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अध्याय तेरह: पाँच अन्य रीतियाँ जिन्हें झूठे ही संस्कार कहा जाता है: पुष्टिकरण, प्रायश्चित (भाग 1/2)
अध्याय तेरह
पाँच अन्य रीतियों के विषय में, जिन्हें झूठे ही संस्कार कहा जाता है: पुष्टिकरण, प्रायश्चित, अन्तिम अभिषेक, कलीसियाई पद-दीक्षा और विवाह
संस्कारों के विषय में पिछली चर्चा से हर संयमी और सीखने को तत्पर व्यक्ति को सन्तोष हो जाना चाहिए था, ताकि वह जिज्ञासावश और आगे न बढ़े, और परमेश्वर के वचन से अलग उन दो संस्कारों के सिवाय, जिन्हें वह प्रभु के ठहराए हुए जानता है, कोई और संस्कार ग्रहण न करे।
तौभी, क्योंकि सात संस्कारों की मान्यता मनुष्यों में सदा से इतनी फैली हुई रही है, और वाद-विवादों तथा उपदेशों में इतनी बार चर्चा में आती रही है कि लम्बे चलन के कारण वह उनके हृदयों में जड़ पकड़ चुकी है और आज भी वहाँ दृढ़ता से जमी हुई है, इसलिए मैंने उचित समझा कि प्रभु के संस्कारों में साधारणतः गिने जानेवाले शेष पाँच को अलग से और निकट से जाँचा जाए। हर प्रकार का झूठ खोलकर मैं सीधे-सादे लोगों को दिखाना चाहता हूँ कि ये रीतियाँ वास्तव में क्या हैं, और अब तक उन्हें संस्कार मानना कैसे अनुचित रहा है।
पहले हमें उसे थामे रखना है जो हम पहले ही अकाट्य तर्क से सिद्ध कर चुके हैं: कि संस्कार ठहराने का अधिकार केवल परमेश्वर का है। क्योंकि संस्कार को परमेश्वर की किसी निश्चित प्रतिज्ञा के द्वारा विश्वासियों के विवेक को निश्चय और शान्ति देनी चाहिए, और ऐसा निश्चय वे किसी मनुष्य से कभी पा नहीं सकते।
संस्कार को हमारे प्रति परमेश्वर की कृपा की साक्षी होना चाहिए, जिसकी गवाही न मनुष्य अपनी ओर से दे सकता है न स्वर्गदूत, क्योंकि:
“प्रभु का मंत्री कौन हुआ?”
परमेश्वर ही अपने वचन के द्वारा अपने विषय में हमें साक्षी देता है।
संस्कार वह मुहर है जिससे परमेश्वर की वसीयत और प्रतिज्ञा पर मुहर लगाई जाती है। परन्तु वह प्रतिज्ञा शारीरिक वस्तुओं और इस संसार के तत्वों के द्वारा मुहरबन्द नहीं हो सकती, जब तक उन्हें इसी उद्देश्य के लिए चिह्नित और नियुक्त न किया गया हो। इसलिए मनुष्य संस्कार नहीं ठहरा सकता, क्योंकि मानवीय सामर्थ्य परमेश्वर के इतने बड़े भेदों को ऐसी तुच्छ वस्तुओं के नीचे छिपा नहीं सकती। संस्कार को संस्कार बनाने के लिए परमेश्वर का वचन पहले होना चाहिए।
पुष्टिकरण के विषय में
पुष्टिकरण, जैसा कि उसे कहा जाता है, पहला चिह्न है जिसे मानवीय ढिठाई ने अपने आप गढ़कर परमेश्वर के संस्कार के रूप में प्रस्तुत किया है। इसके गढ़नेवालों ने दावा किया है कि इसकी सामर्थ्य यह है कि वह बपतिस्मा में निर्दोषता के लिए दिए गए अनुग्रह की वृद्धि के निमित्त पवित्र आत्मा प्रदान करता है, और जो बपतिस्मा में जीवन के लिए नया जन्म पा चुके हैं उन्हें युद्ध के लिए सबल करता है।
यह पुष्टिकरण अभिषेक के साथ और इन शब्दों के रूप में किया जाता है: “मैं तुझे पवित्र क्रूस के चिह्न से चिह्नित करता हूँ और उद्धार के अभिषेक से तेरी पुष्टि करता हूँ, पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा के नाम से।”
यह सब सुन्दर और मनभावन है, परन्तु परमेश्वर का वह वचन कहाँ है जो यहाँ पवित्र आत्मा की उपस्थिति की प्रतिज्ञा करता हो? वे उसका एक अक्षर भी नहीं दिखा सकते। तब वे हमें कैसे निश्चय दिलाएँगे कि उनका क्रिज़्म (पवित्र तेल) पवित्र आत्मा का पात्र है? हम तेल देखते हैं — गाढ़ा और चिकना द्रव — और इससे अधिक कुछ नहीं।
सन्त अगस्तीन कहते हैं, “तत्व में वचन मिलाया जाए, तो वह संस्कार बन जाएगा।” इसलिए यदि वे चाहते हैं कि हम तेल में तेल के सिवाय कुछ और देखें, तो वे हमें यह वचन दिखाएँ।
यदि वे, जैसा उन्हें करना चाहिए, अपने आप को संस्कारों के सेवक मानते, तो आगे विवाद करने की आवश्यकता न रहती। सेवक का पहला नियम यह है कि आज्ञा के बिना कुछ भी न करे। वे कोई आज्ञा दिखाएँ जो उन्हें यह करने का अधिकार देती हो, और मैं और कुछ न कहूँगा। यदि उनके पास कोई आज्ञा नहीं, तो वे अपने इस कार्य को अत्यन्त घोर ढिठाई होने के दोष से बचा नहीं सकते।
इसी कारण हमारे प्रभु ने फरीसियों से पूछा:
“यूहन्ना का बपतिस्मा स्वर्ग की ओर से था या मनुष्यों की ओर से?”
यदि वे उत्तर देते, “मनुष्यों की ओर से,” तो वह ठहरा देता कि वह खोखला और व्यर्थ है। यदि वे उत्तर देते, “स्वर्ग की ओर से,” तो उन्हें यूहन्ना की शिक्षा को ग्रहण करने के लिए विवश होना पड़ता। इसलिए यूहन्ना का बहुत अधिक अपमान न हो, इस कारण उन्होंने यह मानने का साहस नहीं किया कि उसका बपतिस्मा मनुष्यों की ओर से था।
इसी प्रकार, यदि पुष्टिकरण मनुष्यों की ओर से है, तो यह निश्चित है कि वह खोखला और व्यर्थ है। यदि वे हमें समझाना चाहते हैं कि वह स्वर्ग की ओर से है, तो वे इसे प्रमाणित करें।
वे प्रेरितों के उदाहरण से अपना बचाव करते हैं, जिनके विषय में वे मानते हैं कि उन्होंने कोई कार्य उचित कारण के बिना नहीं किया। यह निश्चय ही सत्य है, और यदि वे अपने आप को प्रेरितों के अनुकरणकर्ता सिद्ध कर सकते तो हम उन्हें दोषी न ठहराते। परन्तु प्रेरितों ने क्या किया? सन्त लूका प्रेरितों के काम में बताता है:
“जब यरूशलेम में प्रेरितों ने सुना कि सामरिया देश ने परमेश्वर का वचन ग्रहण कर लिया है, तब उन्होंने पतरस और यूहन्ना को उनके पास भेजा। जब वे पहुँचे तो उन्होंने सामरियों के लिए प्रार्थना की कि वे पवित्र आत्मा पाएँ, क्योंकि वह अब तक उनमें से किसी पर नहीं उतरा था; उन्होंने केवल प्रभु यीशु के नाम में बपतिस्मा लिया था। तब प्रार्थना करके उन्होंने उन पर हाथ रखे, और हाथ रखने के द्वारा सामरियों ने पवित्र आत्मा पाया।”
सन्त लूका इस हाथ रखने का उल्लेख और कई बार भी करता है।
मैं सुनता हूँ कि प्रेरितों ने क्या किया: उन्होंने विश्वासयोग्यता से अपनी सेवा पूरी की। प्रभु की इच्छा थी कि अपने पवित्र आत्मा के जो प्रत्यक्ष और अद्भुत वरदान वह उस समय अपने लोगों पर उण्डेल रहा था, वे प्रेरितों के द्वारा बाँटे जाएँ और इसी हाथ रखने के द्वारा वितरित हों।
मैं इस रीति में कोई गहरा भेद नहीं मानता। मेरा विश्वास है कि प्रेरितों ने इसे यह दर्शाने के लिए अपनाया कि जिस व्यक्ति पर वे हाथ रखते थे उसे वे परमेश्वर को सौंपते और उसके सामने अर्पित करते थे।
यदि प्रेरितों को तब सौंपी गई सेवकाई आज भी कलीसिया में विद्यमान होती, तो हाथ रखना भी उसी प्रकार बना रहना चाहिए था। परन्तु जब ऐसा अनुग्रह अब दिया ही नहीं जाता, तब हाथ रखने का क्या प्रयोजन रह गया?
पवित्र आत्मा निश्चय ही आज भी परमेश्वर के लोगों की सहायता करता है, क्योंकि उसके निर्देशन और मार्गदर्शन के बिना कलीसिया टिकी नहीं रह सकती। हमारे पास वह अटल प्रतिज्ञा है जिसके द्वारा मसीह प्यासों को अपने पास बुलाता है कि वे जीवन का जल पीएँ:
“यदि कोई प्यासा हो तो मेरे पास आकर पीए।”
परन्तु हाथ रखने के द्वारा बाँटी जानेवाली अद्भुत सामर्थ्य और प्रत्यक्ष कार्य बन्द हो चुके हैं, और वे केवल कुछ समय तक बने रहने के लिए ठहराए गए थे। क्योंकि सुसमाचार के नए प्रचार और मसीह के नए राज्य को ऐसे आश्चर्यकर्मों से ऊँचा और महिमावान किया जाना था जैसे पहले कभी न देखे गए थे न जाने गए थे।
जब प्रभु ने इन आश्चर्यकर्मों को बन्द कर दिया, तो इसलिए उसने अपनी कलीसिया को नहीं त्यागा। बल्कि उसने प्रकट किया कि उसके राज्य की भव्यता और उसके वचन की गरिमा पर्याप्त और महिमामय रीति से प्रकट हो चुकी है।
तब ये पाखण्डी किस बात में प्रेरितों की नकल करते हैं? हाथ रखने से तुरन्त पवित्र आत्मा की सामर्थ्य का प्रत्यक्ष प्रकटीकरण होना चाहिए। वे ऐसा कुछ नहीं कर दिखाते। तब वे अपने बचाव में हाथ रखने की दुहाई क्यों देते हैं? हम निश्चय ही मानते हैं कि प्रेरित उसे करते थे, परन्तु बिलकुल भिन्न प्रयोजन से।
उनका तर्क उतना ही निरर्थक है जितना यह कहना कि प्रभु का अपने चेलों पर फूँकना एक संस्कार था जिससे पवित्र आत्मा दिया जाता है।
परन्तु यद्यपि प्रभु ने यह एक बार किया, तौभी उसकी इच्छा यह न थी कि हम भी वैसा ही करें। इसी प्रकार प्रेरितों ने हाथ रखने का प्रयोग तब तक किया जब तक प्रभु को उनकी प्रार्थनाओं के उत्तर में पवित्र आत्मा के वरदान देना भाया। उसका अभिप्राय यह न था कि बाद में आनेवाले इस खोखले और निष्फल चिह्न की नकल करें, जैसा ये बन्दर करते हैं।
फिर, यदि वे यह दिखा भी सकते कि हाथ रखने में वे प्रेरितों की नकल करते हैं — यद्यपि उनमें और प्रेरितों में मूर्खतापूर्ण और विकृत नकल के सिवाय कुछ समानता नहीं — तो भी जिसे वे उद्धार का तेल कहते हैं वह तेल उन्हें कहाँ से मिला? उन्हें किसने सिखाया कि उद्धार तेल में ढूँढ़ो और उसमें आत्मिक बल प्रदान करने की सामर्थ्य मान लो?
क्या वह सन्त पौलुस था, जो हमें इस संसार के तत्वों से इतनी दूर खींच ले जाता है और ऐसी रीतियों की दासता से बढ़कर किसी बात की इतनी कड़ी निन्दा नहीं करता?
इसके विपरीत, मैं निर्भय होकर घोषणा करता हूँ — अपनी ओर से नहीं, परमेश्वर की ओर से — कि जो तेल को उद्धार का तेल कहते हैं वे उस उद्धार को त्यागते हैं जो मसीह में है, मसीह को ठुकराते हैं, और परमेश्वर के राज्य में उनका कोई भाग नहीं। क्योंकि तेल पेट के लिए है और पेट तेल के लिए, और प्रभु इन दोनों को नष्ट कर डालेगा। अर्थात् ये सब निर्बल तत्व जो उपयोग से नष्ट हो जाते हैं परमेश्वर के राज्य में, जो आत्मिक और सनातन है, कोई स्थान नहीं रखते।
यहाँ कोई मुझसे कह सकता है: “तो क्या? क्या तुम यही नियम उस जल पर भी लगाओगे जिससे हम बपतिस्मा पाते हैं, और उस रोटी और दाखरस पर भी जिनके नीचे प्रभु-भोज में प्रभु की देह और लहू हमारे सामने रखा जाता है?”
मैं उत्तर देता हूँ कि संस्कारों में दो बातों पर विचार करना चाहिए: हमारे सामने रखी गई शारीरिक वस्तु का तत्व, और उस पर परमेश्वर के वचन द्वारा अंकित की गई छाप, जिसमें उसकी सारी सामर्थ्य निहित है।
संस्कारों में हमारी आँखों के सामने रखी गई रोटी, दाखरस और जल जहाँ तक अपना स्वाभाविक तत्व बनाए रखते हैं, वहाँ तक सन्त पौलुस का यह कथन लागू होता है:
“भोजन पेट के लिए और पेट भोजन के लिए है; परन्तु परमेश्वर इन दोनों को नष्ट कर देगा।”
क्योंकि ऐसे तत्व इस संसार के स्वरूप के साथ जाते रहते और मिट जाते हैं। परन्तु जहाँ तक ये वस्तुएँ परमेश्वर के वचन से संस्कार बनने के लिए पवित्र ठहराई जाती हैं, वहाँ तक वे हमें शरीर में नहीं रोकतीं, वरन् आत्मिक रीति से सिखाती हैं।
तौभी आओ, और निकट से देखें कि यह तेल कितने राक्षसी विचारों को पोसता है। ये अभिषेक करनेवाले कहते हैं कि पवित्र आत्मा बपतिस्मा में निर्दोषता के लिए और पुष्टिकरण में अनुग्रह की वृद्धि के लिए दिया जाता है।
वे कहते हैं कि बपतिस्मा में हमारा नया जन्म होता है, जबकि पुष्टिकरण में हम युद्ध के लिए शस्त्रसज्ज किए जाते हैं। वे इतने निर्लज्ज हैं कि इनकार करते हैं कि पुष्टिकरण के बिना बपतिस्मा पूर्ण है। हे विकृति!
क्या हम मसीह के साथ गाड़े नहीं गए कि उसके जी उठने में भागी बनें? सन्त पौलुस यीशु मसीह की मृत्यु और जीवन में इस सहभागिता का अर्थ यह बताता है कि हमारे शरीर का घात किया जाना और भले आत्मा का जिलाया जाना:
“हमारा पुराना मनुष्यत्व उसके साथ क्रूस पर चढ़ाया गया, ताकि हम नए जीवन की सी चाल चलें।”
—रोमियों 6:4, 6
क्या कोई शैतान के विरुद्ध युद्ध के लिए इससे अच्छी रीति से शस्त्रसज्ज हो सकता है?
जहाँ तक उस अंश में, जिसे हमने उद्धृत किया, सन्त लूका के इस कथन का सम्बन्ध है कि सामरियों ने प्रभु यीशु के नाम में बपतिस्मा तो लिया था पर पवित्र आत्मा नहीं पाया था — वह यह सीधे इनकार नहीं करता कि उन्हें आत्मा का कोई भी वरदान मिला था, क्योंकि वे यीशु मसीह पर हृदय से विश्वास करते और मुँह से उसका अंगीकार करते थे। वरन् उसका अर्थ यह है कि उन्हें आत्मा का वह वरदान नहीं मिला था जिससे प्रकट सामर्थ्य और प्रत्यक्ष अनुग्रह प्रदान किए जाते थे।
इसी कारण कहा गया है कि प्रेरितों ने पिन्तेकुस्त के दिन आत्मा पाया, यद्यपि बहुत पहले उनसे कहा जा चुका था:
“बोलनेवाले तुम नहीं हो, परन्तु तुम्हारे पिता का आत्मा तुम में बोलता है।”
हे परमेश्वर के जनो, तुम सब यहाँ शैतान की दुष्ट और महामारी-सी चतुराई को देखो। जो वास्तव में बपतिस्मा में दिया गया था, उसे वह अपने पुष्टिकरण में दिलवाता है, ताकि चालाकी से हमें बपतिस्मा से दूर खींच ले जाए।
अब कौन सन्देह कर सकता है कि यह शिक्षा शैतान की है, क्योंकि यह बपतिस्मा से वे प्रतिज्ञाएँ काट ले जाती है जो उसी की हैं और उन्हें कहीं और ले जाती है? मैं कहता हूँ, हम फिर देखते हैं कि इस प्रसिद्ध अभिषेक की नींव क्या है।
परमेश्वर का वचन कहता है:
“तुम में से जितनों ने मसीह में बपतिस्मा लिया है उन्होंने मसीह को पहन लिया है,”
अर्थात् उसके वरदानों समेत। अभिषेक करनेवालों का वचन कहता है कि बपतिस्मा में हमें ऐसी कोई प्रतिज्ञा नहीं मिली जो हमें शैतान के विरुद्ध युद्ध के लिए शस्त्रसज्ज करे। पहली वाणी सत्य की वाणी है; इसलिए दूसरी अवश्य झूठ की वाणी होगी।
इसलिए मैं इस पुष्टिकरण की परिभाषा उनकी अब तक की परिभाषा से अधिक सच्चाई के साथ दे सकता हूँ: वह बपतिस्मा का सीधा अपमान है जो उसके उचित उपयोग को धुँधला कर मिटा देता है; अथवा वह शैतान की झूठी प्रतिज्ञा है जो हमें परमेश्वर के सत्य से दूर खींचने के लिए गढ़ी गई है; अथवा, यदि कोई चाहे, वह शैतान के झूठ से अशुद्ध किया हुआ तेल है जो सीधे-सादे और असावधान लोगों को भरमाने के काम आता है।
इसके अतिरिक्त, ये अभिषेक करनेवाले जोड़ते हैं कि बपतिस्मा के बाद सब विश्वासियों को हाथ रखने के द्वारा पवित्र आत्मा पाना चाहिए, ताकि वे सिद्ध मसीही पाए जाएँ, क्योंकि कोई भी सिद्ध मसीही नहीं जब तक उसका अध्यक्षीय क्रिज़्म से अभिषेक न हुआ हो। ये उन्हीं के शब्द हैं।
परन्तु मैं तो समझता था कि मसीही धर्म से सम्बन्ध रखनेवाली हर बात पवित्रशास्त्र में समाई और बताई गई है। अब, जैसा मैं देखता हूँ, धर्म का सच्चा नियम उससे बाहर ढूँढ़ना होगा। इस प्रकार परमेश्वर की बुद्धि, स्वर्गीय सत्य और मसीह की सारी शिक्षा केवल मसीही बनाना आरम्भ कर सकती हैं; उन्हें सिद्ध करने का काम तेल का है।
इस शिक्षा से सब प्रेरित और इतने सारे शहीद दोषी ठहरते हैं, क्योंकि यह निश्चित है कि उनका कभी तेल से अभिषेक नहीं हुआ। वह पवित्र क्रिज़्म तब था ही नहीं जिससे उनका मसीही होना पूरा किया जाता — अथवा यों कहें कि जिससे वे मसीही बनाए जाते, क्योंकि उसे पाने से पहले वे मसीही थे ही नहीं।
परन्तु यदि मैं चुप भी रहूँ, तो ये क्रिज़्म के व्यापारी अपना खण्डन आप ही पूरी तरह कर देते हैं। बपतिस्मा के बाद वे अपने लोगों के कितने अंश का अभिषेक करते हैं? चौथाई भी नहीं — सौवाँ भाग भी नहीं। तब वे अपने झुण्ड में इतने आधे-मसीहियों को क्यों सहते हैं जबकि उनकी अपूर्णता इतनी सरलता से दूर की जा सकती है?
वे अपनी प्रजा को ऐसी बात छोड़ देने की इतनी लापरवाही से छूट क्यों देते हैं जिसे, उनके कथनानुसार, घोर पाप के बिना छोड़ा नहीं जा सकता? वे उन्हें ऐसी आवश्यक बात ग्रहण करने के लिए, जिसके बिना, जैसा वे कहते हैं, उद्धार नहीं मिल सकता, और अधिक बल से विवश क्यों नहीं करते — सिवाय उसके जो अचानक मृत्यु से रोका गया हो?
निश्चय ही उसे इतनी उदासीनता से बरते जाने देकर वे मौन रूप से मान लेते हैं कि वह उतना मूल्यवान नहीं जितना वे दिखावा करते हैं।
अन्त में वे ठहराते हैं कि इस पवित्र अभिषेक को बपतिस्मा से अधिक आदर के साथ माना जाए, क्योंकि वह केवल बड़े धर्माध्यक्षों के हाथों से दिया जाता है, जबकि बपतिस्मा साधारणतः सब याजक देते हैं।
यहाँ इसके सिवाय और क्या कहा जाए कि वे पूरी तरह पागल हैं? वे अपनी ही गढ़ी हुई बातों पर इतने मोहित हैं कि उनकी तुलना में परमेश्वर की पवित्र विधियों को तुच्छ जानने का साहस करते हैं। हे ईशनिन्दक जीभ! क्या तू मसीह के संस्कार के सामने उस चिकनाई को रखने का साहस करती है जो केवल तेरी साँस की दुर्गन्ध से दूषित और कुछ शब्दों की बुदबुदाहट से जादू की गई है? क्या तू उसकी तुलना परमेश्वर के वचन से पवित्र किए हुए जल से करने का साहस करती है? परन्तु तेरी धृष्टता के लिए यह भी बहुत कम था, क्योंकि तूने तो उसे बढ़कर माना भी है। देखो, पवित्र प्रेरितीय पीठ की आज्ञाएँ!
उनमें से कुछ ने इस उन्माद को ऐसे मत से कम करना चाहा है जो स्वयं अत्यन्त घोर है। उन्होंने कहा है कि पुष्टिकरण के तेल को बपतिस्मा से अधिक आदर के साथ माना जाए, सम्भवतः इसलिए नहीं कि वह अधिक सामर्थ्य और लाभ देता है, परन्तु इसलिए कि वह अधिक प्रतिष्ठित व्यक्तियों द्वारा दिया जाता है, इसलिए कि वह शरीर के अधिक प्रतिष्ठित अंग — अर्थात् माथे — पर लगाया जाता है, अथवा इसलिए कि वह सामर्थ्य की अधिक वृद्धि देता है, यद्यपि पापों की क्षमा के लिए बपतिस्मा का मूल्य अधिक है।
परन्तु अपने पहले तर्क से क्या वे अपने आप को डोनैटिस्ट सिद्ध नहीं करते, जो संस्कार की सामर्थ्य को उसके सेवक की प्रतिष्ठा के अनुसार आँकते हैं?
तौभी हम उन्हें यह मान लेने दें कि पुष्टिकरण अध्यक्षीय हाथ की प्रतिष्ठा के कारण अधिक प्रतिष्ठित कहा जाता है। परन्तु यदि कोई उनसे पूछे कि अध्यक्षों को ऐसा विशेषाधिकार कहाँ से मिला, तो अपने स्वप्नों के सिवाय वे कौन-सा कारण दे सकते हैं?
वे कहते हैं, “केवल प्रेरित ही यह अधिकार चलाते थे, क्योंकि केवल वे ही पवित्र आत्मा बाँटते थे।” परन्तु क्या केवल अध्यक्ष ही प्रेरित हैं? वरन् क्या वे प्रेरित हैं भी?
तौभी हम उन्हें यह भी मान लेने दें। तब वे उन्हीं आधारों पर यह तर्क क्यों नहीं करते कि हमारे प्रभु-भोज में लहू का संस्कार केवल अध्यक्षों को छूना चाहिए, जिसे वे साधारण विश्वासियों से रोक रखते हैं क्योंकि, जैसा वे कहते हैं, हमारे प्रभु ने उसे केवल प्रेरितों को दिया? यदि उसने उसे केवल प्रेरितों को दिया, तो वे यह निष्कर्ष क्यों नहीं निकालते कि इसलिए उसने उसे केवल अध्यक्षों को दिया? परन्तु उस स्थान में वे प्रेरितों को केवल याजक बनाते हैं; यहाँ अचानक उन्हें अध्यक्ष बना देते हैं।
अन्त में, हनन्याह प्रेरित न था, तौभी वह सन्त पौलुस के पास भेजा गया कि उसकी दृष्टि लौटाए, उसे बपतिस्मा दे और पवित्र आत्मा से भर दे।
और भी, मैं यह जोड़ता हूँ: यदि यह कार्य दैवी अधिकार से केवल अध्यक्षों का था, तो उन्होंने इसे साधारण याजकों को सौंपने का साहस कैसे किया, जैसा हम ग्रेगोरी की एक पत्री में पढ़ते हैं?
उनका दूसरा तर्क कितना निरर्थक, बेतुका और मूर्खतापूर्ण है: कि उनका पुष्टिकरण परमेश्वर के बपतिस्मा से अधिक प्रतिष्ठित है क्योंकि पुष्टिकरण में माथे पर तेल मला जाता है, जबकि बपतिस्मा में केवल सिर का तालू भिगोया जाता है — मानो बपतिस्मा जल से नहीं, तेल से होता हो!
मैं उन सब को, जो परमेश्वर का भय मानते हैं, साक्षी ठहराता हूँ कि क्या ये धोखेबाज़ अपनी झूठी शिक्षा के खमीर से संस्कारों की शुद्धता को बिगाड़ने का यत्न नहीं कर रहे। मैंने अन्यत्र कहा है कि मनुष्यों की गढ़ी हुई बातों की भीड़ में संस्कारों में यह देख पाना कठिन है कि सचमुच परमेश्वर की ओर से क्या है। यदि किसी ने तब मेरी बात न मानी, तो अब कम से कम अपने ही शिक्षकों की बात तो माने।
देखो, जल — जो परमेश्वर का चिह्न है — तुच्छ जाना और अपवित्र किया जाता है, जबकि बपतिस्मा में वे केवल अपने तेल को बड़ा ठहराते हैं। हम इसके विपरीत कहते हैं कि बपतिस्मा में माथा जल से भिगोया जाता है, जिसकी तुलना में हम उनके सारे तेल को, चाहे बपतिस्मा में हो या पुष्टिकरण में, गोबर के बराबर भी नहीं गिनते।
यदि कोई आपत्ति करे कि उनका तेल अधिक दाम पर बिकता है, तो उत्तर सरल है: उनकी बिक्री छल, दुष्टता और चोरी है।
अपने तीसरे तर्क से वे अपनी अभक्ति प्रकट करते हैं, जब वे सिखाते हैं कि पुष्टिकरण में बपतिस्मा की अपेक्षा सामर्थ्य की अधिक वृद्धि दी जाती है। प्रेरितों ने हाथ रखने के द्वारा पवित्र आत्मा के प्रत्यक्ष वरदान बाँटे। परन्तु इन धोखेबाज़ों की चिकनाई से कौन-सा लाभ प्रकट होता है?
आओ, इन नरमी बरतनेवालों को छोड़ दें, जो एक ईशनिन्दा को अनेक अन्य ईशनिन्दाओं से ढाँकते हैं। यह एक ऐसी अटूट गाँठ है जिसे परिश्रम से खोलने की अपेक्षा पूरी तरह काट देना ही अच्छा है।
जब वे अपने आप को परमेश्वर के वचन से और हर विश्वसनीय तर्क से वंचित देखते हैं, तो अपने सामान्य दावे की शरण लेते हैं: कि यह रीति बहुत प्राचीन है और अनेक युगों की सहमति से पुष्ट हुई है। यदि यह सच भी होता, तौभी वे कुछ सिद्ध न कर पाते। संस्कार पृथ्वी का नहीं, स्वर्ग का है; मनुष्यों का नहीं, केवल परमेश्वर का है। यदि वे चाहते हैं कि उनका पुष्टिकरण संस्कार माना जाए, तो वे प्रमाणित करें कि परमेश्वर उसका कर्ता है।
परन्तु वे प्राचीनता की दुहाई क्यों देते हैं जबकि प्राचीन लोग दो से अधिक संस्कार कहीं नहीं मानते? यदि हमें अपने विश्वास का निश्चय मनुष्यों से लेना पड़ता, तो हमारे पास एक अभेद्य गढ़ यह तथ्य होता कि प्राचीन लोगों ने उन बातों को, जिन्हें ये लोग झूठे ही संस्कार कहते हैं, कभी संस्कार नहीं माना।
प्राचीन लोग हाथ रखने की चर्चा करते हैं, परन्तु क्या वे उसे संस्कार कहते हैं? सन्त अगस्तीन स्पष्ट लिखते हैं कि वह प्रार्थना के सिवाय और कुछ नहीं। वे यहाँ आकर अपने मूर्खतापूर्ण भेदों से सन्त अगस्तीन का आशय धुँधला न करें, यह कहकर कि उनके शब्द पुष्टिकरण के हाथ रखने के विषय में नहीं बल्कि चंगाई या मेल-मिलाप के हाथ रखने के विषय में समझे जाएँ। उनकी पुस्तक सब के लिए उपलब्ध है। यदि मैं उनके शब्दों को उस अर्थ से भिन्न किसी अर्थ में मोड़ूँ जिसमें सन्त अगस्तीन ने उन्हें लिखा, तो वे मेरे मुँह पर थूकें।
मैं चाहूँगा कि हम उस रीति को बनाए रखें जो मेरे विश्वास में प्राचीनों में तब थी जब संस्कार की यह गर्भपात-सी कल्पना उठी न थी। वह पुष्टिकरण न था, जिसका नाम लेना भी बपतिस्मा को हानि पहुँचाए बिना सम्भव नहीं, परन्तु एक मसीही शिक्षा थी जिसमें बच्चों को, अथवा उन्हें जो बचपन पार कर चुके थे, कलीसिया के सामने अपने विश्वास का लेखा देना पड़ता था।
यह शिक्षा की एक उत्तम पद्धति होती, यदि इसी प्रयोजन के लिए कोई विशेष प्रारूप तैयार होता, जिसमें हमारे धर्म की उन सब बातों को सरल भाषा में सम्मिलित और समझाया गया होता जिन पर विश्वासियों की सार्वभौमिक कलीसिया को बिना विवाद के सहमत होना चाहिए।
लगभग दस वर्ष की आयु का बालक अपने विश्वास का अंगीकार घोषित करने के लिए कलीसिया के सामने उपस्थित हो। उससे हर एक सिद्धान्त पर प्रश्न किए जाएँ और उसे उत्तर देना पड़े। यदि वह किसी बात से अनजान हो या उसे ठीक से न समझा हो, तो उसे सिखाया जाए, ताकि कलीसिया की उपस्थिति और साक्षी में वह उस सच्चे, एक और शुद्ध विश्वास का अंगीकार करे जिसमें सब विश्वासी एक मन से परमेश्वर की आराधना करते हैं।
निश्चय ही, यदि यह अनुशासन चलता, तो कुछ माता-पिताओं की लापरवाही सुधर जाती। तब वे अपने बच्चों की शिक्षा की उपेक्षा बिना बड़ी लज्जा के न कर पाते, जबकि अभी वे उसकी बहुत कम परवाह करते हैं। मसीही लोगों में विश्वास की एकता अधिक होती, और बहुत-से लोग इतने अज्ञानी और अशिक्षित न रहते। कुछ लोग नई शिक्षाओं के बहाव में इतनी सरलता से न बह जाते। संक्षेप में, हर एक के पास मसीही सिद्धान्त का स्पष्ट मार्गदर्शक होता।
प्रायश्चित के विषय में
पुष्टिकरण के तुरन्त बाद वे प्रायश्चित को रखते हैं, जिसके विषय में वे इतनी उलझन और अव्यवस्था से बोलते हैं कि उनकी शिक्षा से कुछ भी दृढ़ या निश्चित नहीं निकाला जा सकता।
हम पहले ही अन्यत्र विस्तार से समझा चुके हैं, पहले यह कि पश्चाताप के विषय में पवित्रशास्त्र हमें क्या सिखाता है, और फिर यह कि वे उसके विषय में क्या सिखाते हैं। अब हमें केवल इतना छूना है कि जिस कारण से उन्होंने इसे संस्कार बनाया है वह कितना तुच्छ है — अथवा यों कहें कि बिलकुल है ही नहीं।
वे उसमें संस्कार ढूँढ़ने का बहुत परिश्रम करते हैं, और इसमें आश्चर्य नहीं, क्योंकि वे उसे ढूँढ़ रहे हैं जो है ही नहीं। अन्त में, जो सबसे उत्तम व्याख्या वे गढ़ सकते हैं, वह भी मतों की विविधता के कारण सब कुछ लटका हुआ, अनिश्चित और उलझा हुआ छोड़ देती है।
तब वे कहते हैं कि बाहरी प्रायश्चित संस्कार है, और यदि ऐसा है, तो उसे भीतरी पश्चाताप — अर्थात् हृदय की खेदपूर्ण टूटन — का चिह्न माना जाना चाहिए, जो इस तर्क के अनुसार संस्कार का सार होगा। अथवा वे कहते हैं कि दोनों संस्कार हैं — दो संस्कार नहीं, परन्तु एक पूर्ण संस्कार — और बाहरी प्रायश्चित केवल संस्कार है, जबकि भीतरी पश्चाताप संस्कार भी है और उसका सार भी, और पापों की क्षमा संस्कार का सार है परन्तु स्वयं संस्कार नहीं।
इस सब के उत्तर में, जिन्हें संस्कार की वह परिभाषा याद है जो ऊपर दी गई, वे जिस-जिस को ये लोग संस्कार कहते हैं उसकी तुलना उससे करें, और उन्हें कोई मेल न मिलेगा। क्योंकि वे पाएँगे कि प्रायश्चित ऐसी बाहरी रीति नहीं जो प्रभु ने हमारे विश्वास की पुष्टि के लिए ठहराई हो।
यदि वे उत्तर दें कि मेरी परिभाषा कोई ऐसा नियम नहीं जिसे मानने को वे बाध्य हों, तो वे सन्त अगस्तीन की सुनें, जिनके प्रति वे अटूट आदर रखने का दिखावा करते हैं। वे कहते हैं: “शारीरिक लोगों के लिए संस्कार दृश्य रूप में ठहराए गए, ताकि संस्कारों की क्रमिक सीढ़ियों से वे आँखों को दिखनेवाली बातों से बुद्धि से समझी जानेवाली बातों तक पहुँचाए जाएँ।”
जिसे वे प्रायश्चित का संस्कार कहते हैं, उसमें वे क्या देखते हैं, या दूसरों को क्या दिखा सकते हैं, जो इससे मेल खाता हो?
सन्त अगस्तीन अन्यत्र कहते हैं: “संस्कार इसलिए कहलाता है कि उसमें एक वस्तु देखी जाती है और दूसरी समझी जाती है। जो देखा जाता है उसका शारीरिक रूप है; जो समझा जाता है वह आत्मिक फल लाता है।”
परन्तु उन्हें उनकी अपनी सीमाओं के भीतर भी हराने के लिए मैं पूछता हूँ: यदि यहाँ कोई संस्कार होता, तो क्या यह कहना अधिक युक्तिसंगत न होता कि याजक का पापमोचन संस्कार है, न कि भीतरी या बाहरी प्रायश्चित? क्योंकि यह कहना सरल होता कि पापमोचन पापों की क्षमा में हमारे विश्वास की पुष्टि के लिए ठहराई गई एक रीति है, और उसके साथ कुंजियों की प्रतिज्ञा है, जैसा वे उसे कहते हैं, अर्थात्—
“जो कुछ तुम पृथ्वी पर बाँधोगे वह स्वर्ग में बँधेगा, और जो कुछ तुम पृथ्वी पर खोलोगे वह स्वर्ग में खुलेगा।”
परन्तु कोई आपत्ति कर सकता है कि याजकों द्वारा बहुतों को पापमोचन दिया जाता है जिन्हें ऐसे पापमोचन से कुछ लाभ नहीं होता, जबकि उन्हीं की शिक्षा के अनुसार नई व्यवस्था के संस्कारों को जो वे दर्शाते हैं उसे प्रभावी रूप से सिद्ध करना चाहिए।
उत्तर तैयार है। जैसे प्रभु-भोज में दोहरा खाना है — एक संस्कारात्मक, जो भले और बुरे दोनों में समान है, और दूसरा विशेष रूप से भलों का — वैसे ही वे यह भी कह सकते थे कि पापमोचन दो प्रकार से ग्रहण किया जाता है।
तौभी मैं अब तक यह नहीं समझ पाया कि जब वे कहते हैं कि नई व्यवस्था के संस्कारों में इतनी सामर्थी प्रभावशीलता है तो उनका क्या अभिप्राय है। जब मैंने इस विषय को उसके उचित स्थान पर लिया, तो मैंने दिखाया कि यह शिक्षा परमेश्वर के सत्य से किसी रीति से मेल नहीं खाती।
मैं यहाँ केवल यह दिखाना चाहता था कि यह कठिनाई उन्हें याजक के पापमोचन को संस्कार कहने से नहीं रोकेगी। क्योंकि वे सन्त अगस्तीन के शब्दों में उत्तर दे सकते थे कि पवित्रीकरण कभी-कभी दृश्य संस्कार होता है, और दृश्य संस्कार कभी-कभी भीतरी पवित्रीकरण के बिना भी होता है; वैसे ही, कि संस्कार जो दर्शाते हैं उसे केवल चुने हुए लोगों में पूरा करते हैं; और फिर, कि कुछ लोग मसीह को केवल संस्कार ग्रहण करने तक पहनते हैं, जबकि दूसरे उसे पवित्रीकरण तक पहनते हैं। पहली बात भले और बुरे दोनों में समान रूप से होती है; दूसरी केवल भलों में होती है।
निश्चय ही उन्होंने अपने आप को अत्यन्त बचकाने ढंग से धोखा दिया है और दोपहर की पूरी रोशनी में अन्धे रहे हैं, क्योंकि ऐसी उलझन और कठिनाई के बीच वे इतनी सरल और जानी-पहचानी बात को पहचान न सके।
तौभी, कि वे अपने संस्कार को जहाँ भी रखें, घमण्ड न करें, मैं इनकार करता हूँ कि उसे संस्कार माना जाए।
पहली बात, उसके पास परमेश्वर की कोई प्रतिज्ञा नहीं, जो संस्कार की एकमात्र नींव है। क्योंकि, जैसा हम ऊपर पर्याप्त रूप से समझा चुके हैं, कुंजियों की प्रतिज्ञा पापमोचन का कोई विशेष रूप स्थापित नहीं करती, वरन् केवल सुसमाचार के प्रचार से सम्बन्ध रखती है, चाहे वह बहुतों से कहा जाए या एक से, बिना भेद के। अर्थात् इस प्रतिज्ञा से हमारा प्रभु हर एक को अलग-अलग सुनाया जानेवाला कोई विशेष पापमोचन स्थापित नहीं करता, परन्तु वह पापमोचन जो सब पापियों को बिना विशेष सम्बोधन के सामान्य रूप से सुनाया जाता है।
दूसरी बात, यहाँ जो भी रीति प्रस्तुत की जाए वह विशुद्ध मानवीय गढ़न्त है, जबकि यह पहले ही सिद्ध हो चुका है कि संस्कार की रीतियाँ केवल परमेश्वर ही ठहरा सकता है। इसलिए प्रायश्चित के संस्कार के विषय में जो कुछ उन्होंने गढ़ा और लोगों को मनवाया है वह सब झूठ और छल है।
इसके अतिरिक्त, उन्होंने इस नकली संस्कार को उसके स्वभाव के अनुकूल एक उपाधि से सजाया है, उसे “जहाज़ टूटने के बाद दूसरा तख़्ता” कहकर। क्योंकि यदि किसी ने पाप से बपतिस्मा में पाए हुए निर्दोषता के वस्त्र को मैला कर दिया हो, तो वे कहते हैं कि वह उसे प्रायश्चित के द्वारा धो सकता है।
वे कहते हैं, “परन्तु यह सन्त जेरोम का कथन है।” जिसने भी कहा हो, यह कथन पूरी तरह हानिकारक होने के दोष से बच नहीं सकता। यह ऐसे बोलता है मानो बपतिस्मा पाप से मिट जाता है, बजाय इसके कि पापियों को सिखाए कि जब भी वे पाप की क्षमा चाहें तो उसे स्मरण करें, ताकि उसे स्मरण करके वे शान्ति पाएँ, साहस बाँधें, और उस क्षमा के विषय में अपना भरोसा दृढ़ करें जो बपतिस्मा में उनसे प्रतिज्ञा की गई थी।
इसलिए जो भी बपतिस्मा को पश्चाताप का संस्कार कहे वह सबसे उचित बात कहेगा, क्योंकि वह उन्हें सांत्वना के रूप में दिया गया जो पश्चाताप करने का यत्न करते हैं।
कोई यह न समझे कि यह मेरी अपनी गढ़ी हुई कल्पना है; प्रकट है कि यह प्राचीन कलीसिया का सामान्य और स्थिर निर्णय था। क्योंकि सन्त अगस्तीन के नाम से प्रचलित विश्वास के विषय में नामक पुस्तक में बपतिस्मा को विश्वास और पश्चाताप का संस्कार कहा गया है।
परन्तु हम अनिश्चित गवाहियों की शरण क्यों लें, मानो इससे अधिक स्पष्ट किसी बात की आवश्यकता हो जो सुसमाचार लेखक बताता है?
“यूहन्ना ने पापों की क्षमा के लिए मन फिराव के बपतिस्मा का प्रचार किया।”
अन्तिम अभिषेक के विषय में
तीसरा नकली संस्कार अन्तिम अभिषेक है, जो केवल याजक द्वारा, केवल जीवन के अन्त में, और केवल अध्यक्ष के पवित्र किए हुए तेल से इन शब्दों के साथ दिया जाता है: “इस पवित्र अभिषेक और अपनी दया के द्वारा परमेश्वर तुझे वे सब पाप क्षमा करे जो तूने सुनने, देखने, सूँघने, छूने और चखने के द्वारा किए हैं।”
वे दिखावा करते हैं कि इस संस्कार में दो सामर्थ्य हैं: पापों की क्षमा और, यदि हितकर हो तो, शारीरिक रोग से राहत, अन्यथा आत्मा का स्वास्थ्य।
वे कहते हैं कि इसकी स्थापना सन्त याकूब में मिलती है, जिसके शब्द ये हैं:
“क्या तुम में कोई रोगी है? तो वह कलीसिया के प्राचीनों को बुलाए, और वे प्रभु के नाम से उस पर तेल मलकर उसके लिए प्रार्थना करें; और वह चंगा हो जाएगा, और यदि उसने पाप किए हों तो वे उसे क्षमा किए जाएँगे।”
यह अभिषेक उसी श्रेणी का है जिसकी चर्चा ऊपर हाथ रखने के विषय में हुई: यह एक नाटकीय प्रदर्शन और नकल है जिससे वे बिना कारण और बिना लाभ के प्रेरितों की नकल करने का यत्न करते हैं।
सन्त मरकुस बताता है कि अपनी पहली यात्रा में प्रेरितों ने, प्रभु से मिली आज्ञा के अनुसार, मरे हुओं को जिलाया, दुष्टात्माओं को निकाला, कोढ़ियों को शुद्ध किया और रोगियों को चंगा किया। वह जोड़ता है कि रोगियों को चंगा करने में उन्होंने तेल का प्रयोग किया:
“उन्होंने बहुत-से रोगियों पर तेल मलकर उन्हें चंगा किया।”
सन्त याकूब के सामने यही बात थी जब उसने आज्ञा दी कि प्राचीनों को बुलाया जाए कि वे रोगी का अभिषेक करें।
परन्तु जो इस पर विचार करते हैं कि हमारे प्रभु और उसके प्रेरित इन बाहरी बातों में कितनी स्वतन्त्रता से व्यवहार करते थे, वे सरलता से समझ लेंगे कि ऐसी रीतियों के नीचे कोई गहरा भेद नहीं छिपा था। जब हमारे प्रभु ने अन्धे को दृष्टि देनी चाही, तो उसने धूल और थूक से मिट्टी बनाई। उसने कुछ को स्पर्श से चंगा किया और कुछ को अपने वचन से। इसी प्रकार प्रेरितों ने कुछ रोगों को केवल शब्दों से चंगा किया, कुछ को स्पर्श से, और कुछ को अभिषेक से।
वे कह सकते हैं, “परन्तु यह अभिषेक प्रेरितों ने अन्य साधनों से अधिक बिना सोचे नहीं अपनाया।” मैं यह मानता हूँ, परन्तु यह नहीं कि उन्होंने इसे चंगाई के साधन के रूप में अपनाया। यह केवल एक चिह्न था जिसका उद्देश्य सीधे-सादे लोगों को यह सिखाना था कि ऐसी सामर्थ्य किसकी ओर से आती है, ताकि वे उसकी प्रशंसा प्रेरितों को न दें। पवित्रशास्त्र में पवित्र आत्मा और उसके वरदानों को तेल से दर्शाना सामान्य और प्रचलित बात है।
परन्तु रोगियों को चंगा करने का वरदान अब नहीं रहा, जैसे वे अन्य आश्चर्यकर्म भी नहीं रहे जिन्हें प्रभु ने कुछ समय के लिए किए जाने की इच्छा की थी ताकि सुसमाचार का नया प्रचार सदा आश्चर्य के योग्य बना रहे। इसलिए यदि हम यह मान भी लें कि अभिषेक उन आश्चर्यजनक सामर्थ्यों का संस्कार था जो तब प्रेरितों के हाथों से बाँटी जाती थीं, तो भी उसका हमसे अब कोई सम्बन्ध नहीं, क्योंकि उन सामर्थ्यों का प्रबन्ध हमें सौंपा नहीं गया।
और वे किस बड़े कारण से इस अभिषेक को पवित्रशास्त्र में उल्लिखित अन्य सब चिह्नों या प्रतीकों से बढ़कर संस्कार बनाते हैं? वे कोई शीलोह का कुण्ड क्यों नहीं ठहराते जिसमें रोगी निश्चित समयों पर स्नान करें?
वे कहते हैं, “वह व्यर्थ ही किया जाएगा।” निश्चय ही उनके अभिषेक से अधिक व्यर्थ नहीं।
वे मृतक के ऊपर क्यों नहीं लेटते, क्योंकि सन्त पौलुस ने एक मरे हुए जवान को उस पर पसरकर जिलाया? वे थूक और धूल से बनी मिट्टी का संस्कार क्यों नहीं बनाते?
वे कहते हैं, “अन्य सब उदाहरण विशेष अवसरों के थे, जबकि अभिषेक की आज्ञा सन्त याकूब ने दी।”
हाँ, परन्तु सन्त याकूब ने उस समय के लिए कहा जब कलीसिया उस वरदान का आनन्द लेती थी जिसका हमने वर्णन किया। वे तो हमें विश्वास दिलाना चाहेंगे कि वही सामर्थ्य आज भी उनके अभिषेक में है, परन्तु अनुभव इसके विपरीत प्रमाण देता है।
अब किसी को आश्चर्य न हो कि उन्होंने उन प्राणों को इतनी निर्भीकता से धोखा दिया जिन्हें उन्होंने जड़ और अन्धे देखा, क्योंकि उन्होंने उन्हें परमेश्वर के वचन से — अर्थात् उनके जीवन और ज्योति से — वंचित कर दिया था; जब वे देह की जीवित और सजग इन्द्रियों को भी धोखा देने का यत्न करने में लज्जित नहीं होते।
इसलिए वे अपने आप को हँसी का पात्र बनाते हैं जब वे चंगाई का वरदान रखने की डींग मारते हैं। हमारा प्रभु निश्चय ही हर युग में अपने लोगों के साथ रहता है और आवश्यकता होने पर उनके रोगों को उसी प्रकार दूर करता है जैसे पूर्वकाल में करता था। परन्तु वह अब वे प्रत्यक्ष सामर्थ्य या वे आश्चर्यकर्म प्रकट नहीं करता जो उसने प्रेरितों के हाथों से बाँटे थे।
इसलिए जैसे प्रेरितों के पास यह कारण था कि वे उन्हें सौंपे गए अनुग्रह को तेल से दर्शाएँ, और इस प्रकार दिखाएँ कि वह पवित्र आत्मा की सामर्थ्य है, उनकी अपनी नहीं, वैसे ही इसके विपरीत ये लोग पवित्र आत्मा का घोर अपमान करते हैं जब वे दुर्गन्धयुक्त और निष्प्रभावी तेल को उसकी सामर्थ्य बताते हैं।
यह ठीक वैसा ही है मानो कोई कहे कि हर प्रकार का तेल पवित्र आत्मा की सामर्थ्य है क्योंकि पवित्रशास्त्र तेल को उसकी सामर्थ्य के नाम के रूप में प्रयोग करता है, अथवा हर कबूतर पवित्र आत्मा है क्योंकि वह एक बार उस रूप में प्रकट हुआ था।
परन्तु वे विचार करें कि वे क्या कर रहे हैं। जहाँ तक हमारा सम्बन्ध है — और वर्तमान के लिए यही पर्याप्त है — हम पूरी निश्चयता से जानते हैं कि उनका अभिषेक संस्कार नहीं है, क्योंकि वह न परमेश्वर की ठहराई हुई रीति है न उसकी किसी प्रतिज्ञा से जुड़ी है।
क्योंकि जब हम संस्कार में ये दो बातें चाहते हैं — कि वह परमेश्वर की ठहराई हुई रीति हो और उससे प्रतिज्ञा जुड़ी हो — तो हम यह भी चाहते हैं कि रीति हमारे लिए ठहराई गई हो और प्रतिज्ञा हमारी हो।
कोई अब यह नहीं मानता कि खतना मसीही कलीसिया का संस्कार है, यद्यपि वह परमेश्वर की विधि थी और उसके साथ प्रतिज्ञा थी, क्योंकि उसकी आज्ञा हमें नहीं दी गई और उसकी प्रतिज्ञा हमें नहीं दी गई।
हम पहले ही स्पष्ट दिखा चुके हैं कि जिस प्रतिज्ञा का दावा वे अपने अभिषेक के लिए करते हैं वह हम से सम्बन्ध नहीं रखती, और वे स्वयं अनुभव से यह प्रमाणित करते हैं। रीति का प्रयोग केवल उन्हें करना चाहिए जिनके पास चंगाई का वरदान है, न कि इन जल्लादों को, जो चंगा करने से अधिक मारने और घायल करने में सामर्थी हैं।
यदि वे यह सिद्ध करने में सफल भी हो जाएँ कि अभिषेक के विषय में सन्त याकूब जो कहता है वह हमारे समय पर लागू होता है — जो वे करने से बहुत दूर हैं — तो भी उस अभिषेक को स्थापित करने की दिशा में उन्होंने थोड़ा ही किया होता जिससे वे अब तक हमें लीपते आए हैं।
सन्त याकूब आज्ञा देता है कि सब रोगियों का अभिषेक किया जाए। ये लोग अपनी चिकनाई से रोगियों को नहीं, परन्तु आधे मरे हुए शरीरों को अपवित्र करते हैं, जब आत्मा निकलने को तैयार होती है — अथवा, जैसा वे कहते हैं, अन्तिम घड़ी में। यदि उनके संस्कार में या तो रोग की गम्भीरता घटाने का, या आत्मा को कुछ राहत पहुँचाने का सुलभ उपाय है, तो वे बहुत निर्दय हैं कि उसे कभी समय पर नहीं देते।
सन्त याकूब का आशय है कि रोगी का अभिषेक कलीसिया के प्राचीन करें। ये लोग याजक के सिवाय किसी अभिषेककर्ता को नहीं मानते। उनकी यह व्याख्या कि सन्त याकूब में “प्राचीनों” का अर्थ याजक है, और बहुवचन अधिक प्रतिष्ठा के लिए प्रयुक्त हुआ, सर्वथा निरर्थक है — मानो उस समय की कलीसियाओं में याजकों की इतनी भरमार थी कि वे अपना तेल का डिब्बा लम्बे जुलूसों में लिए फिर सकते थे।
जब सन्त याकूब सीधे आज्ञा देता है कि रोगी का अभिषेक किया जाए, तो मैं साधारण तेल से किए गए अभिषेक के सिवाय किसी अभिषेक को नहीं समझता। सन्त मरकुस के वृत्तान्त में किसी अन्य प्रकार के तेल का उल्लेख नहीं।
ये लोग किसी तेल को स्वीकार्य नहीं मानते जब तक वह अध्यक्ष द्वारा पवित्र न किया गया हो — अर्थात् उसकी साँस से भली-भाँति गर्म न किया गया हो, उसकी बुदबुदाहट से जादू न किया गया हो, और घुटनों के बल नौ बार अभिवादित न हुआ हो: तीन बार “जय हो, पवित्र तेल” से; तीन बार “जय हो, पवित्र क्रिज़्म” से; और तीन बार “जय हो, पवित्र मरहम” से। यह उनकी गम्भीर रीति है। ऐसे मन्त्र उन्होंने किससे सीखे?
सन्त याकूब कहता है कि जब रोगी का तेल से अभिषेक और उसके लिए प्रार्थना हो चुके, तो यदि उसने पाप किए हों तो वे उसे क्षमा किए जाएँगे। उसका आशय यह नहीं कि पाप चिकनाई से मिटाए जाते हैं, परन्तु यह कि विश्वासियों की प्रार्थनाएँ, जिनके द्वारा उनका पीड़ित भाई परमेश्वर को सौंपा जाता है, व्यर्थ न जाएँगी।
ये लोग दुष्टता से दिखावा करते हैं कि पाप उनके पवित्र — अर्थात् घृणित — अभिषेक से क्षमा होते हैं। देखो, यदि उन्हें सन्त याकूब की गवाही का अपनी मूर्खतापूर्ण कल्पना के अनुसार दुरुपयोग करने दिया भी जाए, तो भी उन्होंने कितना कुछ पूरा किया होगा।
कलीसियाई पद-दीक्षा के विषय में
पद-दीक्षा का संस्कार उनकी सूची में चौथा रखा गया है, परन्तु वह इतना उपजाऊ है कि अपने ही सात छोटे संस्कार उत्पन्न करता है। यह सचमुच हास्यास्पद है कि सात संस्कार घोषित करने के बाद, जब वे उन्हें गिनने का यत्न करते हैं तो तेरह गिनते हैं।
वे यह कहकर इसका बचाव नहीं कर सकते कि पद-दीक्षा के सातों संस्कार एक ही संस्कार हैं क्योंकि वे सब एक ही याजकपद की ओर ले जाते हैं और सीढ़ियों के समान हैं जिनसे उस तक चढ़ा जाता है। क्योंकि जब यह प्रकट है कि हर एक की रीतियाँ भिन्न हैं, और वे कहते हैं कि हर एक भिन्न अनुग्रह देता है, तो कोई सन्देह नहीं कर सकता कि उन्हीं की शिक्षा के अनुसार सात संस्कार मानने पड़ेंगे।
और जब वे स्वयं खुलकर मानते हैं कि सात हैं तो हम इस पर ऐसा विवाद क्यों करें मानो यह सन्देहजनक हो? वे इन्हें सात कलीसियाई पद या श्रेणियाँ कहते हैं: द्वारपाल, पाठक, भूतनिष्कासक, सहायक, उपयाजक, डीकन और याजक।
वे कहते हैं कि सात इसलिए हैं क्योंकि पवित्र आत्मा के अनुग्रह के सात रूप हैं, जिनसे इन पदों पर उन्नत किए जानेवालों को भरा जाना चाहिए, और जो उनकी उन्नति में बढ़ाया और अधिक प्रचुरता से दिया जाता है।
पहले, उनकी गिनती पवित्रशास्त्र की विकृत टीका और व्याख्या से गढ़ी गई है, क्योंकि वे कल्पना करते हैं कि उन्होंने यशायाह में पवित्र आत्मा की सात सामर्थ्यों के विषय में पढ़ा है। परन्तु सच तो यह है कि भविष्यद्वक्ता उस अंश में छः से अधिक का उल्लेख नहीं करता:
“बुद्धि और समझ की आत्मा, युक्ति और पराक्रम की आत्मा, ज्ञान और यहोवा के भय की आत्मा।”
न ही उसका अभिप्राय वहाँ पवित्र आत्मा के सब वरदानों को गिनना था। क्योंकि पवित्रशास्त्र में अन्यत्र उसे जीवन का आत्मा, पवित्रता का आत्मा और परमेश्वर की सन्तान होने के लेपालकपन का आत्मा भी कहा गया है।
अन्य लोग, जो अपने को अधिक सूक्ष्मदर्शी मानते हैं, केवल सात नहीं बल्कि नौ पद मानते हैं, जो, जैसा वे दावा करते हैं, विजयी कलीसिया के अनुरूप हैं। फिर भी उन्हीं में विरोध है। कुछ मुण्डन को पहला पद और अध्यक्षपद को अन्तिम बनाते हैं। अन्य मुण्डन को निकाल देते हैं और प्रधान-अध्यक्षपद को पदों में गिनते हैं।
इसिदोर उन्हें भिन्न रीति से बाँटता है, भजन-गायकों और पाठकों को अलग-अलग पद बनाकर। वह पहले को गायन का नेतृत्व करने और दूसरे को लोगों की शिक्षा के लिए पवित्रशास्त्र पढ़ने के लिए नियुक्त करता है — एक भेद जिसे धर्म-नियम मानते हैं।
ऐसी विविधता में हम क्या त्यागें या अपनाएँ? क्या हम कहें कि सात पद हैं? वाक्य-संग्रह का गुरु यही सिखाता है, परन्तु सबसे प्रबुद्ध शिक्षक कुछ और ठहराते हैं। फिर ये शिक्षक भी आपस में असहमत हैं। इसके अतिरिक्त, पवित्र धर्म-नियम हमें एक और ही मार्ग दिखाते हैं।
देखो, जब मनुष्य परमेश्वर के वचन के बिना ईश्वरीय बातों पर विवाद करते हैं तो उनमें कैसी सहमति होती है!
फिर, जब वे अपने पदों की उत्पत्ति की बात करते हैं, तो नन्हें बच्चों के सामने भी वे कितने हास्यास्पद बन जाते हैं! वे कहते हैं, “पादरी (क्लर्क) शब्द चिट्ठी से निकला है, क्योंकि वे परमेश्वर के भाग में पड़े हैं, क्योंकि वे परमेश्वर द्वारा चुने गए हैं, अथवा क्योंकि परमेश्वर उनका भाग है।”
परन्तु पूरी कलीसिया के नाम को अपने लिए ही हथिया लेना उनके लिए ईशनिन्दा थी। क्योंकि इस शब्द का अर्थ मीरास है, और कलीसिया मसीह की मीरास है, जो उसे पिता ने दी है। सन्त पतरस कुछ मुण्डे हुए लोगों को पादरी-वर्ग नहीं कहता, जैसा उन्होंने उसके शब्दों की झूठी टीका की है, परन्तु यह उपाधि परमेश्वर के सारे लोगों को देता है।
इसके बाद उनके अभिलेख कहते हैं कि पादरियों का सिर के तालू पर मुण्डन इसलिए किया जाता है कि गोल मुण्डन राजसी श्रेष्ठता को दर्शाए, क्योंकि पादरियों को राजा होना चाहिए जो अपने आप पर और दूसरों पर शासन करें, जैसा सन्त पतरस उनसे कहता है:
“तुम एक चुना हुआ वंश, राजकीय याजकों का समाज, पवित्र जाति और परमेश्वर की निज प्रजा हो।”
यहाँ फिर मैं उन्हें झूठ का दोषी ठहराता हूँ। सन्त पतरस पूरी कलीसिया से बोलता है, परन्तु वे उसके कथन को किसी याजकीय भीड़ पर लागू करके मोड़ते हैं, मानो “पवित्र बनो” केवल उन्हीं से कहा गया हो। मानो केवल वे ही मसीह के लहू से मोल लिए गए हों और केवल वे ही परमेश्वर के लिए राज्य और याजकों का समाज बनाए गए हों, न कि सब विश्वासी बिना भेद के, जैसा पवित्रशास्त्र साक्षी देता है।
फिर वे अपने मुण्डन के अन्य कारण बताते हैं। उनके सिर का तालू खुला छोड़ा जाता है यह दिखाने के लिए कि उनके मन परमेश्वर की महिमा को आमने-सामने बिना बाधा के निहारें; अथवा यह दिखाने के लिए कि आँखों और सिर के दोष काट डाले जाने चाहिए; अथवा सांसारिक सम्पत्ति के त्याग और छोड़ देने को दर्शाने के लिए, जबकि जो बालों का घेरा बचा रहता है वह उस सम्पत्ति के भाग को दर्शाता है जो वे अपने जीवन-निर्वाह के लिए रखते हैं।
यह सब केवल प्रतीक में है, क्योंकि मन्दिर का परदा सम्भवतः अब तक फटा नहीं। इस प्रकार, अपने आप को मना लेते हैं कि जब उन्होंने अपने मुण्डन से ऐसी बातों को दर्शा दिया तो उन्होंने अपना कर्तव्य पूरी तरह निभा दिया, वे इनमें से कुछ भी वास्तव में पूरा नहीं करते।
वे कब तक हमें ऐसे झूठों और भ्रमों से धोखा देते रहेंगे? बालों का गुच्छा कतरकर पादरी दिखाते हैं कि उन्होंने सांसारिक सम्पत्ति की बहुतायत त्याग दी है, कि वे हर बाधा से मुक्त होकर परमेश्वर की महिमा का ध्यान करते हैं, और कि उन्होंने अपनी आँखों और कानों की अभिलाषाओं को मार डाला है। फिर भी कोई वर्ग ऐसा नहीं जो लोभ, अज्ञान और व्यभिचार से इनसे अधिक भरा हो। वे अपनी पवित्रता को वास्तव में क्यों नहीं दिखाते, बजाय इसके कि झूठे और धोखे के चिह्नों से उसका प्रतीक दिखाएँ?
अन्त में, जब वे कहते हैं कि उनका मुण्डन नाज़ीरों से अपनी उत्पत्ति और अर्थ पाता है, तो इसके सिवाय वे क्या सिद्ध करते हैं कि उनके भेद यहूदी रीतियों से उतरे हैं — अथवा यों कहें कि वे विशुद्ध यहूदी धर्म हैं?
जब वे जोड़ते हैं कि प्रिस्किल्ला, अक्विला और सन्त पौलुस ने मन्नत मानकर शुद्ध होने के लिए अपने बाल कटवाए, तो वे बड़ा अज्ञान दिखाते हैं। प्रिस्किल्ला के विषय में ऐसी कोई बात नहीं कही गई, और अन्य दो में से केवल एक के विषय में कही गई है, यद्यपि निश्चित नहीं कि कौन। क्योंकि सन्त लूका जिस बाल कटवाने का उल्लेख करता है वह उतनी ही सरलता से सन्त पौलुस के विषय में हो सकता है जितनी अक्विला के विषय में।
और कि हम उन्हें वह भी न दे दें जो वे माँगते हैं — अर्थात् कि उन्होंने सन्त पौलुस को अपना आदर्श बनाया — सीधे-सादे लोग ध्यान दें कि सन्त पौलुस ने कभी किसी पवित्रीकरण के लिए अपना सिर नहीं मुँड़वाया, केवल अपने पड़ोसियों की निर्बलता के अनुसार अपने आप को ढालने के लिए।
मैं ऐसी मन्नतों को सामान्यतः प्रेम की मन्नतें कहता हूँ, भक्ति की नहीं। अर्थात् वे धर्म-क्रिया या परमेश्वर की सेवा के रूप में नहीं, परन्तु निर्बलों की निर्बलता सहने के लिए ली गईं, जैसा सन्त पौलुस कहता है:
“मैं यहूदियों के लिए यहूदी के समान बना।”
इस प्रकार उसने यह अस्थायी रूप से यहूदियों के अनुकूल बनने के लिए किया। परन्तु जब ये लोग बिना किसी लाभ के नाज़ीरों के शुद्धिकरणों की नकल करना चाहते हैं, तो वे एक नया यहूदी धर्म खड़ा करने के सिवाय और क्या कर रहे हैं?
धर्मादेशीय पत्री इसी सावधान बुद्धि से रची गई थी। वह पादरियों को, प्रेरित के अनुसार, बाल बढ़ाने से मना करती है, और उन्हें गोले के आकार में गोल मुण्डन कराने की आज्ञा देती है — मानो प्रेरित को, जब वह सब मनुष्यों के लिए आदरणीय बात सिखा रहा था, उनके पादरियों के गोल मुण्डन की बड़ी चिन्ता थी।
पाठक इन आरम्भों से अनुमान लगाएँ कि अन्य पद कैसे होंगे जब उनका प्रवेश ही ऐसा है।
परन्तु यह हर मूर्खता से बढ़कर है: अपने हर एक पद में वे मसीह को अपना सहकर्मी बनाते हैं।
पहले, वे कहते हैं, उसने द्वारपाल का काम तब किया जब उसने मन्दिर से बेचनेवालों और मोल लेनेवालों को निकाल दिया; और वह दिखाता है कि वह द्वारपाल है जब वह कहता है:
“द्वार मैं हूँ।”
उसने पाठक का काम तब लिया जब उसने आराधनालय के बीच में यशायाह पढ़ा। उसने भूतनिष्कासक का काम तब किया जब बहरे और गूँगे मनुष्य के कान और जीभ को अपने थूक से छूकर उसे सुनना और बोलना लौटाया।
उसने इन शब्दों से गवाही दी कि वह सहायक है:
“जो मेरे पीछे हो लेगा वह अन्धकार में न चलेगा।”
उसने उपयाजक का काम तब किया जब कमर में तौलिया बाँधकर उसने अपने प्रेरितों के पाँव धोए। उसने डीकन का काम तब किया जब उसने भोज में अपनी देह और लहू प्रेरितों को बाँटा। उसने याजक का काम तब पूरा किया जब उसने क्रूस पर अपने आप को पिता के लिए बलिदान करके चढ़ाया।
ये बातें बिना हँसे सुनना ऐसा असम्भव है कि मुझे आश्चर्य होता है कि वे बिना हँसे लिखी कैसे गईं — कम से कम तब, यदि जिन्होंने उन्हें लिखा वे मनुष्य थे।
परन्तु “सहायक” (acolyte) नाम के विषय में वे जिस चतुराई से तर्क करते हैं वह विशेष रूप से विचारणीय है। वे इसका अर्थ मोमबत्ती-वाहक करते हैं, ऐसा शब्द प्रयोग करके जिसे मैं जादुई समझता हूँ, क्योंकि वह निश्चय ही हर भाषा और जाति के लिए अज्ञात है। फिर भी यूनानी शब्द akolouthos का अर्थ है पीछे चलनेवाला और साथ देनेवाला, जबकि अपने शब्द से उनका अभिप्राय मोमबत्ती उठानेवाले से है।
तौभी, यदि मैं इन मूर्खताओं का खण्डन करने में गम्भीरता से लगूँ, तो मैं भी उपहास के योग्य ठहरूँगा, वे इतनी खोखली और निरर्थक हैं।
तौभी, कि वे स्त्रियों को भी अब और धोखा न दें, हमें उनके झूठों को थोड़ा और खोल देना चाहिए।
बड़ी धूमधाम और गम्भीरता से वे अपने पाठकों, भजन-गायकों, द्वारपालों और सहायकों को ऐसे कर्तव्यों के लिए नियुक्त करते हैं जो वे वास्तव में छोटे बच्चों को या उन्हें सौंपते हैं जिन्हें वे साधारण जन कहते हैं।
क्योंकि मोमबत्तियाँ अक्सर कौन जलाता है, या जल और दाखरस कौन उँडेलता है, सिवाय किसी बालक या निर्धन साधारण जन के जो इसी से अपनी जीविका चलाता है? क्या ये ही लोग गाते और कलीसिया के द्वार नहीं खोलते-बन्द करते? क्योंकि उनके मन्दिरों में कभी किसने किसी सहायक या द्वारपाल को अपना काम करते देखा है?
वरन् जिस व्यक्ति ने बचपन में सहायक का कर्तव्य निभाया, वह उस पद पर दीक्षित होते ही वह नहीं रहता जो कहलाता है। ऐसा प्रतीत होता है कि वे अपने पद के कर्तव्यों को उसकी उपाधि पाते ही जान-बूझकर छोड़ देते हैं।
देखो कि क्यों उन्हें ऐसे संस्कारों से दीक्षित होना और पवित्र आत्मा पाना पड़ता है: अर्थात् इसलिए कि वे कुछ न करें।
यदि वे कहें कि यह केवल वर्तमान युग की विकृति है जिसमें वे अपने कर्तव्य को छोड़ते और तुच्छ जानते हैं, तो उन्हें यह भी मानना पड़ेगा कि उनकी पवित्र पद-दीक्षाएँ, जिन्हें वे इतनी अद्भुत रीति से ऊँचा उठाते हैं, आज कलीसिया में कोई फल या उपयोग नहीं रखतीं। उन्हें यह भी मानना पड़ेगा कि उनकी सारी कलीसिया शापित अव्यवस्था से भरी है, क्योंकि वह साधारण जनों और बच्चों को मोमबत्तियाँ और सुराहियाँ सँभालने देती है, जबकि उन्हें छूने के योग्य कोई नहीं सिवाय उसके जो सहायक के रूप में पवित्र किया गया हो, और गायन बच्चों को सौंप देती है, जबकि वह केवल पवित्र किए हुए होंठों से निकलना चाहिए।
वे भूतनिष्कासकों को किसलिए पवित्र करते हैं? मैं समझता हूँ कि यहूदियों के भी भूतनिष्कासक थे, परन्तु मैं यह भी देखता हूँ कि उन्होंने अपना नाम उन भूत-निष्कासनों से पाया जो वे वास्तव में करते थे। परन्तु कभी किसने सुना कि इन नकली भूतनिष्कासकों ने अपने पेशे का एक भी कार्य पूरा किया हो?
वे दावा करते हैं कि उनके पास विक्षिप्तों, अविश्वासियों और दुष्टात्मा-ग्रस्तों पर हाथ रखने की सामर्थ्य है। परन्तु वे दुष्टात्माओं को यह विश्वास नहीं दिला सकते कि उनके पास ऐसी सामर्थ्य है — न केवल इसलिए कि दुष्टात्माएँ उनकी आज्ञाओं के अधीन नहीं होतीं, वरन् इसलिए भी कि दुष्टात्माएँ उन पर अधिकार रखती हैं। क्योंकि उनमें से दस में से एक भी मुश्किल से ऐसा मिलेगा जो स्वयं किसी दुष्ट आत्मा से चलाया न जाता हो।
इसलिए अपने छोटे पदों के विषय में वे जो कुछ बड़बड़ाते हैं, चाहे वे पाँच गिने जाएँ या छः, वह झूठ और अज्ञान से गढ़ा गया है। इनमें मैं उपयाजक की श्रेणी को भी गिनता हूँ, यद्यपि इन छोटे पदों की यह भीड़ बन जाने के बाद उसे बड़े पदों में सम्मिलित कर दिया गया।
यह स्पष्ट प्रकट है कि उन्हें संस्कार नहीं माना जाना चाहिए, क्योंकि उन्हीं के अंगीकार के अनुसार वे आदिम कलीसिया को अज्ञात थे और बहुत वर्ष बाद गढ़े गए। चूँकि संस्कारों में परमेश्वर की प्रतिज्ञा होनी चाहिए, वे न स्वर्गदूतों द्वारा ठहराए जा सकते हैं न मनुष्यों द्वारा, परन्तु केवल परमेश्वर द्वारा, जिसका ही अधिकार है प्रतिज्ञा देना।
शेष दो के लिए ऐसा प्रतीत होता है कि उनके पास परमेश्वर के वचन की गवाही है, और इसलिए एक विशेष अधिकार से वे उन्हें विशेष रूप से पवित्र पद-दीक्षाएँ कहते हैं। परन्तु हमें देखना है कि वे इस उद्देश्य से पवित्रशास्त्र का कितना विकृत दुरुपयोग करते हैं।
हम याजकपद की दीक्षा से आरम्भ करेंगे। मैं इस नाम को फ्रांसीसी भाषा के प्रचलित अर्थ के अनुसार प्रयोग करता हूँ — अर्थात् उसके लिए जिसे लातीनी लोग sacerdotium कहते हैं।
वे उन्हें याजक कहते हैं जिन्हें, वे कहते हैं, वेदी पर मसीह की देह और लहू का बलिदान चढ़ाना, प्रार्थनाएँ पढ़ना और परमेश्वर के वरदानों को आशीष देना शोभा देता है। इसलिए अपनी दीक्षा पर वे पात्र के साथ थाली और भोग-रोटी (Host) पाते हैं, इस बात के चिह्न के रूप में कि उनके पास परमेश्वर के लिए मेल-मिलाप के बलिदान चढ़ाने की सामर्थ्य है। उनके हाथ भी अभिषिक्त किए जाते हैं यह दर्शाने के लिए कि उनके पास पवित्र करने की सामर्थ्य है।
इस सब में से किसी के लिए भी उनके पास परमेश्वर के वचन में कोई सहारा नहीं, वरन् वे उसकी व्यवस्था और विधियों को इससे अधिक दुष्टता से बिगाड़ ही नहीं सकते थे।
पहले, जो हमने पिछले अध्याय में स्थापित किया उसे निर्णायक मानना चाहिए: वे सब जो मेल-मिलाप का बलिदान चढ़ाने के लिए अपने आप को याजक कहते हैं, मसीह को हानि पहुँचाते हैं। उसे पिता ने शपथ के साथ मलिकिसिदक की रीति पर, बिना अन्त और बिना उत्तराधिकारी के, याजक ठहराया और अभिषिक्त किया।
वही है जिसने एक बार अनन्त शुद्धि और मेल-मिलाप का बलिदान चढ़ाया और जो अब स्वर्ग के पवित्रस्थान में प्रवेश करके हमारे लिए मध्यस्थता करता है।
उसमें हम सब निश्चय ही याजक हैं, परन्तु केवल स्तुति और धन्यवाद चढ़ाने के लिए — संक्षेप में, अपने आप को और जो कुछ हमारा है उसे परमेश्वर को अर्पित करने के लिए। अपने बलिदान से परमेश्वर को प्रसन्न करना और पापों को शुद्ध करना मसीह की अनुपम श्रेष्ठता थी। तब शेष क्या रहा, सिवाय इसके कि उनका याजकपद एक शापित ईशनिन्दा है?
परन्तु चूँकि वे यह डींग मारने में लज्जित नहीं होते कि वे प्रेरितों के उत्तराधिकारी हैं, हमें देखना चाहिए कि वे प्रेरितीय सेवा को कैसे निभाते हैं। फिर भी यदि वे चाहते हैं कि उनके दावों पर विश्वास किया जाए, तो कम से कम उन्हें आपस में तो सहमत होना चाहिए।
वर्तमान में अध्यक्ष, भिखारी साधु और याजक प्रेरितों के उत्तराधिकार के विषय में प्राणघातक संघर्ष में लगे हैं। अध्यक्ष मानते हैं कि प्रेरित के पद के लिए बारह एक अनुपम विशेषाधिकार से चुने गए थे, और वे दावा करते हैं कि वे उनका स्थान रखते हैं क्योंकि उन्हें औरों पर श्रेष्ठता प्राप्त है। वे कहते हैं कि साधारण याजक उन सत्तर चेलों का स्थान रखते हैं जो बाद में हमारे प्रभु ने नियुक्त किए।
परन्तु उनका तर्क इतना निर्बल है कि उसके लिए लम्बे खण्डन की आवश्यकता नहीं, क्योंकि वह उन्हीं के अभिलेखों में दर्ज कार्यों से नष्ट हो जाता है, जहाँ लिखा है: “इससे पहले कि शैतानी फूट कलीसिया में आई, जिससे एक कहता था, ‘मैं कैफ़ा का हूँ,’ और दूसरा, ‘मैं अपुल्लोस का हूँ,’ याजक और अध्यक्ष में कोई भेद न था।”
इसलिए उनका निर्णय बेहतर है जो मानते हैं कि यह भेद अन्यजातियों से उधार लिया गया, क्योंकि अन्यजातियों में अनेक प्रकार के याजक थे जो सम्मान और पद में भिन्न थे।
भिखारी साधु केवल एक समानता के कारण अपने आप को प्रेरितों के प्रतिनिधि के रूप में चलाना चाहते हैं, जिसमें वास्तव में वे उनसे बहुत भिन्न हैं: वे यहाँ-वहाँ भटकते और दूसरों की सम्पत्ति पर जीते हैं।
प्रेरित इन भटकते आवारा लोगों की तरह बिना सोचे-समझे एक स्थान से दूसरे स्थान नहीं गए। वे जहाँ परमेश्वर ने बुलाया वहाँ गए ताकि सुसमाचार को फलवन्त करें। न ही उन्होंने दूसरों की सम्पत्ति से आलस्य में अपने पेट भरे। वरन् परमेश्वर से मिली स्वतन्त्रता के अनुसार उन्होंने उनकी उदारता ग्रहण की जिन्हें वे वचन में शिक्षा देते थे।
साधुओं को उधार के पंखों से अपने आप को सजाने की कोई आवश्यकता न थी, मानो उनके पास अपने सच्चे स्वभाव के विषय में गवाही का अभाव हो, क्योंकि सन्त पौलुस उनका बहुत अच्छा वर्णन करता है:
“हम सुनते हैं कि तुम में कुछ अनुचित चाल चलते हैं, कुछ काम नहीं करते, परन्तु दूसरों के कामों में हाथ डालते हैं।”
और अन्यत्र वह कहता है:
“इन्हीं में से वे हैं जो घर-घर घुसते और पापों से लदी हुई स्त्रियों को बन्दी बना लेते हैं, जो सदा सीखती रहती हैं पर सत्य की पहचान तक कभी नहीं पहुँचतीं।”
चूँकि वे इन वर्णनों को उचित रूप से अपने लिए दावा कर सकते हैं, वे प्रेरितीय सेवा को औरों के लिए छोड़ दें, जिससे वे उतने ही दूर हैं जितनी पृथ्वी स्वर्ग से।
इन बातों को छोड़कर, आओ हम सामान्य रूप से विचार करें कि उनका याजकपद का पद प्रेरितों की सेवा से कितना मेल खाता है।
