अध्याय 20

अध्याय सत्रह: मसीही जीवन के विषय में (भाग 2/2)

Institutes of the Christian Religion (1541) · John Calvin

यह हिन्दी संस्करण UECF.NET के लिए AI-सहायता से किए गए पूर्ण अनुवाद और सम्पादकीय गुणवत्ता-समीक्षा के द्वारा तैयार किया गया है। अध्ययन के लिए अंग्रेज़ी मूल पाठ ही प्रामाणिक है। कोई त्रुटि दिखे तो [email protected] पर लिखें।

अध्याय सत्रह: मसीही जीवन के विषय में (भाग 2/2)

क्या यह हमारे लिए बड़ी लज्जा की बात न होगी कि जिन बातों को प्रभु ने इतना ऊँचा मूल्य दिया है, उन्हें हम इस संसार के उन सुखों से कम मूल्यवान समझें जो धुएँ के समान तुरन्त उड़ जाते हैं?

जब पवित्रशास्त्र इस प्रकार हर अपमान और विपत्ति में, जो हमें धार्मिकता की रक्षा के लिए सहनी पड़ती है, हमें ढाढ़स बँधाता है, तो यदि हम उन्हें धीरज और प्रसन्न मन से न सहें तो हम अत्यन्त कृतघ्न ठहरते हैं—विशेषकर इसलिए कि इस प्रकार का क्रूस सब से बढ़कर विश्वासियों का ही भाग है, और इसके द्वारा मसीह उनमें महिमा पाना चाहता है, जैसा सन्त पतरस कहता है।

तौभी परमेश्वर हमसे ऐसे आनन्द की माँग नहीं करता जो शोक की सारी कड़वाहट को दूर कर दे।

नहीं तो क्रूस के नीचे सन्तों का धीरज कुछ भी न ठहरता, यदि वे पीड़ा से तड़पते न और संकट में होने पर वेदना न सहते। इसी प्रकार, यदि निर्धनता उनके लिए कठोर और कड़वी न होती, यदि वे रोग में कोई यातना न सहते, यदि अपमान उन्हें घायल न करता, और यदि मृत्यु उन्हें भय से न भर देती, तो इन सब को तुच्छ जानने में कौन-सा बल या संयम होता?

परन्तु क्योंकि इनमें से प्रत्येक की अपनी कड़वाहट है, जिससे वह स्वभावतः हर मनुष्य के हृदय को बेधती है, इसलिए विश्वासी का बल तब प्रकट होता है जब वह ऐसे दुःख की तीक्ष्णता से आक्रान्त होकर और बुरी तरह पीड़ित होकर भी उसका सामना करता, उसे जीतता और उससे ऊपर उठ जाता है। उसका धीरज तब प्रकट होता है जब उसी वेदना से उकसाया जाकर भी वह परमेश्वर के भय से, मानो लगाम से, रोका जाता है कि किसी अति में न फूट पड़े। उसका आनन्द और उल्लास तब दिखाई देता है जब शोक और पीड़ा से घायल होकर भी वह परमेश्वर की आत्मिक सान्त्वना में सन्तुष्ट रहता है।

पीड़ा की स्वाभाविक अनुभूति के विरुद्ध, धीरज और संयम का पीछा करते हुए, विश्वासी जो संघर्ष करते हैं, उसका बहुत ही उत्तम वर्णन सन्त पौलुस ने इन शब्दों में किया है:

“हम चारों ओर से क्लेश तो भोगते हैं, परन्तु कुचले नहीं जाते; हम निर्धन तो हैं, परन्तु निराश्रित नहीं; सताए तो जाते हैं, परन्तु त्यागे नहीं जाते; गिराए तो जाते हैं, परन्तु नाश नहीं होते।”

—2 कुरिन्थियों 4:8–9

हम देखते हैं कि क्रूस को धीरज से सहने का अर्थ पूर्णतः संवेदनहीन हो जाना और कुछ भी पीड़ा अनुभव न करना नहीं है, जैसा कि स्तोइक दार्शनिकों ने मूर्खतापूर्वक प्राचीन काल के साहसी पुरुष का चित्र खींचा था: ऐसा पुरुष जो अपनी मनुष्यता को उतार फेंककर विपत्ति से उतना ही प्रभावित होता जितना सम्पन्नता से, शोकपूर्ण बातों से उतना ही जितना आनन्ददायक बातों से—वरन् जो पत्थर के समान संवेदनहीन होता।

और इस ऊँची बुद्धिमानी से उन्होंने क्या प्राप्त किया? उन्होंने धीरज की ऐसी छवि बनाई जो मनुष्यों में कभी रही ही नहीं और कभी हो भी नहीं सकती। वस्तुतः अत्यन्त परिष्कृत धीरज की खोज में उन्होंने मनुष्यजाति को उसके वास्तविक अभ्यास से ही वंचित कर दिया।

आज भी मसीहियों में ऐसे ही लोग हैं जो न केवल कराहने और रोने को वरन् शोक करने और चिन्ता अनुभव करने को भी दोष समझते हैं। ऐसी अमानवीय धारणाएँ प्रायः उन निठल्ले लोगों से उपजती हैं जो काम में हाथ डालने की अपेक्षा चिन्तन-मनन में अधिक लगे रहते हैं, और इसलिए ऐसी कल्पनाओं के सिवा और कुछ उत्पन्न नहीं कर सकते।

हमारे लिए तो हमें इस कठोर और कड़े दर्शन का कोई काम नहीं, जिसे हमारे प्रभु यीशु ने न केवल अपने वचनों से वरन् अपने उदाहरण से भी दोषी ठहराया। वह अपने शोक के कारण भी कराहा और रोया, और दूसरों पर तरस खाकर भी; और उसने अपने चेलों को भी इससे भिन्न शिक्षा नहीं दी:

“संसार आनन्द करेगा, परन्तु तुम शोक करोगे; वह हँसेगा, परन्तु तुम रोओगे।”

—यूहन्ना 16:20

और कोई इसे दोष न समझे, इसलिए वह शोक करनेवालों को धन्य घोषित करता है।

—मत्ती 5:4

इसमें आश्चर्य नहीं। क्योंकि यदि सब आँसू दोषी ठहरें, तो प्रभु यीशु के विषय में हम क्या निर्णय करेंगे, जिसकी देह से लहू की बूँदें टपकीं? यदि हर भय अविश्वास कहलाए, तो उस भय के विषय में हम क्या सोचेंगे जिससे वह इतनी गहराई तक दब गया था? उसके इस अंगीकार को हम कैसे सराहेंगे कि उसका प्राण मृत्यु तक शोक से भरा है?

ये बातें मैंने इसलिए कहीं कि सब भक्तिमान हृदयों को निराशा से बचाए रखूँ, ताकि वे केवल इस कारण धीरज का पीछा न छोड़ दें कि वे शोक की स्वाभाविक अनुभूति से पूर्णतः मुक्त नहीं हुए हैं।

जो लोग धीरज को संवेदनहीनता में ठहराते हैं और दृढ़ और अटल मनुष्य को काठ का कुन्दा बना देते हैं, वे जब धीरज का अभ्यास करने चलेंगे तो अनिवार्यतः साहस खोकर निराशा में गिर पड़ेंगे।

इसके विपरीत, पवित्रशास्त्र सन्तों की सहनशीलता की प्रशंसा तब करता है जब वे अपने दुःखों की कठोरता से इस प्रकार पीड़ित होते हैं कि उससे टूटकर मूर्छित नहीं हो जाते; जब वे कड़वाहट से ऐसे बिंध जाते हैं कि आत्मिक आनन्द उनके साथ बना रहता है; और जब वे वेदना से ऐसे दबाए जाते हैं कि फिर भी साँस लेते रहते और परमेश्वर की सान्त्वना में आनन्दित रहते हैं।

इस बीच यह संघर्ष उनके हृदयों के भीतर चलता है: उनकी स्वाभाविक भावना हर विरोधी बात से भागती और घृणा करती है, जबकि भक्ति का भाव उन्हें इन कठिनाइयों में से होकर परमेश्वर की इच्छा की आज्ञाकारिता की ओर खींचता है। मसीह ने सन्त पतरस से यह कहकर इसी संघर्ष को प्रकट किया:

“जब तू जवान था, तब अपनी कमर बाँधकर जहाँ चाहता था वहाँ फिरता था; परन्तु जब तू बूढ़ा होगा, तो कोई दूसरा तेरी कमर बाँधकर तुझे वहाँ ले जाएगा जहाँ तू नहीं जाना चाहता।”

—यूहन्ना 21:18

निश्चय ही यह सम्भव नहीं कि सन्त पतरस, जब उसे अपनी मृत्यु से परमेश्वर की महिमा करनी थी, उसकी ओर बलपूर्वक और अपनी इच्छा के विरुद्ध घसीटा गया हो; नहीं तो उसकी शहादत बहुत कम प्रशंसा के योग्य होती। तौभी, यद्यपि उसने स्वेच्छा और आनन्द से परमेश्वर की आज्ञा के आगे सिर झुकाया, वह मनुष्य होना नहीं छोड़ चुका था, और इसलिए दो प्रवृत्तियों के बीच बँटा हुआ था।

क्योंकि जब वह उस क्रूर मृत्यु पर विचार करता जो उसे सहनी थी, तो उसकी भयावहता से भयभीत होकर वह स्वेच्छा से उससे बच निकलता। परन्तु जब वह सोचता कि वह परमेश्वर की आज्ञा से उसके लिए बुलाया गया है, तो वह स्वेच्छा से, वरन् आनन्द के साथ, हर भय को पैरों तले रौंदकर अपने आपको प्रस्तुत कर देता।

इसलिए यदि हम मसीह के चेले होना चाहते हैं, तो हमें परमेश्वर के प्रति ऐसी श्रद्धा और आज्ञाकारिता से अपने हृदयों को भरने का यत्न करना चाहिए कि वे उसकी भली इच्छा के विरोधी हर भाव को वश में करके दबा दें। तब हम चाहे जो क्लेश सहें और हृदय की पीड़ा चाहे जितनी हो, फिर भी हम दृढ़ता से धीरज बनाए रखेंगे।

विपत्तियों की अपनी तीक्ष्णता सदा बनी रहेगी और वे हमें घायल करती रहेंगी। इसलिए जब हम रोग से पीड़ित होंगे तो कराहेंगे, शिकायत करेंगे और स्वास्थ्य चाहेंगे। निर्धनता से दबे होने पर हम व्याकुलता और चिन्ता के डंक अनुभव करेंगे। अपमान, तिरस्कार और हर प्रकार की हानि भी इसी प्रकार हमारे हृदयों को घायल करेगी। जब हमारे किसी सम्बन्धी की मृत्यु होगी तो हम स्वभाव का देय आँसू उसे चुकाएँगे।

तौभी हम सदा इसी निष्कर्ष पर लौटेंगे: “फिर भी परमेश्वर की यही इच्छा है; इसलिए हम उसकी इच्छा पर चलें।” वस्तुतः यह विचार पीड़ा की वेदनाओं, आँसुओं और कराहों के बीच प्रवेश करना चाहिए, ताकि वह हमारे हृदयों को उन्हीं बातों को प्रसन्नता से सहने के योग्य बनाए जिनसे वे इतने गहरे दुःखी हैं।

क्योंकि क्रूस को भली-भाँति सहने का मुख्य कारण हमने परमेश्वर की इच्छा पर विचार करने से पाया है, इसलिए हमें संक्षेप में मसीही और दार्शनिक धीरज के बीच का भेद बताना चाहिए।

बहुत थोड़े दार्शनिक इतनी ऊँचाई तक पहुँचे कि यह समझ सके कि मनुष्य परमेश्वर के हाथ से दुःखों के द्वारा अभ्यास कराए जाते हैं और इसलिए हमें उसकी इच्छा के आगे झुकना चाहिए। फिर भी जो इस बिन्दु तक पहुँचे, वे आवश्यकता के सिवा और कोई कारण नहीं देते। परन्तु इसका अर्थ इसके सिवा क्या है कि हमें परमेश्वर के आगे झुकना है क्योंकि उसका विरोध करने का हर प्रयत्न व्यर्थ होगा? क्योंकि यदि हम परमेश्वर की आज्ञा केवल इसलिए मानें कि हमें मानना पड़ता है, तो जब भी बच निकलना सम्भव हो जाएगा, हम उसकी आज्ञा मानना छोड़ देंगे।

परन्तु पवित्रशास्त्र हमसे परमेश्वर की इच्छा में कुछ और ही बात देखने को कहता है: पहले, उसकी धार्मिकता और न्याय; और फिर, हमारे उद्धार के लिए उसकी चिन्ता। इसलिए मसीही उपदेश इस रीति से चलते हैं:

चाहे निर्धनता, देश-निकाला, बन्दीगृह, अपमान, रोग, सम्बन्धियों की मृत्यु या कोई और विपत्ति हमें सताए, हमें विचार करना चाहिए कि इनमें से कुछ भी प्रभु की इच्छा और विधान के बिना नहीं होता। इसके अतिरिक्त, वह कुछ भी नहीं करता जो भली-भाँति व्यवस्थित न्याय के अनुसार न हो।

क्योंकि क्या? क्या जो पाप हम प्रतिदिन करते हैं वे इससे लाख गुना अधिक कठोर और भारी ताड़ना के योग्य नहीं हैं जितनी हमें मिलती है? क्या यह उचित नहीं कि हमारा शरीर वश में किया जाए और जूए के अधीन चलने को सधाया जाए, ऐसा न हो कि वह उस असंयम में भटक जाए जिसकी ओर उसका स्वभाव झुका हुआ है? क्या परमेश्वर की धार्मिकता और सत्य इस योग्य नहीं कि हम उनके लिए दुःख उठाएँ?

जब परमेश्वर का न्याय हमारे सब दुःखों में स्पष्ट दिखाई देता है, तो हम बिना अन्याय किए कुड़कुड़ा या विद्रोह नहीं कर सकते। यहाँ हम दार्शनिकों की वह ठण्डी टेक नहीं सुनते कि हमें झुकना चाहिए क्योंकि यह अनिवार्य है, वरन् एक जीवित और सामर्थी चेतावनी सुनते हैं कि हमें आज्ञा माननी चाहिए क्योंकि विरोध करना अनुचित है। हमें धीरज को अपनाना चाहिए क्योंकि अधीरता परमेश्वर की इच्छा के विरुद्ध विद्रोह है।

और क्योंकि हमारे लिए कुछ भी वास्तव में वांछनीय नहीं सिवाय उसके जिसे हम भला और हितकारी जानते हैं, इसलिए दया का पिता इस विषय में भी हमें यह निश्चय दिलाकर सान्त्वना देता है कि जब वह हमें क्रूस से ताड़ना देता है, तब वह हमारे उद्धार का प्रबन्ध कर रहा है।

यदि क्लेश हमारे लिए हितकारी हैं, तो हम उन्हें शान्त और कृतज्ञ हृदय से क्यों न स्वीकार करें? इसलिए उन्हें धीरज से सहने में हम केवल आवश्यकता के आगे झुक नहीं रहे, वरन् उस बात में सन्तुष्ट रह रहे हैं जो हमारे भले के लिए है।

ये विचार, मैं कहता हूँ, हमारे हृदयों को आत्मिक आनन्द से उतना ही विस्तृत करेंगे जितना वे क्रूस की स्वाभाविक कड़वाहट से संकुचित होते हैं। इसी से धन्यवाद भी उत्पन्न होगा, जो आनन्द के बिना हो ही नहीं सकता।

अब, क्योंकि प्रभु की स्तुति और धन्यवाद केवल आनन्दित और प्रसन्न हृदय से ही निकल सकते हैं, और फिर भी संसार की किसी बात से उनमें बाधा नहीं आनी चाहिए, इसलिए यह प्रकट है कि क्रूस की कड़वाहट का आत्मिक आनन्द से मधुर किया जाना कितना आवश्यक है।

इसके अतिरिक्त, हम पर जैसा भी क्लेश आए, हमें सदा यह लक्ष्य दृष्टि में रखना चाहिए: कि हम वर्तमान जीवन को तुच्छ जानने के अभ्यस्त हो जाएँ और इस प्रकार आनेवाले जीवन पर मनन करने के लिए जगाए जाएँ।

क्योंकि प्रभु भली-भाँति जानता है कि हम इस संसार के प्रति अन्धे, वरन् पशुओं जैसे, मोह की ओर कितने झुके हुए हैं, इसलिए वह हमें उससे खींचने और हमारी सुस्ती से जगाने के लिए अत्यन्त उपयुक्त साधन अपनाता है, ऐसा न हो कि हमारे हृदय ऐसे मूर्खतापूर्ण मोह से बहुत दृढ़ता से जकड़ जाएँ।

हम में कोई ऐसा नहीं जो यह न चाहे कि दिखाई दे मानो वह जीवन की सारी यात्रा में स्वर्गीय अमरता की अभिलाषा रखता और उसे पाने का यत्न करता है। क्योंकि हमें इस बात की लज्जा आती है कि हमारे पास पशुओं से बढ़कर कोई श्रेष्ठता न हो, जिनकी दशा हमारी दशा से बुरी न होती यदि मृत्यु के बाद हमारे लिए अनन्तता की कोई आशा न रहती।

परन्तु यदि प्रत्येक की योजनाओं, विचार-विमर्श, उद्यमों और कार्यों की जाँच की जाए, तो उनमें पृथ्वी के सिवा और कुछ दिखाई न देगा। यह जड़ता इसलिए होती है कि हमारी समझ उस झूठी चमक से चौंधिया जाती है जो धन, मान और सामर्थ्य अपने बाहरी रूप में दिखाते हैं, और इस प्रकार उनसे आगे नहीं देख पाती।

इसी प्रकार हमारा हृदय, लोभ, महत्त्वाकांक्षा और अन्य बुरी अभिलाषाओं में व्यस्त होकर, यहाँ नीचे इतनी दृढ़ता से जमा हुआ है कि ऊपर नहीं देख सकता। अन्ततः सारी आत्मा, शारीरिक सुखों में लिपटी और उलझी हुई, पृथ्वी पर ही अपना सुख ढूँढ़ती है।

इसलिए इस बुराई के उपचार के लिए प्रभु अपने सेवकों को नाना प्रकार के दुःखों में निरन्तर अभ्यास कराकर वर्तमान जीवन की व्यर्थता सिखाता है। ताकि वे इस जीवन में अपने लिए शान्ति और विश्राम की आशा न बाँधें, वह इसे प्रायः युद्धों, उपद्रवों, लूटपाट या अन्य हानियों से अशान्त और व्याकुल होने देता है।

ताकि वे नाशमान धन की अत्यधिक लालसा न करें, या जो उनके पास पहले से है उसी में सन्तुष्ट होकर न बैठ जाएँ, वह उन्हें निर्धनता में डाल देता है—कभी भूमि की बंजरता से, कभी आग से, और कभी किसी और साधन से—या फिर उन्हें साधारण स्थिति में सीमित रखता है।

ताकि वे विवाह में अत्यधिक सुख न मानें, वह या तो उन्हें कठोर और हठीली पत्नियाँ देता है जो उन्हें सताती हैं, या उन्हें दीन करने के लिए उद्दण्ड सन्तान देता है, या पत्नियों और बच्चों को छीनकर उन्हें पीड़ित करता है।

यदि वह इन सब बातों में उनसे कोमलता का व्यवहार करे, तौभी, ऐसा न हो कि वे मिथ्या अभिमान से फूल उठें या अव्यवस्थित भरोसे में अपने आपको बड़ा समझें, वह उन्हें रोगों और संकटों के द्वारा चेतावनी देता है, और मानो उनकी आँखों के सामने रख देता है कि मरणशील होने के अधीन सब सम्पत्तियाँ कितनी निर्बल और क्षणभंगुर हैं।

इसलिए हम क्रूस की शिक्षा के अधीन तब बहुत लाभ पाते हैं जब हम सीखते हैं कि वर्तमान जीवन, अपने आप में विचार किया जाए तो, अशान्ति और कष्ट से भरा है, पूर्णतः दुःखमय है और किसी भी बात में सचमुच सुखी नहीं; और यह कि उसकी सब बहुमूल्य मानी जानेवाली वस्तुएँ क्षणिक और अनिश्चित, तुच्छ और असंख्य दुःखों से मिली हुई हैं।

इससे हम निष्कर्ष निकालते हैं कि हमें यहाँ संघर्ष के सिवा और कुछ ढूँढ़ना या आशा करना नहीं चाहिए, और जब मुकुट दृष्टि में हो तब हमें अपनी आँखें स्वर्ग की ओर उठानी चाहिए। क्योंकि यह निश्चित है कि हमारे हृदय आनेवाले जीवन की अभिलाषा और मनन के लिए कभी गम्भीरता से नहीं उठेंगे जब तक वे पहले इस पार्थिव जीवन को तुच्छ जानने के लिए प्रेरित न हों।

इन दो छोरों के बीच कोई मध्य मार्ग नहीं: या तो पृथ्वी हमारे लिए तुच्छ हो जाए, या वह अपने प्रति असंयमी प्रेम से हमें बाँधे रखेगी। इसलिए यदि हमें अमरता की कुछ भी चिन्ता है, तो हमें इन बुरे बन्धनों से अपने आपको छुड़ाने का यत्नपूर्वक प्रयास करना चाहिए।

अब, क्योंकि वर्तमान जीवन में सदा हमें आकर्षित करने के लिए बहुत से सुख हैं और हमें लुभाने के लिए सुहावनेपन, शोभा और मधुरता का बड़ा आभास है, इसलिए हमें घड़ी-घड़ी उससे खींचे जाने की बड़ी आवश्यकता है, ऐसा न हो कि हम ऐसी चापलूसियों से धोखा खाएँ और मानो मोहित हो जाएँ।

क्योंकि मैं पूछता हूँ, क्या होता यदि हमें यहाँ निरन्तर सुख मिलता, जबकि इतने कोंचों से लगातार बेधे जाने पर भी हम अपनी दुर्दशा को पहचानने के लिए पर्याप्त नहीं जागते? न केवल विद्वान लोग मानते हैं कि मानव जीवन छाया या धुएँ के समान है, वरन् यह साधारण लोगों में भी एक प्रचलित कहावत है।

क्योंकि मनुष्यों ने देखा कि यह जानने की एक अत्यन्त उपयोगी बात है, इसलिए उन्होंने इसे अनेक सुन्दर वचनों में मनाया। तौभी संसार में ऐसी कोई बात नहीं जिस पर हम इससे अधिक लापरवाही से विचार करते हों या जिसे इससे कम याद रखते हों।

क्योंकि हम अपने सब काम ऐसे हाथ में लेते हैं मानो हमने पृथ्वी पर अपनी अमरता स्थापित कर ली हो। यदि किसी मृतक को गाड़ा जा रहा हो, या हम कब्रों के बीच किसी कब्रिस्तान में हों, तो क्योंकि तब मृत्यु का चित्र हमारी आँखों के सामने होता है, मैं मानता हूँ कि हम इस जीवन की नश्वरता के विषय में बहुत अच्छा दर्शन बघारते हैं—यद्यपि यह भी सदा नहीं होता, क्योंकि कभी-कभी ये बातें हमें ज़रा भी नहीं हिलातीं।

परन्तु जब यह होता भी है, तो यह एक क्षणिक दर्शन है जो हमारे पीठ फेरते ही उड़ जाता है और कोई स्मृति नहीं छोड़ता। क्योंकि न केवल मृत्यु को वरन् अपनी नश्वरता को भी भुलाकर, मानो हमने दोनों के विषय में कभी सुना ही न हो, हम फिर निश्चिन्तता और पृथ्वी की अमरता के मूर्खतापूर्ण भरोसे में गिर पड़ते हैं।

यदि कोई इस बीच हमें प्राचीन कहावत सुनाए कि मनुष्य एक दिन का प्राणी है, तो हम उसे सहर्ष मान लेते हैं, परन्तु इतने कम विचार के साथ कि यह धारणा हमारे हृदयों में दृढ़ता से जमी रहती है कि हमें यहाँ सदा जीना है।

तो फिर कौन इनकार करेगा कि हमारे लिए यह नितान्त आवश्यक है कि हमें न केवल चेताया जाए, वरन् हर सम्भव अनुभव से हमें विश्वास दिलाया जाए कि इस पार्थिव जीवन के विषय में मनुष्य की दशा कितनी दुःखद है? क्योंकि जब हमें इसका विश्वास हो भी चुका होता है, तब भी हम इस जीवन को इतना सराहना बन्द नहीं कर पाते कि लगभग उससे सुन्न हो जाते हैं, मानो उसमें सारा सुख समाया हो।

क्योंकि प्रभु को हमें इस प्रकार शिक्षा देना आवश्यक है, इसलिए हमारा कर्त्तव्य है कि उन चेतावनियों पर ध्यान दें जिनसे वह हमें हमारी लापरवाही से जगाता है, ताकि संसार को तुच्छ जानकर हम सारे मन से आनेवाले जीवन के चिन्तन की अभिलाषा करें।

तौभी विश्वासियों को वर्तमान जीवन के प्रति ऐसी तुच्छता का अभ्यास करना चाहिए जिससे न तो उसके प्रति घृणा उत्पन्न हो और न परमेश्वर के प्रति कृतघ्नता। क्योंकि यद्यपि यह जीवन असंख्य दुःखों से भरा है, तौभी यह उचित रूप से परमेश्वर की उन आशीषों में गिना जाता है जो तुच्छ जानने योग्य नहीं हैं।

इसलिए यदि हम उसमें परमेश्वर का कोई अनुग्रह न पहचानें, तो हम बड़ी कृतघ्नता के दोषी हैं। विशेषकर विश्वासियों के लिए तो यह प्रभु की कृपा का साक्षी होना चाहिए, क्योंकि यह पूर्णतः उनके उद्धार को आगे बढ़ाने के लिए ठहराया गया है।

क्योंकि अविनाशी महिमा का उत्तराधिकार हम पर पूर्ण रीति से प्रकट करने से पहले, प्रभु छोटी बातों में अपने आप को हमारा पिता घोषित करना चाहता है—अर्थात् उन भलाइयों में जो हम प्रतिदिन उसके हाथ से पाते हैं। इसलिए, जब यह जीवन हमें परमेश्वर की भलाई का ज्ञान कराने का काम करता है, तो क्या हम इसे ऐसा समझें मानो इसमें कोई भलाई है ही नहीं?

इसलिए हमारा ऐसा विचार और मनोभाव होना चाहिए कि हम इसे ईश्वरीय कृपा का ऐसा दान समझें जिसे ठुकराना नहीं चाहिए।

क्योंकि यदि पवित्रशास्त्र की साक्षियाँ न भी होतीं—जो निश्चय ही हैं—तब भी स्वभाव ही हमें प्रेरित करता कि हम परमेश्वर का धन्यवाद करें, क्योंकि उसने हमें सृजा और इस संसार में रखा, इसमें हमें बनाए रखता है, और यहाँ हमें थामे रखने के लिए जो कुछ आवश्यक है वह सब जुटाता है।

इसके अतिरिक्त, कृतज्ञता का और भी बड़ा कारण यह है कि वह हमें यहाँ अपने राज्य की महिमा के लिए तैयार कर रहा है। क्योंकि उसने ठहरा दिया है कि जिन्हें स्वर्ग में मुकुट पहनाया जाना है, वे पहले पृथ्वी पर युद्ध करें, ताकि वे तब तक जयवन्त न हों जब तक युद्ध की कठिनाइयों को पार करके विजय प्राप्त न कर लें।

एक और विचार भी बड़ा भार रखता है: यहाँ हम उसकी भलाइयों में उसकी कृपा की मधुरता का स्वाद चखना आरम्भ करते हैं, ताकि हमारी आशा और अभिलाषा उसके पूर्ण प्रकाशन को खोजने के लिए जगाई जाए।

जब हम यह स्थापित कर चुकें कि यह पार्थिव जीवन ईश्वरीय दया का दान है, जिसके लिए हम परमेश्वर के ऋणी हैं और हमें कृतज्ञ होना चाहिए, तब उसकी दुःखद दशा पर विचार करने का समय आएगा, ताकि हम उस अत्यधिक मोह से अपने आपको छुड़ाएँ जिसकी ओर, जैसा हमने दिखाया है, हम सब स्वभावतः झुके हैं।

इस जीवन के अव्यवस्थित प्रेम में से जो कुछ हम घटाएँ, उसे स्वर्गीय जीवन की ओर लगा देना चाहिए।

मैं सहर्ष मानता हूँ कि जिन्होंने सर्वोच्च भलाई यह ठहराई कि कभी जन्म ही न लिया जाए, और दूसरी श्रेष्ठ बात यह कि शीघ्र मर जाया जाए, उन्होंने अपनी मानवीय समझ के अनुसार ठीक विचार किया। क्योंकि वे अन्यजाति थे, परमेश्वर और सच्चे धर्म के प्रकाश से वंचित, तो वे इस पार्थिव जीवन में दुःख और भय के सिवा और क्या देख सकते थे?

और यह बिना कारण नहीं था कि स्कूथी लोग अपने बच्चों के जन्म पर रोते थे, और जब उनके सम्बन्धियों में से कोई मरता तो आनन्द मनाते और भोज करते थे। फिर भी इससे उन्हें कुछ लाभ नहीं हुआ। क्योंकि विश्वास की सच्ची शिक्षा के अभाव में उन्होंने न देखा कि जो अपने आप में न धन्य है न वांछनीय, वह विश्वासियों के उद्धार के लिए कैसे ठहरता है। इसलिए उनके निर्णय का परिणाम निराशा था।

इसलिए परमेश्वर के सेवक इस मरणशील जीवन का मूल्यांकन करते समय सदा यही उद्देश्य दृष्टि में रखें: कि यह देखकर कि इसमें दुःख के सिवा कुछ नहीं, वे भावी और अनन्त जीवन पर मनन करने के लिए और अधिक स्वतन्त्र और तैयार हो जाएँ।

जब वे दोनों की तुलना करेंगे, तो वे न केवल वर्तमान जीवन को हल्का समझ सकेंगे वरन् उसे तुच्छ जान सकेंगे और आनेवाले जीवन की तुलना में उसे कुछ भी न समझ सकेंगे।

क्योंकि यदि स्वर्ग हमारा देश है, तो पृथ्वी प्रवास और निर्वासन के स्थान के सिवा और क्या है? यदि इस संसार से कूच करना जीवन में प्रवेश है, तो यह संसार कब्र के सिवा और क्या है, और इसमें बने रहना मृत्यु में डूबे रहने के सिवा और क्या है? यदि इस देह से छूटना स्वतन्त्रता है, तो देह बन्दीगृह के सिवा और क्या है? और यदि हमारा परम सुख परमेश्वर की उपस्थिति के आनन्द में है, तो उससे वंचित रहना क्या दुर्दशा नहीं?

अब जब तक हम इस संसार से कूच न करें, हम मानो परमेश्वर से दूर रहते हैं। इसलिए यदि पार्थिव जीवन की तुलना स्वर्गीय जीवन से की जाए, तो इसमें सन्देह नहीं कि उसे तुच्छ जाना और लगभग कूड़ा समझा जा सकता है।

यह सच है कि हमें इस जीवन से कभी घृणा नहीं करनी चाहिए, सिवाय उस सीमा तक जहाँ तक यह हमें पाप की दासता में रखता है—यद्यपि सच पूछो तो यह भी स्वयं जीवन के माथे नहीं मढ़ा जाना चाहिए।

जो भी हो, हमें इससे ऐसी रीति से थकना और असन्तुष्ट होना चाहिए कि इसका अन्त देखने की अभिलाषा रखते हुए भी हम परमेश्वर की भली इच्छा के अनुसार इसमें बने रहने को तैयार रहें, ताकि हमारी थकावट हर प्रकार की कुड़कुड़ाहट और अधीरता से मुक्त रहे।

क्योंकि यह जीवन एक चौकी के समान है जिसमें प्रभु ने हमें रखा है और जिसमें हमें तब तक रहना है जब तक वह हमें बुला न ले। सन्त पौलुस अपनी दशा पर विलाप करता है क्योंकि वह अपनी इच्छा से अधिक समय तक मानो अपनी देह के बन्दीगृह में बँधा रोका गया है, और छूटने की प्रबल लालसा से आहें भरता है।

—रोमियों 7:24; फिलिप्पियों 1:23

तौभी, परमेश्वर की इच्छा के अधीन रहने के लिए, वह जीवन या मृत्यु दोनों के लिए अपने आपको तैयार घोषित करता है, क्योंकि वह जानता है कि चाहे जीकर चाहे मरकर, परमेश्वर के नाम की महिमा करना उस पर उसका ऋण है। उसकी महिमा के लिए क्या हितकर है, यह ठहराना प्रभु का काम है।

इसलिए यदि हमें उसके लिए जीना और मरना है, तो हम अपने जीवन और अपनी मृत्यु दोनों को उसकी भली इच्छा पर छोड़ दें। तथापि, साथ ही हम सदा मृत्यु की अभिलाषा करें और उस पर निरन्तर मनन करें, आनेवाली अमरता की तुलना में इस मरणशील जीवन को तुच्छ जानकर, और जब कभी प्रभु को भाए इसे त्याग देने की इच्छा रखकर, क्योंकि यह हमें पाप की दासता में रखता है।

फिर भी यह एक विकट बात है कि बहुत से लोग जो मसीही होने का घमण्ड करते हैं, मृत्यु की अभिलाषा करने के बदले उससे ऐसा भय खाते हैं कि जैसे ही उसका नाम सुनते हैं, काँप उठते हैं मानो यह उन पर पड़नेवाली सब से बड़ी विपत्ति हो।

यदि देह का आत्मा से अलग किया जाना सुनकर हमारी स्वाभाविक अनुभूति हिल जाए और डर जाए तो आश्चर्य नहीं। परन्तु यह नितान्त असह्य है कि मसीही हृदय में इतना प्रकाश न हो कि इस भय को, जैसा भी हो, कहीं बड़ी सान्त्वना से जीतकर दबा दे।

क्योंकि यदि हम विचार करें कि हमारी देह का तम्बू—निर्बल, दोषपूर्ण, नाशमान, क्षीण और क्षय की ओर झुका हुआ—उतारा जाता है और मानो ढाया जाता है, ताकि बाद में वह सिद्ध, स्थायी, अविनाशी और स्वर्गीय महिमा में फिर से खड़ा किया जाए, तो क्या विश्वास हमें विवश न करेगा कि हम उसकी तीव्र अभिलाषा करें जिससे स्वभाव भागता और घृणा करता है?

यदि हम विचार करें कि मृत्यु के द्वारा हम एक दुःखद निर्वासन से बुलाकर अपने देश में—वरन् अपने स्वर्गीय देश में—बसाए जाते हैं, तो क्या हम इससे विशेष सान्त्वना न पाएँगे?

परन्तु कोई आपत्ति करेगा कि सब वस्तुएँ अपने अस्तित्व में बने रहना चाहती हैं। मैं यह मानता हूँ। इसी कारण मैं कहता हूँ कि हमें आनेवाली अमरता की अभिलाषा करनी चाहिए, जहाँ हमारी ऐसी स्थिर और टिकाऊ दशा होगी जैसी पृथ्वी पर कहीं दिखाई नहीं देती।

क्या यह उचित है कि पशु, वरन् लकड़ी और पत्थर तक की अचेतन सृष्टि, जिसे मानो अपनी व्यर्थता और भ्रष्टता का कुछ बोध है, उससे छुड़ाए जाने के लिए न्याय के दिन की बाट जोहे, जबकि हम—जिनके पास पहले कुछ स्वाभाविक समझ है और फिर परमेश्वर की आत्मा से प्रकाशित हैं—जब हमारा अपना अस्तित्व दाँव पर है, इस पार्थिव भ्रष्टता से ऊपर अपनी आँखें उठाने में चूक जाएँ?

—रोमियों 8:19–22

परन्तु इतनी बड़ी विकृति के विरुद्ध यहाँ विस्तार से तर्क करना मेरा अभिप्राय नहीं। वस्तुतः मैंने आरम्भ में ही घोषित कर दिया था कि मैं यहाँ हर विषय को लम्बे उपदेश के रूप में प्रस्तुत करना नहीं चाहता।

ऐसे डरपोक स्वभाव के लोगों को मैं सन्त साइप्रियन की पुस्तक मृत्यु के विषय में पढ़ने की सलाह देता, यदि वे इस योग्य न होते कि उन्हें दार्शनिकों के पास भेजा जाए, जिनमें वे मृत्यु के प्रति ऐसी तुच्छता पाएँगे जो उन्हें लज्जित कर दे।

तथापि हमें इस सिद्धान्त को दृढ़ता से थामे रहना चाहिए: मसीह की पाठशाला में उचित उन्नति उसी ने की है जो मृत्यु के दिन और अन्तिम पुनरुत्थान की बाट आनन्द और उल्लास से जोहता है। क्योंकि सन्त पौलुस सब विश्वासियों का वर्णन इसी चिह्न से करता है, और पवित्रशास्त्र जब कभी हमारे सामने आनन्द का कारण रखना चाहता है तो हमें वहीं ले जाता है:

“आनन्दित हो और अपने सिर ऊपर उठाओ, क्योंकि तुम्हारा छुटकारा निकट है।”

—लूका 21:28

मैं पूछता हूँ, यह कैसी बुद्धि है कि जिसे यीशु मसीह ने आनन्द का उचित कारण माना, वह हम में शोक और भय के सिवा कुछ उत्पन्न न करे? यदि ऐसा है, तो हम उसके चेले होने का घमण्ड क्यों करते हैं?

इसलिए आओ, हम अधिक सही निर्णय की ओर लौटें। चाहे हमारे अन्धे और निर्बुद्धि शरीर की अभिलाषा विरोध करे, तौभी हम प्रभु के आगमन की लालसा एक परम धन्य घटना के रूप में करने में हिचकिचाएँ नहीं—केवल सादी अभिलाषा से नहीं, वरन् कराहते और आहें भरते हुए।

क्योंकि वह हमारे पास छुड़ानेवाले के रूप में आएगा, कि हमें हर बुराई और दुःख के इस गर्त से छुड़ाए और अपनी महिमा के उत्तराधिकार में पहुँचाए।

जब तक विश्वासी पृथ्वी पर रहते हैं, उन्हें वध के लिए ठहराई गई भेड़ों के समान होना है, ताकि वे अपने सिर यीशु मसीह के अनुरूप बनें। इसलिए यदि वे अपने मन को ऊपर न उठाएँ, कि संसार की हर वस्तु से ऊपर उठकर उन बातों से परे देखें जो इस समय उनके सामने हैं, तो वे अत्यन्त अभागे होंगे।

परन्तु जब वे अपने विचारों को पार्थिव बातों से ऊपर उठा लेंगे, तो अपने दुःखों के बीच अपने आपको ढाढ़स देना उनके लिए सरल होगा। वे देख सकते हैं कि दुष्ट लोग धन और मान में फल-फूल रहे हैं, शान्ति भोग रहे हैं और अपनी सब अभिलाषित वस्तुएँ रखते हैं, सुख और ठाठ-बाट से जी रहे हैं। उनके हाथों उनके साथ अमानवीय व्यवहार भी हो सकता है, वे उनके अपमान सह सकते हैं, लूटे जा सकते हैं, या हर प्रकार का अत्याचार झेल सकते हैं। तौभी वे उस अन्तिम दिन को सदा अपनी आँखों के सामने रखेंगे जब वे जानते हैं कि प्रभु अपने विश्वासियों को अपने राज्य के विश्राम में इकट्ठा करेगा, उनकी आँखों से हर आँसू पोंछ देगा, उन्हें महिमा का मुकुट पहनाएगा, उन्हें आनन्द के वस्त्र ओढ़ाएगा, अपने सुखों की असीम मधुरता से उन्हें तृप्त करेगा, उन्हें अपनी ही ऊँचाई तक उठाएगा, और संक्षेप में उन्हें अपनी धन्यता में सहभागी करेगा।

दूसरी ओर, वह उन दुष्टों को जिन्होंने पृथ्वी पर अपने आपको ऊँचा उठाया, घोर अपमान में डाल देगा। वह उनके सुखों को भयानक यातनाओं से बदल देगा, उनकी हँसी और आनन्द को रोने और दाँत पीसने से, और उनके चैन को विवेक की भयंकर पीड़ा से। संक्षेप में, वह उन्हें अनन्त आग में डाल देगा और उन्हें उन विश्वासियों के अधीन कर देगा जिनके साथ उन्होंने दुष्टता से व्यवहार किया।

यही वस्तुतः हमारी एकमात्र सान्त्वना है। यदि यह छीन ली जाए, तो या तो हमें साहस खो देना होगा, या अपने आपको व्यर्थ और तुच्छ सान्त्वनाओं से बहलाना और भरमाना होगा जिनका अन्त हमारे विनाश में होगा।

क्योंकि भविष्यद्वक्ता स्वयं मानता है कि जब वह दुष्टों की वर्तमान समृद्धि पर अत्यधिक ध्यान लगाए रहा, तब वह डगमगा गया और उसके पाँव लगभग फिसल गए थे। वह तब तक दृढ़ न रह सका जब तक उसने अपने विचारों को परमेश्वर के पवित्रस्थान पर मनन करने की ओर न फेरा—अर्थात् जब तक उसने न सोचा कि धर्मियों और दुष्टों का अन्तिम परिणाम क्या होगा।

—भजन संहिता 73:2–17

एक शब्द में निष्कर्ष यह कि मसीह का क्रूस अन्ततः विश्वासियों के हृदयों में शैतान, शरीर, पाप, मृत्यु और दुष्टों पर जयवन्त होता है, जब वे भी उसके पुनरुत्थान की सामर्थ्य को देखने के लिए अपनी आँखें फेरते हैं।

इसी शिक्षा के द्वारा पवित्रशास्त्र हमें पार्थिव वस्तुओं के उचित उपयोग की भी शिक्षा देता है, जिस विषय की अवहेलना नहीं होनी चाहिए जब हम अपने जीवन को ठीक रीति से व्यवस्थित करने पर विचार करते हैं। क्योंकि यदि हमें जीना है, तो जीवन के लिए आवश्यक सहायक वस्तुओं का भी उपयोग करना होगा। वस्तुतः हम उन वस्तुओं से भी पूर्णतः दूर नहीं रह सकते जो आवश्यकता की अपेक्षा सुख की सेवा करती प्रतीत होती हैं।

इसलिए हमें उचित मर्यादा का पालन करना चाहिए, ताकि हम इन वस्तुओं का उपयोग शुद्ध और स्वस्थ विवेक से करें, अपनी आवश्यकता के लिए भी और अपने आनन्द के लिए भी। परमेश्वर हमें यह मर्यादा तब दिखाता है जब वह सिखाता है कि वर्तमान जीवन उसके सेवकों के लिए एक तीर्थयात्रा के समान है जिससे वे स्वर्गीय राज्य की ओर यात्रा करते हैं।

यदि हम पृथ्वी पर से केवल होकर जा रहे हैं, तो इसमें सन्देह नहीं कि हमें उसकी वस्तुओं का उपयोग इस प्रकार करना चाहिए कि वे हमारी यात्रा में बाधा न बनकर उसे आगे बढ़ाएँ। परन्तु क्योंकि यह विषय कठिन है, और दोनों छोरों में से किसी में गिर पड़ने का संकट है, इसलिए आओ हम एक निश्चित नियम ठहराने का यत्न करें जिससे हम निर्भय होकर अपने आपको चला सकें।

कुछ भले और पवित्र पुरुष हुए हैं जिन्होंने, यह देखकर कि मनुष्यों का असंयम, कठोरता से रोका न जाए तो, प्रतिदिन बेलगाम स्वच्छन्दता से फूट पड़ता है इतनी बड़ी बुराई का सुधार इस प्रकार करना चाहा कि मनुष्य को शारीरिक वस्तुओं का उपयोग केवल उतना ही करने दिया जाए जितना आवश्यक हो। उन्होंने यह इसलिए किया कि उन्हें और कोई उपचार नहीं सूझा।

उनकी सम्मति वस्तुतः भले अभिप्राय से निकली थी, परन्तु वे उसे अत्यधिक कठोरता तक ले गए। क्योंकि उन्होंने एक बहुत संकटपूर्ण काम किया: उन्होंने विवेकों को परमेश्वर के वचन के बन्धन से भी अधिक कसकर बाँध दिया।

दूसरी ओर, आज बहुत से लोग हैं जो बाहरी वस्तुओं के उपयोग में हर प्रकार के असंयम को क्षमा करने का बहाना और उस शरीर को खुली छूट देने का बहाना ढूँढ़ते हैं जो पहले ही सब सीमाएँ लाँघने को बहुत उतावला है। वे एक ऐसा सिद्धान्त मानकर चलते हैं जिसे मैं स्वीकार नहीं करता: कि इस स्वतन्त्रता को किसी संयम से रोका न जाए, वरन् हर व्यक्ति के विवेक को अनुमति हो कि जैसा वह उचित समझे वैसा इसका उपयोग करे।

मैं सहर्ष मानता हूँ कि इस विषय में हम न तो विवेकों को निश्चित सूत्रों और विधियों में बाँध सकते हैं और न हमें बाँधना चाहिए। परन्तु जब पवित्रशास्त्र हमें उचित उपयोग के लिए सामान्य नियम देता है, तो उस उपयोग को उन्हीं के अनुसार नियमित क्यों न किया जाए?

पहले, हमें यह मानना चाहिए कि परमेश्वर के दानों का उपयोग तब अव्यवस्थित नहीं होता जब वह उस उद्देश्य की ओर निर्देशित हो जिसके लिए परमेश्वर ने उन्हें सृजा और ठहराया, क्योंकि उसने उन्हें हमारी भलाई के लिए सृजा, हमारी हानि के लिए नहीं। इसलिए जो उस उद्देश्य पर सावधानी से विचार करता है, उससे अधिक सीधे मार्ग पर कोई न चलेगा।

यदि हम विचार करें कि परमेश्वर ने भोजन क्यों बनाया, तो हम पाएँगे कि उसका अभिप्राय केवल हमारी आवश्यकता की पूर्ति ही नहीं वरन् हमारा आनन्द और ताज़गी भी था। इसी प्रकार वस्त्रों में, आवश्यकता के अतिरिक्त, उसने शोभा और औचित्य को भी ध्यान में रखा।

जड़ी-बूटियों, वृक्षों और फलों में, उनसे मिलनेवाले नाना लाभों के अतिरिक्त, उसका अभिप्राय यह था कि वह उनकी सुन्दरता से हमारी दृष्टि को आनन्दित करे और उनकी सुगन्ध से हमें और सुख दे। क्योंकि यदि यह सच न होता, तो भविष्यद्वक्ता परमेश्वर की भलाइयों में यह न गिनता कि दाखमधु मनुष्य के हृदय को आनन्दित करता है और तेल उसके मुख को चमकाता है।

—भजन संहिता 104:15

और न पवित्रशास्त्र परमेश्वर की कृपा की प्रशंसा में बार-बार यह बताता कि उसने ये सब भली वस्तुएँ मनुष्य को दी हैं। वस्तुतः वस्तुओं में स्वभाव से जो उत्तम गुण हैं, वे हमें दिखाते हैं कि हमें उनका आनन्द कैसे, किस उद्देश्य से और किस सीमा तक लेना चाहिए।

क्या हम समझते हैं कि हमारा प्रभु फूलों को हमारी आँखों के सामने प्रस्तुत होने के लिए ऐसी सुन्दरता देता, यदि उन्हें देखकर कुछ भी सुख पाना अनुचित होता? क्या हम समझते हैं कि वह उन्हें ऐसी मनभावनी सुगन्ध देता, यदि उसका अभिप्राय यह न होता कि मनुष्य उन्हें सूँघकर आनन्दित हो?

इसके अतिरिक्त, क्या उसने रंगों में ऐसा भेद नहीं किया कि कुछ दूसरों से अधिक सुन्दर हैं? क्या उसने सोने, चाँदी, हाथीदाँत और संगमरमर को विशेष चमक नहीं दी, जिससे वे अन्य धातुओं और पत्थरों से अधिक बहुमूल्य और श्रेष्ठ ठहरते हैं? अन्ततः, क्या उसने हमें बहुत-सी ऐसी वस्तुएँ नहीं दीं जिन्हें हमें मूल्यवान समझना चाहिए, यद्यपि वे हमारे लिए आवश्यक नहीं?

इसलिए आओ, हम उस अमानवीय दर्शन को ठुकराएँ जो मनुष्य को परमेश्वर की सृष्टि का उपयोग केवल नितान्त आवश्यकता से अधिक करने न देकर, न केवल बिना कारण हमें ईश्वरीय उदारता के उचित आनन्द से वंचित करता है, वरन् उसका पालन तब तक हो ही नहीं सकता जब तक वह मनुष्य को हर अनुभूति से रहित करके काठ का कुन्दा न बना दे।

फिर भी, दूसरी ओर, हमें अपने शरीर की उन अभिलाषाओं से भी उतनी ही सावधानी से बचना चाहिए जो रोकी न जाएँ तो बिना मर्यादा के फूट पड़ती हैं। इसके अतिरिक्त, जैसा मैं कह चुका हूँ, कुछ लोग हैं जो स्वतन्त्रता के बहाने शरीर को सब कुछ करने देते हैं।

इसलिए उसे पहले इस नियम से रोका जाना चाहिए: जितनी भली वस्तुएँ हमारे पास हैं, वे सब हमारे लिए इसीलिए सृजी गईं कि हम उनके रचयिता को पहचानें और धन्यवाद के साथ उसकी कृपा को बड़ा मानें।

परन्तु धन्यवाद कहाँ रहेगा यदि तू पेटूपन के कारण अपने ऊपर इतना भोजन और दाखमधु लाद ले कि तू संवेदनहीन और परमेश्वर की सेवा करने और अपनी बुलाहट के कर्त्तव्य निभाने के अयोग्य हो जाए?

परमेश्वर की पहचान कहाँ रही यदि अत्यधिक बहुतायत से उभारा गया शरीर लज्जाजनक अभिलाषाओं में पड़कर समझ को अपनी अशुद्धता से तब तक संक्रमित करे जब तक वह उसे अन्धा न कर दे और भले-बुरे में भेद करने की क्षमता न छीन ले?

जो वस्त्र परमेश्वर हमें देता है, उसके लिए हम उसका धन्यवाद कैसे करेंगे यदि उनकी भड़कीली शान हमें घमण्डी बनाए और दूसरों को तुच्छ जानने का कारण बने? यदि उनका प्रदर्शन व्यभिचार का साधन बने, तो मैं पूछता हूँ, हम अपने परमेश्वर को कैसे मानेंगे यदि हमारी आँखें अपने वस्त्रों की चमक-दमक को सराहने में लगी हों?

यही बात हर अन्य प्रकार की सम्पत्ति के विषय में कही जा सकती है। इसलिए यह प्रकट है कि यह विचार परमेश्वर के दानों के दुरुपयोग की स्वच्छन्दता पर पहले से ही कुछ रोक लगा देता है।

परन्तु मनुष्य को वर्तमान जीवन को तुच्छ जानने और स्वर्गीय अमरता पर मनन करने की ओर ले आने से अधिक निश्चित या छोटा मार्ग और कोई नहीं, क्योंकि इससे दो नियम निकलते हैं।

पहला यह कि जो इस संसार का उपयोग करते हैं वे इससे इतने कम लिप्त हों मानो उपयोग ही नहीं करते; जो विवाह करते हैं, मानो विवाहित नहीं; और जो मोल लेते हैं, मानो उनके पास कुछ नहीं, जैसी सन्त पौलुस की आज्ञा है।

—1 कुरिन्थियों 7:29–31

दूसरा यह कि हम निर्धनता को उतने ही धीरज और शान्ति से सहना सीखें जितना संयम से हम बहुतायत का उपयोग करते हैं।

जब सन्त पौलुस हमें आज्ञा देता है कि इस संसार का उपयोग ऐसे करें मानो उपयोग नहीं करते, तो वह न केवल खाने-पीने में सब असंयम, हर प्रकार की विलासिता, अत्यधिक महत्त्वाकांक्षा, घमण्ड और भवनों, वस्त्रों और रहन-सहन की अति चिन्ता को काट डालता है; वरन् वह हर उस चिन्ता और लगाव को भी सुधारता है जो हमें स्वर्गीय जीवन पर विचार करने और अपनी आत्माओं को उनके सच्चे आभूषणों से सँवारने से भटकाता या रोकता है।

बहुत पहले कातो ने सच कहा था कि जहाँ बाहरी दिखावे की बड़ी चिन्ता होती है, वहाँ सद्गुण की बड़ी उपेक्षा होती है। इसी प्रकार एक प्राचीन कहावत है कि जो अपनी देह को लाड़-प्यार करने और सजाने में बहुत ध्यान लगाते हैं, वे अपनी आत्माओं की बहुत कम परवाह करते हैं।

इसलिए यद्यपि बाहरी वस्तुओं में विश्वासियों की स्वतन्त्रता निश्चित सूत्रों में बाँधी नहीं जानी चाहिए, तौभी वह इस नियम के अधीन है: कि वे अपने आपको यथासम्भव कम छूट दें। इसके विपरीत, उन्हें हर अनावश्यक वस्तु और बहुतायत के हर व्यर्थ प्रदर्शन को काट डालने में सजग रहना चाहिए, असंयम में अपने आपको खो देना तो दूर की बात है। उन्हें सावधानी से इस बात की रखवाली करनी चाहिए कि जो वस्तुएँ सहायक होनी चाहिए वे बाधा न बन जाएँ।

दूसरा नियम यह है कि जो निर्धनता में जीते हैं वे अपने अभाव की वस्तुओं के बिना धीरज से रहना सीखें, ऐसा न हो कि वे अत्यधिक चिन्ता से पीड़ित हों। जो इस संयम को बनाए रख सकते हैं उन्होंने प्रभु की पाठशाला में कम उन्नति नहीं की। दूसरी ओर, जिसने इस विषय में कोई उन्नति नहीं की, उसके पास शायद ही कुछ होगा जिससे वह अपने आपको मसीह का चेला प्रमाणित करे।

पार्थिव वस्तुओं की लालसा के साथ चलनेवाले अनेक अन्य दोषों के अतिरिक्त, लगभग सदा ऐसा होता है कि जो निर्धनता को अधीरता से सहता है, वह बहुतायत से घिरा होने पर उसके विपरीत दोष दिखाता है।

इससे मेरा तात्पर्य यह है कि जो साधारण वस्त्र से लज्जित होता है, वह महँगे वस्त्र पर घमण्ड करेगा। जो थोड़े भोजन से असन्तुष्ट होकर उससे उत्तम की लालसा में अपने आपको सताता है, वह भरी-पूरी मेज़ पर पहुँचकर संयमी न रह सकेगा। जो दीन और अप्रसिद्ध दशा को बिना व्याकुल और असन्तुष्ट हुए नहीं सह सकता, वह यदि किसी मान के पद पर पहुँच जाए तो घमण्ड और अहंकार से अपनी रक्षा न कर सकेगा।

इसलिए जो भी बिना कपट परमेश्वर की सेवा करना चाहते हैं, उन्हें प्रेरित के उदाहरण पर चलकर बहुतायत और अभाव दोनों को सहना जानने का यत्न करना चाहिए—अर्थात् बहुतायत के बीच संयमी रहना और निर्धनता के बीच धीरज से सन्तुष्ट रहना।

—फिलिप्पियों 4:12

पवित्रशास्त्र पार्थिव वस्तुओं के उपयोग को नियमित करने के लिए हमें एक तीसरा नियम देता है, जिसे हमने प्रेम की आज्ञाओं की चर्चा करते समय संक्षेप में छुआ था। वह सिखाता है कि यद्यपि सब वस्तुएँ हमें परमेश्वर की कृपा से दी गई हैं और हमारे लाभ के लिए ठहराई गई हैं, तौभी वे हमें धरोहर के रूप में सौंपी गई हैं जिनका हमें एक दिन लेखा देना है।

इसलिए हमें उन्हें इस प्रकार सँभालना चाहिए कि हम सदा इस वाक्य को स्मरण रखें: जो कुछ हमारे प्रभु ने हमारी देखरेख में सौंपा है, उस सब का हमें लेखा देना है।

इसके अतिरिक्त, हमें विचार करना चाहिए कि हमसे लेखा कौन माँगता है: स्वयं परमेश्वर। जैसे उसने संयम, सादगी, इन्द्रियनिग्रह और विनम्रता की दृढ़ता से सराहना की है, वैसे ही वह हर प्रकार के असंयम, घमण्ड, दिखावे और व्यर्थता से घृणा करता है। वह उसी भण्डारीपन को स्वीकार करता है जो प्रेम से नियमित हो, और अपने ही मुख से उसने हर उस सुख को दोषी ठहराया है जो मानव हृदय को पवित्रता और शुद्धता से फेर दे या समझ को मन्द कर दे।

हमें यह भी यत्नपूर्वक देखना चाहिए कि परमेश्वर हम में से प्रत्येक को आज्ञा देता है कि अपने जीवन के सब कार्यों में अपनी बुलाहट को ध्यान में रखे। क्योंकि वह जानता है कि मानव मन बेचैनी से कैसे जलता है, वह कितनी सरलता से इधर-उधर बहा जाता है, और महत्त्वाकांक्षा और लालसा उसे एक साथ अनेक भिन्न बातें अपनाने को कैसे उकसाती है।

इसलिए, ऐसा न हो कि हम अपनी मूर्खता और उतावलेपन से सब कुछ उलट-पुलट कर दें, उसने नाना दशाओं और जीवन-पद्धतियों को अलग-अलग ठहराया और हर एक के लिए ठहरा दिया कि उसे क्या करना चाहिए। और ऐसा न हो कि कोई लापरवाही से अपनी सीमाओं को लाँघे, उसने इन जीवन-पद्धतियों को बुलाहट कहा है।

इसलिए प्रत्येक को अपनी दशा को परमेश्वर की ओर से सौंपी गई चौकी समझना चाहिए, ताकि वह अपने जीवन की सारी यात्रा में बिना सोचे-समझे इधर-उधर भटकता और मारा-मारा न फिरे।

यह भेद इतना आवश्यक है कि हमारे सब काम परमेश्वर के सामने इसी के अनुसार परखे जाते हैं—और प्रायः मानवीय या दार्शनिक बुद्धि के निर्णय से बहुत भिन्न रीति से। न केवल साधारण लोग वरन् दार्शनिक भी अपने देश को अत्याचारी से छुड़ाना सोचे जा सकनेवाले कामों में सब से उत्तम और श्रेष्ठ मानते हैं। फिर भी जो निजी व्यक्ति अत्याचारी को मार डालता है, उसे परमेश्वर की वाणी स्पष्ट दोषी ठहराती है।

तथापि मेरा अभिप्राय उन सब उदाहरणों पर ठहरना नहीं जो दिए जा सकते हैं। हमारे लिए इतना पहचानना काफ़ी है कि परमेश्वर की बुलाहट ही वह सिद्धान्त और नींव है जिससे हमें हर बात में अपने आपको ठीक रीति से चलाना है, और जो उसके अनुसार अपने आपको नहीं चलाता, वह अपना कर्त्तव्य विश्वासयोग्यता से निभाने में कभी सीधे मार्ग पर न रहेगा।

वह कभी-कभी ऐसा काम कर सकता है जो बाहर से प्रशंसनीय दिखे, परन्तु मनुष्यों में उसकी चाहे जो प्रतिष्ठा हो, वह परमेश्वर के सिंहासन के सामने स्वीकार न होगा।

इसके अतिरिक्त, जब तक हम अपनी बुलाहट को स्थायी नियम के रूप में न थामें, हमारे जीवन के नाना अंशों में कोई स्थिर क्रम या संगति न होगी। इसलिए जिसने अपने जीवन को इस लक्ष्य की ओर लगाया है, उसने उसे अत्यन्त उत्तम रीति से व्यवस्थित किया है।

इससे हमें अनुपम सान्त्वना मिलती है: कोई काम इतना तुच्छ या नीच नहीं जो परमेश्वर के सामने चमके नहीं और उसकी दृष्टि में अत्यन्त बहुमूल्य न हो, बशर्ते उसे करते हुए हम अपनी बुलाहट की सेवा करें।

समाप्त।

विषय-सूची

इस संस्करण पर टिप्पणी

वर्तमान पुस्तक का सार

फ्रांसीसियों के राजा फ्रांसिस प्रथम को समर्पण

अध्याय एक: परमेश्वर का ज्ञान

अध्याय दो: मनुष्य का ज्ञान और स्वतन्त्र इच्छा

अध्याय तीन: परमेश्वर की व्यवस्था का प्रकाशन

अध्याय चार: विश्वास के विषय में, जिसमें प्रेरितों के विश्वास-वचन की व्याख्या की गई है

अध्याय पाँच: पश्चाताप

अध्याय छह: विश्वास से धर्मी ठहराए जाने और कर्मों की योग्यता के विषय में अध्याय सात: पुरानी और नई वाचा की समानताओं और भिन्नताओं के विषय में

अध्याय आठ: परमेश्वर की पूर्वनियति और विधान के विषय में

अध्याय नौ: प्रार्थना के विषय में; प्रभु की प्रार्थना की व्याख्या

अध्याय दस: संस्कारों के विषय में

अध्याय ग्यारह: बपतिस्मा का अर्थ

अध्याय बारह: प्रभु-भोज का अर्थ

अध्याय तेरह: संस्कार कहलानेवाले उन पाँच अन्य अनुष्ठानों के विषय में जो झूठे हैं: दृढ़ीकरण, प्रायश्चित्त-विधि, अन्तिम अभिषेक, कलीसियाई पद-नियुक्ति और विवाह

अध्याय चौदह: मसीही स्वतन्त्रता के विषय में

अध्याय पन्द्रह: कलीसिया का अधिकार

अध्याय सोलह: नागरिक शासन के विषय में

अध्याय सत्रह: मसीही जीवन के विषय में

↑