अध्याय 15

अध्याय बारह: प्रभु-भोज का महत्त्व (भाग 3 / 3)

Institutes of the Christian Religion (1541) · John Calvin

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अध्याय बारह: प्रभु-भोज का महत्त्व (भाग 3 / 3)

इस संस्कार ने हमें यह प्रतिज्ञा दी कि यीशु मसीह की मृत्यु के द्वारा हम जीवन में लौटा लिए गए हैं—केवल एक बार नहीं, वरन् उसी के द्वारा हमें निरन्तर जीवन दिया जाता रहता है, क्योंकि हमारे उद्धार से सम्बन्ध रखनेवाली सब बातें उसी समय पूरी हो चुकी थीं।

मिस्सा का बलिदान तो बिलकुल भिन्न राग अलापता है: कि यीशु मसीह को हमें किसी भी प्रकार का लाभ पहुँचाने के लिए प्रतिदिन बलि चढ़ाया जाना अवश्य है। प्रभु-भोज को कलीसिया की सार्वजनिक सभा में चढ़ाया और बाँटा जाना था, ताकि वह हमें उस सहभागिता की शिक्षा दे जिससे हम सब यीशु मसीह में एक साथ जुड़े हुए हैं। मिस्सा का बलिदान इस सहभागिता को तोड़ता और नष्ट कर देता है।

क्योंकि जब से यह भ्रम फैला कि ऐसे याजक अवश्य होने चाहिए जो लोगों के लिए बलि चढ़ाएँ, मानो प्रभु-भोज केवल उन्हीं के लिए सुरक्षित रखा गया हो, तब से वह विश्वासियों की कलीसिया को वैसे नहीं बाँटा गया जैसी हमारे प्रभु की आज्ञा थी। तब निजी मिस्साओं का मार्ग खुल गया, जो हमारे प्रभु द्वारा ठहराई गई सहभागिता को नहीं, वरन् बहिष्कार को दर्शाती हैं, क्योंकि याजक और बलिदानकर्ता अपनी बलि को अकेला ही निगल जाने का मन रखकर अपने आपको विश्वासियों की सारी देह से अलग कर लेता है।

कोई धोखा न खाए, इसलिए मैं निजी मिस्साएँ उन्हें भी कहता हूँ जो गाने और ऊँची आवाज़ों के कारण महामिस्सा कहलाती हैं, और उन्हें भी जिनमें याजक अकेला बुदबुदाता और धीमे स्वर में कुछ बड़बड़ाता है। क्योंकि ये सब समान रूप से कलीसिया को प्रभु-भोज में साझा सहभागिता से वंचित करती हैं।

परन्तु समाप्त करने से पहले मैं मिस्सा के अपने आचार्यों से पूछता हूँ: जब वे जानते हैं कि परमेश्वर की आज्ञा मानना सब बलिदानों से उत्तम है और कि वह चाहता है कि मनुष्य उसे बलि चढ़ाने की अपेक्षा उसकी वाणी पर ध्यान दें—

“आज्ञा मानना बलि चढ़ाने से और ध्यान देना मेढ़ों की चर्बी से उत्तम है।”

—1 शमूएल 15:22

—तो वे यह कैसे मान सकते हैं कि परमेश्वर इस प्रकार के बलिदान को स्वीकार करता है, जिसके लिए उनके पास कोई आज्ञा नहीं और जिसे वे देखते हैं कि पवित्रशास्त्र के एक अक्षर से भी सिद्ध नहीं किया जा सकता?

फिर, जब वे प्रेरित को यह कहते सुनते हैं:

“कोई इस आदर और याजकपद के नाम को अपने आप नहीं ले सकता, केवल वही जो हारून के समान परमेश्वर की ओर से बुलाया गया हो। मसीह ने भी अपने आपको उसमें नहीं घुसेड़ा, परन्तु अपने पिता की बुलाहट का आज्ञाकारी हुआ।”

—इब्रानियों 5:4–5

तो उन्हें या तो यह दिखाना होगा कि परमेश्वर उनके याजकपद का रचनेवाला और ठहरानेवाला है, या यह मानना होगा कि उनका पद और सेवा परमेश्वर की ओर से नहीं हैं, और कि बिना बुलाए वे अपने ही दुःसाहस से उनमें घुस आए हैं। परन्तु वे अपने याजकपद के समर्थन में एक अक्षर भी प्रस्तुत नहीं कर सकते।

तब उन बलिदानों का क्या होगा जो बिना याजक के चढ़ाए ही नहीं जा सकते? इसके सिवा और क्या शेष रहता है कि अन्धे देखें, बहरे सुनें, और छोटे बच्चे भी मिस्सा की घृणित बात को समझ लें? सोने के पात्र में परोसी हुई—अर्थात् परमेश्वर के वचन के नाम के अधीन—उसने पृथ्वी के सब राजाओं और जातियों को, बड़े से लेकर छोटे तक, ऐसा मतवाला, भ्रमित और जड़ कर दिया है कि पशुओं से भी अधिक बुद्धिहीन होकर उन्होंने अपने उद्धार का आदि और अन्त इसी एक घृणित वस्तु में रख दिया है।

निश्चय ही शैतान ने यीशु मसीह के राज्य पर आक्रमण करने और उसे उलट देने के लिए इससे अधिक सामर्थी कोई यन्त्र कभी खड़ा नहीं किया। यही वह हेलेन है जिसके लिए सत्य के शत्रु अब ऐसी निर्दयता, उन्माद और क्रोध से लड़ रहे हैं। और सचमुच वह ऐसी हेलेन है जिसके साथ वे आत्मिक व्यभिचार करते हैं, जो सब से घृणित है।

मैं यहाँ उन स्थूल और खुले दुर्व्यवहारों को छोटी अँगुली से भी नहीं छूता जिनके द्वारा वे कह सकते हैं कि उनके पवित्र मिस्सा की शुद्धता अपवित्र और भ्रष्ट की गई है: अर्थात् उसके द्वारा वे जो लज्जाजनक हाट और व्यापार चलाते हैं, इन बलिदानकर्ताओं की अपनी मिस्साओं से होनेवाली दुष्ट और अपमानजनक कमाई, और वह विशाल लूट जिससे वे अपने लोभ को तृप्त करते हैं।

मैं केवल, और वह भी थोड़े सीधे शब्दों में, मिस्सा की परम पवित्र “पवित्रता” का स्वरूप दिखाता हूँ, जिसके कारण वह इतने समय से इतनी प्रशंसा और श्रद्धा के योग्य ठहराई गई। इतने बड़े भेदों को उनके मूल्य के अनुसार समझाने और बड़ाई करने के लिए एक बड़ी पुस्तक चाहिए। और न मैं यहाँ उन गन्दी भ्रष्टताओं को मिलाना चाहता हूँ जो सब को दिखाई देती हैं। मेरा उद्देश्य यह है कि सब समझ लें कि मिस्सा, अपने शुद्धतम और उत्तम रूप में, और उस दृष्टि से जिससे उसका सबसे अनुकूल न्याय किया जा सकता है, अपने उपांगों और परिणामों को एक ओर रखकर भी, जड़ से शिखर तक हर प्रकार की अधर्मिता, निन्दा, मूर्तिपूजा और पवित्र वस्तुओं की अपवित्रता से भरी हुई है।

अब, ऐसा न हो कि कोई झगड़ालू मनुष्य “बलिदान” और “याजक” शब्दों के विषय में फिर हमसे विवाद करने का अवसर पाए, मैं संक्षेप में समझाता हूँ कि इस सारे वर्णन में मैंने “बलिदान” शब्द और “याजक” पदवी से क्या अभिप्राय लिया है।

मुझे नहीं दिखता कि परमेश्वर की आराधना से सम्बन्ध रखनेवाली हर रीति और विधि पर “बलिदान” नाम को लागू करने का किसी के पास क्या कारण हो सकता है। क्योंकि हम देखते हैं कि पवित्रशास्त्र के निरन्तर प्रयोग के अनुसार “बलिदान” नाम उस वस्तु पर लगाया गया है जिसे यूनानी कभी थुसिया और कभी प्रोसफोरा कहते हैं, जो शब्द सामान्यतः परमेश्वर को चढ़ाई जानेवाली हर वस्तु को सूचित करते हैं।

तो भी यहाँ हमें एक भेद करना होगा, जो मूसा की व्यवस्था के बलिदानों से लिया गया है, जिनकी छाया के अधीन प्रभु अपने लोगों के सामने आत्मिक बलिदानों के विषय में सारा सत्य दर्शाना चाहता था। यद्यपि इन बलिदानों के अनेक प्रकार थे, फिर भी वे सब दो वर्गों में रखे जा सकते हैं।

भेंट या तो पाप के लिए चढ़ाई जाती थी, एक प्रकार के प्रायश्चित के रूप में जिससे परमेश्वर के सामने दोष का प्रायश्चित किया जाता था, या ईश्वरीय आराधना के चिह्न और उसे दिए जानेवाले आदर की साक्षी के रूप में।

इस दूसरे वर्ग में तीन प्रकार के बलिदान सम्मिलित थे। चाहे मनुष्य विनती के द्वारा परमेश्वर की कृपा और अनुग्रह चाहते, उसके उपकारों के लिए उसकी स्तुति करते, या केवल उसकी वाचा की स्मृति को नया करने का अभ्यास करते, ये सब बलिदान इस बात की साक्षी देते थे कि वे उसके नाम के प्रति कैसी श्रद्धा रखते थे। इसलिए इस दूसरे वर्ग में वे ठहराए जाने चाहिए जिन्हें व्यवस्था होमबलि, पेयबलि, अन्नबलि, पहिलौठे फल और मेलबलि कहती है।

इसी कारण हम भी बलिदानों को दो वर्गों में बाँटते हैं। पहले को हम परमेश्वर के आदर और श्रद्धा के लिए ठहराया गया बलिदान कहते हैं, जिसके द्वारा विश्वासी उसे वह स्वीकार करते हैं जिससे हर भलाई आती और निकलती है, और इसलिए उसे उसके योग्य धन्यवाद चढ़ाते हैं। दूसरे को हम प्रायश्चित्तिक या पापनिवारक बलिदान कहते हैं।

पापनिवारक बलिदान वह है जो परमेश्वर के क्रोध को शान्त करने, उसके न्याय को सन्तुष्ट करने, और इस प्रकार पापों को शुद्ध और साफ़ करने के लिए चढ़ाया जाता है, ताकि पापी, उनके दागों से शुद्ध होकर और धार्मिकता की पवित्रता में लौटाया जाकर, फिर से परमेश्वर की कृपा में ग्रहण किया जाए।

व्यवस्था के अधीन पापों को मिटाने के लिए चढ़ाए जानेवाले बलिदानों का यही नाम था—इसलिए नहीं कि वे अधर्म को मिटाने या मनुष्यों को परमेश्वर से मिलाने के लिए पर्याप्त थे, परन्तु इसलिए कि वे उस सच्चे बलिदान की पूर्व-छाया थे जो अन्ततः यीशु मसीह के द्वारा सचमुच सिद्ध किया गया। वह उसी एक के द्वारा पूरा किया गया क्योंकि कोई और उसे पूरा नहीं कर सकता था, और वह केवल एक ही बार चढ़ाया गया क्योंकि यीशु मसीह द्वारा किए गए उस एक बलिदान की सामर्थ्य और प्रभाव अनन्त है।

उसने स्वयं अपने मुख से इसकी साक्षी दी जब उसने कहा:

“पूरा हुआ।”

—यूहन्ना 19:30

अर्थात् हमें पिता की कृपा से मिलाने और पापों की क्षमा, धार्मिकता और उद्धार प्राप्त करने के लिए जो कुछ आवश्यक था, वह सब उसकी उस एक भेंट से पूरा, सम्पन्न और सिद्ध हो गया। किसी बात की कमी न रही, और इसलिए उसके बाद किसी अन्य बलिदान के लिए कोई स्थान नहीं हो सकता था।

इसलिए हमें यह निष्कर्ष निकालना चाहिए कि यदि कोई इस अभिप्राय से भेंट को दोहराता है कि उसके द्वारा पापों की क्षमा पाए, परमेश्वर को मनाए और धार्मिकता प्राप्त करे, तो वह यीशु मसीह के और उस बलिदान के, जो उसने हमारे लिए क्रूस पर अपनी मृत्यु के द्वारा किया, विरुद्ध असहनीय निन्दा और ईशनिन्दा है।

फिर भी मिस्सा में और क्या किया जाता है, इसके सिवा कि एक नई भेंट के पुण्य के द्वारा हम यीशु मसीह के दुःखभोग के सहभागी बनाए जाते हैं? और, ताकि उनके लाभ की कोई सीमा न रहे, उन्होंने यह कहना भी कम समझा कि उनका बलिदान समस्त कलीसिया पर समान रूप से और सामूहिक रूप से लागू होता है। उन्होंने यह भी जोड़ा कि यह उनके अधिकार में है कि जैसे उनकी इच्छा हो वैसे उसे किसी एक या दूसरे व्यक्ति पर विशेष रूप से लागू करें—या यों कहें, उस पर जो उनका माल खरीदने के लिए पर्याप्त दाम देने को तैयार हो।

यद्यपि वे उसका दाम यहूदा जितना ऊँचा नहीं ठहरा सके, तो भी उन्होंने संख्या में एक समानता बनाए रखी, ताकि किसी चिह्न के द्वारा वे अपने स्वामी का उदाहरण दोहरा सकें। यहूदा ने यीशु मसीह को चाँदी के तीस सिक्कों में बेचा; ये लोग जहाँ तक उनके बस में है, उसे ताँबे के तीस सिक्कों में बेचते हैं। परन्तु यहूदा ने उसे केवल एक बार बेचा; ये लोग जब भी कोई ग्राहक पाते हैं, उसे बेच देते हैं।

इसी अर्थ में हम यह भी इनकार करते हैं कि वे याजक हैं: अर्थात् कि ऐसी भेंट के द्वारा वे लोगों के लिए परमेश्वर के सामने मध्यस्थता करते हैं, परमेश्वर को मनुष्यों से मिलाते हैं, और पापों का प्रायश्चित और शुद्धिकरण सम्पन्न करते हैं। क्योंकि नई वाचा का एकमात्र याजक और महायाजक यीशु मसीह है। सब याजकपद उसी को सौंप दिए गए हैं और उसी में समाप्त और पूरे हो गए हैं।

यदि पवित्रशास्त्र ने यीशु मसीह के सनातन याजकपद का उल्लेख न भी किया होता, तो भी यह बात कि परमेश्वर ने प्राचीन याजकपदों को मिटा दिया और कोई दूसरा नया नहीं ठहराया, प्रेरित के तर्क को अजेय बना देती:

“कोई याजकपद का आदर अपने आप नहीं लेता, जब तक परमेश्वर की ओर से बुलाया न गया हो।”

—इब्रानियों 5:4

तब ये अपवित्र लोग, जो अपने आपको यीशु मसीह के घात करनेवाले होने का घमण्ड करते हैं, किस भरोसे से अपने आपको जीवते परमेश्वर के याजक कहने का साहस करते हैं?

हम “याजक” और “याजकपद” शब्दों का प्रयोग उस यूनानी शब्द के अर्थ के अनुसार नहीं करते जिससे वे निकले हैं, जिसका अर्थ प्राचीन (प्रध्यान) है। उस अर्थ में तो कलीसिया के सच्चे सेवक उचित रूप से याजक कहे जा सकते और उनकी सेवा याजकपद। परन्तु हम इन शब्दों का प्रयोग उनके सामान्य अर्थ के अनुसार करते हैं, ताकि “याजक” का अर्थ वह बलिदानकर्ता हो जो परमेश्वर को वैसा बलिदान चढ़ाने के लिए ठहराया गया हो जैसा हमने वर्णन किया, और “याजकपद” का अर्थ ऐसे बलिदानकर्ता की गरिमा, दशा और सेवा हो।

दूसरे प्रकार के बलिदान के अधीन, जिसे धन्यवाद या स्तुति का बलिदान कहा जाता है, प्रेम के सब कर्तव्य सम्मिलित हैं। जब ये हमारे पड़ोसियों के प्रति किए जाते हैं, तो कुछ अंश में वे परमेश्वर को चढ़ाए जाते हैं, जो इस प्रकार अपने अंगों में सम्मानित होता है। साथ ही हमारी सब प्रार्थनाएँ, स्तुतियाँ, धन्यवाद, और परमेश्वर की सेवा और आदर के लिए हम जो कुछ और करते हैं, वह भी इसमें सम्मिलित है।

ये सब भेंटें एक बड़े बलिदान पर निर्भर हैं, जिसके द्वारा हम देह और आत्मा सहित परमेश्वर के पवित्र मन्दिरों के रूप में समर्पित और अर्पित किए जाते हैं। क्योंकि यह पर्याप्त नहीं कि हमारे भीतरी कार्य उसकी सेवा में लगाए जाएँ; उचित यह है कि पहले हम स्वयं और फिर हमारे सब कार्य उसे समर्पित हों, ताकि हमारे भीतर जो कुछ है वह सब उसकी महिमा की सेवा करे और उसकी प्रभुता को ऊँचा उठाए।

इस प्रकार का बलिदान परमेश्वर के क्रोध को शान्त करने, पापों की क्षमा पाने, या धार्मिकता कमाने और प्राप्त करने में कोई योगदान नहीं देता, वरन् केवल परमेश्वर को बड़ा ठहराने और महिमा देने की ओर लक्षित है। क्योंकि वह उसे ग्रहणयोग्य हो ही नहीं सकता जब तक वह उनसे न निकले जो पापों की क्षमा पाकर पहले से ही उससे मेल कर चुके हैं और किसी अन्य स्रोत से धर्मी ठहराए जा चुके हैं।

इसके अतिरिक्त, ऐसा बलिदान कलीसिया के लिए इतना आवश्यक है कि वह उसके बिना रह ही नहीं सकती। इसलिए जब तक परमेश्वर के लोग बने रहेंगे, यह सदा बना रहेगा, जैसा भविष्यद्वक्ता ने लिखा है:

“उदयाचल से अस्ताचल तक जातियों में मेरा नाम महान् है; और हर स्थान में मेरे नाम के लिए धूप और शुद्ध भेंट चढ़ाई जाती है। क्योंकि जातियों में मेरा नाम अति भययोग्य है, यहोवा कहता है।”

—मलाकी 1:11

हम इस बलिदान को हटाने से कितने दूर हैं। सन्त पौलुस भी हमें आज्ञा देता है:

“अपने शरीरों को जीवित, पवित्र और परमेश्वर को भानेवाला बलिदान करके चढ़ाओ; यही तुम्हारी आत्मिक सेवा है।”

—रोमियों 12:1

उसने बड़ी सटीकता से बोला जब उसने जोड़ा कि यही वह तर्कसंगत सेवा है जो हम परमेश्वर की करते हैं। क्योंकि उसका अभिप्राय परमेश्वर की सेवा और आदर करने की आत्मिक रीति से था, जिसे उसने मौन रूप से मूसा की व्यवस्था के शारीरिक बलिदानों के विपरीत रखा।

इसी प्रकार दान और दया के कार्य ऐसे बलिदान कहलाते हैं जिनसे परमेश्वर प्रसन्न होता है। फिलिप्पियों की उदारता, जिससे उन्होंने सन्त पौलुस की आवश्यकता पूरी की, कहलाती है:

“सुखदायक सुगन्ध, और ग्रहणयोग्य बलिदान जो परमेश्वर को भाता है।”

—फिलिप्पियों 4:18

इसी प्रकार विश्वासियों के सब कार्य आत्मिक बलिदान कहलाते हैं। इस विषय को लम्बा क्यों खींचें, जब कि यह कथन-शैली पवित्रशास्त्र में इतनी बार आती है?

जब लोग अभी व्यवस्था की प्रारम्भिक शिक्षा के अधीन ही चलाए जा रहे थे, तब भी भविष्यद्वक्ताओं ने पर्याप्त स्पष्ट कर दिया था कि बाहरी बलिदानों में एक ऐसा सार और सत्य निहित था जो आज मसीही कलीसिया में बना हुआ है। इसी कारण दाऊद ने प्रार्थना की:

“मेरी प्रार्थना तेरे सामने धूप के समान ऊपर उठे।”

—भजन संहिता 141:2

और होशे धन्यवादों को कहता है:

“हमारे होंठों के बछड़े।”

—होशे 14:2

अन्यत्र दाऊद उन्हें कहता है:

“स्तुतिरूपी बलिदान।”

—भजन संहिता 50:14, 23

प्रेरित ने इसमें उसका अनुसरण किया जब उसने हमें आज्ञा दी:

“परमेश्वर के लिए स्तुतिरूपी बलिदान चढ़ाओ, अर्थात् उन होंठों का फल जो उसके नाम की महिमा करते हैं।”

—इब्रानियों 13:15

यह असम्भव है कि इस प्रकार का बलिदान हमारे प्रभु के भोज में न हो। क्योंकि जब हम उसकी मृत्यु की घोषणा और स्मरण करते और धन्यवाद चढ़ाते हैं, तब हम स्तुति के बलिदान के सिवा और कुछ नहीं करते।

बलिदान चढ़ाने की इस सेवा के कारण सब मसीही कहलाते हैं:

“राजकीय याजकों का समाज।”

—1 पतरस 2:9

क्योंकि यीशु मसीह के द्वारा हम परमेश्वर को स्तुति का बलिदान चढ़ाते हैं—अर्थात् उसके नाम का अंगीकार करनेवाले होंठों का फल, जैसा हमने प्रेरित से सुना है। क्योंकि हम किसी मध्यस्थ के बिना अपनी भेंटों और चढ़ावों के साथ परमेश्वर के सामने नहीं ठहर सकते। यीशु मसीह वही मध्यस्थ है जो हमारे लिए बिनती करता है और जिसके द्वारा हम अपने आपको और अपना सब कुछ पिता को अर्पित करते हैं।

वही हमारा महायाजक है, जिसने स्वर्ग के पवित्रस्थान में प्रवेश करके उसमें हमारे लिए मार्ग खोला और हमें प्रवेश दिलाया। वही हमारी वेदी है, जिस पर हम अपनी भेंटें रखते हैं। उसी में हम जो कुछ साहस करते हैं, साहस करते हैं। संक्षेप में, वही है जिसने:

“हमें अपने पिता के लिए राजा और याजक बनाया।”

—प्रकाशितवाक्य 1:6

यदि कोई प्राचीन लेखकों के अधिकार के आधार पर यह तर्क देना चाहे कि प्रभु-भोज में किया जानेवाला बलिदान उस रीति से भिन्न समझा जाना चाहिए जैसी हमने समझाई है, तो मैं संक्षिप्त उत्तर दूँगा। यदि उद्देश्य पोप के अनुयायियों द्वारा मिस्सा के बलिदान के विषय में गढ़ी गई कल्पना का समर्थन करना हो, तो प्राचीन लेखकों को उसके पक्ष में आगे नहीं लाना चाहिए, क्योंकि वे सब स्पष्ट रूप से और एक स्वर से सिखाते हैं कि प्रभु-भोज में केवल यीशु मसीह के किए हुए उस एक बलिदान का स्मरण मनाया जाता है।

हम तो इस बात से इनकार नहीं करते कि यीशु मसीह की भेंट वहाँ हमारे सामने इस प्रकार प्रस्तुत की जाती है कि हम मानो उसे अपनी आँखों से क्रूस पर देख सकें, जैसा प्रेरित कहता है:

“गलातियों के बीच यीशु मसीह क्रूस पर चढ़ाया हुआ दिखाया गया,”

—गलातियों 3:1

जब उनके सामने उसकी मृत्यु का प्रचार स्पष्ट रूप से किया गया था।

फिर भी मैं देखता हूँ कि प्राचीन लेखकों ने भी इस स्मरण को उससे भिन्न कुछ बना दिया जो प्रभु की विधि की माँग थी, क्योंकि उनका प्रभु-भोज किसी दोहराई गई, या कम से कम नवीकृत, बलि का कोई-सा दृश्य प्रस्तुत करता था। इसलिए विश्वासियों के लिए प्रभु की शुद्ध और सरल विधि को थामे रहने से अधिक सुरक्षित कुछ नहीं।

वास्तव में, यदि हम मानते हैं कि यह प्रभु का भोज है, मनुष्य का नहीं, तो न मानवीय अधिकार, न समय की दीर्घता, न कोई अन्य दिखावा हमें उसकी इच्छा से हटाए या खींचे। इसलिए, जब प्रेरित ने कुरिन्थियों में प्रभु-भोज को उसकी उचित सम्पूर्णता में लौटाना चाहा, जहाँ वह कुछ दुरुपयोगों से बिगड़ गया था, तो उसे जो सबसे उत्तम और छोटा मार्ग मिला वह यह था कि उन्हें इसी एक विधि की ओर लौटाए, जिससे वह दिखाता है कि सदा का नियम लिया जाना चाहिए।

यहाँ पाठक संक्षिप्त सार में वह सब देख सकते हैं जो हमने इन दो संस्कारों के विषय में जानना आवश्यक समझा, जिनका प्रयोग नए नियम के आरम्भ से लेकर युग के अन्त तक मसीही कलीसिया को दिया गया था।

बपतिस्मा मानो कलीसिया में प्रवेश और विश्वास का प्रथम अंगीकार है। प्रभु-भोज एक निरन्तर पोषण है जिसके द्वारा यीशु मसीह अपने विश्वासियों को आत्मिक रीति से खिलाता है। इसलिए जैसे:

“एक परमेश्वर, एक विश्वास, एक मसीह, और एक कलीसिया है, जो उसकी देह है,”

—इफिसियों 4:4–6

वैसे ही बपतिस्मा भी एक ही है, जो कभी दोहराया नहीं जाता। परन्तु प्रभु-भोज बार-बार बाँटा जाता है, ताकि जिन्हें एक बार कलीसिया में ग्रहण करके कलम लगाया गया है, वे समझें कि उन्हें यीशु मसीह के द्वारा निरन्तर पोषण और भोजन दिया जाता है।

इन दो संस्कारों के सिवा, जैसे परमेश्वर ने कोई और ठहराया नहीं, वैसे ही विश्वासियों की कलीसिया को कोई और ग्रहण नहीं करना चाहिए। यह समझना सरल है कि नए संस्कार स्थापित करना या ठहराना मानवीय सामर्थ्य या अधिकार का काम नहीं, यदि हम उसे स्मरण करें जो ऊपर पर्याप्त और स्पष्ट रूप से समझाया जा चुका है: अर्थात् कि संस्कार परमेश्वर द्वारा इसलिए ठहराए गए हैं कि वे हमें उसकी किसी प्रतिज्ञा की शिक्षा दें और हमारे प्रति उसकी कृपा की साक्षी दें।

“प्रभु का सलाहकार कौन हुआ?”

—यशायाह 40:13; रोमियों 11:34

इसलिए कोई भी हमें परमेश्वर की कृपा के विषय में निश्चयपूर्वक कुछ प्रतिज्ञा नहीं दे सकता, हमें विश्वास नहीं दिला सकता कि वह हमारे प्रति कैसा मन रखता है, या घोषित नहीं कर सकता कि वह क्या देना चाहता है और क्या अस्वीकार करना चाहता है। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि कोई भी ऐसा चिह्न नहीं ठहरा या स्थापित कर सकता जो परमेश्वर की किसी इच्छा या प्रतिज्ञा की साक्षी दे। केवल परमेश्वर ही हमें चिह्न देकर हमारे प्रति अपने विषय में साक्षी दे सकता है।

मैं इसे और संक्षेप में और शायद और रूखेपन से, परन्तु और स्पष्टता से कहूँगा: उद्धार की प्रतिज्ञा के बिना कोई संस्कार कभी हो ही नहीं सकता। सब मनुष्य इकट्ठे होकर भी अपनी ओर से हमें हमारे उद्धार के विषय में कुछ प्रतिज्ञा नहीं दे सकते। इसलिए वे अपने आप कोई संस्कार न ठहरा सकते हैं और न स्थापित कर सकते हैं।

इसलिए मसीही कलीसिया इन दो से सन्तुष्ट रहे। वह न केवल अभी किसी और को ग्रहण करने, अनुमोदन करने या मानने से इनकार करे, वरन् युग के अन्त तक किसी तीसरे की कभी इच्छा या आशा भी न करे।

यहूदियों के लिए निश्चय ही, उन चिह्नों के अतिरिक्त जो उनके पास सामान्यतः थे, भिन्न-भिन्न समयों पर अनेक चिह्न ठहराए गए—जैसे मन्ना, चट्टान से बहता जल, पीतल का साँप, और ऐसे ही अन्य। परन्तु इस विविधता का उद्देश्य उन्हें चेताना था कि वे ऐसी आकृतियों में विश्राम न करें जिनकी दशा स्थायी नहीं थी, वरन् परमेश्वर से कोई ऐसी उत्तम वस्तु की आशा रखें जो अटल और अन्तहीन बनी रहे।

हमारी दशा बिलकुल भिन्न है, क्योंकि यीशु मसीह हम पर प्रकट और प्रगट हो चुका है:

“जिसमें बुद्धि और ज्ञान के सारे भण्डार छिपे हुए हैं।”

—कुलुस्सियों 2:3

ये भण्डार उसमें ऐसी प्रचुरता और परिपूर्णता से विद्यमान हैं कि उनमें किसी नई वृद्धि की आशा रखना या माँग करना सचमुच परमेश्वर की परीक्षा लेना और उसे अपने विरुद्ध क्रोधित करना होगा। हमें केवल यीशु मसीह के लिए भूखा होना चाहिए, उसे ढूँढ़ना, उसे निहारना, उसे सीखना और उससे लिपटे रहना चाहिए, उस महान दिन के आने तक जब हमारा प्रभु अपने राज्य की महिमा को पूर्ण रीति से प्रकट करेगा और अपने आपको जैसा वह है वैसा हम पर खुल्लमखुल्ला प्रकट करेगा।

इसी कारण हमारा यह समय पवित्रशास्त्र में “अन्तिम घड़ी,” “अन्तिम दिन,” और “अन्तिम समय” कहा गया है, ताकि कोई किसी नई शिक्षा या प्रकाशन की व्यर्थ आशा से धोखा न खाए।

“पूर्वकाल में परमेश्वर ने बापदादों से भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा बार-बार और भिन्न-भिन्न रीति से बातें करके, इन अन्तिम दिनों में हम से अपने प्रिय पुत्र के द्वारा बातें कीं।”

—इब्रानियों 1:1–2

केवल वही हम पर पिता को प्रकट कर सकता है।

अब, जैसे मनुष्यों को परमेश्वर की कलीसिया में नए संस्कार बनाने या ठहराने से रोका गया है, वैसे ही यह वांछनीय होता कि परमेश्वर द्वारा ठहराए गए उन संस्कारों में यथासम्भव कम मानवीय आविष्कार मिलाया जाए। क्योंकि जैसे दाखमधु पानी मिलाने से फीका पड़ जाता और अपना स्वाद खो देता है, और सारा गुँधा हुआ आटा खमीर से खट्टा हो जाता है, वैसे ही परमेश्वर के भेदों की शुद्धता तब केवल दूषित और भ्रष्ट होती है जब मनुष्य उसमें अपनी ओर से कुछ मिलाता है।

फिर भी हम देखते हैं कि संस्कार, जैसे आज व्यवहार में हैं, अपनी मूल शुद्धता से कितने गिर गए हैं। सब जगह जितना होना चाहिए उससे कहीं अधिक आडम्बर, रीति-रिवाज और नाटकीय प्रदर्शन है, जबकि परमेश्वर के वचन का कोई हिसाब या उल्लेख नहीं, जिसके बिना संस्कार स्वयं संस्कार नहीं रहते।

परमेश्वर की ठहराई हुई रीतियाँ भी इतनी अनगिनत अन्य रीतियों के बीच दिखाई नहीं दे सकतीं, वरन् दबी हुई और पीछे फेंकी हुई हैं। बपतिस्मा में हम उसका कितना कम देखते हैं जिसे अकेले चमकना और प्रकट होना चाहिए—अर्थात् स्वयं बपतिस्मा! प्रभु-भोज तो पूरी तरह दफ़न हो गया जब उसे मिस्सा में बदल और परिवर्तित कर दिया गया। वह कुछ मात्रा में केवल वर्ष में एक बार दिखाई देता है, और तब भी फाड़ा हुआ, काटा हुआ, अलग किया हुआ, तोड़ा हुआ, बँटा हुआ और पूरी तरह विकृत।

कितना उत्तम होता यदि जब भी किसी को बपतिस्मा लेना होता, वह विश्वासियों की मण्डली के सामने प्रस्तुत किया जाता; यदि सारी कलीसिया, उसे देखती, निहारती और उसके लिए प्रार्थना करती हुई, उसे परमेश्वर को अर्पित करती; यदि विश्वास का वह अंगीकार, जिसकी शिक्षा विश्वास में ग्रहण होनेवाले को दी जानी चाहिए, पढ़ा जाता; यदि बपतिस्मा में निहित प्रतिज्ञाएँ सुनाई और घोषित की जातीं; यदि फिर उसे पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा के नाम से बपतिस्मा दिया जाता; और अन्त में उसे प्रार्थनाओं और धन्यवाद के साथ विदा किया जाता।

इस प्रकार बपतिस्मा के लिए कोई उपयोगी बात छूटती नहीं, और वह एक रीति जिसका रचयिता परमेश्वर है, किसी बाहरी भ्रष्टता से धुँधली हुए बिना अत्यन्त स्पष्टता से चमकती।

जहाँ तक इस बात का प्रश्न है कि बपतिस्मा पानेवाला पूरी तरह पानी में डुबोया जाए या उस पर केवल पानी उँडेला जाए, यह कोई महत्त्व की बात नहीं। विभिन्न क्षेत्रों की भिन्न-भिन्न परिस्थितियों के अनुसार यह कलीसियाओं की स्वतन्त्रता में रहना चाहिए, क्योंकि चिह्न दोनों रूपों में दर्शाया जाता है। तो भी “बपतिस्मा देना” शब्द का अर्थ ही पूरा डुबोना है, और यह निश्चित है कि प्राचीन कलीसिया में व्यक्ति को पूरी तरह डुबोने की प्रथा का पालन किया जाता था।

जहाँ तक पवित्र प्रभु-भोज का प्रश्न है, वह बहुत उचित रीति से सम्पन्न किया जा सकता यदि वह कलीसिया को बार-बार, और कम से कम प्रति सप्ताह एक बार, इस प्रकार दिया जाता: पहले, सभा का आरम्भ सार्वजनिक प्रार्थनाओं से हो, फिर वचन का प्रचार हो। तब, मेज़ पर रोटी और दाखमधु रखे जाने पर, सेवक प्रभु-भोज की स्थापना का पाठ करे और फिर उन प्रतिज्ञाओं की घोषणा करे जो उसमें हमारे लिए छोड़ी गई हैं। साथ ही वह उन सब को उससे दूर रखे जिन्हें प्रभु के निषेध ने रोका है।

तब प्रार्थना की जाए कि जैसे हमारे प्रभु ने अपनी कृपा से हमें यह पवित्र पोषण दिया है, वैसे ही वह हमें विश्वास और हार्दिक कृतज्ञता के द्वारा इसे उचित रीति से ग्रहण करने की शिक्षा और तैयारी भी देने की कृपा करे; और कि, क्योंकि हम स्वयं ऐसे भोज के योग्य नहीं, वह अपनी दया से हमें उसके योग्य बना दे।

इस समय भजन गाए जाएँ या पवित्रशास्त्र का कोई अंश पढ़ा जाए। तब विश्वासी इस पवित्र भोजन में उचित और व्यवस्थित रीति से भाग लें, सेवक रोटी तोड़ें और बाँटें और कटोरा प्रस्तुत करें।

जब प्रभु-भोज समाप्त हो जाए, तो शुद्ध विश्वास, उसके दृढ़ अंगीकार, प्रेम और मसीहियों के योग्य आचरण की उत्प्रेरणा दी जाए। अन्त में परमेश्वर को धन्यवाद चढ़ाया जाए और स्तुति गाई जाए।

जब ये सब बातें पूरी हो जाएँ, तो कलीसिया और मण्डली को शान्ति से विदा किया जाए।

चाहे विश्वासी रोटी को अपने हाथ में लें या नहीं; चाहे वे उसे आपस में बाँटें या हर एक वही खाए जो उसे दिया गया; चाहे वे कटोरा सेवक को लौटाएँ या अपने पास बैठे व्यक्ति को दें; चाहे रोटी खमीरी हो या अख़मीरी; चाहे दाखमधु लाल हो या सफ़ेद—यह सब महत्त्वहीन और कोई मायने नहीं रखता। क्योंकि ये बातें तटस्थ हैं और कलीसिया की स्वतन्त्रता पर छोड़ी गई हैं।

फिर भी यह निश्चित है कि प्राचीन कलीसिया की प्रथा यह थी कि हर कोई रोटी अपने हाथ में ले। और यीशु मसीह ने कहा:

“इसे आपस में बाँट लो।”

—लूका 22:17

इतिहासों से स्पष्ट है कि रोम के अध्यक्ष अलेक्ज़ेंडर के समय से पहले प्रभु-भोज में प्रयुक्त रोटी साधारण खमीरी रोटी थी जो सामान्यतः खाई जाती थी। अलेक्ज़ेंडर ही पहला था जिसने अख़मीरी रोटी का प्रयोग पसन्द किया। मुझे इसका कोई कारण नहीं दिखता सिवा इसके कि वह किसी नए तमाशे के द्वारा साधारण लोगों की आँखों को विस्मय से खींचना चाहता था, न कि उनके हृदयों को सच्चे धर्म की शिक्षा देना।

मैं उन सब से अपील करता हूँ जिन्हें भक्ति के प्रति थोड़ा-सा भी लगाव छूता है: क्या वे स्पष्ट नहीं देखते कि संस्कारों के ऐसे प्रयोग में परमेश्वर की महिमा कितनी अधिक स्पष्टता से चमकती है, और विश्वासी उससे इन मूर्खतापूर्ण और खोखले नाटकीय प्रदर्शनों की अपेक्षा कितनी अधिक मिठास और आत्मिक सान्त्वना पाते हैं? ऐसे तमाशे लोगों के मन को धोखा देने के सिवा किसी काम के नहीं, जो उन पर आश्चर्य करते और भय से भर जाते हैं।

वे इसे लोगों को धर्म और परमेश्वर के भय में बनाए रखना कहते हैं, जब कि वास्तव में लोग अन्धविश्वास से जड़ और संवेदनाहीन किए जाकर वहाँ ले जाए जाते हैं जहाँ ये लोग चाहें।

यदि कोई इन आविष्कारों का बचाव प्राचीनता के आधार पर करना चाहे, तो मैं इससे अनजान नहीं कि बपतिस्मा में तेल-अभिषेक और उम्मीदवार पर फूँकने की प्रथा कितनी प्राचीन है, न इससे कि प्रेरितों के युग के कितनी जल्दी बाद हमारे प्रभु का भोज मानो मानवीय आविष्कारों से खोखला हो गया। परन्तु मानवीय अहंकार और दुःसाहस की ऐसी ही उतावली और मूर्खता है कि वह परमेश्वर के भेदों से खिलवाड़ करने से अपने आपको रोक नहीं पाता।

हमें, इसके विपरीत, स्मरण रखना चाहिए कि परमेश्वर अपने वचन की आज्ञाकारिता को इतना मूल्यवान ठहराता है कि वह चाहता है कि हम उसी के द्वारा उसके स्वर्गदूतों और सारे संसार का भी न्याय करें।

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