत्मा ने परमेश्वर के वचन से चिपके रहने का दिखावा करके बहुतों को भूल और छल में फँसाना चाहा है। आइए विचार करें कि शैतान की उन सब युक्तियों में कितना बल है, जिनसे उसने प्रभु की इस पवित्र विधि को उलटने का प्रयत्न किया है, जो उसकी कलीसिया में सदा, जैसा उचित था, श्रद्धापूर्वक मानी जाती रही है।
जिन्हें शैतान इस विषय में परमेश्वर के निश्चित वचन का खण्डन करने को प्रेरित करता है, वे खतने और बपतिस्मा की उस तुलना से, जो हमने की है, अपने आप को कड़ाई से दबा हुआ और सामर्थ्य से खण्डित पाते हैं। इसलिए वे इन दोनों चिह्नों के बीच कोई बड़ा भेद स्थापित करने का प्रयत्न करते हैं, ताकि एक का कुछ भी दूसरे पर लागू न हो सके। पहला, वे कहते हैं कि चिह्नित वास्तविकता भिन्न है। दूसरा, कि वाचा सर्वथा भिन्न है। तीसरा, कि बच्चों को भिन्न-भिन्न अर्थों में समझना चाहिए।
पहली बात को सिद्ध करने के प्रयास में वे दलील देते हैं कि खतना मारे जाने का प्रतीक था, परन्तु बपतिस्मा नहीं था। यह हम उन्हें अत्यन्त प्रसन्नता से मान लेते हैं, क्योंकि यह हमारे पक्ष में है। वास्तव में अपना दावा सिद्ध करने के लिए हम इन्हीं शब्दों के सिवाय और कुछ प्रयोग नहीं करते: खतना और बपतिस्मा दोनों समान रूप से मारे जाने को दर्शाते हैं। इससे हम निष्कर्ष निकालते हैं कि बपतिस्मा खतने का उत्तराधिकारी है, क्योंकि वह मसीहियों के लिए वही वास्तविकता बताता है जो खतना यहूदियों के लिए बताता था।
उनके दूसरे कथन के विषय में, वे यह दिखाते हैं कि वे कितने बावले हो गए हैं, केवल एक अंश को झूठी व्याख्या से उलटकर नहीं, वरन् सारे पवित्रशास्त्र को उलटकर। क्योंकि वे यहूदियों को एक शारीरिक और पशु-तुल्य जाति के रूप में चित्रित करते हैं, जिसकी परमेश्वर के साथ केवल सांसारिक जीवन के विषय में वाचा थी और केवल वर्तमान तथा नाशमान आशीषों के विषय में प्रतिज्ञा थी। यह कहने में इसके सिवाय क्या बचता है कि हम उस जाति को सूअरों का झुण्ड मानें जिन्हें हमारे प्रभु ने नाँद पर खिलाने के लिए चुना, और फिर उन्हें सदा के लिए नाश होने को छोड़ दिया? क्योंकि जब कभी हम खतने और उसके साथ जुड़ी प्रतिज्ञाओं का सहारा लेते हैं, वे तुरन्त उत्तर देते हैं कि वह एक शाब्दिक चिह्न था और उसकी प्रतिज्ञाएँ शारीरिक थीं।
परन्तु यदि खतना एक शाब्दिक चिह्न था, तो बपतिस्मा भी वैसा ही होना चाहिए, क्योंकि सन्त पौलुस, कुलुस्सियों की दूसरी पत्री में, एक को दूसरे से अधिक आत्मिक नहीं ठहराता:
“उसमें तुम्हारा ऐसा खतना हुआ जो हाथों से नहीं होता, जब तुमने अपने शरीर में बसे पाप की देह को उतार डाला, जो मसीह का खतना है। तब तुम बपतिस्मा में उसके साथ गाड़े गए।”
इस अंश का और क्या अर्थ हो सकता है सिवाय इसके कि बपतिस्मा की पूर्ति खतने की पूर्ति है, क्योंकि दोनों एक ही वास्तविकता को दर्शाते हैं? क्योंकि सन्त पौलुस यह दिखाना चाहता है कि मसीहियों के लिए बपतिस्मा वही है जो पहले यहूदियों के लिए खतना था।
अब, चूँकि हम पहले ही स्पष्ट दिखा चुके हैं कि इन दोनों चिह्नों की प्रतिज्ञाओं और उनमें दर्शाए गए भेदों में कोई अन्तर नहीं, हम इस पर और नहीं ठहरेंगे। हम केवल विश्वासियों को चेताएँगे कि वे विचार करें कि क्या ऐसे चिह्न को शारीरिक और शाब्दिक माना जाना चाहिए जिसमें जो कुछ है वह सब आत्मिक और स्वर्गीय है।
तो भी, क्योंकि वे अपने झूठ को सच का रूप देने के लिए कुछ अंश प्रस्तुत करते हैं, हम संक्षेप में हर उस आपत्ति का समाधान करेंगे जो वे उठा सकते हैं। यह निश्चित है कि मुख्य प्रतिज्ञाएँ जो हमारे प्रभु ने पुराने नियम के अधीन अपने लोगों को दीं, वे प्रतिज्ञाएँ जिनमें उनके साथ उसकी वाचा थी, आत्मिक थीं और अनन्त जीवन से सम्बन्ध रखती थीं। पूर्वजों ने उन्हें आत्मिक रीति से ही समझा भी, ताकि वे आनेवाली महिमा की आशा बाँधें और अपनी सारी भावना से उसकी ओर खिंचें। तो भी, हम इनकार नहीं करते कि उसने उनके प्रति अपनी भली इच्छा की गवाही अन्य शारीरिक और सांसारिक प्रतिज्ञाओं के द्वारा भी दी, परन्तु वे आत्मिक प्रतिज्ञाओं की पुष्टि करने का काम करती थीं।
यही बात बपतिस्मा के विषय में भी कही जा सकती है, उन लोगों की भूल का खण्डन करने के लिए जो उसमें जल के सिवाय और कुछ नहीं खोजते।
तो फिर प्रेरित का क्या आशय है जब वह अन्यत्र सिखाता है कि अब्राहम के सच्चे बच्चे शरीर के नहीं हैं, वरन् केवल प्रतिज्ञा के बच्चे ही उसकी सन्तान गिने जाते हैं? इन शब्दों से लगता है कि अब्राहम के शारीरिक वंश से उत्पत्ति का कोई लाभ नहीं। यहाँ हमें सन्त पौलुस के अभिप्राय को ध्यान से देखना चाहिए।
यहूदियों को दिखाने के लिए कि परमेश्वर का अनुग्रह अब्राहम की शारीरिक सन्तान से बँधा नहीं है, और ऐसे शारीरिक सम्बन्ध का अपने आप में कोई मूल्य नहीं, वह रोमियों के नौवें अध्याय में उनके सामने इश्माएल और एसाव को रखता है। अब्राहम के वंशज होते हुए भी वे परायों की भाँति ठुकराए गए, जबकि आशीष इसहाक और याकूब में स्थापित हुई। इससे वह निष्कर्ष निकलता है जो उसने बाद में निकाला: उद्धार परमेश्वर की दया पर निर्भर है, जो वह जिस पर चाहता है उस पर करता है। इसलिए यदि यहूदी उसके वचन का पालन न करें, तो उनके पास यह घमण्ड करने का कोई आधार नहीं कि वे परमेश्वर की कलीसिया हैं।
तो भी, इस प्रकार उनके व्यर्थ घमण्ड को ताड़ना देने के बाद, सन्त पौलुस यह भी मानता है कि अब्राहम से उसके और उसकी सन्तान के लिए बाँधी गई वाचा निर्मूल्य नहीं थी, वरन् सदा अपना बल बनाए रखती थी।
इसलिए ग्यारहवें अध्याय में वह घोषणा करता है कि उसे तुच्छ नहीं जानना चाहिए और यहूदी सुसमाचार के उचित और मूल उत्तराधिकारी हैं। केवल अपनी कृतघ्नता से ही वे अपने आप को उसके अयोग्य बनाते हैं। फिर भी, वे चाहे जितने अविश्वासी हों, वह उन्हें अब भी उस पवित्र पूर्वज-परम्परा के कारण पवित्र कहता है जिससे वे उत्पन्न हुए हैं। वह कहता है कि उनकी तुलना में हम केवल बौनी डालियाँ हैं जो उनकी जड़ में लेकर कलम की भाँति जोड़ी गईं, जबकि वे स्वाभाविक डालियाँ हैं।
