यह हिन्दी संस्करण UECF.NET के लिए AI-सहायता से किए गए पूर्ण अनुवाद और सम्पादकीय गुणवत्ता-समीक्षा के द्वारा तैयार किया गया है। अध्ययन के लिए अंग्रेज़ी मूल पाठ ही प्रामाणिक है। कोई त्रुटि दिखे तो [email protected] पर लिखें।
अध्याय छह: विश्वास द्वारा और कर्मों की योग्यता द्वारा धर्मी ठहराए जाने के विषय में (भाग 4/4)
क्योंकि लिखा है:
“दासी का पुत्र स्वतंत्र स्त्री के पुत्र के साथ अधिकारी न होगा।”
वरन् जिन स्थलों में पवित्र आत्मा अनन्त जीवन को कर्मों का प्रतिफल ठहराकर प्रतिज्ञा करता है, उनमें भी वह उसे स्पष्ट शब्दों में मीरास कहकर दिखाता है कि वह किसी और स्रोत से नहीं आता। इसलिए जब मसीह अपने पिता के चुने हुओं को स्वर्गीय राज्य का अधिकारी होने के लिए बुलाता है, तो वह निश्चय ही उन कर्मों का वर्णन करता है जिनका प्रतिफल वह उन्हें देना चाहता है, परन्तु साथ ही यह भी जोड़ देता है कि वे उसे मीरास के अधिकार से पाएँगे।
“हे मेरे पिता के धन्य लोगो, आओ, उस राज्य के अधिकारी हो जाओ जो तुम्हारे लिए तैयार किया गया है।”
इसी प्रकार सन्त पौलुस उन दासों को, जो अपना कर्तव्य विश्वासयोग्यता से निभाते हैं, प्रभु से प्रतिफल की आशा रखने का उपदेश देता है, परन्तु तुरन्त जोड़ देता है कि यह प्रतिफल मीरास है।
“तुम्हें प्रभु से मीरास का प्रतिफल मिलेगा।”
हम देखते हैं कि मसीह और उसके प्रेरित स्पष्ट रूप से इस बात से सावधान करते हैं कि हम अनन्त आनन्द का श्रेय परमेश्वर के लेपालकपन को न देकर कर्मों को देने लगें। तो कोई पूछेगा कि वे कर्मों का उल्लेख क्यों करते हैं? इस प्रश्न का समाधान पवित्र शास्त्र के एक ही उदाहरण से हो सकता है।
इसहाक के जन्म से पहले अब्राहम से प्रतिज्ञा की गई थी कि उसके वंश होगा जिसमें पृथ्वी की सारी जातियाँ आशीष पाएँगी, और उसकी सन्तान आकाश के तारों और समुद्र की बालू के समान होगी। बहुत समय के पश्चात् वह परमेश्वर की आज्ञा के अनुसार अपने पुत्र इसहाक की बलि चढ़ाने को तैयार हुआ। ऐसी आज्ञाकारिता दिखाने के पश्चात् उसे यह प्रतिज्ञा मिली:
“यहोवा की यह वाणी है, मैंने अपनी ही शपथ खाई है कि तूने जो यह काम किया है कि अपने पुत्र, अपने एकलौते पुत्र को भी, मुझे प्रसन्न करने के लिए नहीं रख छोड़ा, इस कारण मैं निश्चय तुझे आशीष दूँगा और तेरे वंश को आकाश के तारों और समुद्र तट की बालू के समान अनगिनत करूँगा; और तेरे वंश के द्वारा पृथ्वी की सारी जातियाँ आशीष पाएँगी, क्योंकि तूने मेरी बात मानी है।”
यहाँ हम क्या सुनते हैं? क्या अब्राहम ने अपनी आज्ञाकारिता से उस आशीष को कमाया था जिसकी प्रतिज्ञा उसे आज्ञा दिए जाने से पहले ही की जा चुकी थी? यहाँ निश्चय ही हम स्पष्ट और निःसंदेह देखते हैं कि प्रभु विश्वासियों के कर्मों का प्रतिफल उन्हीं लाभों से देता है जो वह उन्हें पहले ही दे चुका था, जब उन्होंने कुछ करने का विचार भी न किया था, और जब उसके पास उनका भला करने का अपनी दया के सिवाय कोई कारण न था।
तो भी जब परमेश्वर कहता है कि वह कर्मों का प्रतिफल उसी से देता है जो उसने उन कर्मों के होने से पहले सेंतमेंत दिया था, तो यह न छल है, न उपहास। क्योंकि वह चाहता है कि हम उसकी प्रतिज्ञा की पूर्ति का मनन करते हुए भले कामों में अपने आप को लगाएँ, और उनके द्वारा स्वर्ग में हमारे सामने रखी हुई धन्य आशा की ओर बढ़ते जाएँ; इसलिए प्रतिज्ञाओं का फल उचित रीति से उन्हीं को दिया जाता है, क्योंकि वे मानो वे साधन हैं जिनके द्वारा हम उसके भोग में पहुँचाए जाते हैं।
इन दोनों बातों को प्रेरित ने उत्तम रीति से व्यक्त किया जब उसने कहा कि कुलुस्सी के लोग उस आशा के कारण प्रेम में लगे रहे जो उनके लिए स्वर्ग में रखी हुई है, जिसका समाचार उन्होंने सुसमाचार की सच्ची शिक्षा के द्वारा सुना था।
“हमने मसीह यीशु में तुम्हारे विश्वास और सब पवित्र लोगों के प्रति तुम्हारे प्रेम का समाचार सुना, उस आशा के कारण जो तुम्हारे लिए स्वर्ग में रखी हुई है, जिसका वर्णन तुम सत्य के वचन, अर्थात् सुसमाचार में पहले सुन चुके हो।”
यह कहकर कि उन्होंने सुसमाचार के द्वारा जाना कि स्वर्गीय मीरास उनके लिए तैयार की गई है, वह यह दर्शाता है कि उनकी आशा केवल मसीह में स्थापित थी, किसी कर्म में नहीं। जब वह कहता है कि इसी कारण वे भलाई करने का यत्न करते हैं, तो वह दिखाता है कि विश्वासियों को उसे पकड़ने के लिए अपने सारे जीवन की दौड़ दौड़नी चाहिए।
अब, ऐसा न हो कि हम यह समझ बैठें कि प्रभु की प्रतिज्ञा किया हुआ प्रतिफल हमारी योग्यता के अनुसार नापा जाएगा, वह हमारे सामने एक दृष्टान्त रखता है जिसमें वह अपनी तुलना एक गृहस्थ से करता है जो अपने दाख की बारी में हर मिलनेवाले को भेजता है—किसी को दिन के पहले घण्टे में, किसी को दूसरे में, किसी को तीसरे में, और कुछ को ग्यारहवें में—और सन्ध्या को सब को बराबर मज़दूरी देता है।
इस दृष्टान्त का अर्थ उस पुस्तक में बहुत अच्छी रीति से और संक्षेप में समझाया गया है जिसका नाम अन्यजातियों की बुलाहट है और जो सन्त अम्बरोस के नाम से मानी जाती है। क्योंकि उसका लेखक एक प्राचीन शिक्षक है, इसलिए मैं अपने शब्दों के बदले उसी के शब्दों का प्रयोग करना उचित समझता हूँ:
प्रभु ने इस उपमा के द्वारा दिखाना चाहा कि सब विश्वासियों की बुलाहट, चाहे उनमें बाहरी भेद कुछ भी हो, केवल उसके अनुग्रह की है। इसलिए वे लोग, जो केवल एक घण्टा परिश्रम करके उनके बराबर किए गए जिन्होंने दिन भर का भार उठाया, उन लोगों की दशा को दर्शाते हैं जिन्हें परमेश्वर अपने अनुग्रह की उत्तमता को बढ़ाने के लिए उनके जीवन के अन्त में बुलाता है। वह उन्हें अपनी दया के अनुसार प्रतिफल देता है—उनके परिश्रम की मज़दूरी चुकाकर नहीं, वरन् अपनी भलाई की सम्पदा उन पर उण्डेलकर, ठीक वैसे ही जैसे उसने उन्हें उनके कर्मों के बिना चुना—ताकि जिन्होंने बहुत समय तक परिश्रम किया और अन्तिमों से अधिक कुछ नहीं पाते, वे भी समझ लें कि उन्हें जो कुछ मिलता है वह उसके अनुग्रह का दान है, उनके परिश्रम की मज़दूरी नहीं।
इसलिए हम यह न समझें कि ऊपर उद्धृत प्रतिज्ञाओं में पवित्र आत्मा कर्मों की योग्यता की प्रशंसा करना चाहता है, मानो वे ऐसे प्रतिफल के योग्य हों। क्योंकि पवित्र शास्त्र हमारे लिए ऐसा कुछ नहीं छोड़ता जिसमें हम परमेश्वर के सम्मुख घमण्ड कर सकें। इसके विपरीत, उसका सारा उद्देश्य हमारे अभिमान को चूर करना, हमें दीन बनाना, गिरा देना और पूरी तरह शून्य कर देना है।
वरन् इन प्रतिज्ञाओं के द्वारा पवित्र आत्मा हमारी दुर्बलता की सहायता को आता है, जो यदि इस प्रकार सम्भाली और शान्त न की जाती तो तुरन्त डूबकर विफल हो जाती। पहले तो हर एक विचार करे कि न केवल अपनी सब प्रिय वस्तुओं को, वरन् अपने आप को भी त्यागना और छोड़ देना कितना कठिन है। तो भी मसीह अपने चेलों को, अर्थात् सब विश्वासियों को, यही पहला पाठ देता है। वह जीवन भर उन्हें क्रूस के अनुशासन में रखता है कि वे सांसारिक वस्तुओं की लालसा या भरोसे में अपना मन न लगाएँ। संक्षेप में, वह उनके साथ ऐसा व्यवहार करता है कि इस संसार के सारे विस्तार में वे जहाँ कहीं आँख उठाएँ, उन्हें निराशा के कारण के सिवाय कुछ दिखाई न दे। इसीलिए सन्त पौलुस कहता है:
“यदि हम केवल इसी जीवन में मसीह से आशा रखते हैं, तो हम सब मनुष्यों से अधिक अभागे हैं।”
इसलिए ऐसी पीड़ा के बीच हम हियाव न छोड़ें, इसके लिए प्रभु हमारी सहायता को आता है और हमें चेताता है कि हम अपने सिर ऊँचे उठाएँ और आगे दूर तक देखें, और प्रतिज्ञा करता है कि जो आनन्द हम इस संसार में नहीं देखते, वह हमें उसी में मिलेगा।
वह उसे प्रतिफल, मज़दूरी और बदला कहता है, इसलिए नहीं कि वह हमारे कर्मों की योग्यता को आँक रहा है, वरन् इसलिए कि वह यह सूचित करता है कि यह उन दुःखों, क्लेशों और निन्दाओं का बदला है जो हम पृथ्वी पर सहते हैं। इसलिए पवित्र शास्त्र का अनुसरण करके अनन्त जीवन को प्रतिफल कहने में कोई हानि नहीं, क्योंकि उसके द्वारा प्रभु अपने सेवकों को परिश्रम से विश्राम में, पीड़ा से शान्ति में, शोक से आनन्द में, दरिद्रता से सम्पन्नता में और अनादर से महिमा में पहुँचाता है। संक्षेप में, उन्होंने जो भी बुराइयाँ सही हैं, उन सब को वह कहीं बड़ी आशीषों में बदल देता है।
और पवित्र जीवन को मार्ग मानने में भी कोई कठिनाई नहीं—ऐसा मार्ग नहीं जो हमारे लिए स्वर्गीय महिमा का द्वार खोलता हो, वरन् ऐसा मार्ग जिससे परमेश्वर अपने चुने हुओं को उसके प्रकट होने तक पहुँचाता है, क्योंकि जिन्हें उसने पवित्र किया है उन्हें महिमा देना उसकी इच्छा है। केवल हम योग्यता और प्रतिफल के बीच किसी मेल की कल्पना न करें। यहीं सोफिस्ट लोग उलटी राह पर भटक जाते हैं, क्योंकि वे उस उद्देश्य पर विचार नहीं करते जिसे हमने समझाया है। यह कैसा उपहास है कि जब परमेश्वर हमें एक लक्ष्य की ओर बुलाता है, तब हम अपनी आँखें दूसरी ओर फेर लें!
इससे अधिक स्पष्ट कुछ नहीं कि भले कामों के लिए प्रतिफल की प्रतिज्ञा इसलिए नहीं की गई कि हमारे मन महिमा से फूल उठें, वरन् इसलिए कि हमारे शरीर की दुर्बलता को सहारा मिले। इसलिए जो कोई इससे कर्मों में कुछ योग्यता निकालना चाहता है, वह सच्चे उद्देश्य से हट जाता है।
इसलिए जब पवित्र शास्त्र कहता है कि परमेश्वर धर्मी न्यायी की नाईं अपने सेवकों को धार्मिकता का मुकुट देगा, तब मैं न केवल सन्त अगस्तीन के साथ यह उत्तर देता हूँ:
यदि उसने पहले दयालु पिता की नाईं अनुग्रह न दिया होता, तो वह धर्मी न्यायी की नाईं मुकुट कैसे देता? और यदि अनुग्रह पहले न आया होता—वह अनुग्रह जो भक्तिहीन को धर्मी ठहराता है—तो कोई धार्मिकता कैसे होती? और यदि जो कुछ हमारे पास है वह पहले हमें तब न दिया गया होता जब कुछ देय न था, तो यह मुकुट देय वस्तु के रूप में कैसे चुकाया जाता?
परन्तु मैं यह भी जोड़ता हूँ: परमेश्वर हमारे कर्मों में धार्मिकता कैसे गिनता, यदि वह अपनी सहनशीलता से उनके भीतर की अधार्मिकता को न ढाँप देता? वह उन्हें प्रतिफल के योग्य कैसे ठहराता, यदि अपनी असीम भलाई से उनमें जो कुछ दण्ड के योग्य है उसे मिटा न देता?
मैं यह बात सन्त अगस्तीन के कथन में इसलिए जोड़ता हूँ कि वह अनन्त जीवन को सामान्यतः अनुग्रह कहता है, क्योंकि जब वह हमारे कर्मों को चुकाया जाता है तब भी वह परमेश्वर के सेंतमेंत दिए हुए दानों के कारण हमें दिया जाता है।
परन्तु पवित्र शास्त्र हमें और भी दीन बनाता है। क्योंकि हमें अपने कर्मों पर घमण्ड करने से इसलिए मना करने के अतिरिक्त कि वे परमेश्वर के सेंतमेंत दिए हुए दान हैं, वह हमें यह भी दिखाता है कि वे सदा अशुद्धता से कलंकित रहते हैं, यहाँ तक कि यदि उसके न्याय की कठोरता के अनुसार उनकी जाँच की जाए तो वे न परमेश्वर को सन्तुष्ट कर सकते हैं, न प्रसन्न।
और भी ऐसे स्थल हैं जिनका अर्थ लगभग वही है जो अभी समझाए हुए स्थलों का है। इसलिए कहा गया है:
“अधर्म के धन से अपने लिए मित्र बना लो, ताकि जब वह जाता रहे तो वे तुम्हें परमेश्वर के राज्य में ले लें।”
फिर:
“इस संसार के धनवानों को आज्ञा दे कि वे अभिमानी न हों, और धन की अनिश्चितता पर नहीं, वरन् जीवित परमेश्वर पर आशा रखें। उन्हें समझा कि वे भलाई करें, भले कामों में धनी हों, और आनेवाले समय के लिए अपने लिए भली नींव डाल रखें, ताकि वे अनन्त जीवन को वश में कर लें।”
हम देखते हैं कि भले कामों की तुलना उस धन से की गई है जिसका, कहा जाता है, हम आनेवाले आनन्द में भोग करेंगे।
मेरा उत्तर यह है कि इन स्थलों में जो कहा गया है उसे हम तब तक ठीक नहीं समझेंगे जब तक हम उस उद्देश्य की ओर दृष्टि न करें जिसकी ओर पवित्र आत्मा अपने शब्दों को ले जाता है। यदि मसीह का यह कथन सत्य है—
“जहाँ तुम्हारा धन है, वहीं तुम्हारा मन भी लगा रहेगा।”
—तो जैसे इस युग के लोग वर्तमान जीवन के सुख से सम्बन्ध रखनेवाली वस्तुओं को बटोरने में पूरी तरह लगे रहते हैं वैसे ही विश्वासियों को, यह देखकर कि यह जीवन स्वप्न की नाईं मिट जाएगा, उन वस्तुओं को, जिनका वे सदा भोग करना चाहते हैं, पहले ही उस स्थान को भेज देना चाहिए जहाँ उन्हें सदा जीवित रहना है।
इसलिए हमें उन लोगों का उदाहरण अपनाना चाहिए जो एक स्थान से दूसरे स्थान को वहाँ स्थायी रूप से बसने के लिए जाते हैं। वे अपनी सारी सम्पत्ति आगे भेज देते हैं और थोड़े समय तक उसके बिना रहने की चिन्ता नहीं करते। वरन् वे अपने आप को और भी सुखी समझते हैं, क्योंकि जहाँ उन्हें अपना शेष जीवन बिताना है वहाँ उनके पास अधिक धन है।
यदि हम विश्वास करते हैं कि स्वर्ग हमारा देश और हमारा निज निवास-स्थान है, तो हमें अपना धन यहाँ रखकर, अचानक चले जाने को विवश होने पर उसे छोड़ देने के बदले, उसे वहाँ भेज देना चाहिए। और उसे आगे भेजने की रीति क्या है? यह कि उसे दरिद्रों में उनकी आवश्यकता के समय बाँट दें, क्योंकि प्रभु मानता है कि जो कुछ उन्हें दिया जाता है वह उसी को दिया गया है।
“तुमने जो मेरे इन छोटे से छोटे भाइयों में से किसी एक के साथ किया, वह मेरे ही साथ किया।”
इसी से यह उत्तम प्रतिज्ञा निकलती है:
“जो कंगाल पर अनुग्रह करता है, वह यहोवा को उधार देता है।”
फिर:
“जो बहुत बोता है, वह बहुत काटेगा।”
क्योंकि अपने भाइयों के प्रति हम प्रेम का जो भी कार्य करते हैं, वह मानो परमेश्वर के हाथों में सुरक्षित रखने के लिए रख दिया जाता है। इसलिए वह विश्वासयोग्य रखवाले की नाईं एक दिन वह सब हमें बहुत उदार ब्याज समेत लौटा देगा।
तो फिर कोई कहेगा, क्या? क्या परमेश्वर के यहाँ प्रेम के कार्यों का इतना मान है कि वे उसके पास धरोहर रखे धन के समान हैं? और जब पवित्र शास्त्र इसकी इतनी स्पष्ट साक्षी देता है, तब ऐसा कहने से कौन झिझकेगा?
परन्तु यदि कोई परमेश्वर की भलाई को ढाँपने के लिए कर्मों की योग्यता स्थापित करना चाहे, तो ये साक्षियाँ उसकी भूल को पक्का करने में कुछ काम न आएँगी। क्योंकि इनसे हम इसके सिवाय कुछ नहीं निकाल सकते कि हमारे प्रति परमेश्वर की भलाई और सहनशीलता अद्भुत है। हमें भलाई के लिए उभारने को वह प्रतिज्ञा करता है कि हमारा किया हुआ कोई भला काम व्यर्थ न जाएगा, यद्यपि वे सब न केवल प्रतिफल पाने के, वरन् उसके द्वारा ग्रहण किए जाने के भी योग्य नहीं हैं।
परन्तु वे प्रेरित के उन शब्दों पर अधिक बल देते हैं जिनमें वह थिस्सलुनीकियों को उनके क्लेशों में शान्ति देते हुए कहता है कि ये क्लेश उन पर इसलिए भेजे गए हैं कि वे परमेश्वर के उस राज्य के योग्य गिने जाएँ जिसके लिए वे दुःख उठाते हैं:
“परमेश्वर के निकट यह न्याय है कि जो तुम्हें क्लेश देते हैं, उन्हें बदले में क्लेश दे, और तुम्हें, जो क्लेश पाते हो, हमारे साथ चैन दे, जब प्रभु यीशु स्वर्ग से प्रकट होगा।”
इसी प्रकार इब्रानियों की पत्री का लेखक कहता है:
“परमेश्वर अन्यायी नहीं कि तुम्हारे काम को और उस प्रेम को भूल जाए जो तुमने उसके नाम के लिए इस रीति से दिखाया कि पवित्र लोगों की सेवा की।”
पहले स्थल का उत्तर मैं यह देता हूँ कि सन्त पौलुस किसी योग्यता की महत्ता नहीं जताता, वरन् केवल यह कहना चाहता है कि जैसे स्वर्गीय पिता ने हमें अपनी सन्तान होने के लिए चुना है, वैसे ही वह चाहता है कि हम उसके जेठे पुत्र के स्वरूप में ढाले जाएँ। इसलिए जैसे मसीह ने अपने लिए ठहराई हुई महिमा में प्रवेश करने से पहले दुःख उठाया, वैसे ही हमें भी बहुत क्लेश सहकर स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करना होगा।
इसलिए जब हम मसीह के नाम के लिए क्लेश सहते हैं, तब वे चिह्न हम पर अंकित होते हैं जिनसे हमारा प्रभु अपने झुण्ड की भेड़ों को पहचानता है। इसी अर्थ में हम परमेश्वर के राज्य के योग्य गिने जाते हैं, क्योंकि हम अपनी देह में यीशु मसीह के चिह्न लिए फिरते हैं, जो परमेश्वर की सन्तान होने के प्रमाण हैं।
निम्नलिखित कथन भी इसी से सम्बन्ध रखते हैं:
“हम अपनी देह में मसीह की मृत्यु लिए फिरते हैं, ताकि उसका जीवन हम में प्रकट हो।”
और:
“हम उसके दुःखों में सहभागी होकर उसके समान बनते हैं, ताकि हम उसके पुनरुत्थान की समानता तक पहुँचें।”
सन्त पौलुस जो यह जोड़ता है कि जिन्होंने दुःख उठाया है उन्हें चैन देना परमेश्वर के निकट न्याय है, वह कर्मों में किसी योग्यता को सिद्ध करने के लिए नहीं, वरन् केवल उद्धार की आशा को दृढ़ करने के लिए है। मानो उसने कहा हो: जैसे तुम्हारे शत्रुओं ने तुम पर जो अत्याचार और अपमान किए हैं उनका बदला लेना परमेश्वर के धर्मी न्याय का काम है, वैसे ही तुम्हें तुम्हारे दुःखों से राहत और चैन देना भी उसी का काम है।
दूसरा स्थल, जो कहता है कि भले कामों को परमेश्वर भूल न जाए, और लगभग यह जताता है कि यदि वह उन्हें भूल जाए तो अन्यायी ठहरेगा, इस अर्थ में समझा जाना चाहिए: हमें हमारी सुस्ती से जगाने के लिए प्रभु ने हमें यह आशा दी है कि हम उसके नाम के लिए जो कुछ करते हैं वह व्यर्थ न जाएगा।
हम स्मरण रखें कि यह प्रतिज्ञा, अन्य सब के समान, हमारे लिए कुछ लाभदायक न होती यदि उसकी दया की सेंतमेंत वाचा पहले न आई होती, जिस पर हमारे उद्धार की पूरी निश्चयता टिकी है। इस नींव के होते हुए हमें यह निश्चित भरोसा रखना चाहिए कि परमेश्वर अपनी भलाई से हमारे कर्मों का बदला देने में पीछे नहीं हटेगा, यद्यपि वे उसके सर्वथा अयोग्य हैं।
इसलिए प्रेरित हमें इस आशा में दृढ़ करने को कहता है कि परमेश्वर अन्यायी नहीं कि अपनी प्रतिज्ञा पूरी करने में चूक जाए। अतः परमेश्वर की यह धार्मिकता हमें हमारा देय चुकाने के न्याय की अपेक्षा उसकी प्रतिज्ञा की विश्वासयोग्यता की ओर अधिक संकेत करती है।
इसी अर्थ में सन्त अगस्तीन का एक उल्लेखनीय कथन है, जिसे उस पवित्र जन ने बार-बार दोहराने में संकोच नहीं किया, और जिसे हमारी स्मृति में भी गहराई से बैठ जाना चाहिए:
प्रभु विश्वासयोग्य है, जिसने अपने आप को हमारा कर्ज़दार बनाया है—हमसे कुछ लेकर नहीं, वरन् हमसे सेंतमेंत सब कुछ की प्रतिज्ञा करके।
हमारे फरीसी सन्त पौलुस के इन कथनों को भी प्रस्तुत करते हैं:
“यदि मुझे यहाँ तक पूरा विश्वास हो कि मैं पहाड़ों को हटा दूँ, परन्तु प्रेम न रखूँ, तो मैं कुछ भी नहीं।”
फिर:
“पर अब विश्वास, आशा, प्रेम ये तीनों स्थायी हैं, पर इनमें सबसे बड़ा प्रेम है।”
फिर:
“इन सब के ऊपर आपस में प्रेम रखो, जो सिद्धता का कटिबन्ध है।”
पहले दो कथनों से वे यह सिद्ध करने का प्रयत्न करते हैं कि हम विश्वास से नहीं, वरन् प्रेम से धर्मी ठहराए जाते हैं, क्योंकि प्रेम अधिक उत्तम गुण है। परन्तु यह चतुराई सहज ही खण्डित हो जाती है। क्योंकि हम पहले ही अन्यत्र समझा चुके हैं कि पहले स्थल में जिसका उल्लेख है उसका सच्चे विश्वास से कुछ सम्बन्ध नहीं।
हम मानते हैं कि दूसरे स्थल को सच्चे विश्वास के विषय में समझना चाहिए, जिससे ऊपर सन्त पौलुस प्रेम को बड़ा ठहराता है—इसलिए नहीं कि प्रेम अधिक पुण्यदायक है, वरन् इसलिए कि वह अधिक फलवन्त है, अधिक दूर तक फैलता है, अधिक लोगों की सेवा करता है, और अपनी शक्ति सदा बनाए रखता है, जबकि विश्वास का उपयोग केवल कुछ समय के लिए है।
यदि हम उत्तमता पर विचार करें तो परमेश्वर के प्रति प्रेम ही उचित रीति से पहला स्थान पाएगा, यद्यपि सन्त पौलुस यहाँ उसके विषय में नहीं कहता। क्योंकि उसका एकमात्र उद्देश्य यह है कि हम प्रेम के द्वारा परमेश्वर में एक दूसरे की उन्नति करें। परन्तु मान लें कि प्रेम हर बात में विश्वास से उत्तम है। तो भी कौन सुबुद्धि मनुष्य, वरन् कौन स्थिर चित्तवाला मनुष्य, इससे यह निष्कर्ष निकालेगा कि प्रेम विश्वास से अधिक धर्मी ठहराता है?
विश्वास में धर्मी ठहराने की शक्ति इस बात में नहीं कि विश्वास एक कर्म के रूप में योग्य है, क्योंकि हमारा धर्मी ठहराया जाना केवल परमेश्वर की दया और मसीह की योग्यता में है। विश्वास के विषय में यह केवल इसलिए कहा जाता है कि वह धर्मी ठहराता है, क्योंकि वह उस धार्मिकता को ग्रहण करता है जो मसीह में उसे दी जाती है।
अब यदि हमारे विरोधियों से पूछा जाए कि वे किस अर्थ में प्रेम को धर्मी ठहराने की शक्ति देते हैं, तो वे उत्तर देंगे कि चूँकि प्रेम परमेश्वर को भानेवाला गुण है, इसलिए उसकी योग्यता के द्वारा हम पर धार्मिकता आरोपित की जाती है, इस सीमा तक कि वह ईश्वरीय भलाई द्वारा ग्रहण किया जाता है। इसी से हम देखते हैं कि उनका तर्क कितना ठोस है।
हम कहते हैं कि विश्वास धर्मी ठहराता है, इसलिए नहीं कि वह अपनी योग्यता से हमारे लिए धार्मिकता कमाता है, वरन् इसलिए कि वह वह साधन है जिससे हम मसीह की धार्मिकता को सेंतमेंत पाते हैं। परन्तु वे परमेश्वर की दया को पीछे छोड़ देते हैं और मसीह का उल्लेख तक नहीं करते, जिसमें धार्मिकता का पूरा सार निहित है, और फिर यह तर्क करते हैं कि हम प्रेम से धर्मी ठहराए जाते हैं क्योंकि प्रेम अधिक उत्तम है। यह वैसा ही है जैसे कोई तर्क करे कि राजा जूता बनाने के लिए मोची से अधिक उपयुक्त है क्योंकि वह कहीं अधिक योग्य और कुलीन है।
केवल यही तर्क हमें यह दिखाने के लिए पर्याप्त है कि सोरबोन के सब विद्यालयों ने कभी नहीं समझा कि विश्वास से धर्मी ठहराया जाना क्या है।
अब यदि कोई विवादी यह आपत्ति करे कि मैं सन्त पौलुस में विश्वास शब्द को भिन्न-भिन्न अर्थों में लेता हूँ, और कहे कि एक ही स्थल में उसकी भिन्न व्याख्या करने का कोई औचित्य नहीं, तो मेरे पास ऐसा करने का बहुत अच्छा कारण है। क्योंकि जितने दान उसने गिनाए थे, वे सब किसी न किसी मात्रा में विश्वास और आशा में समेटे जा सकते हैं, क्योंकि वे परमेश्वर के ज्ञान से सम्बन्ध रखते हैं; इसलिए जब वह अध्याय के अन्त में अपने तर्क का सार देता है, तब उन सब को इन्हीं दो शब्दों के अन्तर्गत समेट लेता है।
मानो उसने कहा हो: भविष्यवाणी, अन्य भाषाएँ, व्याख्या का वरदान और ज्ञान, ये सब इसी लक्ष्य की ओर ले जाते हैं—हमें परमेश्वर के ज्ञान तक पहुँचाने की ओर। अब इस नश्वर जीवन में हम परमेश्वर को केवल विश्वास और आशा से जानते हैं। इसलिए जब मैं विश्वास और आशा का नाम लेता हूँ, तब इन सब दानों को एक साथ समेट लेता हूँ। अतः ये तीनों स्थायी हैं: विश्वास, आशा और प्रेम। अर्थात् दान चाहे कितने ही भिन्न हों, वे सब इन तीनों से सम्बन्ध रखते हैं, जिनमें प्रेम सबसे प्रधान है।
तीसरे स्थल से वे यह निष्कर्ष निकालते हैं कि यदि प्रेम सिद्धता का कटिबन्ध है, तो वह धार्मिकता का भी कटिबन्ध है, क्योंकि धार्मिकता सिद्धता के सिवाय और कुछ नहीं। पहली बात, यदि हम इस तथ्य को छोड़ भी दें कि सन्त पौलुस उसे सिद्धता तब कहता है जब सुव्यवस्थित कलीसिया के अंग आपस में जुड़ जाते हैं, और यदि हम यह मान भी लें कि मनुष्य प्रेम के द्वारा परमेश्वर के सम्मुख सिद्ध किया जाता है, तो इससे वे कौन सा नया निष्कर्ष निकालेंगे? क्योंकि मैं सदा यही उत्तर दूँगा कि हम इस सिद्धता को तब तक कभी नहीं पाते जब तक प्रेम को पूर्ण रीति से पूरा न करें। इससे मैं यह निष्कर्ष निकाल सकता हूँ कि चूँकि संसार के सब मनुष्य प्रेम को पूरा करने में बहुत पीछे रह जाते हैं, इसलिए सिद्धता की हर आशा उनसे छीन ली गई है।
मेरा इरादा उन हठी सोरबोनवादियों की हर साक्षी का पीछा करने का नहीं है जो वे हमारे विरुद्ध लड़ने के लिए पवित्र शास्त्र से यहाँ-वहाँ बिना सोचे-समझे बटोर लाते हैं। क्योंकि उनके कुछ दावे इतने हास्यास्पद हैं कि उनको छूने से मैं भी उन्हीं के समान मूर्ख बने बिना नहीं रह सकता।
इसलिए मैं मसीह के एक कथन को समझाकर इस विषय को समाप्त करूँगा जिससे वे असाधारण आनन्द पाते हैं। यह उसका वह उत्तर है जो उसने व्यवस्था के उस शिक्षक को दिया जिसने उससे पूछा था कि उद्धार के लिए क्या आवश्यक है:
“यदि तू जीवन में प्रवेश करना चाहता है, तो आज्ञाओं को मान।”
वे कहते हैं, “हमें और क्या चाहिए? अनुग्रह का रचयिता स्वयं हमें आज्ञा देता है कि हम आज्ञाओं का पालन करके परमेश्वर का राज्य प्राप्त करें।”
मानो यह प्रकट ही न हो कि मसीह अपने उत्तर सदा उन्हीं के अनुसार ढालता था जिनसे वह बात करता था। इस स्थल में उससे व्यवस्था के एक शिक्षक ने अनन्त आनन्द पाने के साधन के विषय में पूछा था, और केवल सामान्य रूप में नहीं, वरन् इस रूप में: जीवन पाने के लिए मनुष्यों को क्या करना चाहिए? प्रभु ने वैसा उत्तर इसलिए दिया कि पूछनेवाला कैसा था और प्रश्न की प्रकृति क्या थी।
क्योंकि वह शिक्षक व्यवस्था की धार्मिकता की झूठी धारणा से फूला हुआ था और अपने कर्मों के भरोसे में अन्धा था। इसके अतिरिक्त उसने केवल यही पूछा कि उद्धार पाने के लिए मनुष्य को धार्मिकता के कौन से कर्म करने चाहिए। इसलिए उसे ठीक ही व्यवस्था के पास भेजा गया, जिसमें हमारे पास धार्मिकता का सिद्ध दर्पण है।
हम भी ऊँचे और स्पष्ट स्वर में घोषणा करते हैं कि यदि धार्मिकता कर्मों में खोजी जाए तो आज्ञाओं का पालन करना चाहिए, और यह वह शिक्षा है जिसे सब मसीहियों को जानना आवश्यक है। क्योंकि यदि वे न जानें कि वे मृत्यु के विनाश में गिर चुके हैं, तो मसीह की ओर क्यों भागेंगे? और यदि वे न समझें कि जीवन का मार्ग क्या है, तो वे कैसे जानेंगे कि वे उस मार्ग से कितनी दूर भटक गए हैं?
इसलिए जब तक वे अपने जीवन और परमेश्वर की धार्मिकता के बीच, जो व्यवस्था में निहित है, विरोध को नहीं समझ लेते, तब तक उन्हें ठीक रीति से यह शिक्षा नहीं मिलती कि उद्धार पाने के लिए मसीह की ओर भागें।
सार यह है: यदि हम अपने कर्मों में उद्धार खोजें, तो हमें उन आज्ञाओं का पालन करना होगा जो हमें सिद्ध धार्मिकता की शिक्षा देती हैं। परन्तु हम यहीं न रुक जाएँ, जब तक कि हम मार्ग के बीच में ही असफल होना न चाहें, क्योंकि हम में से कोई भी उनका पालन करने में समर्थ नहीं। इसलिए, जब हम सब व्यवस्था की धार्मिकता से बाहर कर दिए गए हैं, तो हमें दूसरे शरणस्थान और सहायता की आवश्यकता है—अर्थात् मसीह में विश्वास।
इसलिए जैसे प्रभु यीशु ने इस स्थल में उस व्यवस्था के शिक्षक को—जिसे वह जानता था कि वह अपने कर्मों के व्यर्थ भरोसे से फूला हुआ है—व्यवस्था के पास भेजा, ताकि वह अपने आप को दण्ड के अधीन एक दीन पापी के रूप में पहचाने, वैसे ही अन्यत्र वह उन्हें, जो ऐसे ज्ञान से दीन हो चुके हैं, व्यवस्था का कोई उल्लेख किए बिना अपने अनुग्रह की प्रतिज्ञा से शान्ति देता है:
“हे सब परिश्रम करनेवालो और बोझ से दबे लोगो, मेरे पास आओ; मैं तुम्हें विश्राम दूँगा।”
अन्त में, जब हमारे विरोधी पवित्र शास्त्र को तोड़-मरोड़ने से थक जाते हैं, तब वे हमें भ्रान्तियों और खोखले कुतर्कों से फँसाने का यत्न करते हैं। पहले, वे हुज्जत करते हैं कि विश्वास भी एक कर्म कहलाता है, इसलिए हमारा उसे कर्मों से भिन्न वस्तु के रूप में उनके विरुद्ध रखना भूल है। मानो विश्वास, जहाँ तक वह परमेश्वर की इच्छा के प्रति आज्ञाकारिता का कार्य है, अपनी योग्यता से हमारे लिए धार्मिकता प्राप्त करता है, न कि वहाँ तक कि वह परमेश्वर की दया को ग्रहण करके हमें मसीह की उस धार्मिकता का निश्चय दिलाता है जो हमारे स्वर्गीय पिता की सेंतमेंत भलाई से सुसमाचार में हमें दी जाती है।
पाठक मुझे क्षमा करेंगे यदि मैं ऐसी मूर्खता का खण्डन करने में समय नष्ट न करूँ, क्योंकि ये आपत्तियाँ इतनी हल्की और तुच्छ हैं कि अपने आप ढह जाती हैं। तो भी मैं उनकी एक आपत्ति का उत्तर देना उचित समझता हूँ, जो इसलिए कि उसमें कुछ तर्क का रूप और रंग है, सीधे-सादे लोगों के लिए कठिनाई उत्पन्न कर सकती है।
वे कहते हैं कि चूँकि विपरीत बातें एक ही नियम से शासित होती हैं, और हर पाप हम पर अधार्मिकता के रूप में आरोपित किया जाता है, इसलिए उचित है कि हर भला काम भी धार्मिकता के रूप में आरोपित किया जाए।
जो लोग उत्तर देते हैं कि मनुष्यों का दण्ड ठीक रीति से केवल अविश्वास से होता है, विशेष पापों से नहीं, वे मुझे सन्तुष्ट नहीं करते। मैं उन्हें सहर्ष मान लेता हूँ कि अविश्वास हर बुराई का स्रोत और जड़ है, क्योंकि यह परमेश्वर को छोड़ देने और लगभग त्याग देने का आरम्भ है, जिससे उसकी इच्छा के सब उल्लंघन उत्पन्न होते हैं। परन्तु जहाँ तक वे मनुष्य की धार्मिकता या अधार्मिकता को आँकने में भले और बुरे कर्मों को एक ही तराजू में रखते दिखाई देते हैं, वहाँ मुझे उनका विरोध करना पड़ता है।
क्योंकि कर्मों की धार्मिकता व्यवस्था की सिद्ध आज्ञाकारिता है। इसलिए कोई भी कर्मों से धर्मी नहीं हो सकता जब तक कि वह अपने जीवन के सारे काल में परमेश्वर की व्यवस्था का मानो बिलकुल सीधी रेखा में पालन न करे। जिस क्षण वह किसी भी दिशा में मुड़ता है, वह अधार्मिकता में गिर जाता है। इससे प्रकट है कि धार्मिकता कुछ थोड़े से भले कामों में नहीं, वरन् परमेश्वर की इच्छा के पूर्ण और सिद्ध पालन में है।
अधार्मिकता को आँकने का नियम बिलकुल भिन्न है। क्योंकि जो कोई व्यभिचार या चोरी करता है, वह उसी एक अपराध से मृत्यु का दोषी हो जाता है, क्योंकि उसने परमेश्वर की महिमा का उल्लंघन किया है। यहीं हमारे सोफिस्ट भटक जाते हैं: वे इस पर विचार नहीं करते जो सन्त याकूब कहता है:
“जो कोई एक आज्ञा को तोड़ता है, वह सब का दोषी ठहरता है, क्योंकि जिसने हत्या करने को मना किया, उसी ने चोरी करने को भी मना किया।”
इसलिए जब हम कहते हैं कि मृत्यु हर पाप का उचित दण्ड है, तो यह अनुचित नहीं लगना चाहिए, क्योंकि सब पाप परमेश्वर के क्रोध और दण्ड के योग्य हैं। परन्तु इसको उलटकर यह तर्क करना कि मनुष्य एक ही भले काम से परमेश्वर की कृपा पा सकता है जबकि बहुत से अपराधों से उसका क्रोध भड़काता है, दोषपूर्ण तर्क होगा।
