अध्याय 20

अध्याय सत्रह: मसीही जीवन के विषय में (भाग 1/2)

Institutes of the Christian Religion (1541) · John Calvin

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अध्याय सत्रह: मसीही जीवन के विषय में (भाग 1/2)

अध्याय सत्रह

मसीही जीवन के विषय में

मसीही के जीवन को गढ़ने का बीड़ा उठाकर मैं एक विस्तृत और विविध विषय में प्रवेश कर रहा हूँ—ऐसा विषय जो, यदि मैं उसे पूरी तरह समझाना चाहूँ, तो एक बड़े ग्रन्थ को भर सकता है।

हम देखते हैं कि प्राचीन शिक्षकों की उपदेश-रचनाएँ कितनी विस्तृत हैं, चाहे वे केवल एक ही गुण का वर्णन क्यों न करें। यह अत्यधिक वाचालता के कारण नहीं है, क्योंकि जिस किसी गुण की प्रशंसा और सराहना करने का कोई बीड़ा उठाता है, विषय की प्रचुरता ऐसी होती है कि जब तक बहुत शब्द न कहे जाएँ, तब तक ऐसा लगता है कि उसका ठीक-ठीक वर्णन हुआ ही नहीं।

तथापि मेरा अभिप्राय यह नहीं है कि जिस जीवन-शिक्षा को मैं प्रस्तुत करना चाहता हूँ, उसे इतना बढ़ा दूँ कि हर एक गुण को अलग-अलग समझाऊँ और प्रत्येक के विषय में लम्बे उपदेश दूँ। ऐसी शिक्षा दूसरों की रचनाओं से, विशेषकर प्राचीन शिक्षकों की होमिलियों—अर्थात् जनसाधारण के लिए दिए गए उपदेशों—से प्राप्त की जा सकती है।

मेरे लिए इतना पर्याप्त होगा कि मैं एक ऐसी व्यवस्था प्रस्तुत करूँ जिसके द्वारा मसीही को अपने जीवन को भली-भाँति ढालने के उचित लक्ष्य की ओर चलाया और निर्देशित किया जा सके। मैं कहता हूँ, मैं इसी से सन्तुष्ट रहूँगा कि संक्षेप में एक ऐसा सामान्य नियम रख दूँ जिससे वह अपने सब कार्यों का सम्बन्ध जोड़ सके।

सम्भव है कि किसी और समय हमें ऐसे उपदेश रचने का अवसर मिले जैसे प्राचीन शिक्षकों के प्रवचनों में पाए जाते हैं। परन्तु हमारे सम्मुख का यह कार्य माँग करता है कि हम यथासम्भव अत्यन्त संक्षेप में एक सीधी-सादी शिक्षा प्रस्तुत करें।

जैसे दार्शनिक सद्गुण और खरेपन के कुछ सिद्धान्त स्थापित करते हैं, जिनसे वे विशेष कर्तव्यों और सब सद्गुणी कार्यों को निकालते हैं, वैसे ही इस विषय में पवित्रशास्त्र की भी अपनी एक पद्धति है—ऐसी पद्धति जो दार्शनिकों की पद्धति से कहीं अधिक उत्तम और निश्चित है।

अन्तर केवल इतना है कि दार्शनिक महत्त्वाकांक्षा से भरे हुए थे, इसलिए उन्होंने अपनी शिक्षा का क्रम और विन्यास दिखाने के लिए, और इस प्रकार अपनी सूक्ष्म बुद्धि प्रदर्शित करने के लिए, यथासम्भव अधिक स्पष्टता खोजी। इसके विपरीत पवित्र आत्मा, क्योंकि वह बिना बनावट और दिखावे के सिखाता है, सदैव एक निश्चित क्रम और पद्धति का इतनी कठोरता से पालन नहीं करता। फिर भी, क्योंकि वह कभी-कभी ऐसे क्रम को काम में लाता है, इससे वह संकेत देता है कि हमें उसकी उपेक्षा नहीं करनी चाहिए।

पवित्रशास्त्र का जिस क्रम की हम बात कर रहे हैं, उसके दो भाग हैं। पहला यह कि हमारे हृदयों में धार्मिकता के प्रति प्रेम बैठाया जाए, जिसकी ओर हम स्वभाव से झुके हुए नहीं हैं। दूसरा यह कि हमें एक निश्चित नियम दिया जाए जो हमें अपने जीवन को ढालने में इधर-उधर भटकने या मार्ग से चूकने से रोके।

पहली बात के विषय में पवित्रशास्त्र के पास हमारे हृदयों को भलाई से प्रेम करने की ओर झुकाने के अनेक उत्तम कारण हैं। उनमें से कई को हम पहले ही भिन्न-भिन्न स्थानों में बता चुके हैं, और कुछ को यहाँ फिर छुएँगे।

पवित्रशास्त्र इससे उत्तम नींव और क्या डाल सकता था कि वह हमें स्मरण दिलाए कि हमें पवित्र किया जाना है क्योंकि हमारा परमेश्वर पवित्र है?

तुम पवित्र बनो, क्योंकि मैं यहोवा तुम्हारा परमेश्वर पवित्र हूँ।

—लैव्यव्यवस्था 19:2

वह यह कारण भी जोड़ता है: यद्यपि हम भटकती हुई भेड़ों के समान बिखरे हुए थे और इस संसार की भूलभुलैया में तितर-बितर थे, तौभी परमेश्वर ने हमें इकट्ठा किया है कि हमें अपने साथ मिला ले।

जब कभी हम परमेश्वर के साथ अपने मेल की बात सुनते हैं, तब हमें स्मरण रखना चाहिए कि पवित्रता ही उस मेल का बन्धन है। इसका अर्थ यह नहीं कि अपनी पवित्रता के पुण्य से हम परमेश्वर की सहभागिता में प्रवेश करते हैं; क्योंकि पवित्र होने से पहले हमें उससे जुड़ना होगा, ताकि वह अपनी पवित्रता हम पर उण्डेले। बल्कि, क्योंकि यह उसकी महिमा के अनुरूप है कि वह दुष्टता और अशुद्धता से कोई सहभागिता न रखे, इसलिए हमें उसके समान होना चाहिए, क्योंकि हम उसके हैं।

इसलिए पवित्रशास्त्र सिखाता है कि हमारी बुलाहट का यही उद्देश्य है, जिसकी ओर यदि हम परमेश्वर की बुलाहट का उत्तर देना चाहते हैं तो हमें निरन्तर दृष्टि रखनी चाहिए। क्योंकि जिस गन्दगी और अपवित्रता में हम डूबे हुए थे, उससे छुड़ाए जाने का क्या लाभ, यदि हम अपने सारे जीवन भर उसी में लोटते रहना चाहें?

इसके अतिरिक्त, पवित्रशास्त्र हमें स्मरण दिलाता है कि यदि हम परमेश्वर की प्रजा में गिने जाना चाहते हैं, तो हमें यरूशलेम में, जो उसका पवित्र नगर है, बसना होगा। क्योंकि उसने उसे अपने सम्मान के लिए पवित्र और समर्पित किया है, इसलिए उसे अशुद्ध और अपवित्र निवासियों से दूषित और अपवित्र नहीं होना चाहिए।

इसी से ऐसी घोषणाएँ निकलती हैं:

जो सिद्ध चाल चलता और धर्म के काम करता है, वही यहोवा के तम्बू में रहेगा।

—भजन संहिता 15:1–2

जो धर्म से चलता और खरी बात बोलता है, वह ऊँचे स्थान पर निवास करेगा।

—यशायाह 33:15–16

हमें और भी सामर्थ्य से प्रेरित करने के लिए पवित्रशास्त्र सिखाता है कि जैसे परमेश्वर ने मसीह में हमें अपने साथ मिला लिया है, वैसे ही उसने मसीह को हमारे सम्मुख उस आदर्श और नमूने के रूप में रखा है जिसके अनुरूप हमें बनना है।

जो लोग समझते हैं कि नैतिक शिक्षा का उचित और पर्याप्त वर्णन केवल दार्शनिकों ने ही किया है, वे मुझे अपनी पुस्तकों में ऐसी शिक्षा दिखाएँ जो उतनी उत्तम हो जितनी अभी मैंने बताई है। जब वे अपनी सारी शक्ति से हमें सद्गुण के लिए प्रेरित करना चाहते हैं, तब इससे अधिक कुछ प्रस्तुत नहीं करते कि हमें प्रकृति के अनुसार जीवन बिताना चाहिए।

पवित्रशास्त्र हमें प्रेरणा के कहीं उत्तम स्रोत की ओर ले जाता है। वह न केवल यह आज्ञा देता है कि हम अपना सारा जीवन परमेश्वर की ओर, जो उसका रचयिता है, लगा दें; वरन् यह स्मरण दिलाने के बाद कि हम अपनी सृष्टि के सच्चे उद्देश्य से गिर गए हैं, वह यह भी जोड़ता है कि मसीह, जो हमें परमेश्वर उसके पिता से मिलाता है, हमें निर्दोषता के आदर्श के रूप में दिया गया है, जिसका स्वरूप हमारे जीवनों में प्रकट होना चाहिए।

इससे अधिक बल या प्रभाव के साथ और क्या कहा जा सकता था? बल्कि इससे अधिक और क्या माँगा जा सकता है?

यदि परमेश्वर हमें इस शर्त पर अपने पुत्रों के रूप में ग्रहण करता है कि हमारे जीवनों में मसीह का स्वरूप दिखाई दे, तो यदि हम धार्मिकता और पवित्रता में लगे नहीं रहते, तो हम न केवल लज्जाजनक विश्वासघात से अपने सृष्टिकर्ता को त्याग देते हैं, वरन् उसे अपने उद्धारकर्ता के रूप में भी अस्वीकार करते हैं।

फिर पवित्रशास्त्र हमें प्रेरित करने के लिए कारण परमेश्वर के सब उपकारों से और हमारे उद्धार के हर भाग से निकालता है।

क्योंकि परमेश्वर ने अपने आप को हमारे पिता के रूप में हमें दिया है, इसलिए यदि हम उसकी सन्तान के समान आचरण न करें तो हम लज्जाजनक कृतघ्नता के दोषी ठहरते हैं।

क्योंकि मसीह ने हमें अपने लहू के धोने से शुद्ध किया है और यह शुद्धिकरण बपतिस्मा के द्वारा हम तक पहुँचाया है, इसलिए यह उचित नहीं कि हम फिर नई अशुद्धता से अपने आप को मलिन करें।

क्योंकि उसने हमें अपनी देह में जोड़ा और कलम लगाया है, इसलिए हमें सावधानी से यत्न करना चाहिए कि किसी भी रीति से अपने आप को दूषित न करें, क्योंकि हम उसके अंग हैं।

क्योंकि मसीह, जो हमारा सिर है, स्वर्ग पर चढ़ गया है, इसलिए हमें हर सांसारिक लालसा को त्याग देना चाहिए और सारे मन से स्वर्गीय जीवन की अभिलाषा करनी चाहिए।

क्योंकि पवित्र आत्मा ने हमें परमेश्वर के मन्दिर होने के लिए पवित्र ठहराया है, इसलिए हमें यत्न करना चाहिए कि हम में परमेश्वर की महिमा ऊँची हो, और किसी भी अशुद्धता को प्रवेश देने से सावधान रहें।

क्योंकि हमारी आत्माएँ और देह परमेश्वर के राज्य की अमरता और उसकी महिमा के अविनाशी मुकुट के लिए ठहराई गई हैं, इसलिए हमें यत्न करना चाहिए कि दोनों को प्रभु के दिन तक शुद्ध और निष्कलंक बनाए रखें।

अपने जीवन को भली-भाँति ढालने के लिए ये खरी और उपयुक्त नींवें हैं, और इनके समान कुछ भी सब दार्शनिकों में नहीं मिलेगा। क्योंकि जब वे मनुष्य को उसका कर्तव्य दिखाना चाहते हैं, तब उसकी स्वाभाविक प्रतिष्ठा के वर्णन से ऊपर कभी नहीं उठते।

अब मुझे उन लोगों से बात करनी है जिनके पास मसीह का केवल नाम ही है, फिर भी वे मसीही गिने जाना चाहते हैं। परन्तु वे उसके पवित्र नाम पर घमण्ड करने का साहस कैसे करते हैं, जबकि उसके साथ किसी की सहभागिता नहीं सिवाय उसके जिसने सुसमाचार के वचन के द्वारा उसे ठीक रीति से जाना है?

सन्त पौलुस इनकार करता है कि किसी ने मसीह का सच्चा ज्ञान पाया है, जब तक उसने उस पुराने मनुष्यत्व को, जो उच्छृंखल अभिलाषाओं से भ्रष्ट है, उतार फेंकना और मसीह को पहिन लेना न सीखा हो।

तुम ने मसीह की ऐसी शिक्षा नहीं पाई, यदि तुम ने सचमुच उसकी सुनी और उसी में सिखाए गए, जैसा यीशु में सत्य है: कि तुम अगले चालचलन के पुराने मनुष्यत्व को, जो भरमानेवाली अभिलाषाओं के अनुसार भ्रष्ट होता जाता है, उतार डालो; और अपने मन के आत्मिक स्वभाव में नये बनते जाओ, और नये मनुष्यत्व को पहिन लो, जो परमेश्वर के अनुसार सत्य की धार्मिकता और पवित्रता में सृजा गया है।

—इफिसियों 4:20–24

इसलिए यह प्रत्यक्ष है कि ऐसे लोग झूठा दावा करते हैं कि वे मसीह को जानते हैं, और ऐसा करके उसका बड़ा अनादर करते हैं, चाहे वे उसके विषय में कितनी ही धाराप्रवाह वाणी में क्यों न बोलें। क्योंकि सुसमाचार जीभ की शिक्षा नहीं, जीवन की शिक्षा है। उसे अन्य विद्याओं के समान केवल बुद्धि और स्मरण-शक्ति से ग्रहण नहीं करना चाहिए, वरन् उसे सारे प्राण को अपने वश में कर लेना चाहिए और हृदय की गहराई में अपना आसन और निवास-स्थान बना लेना चाहिए। अन्यथा वह ठीक रीति से ग्रहण नहीं किया गया।

इसलिए वे या तो यह घमण्ड करके परमेश्वर का अनादर करना छोड़ें कि वे वह हैं जो वे नहीं हैं, या अपने आप को मसीह का चेला प्रकट करें।

हमने धर्म में सिद्धान्त को पहला स्थान उचित ही दिया है, क्योंकि वह हमारे उद्धार का आरम्भ है। परन्तु यदि वह सिद्धान्त हमारे लिए उपयोगी और फलदायी होना है, तो उसे हृदय में गहराई तक पैठना चाहिए और हमारे जीवन में अपनी सामर्थ्य दिखानी चाहिए—बल्कि उसे हमें अपने ही स्वभाव में बदल देना चाहिए।

यदि दार्शनिकों के पास उन लोगों पर क्रोधित होने का उचित कारण है जो उनकी कला का, जिसे वे जीवन की स्वामिनी कहते हैं, अंगीकार तो करते हैं पर उसे कुतर्क की बकवास बना डालते हैं, तो हमारे पास उन बकवादियों से घृणा करने का कितना अधिक कारण है जो सुसमाचार को अपने होठों पर ढोकर सन्तुष्ट रहते हैं पर अपने सारे जीवन में उसका तिरस्कार करते हैं?

उसकी सामर्थ्य को हृदय के गहरे से गहरे कोनों में पैठना चाहिए और आत्मा में उन सब दार्शनिक उपदेशों से लाख गुना अधिक दृढ़ता से जड़ पकड़नी चाहिए, जिनमें तुलना में बहुत कम बल है।

मैं यह नहीं माँगता कि मसीही का आचरण पूर्ण शुद्धता और सिद्धता में सुसमाचार के सिवाय और कुछ न हो, यद्यपि यह निश्चय ही चाहने और पाने के योग्य है। फिर भी मैं मसीही सिद्धता की माँग इतनी कठोरता और उग्रता से नहीं करता कि जब तक कोई उसे पा न चुका हो, मैं उसे मसीही मानने से इनकार कर दूँ।

यदि मैं ऐसा करूँ तो संसार का हर मनुष्य कलीसिया से बाहर हो जाएगा, क्योंकि एक भी ऐसा नहीं मिलेगा जो अब तक ऐसी सिद्धता से दूर न हो, चाहे कुछ ने बहुत उन्नति की हो, जबकि अधिकांश बहुत थोड़ा ही आगे बढ़े हैं। फिर भी इसलिए उन्हें ठुकराया नहीं जाना चाहिए।

तो फिर क्या माँगा जाता है? हमें निरन्तर अपनी आँखों के सामने वह लक्ष्य रखना चाहिए जिसकी ओर हमारे सब कार्य निर्देशित होने हैं: कि हम उस सिद्धता की ओर बढ़ने का यत्न करें जिसकी परमेश्वर आज्ञा देता है। हमें परिश्रम करना और उसे पाने की अभिलाषा रखनी चाहिए।

क्योंकि हमें परमेश्वर के साथ मोल-भाव करने की अनुमति नहीं है, कि जो कुछ वह अपने वचन में आज्ञा देता है उसका एक भाग तो ग्रहण करें और दूसरा भाग अपनी पसन्द के अनुसार छोड़ दें। सबसे बढ़कर, वह सदा हमें खराई की सिफारिश करता है। इस शब्द से उसका अर्थ है हृदय की ऐसी शुद्ध सरलता जो सब बनावट से मुक्त और शुद्ध हो और दुचित्ते हृदय के विपरीत हो।

फिर भी जब तक हम इस सांसारिक बन्दीगृह में हैं, हम में से कोई भी इतना सबल और तैयार नहीं कि इस दौड़ को उचित तेजी से दौड़े। वरन् अधिकांश इतने निर्बल और दुर्बल हैं कि लड़खड़ाते और लँगड़ाते हैं और बहुत कम आगे बढ़ पाते हैं।

इसलिए हम में से प्रत्येक अपनी सीमित सामर्थ्य के अनुसार आगे बढ़े, और जिस मार्ग पर हमने आरम्भ किया है उस पर चलना न छोड़ें। कोई भी इतना बुरा नहीं चलेगा कि प्रतिदिन थोड़ा आगे न बढ़ सके और कुछ भूमि प्राप्त न कर सके।

इसलिए हम प्रभु के मार्ग में निरन्तर उन्नति करने का यत्न कभी न छोड़ें, और इसलिए साहस न खोएँ कि हमारी उन्नति थोड़ी है। यद्यपि हमारी उन्नति हमारी अभिलाषा के अनुसार नहीं है, तौभी जब आज का दिन बीते कल से बढ़कर होता है तो हमारा परिश्रम व्यर्थ नहीं जाता।

हम केवल अपना लक्ष्य शुद्ध और खरी सरलता के साथ अपने सम्मुख रखें और अपने गन्तव्य तक पहुँचने का यत्न करें। हम व्यर्थ बहानों से अपनी चापलूसी न करें, न अपने दोषों को प्रश्रय दें, वरन् बिना रुके दिन-प्रतिदिन उत्तम बनने का परिश्रम करें, जब तक कि हम उस परम भलाई को न पा लें जिसे हमें अपने सारे जीवन में खोजना और जिसका पीछा करना है।

उसे हम पूरी रीति से तभी पाएँगे जब अपनी शारीरिक दुर्बलता से मुक्त होकर हम उसके पूर्ण सहभागी बनाए जाएँगे—अर्थात् जब परमेश्वर हमें अपनी सहभागिता में ग्रहण कर लेगा।

अब हम दूसरी बात पर आएँ। यद्यपि परमेश्वर की व्यवस्था में हमारे जीवन को निर्देशित करने की एक उत्तम पद्धति और सुव्यवस्थित विन्यास है, तथापि हमारे दयालु स्वर्गीय स्वामी को यह भला लगा कि वह अपनी प्रजा को उस नियम के अनुसार जो उसने उन्हें अपनी व्यवस्था में दिया था, और भी अधिक सटीक शिक्षा से गढ़े।

इस शिक्षा का आरम्भ यह है कि विश्वासियों का कर्तव्य है कि वे अपनी देह को परमेश्वर के सम्मुख जीवित, पवित्र और ग्रहणयोग्य बलिदान करके चढ़ाएँ, और इसी में वह उचित आराधना है जो हमें उसे अर्पित करनी है।

अपने शरीरों को जीवित, और पवित्र, और परमेश्वर को भानेवाला बलिदान करके चढ़ाओ; यही तुम्हारी आत्मिक सेवा है। और इस संसार के सदृश न बनो; परन्तु तुम्हारी बुद्धि के नये हो जाने से तुम्हारा चाल-चलन भी बदलता जाए, जिससे तुम परमेश्वर की भली, और भावती, और सिद्ध इच्छा को अनुभव से मालूम करते रहो।

—रोमियों 12:1–2

इसी से यह उपदेश निकलता है कि विश्वासी इस संसार के साँचे में अपने आप को न ढालें, वरन् अपनी बुद्धि के नए हो जाने से बदलते जाएँ, ताकि वे परमेश्वर की इच्छा को खोजें और जानें।

यह समझना पहले से ही बड़े महत्त्व की बात है कि हम परमेश्वर के लिए पवित्र और समर्पित किए गए हैं, ताकि अब से हम उसकी महिमा के सिवाय कुछ न सोचें, न कहें, न मनन करें और न करें। क्योंकि जो पवित्र ठहराया जा चुका है, उसे अपवित्र काम में लगाना उचित नहीं।

यदि हम अपने नहीं परन्तु प्रभु के हैं, तो यह प्रकट है कि भूल से बचने के लिए हमें क्या करना है और हमारे जीवन के सब कार्य किस लक्ष्य की ओर निर्देशित होने चाहिए।

हम अपने नहीं हैं; इसलिए हमारे विचार-विमर्श और कार्यों में न हमारी बुद्धि राज्य करे, न हमारी इच्छा।

हम अपने नहीं हैं; इसलिए हम अपने सम्मुख यह लक्ष्य न रखें कि शरीर के अनुसार जो हमारे लिए लाभदायक है उसे खोजें।

हम अपने नहीं हैं; इसलिए जहाँ तक सम्भव हो हम अपने आप को और अपना सब कुछ भूल जाएँ।

फिर, हम प्रभु के हैं; इसलिए हम उसी के लिए जीएँ और उसी के लिए मरें।

यदि हम जीवित हैं तो प्रभु के लिये जीवित हैं; और यदि मरते हैं तो प्रभु के लिये मरते हैं। सो हम जीएँ या मरें, हम प्रभु ही के हैं।

—रोमियों 14:8

हम प्रभु के हैं; इसलिए हमारे सब कार्यों पर उसकी इच्छा और बुद्धि का शासन हो।

हम प्रभु के हैं; इसलिए हमारे जीवन का हर भाग उसी की ओर, जो उसका एकमात्र उद्देश्य है, निर्देशित हो।

वह मनुष्य कितना आगे बढ़ चुका है जिसने यह जानकर कि वह अपना नहीं है, अपने ऊपर की प्रभुता और शासन को अपनी ही बुद्धि से हटाकर परमेश्वर को सौंप दिया है! क्योंकि जैसे मनुष्यों को विनाश में पहुँचानेवाली सबसे घातक महामारी यह है कि वे अपने आप को प्रसन्न करना चाहते हैं, वैसे ही उद्धार का एकमात्र बन्दरगाह यह है कि हम न अपनी दृष्टि में बुद्धिमान हों, न अपने आप से कुछ चाहें, वरन् केवल प्रभु के पीछे चलें।

इसलिए हमारा पहला कदम यही हो: कि हम अपने आप से हट जाएँ, ताकि अपनी समझ की पूरी शक्ति परमेश्वर की सेवा में लगा दें।

"सेवा" से मेरा अर्थ केवल उसके वचन का पालन नहीं, वरन् यह है कि मानवीय समझ अपनी ही बुद्धि से रिक्त होकर पूरी तरह परमेश्वर के आत्मा की ओर मुड़े और अपने आप को उसके निर्देशन के अधीन कर दे।

यह परिवर्तन, जिसे सन्त पौलुस मन का नया हो जाना कहता है, सब दार्शनिकों को अज्ञात था, यद्यपि यही जीवन में पहला प्रवेश-द्वार है। वे सिखाते हैं कि केवल बुद्धि ही मनुष्य पर राज्य और शासन करे। उनका मानना है कि केवल बुद्धि की ही सुननी और माननी चाहिए, और इसलिए जीवन का सारा शासन उसी को सौंप देते हैं।

इसके विपरीत मसीही दर्शन माँग करता है कि बुद्धि झुके और हट जाए, ताकि पवित्र आत्मा को स्थान दे और उसके निर्देशन में वश में आ जाए। इस प्रकार मनुष्य अब अपने से नहीं जीता, वरन् मसीह को अपने भीतर जीने और राज्य करने देता है और उसे अपने में रखता है।

अब मैं जीवित न रहा, पर मसीह मुझ में जीवित है।

—गलातियों 2:20

इसी से वह दूसरा भाग निकलता है जो हमने कहा: कि हम उन बातों को न खोजें जो हमें भाती हैं, परन्तु उन्हें जो परमेश्वर को भाती हैं और जो उसकी महिमा को ऊँचा करने में काम आती हैं।

यह भी एक बड़ा सद्गुण है: कि अपने आप को लगभग भुलाकर—या कम से कम अपनी ही चिन्ता में डूबे रहना छोड़कर—हम विश्वासयोग्यता से परमेश्वर और उसकी आज्ञाओं के पीछे चलने में अपना ध्यान लगाएँ।

जब पवित्रशास्त्र हमें अपने लिए विशेष ध्यान रखने से रोकता है, तब वह न केवल हमारे हृदयों से लोभ, शासन करने की लालसा, ऊँचे सम्मान या लाभदायक सम्बन्ध पाने की महत्त्वाकांक्षा को दूर करता है, वरन् हर प्रकार की स्वार्थपरता, मानवीय महिमा की भूख और अन्य छिपी हुई बीमारियों को भी जड़ से उखाड़ना चाहता है।

मसीही की मनोदशा ऐसी होनी चाहिए कि अपने सारे जीवन में वह स्मरण रखे कि उसे परमेश्वर से काम है। क्योंकि वह जानता है कि उसे अपने सब कामों का लेखा परमेश्वर को देना है, इसलिए वह अपना पूरा अभिप्राय उसी की ओर लगाता और उसी पर स्थिर रखता है। क्योंकि जो अपने सब कामों में परमेश्वर की ओर देखता है, वह सहज ही अपने मन को हर व्यर्थ विचार से हटा लेता है।

यही वह आत्म-त्याग है जिसकी मसीह अपने सब चेलों से पहले पाठ के रूप में इतनी सावधानी से माँग करता है। जब यह मनुष्य के हृदय पर अधिकार कर लेता है, तब वह पहले अभिमान, घमण्ड और दिखावे को निकाल देता है; फिर लोभ, असंयम, अति, विषय-भोग और आत्म-प्रेम से उत्पन्न अन्य सब दोषों को।

जहाँ आत्म-त्याग का राज्य नहीं होता, वहाँ मनुष्य या तो निर्लज्जता से हर प्रकार की दुष्टता में अपने आप को डुबो देता है, या यदि कुछ सद्गुण का दिखावा हो भी, तो वह महिमा की बुरी लालसा से बिगड़ जाता है।

मुझे ऐसा मनुष्य दिखाओ जो प्रभु की आज्ञा के अनुसार अपना त्याग किए बिना दूसरों के प्रति स्वेच्छा से दया करता हो। जिनमें यह मनोदशा नहीं थी, उन्होंने कम से कम इतना तो किया कि सद्गुण का पीछा करते हुए प्रशंसा खोजी।

जिन दार्शनिकों ने सबसे अधिक उत्साह से यह वाद किया कि सद्गुण की चाह उसी के निमित्त होनी चाहिए, वे भी अभिमान और घमण्ड से इतने फूले हुए थे कि प्रकट है कि उन्होंने सद्गुण को इसी कारण चाहा कि उन्हें अपने आप को ऊँचा उठाने का आधार मिले।

सांसारिक महिमा खोजनेवाले महत्त्वाकांक्षी, और भीतरी अहंकार से फटे पड़नेवाले लोग परमेश्वर को प्रसन्न कर पाने से इतने दूर हैं कि वह घोषणा करता है कि पहले वर्ग के लोग अपना प्रतिफल इस संसार में पा चुके हैं, और दूसरे वर्ग के लोग परमेश्वर के राज्य से चुंगी लेनेवालों और वेश्याओं से भी अधिक दूर हैं।

वे अपना प्रतिफल पा चुके।

—मत्ती 6:2

चुंगी लेनेवाले और वेश्याएँ तुम से पहले परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करती हैं।

—मत्ती 21:31

तथापि हमने अब तक स्पष्ट रूप से नहीं समझाया कि जब तक मनुष्य पहले अपना त्याग न करे, तब तक कितनी बाधाएँ उसे भला करने में लगने से रोकती हैं।

प्राचीन काल में सच ही कहा गया था कि मनुष्य की आत्मा के भीतर दोषों का एक पूरा संसार छिपा है। हमें इसका कोई और उपाय नहीं मिलेगा कि हम अपना त्याग करें और अपनी पसन्द का विचार छोड़कर अपनी समझ को उन बातों की खोज में निर्देशित और समर्पित करें जो परमेश्वर हम से चाहता है—और इन्हें केवल इसलिए खोजें कि वे उसे भाती हैं।

हमें ध्यान देना चाहिए कि यह आत्म-त्याग कुछ तो दूसरे मनुष्यों के साथ हमारे सम्बन्ध से, और कुछ—बल्कि मुख्यतः—परमेश्वर के साथ हमारे सम्बन्ध से जुड़ा है।

जब पवित्रशास्त्र हमें आज्ञा देता है कि हम दूसरों के प्रति ऐसा आचरण करें कि सम्मान में उन्हें अपने से बढ़कर समझें और विश्वासयोग्यता से उनकी भलाई चाहें, तब वह ऐसी आज्ञाएँ देता है जिनका पालन हमारे हृदय कर ही नहीं सकते जब तक वे पहले अपने स्वाभाविक स्वभाव से रिक्त न कर दिए जाएँ।

क्योंकि हम सब आत्म-प्रेम से ऐसे अन्धे और बहके हुए हैं कि कोई ऐसा नहीं जो यह न समझता हो कि उसके पास अपने आप को सबसे ऊँचा उठाने और अपने सामने सारे संसार को तुच्छ जानने का उचित कारण है।

यदि परमेश्वर ने हमें कोई आदर के योग्य वरदान दिया है, तो हमारे हृदय तुरन्त उसी के बहाने अपने आप को ऊँचा उठा लेते हैं। हम केवल फूल ही नहीं जाते, वरन् घमण्ड से लगभग फट पड़ते हैं।

जिन दोषों से हम भरे हैं उन्हें हम दूसरों से सावधानी से छिपाते हैं और अपने आप को समझा लेते हैं कि वे छोटे और तुच्छ हैं। कभी-कभी हम उन्हें सद्गुण भी मान बैठते हैं। जहाँ तक हमारे वरदानों का प्रश्न है, हम उन्हें अपने में इतना आँकते हैं कि उन पर मुग्ध हो जाते हैं।

यदि वही वरदान दूसरों में दिखाई दें—चाहे अधिक मात्रा में ही—तो हम उन्हें यथासम्भव ढाँप देते हैं या घटा देते हैं, ताकि हमें उनके आगे झुकना न पड़े। इसके विपरीत, हमारे पड़ोसियों में जो भी दोष हैं, उन्हें कड़ाई से जाँचकर ही हम सन्तुष्ट नहीं होते, वरन् द्वेष से बढ़ा-चढ़ाकर बताते हैं।

इसी से वह ढिठाई उत्पन्न होती है जिससे हम में से प्रत्येक, मानो मानवता की सामान्य दशा से मुक्त हो, सब लोगों से ऊपर श्रेष्ठता चाहता है और किसी को अपवाद ठहराए बिना सब दूसरों को अपने से छोटा जानकर तुच्छ समझता है।

निर्धन तो धनवानों के आगे, साधारण जन कुलीनों के आगे, सेवक अपने स्वामियों के आगे और अज्ञानी विद्वानों के आगे झुकते ही हैं। तौभी कोई ऐसा नहीं जो अपने हृदय में यह धारणा न रखता हो कि वह सब दूसरों से ऊँचा उठाए जाने के योग्य है।

इस प्रकार प्रत्येक मनुष्य अपनी चापलूसी करके अपने ही हृदय में एक राज्य पालता है। जो कुछ उसे भाता है उसे अपने ही नाम लिखकर वह दूसरों के मन और आचरण पर न्याय करने बैठ जाता है। यदि कोई विवाद उठ खड़ा हो, तो तब विष फूट पड़ता है और प्रकट हो जाता है।

बहुत से लोग तब तक कोमलता और नम्रता का कुछ दिखावा करते हैं जब तक सब कुछ उनकी इच्छा के अनुसार चलता है। परन्तु कितने थोड़े हैं जो उकसाए और खिजाए जाने पर भी कोमलता और नम्रता बनाए रखते हैं?

वस्तुतः यह और किसी रीति से हो नहीं सकता जब तक कि अपने आप से प्रेम करने और अपने आप को ऊँचा उठाने की घातक महामारी को हृदय की गहराई से उखाड़ न फेंका जाए, जैसे पवित्रशास्त्र स्वयं उसे उखाड़ फेंकता है।

यदि हम उसकी शिक्षा सुनें, तो हमें स्मरण रखना चाहिए कि जितने अनुग्रह परमेश्वर ने हमें दिए हैं वे हमारी अपनी सम्पत्ति नहीं, वरन् उसकी उदारता के मुफ़्त दान हैं। इसलिए जो उनके कारण घमण्डी हो जाता है, वह अपनी कृतघ्नता प्रकट करता है।

दूसरी ओर, अपने दोषों को निरन्तर पहचानते रहने से हमें दीनता की ओर लाया जाना चाहिए। तब हम में ऐसा कुछ न रहेगा जो हमें घमण्डी बना सके; वरन् हमें अपने आप को दीन और नीचा करने के बहुत से कारण मिलेंगे।

इसके अतिरिक्त हमें आज्ञा मिली है कि परमेश्वर के जो भी वरदान हम अपने पड़ोसियों में देखें, उन्हें ऐसे आदर और सम्मान की दृष्टि से देखें कि उन वरदानों के कारण उन व्यक्तियों का भी आदर करें जिनमें वे बसे हैं। क्योंकि किसी व्यक्ति को उस सम्मान से वंचित करना सचमुच लज्जा की बात होगी जो परमेश्वर ने उसे दिया है।

हमें यह भी आज्ञा मिली है कि हम दूसरों के दोषों पर आँखें न गड़ाएँ, वरन् उन्हें ढाँप दें—चापलूसी करके और इस प्रकार उनके दोषों को बढ़ावा देकर नहीं, वरन् इसलिए कि जिसने अपराध किया है उसका अपमान न करें, क्योंकि हम पर उसके प्रति प्रेम और आदर का ऋण है।

इससे यह फलित होगा कि जिस किसी से भी हमारा काम पड़े, हम न केवल नम्रता और संयम से, वरन् कोमलता और मित्रता से भी पेश आएँगे। और इसके विपरीत, कोई भी सच्ची दीनता कभी और किसी मार्ग से नहीं पाएगा सिवाय इसके कि उसका हृदय अपने आप को दीन करने और दूसरों का आदर करने के लिए तैयार हो।

जहाँ तक अपने पड़ोसी की भलाई चाहकर अपना कर्तव्य पूरा करने की बात है, वह कितना कठिन है! जब तक हम अपने विचार को एक ओर न रख दें और हर शारीरिक लगाव से अपने आप को रिक्त न कर लें, तब तक इस विषय में हम कुछ भी पूरा न कर पाएँगे।

क्योंकि वे कर्तव्य जिनकी सन्त पौलुस प्रेम से माँग करता है, कौन पूरा कर सकता है जब तक कि उसने अपना त्याग न किया हो ताकि वह अपने आप को पूरी तरह अपने पड़ोसियों के लिए लगा दे?

प्रेम धीरजवन्त है, और कृपाल है; प्रेम डाह नहीं करता; प्रेम अपनी बड़ाई नहीं करता, और फूलता नहीं। वह अनरीति नहीं चलता, वह अपनी भलाई नहीं चाहता।

—1 कुरिन्थियों 13:4–5

यदि केवल यही एक माँग होती—कि हमें अपना लाभ नहीं खोजना है—तब भी हमें अपने स्वभाव के विरुद्ध बड़ा बल लगाना पड़ता। क्योंकि वह हमें आत्म-प्रेम की ओर इतने बल से खींचता है कि वह सहज ही यह नहीं होने देता कि हम दूसरों की भलाई खोजने के लिए अपने लाभ की उपेक्षा करें, और अपने अधिकार छोड़कर उन्हें अपने पड़ोसियों को सौंप दें, यह तो और भी दूर की बात है।

हमें इस मनोदशा तक पहुँचाने के लिए पवित्रशास्त्र सिखाता है कि प्रभु से प्राप्त हर वरदान हमें इस शर्त पर सौंपा गया है कि हम उसे कलीसिया की सामान्य भलाई के लिए काम में लाएँ। इसलिए परमेश्वर के वरदानों का उचित उपयोग यह है कि उन्हें प्रेम और उदारता के साथ अपने पड़ोसियों में बाँटा जाए।

इस बाँटने के लिए इससे उत्तम या निश्चित नियम नहीं मिल सकता था कि जो कुछ भला हमारे पास है वह परमेश्वर ने हमें इस शर्त पर सौंपा है कि उसका प्रबन्ध दूसरों के लाभ के लिए किया जाए।

पवित्रशास्त्र और आगे बढ़कर हम में से प्रत्येक के पास के वरदानों की तुलना मानव देह के अंगों के विशेष कामों से करता है। कोई अंग अपनी क्षमता अपने ही लिए नहीं रखता, न उसे केवल अपने निजी उपयोग में लगाता है। वरन् वह उस क्षमता को अन्य अंगों के लाभ के लिए काम में लाता है और उससे उसे कोई लाभ नहीं मिलता सिवाय उस लाभ के जो सारी देह में बाँटे गए हित से आता है।

उसी प्रकार विश्वासी को अपनी सारी सामर्थ्य अपने भाइयों के लिए लगा देनी चाहिए, और अपने लिए कोई निजी प्रबन्ध नहीं करना चाहिए सिवाय इसके कि अपना अभिप्राय निरन्तर कलीसिया की सामान्य भलाई की ओर लगाए रखे।

इसलिए भला करने और दया दिखाने में हम इस नियम का पालन करें: प्रभु ने जो कुछ हमें दिया है जिससे हम अपने पड़ोसी की सहायता कर सकें, उसके हम केवल भण्डारी हैं, और हमें एक दिन लेखा देना होगा कि हमने अपने सौंपे हुए काम को कितनी विश्वासयोग्यता से निभाया।

इसके अतिरिक्त, कोई भी भण्डारीपन भला और उचित नहीं सिवाय उसके जो प्रेम के नियम से शासित हो। इससे यह फलित होगा कि हम केवल अपने पड़ोसी की भलाई की चिन्ता को अपनी भलाई की चिन्ता के साथ नहीं जोड़ेंगे, वरन् अपने लाभ को दूसरों के लाभ के अधीन रखेंगे।

वस्तुतः हमें यह दिखाने के लिए कि जो कुछ वह हमें देता है उसका प्रबन्ध किस रीति से करना चाहिए, प्रभु ने बहुत पहले इस्राएल की प्रजा को यह नियम सौंपा था। जब भी वह उन्हें छोटे से छोटा लाभ देता, तो आज्ञा देता कि नई उपज के पहले फल उसे चढ़ाए जाएँ। इसके द्वारा प्रजा यह साक्षी देती थी कि उन्हें उन सम्पत्तियों का कोई फल भोगने की अनुमति नहीं जो पहले उसके लिए पवित्र न ठहराई गई हों।

यदि परमेश्वर के वरदान हमारे लिए अन्ततः तभी पवित्र ठहरते हैं जब हम उन्हें अपने हाथों से उसके लिए समर्पित कर दें, तो प्रकट है कि कोई भी ऐसा उपयोग जो इस समर्पण की ओर निर्देशित न हो, निन्दनीय दुरुपयोग है।

दूसरी ओर, यह मूर्खता होगी कि हम अपने सौंपे हुए धन में से कुछ देकर परमेश्वर को धनी करने का प्रयत्न करें। क्योंकि हमारा उपकार स्वयं परमेश्वर तक नहीं पहुँच सकता, जैसा भविष्यद्वक्ता कहता है, इसलिए हमें उसे उसके उन सेवकों के प्रति करना चाहिए जो संसार में हैं।

मेरा कुशल तुझ ही से है, और तेरे कारण मेरी भलाई कुछ नहीं... परन्तु पृथ्वी पर जो पवित्र लोग हैं, वे ही मेरे श्रेष्ठ लोग हैं, और उन्हीं में मेरा सारा हर्ष है।

—भजन संहिता 16:2–3

इसके अतिरिक्त, ताकि हम भला करने में थक न जाएँ—जैसा अन्यथा निरन्तर होता रहता—हमें स्मरण रखना चाहिए कि प्रेरित आगे क्या जोड़ता है: प्रेम धीरजवन्त है और सहज ही चिढ़ता नहीं।

प्रेम धीरजवन्त है, और कृपाल है... प्रेम सहज ही चिढ़ता नहीं।

—1 कुरिन्थियों 13:4–5

प्रभु हमें बिना किसी अपवाद के सब का भला करने की आज्ञा देता है, यद्यपि अधिकांश लोग, यदि उनके अपने गुणों के अनुसार आँके जाएँ, अयोग्य हैं। परन्तु पवित्रशास्त्र इस आपत्ति का पहले ही उत्तर देता है यह स्मरण दिलाकर कि हमें यह नहीं देखना कि मनुष्य अपने आप में क्या योग्यता रखते हैं। वरन् हमें हर एक में परमेश्वर के स्वरूप को देखना है, जिसका हम पर सारा आदर और प्रेम का ऋण है।

हमें इस स्वरूप को विशेष रूप से उनमें पहचानना चाहिए जो विश्वास के घराने के हैं, क्योंकि वह उनमें मसीह के आत्मा के द्वारा नया किया और पुनःस्थापित किया गया है।

इसलिए जहाँ तक अवसर मिले हम सब के साथ भलाई करें, विशेषकर विश्वासी भाइयों के साथ।

—गलातियों 6:10

इसलिए जो भी व्यक्ति हो जो हमारी सहायता की आवश्यकता लेकर हमारे सामने आए, हमारे पास उसकी सहायता से इनकार करने का कोई कारण न होगा।

यदि हम कहें कि वह परदेशी है, तो प्रभु ने उस पर ऐसी छाप लगा दी है जो उसे हमारे लिए अपना-सा बना दे।

यदि हम यह कहें कि वह तुच्छ और निकम्मा है, तो प्रभु उत्तर देता है कि उसने उसे अपना स्वरूप उसमें चमकाकर आदर दिया है।

यदि हम कहें कि हम पर उसका कुछ ऋण नहीं, तो प्रभु हमें बताता है कि उसने उस व्यक्ति को अपने स्थान पर रखा है कि उसकी भलाई करके हम उन उपकारों को स्वीकार करें जो परमेश्वर ने हम पर किए हैं।

यदि हम कहें कि वह इस योग्य नहीं कि हम उसके लिए एक कदम भी चलें, तो परमेश्वर का वह स्वरूप, जिसे हमें उसमें देखना है, पूरी तरह इस योग्य है कि हम अपने आप को और अपना सब कुछ उसकी सेवा में लगा दें।

यदि वह ऐसा मनुष्य भी हो जो न केवल हमारे किसी उपकार के योग्य न हो, वरन् जिसने हम पर बहुत अन्याय और अत्याचार भी किए हों, तब भी यह हमारे लिए उससे प्रेम करना और उसकी भलाई और सेवा करना छोड़ देने के लिए पर्याप्त कारण नहीं होगा।

यदि हम कहें कि उसने हमसे ऐसे व्यवहार के योग्य कुछ नहीं किया, तो परमेश्वर पूछ सकता है कि उसने स्वयं हमसे क्या पाने के योग्य किया है। क्योंकि जब वह हमें आज्ञा देता है कि मनुष्यों के जो अपराध हमारे विरुद्ध हुए हैं, उन्हें क्षमा करें, तब वह उन अपराधों को अपने ऊपर ले लेता है।

यही एकमात्र मार्ग है जिससे हम वह पा सकते हैं जो मानव स्वभाव के लिए केवल कठिन ही नहीं, वरन् सर्वथा विपरीत है: कि घृणा करनेवालों से प्रेम रखें, बुराई के बदले भलाई करें और निन्दा करनेवालों के लिए प्रार्थना करें।

अपने शत्रुओं से प्रेम रखो, जो तुम्हें श्राप दें उन्हें आशीष दो, जो तुम से बैर रखें उनका भला करो, और जो तुम्हें सताते और दुर्व्यवहार करते हैं उनके लिये प्रार्थना करो।

—मत्ती 5:44

मैं कहता हूँ, हम इसे तभी पाएँगे जब यह स्मरण रखें कि हमें मनुष्यों की दुष्टता पर नहीं टिके रहना है, वरन् उनमें परमेश्वर के स्वरूप को देखना है। उसकी श्रेष्ठता और प्रतिष्ठा के द्वारा वह स्वरूप हमें उनसे प्रेम करने की ओर प्रेरित कर सकता है और करना चाहिए, और उन सब दोषों को मिटा देना चाहिए जो हमें ऐसा करने से फेर सकते हैं।

आत्म-दमन का यह कार्य हम में तब सचमुच प्रबल होगा जब हमारा प्रेम सम्पूर्ण होगा। ऐसा प्रेम केवल उन सब बाहरी कर्तव्यों को निभाने में नहीं है जो उससे जुड़े हैं, वरन् उन्हें मित्रता के सच्चे स्नेह के साथ निभाने में है।

कोई मनुष्य बाहरी कर्तव्य के सम्बन्ध में अपने पड़ोसी को वह सब दे सकता है जो उसका ऋण है, फिर भी अपना कर्तव्य जैसा चाहिए वैसा पूरा करने से दूर रह सकता है।

हम बहुतों को देखते हैं जो बहुत उदार दिखना चाहते हैं, फिर भी कुछ नहीं देते जब तक पानेवाले को अभिमानी मुद्रा या घमण्डी बोल से झिड़क न दें।

हमारे इस युग में हम ऐसी दयनीय दशा तक पहुँच गए हैं कि अधिकतर लोग बिना अपमान जोड़े कोई दान नहीं देते। ऐसी विकृति तो अन्यजातियों में भी सहन नहीं की जानी चाहिए थी।

प्रभु मसीहियों से बहुत भिन्न बात माँगता है: कि वे आनन्दित और प्रसन्न मुख के साथ दें और अपनी उदारता को दयालुता और कोमलता से मनोहर बनाएँ।

पहले, उन्हें अपने आप को उस व्यक्ति के स्थान पर रखना चाहिए जिसे सहायता चाहिए। उन्हें उसकी दशा पर ऐसी करुणा करनी चाहिए मानो वे स्वयं उसे अनुभव कर रहे और सह रहे हों, और उसी दयालु स्नेह से उसकी सहायता करने को प्रेरित हों जैसे वे अपनी करते।

ऐसा हृदय रखनेवाला मनुष्य न केवल अपने भाइयों के प्रति अपनी दया को घमण्ड या झिड़की से दूषित करने से बचेगा; वह न तो पानेवाले को उसकी निर्धनता के कारण तुच्छ जानेगा, न उसे अपने अधीन करने का यत्न करेगा मानो वह उसका व्यक्तिगत रूप से ऋणी हो।

उसी प्रकार हम अपने शरीर के किसी अंग का अपमान नहीं करते जब शेष देह उसे आराम पहुँचाने में परिश्रम करती है, न यह सोचते हैं कि उस पर अन्य अंगों का कोई विशेष ऋण चढ़ गया है, क्योंकि उसने उन्हें अपने लिए सहे गए कष्ट से अधिक कष्ट दिया है।

क्योंकि अंग जो सहायता एक-दूसरे को देते हैं, वह मुफ़्त का उपकार नहीं गिनी जाती, वरन् उस ऋण का भुगतान और चुकौती गिनी जाती है जो स्वभाव की व्यवस्था से देय है।

इस रीति से हमें एक और लाभ भी होगा: हम यह नहीं सोचेंगे कि केवल एक विशेष बात में कर्तव्य पूरा कर देने से हम आगे के सब कर्तव्य से मुक्त और छूटे हुए हैं, जैसा लोग प्रायः मान लेते हैं।

जब कोई धनी अपनी सम्पत्ति में से कुछ दे देता है, तो वह प्रायः अपने अन्य सब दायित्वों को एक ओर रखकर भूल जाता है मानो वे उससे सम्बन्ध ही नहीं रखते। इसके विपरीत, हर एक को पहचानना चाहिए कि जो कुछ उसके पास है और जो कुछ उसके सामर्थ्य में है, वह सब उसके पड़ोसियों का ऋण है। उनका भला करने के अपने दायित्व पर उसे कोई सीमा नहीं लगानी चाहिए सिवाय वहाँ जहाँ उसकी सामर्थ्य चुक जाए। जब तक वह सामर्थ्य पहुँचती है, उस पर प्रेम का शासन होना चाहिए।

अब हम आत्म-त्याग के उस दूसरे भाग पर विचार करें जो परमेश्वर से सम्बन्ध रखता है। हम इसके विषय में भिन्न-भिन्न स्थानों पर बोल चुके हैं, और जो कुछ कहा जा चुका है उस सब को दोहराना अनावश्यक होगा। यह दिखाना पर्याप्त होगा कि वह हमें कैसे अधीनता, धीरज और कोमलता में लाए।

पहले, शान्ति और सुख से जीने के साधन खोजने में पवित्रशास्त्र हमें बार-बार इसी बात पर लौटाता है: कि अपने आप को और अपना सब कुछ परमेश्वर को सौंपकर हम अपने हृदय की भावनाओं को उसके अधीन करें, ताकि वे वश में और दबी रहें।

हम में प्रचण्ड असंयम है और प्रतिष्ठा और सम्मान पाने, सामर्थ्य हासिल करने, धन जमा करने और हर उस वस्तु को बटोरने की बेलगाम लालसा है जो ठाठ-बाट और भव्यता में सहायक दिखाई दे। इसके विपरीत, हम निर्धनता, नीचता और अपमान से बहुत डरते और घृणा करते हैं, और इसलिए अपनी सारी शक्ति से उनसे भागते हैं।

इसी कारण हम देखते हैं कि वे सब जो अपने ही परामर्श के अनुसार अपना जीवन ढालते हैं, मन में कितने व्याकुल रहते हैं; कितनी युक्तियाँ आज़माते हैं; और अपने आप को कितने प्रकार से सताते हैं ताकि उन वस्तुओं को पाएँ जिनकी ओर महत्त्वाकांक्षा और लोभ उन्हें ले जाते हैं और निर्धनता और नीची दशा से बचें।

इसलिए यदि विश्वासी इन फन्दों में फँसने से बचना चाहते हैं, तो उन्हें यह मार्ग अपनाना चाहिए।

पहले, उन्हें परमेश्वर की आशीष के सिवाय उन्नति के किसी साधन की न चाह रखनी चाहिए, न आशा, न कल्पना। इसलिए उन्हें उसी पर निश्चिन्त होकर विश्राम करना और भरोसा रखना चाहिए।

यद्यपि शरीर अपने आप को अपना उद्देश्य पाने में पूरी तरह समर्थ समझता है—चाहे वह अपनी कुशलता से सम्मान और धन की अभिलाषा करे, उन्हें पाने के लिए अपने परिश्रम लगाए, या मनुष्यों की कृपा से सहायता पाए—तौभी निश्चित है कि ये सब बातें कुछ नहीं हैं। न हमारी चतुराई, न हमारा परिश्रम कभी हमें लाभ पहुँचा सकता है सिवाय उतने के जितना प्रभु दोनों को सफल करता है।

इसके विपरीत, उसकी आशीष ही हर बाधा के बीच से मार्ग निकालेगी और सब बातों में हमें अनुकूल परिणाम देगी।

इसके अतिरिक्त, यदि हम उसकी आशीष के बिना कुछ सम्मान या धन पा भी लें—जैसा हम नित्य देखते हैं कि दुष्ट लोग बड़ी सम्पत्ति और ऊँचे पद पा जाते हैं—तौभी जहाँ परमेश्वर का श्राप ठहरा है वहाँ सुख की एक बूँद भी नहीं भोगी जा सकती। इसलिए जब तक उसकी आशीष हम पर न ठहरे, जो कुछ हम पाएँगे वह हमारी दुर्गति ही बनेगा।

ऐसी वस्तु की इच्छा करना जो हमें केवल दुखी ही कर सकती है, निरी पागलपन होगा।

इसलिए यदि हम विश्वास करें कि उन्नति का हर साधन केवल परमेश्वर की आशीष में है, और उसके बिना हमारे लिए दुर्गति और विपत्ति के सिवाय कुछ नहीं, तो हमारा कर्तव्य यह नहीं कि हम अपनी योग्यता, परिश्रम, मनुष्यों की कृपा या भाग्य पर भरोसा करके धन और सम्मान के पीछे अत्यधिक लालसा से दौड़ें। वरन् हमें सदा परमेश्वर की ओर देखना चाहिए, ताकि उसके निर्देशन में हम उस दशा में पहुँचाए जाएँ जो उसे भली लगे।

इससे यह फलित होगा कि हम धन को अपनी ओर खींचने या सम्मान को उचित-अनुचित, हिंसा, छल या किसी अन्य टेढ़े साधन से झपटने का यत्न नहीं करेंगे। हम केवल उन्हीं लाभों को खोजेंगे जो हमें निर्दोषता से नहीं हटाते।

क्योंकि कौन परमेश्वर की आशीष से सहायता की आशा रख सकता है जब वह धोखा, लूट और अन्य दुष्ट कार्य करता हो? क्योंकि वह आशीष केवल उन्हीं के साथ रहती है जो अपने विचारों और कार्यों में खरे हैं, इसलिए जो उसे चाहता है वह इसी से हर अधर्म और बुरी युक्ति से रोका जाना चाहिए।

इसके अतिरिक्त, यह हमारे लिए लगाम का काम करेगा जो हमें धनी बनने की अव्यवस्थित लालसा में जलने या महत्त्वाकांक्षा से अपने आप को ऊँचा उठाने का यत्न करने से रोके। क्योंकि यह कैसी निर्लज्जता होगी कि हम यह मान बैठें कि परमेश्वर हमारी उस वस्तु को पाने में सहायता करे जो हम उसके वचन के विरुद्ध चाहते हैं? उससे यह बहुत दूर की बात है कि वह अपनी आशीष के अनुग्रह से उसे आगे बढ़ाए जिसे वह अपने ही मुँह से दोषी ठहराता है।

अन्ततः, जब घटनाएँ हमारी आशाओं और अभिलाषाओं के अनुसार न हों, तब यह विचार हमें अधीरता में फूट पड़ने और अपनी दशा को कोसने से रोकेगा। क्योंकि हम पहचानेंगे कि ऐसा करना परमेश्वर के विरुद्ध बड़बड़ाना होगा, जिसकी इच्छा से निर्धनता और धन, अपमान और सम्मान सब बाँटे जाते हैं।

संक्षेप में, जो परमेश्वर की आशीष पर विश्राम करता है, जैसा कहा गया है, वह उन वस्तुओं में से किसी का भी, जिन्हें मनुष्य प्रचण्ड लालसा से चाहते हैं, दुष्ट और टेढ़े साधनों से पीछा नहीं करेगा, क्योंकि वह जानता है कि ऐसे साधन उसे कुछ लाभ नहीं पहुँचा सकते।

यदि उसे समृद्धि मिले, तो वह उसे अपने परिश्रम, योग्यता या भाग्य का फल नहीं ठहराएगा, वरन् मानेगा कि वह परमेश्वर की ओर से है।

दूसरी ओर, यदि वह थोड़ी ही उन्नति करे जबकि दूसरे अपनी अभिलाषा के अनुसार ऊपर उठते जाएँ—या उसकी दशा गिर भी जाए—तौभी वह अपनी निर्धनता को उस रीति से अधिक धीरज और संयम से सहेगा जैसे अविश्वासी साधारण धन को भी, जो उसकी अभिलाषा से कम रहा, सह पाता।

क्योंकि विश्वासी के पास ऐसी शान्ति है जिसमें वह संसार के सारे धन और सम्मान से, चाहे वे एक ढेर में बटोर दिए जाएँ, अधिक सन्तोष से विश्राम कर सकता है: वह हर बात को परमेश्वर की ओर से उस रीति से ठहराई हुई मानता है जो उसके उद्धार के लिए सबसे अनुकूल है।

विश्वासियों को ऐसा धीरज और संयम केवल इसी एक बात में नहीं रखना चाहिए, वरन् उसे उन सब परिस्थितियों तक बढ़ाना चाहिए जिनके अधीन यह वर्तमान जीवन है।

इसलिए किसी ने अपना ठीक रीति से त्याग नहीं किया जब तक उसने अपने आप को परमेश्वर के हाथों में ऐसा न सौंप दिया हो कि वह अपने सारे जीवन को परमेश्वर की इच्छा के अनुसार चलने देने को स्वेच्छा से तैयार हो।

जिसमें ऐसी मनोदशा होगी, वह जो कुछ भी हो अपने आप को कभी अभागा नहीं समझेगा, न अपनी दशा की ऐसी शिकायत करेगा जो परोक्ष रूप से परमेश्वर पर दोष लगाए।

ऐसी मनोदशा कितनी आवश्यक है, यह तब प्रकट होगा जब हम विचार करें कि हम कितनी विपत्तियों के अधीन हैं। हज़ार रोग लगातार, एक के बाद एक, हमें सताते हैं। कभी महामारी हमें पीड़ित करती है; कभी युद्ध। कभी पाला या ओलावृष्टि बंजरपन लाती है और इस प्रकार हमें निर्धनता की धमकी देती है। कभी मृत्यु हमसे पत्नियाँ, बच्चे और अन्य सम्बन्धी छीन लेती है। कभी हमारा घर आग में भस्म हो जाता है।

ये बातें मनुष्यों से अपने जीवन को कुड़वाती हैं, अपने जन्म के दिन से घृणा कराती हैं, आकाश और उजियाले से बैर करवाती हैं, परमेश्वर की निन्दा कराती हैं, और—क्योंकि वे ईशनिन्दा में वाक्पटु होते हैं—उस पर अन्याय और क्रूरता का दोष लगवाती हैं।

इसके विपरीत विश्वासी को इन बातों में भी परमेश्वर की दया और उसकी पितृवत् कृपा को देखना चाहिए। यद्यपि वह अपने आप को अपने सब सम्बन्धियों की मृत्यु से बिछड़ा और अपने घराने को उजड़ा हुआ देखे, तौभी वह परमेश्वर को धन्य कहना न छोड़ेगा। वरन् वह अपने विचार इस ओर लगाएगा: कि क्योंकि परमेश्वर का अनुग्रह उसके घर में बसा है, वह उस घर को उजड़ा रहने न देगा।

यद्यपि उसकी खेती और दाख की बारियाँ पाले, ओलों या किसी और आँधी से उजाड़ और नष्ट हो जाएँ, यहाँ तक कि वह अकाल का संकट सामने देखे, तौभी वह हियाव न छोड़ेगा, न परमेश्वर से अप्रसन्न होगा। वरन् दृढ़ भरोसे में बना रहेगा और अपने मन में कहेगा, "तौभी हम प्रभु की रक्षा में हैं; हम उसके चरागाह की भेड़ें हैं। इसलिए बंजरपन चाहे कितना ही कठोर हो, वह सदा हमारे जीने के लिए जो आवश्यक है उसे जुटाएगा।"

यद्यपि वह रोग की पीड़ा सहे, तौभी वह पीड़ा से इतना दब नहीं जाएगा कि अधीरता में फूट पड़े और परमेश्वर से शिकायत करे। वरन् अपने स्वर्गीय पिता की धार्मिकता और भलाई पर, जो उसे ताड़ना देने में है, विचार करने से वह धीरज में प्रशिक्षित होगा।

संक्षेप में, जो कुछ भी हो, यह जानकर कि सब कुछ प्रभु के हाथ से आता है, वह उसे शान्त और धन्यवादी मन से ग्रहण करेगा, ऐसा न हो कि वह उसकी आज्ञा का विरोध करे जिसके हाथों में उसने अपने आप को एक बार सौंप दिया है।

सबसे बढ़कर, अन्यजातियों की वह मूर्खतापूर्ण और दयनीय सान्त्वना मसीही हृदय से दूर रहे: कि विपत्तियों को भाग्य के सिर मढ़ दिया जाए ताकि वे अधिक धीरज से सही जा सकें। क्योंकि दार्शनिक तर्क देते हैं कि भाग्य पर क्रोध करना मूर्खता होगी, क्योंकि वह अन्धी और बिना सोचे-समझे चलनेवाली है, अपने तीर बिना ठौर-ठिकाने के फेंकती है और भले-बुरे दोनों को बिना भेद के घायल करती है।

इसके विपरीत भक्ति का नियम यह है कि समृद्धि और विपत्ति, दोनों को परमेश्वर का हाथ ही निर्देशित और संचालित करता है। वह बिना सोचे-समझे हिंसा से नहीं चलता, वरन् भलाई और बुराई दोनों को सुव्यवस्थित न्याय के अनुसार बाँटता है।

तौभी विश्वासी की मनोदशा को और भी ऊँचा उठना चाहिए—उस स्थान तक जहाँ मसीह अपने सब अनुयायियों को बुलाता है: कि हर एक अपना क्रूस उठाए।

क्योंकि वे सब जिन्हें प्रभु ने गोद लिया है और अपनी सन्तानों की मण्डली में ग्रहण किया है, उन्हें एक कठिन और परिश्रमी जीवन के लिए, जो श्रम और असंख्य प्रकार के कष्टों से भरा है, अपने आप को तैयार करना चाहिए। स्वर्गीय पिता की यही इच्छा है कि अपने सेवकों को इस प्रकार अभ्यास कराए, ताकि उन्हें परखे।

उसने इस क्रम का आरम्भ मसीह से किया, जो उसका ज्येष्ठ पुत्र है, और इसे अपनी अन्य सब सन्तानों की ओर जारी रखता है। क्योंकि यद्यपि मसीह उसका प्रिय पुत्र था, जिससे वह सदा प्रसन्न रहा, तौभी हम देखते हैं कि इस संसार में उसके साथ कोमलता या सुकुमारता का व्यवहार नहीं हुआ। वरन् यह कहा जा सकता है कि वह न केवल निरन्तर दुःख उठाता रहा, वरन् उसका सारा जीवन एक प्रकार के सतत क्रूस के सिवाय और कुछ न था।

तो फिर हम अपने आप को उस दशा से कैसे बचा सकते हैं जिसके अधीन मसीह हमारे सिर को होना पड़ा, विशेषकर इसलिए कि वह हमारे लिए उसके अधीन हुआ, कि हमें धीरज का आदर्श दे? इसलिए प्रेरित घोषणा करता है कि परमेश्वर ने अपनी सब सन्तानों के लिए यही अन्त ठहराया है: कि वे उसके मसीह के अनुरूप बनें।

इससे हमें एक अनुपम सान्त्वना मिलती है: कि सब उन दुर्दशाओं को, जिन्हें सामान्यतः प्रतिकूल और बुरा माना जाता है, सहकर हम मसीह के क्रूस में सहभागी होते हैं, ताकि जैसे वह दुःख की खाई में से होकर स्वर्गीय महिमा में प्रवेश करने के लिए निकला, वैसे ही हम भी नाना क्लेशों में से होकर वहाँ पहुँचें।

क्योंकि सन्त पौलुस सिखाता है कि जब हम अपने भीतर मसीह के दुःखों की सहभागिता का अनुभव करते हैं, तब हम उसके पुनरुत्थान की सामर्थ्य को भी ग्रहण करते हैं; और जब हम उसकी मृत्यु के भागी बनाए जाते हैं, तब उसके महिमामय अमरत्व में प्रवेश करने के लिए तैयार किए जाते हैं।

क्रूस में पाई जानेवाली हर कड़वाहट को मीठा करने के लिए यह कितना सामर्थी है! क्योंकि जितना अधिक हम सताए जाते और दुर्दशा सहते हैं, उतनी ही निश्चितता से मसीह के साथ हमारी सहभागिता पक्की होती है। जब हम उसमें सहभागी होते हैं, तब विपत्तियाँ हमारे लिए न केवल आशीषित होती हैं, वरन् ऐसे सहायक भी बनती हैं जिनके द्वारा हमारा उद्धार बहुत आगे बढ़ता है।

इसके अतिरिक्त, प्रभु यीशु को क्रूस उठाने और क्लेश सहने की कोई आवश्यकता न थी सिवाय इसके कि वह परमेश्वर अपने पिता के प्रति अपनी आज्ञाकारिता की साक्षी दे और उसे प्रमाणित करे। परन्तु हमारे लिए अनेक कारणों से आवश्यक है कि इस जीवन में हम निरन्तर दुःख पाते रहें।

पहला, क्योंकि हम स्वभाव से अपने आप को ऊँचा उठाने और सब कुछ अपने ही नाम लिखने की ओर बहुत झुके हुए हैं, इसलिए जब तक हमारी दुर्बलता हमें प्रत्यक्ष रूप से दिखाई न जाए, हम तुरन्त अपनी शक्ति का अत्यधिक अनुमान लगा लेते हैं और सन्देह नहीं करते कि वह हर उस कठिनाई के विरुद्ध अजेय सिद्ध होगी जो आ सके। इसी से शरीर पर व्यर्थ और मूर्खतापूर्ण भरोसा उत्पन्न होता है, जो फिर हमें परमेश्वर के विरुद्ध घमण्ड करने को उकसाता है, मानो हमारी अपनी सामर्थ्य उसके अनुग्रह के बिना ही पर्याप्त हो।

वह इस अहंकार को इससे उत्तम रीति से वश में नहीं कर सकता कि हमें अनुभव से दिखाए कि हम में कितनी दुर्बलता—यहाँ तक कि नश्वरता—है। इसलिए वह हमें अपमान, निर्धनता, रोग, सम्बन्धियों की हानि या अन्य विपत्तियों से पीड़ित करता है। अपने ही भरोसे छोड़े जाने पर हम इनके आगे तुरन्त हार जाते हैं, क्योंकि हम में इन्हें सहने की कोई शक्ति नहीं।

तब दीन किए जाकर हम उसकी सामर्थ्य की प्रार्थना करना सीखते हैं, जो अकेली हमें ऐसे बोझों के नीचे दृढ़ खड़े रहने के योग्य बनाती है। यहाँ तक कि सबसे पवित्र विश्वासी भी, यद्यपि वे जानते हैं कि उनकी दृढ़ता प्रभु के अनुग्रह पर टिकी है, न कि अपनी सामर्थ्य पर, तौभी अपने साहस और स्थिरता पर अत्यधिक निश्चिन्त हो जाते हैं जब तक कि प्रभु क्रूस के द्वारा उन्हें परखकर उन्हें अपना अधिक निश्चित ज्ञान न करा दे।

जब तक सब कुछ शान्त रहता है, वे इस विचार से अपनी चापलूसी करते हैं कि उनके पास बड़ा साहस और स्थिरता है। परन्तु जब क्लेश से झकझोरे जाते हैं, तब पाते हैं कि यह भरोसा पाखण्ड था।

इस प्रकार विश्वासियों को अपनी दुर्बलताओं का बोध कराया जाना चाहिए, ताकि वे दीनता में बढ़ें, शरीर पर हर विकृत भरोसे को त्याग दें और अपने आप को पूरी तरह परमेश्वर के अनुग्रह पर छोड़ दें। जब वे ऐसा कर लेते हैं, तब वे उसकी सामर्थ्य की उपस्थिति का अनुभव करते हैं, जिसमें वे आवश्यकता से अधिक बल पाते हैं।

सन्त पौलुस का यही अर्थ है जब वह कहता है कि क्लेश से धीरज उत्पन्न होता है, और धीरज से खरा चरित्र। क्योंकि विश्वासी क्लेश में सहायता करने की प्रभु की प्रतिज्ञा की सच्चाई का अनुभव करते हैं जब वे उसके हाथ से थामे जाकर धीरज के साथ स्थिर रहते हैं—जो वे अपनी सामर्थ्य से कभी नहीं कर सकते थे।

इसलिए धीरज पवित्र लोगों को प्रमाणित करता है कि परमेश्वर सचमुच वह सहायता देता है जिसकी उसने प्रतिज्ञा की है, जब कभी उसकी आवश्यकता हो। इससे उनकी आशा भी दृढ़ होती है, क्योंकि यह घोर कृतघ्नता होती कि परमेश्वर की उस सच्चाई की जिसे वे पहले ही दृढ़ और अटल अनुभव कर चुके हैं, भविष्य के लिए आशा न रखें।

अब हम देखते हैं कि क्रूस से एक अटूट क्रम में कितने लाभ निकलते हैं।

क्योंकि अपनी शक्ति के विषय में जो झूठी धारणा हम स्वभाव से बना लेते हैं उसे उलटकर, और उस पाखण्ड को प्रकट करके जो अपनी चापलूसियों से हमें फुसलाता और धोखा देता है, क्रूस शरीर पर उस भरोसे को गिरा देता है जो हमारे लिए इतना विनाशकारी था। फिर, इस प्रकार हमें दीन करके, वह हमें परमेश्वर पर विश्राम करना सिखाता है, जो हमारी नींव होकर हमें गिरने या हियाव छोड़ने नहीं देता।

इस विजय से आशा उत्पन्न होती है, क्योंकि प्रभु जो प्रतिज्ञा करता है उसे पूरा करके भविष्य के लिए अपनी सच्चाई को दृढ़ करता है। यदि ये ही कारण होते, तब भी प्रकट है कि क्रूस की ताड़ना हमारे लिए कितनी आवश्यक है।

क्योंकि यह कोई छोटा लाभ नहीं कि आत्म-प्रेम, जो हमें अन्धा करता है, हटा दिया जाए, ताकि हम अपनी दुर्बलता को ठीक रीति से जानें; कि उसे ठीक रीति से जानकर हम अपने आप पर अविश्वास करना सीखें; कि अपने आप पर अविश्वास करके हम अपना भरोसा परमेश्वर पर लगाएँ; कि हृदय के निश्चित भरोसे के साथ परमेश्वर पर टिककर हम उसकी सहायता से विजयी होकर अन्त तक स्थिर रहें; कि उसके अनुग्रह में दृढ़ खड़े होकर हम जानें कि वह अपनी प्रतिज्ञाओं में सच्चा और विश्वासयोग्य है; और कि उन प्रतिज्ञाओं का निश्चित ज्ञान पाकर हमारी आशा दृढ़ हो।

प्रभु के पास अपने सेवकों को दुःख देने का एक और कारण है: उनके धीरज को परखना और उन्हें आज्ञाकारिता में प्रशिक्षित करना। इसलिए नहीं कि उनमें उस आज्ञाकारिता के सिवाय जो उसने उन्हें दी है कोई और आज्ञाकारिता हो सके, परन्तु उसे यह भाता है कि इस रीति से उन अनुग्रहों को प्रकट करे और उनकी साक्षी दे जो उसने अपने विश्वासियों में रखे हैं, ताकि वे उनके भीतर निष्क्रिय और छिपे न पड़े रहें।

इसलिए जब वह अपने सेवकों को दिए हुए धीरज को सामने लाता है, तब कहा जाता है कि वह उनके धीरज की परीक्षा करता है। इसी से ये कथन आते हैं कि उसने अब्राहम को परखा और उसकी भक्ति को जाना, क्योंकि अब्राहम ने उसकी आज्ञा मानने के लिए अपने पुत्र को बलि चढ़ाने से इनकार नहीं किया।

इसलिए सन्त पतरस कहता है कि हमारा विश्वास क्लेश से वैसे ही परखा जाता है जैसे सोना भट्ठी में परखा जाता है।

—1 पतरस 1:7

कौन इनकार करेगा कि इतना उत्तम वरदान, जो प्रभु ने अपने सेवकों को दिया है, उपयोग में लाया जाना उचित है ताकि वह जाना जाए और प्रकट हो? अन्यथा उसका मूल्य कभी वैसा नहीं आँका जाएगा जैसा आँका जाना चाहिए।

यदि इसलिए प्रभु के पास उचित कारण है कि जो सद्गुण उसने विश्वासियों में रखे हैं उनके अभ्यास का अवसर दे, ताकि वे न छिपे रहें, न निष्फल हो जाएँ, तो हम देखते हैं कि वह जो दुःख भेजता है वह बिना कारण नहीं है, जिनके बिना उनके धीरज का कोई अभ्यास न होता।

मैं यह भी कहता हूँ कि इसी साधन से वह उन्हें धीरज में प्रशिक्षित करता है, क्योंकि इससे वे यह सीखते हैं कि अपनी इच्छाओं के अनुसार नहीं, वरन् उसकी इच्छा के अनुसार जीएँ। वस्तुतः यदि सब कुछ उनकी इच्छा के अनुसार होता, तो वे कभी न जानते कि परमेश्वर के पीछे चलने का क्या अर्थ है।

अन्यजाति दार्शनिक सेनेका हमें बताता है कि जब किसी को विपत्ति धीरज से सहने का उपदेश दिया जाता, तब यह कहना एक प्राचीन कहावत थी, "हमें परमेश्वर के पीछे चलना चाहिए।" इससे उनका अर्थ यह था कि मनुष्य प्रभु का जूआ सचमुच तभी स्वीकार करता है जब वह अपने आप को ताड़ना पाने देता है और अपना हाथ और पीठ उसकी छड़ियों के लिए स्वेच्छा से प्रस्तुत करता है।

अब यदि यह उचित है कि हम अपने स्वर्गीय पिता के प्रति हर रीति से आज्ञाकारी बनें, तो हमें इससे इनकार नहीं करना चाहिए कि वह हमें उस आज्ञाकारिता में हर सम्भव साधन से प्रशिक्षित करे।

फिर भी हम यह नहीं समझते कि यह कितना आवश्यक है जब तक यह विचार न करें कि हमारा शरीर कितने असंयम से प्रभु का जूआ उतार फेंकता है जैसे ही उसके साथ थोड़ी-सी छूट बरती जाए। अड़ियल घोड़ों के साथ भी यही होता है: कुछ समय अस्तबल में निठल्ले और भली-भाँति खिलाए-पिलाए रहने के बाद उन्हें फिर साधना कठिनाई से हो पाता है, और वे उस स्वामी को नहीं पहचानते जिसका नियन्त्रण पहले मानते थे।

संक्षेप में, जिस बात की प्रभु ने इस्राएल की प्रजा के विषय में शिकायत की, वही सब मनुष्यों में सामान्यतः देखी जाती है: जब वे अत्यधिक खिलाए जाने से मोटे हो जाते हैं, तब उस पर लात मारते हैं जिसने उन्हें पोसा।

—व्यवस्थाविवरण 32:15

परमेश्वर की उदारता निश्चय ही हमें उसकी भलाई पर विचार करने और उससे प्रेम करने की ओर खींचे। परन्तु हमारी कृतघ्नता ऐसी है कि हम उसकी छूट से भलाई करने के लिए प्रोत्साहित होने की अपेक्षा अधिकतर बिगड़ जाते हैं, इसलिए यह आवश्यकता से भी अधिक है कि वह हम पर कसकर लगाम रखे और हमें अनुशासन में थामे रहे, ऐसा न हो कि हम ऐसी ढिठाई में फूट पड़ें।

इसलिए, ऐसा न हो कि सम्पत्ति की अत्यधिक प्रचुरता हमें घमण्डी बना दे, सम्मान हमें अहंकार से भर दें, और देह या आत्मा में जो वरदान हमारे पास हैं वे हम में ढिठाई उत्पन्न करें, प्रभु खतरे को पहले ही भाँप लेता है और उपचार जुटाता है। क्रूस की औषधि के द्वारा वह हमारे शरीर की मूर्खता पर अंकुश लगाता और उसे वश में करता है। वह यह नाना रीतियों से करता है, जैसा वह जानता है कि हर एक के लिए उपयुक्त और हितकर है।

क्योंकि हम सब समान रूप से रोगी नहीं हैं, न हम सब एक ही रोग से पीड़ित हैं; इसलिए एक ही उपचार सब के लिए उपयुक्त नहीं। इसी कारण वह कुछ को एक प्रकार के क्रूस से और अन्यों को दूसरे प्रकार के क्रूस से अभ्यास कराता है। फिर भी, यद्यपि सब के स्वास्थ्य का प्रबन्ध करने में वह कुछ को हल्की औषधि और अन्यों को कड़ी और कठोर औषधि देता है, वह किसी को पूरी तरह छूट नहीं देता, क्योंकि वह जानता है कि हर कोई रोगी है।

इसके अतिरिक्त, हमारे भले पिता को न केवल भविष्य के लिए हमारी दुर्बलता से बचाव करना होता है; अपने प्रति हमारी आज्ञाकारिता में हमें बनाए रखने के लिए प्रायः उसे हमारे बीते दोषों को भी सुधारना आवश्यक होता है। इसलिए जब कभी हम पर कोई दुःख आए, हमें अपने बीते जीवन को स्मरण करना चाहिए। ऐसा करने में हम निस्सन्देह पाएँगे कि हमने कोई ऐसा दोष किया है जो ऐसी ताड़ना के योग्य है।

तथापि अपने पाप की पहचान धीरज के लिए हमारे उपदेश का मुख्य आधार नहीं होनी चाहिए, क्योंकि पवित्रशास्त्र हमें इससे कहीं उत्तम विचार देता है जब वह कहता है कि प्रभु हमें विपत्ति से ताड़ना इसलिए देता है कि हम संसार के साथ दण्ड के भागी न ठहरें।

—1 कुरिन्थियों 11:32

इसलिए क्लेश की सबसे बड़ी कड़वाहट के बीच भी हमें अपने पिता की दया और कृपा को पहचानना चाहिए, क्योंकि तब भी वह हमारे उद्धार को आगे बढ़ाना नहीं छोड़ता। क्योंकि वह हमें नाश या बरबाद करने के लिए नहीं, वरन् संसार के दण्ड से छुड़ाने के लिए दुःख देता है।

यह विचार हमें उस ओर ले जाएगा जो पवित्रशास्त्र अन्यत्र सिखाता है:

हे मेरे पुत्र, यहोवा की शिक्षा से मुँह न मोड़ना, और जब वह तुझे डाँटे, तब तू उससे थक न जाना; क्योंकि यहोवा जिससे प्रेम रखता है उसको डाँटता है, जैसे पिता अपने प्रिय पुत्र को।

—नीतिवचन 3:11–12

जब हमें बताया जाता है कि ये ताड़नाएँ पिता की छड़ियाँ हैं, तो क्या हमारा कर्तव्य नहीं कि हम सीखने को तत्पर सन्तानों के समान झुक जाएँ, न कि अपनी दुष्टता में कठोर हुए हताश मनुष्यों की भाँति विरोध करें? प्रभु हमें नाश होने देता, यदि हमारे भटक जाने पर वह ताड़ना के द्वारा हमें अपनी ओर न खींचता। जैसा प्रेरित कहता है, यदि वह हमें अनुशासन में न रखे, तो हम नाजायज़ सन्तान हैं, सच्चे पुत्र नहीं।

—इब्रानियों 12:8

इसलिए हम अत्यन्त हठीले हैं यदि हम प्रभु को सह न सकें जब वह हमारे प्रति अपना अनुग्रह और हमारे उद्धार की चिन्ता प्रकट करता है। पवित्रशास्त्र अविश्वासियों और विश्वासियों के बीच यह अन्तर ठहराता है: पहले, पुराने समय के उन दासों के समान जो स्वभाव से हठीले थे, कोड़े के नीचे केवल और बिगड़ते और कठोर होते जाते हैं; दूसरे, कुलीन सन्तान के समान, ताड़ना से मन फिराव और जीवन-सुधार की ओर ले जाए जाते हैं। अब हम चुनें कि इनमें से हम कौन होना चाहते हैं। परन्तु क्योंकि यह विषय अन्यत्र चर्चा में आ चुका है, इसलिए यहाँ संक्षेप में छू लेना ही पर्याप्त होगा।

तथापि सबसे बड़ी सान्त्वना तब मिलती है जब हम धार्मिकता के कारण सताव सहते हैं। क्योंकि तब हमें स्मरण रखना चाहिए कि प्रभु हमें अपनी सेवा के चिह्न देकर कितना सम्मान देता है।

धार्मिकता के कारण सताव से मेरा अर्थ केवल सुसमाचार की रक्षा के लिए दुःख उठाना नहीं, वरन् हर न्यायोचित कारण को थामे रखने के लिए भी है। चाहे शैतान के झूठ के विरुद्ध परमेश्वर के सत्य की रक्षा में हो, या निर्दोषों को दुष्टों से बचाने और उन्हें अन्याय और हानि सहने से रोकने में, हम संसार की घृणा और क्रोध मोल ले सकते हैं और इस प्रकार अपनी प्रतिष्ठा, सम्पत्ति या प्राण को संकट में डाल सकते हैं। फिर भी हमें इस पर दुखी नहीं होना चाहिए कि हमने अपने आप को परमेश्वर के लिए इतना पूरी तरह समर्पित किया, न अपने आप को अभागा समझना चाहिए जब वह अपने ही मुँह से हमें धन्य कहता है।

निर्धनता, अपने आप में देखी जाए तो, सचमुच दुर्दशा है। देश-निकाला, अपमान, लज्जा और कारावास के विषय में भी यही सच है; और अन्ततः मृत्यु सबसे बड़ी विपत्ति है। परन्तु जब परमेश्वर अपनी कृपा हम पर फूँकता है, तब इनमें से कोई ऐसी बात नहीं जिसे वह हमारे सुख और आशीष में न बदल दे। इसलिए हम अपने शरीर के झूठे निर्णय की अपेक्षा मसीह की साक्षी से सन्तुष्ट रहें।

तब, प्रेरितों के उदाहरण पर चलते हुए, हम आनन्द करेंगे जब कभी वह हमें अपने नाम के लिए अपमान सहने के योग्य ठहराए। क्योंकि यदि निर्दोष और शुद्ध विवेकवाले होकर भी हम दुष्टों की बुराई के कारण अपनी सम्पत्ति से वंचित किए जाएँ, तो मनुष्यों के आगे हम निर्धन तो होते हैं, परन्तु परमेश्वर के सामने हमारा सच्चा धन इसी से बढ़ता है।

यदि हम निकाल दिए जाएँ और अपने देश से निर्वासित कर दिए जाएँ, तो हम प्रभु के घराने में और भी गहराई से ग्रहण किए जाते हैं। यदि हम सताए और पीड़ित किए जाएँ, तो अपने प्रभु में शरण लेने के लिए प्रेरित होकर हम उसमें और भी दृढ़ता से स्थापित किए जाते हैं। यदि हम निन्दा और अपमान सहें, तो परमेश्वर के राज्य में और भी ऊँचे उठाए जाते हैं। यदि हम मर जाएँ, तो हमारे लिए धन्य जीवन का मार्ग खुल जाता है।

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