अध्याय 13

अध्याय दस: संस्कारों के विषय में

Institutes of the Christian Religion (1541) · John Calvin

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अध्याय दस: संस्कारों के विषय में

अध्याय दस

संस्कारों के विषय में

अब हमें संस्कारों के विषय में बोलना है। यह अत्यन्त आवश्यक है कि हम उनके सम्बन्ध में कोई निश्चित शिक्षा ग्रहण करें, ताकि हम जान सकें कि वे किस उद्देश्य से ठहराए गए हैं और उनका उपयोग किस प्रकार करना उचित है।

सबसे पहले हमें यह समझना चाहिए कि संस्कार क्या है: यह एक बाहरी चिन्ह है, जिसके द्वारा हमारा प्रभु हमारे प्रति अपनी भलाई और अनुग्रहपूर्ण इच्छा को हम पर प्रकट करता और उसकी गवाही देता है, ताकि हमारे विश्वास की निर्बलता को सहारा और बल मिले। इसकी यह परिभाषा भी दी जा सकती है कि संस्कार परमेश्वर के अनुग्रह की वह गवाही है जो बाहरी चिन्ह के द्वारा घोषित की जाती है।

इससे हम देखते हैं कि संस्कार कभी ऐसा नहीं होता जिससे पहले परमेश्वर का वचन न आया हो। वह तो वचन के साथ एक उपांग के रूप में जोड़ा जाता है, जो उस वचन पर मुहर लगाने और उसे पक्का करने, और हमें उसका और भी अधिक निश्चय दिलाने के लिए ठहराया गया है, जैसा कि हमारे प्रभु हमारी समझ की मन्दता और हमारे शरीर की निर्बलता के कारण आवश्यक देखता है। इसका कारण यह नहीं कि वचन अपने आप में पर्याप्त दृढ़ नहीं है, या अपने स्वभाव में उसे इससे अच्छी कोई पुष्टि मिल सकती है। क्योंकि वह परमेश्वर के सत्य के सिवा और कुछ नहीं, जो अपने आप में ऐसा निश्चित और अटल है कि उसे अपने से बढ़कर किसी और स्थान से पुष्टि नहीं मिल सकती। परन्तु संस्कार इसलिए दिया गया है कि हम वचन में दृढ़ किए जाएँ।

हमारा विश्वास इतना छोटा और दुर्बल है कि जब तक उसे चारों ओर से सहारा न दिया जाए और हर उपाय से थामा न जाए, वह तुरन्त इधर-उधर हिल जाता, डगमगा जाता और लड़खड़ाने लगता है। और क्योंकि हम ऐसे अज्ञानी हैं और पार्थिव तथा शारीरिक वस्तुओं में ऐसे रमे और जकड़े हुए हैं कि किसी आत्मिक बात को न सोचते हैं, न समझ सकते हैं, न उसकी कल्पना कर सकते हैं, इसलिए दयालु प्रभु हमारी समझ की मन्दता के अनुसार अपने आप को ढाल लेता है। इन भौतिक तत्वों के द्वारा वह हमें अपनी ओर खींचता है और हमें शरीर में भी वह देखने देता है जो आत्मा से सम्बन्ध रखता है। यह इसलिए नहीं कि जो वस्तुएँ हमारे सामने संस्कार के रूप में रखी जाती हैं उनमें स्वभाव से ऐसा गुण और सामर्थ्य है, परन्तु इसलिए कि परमेश्वर ने उन पर मुहर और चिन्ह लगाकर उन्हें इस अर्थ का वाहक ठहराया है।

हमें उन लोगों की बात नहीं सुननी चाहिए जो इस प्रकार का कुतर्क करते हैं: या तो हम जानते हैं कि संस्कार से पहले आनेवाला परमेश्वर का वचन परमेश्वर की सच्ची इच्छा है, या नहीं जानते। यदि जानते हैं, तो उसके बाद आनेवाले संस्कार से हम कुछ नया नहीं सीखते। यदि नहीं जानते, तो संस्कार हमें यह सिखा नहीं सकता, क्योंकि उसकी सारी शक्ति और प्रभाव वचन में ही है।

उन्हें संक्षेप में यह उत्तर दिया जाए कि सार्वजनिक पत्रों और कानूनी दस्तावेज़ों पर लगाई गई मुहरें अपने आप में कुछ भी नहीं होतीं। यदि चर्मपत्र पर कुछ लिखा न हो, तो उनका कोई उपयोग न होगा और वे उस पर व्यर्थ ही लगाई जाएँगी। फिर भी, जब वे पत्रों के साथ जोड़ी जाती हैं, तो उनमें लिखी बात को पक्का करती, प्रमाणित करती और अधिक विश्वसनीय बनाती हैं।

और वे यह भी नहीं कह सकते कि यह तुलना हमने अभी अपनी सुविधा के लिए गढ़ ली है। सन्त पौलुस ने इसका प्रयोग किया, जब उसने खतने के संस्कार को यूनानी शब्द स्फ्रागिदा अर्थात् मुहर कहा। उस स्थान पर वह दिखाता है कि खतना अब्राहम की धार्मिकता नहीं था, परन्तु उस वाचा की मुहर था जो उस विश्वास के द्वारा थी जिसमें वह पहले ही धर्मी ठहराया जा चुका था।

और मैं पूछता हूँ, यदि हम यह सिखाएँ कि प्रतिज्ञा पर संस्कारों के द्वारा मुहर लगाई जाती है, तो इससे हमें ठोकर क्यों लगे, जबकि प्रकट है कि एक प्रतिज्ञा दूसरी प्रतिज्ञा से पक्की की जाती है? क्योंकि अधिक स्पष्ट प्रतिज्ञा विश्वास को निश्चय दिलाने के लिए अधिक उपयुक्त होती है। संस्कार हमारे सामने अत्यन्त स्पष्ट प्रतिज्ञाएँ लाते हैं, और बोले हुए वचन से बढ़कर उनमें यह विशेष लाभ है कि वे उन प्रतिज्ञाओं को चित्र के समान हमारे सामने सजीव रूप में प्रस्तुत करते हैं।

न ही हमें उस भेद से विचलित होना चाहिए जो संस्कारों और सरकारी दस्तावेज़ों पर लगाई जानेवाली मुहरों के बीच बताया जाता है: कि चूँकि दोनों इस संसार के भौतिक तत्वों से बने हैं, इसलिए संस्कार परमेश्वर की आत्मिक प्रतिज्ञाओं पर मुहर लगाने के काम नहीं आ सकते, जैसे मुहरें राजाओं के उन लेखों को प्रमाणित करती हैं जो क्षणभंगुर और नाशमान वस्तुओं के विषय में होते हैं। क्योंकि जब कोई विश्वासी संस्कार को देखता है, तो वह उसके बाहरी रूप पर ठहर नहीं जाता, परन्तु पवित्र मनन के द्वारा, भौतिक आकृति और आत्मिक वस्तु के बीच के सादृश्य के अनुसार, उसमें छिपे हुए उच्च भेदों को देखने के लिए ऊपर उठता है।

और क्योंकि हमारा प्रभु अपनी प्रतिज्ञाओं को वाचाएँ और सन्धियाँ, और संस्कारों को उन वाचाओं के चिन्ह और प्रमाण कहता है, इसलिए हम मनुष्यों की वाचाओं और सन्धियों से तुलना ले सकते हैं। अपनी सन्धियों को पक्का करने के लिए प्राचीन लोग एक सूअरी का वध करने के आदी थे। यदि सन्धि के शब्द उसके साथ न होते, बल्कि उससे पहले न कहे गए होते, तो वध की गई सूअरी से क्या सिद्ध होता? सूअरियाँ तो अकसर बिना कोई भेद प्रकट किए मारी जाती हैं।

इसी प्रकार, हाथ मिलाना अपने आप में क्या सूचित करता है, जबकि लोग अकसर अपने शत्रुओं के हाथ उन्हें हानि पहुँचाने के लिए पकड़ लेते हैं? फिर भी जब पहले मित्रता और सन्धि के वचन कहे जा चुके हों, तब ऐसे चिन्ह से वे वचन पक्के किए जाते हैं, चाहे सन्धि का प्रस्ताव, निर्णय और समझौता पहले ही हो चुका हो।

इसलिए संस्कार वे अभ्यास हैं जो हमें परमेश्वर के वचन और प्रतिज्ञाओं के विषय में अधिक निश्चित करने के लिए दिए गए हैं। क्योंकि हम शारीरिक हैं, इसलिए वे हमें भौतिक वस्तुओं में भी दिए गए हैं, ताकि वे हमारी मन्दता की क्षमता के अनुसार हमें सिखाएँ और शिक्षकों के समान, जैसे वे छोटे बच्चों को चलाते हैं, हमें मार्ग दिखाएँ और ले चलें। इसी कारण सन्त ऑगस्टीन संस्कार को दृश्य वचन कहता है, क्योंकि वह परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं को चित्र के समान हमारे सामने दिखाता और उन्हें सजीव रूप में हमारे सम्मुख प्रस्तुत करता है।

संस्कारों का पूरा वर्णन करने के लिए हम और भी तुलनाओं का प्रयोग कर सकते हैं, जैसे जब हम उन्हें अपने विश्वास के खम्भे कहते हैं। क्योंकि जैसे कोई भवन अपनी नींव पर टिका और खड़ा रहता है, फिर भी जब उसके नीचे सहारा देनेवाले खम्भे लगा दिए जाते हैं तो वह अधिक सुरक्षित और स्थिर हो जाता है, वैसे ही हमारा विश्वास परमेश्वर के वचन पर, नींव के समान, टिका और खड़ा रहता है। परन्तु जब संस्कार जोड़े जाते हैं, तब वे उन खम्भों का काम करते हैं जिन पर विश्वास अधिक सुरक्षित रूप से टिकता है और जिनसे वह अधिक दृढ़ किया जाता है।

हम उन्हें दर्पण भी कह सकते हैं जिनमें हम परमेश्वर के उस अनुग्रह के धन को देखते हैं जो वह हम पर उण्डेलता है। क्योंकि इन संस्कारों के द्वारा, जैसा कि कहा जा चुका, वह हमारी मन्द समझ की जानने की क्षमता के अनुसार अपने आप को हम पर प्रकट करता है और हमारे प्रति अपनी भलाई की गवाही देता है।

और वे लोग भी ठीक तर्क नहीं करते जो यह कहते हैं कि संस्कार परमेश्वर के अनुग्रह की गवाही नहीं हैं, क्योंकि उन्हें अकसर दुष्ट लोग ग्रहण करते हैं, जो फिर भी इससे परमेश्वर को अपने प्रति अधिक अनुकूल नहीं पाते, वरन् और भी बड़े दण्ड के भागी होते हैं। इसी तर्क से तो सुसमाचार भी परमेश्वर के अनुग्रह की गवाही न ठहरेगा, क्योंकि उसे बहुत लोग सुनते हैं जो उसे तुच्छ जानते हैं। और अन्त में स्वयं यीशु मसीह भी ऐसी गवाही न ठहरेगा, क्योंकि उसे बहुतों ने देखा और जाना, जिनमें से बहुत थोड़ों ने उसे ग्रहण किया।

राजाओं के सरकारी पत्रों में भी यही देखा जा सकता है। यद्यपि लोगों का एक बड़ा भाग जानता है कि उन पर लगी असली मुहर राजा की ओर से है, तौभी वे उसे तुच्छ जानते हैं। कुछ लोग उसे ऐसी वस्तु समझकर एक ओर रख देते हैं जिससे उनका कोई सरोकार नहीं, और कुछ तो उससे घृणा भी करते हैं। इस प्रकार, इस समानता पर विचार करते हुए, हम ऊपर दी गई तुलना को स्वीकार किए बिना नहीं रह सकते।

इसलिए यह अत्यन्त निश्चित है कि हमारा प्रभु अपने पवित्र वचन और अपने संस्कारों दोनों में सब पर अपनी दया और अनुग्रहपूर्ण इच्छा प्रस्तुत करता है। फिर भी उसे केवल वे ही ग्रहण करते हैं जो वचन और संस्कारों दोनों को पक्के विश्वास से स्वीकार करते हैं। इसी प्रकार हमारा प्रभु यीशु मसीह पिता की ओर से सब के उद्धार के लिए दिया और प्रस्तुत किया गया, परन्तु सब ने उसे नहीं पहचाना और ग्रहण किया। सन्त ऑगस्टीन ने कहीं यही बात कहना चाहते हुए यह कहा कि संस्कार में वचन की प्रभावशीलता इसमें नहीं है कि वह बोला जाता है, परन्तु इसमें है कि उस पर विश्वास किया जाता और उसे ग्रहण किया जाता है।

इसलिए हम निष्कर्ष निकालते हैं कि संस्कार ठीक ही परमेश्वर के अनुग्रह की गवाहियाँ और मानो उस कृपा की मुहरें कहलाते हैं जो वह हम पर रखता है। उस कृपा पर हमारे भीतर मुहर लगाकर वे हमारे विश्वास को शान्ति देते, उसका पोषण करते, उसे दृढ़ करते और बढ़ाते हैं। इसके विरुद्ध कुछ लोगों ने जो तर्क उठाने का प्रयत्न किया है वे अत्यन्त तुच्छ और निर्बल हैं।

कुछ लोग कहते हैं कि यदि हमारा विश्वास अच्छा है तो वह और अच्छा नहीं किया जा सकता। क्योंकि, वे तर्क देते हैं, यदि वह परमेश्वर की दया पर ऐसी दृढ़ता से टिका और भरोसा न रखे कि उससे हिलाया या खींचा न जा सके, तो वह विश्वास ही नहीं है। उनके लिए कहीं उत्तम होता कि वे प्रेरितों के साथ यह प्रार्थना करते:

“हे प्रभु, हमारा विश्वास बढ़ा,”

—लूका 17:5

इसकी अपेक्षा कि वे विश्वास की ऐसी सिद्धता का घमण्ड करें, जो किसी मनुष्य के पास इस जीवन में न कभी रही है और न कभी होगी।

वे उत्तर दें कि जिस मनुष्य ने यह कहा, उसके पास उनके विचार में कैसा विश्वास था:

“हे प्रभु, मैं विश्वास करता हूँ; मेरे अविश्वास का उपाय कर।”

—मरकुस 9:24

क्योंकि वह विश्वास, यद्यपि केवल आरम्भ ही हुआ था, अच्छा था, फिर भी अविश्वास के घटने से वह और अच्छा किया जा सकता था। परन्तु उन्हें उनके अपने विवेक से अधिक निश्चित किसी तर्क से निरुत्तर नहीं किया जा सकता। क्योंकि यदि वे अपने आप को पापी मानते हैं, जिसे वे चाहें या न चाहें, इनकार नहीं कर सकते, तो उन्हें अनिवार्य रूप से इस दोष को अपने विश्वास की अपूर्णता के सिर मढ़ना होगा।

परन्तु वे कहते हैं कि फिलिप्पुस ने खोजे को उत्तर दिया था कि यदि वह पूरे मन से विश्वास करता है तो उसे बपतिस्मा लेने की अनुमति है। तब बपतिस्मा से मिलनेवाली पुष्टि के लिए यहाँ क्या स्थान हो सकता है, जबकि विश्वास पहले ही पूरे हृदय को अधिकार में लिए और भरे हुए है?

इसके उत्तर में मैं उनसे बदले में पूछता हूँ: क्या वे नहीं देखते कि उनके अपने हृदयों का एक बड़ा भाग विश्वास से रहित और खाली है? क्या वे अपने भीतर प्रतिदिन विश्वास की कोई नई बढ़ती नहीं पहचानते? एक अन्यजाति ने घमण्ड किया था कि वह सीखते-सीखते बूढ़ा हुआ।

तो हम मसीही अत्यन्त अभागे हैं यदि बिना कोई उन्नति किए बूढ़े हो जाएँ। हमारा विश्वास क्रमिक अवस्थाओं से होकर निकलना चाहिए, जिनके द्वारा वह निरन्तर आगे बढ़ता रहे, जब तक वह पूर्ण पुरुषत्व तक न पहुँच जाए। इसलिए इस स्थान पर पूरे मन से विश्वास करने का अर्थ यह नहीं कि यीशु मसीह में पूर्ण रूप से स्थिर हो जाना, परन्तु केवल यह कि उसे स्वेच्छा से और सच्चे उत्साह के साथ ग्रहण करना; उससे जो कुछ मिला है उसी से सन्तुष्ट न रहना, वरन् उसके लिए तीव्र लालसा के साथ भूखा-प्यासा होना और उसकी अभिलाषा करना।

पवित्रशास्त्र की यही सामान्य बोलचाल है: जब वह कहता है कि कोई काम पूरे मन से किया जाता है, तो उसका अर्थ यह होता है कि वह स्वेच्छा से और कपट के बिना किया जाता है। ऐसे ये वचन हैं:

“मैं ने पूर्ण मन से तुझे ढूँढ़ा है।”

—भजन संहिता 119:10

फिर:

“मैं पूर्ण मन से तेरा धन्यवाद करूँगा।”

—भजन संहिता 138:1

इसके विपरीत, कपटियों और धोखेबाज़ों को डाँटते समय पवित्रशास्त्र उन पर यह दोष लगाने का आदी है कि उनके पास “एक मन और एक मन” है, अर्थात् दोहरा मन।

वे आगे यह भी कहते हैं कि यदि विश्वास संस्कारों से बढ़ता, तो पवित्र आत्मा व्यर्थ ही दिया गया होता, क्योंकि विश्वास को आरम्भ करना, दृढ़ करना और सिद्ध करना उसी का कार्य और सामर्थ्य है। मैं उनके सामने मानता हूँ कि विश्वास पवित्र आत्मा का अपना और सम्पूर्ण कार्य है। उसी से प्रकाश पाकर हम परमेश्वर को और उसकी भलाई के बड़े भण्डारों को पहचानते हैं। उसके प्रकाश के बिना हमारे मन ऐसे अन्धे हैं कि कुछ देख नहीं सकते, और सब बोध से ऐसे रहित हैं कि आत्मिक बातों में से कुछ भी पहचान नहीं सकते।

परन्तु जहाँ वे परमेश्वर का केवल एक अनुग्रह देखते हैं, वहाँ हम तीन पहचानते हैं। पहला, हमारा प्रभु अपने वचन के द्वारा हमें सिखाता और शिक्षा देता है। दूसरा, वह अपने संस्कारों के द्वारा हमें दृढ़ करता है। तीसरा, वह अपने पवित्र आत्मा के प्रकाश से हमारी समझ को प्रकाशित करता और वचन तथा संस्कार दोनों के लिए हमारे हृदयों में प्रवेश देता है। नहीं तो वे केवल कानों पर पड़ते और आँखों के सामने आ जाते, परन्तु भीतरी मनुष्य में न पैठते, न उसे हिलाते।

इसलिए मैं चाहता हूँ कि पाठक यह समझें कि जब मैं संस्कारों को विश्वास को दृढ़ करने और बढ़ाने का कार्य सौंपता हूँ, तो मैं यह कल्पना नहीं करता कि उनमें इसे सदा सम्पन्न करने की कोई अन्तर्निहित सामर्थ्य है, परन्तु यह कि परमेश्वर ने उन्हें इसी उद्देश्य से ठहराया है। वे अपना प्रभाव तब उत्पन्न करते हैं जब आत्माओं का भीतरी गुरु उनके साथ अपनी सामर्थ्य जोड़ता है, जिसके द्वारा ही हृदय बेधे जाते और भावनाएँ संस्कारों को प्रवेश देने के लिए प्रेरित की जाती हैं।

यदि वह अनुपस्थित हो, तो संस्कार मन को उससे अधिक कुछ नहीं पहुँचा सकते जितना सूर्य का प्रकाश अन्धी आँखों को या गूँजती आवाज़ बहरे कानों को पहुँचा सकती है। इसलिए मैं आत्मा और संस्कारों के बीच यह भेद करता हूँ: मैं मानता हूँ कि सामर्थ्य आत्मा में है, और संस्कारों के लिए इसके सिवा और कुछ नहीं छोड़ता कि वे ऐसे साधन हैं जिन्हें प्रभु हमारे प्रति काम में लाता है। आत्मा के कार्य के बिना ये साधन निष्फल और खोखले होंगे; फिर भी जब आत्मा भीतर से उनके द्वारा कार्य करता है, तो वे प्रभाव से भरपूर हैं।

अब प्रकट है कि मेरे विचार में विश्वास संस्कारों से किस प्रकार दृढ़ होता है: जैसे आँखें सूर्य के प्रकाश से देखती हैं और कान आवाज़ की ध्वनि से सुनते हैं। निश्चय ही प्रकाश आँखों के लिए कुछ न कर पाता यदि उनमें उसे ग्रहण करने की देखने की शक्ति न होती, और न ध्वनि कानों के लिए कुछ कर पाती यदि उन्हें स्वभाव से सुनने की शक्ति न दी गई होती।

अब यदि यह सच है, जैसा कि हमारे बीच निश्चित होना चाहिए, कि विश्वास को उत्पन्न करने, थामने, बनाए रखने और स्थापित करने में पवित्र आत्मा का कार्य आँख के देखने और कान के सुनने के समान है, तो दोनों निष्कर्ष भली-भाँति निकलते हैं: संस्कार उसकी सामर्थ्य के बिना कुछ लाभ नहीं पहुँचाते, और फिर भी उन हृदयों में, जो उसके द्वारा पहले ही शिक्षित हो चुके हैं, संस्कारों से विश्वास के दृढ़ और बढ़ाए जाने में कोई बाधा नहीं है।

इस तर्क से उन आपत्तियों का भी उत्तर हो जाता है जो कुछ लोग सामान्यतः उठाते हैं। वे कहते हैं कि यदि हम विश्वास की बढ़ती या पुष्टि का श्रेय सृजी हुई वस्तुओं को दें, तो हम परमेश्वर के आत्मा के साथ अन्याय करते हैं, जिसे अकेले ही उसका कर्ता मानना चाहिए। परन्तु ऐसा करने में हम उससे वह स्तुति नहीं छीनते जो उसकी है, क्योंकि विश्वास को दृढ़ करना और बढ़ाना उसका इसी में है कि वह अपने प्रकाश के द्वारा हमारे मनों को उस ज्योति को ग्रहण करने के लिए तैयार करता है जो संस्कारों में हमारे सामने रखी गई है।

यदि यह अब भी बहुत अस्पष्ट रूप में कहा गया हो, तो इसे इस तुलना से स्पष्ट किया जा सकता है। यदि कोई किसी दूसरे व्यक्ति को कोई काम करने के लिए मनाना चाहे, तो वह हर उस तर्क पर विचार करेगा जिससे वह व्यक्ति सहमत होने के लिए खिंच आए और मानो विवश हो जाए। फिर भी कुछ सिद्ध नहीं हुआ यदि जिससे बात की जा रही है उसमें ऐसी सजीव और तीव्र बुद्धि न हो जो उसके सामने रखे गए तर्कों का वज़न समझ सके; यदि वह स्वभाव से सिखाए जाने योग्य और अच्छी शिक्षा मानने की ओर झुका हुआ न हो; और अन्त में, यदि उसने अपने सलाहकार की सच्चाई और बुद्धिमानी के विषय में ऐसी धारणा न बना ली हो जो उसके निर्णय को पहले ही प्रस्तावित बात को ग्रहण करने के लिए प्रवृत्त कर दे।

क्योंकि बहुत से हठीले मन हैं जिन्हें किसी तर्क से कभी मनाया नहीं जा सकता। जब सलाहकार की खराई पर सन्देह हो या उसके अधिकार को तुच्छ जाना जाए, तब उन लोगों में भी कुछ सिद्ध नहीं होता जो अन्यथा सहज ही मान जानेवाले हैं। इसके विपरीत, जब ये सब बातें एक साथ मिल जाती हैं, तो दी गई सलाह स्वेच्छा से ग्रहण की जाएगी, यद्यपि अन्यथा उसे तुच्छ जाना जाता।

हमारे भीतर परमेश्वर का कार्य भी ऐसा ही है। ताकि वचन हमारे कानों पर व्यर्थ न पड़े, या संस्कार हमारी आँखों के सामने बिना लाभ के न रखे जाएँ, वह घोषणा करता है कि वहाँ परमेश्वर ही बोलता है, हमारे हृदयों की कठोरता को कोमल करता है, और हमें उस आज्ञाकारिता के लिए तैयार करता है जो उसके वचन के प्रति उचित है। अन्त में वह वचन और संस्कार दोनों को आत्मा के भीतरी कानों तक पहुँचाता है।

इसलिए इसमें कोई सन्देह नहीं कि वचन और संस्कार दोनों हमारे विश्वास को दृढ़ करते हैं, क्योंकि वे हमारे स्वर्गीय पिता की हमारे प्रति भली इच्छा को हमारी आँखों के सामने स्पष्ट रखते हैं। उसी भली इच्छा के ज्ञान में हमारे विश्वास की स्थिरता है, और उसी पर उसकी सारी शक्ति टिकी है। आत्मा भी इस पुष्टि को हमारे हृदयों पर अंकित करके और वहाँ उसे प्रभावशाली बनाकर विश्वास को दृढ़ करता है।

प्रभु यीशु दिखाता है कि यह गुण बाहरी वचन का है, जब वह उसे बीज कहता है। क्योंकि जैसे बीज यदि किसी बंजर और अनजोती भूमि पर गिरे तो बिना कुछ उपजाए नष्ट हो जाता है, परन्तु यदि भली-भाँति जोते हुए खेत में डाला जाए तो भरपूर फल देता है, वैसे ही परमेश्वर का वचन यदि किसी कठोर और हठीले मन पर पड़े तो समुद्र-तट की कंकड़ीली भूमि पर डाले हुए बीज के समान बाँझ रहता है। परन्तु यदि उसे पवित्र आत्मा के कार्य से भली-भाँति तैयार किया हुआ मन मिले, तो वह फलवन्त होता और भरपूर उपज देता है।

अब यदि बीज और वचन के बीच ऐसा निकट सादृश्य है, जैसे हम कहते हैं कि अनाज बीज से उगता, फूटता और पकने तक पहुँचता है, तो हम यह क्यों न कहें कि विश्वास अपना आरम्भ, बढ़ती और सिद्धता वचन से पाता है?

संस्कार हमारे विश्वास की ऐसी सच्ची पुष्टियाँ हैं कि कभी-कभी जब परमेश्वर चाहता है कि उनके द्वारा प्रतिज्ञा की गई बातों पर से भरोसा हटा दे, तो वह संस्कारों को भी हटा देता है। जब वह आदम को अमरता के वरदान से वंचित करके निकाल देता है, तब कहता है:

“आदम जीवन के फल को न तोड़े, ऐसा न हो कि वह सदा जीवित रहे।”

—उत्पत्ति 3:22

यह हम क्या सुन रहे हैं? क्या वह फल आदम को वह अविनाशिता लौटा सकता था जिससे वह पहले ही गिर चुका था? निश्चय ही नहीं।

परन्तु मानो उसने कहा: “मेरी प्रतिज्ञा का वह चिन्ह, जो उसे अमरता की कुछ आशा दे सकता है, उससे ले लिया जाए, ताकि वह आगे को व्यर्थ भरोसा न रखे।”

इसी कारण, जब प्रेरित इफिसियों को स्मरण दिलाता है कि वे प्रतिज्ञाओं के लिए परदेशी, इस्राएल की प्रजा के अधिकार से अलग, और परमेश्वर तथा मसीह से रहित थे, तो वह कहता है कि वे खतने में सहभागी नहीं हुए थे। इससे वह यह सूचित करता है कि वे प्रतिज्ञा से बाहर थे, क्योंकि उन्होंने उसका चिन्ह ग्रहण नहीं किया था।

वे एक और आपत्ति उठाते हैं: कि जब सृजी हुई वस्तुओं को इतनी सामर्थ्य दी जाती है, तो परमेश्वर की महिमा उन्हें दे दी जाती है, और इस प्रकार घट जाती है। इसका उत्तर सरल है। हम सृजी हुई वस्तुओं में कोई सामर्थ्य नहीं रखते, केवल यह कहते हैं कि परमेश्वर ऐसे साधनों और उपकरणों को काम में लाता है जो उसे स्वयं उपयुक्त जान पड़ते हैं, ताकि सब कुछ उसकी महिमा की सेवा करे, क्योंकि वह सब का प्रभु और स्वामी है।

इस प्रकार वह रोटी और अन्य भोजनों से हमारी देह का पोषण करता है, सूर्य से जगत को प्रकाशित करता है और अग्नि से उसे गर्म करता है। फिर भी न रोटी, न सूर्य, न अग्नि कुछ करती है, सिवा इसके कि इन साधनों के नीचे वह अपनी आशिषें हमें देता है। इसी प्रकार वह संस्कारों के द्वारा विश्वास को आत्मिक रीति से खिलाता और पोषण देता है, जिनका एकमात्र काम परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं को हमारी आँखों के सामने प्रस्तुत करना है।

हमें उन अन्य सृजी हुई वस्तुओं पर कोई भरोसा नहीं रखना चाहिए जिन्हें परमेश्वर ने अपनी भलाई से हमारे उपयोग के लिए ठहराया है और जिनकी सेवा के द्वारा वह अपनी भलाई के वरदान हमें देता है। न ही हमें उन्हें अपनी भलाई के कारण मानकर उनकी प्रशंसा या महिमा करनी चाहिए। इसी प्रकार हमारा भरोसा संस्कारों पर नहीं टिकना चाहिए, और न परमेश्वर की महिमा उन्हें दी जानी चाहिए। परन्तु सब सृजी हुई वस्तुओं से मुँह फेरकर और उन्हें पीछे छोड़कर, हमारे विश्वास और हमारे अंगीकार दोनों को उसकी ओर उठना और अपने आप को उसी की ओर लगाना चाहिए जो संस्कारों और हर दूसरी भलाई का कर्ता है।

अन्त में, जब वे अपनी भूल के लिए सहारा संस्कार शब्द से ही ढूँढ़ते हैं, तो वे बहुत ही चालाकी से आगे बढ़ते हैं। वे कहते हैं कि यद्यपि मान्य लेखकों में इस शब्द के बहुत अर्थ हैं, उनमें से केवल एक ही चिन्हों के लिए उचित या लागू होता है: अर्थात् वह गम्भीर शपथ जो सैनिक अपने राजा या सेनापति के प्रति लेता है जब वह पंक्तियों में भरती और ग्रहण किया जाता है। क्योंकि जैसे इस शपथ से नए सैनिक अपने राजा या सेनापति के प्रति निष्ठा की प्रतिज्ञा करते, अपने आप को उसे सौंपते और घोषणा करते हैं कि वे उसकी सेना के हैं, वैसे ही हम अपने चिन्हों के द्वारा यीशु मसीह को अपना सेनापति मानते और गवाही देते हैं कि हम उसके झण्डे के नीचे युद्ध करते हैं।

वे अपने अर्थ को और स्पष्ट तथा प्रकट करने के लिए तुलनाएँ जोड़ते हैं। जैसे युद्ध में फ्रांसीसी और अंग्रेज़ एक-दूसरे से इसलिए पहचाने जाते हैं कि फ्रांसीसी सफेद क्रूस और अंग्रेज़ लाल क्रूस धारण करते हैं। इसी प्रकार रोमी लोग पहनावे के भेदों से यूनानियों से अलग पहचाने जाते थे। इसके अतिरिक्त, रोम के वर्ग एक-दूसरे से अपने-अपने विशेष चिन्हों द्वारा भिन्न किए जाते थे: सीनेटर नाइटों से बैंगनी वस्त्रों और गोल जूतों द्वारा, और नाइट साधारण लोगों से अँगूठी द्वारा। इसी प्रकार हमारे भी चिन्ह हैं जिनसे हम अविश्वासियों और अपने धर्म से बाहर के लोगों से पहचाने और अलग किए जाते हैं।

परन्तु मैं विश्वास के साथ सच कह सकता हूँ कि प्राचीन लोगों ने, जिन्होंने हमारे चिन्हों को संस्कार नाम दिया, उस अर्थ पर ध्यान नहीं दिया जिसमें लातीनी लेखकों ने उस शब्द का प्रयोग किया था। परन्तु सुविधा के लिए उन्होंने उसे यह नया अर्थ दिया, जिससे उन्होंने केवल पवित्र चिन्हों को सूचित किया।

यदि हम इस बात की और बारीकी से जाँच करना चाहें, तो यह मानना उचित है कि उन्होंने इस शब्द को इस अर्थ में उसी तर्क और सादृश्य से अपनाया जिससे उन्होंने विश्वास शब्द को वह अर्थ दिया जिसमें हम अब उसका प्रयोग करते हैं। क्योंकि यद्यपि विश्वास का सही अर्थ वह सच्चाई है जिससे प्रतिज्ञा निभाई जाती है, उन्होंने उसे उस निश्चय या दृढ़ प्रतीति को सूचित करने के लिए प्रयोग किया जो किसी को उस सच्चाई के विषय में होती है।

इसी प्रकार, यद्यपि संस्कार वह शपथ है जिससे सैनिक अपने सेनापति से प्रतिज्ञा करता और अपने को बाँधता है, प्राचीन लोगों ने इस शब्द को उस चिन्ह को सूचित करने के लिए प्रयोग किया जिससे सेनापति अपने सैनिकों को अपनी पंक्तियों और सेवा में ग्रहण करता है। क्योंकि प्रभु अपने संस्कारों के द्वारा हमसे प्रतिज्ञा करता है कि वह हमारा परमेश्वर होगा और हम उसकी प्रजा होंगे।

परन्तु हम ऐसी सूक्ष्मताओं को छोड़ देते हैं, क्योंकि बहुत ही स्पष्ट प्रमाणों से हम दिखा और सिद्ध कर सकते हैं कि प्राचीन लोगों ने हमारे चिन्हों को संस्कार कहकर और कुछ नहीं, केवल यही सूचित करना चाहा कि वे पवित्र और आत्मिक वस्तुओं के चिन्ह हैं। वास्तव में पवित्रशास्त्र के लातीनी अनुवाद में यह शब्द प्रायः भेद के लिए प्रयुक्त हुआ है।

उनकी प्रस्तावित तुलनाओं को हम सहर्ष स्वीकार करते हैं, परन्तु उन्हें इसकी अनुमति नहीं देते कि वे संस्कारों में जो सबसे कम महत्त्व की बात है उसे पहले रखें, और उनमें और कुछ पहचानें ही नहीं। संस्कारों के विषय में प्रमुख विचार यह होना चाहिए कि वे परमेश्वर के प्रति हमारे विश्वास की सेवा के लिए दिए गए हैं।

दूसरा विचार यह है कि संस्कार मनुष्यों के सामने हमारे अंगीकार की गवाही देने के काम आते हैं। इस दूसरे उद्देश्य के अनुसार अभी बताई गई तुलनाएँ अच्छी और पूरी तरह उचित हैं।

दूसरी ओर, हमें चेतावनी दी जानी चाहिए कि जैसे ये लोग संस्कारों की प्रभावशीलता को नष्ट करते और उनके उपयोग को मिटा देते हैं, वैसे ही कुछ और लोग हैं जो संस्कारों को कुछ रहस्यमय सामर्थ्य सौंपते हैं, जिनके विषय में हम कहीं नहीं पढ़ते कि परमेश्वर ने उन्हें कभी दी। इस भूल से सीधे और अनजान लोग धोखा खाते और भटकाए जाते हैं, और उन्हें सिखाया जाता है कि परमेश्वर के वरदान और अनुग्रह वहाँ ढूँढ़ें जहाँ वे किसी भी रीति से नहीं मिल सकते। धीरे-धीरे वे उससे फिरा दिए और खींच लिए जाते हैं कि केवल व्यर्थ बातों के पीछे चलें।

क्योंकि कुतर्कियों की पाठशालाओं ने एक मत से यह ठहराया है कि नई व्यवस्था के संस्कार, अर्थात् जिनका उपयोग अब मसीही कलीसिया में होता है, धर्मी ठहराते और अनुग्रह प्रदान करते हैं, बशर्ते हम उनके मार्ग में घातक पाप की कोई बाधा न डालें। यह कहना सम्भव नहीं कि यह मत कितना विनाशकारी है, विशेषकर इसलिए कि यह इतने वर्षों से कलीसिया की बड़ी हानि के साथ स्वीकार किया गया है और संसार के एक बड़े भाग में अब भी बना हुआ है।

यह वास्तव में पूरी तरह शैतानी है। क्योंकि विश्वास के बिना धार्मिकता की प्रतिज्ञा करके यह विवेक को उलझन और दण्ड में डाल देता है। इसके अतिरिक्त, संस्कार को धार्मिकता का कारण ठहराकर यह मनुष्यों के मनों को इस अन्धविश्वास में बाँधता और फँसाता है कि वे परमेश्वर के बजाय किसी शारीरिक वस्तु में विश्राम करें, क्योंकि वे स्वभाव से पार्थिव वस्तुओं की ओर उससे कहीं अधिक झुके हुए हैं जितना उन्हें होना चाहिए। यह भला होता कि हमने इन दोनों बुराइयों का इतना व्यापक अनुभव न किया होता; इन्हें किसी विस्तृत प्रमाण की आवश्यकता नहीं।

विश्वास के बिना ग्रहण किया गया संस्कार कलीसिया के विनाश के सिवा और क्या है? क्योंकि उससे प्रतिज्ञा के बल के सिवा और कुछ आशा नहीं रखनी चाहिए, जो अविश्वासियों पर परमेश्वर का क्रोध उतना ही प्रकट करती है जितना विश्वासियों के सामने उसका अनुग्रह प्रस्तुत करती है। इसलिए जो कोई यह कल्पना करता है कि उसे संस्कारों से उसके सिवा कोई और लाभ मिलता है जो वह विश्वास से ग्रहण करता है, जैसा कि वचन के द्वारा उसके सामने रखा गया है, वह बहुत धोखे में है।

इससे हम यह भी निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि उद्धार का भरोसा संस्कारों में सहभागी होने पर निर्भर नहीं है, मानो धार्मिकता उन्हीं में स्थित हो। हम जानते हैं कि धार्मिकता केवल यीशु मसीह में है और सुसमाचार के प्रचार के द्वारा हम तक उतनी ही पहुँचाई जाती है जितनी संस्कारों की गवाही के द्वारा। वास्तव में वह उस संस्कारिक गवाही के बिना भी पूरी रीति से रह सकती है।

इस प्रकार सन्त ऑगस्टीन का यह कथन सच है: दृश्य चिन्ह प्रायः अदृश्य पवित्रीकरण के बिना प्रकट होता है, और इसके विपरीत, पवित्रीकरण दृश्य चिन्ह के बिना।

इसलिए हमारे लिए यह निश्चित हो कि संस्कारों का परमेश्वर के वचन के सिवा कोई और कार्य नहीं है: यीशु मसीह को और उसमें उसके स्वर्गीय अनुग्रह के भण्डारों को हमारे सामने अर्पित और प्रस्तुत करना। वे केवल उन्हीं की सेवा करते और उन्हीं को लाभ पहुँचाते हैं जिनके द्वारा वे विश्वास से लिए और ग्रहण किए जाते हैं।

इसके अतिरिक्त, जब हम प्राचीन लोगों के उन आदरपूर्ण वचनों को पढ़ें जिनसे उन्होंने संस्कारों की गरिमा को बढ़ाया, तब हमें इससे मिलती-जुलती एक भूल में गिरने से सावधान रहना चाहिए। हमें यह कल्पना नहीं करनी चाहिए कि उनमें कोई गुप्त सामर्थ्य ऐसी जुड़ी और बँधी है कि पवित्र आत्मा के अनुग्रह उनके द्वारा ऐसे बाँटे और दिए जाते हैं जैसे दाखमधु प्याले या पात्र में परोसा जाता है।

उनका सारा कार्य केवल इतना है कि वे हमारे प्रति परमेश्वर की भली इच्छा और कृपा की गवाही दें और उसे पक्का करें। वे हमें इससे आगे कोई लाभ नहीं देते जब तक पवित्र आत्मा आकर हमारे मनों और हृदयों को न खोले और हमें इस गवाही को ग्रहण करने के योग्य न बनाए। यहाँ परमेश्वर के नाना और भिन्न-भिन्न अनुग्रह भी स्पष्ट दिखाई देते हैं।

क्योंकि संस्कार, जैसा कि हम ऊपर संकेत कर चुके हैं, परमेश्वर की ओर से वही काम करते हैं जो शुभ समाचार लानेवाले दूत मनुष्यों की ओर से करते हैं। वे हमें लाभ प्रदान नहीं करते, केवल उन बातों की घोषणा करते और उन्हें दिखाते हैं जो हमें ईश्वरीय उदारता से दी गई हैं।

पवित्र आत्मा संस्कारों के द्वारा बिना भेद सब को नहीं दिया जाता। परन्तु परमेश्वर उसे विशेष रूप से अपने लोगों को देता है। वही है जो परमेश्वर के अनुग्रहों को अपने साथ लाता है, संस्कारों को हमारे भीतर प्रवेश दिलाता है और वहाँ उन्हें फलवन्त करता है।

यद्यपि हम इनकार नहीं करते कि प्रभु अपनी ठहराई हुई विधि के साथ अपने आत्मा की अत्यन्त उपस्थित सामर्थ्य रखता है, ताकि उसके नियुक्त किए हुए संस्कारों का संचालन खोखला और निष्फल न हो, तौभी हम सिखाते हैं कि आत्मा का भीतरी अनुग्रह, जो बाहरी सेवकाई से भिन्न है, उस पर भी उससे अलग विचार किया जाना चाहिए।

जब संस्कारों के विषय में ऐसी शिक्षा दी जाती है, तब उनकी गरिमा पर्याप्त रूप से स्पष्ट होती है, उनका उपयोग दिखाया जाता है और उनका लाभ सराहा जाता है। साथ ही उचित संयम भी बना रहता है: न उन्हें जितना चाहिए उससे अधिक सौंपा जाता है, न उनके उचित अधिकार में से कुछ छीना जाता है।

संस्कार शब्द, जैसा हमने अब तक उसका प्रयोग किया है, उन सब चिन्हों को सामान्य रूप से सम्मिलित करता है जो परमेश्वर ने कभी मनुष्यों को अपनी प्रतिज्ञाओं की सच्चाई प्रमाणित करने और उनका निश्चय दिलाने के लिए ठहराए और दिए। कभी उसने ये चिन्ह प्राकृतिक वस्तुओं में से चुने; कभी उसने उन्हें आश्चर्यकर्मों में प्रस्तुत किया।

पहली प्रकार के उदाहरणों में यह है कि उसने आदम और हव्वा को जीवन का वृक्ष अमरता की प्रतिज्ञा के रूप में दिया, ताकि वे जब तक उसका फल खाएँ तब तक उसके अधिकारी होने का निश्चय रखें।

इसी प्रकार उसने नूह के सामने इन्द्रधनुष को उसके और उसके वंशजों के लिए चिन्ह और प्रमाण के रूप में रखा कि वह फिर कभी जलप्रलय से पृथ्वी का नाश नहीं करेगा।

आदम और नूह के पास ये वस्तुएँ संस्कार के रूप में थीं, इसलिए नहीं कि वृक्ष ने उन्हें अमरता दी, क्योंकि वह अपने आप को अमरता नहीं दे सकता था, और न इसलिए कि इन्द्रधनुष, जो बादलों पर सूर्य की किरणों का प्रतिबिम्ब मात्र है, जल को रोकने और थामने की सामर्थ्य रखता था। परन्तु इसलिए कि इन वस्तुओं पर परमेश्वर के वचन से एक चिन्ह अंकित किया गया था, जिससे वे उसकी प्रतिज्ञाओं के प्रमाण और मुहर बन गईं।

वृक्ष निश्चय ही पहले भी वृक्ष था, और इन्द्रधनुष इन्द्रधनुष। परन्तु जब उन पर परमेश्वर के वचन से चिन्ह लगा, तब उन्हें एक नया रूप दिया गया, और वे वह होने लगीं जो पहले नहीं थीं।

ताकि कोई यह न समझे कि यह बिना कारण कहा जा रहा है, इन्द्रधनुष आज भी उस प्रतिज्ञा और वाचा का साक्षी बना हुआ है जो परमेश्वर ने नूह से बाँधी थी। जब कभी हम उसे देखते हैं, तो उसमें परमेश्वर की यह प्रतिज्ञा पहचानते हैं कि पृथ्वी फिर कभी जलप्रलय से नष्ट नहीं होगी।

इसलिए यदि कोई दार्शनिक हमारे विश्वास की सरलता का उपहास करने के लिए यह कहे कि इन्द्रधनुष बनानेवाले रंगों की विविधता सूर्य की किरणों के सामने के बादल से टकराकर लौटने से स्वाभाविक रूप से उत्पन्न होती है, तो हम उसे यह मान लेंगे। परन्तु हम उसकी अज्ञानता को डाँट सकते हैं, क्योंकि वह यह नहीं मानता कि परमेश्वर प्रकृति का प्रभु है, जो अपनी इच्छा के अनुसार सब तत्वों को अपनी महिमा के उपकरण के रूप में काम में लाता है।

यदि परमेश्वर ने सूर्य, तारों, पृथ्वी या पत्थरों पर ऐसे चिन्ह और प्रमाण अंकित करके दिए होते, तो ये सब हमारे लिए संस्कार होते। क्योंकि बिना ढाली गई चाँदी और ढाली तथा मुद्रांकित की गई चाँदी का मूल्य और दाम समान क्यों नहीं होता, यद्यपि दोनों ठीक एक ही धातु हैं? इसलिए कि पहली में अपने स्वभाव के सिवा कुछ नहीं, जबकि दूसरी, सार्वजनिक ठप्पे से अंकित होकर, ढाला हुआ सिक्का बन जाती और एक नया निर्धारित मूल्य पाती है।

और क्या परमेश्वर अपने वचन से अपनी सृष्टि की वस्तुओं पर मुहर और चिन्ह लगाकर उन्हें संस्कार नहीं बना सकता, यद्यपि पहले वे केवल नंगे और साधारण तत्व थीं?

दूसरी प्रकार के उदाहरणों में यह है कि उसने गिदोन को विजय की प्रतिज्ञा देने के लिए ऊन को भिगोया जबकि भूमि पर ओस नहीं पड़ी, और फिर भूमि को भिगोया जबकि ऊन सूखी रही। इसी प्रकार उसने हिजकिय्याह को चंगाई की प्रतिज्ञा देने के लिए धूपघड़ी की छाया को दस अंश पीछे हटाया। चूँकि ये बातें उनके विश्वास की निर्बलता को सम्भालने, सान्त्वना देने और दृढ़ करने के लिए की गईं, इसलिए ये भी उनके लिए संस्कार थीं।

परन्तु हमारा वर्तमान उद्देश्य विशेष रूप से उन संस्कारों का वर्णन करना है जिन्हें हमारे प्रभु ने ठहराया और अपनी कलीसिया में सामान्य रूप से उपयोग किए जाने की इच्छा की, ताकि अपने लोगों को एक ही विश्वास और उस विश्वास के अंगीकार में पोषण दे और बनाए रखे।

ये केवल चिन्हों के रूप में नहीं, वरन् विधियों के रूप में भी दिए गए हैं, या, यदि कोई इसे ऐसे कहना चाहे, तो उनमें दिए गए चिन्ह ही विधियाँ हैं। इसके अतिरिक्त, वे हमारे अंगीकार के प्रमाण हैं जिनके द्वारा हम सब के सामने स्वीकार करते हैं कि हम परमेश्वर के हैं और उसके प्रति अपनी निष्ठा की प्रतिज्ञा करते हैं।

इसलिए क्रिसोस्टम बहुत अच्छा कहता है जब वह उन्हें ऐसी वाचाएँ कहता है जिनसे हमारे ऋण का पत्र रद्द किया जाता है, और दूसरी ओर ऐसे बन्धन जिनसे हम स्वीकार करते हैं कि हम पवित्रता और शुद्धता से जीवन बिताने के ऋणी हैं। क्योंकि जैसे हमारा प्रभु उनमें वह सारा ऋण क्षमा करता है जो हमारे किए हुए दोषों और अपराधों के कारण हम पर है, वैसे ही हम बदले में अपने आप को बाँधते हैं कि पवित्रता और जीवन की निर्दोषता में उसकी सेवा करें।

इसलिए ऐसे संस्कारों की यह परिभाषा दी जा सकती है कि वे ऐसी विधियाँ हैं जिनसे प्रभु अपने लोगों का अभ्यास कराना चाहता है: पहले, हृदय के भीतर विश्वास को बचाए रखने, जगाने और दृढ़ करने के लिए; और दूसरे, मनुष्यों के सामने अपने धर्म की गवाही देने के लिए।

समय की व्यवस्था के अनुसार इन संस्कारों में भी भेद रहा है, जिनमें प्रभु ने मनुष्यों पर नाना रीति से अपने आप को प्रकट करना और दिखाना उचित समझा। अब्राहम और उसके वंशजों को खतना की आज्ञा दी गई, और उसके बाद मूसा की व्यवस्था के द्वारा उसमें धुलाइयाँ और बलिदान जोड़े गए। हमारे प्रभु यीशु मसीह के आगमन तक ये ही यहूदियों के संस्कार थे।

उसके आगमन पर वे संस्कार समाप्त कर दिए गए और दो अन्य ठहराए गए, जिनका उपयोग अब मसीही कलीसिया करती है: बपतिस्मा और प्रभु-भोज।

फिर भी यहूदियों के प्राचीन संस्कार उसी लक्ष्य और उद्देश्य की ओर थे जिसकी ओर अब हमारे दो संस्कार हैं: अर्थात् मनुष्यों को यीशु मसीह की ओर निर्देशित करना और ले चलना, या यों कहें कि प्रतिमाओं के रूप में उसे प्रस्तुत करना और उसका परिचय देना। क्योंकि जैसा हम पहले दिखा चुके हैं, संस्कार उन मुहरों के समान हैं जिनसे परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं पर मुहर लगाई जाती है, और चूँकि यह निश्चित है कि परमेश्वर की कोई भी प्रतिज्ञा मनुष्यों से यीशु मसीह के सिवा नहीं की गई, इसलिए परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं को सिखाने और स्मरण कराने के लिए संस्कारों को अनिवार्य रूप से हमें यीशु मसीह को दिखाना चाहिए।

इन प्राचीन और नए संस्कारों में केवल एक भेद है: पहले संस्कारों ने प्रतिज्ञा किए गए मसीह की पूर्वछाया दी जब वह अभी आनेवाले के रूप में प्रतीक्षित था, जबकि हमारे नए संस्कार गवाही देते और सिखाते हैं कि वह दिया जा चुका और प्रकट हो चुका है।

जब इनमें से प्रत्येक की अलग-अलग व्याख्या की जाएगी, तब ये बहुत अधिक स्पष्ट समझ में आएँगे।

पहले, खतना यहूदियों के लिए एक चिन्ह था जो उन्हें चेतावनी देता था कि जो कुछ मनुष्य के बीज से निकलता है, अर्थात् मनुष्य का सारा स्वभाव, भ्रष्ट है और उसका खतना किया जाना और उसका काट डाला जाना आवश्यक है। इसके अतिरिक्त, वह अब्राहम से की गई उस प्रतिज्ञा में उन्हें दृढ़ करने के लिए निश्चय और स्मरण का साधन था जो उस आशीष पाए हुए वंश के विषय में थी जिसमें पृथ्वी की सब जातियाँ आशीष पानेवाली थीं और जिससे वे स्वयं भी अपनी आशीष की आशा रखते थे।

यह उद्धार देनेवाला वंश, जैसा सन्त पौलुस हमें सिखाता है, यीशु मसीह था, जिसमें अकेले उन्हें वह फिर पाने की आशा थी जो उन्होंने आदम में खोया था। इसलिए खतना उनके लिए वही था जो सन्त पौलुस कहता है कि वह अब्राहम के लिए था: विश्वास की धार्मिकता पर मुहर। उसके द्वारा उन्हें और अधिक निश्चय होता गया कि उनका विश्वास, जिससे वे इस आशीष पाए हुए वंश की प्रतीक्षा करते थे, परमेश्वर की ओर से उनके लिए धार्मिकता गिना जाता था और सदा गिना जाता रहेगा। परन्तु किसी दूसरे, अधिक उपयुक्त स्थान पर हम खतना और बपतिस्मा की तुलना करेंगे।

धुलाइयों और शुद्धिकरणों ने उन्हें उनकी अशुद्धता, मलिनता और अपवित्रता दिखाई, जिनसे वे स्वभाव से दूषित, कलंकित और संक्रमित थे। उन्होंने उनसे एक दूसरी धुलाई की भी प्रतिज्ञा की जिससे वे अपने दागों और भ्रष्टता से शुद्ध और निर्मल किए जाएँगे। वह धुलाई यीशु मसीह था: उसके लहू से हम शुद्ध और निर्मल किए जाते हैं, और उसके घावों से हम चंगे होते हैं।

बलिदानों ने उन्हें उनके पापों और अधर्म का दोषी ठहराया और साथ ही उन्हें सिखाया कि उन पापों के लिए परमेश्वर के न्याय को सन्तुष्ट किया जाना आवश्यक है। इसलिए एक महान महायाजक और अध्यक्ष होगा, परमेश्वर और मनुष्यों के बीच मध्यस्थ, जो लहू बहाकर और पापों की क्षमा के लिए ग्रहणयोग्य बलिदान चढ़ाकर परमेश्वर के न्याय को सन्तुष्ट करेगा।

यह महान महायाजक यीशु मसीह था। बहाया गया लहू उसी का अपना था, और वह स्वयं बलिदान था। क्योंकि उसने अपने आप को पिता के सामने अर्पित किया, और मृत्यु तक आज्ञाकारी बना। इस आज्ञाकारिता से उसने मनुष्य की उस अवज्ञा को मिटा दिया जिसने परमेश्वर के क्रोध को भड़काया और उभारा था।

जहाँ तक हमारे दो संस्कारों की बात है, वे यीशु मसीह को हमारे सामने और भी स्पष्ट रीति से प्रस्तुत करते हैं, क्योंकि वह मनुष्यों पर और निकटता से प्रकट हुआ है, क्योंकि वह वास्तव में वैसा ही दिया और प्रकट किया गया जैसी पिता ने उसकी प्रतिज्ञा की थी।

बपतिस्मा हमें गवाही देता है कि हम शुद्ध और धोए गए हैं, जबकि प्रभु-भोज का यूखरिस्त गवाही देता है कि हम छुड़ाए गए हैं। जल में हमारे सामने धुलाई प्रस्तुत है; लहू में प्रायश्चित्त। दोनों यीशु मसीह में पाए जाते हैं, जो, जैसा सन्त यूहन्ना कहता है, जल और लहू के द्वारा आया, अर्थात् शुद्ध करने और छुड़ाने के लिए।

परमेश्वर का आत्मा इसकी गवाही देता है, या यों कहें कि तीन मिलकर गवाही देते हैं: जल, लहू और आत्मा। जल और लहू में हमारे पास अपने शुद्ध किए जाने और छुड़ाए जाने की गवाही है। पवित्र आत्मा, जो प्रमुख गवाह है, निश्चय ही यह गवाही हमारे लिए पक्की करता है और हमें इस पर विश्वास करने, इसे समझने और स्वीकार करने योग्य बनाता है, क्योंकि अन्यथा हम इसे समझ न सकते।

यह उच्च भेद हमें तब स्पष्ट दिखाया गया जब क्रूस पर लटके हुए यीशु मसीह के पवित्र पंजर से लहू और जल बह निकला। इसी कारण सन्त ऑगस्टीन ने मसीह के पंजर को बहुत उचित रीति से वह स्रोत और सोता कहा जिससे हमारे संस्कार बहे हैं। हमें इन संस्कारों का कुछ और विस्तार से वर्णन करना चाहिए।

इसके अतिरिक्त, विद्वत्तावादी गुरु जो पुरानी और नई व्यवस्था के संस्कारों के बीच बड़ा भेद बताते हैं, मानो पहले केवल दूर से परमेश्वर के अनुग्रह को दर्शाते थे जबकि दूसरे उसे वास्तव में प्रदान करते हैं, वह पूरी तरह त्याग देने योग्य है। क्योंकि प्रेरित एक को दूसरे से बढ़कर नहीं कहता जब वह सिखाता है कि पुराने नियम के अधीन हमारे पूर्वजों ने वही आत्मिक भोजन खाया जो हम खाते हैं, और समझाता है कि वह भोजन मसीह था।

कौन उस चिन्ह को खोखला और सार से रहित कहने का साहस करेगा जिसने यहूदियों को यीशु मसीह की सच्ची सहभागिता दिखाई? उस स्थान पर प्रेरित जिस तर्क को आगे बढ़ाता है उसका सन्दर्भ भी इसका समर्थन करता है। ताकि कोई परमेश्वर के अनुग्रह के बहाने उसके न्याय को तुच्छ न जाने, वह उन कठोरता और गम्भीरता के उदाहरण प्रस्तुत करता है जो परमेश्वर ने यहूदियों पर दिखाई। और ताकि कोई अपने आप को उनसे श्रेष्ठ न ठहराए, मानो उसे कोई बड़ा विशेषाधिकार प्राप्त हो, वह इस आपत्ति को पहले ही उन्हें हमारे बराबर ठहराकर दूर कर देता है।

परन्तु कोई उस बात का हवाला दे सकता है जो वह रोमियों में खतने के विषय में कहता है, जहाँ वह उसे बपतिस्मा से बहुत घटकर ठहराता प्रतीत होता है, यद्यपि बात ऐसी नहीं है।

क्योंकि वहाँ जो कुछ कहा गया है वह बपतिस्मा के विषय में भी उतनी ही भली-भाँति कहा जा सकता है, और वास्तव में कहा भी गया है। पहला, सन्त पौलुस सिखाता है कि परमेश्वर बाहरी धुलाई का कुछ हिसाब नहीं रखता जब तक हृदय भीतर से शुद्ध न किया जाए और अन्त तक पवित्रता में बना न रहे। दूसरा, सन्त पतरस गवाही देता है कि बपतिस्मा की सच्चाई बाहरी शुद्धि में नहीं, परन्तु अच्छे विवेक में है।

फिर भी, क्योंकि मैं इस विषय का और पूरा वर्णन उस स्थान के लिए रखता हूँ जहाँ मैंने बपतिस्मा की खतने से तुलना करना ठहराया है, इसलिए यहाँ मैं उसे केवल संक्षेप में छूऊँगा।

सम्भवतः ये अभागे कुतर्की इस भूल में इसलिए पड़े कि वे प्राचीन लेखकों में पाई जानेवाली संस्कारों की अतिशयोक्तिपूर्ण प्रशंसाओं से धोखा खाए और भटकाए गए। जैसे सन्त ऑगस्टीन का यह कथन कि पुरानी व्यवस्था के संस्कारों ने केवल उद्धार की प्रतिज्ञा की, जबकि हमारे संस्कार उसे देते हैं।

यह न समझकर कि ऐसे वाक्य अतिशयोक्ति थे, अर्थात् जान-बूझकर बढ़ाकर कहे गए, उन्होंने अपने ही बढ़ाए-चढ़ाए निष्कर्ष बोए और फैलाए, परन्तु उस अर्थ से सर्वथा भिन्न अर्थ में जो प्राचीन लेखकों का था।

क्योंकि उस स्थान पर सन्त ऑगस्टीन का आशय उससे भिन्न कुछ नहीं था जो वह स्वयं अन्यत्र लिखता है: अर्थात् यह कि मूसा की व्यवस्था के संस्कारों ने यीशु मसीह की पहले से घोषणा की, जबकि हमारे संस्कार उसकी घोषणा करते हैं। मानो उसने कहा हो कि पहले संस्कारों ने मसीह को तब दर्शाया जब वह अभी आनेवाले के रूप में प्रतीक्षित था, परन्तु हमारे संस्कार उसे उपस्थित दिखाते हैं जब वह आ चुका और हमें दिया जा चुका है।

यह इस स्थान की और निकट से जाँच करने पर सहज ही परखा जा सकता है, और उस उपदेश से भी जिसमें वह खुलकर मानता है कि यहूदियों के संस्कार अपने चिन्हों में भिन्न थे परन्तु सूचित वस्तु में एक-से थे: दृश्य रूप में भिन्न, परन्तु आत्मिक सामर्थ्य और प्रभाव में एक-से और एक।

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