अध्याय 6

अध्याय तीन: परमेश्वर की व्यवस्था का प्रकाशन (भाग 3/4)

Institutes of the Christian Religion (1541) · John Calvin

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अध्याय तीन: परमेश्वर की व्यवस्था का प्रकाशन (भाग 3/4)

चौथी आज्ञा

विश्राम के दिन को पवित्र मानने के लिये स्मरण रखना। छह दिन तू परिश्रम करना और अपना सब काम-काज करना। परन्तु सातवाँ दिन तेरे परमेश्वर यहोवा के लिये विश्राम का है। उसमें तू किसी प्रकार का काम न करना—न तू, न तेरा बेटा, न तेरी बेटी, न तेरा दास, न तेरी दासी, न तेरे पशु, और न तेरे फाटकों के भीतर रहनेवाला परदेशी। क्योंकि छह दिन में, इत्यादि।

इस आज्ञा का उद्देश्य यह है कि हम अपनी इच्छाओं और कामों के लिये मरे हुए होकर परमेश्वर के राज्य पर ध्यान करें, और उसके ठहराए हुए साधनों के द्वारा उस ध्यान का अभ्यास करें।

फिर भी, क्योंकि इस आज्ञा का स्वरूप दूसरी आज्ञाओं से कुछ भिन्न है, इसलिये इसकी व्याख्या भी कुछ भिन्न रीति से करनी होगी। प्राचीन शास्त्री इसे प्रायः “छायारूप” कहा करते थे, क्योंकि इसमें एक विशेष दिन के बाहरी पालन का विधान है, जो मसीह के आगमन पर अन्य प्रतीकों के साथ समाप्त कर दिया गया।

यह निश्चय ही सत्य है, पर यह आधी ही बात को छूता है। इसलिये हमें अपनी व्याख्या एक ऊँचे बिन्दु से आरम्भ करनी चाहिए और इस आज्ञा में निहित तीन उद्देश्यों पर विचार करना चाहिए।

पहला, सातवें दिन के विश्राम के द्वारा प्रभु इस्राएल के लोगों के सम्मुख आत्मिक विश्राम का चित्र खींचना चाहता था। विश्वासियों को अपने कामों से रुक जाना चाहिए, ताकि वे परमेश्वर को अपने भीतर कार्य करने दें।

दूसरा, उसकी इच्छा थी कि एक निश्चित दिन ठहराया जाए, जिसमें वे व्यवस्था को सुनने और उसकी विधियों का पालन करने के लिये इकट्ठा हों।

तीसरा, उसका अभिप्राय था कि दूसरों के अधिकार के अधीन रहनेवाले दासों और मज़दूरों को विश्राम का एक दिन मिले, ताकि उन्हें अपने परिश्रम से कुछ राहत मिले।

तौभी अनेक अनुच्छेद दिखाते हैं कि इस आज्ञा में आत्मिक विश्राम के चित्र को ही प्रमुख स्थान प्राप्त था (गिनती 15; निर्गमन 31 और 35; यिर्मयाह 17; यहेजकेल 20 और 22; यशायाह 56)। क्योंकि परमेश्वर ने किसी भी आज्ञा के पालन की माँग इतनी कठोरता से कभी नहीं की जितनी इस आज्ञा की।

जब वह अपने भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा यह घोषणा करता है कि सारा धर्म नष्ट हो गया है, तो वह यह शिकायत करता है कि उसके विश्रामदिन को अपवित्र और भंग किया गया है, या उसे ठीक रीति से न माना गया और न पवित्र ठहराया गया—मानो इस बिन्दु के छूट जाने पर कुछ भी शेष नहीं रहता जिसमें उसका आदर किया जा सके।

इसके विपरीत, वह इसके पालन की बड़ी प्रशंसा करता है। इसी कारण, परमेश्वर ने उन्हें जितनी आशीषें दी थीं उन सब में से विश्वासी लोग उसके विश्रामदिन के प्रकाशन को एक अनुपम उपकार मानते थे। इस प्रकार नहेमायाह में लेवीय कहते हैं:

“तू ने उन्हें अपना पवित्र विश्रामदिन बताया, और अपने दास मूसा के हाथ से उन्हें आज्ञाएँ, विधियाँ और व्यवस्था दीं।”

—नहेमायाह 9

हम देखते हैं कि वे इसे अन्य सब आज्ञाओं से ऊपर मानते थे। इससे हमें विश्रामदिन की गरिमा और श्रेष्ठता का पता चलता है, जिसे मूसा और यहेजकेल भी स्पष्ट रीति से समझाते हैं। क्योंकि निर्गमन में हम पढ़ते हैं:

“तुम मेरे विश्रामदिनों को अवश्य मानना, क्योंकि यह तुम्हारी पीढ़ी-पीढ़ी में मेरे और तुम्हारे बीच एक चिन्ह है, जिससे तुम जानो कि मैं ही तुम्हारा पवित्र करनेवाला परमेश्वर हूँ। इसलिये तुम विश्रामदिन को मानना, क्योंकि वह तुम्हारे लिये पवित्र है। इस्राएली उसे मानें और पीढ़ी-पीढ़ी में उसका पालन करें, क्योंकि यह सदा की वाचा और सदा का चिन्ह है।”

—निर्गमन 31

यहेजकेल इस विषय में और भी विस्तार से कहता है, फिर भी उसके कथन का सार यही है कि विश्रामदिन एक चिन्ह था जिसके द्वारा इस्राएल को जानना था कि परमेश्वर उसका पवित्र करनेवाला है (यहेजकेल 20)।

यदि हमारा पवित्रीकरण अपनी इच्छा का त्याग करने में है, तो बाहरी चिन्ह और भीतरी वास्तविकता के बीच का सामंजस्य पहले से स्पष्ट है। हमें पूरी तरह रुक जाना चाहिए, ताकि परमेश्वर हमारे भीतर कार्य करे। हमें अपनी इच्छा समर्पित करनी चाहिए, अपना हृदय सौंप देना चाहिए, और अपने शरीर की सब लालसाओं को त्याग देना और छोड़ देना चाहिए। संक्षेप में, हमें हर उस बात से रुक जाना चाहिए जो हमारी अपनी समझ से उत्पन्न होती है, ताकि परमेश्वर के हमारे भीतर कार्य करने से हम उसमें विश्राम पाएँ, जैसा प्रेरित भी सिखाता है।

यही बात इस्राएल को सातवें दिन के विश्राम के द्वारा दिखाई गई थी। इसके पालन को और भी पवित्र बनाने के लिये हमारे प्रभु ने अपने ही उदाहरण से इस विधि को स्थिर किया। क्योंकि जब मनुष्य को अपने सृष्टिकर्ता का अनुकरण करने की शिक्षा दी जाती है, तब उसके मन पर इसका बहुत प्रभाव पड़ना चाहिए।

यदि कोई सात की संख्या में कोई गुप्त अर्थ ढूँढ़े, तो सम्भव है कि चूँकि शास्त्र में यह संख्या पूर्णता को सूचित करती है, इसलिये यहाँ इसे निरन्तरता को दर्शाने के लिये चुना गया है। यह उससे मेल खाता है जो हम मूसा में पाते हैं: यह बताने के बाद कि प्रभु ने सातवें दिन विश्राम किया, वह उस विश्राम का अन्त करने के लिये कोई आगामी दिन नियुक्त नहीं करता।

एक और सम्भावित व्याख्या भी प्रस्तुत की जा सकती है। इस संख्या के द्वारा प्रभु यह संकेत देना चाहता था कि विश्वासियों का विश्रामदिन अन्तिम दिन तक कभी पूर्ण रीति से सिद्ध नहीं होगा। हम यहाँ उसका आरम्भ करते हैं और प्रतिदिन उसे आगे बढ़ाते हैं, परन्तु क्योंकि हम अब भी अपने शरीर के विरुद्ध निरन्तर युद्ध करते रहते हैं, इसलिये वह तब तक पूरा नहीं होगा जब तक यशायाह की यह घोषणा पूरी न हो जाए—कि परमेश्वर के राज्य में एक विश्रामदिन होगा जो अनन्तकाल तक बना रहेगा (यशायाह 66)—जब परमेश्वर सब में सब कुछ होगा (1 कुरिन्थियों 15:28)।

इसलिये ऐसा प्रतीत हो सकता है कि सातवें दिन के द्वारा प्रभु अपने लोगों को उस विश्रामदिन की पूर्णता का चित्र दिखाना चाहता था जो अन्तिम दिन आएगा, ताकि वे इस सारे जीवन में उस पूर्णता की ओर निरन्तर अग्रसर होते रहें।

यदि यह व्याख्या अत्यधिक सूक्ष्म लगे और कोई इसे ग्रहण करना न चाहे, तो मुझे इस पर आपत्ति नहीं कि वह किसी सरल व्याख्या में सन्तोष करे: कि प्रभु ने एक दिन ठहराया, जिसके द्वारा लोग व्यवस्था की देख-रेख में अनन्त आत्मिक विश्राम पर ध्यान करने का प्रशिक्षण पाएँ।

उसने सातवाँ दिन या तो इसलिये ठहराया कि उसने उसे पर्याप्त समझा, या इसलिये कि वह लोगों के सामने अपना उदाहरण रखकर उन्हें इस विधि के पालन के लिये अधिक प्रभावी रीति से प्रोत्साहित करना चाहता था, या फिर इसलिये कि वह यह दिखाना चाहता था कि विश्रामदिन का लक्ष्य उन्हें उनके सृष्टिकर्ता के सदृश बनाने के सिवा और कुछ नहीं था।

ठीक-ठीक कौन-सी व्याख्या है, इसका बहुत महत्त्व नहीं, बशर्ते इस भेद का अर्थ बना रहे: कि लोगों को अपने कामों से रुक जाने की शिक्षा दी गई थी। भविष्यद्वक्ता यहूदियों को निरन्तर इसी मनन की ओर निर्देशित करते रहे, ताकि वे यह न समझ बैठें कि केवल हाथ के परिश्रम से दूर रहने से ही उन्होंने आज्ञा पूरी कर दी।

पहले उद्धृत अनुच्छेदों के अतिरिक्त, यशायाह कहता है:

“यदि तू विश्रामदिन को अशुद्ध न करे, अर्थात् मेरे पवित्र दिन में अपनी इच्छा पूरी करने से अपना पाँव रोके; और विश्रामदिन को आनन्द का दिन और यहोवा का पवित्र और महिमायुक्त दिन कहे, और उसका आदर करके अपने ही काम-काज को न करे, न अपनी ही इच्छा पूरी करे, तो तू यहोवा के कारण सुखी होगा।”

—यशायाह 58

इसमें कोई सन्देह नहीं कि इस आज्ञा का जो अंश रस्मी था वह मसीह के आगमन से समाप्त कर दिया गया। क्योंकि वही सत्य है जिसकी उपस्थिति से सब प्रतीक लुप्त हो जाते हैं। वही वह देह है जिसके सामने छायाएँ छोड़ दी जाती हैं। मैं कहता हूँ, वही विश्रामदिन की सच्ची परिपूर्णता है।

क्योंकि बपतिस्मा के द्वारा उसके साथ गाड़े जाकर हम उसकी मृत्यु में उसके साथ एक हो जाते हैं, ताकि उसके पुनरुत्थान में सहभागी होकर हम नए जीवन की सी चाल चलें (रोमियों 6)।

इसलिये प्रेरित कहता है कि विश्रामदिन आनेवाली बातों की छाया था और सार वस्तु मसीह की है—अर्थात् सच्ची और ठोस वास्तविकता, जिसे वह उस अनुच्छेद में स्पष्ट रीति से समझाता है (कुलुस्सियों 2)।

यह वास्तविकता एक ही दिन से सन्तुष्ट नहीं होती, वरन् हमारे जीवन का पूरा क्रम माँगती है, जब तक कि हम अपने लिये पूरी तरह मरकर परमेश्वर के सत्य से परिपूर्ण न हो जाएँ। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि दिनों के विषय में हर प्रकार का अन्धविश्वासपूर्ण पालन मसीहियों से बहुत दूर रहना चाहिए।

फिर भी, चूँकि शेष दो उद्देश्य प्राचीन छायाओं में गिने जाने योग्य नहीं हैं, वरन् हर युग पर समान रूप से लागू होते हैं, इसलिये यद्यपि विश्रामदिन समाप्त कर दिया गया है, यह सिद्धान्त हमारे बीच बना रहता है: हमारे पास ऐसे निश्चित दिन होने चाहिए जिनमें हम प्रचार सुनने, सार्वजनिक प्रार्थनाएँ करने और संस्कार मनाने के लिये इकट्ठे हों। दूसरा, दासों और मज़दूरों को उनके काम से कुछ राहत मिलनी चाहिए।

इसमें कोई सन्देह नहीं कि विश्रामदिन की आज्ञा देते समय प्रभु की दृष्टि में ये दोनों उद्देश्य थे। पहला यहूदियों के अपने व्यवहार से भली-भाँति प्रमाणित होता है। दूसरे को मूसा व्यवस्थाविवरण में बताता है:

“ताकि तेरे दास और तेरी दासी भी तेरे समान विश्राम करें। स्मरण रख कि तू मिस्र देश में दास था।”

—व्यवस्थाविवरण 5

इसी प्रकार निर्गमन में:

“ताकि तेरा बैल और तेरा गधा और तेरे घर के लोग विश्राम करें।” —निर्गमन 23

कौन इनकार कर सकता है कि ये दोनों उद्देश्य हम पर भी यहूदियों से कम लागू नहीं होते? कलीसिया की सभाएँ परमेश्वर के वचन से आज्ञापित हैं, और अनुभव स्वयं दिखाता है कि वे हमारे लिये कितनी आवश्यक हैं। परन्तु यदि निश्चित दिन ठहराए न जाएँ, तो हम कब इकट्ठे होंगे?

प्रेरित सिखाता है कि हमारे बीच सब कुछ शिष्टता और क्रम से होना चाहिए (1 कुरिन्थियों 14)। फिर भी दिनों के इस प्रबन्ध के बिना शिष्टता और क्रम को बनाए रखना इतना असम्भव है कि यदि इसे हटा दिया जाए, तो हम तुरन्त कलीसिया के भीतर असाधारण अव्यवस्था और गड़बड़ी देखेंगे।

इसलिये यदि हम उसी आवश्यकता का अनुभव करते हैं जिसका निवारण प्रभु ने यहूदियों के लिये विश्रामदिन ठहराकर करना चाहा था, तो कोई यह न कहे कि इस व्यवस्था का हमसे कोई सम्बन्ध नहीं। क्योंकि हमारे अनुग्रहकारी पिता ने निश्चय ही हमारी आवश्यकता की पूर्ति का प्रबन्ध करना उतना ही चाहा जितना उनकी आवश्यकता का।

“परन्तु,” कोई पूछ सकता है, “हम प्रतिदिन क्यों नहीं इकट्ठे होते, और इस प्रकार इस भेद को क्यों नहीं मिटा देते?”

मैं इसकी बड़ी अभिलाषा रखूँगा। निश्चय ही आत्मिक ज्ञान इस योग्य है कि प्रत्येक दिन का कुछ भाग उसे दिया जाए। परन्तु यदि बहुतों की निर्बलता के कारण प्रतिदिन की सभा सम्भव नहीं हो पाती, और प्रेम हमें उन्हें और अधिक विवश करने की अनुमति नहीं देता, तो हम उस नियम का पालन क्यों न करें जो परमेश्वर ने हमें दिखाया है?

हमें इस विषय में कुछ और विस्तार से कहना चाहिए, क्योंकि आजकल कुछ अशान्त मन के लोग रविवार को लेकर हल्ला मचाते हैं। वे शिकायत करते हैं कि मसीही लोगों को यहूदी मत में रखा जा रहा है, क्योंकि वे अब भी दिनों के कुछ पालन को बनाए रखते हैं।

मैं उत्तर देता हूँ कि हम रविवार को यहूदी रीति में नहीं मानते, क्योंकि हमारे और यहूदियों के बीच बड़ा अन्तर है। हम उसे कठोर धार्मिक निष्ठा से किसी ऐसी रस्म के रूप में नहीं मानते जिसमें कोई आत्मिक भेद छिपा हो। वरन् हम उसे कलीसिया में अच्छी व्यवस्था बनाए रखने के एक आवश्यक साधन के रूप में काम में लाते हैं।

“परन्तु,” वे कहते हैं, “सन्त पौलुस इनकार करता है कि मसीहियों का दिनों के पालन के विषय में न्याय किया जाए, क्योंकि ऐसी बातें आनेवाली बातों की छाया हैं। इसी कारण वह डरता है कि गलातियों के बीच उसका परिश्रम व्यर्थ गया, क्योंकि वे अब भी दिनों को मानते हैं। और रोमियों में वह एक दिन को दूसरे से भिन्न मानने को अन्धविश्वास घोषित करता है” (कुलुस्सियों 2; गलातियों 4; रोमियों 14)।

परन्तु कौन-सा समझदार मनुष्य नहीं देखता कि प्रेरित किस प्रकार के पालन की चर्चा कर रहा है? वे लोग उस उद्देश्य पर विचार नहीं कर रहे थे जिसका हमने वर्णन किया—अर्थात् कलीसिया में क्रम और सुशासन को बनाए रखना। पर्वों को आत्मिक बातों की छाया के रूप में बनाए रखकर उन्होंने मसीह की महिमा और सुसमाचार के तेज को धुँधला कर दिया।

वे हाथ के परिश्रम से इसलिये दूर नहीं रहते थे कि वह उन्हें परमेश्वर के वचन के मनन में लगने से रोकता था। वरन् वे मूर्खतापूर्ण भक्ति के कारण ऐसा करते थे, यह मानकर कि विश्राम करके वे परमेश्वर की सेवा कर रहे हैं।

सन्त पौलुस इसी विकृत शिक्षा का विरोध करता है, न कि उस वैध विधि का जो मसीही संगति में शान्ति बनाए रखने के लिये स्थापित की गई है। क्योंकि उसकी स्थापित की हुई कलीसियाएँ इसी दूसरे उद्देश्य के लिये विश्रामदिन को मानती थीं। वह इसे यों प्रमाणित करता है कि कुरिन्थियों के लिये उस दिन को कलीसिया में अपनी भेंटें लाने का दिन ठहराता है (1 कुरिन्थियों 16)।

यदि हमें अन्धविश्वास का भय है, तो वह यहूदियों के पर्वों में आज रविवार में होनेवाले भय से कहीं अधिक था। इसलिये, चूँकि अन्धविश्वास को उखाड़ना हितकर था, यहूदियों द्वारा माना जानेवाला दिन छोड़ दिया गया। और क्योंकि कलीसिया में क्रम, सुशासन और शान्ति बनाए रखने के लिये एक और दिन आवश्यक था, इसलिये उसके स्थान पर दूसरा दिन ठहराया गया।

मैं सात की संख्या पर इसलिये बल नहीं देता कि कलीसिया को किसी प्रकार की दासता में डालूँ। क्योंकि मैं उन कलीसियाओं को दोषी नहीं ठहराऊँगा जिन्होंने सभा के लिये अन्य पवित्र दिन ठहराए हों, बशर्ते उनमें कोई अन्धविश्वास न हो—और जब एकमात्र उद्देश्य अच्छी व्यवस्था बनाए रखना हो, तब अन्धविश्वास नहीं होता।

तो आज्ञा का सार यही हो। जैसे यहूदियों के लिये सत्य एक प्रतीक के रूप में दिखाया गया था, वैसे ही हमारे लिये वह बिना प्रतीक के घोषित किया गया है: अपने सारे जीवन में हमें अपने कामों से एक चिरस्थायी विश्राम पर मनन करना चाहिए, ताकि परमेश्वर अपने आत्मा के द्वारा हमारे भीतर कार्य करे।

दूसरा, हमें वचन को सुनने, संस्कारों को मनाने और सार्वजनिक प्रार्थनाएँ करने के द्वारा कलीसिया की वैध व्यवस्था का पालन करना चाहिए।

तीसरा, हमें अपने अधिकार के अधीन रहनेवालों पर अत्यधिक बोझ नहीं डालना चाहिए।

इससे उन झूठे शिक्षकों के झूठ उलट जाते हैं जिन्होंने पहले बेचारी साधारण जनता को यहूदी धारणाओं से भर दिया था, और रविवार तथा विश्रामदिन में केवल यह भेद बताया कि पहले माना जानेवाला सातवाँ दिन तो समाप्त हो गया है, फिर भी एक दिन को उसी रीति से मानना अब भी आवश्यक है।

इसका अर्थ केवल इतना है कि यहूदियों के विरोध में दिन बदल दिया गया, जबकि वही अन्धविश्वास बना रहा जिसकी निन्दा सन्त पौलुस ने की: कि उस दिन में कोई गुप्त आत्मिक अर्थ है, जैसा पुराने नियम के अधीन था।

सचमुच, हम देखते हैं कि उनकी शिक्षा का क्या फल निकला है। जो इसका अनुसरण करते हैं वे विश्रामदिन की शारीरिक धारणा में यहूदियों से भी आगे बढ़ गए हैं, यहाँ तक कि यशायाह में पाई जानेवाली फटकारें उन पर उन लोगों की अपेक्षा अधिक उचित रीति से लागू होंगी जिन्हें भविष्यद्वक्ता ने अपने समय में डाँटा था।

पाँचवीं आज्ञा

अपने पिता और अपनी माता का आदर करना, जिससे जो देश तेरा परमेश्वर यहोवा तुझे देता है उसमें तू बहुत दिन तक रहे।

उद्देश्य यह है: क्योंकि परमेश्वर चाहता है कि उसकी स्थापित की हुई व्यवस्था बनी रहे, इसलिये हमें अधिकार के उन क्रमों का पालन करना चाहिए जो उसने ठहराए हैं।

इसलिये आज्ञा का सार यह है कि जिन्हें प्रभु ने हमारे ऊपर ठहराया है उनका हमें सम्मान करना चाहिए और उन्हें आदर और आज्ञाकारिता देनी चाहिए, साथ ही उनसे प्राप्त उपकारों के लिये कृतज्ञता भी।

इससे यह निषेध निकलता है कि हम तिरस्कार, विद्रोह या कृतघ्नता के द्वारा उनकी गरिमा को घटाएँ नहीं। क्योंकि शास्त्र में “आदर” शब्द का यही व्यापक अर्थ है। इसी प्रकार जब प्रेरित कहता है कि जो प्राचीन अच्छी रीति से अगुआई करते हैं वे दुगने आदर के योग्य हैं, तब वह केवल उस सम्मान की ही नहीं, वरन् उनके परिश्रम के योग्य प्रतिफल की भी बात करता है।

क्योंकि यह आज्ञा, जो हमें अपने ऊपर के अधिकारियों के अधीन करती है, हमारे स्वभाव की कुटिलता के बहुत विरुद्ध है—जो महत्त्वाकांक्षा और घमण्ड से फूलकर स्वेच्छा से अधीन नहीं होता—इसलिये अधिकार का सबसे कम अप्रिय और सबसे सुखद रूप हमारे सामने उदाहरण के रूप में रखा गया है, क्योंकि वही हमारे हृदयों को आज्ञाकारी अधीनता के लिये झुकाने और कोमल बनाने में सबसे अधिक समर्थ है।

इस प्रकार, उस अधीनता के द्वारा जो सबसे मधुर और सहने में सबसे सरल है, प्रभु धीरे-धीरे हमें हर प्रकार की वैध अधीनता का अभ्यस्त करता है, क्योंकि वही सिद्धान्त उन सब पर लागू होता है।

जब कभी परमेश्वर किसी को प्रमुखता देता है, तब वह अपना नाम उस व्यक्ति को उतना ही देता है जितना उसके अधिकार की रक्षा के लिये आवश्यक है। पिता, परमेश्वर और प्रभु—ये उपाधियाँ परमेश्वर की इतनी अपनी हैं कि जब कभी इनका उल्लेख हो, हमारे हृदय उसकी महिमा की स्वीकृति से द्रवित हो उठने चाहिए।

इसलिये जब वह मनुष्यों को इन उपाधियों में भागी होने देता है, तब मानो अपने तेज की कोई चिनगारी उन्हें देता है, ताकि वे अपने पद के अनुसार प्रतिष्ठित और आदरणीय ठहरें।

इस प्रकार, जिसे “पिता” कहा जाता है उसमें हमें ईश्वरीय आदर का कुछ अंश पहचानना चाहिए, क्योंकि वह बिना कारण परमेश्वर की उपाधि धारण नहीं करता।

इसी प्रकार जो राजकुमार या स्वामी है, वह भी कुछ मात्रा में परमेश्वर के आदर में सहभागी है।

इसलिये हमें सन्देह नहीं करना चाहिए कि प्रभु यहाँ एक सार्वभौमिक नियम स्थापित करता है: जिस मात्रा में हम किसी को परमेश्वर की ओर से अपने ऊपर ठहराया गया जानते हैं, उसी मात्रा में हमें उसे आदर, श्रद्धा और प्रेम देना चाहिए और अपनी सामर्थ्य भर उसकी हर सेवा करनी चाहिए।

न ही हमें यह विचार करना चाहिए कि हमारे अधिकारी ऐसे आदर के योग्य हैं या नहीं। उनका चरित्र चाहे जैसा हो, वे परमेश्वर की इच्छा के बिना अपने पद पर नहीं पहुँचे, और उसी पद के कारण हमारा प्रभु हमें उनका आदर करने की आज्ञा देता है।

फिर भी वह विशेष रूप से आज्ञा देता है कि हम उन माता-पिता का आदर करें जिन्होंने हमें इस जीवन में लाया, जो बात प्रकृति ही हमें सिखाए। क्योंकि जो कोई तिरस्कार या विद्रोह के द्वारा माता-पिता के अधिकार का उल्लंघन करते हैं, वे मनुष्य नहीं वरन् राक्षस हैं।

इसीलिये हमारा प्रभु आज्ञा देता है कि जो कोई पिता या माता की आज्ञा न माने वह मार डाला जाए, और ठीक ही। क्योंकि जब वे उन्हें नहीं पहचानते जिनके द्वारा वे इस जीवन में आए, तो वे निश्चय ही जीने के योग्य नहीं हैं।

व्यवस्था के अनेक अनुच्छेद हमारे कथन की पुष्टि करते हैं: यहाँ जिस आदर की चर्चा है वह तीन अंगों से बना है—श्रद्धा, आज्ञाकारिता, और प्राप्त उपकारों की कृतज्ञता से उपजा प्रेम।

पहले की आज्ञा तब मिलती है जब परमेश्वर आदेश देता है कि जो कोई पिता या माता को कोसे वह मार डाला जाए, क्योंकि इस रीति से वह सब तिरस्कार और अनादर को दण्ड देता है (निर्गमन 21; लैव्यव्यवस्था 20; नीतिवचन 20)।

दूसरी उसकी इस आज्ञा में दिखाई देती है कि हठीले और अवज्ञाकारी पुत्र को भी मार डाला जाए।

तीसरी की पुष्टि मत्ती 15 में मसीह की इस घोषणा से होती है कि परमेश्वर हमें अपने माता-पिता का पालन-पोषण करने और उनकी भलाई करने की आज्ञा देता है।

जब कभी सन्त पौलुस इस आज्ञा का उल्लेख करता है, तब वह हमें आज्ञाकारिता के लिये प्रोत्साहित करता है, जो दूसरे अंग से सम्बन्ध रखती है (इफिसियों 6; कुलुस्सियों 3)।

प्रतिज्ञा इसलिये जोड़ी गई है कि आज्ञा की और अधिक सराहना हो और हमें स्मरण रहे कि यह अधीनता परमेश्वर को कितनी प्रिय है। सन्त पौलुस यही प्रेरणा देता है जब वह कहता है कि यह प्रतिज्ञा सहित पहली आज्ञा है। क्योंकि पहली पटिया में पहले दी गई प्रतिज्ञा किसी एक ही आज्ञा से नहीं जुड़ी थी, वरन् सारी व्यवस्था तक फैली हुई थी।

वर्तमान प्रतिज्ञा को इसी प्रकार समझना चाहिए। प्रभु ने इस्राएलियों से विशेष रूप से उस देश के विषय में कहा जिसे उसने उन्हें मीरास के रूप में देने की प्रतिज्ञा की थी। यदि उस देश का अधिकार परमेश्वर की कृपा का प्रमाण था, तो इसमें आश्चर्य नहीं कि उसने उन्हें दीर्घायु की प्रतिज्ञा देकर अपने अनुग्रह की गवाही देना चाहा, जिससे वे उसकी आशीष का सुख अधिक समय तक भोग सकें।

इसलिये यह मानो ऐसा कहना है: “अपने पिता और माता का आदर कर, ताकि दीर्घायु होकर तू उस देश का सुख अधिक समय तक भोग सके जो तेरे प्रति मेरे अनुग्रह की गवाही का काम देगा।”

इसके अतिरिक्त, क्योंकि सारी पृथ्वी विश्वासियों के लिये आशीषित है, इसलिये हम उचित ही वर्तमान जीवन को परमेश्वर की आशीषों में गिनते हैं। अतः जहाँ तक दीर्घायु हमारे प्रति परमेश्वर की कृपा का प्रमाण है, वहाँ तक यह प्रतिज्ञा हमारी भी है।

दीर्घायु की प्रतिज्ञा हमें, यहूदियों को दी गई प्रतिज्ञा से अधिक, इसलिये नहीं दी गई कि उसमें अपने आप में कोई धन्यता निहित है, वरन् इसलिये कि वह धर्मियों के प्रति परमेश्वर की भलाई का चिन्ह है।

इसलिये यदि कोई आज्ञाकारी सन्तान युवावस्था में मर जाए—जैसा प्रायः होता है—तो भी परमेश्वर अपनी प्रतिज्ञा के प्रति पूरी तरह विश्वासयोग्य बना रहता है। वह उसे वैसे ही पूरा करता है जैसे कोई किसी को, जिससे उसने केवल दो एकड़ की प्रतिज्ञा की थी, सौ एकड़ भूमि दे दे।

सारा विषय इस पर टिका है: दीर्घायु की प्रतिज्ञा यहाँ केवल इस सीमा तक है कि वह एक आशीष है, और वह परमेश्वर की ओर से आशीष इस सीमा तक है कि वह उसके अनुग्रह की गवाही देती है। फिर भी वह अपने सेवकों पर वह अनुग्रह मृत्यु में सौ हज़ार गुना अधिक स्पष्टता से प्रकट करता है।

इसके विपरीत, जब प्रभु उन्हें जो अपने पिता और माता की आज्ञा मानते हैं वर्तमान जीवन में अपनी आशीष की प्रतिज्ञा देता है, तब वह यह भी संकेत देता है कि उसका श्राप उन सब पर आएगा जो अवज्ञाकारी हैं। यह सुनिश्चित करने के लिये कि उसका न्याय पूरा हो, वह अपनी व्यवस्था में आज्ञा देता है कि उनके विरुद्ध न्याय किया जाए।

यदि वे किसी प्रकार मनुष्यों के हाथों से बच निकलें, तो परमेश्वर स्वयं उनकी अवज्ञा का बदला लेगा। क्योंकि हम देखते हैं कि ऐसे कितने ही लोग युद्धों, झगड़ों या अन्य रीतियों से मर जाते हैं, जिससे प्रकट होता है कि उन्हें दुःखद अन्त तक पहुँचाने में परमेश्वर का हाथ काम कर रहा है।

और यदि कुछ लोग वृद्धावस्था तक बचे रहें, फिर भी इस जीवन में परमेश्वर की आशीष से वंचित रहें, यहाँ केवल क्षीण होते रहें और आगे के लिये और बड़े दण्ड के लिये रखे जाएँ, तो वे इस प्रतिज्ञा में भागी होने से बहुत दूर हैं।

अन्त में, हमें संक्षेप में यह देखना चाहिए कि हमें अपने माता-पिता की आज्ञा केवल प्रभु में माननी है, जैसा उस नींव से प्रकट है जिसे हमने स्थापित किया (इफिसियों 6)। वे हमारे ऊपर इसलिये हैं कि परमेश्वर ने उन्हें ऊँचा किया है और अपने आदर का कुछ अंश उन्हें दिया है।

इसलिये उन्हें दी जानेवाली अधीनता हमें परमेश्वर के प्रति, जो परम पिता है, श्रद्धा की ओर ले जानेवाली सीढ़ी का काम करे। अतः यदि वे हमसे उसकी व्यवस्था तुड़वाना चाहें, तो हम उन्हें तब पिता नहीं वरन् अजनबी समझें जो हमें हमारे सच्चे पिता की आज्ञाकारिता से फेरना चाहते हैं।

हमें अपने राजकुमारों, स्वामियों और अधिकारियों के विषय में भी यही निर्णय करना चाहिए। क्योंकि यह अत्यन्त अनुचित होगा यदि उनकी प्रमुखता को परमेश्वर की सर्वोच्चता को घटाने का कोई अधिकार हो, क्योंकि वह उसी के अधिकार पर निर्भर है और उसे घटाने के बजाय बढ़ाना चाहिए—उल्लंघन करने के बजाय दृढ़ करना चाहिए।

छठी आज्ञा

तू खून न करना।

इस आज्ञा का उद्देश्य यह है कि क्योंकि परमेश्वर ने सारी मानव जाति को एक साझे बन्धन में जोड़ा है, इसलिये हम में से प्रत्येक के लिये सब की सुरक्षा और रक्षा अनमोल होनी चाहिए।

इसलिये, संक्षेप में, हिंसा, हानि या चोट का हर वह कार्य जिससे हमारे पड़ोसी का शरीर घायल हो, हमारे लिये वर्जित है। इसी से हमें सकारात्मक आज्ञा की ओर बढ़ना चाहिए: यदि हम अपने पड़ोसी का जीवन बचाने के लिये कुछ कर सकते हैं, तो हमें ईमानदारी से उसमें लगना चाहिए। हमें वह सब जुटाना चाहिए जो उसके कल्याण में सहायक हो, और उसका विरोध करना चाहिए जो उसके लिये संकट बने। इसी प्रकार यदि कोई संकट या विपत्ति में हो, तो हमें उसकी सहायता करनी और उसे राहत देनी चाहिए।

यदि हम स्मरण रखें कि यहाँ बोलनेवाला परमेश्वर व्यवस्था देनेवाला है, तो हमें समझना चाहिए कि वह यह नियम हमारी आत्माओं को देता है। क्योंकि यह मान लेना हास्यास्पद होगा कि वह जो हृदय के विचारों को देखता है और मुख्यतः उन्हीं पर दृष्टि रखता है, केवल हमारे शरीरों को सच्ची धार्मिकता की शिक्षा देगा।

इसलिये यहाँ हृदय की हत्या वर्जित है, और अपने पड़ोसी के जीवन की रक्षा की भीतरी भावना की आज्ञा दी गई है। यद्यपि हाथ हत्या को जन्म देता है, हृदय उसे तब गर्भ में धारण करता है जब वह क्रोध और घृणा से ग्रस्त होता है।

विचार करो कि क्या तुम अपने भाई पर क्रोध कर सकते हो और उसे हानि पहुँचाने की इच्छा न रखो। यदि तुम ऐसी इच्छा के बिना क्रोध नहीं कर सकते, तो उसके बिना घृणा भी नहीं कर सकते, क्योंकि घृणा गहराई से जमे हुए क्रोध के सिवा और कुछ नहीं है।

तुम चाहे जितना छिपाओ और छलपूर्ण बहानों की शरण लो, यह निश्चित है कि घृणा और क्रोध हानि पहुँचाने की इच्छा के बिना नहीं रह सकते। यदि तब भी तुम इस बात से बचना चाहो, तो पवित्र आत्मा पहले ही घोषित कर चुका है कि जो कोई अपने भाई से मन में बैर रखता है वह हत्यारा है (1 यूहन्ना 3:15)।

मसीह भी घोषणा करता है कि जो कोई अपने भाई पर क्रोध करे वह कचहरी में दण्ड के योग्य होगा; जो कोई अपना क्रोध प्रकट करे वह महासभा में दोषी ठहरेगा; और जो कोई उसे अपमानित करे वह नरक की आग के योग्य होगा (मत्ती 5)।

शास्त्र दो कारण बताता है जिन पर यह आज्ञा आधारित है: मनुष्य परमेश्वर का स्वरूप है, और वह हमारा अपना मांस भी है।

इसलिये यदि हम परमेश्वर के स्वरूप को भंग नहीं करना चाहते, तो हमें अपने पड़ोसी की कोई हानि नहीं करनी चाहिए। और यदि हम सारी मानवता का त्याग नहीं करना चाहते, तो हमें उसे अपने ही मांस के समान प्रिय मानना चाहिए।

मसीह के उद्धार के उपकार से जो प्रोत्साहन लिया जा सकता है, उस पर अन्यत्र विचार किया जाएगा। परन्तु प्रभु चाहता था कि हम स्वभावतः मनुष्य में इन दो बातों पर, जिनका उल्लेख हो चुका है, विचार करें, जो दोनों हमें उसकी भलाई करने की ओर ले जाती हैं: कि हर एक में हम उस पर अंकित परमेश्वर के स्वरूप का आदर करें और अपने ही मांस से प्रेम रखें।

इसलिये जो व्यक्ति रक्त बहाने से दूर रहा है, वह आवश्यक रूप से हत्या के दोष से निर्दोष नहीं है। क्योंकि जो कोई अपने पड़ोसी के कल्याण के विरुद्ध कोई कार्य करता है, या ऐसा करने का प्रयत्न या षड्यन्त्र करता है, या केवल अपने हृदय में उसकी कल्पना करता है, वह परमेश्वर की दृष्टि में हत्यारा गिना जाता है।

इसके विपरीत, यदि हम अपनी सामर्थ्य और मिले हुए अवसर के अनुसार अपने पड़ोसी की भलाई करने में न लगें, तो अपनी निर्दयता के द्वारा हम इस आज्ञा का उल्लंघन करते हैं।

यदि प्रभु प्रत्येक मनुष्य के शारीरिक कल्याण की इतनी गहरी चिन्ता करता है, तो इससे हम समझ सकते हैं कि वह हमें आत्माओं के उद्धार की खोज के लिये कितना बाध्य करता है, जो उसकी दृष्टि में अतुलनीय रूप से अधिक मूल्यवान हैं।

सातवीं आज्ञा

तू व्यभिचार न करना।

इस आज्ञा का उद्देश्य यह है कि क्योंकि परमेश्वर पवित्रता और शुद्धता से प्रेम करता है, इसलिये हर प्रकार की अशुद्धता हम से दूर रहनी चाहिए।

इसलिये इसका सार यह है कि हमें किसी भी अशुद्धता या शारीरिक असंयम से कलंकित नहीं होना चाहिए। इस निषेध के अनुरूप सकारात्मक आज्ञा यह है कि हमारा जीवन अपने सब कार्यों में शुद्धता और संयम से नियन्त्रित हो।

परमेश्वर स्पष्ट रूप से व्यभिचार को वर्जित करता है, जिसकी ओर सब यौन असंयम प्रवृत्त होता है, ताकि व्यभिचार की लज्जाजनकता और अशोभनीयता के द्वारा—जो और भी स्पष्ट दिखाई देती है क्योंकि वह हमारे शरीरों का अपमान करती है—वह हमें हर प्रकार की यौन अशुद्धता से घृणा करना सिखाए।

मनुष्य इस शर्त पर रचा गया कि वह अकेला न रहे वरन् उसके अनुरूप एक सहायक उसके पास हो। इसके अतिरिक्त, पाप के श्राप के कारण वह इस आवश्यकता के और भी अधीन हो गया। इसलिये जहाँ तक हितकर था, प्रभु ने विवाह की स्थापना करके हमारे लिये एक उपचार का प्रबन्ध किया, जिसे अपने अधिकार से ठहराकर उसने अपनी आशीष से पवित्र किया।

इससे प्रकट है कि विवाह से बाहर पुरुष और स्त्री का हर मेल उसके सम्मुख शापित है, जबकि विवाह की संगति हमारी आवश्यकता के उपचार के रूप में दी गई है, ताकि हम अपनी पापमय लालसाओं को खुली छूट न दें।

जब हम सुनते हैं कि कोई पुरुष विवाह से बाहर किसी स्त्री के साथ परमेश्वर के श्राप के बिना नहीं रह सकता, तब हम अपने आप को धोखा न दें।

हमें इस उपचार की आवश्यकता दो कारणों से है: अपनी मूल प्रकृति की दशा के कारण भी और उस भ्रष्टता के कारण भी जो बाद में उसमें आ गई। उस व्यक्ति को छोड़कर, जिसे परमेश्वर ने विशेष अनुग्रह दिया है, कोई भी इससे मुक्त नहीं। इसलिये हर एक ध्यान से विचार करे कि उसे क्या दिया गया है।

जिन्हें संयम का विशेष वरदान नहीं मिला, वे यदि उस उपचार का उपयोग करने से इनकार करें जो उन्हें दिया और प्रस्तुत किया गया है, तो वे परमेश्वर से लड़ते हैं और उसकी विधि का विरोध करते हैं।

यहाँ कोई यह आपत्ति न करे, जैसा बहुत लोग प्रायः करते हैं, कि परमेश्वर की सहायता से वह सब कुछ कर सकेगा। क्योंकि ऐसी सहायता केवल उन्हें दी जाती है जो उसके मार्गों में चलते हैं—अर्थात् अपने बुलावे की सीमा के भीतर (भजन संहिता 91)। जो परमेश्वर के दिए हुए साधनों को छोड़कर अपनी ढिठाई से अपनी आवश्यकता पर विजय पाने का दुस्साहस करते हैं, वे उस बुलावे से हट गए हैं।

प्रभु घोषणा करता है कि संयम एक अनुपम वरदान है, जो उसकी सारी कलीसिया को अन्धाधुन्ध नहीं दिया गया, वरन् उसके बहुत थोड़े सदस्यों को। क्योंकि वह हमारे सामने एक विशेष वर्ग के लोगों को रखता है जिन्होंने स्वर्ग के राज्य के लिये अपने आप को नपुंसक बना लिया है—अर्थात् इसलिये कि वे परमेश्वर की महिमा की सेवा में अधिक स्वतन्त्रता से लग सकें (मत्ती 19)।

कोई यह न समझे कि यह हमारे अपने सामर्थ्य में है, इसलिये मसीह पहले ही कह चुका था कि हर कोई इसे ग्रहण नहीं कर सकता, वरन् केवल वे जिन्हें यह स्वर्ग से दिया गया है। इसलिये वह यह निष्कर्ष देता है, “जो ग्रहण कर सकता है, वह ग्रहण करे।”

सन्त पौलुस और भी स्पष्टता से यही सिखाता है जब वह कहता है:

“हर एक को परमेश्वर की ओर से अपना-अपना वरदान मिला है, किसी को किसी प्रकार का, और किसी को किसी और प्रकार का।”

—1 कुरिन्थियों 7

परन्तु हमारे याजक, भिक्षु और भिक्षुणियाँ इस विचार की उपेक्षा करके आत्मविश्वास से मान लेते हैं कि वे संयमी बने रह सकेंगे। फिर भी उन्हें किसने बताया कि वे जीवन भर पवित्रता बनाए रख सकते हैं, जैसा कि वे सदा के लिये करने की प्रतिज्ञा में बँध जाते हैं?

वे समस्त मानव जाति की सामान्य दशा के विषय में परमेश्वर की घोषणा सुनते हैं:

“मनुष्य का अकेला रहना अच्छा नहीं।”

वे यह भी जानते हैं—और परमेश्वर करे कि वे इसे इतनी तीव्रता से अनुभव न करते—कि उनके शरीर में असंयम की उत्तेजनाएँ कितनी प्रचण्ड हैं। तब वे इस सामान्य बुलावे को अपने सारे जीवन के लिये ठुकराने का साहस कैसे करते हैं, जबकि संयम का वरदान प्रायः केवल किसी विशेष समय के लिये दिया जाता है, जैसी परिस्थितियों की माँग हो?

ऐसी हठधर्मिता में उन्हें परमेश्वर से अपनी सहायता की आशा नहीं करनी चाहिए, वरन् स्मरण करना चाहिए कि क्या लिखा है:

“तू प्रभु अपने परमेश्वर की परीक्षा न करना।”

परमेश्वर की परीक्षा करना यह है कि हम उस स्वभाव के विरुद्ध संघर्ष करें जो उसने हमें दिया है और उसके दिए हुए उपचारों को तुच्छ जानें, मानो उनका हमसे कोई सम्बन्ध ही न हो।

ये लोग केवल यही नहीं करते, वरन् विवाह को अपवित्रता कहने में लज्जित भी नहीं होते। फिर भी हमारे प्रभु ने इसकी स्थापना को अपनी महिमा के अयोग्य नहीं समझा; उसने इसे सब में आदरणीय घोषित किया; और यीशु मसीह ने अपनी उपस्थिति से इसे पवित्र किया और अपने पहले चमत्कार से इसका आदर किया (उत्पत्ति 2; इब्रानियों 13; यूहन्ना 2)।

वे ऐसा केवल अपनी अपनाई हुई अवस्था—विवाह से परहेज़—को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाने के लिये करते हैं, मानो उनका अपना जीवन स्पष्ट रूप से यह न दिखाता हो कि विवाह से परहेज़ करना और कुँवारी पवित्रता रखना बिलकुल भिन्न बातें हैं।

फिर भी वे इतने निर्लज्ज हैं कि अपने जीवन-ढंग को “स्वर्गदूतों के समान” कहते हैं। इसमें वे परमेश्वर के स्वर्गदूतों का घोर अपमान करते हैं, उनकी तुलना व्यभिचारियों, परस्त्रीगामियों और उनसे भी बुरे घृणित कर्मों के दोषी मनुष्यों से करके।

यहाँ विस्तृत तर्कों की आवश्यकता नहीं, क्योंकि सत्य स्वयं उन्हें दोषी ठहराता है। क्योंकि हम स्पष्ट देखते हैं कि हमारा प्रभु ऐसे घमण्ड और अपने वरदानों के प्रति ऐसी तुच्छता का कैसे भयंकर दण्डों से बदला देता है। अधिक गुप्त बातों को उघाड़ने में मुझे लज्जा आती है, यद्यपि बहुत अधिक पहले से ज्ञात है—इतना कि वायु तक उससे दुर्गन्धित है।

याजकों को विवाह क्यों नहीं करना चाहिए, इसके प्रमाण में वे एक तर्क देते हैं: यदि लेवीय याजकों को वेदी के निकट आते समय अपनी पत्नियों से सम्बन्ध से दूर रहना पड़ता था, ताकि वे अपनी बलियाँ अधिक पवित्रता से चढ़ाएँ, तो मसीही संस्कारों का, जो अधिक उत्कृष्ट और श्रेष्ठ हैं, विवाहित पुरुषों द्वारा सम्पन्न किया जाना अनुचित होगा।

मानो सुसमाचार की सेवकाई और लेवीय याजकपद एक ही पद हों!

इसके विपरीत, लेवीय याजक यीशु मसीह के व्यक्तित्व का प्रतिनिधित्व करते थे, जिसे परमेश्वर और मनुष्यों के बीच मध्यस्थ होकर अपनी सिद्ध पवित्रता से हमें पिता से मिलाना था।

क्योंकि वे याजक पापी थे और मसीह की पवित्रता से पूरी तरह मेल नहीं खा सकते थे, इसलिये उन्हें आज्ञा दी गई थी कि जब कभी वे पवित्रस्थान के निकट आएँ, तो साधारण मानवीय रीति से बढ़कर अपने आप को शुद्ध करें, ताकि इन प्रतीकों के द्वारा वे किसी मात्रा में उसका प्रतिनिधित्व करें। उस समय वे विशेष रूप से मसीह का प्रतीक धारण करते थे, क्योंकि मध्यस्थों के रूप में कार्य करते हुए वे तम्बू में लोगों की ओर से परमेश्वर के सम्मुख उपस्थित होते थे, जो स्वर्गीय सिंहासन का प्रतिरूप था।

परन्तु क्योंकि कलीसिया के रखवालों के पास न यह पद है और न वे इस व्यक्तित्व का प्रतिनिधित्व करते हैं, इसलिये यह तुलना असंगत है।

इसलिये प्रेरित बिना किसी अपवाद के घोषित करता है कि विवाह सब में आदरणीय है, परन्तु परमेश्वर व्यभिचारियों और परस्त्रीगामियों का न्याय करेगा (इब्रानियों 13)।

इसके अतिरिक्त, ऐसे संयम को अनिवार्यता के रूप में माँगना अत्यन्त दुस्साहस था। ऐसा करके उन्होंने प्राचीन कलीसिया पर बड़ी निन्दा डाली, जो केवल शुद्ध शिक्षा के लिये ही विख्यात न थी वरन् पवित्रता में और भी उल्लेखनीय रीति से फूलती-फलती थी।

क्योंकि मैं पूछता हूँ, वे सब प्राचीन पिताओं के विषय में क्या कहेंगे, जिन्होंने स्पष्टतः बिशपों में विवाह को केवल सहन ही नहीं किया वरन् उसे स्वीकृति भी दी? तब तो यह निष्कर्ष निकलेगा कि उन्होंने परमेश्वर के रहस्यों की अपवित्रता को स्थायी बनाया, क्योंकि वर्तमान मत के अनुसार विवाहित पुरुष उन्हें शुद्धता से सम्पन्न नहीं कर सकते थे।

यह सच है कि नीकिया की महासभा में इस विषय पर वाद-विवाद हुआ। चूँकि सदा कुछ अन्धविश्वासी लोग होते हैं जो अपने आप को विशिष्ट दिखाने के लिये कोई नई कल्पना गढ़ते हैं, इसलिये कुछ चाहते थे कि याजकों के लिये विवाह वर्जित किया जाए।

परन्तु क्या ठहराया गया? पफनूतियस की सम्मति स्वीकार की गई, जिसने घोषणा की कि पुरुष का अपनी पत्नी के साथ विश्वासयोग्य सहवास ही शुद्धता है। इस प्रकार पवित्र विवाह अक्षुण्ण रहा। बिशपों का विवाहित होना अपमानजनक नहीं माना गया, और न ही विवाह को सेवकाई पर कोई कलंक लगानेवाला ठहराया गया।

इसी प्रकार आगे के पिताओं ने, जेरोम को छोड़कर, विवाह के आदर को इतनी कठोरता से कम नहीं किया।

हम सन्त क्रिसॉस्टम की एक साक्षी से सन्तुष्ट होंगे, क्योंकि उन पर विवाह का अत्यधिक पक्ष लेने का सन्देह नहीं किया जा सकता। इसके विपरीत, वे कुँवारेपन की प्रशंसा और बड़ाई करने की ओर अत्यधिक झुके हुए थे। फिर भी वे इस प्रकार कहते हैं:

“शुद्धता की पहली श्रेणी निष्कलंक कुँवारापन है। दूसरी श्रेणी विश्वासयोग्यता से निभाया गया विवाह है। इसलिये जो पति-पत्नी विवाह में सम्मान सहित जीवन बिताते हैं, उनका प्रेम दूसरे प्रकार का कुँवारापन है।”

अब यदि विवाहित लोग यह मानते हैं कि उनका मेल परमेश्वर द्वारा आशीषित है, तो यह उन्हें चेतावनी दे कि वे उसे अनियन्त्रित असंयम से दूषित न करें। यद्यपि विवाह का आदर असंयम की लज्जा को ढँक लेता है, इसका अर्थ यह नहीं कि विवाह उसके लिये प्रोत्साहन बन जाए।

इसलिये वे यह न समझें कि उनके लिये सब कुछ उचित है। हर पति अपनी पत्नी के प्रति संयम से व्यवहार करे, और हर पत्नी भी अपने पति के प्रति, अपने आप को इस प्रकार नियन्त्रित करते हुए कि वे विवाह की पवित्रता के विरुद्ध कुछ न करें।

क्योंकि परमेश्वर की विधि को ऐसी मर्यादा में नियन्त्रित और सीमित रहना चाहिए, उसे विलासिता में बह जाने नहीं देना चाहिए।

अन्त में, हमें विचार करना चाहिए कि व्यभिचार की निन्दा करनेवाला व्यवस्था देनेवाला कौन है: वही जो हमारा पूर्ण स्वामी है और इसलिये उचित ही हम से शरीर, प्राण और आत्मा का खरापन माँगता है।

इस प्रकार, जब वह व्यभिचार को वर्जित करता है, तब वह हमें यह भी वर्जित करता है कि हम अशोभनीय वस्त्रों, अभद्र हाव-भाव और व्यवहार, या लज्जाजनक वाणी के द्वारा दूसरों को बुराई की ओर लुभाएँ।

दार्शनिक आर्केलाउस ने बिना कारण नहीं कहा था, जब उसने एक अत्यधिक कोमल वेश-भूषा पहननेवाले युवक से कहा कि इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता कि वह अपने शरीर के किस अंग से अपनी अशोभनीयता प्रकट करता है। यह निर्णय परमेश्वर के सम्मुख मान्य है, जो हर अशुद्धता से, वह जहाँ कहीं भी हो, आत्मा में या शरीर में, घृणा करता है।

कोई सन्देह न करे, इसलिये स्मरण रखें कि परमेश्वर यहाँ हमें शुद्धता की सराहना करता है। यदि वह शुद्धता की आज्ञा देता है, तो वह उसके विरोध में जो कुछ है उसकी निन्दा करता है।

इसलिये यदि हम इस आज्ञा का पालन करना चाहते हैं, तो हमारे हृदय भीतर बुरी लालसा से न जलें; हमारी आँखें अशोभनीय रीति से न देखें; हमारे चेहरे बहकाने के लिये न सजाए जाएँ; हमारी जीभें गन्दे शब्दों से दूसरों को व्यभिचार के लिये न लुभाएँ; और हमारे मुँह असंयम के कारण कामुकता को अवसर न दें।

क्योंकि ये सब दुर्गुण ऐसे कलंक हैं जिनसे शुद्धता और संयम दूषित होते हैं और उनकी पवित्रता अशुद्ध हो जाती है।

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