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अध्याय एक: परमेश्वर का ज्ञान (भाग 1/2)
अध्याय एक
परमेश्वर का ज्ञान
हमारी लगभग सारी बुद्धि—वह बुद्धि जो सच्ची और निश्चित कहलाने के योग्य है—दो भागों में समाई हुई है: परमेश्वर का ज्ञान और अपना ज्ञान।
पहला ज्ञान हमें न केवल यह दिखाए कि एक ही परमेश्वर है जिसकी सब को उपासना और आदर करना चाहिए, वरन् यह भी कि वही सारे सत्य, बुद्धि, भलाई, धार्मिकता, न्याय, दया, सामर्थ्य और पवित्रता का सोता है। इस प्रकार हम इन सब वस्तुओं की आशा और खोज उसी से रखना सीखते हैं, और इसके अतिरिक्त स्तुति और धन्यवाद के साथ यह मानना भी कि ये सब उसी से निकलती हैं।
दूसरा ज्ञान हमारी निर्बलता, दुर्दशा, व्यर्थता और नीचता को दिखाकर हमें दीनता, अपने पर अविश्वास और अपने प्रति घृणा की ओर ले जाता है। तब वह हमारे भीतर परमेश्वर को खोजने की अभिलाषा जगाता है, क्योंकि हमारा सारा भला उसी में बसा है, और उससे हम अपने आप को रिक्त और वंचित पाते हैं।
अब यह जान लेना सरल नहीं कि इन दो प्रकार के ज्ञानों में कौन-सा पहले आता है और दूसरे को उत्पन्न करता है। क्योंकि जब मनुष्य में दुर्दशा का एक पूरा संसार पाया जाता है, तो हम अपने आप को ठीक से देख ही नहीं सकते कि अपनी दुर्गति के ज्ञान से छिद न जाएँ और उससे प्रभावित न हों, और फिर तुरन्त अपनी आँखें परमेश्वर की ओर न उठाएँ और कम से कम उसका कुछ ज्ञान न पा लें।
इस प्रकार, अपनी तुच्छता, अज्ञानता, व्यर्थता, और अपनी कुटिलता और भ्रष्टता के बोध के द्वारा हम पहचानते हैं कि सच्ची महानता, बुद्धि, सत्य, धार्मिकता और शुद्धता परमेश्वर ही में निवास करती हैं।
अन्ततः, हमारी दुर्दशाएँ हमें प्रभु की आशीषों पर विचार करने को प्रेरित करती हैं; और जब तक हम अपने आप से पूरी तरह अप्रसन्न होने न लगें, तब तक हम गम्भीरता से उसकी अभिलाषा नहीं कर सकते। क्योंकि मनुष्यों में कौन है जो स्वेच्छा से अपने आप में सन्तुष्ट न रहे? वरन् कौन अपने आप में सन्तुष्ट नहीं रहता, जब तक कि अपने विषय में अज्ञानी होने के कारण वह अपनी ही योग्यताओं से सन्तुष्ट रहता है और अपनी दुर्दशा को नहीं पहचानता?
इसलिए हम में से हर एक को अपने ज्ञान के द्वारा न केवल परमेश्वर को खोजने की प्रेरणा मिलती है, वरन् वह मानो हाथ पकड़कर उसे पाने की ओर चलाया और ले जाया भी जाता है।
दूसरी ओर, यह प्रत्यक्ष है कि मनुष्य को अपना स्पष्ट ज्ञान तब तक कभी नहीं होता जब तक वह पहले प्रभु के मुख का दर्शन न कर ले और उस पर विचार करने के बाद नीचे उतरकर अपनी जाँच न करे। क्योंकि यह अहंकार हम सब में जड़ पकड़े हुए है: हमें सदा यही लगता है कि हम धर्मी, सच्चे, बुद्धिमान और पवित्र हैं, जब तक कि अधर्म, झूठ, मूर्खता और अशुद्धता के अकाट्य प्रमाणों से हम दोषी न ठहराए जाएँ।
परन्तु यदि हम केवल अपने ही को देखें और प्रभु की ओर न देखें, जो एकमात्र मापदण्ड है जिसके अनुसार इस न्याय को ढलना चाहिए, तो हम इस प्रकार दोषी नहीं ठहरते। क्योंकि हम सब स्वभाव से कपट की ओर झुके हैं, इसलिए यथार्थ के स्थान पर धार्मिकता का खोखला दिखावा ही हमें भरपूर सन्तुष्ट कर देता है। और क्योंकि हमारे चारों ओर कुछ भी ऐसा नहीं जो बहुत अशुद्ध न हो, इसलिए जो कुछ थोड़ा कम दूषित है उसे हम पूर्णतः शुद्ध मान लेते हैं, जब तक हम अपने मन को अपनी मानवता की सीमाओं के भीतर, जो पूरी तरह भ्रष्ट हो चुकी है, बाँधे रखते हैं।
यह वैसा ही है जैसे वह आँख, जो काले रंग की वस्तुओं के सिवा कुछ नहीं देखती, उस वस्तु को जिसमें केवल धुँधली-सी श्वेतता है—या जो आधी धूसर भी है—संसार की सबसे श्वेत वस्तु मान लेती है।
शारीरिक दृष्टि से ली गई एक और तुलना और भी स्पष्टता से दिखाएगी कि आत्मा के गुणों का आकलन करने में हम अपने आप को कितना धोखा देते हैं। क्योंकि यदि दिन के उजाले में हम धरती की ओर नीचे देखें, या अपने आसपास की वस्तुओं को निहारें, तो हमें निश्चय ही लगता है कि हमारी दृष्टि असाधारण रूप से प्रबल और स्पष्ट है। परन्तु जब हम अपनी आँखें सीधे सूर्य की ओर उठाते हैं, तो जो शक्ति धरती की ओर लगी हुई इतनी प्रबल दिखाई देती थी, वह इतने बड़े प्रकाश से चकराकर चौंधिया जाती है। इसलिए हमें मानना पड़ता है कि जिस तीव्र दृष्टि से हम पार्थिव वस्तुओं को जाँचते हैं, वह सूर्य की ओर लगाने पर अत्यन्त निर्बल और क्षीण है।
अपनी आत्मिक योग्यताओं का मूल्यांकन करते समय भी ठीक यही होता है। जब तक हमारा चिन्तन पृथ्वी से ऊपर नहीं उठता, तब तक हम अपनी धार्मिकता, बुद्धि और सद्गुण से पूर्णतः सन्तुष्ट रहते हैं। हम अपनी चापलूसी और प्रशंसा करते हैं और अपने आप को अर्धदेवता समझने के बहुत निकट पहुँच जाते हैं।
परन्तु जैसे ही हम अपने विचारों को प्रभु की ओर लगाते हैं और उसकी धार्मिकता, बुद्धि और सामर्थ्य की सिद्धता को पहचानते हैं—वही मापदण्ड जिससे हमें नापा जाना है—तब जो कुछ पहले धार्मिकता के रूप में हमें भाता था, वह सबसे बड़े अधर्म से मलिन दिखाई देगा; जिसने बुद्धि का वेश धरकर हमें अद्भुत रीति से भरमाया था, वह पूरी मूर्खता प्रकट होगा; और जिसमें सामर्थ्य का रूप था, वह दयनीय निर्बलता ठहरेगा। हम में जो कुछ सबसे सिद्ध दिखाई देता है, वह भी उस पवित्रता से इतनी दूर है जो परमेश्वर में है।
इसी से वह भय और विस्मय उत्पन्न होता है, जिससे अभिभूत होने की बात पवित्रशास्त्र हमें बार-बार बताता है, जब-जब विश्वासियों ने परमेश्वर की उपस्थिति को अनुभव किया। क्योंकि जब हम देखते हैं कि जो लोग प्रभु के अनुपस्थित-से दिखाई देने पर दृढ़ और निश्चिन्त खड़े रहे, वे जैसे ही वह उन पर अपनी महिमा प्रकट करता है, काँप उठते और भयभीत हो जाते हैं—इतने भयभीत कि मानो मृत्यु के आतंक में निगल लिए जाएँ और लगभग शून्य हो जाएँ—तो हम इससे समझ सकते हैं कि मनुष्य अपनी निर्बलता के ज्ञान से तब तक पर्याप्त रूप से प्रभावित नहीं होता जब तक वह अपनी तुलना परमेश्वर की महिमा से न कर ले।
इस आतंक के अनेक उदाहरण हमें न्यायियों और भविष्यद्वक्ताओं दोनों में मिलते हैं। वरन् परमेश्वर की प्रजा में यह कथन प्रचलित था: “हम मर जाएँगे, क्योंकि प्रभु ने हमें दर्शन दिया है।” —न्यायियों 13; न्यायियों 6; यहेजकेल 1।
इसलिए जब अय्यूब की पुस्तक मनुष्यों को उनकी मूर्खता, निर्बलता और भ्रष्टता के ज्ञान द्वारा दीन करना चाहती है, तो वह अपना मुख्य तर्क निरन्तर परमेश्वर की बुद्धि, सामर्थ्य और पवित्रता के वर्णन से लेती है—और यह अकारण नहीं है।
क्योंकि हम देखते हैं कि अब्राहम प्रभु की महिमा के दर्शन के जितना निकट आता है, उतना ही अधिक अपने आप को मिट्टी और राख मानता है। —उत्पत्ति 18।
हम देखते हैं कि एलिय्याह परमेश्वर की उपस्थिति को खुले मुख से सह नहीं सकता, उसे देखने का उसे इतना भय है। —1 राजा 19।
तो फिर मनुष्य क्या करेगा—वह मनुष्य जो भ्रष्टता और कीड़े के सिवा कुछ नहीं—जब करूबों तक को अत्यन्त भय और श्रद्धा के कारण अपने मुख ढाँपने पड़ते हैं?
भविष्यद्वक्ता यशायाह का यही आशय है जब वह कहता है कि जब सेनाओं का यहोवा राज्य करेगा तब सूर्य लज्जित और चन्द्रमा व्याकुल होगा। अर्थात् जब वह अपना तेज ऊँचा करके प्रकट करेगा, तब जो कुछ और समय सबसे अधिक चमकता है, वह उसकी तुलना में अन्धकारमय हो जाएगा। —यशायाह 24।
फिर भी, यद्यपि परमेश्वर का ज्ञान और अपना ज्ञान परस्पर जुड़े हुए हैं, उचित क्रम यह माँगता है कि हम पहले परमेश्वर के ज्ञान का वर्णन करें और उसके बाद दूसरे ज्ञान की ओर उतरें।
हम इसे निस्सन्देह मानते हैं कि स्वाभाविक झुकाव से मानव मन में परमेश्वरीय वस्तुओं का कुछ बोध विद्यमान है, ताकि कोई अज्ञानता की दुहाई देकर शरण न ले सके। प्रभु ने हर एक को अपनी महिमा की कुछ समझ दी है, ताकि सब मनुष्य यह जानते हुए कि परमेश्वर है और वही उनका सृष्टिकर्ता है, उसका आदर न करने और अपना जीवन उसकी इच्छा पूरी करने में न लगाने के कारण अपनी ही गवाही से दोषी ठहरें।
निश्चय ही, यदि मनुष्यों में कहीं हम ऐसी अज्ञानता ढूँढ़ें कि परमेश्वर बिलकुल अज्ञात रहा हो, तो उसके मिलने की सबसे अधिक सम्भावना सबसे अशिष्ट जातियों में दिखती है, जो सभ्यता और मानवता से सबसे दूर हैं। फिर भी, जैसा कि अन्यजाति भी मानते हैं, कोई राष्ट्र इतना बर्बर और कोई जाति इतनी जंगली नहीं जिसके हृदय में यह धारणा न हो कि कोई परमेश्वर है।
वे लोग भी, जो जीवन के अन्य क्षेत्रों में पशुओं से मुश्किल से भिन्न दिखाई देते हैं, तब भी धर्म का कोई बीज सदा अपने पास रखते हैं। यह सर्वव्यापी धारणा हर मन में इतनी गहरी जड़ पकड़ चुकी है और हर हृदय में इतनी स्थिर हो गई है।
इसलिए, चूँकि संसार के आरम्भ से कोई प्रदेश, नगर, यहाँ तक कि कोई घराना भी धर्म के बिना टिक नहीं सका, इसमें हमें एक प्रकार की मौन स्वीकारोक्ति मिलती है कि परमेश्वरीय वस्तुओं का बोध सब मनुष्यों के हृदयों पर खुदा हुआ है।
वरन् मूर्तिपूजा स्वयं ही इस धारणा का भरपूर प्रमाण देती है। क्योंकि हम जानते हैं कि मनुष्य स्वयं को दीन करने और अन्य प्राणियों को अपने से अधिक आदर देने के कितना अनिच्छुक है। इसलिए जब वह यह सोचा जाना कि उसका कोई परमेश्वर नहीं, उससे अधिक यह पसन्द करता है कि लकड़ी और पत्थर की उपासना करे, तो प्रत्यक्ष है कि परमेश्वरीय महिमा की यह छाप कितनी प्रबल होनी चाहिए। वह मानव मन से मिटाई नहीं जा सकती; वरन् मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति का टूट जाना अधिक सरल है—जैसा कि निश्चय ही तब होता है जब मनुष्य अपने घमण्ड और अहंकार से उतरकर परमेश्वर के प्रति श्रद्धा दिखाने के लिए पृथ्वी के नीच से नीच प्राणियों के नीचे स्वेच्छा से दीन हो जाता है।
इसलिए यह एक झूठा मत है, जिसे कुछ लोग मानते हैं, कि धर्म का आविष्कार आरम्भ में कुछ लोगों की चालाकी और छल से इसलिए किया गया कि सीधे-सादे साधारण लोगों को नियन्त्रित और आज्ञाकारी रखा जाए—मानो जिन्होंने दूसरों को परमेश्वर की उपासना करने को प्रेरित किया, उनके अपने मन में परमेश्वरीय वस्तुओं की कोई धारणा ही न थी।
मैं सहर्ष मानता हूँ कि अन्यजातियों में कुछ चतुर और कपटी लोगों ने साधारण जनों में भय उत्पन्न करने और अन्धविश्वासी संकोच जगाने के लिए धर्म में बहुत कुछ गढ़ा, ताकि उन्हें अधिक आज्ञाकारी और सरलता से शासित होने योग्य बना सकें। परन्तु वे यह कभी सिद्ध नहीं कर सकते थे यदि मनुष्यों के मन पहले से इस दृढ़ धारणा में स्थिर न होते कि परमेश्वर है। उसी स्रोत से उनके विषय में कही गई बातों पर विश्वास करने की उनकी सारी प्रवृत्ति उठी।
न ही हमें यह मान लेना चाहिए कि जिन्होंने धर्म के बहाने सीधे-सादे लोगों को धोखा दिया, वे स्वयं इस धारणा से पूर्णतः रिक्त और वंचित थे कि परमेश्वर है। क्योंकि यद्यपि प्राचीन काल में कुछ लोग थे—और आज बहुत हैं—जो हर देवता का इनकार करते हैं, तथापि वे चाहें या न चाहें, उसे निरन्तर अनुभव करते हैं जिसे वे जानना नहीं चाहते।
हम किसी ऐसे मनुष्य के विषय में नहीं पढ़ते जिसने रोमी सम्राट गायुस कालिगुला से अधिक साहसी और अति उद्दण्ड रीति से परमेश्वर का तिरस्कार करने में अपने आप को डुबोया हो। फिर भी परमेश्वर के क्रोध का कोई भी चिन्ह प्रकट होने पर उससे अधिक दयनीय रीति से कोई नहीं काँपा। इस प्रकार अपनी इच्छा के विरुद्ध वह उसी परमेश्वर से डरता था जिसे वह जानबूझकर तुच्छ ठहराना चाहता था।
उसके समान लोगों के साथ तुम सामान्यतः यही होता देखोगे। क्योंकि जो जितनी निर्भीकता से परमेश्वर का तिरस्कार करता है, वह उतनी ही सरलता से पेड़ से गिरते हुए पत्ते की आहट से भी भयभीत हो जाता है। यह कहाँ से उठता है, सिवाय इसके कि परमेश्वर की महिमा उनसे बदला लेती है, उनके विवेकों को और भी अधिक डराकर, जितना वे उससे भागने का यत्न करते हैं?
वे छिपने का हर सम्भव स्थान खोजते हैं जहाँ परमेश्वर की उपस्थिति से हट जाएँ, और अपने मन से उसकी स्मृति मिटाने का प्रयत्न करते हैं। परन्तु वे चाहें या न चाहें, वे उससे कसकर घिरे रहते हैं। यद्यपि कभी-कभी वह क्षण भर के लिए लुप्त होता दिखाई दे, तथापि वह सदा लौट आता है और पहले से अधिक बल से उन्हें फिर दबाता है।
इस प्रकार, यदि उन्हें विवेक की पीड़ा से कुछ राहत मिलती भी है, तो वह शराबियों या पागलों की नींद से बहुत भिन्न नहीं, जो सोते हुए भी चैन से नहीं सोते, क्योंकि भयावने दर्शन और स्वप्न उन्हें निरन्तर सताते रहते हैं।
इसलिए बड़े से बड़े दुष्ट भी हमारे सामने इसका उदाहरण देते हैं कि परमेश्वर का ज्ञान सब मनुष्यों के हृदयों में कुछ सामर्थ्य सर्वत्र बनाए रखता है।
हम पहले कह चुके हैं कि परमेश्वर के ज्ञान को हम में यह प्रभाव उत्पन्न करना चाहिए: हमारे हृदयों में धर्म का कोई बीज बोना। पहले, उसे हमें परमेश्वर के भय और श्रद्धा की शिक्षा देनी चाहिए; उसके बाद, यह सिखाना चाहिए कि हर भली वस्तु उसी में खोजी जानी चाहिए और उसके लिए सारी कृतज्ञता उसी की देन है।
क्योंकि परमेश्वर का कोई विचार तुम्हारे मन में कैसे आ सकता है और तुम तुरन्त यह न सोचो कि चूँकि तुम उसकी रचना हो, इसलिए सृष्टि के अधिकार से तुम उसके अधिकार के अधीन और समर्पित हो; कि तुम्हारा जीवन उसकी सेवा में लगना चाहिए; और जो कुछ तुम ठानते, कहते और करते हो वह सब उसी की ओर निर्देशित होना चाहिए?
यदि ऐसा है, तो स्पष्ट ही यह निष्कर्ष निकलता है कि तुम्हारा जीवन बिगड़ी हुई रीति से व्यवस्थित है जब तक वह उसकी पवित्र इच्छा की आज्ञाकारिता में नियमित न हो।
दूसरी ओर, तुम उसे स्पष्टता से तब तक नहीं समझ सकते जब तक यह न मानो कि वही हर भलाई का सोता और स्रोत है। इसी विचार से उसके साथ एक हो जाने की अभिलाषा और उसकी भलाई में एक भरोसा उत्पन्न होता, यदि मानवीय समझ अपनी कुटिलता के कारण उसकी उचित खोज से हटा न दी जाती।
परन्तु दोनों बातों में हम सब में एक अद्भुत व्यर्थता और मूर्खता प्रकट होती है। क्योंकि यद्यपि हमारे सारे जीवन को उसकी निरन्तर आज्ञाकारिता से संचालित होना चाहिए, हम अपने लगभग सब कामों में उसका विरोध करते हैं और फिर कुछ तुच्छ प्रायश्चित्तों से उसे मनाना चाहते हैं। यद्यपि हमें पवित्रता और हृदय की निर्दोषता से उसे प्रसन्न करना चाहिए, हम हर प्रकार की निकम्मी बातें और रीतियाँ गढ़ते हैं, इस आशा से कि उनसे उसे बहलाएँ।
इसके अतिरिक्त, यद्यपि हमारा भरोसा पूरी तरह उसी पर टिका होना चाहिए, वह इसके स्थान पर स्वयं हम पर या अन्य प्राणियों पर टिका रहता है।
अन्ततः, हम इतनी भूलों और दुष्ट धारणाओं में लिपटे हुए हैं कि सत्य की वह चिंगारी, जिसने हमें परमेश्वर की महिमा पर विचार करने का प्रकाश दिया था, इतनी ढँक और बुझ गई है कि वह हमें उसके सही ज्ञान तक नहीं पहुँचाती।
केवल आदि बीज शेष है, जो कभी पूरी तरह उखाड़ा नहीं जा सकता: अर्थात् यह स्वीकृति कि कोई परमेश्वरीय सत्ता है। फिर भी यह बीज भी इतना बिगड़ गया है कि केवल सबसे बुरा फल उत्पन्न करता है।
इस विषय में मनुष्य मुख्यतः दो प्रकार से पाप करते हैं।
पहला यह कि बेचारे मनुष्य परमेश्वर का सत्य खोजते समय अपनी प्रकृति से ऊपर नहीं उठते जैसा उन्हें उठना चाहिए, वरन् उसकी महानता को अपनी इन्द्रियों की जड़ता के अनुसार नापते हैं। वे उसे वैसा नहीं समझते जैसा वह अपने आप को जानने के लिए प्रस्तुत करता है, पर उसकी कल्पना वैसी करते हैं जैसा उन्होंने अपने दुस्साहस में उसे गढ़ा है।
ऐसा करके वे एक अथाह गड्ढा खोल देते हैं। एक बार खुल जाने पर, वे चाहे जिस ओर मुड़ें, उन्हें सदा दण्ड की ओर ही ठोकर खानी पड़ती है। क्योंकि इसके बाद परमेश्वर की सेवा करने के लिए वे जो कुछ भी यत्न करें, वह उसके लेखे में नहीं गिना जा सकता, क्योंकि वे परमेश्वर का नहीं, उसके स्थान पर अपने ही हृदय की कल्पना का आदर करते हैं।
इस प्रकार वह खोखला बहाना, जिसे बहुत लोग अपने अन्धविश्वास की रक्षा के लिए सामान्यतः देते हैं, उलट जाता है। वे मानते हैं कि हर धार्मिक भावना, चाहे वह जैसी भी हो—अव्यवस्थित होने पर भी—पर्याप्त है। परन्तु वे यह नहीं सोचते कि सच्चे धर्म को परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप होना चाहिए, जो उसका स्थायी नियम है। वे यह भी नहीं सोचते कि परमेश्वर सदा अपने जैसा ही रहता है और कोई भूत नहीं जो हर एक की इच्छा के अनुसार बदलता हो।
वरन् कोई देख सकता है कि अन्धविश्वास उसे प्रसन्न करने का यत्न करते हुए कितने खोखले भ्रमों से परमेश्वर के साथ खिलवाड़ करता है। क्योंकि लगभग केवल उन्हीं बातों को अपनाकर जिनके विषय में वह गवाही देता है कि उसे उनकी कोई चिन्ता नहीं, वह उन बातों की उपेक्षा करता है जिन्हें उसने ठहराया और अपने लिए ग्रहणयोग्य बताया है—या उन्हें खुले रूप में ठुकरा देता है।
इसलिए जितने लोग अपने मन में ऐसे धर्म गढ़ते हैं जिनसे परमेश्वर का आदर करें, वे अपनी ही कल्पनाओं की उपासना करते हैं, और कुछ नहीं। वे परमेश्वर के साथ इस प्रकार कभी खिलवाड़ करने का साहस न करते यदि पहले उसे अपनी ही कल्पनाओं के अनुसार न गढ़ लेते।
इसी कारण प्रेरित सिखाता है कि परमेश्वर की ऐसी अनिश्चित और अव्यवस्थित धारणा परमेश्वर के विषय में अज्ञानता है। वह कहता है, “जब तुम परमेश्वर को नहीं जानते थे, तब तुम उनके दास थे जो स्वभाव से देवता नहीं हैं।” —गलातियों 4:8।
एक और स्थान में वह कहता है कि इफिसियों के लोग परमेश्वर के बिना थे जब वे उसके सही ज्ञान से दूर थे। —इफिसियों 2:12।
इस विषय में इससे कुछ अन्तर नहीं पड़ता कि कोई एक देवता की कल्पना करे या अनेक की, क्योंकि दोनों ही स्थितियों में सच्चा परमेश्वर त्यागा और छोड़ा जाता है। एक बार उसके त्यागे जाने पर घृणित मूर्तिपूजा के सिवा कुछ नहीं बचता।
इसलिए हमें लैक्टैन्शियस के साथ यह निष्कर्ष निकालना चाहिए कि कोई धर्म तब तक वैध नहीं जब तक वह सत्य से जुड़ा न हो।
दूसरा दोष जो मनुष्य करते हैं, वह यह है कि वे अपनी इच्छा के विरुद्ध बलपूर्वक परमेश्वर पर कुछ विचार करने को खिंचे चले जाते हैं। वे उसकी महिमा के प्रति श्रद्धा से उत्पन्न भय से नहीं, केवल उसके न्याय के आतंक से प्रेरित होते हैं—जिसके न्याय से वे इसलिए डरते हैं कि उससे बच नहीं सकते, और साथ ही उससे घृणा भी करते हैं।
एक अन्यजातीय कवि ने जो कहा, वह उचित रूप से अभक्ति पर और केवल अभक्ति पर ही लागू होता है: अर्थात् कि भय ने ही सबसे पहले संसार में परमेश्वर की श्रद्धा को जन्म दिया।
निश्चय ही वे सब, जिनके हृदय परमेश्वर की धार्मिकता से विमुख हैं, यह चाहेंगे कि उसका सिंहासन—जिसके विषय में वे जानते हैं कि वह उस धार्मिकता के विरुद्ध हर अपराध को दण्ड देने के लिए स्थापित किया गया है—उलट दिया जाए। इस अभिलाषा से वे परमेश्वर से युद्ध छेड़ते हैं, जो अपने न्याय के बिना रह नहीं सकता। परन्तु यह जानते हुए कि उन पर उसकी सामर्थ्य से बचा नहीं जा सकता, क्योंकि वे न उसे दूर भगा सकते हैं न उससे बच सकते हैं, वे उससे डरते हैं।
इसलिए, ऐसा न हो कि वे उसकी महिमा के सर्वथा तिरस्कारी दिखाई दें, वे धर्म का कोई बाहरी रूप निभाते हैं, चाहे वह जैसा भी हो। परन्तु इस बीच वे हर प्रकार के दुर्गुण से अपने आप को मलिन करना और पाप पर पाप का ढेर लगाना नहीं छोड़ते, जब तक कि प्रभु की पवित्र व्यवस्था का पूरी तरह उल्लंघन और उसकी सारी धार्मिकता का विध्वंस न कर दें।
कम से कम, वे इस बनावटी भय से इतने संयमित नहीं होते कि अपने पाप में सन्तुष्ट न रहें और अपनी चापलूसी न करें, अपने शरीर की असंयमता की बागडोर ढीली छोड़ देना उसे पवित्र आत्मा के शासन के अधीन करने से अधिक पसन्द करते हुए।
परन्तु क्योंकि यह सब धर्म की एक खोखली छाया मात्र है—वरन् छाया कहलाने के योग्य भी मुश्किल से—इसलिए हमें संक्षेप में परमेश्वर के उस विशेष ज्ञान को समझाना चाहिए जो केवल विश्वासियों के हृदयों में रोपा जाता है, और उससे उत्पन्न होनेवाली भक्ति की प्रवृत्ति को भी।
पहले, विश्वासी हृदय अपने लिए कोई परमेश्वर यों ही नहीं गढ़ लेता। वह उसकी ओर देखता है जो एकमात्र सच्चा परमेश्वर है। न ही वह उसमें वह सब आरोपित करता है जो उसे अच्छा लगे, वरन् जैसा वह अपने आप को प्रकट करता है उसी रूप में उसे ग्रहण करने से सन्तुष्ट रहता है, और दुस्साहस में उसकी इच्छा से हट न जाने के विषय में सदा सावधानी बरतता है।
इस प्रकार उसे जानकर, और यह समझकर कि वह अपने विधान से सब कुछ संचालित करता है, विश्वासी उस पर रक्षक और संरक्षक के रूप में भरोसा रखता है और इसलिए अपने आप को उसकी देखरेख में सौंप देता है।
क्योंकि वह परमेश्वर को हर भलाई का रचयिता जानता है, इसलिए जब-जब वह किसी आवश्यकता से दबता है, तुरन्त सहायता के लिए उसी की ओर फिरता है। उसका नाम लेकर पुकारने के बाद वह उससे सहायता की प्रतीक्षा करता है। क्योंकि उसे परमेश्वर की भलाई और कृपालुता का निश्चय है, इसलिए वह उसकी दयालुता में निश्चिन्त विश्राम करता है और सन्देह नहीं करता कि परमेश्वर की करुणा में उसकी सब दुर्दशाओं के लिए उपाय सदा तैयार है।
जहाँ तक वह उसे प्रभु और पिता मानता है, वह उसे इस योग्य समझता है कि अपने आप को उसकी आज्ञा के प्रति समर्पित करे, उसकी महिमा का आदर करे, उसकी महिमा को बढ़ाने का यत्न करे और उसकी इच्छा पर चले।
जहाँ तक वह उसे एक धर्मी न्यायी के रूप में देखता है जो एक दिन सब अपराधियों से कठोर बदला लेगा, वह परमेश्वर के सिंहासन को निरन्तर अपनी आँखों के सामने रखता है ताकि हर उस बात से रोका जाए जो उसके क्रोध को भड़काती है।
तथापि, परमेश्वर के न्याय के विचार से वह इतना भयभीत नहीं होता कि उससे हट जाना चाहे, चाहे बचने का कोई उपाय उपलब्ध भी हो। इसके विपरीत, वह परमेश्वर को दुष्टों के दण्डदाता के रूप में भी उतनी ही स्वेच्छा से ग्रहण करता है जितना धर्मियों के प्रतिफलदाता के रूप में, क्योंकि वह जानता है कि बुरों और अधर्मियों को दण्ड देना भी परमेश्वर की महिमा से उतना ही सम्बन्ध रखता है जितना विश्वासियों को अनन्त जीवन का प्रतिफल देना।
इसके अतिरिक्त, वह केवल बदले के भय से पाप करने से नहीं रुकता। क्योंकि वह परमेश्वर से पिता के रूप में प्रेम और श्रद्धा रखता है और प्रभु के रूप में उससे डरता है, इसलिए यदि नरक न भी होता, तब भी वह उसे अप्रसन्न करने से डरता।
यही शुद्ध और सच्चा धर्म है: परमेश्वर के निष्कपट भय से जुड़ा विश्वास—इस शर्त पर कि भय शब्द के अन्तर्गत हम उस धार्मिकता के प्रति प्रेम, जिसे परमेश्वर ने अपनी व्यवस्था में ठहराया है, और अविभाजित हृदय से उसकी महिमा के प्रति स्वेच्छा से दी गई श्रद्धा, दोनों को सम्मिलित समझें।
इसलिए, यदि हम सब परमेश्वर को जानने के उद्देश्य से जन्मे हैं, और यदि उसका ज्ञान तब तक व्यर्थ और निष्फल है जब तक वह इस बिन्दु तक न पहुँचे, तो प्रत्यक्ष है कि जो अपने जीवन के हर विचार और कर्म को इस उद्देश्य की ओर निर्देशित नहीं करते, वे अपनी सृष्टि के क्रम से भटक और गिर जाते हैं।
दार्शनिक भी इससे अनजान नहीं थे। अफ़लातून का आशय इसके सिवा कुछ और न था जब उसने बार-बार सिखाया कि आत्मा का परम भला परमेश्वर की समानता है, जब उसके सच्चे चिन्तन को पाकर वह पूरी तरह उसी में रूपान्तरित हो जाती है।
इसी प्रकार प्लूटार्क में ग्रिल्लुस भी बहुत बुद्धिमानी से तर्क करता है जब वह कहता है कि यदि मानव जीवन से धर्म को हटा दिया जाए, तो मनुष्य न केवल पशुओं से किसी उत्कृष्टता में आगे न रहेंगे, वरन् अनेक रीतियों से कहीं अधिक दयनीय होंगे। क्योंकि इतने प्रकार की बुराइयों के अधीन होकर वे श्रमपूर्ण और बेचैन जीवन बिताते हैं।
केवल परमेश्वर का ज्ञान ही उन्हें श्रेष्ठ बनाता है, क्योंकि उसी के द्वारा वे अमरता की अभिलाषा कर सकते हैं।
चूँकि परमेश्वर ने ठहराया है कि धन्य जीवन का प्रमुख उद्देश्य उसके नाम के ज्ञान में निहित हो, इसलिए वह अपने आप को सब पर स्पष्ट प्रकट करता है, ऐसा न हो कि वह किसी को धन्यता में प्रवेश से वंचित करता दिखाई दे।
क्योंकि यद्यपि स्वभाव से वह अगम्य है और मानवीय समझ से छिपा है, तथापि उसने अपने हर कार्य पर अपनी महिमा के कुछ चिन्ह खोद दिए हैं जिनसे वह अपने आप को हम पर हमारी सीमित क्षमता के अनुसार प्रकट करता है। मेरा आशय ऐसे चिन्हों से है जो इतने प्रत्यक्ष और स्पष्ट हैं कि संसार के सबसे अन्धे और अनजान लोग भी अज्ञानता के हर बहाने से वंचित हो जाते हैं।
इसलिए, यद्यपि उसका सार हम से छिपा है, तथापि उसके सामर्थ्य के कार्य, जो हमारी आँखों के सामने निरन्तर प्रकट होते हैं, उसे हम पर उतना प्रकट करते हैं जितना हमारे उद्धार के लिए उसे जानना आवश्यक है।
पहले, हम जिधर भी आँखें फेरें, संसार का कोई भाग इतना छोटा नहीं जिसमें उसकी महिमा की कम से कम कोई चिंगारी न चमके। विशेषकर, हम सारे संसार की इस सुन्दर उत्कृष्ट रचना को उसकी सारी लम्बाई-चौड़ाई में निहारते हुए, यों कहें तो, प्रकाश की अनन्त प्रचुरता से पूरी तरह चौंधियाए बिना नहीं रह सकते।
इसी कारण इब्रानियों का प्रेरित संसारों को अदृश्य वस्तुओं के दर्पण ठीक ही कहता है, क्योंकि संसार की सुव्यवस्थित रचना हमारे लिए वह दर्पण है जिसमें हम परमेश्वर का, जो अन्यथा अदृश्य है, चिन्तन कर सकते हैं। —इब्रानियों 11:3।
इसी कारण भविष्यद्वक्ता स्वर्गीय प्राणियों को एक ऐसी भाषा का श्रेय देता है जो हर जाति को ज्ञात है, क्योंकि वे ईश्वरीय स्वभाव की ऐसी प्रत्यक्ष गवाही देते हैं कि वह अत्यन्त अज्ञानी और बर्बर जातियों से भी अज्ञात नहीं रह सकता। —भजन संहिता 19।
सन्त पौलुस इसे और खुलकर समझाता है जब वह कहता है कि परमेश्वर के विषय में जो जानने योग्य है वह प्रकट हो चुका है, क्योंकि उसके अदृश्य गुण—उसकी सनातन सामर्थ्य और ईश्वरत्व भी—जगत की सृष्टि के द्वारा चिन्तन करने पर प्रकट दिखाई देते हैं। —रोमियों 1:19–20।
स्वर्ग और पृथ्वी दोनों में असंख्य प्रमाण हैं जो उसकी अद्भुत बुद्धि की गवाही देते हैं। मेरा आशय केवल उनसे नहीं जिन्हें समझना कठिन है और जो खगोलशास्त्र, चिकित्सा और प्राकृतिक दर्शन के अध्ययन से ही समझे जा सकते हैं, वरन् उनसे भी है जो अत्यन्त अशिक्षितों को भी स्पष्ट दिखाई देते हैं। इस प्रकार मनुष्य अपनी आँखें खोलें तो परमेश्वर की बुद्धि के गवाह बनने को विवश हुए बिना नहीं रह सकते।
यह सच है कि जिन्होंने उदार कलाओं की शिक्षा पाई है, या जिन्होंने कम से कम उनका कुछ ज्ञान प्राप्त किया है, उन्हें ईश्वरीय बुद्धि के रहस्यों में और गहरे उतरने में विशेष सहायता मिलती है। तथापि इन विद्याओं की अज्ञानता किसी को परमेश्वर के कार्यों में प्रचुर कौशल देखने और इस प्रकार उनके रचयिता की प्रशंसा की ओर प्रेरित होने से नहीं रोकती।
उदाहरण के लिए, तारों की गतियों की खोज करने, उनके मार्ग निर्धारित करने, उनकी दूरियाँ नापने और हर एक के विशिष्ट गुण को देखने में असाधारण ज्ञान और कौशल चाहिए। जैसे-जैसे परमेश्वर का विधान ऐसे अध्ययन के द्वारा अधिक स्पष्टता से प्रकट होता है, वैसे-वैसे उसकी महिमा को स्वीकार करने में हृदय को ऊँचा उठना चाहिए।
फिर भी, जिनके पास अपनी आँखों के सिवा कोई सहायता नहीं, वे भी ईश्वरीय बुद्धि की उत्कृष्टता से अनजान नहीं रह सकते, जो तारों की अनन्त और सुन्दर रीति से सजी विविधता में स्पष्ट प्रकट होती है। इसलिए निश्चित है कि कोई ऐसा नहीं जिसे परमेश्वर अपनी बुद्धि पर्याप्त रूप से न बताता हो।
इसी प्रकार, मानव शरीर की रचना में उस सामंजस्य, अनुपात, सौन्दर्य और उपयोगिता को देखने के लिए, जिसे गेलन दिखाता है, कुछ कम सूक्ष्म समझ की आवश्यकता नहीं। फिर भी मानव शरीर हर एक की दृष्टि के सामने ऐसी चतुर रचना प्रस्तुत करता है कि उसके रचयिता को उसके कारण प्रशंसा के योग्य ठहराया जाना उचित है।
इसके अतिरिक्त, परमेश्वर का सामर्थ्य कितने उदाहरणों से हमें उसका चिन्तन करने को खींचता है? यह अवश्य होना चाहिए, जब तक हम इस बात से अनजान न रहें कि स्वर्ग और पृथ्वी के इस अनन्त विस्तार को केवल अपने वचन से थामे रखने के लिए कितना सामर्थ्य चाहिए; उसकी आज्ञा पर आकाश को गर्जन से कँपाने, जो चाहे उसे बिजली से भस्म करने, वायु को बिजली की चमक से प्रज्वलित करने, और नाना प्रकार की आँधियों से संसार को चकित करने के लिए; और फिर, जब चाहे, तुरन्त उसे पूर्ण शान्ति में लौटा देने के लिए।
उसी सामर्थ्य से वह समुद्र को, जो मानो वायु में लटका हुआ है, इस प्रकार रोके रखता है कि वह पृथ्वी को हानि नहीं पहुँचा सकता, यद्यपि अपनी ऊँचाई से वह उसे नष्ट करने की धमकी देता है। एक क्षण वह हवाओं के बड़े वेग से उसे भयंकर रीति से उभारता है; अगले क्षण उसकी लहरों को शान्त करके उसे चुप कर देता है।
यही सामर्थ्य हमें उसकी अनन्तता पर विचार करने की ओर भी ले जाए। क्योंकि जिससे सब वस्तुएँ अपनी उत्पत्ति पाती हैं, उसे अवश्य ही अनन्त होना चाहिए और अपना आरम्भ स्वयं से रखना चाहिए।
इसके अतिरिक्त, यदि हम वह कारण खोजें जिसने उसे सब वस्तुओं को एक ही बार में सृजने और फिर उन्हें उनकी सृजी हुई दशा में बनाए रखने को प्रेरित किया, तो हम उसकी भलाई के सिवा कोई और कारण नहीं पाएँगे।
यदि उसकी भलाई अकेली भी खड़ी होती, तो वह हमें उससे प्रेम करने को खींचने के लिए बहुत अधिक होनी चाहिए, क्योंकि जैसा भविष्यद्वक्ता सिखाता है, कोई प्राणी ऐसा नहीं जिस पर उसकी दया उण्डेली न गई हो। —भजन संहिता 145:9।
इसी प्रकार, परमेश्वर के कार्यों के दूसरे वर्ग में—वे घटनाएँ जो प्रकृति के सामान्य क्रम से परे घटती हैं—उसके गुणों के उतने ही प्रत्यक्ष चिन्ह दिखाई देते हैं।
क्योंकि मानव जाति के शासन में वह अपने विधान को इस प्रकार चलाता है कि यद्यपि वह सामान्यतः सब पर हर रीति से कृपालु और उदार है, तथापि वह प्रतिदिन भलों पर उन्हें संचालित करके अपनी धार्मिकता, और दुष्टों पर अपना न्याय प्रकट करता है।
पापों पर वह जो बदला लेता है वह न छिपा है न अज्ञात। इसी प्रकार वह निःसन्देह दिखाता है कि वह निर्दोषता का रक्षक और संरक्षक है, क्योंकि वह धर्मियों के जीवन को अपनी आशीष से सफल करता, उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति करता, उनके दुःखों को हलका करता, उनकी विपत्तियों का उपाय करता और हर रीति से उनके उद्धार का प्रबन्ध करता है।
यद्यपि वह दुष्टों और कुकर्मियों को कुछ समय तक बिना दण्ड के रहने देता है, और भलों और निर्दोषों को अनेक विपत्तियों से दबने और दुष्टों के अधर्म से कुचले जाने देता है, तथापि इससे उसके न्याय का स्थायी नियम धुँधला नहीं पड़ना चाहिए।
इसके विपरीत, हमें बिलकुल भिन्न निष्कर्ष पर पहुँचना चाहिए। जब-जब उसका क्रोध किसी पाप के विरुद्ध प्रत्यक्ष प्रकट हो, तब हमें पहचानना चाहिए कि सब पाप उसके लिए घृणित हैं। और क्योंकि वह अनेक पापों को बिना दण्ड छोड़ देता है, इसलिए हमें एक और न्याय की प्रतीक्षा करनी चाहिए जिसके लिए उनका दण्ड टाल दिया गया है।
इसी प्रकार, अपनी दया पर चिन्तन करने का कितना प्रचुर अवसर वह हमें देता है जब वह दुर्दशाग्रस्त पापियों पर अपनी कृपालुता बढ़ाना नहीं छोड़ता, और पिता की कृपा से भी अधिक कृपा से उन्हें अपनी ओर खींचता है, जब तक कि उसकी भलाइयों से उनका हठ टूट न जाए।
उसकी सामर्थ्य और बुद्धि भी उतनी ही स्पष्टता से प्रकट होती हैं। उसकी सामर्थ्य तब प्रत्यक्ष प्रकट होती है जब दुष्टों की क्रूरता, जो मानवीय दृष्टि में अजेय दिखाई देती थी, प्रायः एक ही क्षण में टूटकर नष्ट हो जाती है; उनका घमण्ड दबा दिया जाता है; उनके सब गढ़ ढा दिए जाते हैं; उनकी सेनाएँ चूर-चूर होकर बिखर जाती हैं; उनका बल तितर-बितर हो जाता है; उनके उद्यम उनकी ही हिंसा से उलट और घबरा जाते हैं; और उनका दुस्साहस, जो आकाश तक ऊँचा उठा था, पृथ्वी के केन्द्र में गिरा दिया जाता है।
इसके विपरीत, तुच्छ जन धूल से उठाए जाते हैं और कंगाल कूड़े के ढेर से ऊँचे किए जाते हैं। पिसे हुए और पीड़ित अत्यन्त संकट से छुड़ाए जाते हैं; जिन्होंने आशा छोड़ दी थी वे फिर अच्छी आशा पाते हैं; निहत्थे और थोड़े लोग बहुतों और भली-भाँति सशस्त्र लोगों पर, और निर्बल बलवानों पर प्रबल होते हैं।
परमेश्वर की बुद्धि इसमें प्रकट होती है कि वह सब कुछ उनके उचित समय के अनुसार ठहराता है, संसार की सारी बुद्धि को घबरा देता है, बुद्धिमानों को उन्हीं की चतुराई में फँसाता है, और संसार के सारे प्रबन्ध को अपने अनुपम विवेक के अनुसार चलाता है।
तो हम देखते हैं कि उन गवाहियों को प्रस्तुत करने के लिए, जो परमेश्वर की महिमा को प्रकाशित और पुष्ट करती हैं, किसी लम्बे या जटिल प्रमाण की आवश्यकता नहीं। जिन थोड़े उदाहरणों को हमने छुआ है उनसे प्रत्यक्ष है कि ये गवाहियाँ इतनी प्रकट हैं और हम जिधर भी मुड़ें हमारे सामने इतनी पूर्णता से आ खड़ी होती हैं कि आँख उन्हें सरलता से पहचान सकती और उँगली से दिखाई जा सकती है।
हमें यहाँ यह देखना चाहिए कि हमें परमेश्वर के ऐसे ज्ञान का निमन्त्रण मिलता है जो केवल खोखली कल्पना में नहीं, वरन् जब हम उसे उचित रीति से ग्रहण कर लें तब उपयोगी और फलदायक होता है।
क्योंकि परमेश्वर हम पर अपने कार्यों के द्वारा प्रकट होता है। जब हम उनकी सामर्थ्य को अपने भीतर अनुभव करते और उनका लाभ पाते हैं, तब हमें अवश्य ही ऐसे ज्ञान से कहीं अधिक गहराई से प्रभावित होना चाहिए, बजाय इसके कि हम केवल परमेश्वर की कल्पना कहीं हवा में करते रहें और अपने भीतर उसका कोई अनुभवजन्य बोध न हो।
इससे हम देखते हैं कि परमेश्वर को खोजने का उचित मार्ग, और सर्वोत्तम क्रम जिसका हम अनुसरण कर सकते हैं, यह है कि उसे उसके कार्यों में निहारें। उनके द्वारा वह हमारे निकट आता और हमसे परिचित होता है, और अपने आप को हम से बाँटता भी है।
हमें दुस्साहसी जिज्ञासा से उसके सार की महानता की छानबीन करने का यत्न नहीं करना चाहिए, जिसकी हमें बहुत उत्सुकता से खोज करने के बजाय आराधना करनी चाहिए। प्रेरित का यही आशय था जब उसने कहा कि परमेश्वर को दूर खोजने की आवश्यकता नहीं, क्योंकि वह अपनी सामर्थ्य से हम में से हर एक में वास करता है। —प्रेरितों के काम 17:27–28।
इसी कारण दाऊद ने परमेश्वर की अवर्णनीय महानता को स्वीकार करने के बाद उसके कार्यों के वर्णन की ओर मुड़कर घोषणा की कि वह उन्हीं के द्वारा उसका प्रचार करेगा।
इसलिए आओ, हम भी परमेश्वर की इस खोज में लगें—ऐसी खोज जो हमारे मन को विस्मय में थामे रखती है और साथ ही उन्हें प्रभावित करती और उसकी सच्ची समझ देती है।
ऐसा ज्ञान हमें न केवल परमेश्वर का आदर और सेवा करने को प्रेरित करे, वरन् आनेवाले जीवन की आशा की ओर भी उकसाए और उत्साहित करे।
क्योंकि जब हम देखते हैं कि हमारा प्रभु अपनी कृपालुता और अपनी सच्चाई दोनों के जो चिन्ह हमें देता है वे केवल आंशिक और अपूर्ण हैं, तो हमें उन्हें उस वस्तु के नमूने मानना चाहिए जो एक दिन उस उद्देश्य के लिए ठहराए गए दिन पूरी रीति से प्रकट होगी।
दूसरी ओर, जब हम देखते हैं कि भले और निर्दोष लोग क्लेशों से दबे हैं, अन्यायों से सताए जाते हैं, निन्दाओं से कुचले जाते हैं, और अपमानों और ताड़नाओं से दुर्व्यवहार पाते हैं, जबकि दुष्ट फलते-फूलते हैं, बिना किसी संकट के शान्ति और सम्मान का आनन्द उठाते हैं, तो हमें निष्कर्ष निकालना चाहिए कि एक और जीवन होगा जिसमें अधर्म को उसका दण्ड और धार्मिकता को उसका प्रतिफल मिलेगा।
इसके अतिरिक्त, जब हम देखते हैं कि विश्वासियों को प्रभु की छड़ियों से प्रायः ताड़ना मिलती है, तो हमें दृढ़ता से निष्कर्ष निकालना चाहिए कि दुष्ट उसकी ताड़नाओं से कहीं कम बचेंगे।
इसलिए हमें मानना चाहिए कि प्रभु के हर कार्य में—परन्तु विशेषकर उनकी सम्पूर्ण समष्टि में—उसके गुण मानो चित्रों में दर्शाए गए हैं। इनके द्वारा सारा संसार परमेश्वर के ज्ञान और उस ज्ञान के द्वारा परम धन्यता के आनन्द की ओर बुलाया जाता है।
फिर भी, यद्यपि ये गुण वहाँ अत्यन्त स्पष्टता से दिखाई देते हैं, हम प्रायः यह नहीं समझ पाते कि वे कहाँ ले जाते हैं, क्या सूचित करते हैं, और किस उद्देश्य से उन्हें समझा जाना चाहिए, जब तक हम अपने भीतर न उतरें और विचार न करें कि परमेश्वर हम में अपना जीवन, बुद्धि और सामर्थ्य कैसे प्रकट करता है, और हमारे प्रति अपनी धार्मिकता, भलाई और दया कैसे चलाता है।
तथापि, परमेश्वर के कार्यों के चिन्तन में उसे और उसके अविनाशी राज्य को दर्शाने के लिए हमारे लिए जो भी प्रकाश जलाया जाए, हमारे मन इतने शारीरिक हैं कि हम इन प्रत्यक्ष गवाहियों में कुछ नहीं देखते, मानो हम अन्धे हों।
क्योंकि जहाँ तक सारे संसार की रचना का प्रश्न है, हम में से कितने हैं जो आँखें आकाश की ओर उठाते या पृथ्वी के सब प्रदेशों पर डालते हुए अपने मन को सृष्टिकर्ता की स्मृति की ओर लौटा लाते हैं? क्या हम सृजनहार को पीछे छोड़कर सृजी हुई वस्तुओं के चिन्तन में ही नहीं रुक जाते?
और जहाँ तक उन घटनाओं का प्रश्न है जो सामान्यतः प्रकृति के क्रम से परे घटती हैं, कितने लोग मानते हैं कि भाग्य उन पर शासन करता है, मनुष्यों को इधर-उधर उछालता और हाँकता है, बजाय इसके कि परमेश्वर का विधान उन्हें भली रीति से चलाता है?
यदि इन बातों में कभी हमें परमेश्वर के विचार की ओर लौटने को विवश होना पड़े—जैसा सब मनुष्यों के साथ अनिवार्य रूप से होता है—तो एक अनिश्चित देवता का कुछ हल्का-सा बोध पाने के तुरन्त बाद हम अपने शरीर की मूर्खताओं में गिर पड़ते हैं और अपनी व्यर्थता से परमेश्वर के शुद्ध सत्य को बिगाड़ देते हैं।
यह सच है कि इस बात में हम भिन्न हैं: हर व्यक्ति अपने लिए कोई नई भूल अलग से गढ़ता है। परन्तु इसमें हम सब एक जैसे हैं: हम में से हर एक अपनी झूठी कल्पनाओं को गले लगाने के लिए एकमात्र सच्चे परमेश्वर को छोड़ देता है।
यह बुराई केवल सीधे-सादे साधारण लोगों और मन्द समझवालों को ही नहीं, वरन् बुद्धि और विद्या में सबसे प्रतिष्ठित लोगों को भी सताती है।
दार्शनिकों की सारी जाति ने इस विषय में अपनी मूर्खता और जड़ता को कितनी पूर्णता से प्रकट किया है! क्योंकि यदि हम औरों को क्षमा भी कर दें, जो पूरी तरह अव्यवस्थित रीति से भटक गए, तो अफ़लातून स्वयं—जो उन सब में सबसे संयमी और विवेकशील था और सच्चे धर्म के सबसे निकट पहुँचा—यहाँ पूरी तरह उलझ गया, क्योंकि उसने एक देहधारी परमेश्वर को खोजा। यह ईश्वरीय महिमा के अयोग्य और उसके सर्वथा अनुपयुक्त है।
तो फिर औरों का क्या होगा, जब उनमें अग्रणी, जिनका कर्तव्य था कि शेष लोगों को प्रकाशित करें और ज्योति दें, इतनी गम्भीर रीति से भटक गए?
इसी प्रकार, यद्यपि मानवीय मामलों का शासन विधान को इतनी स्पष्टता से प्रकट करता है कि उसका इनकार करना असम्भव है, तथापि मनुष्य इससे उससे अधिक लाभ नहीं उठाते जितना वे तब उठाते यदि मानते कि सब कुछ भाग्य द्वारा लापरवाही से उछाला और उलटा-पलटा जाता है। व्यर्थता और भूल की ओर हमारी प्रवृत्ति ऐसी है।
मैं अब भी सबसे प्रतिष्ठित लोगों की बात कर रहा हूँ, साधारण लोगों की नहीं, जिनकी मूर्खता परमेश्वर के सत्य को मलिन और भ्रष्ट करने में सीमा से बढ़कर उमड़ पड़ी है।
इसलिए यह व्यर्थ है कि संसार की रचना भर में इतने दीपक हम पर चमकते हैं कि सृष्टिकर्ता की महिमा को प्रकाशित करें। यद्यपि वे अपनी किरणें हम पर डालते हैं, वे हमें सही मार्ग में नहीं ले जा सकते। वे सचमुच कुछ चिंगारियाँ छोड़ते हैं, परन्तु वे पूरी चमक तक पहुँचने से पहले ही बुझ जाती हैं।
इसलिए उसी अनुच्छेद में, जहाँ प्रेरित संसार को अदृश्य वस्तुओं का प्रतिबिम्ब कहता है, वह यह भी जोड़ता है कि विश्वास ही से मनुष्य समझता है कि यह परमेश्वर के वचन से रचा गया। वह यह सूचित करता है कि अदृश्य ईश्वरत्व संसार के दृश्य रूप में दर्शाया गया है, परन्तु हमारी आँखें उसे देखने में असफल रहती हैं जब तक वे विश्वास के द्वारा परमेश्वर के भीतरी प्रकाशन से प्रकाशित न की जाएँ। —इब्रानियों 11:3।
इसी प्रकार, जब सन्त पौलुस सिखाता है कि परमेश्वर के विषय में जो जानना चाहिए वह जगत की सृष्टि के द्वारा प्रकट है, तो उसका आशय ऐसे प्रकाशन से नहीं जिसे मानवीय समझ उचित रीति से ग्रहण करने में समर्थ हो। वरन् वह सूचित करता है कि वह इससे आगे नहीं बढ़ता कि मनुष्यों को निरुत्तर कर दे। —रोमियों 1:19–20।
वही प्रेरित, यद्यपि एक स्थान पर कहता है कि परमेश्वर को दूर खोजने की आवश्यकता नहीं क्योंकि वह हम में वास करता है, अन्यत्र सिखाता है कि यह निकटता हमें कितना कम लाभ देती है:
पिछले समयों में परमेश्वर ने जातियों को अपने-अपने मार्गों पर चलने दिया। तथापि उसने अपने आप को बिना गवाही के नहीं छोड़ा, स्वर्ग से अपनी भलाइयाँ भेजते हुए, वर्षा और फलवन्त ऋतुएँ देते हुए, और मनुष्यों को भोजन और आनन्द से भरते हुए।
इसलिए, यद्यपि परमेश्वर बिना गवाहों के नहीं—क्योंकि वह अपनी उदारता से मनुष्यों को अपने ज्ञान की ओर कोमलता से बुलाता है—तथापि वे अपने ही मार्गों पर चलते रहते हैं; अर्थात् वे दण्डनीय भूल में चलते हैं।
यद्यपि हमारी स्वाभाविक योग्यता हमें असफल करती है कि हम परमेश्वर के शुद्ध और सही ज्ञान तक न चढ़ सकें, तथापि क्योंकि इस अज्ञानता का दोष हमारे ही भीतर है, इसलिए हर बहाना छीन लिया गया है।
हमें अज्ञानता की दुहाई इस प्रकार देने की अनुमति नहीं कि हम निरन्तर लापरवाही और कृतघ्नता के दोषी न ठहरें।
यह निश्चय ही एक दयनीय बचाव होगा, जिसे स्वीकार किए जाने के योग्य नहीं, यदि मनुष्य यह कहे कि उसके पास उस सत्य को सुनने के लिए कान नहीं जिसे समझरहित प्राणी भी स्पष्ट और ऊँचे स्वर से सुनाते हैं; कि उसके पास वह देखने के लिए आँखें नहीं जो दृष्टिहीन प्राणी दिखाते हैं; या कि अपने मन की निर्बलता के कारण वह वह नहीं जान सका जो सब बुद्धिहीन प्राणी सिखाते हैं।
इसलिए हम उचित ही हर बहाने से वंचित हैं कि खोए हुओं के समान खेतों में भटकते फिरें, जब सब वस्तुएँ हमें सही मार्ग दिखा रही हैं।
तथापि, यद्यपि इसका श्रेय मनुष्यों की भ्रष्टता को देना चाहिए कि वे प्रकृति की अद्भुत कारीगरी के द्वारा अपनी समझ में फैले परमेश्वर के ज्ञान के बीज को तुरन्त बिगाड़ देते हैं, ताकि वह कभी अच्छे फल तक न पहुँचे, तथापि यह निश्चय ही सत्य है कि सृष्टि की परमेश्वर की महानता पर जो सीधी और नंगी गवाही है, वह हमें, जैसे हम अब हैं, पर्याप्त शिक्षा नहीं देती।
क्योंकि जैसे ही हमने संसार पर चिन्तन करके ईश्वरत्व का कुछ हल्का स्वाद पाया, हम सच्चे परमेश्वर को छोड़ देते हैं और उसके स्थान पर अपने ही मन के स्वप्न और कल्पनाएँ खड़ी करते हैं, और धार्मिकता, बुद्धि, भलाई और सामर्थ्य की प्रशंसा उन्हीं को सौंप देते हैं।
इसके अतिरिक्त, हम परमेश्वर के दैनिक कार्यों को इतना धुँधला कर देते हैं—या उनका गलत न्याय करके उन्हें उलट देते हैं—कि उनके लिए उसे जो प्रशंसा और धन्यवाद देय है, उसे हम उससे लूटकर वंचित कर देते हैं।
इसलिए, जैसे प्रभु बिना किसी अपवाद के सब के सामने अपनी महिमा का तेज रखता है, जो उसकी सृष्टि में दर्शाया गया है, ताकि मानवीय अभक्ति को हर बचाव से वंचित कर दे, वैसे ही दूसरी ओर वह उनकी निर्बलता के लिए, जिन पर वह उद्धार के लिए अपने आप को प्रकट करना चाहता है, एक अधिक निश्चित उपाय प्रदान करता है।
उनकी शिक्षा के लिए वह केवल मूक प्राणियों को ही नहीं लगाता, वरन् अपना पवित्र मुख भी खोलता है। वह उन पर केवल यह नहीं प्रकट करता कि कोई परमेश्वर पूजा जाना चाहिए, वरन् यह भी दिखाता है कि वह स्वयं ही वह परमेश्वर है जिसकी उपासना करनी है। वह उन्हें केवल एक परमेश्वर को मानना ही नहीं सिखाता, वरन् अपने आप को उनके सामने उसके रूप में भी प्रस्तुत करता है जिस पर उन्हें निर्भर रहना है।
वरन् आरम्भ से प्रभु ने अपने सेवकों को बुलाने में यही क्रम अपनाया है: ऊपर बताई सब शिक्षाओं के अतिरिक्त उसने अपने वचन को काम में लिया है, जो एक अधिक निश्चित और परिचित चिन्ह है जिससे वह जाना जा सके।
इस रीति से आदम, नूह, अब्राहम और अन्य पूर्वज उसके वचन से प्रकाशित होकर उसके सही ज्ञान में प्रविष्ट हुए—चाहे वह उन्हें दिव्यवाणियों और दर्शनों के द्वारा पहुँचाया गया हो, या पहले उनके पूर्वजों पर प्रकट होकर उनके प्रचार के द्वारा, मानो हाथों-हाथ, उन तक पहुँचा हो।
क्योंकि इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता था कि वे परमेश्वर के वचन के भागी कैसे बने, बशर्ते वे समझते कि वह परमेश्वर से निकला है। इसका निश्चय प्रभु उन्हें सदा तब कराता था जब वह उसका प्रकाशन देना चाहता था।
इस प्रकार परमेश्वर ने अपने आप को थोड़े से लोगों पर प्रकट किया, और उन्हें अपनी उपस्थिति का प्रत्यक्ष चिन्ह दिया। उसने उन्हें अपनी उद्धारकारी शिक्षा का भण्डार सौंपा ताकि वे अपनी सन्तान के प्रति उसके भण्डारी ठहरें।
