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अध्याय दो: मनुष्य का ज्ञान और स्वतंत्र इच्छा (भाग 2 / 4)
क्योंकि अपनी मन्दता के कारण मनुष्य की बुद्धि सत्य की खोज में निश्चित मार्ग पर टिक नहीं पाती, वरन् नाना भ्रमों में भटकती फिरती है। अन्धकार में चलनेवाले अन्धे के समान वह इधर-उधर ठोकरें खाती रहती है, यहाँ तक कि अन्त में राह ही खो बैठती है। इस प्रकार सत्य की खोज में वह दिखा देती है कि उसे खोजने और पाने के लिए वह कितनी अयोग्य और असमर्थ है, क्योंकि वह प्रायः यह भी नहीं पहचान पाती कि उसे किन बातों को जानने में लगना चाहिए।
इसीलिए वह व्यर्थ और निकम्मी बातों की छानबीन करने में मूर्खतापूर्ण जिज्ञासा से स्वयं को सताती है। रही आवश्यक बातों की बात, सो या तो वह उन्हें बिलकुल तुच्छ जानती है, या उन्हें सीधे देखने के बजाय उनकी ओर बस एक उड़ती-सी दृष्टि डाल देती है—और ऐसा भी कभी-कभार ही होता है। निश्चय ही ऐसा लगभग कभी नहीं होता कि मनुष्य गम्भीरता से उनमें मन लगाए।
यद्यपि सब अन्यजातीय लेखक इस विकृति की शिकायत करते हैं, तथापि हम देखते हैं कि वे सब स्वयं इसी में उलझे हुए हैं। इसलिए सुलैमान ने सभोपदेशक में उन सब बातों का वर्णन करके जिनमें मनुष्य आनन्दित होते और अपने आपको बुद्धिमान समझते हैं, अन्त में उन सबको व्यर्थ और निस्सार घोषित किया है।
तो भी जब मनुष्य की बुद्धि किसी विद्या में मन लगाती है, तब उसका परिश्रम ऐसा सर्वथा व्यर्थ नहीं होता कि उससे कुछ प्रगति ही न हो, विशेषकर जब वह पृथ्वी की बातों की ओर लगी हो। वह इतनी मन्द भी नहीं कि स्वर्गीय बातों का थोड़ा-सा स्वाद भी न पाए, यद्यपि वह उनके पीछे लापरवाही से चलती है। फिर भी दोनों विषयों में उसकी सामर्थ्य एक-सी नहीं है। क्योंकि जब वह इस वर्तमान जीवन से ऊपर उठने का प्रयत्न करती है, तभी वह मुख्यतः अपनी निर्बलता में दोषी ठहरती है।
इसलिए यह अधिक स्पष्टता से समझने के लिए कि बुद्धि प्रत्येक क्षेत्र में कहाँ तक ऊपर चढ़ सकती है, हमें एक भेद का सहारा लेना होगा।
वह भेद यह होगा: पृथ्वी की बातों का ज्ञान एक है और स्वर्गीय बातों का ज्ञान दूसरा। पृथ्वी की बातों से मेरा तात्पर्य उन बातों से है जो परमेश्वर और उसके राज्य, सच्ची धार्मिकता, या आनेवाले जीवन की अमरता तक नहीं पहुँचतीं, वरन् वर्तमान जीवन से सम्बन्ध रखती हैं और मानो उसकी सीमाओं के भीतर बन्द हैं। स्वर्गीय बातों से मेरा तात्पर्य सच्ची धार्मिकता के नियम और स्वरूप तथा स्वर्गीय राज्य के भेदों से है।
पहली श्रेणी में राजनीतिक ज्ञान, गृह-प्रबन्ध की उचित रीति, शिल्पकलाएँ, दर्शनशास्त्र और वे सब विद्याएँ आती हैं जो उदार कलाएँ कहलाती हैं। दूसरी श्रेणी में परमेश्वर और उसकी इच्छा का ज्ञान तथा अपने जीवन को उसके अनुसार ढालने का नियम आता है।
पहली श्रेणी के विषय में हमें यह मानना पड़ेगा: चूँकि मनुष्य स्वभाव से सामाजिक प्राणी है, इसलिए वह समाज को पोषित और सुरक्षित रखने की स्वाभाविक प्रवृत्ति से भी प्रेरित होता है। इसी कारण हम देखते हैं कि नागरिक सत्यनिष्ठा और व्यवस्था की कुछ सामान्य धारणाएँ सब मनुष्यों की बुद्धि में अंकित हैं।
इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि कोई ऐसा नहीं मिल सकता जो यह न माने कि सब मानव-समाजों का नियमन कानूनों से होना चाहिए, और जिसकी बुद्धि में कुछ ऐसे सिद्धान्त न हों जिनसे ऐसे कानून उपजते हैं। इसी से वह सहमति भी उत्पन्न होती है जो जातियों और व्यक्तियों में कानूनों को स्वीकार करने के विषय में सदा से रही है, क्योंकि उनका कोई बीज बिना किसी शिक्षक या विधि-निर्माता के सिखाए हर किसी में स्वभाव से ही मौजूद है।
इसका खण्डन उन विवादों और संघर्षों से नहीं होता जो तुरन्त उठ खड़े होते हैं। कुछ लोग चाहते हैं कि हर कानून रद्द हो जाए, सारी सत्यनिष्ठा उलट दी जाए और सारा न्याय बुझा दिया जाए, ताकि वे चोरों और डाकुओं की भाँति अपनी ही अभिलाषाओं के अनुसार चलें। दूसरे—जैसा कि अधिकतर होता है—जिसे एक विधि-निर्माता भला और उचित ठहराता है उसे अन्यायपूर्ण मानते हैं, और जिसे वह बुरा कहकर मना करता है उसे भला समझते हैं।
पहले लोग कानूनों से इसलिए घृणा नहीं करते कि वे नहीं जानते कि कानून भले और पवित्र हैं। वरन् अपनी अभिलाषाओं से उन्माद की भाँति जकड़े और बहा लिए जाने के कारण वे विवेक के विरुद्ध लड़ते हैं। जिसे वे अपनी बुद्धि में उचित मानते हैं, उसी से वे अपने मन में घृणा करते हैं, जहाँ दुष्टता का राज्य है।
दूसरा दल, अपने मतभेद के बावजूद, इतना पूर्णतः भिन्न नहीं है कि उनमें उस सामान्य समझ का अभाव हो जिसका हमने उल्लेख किया है। क्योंकि उनका मतभेद इस विषय में है कि कौन-से कानून सर्वोत्तम हैं, यह इस बात का चिह्न है कि वे न्यायशीलता के किसी सामान्य सिद्धान्त पर सहमत हैं। इसमें भी मानवीय बुद्धि की दुर्बलता प्रकट होती है, क्योंकि यह कल्पना करते हुए कि वह सही मार्ग पर चल रही है, वह लँगड़ाती और डगमगाती है।
तो भी यह दृढ़ता से स्थापित है: सब मनुष्यों में नागरिक व्यवस्था का कोई बीज है। यह इस बात का प्रबल प्रमाण है कि वर्तमान जीवन के शासन के विषय में कोई भी विवेक के प्रकाश से सर्वथा रहित नहीं है।
शिल्पकलाओं और उदार कलाओं, दोनों के विषय में, उन्हें सीखने की हममें कुछ योग्यता का होना यह दर्शाता है कि इस क्षेत्र में मानवीय बुद्धि में कुछ सामर्थ्य बनी हुई है। यद्यपि हर कोई उन सबको सीखने के योग्य और समर्थ नहीं है, तथापि यह इस बात का पर्याप्त प्रमाण है कि मानवीय बुद्धि इस विषय में सारी शक्ति से वंचित नहीं की गई है, क्योंकि कोई ऐसा नहीं मिल सकता जिसमें कम से कम एक को सीखने की कुछ तत्परता न हो।
फिर मनुष्यों में केवल कलाएँ सीखने की सामर्थ्य और सुगमता ही नहीं है। हम देखते हैं कि हर कोई अपनी कला में प्रायः कुछ नया आविष्कार करता है, या जो उसने दूसरों से सीखा है उसे सुधारता और निखारता है। इस विषय में प्लेटो का यह सोचना भूल थी कि ऐसी समझ केवल उस बात का स्मरण है जो आत्मा देह में डाले जाने से पहले जानती थी। तो भी विवेक हमें यह मानने को विवश करता है कि इन बातों का कोई सिद्धान्त मानवीय बुद्धि पर अंकित किया गया है।
इसलिए ये उदाहरण दिखाते हैं कि विवेक की एक सार्वभौमिक समझ स्वभाव से सब मनुष्यों पर अंकित है। फिर भी वह इस प्रकार सार्वभौमिक है कि हर एक को अपनी बुद्धि में परमेश्वर के एक विशेष अनुग्रह को स्वीकार करना चाहिए।
परमेश्वर कुछ लोगों को मूर्ख और निर्बुद्धि बनाकर हमें इस स्वीकारोक्ति के लिए पर्याप्त रूप से प्रेरित करता है। उनमें वह मानो दर्पण में दिखाता है कि यदि मानवीय आत्मा उसके प्रकाश से प्रकाशित न होती तो उसमें कितनी उत्कृष्टता होती—वह प्रकाश जो यद्यपि सब में स्वाभाविक है, तथापि प्रत्येक व्यक्ति के प्रति उसकी उदारता का एक अनुग्रहपूर्ण उपकार है।
कलाओं का आविष्कार, उन्हें सिखाने की विधियाँ, क्रमबद्ध शिक्षा, और उनमें विशिष्ट ज्ञान और उत्कृष्टता—क्योंकि ये केवल थोड़े ही लोगों को दी जाती हैं—सब मनुष्यों की स्वाभाविक सामर्थ्य के निश्चित प्रमाण नहीं हैं। तो भी, क्योंकि ये भले और बुरे, दोनों को दी जाती हैं, हम इन्हें उचित रूप से प्रकृति के वरदानों में गिन सकते हैं।
इसलिए जब हम अन्यजातीय लेखकों में सत्य का वह अद्भुत प्रकाश देखते हैं जो उनकी रचनाओं में चमकता है, तो यह हमें स्मरण दिलाए कि मानव स्वभाव, यद्यपि अपनी खराई से गिर गया और बहुत भ्रष्ट हो गया, फिर भी परमेश्वर के अनेक वरदानों से सुशोभित बना हुआ है।
यदि हम परमेश्वर के आत्मा को सत्य का एकमात्र सोता मानते हैं, तो जहाँ कहीं सत्य प्रकट हो, हम न उसे ठुकराएँगे और न तुच्छ जानेंगे, जब तक कि हम परमेश्वर के आत्मा का अनादर करना न चाहें। क्योंकि आत्मा के वरदानों को तुच्छ जानना बिना उसके प्रति तिरस्कार और निन्दा दिखाए नहीं हो सकता।
क्या हम इनकार कर सकते हैं कि प्राचीन विधिशास्त्रियों में निर्णय की बड़ी स्पष्टता थी, जब उन्होंने ऐसी उत्तम व्यवस्था और ऐसी न्यायसंगत नागरिक शासन-पद्धति स्थापित की? क्या हम कहेंगे कि दार्शनिक अन्धे थे जब उन्होंने प्रकृति के रहस्यों की इतनी लगन से खोज की और उनका ऐसी कुशलता से वर्णन किया? क्या हम कहेंगे कि जिन्होंने हमें तर्क की कला सिखाई—अर्थात् विवेकपूर्वक बोलने की विधि—उनमें कोई समझ नहीं थी? क्या हम कहेंगे कि जिन्होंने चिकित्सा-विज्ञान रचा वे निर्बुद्धि थे? क्या हम अन्य विद्याओं को मूर्खता मानें?
इसके विपरीत, इन विषयों पर लिखी गई पुस्तकों को हम बिना विस्मय से भरे पढ़ नहीं सकते। हम उनकी सराहना इसलिए करते हैं कि हम उनमें निहित बुद्धिमत्ता को स्वीकार करने को विवश हैं। फिर भी हमें किसी वस्तु को उत्कृष्ट या प्रशंसनीय नहीं मानना चाहिए जब तक हम यह स्वीकार न करें कि वह परमेश्वर की ओर से आई है। ऐसा न करना घोर कृतघ्नता होगी—ऐसी कृतघ्नता जो अन्यजातीय कवियों में भी नहीं मिलती, जिन्होंने माना कि दर्शन, व्यवस्था, चिकित्सा और अन्य विद्याएँ परमेश्वर की देन हैं।
इसलिए, चूँकि इन लोगों ने, जिनके पास प्रकृति के वरदानों के सिवा कोई सहायता नहीं थी, संसारी और पार्थिव बातों को समझने में ऐसी कुशलता दिखाई, उनके उदाहरण हमें सिखाएँ कि हमारे प्रभु ने मानव स्वभाव के सर्वोच्च भलाई से छीने जाने के बाद भी उसके पास कितना अनुग्रह छोड़ रखा है।
तो भी हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि ऐसी सब योग्यताएँ परमेश्वर के आत्मा के वरदान हैं, जिन्हें वह मानव जाति की सामान्य भलाई के लिए जिसे चाहता है उसे बाँटता है। क्योंकि यदि जंगल में निवासस्थान बनानेवालों को ज्ञान और कौशल परमेश्वर के आत्मा द्वारा विशेष रूप से देना पड़ा, तो यह आश्चर्य की बात नहीं कि हम कहें कि मानव जीवन के लिए मुख्यतः आवश्यक बातों का ज्ञान हमें परमेश्वर के आत्मा द्वारा पहुँचाया जाता है।
यदि कोई यह आपत्ति करे, "परमेश्वर के आत्मा का दुष्टों से क्या सम्बन्ध, जो परमेश्वर से सर्वथा अलग हैं?" तो मैं उत्तर देता हूँ कि यह तर्क अपर्याप्त है। क्योंकि जब पवित्रशास्त्र कहता है कि आत्मा केवल विश्वासियों में वास करता है, तो इसका अर्थ पवित्रीकरण के आत्मा से है, जिसके द्वारा हम परमेश्वर के मन्दिर होने के लिए उसके निमित्त पवित्र ठहराए जाते हैं।
तो भी परमेश्वर इसी आत्मा की सामर्थ्य से सब प्राणियों को भरने, चलाने और जीवन देने से नहीं रुकता, और वह यह उस विशेष स्वभाव के अनुसार करता है जो उसने हर प्राणी को उसकी सृष्टि के समय दिया था। अब यदि प्रभु ने चाहा है कि दुष्ट और अविश्वासी प्राकृतिक दर्शन, तर्कशास्त्र और अन्य विद्याओं को समझने में हमारी सेवा करें, तो हमें इन विषयों में उनका उपयोग करना चाहिए, ऐसा न हो कि जहाँ कहीं परमेश्वर के वरदान हमें दिए जाएँ वहाँ उन्हें तुच्छ जानने के कारण हमारी लापरवाही का दण्ड हमें मिले।
फिर भी इसलिए कि कोई यह न समझ बैठे कि मनुष्य सचमुच धन्य है, केवल इस कारण कि हमने उसे इस नाशवान संसार में निहित पार्थिव बातों को समझने की इतनी बड़ी सामर्थ्य दी है, हमें यह भी देखना चाहिए कि उसकी समझ की सारी क्षमता और उससे उपजा ज्ञान परमेश्वर के सम्मुख व्यर्थ और महत्त्वहीन है, जब उसमें सत्य की दृढ़ नींव न हो।
क्योंकि सन्त अगस्तीन का यह कथन पूर्णतः सत्य है—वह कथन जिसे धर्मसूत्रों के गुरु (लोम्बार्ड) को भी स्वीकार करना पड़ा: जैसे आरम्भ में मनुष्य को दिए गए अलौकिक वरदान उसके पाप में गिरने के पश्चात् उससे ले लिए गए, वैसे ही उसके पास बचे हुए प्राकृतिक वरदान भ्रष्ट हो गए। ऐसा नहीं कि ये वरदान स्वयं अशुद्ध हो सकते हैं, क्योंकि वे परमेश्वर की ओर से आते हैं, परन्तु मनुष्य के अशुद्ध हो जाने के पश्चात् वे उसमें शुद्ध नहीं रहे, ताकि उनके लिए कोई प्रशंसा उसके नाम न लगाई जाए।
अब यह समझाना शेष है कि जब मानवीय विवेक परमेश्वर के राज्य को खोजता है तो वह क्या समझ सकता है और आत्मिक बुद्धि को ग्रहण करने की उसमें कितनी सामर्थ्य है। यह बुद्धि तीन बातों में निहित है: परमेश्वर को जानना, उसकी इच्छा को जानना, और यह जानना कि हमें अपने जीवन को उस इच्छा के अनुसार कैसे चलाना चाहिए।
पहली दो बातों के विषय में—और विशेषकर दूसरी के विषय में—मनुष्यों में जो अत्यन्त सूक्ष्म बुद्धि रखते हैं वे भी अन्धों से बढ़कर अन्धे हैं। मैं इनकार नहीं करता कि दार्शनिकों के लेखों में यहाँ-वहाँ परमेश्वर के विषय में अच्छे ढंग से कहे गए कथन मिलते हैं। फिर भी उनमें सदा ऐसी अस्थिरता दिखाई देती है कि प्रकट है कि उन्हें उसके विषय में केवल धुँधली धारणाएँ ही थीं।
यह सच है कि परमेश्वर ने उन्हें अपने ईश्वरत्व का थोड़ा-सा स्वाद दिया ताकि वे अपनी अभक्ति के बहाने के रूप में अज्ञानता का तर्क न दे सकें। उसने उन्हें कुछ ऐसे कथन कहने को भी प्रेरित किया जिनसे वे दोषी ठहराए जा सकें। परन्तु उन्होंने जो देखा, उसे ऐसे देखा कि वह उन्हें सत्य की ओर निर्देशित नहीं कर सकता था—परमेश्वर का सच्चा ज्ञान पाने में समर्थ करना तो दूर की बात है।
हम इसे एक तुलना से समझा सकते हैं। यदि कोई मनुष्य रात में आँधी-तूफान के समय खेत के बीच में खड़ा हो, तो बिजली की एक कौंध उसे अपने चारों ओर दूर तक देखने में समर्थ कर सकती है—परन्तु केवल एक क्षण के लिए। इस प्रकार वह उसे सही मार्ग पर चलाने में किसी काम की न होगी। क्योंकि वह प्रकाश इतनी जल्दी लुप्त हो जाता है कि इससे पहले कि वह मार्ग पर ठीक से दृष्टि जमा सके, वह फिर अन्धकार से घिर जाता है। वह क्षणिक प्रकाश उसे सुरक्षित घर पहुँचाने से कितना दूर है!
फिर सत्य की वे थोड़ी-सी बूँदें जो हम दार्शनिकों के लेखों में बिखरी हुई देखते हैं—कितने भयानक झूठों से वे ढँकी हुई हैं?
परन्तु जैसा मैंने कहा, दूसरी बात के विषय में उनकी अज्ञानता ऐसी है कि उन्हें परमेश्वर की इच्छा का कभी थोड़ा-सा भी निश्चित ज्ञान नहीं हुआ, जिसके बिना मानवीय बुद्धि असाधारण उलझन से भरी रहती है।
इसलिए मानवीय विवेक इस सत्य के निकट कभी नहीं पहुँच सकता, न इसके लिए प्रयत्न कर सकता है, न अपने आपको इसकी ओर लगा सकता है: यह समझना कि सच्चा परमेश्वर कौन है और वह हमारे प्रति क्या होना चाहता है।
परन्तु क्योंकि झूठे अहंकार के नशे में चूर होकर हम यह विश्वास करने में कठिनाई पाते हैं कि परमेश्वर की बातों को समझने में हमारा विवेक इतना अन्धा और मन्द है, इसलिए मुझे यही उचित जान पड़ता है कि इसे तर्कों के बजाय पवित्रशास्त्र की गवाहियों से प्रमाणित किया जाए।
सन्त यूहन्ना इसे स्पष्टता से दर्शाता है जब वह कहता है कि आदि से जीवन परमेश्वर में था, यह जीवन मनुष्यों की ज्योति था, और यह ज्योति अन्धकार में चमकती है पर अन्धकार ने उसे ग्रहण न किया। —यूहन्ना 1
इन शब्दों से वह सिखाता है कि मनुष्य की आत्मा कुछ सीमा तक परमेश्वर की ज्योति से प्रकाशित है, ताकि वह किसी लौ से, या कम से कम किसी चिनगारी से, कभी सर्वथा रहित न हो। फिर भी वह यह भी घोषित करता है कि इस प्रकाशन से वह परमेश्वर को समझ नहीं सकती।
ऐसा क्यों? क्योंकि जहाँ तक परमेश्वर के ज्ञान का सम्बन्ध है, मनुष्य की सारी स्वाभाविक सामर्थ्य अन्धकार के सिवा कुछ नहीं। क्योंकि जब पवित्र आत्मा मनुष्यों को अन्धकार कहता है, तो वह उनसे आत्मिक समझ की हर क्षमता छीन लेता है।
इसलिए यूहन्ना पुष्टि करता है कि जो विश्वासी मसीह को ग्रहण करते हैं वे न लहू से, न शरीर की इच्छा से, न मनुष्य की इच्छा से, परन्तु केवल परमेश्वर से उत्पन्न हुए हैं। मानो वह यह कह रहा हो कि शरीर में ऐसी उच्च बुद्धि की क्षमता नहीं कि वह परमेश्वर को और परमेश्वर से सम्बन्ध रखनेवाली बातों को समझ सके, जब तक कि पवित्र आत्मा उसे प्रकाशित न करे। इसी प्रकार यीशु मसीह ने सन्त पतरस को साक्षी दी कि उसे जानने की उसकी योग्यता उसके पिता परमेश्वर की ओर से आत्मिक प्रकाशन के द्वारा आई थी। —मत्ती 16
यदि हम यह निश्चित मानते—जैसा कि निस्सन्देह हमें मानना चाहिए—कि जो कुछ हमारा प्रभु अपने चुने हुओं को नया जन्म देनेवाले आत्मा के द्वारा देता है वह हमारे स्वभाव में नहीं है, तो हमारे पास इस विषय में डगमगाने का कोई कारण न होता।
क्योंकि विश्वासी लोग भविष्यद्वक्ता के द्वारा इस प्रकार कहते हैं:
"हे प्रभु, जीवन का सोता तेरे ही पास है; तेरी ज्योति से हम ज्योति देखेंगे।"
सन्त पौलुस भी साक्षी देता है कि पवित्र आत्मा के बिना कोई मसीह को ठीक से प्रभु नहीं कह सकता।
फिर, यूहन्ना बपतिस्मा देनेवाला अपने चेलों की मन्दता देखकर पुकार उठता है कि जब तक स्वर्ग से किसी को न दिया जाए तब तक वह कुछ भी ग्रहण नहीं कर सकता।
—यूहन्ना 3
कि इस शब्द दान से उसका तात्पर्य आत्मिक प्रकाशन से है, न कि प्रकृति की साधारण समझ से, यह उसकी इस शिकायत से प्रकट है कि मसीह के विषय में उसके सारे प्रचार का उसके चेलों में कुछ परिणाम नहीं निकला। मानो उसने कहा, "मैं स्पष्ट देखता हूँ कि जब तक परमेश्वर अपने आत्मा से मनुष्यों को शिक्षा न दे, मेरे शब्दों में उन्हें ईश्वरीय बातों में सिखाने की कोई सामर्थ्य नहीं।"
इसी प्रकार मूसा ने भी लोगों को उनकी भुलक्कड़ी के लिए डाँटते हुए यह कहा कि जब तक उन्हें अनुग्रह न दिया जाए वे परमेश्वर के भेदों में से कुछ नहीं समझ सकते:
"तुम ने बड़े-बड़े चिह्न और आश्चर्यकर्म अपनी आँखों से देखे, तौभी यहोवा ने तुम्हें न तो समझने का मन, न सुनने के कान, न देखने की आँखें दी हैं।"
यदि वह उन्हें परमेश्वर के कामों पर विचार करने में निर्बुद्धि ठूँठ कहता, तो इससे अधिक क्या कह सकता था?
इसी कारण प्रभु अपने भविष्यद्वक्ता के द्वारा इस्राएलियों से एक विशेष अनुग्रह के रूप में प्रतिज्ञा करता है कि वह उन्हें ऐसा मन देगा जिससे वे उसे जानेंगे।
इससे वह संकेत करता है कि मानवीय बुद्धि में कोई आत्मिक ज्ञान नहीं हो सकता, सिवाय उस सीमा के जहाँ तक वह उसके द्वारा प्रकाशित की गई हो।
परन्तु सन्त पौलुस सबसे अधिक स्पष्टता से बोलता है। इस विषय की चर्चा करते हुए वह यह निष्कर्ष निकालता है:
"शारीरिक मनुष्य परमेश्वर के आत्मा की बातें ग्रहण नहीं करता, क्योंकि वे उसकी दृष्टि में मूर्खता की बातें हैं; और न वह उन्हें जान सकता है।"
वह शारीरिक मनुष्य किसे कहता है? उसे जो प्रकृति के प्रकाश पर भरोसा रखता है। तो मनुष्य स्वभाव से इस दशा में है: वह आत्मिक बातों को नहीं जान सकता।
यदि कारण पूछा जाए, तो यह केवल इतना नहीं कि वह उनकी उपेक्षा करता है। यदि वह अपनी सारी शक्ति से भी यत्न करे, तब भी वह उन्हें पाने में सर्वथा असमर्थ रहेगा, क्योंकि, जैसा सन्त पौलुस कहता है, उनकी जाँच आत्मिक रीति से होती है।
इससे उसका तात्पर्य है कि ये बातें, मानवीय बुद्धि से छिपी होने के कारण, आत्मा के प्रकाशन द्वारा प्रकाशित की जाती हैं। इस प्रकार परमेश्वर की सारी बुद्धि मनुष्य के लिए तब तक मूर्खता ही है जब तक वह अनुग्रह से प्रकाशित न हो।
पौलुस ने इससे पहले उन बातों के ज्ञान को, जिन्हें परमेश्वर ने अपने सेवकों के लिए तैयार किया है, दृष्टि, श्रवण और हमारी समझ की क्षमता की पहुँच से बहुत ऊपर ठहराया था। वरन् उसने साक्षी दी थी कि मानवीय बुद्धि एक परदे के समान है जो हमें परमेश्वर को ठीक से देखने से रोकता है।
हमें और क्या चाहिए? प्रेरित घोषणा करता है कि इस संसार की बुद्धि को मूर्ख ठहराया जाना है—जैसा कि परमेश्वर ने सचमुच ठहराया है—और क्या हम उसमें ऐसी बड़ी सूक्ष्मता मानेंगे कि वह परमेश्वर और उसके राज्य के सब भेदों तक पहुँच जाए? ऐसा पागलपन हमसे दूर रहे।
अब तीसरी बात पर कहना शेष है: उस नियम को जानना जिससे हम अपने जीवन को ठीक से चला सकें—अर्थात् कर्मों की सच्ची धार्मिकता को जानना। इस विषय में मानवीय बुद्धि में पहले चर्चा किए गए विषयों की अपेक्षा कुछ अधिक विवेक दिखाई देता है।
क्योंकि प्रेरित साक्षी देता है कि अन्यजाति, जिनके पास व्यवस्था नहीं, अपने लिए आप ही व्यवस्था हैं और दिखाते हैं कि व्यवस्था की बातें उनके हृदयों में लिखी हैं, क्योंकि उनके विवेक गवाही देते हैं और उनके विचार परमेश्वर के न्याय के सम्मुख उन पर दोष लगाते या उनका बचाव करते हैं। —रोमियों 2
अब यदि अन्यजातियों के मनों पर स्वभाव से परमेश्वर की धार्मिकता अंकित है, तो हम यह नहीं कहेंगे कि वे इस ज्ञान के विषय में सर्वथा अन्धे हैं कि उन्हें कैसे जीवन बिताना चाहिए। वरन् यह सामान्य मान्यता है कि मनुष्य को भले जीवन के सही नियम की पर्याप्त शिक्षा इसी स्वाभाविक व्यवस्था से मिलती है जिसकी चर्चा प्रेरित करता है।
तो भी हमें विचार करना चाहिए कि व्यवस्था का यह ज्ञान मनुष्यों को किस उद्देश्य से दिया गया। तब प्रकट होगा कि वह हमें विवेक और सत्य के लक्ष्य की ओर कहाँ तक निर्देशित कर सकता है। यह सन्त पौलुस के शब्दों से स्पष्ट समझा जा सकता है यदि हम उसके तर्क के क्रम पर विचार करें।
उसने थोड़ी देर पहले कहा था कि जिन्होंने व्यवस्था के अधीन पाप किया उनका न्याय व्यवस्था से होगा और जिन्होंने बिना व्यवस्था के पाप किया वे बिना व्यवस्था के नाश होंगे। क्योंकि यह अन्तिम बात अनुचित जान पड़ती थी—कि बेचारी, अज्ञानी जातियाँ सत्य के किसी प्रकाश के बिना नाश हों—इसलिए वह जोड़ता है कि उनका विवेक उनके लिए व्यवस्था का काम करे, क्योंकि वह उन्हें न्यायपूर्वक दोषी ठहराने के लिए पर्याप्त है।
इसलिए स्वाभाविक व्यवस्था का उद्देश्य मनुष्य को निरुत्तर करना है। अतः हम उसे उचित रूप से इस प्रकार परिभाषित कर सकते हैं: वह विवेक की ऐसी चेतना है जिससे विवेक भले और बुरे में इतना भेद कर लेता है कि मनुष्य से अज्ञानता का बहाना छीन ले, क्योंकि वह अपनी ही गवाही से दोषी ठहरता है।
मनुष्य में अपनी चापलूसी करने की ऐसी प्रबल प्रवृत्ति है कि वह सदा यथासम्भव अपनी बुद्धि को अपने पाप को स्वीकार करने से फेर लेने का यत्न स्वेच्छा से करता रहता है। ऐसा जान पड़ता है कि इसी ने प्लेटो को यह कहने को प्रेरित किया कि हम केवल अज्ञानता के कारण पाप करते हैं।
यह बात ठीक कही गई होती यदि मानवीय कपट अपने दोषों को ऐसे छिपा सकता कि विवेक का पीछा परमेश्वर का न्याय न करता रहे। परन्तु चूँकि पापी, अपने हृदय में निहित भले और बुरे के विवेक से मुँह फेरने पर भी, लगातार बलपूर्वक उसकी ओर घसीटा जाता है और अपनी आँखें ऐसी बन्द नहीं कर सकता कि उसे इच्छा-अनिच्छा से कभी-कभी उन्हें खोलना न पड़े, इसलिए यह कहना झूठ है कि मनुष्य केवल अज्ञानता से पाप करते हैं।
इसीलिए थेमिस्तियस नामक एक और दार्शनिक अधिक सत्य कहता है जब वह सिखाता है कि मनुष्य की बुद्धि अपने सामान्य निर्णय में कदाचित् ही भूल करती है, परन्तु जब वह किसी ऐसे विशेष विषय पर विचार करती है जिसमें उसका अपना सम्बन्ध हो तब धोखा खा जाती है।
उदाहरणार्थ, यदि सामान्य रूप से पूछा जाए कि क्या हत्या बुरी है, तो कोई इनकार नहीं करेगा कि है। फिर भी अपने शत्रु की मृत्यु की युक्ति रचनेवाला मनुष्य उस पर ऐसे विचार करता है मानो वह भली बात हो। इसी प्रकार व्यभिचारी सामान्य रूप से यौन-अनैतिकता की निन्दा करेगा, जबकि अपने व्यभिचार के विषय में अपनी चापलूसी करता रहेगा।
तो अज्ञानता यहाँ है: जब मनुष्य एक सही सार्वभौमिक निर्णय बना चुकता है, तब विशेष विषय में स्वयं को सम्मिलित करते ही वह उस नियम को भूल जाता है जिसका वह पहले पालन कर रहा था और उसे अपने ऊपर लागू नहीं करता। सन्त अगस्तीन ने भजन संहिता 57 की अपनी व्याख्या में इस विषय का बहुत अच्छा वर्णन किया है।
तो भी थेमिस्तियस का कथन सर्वत्र लागू नहीं होता। कभी-कभी बुरे काम की लज्जा पापी के विवेक पर इतनी निकटता से दबाव डालती है कि वह इसलिए नहीं गिरता कि भलाई के झूठे रूप से धोखा खा गया हो, वरन् जानबूझकर और स्वेच्छा से बुराई के हाथ में अपने आपको सौंप देता है।
इसी मनोदशा से वे कथन उपजते हैं जो अन्यजातीय लेखों में मिलते हैं:
"मैं उत्तम मार्ग को देखता और सराहता हूँ, फिर भी निकृष्ट का अनुसरण करता हूँ।"
और ऐसी ही अन्य उक्तियाँ भी हैं।
इस विषय में सारी अनिश्चितता दूर करने के लिए अरस्तू असंयम और अतिभोग के बीच एक उपयोगी भेद करता है। वह कहता है कि जहाँ असंयम का राज्य होता है, वहाँ मनुष्य की भले और बुरे की विशेष जानकारी उसकी अव्यवस्थित अभिलाषा द्वारा छीन ली जाती है। इस प्रकार अपने पाप में वह उस बुराई को नहीं पहचानता जिसकी वह सामान्य रूप से सब दूसरों में निन्दा करता है। परन्तु जब उसकी अभिलाषा उसे अन्धा करना छोड़ देती है, तब पश्चाताप आता है और उसे अपना अपराध पहचानने तक पहुँचाता है।
अतिभोग एक अधिक खतरनाक रोग है। यह वह दशा है जिसमें मनुष्य देखता है कि वह बुराई कर रहा है, फिर भी रुकता नहीं, वरन् हठपूर्वक अपने दुष्ट उद्देश्य में डटा रहता है।
जब हम देखते हैं कि मनुष्य में एक सामान्य निर्णय-शक्ति है जिससे वह भले और बुरे में भेद करता है, तो हमें इस कारण यह नहीं मान लेना चाहिए कि यह निर्णय-शक्ति सर्वथा स्वस्थ और अक्षत है। क्योंकि यदि मनुष्यों में भले-बुरे का विवेक केवल इसलिए है कि वे अज्ञानता का बहाना न कर सकें, तो यह किसी प्रकार आवश्यक नहीं कि सत्य उन्हें हर विशेष बात में ज्ञात हो। इतना ही पर्याप्त है कि वे उसे इतना जानें कि अपने विवेक की गवाही से दोषी ठहराए बिना न्याय से बच न सकें।
वस्तुतः, यदि हम जाँचें कि परमेश्वर की व्यवस्था के अनुसार, जो सिद्ध धार्मिकता का आदर्श है, हमें धार्मिकता की कैसी समझ है, तो हम पाएँगे कि हमारी बुद्धि कितने प्रकार से अन्धी है।
निश्चय ही वह पहली पटिया में निहित मुख्य बातों को बिलकुल नहीं समझती: परमेश्वर पर भरोसा रखना, उसकी सामर्थ्य और धार्मिकता के योग्य उसकी स्तुति करना, उसका नाम लेकर पुकारना, और उसके विश्राम-दिन का पालन करना। कौन-सी मानवीय बुद्धि ने कभी, अपनी स्वाभाविक समझ से, यह केवल जाना ही नहीं, वरन् कल्पना तक की है कि परमेश्वर का सच्चा आदर और आराधना इन्हीं बातों में है?
क्योंकि जब दुष्ट लोग परमेश्वर का आदर करना चाहते हैं, तो यद्यपि वे अपनी मूर्खतापूर्ण कल्पनाओं से सौ हज़ार बार खींचकर अलग किए जाते हैं, वे सदा उन्हीं की ओर लौट जाते हैं। उन्हें यह मनवाना सर्वथा असम्भव है कि परमेश्वर को आत्मिक आराधना के सिवा कोई आराधना भाती नहीं। क्या हम ऐसी बुद्धि की प्रशंसा कर सकते हैं जो न स्वयं सत्य को समझ सकती है और न खरी चेतावनियों को सुन सकती है? फिर भी इस विषय में मानवीय बुद्धि का आचरण ठीक ऐसा ही रहा है। इसलिए हम देखते हैं कि वह सर्वथा मन्द और निर्बुद्धि है।
दूसरी पटिया की आज्ञाओं के विषय में मनुष्य की समझ कुछ अधिक है, क्योंकि वे मानवीय और नागरिक जीवन से अधिक निकटता से सम्बन्ध रखती हैं। फिर भी यहाँ भी कभी-कभी उसकी समझ चूक जाती है।
सर्वोत्तम मानवीय बुद्धियों को यह बेतुका लगता है कि किसी अत्यन्त कठोर शासक को सहा जाए जबकि उस अधिकार का किसी भी उपाय से सामना किया जा सकता है। मानवीय विवेक केवल यही निर्णय कर सकता है कि ऐसे शासन को धीरज से सहना कायर और टूटे हुए मन का चिह्न है, जबकि उसका सामना करना आदरणीय और पुरुषोचित है। परन्तु प्रभु हृदय के इस अत्यधिक अभिमान को दोषी ठहराता है और अपने लोगों को वह धीरज रखने की आज्ञा देता है जिसकी मनुष्य निन्दा और तिरस्कार करते हैं।
इसके अतिरिक्त, परमेश्वर की व्यवस्था के इस विषय में हमारी बुद्धि इतनी अन्धी है कि वह अपनी ही पापमय अभिलाषा की बुराई को नहीं पहचान पाती। क्योंकि स्वाभाविक मनुष्य को अपना भीतरी रोग स्वीकार करने तक नहीं लाया जा सकता, और प्रकृति की ज्योति उस गहरे गड्ढे के द्वार तक पहुँचने से पहले ही बुझ जाती है।
जब दार्शनिक हमारे हृदयों की अनियन्त्रित गतिविधियों की बात करते हैं, तो उनका तात्पर्य उन गतिविधियों से होता है जो दिखाई देनेवाले चिह्नों से प्रकट होती हैं। परन्तु जो बुरी अभिलाषाएँ हृदय में गुप्त रूप से उठती हैं उन्हें वे कुछ नहीं गिनते।
इसलिए जैसे ऊपर प्लेटो को हर पाप को अज्ञानता का परिणाम ठहराने के लिए उचित रूप से डाँटा गया, वैसे ही हमें उन लोगों की राय को भी ठुकराना चाहिए जो सोचते हैं कि हर पाप में पूर्णतः सोची-समझी दुष्टता होती है। क्योंकि हम स्वयं जितना चाहिए उससे अधिक बार अनुभव करते हैं कि जिसे हम भली मंशा समझते हैं, उसके रहते भी हम कितनी बार भटक जाते हैं।
हमारा विवेक और बुद्धि इतने प्रकार की अज्ञानता में लिपटे हैं, इतनी भूलों के अधीन हैं, इतनी बाधाओं से रुके हैं, और इतनी बार उलझन में पड़ जाते हैं कि वे हमें निश्चितता से चलाने से बहुत दूर हैं।
सन्त पौलुस दर्शाता है कि हमारे सारे जीवन में हमारा मार्गदर्शन करने के लिए हमारी बुद्धि कितनी निर्बल है, जब वह कहता है:
"हम अपने आप से किसी बात का विचार करने के योग्य नहीं।"
वह केवल इच्छा या भावना की बात नहीं कर रहा। वह हमसे यह क्षमता भी छीन लेता है कि हम स्वयं यह सोच सकें कि क्या करना भला है।
कोई पूछेगा, "क्या हमारा सारा कौशल, बुद्धि, ज्ञान और सावधानी से किया गया विचार इतना भ्रष्ट हो गया है कि हम परमेश्वर के सम्मुख किसी भली बात के विषय में सोच या मनन तक नहीं कर सकते?" मैं मानता हूँ कि यह हमें बहुत कठोर जान पड़ता है, क्योंकि विवेक और बुद्धि से, जिन्हें हम अपनी प्रमुख उत्कृष्टता मानते हैं, वंचित किया जाना हमें बहुत अखरता है।
फिर भी यह पवित्र आत्मा को सर्वथा न्यायसंगत जान पड़ता है, जो जानता है कि संसार के सब विचार व्यर्थ हैं और स्पष्ट घोषित करता है कि मानवीय हृदय जो कुछ भी रचने में समर्थ है वह बुरा है। यदि हमारी बुद्धि जो कुछ सोचती, विचारती, परामर्श करती और योजना बनाती है वह सदा बुरा ही है, तो हमें परमेश्वर को भानेवाली किसी बात पर विचार करना कैसे सूझ सकता है, जिसे धार्मिकता और पवित्रता के सिवा कुछ स्वीकार्य नहीं?
इस प्रकार हम देख सकते हैं कि हमारी बुद्धि का विवेक, जिस ओर भी मुड़े, सर्वथा व्यर्थता के अधीन है। दाऊद ने यह अपने में पहचाना जब उसने प्रार्थना की कि परमेश्वर उसे समझ दे ताकि वह उसकी आज्ञाओं को ठीक से सीखे। क्योंकि जो मनुष्य नई समझ चाहता है वह संकेत करता है कि उसकी अपनी समझ अपर्याप्त है।
सन्त अगस्तीन ने परमेश्वर की बातों को समझने में हमारे विवेक की इस असमर्थता को इतने स्पष्ट रूप से पहचाना कि उसने स्वीकार किया कि पवित्र आत्मा का अनुग्रह और प्रकाशन हमारी समझ के लिए उतना ही आवश्यक है जितना सूर्य का प्रकाश हमारी आँखों के लिए। वरन् इतने से सन्तुष्ट न होकर वह जोड़ता है कि यद्यपि हम प्रकाश ग्रहण करने के लिए अपनी शारीरिक आँखें खोलते हैं, हमारी समझ की आँखें तब तक बन्द रहती हैं जब तक हमारा प्रभु स्वयं उन्हें न खोले।
अब हमें इच्छा की जाँच करनी है, जिसमें स्वतंत्रता—यदि मनुष्य में कुछ शेष है—उचित रूप से निवास करती है। क्योंकि हम देख चुके हैं कि चुनाव समझ से अधिक इच्छा का विषय है।
पहले, ऐसा न हो कि दार्शनिकों की यह सामान्य उक्ति—कि सब वस्तुएँ स्वभाव से भलाई चाहती हैं—यह सिद्ध करती जान पड़े कि मानवीय इच्छा में कुछ खराई शेष है, हमें यह ध्यान देना चाहिए कि स्वतंत्र इच्छा की सामर्थ्य को ऐसी लालसा में नहीं खोजना चाहिए जो विचारपूर्ण निर्णय से अधिक स्वाभाविक झुकाव से उपजती है।
विद्वत्तावादी धर्मविज्ञानी भी स्वीकार करते हैं कि स्वतंत्र इच्छा का प्रयोग वहीं होता है जहाँ विवेक दोनों विकल्पों पर विचार करता है। इससे उनका तात्पर्य है कि इच्छा की वस्तु ऐसी होनी चाहिए जो चुनाव के अधीन हो और चुनाव सम्भव बनाने के लिए पहले विचार-विमर्श होना चाहिए।
वस्तुतः, यदि हम मनुष्य में भलाई की इस स्वाभाविक अभिलाषा के स्वरूप पर विचार करें, तो पाएँगे कि वह इसे पशुओं के साथ साझा करता है। क्योंकि वे सब उसे चाहते हैं जो उनके लिए लाभदायक है, और जब भलाई का रूप धारण किए हुए कोई वस्तु उनकी इन्द्रियों के सामने आती है, तो वे उसके पीछे चल पड़ते हैं।
परन्तु इस स्वाभाविक लालसा में मनुष्य अपनी अमर प्रकृति की उत्कृष्टता के अनुसार विवेकपूर्वक यह नहीं परखता कि उसे क्या खोजना चाहिए। न वह सच्ची बुद्धि से उस पर विचार करता है। वरन् वह बिना विवेक या विचार के पशु की भाँति अपने स्वभाव की प्रेरणा के पीछे चलता है।
इसलिए केवल यह तथ्य कि मनुष्य स्वाभाविक सहज-प्रवृत्ति से भलाई चाहने को प्रेरित होता है, स्वतंत्र इच्छा से कोई सम्बन्ध नहीं रखता। क्योंकि स्वतंत्र इच्छा के लिए आवश्यक होगा कि वह सही विवेक से भलाई को परखे, उसे पहचानने के पश्चात् उसे चुने, और चुनने के पश्चात् उसका अनुसरण करे।
हर कठिनाई दूर करने के लिए हमें दो बातों पर ध्यान देना होगा जिनमें इस विषय में लोग धोखा खाते हैं। पहली, इस सामान्य कथन में कि सब वस्तुएँ भलाई चाहती हैं, शब्द चाहना का अर्थ इच्छा की उचित गति नहीं, वरन् स्वाभाविक झुकाव है। दूसरी, शब्द भलाई का अर्थ धार्मिकता और सद्गुण नहीं, वरन् यह है कि हर प्राणी अपनी प्रकृति के अनुसार अपना ही कल्याण चाहता है।
चूँकि यह स्वाभाविक लालसा यह सिद्ध करने में कोई महत्त्व नहीं रखती कि मनुष्य को स्वतंत्रता प्राप्त है—ठीक वैसे ही जैसे सब निर्जीव प्राणियों का अपनी प्रकृति की पूर्णता को पाने की ओर झुकाव यह प्रमाणित नहीं करता कि उन्हें स्वतंत्रता है—इसलिए अब हमें विचार करना है कि क्या मनुष्य की इच्छा इतनी पूर्ण रूप से भ्रष्ट और बिगड़ चुकी है कि वह बुराई के सिवा कुछ उत्पन्न नहीं कर सकती, या उसमें कोई स्वस्थ अंश बचा है जिससे भली अभिलाषाएँ उपज सकें।
जो लोग भलाई की इच्छा करने की हमारी सामर्थ्य को परमेश्वर के प्रथम अनुग्रह का फल बताते हैं, वे अपनी भाषा से यह संकेत देते जान पड़ते हैं कि आत्मा में भलाई की ओर स्वेच्छा से लालायित होने की कोई क्षमता है, परन्तु यह क्षमता इतनी निर्बल है कि वह दृढ़ भावना तक नहीं पहुँच सकती जो मनुष्य को प्रयत्न करने को प्रेरित कर सके।
इसमें कोई सन्देह नहीं कि विद्वत्तावादियों ने सामान्यतः यह मत वैसा ही अपनाया जैसा उन्हें ओरिजन और कुछ प्राचीन लेखकों से मिला था। क्योंकि जब वे मनुष्य को उसकी केवल स्वाभाविक दशा में देखते हैं, तो उसका वर्णन रोमियों के सातवें अध्याय में सन्त पौलुस के शब्दों के अनुसार करते हैं:
"जो भला मैं चाहता हूँ वह नहीं करता, परन्तु जो बुराई नहीं चाहता वही करता हूँ। इच्छा तो मुझ में है, परन्तु उसे पूरा करना नहीं।"
इस प्रकार वे सन्त पौलुस के उस खण्ड में चलाए गए तर्क को पूरी तरह बिगाड़ देते हैं। क्योंकि वह मसीही संघर्ष की चर्चा कर रहा है, जिसे वह गलातियों में अधिक संक्षेप में छूता है: विश्वासी अपने भीतर निरन्तर आत्मा और शरीर के बीच संघर्ष का अनुभव करते हैं।
उनके पास आत्मा स्वभाव से नहीं, वरन् नया जन्म पाने के द्वारा है। कि पौलुस नया जन्म पाए हुओं की बात कर रहा है, इससे प्रकट है कि यह कहने के बाद कि उसमें कोई भलाई वास नहीं करती, वह व्याख्या के रूप में जोड़ता है कि उसका अर्थ उसके शरीर में है। इसलिए वह इनकार करता है कि बुराई करनेवाला वास्तव में वही है, वरन् कहता है कि यह वह पाप है जो उसमें बसा हुआ है।
शब्द मुझ में—अर्थात् मेरे शरीर में—से उसका क्या अर्थ है? मानो उसने कहा, "मुझ में, मेरी ओर से, कोई भलाई वास नहीं करती, क्योंकि मेरे शरीर में कोई भलाई नहीं पाई जा सकती।"
इसी से उसके अपने आपको निर्दोष ठहराने की रीति निकलती है:
"अब उसे करनेवाला मैं नहीं, वरन् पाप है जो मुझ में बसा हुआ है।"
ऐसी व्याख्या केवल विश्वासियों पर लागू होती है, जो अपनी आत्मा के प्रमुख अंश से भलाई के लिए यत्न करते हैं।
इसके अतिरिक्त, आगे आनेवाला निष्कर्ष इसे पूर्ण स्पष्टता से प्रमाणित करता है:
"मैं भीतरी मनुष्यत्व से तो परमेश्वर की व्यवस्था से प्रसन्न रहता हूँ, परन्तु मुझे अपने अंगों में दूसरे प्रकार की व्यवस्था दिखाई पड़ती है जो मेरी बुद्धि की व्यवस्था से लड़ती है।"
ऐसा संघर्ष अपने भीतर किसके पास हो सकता है, सिवाय उस मनुष्य के जो परमेश्वर के आत्मा से नया जन्म पा चुका है और फिर भी अपने शरीर के अवशेष लिए फिरता है? इसलिए सन्त अगस्तीन ने, एक समय इस खण्ड की व्याख्या मनुष्य की स्वाभाविक दशा के विषय में की थी, पर बाद में उस व्याख्या को झूठी और अनुपयुक्त मानकर वापस ले लिया।
वस्तुतः, यदि हम मान लें कि परमेश्वर के अनुग्रह के बिना भी मनुष्य में भलाई की ओर ज़रा-सी भी गति है, तो हम उस प्रेरित को क्या उत्तर देंगे जो इनकार करता है कि हम किसी भली बात का विचार तक करने के योग्य हैं? हम उस प्रभु को क्या उत्तर देंगे जो मूसा के द्वारा घोषित करता है कि मानवीय हृदय जो कुछ रचता है वह सर्वथा बिगड़ा हुआ है?
इसलिए, चूँकि वे एक खण्ड को गलत समझने से भटक गए हैं, हमें उनकी धारणा में रुके नहीं रहना चाहिए। वरन् हमें वह ग्रहण करना चाहिए जो मसीह कहता है:
"जो कोई पाप करता है वह पाप का दास है।"
—यूहन्ना 8
अब हम सब स्वभाव से पापी हैं। इसलिए यह निष्कर्ष निकलता है कि हम सब पाप के जूए के अधीन हैं। इसके अतिरिक्त, यदि सारा मनुष्य पाप की दासता में बँधा है, तो उसकी इच्छा—जो उसका प्रमुख अंश है—अवश्य ही सबसे सुदृढ़ ज़ंजीरों में जकड़ी और घिरी होगी।
तो भी मनुष्य को उसके स्वभाव के किसी भी अंश में उस समय से बेहतर नहीं समझा जा सकता जब हम उसे वे वर्णन दें जिनसे पवित्रशास्त्र उसे सुशोभित करता है। यदि प्रभु के इन शब्दों से कि "जो शरीर से जन्मा है वह शरीर है" सारा मनुष्य वर्णित होता है, जैसा सहज ही प्रमाणित किया जा सकता है, तो यह प्रकट है कि वह एक अभागा प्राणी है।
—यूहन्ना 3
क्योंकि शरीर पर मन लगाना, जैसा प्रेरित साक्षी देता है, मृत्यु है, क्योंकि वह परमेश्वर से बैर रखना है, न तो परमेश्वर की व्यवस्था के अधीन है और न हो सकता है।
यदि शरीर इतना बिगड़ा हुआ है कि अपनी हर भावना में वह परमेश्वर से बैर करता है; यदि वह ईश्वरीय धार्मिकता से मेल नहीं खा सकता; संक्षेप में, यदि वह मृत्यु की सामग्री के सिवा कुछ उत्पन्न नहीं कर सकता—तो यह मानते हुए कि मनुष्य के स्वभाव में शरीर के सिवा कुछ नहीं, हम उसमें से भलाई की एक बूँद भी कैसे निकाल सकते हैं?
परन्तु कोई कहेगा कि शब्द शरीर केवल मनुष्य के इन्द्रियसुखी अंश को सूचित करता है, आत्मा के उच्चतर अंश को नहीं। मैं उत्तर देता हूँ कि मसीह और प्रेरित के शब्दों से इसका खण्डन सहज ही हो जाता है।
प्रभु का तर्क यह है कि मनुष्य को नया जन्म लेना अवश्य है क्योंकि वह शरीर है। उसका तात्पर्य यह नहीं कि मनुष्य को केवल अपने देह के अनुसार नया जन्म लेना है। अब आत्मा के विषय में यह नहीं कहा जा सकता कि उसने नया जन्म पाया यदि वह केवल किसी अंश में सुधारी गई हो, वरन् तभी जब वह पूर्णतः नई की गई हो।
इसकी पुष्टि वहाँ और सन्त पौलुस में किए गए विरोधाभास से होती है। क्योंकि आत्मा शरीर के ऐसा विरोध में है कि बीच का कुछ नहीं रह जाता। इसलिए इस भेद के अनुसार मनुष्य में जो कुछ आत्मिक नहीं वह शारीरिक है। फिर भी इस आत्मा की एक बूँद भी हमारे पास नया जन्म पाए बिना नहीं। इसलिए जो कुछ हमारे पास स्वभाव से है, वह शरीर है।
मनुष्य की व्यर्थता के विषय में दाऊद और सब भविष्यद्वक्ताओं ने जो कुछ कहा है, उसे मैं एक-एक करके नहीं गिनाऊँगा। परन्तु भजन संहिता में यह एक गम्भीर घोषणा है कि यदि मनुष्य को व्यर्थता के साथ तौला जाए तो वह व्यर्थता से भी अधिक व्यर्थ पाया जाएगा।
यह मनुष्य की बुद्धि पर कठोर दण्डाज्ञा है कि उससे निकले सब विचारों का उपहास मूर्ख, निस्सार, पागल और बिगड़े हुए कहकर किया जाता है। हृदय पर दण्डाज्ञा भी कम कठोर नहीं जब वह सब वस्तुओं से अधिक कपटी और बिगड़ा हुआ घोषित किया जाता है। —यिर्मयाह 17
परन्तु क्योंकि मैं संक्षिप्त होने का यत्न कर रहा हूँ, मैं एक ऐसे खण्ड से सन्तोष करूँगा जो पूर्ण स्पष्ट दर्पण का काम देगा, जिसमें हम अपने स्वभाव की सारी छवि देख सकते हैं। क्योंकि जब प्रेरित मानव जाति के अभिमान को गिराना चाहता है, तब वह ये गवाहियाँ प्रयोग करता है:
"कोई धर्मी नहीं, एक भी नहीं; कोई समझदार नहीं; कोई परमेश्वर को खोजनेवाला नहीं। सब भटक गए हैं, सब के सब निकम्मे बन गए हैं; कोई भलाई करनेवाला नहीं, एक भी नहीं। उनका गला खुली कब्र है; वे अपनी जीभों से छल करते हैं; उनके होंठों के नीचे नागों का विष है; उनका मुँह श्राप और कड़वाहट से भरा है; उनके पाँव लहू बहाने को फुर्तीले हैं; उनके मार्गों में विनाश और क्लेश है; और उनकी आँखों के सामने परमेश्वर का भय नहीं।"
इन कठोर शब्दों से वह किन्हीं विशेष मनुष्यों पर नहीं गरजता, वरन् आदम की सारी सन्तान पर। न ही वह केवल किसी एक युग के बिगड़े आचरण को डाँटता है; वह हमारे स्वभाव की स्थायी भ्रष्टता पर दोष लगाता है।
क्योंकि उस खण्ड में उसका अभिप्राय केवल मनुष्यों को इसलिए डाँटना नहीं कि वे अपने चाल-चलन को सुधारें। वरन् यह सिखाना है कि उनमें से हर एक, पहले से अन्तिम तक, ऐसी विपत्ति में लिपटा हुआ है कि परमेश्वर की दया से छुड़ाए बिना कोई बच नहीं सकता।
चूँकि यह तब तक सिद्ध नहीं हो सकता था जब तक यह प्रकट न हो कि हमारा स्वभाव इस विनाश में गिर गया है, इसलिए वह ये गवाहियाँ देता है जिनमें हमारा स्वभाव खोए हुए से भी बढ़कर दिखाया गया है।
इसलिए यह बात निश्चित मान ली जाए: मनुष्य जैसे सन्त पौलुस उनका वर्णन करता है, केवल बिगड़ी रीति के कारण नहीं, वरन् स्वाभाविक विकृति के कारण भी वैसे हैं। नहीं तो उसका तर्क टिक नहीं सकता। उसका उद्देश्य यह प्रमाणित करना है कि परमेश्वर की दया के सिवा हमारे पास कोई उद्धार नहीं, क्योंकि हर मनुष्य अपने आप में खोया हुआ और नष्ट है।
मुझे यहाँ यह समझाने की चिन्ता नहीं कि प्रत्येक गवाही सन्त पौलुस के तर्क में कैसे बैठती है, क्योंकि मैं इन घोषणाओं को ऐसे ग्रहण करता हूँ मानो पौलुस ने ही इन्हें पहले कहा हो, न कि भविष्यद्वक्ताओं से उद्धृत किया हो।
पहले, वह मनुष्य से धार्मिकता—अर्थात् खराई और पवित्रता—छीन लेता है। फिर वह उससे समझ छीनता है, जिसका प्रमाण आगे आता है: सब मनुष्य परमेश्वर से फिर गए हैं, यद्यपि परमेश्वर को खोजना बुद्धि का पहला कदम है।
इसके बाद अविश्वास के फल आते हैं: सब भटक गए और मानो बिगड़ गए हैं, यहाँ तक कि उनमें से एक भी भलाई नहीं करता। तब वह वे सब दुष्टताएँ गिनाता है जिनसे वे लोग, जिन्होंने अपने आपको अधर्म के हवाले कर दिया है, अपने देह के हर अंग को अशुद्ध करते हैं।
अन्त में, वह साक्षी देता है कि सब मनुष्य परमेश्वर के भय से रहित हैं, जिसके नियम से हमें अपने सब मार्गों को चलाना चाहिए। यदि मानव जाति की पैतृक सम्पत्ति यही है, तो हमारे स्वभाव में कोई भलाई खोजना व्यर्थ है।
मैं मानता हूँ कि ये सब दुष्टताएँ हर व्यक्ति में बाहर से प्रकट नहीं होतीं। तो भी कोई इनकार नहीं कर सकता कि हर एक उनका बीज अपने भीतर बन्द रखता है। क्योंकि जैसे वह देह जिसमें रोग का कारण और सामग्री भीतर ही हो, स्वस्थ न कहलाएगा, भले ही रोग अभी प्रकट न हुआ हो और कोई पीड़ा न हो, वैसे ही आत्मा भी स्वस्थ नहीं मानी जा सकती जबकि उसके भीतर ऐसी अशुद्धियाँ हों।
फिर भी यह तुलना पूर्ण रूप से उपयुक्त नहीं। क्योंकि देह कितना भी रोगी हो, उसमें जीवन की शक्ति फिर भी बनी रहती है। परन्तु आत्मा, अधर्म के इस गड्ढे में डूबी हुई, केवल रोगी नहीं है; वह हर भलाई से रिक्त भी है।
यहाँ एक प्रश्न उठता है जो ऊपर सुलझाए गए प्रश्न से लगभग मिलता-जुलता है। क्योंकि हर युग में कुछ ऐसे रहे हैं जिन्होंने, प्रकृति के मार्गदर्शन में, जीवन भर सद्गुण की अभिलाषा की। यद्यपि उनके आचरण में बहुत कुछ दोष निकाला जा सकता है, फिर भी उन्होंने आदरणीय जीवन के प्रति अपनी निष्ठा से दिखाया कि उनके स्वभाव में कुछ पवित्रता बची हुई है।
यद्यपि हम कर्मों के पुण्य के विषय में चर्चा करते समय अधिक पूर्णता से समझाएँगे कि ऐसे सद्गुणों का परमेश्वर के सम्मुख क्या मूल्य है, तथापि यहाँ हमें वह सब कहना होगा जो इस समय के विषय के लिए आवश्यक है।
ये उदाहरण हमें यह चेतावनी देते जान पड़ सकते हैं कि हम मनुष्य के स्वभाव को सर्वथा भ्रष्ट न मानें, क्योंकि उसके झुकाव से कुछ मनुष्यों ने न केवल अनेक उत्तम काम किए, वरन् अपने सारे जीवन-काल में आदरपूर्वक आचरण किया।
परन्तु हमें स्मरण रखना चाहिए कि जिस सार्वभौमिक भ्रष्टता की हमने चर्चा की है, उसके बीच भी परमेश्वर के अनुग्रह का कुछ स्थान है—स्वभाव की विकृति को सुधारने के लिए नहीं, वरन् उसे दबाने और भीतर से रोके रखने के लिए। क्योंकि यदि परमेश्वर सब मनुष्यों को लगाम पूरी तरह ढीली करके अपनी अभिलाषाओं के पीछे चलने देता, तो कोई ऐसा न होता जो अनुभव से यह प्रमाणित न कर देता कि वे सब दोष, जिनके लिए सन्त पौलुस मानव स्वभाव को दोषी ठहराता है, उसमें विद्यमान थे।
क्योंकि कौन अपने आपको मनुष्य जाति की गिनती से अलग कर सकता है? फिर भी किसी को यह तभी करना पड़ेगा यदि वह उससे अपने आपको मुक्त रखना चाहे जो सन्त पौलुस सबके विषय में कहता है: कि उनके पाँव लहू बहाने को फुर्तीले हैं; उनके हाथ लूट और हत्या से अशुद्ध हैं; उनके गले खुली कब्रों के समान हैं; उनकी जीभें छल करती हैं; उनके होंठ विषैले हैं; उनके काम निकम्मे, अधर्मी, भ्रष्ट और घातक हैं; उनके हृदय परमेश्वर से रहित हैं और द्वेष के सिवा कुछ नहीं रखते; उनकी आँखें घात लगाने पर टिकी हैं; उनके मन अत्याचार करने को उठे हुए हैं; और संक्षेप में, उनका हर अंग बुराई करने को तैयार है।
यदि हर आत्मा इन सब भयानक दोषों के अधीन है, जैसा प्रेरित निर्भीकता से घोषित करता है, तो हम देख सकते हैं कि क्या होता यदि प्रभु मानवीय अभिलाषा को उसके झुकाव के अनुसार भटकने देता। कोई पागल पशु इतने वेग से नहीं बहता, और कोई नदी इतनी उग्र और तेज़ नहीं कि उसकी बाढ़ ऐसे आवेग से फूट पड़े।
अपने चुने हुओं में प्रभु इन रोगों को उस रीति से चंगा करता है जिसे हम आगे समझाएँगे। निकम्मों में वह उन्हें केवल मानो लगाम से रोके रखता है, ताकि वे उस सीमा के पार न फूट पड़ें जिसे वह सारे संसार की रक्षा के लिए उपयुक्त जानता है।
इसी से ऐसा होता है कि कुछ लोग लज्जा से और कुछ कानूनों के भय से अनेक दुष्ट कामों में अपने आपको सौंपने से रुके रहते हैं, यद्यपि वे अपनी बुरी अभिलाषाओं को पूर्णतः नहीं छिपाते। दूसरे, यह सोचकर कि आदरणीय जीवन-शैली उन्हें लाभ पहुँचाएगी, किसी प्रकार उसकी अभिलाषा करते हैं। फिर भी कुछ और आगे बढ़कर विशेष उत्कृष्टता दिखाते हैं ताकि प्रताप के दिखावे से वे साधारण लोगों को अपने अधीन बनाए रखें।
इस प्रकार प्रभु अपने विधान से हमारे स्वभाव की विकृति को रोके रखता है, परन्तु उसे शुद्ध नहीं करता।
कोई कह सकता है कि यह प्रश्न को सुलझाने के लिए पर्याप्त नहीं। क्योंकि या तो हमें कैटलाइन को कैमिलस के बराबर मानना होगा, या कैमिलस में हमारे पास इस बात का उदाहरण होगा कि स्वभाव, उचित रूप से मार्गदर्शित होने पर, भलाई से सर्वथा रिक्त नहीं है।
मैं मानता हूँ कि कैमिलस में पाए गए सद्गुण परमेश्वर के वरदान थे और स्वयं में विचार करने पर वे प्रशंसनीय माने जा सकते हैं। परन्तु वे यह कैसे प्रमाणित करेंगे कि उसमें स्वाभाविक खराई थी? क्या हमें हृदय की ओर लौटकर इस प्रकार तर्क नहीं करना चाहिए: यदि स्वाभाविक मनुष्य के हृदय में ऐसी खराई थी, तो मानव स्वभाव में भलाई की अभिलाषा करने की कुछ क्षमता है?
परन्तु यदि उसका हृदय बिगड़ा और टेढ़ा था और खराई के सिवा सब कुछ खोजता था तो? यदि हम मान लें कि वह स्वाभाविक मनुष्य था, तो इसमें कोई सन्देह नहीं कि उसका हृदय ऐसा ही था।
तब हम मानव स्वभाव को भलाई में लगने की कौन-सी सामर्थ्य का श्रेय दें, यदि उसमें पाई जानेवाली सबसे बड़ी खराई के दिखावे में भी हम देखते हैं कि वह सदा भ्रष्टता की ओर ही झुकता है?
जैसे हम उस मनुष्य को सद्गुणी कहकर नहीं सराहेंगे जिसके पास सद्गुणों के रूप में छिपे दोषों के सिवा कुछ नहीं, वैसे ही हम मानवीय इच्छा को भलाई चाहने की सामर्थ्य का श्रेय नहीं देंगे जबकि वह अपनी विकृति में जमी हुई है।
तो भी सबसे निश्चित और सरल उत्तर यह है: ऐसे सद्गुण मानव स्वभाव की सामान्य सम्पत्ति नहीं, वरन् प्रभु के विशेष अनुग्रह हैं, जिन्हें वह दुष्टों को भी जिस रीति और मात्रा में चाहे बाँटता है।
इसी कारण, अपनी साधारण बोलचाल में, हम बिना झिझक कहते हैं कि एक व्यक्ति अच्छे कुल का है और दूसरा बुरे कुल का, या एक का स्वभाव अच्छा है और दूसरे का बुरा। फिर भी हम दोनों को मानवीय भ्रष्टता की सार्वभौमिक दशा के अन्तर्गत गिनना नहीं छोड़ते। हमारा तात्पर्य केवल यह है कि परमेश्वर ने एक को एक विशेष अनुग्रह दिया है जो उसने दूसरे को नहीं दिया।
इसलिए इच्छा, पाप की दासता के अधीन बँधी और बन्दी होकर, किसी भी प्रकार अपने आप को भलाई की ओर नहीं चला सकती, उसमें लगना तो दूर की बात है। क्योंकि ऐसी गति परमेश्वर की ओर हमारे मन-फिराव का आरम्भ है, जिसे पवित्रशास्त्र पूर्णतः पवित्र आत्मा के अनुग्रह का कार्य बताता है।
इसी प्रकार यिर्मयाह प्रार्थना करता है कि यदि प्रभु चाहता है कि वह फिरे तो उसे फेर दे। इसी कारण, जब भविष्यद्वक्ता उस अध्याय में विश्वासियों के आत्मिक छुटकारे का वर्णन करता है, तो वह कहता है कि वे अपने से अधिक बलवन्त के हाथ से छुड़ाए गए हैं। इससे वह संकेत करता है कि पापी कितनी कसकर बँधा है जब, परमेश्वर से त्यागा जाकर, वह शैतान के जूए के नीचे रहता है।
तो भी इच्छा मनुष्य में सदा बनी रहती है, और अपने झुकाव से वह पाप की ओर मुड़ी रहती है। क्योंकि जब मनुष्य इस अनिवार्यता में गिरा, तो उससे उसकी इच्छा नहीं छीनी गई, वरन् एक स्वस्थ इच्छा छीनी गई।
इसलिए सन्त बर्नार्ड ठीक कहता है कि इच्छा करना हर मनुष्य में पाया जाता है, परन्तु भलाई की इच्छा करना सुधार का फल है, जबकि बुराई की इच्छा करना हमारे दोष का फल है। इस प्रकार केवल इच्छा करना मनुष्य का है; बुराई की इच्छा करना भ्रष्ट स्वभाव का है; और भलाई की इच्छा करना अनुग्रह का है।
अब जब मैं कहता हूँ कि इच्छा स्वतंत्रता से वंचित है और अनिवार्य रूप से बुराई की ओर खिंची जाती है, तो यह आश्चर्य की बात है कि किसी को यह कहने की रीति अटपटी लगे, क्योंकि इसमें कोई बेतुकापन नहीं है और प्राचीन आचार्यों ने इसे सामान्यतः प्रयोग किया था।
कुछ लोग इसलिए ठोकर खाते हैं कि वे अनिवार्यता और बलात्कार में भेद नहीं कर पाते। परन्तु यदि कोई उनसे पूछे कि क्या परमेश्वर अनिवार्य रूप से भला नहीं है और क्या शैतान अनिवार्य रूप से बुरा नहीं है, तो वे क्या उत्तर देंगे?
यह निश्चित है कि परमेश्वर की भलाई उसके ईश्वरत्व से ऐसी अविभाज्य रूप से जुड़ी है कि उसके लिए भला होना उतना ही अनिवार्य है जितना परमेश्वर होना। और शैतान ने अपने पतन से अपने आपको भलाई की हर सहभागिता से ऐसा पराया कर लिया है कि वह बुराई के सिवा कुछ नहीं कर सकता।
अब यदि कोई निन्दक बड़बड़ाए कि परमेश्वर अपनी भलाई के लिए थोड़ी ही प्रशंसा के योग्य है क्योंकि वह अनिवार्य रूप से भला है, तो क्या उत्तर सरल न होगा? अपनी अनन्त भलाई के कारण—और किसी हिंसक बलात्कार के कारण नहीं—वह बुराई नहीं कर सकता।
इसलिए, यदि परमेश्वर का अनिवार्य रूप से भलाई करना उसकी इच्छा को भलाई करने में स्वतंत्र होने से नहीं रोकता, और यदि शैतान बुराई के सिवा कुछ न कर सकने पर भी स्वेच्छा से पाप करता है, तो कौन यह तर्क करेगा कि मनुष्य में पाप स्वैच्छिक नहीं केवल इसलिए कि मनुष्य पाप करने की अनिवार्यता के अधीन है?
यद्यपि सन्त अगस्तीन सर्वत्र इस अनिवार्यता की शिक्षा देता है, तथापि जब सेलेस्टियस ने इस शिक्षा को घृणित बनाने के लिए उस पर निन्दा की, तब भी उसने इसकी पुष्टि करना नहीं छोड़ा। वह इन शब्दों का प्रयोग करता है:
"मनुष्य की स्वतंत्रता के द्वारा वह पाप में गिरा; अब उसके पश्चात् आई भ्रष्टता ने स्वतंत्रता को अनिवार्यता में बदल दिया है।"
इसलिए हमें इस भेद को ध्यान से देखना चाहिए: जब मनुष्य अपने पतन से भ्रष्ट हो गया, तब वह स्वेच्छा से पाप करता है—अपने हृदय के विरुद्ध नहीं और बलात्कार से नहीं। मैं कहता हूँ, वह पूर्णतः स्वेच्छापूर्ण झुकाव से पाप करता है, इसलिए नहीं कि वह बल से हाँका जाता है। वह अपनी ही पापमय अभिलाषा की प्रेरणा से पाप करता है, इसलिए नहीं कि उसे अपने से बाहर की किसी वस्तु ने विवश किया।
फिर भी उसका स्वभाव इतना बिगड़ा हुआ है कि उसे बुराई के सिवा किसी ओर प्रेरित, उकसाया या चलाया नहीं जा सकता। यदि यह सच है, तो प्रकट है कि वह पाप करने की अनिवार्यता के अधीन है।
अब परमेश्वर के अनुग्रह द्वारा दिए गए उपचार की चर्चा करने का समय है, जिससे हमारा भ्रष्ट स्वभाव सुधारा जाता है। क्योंकि चूँकि प्रभु हमारी सहायता को आकर जिस वस्तु की हम में कमी है उसे पूरा करता है, इसलिए जब यह प्रकट हो जाएगा कि हमारे भीतर उसका कार्य क्या है, तब हमारी दीनता की सीमा को समझना भी सरल होगा।
जब प्रेरित फिलिप्पियों से कहता है कि उसे भरोसा है कि जिसने उनमें भला काम आरम्भ किया है वह उसे यीशु मसीह के दिन तक पूरा करेगा, तो इसमें कोई सन्देह नहीं कि इस भले काम के आरम्भ से उसका तात्पर्य उनके मन-फिराव के उद्गम से है—जब उनकी इच्छा परमेश्वर की ओर फिरी।
इसलिए प्रभु हमारे भीतर अपना कार्य हमारे हृदयों में भलाई और धार्मिकता के प्रेम, अभिलाषा और खोज को प्रेरित करके आरम्भ करता है—या, अधिक उचित रूप से कहें, हमारे हृदयों को धार्मिकता की ओर झुकाकर, गढ़कर और चलाकर। वह हमें अन्त तक स्थिर रहने में दृढ़ करके अपना कार्य पूरा करता है।
ताकि कोई यह कहकर बहस न करे कि परमेश्वर हमारे भीतर भलाई केवल हमारी इच्छा की सहायता करके आरम्भ करता है, जो अन्यथा बहुत निर्बल होती, पवित्र आत्मा अन्यत्र घोषित करता है कि अपने आप पर छोड़ी गई हमारी इच्छा का क्या मूल्य है:
"मैं तुम्हें नया मन दूँगा, और तुम्हारे भीतर नई आत्मा उत्पन्न करूँगा; और तुम्हारी देह में से पत्थर का हृदय निकालकर तुम्हें माँस का हृदय दूँगा। मैं अपना आत्मा तुम्हारे भीतर रखूँगा और तुम्हें अपनी आज्ञाओं पर चलाऊँगा।"
अब कौन कह सकता है कि मानवीय इच्छा की निर्बलता केवल इसलिए सुदृढ़ की जाती है कि वह भलाई को चुनने की उत्कट अभिलाषा करे, जबकि हम सुनते हैं कि उसे पूर्णतः सुधारा और नया किया जाना आवश्यक है?
यदि पत्थर इतना लचीला होता कि उसे हाथ में लेकर हम जिस रूप में चाहें मोड़ सकते, तो मैं इनकार नहीं करता कि मानवीय हृदय में परमेश्वर की आज्ञा मानने की कुछ योग्यता और झुकाव है, बशर्ते उसकी निर्बलता को सुदृढ़ किया जाए। परन्तु यदि हमारे प्रभु का इस तुलना से अभिप्राय यह दिखाना था कि हमारे हृदय से कोई भलाई तब तक नहीं निकल सकती जब तक वह सर्वथा भिन्न न बनाया जाए, तो जो प्रशंसा वह केवल अपने लिए ठहराता है उसे हम परमेश्वर और अपने बीच न बाँटें।
इसलिए, यदि जब प्रभु हमें भलाई की ओर फेरता है तब ऐसा होता है मानो पत्थर माँस में बदल दिया गया हो, तो निश्चित है कि हमारी अपनी इच्छा का सब कुछ मिटा दिया जाता है और उसके पश्चात् जो कुछ आता है वह परमेश्वर की ओर से है।
कुछ लोग शायद यह मान लें कि मानवीय इच्छा केवल परमेश्वर की सामर्थ्य से धार्मिकता और खराई की ओर फिरती है और अपने आप उनसे दूर फिरी रहती है, फिर भी यह जताएँ कि एक बार तैयार हो जाने पर वह अपना भाग स्वयं निभाती है।
वे सन्त अगस्तीन का सहारा ले सकते हैं, जो लिखता है कि अनुग्रह हर भले काम से पहले चलता है और भलाई करने में इच्छा अनुग्रह के द्वारा ले जाई जाती है, वह उसे ले नहीं चलती; वह पीछे चलती है, आगे नहीं जाती।
परन्तु मैं भविष्यद्वक्ता के शब्दों में दो बातें समझता हूँ: पहली, कि प्रभु हमारी बिगड़ी इच्छा को सुधारता है—या यों कहें कि उसे मिटा देता है; और फिर यह कि वह अपनी ओर से हमें भली इच्छा देता है।
जहाँ तक हमारी इच्छा से पहले अनुग्रह चलता और उसे तैयार करता है, मैं उसे अनुग्रह की सेविका कहलाने देता हूँ। परन्तु क्योंकि इच्छा, एक बार सुधर जाने पर, स्वयं परमेश्वर का काम है, इसलिए यह मनुष्य के नाम नहीं लगाया जाना चाहिए कि वह अपनी इच्छा से पूर्ववर्ती अनुग्रह के अधीन होता है।
इसलिए सन्त क्राइसोस्टम ने उचित रीति से नहीं कहा जब उसने कहा कि अनुग्रह इच्छा के बिना कुछ नहीं कर सकता, जैसे इच्छा अनुग्रह के बिना कुछ नहीं कर सकती—मानो इच्छा स्वयं अनुग्रह से उत्पन्न और गढ़ी न गई हो।
जहाँ तक सन्त अगस्तीन की बात है, उसका अभिप्राय मानवीय इच्छा को भले कामों की प्रशंसा में कोई भाग देना न था जब उसने उसे अनुग्रह की सेविका कहा। वह केवल पेलेगियस के दुष्ट सिद्धान्त का खण्डन करना चाहता था, जिसने उद्धार का पहला कारण मानवीय पुण्य में रखा।
इसलिए, उस विवाद के लिए जो आवश्यक था उसे सम्बोधित करते हुए, अगस्तीन दर्शाता है कि अनुग्रह हर पुण्य से पहले चलता है, जबकि दूसरे प्रश्न को छोड़ देता है: हमारे भीतर अनुग्रह का निरन्तर प्रभाव क्या है? इसका वह अन्यत्र बहुत अच्छा वर्णन करता है।
क्योंकि जब वह बार-बार कहता है कि प्रभु अनिच्छुक मनुष्य के आगे-आगे चलता है कि वह इच्छा करे, और इच्छुक मनुष्य की सहायता करता है कि वह व्यर्थ इच्छा न करे, तब अगस्तीन परमेश्वर को हर भलाई का पूर्ण रचयिता ठहराता है।
अब जब हम विषय के मुख्य बिन्दु तक पहुँच गए हैं, आइए हम मामले का सार बताएँ और पवित्रशास्त्र की गवाहियों से अपनी स्थिति स्थापित करें। उसके पश्चात्, ताकि कोई हम पर झूठा दोष न लगाए कि हम पवित्रशास्त्र को उलटते हैं, आइए हम दिखाएँ कि जिस सत्य को हम मानते हैं वही इस पवित्र पुरुष ने भी सिखाया।
मैं यह आवश्यक नहीं समझता कि पवित्रशास्त्र की हर वह गवाही एक के बाद एक प्रस्तुत की जाए जो हमारी स्थिति की पुष्टि में दी जा सकती है, बशर्ते हम उन्हें चुन लें जो शेष को समझने का मार्ग खोलती हैं। दूसरी ओर, मैं यह दिखाना उपयोगी समझता हूँ कि मैं इस पवित्र पुरुष से, जिसका कलीसिया उचित रूप से आदर करती है, कितनी पूर्णता से सहमत हूँ।
जब प्रभु अपने लोगों के मन-फिराव में ये दो बातें रखता है—कि वह उनका पत्थर का हृदय निकालेगा और उन्हें माँस का हृदय देगा—तो वह खुले रूप से साक्षी देता है कि जो कुछ हम से उत्पन्न होता है उसे हमें भलाई तक पहुँचाने के लिए मिटा दिया जाना चाहिए, और जो कुछ उसके स्थान पर रखा जाता है वह उसके अनुग्रह से आता है।
और वह यह केवल एक ही खण्ड में नहीं कहता, क्योंकि हम यिर्मयाह में भी पढ़ते हैं:
"मैं उन्हें एक ही मन और एक ही चाल दूँगा, कि वे सदा मेरा भय मानते रहें। तब मैं अपना भय उनके हृदयों में डालूँगा, कि वे मुझ से फिर न जाएँ।" —यिर्मयाह 32
इसी प्रकार, यहेजकेल में:
"मैं उन्हें एक ही मन दूँगा और उनके भीतर नई आत्मा उत्पन्न करूँगा। मैं उनकी देह में से पत्थर का हृदय निकालकर उन्हें माँस का हृदय दूँगा।"
वह हमारी इच्छा में जो कुछ भला और खरा है उसकी प्रशंसा हमसे इससे अधिक पूर्णतः न हटा सकता था और अपने लिए न ठहरा सकता था जितना हमारे मन-फिराव को नई आत्मा और नए हृदय की सृष्टि कहकर।
क्योंकि इससे सदा यह निष्कर्ष निकलता है कि हमारी इच्छा से तब तक कोई भलाई नहीं निकल सकती जब तक वह सुधारी न जाए, और उसके सुधारे जाने के पश्चात् जितना वह भला है उतना परमेश्वर की ओर से है, हमारी ओर से नहीं।
इस प्रकार हम देखते हैं कि सन्तों ने कैसे प्रार्थना की। सुलैमान ने कहा:
"हमारे परमेश्वर यहोवा हमारे हृदयों को अपनी ओर फेरे, कि हम उसका भय मानें और उसकी आज्ञाओं का पालन करें।"
वह यह स्वीकार करके हमारे हृदय के हठीलेपन को दिखाता है कि वह स्वभाव से परमेश्वर और उसकी व्यवस्था के विरुद्ध विद्रोही है, जब तक कि उसे विपरीत दिशा में न मोड़ा जाए।
इसी प्रकार, जब दाऊद प्रभु से माँगता है कि वह उसके भीतर नया हृदय सिरजे और उसके भीतर सीधी आत्मा नए सिरे से डाले, तो क्या वह यह स्वीकार नहीं करता कि उसके हृदय का हर अंश अशुद्धता और मलिनता से भरा है और उसकी आत्मा विकृति में लिपटी है? इसके अतिरिक्त, जिस शुद्धता की वह अभिलाषा करता है उसे परमेश्वर की सृष्टि कहकर वह उसे उत्पन्न करने की सारी सामर्थ्य उसी को देता है।
यह आश्चर्य की बात है कि हमारे अभिमान को दीन करने के लिए परमेश्वर इससे अधिक कठोरता से कुछ नहीं माँगता कि हम उसके विश्राम-दिन का पालन करें—अर्थात् अपने सब कामों से विश्राम लें। फिर भी हमसे इससे अधिक कठिनाई से कुछ नहीं निकलवाया जाता: कि अपने सब कामों को छोड़कर हम उसके कामों को स्थान दें।
यदि यह पागलपन हमें न रोकता, तो प्रभु यीशु ने अपने अनुग्रह की इतनी भरपूर गवाही दी है कि उसकी महिमा धुँधली न हो:
"सच्ची दाखलता मैं हूँ; तुम डालियाँ हो, और मेरा पिता किसान है। जैसे डाली यदि दाखलता में बनी न रहे तो अपने आप से नहीं फल सकती, वैसे ही तुम भी यदि मुझ में बने न रहो तो नहीं फल सकते; क्योंकि मुझ से अलग होकर तुम कुछ भी नहीं कर सकते।"
—यूहन्ना 15
यदि हम अपने आप से उससे अधिक फल नहीं ला सकते जितना दाखलता से टूटी और सारे पोषण से वंचित डाली, तो अब यह पूछने की कोई आवश्यकता नहीं कि हमारा स्वभाव भलाई करने में कितना समर्थ है। न ही निष्कर्ष में कोई अस्पष्टता है: उससे अलग होकर हम कुछ नहीं कर सकते।
वह केवल यह नहीं कहता कि हम इतने निर्बल हैं कि पर्याप्त नहीं कर सकते। हमें सर्वथा शून्य ठहराकर वह हर उस धारणा को निकाल देता है कि हम में ज़रा-सी भी सामर्थ्य है।
यदि, मसीह में कलम होकर, हम उस दाखलता की डाली के समान फल लाते हैं जो पृथ्वी की नमी, आकाश की ओस और सूर्य की गर्मी से अपना बल पाती है, तो मुझे लगता है कि किसी भी भले काम में प्रशंसा का कोई अंश हमारे लिए नहीं बचता यदि हम परमेश्वर का आदर पूरा बनाए रखना चाहते हैं।
इसलिए प्रेरित सारी प्रशंसा परमेश्वर को देता है:
"परमेश्वर ही है जिसने अपनी सुइच्छा निमित्त तुम्हारे मन में इच्छा और काम, दोनों बातों के करने का प्रभाव डाला है।" —फिलिप्पियों 2
भले काम का पहला अंश इच्छा है। दूसरा उसे पूरा करने का यत्न करना और ऐसा करने की सामर्थ्य रखना है। परमेश्वर दोनों का रचयिता है। इसलिए यह निष्कर्ष निकलता है कि यदि मनुष्य अपने नाम कुछ भी लगाता है, चाहे इच्छा करने में या पूरा करने में, तो वह उतना ही परमेश्वर से छीनता है।
यदि केवल यह कहा जाता कि परमेश्वर हमारी निर्बल इच्छा की सहायता करता है, तो हमारे लिए कुछ बचा रहता। परन्तु जब कहा जाता है कि वह इच्छा को उत्पन्न करता है, तब इससे दिखाया जाता है कि उसमें जो कुछ भला है वह हमारे सिवा किसी और से आता है।
