अध्याय 10

अध्याय सात: पुरानी और नई वाचा की समानताएँ और भिन्नताएँ (भाग 1/2)

Institutes of the Christian Religion (1541) · John Calvin

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अध्याय सात: पुरानी और नई वाचा की समानताएँ और भिन्नताएँ (भाग 1/2)

अध्याय सात

पुरानी और नई वाचा की समानताएँ और भिन्नताएँ

मैंने ऊपर यथासामर्थ्य मसीही सिद्धान्त का सार समझा दिया है, जो परमेश्वर और स्वयं के ज्ञान में निहित है, और जिसके द्वारा हम उद्धार प्राप्त करते हैं। अब हमें एक ऐसा विषय और जोड़ना है जिसे समझना उस सिद्धान्त की सच्चाई को स्थापित करने के लिए बहुत लाभदायक है जो हमने सिखाया है। वह यह है: जिन-जिन को परमेश्वर ने जगत के आरम्भ से अपने लोगों की सहभागिता में बुलाया, उन सब ने इसी शिक्षा के द्वारा यह अनुग्रह पाया और इसी के बन्धन से परमेश्वर के साथ जुड़े।

यद्यपि जो प्रमाण हमने व्यवस्था और भविष्यद्वक्ताओं दोनों में से एकत्र किए हैं, और जो हमारे कथन की पुष्टि करते हैं, वे पर्याप्त रूप से दिखाते हैं कि परमेश्वर के लोगों के पास पवित्रता और धर्म का कभी कोई और नियम नहीं रहा; तथापि, क्योंकि धर्मविज्ञानी पुराने और नए नियम के भेद के विषय में प्रायः लम्बी चर्चाएँ करते हैं, जो सीधे-सादे लोगों के लिए कुछ कठिनाई उत्पन्न कर सकती हैं, इसलिए मैंने उचित समझा कि इस विषय की अधिक पूर्ण जाँच के लिए एक अलग विवेचन समर्पित करूँ।

फिर, जो बात अन्यथा बहुत लाभदायक होती, वह कुछ अनाबैपटिस्टों के उपद्रवी आचरण के कारण आवश्यक हो गई है, जो इस्राएल की प्रजा को सूअरों के झुण्ड से अधिक कुछ नहीं समझते। क्योंकि वे कल्पना करते हैं कि हमारे प्रभु का अभिप्राय केवल यह था कि उन्हें पृथ्वी पर नाँद की भाँति मोटा-ताज़ा करे, और स्वर्गीय अमरता की कोई आशा उन्हें न दे।

इसलिए, सब विश्वासियों को इस घातक भ्रम से दूर खींचने के लिए, और सीधे-सादे लोगों को उन सब कठिनाइयों से छुड़ाने के लिए जो पुराने और नए नियम के बीच किसी भेद की चर्चा होते ही उनके मन में उठती हैं, आइए हम संक्षेप में विचार करें कि जो वाचा प्रभु ने मसीह के आने से पहले इस्राएल की प्रजा से बाँधी, वह उस वाचा से किन बातों में मिलती है और किन में भिन्न है जो उसने मसीह को देह में प्रकट करने के बाद से हमारे साथ बाँधी है।

दोनों बातें एक ही कथन में समेटी जा सकती हैं: प्राचीन पूर्वजों के साथ बाँधी गई वाचा सार और सत्य में हमारी वाचा से इतनी मिलती है कि उसे एक और वही वाचा कहा जा सकता है; भेद केवल उसके प्रशासन की रीति में है।

परन्तु इतने संक्षेप से कोई स्पष्ट समझ नहीं पा सकता, इसलिए यदि हम कुछ आगे बढ़ना चाहते हैं तो विषय की अधिक पूर्ण जाँच करनी होगी। इन वाचाओं की समानता, या कहें एकता, को समझाने में उन सब बातों की जिन्हें हम पहले ही निपटा चुके हैं फिर से विस्तार से चर्चा करना अनावश्यक होगा। इसलिए हमें यहाँ तीन विषयों पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए।

पहला, प्रभु ने यहूदियों के सामने सांसारिक सुख या समृद्धि को ऐसे लक्ष्य के रूप में नहीं रखा जिसकी वे आकांक्षा करें, वरन् उन्हें अमरता की आशा में ग्रहण किया, और इस ग्रहण को दर्शनों के द्वारा तथा अपनी व्यवस्था और भविष्यद्वक्ताओं में प्रकट और प्रमाणित किया।

दूसरा, जिस वाचा के द्वारा वे परमेश्वर से जुड़े, वह उनके पुण्य पर नहीं, वरन् केवल उसकी दया पर आधारित थी।

तीसरा, उन्होंने मसीह को मध्यस्थ के रूप में पाया और जाना, जिसके द्वारा वे परमेश्वर से जुड़े और उसकी प्रतिज्ञाओं के भागी बनाए गए।

दूसरा विषय हमें भली-भाँति ज्ञात होना चाहिए, क्योंकि हमने भविष्यद्वक्ताओं की इतनी साक्षियों से स्पष्ट सिद्ध किया है कि प्रभु ने अपने लोगों के लिए जो कुछ भला किया या जिसकी प्रतिज्ञा की, वह सब उसकी शुद्ध भलाई और दया से निकला है। तीसरे विषय को भी हमने अनेक स्थानों पर पर्याप्त रूप से दिखाया है, और पहले को भी चलते-चलते कुछ छुआ है। परन्तु क्योंकि पहले विषय का वर्णन औरों से अधिक संक्षेप में हुआ, और क्योंकि वही अधिक वाद-विवाद और विरोध का विषय है, इसलिए उसे समझाने में हमें अधिक यत्न करना होगा। फिर भी हमें उसे इस प्रकार निपटाना चाहिए कि यदि अन्य दो की उचित व्याख्या में कुछ कमी रह गई हो, तो उसे भी हम संक्षेप में पूरा कर लें।

प्रेरित इन तीनों विषयों के सम्बन्ध में सब सन्देह निश्चय ही दूर कर देता है, जब वह कहता है कि प्रभु ने यीशु मसीह के सुसमाचार की प्रतिज्ञा बहुत पहले भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा पवित्रशास्त्र में की थी, और अब अपने ठहराए हुए समय पर उसे प्रकट किया है।

“परमेश्वर का सुसमाचार, जिसकी उसने पहले ही से अपने भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा पवित्रशास्त्र में अपने पुत्र के विषय में प्रतिज्ञा की थी।”

—रोमियों 1:1–3

फिर वह कहता है कि सुसमाचार में सिखाई गई विश्वास की धार्मिकता की साक्षी व्यवस्था और भविष्यद्वक्ताओं ने दी थी।

“परन्तु अब व्यवस्था से अलग परमेश्वर की धार्मिकता प्रगट हुई है, जिसकी साक्षी व्यवस्था और भविष्यद्वक्ता देते हैं।”

—रोमियों 3:21

सुसमाचार निश्चय ही मनुष्यों के हृदयों को वर्तमान जीवन के भोग तक सीमित नहीं रखता, वरन् उन्हें अमरता की आशा तक ऊपर उठाता है। न वह उन्हें सांसारिक सुखों से जकड़ता है, वरन् उन्हें वह आशा दिखाकर जो स्वर्ग में उनके लिए रखी है, ऊपर की ओर ले जाता है। क्योंकि वही वर्णन जो वह अन्यत्र देता है, हमें यहीं पहुँचाता है:

“जब तुम ने सुसमाचार को सुना, तो उसी में विश्वास करके प्रतिज्ञा किए हुए पवित्र आत्मा की छाप तुम पर लगी, जो हमारी मीरास का बयाना है।”

—इफिसियों 1:13–14

फिर:

“हम ने मसीह में तुम्हारे विश्वास और सब विश्वासियों के प्रति तुम्हारे प्रेम का समाचार सुना है, उस आशा के कारण जो तुम्हारे लिए स्वर्ग में रखी है, जिसका वर्णन तुम सुसमाचार की शिक्षा के द्वारा सुन चुके हो।”

—कुलुस्सियों 1:4–5

फिर:

“प्रभु ने तुम्हें हमारे सुसमाचार के द्वारा बुलाया, ताकि तुम हमारे प्रभु यीशु मसीह की महिमा के भागी हो।”

—2 थिस्सलुनीकियों 2:14

इसी कारण सुसमाचार को उद्धार की शिक्षा, हर एक विश्वास करनेवाले के उद्धार के लिए परमेश्वर की सामर्थ्य, और स्वर्ग का राज्य भी कहा जाता है।

अब यदि सुसमाचार की शिक्षा आत्मिक है और हमें अविनाशी जीवन में प्रवेश दिलाती है, तो हम यह कल्पना न करें कि जिन्हें सुसमाचार की प्रतिज्ञा दी गई और जिन्हें उसका प्रचार किया गया, वे पशुओं के समान बने रहे, और अपनी आत्माओं की कोई चिन्ता किए बिना शारीरिक सुखों में लिप्त रहे।

न कोई यह कहकर बात बनाए कि सुसमाचार की जो प्रतिज्ञाएँ परमेश्वर ने पहले अपने भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा दीं, वे केवल नए नियम के लोगों के लिए थीं। क्योंकि यह कहने के थोड़ी ही देर बाद कि सुसमाचार की प्रतिज्ञा व्यवस्था में की गई थी, प्रेरित यह भी जोड़ता है:

“व्यवस्था जो कुछ कहती है, उन्हीं से कहती है जो व्यवस्था के अधीन हैं।”

—रोमियों 3:19

मैं सहर्ष मानता हूँ कि वह वहाँ किसी और विषय की चर्चा कर रहा है। परन्तु वह इतना भुलक्कड़ नहीं था कि यह कहते हुए कि व्यवस्था की सारी शिक्षा यहूदियों की है, वह यह भूल जाता कि उसने इससे पहले व्यवस्था में प्रतिज्ञा किए गए सुसमाचार के विषय में क्या कहा था।

इसलिए वह इस स्थान पर स्पष्ट दिखाता है कि पुराना नियम मुख्यतः आनेवाले जीवन की ओर दृष्टि रखता था, क्योंकि वह कहता है कि सुसमाचार की प्रतिज्ञाएँ उसी में समाई हुई हैं। इसी तर्क से यह निष्कर्ष निकलता है कि पुराना नियम परमेश्वर की सेंतमेंत दया पर टिका था और अपनी निश्चयता मसीह में रखता था।

क्योंकि सुसमाचार का प्रचार इसके सिवाय और कुछ घोषित नहीं करता कि दीन पापी परमेश्वर की पिता-तुल्य दया से, बिना उसे कमाए, धर्मी ठहराए जाते हैं, और उसका सम्पूर्ण सार यीशु मसीह में समाया हुआ है। तब कौन यहूदियों को मसीह से वंचित करने का साहस करेगा, जबकि हम सुनते हैं कि सुसमाचार की वाचा उन्हीं के साथ बाँधी गई थी—ऐसी वाचा जिसकी एकमात्र नींव मसीह है? कौन उन्हें सेंतमेंत उद्धार की आशा से बाहर करेगा, जबकि हम सुनते हैं कि विश्वास की शिक्षा उन्हीं को दी गई थी—वह शिक्षा जो हमें सेंतमेंत धार्मिकता दिलाती है?

और ऐसी स्पष्ट बात पर लम्बा विवाद न करना पड़े, इसलिए हमारे पास प्रभु यीशु का एक उल्लेखनीय कथन है:

“अब्राहम मेरा दिन देखने की बड़ी अभिलाषा से मगन था; उसने उसे देखा और आनन्दित हुआ।”

—यूहन्ना 8:56

वहाँ अब्राहम के विषय में जो कहा गया है, प्रेरित दिखाता है कि वह विश्वासियों की सारी मण्डली के लिए सामान्य था, जब वह कहता है:

“यीशु मसीह कल और आज और युगानुयुग एक सा है।”

—इब्रानियों 13:8

क्योंकि वह केवल मसीह के अनन्त ईश्वरत्व की नहीं, वरन् उसकी सामर्थ्य के उस ज्ञान की बात कर रहा है जो विश्वासियों को सदा दिया जाता रहा है।

इसीलिए अपने गीतों में कुँवारी मरियम और जकर्याह मसीह में प्रकट हुए उद्धार को उन प्रतिज्ञाओं की पूर्ति कहते हैं जो परमेश्वर ने अब्राहम और कुलपतियों से की थीं। यदि परमेश्वर ने अपने मसीह को प्रकट करके अपनी प्राचीन शपथ पूरी की, तो इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि पुराने नियम का अन्त मसीह और अनन्त जीवन था।

फिर, प्रेरित न केवल इस्राएल की प्रजा को वाचा के अनुग्रह में हमारे समान और बराबर ठहराता है, वरन् संस्कारों के अर्थ में भी समान ठहराता है। क्योंकि जब वह कुरिन्थियों को उनके उदाहरण से चेताना चाहता है, कि कहीं वे उन्हीं अपराधों में न गिरें जिन्हें परमेश्वर ने उनमें कठोरता से दण्ड दिया था, तो वह आरम्भ में ही यह घोषणा करता है कि हमारे पास कोई ऐसा विशेषाधिकार या प्रतिष्ठा नहीं जो हमें परमेश्वर के उस प्रतिशोध से बचा सके जो उन पर आया।

वस्तुतः प्रभु ने न केवल उन्हें वही लाभ दिए जो वह हमें देता है, वरन् उसने उनके बीच अपना अनुग्रह उन्हीं चिह्नों और संस्कारों के द्वारा भी प्रकट किया। मानो उसने कहा हो: तुम अपने को संकट से परे समझते हो, क्योंकि बपतिस्मा, जिससे तुम पर चिह्न लगा है, और प्रभु-भोज में विशेष प्रतिज्ञाएँ हैं। इस बीच तुम परमेश्वर की भलाई को तुच्छ जानकर उच्छृंखल जीवन बिताते हो। परन्तु तुम्हें समझना चाहिए कि यहूदी भी इन्हीं संस्कारों से वंचित नहीं थे, फिर भी प्रभु ने उनके विरुद्ध अपने न्याय की कठोरता दिखाने से परहेज़ नहीं किया।

वे लाल समुद्र के पार जाने में और उस बादल में, जो उन्हें धूप की गर्मी से बचाता था, बपतिस्मा पाए थे।

जो लोग इस शिक्षा का विरोध करते हैं, वे कहते हैं कि वह एक शारीरिक बपतिस्मा था, जो हमारे आत्मिक बपतिस्मा से केवल किसी समानता के कारण मेल खाता था। परन्तु यदि यह मान लिया जाए, तो प्रेरित के तर्क में कोई बल नहीं रहेगा, क्योंकि उसका उद्देश्य मसीहियों को इस व्यर्थ भरोसे से वंचित करना था कि वे बपतिस्मा के कारण यहूदियों से श्रेष्ठ हैं।

और जो इसके तुरन्त बाद आता है, उसे भी बहाने बनाकर टाला नहीं जा सकता:

“उन सब ने एक ही आत्मिक भोजन खाया और एक ही आत्मिक जल पिया, जो हमें दिया जाता है।”

—1 कुरिन्थियों 10:3–4

सन्त पौलुस समझाता है कि वह भोजन और जल यीशु मसीह ही था।

परन्तु सन्त पौलुस का अधिकार गिराने के लिए वे मसीह के इस कथन को आपत्ति के रूप में रखते हैं:

“तुम्हारे बापदादों ने जंगल में मन्ना खाया और मर गए। जो मेरा मांस खाएगा, वह सदा के लिए नहीं मरेगा।”

—यूहन्ना 6:49–51

इन दोनों स्थलों का मेल सरलता से बैठ जाता है। क्योंकि प्रभु यीशु ऐसे श्रोताओं से बात कर रहा था जो केवल अपना पेट भरना चाहते थे और अपनी आत्माओं के सच्चे पोषण की बहुत कम चिन्ता करते थे, इसलिए उसने अपनी बात को उनकी समझ के अनुकूल कुछ ढाल लिया। विशेषकर उसने मन्ना की तुलना उनकी समझ के अनुसार अपनी देह से की।

उन्होंने माँग की थी कि अपना अधिकार प्रमाणित करने के लिए वह अपनी सामर्थ्य को किसी ऐसे चमत्कार से दिखाए जैसा मूसा ने जंगल में किया था, जब उसने स्वर्ग से मन्ना बरसवाया था। मन्ना में उन्होंने केवल उस शारीरिक आवश्यकता का उपाय देखा जो जंगल में प्रजा को सता रही थी। वे इतनी ऊँचाई तक नहीं उठे कि उस भेद पर विचार करें जिसकी चर्चा सन्त पौलुस करता है।

इसलिए मसीह ने यह दिखाने के लिए कि उन्हें उससे उस लाभ से कहीं बड़े और उत्तम लाभ की आशा रखनी चाहिए जो वे मानते थे कि उनके बापदादों को मूसा से मिला, यह तुलना की: यदि तुम्हारे विचार में यह इतना उत्तम चमत्कार था कि प्रभु ने मूसा के हाथ से अपने लोगों के पास स्वर्गीय भोजन भेजा, कि वे भूख से नष्ट न हों वरन् कुछ समय तक पलते रहें, तो इसी से जान लो कि वह भोजन कितना अधिक मूल्यवान है जो अमरता देता है।

हम देखते हैं कि प्रभु ने मन्ना में जो मुख्य बात थी उसे क्यों छोड़ दिया और केवल उसके छोटे लाभ का ही ध्यान किया। यहूदियों ने निन्दा के भाव से मूसा को उसके सामने रखा था, मानो उसने इस्राएल की प्रजा को उसकी आवश्यकता में चमत्कारिक रूप से मन्ना खिलाकर राहत दी थी। मसीह उत्तर देता है कि वह कहीं अधिक मूल्यवान अनुग्रह का बाँटनेवाला है, जिसकी तुलना में मूसा ने इस्राएल के लिए जो किया वह लगभग कुछ भी नहीं था, चाहे वे उसे कितना ही ऊँचा क्यों न मानते हों।

सन्त पौलुस ने यह विचार करके कि जब प्रभु ने स्वर्ग से मन्ना बरसाया, तब उसका अभिप्राय केवल अपने लोगों को शारीरिक भोजन भेजना ही नहीं था, वरन् उन्हें एक आत्मिक भेद भी देना था जो उस अनन्त जीवन को दर्शाता है जिसकी आशा उन्हें मसीह से रखनी थी, इस विषय को वैसे ही निपटाया जैसा पूरी तरह समझाए जाने के योग्य था। इसलिए हम निःसन्देह यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि अनन्त जीवन की वही प्रतिज्ञाएँ जो आज हमारे सामने रखी जाती हैं, न केवल यहूदियों को भी बताई गईं, वरन् सचमुच आत्मिक संस्कारों के द्वारा उन्हें मुहरबन्द और पक्की भी की गईं।

यदि पाठक चाहें कि व्यवस्था और भविष्यद्वक्ताओं में परमेश्वर की आत्मिक वाचा का वह प्रकाशन देखें, जिसके वहाँ होने को हमने यीशु मसीह और उसके प्रेरितों के वचनों से दिखाया है, तो मैं इस विषय में उन्हें सन्तुष्ट करने को तैयार हूँ। मैं यह और भी प्रसन्नता से करता हूँ, क्योंकि इस प्रकार हमारे विरोधी और अधिक पूरी तरह निरुत्तर हो जाएँगे और उनके पास बच निकलने का कोई अवसर नहीं रहेगा।

हम एक ऐसे प्रमाण से आरम्भ करेंगे, जिसे अनाबैपटिस्ट, मुझे सन्देह नहीं, तुच्छ और लगभग हास्यास्पद ठहराएँगे—वे हर तर्क को इतने अभिमान से ठुकराते हैं—फिर भी वह सब शिक्षा-योग्य और खरी बुद्धिवाले लोगों की दृष्टि में बहुत वज़न रखेगा। चूँकि परमेश्वर ने अपने जीवन के वचन के द्वारा अपने आप को उन सब को दिया जिन्हें उसने कभी अनुग्रह में ग्रहण किया, इसलिए यह निष्कर्ष निकलता है कि उसने उन्हें अनन्त जीवन का भागी बनाया।

मैं कहता हूँ कि परमेश्वर के वचन में ऐसी जीवनदायिनी सामर्थ्य है कि उसका दिया जाना आत्मा को जिलाने का सबसे निश्चित साधन है। दिए जाने से मेरा अभिप्राय उस सामान्य और सार्वभौमिक क्रिया से नहीं है जो स्वर्ग और पृथ्वी में और जगत के सब प्राणियों पर फैली हुई है। क्योंकि यद्यपि वह सब वस्तुओं को उनके भिन्न-भिन्न स्वभाव के अनुसार जीवन देती है, तथापि वह उन सब को विनाश से नहीं छुड़ाती। मेरा अभिप्राय उस विशेष देन से है जिसके द्वारा विश्वासियों की आत्माएँ परमेश्वर के ज्ञान में प्रकाशित होती हैं और कुछ अंश तक उससे जुड़ जाती हैं।

इसलिए चूँकि अब्राहम, इसहाक, नूह, हाबिल, आदम और अन्य पूर्वज परमेश्वर के वचन के ऐसे प्रकाश के द्वारा उससे लगे रहे, इसलिए मैं कहता हूँ कि इसमें कोई सन्देह नहीं कि इसने उन्हें परमेश्वर के अनन्त राज्य में प्रवेश दिलाया। क्योंकि यह परमेश्वर में सच्ची सहभागिता थी, जो अनन्त जीवन के अनुग्रह के बिना हो ही नहीं सकती।

यदि यह अब भी कुछ अस्पष्ट लगे, तो आइए हम वाचा के स्वरूप पर ही आएँ, जो न केवल हर शान्तिप्रिय मन को सन्तुष्ट करेगा, वरन् हमारा खण्डन करने का यत्न करनेवालों की अज्ञानता को भी पर्याप्त रूप से उजागर कर देगा। प्रभु ने अपने सेवकों के साथ यह वाचा सदा इसी रूप में बाँधी:

“मैं तुम्हारा परमेश्वर होऊँगा, और तुम मेरी प्रजा होगे।”

—लैव्यव्यवस्था 26:12

भविष्यद्वक्ताओं ने स्वयं समझाया कि इन शब्दों में जीवन, उद्धार और सब आशीषों का सार सम्मिलित है। क्योंकि दाऊद का बार-बार यह घोषणा करना निरर्थक नहीं है:

“क्या ही धन्य है वह जाति जिसका परमेश्वर यहोवा है।”

—भजन संहिता 144:15

और:

“क्या ही धन्य है वह जाति जिसे उसने अपना निज भाग होने के लिए चुन लिया।”

—भजन संहिता 33:12

इसका अर्थ केवल सांसारिक सुख नहीं समझना चाहिए, वरन् यह कि परमेश्वर उन सब को मृत्यु से छुड़ाता है, सदा के लिए सुरक्षित रखता है, और अपनी दया में निरन्तर थामे रहता है जिन्हें उसने अपने लोगों की सहभागिता में ग्रहण किया है।

यही बात अन्य भविष्यद्वक्ता भी कहते हैं:

“तू हमारा परमेश्वर है; हम नहीं मरेंगे।”

—हबक्कूक 1:12

फिर:

“यहोवा हमारा राजा और हमारा व्यवस्थादाता है; वही हमारा उद्धार करेगा।”

—यशायाह 33:22

फिर:

“हे इस्राएल, तू धन्य है, क्योंकि तेरा उद्धार परमेश्वर में है।”

—व्यवस्थाविवरण 33:29

परन्तु हम अनावश्यक बातों में अत्यधिक परिश्रम न करें, इसलिए यह चेतावनी जो पवित्रशास्त्र हमें बार-बार देता है, अपने आप में हमें सन्तुष्ट करने को पर्याप्त हो: हमारे पास हर भली वस्तु की भरमार और उद्धार की निश्चयता के लिए किसी बात की घटी नहीं, यदि प्रभु हमारा परमेश्वर है।

और ठीक ही है। क्योंकि यदि उसके मुख का प्रकाश उद्धार की सबसे निश्चित प्रतिभूति है, तो वह किसी मनुष्य का परमेश्वर होने की घोषणा करे और साथ ही उसके लिए उद्धार के भण्डार न खोले, यह कैसे हो सकता है? क्योंकि वह इसी शर्त पर हमारा परमेश्वर है कि वह हमारे बीच वास करता है, जैसा उसने मूसा के द्वारा प्रमाणित किया:

“मैं तुम्हारे बीच अपना निवास-स्थान बनाऊँगा, और तुम्हारे बीच चलूँगा-फिरूँगा। मैं तुम्हारा परमेश्वर होऊँगा, और तुम मेरी प्रजा होगे।”

—लैव्यव्यवस्था 26:11–12

ऐसी उपस्थिति जीवन पाए बिना प्राप्त नहीं हो सकती। यदि उनसे और कुछ भी न कहा जाता, तब भी इन शब्दों में उन्हें आत्मिक जीवन की पर्याप्त स्पष्ट प्रतिज्ञा मिल चुकी थी:

“मैं तुम्हारा परमेश्वर हूँ।”

—उत्पत्ति 17:7

क्योंकि उसने यह घोषणा नहीं की कि वह केवल उनकी देहों का परमेश्वर होगा, वरन् मुख्यतः उनकी आत्माओं का। अब यदि आत्माएँ धार्मिकता के द्वारा परमेश्वर से जुड़ी न हों, तो वे उससे अजनबी होकर मृत ही रहती हैं। परन्तु यदि उन्हें उसके साथ सहभागिता प्राप्त हो, तो वही उन्हें जीवन देगी।

इतना ही नहीं: उसने न केवल अपने आप को उनका परमेश्वर घोषित किया, वरन् सदा वैसा ही बने रहने की प्रतिज्ञा की, ताकि उनकी आशा वर्तमान वस्तुओं में न ठहरकर अनन्तकाल तक फैल जाए।

भविष्यकाल में कही गई इस उक्ति को इसी अर्थ में समझा गया, यह विश्वासियों के अनेक कथनों से प्रकट है, जिनमें वे इस निश्चय से अपने को शान्ति देते हैं कि परमेश्वर उन्हें कभी नहीं छोड़ेगा।

फिर, वाचा का एक दूसरा भाग भी था, जिसने उन्हें और भी पूरी रीति से निश्चय दिलाया कि परमेश्वर की आशीष उनके लिए इस सांसारिक जीवन की सीमाओं से परे भी तैयार है:

“मैं तेरे पश्चात् तेरे वंश का भी परमेश्वर होऊँगा।”

—उत्पत्ति 17:7

क्योंकि यदि प्रभु उनके वंशजों का भला करके उनके प्रति अपनी सद्भावना प्रकट करना चाहता था, तो इससे और भी दृढ़ता से यह निष्कर्ष निकलता है कि उसकी कृपा उन पर व्यक्तिगत रूप से भी प्रकट होगी। परमेश्वर मनुष्यों के समान नहीं है, जो मरे हुओं के प्रति अपना प्रेम उनके बच्चों पर इसलिए उँडेलते हैं कि अब उनमें मरे हुओं का भला करने की सामर्थ्य नहीं रही। परन्तु परमेश्वर, जिसकी कृपा मृत्यु से बाधित नहीं होती, उनसे अपनी दया का फल नहीं रोकता जिनके कारण उसने उनके वंशजों पर हज़ार पीढ़ियों तक दया की है।

इसलिए उसने इसके द्वारा अपनी भलाई की वह अपार बहुतायत दिखानी चाही, जिसे उसके सेवकों को मृत्यु के बाद भी अनुभव करना था, जब उसने उसे उनके संसार से चले जाने के बाद भी उनके सारे घराने पर फैलनेवाला बताया।

इस प्रतिज्ञा की सच्चाई पर प्रभु ने मुहर लगाई, और उसकी पूर्ति मानो प्रकट कर दी, जब उसने अब्राहम, इसहाक और याकूब की मृत्यु के बहुत समय बाद अपने आप को उनका परमेश्वर कहा।

“मैं अब्राहम का परमेश्वर, इसहाक का परमेश्वर और याकूब का परमेश्वर हूँ।”

—निर्गमन 3:6

यदि वे नष्ट हो गए होते, तो क्या यह उपाधि हास्यास्पद न होती? इसका अर्थ यह होता: “मैं उनका परमेश्वर हूँ जो अब हैं ही नहीं।” इसलिए सुसमाचार लेखक बताते हैं कि मसीह ने इसी एक तर्क से सदूकियों को निरुत्तर किया, ताकि वे इनकार न कर सकें कि मूसा ने इसी स्थल में मरे हुओं के जी उठने की साक्षी दी है।

“वह मरे हुओं का नहीं, वरन् जीवितों का परमेश्वर है।”

—मत्ती 22:32

वस्तुतः उन्होंने मूसा से यह भी सीखा था:

“उसके सब पवित्र लोग तेरे हाथ में हैं।”

—व्यवस्थाविवरण 33:3

इससे उनके लिए यह निष्कर्ष निकालना सरल था कि पवित्र लोग मृत्यु से बुझ नहीं जाते, क्योंकि जिसके हाथ में जीवन और मृत्यु दोनों हैं, उसने उन्हें अपनी देखभाल और संरक्षण में ले लिया है।

अब हम इस विवाद के मुख्य विषय पर विचार करें: क्या पुराने नियम के अधीन विश्वासी परमेश्वर से इस प्रकार शिक्षित थे कि वे जानते थे कि उनके लिए पृथ्वी के सिवाय कहीं और एक उत्तम जीवन है, और इसलिए उसी पर मन लगाते और इस नाशमान जीवन को तुच्छ जानते थे।

पहले, जिस प्रकार का जीवन परमेश्वर ने उनके लिए ठहराया, वह एक निरन्तर अभ्यास के सिवाय और कुछ न था, जिसके द्वारा वह उन्हें चेताता था कि यदि उनका सुख पृथ्वी तक ही सीमित है, तो वे संसार में सबसे अधिक अभागे लोग हैं।

आदम तो अपने खोए हुए सुख की स्मृति मात्र से ही दयनीय से भी अधिक था, और जी-तोड़ परिश्रम करके भी वह मुश्किल से थोड़ी-सी जीविका जुटा पाता था। और इसलिए कि वह केवल परमेश्वर के इसी शाप से पीड़ित न हो, उसे उसी स्रोत से असाधारण वेदना भोगनी पड़ी जिससे उसे कुछ सान्त्वना मिलनी चाहिए थी। उसके दो पुत्रों में से एक की एक ने दुष्टता से हत्या कर दी। केवल कैन उसके पास रह गया, जिसे वह उचित ही भय और घृणा से देखने को विवश था।

हाबिल, जो यौवन के फूल में इतनी निर्दयता से मार डाला गया, मानवीय दुर्दशा के उदाहरण के रूप में हमारे सामने खड़ा है।

नूह ने अपने जीवन का बड़ा भाग बड़े कष्ट और परिश्रम से जहाज़ बनाने में बिताया, जब कि सारा संसार सुख-विलास में मग्न था। मृत्यु से उसका बच निकलना उसके लिए सौ बार मर जाने से भी अधिक कष्टदायक सिद्ध हुआ। इसके सिवाय कि जहाज़ दस महीने तक उसके लिए कब्र के समान था, इससे अधिक दुखदायी और क्या हो सकता था कि वह इतने समय तक वहाँ बन्द रहे, बिना ताज़ी हवा के स्थान में पशुओं की गन्दगी और मल-मूत्र में डूबा हुआ?

इतनी कठिनाइयों से बच निकलने के बाद वह शोक के एक नए कारण में जा पड़ा।

उसने देखा कि उसका अपना पुत्र उसका उपहास करता है, और उसे अपने ही मुँह से उसे शाप देना पड़ा जिसे परमेश्वर ने जलप्रलय से उसके लिए बड़ी आशीष के रूप में बचाया था।

जब अब्राहम को परमेश्वर ने पहले-पहल बुलाया, तब उसे उसके देश, कुटुम्ब और मित्रों से अलग खींच लिया गया, और इस संसार की सबसे चाहने योग्य वस्तुओं से वंचित कर दिया गया, मानो परमेश्वर ने जान-बूझकर उसे हर सांसारिक आनन्द से रहित करना चाहा हो। ज्यों ही वह उस देश में पहुँचा जहाँ बसने की उसे आज्ञा मिली थी, अकाल ने उसे वहाँ से निकाल दिया। वह सहारे के लिए ऐसे देश में चला गया जहाँ, यदि वह अपने प्राण बचाना चाहता, तो उसे अपनी पत्नी को सौंप देना पड़ता—यह उसके लिए अनेक मृत्युओं से भी अधिक पीड़ादायक था।

क्या वह अपने निवास-स्थान को लौटा? अकाल ने उसे फिर खदेड़ दिया। ऐसे देश में रहने में क्या सुख था जहाँ वह इतनी बार अभाव में पड़ा, और जहाँ वह भूख से मर भी सकता था? अबीमेलेक के देश में भी उसे अपनी पत्नी को सौंपने की वही विवशता आ पड़ी।

कई वर्षों तक अनिश्चितता में इधर-उधर भटकने के बाद, उसके सेवकों के आपसी झगड़ों ने उसे अपने भतीजे को, जिसे वह अपना पुत्र ही समझता था, विदा करने पर विवश किया। इसमें कोई सन्देह नहीं कि यह बिछोह उतना ही पीड़ादायक था जितना अपना कोई अंग काटकर या उखाड़कर अलग कर दिया जाना। थोड़े ही समय बाद उसने सुना कि उसके शत्रु उसे बन्दी बनाकर ले गए हैं।

अत्यन्त बुढ़ापे में पहुँचकर अब्राहम ने अपने को सन्तानहीन पाया—वह सबसे कठोर पीड़ा जो वृद्धावस्था सह सकती है। अन्त में, आशा के विपरीत, उसके इश्माएल उत्पन्न हुआ, परन्तु उसका जन्म भी उसे महँगा पड़ा। वह अपनी पत्नी सारा की झिड़कियों का निशाना बना, मानो उसने उसकी दासी के घमण्ड को बढ़ावा देकर घर में कलह खड़ी कर दी हो।

अपनी अन्तिम आयु में उसे इसहाक दिया गया, परन्तु इस शर्त पर कि उसके बड़े पुत्र को निकाल दिया जाए और एक दीन कुत्ते की नाईं जंगल में फेंक दिया जाए। जब केवल इसहाक ही उसके पास रह गया, जिसमें उसके बुढ़ापे का सारा सुख था, तब उसे आज्ञा मिली कि उसे मार डाले। क्या इससे अधिक दुखद कल्पना की जा सकती है कि एक पिता अपनी ही सन्तान का जल्लाद बने?

यदि इसहाक रोग से मर जाता, तो इस बेचारे बूढ़े को कौन अभागा न समझता, क्योंकि बच्चा उसे इतने थोड़े समय के लिए दिया गया—मानो उपहास में—केवल इसलिए कि सन्तानहीन होने का दुख दुगुना हो जाए? यदि इसहाक किसी परदेशी के हाथों मारा जाता, तो विपत्ति और भी बड़ी होती। परन्तु यह सब दुर्दशाओं से बढ़कर है कि वह अपने पिता के ही हाथ से मारा जाए।

संक्षेप में, अब्राहम अपने सारे जीवन में इतना सताया और पीड़ित रहा कि यदि कोई दुखी जीवन का उदाहरण चित्रित करना चाहे, तो उसे इससे अधिक उपयुक्त और कुछ न मिलेगा। यदि कोई यह आपत्ति करे कि अब्राहम पूर्णतः अभागा नहीं था, क्योंकि वह इतने संकटों से बच निकला और इतनी आँधियों में टिका रहा, तो मैं उत्तर देता हूँ कि हम किसी जीवन को इसलिए धन्य नहीं कहते कि वह अनगिनत कठिनाइयों से होकर बुढ़ापे तक पहुँचा, वरन् इसलिए कि मनुष्य उसे समृद्धि में शान्ति से बिताए।

आइए, हम इसहाक पर आएँ, जिसने इतनी विपत्तियाँ नहीं सहीं, फिर भी उसने मुश्किल से ही कोई छोटा-सा सुख या आनन्द चखा। दूसरी ओर, उसने ऐसे क्लेश अनुभव किए जो मनुष्य को पृथ्वी पर सुख पाने नहीं देते। अपने पिता के समान अकाल ने उसे भी कनान देश से निकाल दिया। उसकी पत्नी उसकी बाँहों से छीन ली गई। उसके पड़ोसी जहाँ-जहाँ वह गया, उसे अनेक प्रकार से सताते और तंग करते रहे, यहाँ तक कि उसे जल के लिए भी झगड़ना पड़ा। उसके पुत्र एसाव की पत्नियों ने उसके घर में उसे बहुत दुख दिया। अपने पुत्रों के बीच की फूट से वह गहरा पीड़ित हुआ, और इतनी बड़ी बुराई का उपाय वह केवल उसी को निकाल देने से कर सका जिसे उसने आशीष दी थी।

रहा याकूब, वह तो कल्पना की जा सकनेवाली सबसे बड़ी दुर्दशा का नमूना और प्रतिमूर्ति ही है। जब वह अभी जवानी में घर पर ही था, तब अपने भाई की धमकियों के कारण चिन्ता से पीड़ित रहा, जिनके सामने अन्त में उसे झुकना पड़ा, और अपने माता-पिता और अपने देश से भाग निकलना पड़ा।

परदेश में रहने की वेदना के सिवाय, उसके मामा लाबान ने उससे कठोर व्यवहार किया। यह कम न था कि उसे सात वर्ष की कठिन और निर्दयी सेवा सहनी पड़ी; उसके अन्त में उसे धोखा दिया गया, और जिसे उसने माँगा था उससे भिन्न पत्नी दी गई। जिस स्त्री को वह चाहता था उसे पाने के लिए उसे सेवा की एक नई अवधि में पड़ना पड़ा, जिसमें दिन को वह धूप की गर्मी से झुलसा और रात को ठण्ड से सुन्न और जमा जाता रहा। उसने बिना नींद और विश्राम के वर्षा, आँधी और तूफ़ान सहा, जैसा उसने स्वयं शिकायत की।

ऐसी दयनीय दशा में बीस वर्ष बिताने के बाद भी उसे अपने ससुर की ओर से प्रतिदिन अन्याय सहने पड़े। न ही उसके अपने घराने में अधिक शान्ति थी, जो उसकी पत्नियों की घृणा, झगड़ों और डाहों से टूट रहा था।

जब परमेश्वर ने उसे अपने देश लौटने की आज्ञा दी, तब उसे चलने का अवसर ताकना पड़ा, जिससे उसका जाना लज्जाजनक भाग निकलने जैसा हो गया। तब भी वह अपने ससुर की दुष्टता से बच न सका, क्योंकि लाबान ने उसका पीछा किया और मार्ग में उसे आ पकड़ा। और क्योंकि परमेश्वर ने उस पर इससे बुरा कुछ आने न दिया, याकूब को उसी मनुष्य की ओर से, जिसके विरुद्ध उसके पास शिकायत के बहुत कारण थे, अनेक झिड़कियाँ और अपमान सहने पड़े।

इसके तुरन्त बाद वह और भी बड़े संकट में पड़ा।

क्योंकि जब वह अपने भाई के निकट पहुँचा, तब उसने अपने सामने हर प्रकार की मृत्यु देखी जिसकी एक क्रूर शत्रु से आशा की जा सकती थी। इसलिए उसके आने की प्रतीक्षा में उसका मन भयंकर रूप से पीड़ित और मानो वेदना से फटा जा रहा था। जब उसने उसे देखा, तो वह अधमरा होकर उसके पैरों पर गिर पड़ा, जब तक कि उसने उसे उससे कहीं अधिक कोमल न पाया जितनी उसने आशा करने का साहस किया था।

अपने देश में पहली बार लौटते ही उसने प्रसव में अपनी पत्नी राहेल को खो दिया, जिसे वह अकेली ही सब से अधिक प्रेम करता था। इसके बाद उसे बताया गया कि जो पुत्र उससे उत्पन्न हुआ था, जिसे वह अपनी सब सन्तानों से अधिक प्रेम करता था, उसे जंगली पशु ने फाड़ खाया। उसका हृदय इस मृत्यु से इतना कटु रूप से घायल हुआ कि बहुत रोने के बाद उसने हर सान्त्वना ठुकरा दी और अपने शोक में ही मर जाने का निश्चय कर लिया, और उसे अपने पुत्र के पीछे कब्र में जाने की सोच के सिवाय कोई और सान्त्वना न मिली।

इसके अतिरिक्त, जब उसने अपनी पुत्री को पकड़ी और बलात्कृत होते देखा, तो उसने कितना शोक, दुख और संकट सहा होगा? और फिर जब उसके पुत्रों ने उसका बदला लेने के लिए एक पूरे नगर को लूट लिया? इससे उन्होंने न केवल उसे उस प्रदेश के सब निवासियों की दृष्टि में घृणित बना दिया, वरन् उसे प्राण-संकट में भी डाल दिया।

इसके बाद रूबेन का भयंकर पाप आया, जिससे उसे असाधारण वेदना हुई होगी। क्योंकि जब मनुष्य के सबसे बड़े दुखों में से एक यह है कि उसकी पत्नी का अपमान हो, तो जब ऐसी दुष्टता उसके अपने पुत्र ही से हो, तब हम क्या कहें? थोड़े ही समय बाद उसका घराना एक और व्यभिचार से अशुद्ध हुआ, जिससे इतने अपमान संसार के सबसे दृढ़ और सबसे धीरजवन्त हृदय को भी तोड़ सकते थे।

अपने अत्यन्त बुढ़ापे में, अपने और अपने घराने की आवश्यकता पूरी करने की इच्छा से, उसने अपने पुत्रों को अनाज लेने के लिए परदेश भेजा। उनमें से एक वहीं बन्दी रह गया, जिसके विषय में वह समझता था कि वह प्राण-संकट में है; और उसे छुड़ाने के लिए उसे बिन्यामीन को भेजने पर विवश होना पड़ा, जिसमें उसका सारा आनन्द था।

कौन कल्पना कर सकता है कि दुखों की ऐसी भीड़ के बीच उसे एक भी ऐसा क्षण मिला जिसमें वह खुलकर साँस ले सके? यही उसने फ़िरौन के सामने प्रमाणित किया:

“मेरे जीवन के वर्ष थोड़े और दुखमय रहे हैं।”

—उत्पत्ति 47:9

जो यह कहता है कि वह निरन्तर दुख में जिया, वह यह दावा नहीं करता कि उसने वह सांसारिक समृद्धि अनुभव की जिसकी परमेश्वर ने उससे प्रतिज्ञा की थी। इसलिए या तो याकूब कृतघ्न था और परमेश्वर की भलाई को न पहचान सका, या उसने सच्चाई से साक्षी दी कि उसका जीवन दुखमय रहा। यदि उसका कथन सच था, तो यह निष्कर्ष निकलता है कि उसकी आशा सांसारिक वस्तुओं पर नहीं टिकी थी।

यदि इन सब पवित्र पूर्वजों ने परमेश्वर से धन्य जीवन की आशा रखी—जिसमें कोई सन्देह नहीं—तो वे निश्चय ही सांसारिक जीवन से भिन्न किसी धन्यता को जानते और उसकी आशा रखते थे। प्रेरित यह अत्यन्त उत्तम रीति से प्रमाणित करता है:

“विश्वास ही से उसने प्रतिज्ञा किए हुए देश में परदेशी की नाईं रहकर इसहाक और याकूब के साथ, जो उसके साथ उसी प्रतिज्ञा के वारिस थे, तम्बुओं में वास किया। क्योंकि वह उस स्थिर नींववाले नगर की प्रतीक्षा करता था, जिसका बनानेवाला और रचनेवाला परमेश्वर है।

“ये सब विश्वास की दशा में मरे, और प्रतिज्ञा की हुई वस्तुओं को पाया नहीं, परन्तु उन्हें दूर से देखकर मान लिया और अंगीकार किया कि हम पृथ्वी पर परदेशी और बाहरी लोग हैं। ऐसा कहनेवाले प्रगट करते हैं कि वे एक और देश की खोज में हैं। और जिस देश से वे निकल आए थे, यदि उस की सुधि करते, तो उन्हें लौट जाने का अवसर था। पर वे एक उत्तम, अर्थात् स्वर्गीय देश की अभिलाषा करते हैं। इसीलिए परमेश्वर उनका परमेश्वर कहलाने में लज्जित नहीं होता, क्योंकि उसने उनके लिए एक नगर तैयार किया है।”

—इब्रानियों 11:9–10, 13–16

वस्तुतः वे लकड़ी के कुन्दों से भी अधिक मूर्ख ठहरते, यदि वे ऐसी प्रतिज्ञाओं के पीछे इतनी दृढ़ता से लगे रहते जिनकी पूर्ति उन्होंने पृथ्वी पर कहीं नहीं देखी, जब तक कि वे उस पूर्ति की आशा कहीं और न रखते।

और प्रेरित का इस बात पर विशेष बल देना भी निराधार नहीं कि वे अपने को इस संसार में परदेशी और यात्री कहते थे, जैसा मूसा स्वयं लिखता है। क्योंकि यदि वे कनान देश में परदेशी थे, तो परमेश्वर की उस प्रतिज्ञा का क्या हुआ जिससे वे उसके वारिस ठहराए गए थे? इससे यह प्रमाणित होता है कि परमेश्वर ने उनसे जो प्रतिज्ञा की थी, वह सांसारिक भूमि से कहीं आगे तक फैली थी।

अतः उन्होंने कनान देश में अपनी कब्रों के सिवाय एक पाँव भर भूमि भी अपने अधिकार में न ली।

“उसने उसमें उसे कुछ मीरास नहीं दी, पाँव धरने भर की भूमि भी नहीं।”

—प्रेरितों के काम 7:5

इसके द्वारा उन्होंने प्रमाणित किया कि वे मृत्यु के बाद ही प्रतिज्ञा का भोग करने की आशा रखते थे। इसी कारण याकूब ने वहाँ गाड़े जाने को इतना महत्त्वपूर्ण समझा कि उसने अपने पुत्र यूसुफ से शपथ खिलाई कि उसकी लोथ वहाँ ले जाए। यूसुफ ने उसी विश्वास से काम लिया जब उसने अपनी मृत्यु के लगभग चार सौ वर्ष बाद अपनी अस्थियाँ वहाँ ले जाने की आज्ञा दी।

संक्षेप में, यह प्रकट है कि अपने सब कामों में वे निरन्तर आनेवाले जीवन की धन्यता की ओर दृष्टि लगाए रहे। क्योंकि याकूब ने ज्येष्ठाधिकार को इतने प्रयत्न और संकट से क्यों चाहा, जब उससे उसे कोई सांसारिक लाभ न मिला और वह अपने पिता के घर से निकाला गया, यदि उसकी दृष्टि किसी उच्चतर आशीष पर न होती? वस्तुतः उसने यही अपनी अभिलाषा बताई, जब अन्तिम साँस लेते हुए वह पुकार उठा:

“हे यहोवा, मैं तेरे उद्धार की बाट जोहता रहा हूँ।”

—उत्पत्ति 49:18

जब वह जानता था कि वह अपने प्राण सौंपने पर है, तब यदि वह मृत्यु में नए जीवन का आरम्भ न देखता, तो किस उद्धार की बाट जोह सकता था?

और हम परमेश्वर की सन्तानों के विषय में विवाद ही क्यों करें, जब वह मनुष्य भी, जिसने सत्य का विरोध करने का यत्न किया, वही प्रतीति और बोध रखता था? क्योंकि बिलाम का क्या अभिप्राय था जब उसने चाहा:

“मेरा प्राण धर्मियों की नाईं मरे, और मेरा अन्त उन्हीं के समान हो।”

—गिनती 23:10

उसका अभिप्राय केवल वही था जिसे दाऊद ने बाद में व्यक्त किया:

“यहोवा की दृष्टि में उसके भक्तों की मृत्यु अनमोल है।”

—भजन संहिता 116:15

और:

“दुष्ट की मृत्यु बुरी होगी।”

—भजन संहिता 34:21

यदि मृत्यु ही मनुष्य का अन्तिम अन्त होती, तो उसमें धर्मी और दुष्ट के बीच कोई भेद न दिखाई देता। इसलिए उनमें भेद उस दशा से किया जाना चाहिए जो आनेवाले युग में उनमें से प्रत्येक के लिए तैयार है।

हम अब तक मूसा से आगे नहीं बढ़े, जिसके विषय में वे स्वप्नदर्शी, जिनके विरुद्ध हम कह रहे हैं, कल्पना करते हैं कि उसका इस्राएल की प्रजा को उपजाऊ भूमि और भोजन की बहुतायत की प्रतिज्ञा देकर परमेश्वर का भय और आदर कराने के सिवाय और कोई कार्य न था। तथापि, जब तक कोई जान-बूझकर अपने सामने रखे गए प्रकाश को बुझाना न चाहे, तब तक हमारे पास आत्मिक वाचा का पूर्णतः स्पष्ट प्रकाशन पहले ही है।

यदि हम भविष्यद्वक्ताओं की ओर बढ़ें, तो वहाँ हमें अनन्त जीवन और मसीह के राज्य को देखने के लिए पूरा प्रकाश मिलेगा। सबसे पहले दाऊद आता है, जो अन्य भविष्यद्वक्ताओं से पहले होने के कारण स्वर्गीय भेदों के विषय में उनसे अधिक अस्पष्टता से बोलता है। तथापि, वह अपनी सारी शिक्षा को इसी लक्ष्य की ओर कितनी स्पष्टता और निश्चयता से मोड़ता है?

अपने सांसारिक निवास को वह कितना मूल्य देता था, यह वह इस कथन से दिखाता है:

“मैं तेरे साथ एक परदेशी और यात्री हूँ, जैसे मेरे सब पितर थे। हर एक मनुष्य निरा व्यर्थ है; वह छाया के समान चला जाता है। अब हे प्रभु, मैं किस बात की बाट जोहूँ? मेरी आशा तेरी ही ओर है।”

—भजन संहिता 39:5–7, 12

निश्चय ही वह मनुष्य, जो यह मानने के बाद कि इस संसार में उसके पास कुछ भी दृढ़ और स्थायी नहीं, फिर भी परमेश्वर में अटल आशा रखता है, अपना सुख इस संसार से परे कहीं देखता है। इसलिए दाऊद की रीति थी कि जब भी वह विश्वासियों को शान्ति देना चाहता, उन्हें इसी मनन की ओर लौटा ले जाता। एक और स्थान में, यह दिखाने के बाद कि यह जीवन कितना छोटा और भंगुर है, वह जोड़ता है:

“परन्तु यहोवा की करुणा उसके डरवैयों पर अनादि से अनन्त तक बनी रहती है।”

—भजन संहिता 103:15–17

इसी के समान वह अन्यत्र कहता है:

“तू ने आदि में पृथ्वी की नींव डाली, हे यहोवा, और आकाश तेरे हाथों के कार्य हैं। वे तो नष्ट होंगे, परन्तु तू बना रहेगा; वे सब वस्त्र के समान पुराने हो जाएँगे, तू उन्हें वस्त्र की नाईं बदलेगा। परन्तु तू सदा वैसा ही बना रहता है, और तेरे वर्षों का कभी अन्त न होगा। तेरे दासों की सन्तान सुरक्षित बसी रहेगी, और उनका वंश तेरे सम्मुख स्थिर रहेगा।”

—भजन संहिता 102:25–28

यदि आकाश और पृथ्वी के टल जाने पर भी विश्वासी परमेश्वर के सम्मुख स्थिर रहते हैं, तो यह निष्कर्ष निकलता है कि उनका उद्धार उसकी अनन्तता से जुड़ा है। वस्तुतः यह आशा टिक ही नहीं सकती, जब तक कि वह उस प्रतिज्ञा पर आधारित न हो जो यशायाह में रखी गई है:

“आकाश धुएँ की नाईं लोप हो जाएगा, और पृथ्वी वस्त्र के समान पुरानी हो जाएगी, और उसके निवासी भी वैसे ही मर जाएँगे; परन्तु मेरा उद्धार सदा बना रहेगा, और मेरी धार्मिकता का अन्त कभी न होगा।”

—यशायाह 51:6

इस स्थान में उद्धार और धार्मिकता को स्थायित्व केवल इस सीमा तक नहीं दिया गया कि ये वस्तुएँ परमेश्वर में निवास करती हैं, वरन् इस सीमा तक भी कि वह इन्हें मनुष्यों को देता है।

वस्तुतः विश्वासियों की धन्यता के विषय में दाऊद जो बार-बार कहता है, उसे स्वर्गीय महिमा के प्रकट होने से जोड़े बिना और किसी रीति से समझा नहीं जा सकता। जैसा वह कहता है:

“यहोवा अपने भक्तों के प्राणों की रक्षा करता है; वह उन्हें दुष्टों के हाथ से छुड़ाएगा।”

—भजन संहिता 97:10

“धर्मियों के लिए ज्योति और सीधे मनवालों के लिए आनन्द बोया गया है।”

—भजन संहिता 97:11

फिर:

“भले मनुष्यों की धार्मिकता सदा बनी रहती है। उनका बल महिमा में ऊँचा किया जाएगा, परन्तु पापियों की अभिलाषा नष्ट होगी।”

—भजन संहिता 112:9–10

फिर:

“धर्मी लोग तेरे नाम का धन्यवाद करेंगे; सीधे लोग तेरे सम्मुख बने रहेंगे।”

—भजन संहिता 140:13

फिर:

“धर्मी सदा स्मरण में बना रहेगा।”

—भजन संहिता 112:6

फिर:

“यहोवा अपने दासों के प्राणों को छुड़ा लेता है।”

—भजन संहिता 34:22

तौभी प्रभु न केवल अपने सेवकों को दुष्टों के हाथों सताए जाने देता है, वरन् प्रायः उन्हें तितर-बितर और नष्ट भी होने देता है। वह भले लोगों को अन्धकार और दुर्दशा में कुम्हलाने देता है, जब कि दुष्ट आकाश के तारों की नाईं चमकते हैं। न ही वह विश्वासियों पर अपने मुख का प्रकाश इस प्रकार प्रकट करता है कि वे स्थायी सुख भोगें।

इसलिए दाऊद स्वयं यह नहीं छिपाता कि यदि हम इस संसार की वर्तमान दशा पर दृष्टि टिकाए रखें, तो वह हमें डिगा देनेवाली एक कठिन परीक्षा होगी, मानो निर्दोषता को परमेश्वर से कोई प्रतिफल नहीं मिलता। अभक्ति फलती-फूलती है, जबकि भले लोगों की मण्डली लज्जा, निर्धनता, तिरस्कार और हर प्रकार की विपत्ति से दबी रहती है।

“मेरे पाँव तो फिसलने ही पर थे, मेरे डग लगभग उखड़ ही चुके थे, जब मैंने मूर्खों की समृद्धि और दुष्टों का फलना-फूलना देखा।”

—भजन संहिता 73:2–3

ये बातें गिनाने के बाद वह निष्कर्ष निकालता है:

“जब मैं सोचने लगा कि इसे कैसे समझूँ, तो यह मेरी दृष्टि में अत्यन्त कठिन था, जब तक कि मैंने परमेश्वर के पवित्रस्थान में जाकर उनके अन्त को न समझ लिया।”

—भजन संहिता 73:16–17

इसलिए आइए हम दाऊद के इसी एक अंगीकार से सीखें कि पुराने नियम के पवित्र पूर्वज इससे अनजान नहीं थे कि परमेश्वर अपने सेवकों से जो प्रतिज्ञा करता है, उसे इस संसार में कितनी कम बार—या कहें, कभी भी पूरी रीति से—पूरा नहीं करता। इसीलिए उन्होंने अपने हृदय परमेश्वर के पवित्रस्थान की ओर उठाए, जहाँ उन्होंने वह छिपा हुआ पाया जो इस नाशमान जीवन में उन्हें दिखाई नहीं दिया।

वह पवित्रस्थान वह अन्तिम न्याय था जिसकी हम आशा रखते हैं। वे उसे विश्वास से ग्रहण करके सन्तुष्ट थे, यद्यपि वे उसे आँखों से नहीं देखते थे। इस भरोसे से सज्जित होकर, इस संसार में जो कुछ भी हुआ, उन्हें सन्देह नहीं था कि एक ऐसा समय आएगा जब परमेश्वर की प्रतिज्ञाएँ पूरी होंगी। यह इन जैसे कथनों से स्पष्ट प्रमाणित होता है:

“मैं तो धार्मिकता से तेरे मुख का दर्शन करूँगा; जागकर तेरे स्वरूप को देखकर मैं तृप्त हूँगा।”

—भजन संहिता 17:15

फिर:

“मैं परमेश्वर के भवन में हरे जैतून के वृक्ष के समान हूँ।”

—भजन संहिता 52:8

फिर:

“धर्मी लोग खजूर के समान फूले-फलेंगे, और लबानोन के देवदार की नाईं बढ़ते रहेंगे। जो यहोवा के भवन में लगाए गए हैं, वे हमारे परमेश्वर के आँगनों में फूले-फलेंगे। वे बुढ़ापे में भी फलते रहेंगे, और रस भरे और हरे-भरे रहेंगे।”

—भजन संहिता 92:12–14

यह बल और शोभा कहाँ प्रकट होगी, सिवाय तब जब इस संसार का वर्तमान रूप परमेश्वर के राज्य के प्रकट होने से उलट दिया जाएगा?

इसलिए जब उन्होंने इस अनन्तता पर दृष्टि जमाई और वर्तमान विपत्तियों की कटुता को तुच्छ जाना, जिन्हें उन्होंने अस्थायी देखा, तब उन्होंने इन शब्दों में निडर होकर घमण्ड किया:

“हे यहोवा, तू धर्मी को सदा डगमगाने न देगा, परन्तु तू दुष्टों को विनाश के गड्ढे में उतारेगा।”

—भजन संहिता 55:22–23

इस संसार में विनाश का वह गड्ढा कहाँ है जो दुष्टों को निगल जाता है, जबकि उनकी समृद्धि का ही अन्यत्र ऐसा वर्णन है कि वे बिना लम्बे कष्ट के चैन से मरते हैं? पवित्र लोगों में ऐसी स्थिरता कहाँ है, जिनके विषय में दाऊद स्वयं बार-बार विलाप करता है कि वे केवल हिलाए ही नहीं गए, वरन् पूरी तरह दबाए और गिराए गए?

इसलिए उसने अपनी आँखों के सामने वह नहीं रखा होगा जो इस संसार की अस्थिरता प्रस्तुत करती है, जो विभिन्न आँधियों से डोलते समुद्र के समान है, वरन् वह जो प्रभु तब करेगा जब वह न्याय के लिए बैठकर आकाश और पृथ्वी की स्थायी व्यवस्था स्थापित करेगा। जैसा दाऊद अन्यत्र अत्यन्त उत्तम रीति से वर्णन करता है:

“मूर्ख अपनी बहुतायत पर भरोसा रखते हैं और अपनी बड़ी धन-सम्पत्ति पर घमण्ड करते हैं। तौभी कोई मनुष्य, चाहे कितना ही बड़ा हो, अपने भाई को मृत्यु से नहीं छुड़ा सकता, न परमेश्वर को उसके छुटकारे का दाम दे सकता है। यद्यपि वे देखते हैं कि बुद्धिमान और मूर्ख दोनों मरते हैं और अपनी सम्पत्ति दूसरों के लिए छोड़ जाते हैं, तौभी वे मन में समझते हैं कि उनके घर सदा बने रहेंगे, और वे पृथ्वी पर कीर्ति और नाम कमाने का यत्न करते हैं। परन्तु मनुष्य प्रतिष्ठा में स्थिर नहीं रहता; वह नाश होनेवाले पशुओं के समान हो जाता है।

“उनकी यह चाल बड़ी मूर्खता है, फिर भी उनके अनुयायी बहुत हैं। वे भेड़ों के झुण्ड की नाईं अधोलोक में इकट्ठे किए जाएँगे, और मृत्यु उन पर राज्य करेगी।”

—भजन संहिता 49:6–14

“भोर होते ही सीधे लोग उन पर प्रभुता करेंगे; उनकी सुन्दरता नष्ट होगी, और अधोलोक उनका निवास होगा।”

—भजन संहिता 49:14

पहले, मूर्खों का उपहास करके, क्योंकि वे अपने क्षणभंगुर सांसारिक सुखों में विश्राम और सन्तोष पाते हैं, दाऊद दिखाता है कि बुद्धिमानों को कोई और सुख खोजना चाहिए। परन्तु वह जी उठने के भेद को और भी स्पष्टता से तब प्रकट करता है जब वह दुष्टों के विनाश और उजड़ने की भविष्यद्वाणी करते हुए विश्वासियों का राज्य स्थापित करता है। क्योंकि जिस भोर की वह बात करता है, उससे हम और क्या समझें, सिवाय इस वर्तमान जीवन के अन्त के बाद नए जीवन के प्रकट होने के?

इसी से वह दृढ़ विश्वास भी उत्पन्न हुआ जिससे उन दिनों के विश्वासी अपने को सान्त्वना देते और धीरज से सहने के लिए बल पाते थे:

“उसका क्रोध तो क्षण भर का होता है, परन्तु उसकी प्रसन्नता जीवन भर की।”

—भजन संहिता 30:5

वे अपने क्लेशों को एक क्षण तक कैसे सीमित कर सकते थे, जब वे जीवन भर क्लेश में रहे? परमेश्वर की भलाई का इतना लम्बा काल उन्होंने कहाँ देखा, जब उन्हें उसे चखने का अवसर मुश्किल से ही मिला? निश्चय ही, यदि वे अपना ध्यान पृथ्वी पर टिकाते, तो उन्हें ऐसा कुछ न मिलता। परन्तु जब उन्होंने अपनी आँखें स्वर्ग की ओर उठाईं, तब समझा कि जो क्लेश पवित्र लोगों को सहना पड़ता है, वह केवल हवा का एक क्षणिक झोंका है, जबकि जो आशीषें उन्हें मिलनी हैं, वे अनन्त हैं।

दूसरी ओर, उन्होंने पहले से देख लिया कि दुष्टों का विनाश अन्तहीन होगा, यद्यपि अपने स्वप्नों में वे अपने को धन्य समझते थे। इसी से ऐसी जानी-पहचानी उक्तियाँ उत्पन्न हुईं:

“धर्मी का स्मरण आशीष के साथ किया जाता है, परन्तु दुष्टों का नाम सड़ जाएगा।”

—नीतिवचन 10:7

फिर:

“यहोवा की दृष्टि में उसके भक्तों की मृत्यु अनमोल है, परन्तु पापी की मृत्यु अत्यन्त दुखदायी है।”

—भजन संहिता 116:15; भजन संहिता 34:21

फिर:

“यहोवा अपने भक्तों के पाँवों की रक्षा करेगा, परन्तु दुष्ट अन्धकार में चुप कर दिए जाएँगे।”

—1 शमूएल 2:9

ऐसे सब कथन प्रमाणित करते हैं कि पुराने नियम के पूर्वज स्पष्ट समझते थे कि इस संसार में विश्वासियों को चाहे जितना दुख सहना पड़े, उनका अन्त फिर भी जीवन और उद्धार होगा। इसके विपरीत, दुष्टों का सुख विनाश की ओर ले जानेवाला एक सुन्दर और सुहावना मार्ग है।

इसी कारण उन्होंने अविश्वासियों की मृत्यु को “खतनारहितों की मृत्यु” कहा, यह जताने के लिए कि उनसे जी उठने की आशा छीन ली गई है। इसलिए दाऊद अपने शत्रुओं के लिए इससे कठोर कोई शाप नहीं सोच सका कि यह प्रार्थना करे:

“वे जीवन की पुस्तक से मिटा दिए जाएँ, और धर्मियों के साथ लिखे न जाएँ।”

—भजन संहिता 69:28

परन्तु सब से अधिक उल्लेखनीय अय्यूब का यह कथन है:

“मैं जानता हूँ कि मेरा छुड़ानेवाला जीवित है, और अन्तिम दिन मैं पृथ्वी पर से फिर जी उठूँगा और इसी देह में अपने छुड़ानेवाले को देखूँगा। यह आशा मेरे हृदय में छिपी है।”

—अय्यूब 19:25–27

जो लोग अपनी सूक्ष्मता दिखाना चाहते हैं, वे बहाना बनाते हैं कि इसे अन्तिम पुनरुत्थान के विषय में नहीं समझना चाहिए, वरन् उस समय के विषय में जब अय्यूब को आशा थी कि प्रभु उसके प्रति अधिक कोमल और कृपालु होगा। यदि हम इसमें उन्हें कुछ अंश तक मान भी लें, तब भी हम चाहे वे माने या न माने यही दृढ़ता से कहेंगे कि यदि अय्यूब पृथ्वी पर ही टिका रहता, तो वह कभी ऐसी ऊँची आशा तक नहीं पहुँच सकता था।

इसलिए हमें मानना होगा कि अय्यूब ने भावी अमरता की ओर आँखें उठाईं, क्योंकि वह कब्र में पड़े-पड़े भी अपने छुड़ानेवाले की बाट जोहता रहा। क्योंकि जो केवल वर्तमान जीवन की सोचते हैं, उनके लिए मृत्यु निराशा की चरम सीमा है, फिर भी वह उसकी आशा छीन न सकी:

“चाहे वह मुझे घात भी करे, तौभी मैं उस पर आशा रखना न छोड़ूँगा।”

—अय्यूब 13:15

यदि कोई हठी कुड़कुड़ाए कि ये कथन केवल थोड़े ही लोगों के थे, और इसलिए यह प्रमाणित नहीं कर सकते कि ऐसी शिक्षा यहूदियों में सामान्यतः मानी जाती थी, तो मैं तुरन्त उत्तर दूँगा कि इन थोड़े लोगों का अभिप्राय ऐसे कथनों से कोई गुप्त बुद्धि दिखाना नहीं था जिसे केवल सर्वोत्तम मस्तिष्क ही समझ सकें। क्योंकि जिन्होंने इस प्रकार कहा, उन्हें पवित्र आत्मा ने प्रजा के शिक्षक ठहराया था। इसलिए अपने पद के अनुसार उन्होंने खुल्लमखुल्ला वह शिक्षा सुनाई जिसे सारी प्रजा को मानना अनिवार्य था।

इसलिए जब हम पवित्र आत्मा की ऐसी स्पष्ट वाणियाँ सुनते हैं, जिनके द्वारा उसने प्राचीन काल में यहूदी कलीसिया में आत्मिक जीवन की साक्षी दी और उसकी निस्सन्देह आशा दी, तब यह अत्यन्त विकृत हठ होगा कि हम उस प्रजा के पास केवल एक शारीरिक वाचा छोड़ें, जो केवल पृथ्वी और सांसारिक सुख की चर्चा करती थी।

यदि मैं उन भविष्यद्वक्ताओं की ओर बढ़ूँ जो बाद में आए, तो इस मुकद्दमे को सिद्ध करने के लिए मेरे पास और भी प्रचुर और सुलभ सामग्री होगी। क्योंकि यदि दाऊद, अय्यूब और शमूएल के साथ विजय हमारे लिए बहुत कठिन न रही, तो उनके साथ वह कहीं सरल होगी। वस्तुतः प्रभु ने अपनी दया की वाचा के प्रशासन में यही क्रम रखा: जैसे-जैसे पूर्ण प्रकाशन का दिन निकट आता गया, वैसे-वैसे उसने अपनी शिक्षा की स्पष्टता बढ़ाई।

इस प्रकार, जब आरम्भ में आदम को पहली प्रतिज्ञा दी गई, तब केवल थोड़ी-सी छोटी चिनगारियाँ जलाई गईं। इसके बाद प्रकाश धीरे-धीरे दिन-प्रतिदिन बढ़ता और फैलता गया, यहाँ तक कि प्रभु यीशु मसीह, धार्मिकता के सूर्य, ने हर बादल को हटा दिया और संसार को पूरी तरह प्रकाशित कर दिया।

इसलिए यदि हम भविष्यद्वक्ताओं की साक्षियों को अपना पक्ष स्थापित करने के लिए प्रयोग करना चाहें, तो हमें यह भय नहीं करना चाहिए कि वे हमें निराश करेंगी। परन्तु क्योंकि मैं देखता हूँ कि यह विषय इतना विशाल है कि हमें उस पर मेरे उपक्रम की सीमा से अधिक समय तक ठहरना पड़ेगा—क्योंकि यह एक बड़ी पुस्तक भरने जितनी सामग्री देगा—और क्योंकि मैं मानता हूँ कि मैं सब साधारण बुद्धि के पाठकों के लिए पहले ही मार्ग खोल चुका हूँ कि वे विषय को स्वयं समझ सकें, मैं अनावश्यक विस्तार से बचूँगा।

मैं पाठकों को केवल इतना चेताऊँगा कि प्रवेश पाने के लिए जो कुंजी मैंने उन्हें दी है, उसे प्रयोग करना याद रखें। जब कभी भविष्यद्वक्ता विश्वासियों की उस धन्यता की बात करें—जिसकी मंद-सी छाया भी इस संसार में मुश्किल से दिखती है—वे इस भेद की ओर लौटें: परमेश्वर की भलाई को अधिक स्पष्टता से दिखाने के लिए भविष्यद्वक्ताओं ने उसे सांसारिक लाभों के द्वारा मानो कुछ प्रतिबिम्बों में चित्रित किया। फिर भी इस चित्रण के द्वारा उनका अभिप्राय मनुष्यों के हृदयों को पृथ्वी से, इस जगत के तत्वों से और इस नाशमान युग से ऊपर उठाना, और उन्हें आत्मिक जीवन की धन्यता पर मनन करने की ओर ले जाना था।

हम एक ही उदाहरण से सन्तुष्ट होंगे। जब इस्राएल की प्रजा बन्दी बनाकर बाबुल ले जाई गई, तब उन्होंने अपने निर्वासन और उजड़ेपन को मृत्यु के बराबर समझा। उन्हें इस बात का विश्वास नहीं दिलाया जा सकता था कि यहेजकेल ने उनकी पुनर्स्थापना के विषय में जो कुछ प्रतिज्ञा की, वह कथा और झूठ के सिवाय कुछ और है, क्योंकि उन्होंने कल्पना की कि यह कहने के बराबर है कि पूरी तरह सड़ चुकी देहें फिर जी उठेंगी।

यह दिखाने के लिए कि यह कठिनाई भी उसे उनके प्रति अपना अनुग्रह पूरा करने से नहीं रोकेगी, प्रभु ने भविष्यद्वक्ता को एक दर्शन में हड्डियों से भरा खेत दिखाया, जिनमें उसने एक क्षण में केवल अपने वचन की सामर्थ्य से आत्मा और बल लौटा दिया। यह दर्शन निश्चय ही प्रजा के अविश्वास को सुधारने के लिए था। साथ ही, इसने उन्हें चेताया कि परमेश्वर की सामर्थ्य उस पुनर्स्थापना से कहीं आगे तक फैली है जिसकी उसने उनसे प्रतिज्ञा की थी, क्योंकि उसके केवल एक आदेश पर बिखरी हुई हड्डियों को जीवन में लौटा देना उसके लिए इतना सरल था।

इसलिए हमें इस कथन की तुलना यशायाह के एक समान कथन से करनी चाहिए:

“मरे हुए जीवित होंगे और अपनी देहों के साथ उठ खड़े होंगे। हे मिट्टी में बसनेवालो, जागो और जयजयकार करो, क्योंकि तुम्हारी ओस हरे खेत की ओस के समान है, और दानवों का देश उजाड़ किया जाएगा। हे मेरी प्रजा, चल, अपनी कोठरियों में प्रवेश कर और अपने किवाड़ अपने पीछे बन्द कर ले। थोड़ी देर के लिए छिप जा, जब तक कि प्रकोप टल न जाए। क्योंकि देखो, यहोवा पृथ्वी के निवासियों को उनके अधर्म का दण्ड देने के लिए निकलेगा। पृथ्वी अपना सोखा हुआ लहू प्रगट कर देगी और अपने भीतर गाड़े हुए मारे हुओं को फिर न छिपाएगी।”

—यशायाह 26:19–21

फिर भी मेरा यह तात्पर्य नहीं कि हर स्थल की व्याख्या इसी नियम के अनुसार की जाए। क्योंकि कुछ ऐसे हैं जो बिना किसी अलंकार या अस्पष्टता के उस भावी अमरता को प्रमाणित करते हैं जो परमेश्वर के राज्य में विश्वासियों के लिए तैयार है। इनमें से कुछ को हम पहले उद्धृत कर चुके हैं, और अन्य भी अनेक हैं, परन्तु विशेषकर दो।

पहला यशायाह में है:

“जैसे मैं नए आकाश और नई पृथ्वी को, जिन्हें मैंने रचा है, अपने सम्मुख स्थिर रखूँगा, वैसे ही तुम्हारा वंश बना रहेगा। एक महीने के बाद दूसरा महीना और एक सब्त के बाद दूसरा सब्त निरन्तर आता रहेगा। सब प्राणी मेरे सम्मुख दण्डवत् करने आएँगे, यहोवा कहता है। और उन अपराधियों की लोथें, जिन्होंने मुझे तुच्छ जाना, अपमान के लिए उघाड़ दी जाएँगी।”

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