अध्याय 17

अध्याय चौदह: मसीही स्वतंत्रता के विषय में

Institutes of the Christian Religion (1541) · John Calvin

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अध्याय चौदह: मसीही स्वतंत्रता के विषय में

अध्याय चौदह

मसीही स्वतंत्रता के विषय में

अब हमें मसीही स्वतंत्रता का वर्णन करना है, जिसकी उपेक्षा सुसमाचारीय शिक्षा का संक्षिप्त सार प्रस्तुत करनेवाले किसी भी जन को नहीं करनी चाहिए। क्योंकि यह अत्यन्त आवश्यक है। इसके ज्ञान के बिना विवेक किसी भी काम में बिना सन्देह हाथ डालने का साहस नहीं कर पाते; वे बार-बार झिझकते और रुक जाते हैं, और सदा काँपते और डगमगाते रहते हैं।

यद्यपि हम ऊपर कई बार इसका उल्लेख कर चुके हैं, तौभी इसकी पूरी चर्चा हमने इसी स्थान के लिए बचा रखी थी। क्योंकि जैसे ही मसीही स्वतंत्रता का नाम लिया जाता है, कुछ लोग तुरन्त अपनी अभिलाषाओं को खुली छूट दे देते हैं, और कुछ लोग बड़ा उपद्रव खड़ा कर देते हैं, यदि ऐसे उतावले मनों को, जो उत्तम से उत्तम वस्तुओं को भी बिगाड़ देते हैं, तुरन्त रोकने के उपाय न किए जाएँ।

इस स्वतंत्रता के बहाने कुछ लोग परमेश्वर की सारी आज्ञाकारिता को उतार फेंकते हैं और अपने शरीर को बेलगाम छूट दे देते हैं। दूसरे इस शिक्षा का विरोध करते हैं और इस स्वतंत्रता की बात सुनना तक नहीं चाहते, यह समझकर कि वह सारी व्यवस्था, संयम और उचित विवेक को उलट देती है।

ऐसी तंग घाटियों में फँसकर हम क्या करें? क्या इन खतरों से बचने के लिए मसीही स्वतंत्रता को छोड़ देना ही अच्छा न होगा?

परन्तु जैसा कहा जा चुका है, इसके ज्ञान के बिना न तो यीशु मसीह को और न सुसमाचार के सत्य को ठीक रीति से जाना जा सकता है। इसलिए हमें ध्यान रखना चाहिए कि यह आवश्यक शिक्षा न तो उपेक्षित हो और न दबा दी जाए, और साथ ही उसके विरुद्ध उठाई जानेवाली बेतुकी आपत्तियों को भी रोका जाए।

मेरे विचार में मसीही स्वतंत्रता के तीन भाग हैं।

पहला यह कि विश्वासियों के विवेक, जब वे अपने धर्मी ठहराए जाने का निश्चय खोज रहे हों, तब व्यवस्था से ऊपर उठें और व्यवस्था की सारी धार्मिकता को भूल जाएँ। क्योंकि जैसा ऊपर दिखाया जा चुका है, व्यवस्था किसी को धर्मी नहीं छोड़ती, इसलिए या तो हमें धर्मी ठहराए जाने की हर आशा से वंचित होना होगा, या फिर हमें व्यवस्था से छुड़ाया जाना होगा, और इस प्रकार छुड़ाया जाना होगा कि हम अपने कर्मों का कोई विचार न करें।

क्योंकि जो कोई यह समझता है कि धार्मिकता पाने के लिए उसे कर्मों का थोड़ा सा भाग भी जोड़ना होगा, वह उनके लिए न कोई सीमा ठहरा सकता है न कोई नाप, वरन अपने आप को सारी व्यवस्था का कर्जदार बना लेता है।

इसलिए जब हमारे धर्मी ठहराए जाने का प्रश्न हो, तब हमें व्यवस्था और अपने कर्मों का हर विचार दूर कर देना चाहिए, केवल परमेश्वर की दया को गले लगाना चाहिए, और अपनी ओर से दृष्टि हटाकर केवल यीशु मसीह की ओर लगानी चाहिए।

यहाँ प्रश्न यह नहीं कि हम धर्मी हैं या नहीं, वरन यह है कि अधर्मी और अयोग्य होते हुए भी हम धर्मी कैसे गिने जा सकते हैं। यदि विवेक इस विषय में कुछ निश्चय चाहते हैं, तो उन्हें व्यवस्था को कोई स्थान नहीं देना चाहिए।

फिर भी इससे कोई यह निष्कर्ष न निकाले कि विश्वासियों के लिए व्यवस्था निरर्थक है। वह उन्हें सिखाती, समझाती और भलाई की ओर उभारती रहती है, यद्यपि परमेश्वर के न्याय के सामने उनके विवेक में उसका कोई स्थान नहीं है। ये दोनों बातें बहुत भिन्न हैं, इसलिए हमें उनमें सावधानी से भेद करना चाहिए।

मसीहियों का सारा जीवन भक्ति का मनन और अभ्यास होना चाहिए, क्योंकि वे पवित्रीकरण के लिए बुलाए गए हैं। व्यवस्था का काम उन्हें दिखाना है कि उन्हें क्या करना चाहिए, और इस प्रकार उन्हें पवित्रता और निर्दोषता की खोज में उभारना है।

परन्तु जब विवेक इस बात से व्याकुल हों कि परमेश्वर को अपने प्रति अनुकूल कैसे पाएँ, क्या उत्तर दें, और यदि परमेश्वर के न्याय के सामने उपस्थित होने को बुलाए जाएँ तो किस भरोसे पर खड़े हों, तब उन्हें व्यवस्था का हिसाब नहीं लगाना चाहिए और न यह सोचना चाहिए कि वह क्या माँगती है। वरन उन्हें केवल यीशु मसीह को ही अपनी धार्मिकता के रूप में प्रस्तुत करना चाहिए, जो व्यवस्था की हर सिद्धता से बढ़कर है।

गलातियों की पत्री का लगभग सारा तर्क इसी बात पर टिका है। सन्त पौलुस की तर्क-पद्धति से यह सिद्ध करना सरल है कि जो लोग कहते हैं कि वह केवल रीति-विधियों से स्वतंत्रता के लिए तर्क करता है, वे विकृत व्याख्याकार हैं। उदाहरण के लिए वह कहता है:

“मसीह ने जो हमारे लिये शापित बना, हमें मोल लेकर व्यवस्था के शाप से छुड़ाया।”

—गलातियों 3:13

फिर:

“उस स्वतंत्रता में स्थिर रहो जिससे मसीह ने हमें स्वतंत्र किया है, और अपने आप को फिर दासत्व के जूए में न जुतने दो।”

—गलातियों 5:1

और:

“देखो, मैं पौलुस तुम से कहता हूँ कि यदि तुम खतना कराओगे तो मसीह से तुम्हें कुछ लाभ न होगा। जो कोई खतना कराता है, वह सारी व्यवस्था का कर्जदार है, और मसीह उसके लिये व्यर्थ ठहरा। तुम में से जो व्यवस्था के द्वारा धर्मी ठहरना चाहते हैं, वे अनुग्रह से गिर गए हैं।”

—गलातियों 5:2–4

ये कथन निश्चय ही रीति-विधियों से स्वतंत्रता की अपेक्षा किसी कहीं ऊँची बात से सम्बन्ध रखते हैं।

मसीही स्वतंत्रता का दूसरा भाग, जो पहले पर निर्भर है, यह है: विवेक व्यवस्था की सेवा इस प्रकार नहीं करते मानो उसकी अनिवार्यता से विवश हों, वरन व्यवस्था के जूए से छुड़ाए जाकर स्वतन्त्रता से परमेश्वर की इच्छा का पालन करते हैं।

क्योंकि जब तक वे व्यवस्था के अधीन रहते हैं, वे निरन्तर भय और आतंक से भरे रहते हैं। इसलिए जब तक उन्हें पहले यह छुटकारा न मिले, वे कभी भी स्वेच्छा से और स्वतन्त्र हृदय से परमेश्वर की इच्छा का पालन करने को भली-भाँति तैयार न होंगे।

एक उदाहरण संक्षेप में और अधिक स्पष्टता से दिखा देगा कि यह शिक्षा हमें कहाँ ले जाती है। व्यवस्था की आज्ञा यह है कि हम परमेश्वर से अपने सारे हृदय, अपने सारे प्राण और अपनी सारी शक्ति से प्रेम रखें।

इस आज्ञा को पूरा करने के लिए आत्मा को पहले हर दूसरे विचार से खाली किया जाना, हृदय को हर दूसरी अभिलाषा से शुद्ध किया जाना, और हमारी सारी शक्तियों को पूरी रीति से परमेश्वर के प्रति समर्पित किया जाना आवश्यक है।

परन्तु परमेश्वर के मार्ग में जो सबसे आगे बढ़ चुके हैं, वे भी इस लक्ष्य से बहुत दूर रहते हैं। क्योंकि यद्यपि वे सच्चे स्नेह और शुद्ध हृदय से परमेश्वर से प्रेम रखते हैं, फिर भी उनके हृदय और प्राण का एक बड़ा भाग अब भी शारीरिक अभिलाषाओं से भरा है। ये उन्हें रोकती और पीछे खींचती हैं, और उन्हें वैसे परमेश्वर की ओर दौड़ने नहीं देतीं जैसे उन्हें दौड़ना चाहिए।

वे आगे बढ़ने का भरसक प्रयत्न करते हैं, परन्तु शरीर उनकी शक्ति को अंशतः क्षीण करता है और अंशतः अपनी ओर मोड़ लेता है।

तब वे क्या करें जब वे देखते हैं कि वे व्यवस्था को पूरा करने के निकट भी नहीं पहुँचते? वे चाहते हैं, अभिलाषा करते हैं और यत्न करते हैं, पर कभी उस सिद्धता के साथ नहीं जो अपेक्षित है। यदि वे व्यवस्था की ओर देखें, तो उन्हें दिखाई देता है कि जो कुछ वे करने का बीड़ा उठा सकते हैं, सब उसके शाप के अधीन रहता है।

कोई अपने आप को यह समझकर धोखा न दे कि उसका कर्म केवल अपूर्ण होने के कारण पूरी रीति से बुरा नहीं है, या यह कि उसमें जो कुछ भला पाया जाता है उसे परमेश्वर फिर भी स्वीकार कर लेता है। क्योंकि व्यवस्था, सिद्ध प्रेम की माँग करती हुई, हर अपूर्णता को दोषी ठहराती है। जो कोई अपने कर्म के विषय में ऐसी धारणा रखता है, वह उसे ध्यान से जाँचे, तो पाएगा कि उसमें जिसे उसने भला समझा था वह व्यवस्था का उल्लंघन है।

इस प्रकार यदि हमारे सारे कर्म व्यवस्था के नियम से नापे जाएँ, तो वे सब उसके शाप के बन्धन में रहते हैं। और बेचारे प्राणों को ऐसा कोई कर्म करने का साहस कैसे होगा जिससे वे शाप के सिवाय और कुछ आशा नहीं रख सकते?

दूसरी ओर, यदि वे व्यवस्था की इस कठोर माँग से, या यों कहें कि उसकी सारी कठोरता से, छुड़ाए जाकर देखें कि परमेश्वर ने उन्हें पिता की सी कोमलता से बुलाया है, तो वे प्रसन्नता से और स्वतन्त्रता से वहाँ-वहाँ चल पड़ेंगे जहाँ-जहाँ वह उन्हें ले चलना चाहेगा।

सारांश यह कि जो व्यवस्था के बन्धनों में बँधे हैं वे उन सेवकों के समान हैं जिन्हें उनके स्वामी प्रतिदिन के लिए काम की एक निश्चित मात्रा सौंप देते हैं। ऐसे सेवक समझते हैं कि उन्होंने कुछ नहीं किया, और जब तक उन्हें सौंपा हुआ सब कुछ पूरी रीति से पूरा न कर लें, वे अपने स्वामियों के सामने आने का साहस नहीं करते।

परन्तु सन्तान, जिनके साथ उनके पिता अधिक उदारता और कोमलता से व्यवहार करते हैं, पिता के सामने ऐसा काम प्रस्तुत करने से नहीं डरतीं जो खुरदरा, अधूरा और यहाँ तक कि दोषपूर्ण भी हो, इस भरोसे पर कि उनकी आज्ञाकारिता और उनका भला आशय पिता को भाएगा, यद्यपि जो वे चाहते थे उसे वे पूरा न कर पाए हों।

इसलिए हमें भी बच्चों के समान होना चाहिए, और कभी सन्देह नहीं करना चाहिए कि हमारा परम दयालु और करुणामय पिता हमारी सेवाओं को स्वीकार करेगा, यद्यपि वे अपूर्ण और दोषपूर्ण हैं, जैसा कि वह स्वयं भविष्यद्वक्ता के द्वारा पुष्टि करता है:

“मैं उन से ऐसी कोमलता करूँगा जैसी पिता अपने सेवा करनेवाले पुत्र से करता है।”

—मलाकी 3:17

यहाँ “कोमलता करना” (दया बरतना) का अर्थ है कृपापूर्वक उन्हें सह लेना, क्योंकि वह उनकी सेवा का भी उल्लेख करता है।

यह निश्चय हमारे लिए अत्यन्त आवश्यक है, क्योंकि इसके बिना हमारा सारा परिश्रम व्यर्थ होगा। परमेश्वर अपने आप को हमारे कर्मों से तब तक सम्मानित नहीं समझता जब तक वे सचमुच उसकी महिमा के लिए न किए जाएँ। और ऐसे भय और सन्देहों के बीच, जब हम निश्चित नहीं कि उनसे वह अप्रसन्न होता है या सम्मानित, हम उन्हें उसकी महिमा के लिए कैसे कर सकते हैं?

इसी कारण इब्रानियों की पत्री का लेखक प्राचीन पुरखाओं के सब भले कामों का श्रेय विश्वास को देता है और उनका मूल्य विश्वास के अनुसार आँकता है।

इस स्वतंत्रता के विषय में रोमियों की पत्री में हमें एक उल्लेखनीय खण्ड मिलता है, जहाँ सन्त पौलुस यह निष्कर्ष निकालता है कि पाप को हम पर प्रभुता नहीं करनी चाहिए, क्योंकि हम व्यवस्था के अधीन नहीं वरन अनुग्रह के अधीन हैं। क्योंकि विश्वासियों को समझाने के बाद:

“इसलिये पाप तुम्हारे मरनहार शरीर में राज्य न करे, और न तुम अपने अंगों को अधर्म के हथियार होने के लिये पाप को सौंपो, पर अपने आप को मरे हुओं में से जी उठे हुओं के समान परमेश्वर को सौंपो, और अपने अंगों को धार्मिकता के हथियार होने के लिये परमेश्वर को सौंप दो।”

—रोमियों 6:12–13

—क्योंकि वे यह आपत्ति कर सकते थे कि वे अब भी पापमय अभिलाषा से भरा शरीर अपने साथ लिए फिरते हैं और पाप उनके भीतर बना रहता है, इसलिए वह यह सान्त्वना जोड़ता है, जिसे वह व्यवस्था से स्वतंत्रता से निकालता है।

मानो वह कहता है: यद्यपि विश्वासी अभी अपने भीतर पाप को बुझा हुआ या धार्मिकता के जीवन को सिद्धता तक पहुँचा हुआ नहीं देखते, तौभी उन्हें निराश या हताश नहीं होना चाहिए, मानो पाप के इन अवशेषों के कारण परमेश्वर उन से क्रोधित हो। क्योंकि परमेश्वर के अनुग्रह से वे व्यवस्था से छुड़ाए जा चुके हैं, ताकि उनके कर्म अब उसके नियम के अनुसार न जाँचे जाएँ।

जो यह निष्कर्ष निकालते हैं कि हम अब व्यवस्था के अधीन नहीं हैं इसलिए स्वतन्त्रता से पाप कर सकते हैं, उन्हें समझ लेना चाहिए कि यह स्वतंत्रता उनकी है ही नहीं, क्योंकि इसका उद्देश्य हमें भलाई की ओर उभारना और ले चलना है।

मसीही स्वतंत्रता का तीसरा भाग हमें सिखाता है कि हम परमेश्वर के सामने उन बाहरी बातों के विषय में, जो अपने आप में उदासीन हैं, अपने विवेक पर बोझ न डालें। वह सिखाता है कि हम उन्हें स्वतन्त्रता से काम में ला भी सकते हैं और उनसे दूर भी रह सकते हैं।

इस स्वतंत्रता का ज्ञान भी अत्यन्त आवश्यक है। यदि हम में यह न हो, तो हमारे विवेक को कभी चैन न मिलेगा, वरन वे अन्तहीन अन्धविश्वास में उलझे रहेंगे।

आज बहुत से लोग समझते हैं कि हम मूर्खता करते हैं जब हम ऐसे प्रश्न उठाते हैं कि क्या मांस खाने की हमें स्वतंत्रता है, क्या विशेष दिनों का मानना और भाँति-भाँति के वस्त्रों का उपयोग स्वतंत्रता की बातें हैं, और ऐसी ही अन्य बातें, जिन्हें वे तुच्छ समझते हैं। परन्तु ये बातें सामान्यतः समझी जानेवाली से कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण हैं।

क्योंकि जब विवेक अपने आप को एक बार रोक और बाँध लेते हैं, तब वे एक अन्तहीन भूलभुलैया और गहरी खाई में जा पड़ते हैं, जिससे फिर निकलना सरल नहीं होता।

यदि कोई इस सन्देह में पड़ने लगे कि चादरों, कमीजों, रूमालों और तौलियों के लिए सन के कपड़े का प्रयोग उचित है या नहीं, तो फिर वह इस बात में भी निश्चित न रहेगा कि सन का मोटा कपड़ा काम में ला सकता है या नहीं। अन्त में वह मोटे रेशों के कपड़े के विषय में भी डगमगाने लगेगा। क्योंकि वह अपने मन में तर्क करेगा कि वह बिना तौलिये के भी खा सकता था और बिना रूमालों के भी काम चला सकता था।

यदि कोई यह मान बैठे कि अन्य भोजन से थोड़ा भी अधिक स्वादिष्ट भोजन वर्जित है, तो अन्त में उसे परमेश्वर के सामने शुद्ध विवेक से न मोटी रोटी खाने का साहस होगा, न साधारण भोजन का, क्योंकि उसके मन में सदा यह विचार उठेगा कि वह इससे भी घटिया भोजन पर अपना जीवन चला सकता था।

यदि उसे अच्छा दाखरस पीने में संकोच हो, तो फिर वह शान्त विवेक से बिगड़ा हुआ या बासी दाखरस भी न पी सकेगा, और अन्त में अन्य जल से अधिक अच्छा या निर्मल जल भी नहीं।

संक्षेप में, वह ऐसी दशा तक पहुँच जाएगा कि आड़ी पड़ी हुई तिनके को लाँघना भी उसे घोर पाप जान पड़ेगा। क्योंकि यह कोई छोटा संघर्ष नहीं जो विवेक के भीतर आरम्भ होता है। प्रश्न यह है कि क्या परमेश्वर को यह भाता है कि हम इन वस्तुओं को काम में लाएँ या उनसे दूर रहें।

परमेश्वर की इच्छा हमारे सब विचारों और कार्यों से पहले होनी चाहिए। परिणामस्वरूप कुछ लोग अवश्य ही निराशा के कारण घबराहट में पड़ेंगे, और दूसरे परमेश्वर के सब भय को ठुकराकर और दूर भगाकर हर रोक-टोक को लाँघकर दौड़ पड़ेंगे, क्योंकि उन्हें उचित मार्ग दिखाई नहीं देता।

क्योंकि जो ऐसे सन्देहों में उलझे हैं, वे जिस ओर भी मुड़ें अपने विवेक के लिए ठोकर का कारण पाते हैं।

सन्त पौलुस कहता है:

“मैं जानता हूँ, और प्रभु यीशु में मुझे निश्चय हुआ है, कि कोई वस्तु अपने आप से अशुद्ध नहीं, परन्तु जो उसको अशुद्ध समझता है उसके लिये अशुद्ध है।”

—रोमियों 14:14

इन शब्दों से वह सब बाहरी वस्तुओं को हमारी स्वतंत्रता के अधीन कर देता है, बशर्ते हमारे विवेक को परमेश्वर के सामने इस स्वतंत्रता का कुछ निश्चय हो। परन्तु यदि कोई अन्धविश्वासी धारणा हमें सन्देहों से भर दे, तो जो वस्तुएँ अपने स्वभाव से शुद्ध हैं वे हमारे लिए अशुद्ध हो जाती हैं।

इसलिए वह आगे कहता है:

“धन्य है वह, जो उस बात में, जिसे वह ठीक समझता है, अपने आप को दोषी नहीं ठहराता। परन्तु जो सन्देह करके खाता है वह दण्ड के योग्य ठहर चुका, क्योंकि वह विश्वास से नहीं खाता; और जो कुछ विश्वास से नहीं, वह पाप है।”

—रोमियों 14:22–23

जो लोग ऐसी तंग घाटियों में पड़कर भी साहसी और निडर दिखने के लिए अपने विवेक के विरुद्ध सब कुछ करने का साहस करते हैं, क्या वे इससे परमेश्वर से विमुख नहीं हो जाते?

दूसरी ओर, जो परमेश्वर के भय से अधिक प्रभावित हैं, वे भयंकर डर और घबराहट में पड़ जाते हैं, क्योंकि उन्हें अपने विवेक के विरुद्ध बहुत कुछ करने को विवश होना पड़ता है।

जो इन दोनों में से किसी भी रीति से वस्तुओं का प्रयोग करते हैं, चाहे विवेक के विरुद्ध ऐसे दुस्साहस से, चाहे ऐसे भय और घबराहट से, वे परमेश्वर की किसी भी दान को धन्यवाद के साथ ग्रहण नहीं करते, यद्यपि सन्त पौलुस साक्षी देता है कि केवल धन्यवाद के द्वारा ही ये दान हमारे उपयोग के लिए पवित्र ठहरते हैं।

धन्यवाद से मेरा तात्पर्य वह है जो उस हृदय से निकलता है जो परमेश्वर के दानों में उसकी भलाई और उदारता को पहचानता है। क्योंकि उनमें से बहुत लोग समझते हैं कि जिन वस्तुओं का वे प्रयोग करते हैं वे परमेश्वर के भले दान हैं और वे परमेश्वर की कृतियों में उसकी स्तुति करते हैं। परन्तु चूँकि वे विश्वास नहीं करते कि परमेश्वर ने ये वस्तुएँ उन्हें दी हैं, वे उसे उपकारकर्ता मानकर धन्यवाद कैसे दे सकते हैं?

सारांश में हम इस स्वतंत्रता का उद्देश्य देखते हैं: कि बिना विवेक की खटक और मन की उथल-पुथल के हम परमेश्वर के दानों को उन्हीं प्रयोजनों में लगा सकें जिनके लिए वे हमें ठहराए गए हैं। इसी भरोसे से हमारे प्राण परमेश्वर के साथ शान्ति और विश्राम पाएँ और हमारे प्रति उसकी उदारता को स्वीकार करें।

हमें ध्यान से विचार करना चाहिए कि मसीही स्वतंत्रता अपने सब भागों में एक आत्मिक विषय है, जिसकी सारी शक्ति डरपोक विवेकों को परमेश्वर के साथ शान्ति में लाने में है, चाहे वे अपने पापों की क्षमा के विषय में सन्देहों में परिश्रम कर रहे हों, चाहे इस चिन्ता और भय में हों कि उनके अपूर्ण कर्म, जो उनके शरीर की मलिनताओं से दागी हैं, परमेश्वर को भाते हैं या नहीं, या उदासीन वस्तुओं के प्रयोग के विषय में अनिश्चित हों।

इसलिए इस स्वतंत्रता को वे लोग गलत समझते हैं जो या तो इसे अपनी शारीरिक अभिलाषाओं का बहाना बनाते हैं और परमेश्वर के दानों का अपने सुख के लिए दुरुपयोग करते हैं, या यह कल्पना करते हैं कि जब तक वे इसे दूसरों के सामने प्रदर्शित न करें तब तक उन्हें स्वतंत्रता प्राप्त नहीं है, और इसलिए इसके प्रयोग में अपने निर्बल भाइयों का कोई विचार नहीं करते।

इन में से पहली रीति से आज बड़े-बड़े दोष किए जाते हैं। जिनके पास विलासिता से जीने के साधन हैं, उनमें से थोड़े ही ऐसे हैं जो भोजों, वस्त्रों और भवनों में, जिनमें अत्यधिक दिखावा और बेढंगी शान होती है, आनन्द न मनाते हों। वे इन बातों में सब से अलग दिखना पसन्द करते हैं और अपने वैभव में अद्भुत आनन्द मानते हैं।

यह सब मसीही स्वतंत्रता के बहाने बचाया और क्षमा योग्य ठहराया जाता है। वे कहते हैं कि ये बातें उदासीन हैं। मैं इसे मानता हूँ, बशर्ते उनका प्रयोग उदासीन भाव से हो। परन्तु जब इनकी लालसा लोभ से की जाए, इन्हें घमण्ड और ठाठ-बाट से दिखाया जाए, और इनमें बेरोक-टोक लिप्त रहा जाए, तब वे ऐसे दोषों से अशुद्ध हो जाती हैं।

उदासीन वस्तुओं में सन्त पौलुस के शब्द बहुत भली भाँति भेद करते हैं:

“शुद्ध लोगों के लिये सब वस्तुएँ शुद्ध हैं, पर अशुद्ध और अविश्वासियों के लिये कुछ भी शुद्ध नहीं, वरन उनकी बुद्धि और विवेक दोनों अशुद्ध हैं।”

—तीतुस 1:15

क्योंकि उन पर श्राप क्यों सुनाए जाते हैं जो धनवान हैं, जो अपनी शान्ति पा चुके हैं, जो तृप्त हैं, जो हँसते हैं, जो हाथीदाँत के पलंगों पर सोते हैं, जो खेत पर खेत जोड़ते हैं, और जिनके भोज सारंगी, बीन, डफ और दाखरस के साथ होते हैं?

निश्चय ही हाथीदाँत, सोना और धन-सम्पत्ति परमेश्वर की भली सृष्टि हैं, जो मनुष्यों के उपयोग के लिए अनुमत और ठहराई भी गई हैं। न कहीं हँसने से रोका गया है, न भोजन से तृप्त होने से, न नई सम्पत्ति जोड़ने से, न वाद्य-यन्त्रों से आनन्दित होने से, न दाखरस पीने से। यह सचमुच सच है।

परन्तु जब कोई वस्तुओं की बहुतायत रखता है, सुख-भोगों में डूब जाता है, अपने प्राण और हृदय को वर्तमान सुखों से मतवाला कर लेता है और निरन्तर नए सुख ढूँढ़ता रहता है, तब वह परमेश्वर के दानों के पवित्र और उचित प्रयोग से बहुत दूर निकल जाता है।

इसलिए वे अपनी बुरी अभिलाषाओं, अपनी घोर अति, अपने व्यर्थ ठाठ-बाट और अहंकार को दूर कर दें, ताकि वे परमेश्वर के दानों को शुद्ध विवेक से काम में ला सकें।

जब वे अपने हृदयों को इस संयम पर ले आएँगे, तब उनके पास उचित प्रयोग का नियम होगा। परन्तु जहाँ यह संयम नहीं है, वहाँ साधारण और सस्ते सुख भी उचित सीमा से बढ़ जाएँगे।

क्योंकि यह कहावत बहुत सच्ची है: मटमैले कपड़े या मोटे ऊन के नीचे प्रायः बैंगनी वस्त्र पहने हुए हृदय बसता है; और इसके विपरीत रेशम और मखमल के नीचे कभी-कभी विनम्र हृदय छिपा होता है।

इसलिए हर कोई अपनी दशा के अनुसार जीवन बिताए, चाहे गरीबी में, चाहे साधारण दशा में, चाहे सम्पन्नता में, परन्तु इस रीति से कि सब पहचानें कि उनका पालन-पोषण परमेश्वर जीवित रहने के लिए करता है, न कि सुख-भोगों में डूब जाने के लिए।

वे समझें कि मसीही स्वतंत्रता का नियम यही है: कि वे सन्त पौलुस के साथ यह सीखें कि जो कुछ उनके सामने रखा जाए उसी में सन्तुष्ट रहें, और दीन होना और आदर पाना, भूखा रहना और तृप्त होना, घटी और बढ़ती दोनों सहना जानें।

“मैंने यह सीखा है कि जिस दशा में हूँ, उसी में सन्तोष करूँ। मैं दीन होना भी जानता हूँ और बढ़ना भी जानता हूँ। हर बात और सब दशाओं में मैंने तृप्त होना भी, भूखा रहना भी, बढ़ना भी और घटना भी सीख लिया है।”

—फिलिप्पियों 4:11–12

जिस दूसरे दोष की हमने चर्चा की वह भी व्यापक है। बहुत से लोग ऐसे व्यवहार करते हैं मानो उनकी स्वतंत्रता तब तक न सुरक्षित है न पूर्ण, जब तक दूसरे लोग उसके साक्षी न हों, और इसलिए वे उसे बिना सोचे-समझे और बिना विवेक के काम में लाते हैं। इस अविचारित प्रयोग से वे प्रायः अपने निर्बल भाइयों को ठोकर खिलाते हैं।

आज हम कुछ ऐसे लोगों को देखते हैं जो समझते हैं कि जब तक वे शुक्रवार को मांस खाकर अपनी स्वतंत्रता पर अधिकार न जमाएँ, तब तक उन्होंने उसे ठीक से सुरक्षित नहीं रखा। मैं उन्हें मांस खाने के लिए दोषी नहीं ठहराता, परन्तु हमें अपने मन से यह झूठी धारणा निकाल देनी चाहिए कि जब तक हम हर अवसर पर अपनी स्वतंत्रता प्रदर्शित न करें तब तक हम में कोई स्वतंत्रता नहीं।

हमें पहचानना चाहिए कि अपनी स्वतंत्रता से हम मनुष्यों के सामने कुछ नहीं पाते, वरन उसे परमेश्वर के सामने रखते हैं, और वह जितनी प्रयोग करने में है उतनी ही दूर रहने में भी है। यदि कोई सचमुच समझता है कि परमेश्वर के सामने यह बिलकुल उदासीन बात है कि वह मांस खाए या अण्डे, या लाल या काले वस्त्र पहने, तो इतना ही बहुत है। उसका विवेक पहले ही छुड़ाया जा चुका है, और इस स्वतंत्रता का लाभ विवेक ही को मिलता है।

इसलिए यदि वह जीवन भर मांस से दूर रहे और कभी एक रंग से अधिक के वस्त्र न पहने, तौभी वह उतना ही स्वतंत्र है। वरन वह इसीलिए स्वतंत्र है कि वह स्वतंत्र विवेक से दूर रहता है।

परन्तु जिन लोगों का हमने वर्णन किया, वे अपने भाई की निर्बलता का कोई विचार न करके सबसे अधिक खतरनाक भूल करते हैं। हमें उस निर्बलता को इस रीति से सहना चाहिए कि हम कोई ऐसा काम उतावली से न करें जिससे उसे ठोकर लगे।

कोई कहेगा कि कभी-कभी अपनी स्वतंत्रता को मनुष्यों के सामने प्रदर्शित करना उचित होता है। यह बात भी मैं मानता हूँ। परन्तु हमें मर्यादा बनाए रखने में अत्यन्त सावधानी बरतनी चाहिए, ताकि हम उन निर्बलों की उपेक्षा न करें जिन्हें हमारे प्रभु ने विशेष रूप से हमारी देखभाल में सौंपा है।

इसलिए मैं यहाँ ठोकरों के विषय में कुछ कहूँगा: उनमें कैसे भेद किया जाए, कौन सी से बचना चाहिए और किन की उपेक्षा की जा सकती है, ताकि हर कोई निश्चय कर सके कि मनुष्यों के बीच उसकी स्वतंत्रता का प्रयोग कैसे होना चाहिए।

हमें दी गई ठोकर और ली गई ठोकर के बीच प्रचलित भेद को देखना चाहिए, क्योंकि इस भेद के लिए पवित्रशास्त्र की स्पष्ट साक्षी है और यह उसके आशय को ठीक रीति से व्यक्त करता है।

यदि कोई लापरवाही, असंयम या अविवेकी उतावलेपन से अनुचित समय या स्थान पर कोई ऐसा काम करे जिससे निर्बल और अशिक्षित लोगों को ठोकर लगे, तो कहा जा सकता है कि उसने ठोकर दी, क्योंकि ठोकर उसी के दोष से उत्पन्न हुई। सामान्यतः जब कभी दोष उस व्यक्ति से उत्पन्न हो जो काम करता है, तब कहा जा सकता है कि ठोकर दी गई।

ठोकर ली गई तब कही जाती है जब कोई ऐसा काम जो असंयम या अविवेक से नहीं किया गया था, फिर भी दूसरों की दुष्टता और द्वेष के कारण ठोकर का अवसर बना दिया जाए। इस दशा में कोई ठोकर दी नहीं गई, परन्तु दुष्ट लोग बिना कारण ठोकर खाते हैं।

पहली प्रकार की ठोकर से केवल निर्बल ही आहत होते हैं। दूसरी से जो ठोकर खाते हैं वे ऐसे लोग हैं जिनकी झगड़ालू कठोरता सदा किसी बात पर आक्रमण और दोषारोपण करने को कुछ ढूँढ़ती रहती है। इसलिए हम एक को निर्बलों की ठोकर और दूसरी को फरीसियों की ठोकर कहेंगे।

हमें अपनी स्वतंत्रता के प्रयोग को इस प्रकार नियमित और संयमित करना चाहिए कि वह अपने निर्बल भाइयों की अज्ञानता के आगे तो झुके, परन्तु फरीसियों की कठोरता के आगे नहीं।

निर्बलों का हमें कितना ध्यान रखना चाहिए, यह सन्त पौलुस बहुत से स्थानों में भरपूर दिखाता है:

“जो विश्वास में निर्बल है, उसे अपनी संगति में ले लो।”

—रोमियों 14:1

फिर:

“इसलिये हम फिर एक दूसरे पर दोष न लगाएँ, पर तुम यही ठान लो कि कोई अपने भाई के सामने ठेस या ठोकर खाने का कारण न रखे।”

—रोमियों 14:13

वह इसी उद्देश्य से और भी बहुत से कथन कहता है, जिन्हें यहाँ दोहराने की अपेक्षा उनके अपने स्थान में पढ़ना अच्छा है।

उसकी शिक्षा का सार यह है:

“हम बलवानों को चाहिए कि निर्बलों की निर्बलताओं को सहें, न कि अपने आप को प्रसन्न करें। हम में से हर एक अपने पड़ोसी को उसकी भलाई और उन्नति के लिये प्रसन्न करे।”

—रोमियों 15:1–2

दूसरी जगह वह कहता है:

“चौकस रहो कि तुम्हारी यह स्वतंत्रता कहीं निर्बलों के लिये ठोकर का कारण न हो जाए।”

—1 कुरिन्थियों 8:9

और:

“जो कुछ बाजार में बिकता है, वह बिना विवेक के कारण कुछ पूछताछ किए खाओ। मेरा मतलब तुम्हारे विवेक से है, दूसरे के विवेक से नहीं।”

—1 कुरिन्थियों 10:25, 29

सारांश में:

“तुम न यहूदियों, न यूनानियों, और न परमेश्वर की कलीसिया के लिये ठोकर के कारण बनो।”

—1 कुरिन्थियों 10:32

फिर एक और स्थान में

“हे भाइयो, तुम स्वतंत्र होने के लिये बुलाए गए हो; परन्तु ऐसा न हो कि यह स्वतंत्रता शारीरिक कामों के लिये अवसर बने, वरन प्रेम से एक दूसरे के दास बनो।”

—गलातियों 5:13

यह निश्चय ही सत्य है। हमारी स्वतंत्रता हमें अपने निर्बल पड़ोसियों के विरुद्ध नहीं दी गई, जिनके अधीन प्रेम हमें करता है और हर बात में हमें उनका सेवक बनाता है। वरन यह इसलिए दी गई है कि अपने विवेक में परमेश्वर के साथ शान्ति रखते हुए हम मनुष्यों के साथ भी मेल-मिलाप से रह सकें।

फरीसियों की ठोकर के विषय में हमारे प्रभु के शब्द हमें दिखाते हैं कि हमें उसका कितना ध्यान रखना चाहिए। वह आज्ञा देता है कि उन्हें छोड़ दो और उन पर ध्यान न दो:

“वे अन्धे मार्ग दिखानेवाले हैं।”

—मत्ती 15:14

चेलों ने उसे चेताया था कि फरीसी उसकी शिक्षा से ठोकर खा गए। उसने उत्तर दिया कि उन्हें छोड़ दिया जाए और उनकी ठोकर की कोई चिन्ता न की जाए।

फिर भी यह विषय अनिश्चित रहता है जब तक हम न समझें कि किन्हें निर्बल और किन्हें फरीसी समझना चाहिए। इस भेद के बिना मैं नहीं देखता कि हम ठोकरों के अवसरों के बीच अपनी स्वतंत्रता का प्रयोग कैसे कर सकते हैं, क्योंकि उसका प्रयोग सदा अत्यन्त जोखिम भरा होगा।

परन्तु मुझे लगता है कि सन्त पौलुस शिक्षा और उदाहरण दोनों से स्पष्ट निर्धारित करता है कि हमें अपनी स्वतंत्रता को कहाँ तक रोकना चाहिए और कब ठोकर के होते हुए भी उसे थामे रखना चाहिए।

जब उसने तीमुथियुस को अपना साथी बनाया, तब उसका खतना किया; पर तीतुस का खतना करने को वह कभी राजी न हुआ। कार्य अलग-अलग थे, परन्तु उसके विचार या उसके आशय में कोई परिवर्तन नहीं हुआ।

तीमुथियुस का खतना करने में, यद्यपि वह सब मनुष्यों से स्वतंत्र था, उसने अपने आप को सब का दास बना लिया:

“मैं यहूदियों के लिये यहूदी बना कि यहूदियों को खींच लाऊँ; जो लोग व्यवस्था के अधीन हैं उनके लिये व्यवस्था के अधीन के समान बना कि व्यवस्था के अधीनों को खींच लाऊँ; निर्बलों के लिये निर्बल के समान बना कि निर्बलों को खींच लाऊँ। मैं सब मनुष्यों के लिये सब कुछ बना हूँ कि किसी न किसी रीति से कितनों का उद्धार कराऊँ।”

—1 कुरिन्थियों 9:19–22

यहाँ हमारी स्वतंत्रता का उचित संयम है: जब कभी उसका प्रयोग न करने से कुछ भला उत्पन्न हो, तब हम स्वतन्त्रता से उसके प्रयोग से दूर रह सकते हैं।

दूसरी ओर, तीतुस का खतना करने से दृढ़ता से इनकार करने में सन्त पौलुस अपने उद्देश्य की साक्षी देता है जब वह लिखता है:

“तीतुस भी, जो मेरे साथ था, यूनानी होने पर भी खतना कराने के लिये विवश नहीं किया गया। यह बात उन झूठे भाइयों के कारण उठी जो चुपके से घुस आए थे कि उस स्वतंत्रता का भेद लें जो हमें मसीह यीशु में मिली है, ताकि वे हमें दास बना दें। हम उनके अधीन होकर एक क्षण भर भी न झुके, ताकि सुसमाचार की सच्चाई तुम में बनी रहे।”

—गलातियों 2:3–5

यहाँ भी हम अपनी स्वतंत्रता की रक्षा करने की आवश्यकता देखते हैं, जब कभी झूठे प्रेरितों की आज्ञाएँ निर्बल विवेकों में उसे उलट देने का भय उत्पन्न करें।

सर्वत्र हमें प्रेम में सेवा करनी चाहिए और अपने पड़ोसियों की उन्नति का ध्यान रखना चाहिए। सन्त पौलुस दूसरी जगह कहता है:

“सब वस्तुएँ मेरे लिये उचित तो हैं, परन्तु सब लाभ की नहीं। सब वस्तुएँ मेरे लिये उचित हैं, परन्तु सब वस्तुओं से उन्नति नहीं होती। कोई अपनी ही भलाई को न ढूँढ़े, वरन अपने पड़ोसी की।”

—1 कुरिन्थियों 10:23–24

इस नियम से अधिक स्पष्ट या निश्चित कुछ नहीं: जब हमारी स्वतंत्रता का प्रयोग हमारे पड़ोसी की उन्नति में योगदान दे, तब हमें उसका प्रयोग करना चाहिए। यदि उसका प्रयोग हमारे पड़ोसी के लिए लाभदायक न हो, तो हमें उससे दूर रहना चाहिए।

कुछ लोग सन्त पौलुस की विवेकशीलता का अनुकरण करते हैं कि स्वतंत्रता से दूर रहें, परन्तु प्रेम की सेवा के सिवाय और सब कुछ खोजते हैं। अपने ही चैन और शान्ति के लिए वे चाहते हैं कि स्वतंत्रता का हर उल्लेख दबा दिया जाए।

फिर भी कभी-कभी अपने पड़ोसियों की उन्नति के लिए अपनी स्वतंत्रता का प्रयोग करना उतना ही उचित और आवश्यक है जितना उनकी भलाई के लिए उसे रोकना।

ठोकरों से बचने के विषय में जो कुछ मैंने सिखाया है, उसे उदासीन वस्तुओं तक ही सीमित रखना चाहिए, जो अपने आप में न भली हैं न बुरी। आवश्यक कर्तव्यों की ठोकर के भय से उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। यहाँ भी, यह सच है, हमें प्रेम का ध्यान रखना चाहिए, परन्तु इस रीति से कि हमारे पड़ोसी के कारण परमेश्वर अप्रसन्न न हो।

मैं उन लोगों के असंयम को पसन्द नहीं करता जो बिना कोलाहल के कुछ नहीं करते और हर चीज़ को सावधानी से खोलने की अपेक्षा हिंसा से फाड़ डालना पसन्द करते हैं। दूसरी ओर, मैं उनके तर्क को भी नहीं मानता जो अपने उदाहरण से दूसरों को असंख्य निन्दाओं में ले जाते हुए बहाना बनाते हैं कि अपने पड़ोसियों को ठोकर न खिलाने के लिए उन्हें ऐसा ही करना पड़ता है। मानो वे इस बीच अपने पड़ोसियों के विवेक को बुराई में दृढ़ नहीं कर रहे हों, विशेषकर जब वे एक ही कीचड़ में निरन्तर फँसे रहते हैं और उसमें से निकलने की कोई आशा नहीं रखते।

जब अपने पड़ोसी को शिक्षा या अपने जीवन के उदाहरण से सिखाने का प्रश्न उठता है, तब वे कहते हैं कि उसे दूध पिलाना चाहिए। परन्तु इसी बहाने वे उसे हानिकारक और विनाशकारी भूलों में बनाए रखते हैं। सन्त पौलुस सचमुच कहता है कि उसने कुरिन्थियों को दूध पिलाया; परन्तु यदि उस समय मिस्सा होता, तो क्या वह उन्हें दूध पिलाने के लिए उसका बलिदान चढ़ाता? नहीं, क्योंकि दूध विष नहीं है।

मैंने तुम्हें दूध पिलाया, अन्न नहीं।

—1 कुरिन्थियों 3:2

इसलिए वे झूठ बोलते हैं जब वे दावा करते हैं कि जिन्हें वे ऐसी कोमलता के रूप में निर्दयता से मार डालते हैं, उन्हें वे पोषण दे रहे हैं। और यदि हम मान भी लें कि ऐसा छिपाव कुछ समय के लिए अच्छा हो सकता है, तो वे कब तक अपनी सन्तान को उसी दूध पर रखेंगे? यदि वे कभी इतने सबल नहीं होते कि सबसे हल्का ठोस भोजन भी सह सकें, तो निश्चित है कि उन्हें कभी स्वास्थ्यकर दूध से भी पोषित नहीं किया गया।

इसलिए, चूँकि विश्वासियों के विवेक उस स्वतंत्रता के विशेषाधिकार से जो उन्हें यीशु मसीह में प्राप्त है, उन बातों के बन्धनों और अनिवार्य पालन से छुड़ाए गए हैं जिन्हें प्रभु ने उनके लिए उदासीन रहने दिया, इसलिए हम निष्कर्ष निकालते हैं कि वे सब मनुष्यों के अधिकार से स्वतंत्र और मुक्त हैं। क्योंकि न तो यह उचित है कि यीशु मसीह उस इतने बड़े उपकार के लिए अपनी प्रशंसा से वंचित किया जाए, और न यह कि विवेक उसके फल से वंचित किए जाएँ।

न हमें उस बात को तुच्छ समझना चाहिए जिसे हम यीशु मसीह को इतनी महँगी पड़ती देखते हैं, जिसे उसने सोने या चाँदी से नहीं, वरन अपने ही लहू से मोल लिया।

तुम्हारा छुटकारा चाँदी या सोने जैसी नाशमान वस्तुओं से नहीं, वरन मसीह के बहुमूल्य लहू से हुआ।

—1 पतरस 1:18–19

इसलिए सन्त पौलुस यह कहने में नहीं हिचकता कि यदि हम अपने आप को मनुष्यों की अधीनता में रखें तो मसीह की मृत्यु हमारे लिए व्यर्थ ठहरती है।

क्योंकि गलातियों की पत्री के कई अध्यायों में वह और किसी बात की नहीं, केवल इसी की चर्चा करता है कि यदि हमारे विवेक अपनी स्वतंत्रता में दृढ़ न रहें तो मसीह हमारे लिए गाड़ दिया गया, या यों कहें कि पूरी तरह बुझा दिया गया। यदि वे मनुष्यों की इच्छा के अनुसार बने नियमों और विधानों से बाँधे जा सकें, तो निश्चय ही वे उस स्वतंत्रता से गिर जाएँगे।

परन्तु जैसे यह विषय जानने के सर्वथा योग्य है, वैसे ही इसे और अधिक स्पष्टता से समझाने की आवश्यकता है। क्योंकि आज, मनुष्यों के विधानों को समाप्त करने के विषय में कोई शब्द कहा नहीं जाता कि तुरन्त बड़े हंगामे उठ खड़े होते हैं, जिन्हें कुछ अंश में उपद्रवी लोग और कुछ अंश में निन्दक भड़काते हैं, मानो मनुष्यों की सारी आज्ञाकारिता को ठुकराया और उलटा जा रहा हो।

इस गलतफहमी को रोकने के लिए हमें ध्यान रखना चाहिए कि मनुष्य में दोहरा शासन है। एक आत्मिक है, जिससे विवेक को परमेश्वर की बातों में और भक्ति से सम्बन्ध रखनेवाली सब बातों में शिक्षा और उपदेश दिया जाता है। दूसरा राजनैतिक या नागरिक है, जिससे मनुष्य को मानवता और शिष्टता के वे कर्तव्य सिखाए जाते हैं जिनका मनुष्यों के बीच पालन करना आवश्यक है।

इन्हें सामान्यतः आत्मिक और लौकिक अधिकार-क्षेत्र कहा जाता है, जो शब्द पर्याप्त उपयुक्त हैं, यह संकेत करते हुए कि पहली प्रकार का शासन प्राण के जीवन से सम्बन्ध रखता है, जबकि दूसरा इस वर्तमान जीवन की सेवा करता है, मनुष्यों को भोजन या वस्त्र देकर नहीं, वरन ऐसे नियम स्थापित करके जिनके अनुसार वे एक दूसरे के साथ आदरपूर्वक और न्यायपूर्वक जी सकें।

पहले का आसन प्राण के भीतर है; दूसरा केवल बाहरी आचरण को ढालता और नियमित करता है। इसलिए पाठक मुझे अनुमति दे कि मैं एक को आत्मिक राज्य और दूसरे को नागरिक या राजनैतिक राज्य कहूँ।

चूँकि हमने इन में भेद कर लिया है, इसलिए हमें इनका अलग-अलग विचार करना चाहिए और इन्हें एक दूसरे में नहीं मिलाना चाहिए। क्योंकि मनुष्य के भीतर मानो दो संसार हैं, जिन पर भिन्न-भिन्न राजा और भिन्न-भिन्न व्यवस्थाएँ शासन कर सकती हैं।

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