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अध्याय ग्यारह: बपतिस्मा का अर्थ (भाग 2/2)
इसी कारण सुसमाचार पहले उन्हीं के सामने रखा जाना आवश्यक था, जैसे प्रभु के घराने के ज्येष्ठ सन्तानों के सामने, जिनका यह विशेषाधिकार तब तक उनका था जब तक उन्होंने उसे ठुकरा न दिया। अब भी हमें उन्हें तुच्छ नहीं जानना चाहिए, चाहे उनमें कितना ही विद्रोह दिखाई दे, बल्कि यह आशा रखनी चाहिए कि प्रतिज्ञा के कारण प्रभु की भलाई अब भी उन पर बनी हुई है। क्योंकि पौलुस प्रेरित गवाही देता है कि वह उनसे कभी दूर न होगी, जब वह कहता है कि परमेश्वर के वरदान और बुलाहट अटल हैं, उनमें पछतावा या परिवर्तन नहीं।
अब्राहम को उसके वंशजों के विषय में दी गई प्रतिज्ञा का बल ऐसा ही है। इसलिए, यद्यपि इस विषय में केवल प्रभु का चुनाव ही प्रभावी है, जो स्वर्गीय राज्य के उत्तराधिकारियों को उन लोगों से अलग करता है जिनका उसमें कोई भाग नहीं, फिर भी उस दयालु परमेश्वर ने यह ठहराया कि अपनी दया को विशेष रूप से अब्राहम की सन्तान पर रखे और खतने के द्वारा उसकी गवाही दे और उस पर मुहर लगाए।
वही सिद्धान्त अब मसीहियों में भी लागू होता है। क्योंकि जैसे पौलुस प्रेरित उस स्थान पर कहता है कि यहूदी अपनी जड़ और मूल के कारण पवित्र ठहरे हैं, वैसे ही दूसरी जगह वह पुष्टि करता है कि मसीहियों के बच्चे अब अपने माता-पिता के द्वारा पवित्र किए गए हैं। इसलिए उन्हें उन दूसरों से अलग किया जाना चाहिए जो अशुद्ध बने रहते हैं।
इससे हम सहज ही आँक सकते हैं कि उनका अगला दावा झूठा है: कि खतना किए गए शिशु केवल उन आत्मिक सन्तानों का पूर्वरूप थे जो परमेश्वर के वचन से नया जन्म पाते हैं। पौलुस ने बात को इस प्रकार के रूपक के स्तर तक नहीं पहुँचाया, जब उसने लिखा कि यीशु मसीह यहूदी जाति का सेवक बना ताकि उनके पूर्वजों से की गई प्रतिज्ञाओं को पक्का करे। मानो उसने यह कहा हो: चूँकि अब्राहम और पूर्वजों को दी गई प्रतिज्ञाएँ उनके वंश से सम्बन्ध रखती हैं, इसलिए यीशु मसीह उस जाति को उद्धार देने आया और इस प्रकार अपने पिता की सत्यता को पूरा किया।
इस प्रकार, यीशु मसीह के पुनरुत्थान के बाद भी पौलुस प्रतिज्ञा को ऐसी समझता है जिसका शाब्दिक रूप से पूरा होना अब भी बाकी है। पतरस प्रेरित प्रेरितों के काम के दूसरे अध्याय में यही कहता है, और यहूदियों से घोषणा करता है कि प्रतिज्ञा उनके और उनके बच्चों के लिए है। तीसरे अध्याय में वह उन्हें वाचाओं की सन्तान, अर्थात् उत्तराधिकारी, कहता है, और यहाँ भी इसी प्रतिज्ञा की ओर संकेत करता है।
ऊपर उद्धृत पौलुस के वचन से भी यह स्पष्ट दिखाई देता है। क्योंकि वह खतने को, जो नन्हे शिशुओं को दिया जाता था, मसीह के साथ आत्मिक सहभागिता की गवाही के रूप में प्रस्तुत करता है। और सचमुच, उस प्रतिज्ञा का क्या उत्तर दिया जा सकता है जो प्रभु अपनी व्यवस्था में अपने विश्वासियों से करता है, कि उनके कारण वह उनके बच्चों पर हज़ार पीढ़ियों तक दया करेगा?
क्या हम कहें कि यह प्रतिज्ञा रद्द हो गई? यह तो परमेश्वर की व्यवस्था को नष्ट करना होगा, जो इसके विपरीत मसीह के द्वारा दृढ़ की जाती है, इस हद तक कि वह हमारी भलाई और उद्धार के लिए कार्य करती है।
खतने और बपतिस्मा के बीच जो और भेद वे स्थापित करना चाहते हैं, वे सब हास्यास्पद, असंगत और आपस में विरोधी भी हैं। क्योंकि यह कहने के बाद कि बपतिस्मा मसीही युद्ध के पहले दिन का है, जबकि खतना आठवें दिन का है, जब देह-दमन पूरा हो चुका होता है, वे तुरन्त कहते हैं कि खतना पाप के मरण का चिह्न है, जबकि बपतिस्मा उस पाप के प्रति मर जाने के बाद हमारा गाड़ा जाना है।
कोई पागल भी अपना इतना खुला खण्डन न करेगा। पहले कथन के अनुसार बपतिस्मा को खतने से पहले आना चाहिए; दूसरे के अनुसार कोई यह निष्कर्ष निकाल सकता है कि उसे खतने के बाद आना चाहिए। फिर भी ऐसी असंगति पर हमें आश्चर्य नहीं करना चाहिए। क्योंकि जब मानव मन कल्पित कथाएँ और स्वप्न जैसी कल्पनाएँ गढ़ने में लग जाता है, तब वह ऐसी बेतुकी बातों में ठोकर खा ही जाता है।
इसलिए हम कहते हैं कि इन दो कल्पित भेदों में से पहला निरा कल्पना-मात्र है। आठवें दिन का इस प्रकार रूपक नहीं बनाया जाना चाहिए। यह कहीं उत्तम होगा कि प्राचीनों के साथ इसकी व्याख्या यह की जाए कि जीवन का नवीनीकरण मसीह के पुनरुत्थान पर निर्भर है, जो आठवें दिन हुआ; या यह कि हृदय का यह खतना इस जीवन की सारी अवधि में जारी रहना चाहिए।
फिर भी अधिक सम्भव यही लगता है कि इस दिन को ठहराते समय हमारे प्रभु ने शिशुओं की निर्बलता का ध्यान रखा। क्योंकि जब उसने चाहा कि उसकी वाचा उनके शरीरों पर अंकित हो, तो यह मानना उचित है कि उसने यह अन्तराल इसलिए ठहराया कि वे पहले पर्याप्त बलवन्त हो जाएँ और इससे उनके प्राण संकट में न पड़ें।
उनका दूसरा भेद भी इससे अधिक निश्चित या ठोस नहीं है। यह कहना कि बपतिस्मा के द्वारा हम देह-दमन के बाद गाड़े जाते हैं, केवल उपहास है। बल्कि पवित्रशास्त्र सिखाता है कि हम इसलिए गाड़े जाते हैं कि मरें।
अन्त में वे तर्क देते हैं कि यदि हम खतने को बपतिस्मा की नींव मानें, तो लड़कियों को बपतिस्मा नहीं दिया जाना चाहिए, क्योंकि केवल पुरुषों का ही खतना होता था। परन्तु यदि वे खतने के अर्थ पर ठीक से विचार करते, तो इस तुच्छ तर्क को छोड़ देते। क्योंकि इस चिह्न के द्वारा प्रभु ने इस्राएल की सन्तान के पवित्र किए जाने को प्रकट किया, इसलिए यह निश्चित है कि वह स्त्रियों पर भी उतना ही लागू होता था जितना पुरुषों पर। वह स्त्रियों को शारीरिक रूप से केवल इसलिए नहीं दिया गया कि उनकी प्रकृति इसकी अनुमति नहीं देती थी। इसलिए जब प्रभु ने पुरुष का खतना करने की आज्ञा दी, तब उसने स्त्री को उसके अधीन सम्मिलित कर लिया। चूँकि वह अपनी देह में खतना ग्रहण नहीं कर सकती थी, फिर भी वह पुरुष के खतने में सहभागी थी।
इस प्रकार, इन सब मूर्खतापूर्ण कल्पनाओं को जैसा वे योग्य हैं वैसा अलग करके और ठुकराकर भी हम भीतरी भेद, प्रतिज्ञाओं, प्रयोग और प्रभाव के विषय में बपतिस्मा और खतने के बीच के मेल को बनाए रखते हैं।
वे आगे यह तर्क करते हैं कि शिशुओं को बपतिस्मा नहीं दिया जाना चाहिए, क्योंकि वे उस भेद के योग्य नहीं हैं जो उसमें दर्शाया गया है। क्योंकि बपतिस्मा, जैसा स्पष्ट है, आत्मिक नया जन्म सूचित करता है, जो, उनके कहने के अनुसार, ऐसी अवस्था में हो नहीं सकता। इसलिए वे निष्कर्ष निकालते हैं कि शिशुओं को आदम की सन्तान ही रहने देना चाहिए, जब तक वे इतने बड़े न हो जाएँ कि दूसरा जन्म पा सकें।
यह सब परमेश्वर की सच्चाई का दुष्टतापूर्वक विरोध करता है। क्योंकि यदि उन्हें आदम की सन्तान ही रहने देना है, तो वे मृत्यु में छोड़े जाते हैं, क्योंकि कहा गया है कि आदम में हम मरने के सिवा कुछ नहीं कर सकते। इसके विपरीत यीशु मसीह आज्ञा देता है कि उन्हें उसके पास आने दिया जाए। क्यों? क्योंकि वही जीवन है। इसलिए वह उन्हें अपना भागी बनाना चाहता है कि उन्हें जीवन दे; फिर भी ये लोग उसकी इच्छा के विरुद्ध लड़ते हैं और घोषित करते हैं कि उन्हें मृत्यु में ही रहना चाहिए।
यदि वे यह कहकर बात टालने का यत्न करें कि उनका आशय यह नहीं कि शिशु केवल आदम की सन्तान बने रहने के कारण नाश होते हैं, तो उनकी भूल का पर्याप्त खण्डन पवित्रशास्त्र ही कर देता है, जो कहता है कि आदम में हम सब मरे हुए हैं और मसीह के सिवा हमारे लिए जीवन की कोई आशा नहीं। इसलिए जीवन के उत्तराधिकारी बनाए जाने के लिए हमें उसमें भागी होना अवश्य है।
इसी प्रकार दूसरी जगह कहा गया है कि हम सब स्वभाव से परमेश्वर के क्रोध के अधीन हैं और पाप में गर्भ में आए हैं, जो अपने साथ सदा दण्ड की आज्ञा लिए रहता है। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि परमेश्वर के राज्य के भागी होने के लिए हमें अपनी स्वाभाविक दशा से आगे निकलना अवश्य है। क्या इससे अधिक स्पष्ट कुछ कहा जा सकता है?
“मांस और लहू परमेश्वर के राज्य के वारिस नहीं हो सकते।”
इसलिए, यदि हमें परमेश्वर के वारिस बनना है तो जो कुछ भी स्वभाव से हमारा है उसे मिटाया जाना अवश्य है, और यह नया जन्म के बिना नहीं हो सकता। सारांश यह कि यीशु मसीह का वचन सत्य ठहरना ही चाहिए, जब वह कहता है कि वही जीवन है। इसलिए यदि हमें मृत्यु की दासता से बचना है तो हमें उसमें होना अवश्य है।
परन्तु वे पूछते हैं: शिशु नया जन्म कैसे पा सकते हैं जब उन्हें भले-बुरे का कोई ज्ञान नहीं? हम उत्तर देते हैं कि यद्यपि परमेश्वर का कार्य हम से छिपा और हमारी समझ से परे है, तौभी इस कारण वह पूरा होना नहीं रुकता। अब यह प्रत्यक्ष है कि प्रभु उन शिशुओं को नया जन्म देता है जिन्हें वह बचाना चाहता है, क्योंकि यह निश्चित है कि वह उनमें से कुछ को बचाता है। क्योंकि यदि वे भ्रष्टता में जन्मे हैं, तो स्वर्गीय राज्य में प्रवेश करने से पहले उन्हें उससे शुद्ध किया जाना अवश्य है, जिसमें कोई अशुद्ध वस्तु प्रवेश नहीं कर सकती। यदि वे पापी जन्मे हैं, जैसा दाऊद और पौलुस प्रेरित गवाही देते हैं, तो परमेश्वर को ग्रहणयोग्य होने के लिए उनका धर्मी ठहराया जाना अवश्य है।
हम इस बात पर और प्रश्न क्यों करें, जब हमारा प्रभु हमें बताता है कि उसके राज्य में प्रवेश करने के लिए हम सबका नया जन्म पाना अवश्य है? और इसके विरुद्ध बड़बड़ानेवालों को चुप कराने के लिए उसने यूहन्ना बपतिस्मा देनेवाले में दिखा दिया कि वह दूसरों में क्या कर सकता है, जब उसने उसे माता के गर्भ ही से पवित्र किया।
और यह आपत्ति भी स्वीकार नहीं की जानी चाहिए कि क्योंकि यह एक बार हुआ, इसलिए यह नहीं निकलता कि यह सदा होता है। हम इस प्रकार तर्क नहीं करते। हम केवल यह दिखाना चाहते हैं कि वे शिशुओं के प्रति परमेश्वर की सामर्थ्य को अन्यायपूर्वक सीमित करते हैं—ऐसी सामर्थ्य जिसे उसने एक बार खुलकर प्रकट कर दिया है।
उनका दूसरा बहाना भी उतना ही मूर्खतापूर्ण है, जब वे कहते हैं कि पवित्रशास्त्र माता के गर्भ से का प्रयोग बचपन से के अर्थ में करता है। क्योंकि स्पष्ट है कि स्वर्गदूत ने जकर्याह से बात करते समय यही पक्का कहना चाहा था कि यूहन्ना माता के गर्भ में ही पवित्र आत्मा से भर जाएगा। इसलिए प्रभु जिसे चाहे उसे पवित्र करेगा, जैसे उसने यूहन्ना को पवित्र किया, क्योंकि उसका हाथ छोटा नहीं हो गया है।
सचमुच, इसी कारण यीशु मसीह अपने शैशव में पवित्र किया गया, कि जीवन की हर अवस्था उसमें उसकी अनुग्रहपूर्ण इच्छा के अनुसार पवित्र हो जाए। क्योंकि उसने हमारा ही मांस और पाप को छोड़ सब बातों में हमारे जैसा देह धारण किया, कि उसी मांस में, जिसमें अपराध किया गया था, दण्ड चुकाए; जिस स्वभाव का उद्धार करना चाहता था उसी में सारी धार्मिकता और सिद्ध आज्ञाकारिता को पूरा करे; और हमारी दुर्बलताओं को करुणामय कोमलता से सहने के लिए और अधिक प्रवृत्त हो। उसी प्रकार वह अपनी मानवता में गर्भ-धारण के समय से ही पूर्णतः पवित्र किया गया, कि उसमें सहभागी होने के द्वारा शिशु भी पवित्र किए जा सकें।
ये दोनों बातें पवित्रशास्त्र में पर्याप्त रूप से प्रमाणित हैं। जहाँ तक पहली बात का सम्बन्ध है, वह अब्राहम का वंश और दाऊद के वंश का फल कहलाता है, और दोनों का पुत्र भी, क्योंकि वह उनकी वंशावली और सन्तान में से उतरा। इसी से पौलुस कहता है कि शरीर के अनुसार वह यहूदियों में से आया। दूसरी जगह कहा गया है कि उसने स्वर्गदूतों का स्वभाव नहीं, परन्तु अब्राहम के वंश का स्वभाव लिया। तब कारण बताया जाता है: कि वह सब बातों में हमारे समान हो, केवल पाप को छोड़कर। इसलिए इसमें कोई सन्देह नहीं कि हमारे ही मांस और सच्ची मानवता में उसने वह सब पूरा किया जो हमारे छुटकारे से सम्बन्ध रखता है।
दूसरी बात के विषय में हम जानते हैं कि वह पवित्र आत्मा से गर्भ में आया, कि उसकी मानवता सारी परिपूर्णता में पवित्र की जाए और उसके पवित्र किए जाने का फल हम पर उण्डेला जाए। अब, यदि यीशु उन सब अनुग्रहों का आदर्श और नमूना है जो प्रभु अपने बच्चों को देता है, तो वह इस विषय में भी हमारे लिए उदाहरण हो सकता है: कि परमेश्वर का हाथ शिशुओं के प्रति उतना ही सामर्थी है जितना किसी और अवस्था के लोगों के प्रति।
चाहे जो हो, हमें अनिवार्य रूप से यह निष्कर्ष निकालना चाहिए कि प्रभु अपने चुने हुओं में से किसी को भी इस संसार से तब तक नहीं उठाता जब तक पहले अपने आत्मा के द्वारा उसे पवित्र और नया जन्म न दे दे।
वे आपत्ति करते हैं कि सत्य उस नया जन्म के सिवा किसी को नहीं मानता जो अविनाशी बीज, अर्थात् परमेश्वर के वचन, से पूरा होता है। हम उत्तर देते हैं कि वे पतरस प्रेरित के कथन को ठीक नहीं समझते। यह कहते हुए वह केवल उन्हीं से बात करता है जिन्हें सुसमाचार की शिक्षा मिल चुकी थी। ऐसे लोगों के लिए परमेश्वर का वचन सदा आत्मिक नया जन्म का बीज है। परन्तु इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि शिशु प्रभु की सामर्थ्य से नया जन्म नहीं पा सकते—ऐसा कार्य जो हम से छिपा और गुप्त है, पर उसके लिए सहज और बिना परिश्रम का है।
इसके अतिरिक्त, यह कहना कि प्रभु किसी रीति से उन पर अपने आपको प्रकट नहीं कर सकता, सर्वथा अनिश्चित और निराधार है। वे पूछते हैं: यह कैसे हो सकता है, जब विश्वास सुनने से आता है, जैसा पौलुस प्रेरित कहता है, और शिशुओं में भले-बुरे का कोई विवेक नहीं? परन्तु वे यह नहीं देखते कि पौलुस केवल उस साधारण रीति की बात कर रहा है जिससे प्रभु अपने लोगों को विश्वास देने के लिए कार्य करता है, यह नहीं कि वह किसी और साधन से कार्य करने में असमर्थ है। सचमुच, उसने ऐसा बहुतों में किया है जिन्हें उसने भीतर से छूकर अपने नाम के ज्ञान की ओर खींचा, बिना उन्हें कोई बोला हुआ वचन सुनाए।
और क्योंकि वे कल्पना करते हैं कि यह शिशुओं के स्वभाव के विरुद्ध है, जिनमें, मूसा के अनुसार, भले और बुरे का भेद अभी नहीं है, मैं उनसे पूछता हूँ कि वे परमेश्वर की सामर्थ्य को क्यों सीमित करना चाहते हैं, मानो वह शिशुओं में आंशिक रूप से वह कार्य नहीं कर सकता जो वह उनमें पूर्ण रूप से करेगा।
क्योंकि यदि जीवन की परिपूर्णता परमेश्वर के सिद्ध ज्ञान में है, तो चूँकि प्रभु उनमें से कुछ को, जो शिशु अवस्था में इस संसार से चले जाते हैं, उद्धार के लिए सुरक्षित रखता है, इसलिए यह निश्चित है कि उन्हें परमेश्वर का पूरा प्रकाशन प्राप्त होगा। अतः जब वे आने वाले जीवन में उसे सिद्ध रूप से पाएँगे, तो वे यहाँ उसका थोड़ा-सा स्वाद क्यों नहीं पा सकते?
हमारा आशय यह कहना नहीं कि शिशुओं में विश्वास होता है, क्योंकि हम नहीं जानते कि परमेश्वर उनके भीतर कैसे कार्य करता है। हमारा उद्देश्य तो इन लोगों की उतावली और ढिठाई को प्रकट करना है, जो अपनी मूर्खतापूर्ण कल्पना के अनुसार जो चाहे उसकी पुष्टि या खण्डन करते हैं, उन सब कारणों की कोई परवाह किए बिना जो उनके विरुद्ध दिए जा सकते हैं।
परन्तु वे बात को और आगे बढ़ाते हैं, यह कहते हुए कि बपतिस्मा पश्चाताप और विश्वास का संस्कार है, जैसा पवित्रशास्त्र हमें सिखाता है। चूँकि पश्चाताप और विश्वास शिशु में नहीं हो सकते, इसलिए शिशुओं को यह संस्कार देना अनुचित है, क्योंकि ऐसा करने से उसका अर्थ निरर्थक हो जाता है।
ये तर्क हमारे विरुद्ध कम और परमेश्वर की विधि के विरुद्ध अधिक लड़ते हैं। क्योंकि पवित्रशास्त्र की अनेक गवाहियों से—विशेषकर यिर्मयाह के चौथे अध्याय से—स्पष्ट है कि खतना पश्चाताप का चिह्न था। पौलुस भी उसे विश्वास की धार्मिकता का संस्कार कहता है। वे परमेश्वर से पूछें कि उसने उसे शिशुओं को क्यों दिलवाया। क्योंकि दोनों संस्कारों में एक ही सिद्धान्त लागू है, इसलिए यदि शिशुओं को खतना देने में कोई अनुचित बात नहीं थी, तो बपतिस्मा देने में भी कोई अनुचित बात नहीं।
यदि वे अपने नित्य के बहाने की शरण लें—कि शिशु उन सच्चे बच्चों का रूप थे जिन्हें नया जन्म मिलता है—तो वह बचाव उनसे पहले ही छीन लिया गया है। इसलिए हम यह कहते हैं: चूँकि हमारे प्रभु ने चाहा कि खतना, यद्यपि वह विश्वास और पश्चाताप का संस्कार था, शिशुओं को दिया जाए, इसलिए उन्हें बपतिस्मा देने में कोई अनौचित्य नहीं—जब तक कि ये निन्दक परमेश्वर पर ऐसी विधि बनाने का दोष न लगाना चाहें। परन्तु परमेश्वर का सत्य, बुद्धि और न्याय उसके सब कामों में इतने स्पष्ट चमकते हैं कि उनकी मूर्खता, झूठ और दुष्टता को लज्जित कर दें।
क्योंकि यद्यपि शिशु तब यह नहीं समझते थे कि खतने का क्या अर्थ है, फिर भी उनका शरीर में खतना किया गया, अपने भ्रष्ट स्वभाव के भीतरी दमन के चिह्न के रूप में, जिस पर उन्हें अपनी आयु के अनुसार मनन करना और उसका अनुसरण करना था, क्योंकि उन्हें बचपन ही से उसकी शिक्षा दी गई थी।
इसी तर्क से हम उन वचनों का उत्तर दे सकते हैं जो वे बपतिस्मा के अर्थ के विषय में उद्धृत करते हैं। उदाहरणार्थ, पौलुस के उसे नया जन्म और नवीकरण का स्नान कहने से वे यह तर्क करते हैं कि वह केवल उन्हीं को दिया जाना चाहिए जो नया जन्म और नवीकरण पाने योग्य हैं। परन्तु हम सदा यही उत्तर देंगे: खतना नया जन्म और नवीकरण का चिह्न है; इसलिए वह केवल उन्हीं को दिया जाना चाहिए जो पहले से उनमें भागी हैं। इस प्रकार, उनके तर्क के अनुसार, शिशुओं के खतने की आज्ञा देनेवाली परमेश्वर की विधि मूर्खतापूर्ण और अनुचित ठहरेगी।
इसलिए ऐसा कोई तर्क जो खतने के विरुद्ध भी समान रूप से लागू होता है, बपतिस्मा के विरुद्ध आपत्ति के रूप में स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए। न वे यह कहकर बात टाल सकते हैं कि जो कुछ प्रभु ने स्थापित किया है उसे बिना और जाँच के भला और पवित्र मानकर ग्रहण कर लेना चाहिए, जबकि जिन बातों की उसने स्पष्ट आज्ञा नहीं दी उनके प्रति ऐसा आदर उचित नहीं। क्योंकि हमें केवल इस प्रश्न का उत्तर चाहिए: क्या परमेश्वर ने शिशुओं के लिए खतना उचित कारण से स्थापित किया, या नहीं?
यदि खतना ठीक ठहराया गया था, ताकि उसके विरुद्ध कोई बेतुकी बात न कही जा सके, तो बपतिस्मा के विषय में भी यही सत्य है। इसलिए हम उनके तर्क का उत्तर इस प्रकार देते हैं।
शिशु नया जन्म और नवीकरण का चिह्न पाते हैं। यदि वे समझ की आयु तक पहुँचने से पहले इस संसार से चले जाएँ, तो यदि वे प्रभु के चुने हुओं में से हैं, तो वे उसके आत्मा के द्वारा, जैसा वह उचित समझे, नया जन्म और नवीकरण पाते हैं, एक ऐसी सामर्थ्य के अनुसार जो हम से छिपी और हमारी समझ से परे है। यदि वे ऐसी आयु तक जीवित रहें जब उन्हें बपतिस्मा के सिद्धान्त की शिक्षा दी जा सके, तो वे सीखेंगे कि अपने सारे जीवन में उन्हें इस नया जन्म का अनुसरण करने के सिवा और कुछ नहीं करना चाहिए, जिसका चिह्न वे शैशव से धारण किए हुए हैं।
इसी प्रकार हमें पौलुस की उस शिक्षा को समझना चाहिए जो रोमियों के छठे और कुलुस्सियों के दूसरे अध्याय में है, कि बपतिस्मा के द्वारा हम मसीह के साथ गाड़े गए हैं। ये बातें कहते हुए उसका आशय यह नहीं कि वे बपतिस्मा से पहले होनी चाहिए। वह केवल यह सिखाता है कि बपतिस्मा का सिद्धान्त क्या है, जो बपतिस्मा पाने के बाद भी उतनी ही भली-भाँति सिखाया और सीखा जा सकता है जितना उससे पहले। इसी प्रकार मूसा और भविष्यद्वक्ताओं ने इस्राएल के लोगों को सिखाया कि खतना उसी वास्तविकता का चिह्न है, यद्यपि उनका खतना बचपन में हो चुका था।
इसलिए, यदि वे यह निष्कर्ष निकालना चाहें कि बपतिस्मा में जो कुछ दर्शाया गया है वह सब बपतिस्मा से पहले होना चाहिए, तो उनकी भूल अत्यन्त घोर है—विशेषकर इसलिए कि ये बातें उन लोगों को लिखी गई थीं जो पहले ही बपतिस्मा पा चुके थे। यही गलातियों को लिखे पौलुस के वचनों के विषय में भी कहना चाहिए, कि हम सब जिन्होंने बपतिस्मा लिया है यीशु मसीह को पहन चुके हैं। यह सच है—पर किस उद्देश्य से? इसलिए कि अब से हम उसमें जीवन बिताएँ, इसलिए नहीं कि हम पहले से उसमें जीवन बिता रहे थे।
और यद्यपि वयस्कों को तब तक चिह्न नहीं पाना चाहिए जब तक उन्हें पहले सूचित वास्तविकता की कुछ समझ न हो, शिशुओं की स्थिति भिन्न है, जैसा अन्यत्र समझाया जाएगा। इसलिए ऐसे सब तर्क, जब इस रीति से सँभाले जाएँ, तो पवित्रशास्त्र के बिगाड़ के सिवा कुछ नहीं हैं, जैसा हर कोई देख सकता है।
उनके शेष तर्कों को हम संक्षेप में निपटाएँगे, जिनका समाधान बिना बड़ी कठिनाई के हो सकता है। वे कहते हैं कि बपतिस्मा हमारे पापों की क्षमा है, जिसमें वे बड़ी भूल करते हैं। क्योंकि तब यीशु मसीह के लहू का क्या होगा, जिसमें अकेले हमें पूर्ण और सम्पूर्ण शुद्धि मिलती है?
परन्तु हम इस भूल को, जो उनमें सामान्य है, क्षमा कर दें और उनके तर्क को पवित्रशास्त्र के अनुसार ढालकर अधिक सशक्त रूप दें: बपतिस्मा हमारे पापों की क्षमा की गवाही है। यह हम मानते हैं। परन्तु हम कहते हैं कि इसी कारण वह शिशुओं का है। क्योंकि चूँकि वे पापी हैं, इसलिए उन्हें क्षमा और अपनी अशुद्धताओं की माफ़ी चाहिए। अब, जब प्रभु गवाही देता है कि वह इस आयु के लोगों पर दया करना चाहता है, तो हम उन्हें वह चिह्न क्यों न दें, जो स्वयं वास्तविकता से छोटी बात है? इसलिए हम उनका तर्क उन्हीं पर लौटा देते हैं।
बपतिस्मा पापों की क्षमा का चिह्न है। शिशु अपने पापों की क्षमा पाते हैं। इसलिए चिह्न, जिसे वास्तविकता के पीछे आना चाहिए, उन्हें ठीक ही दिया जाता है।
वे इफिसियों के पाँचवें अध्याय में लिखी बात सामने लाते हैं: कि हमारे प्रभु ने अपनी कलीसिया को जल के स्नान से जीवन के वचन के द्वारा शुद्ध किया। फिर भी यह वचन भी उन्हीं के विरुद्ध काम करता है। क्योंकि इससे हम इस प्रकार तर्क करते हैं: यदि हमारा प्रभु चाहता है कि उसकी कलीसिया की शुद्धि बपतिस्मा के चिह्न से प्रमाणित और पक्की की जाए, और शिशु कलीसिया के हैं—क्योंकि वे परमेश्वर के लोगों में गिने जाते हैं और स्वर्ग के राज्य के हैं—तो इससे यह निकलता है कि उन्हें कलीसिया के शेष लोगों के साथ अपनी शुद्धि की गवाही पानी चाहिए। क्योंकि जब पौलुस कहता है कि हमारे प्रभु ने बपतिस्मा के द्वारा अपनी कलीसिया को शुद्ध किया, तो वह सारी कलीसिया को सामान्य रूप से, बिना किसी अपवाद के, समेटता है।
यही निष्कर्ष हम उनके उस हवाले से भी निकाल सकते हैं जो वे पौलुस की कुरिन्थियों की पहली पत्री के बारहवें अध्याय से देते हैं, कि बपतिस्मा के द्वारा हम मसीह में सम्मिलित किए जाते हैं। क्योंकि यदि शिशु मसीह की देह के हैं, जैसा जो कहा जा चुका है उससे स्पष्ट है, तो उचित है कि वे बपतिस्मा लें और इस प्रकार उसकी देह के अन्य अंगों के साथ जोड़े जाएँ।
देखिए, वे कितने ज़ोर से हमारे विरुद्ध लड़ते हैं, इतने वचनों को बिना बुद्धि, सम्बन्ध या समझ के ढेर करके!
वे आगे पवित्रशास्त्र में दर्ज रीति से यह दिखाने का यत्न करते हैं कि केवल वयस्क ही बपतिस्मा पाने के योग्य हैं। वे कहते हैं, पतरस प्रेरित ने, जब उन लोगों ने जो हमारे प्रभु की ओर फिरना चाहते थे उससे पूछा कि वे क्या करें, यह उत्तर दिया:
“मन फिराओ, और तुम में से हर एक अपने पापों की क्षमा के लिए बपतिस्मा ले।”
इसी प्रकार, जब खोजे ने फिलिप्पुस प्रेरित से पूछा कि क्या वह बपतिस्मा ले सकता है, तो फिलिप्पुस ने उत्तर दिया कि ले सकता है, यदि वह पूरे मन से विश्वास करे। इससे वे यह निष्कर्ष निकालते हैं कि बपतिस्मा केवल उन्हीं के लिए ठहराया गया है जिनमें विश्वास और पश्चाताप है।
परन्तु यदि हमें इस प्रकार तर्क करना है, तो पहला वचन दिखाएगा कि अकेला पश्चाताप पर्याप्त है, क्योंकि उसमें विश्वास का उल्लेख नहीं; और दूसरा दिखाएगा कि अकेला विश्वास पर्याप्त है, क्योंकि वहाँ पश्चाताप की माँग नहीं। वे मुझसे कहेंगे कि एक वचन दूसरे का पूरक है और इसलिए दोनों को ठीक समझने के लिए उन्हें जोड़ना चाहिए। उसी प्रकार हम कहते हैं कि सब बातों का ठीक मेल बैठाने के लिए अन्य सम्बन्धित वचनों को भी साथ लाना चाहिए, क्योंकि पवित्रशास्त्र का सच्चा अर्थ प्रायः प्रसंग पर निर्भर करता है।
तो हम देखते हैं कि ये लोग जो पूछते हैं कि प्रभु की ओर फिरने के लिए उन्हें क्या करना चाहिए, समझने की आयु के हैं। हम यह नहीं कहते कि ऐसे लोगों को तब तक बपतिस्मा दिया जाए जब तक पहले उनके विश्वास और पश्चाताप का प्रमाण न मिले, जहाँ तक मनुष्य इन्हें पहचान सकते हैं। परन्तु मसीहियों से जन्मे शिशुओं को दूसरी श्रेणी में रखा जाना चाहिए।
यह भेद हम अपने मन की कल्पना से नहीं गढ़ते, परन्तु इसे करने के लिए हमारे पास पवित्रशास्त्र का निश्चित अधिकार है। हम देखते हैं कि प्राचीन काल में यदि कोई जीवते परमेश्वर की सेवा करने के लिए इस्राएल के लोगों से आ मिलता, तो खतना पाने से पहले उसे व्यवस्था ग्रहण करनी और उस वाचा की शिक्षा लेनी पड़ती जो हमारे प्रभु ने अपने लोगों से बाँधी थी। यह इसलिए कि वह स्वभाव से उस यहूदी जाति का नहीं था जिसका वह संस्कार था।
सचमुच, अब्राहम के साथ व्यवहार करते समय भी प्रभु ने यह आज्ञा देकर आरम्भ नहीं किया कि वह बिना जाने क्यों खतना करवाए। बल्कि उसने उसे उस वाचा की शिक्षा दी जिसे वह खतने के द्वारा पक्का करना चाहता था; और जब अब्राहम ने प्रतिज्ञा पर विश्वास किया, तब प्रभु ने उसके लिए संस्कार ठहराया।
तो फिर, अब्राहम चिह्न केवल विश्वास के बाद क्यों पाता है, जबकि उसका पुत्र इसहाक उसे कुछ भी समझने से पहले पा लेता है? इसलिए कि जो वयस्क अभी प्रभु की वाचा में भागी नहीं है, उसे उसमें प्रवेश करने से पहले जानना अवश्य है कि वह वाचा क्या है। परन्तु उसके यहाँ जन्मा शिशु, अपने पिता से की गई प्रतिज्ञा के अनुसार उत्तराधिकार से वाचा का वारिस होने के कारण, चिह्न को उसका अर्थ समझे बिना पाने के योग्य है।
अथवा, इसे और संक्षेप और स्पष्टता से कहें: चूँकि विश्वासी का बच्चा परमेश्वर की वाचा में उसे समझे बिना भागी है, इसलिए उसे चिह्न से वंचित नहीं किया जाना चाहिए, बल्कि वह उसे बिना ऐसी समझ की आवश्यकता के पाने के योग्य है।
इसी कारण हमारा प्रभु कहता है कि इस्राएल के वंश में जन्मे बच्चे उसके लिए अपनी ही सन्तान के रूप में उत्पन्न हुए। वह अपने आपको उन सब लोगों की सन्तानों का पिता मानता है जिनसे उसने प्रतिज्ञा की कि वह उनका और उनकी सन्तान का परमेश्वर होगा।
परन्तु अविश्वासियों से जन्मा अविश्वासी तब तक वाचा से अपरिचित रहता है जब तक वह परमेश्वर के ज्ञान तक न पहुँचे। इसलिए यह आश्चर्य की बात नहीं कि चिह्न में उसका कोई भाग नहीं, क्योंकि अन्यथा वह उसे झूठे बहाने से पाता। इसी से पौलुस कहता है कि अपनी मूर्तिपूजा के समय अन्यजाति लोग वाचा और विधान से रहित थे।
अब बात पर्याप्त स्पष्ट हो गई है। जो वयस्क हमारे प्रभु की ओर फिरना चाहते हैं उन्हें विश्वास और पश्चाताप के बिना बपतिस्मा में ग्रहण नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि उस वाचा में, जिसे बपतिस्मा सूचित करता है, उनके प्रवेश का यही एकमात्र मार्ग है। परन्तु मसीहियों के बच्चे, जिनका वाचा पर प्रतिज्ञा की सामर्थ्य से उत्तराधिकार का अधिकार है, केवल इसी कारण बपतिस्मा में सम्मिलित किए जाने के योग्य हैं।
यही उन लोगों के विषय में कहना चाहिए जिन्होंने यूहन्ना से बपतिस्मा लेने के लिए अपने दोष और अपराध मान लिए, क्योंकि उनमें हमें कोई और उदाहरण नहीं दिखता सिवाय उसके जिसका पालन हम स्वयं करेंगे। क्योंकि यदि कोई यहूदी, तुर्क या मूर्तिपूजक हमारे पास आए, तो हम उसे बपतिस्मा देने से पहले उसे ठीक से शिक्षा न दें और ऐसा अंगीकार न ले लें जो हमें सन्तोषजनक लगे, ऐसा हम न करेंगे। फिर भी यद्यपि अब्राहम का खतना शिक्षा पाने के बाद ही हुआ, यह बात उसके बाद आनेवाली उसकी सन्तानों को बिना शिक्षा के तब तक खतना पाने से नहीं रोकती जब तक वे उसे ग्रहण करने के योग्य न हो जाएँ।
परन्तु यह और दिखाने के लिए कि बपतिस्मा का स्वरूप ऐसा है कि उसके लिए वर्तमान नया जन्म आवश्यक है, वे यूहन्ना के तीसरे अध्याय की गवाही का सहारा लेते हैं:
“जब तक कोई मनुष्य जल और आत्मा से न जन्मे, वह स्वर्ग के राज्य में प्रवेश नहीं कर सकता।”
देखो, वे कहते हैं, हमारा प्रभु बपतिस्मा को नया जन्म कैसे कहता है। यदि इसलिए शिशु नया जन्म पाने में असमर्थ हैं, तो वे बपतिस्मा पाने के योग्य कैसे हो सकते हैं, जो बिना नया जन्म के हो ही नहीं सकता?
पहले तो, हम उन्हें इस प्रकार अपनी झूठी व्याख्याओं से पवित्रशास्त्र को उलटने नहीं देंगे। क्योंकि इस वचन में प्रभु यीशु मसीह बपतिस्मा का कोई उल्लेख नहीं करता। वह तो शारीरिक वस्तुओं से ली गई उपमा और तुलना का प्रयोग करता है, ताकि आत्मिक और स्वर्गीय बातों को ऐसे रूप में प्रस्तुत करे।
कि ऐसा ही है, यह इस बात से प्रकट होता है जो वह थोड़ी देर बाद नीकुदेमुस से कहता है, जिससे वह बात कर रहा था: कि अब तक उसने उससे केवल पृथ्वी की बातें कही थीं। क्योंकि यद्यपि उसका विषय उच्च और आत्मिक बातों से सम्बन्ध रखता था, फिर भी उसने उन्हें शारीरिक रीति से सँभाला और समझाया, दूसरे की मन्दता और सीमित समझ के अनुसार अपने को ढालते हुए।
इसलिए यह दिखाकर कि स्वाभाविक मनुष्य, अपने स्वभाव के कारण, पृथ्वी की ओर झुकता है और स्वर्ग की अभिलाषा नहीं करता, मसीह का आशय जल और आत्मा के इस नया जन्म से यह है कि मनुष्य अपना बोझिलपन त्यागे और एक हल्के और परिष्कृत स्वभाव में सुधारा जाए।
इसके अतिरिक्त, एक और कारण से भी स्पष्ट है कि उनकी व्याख्या स्वीकार नहीं की जानी चाहिए: वह हर उस व्यक्ति को परमेश्वर के राज्य से बाहर कर देगी जिसने बपतिस्मा नहीं लिया। अब मान लो उनका मत प्रबल हो और शिशुओं को बपतिस्मा न दिया जाए। तब वे उस छोटे बच्चे के विषय में क्या कहेंगे जिसे हमारे विश्वास की ठीक शिक्षा दी गई थी पर जो बपतिस्मा देने का अवसर मिलने से पहले मर गया?
हमारा प्रभु कहता है:
“जो पुत्र पर विश्वास करता है, अनन्त जीवन उसका है, और वह दण्ड में नहीं आता, परन्तु वह मृत्यु से पार होकर जीवन में प्रवेश कर चुका है।”
वह कहीं भी उन्हें दोषी नहीं ठहराता जिन्होंने बपतिस्मा नहीं लिया। हम यह बपतिस्मा के तिरस्कार में नहीं कहते, मानो उसकी उपेक्षा की जा सकती हो। हम केवल यह दिखाना चाहते हैं कि बपतिस्मा इतना पूर्णतः आवश्यक नहीं कि जो व्यक्ति उसे पाने से उचित रूप से रोका गया हो वह क्षमा के योग्य न हो।
परन्तु उनकी व्याख्या के अनुसार ऐसे सब लोग बिना अपवाद दोषी ठहरेंगे, चाहे उनमें वह विश्वास रहा हो जिससे हम यीशु मसीह को पाते हैं। इसके अतिरिक्त, इसके सिवा भी वे सब शिशुओं को दोषी ठहराते हैं, क्योंकि वे उन्हें बपतिस्मा देने से इनकार करते हैं जबकि बपतिस्मा को उद्धार के लिए आवश्यक बताते हैं। अब वे अपनी शिक्षा का मेल मसीह के उस वचन से बैठाएँ जिसके द्वारा स्वर्ग का राज्य शिशुओं को सौंपा गया है।
और यदि हम वह सब मान भी लें जो वे माँगते हैं, तो भी उनका निष्कर्ष झूठा ही रहेगा, क्योंकि वह इस झूठी और मूर्खतापूर्ण धारणा से आगे बढ़ता है कि शिशु नया जन्म नहीं पा सकते। अब तक दिया गया विस्तृत तर्क इसके विपरीत को स्पष्ट कर देता है: नया जन्म के बिना परमेश्वर के राज्य में प्रवेश नहीं, न शिशुओं के लिए न वयस्कों के लिए। अब, चूँकि जो शिशु अवस्था में मरते हैं उनमें से कुछ परमेश्वर के राज्य के वारिस हैं, इसलिए अनिवार्य रूप से यह निकलता है कि पहले उन्हें नया जन्म मिलता है।
वे इसी उद्देश्य के लिए पतरस प्रेरित के कथन से अपने को सज्जित करते हैं:
“बपतिस्मा, जो नूह के जहाज़ के प्रतिरूप के अनुसार है, हमारे उद्धार के लिए दिया गया है—शरीर के मैल को दूर करना नहीं, परन्तु परमेश्वर के प्रति एक अच्छे विवेक का उत्तर, जो यीशु मसीह के पुनरुत्थान पर विश्वास के द्वारा आता है।”
यदि बपतिस्मा की वास्तविकता परमेश्वर के सम्मुख विवेक की एक अच्छी गवाही है, तो जब यह उससे अलग कर दी जाए, तब निरर्थक और व्यर्थ वस्तु के सिवा और क्या बचता है? इसलिए यदि शिशुओं में यह अच्छा विवेक नहीं हो सकता, तो उनका बपतिस्मा व्यर्थता और धुएँ के सिवा कुछ नहीं।
यहाँ वे अपनी सदा की भूल में पड़ते हैं कि बिना अपवाद, पूर्ण रूप से, वास्तविकता को चिह्न से पहले आना ही चाहिए। इस भूल का हम पहले ही भरपूर खण्डन कर चुके हैं। क्योंकि खतना, यद्यपि शिशुओं को दिया गया, विश्वास की धार्मिकता का संस्कार और पश्चाताप तथा नया जन्म का चिह्न बने रहने से नहीं रुका। यदि ये बातें असंगत होतीं, तो परमेश्वर ऐसी विधि न बनाता। परन्तु हमें यह सिखाकर कि खतने का सार ऐसा है, और फिर भी उसे शिशुओं को सौंपकर, वह पर्याप्त दिखा देता है कि इन बातों के विषय में वह उन्हें भविष्य के लिए दिया गया था।
इसलिए, जब शिशुओं को बपतिस्मा दिया जाता है तब जिस वर्तमान वास्तविकता पर हमें विचार करना चाहिए वह यह है कि वह उन पर परमेश्वर की वाचा पर मुहर लगाकर और उसे पक्का करके उनके उद्धार की गवाही देता है। शेष सूचित वास्तविकताएँ उनमें उस समय प्रभावी होती हैं जो प्रभु ने उन्हें इन बातों का ज्ञान देने के लिए ठहराया है।
सबसे बढ़कर, अपनी बड़ी ढाल और अपने पक्ष के मुख्य गढ़ के रूप में वे उस बात का सहारा लेते हैं जिसे वे बपतिस्मा की मूल स्थापना कहते हैं, जो उनके अनुसार मत्ती के अन्त में लिखे वचनों से स्थापित हुई थी:
“जाओ, सब जातियों को सिखाओ, और उन्हें पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा के नाम से बपतिस्मा दो, और उन्हें सब बातें मानना सिखाओ जिनकी मैंने तुम्हें आज्ञा दी है।”
इसके साथ वे मरकुस के अन्त का वचन जोड़ते हैं:
“जो विश्वास करे और बपतिस्मा ले, उसी का उद्धार होगा।”
देखो, वे कहते हैं, हमारा प्रभु कैसे आज्ञा देता है कि लोगों को बपतिस्मा देने से पहले शिक्षा दी जाए और दिखाता है कि विश्वास को बपतिस्मा से पहले आना चाहिए। सचमुच, हमारे प्रभु ने यह अपने उदाहरण से दिखाया, क्योंकि उसने तीस वर्ष की आयु तक बपतिस्मा नहीं लिया।
यहाँ वे अनेक प्रकार से भूल करते हैं। यह कहना अत्यन्त स्पष्ट भूल है कि बपतिस्मा पहली बार उसी समय स्थापित हुआ, क्योंकि वह यीशु मसीह के प्रचार के सारे समय में चलता रहा था। चूँकि बपतिस्मा का स्थापित होना उसके चलाए जाने से पहले आवश्यक था, तो हम कैसे कह सकते हैं कि उसकी पहली स्थापना इतने बाद में हुई? इसलिए वे व्यर्थ यत्न करते हैं कि इस वचन को मूल विधि मानकर बपतिस्मा के सारे सिद्धान्त को ठीक उसी में सीमित कर दें।
परन्तु इस भूल को छोड़कर, आइए देखें कि उनके तर्क कितने सशक्त हैं। वे इतने भयंकर नहीं कि यदि हम बहानों का सहारा लेना चाहें तो उनसे सहज ही बच न निकलें। क्योंकि वे शब्दों के क्रम और विन्यास पर इतना कसकर निर्भर हैं, यह तर्क देते हुए कि शिक्षा बपतिस्मा से पहले और विश्वास बपतिस्मा पाने से पहले आना चाहिए, क्योंकि कहा गया है, “शिक्षा दो और बपतिस्मा दो,” और, “जो विश्वास करे और बपतिस्मा ले।”
इसी तर्क से हम उत्तर दे सकते हैं कि बपतिस्मा को लोगों को वह सब मानना सिखाने से पहले आना चाहिए जिसकी यीशु ने आज्ञा दी, क्योंकि कहा गया है, “उन्हें बपतिस्मा देकर, उन्हें सब बातें मानना सिखाओ जिनकी मैंने तुम्हें आज्ञा दी है।”
और यदि यूहन्ना के पहले उद्धृत वचन की उनकी व्याख्या मान ली जाए, कि जल से नया जन्म के विषय में जो कहा गया है उसे बपतिस्मा के विषय में समझा जाए, तो क्या हम इसी तर्क से यह प्रमाणित नहीं कर सकते कि बपतिस्मा को आत्मिक नया जन्म से पहले आना चाहिए, क्योंकि उसका नाम पहले आया है? क्योंकि यह नहीं कहता, “जो आत्मा और जल से नया जन्म पाए,” परन्तु “जल और आत्मा से।”
उनका तर्क पहले ही कुछ कमज़ोर दिखाई देता है। फिर भी हम अपना मामला वहीं नहीं छोड़ते, क्योंकि सत्य की रक्षा करने के लिए हमारे पास कहीं अधिक निश्चित और ठोस उत्तर है। यहाँ हमारा प्रभु अपने प्रेरितों को जो मुख्य आज्ञा देता है वह सुसमाचार की घोषणा है। इसके साथ वह बपतिस्मा की सेवा को ऐसी बात के रूप में जोड़ता है जो उनके उचित आदेश और मुख्य कार्यभार पर निर्भर है। इसलिए बपतिस्मा की चर्चा यहाँ केवल उसी सीमा तक है जहाँ तक वह शिक्षा और प्रचार से जुड़ा है, जैसा अधिक पूर्ण व्याख्या से और अच्छी तरह समझा जा सकता है।
तो प्रभु अपने प्रेरितों को पृथ्वी की हर जाति के लोगों को शिक्षा देने भेजता है।
और वह किन लोगों की बात करता है? निश्चित है कि वह केवल उन्हीं की बात करता है जो शिक्षा ग्रहण करने के योग्य हैं। फिर वह कहता है कि ऐसे लोगों को शिक्षा पाने के बाद बपतिस्मा लेना चाहिए। अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए वह कहता है कि ऐसे लोग विश्वास करके और बपतिस्मा लेकर उद्धार पाएँगे। क्या यहाँ किसी भी वचन में शिशुओं का कोई उल्लेख है?
तो यह कैसा तर्क है जो वे प्रयोग करते हैं? वयस्कों को बपतिस्मा से पहले शिक्षा पानी और विश्वास करना चाहिए; इसलिए बपतिस्मा शिशुओं का नहीं है। वे जितना चाहें ज़ोर लगा लें; वे इस वचन से इससे अधिक कुछ नहीं निकाल सकते कि बपतिस्मा से पहले सुसमाचार उन्हें सुनाया जाना चाहिए जो सुनने के योग्य हैं, क्योंकि यहाँ चर्चा केवल उन्हीं की है। इसलिए इसे शिशुओं को बपतिस्मा से बाहर करने का बहाना बनाना प्रभु के वचनों का घोर बिगाड़ है।
और ताकि सब स्पष्ट देख लें कि उनकी अज्ञानता कहाँ है, मैं उसे एक तुलना से दिखाऊँगा। पौलुस कहता है:
“यदि कोई काम करना न चाहे, तो खाने भी न पाए।”
यदि कोई इससे यह निष्कर्ष निकाले कि शिशुओं को भोजन नहीं देना चाहिए, तो क्या वह सारे संसार की हँसी का पात्र न होगा? क्यों? क्योंकि वह जो केवल एक विशेष श्रेणी के लोगों के विषय में कहा गया था उसे सब पर सार्वभौमिक रूप से लागू करेगा। फिर भी ये भले मनुष्य इस विषय में इससे कम कुछ नहीं करते। क्योंकि जो विशेष रूप से वयस्कों के विषय में कहा गया है उसे वे शिशुओं पर लागू करते हैं ताकि सार्वभौमिक नियम बना सकें।
जहाँ तक हमारे प्रभु के उदाहरण का सम्बन्ध है, वह किसी भी रीति से उनका समर्थन नहीं कर सकता। उसने तीस वर्ष की आयु तक बपतिस्मा नहीं लिया, परन्तु ऐसा इसलिए था कि वह तब अपना प्रचार आरम्भ करना और उसके द्वारा बपतिस्मा को स्थापित करना चाहता था, जिसे यूहन्ना पहले ही देने लगा था। इसलिए अपनी शिक्षा में बपतिस्मा को स्थापित करने की इच्छा से उसने अपनी सेवकाई के आरम्भ में उसे अपनी ही देह में पवित्र किया ताकि उसे अधिक अधिकार दे।
वे प्रेरितों के काम के उन्नीसवें अध्याय में दर्ज उदाहरण से भी अपना समर्थन करना चाहते हैं: कि पौलुस प्रेरित ने इफिसुस में कुछ चेलों को, जो यूहन्ना का बपतिस्मा पहले ही पा चुके थे, फिर से बपतिस्मा दिया, क्योंकि उन्हें पवित्र आत्मा के विषय में पर्याप्त शिक्षा नहीं मिली थी। इससे वे यह दिखाना चाहते हैं कि यदि उन चेलों का पहला बपतिस्मा उनकी अज्ञानता के कारण अमान्य था, तो शिशुओं का बपतिस्मा, जिनमें सारी समझ का अभाव है, और भी अधिक निरस्त माना जाना चाहिए।
परन्तु यदि उनकी व्याख्या ठीक होती, तो हम में से हर एक को फिर से बपतिस्मा पाने के लिए एक नदी की आवश्यकता होती। क्योंकि हम में से कौन अपने भीतर दिन-प्रतिदिन घोर और गम्भीर अज्ञानता को नहीं पहचानता? हर ऐसी खोज पर हमें नया बपतिस्मा लेने दौड़ना पड़ता, मानो पहला कुछ महत्त्व का न हो।
इन सर्वथा हास्यास्पद बेतुकी बातों को अलग रखकर, आइए इस वचन का सच्चा अर्थ खोजें। कुछ लोग इस कथन की, कि पौलुस ने उन्हें यीशु के नाम में बपतिस्मा दिया, यह व्याख्या करते हैं कि उसका आशय शिक्षा देने के सिवा कुछ नहीं। यद्यपि यह व्याख्या पवित्रशास्त्र के प्रयोग से मेल खाती है, मैं एक और अधिक उपयुक्त व्याख्या दूँगा, जिसके विषय में मुझे आशा है कि वह सब के सामने स्पष्ट रूप से स्थापित हो सकेगी।
पवित्रशास्त्र में यह कोई नई बात नहीं कि पवित्र आत्मा के दृश्य अनुग्रहों को पाने को, जैसे उस समय दिए जाते थे, बपतिस्मा कहा जाए। इस प्रकार कहा गया है कि प्रभु ने अपने प्रेरितों को बपतिस्मा दिया जब उसने उन पर अपना आत्मा भेजा और ये अनुग्रह दिए।
वृत्तान्त के अनुसार, पौलुस प्रेरित इन चेलों से पूछता है कि क्या उन्होंने आत्मा के अनुग्रह पाए हैं, और वे उत्तर देते हैं कि वे नहीं जानते कि ये क्या हैं। तब वह उन्हें यीशु के नाम में बपतिस्मा देता है—जल से नहीं, परन्तु उस रीति से जिससे प्रेरित पिन्तेकुस्त के दिन बपतिस्मा पाए थे।
कथा के क्रम से यह और भी पुष्ट होता है। जो तुरन्त आगे आता है—
“और जब उसने उन पर हाथ रखे, तो पवित्र आत्मा उन पर आया”
—इस बपतिस्मा की अधिक स्पष्ट व्याख्या है। पवित्रशास्त्र की यही रीति है: पहले किसी बात को संक्षेप में कहना और फिर उसे अधिक पूर्ण वर्णन के द्वारा समझाना।
अन्यथा, पौलुस उन्हें उनकी अज्ञानता के कारण फिर से बपतिस्मा देकर अनुचित काम करता, क्योंकि प्रेरित स्वयं अपने बपतिस्मा के बाद इतने अनजान और अशिक्षित रहे कि वे यीशु मसीह की सामर्थ्य के विषय में बहुत थोड़ा जानते थे। परन्तु इस बात पर और परिश्रम करने की आवश्यकता नहीं, क्योंकि इस बपतिस्मा को स्पष्टतः हाथ रखने के रूप में समझा जाना चाहिए, जिसके द्वारा पवित्र आत्मा दिया गया।
वे आपत्ति करते हैं कि इसी तर्क से प्रभु-भोज शिशुओं को दिया जाना चाहिए, जिन्हें हम उसमें ग्रहण करने से इनकार करते हैं—मानो भेद को पवित्रशास्त्र में हर सम्भव रीति से पर्याप्त और स्पष्ट रूप से अंकित न किया गया हो।
क्योंकि यदि हम बपतिस्मा के स्वरूप और उद्देश्य पर विचार करें, तो हम पाएँगे कि वह हमारा प्रथम प्रवेश है जिसके द्वारा हम कलीसिया के अंग माने जाते हैं और परमेश्वर के लोगों में स्थान पाते हैं। इसलिए वह हमारे नया जन्म और आत्मिक जन्म का चिह्न है, जिससे हम परमेश्वर की सन्तान बनाए जाते हैं। इसके विपरीत प्रभु-भोज उनके लिए ठहराया गया था जो शैशव से आगे निकलकर ठोस भोजन ग्रहण करने के योग्य हैं।
इस विषय में हमारे पास प्रभु का अति स्पष्ट वचन है। बपतिस्मा के विषय में वह आयु का कोई भेद नहीं करता। परन्तु वह प्रभु-भोज को केवल उन्हीं को दिए जाने की अनुमति देता है जो प्रभु की देह को पहचान सकते हैं, अपने आपको जाँच और परख सकते हैं, और प्रभु की मृत्यु का प्रचार कर सकते हैं। क्या हम इससे अधिक स्पष्ट कुछ चाह सकते हैं?
“मनुष्य अपने आपको जाँच ले, और इसी रीति से इस रोटी में से खाए और इस कटोरे में से पीए।”
इसलिए आत्म-परीक्षा पहले आनी चाहिए, और यह शिशुओं में नहीं हो सकती।
फिर:
“जो अनुचित रीति से खाता है वह प्रभु की देह को न पहचानकर अपने ऊपर दण्ड लाता है।”
यदि वे आत्म-परीक्षा के बिना योग्य रीति से भागी नहीं हो सकते, तो शिशुओं को प्रभु-भोज देकर उनके सामने उनका न्याय और दण्ड रखना उचित न होगा।
फिर:
“मेरे स्मरण के लिए यही किया करो। क्योंकि जब कभी तुम यह रोटी खाते और यह कटोरा पीते हो, तो प्रभु की मृत्यु का प्रचार करते हो।”
शिशु, जो अभी बोल भी नहीं सकते, प्रभु की मृत्यु का प्रचार कैसे कर सकते हैं?
इनमें से कुछ भी बपतिस्मा के लिए आवश्यक नहीं। इसलिए इन दोनों चिह्नों के बीच बड़ा भेद है—ऐसा भेद जो पुराने नियम के अधीन उनके अनुरूप चिह्नों में भी देखा गया। क्योंकि खतना, जो बपतिस्मा के स्थान पर था, शिशुओं को दिया जाता था। परन्तु फसह का मेमना, जिसके स्थान पर अब हमारे पास प्रभु-भोज है, बच्चों में केवल उन्हीं को दिया जाता था जो पूछ सकते थे कि उसका क्या अर्थ है।
यदि इन बेचारे लोगों को प्रभु के वचन का ज़रा-सा भी स्वाद होता, तो वे इतने अन्धे न होते कि उन बातों को अनदेखा कर दें जो स्पष्ट रूप से उनकी आँखों के सामने प्रकट हैं।
जो हमने कहा है वह यह दिखाने के लिए स्पष्टतः पर्याप्त है कि वे लोग कितने अनुचित और अनुपयुक्त रूप से प्रभु की कलीसिया को तंग करते हैं जो प्रश्न और विवाद उठाते हैं ताकि उस पवित्र रीति को दोषी ठहराएँ जिसे विश्वासियों ने प्रेरितों के समय से परिश्रम से निभाया है। हमने स्पष्ट प्रमाणित कर दिया है कि उसकी पवित्र पवित्रशास्त्र में दृढ़ और निश्चित नींव है, और उसके विरुद्ध साधारणतः उठाई जानेवाली सब आपत्तियों का भरपूर खण्डन भी किया है।
इसलिए हमें सन्देह नहीं कि परमेश्वर के सब भले सेवक, इस चर्चा को पढ़कर, पूर्णतः सन्तुष्ट होंगे और स्पष्ट देखेंगे कि इस पवित्र विधि को उलटने और मिटाने के लिए किया गया हर आक्रमण शैतान की छल-भरी युक्ति है। उसका उद्देश्य उस सान्त्वना को घटाना है जो प्रभु अपनी प्रतिज्ञा के द्वारा हमें देना चाहता था, और इस प्रकार उसके नाम की महिमा को धुँधला करना—ऐसी महिमा जो तब और बढ़ती है जब उसकी दया का धन मनुष्यों पर भरपूर उण्डेला जाता है।
क्योंकि जब प्रभु बपतिस्मा के चिह्न के द्वारा हमें प्रत्यक्ष गवाही देता है कि हमारे कारण वह हमारे वंश पर दृष्टि रखना और हमारे बच्चों का परमेश्वर होना चाहता है, तो क्या हमारे पास दाऊद के उदाहरण पर आनन्द मनाने का उत्तम कारण नहीं? हम विचार कर सकते हैं कि प्रभु हमारे प्रति एक अनुग्रहकारी गृहस्वामी की भूमिका लेता है, और अपना विधान न केवल हम पर, परन्तु उन पर भी फैलाता है जो हमारी मृत्यु के बाद हमारे हैं। इस आनन्द में परमेश्वर की विशेष रूप से महिमा होती है।
इसी कारण शैतान हमारे बच्चों को बपतिस्मा में भाग लेने से वंचित करने का यत्न करता है: ताकि जब वह गवाही जो प्रभु ने उन पर देने के लिए ठहराए अनुग्रहों को हमारे लिए पक्का करने के लिए रखी, हमारी दृष्टि से हटा ली जाए, तो हम धीरे-धीरे उस प्रतिज्ञा को भूल जाएँ जो उसने उनके विषय में दी है। इससे केवल कृतघ्नता और हमारे प्रति प्रभु की दया को न पहचानना ही नहीं, परन्तु हमारे बच्चों को उसकी व्यवस्था के भय और अनुशासन में और उसके सुसमाचार के ज्ञान में शिक्षा देने में लापरवाही भी उत्पन्न होगी।
क्योंकि जब हम समझते हैं कि प्रभु ने उन्हें उनके जन्म ही से अपने लोगों में, अपनी कलीसिया के अंगों के रूप में, ग्रहण कर लिया है, तब उन्हें सच्ची भक्ति और परमेश्वर की आज्ञाकारिता में पालने के लिए यह कोई छोटा प्रोत्साहन नहीं।
इसलिए आइए हम अपने प्रभु की इस बड़ी कृपा को न ठुकराएँ, परन्तु भरोसे के साथ अपने बच्चों को उसके सामने प्रस्तुत करें, जिन्हें उसने अपनी प्रतिज्ञा से उन लोगों की सहभागिता में प्रवेश दिया है जिन्हें वह अपने ही घराने के अंग मानता है—अर्थात् मसीही कलीसिया में।
