अध्याय 5

अध्याय दो: मनुष्य का ज्ञान और स्वतंत्र इच्छा (भाग 1/4)

Institutes of the Christian Religion (1541) · John Calvin

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अध्याय दो: मनुष्य का ज्ञान और स्वतंत्र इच्छा (भाग 1/4)

अध्याय दो

मनुष्य का ज्ञान और स्वतंत्र इच्छा

यह बिना कारण नहीं है कि प्राचीन कहावत ने मनुष्य को सदा अपने आप को जानने की इतनी दृढ़ता से सलाह दी है। क्योंकि यदि मानव-जीवन से सम्बन्ध रखनेवाली बातों से अनजान रहना हम लज्जा की बात समझते हैं, तो अपने आप से अनजान रहना कहीं अधिक अपमानजनक है, क्योंकि इसी के कारण हम सब आवश्यक बातों पर विचार करते समय अपने आप को दयनीय रूप से धोखा देते हैं और पूरी तरह अन्धे रह जाते हैं।

परन्तु यह आज्ञा जितनी अधिक उपयोगी है, उतनी ही अधिक सावधानी से हमें इसे ग़लत समझने से बचना चाहिए—जैसा कि हम देखते हैं कि कुछ दार्शनिकों के साथ हुआ है। क्योंकि जब वे मनुष्य को अपने आप को जानने की चेतावनी देते हैं, तो तुरन्त उसे अपनी ही प्रतिष्ठा और श्रेष्ठता पर विचार करने की ओर मोड़ देते हैं। वे उसके सामने ऐसी ही बातें रखते हैं जिनसे वह व्यर्थ भरोसे में ऊँचा उठाया जाए और घमण्ड से फूल जाए।

परन्तु परमेश्वर का सत्य हमें आज्ञा देता है कि अपने विषय में विचार करते समय हम कुछ बहुत भिन्न बात खोजें: अर्थात् ऐसा ज्ञान जो हमें अपनी सामर्थ्य के हर अहंकार से बहुत दूर खींच ले जाए, घमण्ड करने के हर आधार को हमसे छीन ले, और हमें दीनता तक पहुँचाए। यदि हम ठीक निर्णय करने और ठीक आचरण करने के लक्ष्य को पाना चाहते हैं, तो हमें इसी नियम पर चलना चाहिए।

मैं जानता हूँ कि मनुष्य को अपने दानों और श्रेष्ठताओं को स्वीकार करने की ओर ले जाया जाना, अपनी दरिद्रता, अप्रतिष्ठा, लज्जा और दुर्बलता को सुनने और देखने से कितना अधिक प्रिय लगता है। क्योंकि मानव-मन को इससे अधिक किसी बात की अभिलाषा नहीं कि वह मीठे शब्दों और चापलूसियों से मिठास पाए। इसलिए जब कोई मनुष्य अपने गुणों की प्रशंसा सुनता है, तो वह अपने पक्ष में कही गई हर बात पर विश्वास करने की ओर अत्यधिक झुक जाता है।

इसलिए यह आश्चर्य की बात नहीं कि संसार का अधिकांश भाग इस विषय में भटक गया है। क्योंकि मनुष्यों में अपने प्रति एक अव्यवस्थित और अन्धा प्रेम होता है, इसलिए वे स्वेच्छा से अपने आप को समझा लेते हैं कि उनमें तुच्छ समझे जाने योग्य कुछ भी नहीं है। इस प्रकार, किसी और वकील की आवश्यकता के बिना, हर कोई इस व्यर्थ धारणा को अपना लेता है कि मनुष्य अपने आप में भली-भाँति और सुखपूर्वक जीवन बिताने के लिए पर्याप्त है।

यदि कुछ ऐसे हैं जो अधिक नम्रता से सोचना चाहते हैं, तो यद्यपि वे परमेश्वर को कुछ देते हैं ताकि वे सब कुछ अपने ही नाम न लगाते दिखाई दें, फिर भी वे परमेश्वर और अपने बीच बातों का ऐसा बँटवारा करते हैं कि सामर्थ्य, बुद्धि और धार्मिकता का मुख्य भाग उन्हीं के पास रह जाता है। चूँकि मनुष्य स्वभाव से ही अपनी चापलूसी करने की ओर झुका हुआ है, इसलिए उसे खोखली प्रशंसाओं से गुदगुदाए जाने से बढ़कर कोई बात प्रसन्न नहीं कर सकती। इसलिए जिस किसी ने मानव-स्वभाव की श्रेष्ठता को सबसे ऊँचा उठाया है, उसका सदा सबसे अधिक हार्दिक स्वागत हुआ है।

तौभी ऐसी शिक्षा, जो मनुष्य को अपने आप में सन्तुष्ट रहना सिखाती है, उसे धोखा देने के सिवाय और कुछ नहीं करती—और ऐसा पूरी तरह धोखा देती है कि जो कोई उस पर विश्वास करता है वह नाश हो जाता है। क्योंकि खोखला भरोसा बाँध लेने से क्या लाभ, कि हम जिसे भला समझते हैं उस पर विचार करें, योजना बनाएँ, प्रयत्न करें और उसे हाथ में लें, जबकि साथ ही हममें न तो सही समझ है और न उसे पूरा करने की शक्ति? मैं कहता हूँ, आरम्भ से ही असफल होना, और फिर भी हठीले मन से तब तक डटे रहना जब तक हम पूरी तरह घबरा न जाएँ?

जो यह भरोसा रखते हैं कि वे अपनी ही शक्ति से कुछ भी कर सकते हैं, उनके साथ इसके सिवाय और कुछ नहीं हो सकता।

इसलिए यदि कोई इस प्रकार के शिक्षकों की सुनता है, जो हमें अपनी ही धार्मिकता और सामर्थ्य के चिन्तन में लगाए रखते हैं, तो वह आत्म-ज्ञान में उन्नति नहीं करेगा, वरन् अत्यन्त विनाशकारी अज्ञानता से अन्धा हो जाएगा। यद्यपि परमेश्वर का सत्य सब मनुष्यों के सामान्य निर्णय से इस बात में सहमत है कि हमारी बुद्धिमत्ता का दूसरा भाग अपने आप को जानने में है, तौभी इस विषय में बड़ा भेद है कि हमें अपने आप को किस प्रकार जानना चाहिए।

शरीर के निर्णय के अनुसार, मनुष्य तब अपने आप को बहुत अच्छी तरह जाननेवाला प्रतीत होता है जब वह अपनी समझ और शक्ति पर भरोसा करके अपने कर्तव्य में लगने का साहस करता है और हर दोष का त्याग करके जो भला और सम्मानजनक है उसे करने का यत्न करता है। परन्तु जो मनुष्य परमेश्वर के निर्णय के मानदण्ड के अनुसार अपनी ठीक-ठीक जाँच करता है, उसे ऐसा कुछ नहीं मिलता जो उसके हृदय को भरोसे से ऊँचा उठा सके। वह जितनी गहराई से अपनी जाँच करता है, उतना ही अधिक गिराया जाता है, यहाँ तक कि अपने विषय में हर आशा से पूरी तरह खाली होकर वह अपने पास ऐसा कुछ नहीं छोड़ता जिससे वह अपना जीवन ठीक रीति से चला सके।

तौभी हम इससे इनकार नहीं करते कि हमारे स्वभाव में कुलीनता का कुछ बीज बना हुआ है, जो हमें धार्मिकता और खराई का पीछा करने के लिए उभारे। क्योंकि हम न तो अपनी आदि अवस्था पर और न उस उद्देश्य पर जिसके लिए हम सृजे गए, विचार कर सकते हैं, और वह विचार हमें परमेश्वर के राज्य की अमरता पर मनन करने के लिए उकसाने और प्रेरित करने का काम न करे। परन्तु यह पहचान हमें हृदय ऊँचा करने का कारण देने से इतनी दूर है कि इसे हमें दीनता और नम्रता तक पहुँचाना चाहिए।

क्योंकि वह आदि अवस्था क्या है? वह तो वही है जिससे हम गिर गए हैं। जिस उद्देश्य के लिए हम सृजे गए वह क्या है? वह वही है जिससे हम पूरी तरह फिर गए हैं। इसलिए हमारे लिए इसके सिवाय कुछ नहीं बचता कि अपनी दयनीय दशा पर विचार करके हम कराहें, और कराहते हुए अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा की लालसा करें।

अब जब हम कहते हैं कि मनुष्य को अपने में ऐसी कोई बात नहीं देखनी चाहिए जो उसके हृदय को ऊँचा उठाए, तो हमारा अर्थ यह है कि उसमें ऐसा कुछ नहीं जिसके कारण उसे घमण्डी होना चाहिए। इसलिए, यदि उचित लगे, तो मनुष्य को अपने विषय में जो ज्ञान होना चाहिए उसे हम इस प्रकार बाँट लें।

पहला, उसे उस उद्देश्य पर विचार करना चाहिए जिसके लिए वह सृजा गया और उन असाधारण दानों पर जिनसे परमेश्वर ने उसे सम्पन्न किया, ताकि इस विचार से वह आनेवाले जीवन पर मनन करने और परमेश्वर की सेवा करने की इच्छा के लिए उभारा जाए।

दूसरा, उसे अपनी सम्पत्ति का—या यों कहें कि अपनी दरिद्रता का—आकलन करना चाहिए। उसे पहचान लेने पर उसे पूरी घबराहट में गिर जाना चाहिए, मानो वह शून्य बना दिया गया हो। पहला विचार इसलिए है कि वह सीखे कि उसका कर्तव्य और बुलाहट क्या है; दूसरा इसलिए कि वह सीखे कि जो उसे करना चाहिए उसे करने की उसमें कितनी योग्यता है। हम इन दोनों विषयों पर उनके उचित स्थानों में, चर्चा के क्रम की माँग के अनुसार, विचार करेंगे।

तथापि मनुष्य की इस दयनीय दशा का वर्णन आरम्भ करने से पहले यह जानना आवश्यक है कि वह जब पहले-पहल सृजा गया तब कैसा था। क्योंकि जब हम मनुष्य में इन स्वाभाविक दोषों को बताते हैं, तो यह जोखिम होता है कि हम उन्हें प्रकृति के रचयिता, अर्थात् परमेश्वर के सिर मढ़ते हुए प्रतीत हों। अधर्म यह कल्पना करता है कि यदि वह यह दावा कर सके कि उसके सब दोष परमेश्वर से आए हैं, तो इस बहाने से उसके पास पर्याप्त बचाव है। और जब उसे डाँटा जाता है, तो वह परमेश्वर से झगड़ने और जिस सारे दोष का उस पर आरोप है उसे उसी पर डालने से नहीं हिचकिचाता।

वे लोग भी जो परमेश्वर के विषय में अधिक संयम से बोलने का दावा करते हैं, अपने दोषों का बहाना बनाने के लिए प्रकृति को दोष देने का अवसर स्वेच्छा से पकड़ लेते हैं, और कभी यह नहीं सोचते कि ऐसा करके वे परमेश्वर का अनादर करते हैं—यद्यपि कम खुले रूप में—क्योंकि यदि उसके द्वारा रची गई हमारी प्रकृति में कोई दोष होता, तो निन्दा का कुछ अंश उस पर भी आ पड़ता। इसलिए, जब हम देखते हैं कि शरीर हर सम्भव बचाव की खोज करता है जिससे वह समझता है कि उसके दोषों का दोष कहीं और डाला जा सकता है, तो हमें इस द्वेष का सामना करना चाहिए।

इसलिए मानव जाति की विपत्ति पर इस प्रकार विचार किया जाना चाहिए कि हम अपने शरीर की हर टालमटोल को काट डालें और प्रभु की धार्मिकता को न केवल दोषारोपण से, वरन् हर निन्दा और शिकायत से भी निर्दोष ठहराएँ। फिर भी यह शुद्ध सत्य से हटे बिना किया जाना चाहिए। वह सत्य ऐसी बेतुकी बातों को सहारा देने से इतना दूर है कि जैसे ही उसे ठीक रीति से समझा जाता है, वही उनका खण्डन करने के लिए काफी है।

यह निश्चित है कि आदम, जो हम सब का पिता है, परमेश्वर के स्वरूप और समानता में सृजा गया था। इससे प्रकट होता है कि वह ईश्वरीय बुद्धि, धार्मिकता, सामर्थ्य, पवित्रता और सत्य का सहभागी बनाया गया था। क्योंकि हम उन लोगों की भूल को कदापि स्वीकार नहीं कर सकते जो परमेश्वर के इस स्वरूप को उस प्रभुता और श्रेष्ठता में रखते हैं जो मनुष्य को पशुओं पर दी गई थी—मानो वह केवल इसलिए परमेश्वर के समान बनाया गया कि वह उनका स्वामी ठहराया गया था। यदि इसका कोई बड़ा अर्थ न होता, तो मूसा इस घोषणा को इतनी बार न दोहराता कि मनुष्य परमेश्वर के स्वरूप में सृजा गया।

वास्तव में, सन्त पौलुस इस प्रश्न की हर कठिनाई को दूर कर देता है जब वह इस प्रकार कहता है:

“अपने मन के आत्मिक स्वभाव में नये बनते जाओ, और नये मनुष्यत्व को पहिन लो, जो परमेश्वर के अनुसार धार्मिकता और सच्ची पवित्रता में सृजा गया है।”

—इफिसियों 4

और फिर:

“एक दूसरे से झूठ मत बोलो, क्योंकि तुम ने पुराने मनुष्यत्व को उसके कामों समेत उतार डाला है, और नये मनुष्यत्व को पहिन लिया है, जो अपने सृजनहार के स्वरूप के अनुसार ज्ञान प्राप्त करने के लिये नया बनता जाता है।”

—कुलुस्सियों 3

हम देखते हैं कि पौलुस परमेश्वर के स्वरूप की व्याख्या कैसे करता है: वह हमारी आत्मा का प्रभु के अनुरूप होना है, जब हर सांसारिक अशुद्धता से शुद्ध किए जाने पर वह आत्मिक पवित्रता के सिवाय और कुछ नहीं चाहती।

इसलिए मनुष्य, परमेश्वर के स्वरूप में सृजे जाने के कारण, ऐसे दानों और श्रेष्ठताओं से सम्पन्न किया गया था जो उसके प्रति उसके सृजनहार की असाधारण उदारता की साक्षी देते थे। क्योंकि वह हर भलाई में सहभागी होकर परमेश्वर से जुड़ा हुआ था और यदि वह उस खराई में बना रहता जो उसे मिली थी, तो सदा जीवित रहता।

परन्तु वह उस अवस्था में देर तक न रहा। क्योंकि अपनी कृतघ्नता के द्वारा उसने शीघ्र ही अपने आप को उन सब उपकारों के अयोग्य बना लिया जो परमेश्वर ने उस पर किए थे। इस प्रकार जो स्वर्गीय स्वरूप वह धारण किए हुए था वह मिट गया; क्योंकि पाप के द्वारा परमेश्वर से अलग हो जाने पर वह हर भलाई की सहभागिता से भी दूर हो गया, क्योंकि ऐसी आशीषें केवल उसी में पाई जा सकती हैं। इसलिए, बुद्धि, सामर्थ्य, पवित्रता, सत्य और धार्मिकता के स्थान पर, जिनसे वह परमेश्वर की समानता में सजाया गया था, भयानक महामारियाँ आ गईं: अज्ञानता, दुर्बलता, अशुद्धता, व्यर्थता और अधार्मिकता। वह न केवल स्वयं इन बुराइयों में लिपट गया, वरन् उसने अपनी सारी सन्तान को भी इनमें फँसा दिया। क्योंकि उसके सब वंशज उसके समान हैं, जिससे उनका उद्गम है, और उसके मैल से अशुद्ध होकर जन्म लेते हैं।

यही वह पैतृक भ्रष्टता है जिसे प्राचीन पिता मूल पाप कहते थे, और पाप शब्द का प्रयोग हमारे उस स्वभाव की विकृति को बताने के लिए करते थे जो पहले भला और शुद्ध था। इस विषय में उन्होंने पेलागियसवादियों के साथ बड़ा विवाद किया। क्योंकि जब इन विधर्मियों को पवित्रशास्त्र की स्पष्ट साक्षियों से यह सिद्ध किया गया कि पाप पहले मनुष्य से उसकी सारी सन्तान में उतर आया है, तो उन्होंने कुतर्क किया कि वह अनुकरण से उतरा है, उत्पत्ति से नहीं।

इसलिए इन पवित्र जनों ने यह दिखाने का परिश्रम किया कि हम दूसरों के उदाहरण से सीखी हुई किसी बुराई के कारण भ्रष्ट नहीं हुए, वरन् अपनी विकृति को अपनी माता के गर्भ से अपने साथ लाते हैं। असाधारण निर्लज्जता के बिना इससे इनकार नहीं किया जा सकता। फिर भी जो कोई सन्त अगस्तीन की रचनाओं से परिचित है—जिसने देखा है कि पेलागियसवादी किस प्रकार के निर्बुद्धि पशु थे और उनमें कितनी कम लज्जा थी—वह इस विषय में उनके दुस्साहस पर आश्चर्य नहीं करेगा।

दाऊद जो स्वीकार करता है वह निःसन्देह सत्य है: कि वह अधर्म में उत्पन्न हुआ और उसकी माता ने उसे पाप में गर्भ में धारण किया।

—भजन संहिता 51

वह अपने माता-पिता पर कुकर्म का आरोप नहीं लगा रहा। वरन् अपने प्रति परमेश्वर की भलाई को और पूरी तरह बढ़ाकर बताने के लिए वह उस विकृति को स्मरण करता है जो जन्म से ही उसकी थी। चूँकि यह दाऊद की कोई विशेषता नहीं थी, इसलिए इससे निष्कर्ष निकलता है कि समस्त मानव जाति की सार्वभौमिक दशा उसके उदाहरण में दर्शाई गई है। इसलिए हम सब, जो अशुद्ध बीज से उत्पन्न हुए हैं, पाप के संक्रमण से अशुद्ध होकर जन्म लेते हैं; वरन् हम ज्योति में आने से पहले ही परमेश्वर के सम्मुख अशुद्ध हैं। क्योंकि “अशुद्ध में से शुद्ध को कौन निकाल सकता है?” जैसा कि अय्यूब की पुस्तक में कहा गया है।

—अय्यूब 14

इसलिए हमें यह निश्चित मान लेना चाहिए कि आदम केवल मानव-स्वभाव का पिता ही नहीं था, वरन् मानो उसकी जड़ या मूल भी था; और इसलिए उसकी भ्रष्टता के द्वारा मानव जाति उचित रीति से भ्रष्ट हुई। प्रेरित आदम की तुलना मसीह से करके इसे और स्पष्ट रूप से दर्शाता है:

“जैसे एक मनुष्य के द्वारा पाप जगत में आया, और पाप के द्वारा मृत्यु आई—और मृत्यु सब मनुष्यों में फैल गई, क्योंकि सब ने पाप किया—वैसे ही मसीह के अनुग्रह के द्वारा धार्मिकता और जीवन हमें फिर मिलते हैं।”

—रोमियों 5

पेलागियसवादी यहाँ क्या बकवास करेंगे—कि पाप आदम का अनुकरण करने मात्र से सारे जगत में फैला? तो क्या मसीह के अनुग्रह से हमें इसके सिवाय और कोई लाभ नहीं मिलता कि वह हमारे सामने अनुकरण के लिए एक उदाहरण के रूप में रखा गया है? ऐसी निन्दा को कौन सह सकता है?

परन्तु चूँकि इसमें कोई सन्देह नहीं कि मसीह का अनुग्रह सहभागिता के द्वारा हमारा होता है और उसी के द्वारा हम जीवन पाते हैं, इसलिए यह भी निष्कर्ष निकलता है कि धार्मिकता और जीवन दोनों आदम में खो गए, जैसे हम उन्हें मसीह में फिर पाते हैं, और पाप तथा मृत्यु आदम के द्वारा हममें उत्पन्न हुए, जैसे वे मसीह के द्वारा मिटा दिए जाते हैं।

इसे समझने के लिए हमें उस कष्टदायक विवाद में उलझने की भी आवश्यकता नहीं जिसने प्राचीन शिक्षकों को बहुत सताया: अर्थात् क्या बच्चे की आत्मा पिता की आत्मा के सार से निकलती है, क्योंकि मूल पाप आत्मा में रहता है। हमें यह जानकर सन्तुष्ट रहना चाहिए कि प्रभु ने उन अनुग्रहों और दानों को, जो वह मानव-स्वभाव को देना चाहता था, आदम में रख दिया था। इसलिए जब आदम ने उन्हें खोया, तो उसने उन्हें केवल अपने लिए नहीं वरन् हम सब के लिए खोया।

आत्मा की उत्पत्ति की चिन्ता कौन करेगा, जब यह समझ लिया जाए कि आदम को जो वरदान मिले थे और जिन्हें उसने खो दिया, वे उसे केवल अपने लिए नहीं वरन् हमारे लिए भी मिले थे, क्योंकि परमेश्वर ने उन्हें उसे केवल एक अकेले मनुष्य के रूप में नहीं दिया था, वरन् इसलिए कि उसकी सारी सन्तान उसके साथ मिलकर उनका आनन्द ले? इसलिए यह कहने में कोई बेतुकी बात नहीं कि जब आदम उनसे वंचित किया गया, तो मानव-स्वभाव उनसे वंचित हो गया; या कि जब वह पाप से अशुद्ध हुआ, तो वह संक्रमण हम सब में फैल गया।

क्योंकि जैसे सड़ी हुई जड़ से सड़ी हुई कोंपलों के सिवाय कुछ नहीं निकलता, और वह अपनी सड़न को अपनी उत्पन्न की हुई हर डाली और पत्ती में पहुँचा देती है, वैसे ही आदम की सन्तान अपने पिता में अशुद्ध हुई और बदले में अपने वंशजों के लिए अशुद्धता का स्रोत बन गई। अर्थात् भ्रष्टता का आरम्भ आदम में ऐसा जड़ पकड़ गया कि वह किसी निरन्तर धारा की नाईं माता-पिता से सन्तानों तक बहता चला आया है।

पेलागियसवादियों की आपत्ति का खण्डन करना सरल है। वे कहते हैं कि यह अनुचित है कि विश्वासी माता-पिता की सन्तान उनसे भ्रष्टता पाए, क्योंकि उन्हें तो माता-पिता की पवित्रता से शुद्ध होना चाहिए। इसके उत्तर में हम कहते हैं कि सन्तान उस आत्मिक नया जन्म से नहीं उतरती जो परमेश्वर के सेवकों को पवित्र आत्मा के द्वारा मिला है, वरन् उस शारीरिक उत्पत्ति से उतरती है जो उन्हें आदम से मिली है।

यह सच है कि परमेश्वर विश्वासियों की सन्तान को उनके माता-पिता के कारण पवित्र ठहराता है, परन्तु यह उनके स्वभाव के बल से नहीं होता; यह उसके अनुग्रह से आता है। इसलिए यह एक आत्मिक आशीष है जो उस आदि श्राप को मानव-स्वभाव में सर्वत्र बने रहने से नहीं रोकती।

अब, ताकि यह बात उतावली में न कही जाए, हमें मूल पाप की परिभाषा करनी चाहिए। फिर भी मेरा उद्देश्य उन सब परिभाषाओं की जाँच करना नहीं जो इसके विषय में लिखनेवालों ने दी हैं। मैं केवल एक ऐसी परिभाषा दूँगा जो मुझे सत्य के अनुकूल प्रतीत होती है।

तब हम कहेंगे कि मूल पाप हमारे स्वभाव की एक पैतृक भ्रष्टता और विकृति है, जो पहले हमें परमेश्वर के क्रोध का दोषी ठहराती है, और फिर हममें वे कर्म उत्पन्न करती है जिन्हें पवित्रशास्त्र “शरीर के काम” कहता है। यही वह है जिसे सन्त पौलुस प्रायः केवल पाप कहता है, मूल शब्द जोड़े बिना। जो कर्म इससे निकलते हैं—जैसे व्यभिचार, कुकर्म, चोरियाँ, बैर, हत्याएँ और पेटूपन—उन्हें वह इसलिए पाप के फल कहता है, यद्यपि ऐसे सब कर्म स्वयं भी पवित्रशास्त्र में पाप कहलाते हैं।

इसलिए हमें दो बातों पर अलग-अलग विचार करना चाहिए। पहली, हम अपने स्वभाव के हर भाग में इतने भ्रष्ट हो गए हैं कि इस भ्रष्टता के कारण हम परमेश्वर के सम्मुख उचित रीति से दोषी ठहरने योग्य हैं, जिसे धार्मिकता, निर्दोषता और पवित्रता के सिवाय कुछ भी प्रिय नहीं। और न यह कहना चाहिए कि यह दोष केवल किसी दूसरे के अपराध से उत्पन्न होता है, मानो हम अपने पहले पिता के पाप का उत्तर दे रहे हों जबकि हमने स्वयं कोई दण्ड नहीं कमाया।

क्योंकि जब कहा जाता है कि आदम के द्वारा हम परमेश्वर के न्याय के अधीन हो गए हैं, तो इसका अर्थ यह नहीं कि हम स्वयं निर्दोष हैं और बिना कोई दण्ड कमाए केवल उसके पाप के परिणाम भुगत रहे हैं। वरन् इसलिए कि उसके अपराध के द्वारा हम सब विनाश में लिपट गए हैं, इसलिए कहा जाता है कि उसने हम सब को दोष के अधीन कर दिया। फिर भी हमें यह नहीं समझना चाहिए कि उसने हमें केवल दण्ड के योग्य बनाया और अपना पाप हममें नहीं पहुँचाया। क्योंकि उससे उतरा हुआ पाप सचमुच हममें बसता है, और उचित रीति से दण्ड उसी का देय है।

इसलिए सन्त अगस्तीन, यद्यपि वह कभी-कभी इसे दूसरे का पाप कहता है ताकि और स्पष्ट रूप से दिखाए कि हम इसे वंश-परम्परा से पाते हैं, तथापि दृढ़ता से कहता है कि यह हम में से हर एक का अपना विशेष पाप है। स्वयं प्रेरित साक्षी देता है कि मृत्यु सब मनुष्यों पर इसलिए आई कि सब ने पाप किया—अर्थात् इसलिए कि सब मूल पाप में लिपटे हुए हैं और उसके दागों से अशुद्ध हैं।

इसी कारण शिशु भी इस दण्ड की आज्ञा में सम्मिलित हैं—केवल किसी दूसरे के पाप के कारण नहीं वरन् अपने ही पाप के कारण। क्योंकि यद्यपि उन्होंने अभी अपने अधर्म के फल नहीं उत्पन्न किए, तौभी उसका बीज उनके भीतर छिपा हुआ है। वरन् उनका स्वभाव ही पाप की क्यारी है; इसलिए वह परमेश्वर को अप्रिय और घृणित होने के सिवाय और कुछ नहीं हो सकता।

दूसरी बात जिस पर हमें विचार करना चाहिए यह है कि यह विकृति हममें कभी निष्क्रिय नहीं रहती, वरन् निरन्तर नए फल उत्पन्न करती रहती है—अर्थात् शरीर के वे काम जिनका अभी हमने वर्णन किया—जैसे जलती हुई भट्ठी निरन्तर ज्वालाएँ और चिनगारियाँ फेंकती रहती है, और सोता अपना जल उँडेलता रहता है।

इसलिए जिन्होंने मूल पाप को आदि धार्मिकता का अभाव कहकर परिभाषित किया है, उन्होंने उन शब्दों में उसके पूरे सार को तो समेट लिया है; फिर भी उन्होंने उसकी सक्रिय शक्ति को पर्याप्त रूप से व्यक्त नहीं किया। क्योंकि हमारा स्वभाव केवल रिक्त और हर भलाई से रहित ही नहीं है; वह हर प्रकार की बुराई में इतना उपजाऊ है कि निष्क्रिय नहीं रह सकता।

जिन्होंने इसे लालसा कहा है, उन्होंने बिलकुल अनुपयुक्त शब्द का प्रयोग नहीं किया, बशर्ते कि वह भी जोड़ा जाए जिसे बहुत लोग स्वीकार नहीं करेंगे: कि मनुष्य का हर भाग, समझ से लेकर इच्छा तक और आत्मा से लेकर शरीर तक, इस लालसा से अशुद्ध और पूरी तरह भरा हुआ है—या, इसे और संक्षेप में कहें, कि मनुष्य अपने आप में भ्रष्टता के सिवाय और कुछ नहीं।

जो लोग अपने पाप का कारण परमेश्वर पर थोपने का साहस करते हैं, वे अब इस पर विचार करें, क्योंकि मनुष्य स्वभाव से पापी कहे जाते हैं। वे परमेश्वर की रचना को उसकी वर्तमान अशुद्धता में विकृत दृष्टि से देखते हैं, जबकि उन्हें उसे उस स्वभाव में खोजना और देखना चाहिए जो आदम को भ्रष्ट होने से पहले मिला था। इसलिए हमारा विनाश हमारे शरीर के दोष से है, परमेश्वर से नहीं, क्योंकि हम इसके सिवाय किसी और कारण से नाश नहीं हुए कि हम अपनी आदि सृष्टि से गिर गए।

और यहाँ कोई यह आपत्ति भी न करे कि यदि परमेश्वर आदम के पतन को रोक देता, तो वह हमारे उद्धार का और अच्छा प्रबन्ध कर सकता था। क्योंकि यह आपत्ति इतनी धृष्ट और दुस्साहसी है कि इसे किसी विश्वासी के मन में कभी आना ही नहीं चाहिए। इसके अतिरिक्त, यह परमेश्वर की पूर्वनियति से सम्बन्ध रखती है, जिस पर आगे उसके उचित स्थान में विचार किया जाएगा।

इसलिए हम सदा स्मरण रखें कि अपने नाश का कारण अपने स्वभाव की भ्रष्टता को ठहराएँ, न कि उस स्वभाव को जो मनुष्य को आरम्भ में दिया गया था, ऐसा न हो कि हम परमेश्वर पर दोष लगाएँ मानो हमारी बुराई उसी से आई हो।

यह सच है कि पाप का यह घातक घाव हमारे स्वभाव में बैठा हुआ है, परन्तु यह कहने में कि हमारा स्वभाव आरम्भ से ही घायल था और यह कहने में कि वह बाद में कहीं और से आई किसी बात के द्वारा घायल हुआ, बड़ा भेद है। यह निश्चित है कि वह उस पाप के द्वारा घायल हुआ जो बाद में आया। इसलिए हमारे पास अपने सिवाय किसी और की शिकायत करने को नहीं।

पवित्रशास्त्र इसकी ओर ध्यान दिलाने में सावधान है। क्योंकि सभोपदेशक कहता है:

“मैं ने केवल यह पाया है कि परमेश्वर ने मनुष्य को सीधा बनाया, परन्तु उन्होंने बहुत सी युक्तियाँ निकाली हैं।”

इससे प्रकट है कि मनुष्य अपने नाश के लिए अकेले दोषी ठहराया जाना चाहिए, क्योंकि परमेश्वर के अनुग्रह से उसे स्वाभाविक सीधाई मिली थी, परन्तु अपनी ही मूर्खता से वह व्यर्थता में जा गिरा।

हम कहते हैं कि मनुष्य स्वभाव से विकृति के कारण भ्रष्ट है, परन्तु यह विकृति उसके स्वभाव का मूल अंश नहीं है। हम इससे इनकार इसलिए करते हैं कि दिखाएँ कि यह तो एक जोड़ा गया गुण है जो मनुष्य पर आ पड़ा, न कि उसके सार का कोई अनिवार्य गुण जो आरम्भ से उसमें जमा हुआ था। तौभी हम इसे स्वाभाविक कहते हैं, ताकि कोई यह कल्पना न करे कि हर व्यक्ति इसे बुरी आदत और उदाहरण से पाता है, क्योंकि यह हमें अपने पहले जन्म से ही घेरे हुए है।

और हम यह बात बिना अधिकार के भी नहीं कहते। इसी कारण प्रेरित हम सब को स्वभाव से परमेश्वर के क्रोध की सन्तान कहता है। परमेश्वर अपनी सृष्टि के सबसे उत्तम प्राणी से कैसे क्रोधित हो सकता है, जबकि उसकी रची हुई छोटी से छोटी वस्तुएँ भी उसे प्रिय हैं? उत्तर यह है कि वह अपनी रचना की भ्रष्टता से क्रोधित है, न कि रचना से।

इसलिए यदि मनुष्य को बिना कारण नहीं कहा जाता कि वह स्वभाव से परमेश्वर के लिए घृणित है, तो हम उचित रीति से कह सकते हैं कि वह स्वभाव से दुष्ट और बुरा है। सन्त अगस्तीन हमारे भ्रष्ट स्वभाव के कारण उन पापों को स्वाभाविक कहने से नहीं हिचकिचाता जो परमेश्वर के अनुग्रह के हमसे हट जाने पर हमारे शरीर में अनिवार्य रूप से राज्य करते हैं।

इस भेद से मानीकियों की मूर्खता का खण्डन होता है। मनुष्य में एक अनिवार्य विकृति की कल्पना करके वे दावा करते थे कि वह परमेश्वर के सिवाय किसी और के द्वारा रचा गया है, ताकि वे परमेश्वर पर बुराई के किसी उद्गम का आरोप न लगाएँ।

चूँकि हमने देखा है कि पाप के प्रभुत्व ने पहले मनुष्य को अपने वश में करके सारी मानव जाति को दासत्व में डाल दिया, अब हमें यह निर्णय करना है कि इस बन्धुआई में पड़ने के बाद क्या हम सारी स्वतंत्रता और छूट से वंचित कर दिए गए हैं—या उसका कुछ अंश बचा हुआ है, और यदि है तो कहाँ तक फैला है।

परन्तु इस प्रश्न का सत्य और सरलता से स्पष्ट हो सके, इसके लिए हमें पहले वह लक्ष्य स्थापित करना चाहिए जिसकी ओर हमारी सारी चर्चा निर्देशित होनी है। जिस लक्ष्य का हमें पीछा करना चाहिए उसे हम दोनों ओर के खतरों पर विचार करके पहचान लेंगे।

क्योंकि जब मनुष्य हर भलाई से वंचित कर दिया जाता है, तो वह तुरन्त इससे असावधानी का अवसर निकाल लेता है। चूँकि उससे कहा जाता है कि भलाई करने की कोई शक्ति उसमें नहीं है, इसलिए वह उसमें लगने का कोई प्रयत्न नहीं करता, मानो उसका उससे कोई सम्बन्ध ही न हो। दूसरी ओर, उसे थोड़ी सी भी योग्यता का श्रेय दिए बिना नहीं रहा जा सकता कि वह व्यर्थ भरोसे और अहंकार में ऊँचा न हो जाए—और परमेश्वर को उसी मात्रा में उसके आदर से वंचित न करे।

इसलिए इन बुराइयों में पड़ने से बचने के लिए हमें यह सन्तुलन बनाए रखना चाहिए: मनुष्य को सिखाया जाना चाहिए कि उसमें कोई भलाई नहीं और वह दुर्दशा और विवशता से घिरा हुआ है; फिर भी उसे यह भी समझना चाहिए कि जिस भलाई से वह रिक्त है और जिस स्वतंत्रता से वह वंचित किया गया है, उसकी अभिलाषा उसे कैसे करनी चाहिए। वरन् इन बातों का पीछा करने के लिए उसे और तीखी चुभन और गम्भीर प्रेरणा मिलनी चाहिए, उससे कहीं अधिक जितनी तब मिलती यदि उसे विश्वास दिला दिया जाता कि संसार में सबसे बड़ी शक्ति उसके पास है।

हर कोई देख सकता है कि यह दूसरी बात कितनी आवश्यक है—अर्थात् मनुष्य को उसकी लापरवाही और आलस्य से जगाना। परन्तु पहली बात के विषय में—उसे उसकी दरिद्रता दिखाने की आवश्यकता—बहुतेरे उचित से अधिक सन्देह उठाते हैं। इसमें कोई प्रश्न नहीं कि जो वस्तु मनुष्य की अपनी है वह उससे नहीं छीननी चाहिए; अर्थात् हमें उसकी जितनी योग्यता है उससे कम का श्रेय उसे नहीं देना चाहिए। परन्तु यह भी उतना ही स्पष्ट है कि उसे झूठी और खोखली महिमा से वंचित करना कितना आवश्यक है।

क्योंकि यदि मनुष्य को अपने ऊपर घमण्ड करने की अनुमति नहीं थी जब परमेश्वर की उदारता से वह सर्वोच्च दानों से वस्त्रित और सुशोभित था, तो अब उसे कितना अधिक दीन होना चाहिए, क्योंकि अपनी कृतघ्नता के कारण वह सबसे गहरी अप्रतिष्ठा में गिरा दिया गया है, और उस श्रेष्ठता को खो चुका है जो उसके पास पहले थी?

इसे समझना सरल करने के लिए मैं कहता हूँ कि जब मनुष्य उस सर्वोच्च सम्मान तक ऊँचा उठाया गया जो उसे मिल सकता था, तब पवित्रशास्त्र ने उसके विषय में इससे अधिक कुछ नहीं कहा कि वह परमेश्वर के स्वरूप में सृजा गया। इससे वह यह सूचित करता है कि वह अपनी निजी सम्पत्ति में धनी नहीं था, वरन् उसका परमानन्द परमेश्वर की सहभागिता में था।

इसलिए अब उसके लिए इसके सिवाय क्या बचा है कि वह हर महिमा से नंगा और वंचित होकर अपने परमेश्वर को स्वीकार करे? जब वह परमेश्वर के अनुग्रह की सम्पत्ति में भरपूर था, तब उसने परमेश्वर की कृपा और उदारता को नहीं पहचाना। चूँकि उसने उससे मिली आशीषों को कृतज्ञता से स्वीकार करके परमेश्वर की महिमा नहीं की, इसलिए वह कम से कम अब अपनी दरिद्रता को मानकर उसकी महिमा करे।

इसके अतिरिक्त, बुद्धिमत्ता और सामर्थ्य की प्रशंसा के हर दावे को त्याग देना हमारे लिए उतना ही लाभदायक है जितना परमेश्वर की महिमा को बनाए रखने के लिए आवश्यक है। इसलिए जो हमें उचित मात्रा से अधिक कुछ मानते हैं, वे न केवल परमेश्वर की निन्दा करते हैं वरन् हमें भी नाश में ले जाते हैं।

क्योंकि जब हमें अपनी ही शक्ति और सामर्थ्य पर चलना सिखाया जाता है, तो इसका और क्या अर्थ है सिवाय इसके कि हमें सरकण्डे की नोक पर चढ़ा दिया जाए, जो हमें बिना तुरन्त टूटकर गिराए सह नहीं सकता? वरन् हम अब भी अपनी सामर्थ्यों को सरकण्डे से तुलना करके उन्हें बहुत अधिक आदर देते हैं, क्योंकि मनुष्य उनके विषय में जो कुछ कल्पना करते हैं वह धुएँ के सिवाय कुछ नहीं।

इसलिए यह बिना कारण नहीं कि यह उत्तम कथन सन्त अगस्तीन के द्वारा इतनी बार दोहराया गया है:

“जो स्वतंत्र इच्छा के पक्षधर हैं, वे उसे स्थापित करने के बजाय उसे सिर के बल विनाश में गिरा देते हैं।”

मुझे यह भूमिका देना आवश्यक लगा, क्योंकि कुछ ऐसे हैं जो यह सहन नहीं कर सकते कि मनुष्य की सामर्थ्य को उलट दिया जाए और शून्य कर दिया जाए ताकि परमेश्वर की सामर्थ्य उसमें स्थापित हो। वे इस सारी चर्चा को केवल निष्फल ही नहीं, वरन् अत्यन्त खतरनाक ठहराते हैं। फिर भी हम इसे अत्यन्त लाभदायक और, इससे भी बढ़कर, सच्चे धर्म की नींवों में से एक पाएँगे।

मनुष्य की क्षमताओं पर ठीक रीति से विचार करने के लिए हम उन्हें सबसे सरल रीति से बाँटकर आरम्भ करेंगे। क्योंकि दार्शनिकों के सूक्ष्म भेदों का अनुसरण करने की कोई आवश्यकता नहीं।

मैं सहर्ष स्वीकार करता हूँ कि प्लेटो जो कहता है उसमें तर्क का कुछ आभास है: कि मनुष्य में पाँच इन्द्रियाँ हैं, जिन्हें वह वे साधन कहता है जिनके द्वारा सामान्य बोध—एक सर्वव्यापी पात्र की नाईं—दृष्टि, श्रवण, स्वाद, गन्ध या स्पर्श के सामने प्रस्तुत सब बाहरी वस्तुओं को ग्रहण करता है। फिर कल्पना-शक्ति उसे अलग-अलग पहचानती है जिसे सामान्य बोध ने धारण और ग्रहण किया है; उसके बाद तर्कबुद्धि सब कुछ का निर्णय करके अपना कार्य करती है। अन्त में, तर्कबुद्धि के ऊपर बुद्धि है, जो उन सब बातों को स्थिर और दृढ़ दृष्टि से देखती है जिनकी तर्कबुद्धि अपने चिन्तन की प्रक्रियाओं से जाँच करती है।

इस प्रकार, उसके अनुसार, आत्मा में जानने और समझने से सम्बन्ध रखनेवाली तीन शक्तियाँ हैं, जिन्हें इसीलिए ज्ञानात्मक क्षमताएँ कहा जाता है: तर्कबुद्धि, बुद्धि और कल्पना-शक्ति। इनके अनुरूप इच्छा से सम्बन्ध रखनेवाली तीन और हैं: इच्छा-शक्ति, जिसका कार्य उसे चाहना है जिसे बुद्धि और तर्कबुद्धि उसके सामने रखती हैं; क्रोध, जो उसका अनुसरण करता है जिसे तर्कबुद्धि और कल्पना-शक्ति उसके सामने प्रस्तुत करती हैं; और लालसा, जो उसे पकड़ती है जो कल्पना-शक्ति के द्वारा उसके सामने प्रस्तुत किया जाता है।

यद्यपि ये सब बातें सच हैं, या कम से कम सम्भाव्य हैं, तौभी हमें उनमें लगने की कोई आवश्यकता नहीं, क्योंकि जोखिम है कि वे हमारी बहुत कम सहायता करेंगी और अपनी अस्पष्टता से हमें बहुत परेशान करेंगी।

हम अरस्तू के दिए हुए जैसे अन्य भेद भी प्रस्तुत कर सकते थे: कि आत्मा का एक भाग ऐसा है जिसमें अपने में कोई तर्कबुद्धि नहीं पर फिर भी तर्कबुद्धि से मार्गदर्शन पा सकता है, और दूसरा भाग जो वास्तव में तर्कबुद्धि का सहभागी है। इसी प्रकार, कि तीन बातें हैं जिनसे सब मानवीय कार्य निकलते हैं: इन्द्रिय-बोध, बुद्धि और अभिलाषा।

परन्तु हमें बोलने की ऐसी रीति अपनानी चाहिए जिसे सब समझ सकें, और यह दार्शनिकों से नहीं ली जा सकती। क्योंकि जब वे बहुत सरल ढंग से बोलना चाहते हैं, तब भी वे आत्मा को दो भागों में बाँटते हैं: बुद्धि और अभिलाषा। फिर भी वे इनमें से प्रत्येक को फिर बाँट देते हैं।

वे कहते हैं कि एक चिन्तनशील बुद्धि है, जो कर्म तक नहीं पहुँचती वरन् केवल चिन्तन में ही ठहरी रहती है—वह क्षमता जिसे सिसरो बोध-शक्ति शब्द से दर्शाता है। दूसरी व्यावहारिक बुद्धि है, जो भले या बुरे को ग्रहण करने के बाद इच्छा को उसका पीछा करने या उससे बचने के लिए प्रेरित करती है। इसी प्रकार के अन्तर्गत भली रीति से जीने का ज्ञान भी आता है।

इसी प्रकार वे अभिलाषा को लालसा और इच्छा में बाँटते हैं, और जब मनुष्य की चाह तर्कबुद्धि के अधीन होती है तब उसे इच्छा कहते हैं और जब वह असंयम में फूट पड़ती है और संयम का जूआ उतार फेंकती है तब लालसा कहते हैं। ऐसा करते हुए वे सदा यह कल्पना करते हैं कि मनुष्य में कोई ऐसी तर्कबुद्धि है जिससे वह अपने आप को ठीक रीति से चला सकता है।

परन्तु हम, जो कहते हैं कि मानवीय तर्कबुद्धि भ्रष्ट हो गई है, उनसे पूरी तरह सहमत नहीं हो सकते। इसलिए हमें एक और विभाजन अपनाना चाहिए: हमारी आत्मा में दो भाग हैं—बुद्धि और इच्छा। बुद्धि इसलिए है कि हमारे सामने प्रस्तुत सब वस्तुओं में भेद करे और निर्णय करे कि किसे स्वीकार और किसे दोषी ठहराना चाहिए। इच्छा का कार्य उसे चुनना और उसका पीछा करना है जिसे बुद्धि ने भला ठहराया है, और इसके विपरीत, उसे अस्वीकार करना और उससे बचना है जिसे उसने दोषी ठहराया है।

हमें यहाँ अरस्तू के उस अत्यन्त सूक्ष्म तर्क पर रुकने की आवश्यकता नहीं कि बुद्धि में वस्तुतः कोई गति नहीं होती, वरन् चुनाव ही मनुष्य को गति देता है। अनावश्यक प्रश्नों में उलझे बिना, हमारे लिए इतना पर्याप्त होना चाहिए कि बुद्धि मानो आत्मा की शासक और सेनापति है; कि इच्छा उसके निर्धारण पर निर्भर है और जब तक बुद्धि का निर्णय न मिल जाए तब तक कुछ नहीं चाहती।

इसलिए अरस्तू एक और स्थान पर सत्य कहता है जब वह कहता है कि अभिलाषा की क्षमता में बचाव और चाह बुद्धि में अस्वीकार और स्वीकार के अनुरूप हैं। हम आगे देखेंगे कि इच्छा को ठीक रीति से चलाने में बुद्धि का मार्गदर्शन कितना भरोसेमन्द है। यहाँ हमारा उद्देश्य केवल यह दिखाना है कि मानवीय आत्मा की सब शक्तियाँ इन दो विभाजनों में से किसी एक में समेटी जा सकती हैं।

इस प्रकार हम इन्द्रिय-बोध को बुद्धि के अन्तर्गत सम्मिलित करते हैं, यद्यपि दार्शनिक उन्हें अलग करते हैं, और कहते हैं कि इन्द्रिय-बोध सुख की ओर झुकता है जबकि बुद्धि सम्मान और सद्गुण की ओर। इसके अतिरिक्त, अभिलाषा शब्द के स्थान पर हम अधिक प्रचलित शब्द इच्छा का प्रयोग करते हैं।

आओ अब विचार करें कि इन दोनों क्षमताओं में से प्रत्येक में कितनी योग्यता है। दार्शनिक सामान्यतः इस पर सहमत हैं कि तर्कबुद्धि मानवीय आत्मा में निवास करती है और बुद्धि को मार्ग दिखाने के लिए दीपक का और इच्छा पर शासन करने के लिए रानी का काम करती है। क्योंकि वे कल्पना करते हैं कि तर्कबुद्धि ईश्वरीय प्रकाश से इतनी भरी है कि वह भले और बुरे में ठीक भेद कर सकती है और आज्ञा देने की पर्याप्त शक्ति रखती है।

इसके विपरीत, वे कहते हैं कि इन्द्रिय-बोध अज्ञानता और जड़ता से भरा है, ऊँची और उत्तम बातों के विचार तक उठने में असमर्थ और सदा पृथ्वी पर ही टिका रहता है। वे मानते हैं कि अभिलाषा, यदि वह तर्कबुद्धि के अधीन रहे और अपने आप को इन्द्रिय-बोध के वश में न होने दे, तो उसमें जो भला और सम्मानजनक है उसे खोजने की स्वाभाविक प्रवृत्ति है और इस प्रकार वह सही मार्ग पर बनी रह सकती है। परन्तु यदि वह अपने आप को दास की नाईं इन्द्रिय-बोध को सौंप दे, तो उसके द्वारा भ्रष्ट और विकृत हो जाती है और अपमानजनक बातों में फूट पड़ती है।

इसलिए वे कहते हैं कि मानवीय बुद्धि में अपनी तर्कबुद्धि है जो मनुष्य को भली रीति से और सुखपूर्वक जीने में मार्ग दिखाती है, बशर्ते वह अपनी कुलीनता बनाए रखे और उस सद्गुण को अवसर दे जो स्वाभाविक रूप से उसमें जड़ पकड़े हुए है। साथ ही, वे एक निम्न प्रेरणा को मानते हैं जिसे इन्द्रिय-बोध कहा जाता है, जिसके द्वारा मनुष्य बहका दिया जाता है और भूल और अज्ञानता में खींच लिया जाता है, परन्तु जिसे तर्कबुद्धि फिर भी वश में कर सकती है और धीरे-धीरे दबा सकती है।

वे इच्छा को तर्कबुद्धि और इन्द्रिय-बोध के बीच रखते हैं, कि उसे स्वतंत्रता है कि चाहे तो तर्कबुद्धि के अधीन हो जाए या अपने आप को इन्द्रिय-बोध के हवाले कर दे। यह सच है कि अनुभव ने कभी-कभी उन्हें यह मानने पर विवश किया है कि मनुष्य के लिए अपने भीतर तर्कबुद्धि का राज्य स्थापित करना कितना कठिन है, क्योंकि वह कभी सुख से फुसलाया जाता है, कभी भलाई के झूठे रूप से धोखा खाता है, और कभी असंयमी भावनाओं से हिलाया जाता है, जो—जैसा प्लेटो कहता है—रस्सियों के समान हैं जो उसे इधर-उधर खींचती और झकझोरती हैं।

इसी कारण सिसरो कहता है कि हमारे मनों में प्रकृति के द्वारा जलाई हुई भलाई की केवल थोड़ी सी छोटी चिनगारियाँ हैं, जिन्हें हम झूठी धारणाओं और बुरे आचरण से सरलता से बुझा देते हैं। इसके अतिरिक्त, वे मानते हैं कि जब ऐसे रोग एक बार हमारे मनों पर अधिकार कर लेते हैं, तो वे वहाँ इतनी शक्ति से राज्य करते हैं कि उन्हें सरलता से रोका नहीं जा सकता; और वे उनकी तुलना बेकाबू घोड़ों से करने में भी नहीं हिचकिचाते। क्योंकि जैसे बेकाबू घोड़ा अपने सवार को गिराकर बिना रोक-टोक के लात मारता है, वैसे ही आत्मा, तर्कबुद्धि को ठुकराकर और अपने आप को अपनी लालसाओं के हवाले करके, पूर्ण अव्यवस्था में फूट पड़ती है।

शेष रहा, वे इसे निश्चित मानते हैं कि सद्गुण और दुर्गुण दोनों हमारे वश में हैं। क्योंकि वे कहते हैं कि यदि भलाई या बुराई करना हमारे चुनाव में न होता, तो उनसे दूर रहना भी हमारे वश में न होता। इसके विपरीत, यदि हम उनसे दूर रहने में स्वतंत्र हैं, तो उन्हें करने में भी स्वतंत्र हैं।

अब, वे तर्क देते हैं कि हम जो कुछ करते हैं वह स्वतंत्र चुनाव से करते हैं, और जिन बातों से हम दूर रहते हैं उनसे स्वतंत्र रूप से दूर रहते हैं। इसलिए इससे निष्कर्ष निकलता है कि हम जो भलाई या बुराई करते हैं उससे रुकना और जो छोड़ देते हैं उसे करना हमारे वश में है। वरन् उनमें से कुछ अपनी मूर्खता में इतना आगे बढ़ गए हैं कि घमण्ड करते हैं कि जीवन तो उन्हें परमेश्वर के उपकार से मिला है, पर भली रीति से जीने की योग्यता उनमें अपनी ओर से है।

संक्षेप में, तब, दार्शनिकों का मत यह है: मानवीय बुद्धि में बसी तर्कबुद्धि हमें ठीक रीति से चलाने और यह दिखाने के लिए पर्याप्त है कि क्या करना भला है। इच्छा, तर्कबुद्धि के अधीन होने पर भी, इन्द्रिय-बोध के द्वारा बुराई करने के लिए परखी और फुसलाई जाती है; फिर भी, क्योंकि उसे चुनाव की स्वतंत्रता है, उसे तर्कबुद्धि का पूरी तरह अनुसरण करने से रोका नहीं जा सकता।

जहाँ तक मसीही कलीसिया के शिक्षकों की बात है, यद्यपि उनमें से किसी ने इस बात को मानने में चूक नहीं की कि मनुष्य की तर्कबुद्धि पाप से बहुत बिगड़ गई है और उसकी इच्छा अनेक पापमय लालसाओं के अधीन है, तौभी उनमें से अधिकांश ने दार्शनिकों का अनुसरण आवश्यकता से अधिक निकटता से किया।

मुझे लगता है कि दो विचारों ने प्राचीन पिताओं को ऐसा करने के लिए प्रेरित किया। पहला, उन्हें डर था कि यदि वे मनुष्य को भलाई करने की हर स्वतंत्रता से वंचित कर देंगे, तो दार्शनिक उनकी शिक्षा का उपहास करेंगे। दूसरा, उन्हें डर था कि शरीर, जो पहले ही असावधानी की ओर पर्याप्त झुका हुआ है, इसे भले कर्मों को तुच्छ जानने का अवसर बना लेगा। इसलिए, मानव जाति की सामान्य धारणा के विरुद्ध कुछ न सिखाने के लिए, उन्होंने पवित्रशास्त्र की शिक्षा को कुछ अंश तक दार्शनिकों की शिक्षा से मिलाने का प्रयत्न किया।

फिर भी उनके शब्दों से प्रकट है कि उन्हें मुख्यतः दूसरी बात की चिन्ता थी। क्रिसोस्तम एक स्थान पर कहता है:

“परमेश्वर ने भलाई और बुराई को हमारे वश में रखा है, और दोनों में से किसी एक को चुनने के लिए हमें स्वतंत्र इच्छा दी है। वह हमें बाध्यता से नहीं खींचता, परन्तु यदि हम स्वेच्छा से उसके पास आएँ तो ग्रहण करता है।”

फिर:

“जो बुरा है वह यदि चाहे तो भला बन सकता है, और जो भला है वह बदलकर बुरा बन सकता है। क्योंकि परमेश्वर ने हमारे स्वभाव में चुनाव की स्वतंत्रता दी है और हम पर कोई अनिवार्यता नहीं थोपता, परन्तु हमें ऐसे उपाय देता है जिन्हें हम उचित समझें तो काम में लाएँ।”

फिर:

“जैसे हम परमेश्वर के अनुग्रह की सहायता पाए बिना कोई भलाई नहीं कर सकते, वैसे ही यदि हम वह योगदान न दें जो हमारे वश में है, तो उसका अनुग्रह हमारी सहायता को नहीं आएगा।”

उसने पहले कहा था कि सब कुछ परमेश्वर की सहायता पर निर्भर नहीं है, वरन् हम भी अपनी ओर से कुछ योगदान देते हैं।

वास्तव में, यह कथन उसके यहाँ सामान्य है:

“जो हमारे वश में है वह हम दें, और शेष परमेश्वर पूरा करेगा।”

इसके अनुरूप सन्त जेरोम जो कहता है:

“आरम्भ करना हमारा काम है और पूर्ण करना परमेश्वर का; जो हम कर सकते हैं उसे प्रस्तुत करना हमारा कर्तव्य है और जो हम नहीं कर सकते उसे पूरा करना उसका।”

हम निश्चय ही देखते हैं कि इन कथनों में उन्होंने मनुष्य को उचित से अधिक सामर्थ्य दी, क्योंकि वे मानते थे कि हमारा आलस्य इसके सिवाय और किसी रीति से नहीं जगाया जा सकता कि यह सिखाया जाए कि यदि हम भली रीति से नहीं जीते तो यह हमारा ही दोष है। इसके बाद हम देखेंगे कि उनके पास ऐसा करने का उचित कारण था या नहीं। वरन्, सच कहूँ तो, यह प्रकट हो जाएगा कि जिन कथनों का हमने उल्लेख किया वे झूठे हैं।

यद्यपि यूनानी शिक्षकों ने, सब से बढ़कर—और विशेषकर सन्त क्रिसोस्तम ने—मानवीय सामर्थ्य को बढ़ा-चढ़ाकर बताने में उचित सीमा लाँघ दी, तौभी सन्त अगस्तीन को छोड़कर लगभग सब प्राचीन पिता इस विषय में इतने असंगत हैं, या इतने सन्देह से या अस्पष्ट रूप से बोलते हैं, कि उनके लेखों से मुश्किल से कोई निश्चित निष्कर्ष निकाला जा सकता है।

इसलिए हम हर एक का मत अलग-अलग बताने में नहीं रुकेंगे। हम केवल चर्चा के क्रम की माँग के अनुसार विभिन्न लेखकों ने जो कहा है उसे यथावसर छूते चलेंगे।

बाद के लेखक, जिनमें से प्रत्येक मानवीय सामर्थ्य के पक्ष में कोई विशेष सूक्ष्मता दिखाना चाहता था, क्रमशः बुरे से और बुरे में गिरते गए, यहाँ तक कि उन्होंने संसार को इस धारणा तक पहुँचा दिया कि मनुष्य केवल अपने इन्द्रिय-सम्बन्धी भाग में भ्रष्ट हुआ है, जबकि उसकी तर्कबुद्धि खरी बनी रही और उसकी इच्छा ने अधिकांश में स्वतंत्रता बनाए रखी।

स्वतंत्र इच्छा शब्द लातीनी लेखकों में सदा प्रयोग होता रहा है। यूनानी और भी धृष्ट शब्द का प्रयोग करते हैं, जिससे वे यह सूचित करते हैं कि मनुष्य में अपनी ओर से सामर्थ्य है।

चूँकि हर किसी में, साधारण लोगों में भी, यह धारणा इस प्रकार पूरी तरह बैठ गई है कि हम सब में स्वतंत्र इच्छा है—और चूँकि जो लोग विद्वान समझे जाना चाहते हैं उनमें से अधिकांश नहीं समझते कि यह स्वतंत्रता कहाँ तक मानी जाती है—आओ पहले विचार करें कि इस शब्द का अर्थ क्या है। उसके बाद, पवित्रशास्त्र की शुद्ध शिक्षा से, हम शीघ्र निर्णय कर लेंगे कि मनुष्य में भलाई या बुराई करने की कितनी योग्यता है।

यद्यपि यह शब्द सब के द्वारा सामान्यतः प्रयोग किया जाता है, फिर भी बहुत कम लोग इसकी परिभाषा करते हैं। तथापि, ओरिजन ने उस समय की सर्वमान्य परिभाषा दी प्रतीत होती है जब उसने कहा कि स्वतंत्र इच्छा भले और बुरे को पहचानने की तर्कबुद्धि की क्षमता है, और उनमें से चुनने की इच्छा की क्षमता है।

सन्त अगस्तीन इससे भिन्न नहीं कहता जब वह कहता है कि यह तर्कबुद्धि और इच्छा की वह क्षमता है जिससे परमेश्वर का अनुग्रह सहायता करे तो भलाई चुनी जाती है, और वह अनुग्रह हट जाए तो बुराई। सन्त बर्नार्ड ने और अधिक सटीक बोलने का प्रयत्न करते हुए और अस्पष्ट कर दिया, और कहा कि यह इच्छा की उस स्वतंत्रता से उठनेवाली सम्मति है, जो खोई नहीं जा सकती, और तर्कबुद्धि के एक अटल निर्णय के साथ।

अन्सेल्म की परिभाषा भी मुश्किल से अधिक स्पष्ट है। वह कहता है कि स्वतंत्र इच्छा सीधाई को सीधाई के ही लिए बनाए रखने की शक्ति है। इसलिए सेन्टेन्सेस के गुरु और विद्वत्तावादी शिक्षकों ने सन्त अगस्तीन की परिभाषा को पसन्द किया क्योंकि वह समझने में अधिक सरल थी और परमेश्वर के अनुग्रह को बाहर नहीं करती थी, जिसके बिना वे भली-भाँति जानते थे कि मानवीय इच्छा में कोई शक्ति नहीं।

तथापि उन्होंने अपनी ओर से कुछ जोड़ा, यह सोचकर कि या तो बात को बेहतर रीति से कहें या कम से कम दूसरों के कहे को और स्पष्टता से समझाएँ। पहला, वे इस पर सहमत हैं कि निर्णय शब्द तर्कबुद्धि से सम्बन्धित किया जाए, जिसका कार्य भले और बुरे में भेद करना है, जबकि उसके साथ जोड़ा गया स्वतंत्र या मुक्त विशेषण वस्तुतः इच्छा का है, जो दोनों में से किसी भी ओर झुक सकती है।

चूँकि स्वतंत्रता वस्तुतः इच्छा की है, इसलिए थॉमस एक्विनास सोचता है कि यह एक अच्छी परिभाषा होगी: स्वतंत्र इच्छा एक चुननेवाली शक्ति है, जो यद्यपि बुद्धि और इच्छा के बीच में खड़ी है, तौभी इच्छा की ओर अधिक झुकती है।

हमने अब देख लिया कि स्वतंत्र इच्छा की शक्ति किसमें बताई जाती है: अर्थात् तर्कबुद्धि और इच्छा में। अब यह निश्चित करना शेष है कि वह कहाँ तक फैली है। सामान्यतः, बाहरी बातें जो परमेश्वर के राज्य से सम्बन्ध नहीं रखतीं, मनुष्य की सम्मति और चुनाव के अधीन मानी जाती हैं, जबकि सच्ची धार्मिकता परमेश्वर के आत्मिक अनुग्रह और उसके आत्मा के नया जन्म के अधीन।

इसे व्यक्त करने की इच्छा से अन्यजातियों की बुलाहट नामक पुस्तक का लेखक कहता है कि चाहने के तीन प्रकार हैं। पहले को वह इन्द्रियजन्य, दूसरे को स्वाभाविक और तीसरे को आत्मिक कहता है। पहले दो को वह मनुष्य में स्वतंत्र बनाता है पर कहता है कि तीसरा पवित्र आत्मा का कार्य है। यह मत सत्य है या नहीं, इस पर हम आगे चर्चा करेंगे। हमारा वर्तमान कार्य केवल दूसरों के मतों को संक्षेप में बताना है।

इससे निष्कर्ष निकलता है कि लेखकों ने स्वतंत्र इच्छा पर विचार करते समय शारीरिक जीवन से सम्बन्ध रखनेवाले सब बाहरी कर्मों पर अधिक ध्यान नहीं दिया, वरन् मुख्यतः परमेश्वर की इच्छा की आज्ञाकारिता पर विचार किया। मैं सहर्ष स्वीकार करता हूँ कि यह दूसरा प्रश्न मुख्य है, परन्तु मैं यह भी मानता हूँ कि दूसरे की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, और आशा करता हूँ कि जब हम उस तक पहुँचेंगे तब अपने निर्णय को सिद्ध कर सकूँगा।

इसके अतिरिक्त, धर्मशास्त्र की पाठशालाओं में एक भेद स्वीकार किया गया है जिसमें स्वतंत्रता के तीन प्रकार गिनाए गए हैं। पहली, अनिवार्यता से स्वतंत्रता, दूसरी, पाप से स्वतंत्रता, और तीसरी, दुर्दशा से स्वतंत्रता। वे कहते हैं कि पहली स्वभाव से मनुष्य में ऐसी जड़ पकड़े हुए है कि उससे छीनी नहीं जा सकती, जबकि वे मानते हैं कि अन्य दो पाप के द्वारा खो गईं।

मैं इस भेद को सहर्ष स्वीकार करता हूँ, सिवाय इसके कि इसमें अनिवार्यता को बाध्यता से ग़लत रीति से मिला दिया गया है। उचित स्थान पर प्रकट हो जाएगा कि ये दो बहुत भिन्न बातें हैं।

इसलिए यह निश्चित है कि मनुष्य में भलाई करने की कोई स्वतंत्र इच्छा नहीं है जब तक कि उसे परमेश्वर के अनुग्रह की सहायता न मिले—और विशेषकर उस आत्मिक अनुग्रह की जो नया जन्म के द्वारा केवल चुने हुए लोगों को दिया जाता है। तथापि अभी यह स्पष्ट नहीं कि मनुष्य भलाई करने की योग्यता से पूरी तरह वंचित है या उसमें कोई छोटा और दुर्बल अवशेष बचा है जो परमेश्वर के अनुग्रह के बिना कुछ नहीं कर सकता परन्तु उस अनुग्रह की सहायता मिलने पर अपना भाग पूरा करता है।

सेन्टेन्सेस का गुरु, इस बात का निर्णय करने की इच्छा से, कहता है कि मनुष्य को भलाई करने के योग्य बनाने के लिए दोहरा अनुग्रह आवश्यक है। पहले को वह कार्यकारी अनुग्रह कहता है, जो हमें प्रभावी रूप से भलाई चाहने के लिए प्रेरित करता है। दूसरे को वह सहकारी अनुग्रह कहता है, जो भली इच्छा के पीछे-पीछे आता है कि उसकी सहायता करे।

इस विभाजन में मुझे जो अप्रिय लगता है वह यह है कि हमें प्रभावी रूप से भलाई की अभिलाषा करानेवाला कार्य परमेश्वर के अनुग्रह को देते हुए वह यह जताता है कि स्वभाव से हम कुछ अंश तक भलाई की अभिलाषा करते हैं, यद्यपि हमारी अभिलाषा का कोई प्रभाव नहीं होता। सन्त बर्नार्ड लगभग इसी रीति से बोलता है, और कहता है कि हर भली इच्छा परमेश्वर का काम है परन्तु मनुष्य अपनी ही प्रेरणा से भली इच्छा पाने की अभिलाषा कर सकता है।

परन्तु सेन्टेन्सेस का गुरु सन्त अगस्तीन को ग़लत समझा, जिसका अनुसरण वह इस भेद को करने में कर रहा था।

इसके अतिरिक्त, दूसरे भाग में एक अस्पष्टता है जो मुझे परेशान करती है, क्योंकि उसने एक विकृत धारणा उत्पन्न की है। क्योंकि विद्वत्तावादियों ने सोचा है कि वह कहता है कि हम परमेश्वर के अनुग्रह के साथ सहयोग करते हैं क्योंकि यह हमारे वश में है कि हमें दिए गए पहले अनुग्रह को ठुकराकर निष्फल कर दें या उसका पालन करके उसे पक्का करें।

अन्यजातियों की बुलाहट का लेखक भी यही मत रखता है। वह कहता है कि जिनमें विवेकपूर्ण निर्णय है वे अपने आप को अनुग्रह से हटा लेने में स्वतंत्र हैं, इसलिए उनका उससे न हटना उनके लिए सद्गुण गिना जाता है। इस प्रकार उन्हें उस काम के लिए कुछ पुण्य मिल सकता है जिसे वे चाहते तो छोड़ सकते थे, यद्यपि यह परमेश्वर के सहकारी अनुग्रह के बिना पूरा नहीं हो सकता।

मैंने इन बातों को चलते-चलते इसलिए लिखना चाहा कि पाठक समझ सके कि मैं उन विद्वत्तावादी शिक्षकों से किस बात में भिन्न हूँ जिन्होंने बाद में आए सोफिस्टों से अधिक खरी शिक्षा को थामे रखा। इन बाद के लेखकों से हमारा मतभेद और बड़ा है, क्योंकि वे अपने पूर्ववर्तियों की शुद्धता से बहुत दूर हट गए।

जो भी हो, इस भेद से हम समझ सकते हैं कि किस बात ने उन्हें मनुष्य को स्वतंत्र इच्छा देने के लिए प्रेरित किया। क्योंकि सेन्टेन्सेस का गुरु अन्त में घोषणा करता है कि मनुष्य को स्वतंत्र इच्छा वाला इसलिए नहीं कहा जाता कि वह भलाई सोचने या करने में उतना ही समर्थ है जितना बुराई करने में, वरन् केवल इसलिए कि वह बाध्यता के अधीन नहीं है।

यह स्वतंत्रता इससे बाधित नहीं होती कि हम बुरे हैं और पाप के दास हैं और बुराई के सिवाय कुछ नहीं कर सकते। इसलिए हम देखते हैं कि वे मानते हैं कि मनुष्य को स्वतंत्र इच्छा वाला इसलिए नहीं कहा जाता कि उसे भले और बुरे के बीच स्वतंत्र चुनाव है, वरन् इसलिए कि वह जो करता है स्वेच्छा से करता है, बाध्यता से नहीं।

वह कथन निश्चय ही सत्य है। परन्तु इतनी छोटी बात को इतनी भव्य उपाधि से सजाना कैसा उपहास है! वाह, कैसी शानदार स्वतंत्रता है—यह कहना कि मनुष्य को पाप की सेवा करने के लिए बाध्य नहीं किया जाता, परन्तु वह ऐसे स्वैच्छिक दासत्व में जकड़ा हुआ है कि उसकी इच्छा पाप की जंजीरों से बन्दी बनाकर रखी गई है।

निश्चय ही, मैं शब्दों के उन सब विवादों से घृणा करता हूँ जिनसे कलीसिया बिना किसी प्रयोजन के सताई जाती है। तथापि मैं समझता हूँ कि हमें हर ऐसे शब्द से बचना चाहिए जिसमें कोई बेतुका अर्थ निहित हो, विशेषकर जहाँ भूल का खतरा हो।

क्योंकि जब मनुष्य को स्वतंत्र इच्छा दी जाती है, तो कितने ऐसे नहीं जो तुरन्त यह निष्कर्ष निकालते हैं कि वह अपने निर्णय और अपनी इच्छा दोनों का स्वामी है, और अपनी ही सामर्थ्य से अपने आप को किसी भी दिशा में मोड़ सकता है? परन्तु कोई कह सकता है कि यह खतरा दूर किया जा सकता है, बशर्ते लोगों को सावधानी से सिखाया जाए कि स्वतंत्र इच्छा शब्द का क्या अर्थ है।

मैं इसके विपरीत कहता हूँ कि झूठ और छल का अनुसरण करने की हमारी स्वाभाविक प्रवृत्ति के कारण हम लम्बी व्याख्या से सत्य की शिक्षा पाने की अपेक्षा किसी एक शब्द को भूल का अवसर बना लेने में अधिक शीघ्रता करेंगे। इसका हमारे पास इसी शब्द के विषय में पर्याप्त से अधिक प्रमाण है। क्योंकि जब यह शब्द चल पड़ा, तो इसे इस रीति से अपनाया गया कि प्राचीन लेखकों की दी हुई व्याख्याओं की उपेक्षा कर दी गई, और मनुष्यों ने इसे अपने ऊपर घमण्ड करने का अवसर बना लिया।

इसके अतिरिक्त, यदि पिताओं का अधिकार हमारे लिए महत्त्व रखता है, तो यद्यपि वे इस शब्द का निरन्तर प्रयोग करते हैं, फिर भी वे दिखाते हैं कि वे इसे कितना कम मूल्य देते हैं—विशेषकर सन्त अगस्तीन, जो इच्छा को दास कहने से नहीं हिचकिचाता। यह सच है कि एक स्थान पर वह उनका विरोध करता है जो इनकार करते हैं कि कोई स्वतंत्र इच्छा है, परन्तु वह तुरन्त स्पष्ट कर देता है कि उसका क्या अभिप्राय है जब वह कहता है:

“बस कोई स्वतंत्र इच्छा से इस प्रकार इनकार न करे कि उसके द्वारा पाप का बहाना बनाना चाहे।”

दूसरी ओर, वह मानता है कि मनुष्य की इच्छा परमेश्वर के आत्मा के बिना स्वतंत्र नहीं है, क्योंकि वह अपनी ही पापमय लालसाओं से पराजित है। फिर, वह कहता है कि जब इच्छा उस दुर्गुण से पराजित हो गई जिसमें वह गिर पड़ी थी, तो हमारे स्वभाव ने अपनी स्वतंत्रता खो दी। फिर, कि मनुष्य ने स्वतंत्र इच्छा का बुरा उपयोग करके उसे भी और अपने आप को भी खो दिया। फिर, कि स्वतंत्र इच्छा बन्दी है और कोई भलाई नहीं कर सकती।

इसके अतिरिक्त, हम क्या कहें जब दूसरे स्थान पर वह इस अभिव्यक्ति का लगभग उपहास करता प्रतीत होता है, यह कहकर कि मनुष्य में स्वतंत्र इच्छा तो है, परन्तु ऐसी इच्छा नहीं जिसे स्वतंत्र किया गया हो; कि वह धार्मिकता से स्वतंत्र है और पाप का दास है? जब वह साक्षी देता है कि मनुष्य की स्वतंत्रता का अर्थ इसके सिवाय कुछ नहीं कि वह धार्मिकता से भटक गया है, और पाप की सेवा करने के लिए उसका जूआ उतार फेंका है, तो क्या वह मनुष्य को दी गई उस उपाधि का, जब कहा जाता है कि उसमें स्वतंत्र इच्छा है, स्पष्ट उपहास नहीं कर रहा?

इसलिए यदि कोई इस अभिव्यक्ति का प्रयोग खरी समझ के साथ करता है, तो मैं इस पर उससे बहुत विवाद नहीं करूँगा। परन्तु क्योंकि मैं देखता हूँ कि इसका प्रयोग बड़े खतरे के बिना नहीं हो सकता और इसे हटा देने से, इसके विपरीत, कलीसिया को बहुत लाभ होगा, इसलिए मैं इसका प्रयोग न करना पसन्द करूँगा। और यदि कोई मुझसे सलाह माँगे, तो मैं उससे कहूँगा कि इससे दूर रहे।

कुछ लोग सोच सकते हैं कि मैंने यह मानकर अपने ही पक्ष को गम्भीर हानि पहुँचाई है कि सन्त अगस्तीन को छोड़कर कलीसिया के सब शिक्षकों ने इस विषय में इतने सन्देह से या असंगत रीति से बात की कि उनसे कोई निश्चित शिक्षा नहीं निकाली जा सकती। वे इसे ऐसे समझेंगे मानो मैं उन्हें केवल इसलिए अलग कर देना चाहता था कि वे मेरे विरोध में हैं।

परन्तु मैंने इसके सिवाय और कुछ नहीं चाहा कि पाठकों के लाभ के लिए उन्हें ईमानदारी से बात की सच्ची स्थिति बता दूँ, ताकि वे इन लेखकों से उससे अधिक की आशा न रखें जितना उन्हें मिलेगा। क्योंकि वे सदा अनिश्चित बने रहेंगे: कभी पिता मनुष्य को सारी सामर्थ्य से वंचित कर देते हैं और उसे केवल परमेश्वर के अनुग्रह की शरण लेना सिखाते हैं; कभी वे उसे कोई योग्यता देते हैं, या कम से कम देते प्रतीत होते हैं।

तथापि, मेरे लिए उनके कुछ कथनों से यह दिखाना कठिन नहीं कि उनकी भाषा में जो भी अस्पष्टता पाई जाए, उन्होंने मानवीय सामर्थ्य को या तो पूरी तरह शून्य माना या कम से कम बहुत कम आँका, और भले कर्मों की सारी प्रशंसा पवित्र आत्मा को दी।

क्योंकि सन्त साइप्रियन के उस कथन का, जिसे सन्त अगस्तीन इतनी बार उद्धृत करता है, और क्या अर्थ है?

“हमें किसी बात में घमण्ड नहीं करना चाहिए, क्योंकि कोई भलाई हमारी अपनी नहीं।”

निश्चय ही, यह मनुष्य को पूरी तरह शून्य बना देता है कि उसे सब कुछ परमेश्वर में खोजना सिखाए।

यही बात लियों के प्राचीन बिशप यूकेरियस के कथन के विषय में भी सच है:

“मसीह जीवन का वृक्ष है, और जो कोई उसकी ओर हाथ बढ़ाए वह जीवित रहेगा। भले और बुरे के ज्ञान का वृक्ष स्वतंत्र इच्छा है, और जो कोई उसे चखना चाहे वह मर जाएगा।”

इसी प्रकार सन्त क्रिसोस्तम कहता है कि मनुष्य केवल स्वभाव से पापी ही नहीं, वरन् पूरी तरह पाप के सिवाय और कुछ नहीं। यदि हममें कोई भलाई नहीं; यदि मनुष्य सिर से पाँव तक पाप के सिवाय कुछ नहीं; यदि उसके लिए प्रयत्न करना भी उचित नहीं—तो स्वतंत्र इच्छा का क्या मूल्य हो सकता है? भले कर्मों की प्रशंसा को परमेश्वर और मनुष्य के बीच बाँटना कैसे उचित हो सकता है?

मैं अन्य पिताओं से ऐसी ही बहुत सी साक्षियाँ प्रस्तुत कर सकता था। परन्तु ताकि कोई यह आपत्ति न करे कि मैंने केवल वे अंश चुने हैं जो मेरे प्रयोजन के हैं और वे छोड़ दिए हैं जो मेरे पक्ष को हानि पहुँचा सकते थे, मैं सूची को बढ़ाने से रुकता हूँ।

तथापि, मैं यह कहने का साहस करता हूँ: यद्यपि वे कभी-कभी स्वतंत्र इच्छा को ऊँचा उठाने में उचित सीमा से बढ़ जाते हैं, तौभी वे सदा इसी लक्ष्य की ओर झुकते हैं—कि मनुष्य को उसकी अपनी सामर्थ्य पर भरोसे से फेर दें और उसे सिखाएँ कि उसकी सारी शक्ति अकेले परमेश्वर में है।

आओ अब सरलता और सच्चाई से विचार करें कि मनुष्य का स्वभाव वास्तव में क्या है।

मुझे यहाँ वह दोहराना पड़ रहा है जिसे मैंने इस ग्रन्थ के आरम्भ में छुआ था: अर्थात् कि जिस मनुष्य ने आत्म-ज्ञान में सबसे अधिक उन्नति की है वह वही है जो अपनी विपत्ति, दरिद्रता, नग्नता और लज्जा को समझकर गिराया और दबा दिया गया है।

क्योंकि इसका कोई खतरा नहीं कि मनुष्य अपने आप को बहुत अधिक नीचा करेगा, बशर्ते वह समझे कि जो उसमें नहीं है उसे उसे परमेश्वर में पाना है। इसके विपरीत, वह अपने आप को भलाई का एक कण भी उचित से अधिक नहीं दे सकता बिना अपने आप को व्यर्थ भरोसे से नाश किए और परमेश्वर की महिमा को हड़पकर परमेश्वर-निन्दा का दोषी बने।

वरन् जब भी यह इच्छा हमारे मन में आए—यह दावा करने की कि हमारे पास कुछ अपना है, जो परमेश्वर में नहीं वरन् हममें रहता है—तो हमें समझना चाहिए कि यह विचार किसी और सलाहकार ने नहीं सुझाया सिवाय उसके जिसने हमारे पहले माता-पिता को परमेश्वर के समान बनने की इच्छा करने के लिए बहकाया, कि भले और बुरे को जानें। यदि जो वचन मनुष्य को अपने आप में ऊँचा उठाता है वह शैतानी वचन है, तो हमें उसे कोई स्थान नहीं देना चाहिए जब तक कि हम अपने शत्रु से सम्मति लेना न चाहें।

यह निश्चय ही सुखद है कि हम कल्पना करें कि हममें इतनी सामर्थ्य है कि हम अपने आप में सन्तुष्ट रह सकते हैं। परन्तु पवित्रशास्त्र में इस व्यर्थ भरोसे के विरुद्ध हमें चेतावनी देनेवाली बहुत सी घोषणाएँ हैं, जैसे ये:

“श्रापित है वह मनुष्य जो मनुष्य पर भरोसा रखता है और शरीर को अपना बल जानता है।”

—यिर्मयाह 17

फिर:

“परमेश्वर न घोड़े के बल से प्रसन्न होता है, न मनुष्य के पैरों से, परन्तु उनसे प्रसन्न होता है जो उसका भय मानते हैं और उसकी भलाई को पहचानते हैं।”

—भजन संहिता 147

फिर:

“वही थके हुए को बल देता है और गिरे हुए साहसवाले को फिर सम्भालता है। वह भरी जवानी वालों को थकाकर गिरा देता है; वह बलवानों को क्षीण कर देता है और अपने पर आशा रखनेवालों को बल देता है।”

—यशायाह 40

इन सब घोषणाओं का लक्ष्य यही है कि यदि कोई परमेश्वर को अपना सहायक चाहता है तो वह अपनी शक्ति पर थोड़े से भी भरोसे में न ठहरे, क्योंकि परमेश्वर अभिमानियों का साम्हना करता है और दीनों पर अनुग्रह करता है।

आओ इन सब प्रतिज्ञाओं को भी स्मरण करें:

“मैं प्यासी भूमि पर जल और सूखी भूमि पर नदियाँ बहाऊँगा।”

—यशायाह 44

फिर:

“हे सब प्यासे लोगो, आओ और जल भर लो।”

—यशायाह 55

और ऐसी ही अन्य प्रतिज्ञाएँ हैं, जो सब साक्षी देती हैं कि परमेश्वर की आशीषें पाने के लिए कोई प्रवेश नहीं पाता सिवाय उस व्यक्ति के जो अपनी दरिद्रता के बोध से मूर्छित और निढाल हो जाता है।

और हमें अन्य अंश भी नहीं भूलने चाहिए, जैसे यशायाह का यह अंश:

“न तो दिन को सूर्य तेरी ज्योति होगा, न रात को चन्द्रमा, परन्तु तेरा परमेश्वर तेरी सदा की ज्योति होगा।”

—यशायाह 60

निश्चय ही प्रभु अपने सेवकों से सूर्य या चन्द्रमा का प्रकाश नहीं छीनता। परन्तु क्योंकि वह चाहता है कि उनमें अकेला वही महिमामय प्रकट हो, इसलिए वह उनसे उन सब वस्तुओं पर भरोसा दूर कर देता है जो हमारी दृष्टि में सबसे उत्तम प्रतीत होती हैं।

इसलिए, मैं क्रिसोस्तम के इस कथन से सदा बहुत प्रसन्न रहा हूँ, जिसमें वह कहता है कि दीनता हमारे दर्शन की नींव है। मैं सन्त अगस्तीन के कथन से और भी अधिक प्रसन्न हूँ:

“जब यूनानी वक्ता डेमोस्थनीज़ से पूछा गया कि वाक्पटुता का पहला नियम क्या है, तो उसने उत्तर दिया, ‘प्रस्तुति।’ जब दूसरा पूछा गया, तो उसने वही उत्तर दिया, और तीसरे के विषय में भी वैसा ही। उसी प्रकार, यदि तुम मुझसे मसीही धर्म के सिद्धान्तों के विषय में पूछो, तो मैं उत्तर दूँगा कि पहला, दूसरा और तीसरा, दीनता है।”

परन्तु दीनता से अगस्तीन का यह अर्थ नहीं कि जो मनुष्य कल्पना करता है कि उसमें कुछ सामर्थ्य है वह फिर भी घमण्डी होने से रुका रहे। उसका अर्थ यह है कि मनुष्य सचमुच अपने आप को ऐसा पहचाने कि उसके पास परमेश्वर के सम्मुख अपने आप को दीन करने के सिवाय कोई शरण नहीं, जैसा अगस्तीन अन्यत्र घोषणा करता है:

“कोई अपनी चापलूसी न करे। अपने आप में हर मनुष्य शैतान है; जो भलाई उसके पास है वह उसे परमेश्वर से मिली है। क्योंकि तेरे पास अपनी ओर से पाप के सिवाय और क्या है? यदि तू अपना दावा करना चाहता है, तो पाप का दावा कर, क्योंकि धार्मिकता परमेश्वर की है।”

फिर:

“हम अपने स्वभाव की सामर्थ्य पर इतना भरोसा क्यों करते हैं? वह घायल है, गिराया हुआ है, बिखरा हुआ है और नष्ट हो चुका है। उसे सच्चे अंगीकार की आवश्यकता है, झूठे बचाव की नहीं।”

इसलिए हम अपने कथित अधिकारों के विषय में परमेश्वर से विवाद न करें, मानो हम कंगाल किए जा रहे हों। क्योंकि जैसे हमारी दीनता उसकी महिमा का बढ़ना है, वैसे ही हमारी दीनता का अंगीकार सदा उसकी दया को अपने उपाय के रूप में तैयार पाता है।

फिर भी मेरा यह अभिप्राय नहीं कि मनुष्य परमेश्वर को वह कुछ सौंप दे जो न्यायपूर्वक उसका अपना है, या जो भी योग्यता उसमें सचमुच हो उसे पहचानने से अपने मन को केवल अपने आप को दीन बनाने के लिए फेर ले। मैं केवल यह माँगता हूँ कि सारे मूर्खतापूर्ण आत्म-प्रेम, घमण्ड और महत्त्वाकांक्षा को—जिन भावनाओं से वह बहुत अधिक अन्धा हो गया है—एक ओर रखकर वह अपने आप को पवित्रशास्त्र के दर्पण में देखे।

ताकि हमारी चर्चा उस भेद के अनुसार आगे बढ़े जो हमने स्थापित किया है, जिसके द्वारा हमने मानवीय आत्मा को बुद्धि और इच्छा में बाँटा, हमें पहले जाँचना चाहिए कि बुद्धि में कितनी सामर्थ्य है।

यह कहना कि वह इतनी पूरी तरह अन्धी हो गई है कि उसमें किसी भी बात का कोई ज्ञान शेष नहीं रहा, न केवल परमेश्वर के वचन के, वरन् साधारण अनुभव के भी विरुद्ध होगा। क्योंकि हम देखते हैं कि मानव-मन में सत्य की खोज करने की कुछ अभिलाषा है, जिसकी ओर वह इतना न झुकता यदि उसे पहले उसका कुछ स्वाद न मिला होता।

इसलिए यह तथ्य कि मानव-मन में सत्य के प्रति स्वाभाविक प्रेम है, पहले से ही उसमें प्रकाश की एक चिनगारी है। पशुओं में सत्य के प्रति जो तिरस्कार पाया जाता है वह दर्शाता है कि वे जड़ता से भरे हैं और उनमें तर्कबुद्धि का कोई बोध नहीं। तथापि यह अभिलाषा, जैसी भी है, ठीक रीति से आरम्भ होने से पहले ही विफल हो जाती है, क्योंकि वह व्यर्थता में गिर पड़ती है।

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