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अध्याय एक: परमेश्वर का ज्ञान (भाग 2/2)
इस प्रकार हम देखते हैं कि अब्राहम ने अनन्त जीवन की उस वाचा को, जो उसे दी गई थी, अपने घराने तक पहुँचाया और यत्न किया कि वह आनेवाली पीढ़ी के लिए सुरक्षित रखी जाए।
उस समय से अब्राहम के वंशज अन्य जातियों से इस भेद के द्वारा अलग पहचाने गए कि परमेश्वर के एक विशेष अनुग्रह से वे वचन की इस सहभागिता में ग्रहण कर लिए गए थे।
फिर जब प्रभु को यह भला लगा कि वह एक ऐसी कलीसिया स्थापित करे जो दूसरों से और भी स्पष्ट रूप से अलग हो, तब उसने उसी वचन को और अधिक गम्भीरता से प्रकाशित किया और चाहा कि वह एक प्रामाणिक दस्तावेज़ के रूप में लिखित रूप में सौंपा जाए।
इसलिए उसी समय से परमेश्वर के वचन की वाणियाँ और प्रकाशन लिखित रूप में अंकित किए जाने लगे। इससे पहले वे विश्वासी लोगों के बीच एक से दूसरे को सौंपे जाते हुए सुरक्षित रखे गए थे।
इस विषय में प्रभु ने एक विशेष विधान के द्वारा आनेवाली पीढ़ियों के कल्याण का ध्यान रखा। क्योंकि यदि हम विचार करें कि मनुष्य की बुद्धि परमेश्वर को भूल जाने की ओर कितनी झुकी हुई है, वह भूल में कितनी सरलता से भटक जाती है, और हर घड़ी नए-नए नकली धर्म गढ़ने में कितनी चंचल है, तो हम भली-भाँति समझ सकते हैं कि स्वर्गीय शिक्षा का लिखित रूप में दिया जाना कितना आवश्यक था, ताकि वह भूल जाने से नष्ट न हो, भ्रम से मिट न जाए, और मनुष्यों के दुस्साहस से बिगाड़ी न जाए।
इसलिए यह प्रकट है कि परमेश्वर ने अपने वचन को उन लोगों के प्रति काम में लिया जिन्हें वह फलदायी रीति से शिक्षा देना चाहता था, क्योंकि उसने देखा कि जगत की रचना पर अंकित उसका स्वरूप और प्रतिमा पर्याप्त नहीं थी। अतः यदि हम उसके सत्य के यथार्थ मनन की सच्ची अभिलाषा रखते हैं, तो हमें इसी मार्ग पर चलना होगा।
मैं कहता हूँ कि हमें उस वचन की ओर लौटना होगा, जिसमें परमेश्वर हमें अत्यन्त स्पष्टता से दिखाया जाता है और अपने कार्यों के द्वारा जीवन्त रूप में चित्रित किया जाता है, बशर्ते उन कार्यों को हमारी बुद्धि की विकृति के अनुसार नहीं, परन्तु अनन्त सत्य के मानदण्ड के अनुसार परखा जाए।
यदि हम उस वचन से मुड़ जाएँ, तो चाहे हम कितनी ही तेज़ दौड़ें, हम कभी लक्ष्य तक नहीं पहुँचेंगे, क्योंकि हम मार्ग से बाहर दौड़ रहे हैं।
क्योंकि हमें यह समझना चाहिए कि परमेश्वर की वह ज्योति, जिसे प्रेरित “अगम्य” कहता है, एक भूलभुलैया के समान है, जिसमें हम अपना मार्ग खो बैठेंगे जब तक कि वचन के निर्देश से हमारी अगुवाई न की जाए। इसलिए इस मार्ग पर लँगड़ाते हुए चलना उसके बाहर तेज़ दौड़ने से कहीं उत्तम है।
अतः दाऊद ने यह बताने के बाद कि आकाशमण्डल परमेश्वर की महिमा का वर्णन कैसे करता है, अन्तरिक्ष उसके हाथों के कामों को कैसे प्रकट करता है, और दिन-रात के सुन्दर क्रम से उसकी महिमा कैसे प्रगट होती है, वह आगे परमेश्वर के वचन की चर्चा करता है:
यहोवा की व्यवस्था खरी है, वह प्राण को फिरा लाती है; यहोवा की साक्षी विश्वासयोग्य है, वह भोले को बुद्धिमान बनाती है; यहोवा के उपदेश सीधे हैं, वे हृदय को आनन्दित करते हैं; यहोवा की आज्ञा निर्मल है, वह आँखों में ज्योति ले आती है।
इससे वह यह संकेत देता है कि सृष्ट वस्तुओं के द्वारा मिलनेवाली शिक्षा सब के लिए सामान्य है, परन्तु वचन के द्वारा मिलनेवाली शिक्षा परमेश्वर की सन्तानों की विशेष पाठशाला है।
जब यह प्रमाणित हो जाए कि हमारे सामने रखा गया वचन परमेश्वर की ओर से है, तब कोई भी मनुष्य इतना घोर दुस्साहसी नहीं हो सकता—जब तक कि वह स्वाभाविक समझ और मानवता से भी सर्वथा रहित न हो—कि उस पर विश्वास करने से इनकार करने का साहस करे।
परन्तु क्योंकि प्रतिदिन स्वर्ग से नई वाणियाँ नहीं उतारी जातीं, और हमारे पास केवल पवित्रशास्त्र ही है, जिसमें परमेश्वर ने अपने सत्य को सदा की स्मृति में सुरक्षित रखना चाहा, इसलिए हमें संक्षेप में समझाना आवश्यक है कि विश्वासियों के बीच पवित्रशास्त्र का वही अधिकार क्यों है जो परमेश्वर की वाणी का तब होता यदि वह उसके अपने मुख से सुनी जाती।
यह विषय निश्चय ही और अधिक विस्तार से कहे जाने और अधिक परिश्रम से विचारे जाने के योग्य है। फिर भी पाठक मुझे क्षमा करें यदि मैं विषय की महत्ता की अपेक्षा इस पुस्तक की योजना जितना अनुमति देती है उसका अधिक ध्यान रखूँ।
बहुत-से लोग इस अत्यन्त घातक भूल में फँसे हैं कि पवित्रशास्त्र का अधिकार उतना ही है जितना कलीसिया की सहमति से उसे दिया जाता है—मानो परमेश्वर का अनन्त और अटल सत्य मनुष्यों की इच्छा पर टिका हो।
पवित्र आत्मा का घोर अनादर करते हुए वे पूछते हैं: कौन हमें प्रमाणित करेगा कि पवित्रशास्त्र परमेश्वर की ओर से आया है? कौन हमें निश्चय दिलाएगा कि वह हमारे समय तक सम्पूर्ण सुरक्षित रहा है? कौन हमें मनवाएगा कि एक पुस्तक आज्ञाकारिता के साथ ग्रहण की जाए और दूसरी ठुकरा दी जाए, जब तक कि कलीसिया इन सब बातों के विषय में कोई निश्चित नियम न दे?
इसलिए वे निष्कर्ष निकालते हैं कि पवित्रशास्त्र के प्रति हमें कितना आदर रखना चाहिए और कौन-सी पुस्तकें उसमें गिनी जानी चाहिए, यह सब कलीसिया के निर्णय पर निर्भर है।
इस प्रकार ये निन्दक, कलीसिया के बहाने एक निरंकुश अत्याचार स्थापित करने की इच्छा रखते हुए, उन असंगतियों की कुछ चिन्ता नहीं करते जिनमें वे स्वयं को और दूसरों को उलझाते हैं, बस इतना हो कि वे भोले लोगों को मना लें कि कलीसिया के लिए सब कुछ उचित है।
परन्तु यदि ऐसा होता, तो उन बेचारे विवेकों का क्या होता जो अनन्त जीवन का निश्चित भरोसा ढूँढ़ रहे हैं, जब वे देखते कि उसकी सारी प्रतिज्ञाएँ केवल मनुष्यों के निर्णय पर ही टिकी और आश्रित हैं? यदि वे ऐसा मत रखते, तो काँपने और डगमगाने से कभी कैसे छूट पाते?
इसके अतिरिक्त, हमारा विश्वास अविश्वासियों के उपहास का कैसा पात्र बन जाता? सारे संसार की दृष्टि में वह कितना संदिग्ध हो जाता, यदि यह समझा जाता कि वह मनुष्यों की दया और इच्छा पर टिका है?
परन्तु ऐसे झूठे लोगों का खण्डन सन्त पौलुस के एक ही कथन से सरलता से हो जाता है, जो गवाही देता है कि कलीसिया भविष्यद्वक्ताओं और प्रेरितों की नींव पर स्थापित है। —इफिसियों 2:20।
यदि भविष्यद्वक्ताओं और प्रेरितों की शिक्षा कलीसिया की नींव है, तो उस शिक्षा की निश्चितता कलीसिया के प्रकट होने से पहले ही रही होगी।
और वे यह कहकर भी बच नहीं सकते कि यद्यपि कलीसिया का उद्गम उसी स्रोत से हुआ, फिर भी यह अनिश्चित ही रहा कि कौन-सी पुस्तकें भविष्यद्वक्ताओं और प्रेरितों की ठहरानी चाहिए, जब तक कि कलीसिया ने उनके विषय में अपना निर्णय न दे दिया।
क्योंकि यदि मसीही कलीसिया आरम्भ से ही भविष्यद्वक्ताओं के लेखों और प्रेरितों के प्रचार की नींव पर स्थापित हुई थी, तो जहाँ कहीं वह शिक्षा पाई जाती है, उसका अधिकार कलीसिया से पहले का ही होगा, क्योंकि उसके बिना कलीसिया का अस्तित्व कभी हो ही नहीं सकता था।
इसलिए यह कहना भ्रम और झूठ है कि कलीसिया को पवित्रशास्त्र का ऐसा न्याय करने का अधिकार है कि वह अपनी इच्छा के अनुसार उसे जितनी निश्चितता चाहे प्रदान करे।
अतः जब कलीसिया पवित्रशास्त्र को ग्रहण और स्वीकार करती है, तो इससे वह उसे प्रामाणिक नहीं बना देती, मानो वह पहले संदिग्ध और अनिश्चित रहा हो। बल्कि इसलिए कि कलीसिया उसे अपने प्रभु का सत्य पहचानती है, वह तुरन्त, कर्त्तव्य के अनुसार, उसका आदर करती है।
उनका यह प्रश्न—यदि हम कलीसिया की आज्ञा का सहारा न लें तो कैसे जानेंगे कि पवित्रशास्त्र परमेश्वर की ओर से आया है?—ऐसा है मानो कोई पूछे कि हम ज्योति को अन्धकार से, श्वेत को श्याम से, या कड़वे को मीठे से अलग करना कैसे सीखते हैं।
क्योंकि पवित्रशास्त्र अपने सत्य की उतनी ही स्पष्ट गवाही देता है जितनी श्वेत और श्याम वस्तुएँ अपने रंग की, या मीठी और कड़वी वस्तुएँ अपने स्वाद की देती हैं।
फिर भी, यदि हम विवेकों के लिए ठीक प्रबन्ध करना चाहते हैं कि वे निरन्तर सन्देह से विचलित न रहें, तो हमें पवित्रशास्त्र के अधिकार को मनुष्य के तर्कों, प्रमाणों या अनुमानों से ऊँचे स्रोत से प्राप्त करना होगा। अर्थात् हमें उसे पवित्र आत्मा की आन्तरिक गवाही पर स्थापित करना होगा।
क्योंकि यद्यपि पवित्रशास्त्र अपनी ही महिमा में आदर कराने के लिए पर्याप्त सामर्थ्य रखता है, फिर भी वह हम पर सचमुच तभी प्रभाव डालना आरम्भ करता है जब पवित्र आत्मा द्वारा हमारे हृदयों पर उसकी मुहर लगाई जाती है।
उसकी सामर्थ्य से प्रकाशित होकर हम फिर न तो अपने निर्णय के आधार पर, न दूसरों के निर्णय के आधार पर यह मानते हैं कि पवित्रशास्त्र परमेश्वर की ओर से है। बल्कि सब मानवीय निर्णय से ऊपर, हम इसे निःसन्देह मानते हैं कि पवित्रशास्त्र हमें मनुष्यों की सेवकाई के द्वारा स्वयं परमेश्वर के मुख से दिया गया है, मानो हम उसमें परमेश्वर के स्वरूप को प्रत्यक्ष देख रहे हों।
हम ऐसे तर्क या सम्भावनाएँ नहीं खोजते जिन पर हमारा निर्णय टिके। इसके विपरीत, हम अपने निर्णय और समझ को पवित्रशास्त्र के अधीन कर देते हैं, मानो वह ऐसी ऊँची वस्तु हो जिसका न्याय किए जाने की कोई आवश्यकता ही नहीं।
हम ऐसा उस प्रकार नहीं करते जैसे कुछ लोग किसी अज्ञात वस्तु को हल्के में ग्रहण कर लेते हैं और जब वह जानी जाती है तो उन्हें अप्रिय लगती है। बल्कि हम ऐसा इसलिए करते हैं कि हम पूरी तरह निश्चित हैं कि पवित्रशास्त्र में हमारे पास अजेय सत्य है।
न ही हम वैसे समर्पण करते हैं जैसे अज्ञानी लोग अपने मनों को अन्धविश्वासों के बन्दी बना देते हैं। हम ऐसा इसलिए करते हैं कि हम वहाँ ईश्वरीय स्वभाव की स्पष्ट सामर्थ्य को अपना बल प्रदर्शित करते हुए देखते हैं। इसी सामर्थ्य से हम जानते-बूझते और स्वेच्छा से आज्ञा मानने के लिए खींचे और प्रज्वलित किए जाते हैं, फिर भी ऐसे प्रभाव के साथ जो मानवीय इच्छा या ज्ञान के प्रभाव से कहीं बढ़कर है।
इसलिए यह ऐसा दृढ़ विश्वास है जिसे तर्कों की आवश्यकता नहीं, फिर भी ऐसा ज्ञान है जो सर्वोत्तम तर्क पर आधारित है: अर्थात् हमारे मन उसमें किसी भी तर्क से अधिक निश्चित और सुरक्षित विश्राम पाते हैं।
अन्ततः, यह ऐसा निश्चय है जो केवल स्वर्गीय प्रकाशन से ही उत्पन्न हो सकता है।
मैं और कुछ नहीं कहता, केवल वही जो हर विश्वासी अपने भीतर अनुभव करता है, सिवाय इसके कि शब्द विषय की गरिमा से बहुत नीचे रह जाते हैं और उसे ठीक-ठीक समझाने के लिए अपर्याप्त हैं।
यदि हमारे पास यह निश्चय नहीं है—जो प्रत्येक मानवीय निर्णय से ऊँचा और दृढ़ है—तो पवित्रशास्त्र का अधिकार तर्कों से सिद्ध करना, कलीसिया की सहमति से स्थापित करना, या अन्य प्रमाणों से पुष्ट करना व्यर्थ ही होगा। जब तक यह नींव पहले न डाली जाए, पवित्रशास्त्र सदा अधर में लटका रहेगा।
इसके विपरीत, जब पवित्रशास्त्र को वह आज्ञाकारिता मिल जाए जो उसे उचित रूप से मिलनी चाहिए और वह हर सन्देह से मुक्त हो जाए, तब वे तर्क जिनमें पहले हमारे हृदयों में उसकी निश्चितता को स्थिर करने और जमाने की बहुत कम सामर्थ्य थी, उत्तम सहायक बन जाएँगे।
यह कहना असम्भव है कि पवित्रशास्त्र कितना अधिक दृढ़ होता है जब हम ध्यानपूर्वक विचार करते हैं कि परमेश्वर ने उसमें अपनी बुद्धि की व्यवस्था को कैसी भली रीति से सजाया और क्रमबद्ध किया है; उसकी शिक्षा सर्वत्र अपने आपको कैसे स्वर्गीय प्रकट करती है, जिसमें कुछ भी सांसारिक नहीं है; उसके सारे अंग परस्पर कितने सुन्दर रूप से मेल खाते हैं; और अन्य अनेक विशेषताएँ जो लेखों को अधिकार प्रदान करने के योग्य हैं।
इसके अतिरिक्त, हमारे हृदय और भी दृढ़ किए जाते हैं जब हम विचार करते हैं कि शब्दों की सुघड़ता नहीं, बल्कि विषय की महिमा ही हमें विस्मय में खींच ले जाती है।
सच तो यह है कि यह परमेश्वर के बड़े विधान के बिना नहीं हुआ कि स्वर्गीय राज्य के गूढ़ भेद हमें बिना बड़ी वाक्पटुता के, साधारण शब्दों में सौंपे गए। यदि वे वाक्पटुता से सहारा पाते और सजाए जाते, तो दुष्ट लोग निन्दा करते हुए कहते कि उनकी सारी सामर्थ्य उसी में है।
परन्तु अब, जब यह सरल, अपरिष्कृत और लगभग ग्रामीण शैली जगत के वक्ताओं की सारी वाक्पटुता से अधिक हमें आदर की ओर प्रेरित करती है, तो हम इसके सिवा क्या निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि पवित्रशास्त्र के भीतर सत्य की ऐसी सामर्थ्य है कि उसे शब्दों की कलाकारी की कोई आवश्यकता नहीं?
इसलिए प्रेरित का यह तर्क निराधार नहीं कि कुरिन्थियों का विश्वास मानवीय बुद्धि पर नहीं, परन्तु परमेश्वर की सामर्थ्य पर आधारित था, क्योंकि उनके बीच उसका प्रचार मानवीय बुद्धि की लुभानेवाली बातों में नहीं था, परन्तु आत्मा और सामर्थ्य के प्रमाण से पुष्ट किया गया था। —1 कुरिन्थियों 2:4–5।
क्योंकि सत्य हर सन्देह से मुक्त होता है जब वह बाहरी सहायता के बिना अपने आप ही दृढ़ खड़े रहने के लिए पर्याप्त हो।
यह सामर्थ्य पवित्रशास्त्र की कैसी विशेषता है, यह इस बात से प्रकट होता है कि कोई भी मानवीय लेख, चाहे कितनी ही कुशलता से चमकाया और सजाया गया हो, हमें प्रभावित करने की वैसी सामर्थ्य नहीं रखता।
आइए, हम डेमॉस्थनीज़ या सिसरो, प्लेटो या अरस्तू, या उनकी मण्डली के किसी और को पढ़ें। मैं सहर्ष मानता हूँ कि वे हमें अद्भुत रीति से आकर्षित करेंगे, आनन्दित करेंगे और प्रभावित करेंगे, यहाँ तक कि मन को मोहित कर लेंगे।
परन्तु यदि हम उनसे हटकर पवित्र शास्त्र पढ़ने लगें, तो हम चाहें या न चाहें, पवित्रशास्त्र हमारे हृदय को बेध डालेगा। वह हमारे हृदयों में ऐसा उतरेगा और हमारे भीतर इतनी गहराई से जम जाएगा कि उसके प्रभाव की तुलना में वक्ताओं और दार्शनिकों की सारी सामर्थ्य धुएँ के सिवा कुछ न रहेगी।
इससे यह समझना सरल है कि पवित्रशास्त्र में मनुष्यों को प्रेरित करने का एक ईश्वरीय गुण है, क्योंकि वह मानवीय कौशल से उत्पन्न सब सुन्दरताओं से कहीं बढ़कर है।
दूसरी ओर, कलीसिया की सहमति महत्वहीन नहीं है। इसे कुछ नहीं समझना चाहिए कि जब से पवित्रशास्त्र प्रकाशित हुआ, सब युगों में उसके अधीन होने में निरन्तर एकमतता रही है।
यद्यपि शैतान ने उसे दबाने या उलट देने के—यहाँ तक कि मनुष्यों की स्मृति से उसे पूरी तरह मिटा देने के—अनेक प्रयत्न किए, फिर भी वह खजूर के वृक्ष के समान सदा अजेय और विजयी बना रहा है।
क्योंकि ऐसा कोई उत्कृष्ट बुद्धिवाला दार्शनिक या वक्ता शायद ही हुआ हो जिसने पवित्रशास्त्र के विरुद्ध अपनी सूक्ष्मता न लगाई हो। फिर भी सब निष्फल रहे। पृथ्वी की सारी सामर्थ्य उसके सत्य को नष्ट करने के लिए सज्जित हुई, और उसके सारे प्रयास धुएँ में उड़ गए।
यदि पवित्रशास्त्र की रक्षा केवल मानवीय सहारे से की गई होती, तो चारों ओर से इतने भयंकर आक्रमण होने पर वह कैसे टिक पाता?
हमें तो यही निष्कर्ष निकालना चाहिए कि जो पवित्रशास्त्र हमारे पास है वह परमेश्वर की ओर से है, क्योंकि मनुष्यों की सारी बुद्धि और सामर्थ्य के होते हुए भी वह अपनी ही सामर्थ्य से आगे बढ़ा है।
इसके अतिरिक्त, किसी एक नगर या जाति ने ही उसे ग्रहण करने के लिए एका नहीं किया। पृथ्वी की सारी चौड़ाई और लम्बाई में, पवित्रशास्त्र ने उन लोगों की एकमत सहमति से अपना अधिकार प्राप्त किया है जिनमें अन्यथा कुछ भी समानता न थी।
इतनी विभिन्न जातियों के बीच, जो अन्यथा अपने रीति-रिवाज़ों और जीवन-शैली में भिन्न हैं, ऐसी सहमति हमें प्रभावित करनी चाहिए, क्योंकि प्रकट है कि उन्हें एकमत करने में परमेश्वर की सामर्थ्य ने कार्य किया।
फिर भी यह विचार और भी अधिक वज़न रखेगा जब हम उनकी खराई और पवित्रता पर ध्यान करें जो पवित्रशास्त्र को ग्रहण करने पर सहमत हुए। मेरा तात्पर्य उनमें से हर एक से नहीं, परन्तु उनसे है जिन्हें हमारे प्रभु ने अपनी कलीसिया में दीपक ठहराया कि वे अपनी पवित्रता की ज्योति से उसे प्रकाशित करें।
और फिर, हमें इस शिक्षा को कितनी निश्चितता से ग्रहण करना चाहिए, जिसे हम इतने पवित्र जनों के लहू से मुहरबन्द और प्रमाणित देखते हैं?
एक बार उसे ग्रहण कर लेने पर, वे उसके लिए साहस से, यहाँ तक कि आनन्द के साथ मरने में भी नहीं झिझके। तो फिर हम उसे निश्चित और अजेय दृढ़ विश्वास के साथ ग्रहण करने से कैसे चूक सकते हैं, जबकि वह हमें ऐसी प्रतिभूति और पुष्टि के साथ सौंपी गई है?
इसलिए यह पवित्रशास्त्र की कोई छोटी पुष्टि नहीं कि वह इतने गवाहों के लहू से मुहरबन्द हुआ है—विशेषकर जब हम पहचानते हैं कि उन्होंने अपने विश्वास की गवाही के लिए मृत्यु उन्माद या पागलपन से नहीं सही, जैसा कभी-कभी भ्रम में बहकाए गए और विवेक खो बैठे मनों के साथ होता है, परन्तु परमेश्वर के लिए ऐसी उत्साहभरी धुन से जो जितनी संयमित और सुव्यवस्थित थी उतनी ही दृढ़ और स्थिर भी।
और भी अनेक स्पष्ट और प्रबल कारण हैं जिनसे पवित्रशास्त्र की महिमा और गरिमा न केवल विश्वासियों के हृदयों में स्थापित की जा सकती है, बल्कि निन्दकों की द्वेषपूर्ण बातों के विरुद्ध सामर्थ्य से उसकी रक्षा भी की जा सकती है।
फिर भी ये कारण अपने आप में पवित्रशास्त्र की निश्चितता को ठीक रीति से स्थापित करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं जब तक स्वर्गीय पिता उसमें अपने ईश्वरत्व को चमकाकर प्रकट न करे, उसे हर सन्देह और विवाद से ऊपर न उठा दे, और उसके प्रति दृढ़ आदर स्थापित न कर दे।
इसलिए पवित्रशास्त्र हमें परमेश्वर के उद्धार देनेवाले ज्ञान से अन्ततः तभी सन्तुष्ट करेगा जब उसकी निश्चितता पवित्र आत्मा के आन्तरिक विश्वास दिलाने पर टिकी हो।
उसकी पुष्टि करनेवाली मानवीय गवाहियाँ तब व्यर्थ नहीं रहेंगी जब वे इस प्रधान और सर्वोपरि गवाही के पीछे-पीछे, हमारी निर्बलता को सहारा देने के लिए दिए गए गौण सहायकों और साधनों के रूप में चलेंगी।
जो लोग पवित्रशास्त्र को छोड़ देते हैं और परमेश्वर तक पहुँचने के लिए कोई और मार्ग गढ़ते हैं, वे भूल से धोखा खाए हुए इतने नहीं हैं जितने निरे पागलपन से हाँके गए हैं।
इस प्रकार के कुछ उन्मादी लोग अभी हाल में उठे हैं जो घमण्ड से आत्मा की शिक्षा पाने का दिखावा करते हैं। वे स्वयं सब पढ़ाई को तुच्छ जानते हैं और उन लोगों की सादगी का उपहास करते हैं जो अब भी उसका अनुसरण करते हैं जिसे वे मृत और मार डालनेवाला अक्षर कहते हैं।
परन्तु मैं उनसे पूछना चाहूँगा: वह आत्मा कौन है जिसकी प्रेरणा से वे इतने ऊँचे उठाए गए हैं कि पवित्रशास्त्र की सारी शिक्षा को बचकानी और घृणित समझकर तुच्छ जानने का साहस करते हैं?
यदि वे उत्तर दें कि वह मसीह का आत्मा है, तो उनका यह आत्मविश्वास सर्वथा हास्यास्पद है। क्योंकि मैं समझता हूँ कि वे मानेंगे कि प्रेरित और आदिम कलीसिया के विश्वासी मसीह के आत्मा से प्रेरित थे। फिर भी उनमें से किसी ने इससे परमेश्वर के वचन को तुच्छ जानना नहीं सीखा। इसके विपरीत, हर एक उसके प्रति और अधिक आदर से भर गया, जैसा उनके लेख स्पष्ट गवाही देते हैं।
इसके अतिरिक्त, मैं चाहता हूँ कि वे इस प्रश्न का उत्तर दें: क्या उन्होंने कोई ऐसा भिन्न आत्मा पाया है जो उस आत्मा से अलग है जिसकी प्रतिज्ञा प्रभु ने अपने चेलों से की थी? यद्यपि वे हद से बढ़कर पागल हैं, फिर भी मैं नहीं समझता कि वे ऐसे उन्माद में बह गए हैं कि इस पर घमण्ड करने का साहस करें।
जब प्रभु ने अपने आत्मा की प्रतिज्ञा की, तब उसने घोषणा की कि वह आत्मा कैसा होगा? उसने कहा कि आत्मा अपनी ओर से नहीं बोलेगा, परन्तु प्रेरितों को वह सब स्मरण दिलाएगा जो मसीह ने उन्हें अपने वचन के द्वारा सिखाया था। —यूहन्ना 14:26; 16:13।
इसलिए पवित्र आत्मा का कार्य, जैसी उसकी प्रतिज्ञा हमसे की गई है, यह नहीं है कि नए और पहले से अज्ञात प्रकाशन गढ़े, या शिक्षा का कोई नया रूप रचे जो हमें एक बार ग्रहण की हुई सुसमाचार की शिक्षा से दूर खींच ले जाए। बल्कि उसका कार्य है कि सुसमाचार के द्वारा हमें दी गई शिक्षा पर हमारे हृदयों में मुहर लगाए और उसे दृढ़ करे।
इससे हम सरलता से समझ जाते हैं कि यदि हम परमेश्वर के आत्मा से कोई फल या लाभ पाना चाहते हैं, तो हमें पवित्रशास्त्र को सुनने और पढ़ने, दोनों में परिश्रम करना चाहिए।
इसके विपरीत, यदि कोई आत्मा परमेश्वर के वचन में निहित बुद्धि को छोड़ दे और हमारे पास कोई भिन्न शिक्षा ले आए, तो उस पर उचित रूप से व्यर्थता और झूठ का सन्देह किया जाना चाहिए।
और हम क्या कर सकते हैं? जब शैतान स्वयं को ज्योतिर्मय स्वर्गदूत का रूप बना लेता है, तो यदि आत्मा एक अत्यन्त निश्चित चिह्न से पहचाना न जाए, तो हमारे बीच उसका क्या अधिकार रहेगा?
प्रभु की वाणी के द्वारा वह हमारे लिए यथेष्ट और स्पष्ट रूप से पहचाना तो गया है, जब तक कि ये अभागे लोग जान-बूझकर अपने ही भ्रम में भटकना न चाहें, और उस आत्मा को नहीं जो उससे निकलता है, परन्तु अपने ही में से कोई आत्मा ढूँढ़ें।
परन्तु वे आपत्ति करते हैं कि यह बड़ी असंगति होगी कि परमेश्वर का आत्मा, जिसके अधीन सब कुछ होना चाहिए, पवित्रशास्त्र के अधीन कर दिया जाए।
मानो पवित्र आत्मा के लिए सर्वत्र अपने ही समान और अपने से संगत रहना, सदा स्थिर बने रहना और कभी न बदलना कोई अनादर की बात हो!
निश्चय ही, यदि उसे किसी मानवीय, स्वर्गदूतीय या अन्य मानदण्ड के अधीन किया जाता, तो कहा जा सकता था कि इससे वह नीचा किया गया और दासता में डाल दिया गया। परन्तु जब उसकी तुलना स्वयं उसी से की जाती है और उसके अपने स्वभाव के अनुसार उस पर विचार किया जाता है, तो कौन कह सकता है कि इससे उसकी कोई हानि हुई?
वे कहते हैं, “परन्तु इस प्रकार तो वह परीक्षा के अधीन हो जाता है।”
मैं मानता हूँ। परन्तु यह ऐसी परीक्षा है जिसके द्वारा उसने चाहा कि उसकी महिमा हमारे बीच स्थापित हो। जब वह स्वयं को प्रकट करता है, तो हमारे लिए यही पर्याप्त होना चाहिए। परन्तु ताकि शैतान की आत्मा उसके नाम से प्रवेश न पा सके, पवित्र आत्मा चाहता है कि हम उसे उस प्रतिमा में पहचानें जो उसने पवित्रशास्त्र पर अंकित की है।
वही पवित्रशास्त्र का रचयिता है। वह परिवर्तनशील या अपने से भिन्न नहीं हो सकता। इसलिए उसे सदा वैसा ही बने रहना चाहिए जैसा उसने एक बार वहाँ अपने आपको प्रकट किया।
इससे उसका कोई अनादर नहीं होता, जब तक कि हम यह न कहें कि अपने आप से गिर जाना उसके लिए आदर की बात होगी।
उनका हम पर यह आरोप कि हम “मार डालनेवाले अक्षर” से अत्यधिक चिपके रहते हैं—इससे वे दिखाते हैं कि पवित्रशास्त्र को तुच्छ जानने के कारण वे परमेश्वर के दण्ड से कैसे नहीं बच पाते।
क्योंकि प्रकट है कि इस खण्ड में सन्त पौलुस उन धोखा देनेवालों से विवाद कर रहा है जो मसीह से अलग केवल व्यवस्था को ऊँचा उठाते हैं, और इस प्रकार लोगों को नई वाचा के अनुग्रह से दूर कर देते हैं, जिसमें प्रभु प्रतिज्ञा करता है कि वह अपनी व्यवस्था को विश्वासियों के अन्तःकरण में रखेगा और उनके हृदयों पर लिखेगा।
अतः परमेश्वर की व्यवस्था मृत अक्षर है और अपने चेलों को मार डालती है जब वह मसीह के अनुग्रह से अलग कर दी जाए और केवल कानों में गूँजती रहे, हृदय को न छुए।
परन्तु यदि परमेश्वर के आत्मा के द्वारा वह इच्छा पर जीवन्त रूप से अंकित हो जाए, और यदि वह यीशु मसीह को हम तक पहुँचाए, तो वह जीवन का वचन है, जो प्राणों को फिराता और भोलों को बुद्धिमान बनाता है।
सचमुच, उसी खण्ड में प्रेरित अपने प्रचार को “आत्मा की सेवकाई” कहता है। —2 कुरिन्थियों 3:6–8।
इससे वह संकेत देता है कि परमेश्वर का आत्मा अपने उस सत्य से, जिसे उसने पवित्रशास्त्र में व्यक्त किया है, ऐसा जुड़ा और बँधा हुआ है कि वह अन्ततः अपनी सामर्थ्य तभी प्रकट करता है जब वचन उस आदर के साथ ग्रहण किया जाए जो उसे उचित रूप से मिलना चाहिए।
यह उस बात का किसी रीति से खण्डन नहीं करता जो अभी थोड़ी देर पहले कही गई थी: कि वचन में हमारे लिए बहुत कम निश्चितता होती है जब तक आत्मा की गवाही से उसकी पुष्टि न हो।
क्योंकि प्रभु ने अपने आत्मा और अपने वचन की निश्चितता को मानो परस्पर बन्धन से एक साथ बाँध दिया है। उसने ऐसा इसलिए किया कि हमारी बुद्धि वचन को आज्ञाकारिता के साथ ग्रहण करे जब वह देखे कि आत्मा उसमें ऐसी ज्योति के रूप में चमक रहा है जिससे वह परमेश्वर के मुख का दर्शन कर सके। साथ ही उसने ऐसा इसलिए भी किया कि हम परमेश्वर के आत्मा को धोखे या भूल के भय के बिना ग्रहण करें, और उसे उसकी प्रतिमा में, अर्थात् उसके वचन में पहचानें।
और सचमुच बात ऐसी ही है। परमेश्वर ने मनुष्यों को ऐसा वचन नहीं दिया जिसे वह अपने आत्मा के आते ही तुरन्त मिटा देना चाहता था। बल्कि उसने उसी आत्मा को भेजा जिसकी सामर्थ्य से उसने पहले अपना वचन दिया था, ताकि उसकी प्रभावशाली पुष्टि करके वह उसी के द्वारा अपना कार्य पूरा करे।
इसी रीति से मसीह ने उन दो चेलों की समझ खोली—इसलिए नहीं कि पवित्रशास्त्र को ठुकराकर वे अपने आप में बुद्धिमान बन जाएँ, परन्तु इसलिए कि वे उसे समझ सकें। —लूका 24:27, 45।
इसी प्रकार जब सन्त पौलुस थिस्सलुनीकियों को समझाता है कि आत्मा को न बुझाओ, तो वह उन्हें वचन से अलग खोखले चिन्तनों की ओर आकाश में नहीं उड़ा ले जाता। वह तुरन्त जोड़ देता है कि वे भविष्यद्वाणियों को तुच्छ न जानें। —1 थिस्सलुनीकियों 5:19–20।
इससे वह निश्चय ही संकेत देता है कि जब भविष्यद्वाणियों को तुच्छ जाना जाता है तब आत्मा की ज्योति बुझ जाती है।
ये घमण्डी उन्मादी इस पर क्या कहेंगे, जो किसी प्रकाश को तभी मान्य समझते हैं जब वे परमेश्वर के वचन को छोड़ और तुच्छ जानकर स्वप्न देखते हुए अपनी कल्पना में आई हर बात को उतावलेपन से अपना लेते हैं?
परमेश्वर की सन्तानों में इससे बहुत भिन्न संयम होना चाहिए। क्योंकि जब वे देखती हैं कि परमेश्वर के आत्मा के बिना वे सत्य की हर ज्योति से वंचित हैं, तब वे यह भी जानती हैं कि वचन ही वह साधन है जिसके द्वारा प्रभु विश्वासियों को अपने आत्मा का प्रकाश बाँटता है।
क्योंकि वे उस आत्मा के सिवा किसी और आत्मा को नहीं मानते जो प्रेरितों में वास करता था और उनके मुख से बोलता था—वही आत्मा जिसके द्वारा वे निरन्तर वचन की ओर लौटाए और फिर से उस पर ध्यान देने के लिए अगुवाई पाते हैं।
परन्तु क्योंकि हमने सिखाया है कि परमेश्वर का ज्ञान—जो अन्यथा जगत की रचना और सब सृष्ट वस्तुओं में यथेष्ट प्रदर्शित है—फिर भी उसके वचन के द्वारा हमें अधिक घनिष्ठ रीति से घोषित किया जाता है, इसलिए अब हमें विचार करना चाहिए कि क्या परमेश्वर पवित्रशास्त्र में अपने आपको वैसा ही प्रस्तुत करता है जैसा वह अपने कार्यों में हमें पहले दिखाया जा चुका है। यदि कोई इसे पूरी तरह समझाना चाहे तो यह निश्चय ही लम्बा विषय होगा। फिर भी मैं केवल एक सारांश प्रस्तुत करके सन्तुष्ट रहूँगा, जिससे विश्वासी विवेक यह सीख सकें कि उन्हें पवित्रशास्त्र में परमेश्वर के विषय में मुख्यतः क्या खोजना चाहिए, और उसे पाने के लिए एक निश्चित लक्ष्य की ओर निर्देशित हो सकें।
इसलिए सबसे पहले, प्रभु अपने आपको ऐसा परमेश्वर घोषित करता है जिसने आकाश और पृथ्वी की सृष्टि करके मानव जाति पर अपना असीम अनुग्रह और उपकार उँड़ेला। फिर भी उसने विश्वासियों को सदा और निरन्तर पाला और सम्भाले रखा है, और अपने विशेष अनुग्रह से उनकी रक्षा की है; और बदले में वह उनके द्वारा जाना और आदर पाया गया है। इसी प्रकार, हर युग के इतिहासों के द्वारा वह हमारी आँखों के सामने—मानो चित्र में—विश्वासियों के प्रति अपनी भलाई की स्थिरता को रखता है: उसका विधान उन पर कितनी सावधानी से दृष्टि रखता है; वह उनका भला करने के लिए कितना तत्पर है; उसकी सहायता कितनी सामर्थी है; वह उनसे कितनी उत्कटता से प्रेम करता है; उनके दोषों को सहने में उसका धीरज कितना महान है; उन्हें ताड़ना देने में वह कैसी पितृवत् दया दिखाता है; और वह उनसे की गई अपनी प्रतिज्ञाओं को सदा के लिए कितनी विश्वासयोग्यता से निभाता है।
दूसरी ओर, वह पापियों पर अपने प्रतिशोध की कठोरता दिखाता है: उन्हें बहुत समय तक सहने के बाद उसके क्रोध का भड़कना कितना भयानक है, और उन्हें व्याकुल और तितर-बितर करने के लिए उसका हाथ कितना सामर्थी है। यह वर्णन उस बात से बहुत भली रीति से मेल खाता है जो हमने कही कि सारे जगत की रचना में दिखाई देती है।
फिर भी एक विशेष खण्ड में परमेश्वर का स्वभाव इस रीति से व्यक्त किया गया है कि उसका मुख हमारे सामने जीवन्त रूप से प्रस्तुत होता है, ताकि हम उसे स्पष्ट देख सकें। क्योंकि मूसा के दिए वर्णन में ऐसा प्रतीत होता है कि उसका आशय संक्षेप में वह सब समेट लेना था जो मनुष्यों को परमेश्वर के विषय में जानने की अनुमति है। वह इस प्रकार कहता है:
“यहोवा, यहोवा परमेश्वर, दयालु और अनुग्रहकारी, कोप करने में धीमा, और भलाई और सच्चाई में अति महान, हजारों पीढ़ियों तक दया करनेवाला, अधर्म और पापों को क्षमा करनेवाला, परन्तु दोषी को किसी रीति से निर्दोष न ठहरानेवाला, पितरों के अधर्म का दण्ड बेटों और पोतों को देनेवाला।”
यहाँ हमें ध्यान देना चाहिए कि परमेश्वर की अनन्तता और उसका स्वयंभू अस्तित्व उस नाम से घोषित होते हैं जो पहले उसे दिया गया है। इब्रानी में दो बार दोहराया गया यह नाम उस “एकमात्र जो है” के बराबर अर्थ रखता है।
फिर उसके गुण गिनाए जाते हैं, जिनके द्वारा वह हमारे सामने दिखाया जाता है—जैसा वह अपने आप में है वैसा नहीं, परन्तु जैसा वह हमारे प्रति है वैसा। इस प्रकार यह ज्ञान खोखले चिन्तन में कम और जीवन्त अनुभव में अधिक निहित है।
इसके अतिरिक्त, हम देखते हैं कि यहाँ गिनाए गए गुण वे ही हैं जो, जैसा हमने देखा, आकाश और पृथ्वी में चमकते हैं: अर्थात् दया, भलाई, करुणा, धार्मिकता, न्याय और सत्य। उसकी सामर्थ्य उस इब्रानी शब्द में सम्मिलित है जो उसे तीसरी उपाधि के रूप में दिया गया है, जिसका अर्थ है वह जो सब सामर्थ्यों को अपने भीतर रखता है।
भविष्यद्वक्ता भी उसे यही उपाधियाँ देते हैं जब वे उसके पवित्र नाम की पूरी महिमा करना चाहते हैं। ताकि हमें बहुत-से खण्ड एकत्र न करने पड़ें, इस समय एक भजन ही पर्याप्त होगा, जिसमें उसके गुणों का पूरा सार इतने परिश्रम से गिनाया गया है कि कुछ भी छूटा नहीं। फिर भी वहाँ कुछ ऐसा नहीं बताया गया जो सृष्ट वस्तुओं में भी न देखा जा सके। इस प्रकार परमेश्वर अनुभव के द्वारा हमें उसी परमेश्वर के रूप में अपने आपको जनाता है जैसा वह अपने वचन में अपने आपको बताता है।
यिर्मयाह में, जहाँ परमेश्वर घोषित करता है कि वह हमसे किस रीति से जाना जाना चाहता है, वह इतना पूरा वर्णन नहीं देता; फिर भी बात एक ही ठहरती है:
“जो घमण्ड करे वह इसी बात पर घमण्ड करे कि वह मुझे जानता है, कि मैं यहोवा हूँ जो पृथ्वी पर दया, न्याय और धार्मिकता के काम करता है।”
निश्चय ही, हमारे लिए मुख्यतः ये तीन बातें जानना आवश्यक है: उसकी दया, जिसमें हम सब का उद्धार निहित है; उसका न्याय, जिसे वह प्रतिदिन दुष्टों पर चलाता है और उनके लिए अनन्त विनाश तक और भी कठोर रूप में रख छोड़ता है; और उसकी धार्मिकता, जिसके द्वारा उसके विश्वासयोग्य लोग अनुग्रह से सुरक्षित रखे जाते हैं। जब ये बातें समझ ली जाती हैं, तो भविष्यद्वक्ता गवाही देता है कि हमारे पास परमेश्वर में घमण्ड करने के लिए प्रचुर कारण है।
फिर भी यह कहने में न उसकी सामर्थ्य, न उसका सत्य, न उसकी पवित्रता, न उसकी भलाई छोड़ी गई है। क्योंकि उसकी धार्मिकता, दया और न्याय का ज्ञान—जैसा उस खण्ड में अपेक्षित है—उसके अटल सत्य पर आधारित हुए बिना कैसे खड़ा रह सकता है? और उसकी सामर्थ्य को पहले समझे बिना कोई कैसे विश्वास कर सकता है कि वह पृथ्वी पर धार्मिकता और न्याय से शासन करता है? उसकी दया उसकी भलाई के सिवा और कहाँ से निकलती है? अन्त में, यदि उसके सारे मार्ग दया, न्याय और धार्मिकता हैं, तो उसकी पवित्रता भी उनमें चमकती है।
अब पवित्रशास्त्र में हमें प्रस्तुत परमेश्वर का ज्ञान उसी लक्ष्य की ओर प्रवृत्त है जो सृष्ट वस्तुओं के द्वारा हमें दिया जाता है: अर्थात् पहले हमें परमेश्वर के भय के लिए जगाना, और फिर हमें उस पर भरोसा रखने की ओर ले चलना, ताकि हम निर्दोष जीवन और सच्ची आज्ञाकारिता के द्वारा उसकी सेवा और आदर करना सीखें, और पूरी तरह उसकी भलाई में विश्राम करें।
फिर भी, क्योंकि परमेश्वर अपने आपको यथार्थ और सीधे मनन के लिए अपने मसीह के मुख के सिवा और कहीं प्रस्तुत नहीं करता—और वह मुख केवल विश्वास की आँखों से ही देखा जा सकता है—इसलिए उचित होगा कि परमेश्वर के ज्ञान के विषय में जो कहना शेष है उसे तब तक के लिए टाल दें जब तक हम उस विश्वास की समझ की चर्चा तक न पहुँचें।
