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अध्याय तीन: परमेश्वर की व्यवस्था का प्रकाशन (भाग 4/4)
आठवीं आज्ञा
तू चोरी न करना।
इस आज्ञा का उद्देश्य यह है कि, क्योंकि हर प्रकार का अन्याय परमेश्वर को अप्रिय है, इसलिए हमें हर एक को वह लौटाना चाहिए जो उचित रीति से उसका है।
अतः इसका सार यह है कि परमेश्वर हमें मना करता है कि हम दूसरे की सम्पत्ति को अपनी ओर खींचने का प्रयत्न करें, और आज्ञा देता है कि हम निष्ठापूर्वक परिश्रम करें कि हर एक की वस्तु उसके लिए सुरक्षित रहे।
हमें समझना चाहिए कि जो कुछ किसी के पास है, वह उसे संयोग से नहीं, वरन् परमेश्वर के बाँटने से मिला है। इसलिए कोई भी मनुष्य अपनी सम्पत्ति से ठगा नहीं जा सकता, जब तक कि परमेश्वर की विधाता-रूपी व्यवस्था का उल्लंघन न हो।
चोरी के बहुत से रूप हैं। एक वह है जो हिंसा में होती है, जब दूसरे की सम्पत्ति बलपूर्वक छीन ली जाती और डाके की भाँति लूट ली जाती है। दूसरी वह है जो छल और द्वेष में होती है, जब कोई धोखे से चतुराई के साथ अपने पड़ोसी को कंगाल कर देता है। तीसरी और भी अधिक छिपी हुई चालाकी का उपयोग करती है, जो किसी को कानून का आवरण ओढ़ाकर उसकी सम्पत्ति से वंचित कर देती है। चौथी चापलूसी के द्वारा काम करती है, जब मनमोहक शब्दों से, भेंट के नाम पर या किसी अन्य रीति से, वह प्राप्त किया जाता है जो न्यायतः किसी और का होना चाहिए।
परन्तु उसके विविध रूपों की सूची बनाने में अधिक समय लगाने के स्थान पर हमें संक्षेप में यह देखना चाहिए कि दूसरे की हानि पर अपने आपको धनी बनाने का जो भी उपाय हम काम में लाएँ, वह चोरी ही गिना जाना चाहिए, जब भी वह उस मसीही सच्चाई से हट जाए जिसकी माँग प्रेम करता है और किसी भी प्रकार की कुटिलता, छल या हानिकारक व्यवहार की ओर मुड़ जाए।
यद्यपि ऐसा करनेवाले लोग प्रायः सांसारिक न्यायी के सामने अपने मुकदमे जीत जाते हैं, तथापि परमेश्वर उन्हें चोरों के सिवा और कुछ नहीं गिनता। वह उन युक्तियों को देखता है जो चालाक लोग दूर से सीधे-सादे लोगों को अपने जाल में फँसाने के लिए रचते हैं। वह उन वसूलियों की कठोरता को देखता है जिनके द्वारा बलवान लोग निर्बलों को कुचलते हैं। वह देखता है कि उनकी चापलूसियाँ कितनी विषैली हैं जो किसी को छलने के लिए अपनी बातों को मीठा बनाते हैं—ऐसी बातें जो प्रायः मनुष्यों की दृष्टि से बच निकलती हैं।
फिर, यह आज्ञा केवल तभी भंग नहीं होती जब किसी के साथ उसके धन, माल या सम्पत्ति में अन्याय किया जाए, वरन् तब भी जब उसके किसी भी अधिकार में अन्याय हो। क्योंकि जब हम अपने पड़ोसी को वे कर्तव्य देने से इनकार करते हैं जो हम पर उसके प्रति बनते हैं, तब हम उसे उसकी वस्तु से ठगते हैं।
इसलिए, यदि कोई प्रबन्धक, बटाईदार या किरायेदार अपने स्वामी की सम्पत्ति की रखवाली करने के बदले आलस्य में जीवन बिताए और उसकी भलाई की उपेक्षा करे जो उसका पालन-पोषण करता है; यदि वह अपने सौंपे हुए धन को उड़ा दे या अति-भोग में खा जाए; यदि कोई सेवक अपने स्वामी का उपहास करे, उसके भेद खोल दे, या उसकी सम्पत्ति, प्रतिष्ठा या प्राण के विरुद्ध षड्यन्त्र रचे; या दूसरी ओर, यदि कोई स्वामी अपने घराने के साथ निर्दयता का व्यवहार करे—तो यह सब परमेश्वर के सामने चोरी है।
क्योंकि जो कोई अपनी बुलाहट के अनुसार दूसरों के प्रति आवश्यक कर्तव्य पूरा नहीं करता, वह उनकी उचित वस्तु को रोक रखता है।
इसलिए हम इस आज्ञा का पालन तब करेंगे जब हम अपनी दशा से सन्तुष्ट रहकर उसके सिवा कोई लाभ न चाहें जो ईमानदारी का और विधिसम्मत हो; जब हम अपने पड़ोसी को हानि पहुँचाकर धनी होना न चाहें; जब हम उसकी सम्पत्ति पाने के लिए उसके विनाश की योजना न बनाएँ; जब हम दूसरों के लहू और पसीने से धन बटोरने का परिश्रम न करें; और जब हम अपनी लालसा को तृप्त करने या उसे अति-भोग में उड़ाने के लिए जो कुछ भी सम्भव हो उसे अन्यायपूर्वक और बिना भेद किए न हड़पें।
इसके विपरीत, हमारा लक्ष्य सदा यह होना चाहिए कि जहाँ तक हमसे हो सके, अपनी सम्मति और साधनों से हर एक की सहायता करें कि उसकी वस्तु उसके पास सुरक्षित रहे। यदि हमें दुष्ट और धोखेबाज लोगों से व्यवहार करना पड़े, तो हमें तैयार रहना चाहिए कि उन्हीं की-सी दुष्टता से उनसे लड़ने के बदले अपना कुछ छोड़ दें।
इतना ही नहीं। जब हम दूसरों को निर्धनता सहते देखें, तब हमें उनकी आवश्यकता में सहभागी होना और अपनी बहुतायत में से उनकी घटी को पूरा करना चाहिए।
अन्त में, हर एक को यह विचार करना चाहिए कि उसका पद उस पर दूसरों के प्रति कौन-से कर्तव्य डालता है, ताकि वह उन्हें विश्वासयोग्यता से निभाए।
इसी नियम के अनुसार प्रजा को अपने अधिकारियों का आदर करना, स्वेच्छा से उनके अधीन रहना, उनकी व्यवस्थाओं और आज्ञाओं का पालन करना, और ऐसी किसी बात से इनकार न करना चाहिए जिसे वे परमेश्वर को अप्रसन्न किए बिना कर सकते हैं।
इसके विपरीत, अधिकारियों को अपनी प्रजा के शासन में चिन्ता और परिश्रम करना, सर्वत्र शान्ति बनाए रखना, भलों की रक्षा करना, दुष्टों को दण्ड देना, और अपने पद का निर्वाह उन लोगों के समान करना चाहिए जिन्हें सर्वोच्च न्यायी परमेश्वर को लेखा देना है।
कलीसिया के सेवक परमेश्वर के वचन की विश्वासयोग्यता से सेवा करें, न उद्धार की शिक्षा को बिगाड़ें, न उसकी शुद्धता से समझौता करें। वे लोगों को केवल खरी शिक्षा से ही नहीं, वरन् अपने जीवन के उदाहरण से भी सिखाएँ। संक्षेप में, वे अच्छे चरवाहों के समान भेड़ों की अगुवाई करें।
दूसरी ओर, लोग उन्हें परमेश्वर के दूत और प्रेरित जानकर ग्रहण करें, उन्हें वह आदर दें जो हमारे प्रभु ने उनके लिए ठहराया है, और उनकी जीविका का प्रबन्ध करें।
माता-पिता अपने बच्चों का पालन-पोषण करने, उन्हें शिक्षा देने और उन पर शासन करने का परिश्रम करें, क्योंकि वे परमेश्वर की ओर से उन्हें सौंपे गए हैं। वे उनके साथ इतनी कठोरता न बरतें कि वे हियाव छोड़ बैठें, वरन् उनकी अवस्था के योग्य कोमलता और दया से उन्हें सँभालें। जैसा पहले कहा जा चुका है, बच्चों पर भी अपने माता-पिता के प्रति आदर और आज्ञाकारिता का ऋण है।
इसी प्रकार जवान लोग बूढ़ों का आदर करें, क्योंकि हमारे प्रभु की इच्छा है कि पकी आयु आदरणीय हो। बूढ़े भी अपनी बुद्धि से जवानों को मार्ग दिखाने का यत्न करें, उनके साथ अत्यधिक कठोरता न बरतें, वरन् ऐसी गम्भीरता रखें जो कोमलता और दया से सन्तुलित हो।
सेवक अपने स्वामियों के लिए उपयोगी बनें और उन्हें प्रसन्न करने का परिश्रम करें—केवल तब नहीं जब उन पर दृष्टि हो, वरन् सच्चे मन से, उनके समान जो परमेश्वर की सेवा करते हैं।
स्वामी भी अपने सेवकों के प्रति अत्यधिक कठोर और अड़ियल न बनें, उन्हें कठोरता से न दबाएँ और न तिरस्कार से व्यवहार करें। वरन् वे उन्हें भाई और परमेश्वर के संगी सेवक पहचानें और इसलिए उनके साथ मानवीय व्यवहार करें।
इस रीति से हर एक यह विचार करे कि अपनी स्थिति और पद के अनुसार वह अपने पड़ोसियों का क्या देनदार है, और उन्हें उनका हक़ चुकाए।
फिर, हमें सदा व्यवस्था देनेवाले की ओर ध्यान लगाए रखना चाहिए, ताकि हम स्मरण रखें कि यह नियम शरीर के लिए जितना, उतना ही आत्मा के लिए ठहराया गया है। अतः हर एक अपनी इच्छा को सब मनुष्यों की भलाई और लाभ को सुरक्षित रखने और बढ़ाने में लगाए।
नौवीं आज्ञा
तू अपने पड़ोसी के विरुद्ध झूठी साक्षी न देना।
इस आज्ञा का उद्देश्य यह है कि, क्योंकि परमेश्वर सत्य है और झूठ से घृणा करता है, इसलिए हमें बिना छल के सत्य का पक्ष लेना चाहिए।
अतः इसका सार यह है कि हम किसी की प्रतिष्ठा को निन्दा या झूठी अफ़वाहों से हानि न पहुँचाएँ, न उसकी सम्पत्ति में उसे क्षति पहुँचाएँ। संक्षेप में, हमें किसी के साथ न उसकी बुराई करके अन्याय करना चाहिए, न उसे उपहास का पात्र बनाकर।
इस निषेध के अनुरूप यह सकारात्मक आज्ञा है कि हम सत्य को थामे रखने में हर एक की निष्ठापूर्वक सहायता करें, चाहे वह उसकी सम्पत्ति की रक्षा के लिए हो या उसकी प्रतिष्ठा की।
ऐसा प्रतीत होता है कि हमारे प्रभु ने इस आज्ञा का अर्थ निर्गमन 23 में समझाना चाहा, जब उसने कहा:
“तू झूठी बात न फैलाना, और न झूठ का समर्थन करने के लिए किसी के साथ मिलकर झूठी साक्षी देना।”
फिर:
“तू हर प्रकार के झूठ से दूर रहना।”
अन्यत्र वह हमें केवल यही मना नहीं करता कि हम दूसरों के विषय में द्वेषपूर्ण बातें फैलाएँ, उन्हें बदनाम करें और उनकी निन्दा करें, वरन् यह भी कि हम अपने भाई को धोखा दें, क्योंकि वह इन दोनों अपराधों का स्पष्ट उल्लेख करता है (लैव्यव्यवस्था 19)।
इसमें कोई सन्देह नहीं कि जैसे उसने पहले क्रूरता, यौन-अशुद्धता और लोभ को सुधारना चाहा था, वैसे ही यहाँ वह झूठ को रोकना चाहता है, जो पहले बताई गई दो श्रेणियों के अन्तर्गत आ जाता है। क्योंकि या तो हम अपने पड़ोसी की बुराई करके उसकी प्रतिष्ठा को हानि पहुँचाते हैं, या झूठ और छल-भरे शब्दों से उसके कल्याण में बाधा डालते हैं।
इससे विशेष अन्तर नहीं पड़ता कि इस आज्ञा को विशेष रूप से न्यायालय में दी जानेवाली गम्भीर साक्षी के विषय में समझा जाए या निजी तौर पर कही गई बातों के विषय में। क्योंकि हमें सदा इस सिद्धान्त पर लौटना चाहिए: हमारा प्रभु हर प्रकार के दोष में से एक विशेष रूप को उदाहरण के लिए सामने रखता है, जिससे बाकी सब को जोड़ना चाहिए, और वह उस रूप को चुनता है जिसमें उस दोष की घृणित प्रकृति सबसे स्पष्ट दिखाई देती है।
तथापि मैं इस आज्ञा को सामान्य अर्थ में समझना अधिक उचित मानता हूँ, क्योंकि न्यायालय में झूठी साक्षी कभी झूठी शपथ के बिना नहीं दी जाती, और झूठी शपथ के विषय में पहली पटिया में पहले ही कहा जा चुका है।
अब हम देखते हैं कि इस आज्ञा का उचित पालन करने के लिए हमें अपनी वाणी को अपने पड़ोसी के लाभ के लिए सच्चाई से काम में लाना चाहिए, चाहे वह उसकी प्रतिष्ठा बचाने के लिए हो या उसके हितों की रक्षा के लिए।
इसका न्याय स्पष्ट है। क्योंकि यदि अच्छा नाम किसी भी निधि से अधिक मूल्यवान है, तो किसी मनुष्य के साथ उतना ही अन्याय होता है जब उसका अच्छा नाम छीना जाए जितना तब जब उसकी सम्पत्ति छीन ली जाए। वरन् पड़ोसी को कभी-कभी चोरी की अपेक्षा झूठ से अधिक बड़ी हानि पहुँचती है।
तथापि यह आश्चर्य की बात है कि इस विषय में अपराध करने की मनुष्य को कितनी कम चिन्ता होती है। बहुत थोड़े ही लोग हैं जो इस दोष से गहरे संक्रमित नहीं, क्योंकि हर कोई दूसरों के दोषों को जाँचने और उघाड़ने की ओर झुका रहता है।
न ही हमें यह कह देना पर्याप्त बहाना समझना चाहिए कि हमने झूठ नहीं बोला। क्योंकि जो हमें झूठ के द्वारा अपने पड़ोसी की निन्दा करने से रोकता है, वही यह भी चाहता है कि जहाँ तक सत्य अनुमति दे, उसकी प्रतिष्ठा बनी रहे। यद्यपि आज्ञा स्पष्ट रूप से केवल झूठ के द्वारा उसकी प्रतिष्ठा बिगाड़ने से रोकती है, तथापि इससे यह संकेत मिलता है कि उसका अच्छा नाम परमेश्वर की दृष्टि में मूल्यवान है।
हमारे लिए इतना देख लेना पर्याप्त होना चाहिए कि हमारा प्रभु इसकी चिन्ता करता है कि हमारे पड़ोसी की बदनामी न हो। इसलिए यहाँ हर प्रकार की द्वेषपूर्ण निन्दा निस्सन्देह दोषी ठहराई गई है।
निन्दा से हमारा तात्पर्य वह ताड़ना नहीं है जो किसी को सुधारने के लिए हो; न वह न्यायिक अभियोग जो अपराध का उपचार करने के लिए हो; न वह सार्वजनिक सुधार जो एक व्यक्ति को इसलिए दिया जाए कि दूसरे चेतावनी पाएँ; न किसी दुष्ट मनुष्य के विषय में वह चेतावनी जो उन्हें दी जाए जिन्हें उसका स्वभाव जानना आवश्यक है, ऐसा न हो कि वे उससे धोखा खाएँ। वरन् हमारा तात्पर्य द्वेष या बुरा बोलने की इच्छा से उपजी घृणित हानि से है।
फिर, यह आज्ञा यहाँ तक पहुँचती है कि हमें हास-परिहास में दूसरों पर शालीनता से ताने कसकर और उन्हें चोट पहुँचाकर चतुराई की ख्याति पाने का यत्न नहीं करना चाहिए, जैसा कुछ लोग करते हैं जो किसी को लज्जित करने में बड़ा आनन्द लेते हैं। क्योंकि ऐसे असंयम से जिसकी हँसी उड़ाई जाती है उस पर प्रायः स्थायी कलंक रह जाता है।
यदि अब हम उस व्यवस्था देनेवाले पर विचार करें, जिसे हमारी जीभ के साथ-साथ हमारे कानों और हृदयों पर भी राज्य करना चाहिए, तो हम पहचान लेंगे कि निन्दकों को सुनने की इच्छा, उन्हें कान देने की तत्परता और उनकी बुरी बातों पर विश्वास करने की सहमति भी उतनी ही वर्जित है जितनी स्वयं निन्दा।
क्योंकि यह कहना बेतुका होगा कि परमेश्वर जीभ की द्वेषपूर्ण बात से तो घृणा करता है, परन्तु हृदय की दुष्टता को दोषी नहीं ठहराता।
इसलिए यदि हममें परमेश्वर का सच्चा भय और प्रेम है, तो हम यत्न करें—जहाँ तक सम्भव और उचित हो, और जैसा प्रेम माँगता है—कि न अपने कान और न अपनी जीभ निन्दा, चुगली या उपहास को दें। हम बुरे सन्देहों को अपने हृदय में सहज ही प्रवेश न करने दें। वरन् हर एक की बातों और कामों का अधिक से अधिक भला अर्थ लेते हुए, हम हर रीति से हर एक का सम्मान बनाए रखें।
दसवीं आज्ञा
तू अपने पड़ोसी के घर का लालच न करना। तू उसकी पत्नी, उसके दास-दासी, उसके बैल या गधे का, या उसकी किसी भी वस्तु का लोभ न करना।
इस आज्ञा का उद्देश्य यह है कि, क्योंकि परमेश्वर चाहता है कि हमारी सारी आत्मा प्रेम की भावना से भरी हो और उसके अधिकार में हो, इसलिए हर विपरीत अभिलाषा को हमारे हृदयों से निकाल फेंकना चाहिए।
अतः इसका सार यह है कि हमारे मन में कोई ऐसा विचार प्रवेश न करे जो हमारे हृदय को अपने पड़ोसी के लिए हानिकारक या अनिष्टकारी अभिलाषा की ओर उभारे।
इस निषेध के अनुरूप यह सकारात्मक आज्ञा है कि हम जो कुछ सोचें, विचारें, चाहें या अपनाएँ, वह हमारे पड़ोसी के कल्याण और लाभ से जुड़ा हो।
परन्तु यहाँ एक बड़ी कठिनाई उठती है। क्योंकि यदि हमने जो पहले कहा वह सच है—कि व्यभिचार और चोरी को मना करके हमारे प्रभु ने अशुद्धता और हानि पहुँचाने, धोखा देने या लूटने के हर इरादे को भी मना कर दिया—तो ऐसा प्रतीत हो सकता है कि अब उसके लिए दूसरे की वस्तुओं का लोभ करना अलग से मना करना अनावश्यक है।
हम इस प्रश्न को दृढ़ संकल्प और लोभ-भरी अभिलाषा के अन्तर पर विचार करके सुलझा सकते हैं। दृढ़ संकल्प से हमारा तात्पर्य इच्छा के उस सोचे-समझे निश्चय से है जो तब होता है जब मानव-हृदय प्रलोभन से जीत लिया और वश में कर लिया गया हो। लोभ-भरी अभिलाषा ऐसे विचार-विमर्श या सहमति के बिना भी हो सकती है, जब हृदय केवल लुभाया और किसी बुराई को करने के लिए उकसाया जाता है।
इसलिए जैसे प्रभु ने पहले माँग की कि मनुष्य के इरादे, उपक्रम और कर्म प्रेम के नियम से संचालित हों, वैसे ही अब वह माँग करता है कि मन के विचार भी उसी नियम के अनुसार निर्देशित हों, ताकि कोई ऐसा विचार न उठे जो हमें उसके विपरीत उकसाए।
जैसे उसने पहले हृदय को क्रोध, घृणा, व्यभिचार, डकैती और झूठ की ओर ले जाए जाने से मना किया था, वैसे ही अब वह उसे इनकी ओर भड़काए या हिलाए जाने से भी मना करता है।
वह ऐसी पूर्ण सच्चाई की माँग बिना कारण नहीं करता। क्योंकि कौन इनकार करेगा कि आत्मा की हर शक्ति उचित रीति से प्रेम को समर्पित होनी चाहिए? और यदि कोई शक्ति प्रेम से फिर जाए, तो कौन इनकार करेगा कि वह भ्रष्ट हो गई है?
तुम्हारे मन में पड़ोसी के लिए हानिकारक कोई भी अभिलाषा कहाँ से प्रवेश करती है, सिवाय इसके कि दूसरों की उपेक्षा करके तुम केवल अपना ही लाभ ढूँढ़ते हो? क्योंकि यदि तुम्हारा सारा हृदय प्रेम से भरा होता, तो ऐसी कोई कल्पना उसमें प्रवेश न कर सकती। इसलिए हमें यह निष्कर्ष निकालना चाहिए कि जितना हृदय ऐसी अभिलाषाओं को मन में स्थान देता है, उतना वह प्रेम से रिक्त है।
कोई यह आपत्ति करेगा कि जो कल्पनाएँ मन में से होकर उड़ जाती और फिर ओझल हो जाती हैं, उन्हें लोभ-भरी अभिलाषा ठहराकर दोषी मानना अनुचित है, क्योंकि लोभ का निवास हृदय के भीतर है।
मेरा उत्तर यह है कि यहाँ हम उन कल्पनाओं की बात कर रहे हैं जो केवल मन में से होकर नहीं निकल जातीं, वरन् हृदय को भी अभिलाषा से चुभो देती हैं। क्योंकि हम अपने विचारों में कभी कोई अभिलाषा या इच्छा नहीं करते कि हृदय उससे छुआ और भड़का न जाए।
इसलिए हमारा प्रभु प्रेम की एक अद्भुत उत्कटता की आज्ञा देता है, जिसे वह थोड़ी-सी भी पापमय अभिलाषा से रुकने नहीं देगा। वह एक आश्चर्यजनक रूप से सुव्यवस्थित हृदय की माँग करता है, जिसे वह प्रेम की व्यवस्था के विपरीत किसी भी आवेग से तनिक भी चुभने नहीं देगा।
सन्त ऑगस्टीन ने इस आज्ञा को समझने के लिए मेरे लिए मार्ग खोला, ताकि कोई यह न समझे कि अपनी व्याख्या में मैं अकेला खड़ा हूँ।
यद्यपि परमेश्वर का अभिप्राय हर बुरी अभिलाषा को मना करना था, तथापि उसने उदाहरण के लिए उन वस्तुओं को चुना जो सबसे अधिक हमें खींचती और भरमाती हैं।
ऐसा करके वह मानवीय अभिलाषा को कुछ भी छूट नहीं देता, क्योंकि वह उसे उन वस्तुओं से हटा लेता है जिनकी ओर वह मुख्यतः झुकी रहती है।
अब हमारे पास व्यवस्था की दूसरी पटिया है, जो हमें पूर्ण रूप से सिखाती है कि हम परमेश्वर के लिए, जिस पर प्रेम की नींव है, मनुष्यों के प्रति क्या देनदार हैं। इसलिए इस दूसरी पटिया में सिखाई गई हर बात को कोई निरन्तर दोहराता रहे, परन्तु उससे कुछ न होगा, जब तक कि यह शिक्षा पहले परमेश्वर के भय और श्रद्धा की नींव पर स्थापित न हो।
अब व्यवस्था का उद्देश्य निश्चित करना कठिन न होगा: वह है सिद्ध धार्मिकता, जिसके द्वारा मानव जीवन परमेश्वर की पवित्रता के अनुरूप, जो उसका आदर्श है, ढाला जाता है।
क्योंकि हमारे प्रभु ने व्यवस्था में अपने स्वभाव का ऐसा चित्र खींचा है कि यदि कोई उसे पूरा करे जिसकी आज्ञा दी गई है, तो वह अपने जीवन में परमेश्वर के स्वरूप को प्रकट करेगा।
इसलिए जब मूसा ने इस्राएल के लोगों को परमेश्वर की आज्ञाएँ संक्षेप में स्मरण दिलानी चाहीं, तो उसने कहा:
“और अब, हे इस्राएल, तेरा परमेश्वर यहोवा तुझसे इसके सिवा और क्या माँगता है कि तू उसका भय माने और उसके सब मार्गों पर चले; कि तू अपने सारे हृदय और सारे प्राण से उससे प्रेम रखे और उसकी सेवा करे; और उसकी आज्ञाओं का पालन करे?”
जब-जब मूसा ने व्यवस्था का उद्देश्य बताना चाहा, तब-तब उसने इसे दोहराना कभी न छोड़ा।
तो व्यवस्था की शिक्षा का लक्ष्य यही है: मनुष्य को पवित्र जीवन के द्वारा उसके परमेश्वर से जोड़ना और, जैसा मूसा अन्यत्र कहता है, उसे परमेश्वर से लिपटाए रखना (व्यवस्थाविवरण 11)।
इस पवित्रता की परिपूर्णता दो बातों में है: कि हम प्रभु अपने परमेश्वर से अपने सारे हृदय, प्राण और शक्ति से प्रेम रखें, और फिर अपने पड़ोसी से अपने समान (मत्ती 22)।
पहली बात यह है कि हमारी आत्मा पूरी रीति से परमेश्वर के प्रेम से भरी हो। इसी से पड़ोसी का प्रेम उत्पन्न होगा।
प्रेरित का यही अभिप्राय है जब वह कहता है कि आज्ञा का सार उस प्रेम में है जो शुद्ध विवेक और निष्कपट विश्वास से उत्पन्न होता है (1 तीमुथियुस 1)। हम देखते हैं कि अच्छा विवेक और विश्वास—एक शब्द में, भक्ति और परमेश्वर का भय—प्रधान के रूप में पहले रखे गए हैं, जिनसे फिर पड़ोसी के प्रति प्रेम निकलता है।
इसलिए यह कल्पना करना मूर्खता होगी कि व्यवस्था केवल धार्मिकता के कुछ आरम्भिक पाठ सिखाती है, और मनुष्यों को केवल उसके आरम्भ से परिचित कराती है, बिना उन्हें सिद्धता के मार्ग पर ले चले। क्योंकि मूसा और सन्त पौलुस के कथनों में जो सिद्धता समाई है, उससे बड़ी सिद्धता हम चाह ही नहीं सकते।
जो उस शिक्षा से सन्तुष्ट न हो जो मनुष्य को परमेश्वर के भय, उसकी महिमा की आत्मिक आराधना, उसकी आज्ञाओं के पालन, परमेश्वर और उसके मार्गों की खराई, विवेक की शुद्धता, विश्वास की निष्कपटता और प्रेम की ओर निर्देशित और गठित करती है, वह और आगे कहाँ बढ़ना चाहेगा?
इससे हमारी दी हुई वह व्याख्या पुष्ट होती है जिसमें हम भक्ति और प्रेम के लिए आवश्यक हर बात को व्यवस्था की आज्ञाओं से जोड़ते हैं। क्योंकि जो कुछ प्रारम्भिक सिद्धान्तों पर ही रुक जाते हैं, मानो व्यवस्था परमेश्वर की इच्छा को केवल आंशिक रूप में सिखाती हो, वे उसके उद्देश्य को ठीक से नहीं समझते, जैसा प्रेरित कहता है।
तथापि, क्योंकि मसीह और उसके प्रेरित व्यवस्था का सार बताते समय कभी-कभी पहली पटिया का उल्लेख नहीं करते, इसलिए इस विषय में हमें एक शब्द कहना चाहिए। बहुत से लोग उन शब्दों को, जो व्यवस्था के केवल आधे भाग से सम्बन्ध रखते हैं, पूरी व्यवस्था पर लागू करके भूल में पड़ते हैं।
सन्त मत्ती में मसीह कहता है कि व्यवस्था की अधिक गम्भीर बातें दया, न्याय और विश्वासयोग्यता में हैं (मत्ती 23)। विश्वासयोग्यता से उसका अर्थ निस्सन्देह सच्चाई या खराई है। फिर भी इस कथन को पूरी व्यवस्था तक फैलाने के लिए कुछ लोग विश्वासयोग्यता का अर्थ धर्म-कर्म करते हैं। यह निराधार है, क्योंकि मसीह वहाँ उन कर्मों की बात कर रहा है जिनके द्वारा मनुष्य को अपनी धार्मिकता प्रकट करनी चाहिए।
यदि हम इस सिद्धान्त को ध्यान में रखें, तो हमें आश्चर्य न होगा कि अन्यत्र, जब उससे पूछा गया कि अनन्त जीवन में प्रवेश करने के लिए कौन-सी आज्ञाएँ माननी चाहिए, तो उसने निम्नलिखित गिनाकर उत्तर दिया:
“तू हत्या न करना। तू व्यभिचार न करना। तू चोरी न करना। तू झूठी साक्षी न देना। तू अपने पिता और माता का आदर करना। तू अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रखना।”
क्योंकि पहली पटिया का पालन या तो हृदय की भीतरी भावना में था या रीति-रिवाजों में। हृदय की भावना दिखाई नहीं देती थी, जबकि कपटी लोग रीति-रिवाजों का पालन सब से अधिक यत्न से करते थे। इसलिए प्रेम के कार्य धार्मिकता का अधिक निश्चित प्रमाण देते हैं।
परन्तु कोई पूछेगा कि क्या मनुष्यों के बीच आदरपूर्वक और विश्वासयोग्यता से जीना धार्मिकता प्राप्त करने के लिए परमेश्वर का भय मानने और भक्ति के द्वारा उसका आदर करने से अधिक महत्त्वपूर्ण है।
मैं उत्तर देता हूँ कि नहीं। फिर भी, क्योंकि कोई भी मनुष्य प्रेम को उसकी पूर्णता में तब तक सच्चे रूप में सुरक्षित नहीं रख सकता जब तक वह पहले परमेश्वर का भय न माने, इसलिए प्रेम के कार्य किसी के भक्त होने का भी प्रमाण देते हैं।
फिर, क्योंकि परमेश्वर हमसे कोई लाभ नहीं पा सकता, जैसा वह अपने भविष्यद्वक्ता के द्वारा घोषित करता है, इसलिए वह हमसे यह नहीं माँगता कि हम उसकी भलाई करने का परिश्रम करें। वरन् वह हमें अपने पड़ोसी के प्रति भले कामों में लगाता है (भजन संहिता 16)।
इसलिए सन्त पौलुस का विश्वासी की सारी सिद्धता को प्रेम में रखना बिना कारण नहीं है (इफिसियों 1)। एक और स्थान पर वह प्रेम को व्यवस्था की पूर्णता कहता है, यह कहते हुए कि जो अपने पड़ोसी से प्रेम रखता है उसने व्यवस्था पूरी की है (रोमियों 13)।
फिर वह कहता है कि पूरी व्यवस्था इस एक कथन में समाई हुई है:
“तू अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रखना।”
वह इससे अधिक कुछ नहीं सिखाता जो प्रभु इस घोषणा में कहता है:
“जो कुछ तुम चाहते हो कि लोग तुम्हारे साथ करें, तुम भी उनके साथ वैसा ही करो, क्योंकि व्यवस्था और भविष्यद्वक्ताओं की शिक्षा यही है।”
यह निश्चित है कि व्यवस्था और भविष्यद्वक्ता दोनों पहला स्थान विश्वास और परमेश्वर के नाम के प्रति श्रद्धा को देते हैं, और उसके बाद पड़ोसी के प्रति प्रेम की सराहना करते हैं। परन्तु प्रभु का अभिप्राय यह है कि वहाँ हमें मनुष्यों के प्रति खराई और न्याय बरतने की आज्ञा इस बात के प्रमाण के रूप में दी गई है कि परमेश्वर का भय सचमुच हमारे भीतर बसा है।
इसलिए हम इस बात को दृढ़ता से थामे रहें: हमारा जीवन परमेश्वर की इच्छा और उसकी व्यवस्था की आज्ञा के अनुसार तब ठीक रीति से व्यवस्थित होता है जब वह हर प्रकार से हमारे भाइयों के लिए लाभदायक हो।
इसके विपरीत, पूरी व्यवस्था में एक भी अक्षर ऐसा नहीं मिलता जो मनुष्य को सिखाए कि अपने ही लाभ के लिए उसे क्या करना या क्या छोड़ना चाहिए। वरन् क्योंकि मनुष्य स्वभाव से अपने आपसे प्रेम करने की ओर उचित से कहीं अधिक झुके हुए हैं, इसलिए उन्हें ऐसे प्रेम के लिए, जो पहले ही हर उचित सीमा से बढ़ा हुआ था, भड़काने वाली आज्ञा देने की कोई आवश्यकता न थी।
इसलिए यह स्पष्ट है कि आज्ञाओं का पालन अपने प्रति प्रेम में नहीं, वरन् परमेश्वर और पड़ोसी के प्रति प्रेम में है। परिणामस्वरूप, वही मनुष्य सब से अच्छा जीवन बिताता है जो जहाँ तक सम्भव हो अपने लिए कम से कम जीता है, जबकि कोई उससे अधिक अव्यवस्थित जीवन नहीं जीता जो अपने लिए जीता और केवल अपने लाभ की सोचता है।
वरन्, पड़ोसी के प्रति हमारे ऊपर जो प्रेम की भावना बनती है उसे अधिक स्पष्टता से बताने के लिए, प्रभु हमें उस प्रेम की ओर भेजता है जो हम अपने आप से रखते हैं, और उसे हमारे सामने नियम और आदर्श के रूप में रखता है। इस पर सावधानी से विचार करना चाहिए।
हमें इस तुलना को वैसा नहीं समझना चाहिए जैसा कुछ सोफिस्टों ने समझा है, मानो मसीह हर एक को आज्ञा देता हो कि पहले अपने आप से और फिर अपने पड़ोसी से प्रेम करे। वरन् उसका अभिप्राय यह था कि जो प्रेम हम स्वभाव से अपनी ओर लगाते हैं, उसे दूसरों की ओर मोड़ दिया जाए।
इसीलिए प्रेरित कहता है कि प्रेम अपने लाभ की खोज में नहीं रहता (1 कुरिन्थियों 13)।
उनका यह तर्क तिनके के बराबर भी मूल्य नहीं रखता: कि नियम को उस वस्तु से पहले आना चाहिए जिसे वह नापता है, और हमारा प्रभु अपने पड़ोसी के प्रति प्रेम को आत्म-प्रेम के अनुसार नापता है।
मैं उत्तर देता हूँ कि हमारा प्रभु आत्म-प्रेम को कोई ऊँचा नियम नहीं ठहराता जिसके अनुसार निम्न माने गए पड़ोसी-प्रेम को ढलना पड़े। वरन् क्योंकि हमारी स्वाभाविक विकृति से हमारा प्रेम अपने ही ऊपर टिक गया था, इसलिए वह दिखाता है कि उसे अन्यत्र बढ़ाया जाना चाहिए, ताकि हम दूसरों की भलाई करने के लिए उतने ही तत्पर हों जितने अपनी भलाई करने के लिए।
फिर, क्योंकि यीशु मसीह ने सामरी के दृष्टान्त में दिखाया कि संसार का सबसे बड़ा अजनबी भी पड़ोसी नाम के अन्तर्गत आता है, इसलिए हमें प्रेम की आज्ञा को केवल उन्हीं तक सीमित नहीं करना चाहिए जो किसी बन्धन या सम्बन्ध से हमसे जुड़े हैं (लूका 10)।
मैं इनकार नहीं करता कि जो जितना अधिक हमसे जुड़ा है, उसकी सहायता हमें उतनी ही अधिक तत्परता और घनिष्ठता से करनी चाहिए। मानवता का नियम यह माँग करता है कि जितने निकट कुटुम्ब, मित्रता या पड़ोस के बन्धन हमें जोड़ते हैं, उतने ही अधिक कर्तव्य हमारे एक-दूसरे के प्रति होते हैं। हम इसे परमेश्वर को अप्रसन्न किए बिना मान सकते हैं, जिसकी विधाता-रूपी व्यवस्था हमें ऐसा करने की ओर ले जाती है।
फिर भी मेरा कहना है कि हमें प्रेम की भावना में बिना किसी अपवाद के सब मनुष्यों को अपनाना चाहिए। हमें यूनानी और बर्बर में कोई भेद नहीं करना चाहिए, न यह देखना चाहिए कि वे योग्य हैं या अयोग्य, न यह कि वे मित्र हैं या शत्रु। क्योंकि हमें उन्हें परमेश्वर में देखना है, अपने आप में नहीं।
जब हम इस विचार से मुड़ जाते हैं, तो इसमें आश्चर्य नहीं कि हम बहुत सी भूलों में पड़ते हैं। इसलिए यदि हम प्रेम के सही मार्ग पर बने रहना चाहते हैं, तो हमें स्वयं मनुष्यों पर दृष्टि नहीं टिकानी चाहिए, जिनके गुण प्रायः हमें प्रेम करने की अपेक्षा घृणा करने को विवश कर देते।
इसके बजाय हमें परमेश्वर की ओर देखना चाहिए, जो आज्ञा देता है कि जो प्रेम हम उससे रखते हैं, उसे हम सब मनुष्यों की ओर बढ़ाएँ।
इसलिए हमें यह नींव सदा थामे रखनी चाहिए: मनुष्य चाहे कोई भी हो, यदि हम परमेश्वर से प्रेम रखते हैं तो हमें उससे प्रेम रखना ही है।
अतः यह या तो घातक अज्ञानता थी या द्वेष, जब विद्वत्तावादी आचार्यों ने बदला न लेने और अपने शत्रुओं से प्रेम रखने की हमारे प्रभु की आज्ञाओं को मात्र सलाह बना दिया, जिन्हें वे कहते हैं कि हम चाहें तो मानें और चाहें तो न मानें।
उन्होंने घोषित किया कि केवल संन्यासी ही इन आज्ञाओं का पालन करने के लिए अनिवार्य रूप से बँधे हैं। उन्होंने संन्यासियों को साधारण मसीहियों से अधिक सिद्ध धार्मिकता का भागी ठहराया, क्योंकि संन्यासियों ने अपने आपको उसका पालन करने के लिए बाँध लिया था जिसे वे “सुसमाचारीय सलाहें” कहते थे।
इन बातों को आज्ञाएँ न मानने का उनका कारण यह था कि वे बहुत भारी और कठिन थीं, अनुग्रह की व्यवस्था के अधीन रहनेवाले मसीहियों के लिए भी।
परन्तु क्या वे सचमुच पड़ोसी के प्रति प्रेम सम्बन्धी परमेश्वर की सनातन व्यवस्था को मिटाने का साहस करते हैं? क्या पवित्रशास्त्र में कहीं ऐसा कोई भेद मिलता है? क्या हम इसके ठीक विपरीत नहीं पाते—बहुत सी आज्ञाएँ जो कठोरता से हमसे अपने शत्रुओं से प्रेम रखने की माँग करती हैं?
क्योंकि इसका क्या अर्थ है कि हम अपने शत्रु को भूखा होने पर भोजन कराएँ; कि उसके बैल और गधे के भटक जाने पर उन्हें मार्ग पर लौटा लाएँ; और बोझ के नीचे गिर जाने पर उन्हें उठाएँ? क्या हम अपने शत्रुओं के पशुओं पर तो दया करें, परन्तु स्वयं शत्रुओं के प्रति कोई प्रेम न रखें? (नीतिवचन 25; निर्गमन 23)।
तो फिर? क्या यह परमेश्वर का सनातन वचन नहीं है कि बदला लेना केवल उसी का काम है और वह हर एक को उसका उचित फल देगा (व्यवस्थाविवरण 32)?
यह अन्यत्र और भी स्पष्ट रूप से कहा गया है:
“तू अपने पड़ोसियों की ओर से हुई हानियों का बदला न लेना और न उनकी स्मृति मन में रखना।”
या तो वे इन अंशों को पवित्रशास्त्र से मिटा दें, या मान लें कि परमेश्वर का अभिप्राय इन बातों की आज्ञा देकर व्यवस्था देनेवाले के रूप में कार्य करना था, न कि केवल सलाहकार के रूप में, जैसा वे कल्पना करते हैं।
इसके अतिरिक्त, इन शब्दों का क्या अर्थ है, जिन्हें उन्होंने एक मूर्खतापूर्ण टीका से बिगाड़ दिया है?
हमारा प्रभु कहता है, “अपने शत्रुओं से प्रेम रखो। जो तुमसे बैर रखते हैं उनका भला करो, जो तुम्हें सताते हैं उनके लिए प्रार्थना करो, और जो तुम्हारी बुराई करते हैं उन्हें आशीष दो, कि तुम अपने स्वर्गीय पिता की सन्तान ठहरो।”
क्रिसोस्तोम के साथ कौन यह निष्कर्ष न निकालेगा कि, क्योंकि जोड़ा गया कारण इतना आवश्यक है, ये सलाहें नहीं वरन् आज्ञाएँ हैं? यदि हमारा प्रभु हमें अपनी सन्तान की गिनती से निकाल दे, तो हमारे पास क्या शेष रहेगा?
इन रब्बियों की राय के अनुसार केवल संन्यासी ही परमेश्वर की सन्तान होंगे और उसे अपना पिता कहकर पुकारने का साहस कर सकेंगे। तब कलीसिया का क्या होगा? इस तर्क के अनुसार उसे अन्यजातियों और चुंगी लेनेवालों के बीच भेज दिया जाएगा।
क्योंकि हमारा प्रभु तुरन्त आगे कहता है:
“यदि तुम केवल उन्हीं से प्रेम रखो जो तुमसे प्रेम रखते हैं, तो तुम्हारा क्या प्रतिफल होगा? अन्यजाति लोग और चुंगी लेनेवाले भी ऐसा ही करते हैं।”
यदि हम मसीही नाम तो रखें परन्तु स्वर्गीय मीरास से वंचित रहें, तो हम सचमुच अच्छी दशा में पहुँचे होंगे!
ऐसे शिक्षक स्पष्ट रूप से अपने आपको शैतान की सन्तान प्रकट करते हैं जब वे परमेश्वर की सब सन्तानों के साझा जूए को इतने साहस से उतार फेंकते हैं।
वास्तव में मैं नहीं जानता कि इस शिक्षा को प्रकाशित करने में उनकी मूर्खता पर अधिक आश्चर्य करूँ या उनकी निर्लज्जता पर। क्योंकि प्राचीन लेखकों में से कोई भी इसे एक निश्चित बात घोषित करने में नहीं हिचकता कि ये सब आज्ञाएँ हैं। हम देखते हैं कि सन्त ग्रेगरी के समय में भी इस विषय में कोई सन्देह न था, क्योंकि उसने बिना किसी हिचक के इन्हें आज्ञाओं में गिना है।
परन्तु देखें कि वे कितनी मूर्खता से तर्क करते हैं। वे कहते हैं, “यह मसीहियों के लिए बहुत भारी बोझ होगा”—मानो इससे अधिक बोझिल कुछ कल्पना की जा सकती है कि हम अपने सारे हृदय, प्राण और शक्ति से परमेश्वर से प्रेम रखें।
उस आज्ञा की तुलना में कुछ भी कठिन नहीं, चाहे हमसे शत्रु से प्रेम रखने की माँग की जाए या बदला लेने की हर इच्छा को त्यागने की। वरन् व्यवस्था में जो कुछ भी है, उसके छोटे से छोटे बिन्दु तक, हमारी दुर्बलता के लिए ऊँचा और कठिन है।
केवल परमेश्वर ही हमें सीधे चलने के योग्य बनाता है। वह जो आज्ञा देता है उसे दे, और जो चाहे उसकी आज्ञा दे।
जब वे कहते हैं कि मसीही अनुग्रह की व्यवस्था के अधीन हैं, तो इसका अर्थ यह नहीं कि मसीही लगाम ढीली करके अव्यवस्थित जीवन जी सकते हैं। इसका अर्थ यह है कि वे मसीह में समाविष्ट किए गए हैं, जिसके अनुग्रह से वे व्यवस्था के श्राप से छूटे हैं और जिसके आत्मा के द्वारा व्यवस्था उनके हृदयों पर लिखी जाती है।
सन्त पौलुस इस अनुग्रह को अनुचित अर्थ में व्यवस्था कहता है, क्योंकि वह उस तुलना को बनाए रखना चाहता है जो उसने दोनों के बीच स्थापित की थी। परन्तु ये मूर्ख लोग व्यवस्था शब्द में बिना आधार कोई बड़ा भेद कल्पित करते हैं।
क्षम्य पाप के विषय में उन्होंने जो कहा है, वह भी उतना ही अविवेकपूर्ण है। वे व्यवस्था की पहली पटिया को भंग करनेवाली, परमेश्वर के विरुद्ध छिपी हुई अभक्ति को, और अन्तिम आज्ञा के सीधे उल्लंघन को, दोनों को “क्षम्य पाप” कहते हैं।
क्योंकि उनकी परिभाषा यह है: क्षम्य पाप वह बुरी अभिलाषा है जो सोची-समझी सहमति के बिना उठती है और हृदय में अधिक देर नहीं ठहरती।
मैं इसके विपरीत कहता हूँ कि कोई भी बुरी अभिलाषा हृदय में प्रवेश नहीं कर सकती, सिवाय इसके कि व्यवस्था द्वारा माँगी गई किसी बात का अभाव हो।
हमें पराए देवता रखने से मना किया गया है। जब आत्मा, अविश्वास से परखी जाकर, इधर-उधर देखती और डगमगाती है; जब वह अपना सुख परमेश्वर के सिवा कहीं और खोजने के लिए हिलाई जाती है—तो ये हलचलें, चाहे कितनी ही हल्की क्यों न हों, कहाँ से उठती हैं, सिवाय इसके कि आत्मा के भीतर कोई ऐसी रिक्तता है जो ऐसे प्रलोभनों को अनुमति देती है?
लम्बे तर्क से बचने के लिए: हमें आज्ञा है कि हम परमेश्वर से अपने सारे हृदय, प्राण और मन से प्रेम रखें। इसलिए जब तक आत्मा की हर शक्ति और क्षमता परमेश्वर के प्रेम में समर्पित न हो, हम व्यवस्था की आज्ञाकारिता से हट गए हैं।
क्योंकि जब परमेश्वर के राज्य के विरोधी और विपरीत प्रलोभनों में इतना बल हो कि वे हमें डगमगा दें या हमारे मन में थोड़ी-सी भी बाधा डाल दें, जिससे परमेश्वर की पूरी रीति से आज्ञा न मानी जाए और उसकी इच्छा बिना प्रतिरोध के पूरी न हो, तो यह इस बात का चिह्न है कि उसका राज्य हमारे विवेक में दृढ़ता से स्थापित नहीं हुआ है।
इसके अतिरिक्त, हमने दिखाया है कि अन्तिम आज्ञा उचित रीति से इसी विषय से सम्बन्ध रखती है। क्या किसी बुरी अभिलाषा ने हमारे हृदय को चुभोया है? तो हम पहले ही लोभ के दोषी हैं और परिणामस्वरूप व्यवस्था के उल्लंघनकर्ता हैं।
क्योंकि प्रभु ने केवल हमारे पड़ोसी के लिए हानिकारक सोची-समझी योजनाओं और युक्तियों को ही नहीं, वरन् हमारे ऐसी किसी भी अभिलाषा से उत्तेजित या भड़काए जाने को भी मना किया है। जहाँ कहीं व्यवस्था तोड़ी जाती है, वहाँ परमेश्वर का श्राप तैयार रहता है।
इसलिए हमें छोटी से छोटी अभिलाषाओं को भी मृत्यु के दण्ड से मुक्त नहीं करना चाहिए।
मैं चाहता हूँ कि ऐसे लोग विचार करें कि मसीह का क्या अर्थ है जब वह कहता है:
“जो कोई इन छोटी से छोटी आज्ञाओं में से किसी को तोड़े और दूसरों को भी ऐसा ही करना सिखाए, वह स्वर्ग के राज्य में तुच्छ गिना जाएगा।”
क्या वे स्वयं उन्हीं लोगों में नहीं हैं जब वे व्यवस्था के उल्लंघन को घटाने का साहस करते हैं, मानो वह मृत्यु के योग्य ही न हो?
उन्हें केवल यही नहीं सोचना चाहिए कि क्या आज्ञा दी गई है, वरन् यह भी कि आज्ञा देनेवाला कौन है। क्योंकि कोई उल्लंघन इतना छोटा नहीं जो उसके अधिकार को घटा न दे। क्या उनकी दृष्टि में यह तुच्छ बात है कि परमेश्वर की महिमा का किसी भी बात में उल्लंघन हो?
फिर, यदि प्रभु ने अपनी इच्छा व्यवस्था में प्रकट की है, तो व्यवस्था के विपरीत हर बात उसे अप्रिय है। क्या वे परमेश्वर के क्रोध को इतना निर्बल और निहत्था समझते हैं कि बदला तुरन्त न आए?
वास्तव में उसने यह पर्याप्त स्पष्टता से घोषित किया है, यदि वे अपने आपको उसकी वाणी सुनने के लिए तैयार कर सकें, बजाय इसके कि अपनी तुच्छ बारीकियों से उसके सत्य को धुँधला करें:
“जो प्राणी पाप करता है वही मरेगा।”
फिर:
“पाप की मजदूरी मृत्यु है।”
ये लोग मानते हैं कि पापमय अभिलाषा पाप है, क्योंकि वे इससे इनकार नहीं कर सकते, फिर भी वे कहते हैं कि यह घातक पाप नहीं है।
जब वे इतने समय से अपनी मूर्खता में डटे हुए हैं, तो कम से कम अब उसे सुधार लें। परन्तु यदि वे अपने हठ में बने रहने का निश्चय करें, तो परमेश्वर की सन्तान उन्हें उसी में छोड़ दे और स्वीकार करे कि हर पाप घातक है।
क्योंकि हर पाप परमेश्वर की इच्छा के विरुद्ध विद्रोह है, जो अनिवार्य रूप से उसके क्रोध को भड़काता है, और हर पाप व्यवस्था का उल्लंघन है, जिसके विरुद्ध बिना किसी अपवाद के अनन्त मृत्यु का दण्ड सुनाया गया है।
जहाँ तक सन्तों और विश्वासियों द्वारा किए गए पापों की बात है, वे सचमुच क्षम्य हैं—परन्तु यह परमेश्वर की दया के कारण है, उनके अपने स्वभाव के कारण नहीं।
जो हमने ऊपर स्थापित किया—कि व्यवस्था हमें सिद्ध धार्मिकता की शिक्षा देती है—उससे यह भी निकलता है कि व्यवस्था का पूर्ण पालन परमेश्वर के सामने पूर्ण धार्मिकता है, जिसके द्वारा मनुष्य उसके स्वर्गीय सिंहासन के सामने धर्मी गिना जा सकता है।
इसलिए व्यवस्था प्रकाशित करने के बाद मूसा स्वर्ग और पृथ्वी को साक्षी ठहराने में नहीं हिचकता कि उसने इस्राएल के लोगों के सामने जीवन और मृत्यु, भलाई और बुराई रखी है (व्यवस्थाविवरण 30)।
न ही हम इनकार कर सकते हैं कि व्यवस्था की पूर्ण आज्ञाकारिता का प्रतिफल अनन्त जीवन है, जैसी प्रभु ने प्रतिज्ञा की है। तथापि हमें यह भी विचार करना चाहिए कि क्या हम ऐसी आज्ञाकारिता देते हैं कि उससे उद्धार का कोई भरोसा पा सकें।
क्योंकि यह जानने से क्या लाभ कि व्यवस्था की आज्ञाकारिता के प्रतिफल के रूप में अनन्त जीवन की आशा की जा सकती है, जब तक हम यह भी न जानें कि क्या हम इस उपाय से उद्धार पा सकते हैं?
यहाँ व्यवस्था की हमें बचाने में असमर्थता प्रकट होती है। क्योंकि ऐसी आज्ञाकारिता हममें से किसी में नहीं पाई जाती, इसलिए हम जीवन की प्रतिज्ञाओं से बाहर कर दिए जाते हैं और अनन्त श्राप के अधीन आ जाते हैं।
मैं केवल उसकी बात नहीं कर रहा जो वास्तव में होता है, वरन् उसकी जो अनिवार्य रूप से होना ही है। क्योंकि व्यवस्था की शिक्षा मानवीय सामर्थ्य से बहुत ऊपर है, इसलिए हम उसकी प्रतिज्ञाओं को दूर से तो देख सकते हैं, परन्तु उनसे कोई लाभ नहीं उठा सकते।
इसलिए व्यवस्था से हमें अपनी दुर्दशा की स्पष्ट पहचान के सिवा और कुछ नहीं मिलता, क्योंकि उद्धार की हर आशा हमसे छीन ली जाती है और मृत्यु प्रकट हो जाती है।
दूसरी ओर उसकी भयानक धमकियाँ खड़ी हैं, जो हममें से कुछ पर नहीं, वरन् बिना किसी अपवाद के सब पर दबाव डालती हैं। वे हमें अटल कठोरता से दबाती और पीछा करती हैं, ताकि हम व्यवस्था में एक निश्चित श्राप को देखें।
इसलिए यदि हम केवल व्यवस्था की ओर देखें, तो हम हियाव छोड़ने, घबराहट से अभिभूत होने और निराश होने के सिवा कुछ नहीं कर सकते। क्योंकि उसमें हम सब श्रापित और दोषी ठहराए गए हैं, और हममें से कोई उस आशीष में सम्मिलित नहीं जो उसे माननेवालों से प्रतिज्ञा की गई है।
कोई पूछेगा कि क्या परमेश्वर हमें धोखा देने में आनन्दित होता है। क्योंकि यह उपहास जैसा प्रतीत होता है कि मनुष्य को सुख की कोई आशा दिखाई जाए, उसे उसकी ओर बुलाया और प्रेरित किया जाए, और प्रतिज्ञा की जाए कि वह उसके लिए तैयार है, जबकि उस तक पहुँचने का मार्ग बन्द रहे।
मेरा उत्तर यह है कि यद्यपि व्यवस्था की प्रतिज्ञाएँ, सशर्त होने के कारण, केवल उन्हीं के लिए पूरी होती हैं जिन्होंने सिद्ध धार्मिकता पूरी की हो—जो किसी मनुष्य में नहीं पाई जाती—तथापि वे व्यर्थ नहीं दी गई थीं।
क्योंकि जब हम समझ लेते हैं कि उनका हमारे लिए कोई मूल्य या प्रभाव तब तक नहीं जब तक परमेश्वर हमें अपनी मुफ़्त भलाई से, हमारे कर्मों का विचार किए बिना, ग्रहण न करे, और जब हम विश्वास से उस भलाई को ग्रहण कर लेते हैं जो सुसमाचार में हमें दी जाती है, तब ये ही प्रतिज्ञाएँ, अपनी शर्तों समेत, खोखली नहीं हैं।
क्योंकि तब प्रभु हमें सब कुछ मुफ़्त देता है। उसकी कृपा यहाँ तक पहुँचती है कि वह हमारी अपूर्ण आज्ञाकारिता को अस्वीकार नहीं करता। वरन् उसमें जो कमी है उसे क्षमा और माफ़ करके वह उसे अच्छी और पूर्ण मानकर ग्रहण करता है और परिणामस्वरूप हमें व्यवस्था की प्रतिज्ञाओं का फल पाने देता है, मानो उनकी शर्त पूरी हो गई हो।
परन्तु क्योंकि इस प्रश्न पर विश्वास से धर्मी ठहराए जाने की चर्चा के समय अधिक विस्तार से विचार किया जाएगा, इसलिए मैं अभी इसे और आगे नहीं बढ़ाऊँगा।
अब हमें अपने इस कथन को कि व्यवस्था का पालन असम्भव है, अधिक संक्षेप में समझाना और पुष्ट करना चाहिए। क्योंकि यह कथन कुछ लोगों को इतना बेतुका लगता है कि सन्त जेरोम ने इसे दुष्टता ठहराने में संकोच नहीं किया। जिस कारण से उसने ऐसा किया उससे मुझे कोई सरोकार नहीं; हमारे लिए सत्य को समझ लेना पर्याप्त है।
मैं सम्भावना के विभिन्न प्रकारों के विषय में जटिल भेद प्रस्तुत नहीं करूँगा। मैं उसे असम्भव कहता हूँ जो कभी देखा नहीं गया और जो, परमेश्वर की आज्ञा के अनुसार, कभी होगा भी नहीं।
यदि हम संसार के आरम्भ से अब तक के सारे समय की जाँच करें, तो मेरा कथन है कि सब सन्तों में कभी एक भी ऐसा न हुआ जिसने, नश्वर देह के इस बन्दीगृह में बन्द रहते हुए, ऐसा सिद्ध प्रेम रखा हो कि वह परमेश्वर से अपने सारे हृदय, प्राण और शक्ति से प्रेम रखता हो।
मैं आगे कहता हूँ कि कभी एक भी ऐसा न हुआ जो किसी पापमय अभिलाषा से कलंकित न हुआ हो। इसका खण्डन कौन कर सकता है?
मैं भली-भाँति जानता हूँ कि अन्धविश्वास कैसे सन्तों की कल्पना करता है: ऐसे व्यक्ति जो इतने शुद्ध हों कि स्वर्ग के स्वर्गदूत भी उनकी बराबरी मुश्किल से कर सकें। परन्तु यह पवित्रशास्त्र और अनुभव दोनों के विरुद्ध है।
मैं और आगे कहता हूँ कि ऐसा कोई कभी न होगा जो तब तक ऐसी सिद्धता पाए जब तक वह अपनी देह से छुड़ाया न जाए। यह पवित्रशास्त्र की अनेक स्पष्ट साक्षियों से प्रमाणित होता है।
मन्दिर के समर्पण के समय सुलैमान ने घोषणा की:
“पृथ्वी पर कोई मनुष्य नहीं जो पाप न करता हो।”
दाऊद कहता है:
“कोई जीवित प्राणी तेरे सामने धर्मी नहीं ठहरेगा।”
यह कथन अय्यूब की पुस्तक में बार-बार दोहराया गया है। सन्त पौलुस इसे अन्य सब से अधिक स्पष्टता से पुष्ट करता है:
“शरीर आत्मा के विरुद्ध अभिलाषा करता है, और आत्मा शरीर के विरुद्ध।”
और वह यह सिद्ध करने के लिए कि जो सब व्यवस्था के अधीन हैं वे श्रापित हैं, इस कथन के सिवा कोई और कारण नहीं देता:
“श्रापित है हर वह जो व्यवस्था की सब आज्ञाओं के पालन में स्थिर नहीं रहता।”
इससे वह संकेत देता है—या यों कहें कि एक स्थापित तथ्य के रूप में मान लेता है—कि कोई ऐसी आज्ञाकारिता में स्थिर नहीं रह सकता।
अब जो कुछ पवित्रशास्त्र ने पहले से कहा है, उसे सदा के लिए निश्चित, वरन् अनिवार्य मानना चाहिए। पेलागियसवादियों ने सन्त ऑगस्टीन को इसी बारीकी से परेशान किया। उनके दोषारोपण से बचने के लिए उसने माना कि प्रभु यदि चाहे तो एक नश्वर मनुष्य को स्वर्गदूतीय सिद्धता तक उठा सकता है, परन्तु उसने कभी ऐसा किया नहीं और कभी करेगा भी नहीं, क्योंकि उसने इसके विपरीत घोषित किया है।
मैं इस कथन का विरोध नहीं करता, परन्तु मैं यह जोड़ता हूँ कि परमेश्वर की सामर्थ्य को उसके सत्य के विरुद्ध खड़ा करने में कोई तुक नहीं। इसलिए इस प्रस्ताव पर उचित रीति से विवाद नहीं किया जा सकता: कि जिन बातों के विषय में प्रभु ने घोषित किया है कि वे कभी न होंगी, उन्हें ठीक ही असम्भव कहा जा सकता है।
फिर भी, यदि विवाद केवल असम्भव शब्द को लेकर हो, तो स्वयं यीशु मसीह ने, जब उसके चेलों ने पूछा कि कौन उद्धार पा सकता है, उत्तर दिया:
“मनुष्यों से तो यह असम्भव है, परन्तु परमेश्वर से सब कुछ सम्भव है।”
सन्त ऑगस्टीन ठोस तर्कों से दिखाता है कि इस वर्तमान जीवन में हम परमेश्वर को वह प्रेम कभी नहीं देते जो हम पर उसका ऋण है। वह कहता है कि प्रेम ज्ञान से इस प्रकार उत्पन्न होता है कि कोई भी परमेश्वर से सिद्ध प्रेम नहीं रख सकता जब तक उसने पहले उसकी भलाई को सिद्ध रीति से न जाना हो।
परन्तु जब तक हम इस पृथ्वी की यात्रा में हैं, हम उसकी भलाई को केवल धुँधले रूप में, दर्पण में देखते हैं (1 कुरिन्थियों 13:12)। इसलिए यह निकलता है कि उसके प्रति हमारा प्रेम अपूर्ण है।
इसलिए हम इसे निश्चित मानें: जब तक हम इस संसार में जीवित हैं, व्यवस्था की पूर्ति हमारे लिए असम्भव है, जैसा कि अन्यत्र सन्त पौलुस से प्रमाणित किया जाएगा।
परन्तु सारा विषय अधिक स्पष्टता से समझा जा सके, इसलिए आइए हम व्यवस्था के कार्य और उपयोग का सार प्रस्तुत करें, जो, जहाँ तक मैं समझ सकता हूँ, तीन भागों में है।
पहला यह है कि परमेश्वर की धार्मिकता को—अर्थात् उस धार्मिकता को जो उसे ग्रहण योग्य है—प्रकट करके व्यवस्था हर एक को उसकी अपनी अधार्मिकता के विषय में चेताती है, उसे उसका निश्चय कराती है, और अन्त में उसे दोषी ठहराकर दण्ड देती है। क्योंकि मनुष्य, जो अन्यथा आत्म-प्रेम से अन्धा और मतवाला है, उसे विवश होकर अपनी दुर्बलता और अशुद्धता दोनों को पहचानना और स्वीकार करना पड़ता है।
जब तक उसका घमण्ड स्पष्ट रूप से उघाड़ा न जाए, वह अपनी शक्ति पर मूर्खतापूर्ण भरोसे से फूला रहता है। न ही उसे उसकी दुर्बलता और अपर्याप्तता को पहचानने तक लाया जा सकता है जब तक वह उसे अपनी कल्पना के अनुसार नापता रहे। परन्तु जब वह परमेश्वर की व्यवस्था का पालन करने का प्रयत्न करता है, तो जो कठिनाई उसे सामने आती है, वह उसे अपने अहंकार को दीन करने का कारण देती है। क्योंकि वह पहले अपनी शक्तियों को चाहे कितना ही ऊँचा मानता रहा हो, तब वह अनुभव करता है कि वे इतने बड़े भार के नीचे कितनी बोझिल हैं, यहाँ तक कि वे लड़खड़ाती, डगमगाती, गिर पड़ती और अन्त में बिलकुल थक जाती हैं। इस प्रकार व्यवस्था की शिक्षा से सीखकर मनुष्य उस आत्मविश्वास से रिक्त कर दिया जाता है जिससे वह स्वभावतः भरा हुआ है।
उसे अहंकार के उस दूसरे दोष से भी शुद्ध होना चाहिए जिसके विषय में हमने कहा है। क्योंकि जब तक वह अपने ही निर्णय पर भरोसा रखता है, वह सच्ची धार्मिकता के स्थान पर कपट गढ़ लेता है। इसमें मगन होकर वह अपने ही मन से रचे गए कुछ विधि-विधानों के बहाने परमेश्वर के अनुग्रह के विरुद्ध घमण्ड से खड़ा हो जाता है।
परन्तु जब उसे विवश किया जाता है कि वह परमेश्वर की व्यवस्था के मापदण्ड के अनुसार अपने जीवन को परखे, तो वह इस झूठी धार्मिकता की उस धारणा को छोड़ देता है जो उसने बना ली थी। वह देखता है कि वह सच्ची पवित्रता से कितना अत्यधिक दूर है और, इसके विपरीत, उन दोषों से कितना भरा है जिनसे वह पहले अपने आपको मुक्त समझता था। क्योंकि पापमय अभिलाषाएँ इतनी गहराई में छिपी और उलझी हुई हैं कि वे मनुष्य की दृष्टि से सहज ही बच निकलती हैं।
प्रेरित का यह कहना बिना कारण नहीं है:
“यदि व्यवस्था न कहती, ‘तू लोभ न करना,’ तो मैं लोभ को न जानता।”
क्योंकि जब तक लोभ को व्यवस्था उघाड़कर उसके छिपने के स्थानों से बाहर न खींचे, वह अभागे मनुष्य को उसके जाने बिना ही मार डालता है।
इसलिए व्यवस्था एक दर्पण के समान है जिसमें हम पहले अपनी दुर्बलता को, फिर उससे उत्पन्न अधर्म को, और अन्त में दोनों से निकलनेवाले श्राप को देखते हैं—जैसे दर्पण में हम अपने मुख के धब्बे देखते हैं।
क्योंकि जिस मनुष्य में धार्मिकता से जीने की हर क्षमता का अभाव है, वह पाप के दलदल में पड़े रहने के सिवा कुछ नहीं कर सकता। पाप के बाद श्राप आता है। इसलिए जितनी अधिक पूर्णता से व्यवस्था हमें उल्लंघन का दोषी ठहराती है, उतना ही अधिक वह हमें दण्डित और अधिक दण्ड के योग्य प्रकट करती है।
प्रेरित का यही अभिप्राय है जब वह कहता है:
“व्यवस्था के द्वारा पाप की पहचान होती है।”
यहाँ वह व्यवस्था के पहले कार्य को बताता है, जो वह उन पापियों के प्रति करती है जिनका अभी नया जन्म नहीं हुआ।
इन्हीं कथनों का अर्थ भी वही है: कि व्यवस्था इसलिए आई कि पाप बढ़े (रोमियों 5:20); और इसलिए वह मृत्यु की सेवा है, जो परमेश्वर का क्रोध उत्पन्न करती और हमें मार डालती है (2 कुरिन्थियों 3:7; रोमियों 4:15)।
क्योंकि इसमें कोई सन्देह नहीं कि विवेक जितनी निकटता से अपने पाप की समझ से छुआ जाता है, उतना ही अधर्म भी साथ-साथ बढ़ता है, क्योंकि तब उल्लंघन के साथ व्यवस्था देनेवाले के विरुद्ध विद्रोह भी जुड़ जाता है।
इससे निकलता है कि व्यवस्था पापी के विनाश के लिए परमेश्वर के बदले को सन्नद्ध करती है, क्योंकि वह स्वयं से दोष लगाने, दण्ड देने और नष्ट करने के सिवा कुछ नहीं कर सकती। जैसा सन्त ऑगस्टीन कहता है, यदि अनुग्रह का आत्मा हटा लिया जाए, तो व्यवस्था का दोष लगाने और मार डालने के सिवा कोई और काम नहीं रहता।
फिर भी ऐसा कहने में हम व्यवस्था की कोई हानि नहीं करते, न उसकी उत्कृष्टता में से कुछ घटाते हैं। निश्चय ही, यदि हमारी इच्छा पूरी तरह उसकी आज्ञाकारिता में जमी और व्यवस्थित होती, तो हमारे उद्धार के लिए उसकी शिक्षा का केवल ज्ञान ही पर्याप्त होता।
परन्तु क्योंकि हमारा स्वभाव, भ्रष्ट और शारीरिक होने के कारण, परमेश्वर की आत्मिक व्यवस्था का सीधा विरोधी है और उसकी शिक्षा से सुधारा नहीं जा सकता, इसलिए निकलता है कि जो व्यवस्था, यदि ठीक रीति से ग्रहण की जाती तो उद्धार के लिए दी गई होती, वह हमारे लिए पाप और मृत्यु का कारण बन जाती है।
क्योंकि हम सब उसके उल्लंघन के दोषी ठहरे हैं, इसलिए वह परमेश्वर की धार्मिकता को जितनी स्पष्टता से प्रकट करती है, उतनी ही पूर्णता से हमारी अधार्मिकता को उघाड़ती है। धार्मिकता के लिए तैयार प्रतिफल का हमें वह जितना निश्चय दिलाती है, उतना ही निश्चय अधर्मियों के लिए तैयार दण्ड का भी दिलाती है।
इसलिए इन कथनों से हम व्यवस्था की कोई हानि करने से इतने दूर हैं कि परमेश्वर की भलाई की इससे उत्तम सराहना हम कर ही नहीं सकते। क्योंकि इससे प्रकट होता है कि केवल हमारी अपनी विकृति ही हमें उस अनन्त आशीष को पाने से रोकती है जो व्यवस्था में हमें दी गई है।
इससे हमें परमेश्वर के अनुग्रह का, जो व्यवस्था की घटी को पूरा करता है, अधिक मूल्य आँकने का और उसकी दया से, जिसके द्वारा वह अनुग्रह हमें दिया जाता है, और गहरा प्रेम रखने का कारण मिलता है। क्योंकि हम देखते हैं कि वह हमारी भलाई करने में कभी थकता नहीं, वरन् निरन्तर आशीष पर आशीष जोड़ता जाता है।
अब जब हमारी अधार्मिकता और दण्ड की आज्ञा व्यवस्था की साक्षी से उघाड़ी और पुष्ट की जाती है, तो यह इसलिए नहीं किया जाता कि हम निराशा में पड़ें और पूरी तरह हियाव छोड़कर अपने आपको विनाश के हवाले कर दें। यदि हम व्यवस्था का उचित उपयोग करें, तो ऐसा परिणाम न होगा। यह सच है कि दुष्ट इस रीति से निराशा में धकेले जाते हैं, परन्तु वह उनके हृदयों के हठ से उत्पन्न होती है।
परन्तु परमेश्वर की सन्तान को एक भिन्न अन्त तक पहुँचना चाहिए। उन्हें वह समझना चाहिए जो सन्त पौलुस सिखाता है जब वह मानता है कि हम सब व्यवस्था से दोषी ठहराए गए हैं:
“कि हर एक मुँह बन्द किया जाए, और सारा संसार परमेश्वर के सामने दण्ड के योग्य ठहरे।”
फिर, एक और स्थान पर वह सिखाता है कि परमेश्वर ने सब को अविश्वास में बन्द कर रखा है, इसलिए नहीं कि उन्हें नष्ट करे या नाश होने के लिए छोड़ दे, वरन्:
“कि वह सब पर दया करे।”
अर्थात्, अपनी ही शक्ति पर हर व्यर्थ भरोसा त्यागकर, वे पहचानें कि वे केवल उसी के हाथ से थामे गए हैं। फिर, पूरी तरह खाली और असहाय छोड़ दिए जाने पर, वे उसकी दया की शरण लें, पूर्ण रूप से उसी पर टिकें, उसकी छाया में अपने आपको छिपाएँ, और उसी को अपनी धार्मिकता और पुण्य के रूप में अपनाएँ—जैसा वह यीशु मसीह में उन सब को दी जाती है जो सच्चे विश्वास से उसे ढूँढ़ते, चाहते और उसकी बाट जोहते हैं।
क्योंकि व्यवस्था में प्रभु केवल सिद्ध धार्मिकता का प्रतिफल देनेवाले के रूप में प्रकट होता है, जिसकी हम सब में घटी है। इसके विपरीत, वह अपने आपको हमारे पापों के योग्य दण्डों के कठोर निष्पादक के रूप में प्रकट करता है। परन्तु मसीह में उसका मुख हम पर अनुग्रह और कोमलता से भरा हुआ चमकता है, यद्यपि हम कंगाल और अयोग्य पापी हैं।
उस शिक्षा के विषय में जो हमें व्यवस्था से पानी चाहिए, ताकि हम परमेश्वर की सहायता माँगने की ओर ले जाए जाएँ, सन्त ऑगस्टीन प्रायः इस प्रकार कहता है:
“व्यवस्था आज्ञा देती है, ताकि उसकी आज्ञाओं को पूरा करने का यत्न करके और अपनी दुर्बलता के कारण असफल होकर हम परमेश्वर की सहायता माँगना सीखें।”
फिर:
“व्यवस्था का उपयोग यह है कि मनुष्य को उसकी दुर्बलता का निश्चय कराए और उसे अनुग्रह की उस औषधि को ढूँढ़ने के लिए विवश करे जो मसीह में है।”
फिर:
“व्यवस्था आज्ञा देती है; अनुग्रह भला करने की शक्ति देता है।”
फिर:
“परमेश्वर वह आज्ञा देता है जो हम नहीं कर सकते, ताकि हम जानें कि हमें उससे क्या माँगना चाहिए।”
व्यवस्था के दूसरे लाभ के विषय में सन्त ऑगस्टीन इतने स्पष्ट रूप से नहीं कहता—सम्भवतः इसलिए कि उसने सोचा कि एक को दूसरे से समझा जा सकता है, या सम्भवतः इसलिए कि वह इस विषय में पूरी तरह निश्चित न था।
अब, यद्यपि जिस लाभ की हमने चर्चा की वह उचित रीति से परमेश्वर की सन्तान का है, तथापि वह त्यागे हुए लोगों में भी साझा है। क्योंकि यद्यपि वे उस बिन्दु तक नहीं पहुँचते जिसे विश्वासियों ने पाया है—शरीर के अनुसार दीन किए जाना, ताकि वे आत्मा से आत्मिक शक्ति पाएँ—वरन् भय और निराशा में पूरी तरह गिर पड़ते हैं, तथापि यह परमेश्वर के न्याय की समता को प्रकट करने का काम करता है कि उनके विवेक इस प्रकार पीड़ित हों।
क्योंकि वे निरन्तर, जहाँ तक उनसे हो सके, परमेश्वर के न्याय से बचने का प्रयत्न करते रहते हैं। फिर भी, यद्यपि वह न्याय अभी खुले रूप में प्रकट नहीं हुआ, वे व्यवस्था की और अपने विवेक की साक्षी से इतने दबे हुए हैं कि वे प्रकट कर देते हैं कि वे किस योग्य हैं।
व्यवस्था का दूसरा कार्य यह है: कि जो केवल विवश होकर ही भला करना चाहते हैं, वे उसकी भयानक धमकियाँ सुनकर कम से कम दण्ड के भय से बुराई से रोके जाएँ।
वे इसलिए नहीं रोके जाते कि उनके हृदय भीतर से हिलाए या प्रभावित किए गए हैं, वरन् इसलिए कि उन्हें लगाम की भाँति उन बुरी अभिलाषाओं को पूरा करने से रोका जाता है जिन्हें वे अन्यथा बेलगाम छूट के साथ पूरा करते।
इससे वे परमेश्वर के सामने किसी रीति से अधिक धर्मी या अच्छे नहीं ठहरते। क्योंकि यद्यपि भय या लज्जा उन्हें रोकती है ताकि वे जो हृदय में सोच चुके हैं उसे करने का या अपने असंयम का क्रोध उँडेलने का साहस न करें, तथापि इससे उनके हृदय परमेश्वर के भय और आज्ञाकारिता में नहीं लाए जाते।
वरन् जितना वे अपने आपको रोकते हैं, उतना ही वे भीतर अपनी वासनाओं में जलते और उबलते हैं, हर दुष्ट और लज्जाजनक काम करने को तैयार, यदि व्यवस्था का आतंक उन्हें रोके न रखे। उनके हृदय केवल बुरे ही नहीं रहते, वरन् वे परमेश्वर की व्यवस्था से प्राणघातक घृणा भी रखते हैं; और क्योंकि परमेश्वर उसका रचयिता है, वे उससे घृणा करते हैं। यदि उनके वश में होता, तो वे उसे प्रसन्नता से मिटा देते, क्योंकि वे उसका भली, पवित्र और खरी बातों की आज्ञा देना, या उसकी महिमा का तिरस्कार करनेवालों से बदला लेना सह नहीं सकते।
यह मनोभाव कुछ में अधिक खुलकर प्रकट होता है और कुछ में अधिक छिपा रहता है, परन्तु यह उन सब में है जिनका नया जन्म नहीं हुआ। वे व्यवस्था के अधीन केवल किसी प्रकार होते हैं—स्वेच्छा से नहीं, वरन् विवशता और बहुत प्रतिरोध के साथ। परमेश्वर की कठोरता के भय के सिवा कुछ उन्हें बाँधे नहीं रखता।
फिर भी, यह बाधित और जबरन की गई धार्मिकता मानव समाज के लिए आवश्यक है। प्रभु उसकी शान्ति का प्रबन्ध इस प्रकार करता है कि सब कुछ उलट-पुलटकर गड़बड़ी में न पड़ जाए, जैसा तब होता जब हर एक को जो चाहे करने की छूट होती।
फिर, यह परमेश्वर की सन्तान के लिए भी निष्फल नहीं कि उस समय में, जब उनके पास अभी परमेश्वर का आत्मा नहीं है वरन् वे अपने शरीर की मूर्खता के अनुसार जीते हैं, वे इस प्रारम्भिक अनुशासन से शासित हों। क्योंकि कभी-कभी ऐसा होता है कि प्रभु अपने चुने हुओं पर तुरन्त अपने आपको प्रकट नहीं करता, वरन् उन्हें बुलाने से पहले कुछ समय के लिए अज्ञानता में चलने देता है।
उस समय में, यद्यपि वे वर्तमान में थोड़ी ही उन्नति करते हैं, क्योंकि उनके हृदय अभी साधे और वश में नहीं किए गए, तथापि इस दासोचित भय से वे पूर्ण उच्छृंखलता से रोके रहते हैं। इस प्रकार वे धीरे-धीरे प्रभु का जूआ उठाने के अभ्यस्त हो जाते हैं, ताकि जब वह उन्हें बुलाए तो वे उसकी आज्ञाओं के अधीन होने के लिए, मानो किसी नई और अनजानी बात के लिए, पूरी तरह अप्रस्तुत न हों।
सम्भव है कि प्रेरित ने व्यवस्था के इसी कार्य का वर्णन करना चाहा जब उसने कहा कि व्यवस्था धर्मियों के लिए नहीं, वरन् अधर्मियों और विद्रोहियों, भक्तिहीनों और पापियों, अपवित्रों और अशुद्धों, माता-पिता के घातकों, हत्यारों, व्यभिचारियों, चोरों, झूठ बोलनेवालों, झूठी शपथ खानेवालों और खरी शिक्षा के विपरीत जो कुछ भी करते हैं उन सब के लिए ठहराई गई है (1 तीमुथियुस 1:9–10)।
इससे वह दिखाता है कि व्यवस्था उस लगाम के समान है जो शरीर की अभिलाषाओं को रोकती है, जो अन्यथा बिना माप के फूट पड़तीं।
तीसरा उपयोग, जो मुख्य है और उस उद्देश्य से अत्यन्त उचित रूप से सम्बन्ध रखता है जिसके लिए व्यवस्था दी गई थी, विश्वासियों के बीच अपना स्थान रखता है, जिनके हृदयों में परमेश्वर का आत्मा पहले ही राज्य करता और अपना सामर्थ्य प्रयोग करता है।
क्योंकि यद्यपि उनकी व्यवस्था परमेश्वर की उँगली से उनके हृदयों पर लिखी हुई है—अर्थात्, यद्यपि पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन में उनमें परमेश्वर की आज्ञा मानने की इच्छा है—तथापि वे व्यवस्था से दो प्रकार से लाभ पाते हैं।
पहला, वह एक उत्कृष्ट साधन है जिससे वे दिन-प्रतिदिन अधिक पूर्णता और निश्चय से सीख सकते हैं कि परमेश्वर की इच्छा क्या है, जिसकी वे आकांक्षा करते हैं, और जिससे वे उसके ज्ञान में दृढ़ किए जा सकते हैं।
जैसे एक सेवक, यद्यपि अपने हृदय में पूरी तरह ठाने हुए है कि अपने स्वामी की विश्वासयोग्यता से सेवा करे और हर बात में उसे प्रसन्न करे, फिर भी उसके स्वभाव से भली-भाँति परिचित हो और उसकी इच्छाओं पर सावधानी से विचार करे ताकि उनके अनुरूप अपने आपको ढाले, वैसे ही हममें से किसी को अपने आपको इस आवश्यकता से मुक्त नहीं समझना चाहिए।
क्योंकि अब तक किसी ने ऐसी बुद्धि प्राप्त नहीं की कि वह व्यवस्था की दैनिक शिक्षा से दिन-प्रतिदिन उन्नति न कर सके और परमेश्वर की इच्छा की अधिक स्पष्ट समझ न पा सके।
फिर, क्योंकि हमें केवल शिक्षा की नहीं, वरन् प्रोत्साहन की भी आवश्यकता है, इसलिए परमेश्वर का सेवक व्यवस्था से यह लाभ पाएगा: उस पर बार-बार मनन करने से वह आज्ञाकारिता के लिए प्रेरित होगा, उसमें दृढ़ किया जाएगा, और अपने दोषों से खींचकर लौटाया जाएगा।
क्योंकि सन्तों को इसी प्रकार अपने आपको आगे बढ़ाना चाहिए। वे भलाई करने में अपने आपको लगाने के लिए चाहे कितने ही उत्सुक हों, वे अपने शरीर की सुस्ती और भारीपन से निरन्तर रुकते रहते हैं, यहाँ तक कि वे अपना कर्तव्य कभी पूरी तरह निभा नहीं पाते।
इस शरीर के लिए व्यवस्था कोड़े का काम करती है, जो उसे गधे की भाँति काम पर हाँकती है जो लगातार मार खाए बिना आगे नहीं बढ़ता। या, अधिक स्पष्ट रूप में कहें, तो क्योंकि आत्मिक मनुष्य अभी अपने शरीर के बोझ से छुड़ाया नहीं गया, इसलिए व्यवस्था एक सतत अंकुश का काम करती है, जो उसे सो जाने या सुस्त हो जाने नहीं देती।
दाऊद के सामने यही उपयोग था जब उसने परमेश्वर की व्यवस्था की इतनी बड़ी स्तुतियाँ गाईं:
“यहोवा की व्यवस्था खरी है, वह प्राण को बहाल करती है; यहोवा के आदेश सीधे हैं, वे हृदय को आनन्दित करते हैं।” —भजन संहिता 19:7–8
फिर:
“तेरा वचन मेरे पाँव के लिए दीपक और मेरे मार्ग के लिए उजियाला है।”
उस भजन में जो कुछ आगे है, उसके विषय में भी यही सच है।
यह ऊपर उद्धृत सन्त पौलुस के कथनों के विरुद्ध नहीं, जहाँ वह यह नहीं दिखाता कि व्यवस्था उस विश्वासी को क्या लाभ पहुँचाती है जिसका नया जन्म हो चुका है, वरन् यह कि व्यवस्था मनुष्य में अपने आप क्या कर सकती है।
इसके विपरीत दाऊद दिखाता है कि प्रभु अपने सेवकों को अपनी व्यवस्था की शिक्षा कितने लाभप्रद रूप से देता है जब वह उनके भीतर उसका पालन करने की इच्छा फूँकता है।
कुछ अज्ञानी लोग, इस भेद को न पहचान पाने के कारण, उतावली से मूसा को अस्वीकार करते हैं और आग्रह करते हैं कि व्यवस्था को छोड़ देना चाहिए। क्योंकि वे नहीं सोचते कि मसीहियों को ऐसी शिक्षा पर ध्यान देना उचित है जिसमें अपने आप में मृत्यु की सेवा समाई है।
ऐसी राय हमसे दूर रहनी चाहिए, क्योंकि मूसा ने स्पष्ट घोषित किया कि यद्यपि व्यवस्था पापी मनुष्य में मृत्यु के सिवा कुछ उत्पन्न नहीं कर सकती, तथापि वह विश्वासियों के लिए एक बहुत भिन्न लाभ लाती है। मृत्यु के निकट आते समय उसने लोगों के सामने यह घोषणा की:
“जितनी बातें मैं आज तुम्हारे सामने साक्षी देकर कहता हूँ उन सब को अपने मन में रखो, ताकि तुम उन्हें अपने बच्चों को सिखाओ और उन्हें चौकसी से सिखाओ कि इस पुस्तक में लिखी हुई हर बात का पालन करें। क्योंकि ये बातें तुम्हें व्यर्थ आज्ञा नहीं दी गईं, वरन् इसलिए कि तुम इनसे जीवित रहो।”
वास्तव में, यदि कोई इनकार नहीं कर सकता कि व्यवस्था में सिद्ध धार्मिकता का पूर्ण चित्र है, तो हमें या तो यह कहना होगा कि भली रीति से जीने का हमारे पास कोई नियम नहीं होना चाहिए, या यह कि हमें इसी से जुड़े रहना है। क्योंकि भक्तिपूर्ण जीवन के बहुत से नियम नहीं हैं, वरन् केवल एक है, जो सनातन और अपरिवर्तनीय है।
इसलिए दाऊद का यह कथन कि धर्मी मनुष्य दिन-रात व्यवस्था पर मनन करता है, किसी एक युग तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए, वरन् संसार के अन्त तक हर पीढ़ी पर लागू होता है (भजन संहिता 1:2)।
न ही हमें इस बात से घबराना चाहिए कि व्यवस्था उससे अधिक सिद्ध पवित्रता की माँग करती है जो हम देह के बन्दीगृह में बन्द रहकर पा सकते हैं, और इस कारण उसकी शिक्षा को छोड़ दें।
क्योंकि जब तक हम परमेश्वर के अनुग्रह के अधीन हैं, व्यवस्था अपनी कठोरता को चरम सीमा तक हम पर दबाकर नहीं चलाती, मानो उसे कुछ भी सन्तुष्ट नहीं कर सकता जब तक हम वह सब कुछ पूर्णता से पूरा न करें जिसकी वह आज्ञा देती है। वरन् हमें उस सिद्धता की ओर उकसाकर जिसके लिए वह बुलाती है, वह हमें वह लक्ष्य दिखाती है जिसकी ओर हमें जीवन भर बढ़ना है।
यदि हम उस लक्ष्य की ओर बढ़ने से कभी न रुकें, तो यह पर्याप्त है। क्योंकि यह सारा जीवन एक दौड़ के समान है। जब हम उसके अन्त पर पहुँचेंगे, तो प्रभु हमें उस लक्ष्य को पाने की आशीष देगा जिसका हम अब पीछा कर रहे हैं, यद्यपि हम अभी उससे बहुत दूर हैं।
अब, क्योंकि व्यवस्था विश्वासियों को प्रोत्साहित करने का काम करती है—उनके विवेक को श्राप के अधीन बाँधने के लिए नहीं, वरन् उन्हें आगे उकसाकर और उनकी अपूर्णता को सुधारकर सुस्ती से जगाने के लिए—इसलिए कुछ लोग, उसके श्राप से इस छुटकारे को व्यक्त करने की इच्छा से, कहते हैं कि विश्वासियों के लिए व्यवस्था रद्द और निरस्त कर दी गई है।
उनका तात्पर्य यह नहीं कि वह अब उन्हें निरन्तर भली और पवित्र बातें करने की आज्ञा नहीं देती, वरन् यह कि वह उनके लिए अब वह नहीं रही जो पहले थी: अर्थात्, वह अब उनके विवेक को मृत्यु के आतंक से दबा नहीं देती।
वास्तव में सन्त पौलुस व्यवस्था के ऐसे रद्द किए जाने की स्पष्ट शिक्षा देता है। इसके अतिरिक्त, ऐसा प्रतीत होता है कि यह शिक्षा यीशु मसीह के नाम पर भी मढ़ी गई थी, क्योंकि उसने इस आरोप के विरुद्ध अपना बचाव किया कि वह व्यवस्था को नष्ट या भंग करने का इरादा रखता है—जो वह न करता यदि उस पर इसका आरोप न लगाया गया होता (मत्ती 5:17)।
यह राय बिना किसी प्रकार के प्रामाणिक दीखने के उठी न होती। इसलिए सम्भव है कि वह उसकी शिक्षा की झूठी व्याख्या से उत्पन्न हुई, जैसे लगभग सब भूलें किसी सत्य से अवसर पाती हैं।
परन्तु अपने आपको इस भूल में पड़ने से बचाने के लिए हमें सावधानी से भेद करना चाहिए कि व्यवस्था में क्या रद्द किया गया है और क्या अब भी दृढ़ता से स्थापित है।
जब प्रभु यीशु कहता है:
“मैं व्यवस्था को रद्द करने नहीं, वरन् पूरा करने आया हूँ।”
और फिर:
“उसमें से एक अक्षर भी न टलेगा जब तक आकाश और पृथ्वी टल न जाएँ और उसमें लिखी हुई सब बातें पूरी न हो जाएँ।”
तो वह दिखाता है कि उसके आने से व्यवस्था के प्रति जो श्रद्धा और आज्ञाकारिता चाहिए, उसमें किसी भी रीति से कमी नहीं आई। और यह ठीक ही है, क्योंकि वह उसके उल्लंघनों का उपचार करने आया था।
इसलिए यीशु मसीह के द्वारा व्यवस्था की शिक्षा का किसी रीति से उल्लंघन नहीं होता। वह हमें सिखाने, चेताने, डाँटने और सुधारने के द्वारा हर भले काम में प्रशिक्षित करती रहती है।
श्राप के विषय में जो सन्त पौलुस कहता है, वह व्यवस्था के शिक्षा देने के कार्य से नहीं, वरन् विवेक को बाँधने और दास बनाने की उसकी शक्ति से सम्बन्ध रखता है। क्योंकि व्यवस्था अपने स्वभाव से न केवल सिखाती है, वरन् जिस-जिस की वह आज्ञा देती है उस सब की कठोरता से माँग भी करती है। यदि उसकी आज्ञा न मानी जाए—वरन् यदि उसकी माँगें अन्तिम बिन्दु तक पूरी न की जाएँ—तो वह तुरन्त दण्ड की अपनी भयानक आज्ञा सुना देती है।
इसी कारण प्रेरित कहता है कि जो सब व्यवस्था के अधीन हैं वे श्रापित हैं, क्योंकि लिखा है:
“श्रापित है हर वह जो उस सब को पूरा नहीं करता जिसकी आज्ञा दी गई है।”
इस प्रकार वह उन सब को व्यवस्था के अधीन ठहराता है जो अपनी धार्मिकता को पापों की क्षमा में स्थापित नहीं करते, जिसके द्वारा हम व्यवस्था की कठोरता से छुड़ाए जाते हैं।
इसलिए हमें इन बन्धनों से निकल भागना चाहिए, यदि हम बन्धन में दयनीय रीति से नाश नहीं होना चाहते। परन्तु किन बन्धनों से? उस कठोर माँग से जिससे व्यवस्था बिना किसी छूट के और बिना किसी दोष को अदण्डित छोड़े हमारा पीछा करती है।
इस दयनीय श्राप से हमें छुड़ाने के लिए मसीह हमारे लिए श्राप बना, जैसा लिखा है:
“श्रापित है हर वह जो काठ पर लटकाया जाता है।”
—गलातियों 3:13; व्यवस्थाविवरण 21:23
अगले अध्याय में सन्त पौलुस कहता है कि मसीह व्यवस्था के अधीन किया गया ताकि उन्हें छुड़ाए जो उसकी दासता में थे। परन्तु वह तुरन्त जोड़ता है:
“ताकि हम लेपालक पुत्रों का पद पाएँ।”
इसका क्या अर्थ है? यह कि हम अब उस बन्धन में बन्दी न रहें जिसने हमारे विवेक को मृत्यु की पीड़ा में बाँध रखा था।
फिर भी व्यवस्था का अधिकार सदा अक्षुण्ण रहता है, ताकि हमें उसे निरन्तर उसी आदर और श्रद्धा के साथ ग्रहण करना चाहिए।
एक और अंश में, जो कुलुस्सियों की पत्री में मिलता है, कुछ अधिक कठिनाई है:
“जब तुम अपने अपराधों और अपने शरीर की खतनारहित दशा में मरे हुए थे, तब परमेश्वर ने तुम्हें मसीह के साथ जिलाया, और तुम्हारे सब अपराध क्षमा किए, और विधियों का वह लेख जो हमारे विरुद्ध था और हमारे प्रतिकूल था, मिटा डाला और उसे क्रूस पर कीलों से जड़ दिया।”
क्योंकि सन्त पौलुस व्यवस्था के रद्द किए जाने को और आगे बढ़ाता हुआ प्रतीत होता है, मानो उसकी विधियाँ अब किसी रीति से हमसे सम्बन्ध नहीं रखतीं।
कुछ इस अंश को केवल नैतिक व्यवस्था के विषय में समझते हैं, यद्यपि वे समझाते हैं कि जो समाप्त किया गया है वह व्यवस्था की शिक्षा नहीं, वरन् उसकी अत्यधिक कठोरता है। अन्य, सन्त पौलुस के शब्दों पर अधिक ध्यान से विचार करके, पहचानते हैं कि वे उचित रीति से रीति-विधि सम्बन्धी व्यवस्था की ओर संकेत करते हैं, और देखते हैं कि सन्त पौलुस उसके विषय में बोलते समय सामान्यतः विधियाँ शब्द का प्रयोग करता है। क्योंकि इफिसियों की पत्री में वह कहता है:
“यीशु मसीह हमारी शान्ति है, जिसने हमें एक कर दिया, और विधियों में निहित आज्ञाओं की व्यवस्था को रद्द कर दिया।” —इफिसियों 2:14–15
इसमें कोई सन्देह नहीं कि इस कथन को रीति-विधियों के विषय में समझना चाहिए, क्योंकि वह कहता है कि यह व्यवस्था यहूदियों को अन्यजातियों से अलग करनेवाली दीवार का काम करती थी।
इसलिए मैं मानता हूँ कि दूसरा दल पहली व्याख्या की ठीक ही आलोचना करता है। फिर भी मुझे लगता है कि उन्होंने स्वयं प्रेरित के अर्थ को अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं किया। क्योंकि मैं इन दोनों अंशों को ऐसे गड्डमड्ड करने का समर्थन नहीं करता, मानो एक बिलकुल दूसरे के समान हो।
इफिसियों के अंश का अर्थ यह है: सन्त पौलुस इफिसियों को निश्चय दिलाना चाहता है कि वे इस्राएल के लोगों की संगति में ग्रहण किए गए हैं, इसलिए उनसे कहता है कि जो रुकावट पहले उन्हें अलग करती थी, वह हटा दी गई है। यह रुकावट रीति-विधियों में थी। क्योंकि जिन धुलाइयों और बलिदानों से यहूदी अपने आपको परमेश्वर के लिए पवित्र करते थे, वे उन्हें अन्यजातियों से अलग करते थे।
परन्तु कुलुस्सियों की पत्री में हर कोई देख सकता है कि सन्त पौलुस एक गहरे भेद की बात करता है। वहाँ प्रश्न उन मूसा-सम्बन्धी विधि-विधानों का है जिनके अधीन झूठे शिक्षक मसीही लोगों को लाना चाहते थे। इसलिए जैसे गलातियों की पत्री में, उसी विवाद पर विचार करते समय, वह बात को और आगे ले जाता है और उसके मूल तक पहुँचाता है, वैसे ही वह यहाँ भी करता है।
क्योंकि यदि रीति-विधियों में उन्हें करने के दायित्व के सिवा कुछ और न देखा जाए, तो वह उन्हें ऋण का बन्धन क्यों कहता है, और ऐसा जो हमारे विरुद्ध खड़ा था? और वह हमारे उद्धार का लगभग सारा सार उसके रद्द और नाश किए जाने में क्यों रखता? इसलिए स्पष्ट है कि हमें बाहरी रीति-विधियों से परे देखना चाहिए।
मुझे विश्वास है कि मैंने सच्चा अर्थ पा लिया है, बशर्ते कि उसे सच माना जाए जो सन्त ऑगस्टीन अन्यत्र बहुत ठीक लिखता है: कि यहूदी रीति-विधियों में पापों से शुद्धि के बजाय पापों का अंगीकार था।
क्योंकि यहूदी बलिदान चढ़ाने में और क्या करते थे सिवाय इसके कि अपने आपको मृत्यु का दोषी स्वीकार करें, क्योंकि वे अपनी जगह एक पशु को घात होने के लिए रखते थे? अपनी धुलाइयों से वे और क्या करते थे सिवाय इसके कि अपने आपको अशुद्ध और अपवित्र स्वीकार करें? इस प्रकार वे अपनी अशुद्धता और अपराधों से उत्पन्न ऋण को स्वीकार करते थे, परन्तु यह अंगीकार उस ऋण को चुकाता न था।
इसी कारण प्रेरित कहता है कि अपराधों से छुटकारा मसीह की मृत्यु के द्वारा हुआ—वे अपराध जो पुरानी वाचा के अधीन बने रहे थे और अब तक मिटाए नहीं गए थे (इब्रानियों 9:15)।
इसलिए सन्त पौलुस रीति-विधियों को उनका पालन करनेवालों के विरुद्ध खड़े ऋण के बन्धन कहता है, और ठीक ही कहता है, क्योंकि उन विधियों के द्वारा वे अपने ही दण्ड की साक्षी देते और उस पर मुहर लगाते थे।
इसका इससे खण्डन नहीं होता कि प्राचीन पूर्वज उसी अनुग्रह में सहभागी थे जिसमें हम हैं। क्योंकि उन्होंने वह अनुग्रह मसीह के द्वारा पाया, रीति-विधियों के द्वारा नहीं। इस अंश में सन्त पौलुस रीति-विधियों को मसीह से अलग करता है, क्योंकि सुसमाचार प्रकट होने के बाद उनका निरन्तर पालन उसकी महिमा को धुँधला करता था।
इसलिए हमने स्थापित कर दिया है कि रीति-विधियाँ, जब उन्हें अपने आप में देखा जाए, मानव उद्धार के विरुद्ध ऋण के बन्धन ठीक ही कही जाती हैं, क्योंकि वे कानूनी रूप से बाँधनेवाले दस्तावेज़ों के समान थीं, जो विवेक को अपने ऋण स्वीकार करने के लिए बाध्य करते थे।
इसलिए, क्योंकि झूठे शिक्षक मसीही कलीसिया को उनका पालन करने के लिए विवश करना चाहते थे, सन्त पौलुस उनके मूल उद्देश्य की ओर ठीक ही लौटता है और कुलुस्सियों को उस खतरे की चेतावनी देता है जिसमें वे पड़ेंगे यदि वे अपने आपको ऐसी दासता के अधीन लाए जाने दें।
क्योंकि उसी साधन से उनसे मसीह का अनुग्रह छीन लिया जाता, क्योंकि उसने अपनी मृत्यु के द्वारा एक ही बार पूरी की गई शुद्धि से उन सब बाहरी विधियों को रद्द कर दिया जिनके द्वारा मनुष्य अपने आपको परमेश्वर का ऋणी स्वीकार करते थे परन्तु कभी अपने ऋणों से मुक्त नहीं किए जाते थे।
