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अध्याय पाँच: पश्चाताप (भाग 3 / 3)
हम सब दण्डों को सामान्य रूप से न्याय शब्द से सूचित करेंगे, जिसे हम दो प्रकारों में बाँटेंगे। पहले को हम प्रतिशोध का न्याय कहेंगे और दूसरे को सुधार का न्याय।
प्रतिशोध के न्याय में प्रभु अपने शत्रुओं को इस प्रकार दण्ड देता है कि उन पर अपना क्रोध प्रकट करता है, ताकि उन्हें बिगाड़े, नष्ट करे और मिटा दे। इसलिए जब भेजा गया दण्ड उसके क्रोध से जुड़ा होता है, तब उसे ठीक ही परमेश्वर का प्रतिशोध कहा जाता है।
सुधार के न्याय में वह क्रोधित होकर दण्ड नहीं देता, न नष्ट करने या घबराहट में डालने के लिए ताड़ना करता है। इसलिए, ठीक कहें तो, उसे प्रतिशोध नहीं, वरन् चेतावनी और सुधार कहना चाहिए।
एक न्यायी का काम है, दूसरा पिता का। क्योंकि जब न्यायी किसी कुकर्मी को दण्ड देता है, तो वह उसके दोष और अपराध को दण्ड देता है। परन्तु जब पिता अपने पुत्र को सुधारता है, तो उसका लक्ष्य उसके दोष का बदला लेना नहीं होता; वरन् वह उसे शिक्षा देना और आगे के लिए अधिक सावधान बनाना चाहता है।
क्राइसोस्टम इस तुलना को कुछ भिन्न रीति से प्रयोग करता है, यद्यपि वह उसी निष्कर्ष पर पहुँचता है:
“पुत्र को भी पीटा जाता है, और दास को भी। परन्तु दास इसलिए दण्ड पाता है कि उसने पाप किया है और वह वही पाता है जिसके वह योग्य है; पुत्र को प्रेमपूर्ण अनुशासन से ताड़ना दी जाती है।”
इसलिए पुत्र को ताड़ना इसलिए दी जाती है कि वह सुधरे और सही मार्ग पर लौट आए, जबकि दास को वही मिलता है जिसके वह योग्य ठहरा है, क्योंकि स्वामी उस पर क्रुद्ध है।
परन्तु पूरी बात को सरलता से समझने के लिए हमें दो भेद करने होंगे। पहला यह कि जहाँ कहीं दण्ड का उद्देश्य प्रतिशोध है, वहाँ परमेश्वर का क्रोध और श्राप प्रकट होता है, जिसे वह अपने विश्वासियों पर कभी नहीं भेजता। इसके विपरीत, सुधार परमेश्वर की ओर से आशीष और उसके प्रेम की गवाही है, जैसा पवित्रशास्त्र कहता है:
“धन्य है वह मनुष्य जिसे परमेश्वर ताड़ना देता है।”
और फिर:
“हे मेरे पुत्र, प्रभु की ताड़ना को तुच्छ न जान, क्योंकि प्रभु जिससे प्रेम करता है उसी को ताड़ना देता है।”
—नीतिवचन 3:11–12; इब्रानियों 12:5–6
यह भेद प्रायः बताया जाता है। क्योंकि इस संसार में दुष्ट जितने भी क्लेश सहते हैं, वे उनके लिए नरक के द्वार और प्रवेश-मार्ग के समान हैं, जहाँ से वे मानो दूर से अपने अनन्त दण्ड को देखते हैं। वे उनसे सुधरने या कोई लाभ पाने से इतने दूर हैं कि प्रभु इन क्लेशों के द्वारा उन्हें उस भयानक दण्ड के लिए तैयार करता है जो अन्त में उन पर अवश्य आएगा।
प्रभु अपने सेवकों को भी ताड़ना देता है, परन्तु उन्हें मृत्यु के हाथ सौंपने के लिए नहीं। इसलिए जब वे उसकी छड़ियों से मारे जाते हैं, तब पहचानते हैं कि यह उनकी भलाई और शिक्षा के लिए है। इस प्रकार, जैसे हम देखते हैं कि विश्वासियों ने सदा ऐसी ताड़नाओं को धीरज से और शान्त मन से ग्रहण किया है, वैसे ही उन्होंने उन दण्डों को सदा भय की दृष्टि से देखा है जिनमें परमेश्वर का क्रोध उन पर प्रकट होता है।
यिर्मयाह कहता है:
“हे यहोवा, मुझे ताड़ना दे, परन्तु मेरे सुधार के लिए, अपने क्रोध में नहीं, ऐसा न हो कि मैं मिट जाऊँ। अपना क्रोध उन जातियों पर उण्डेल जो तुझे नहीं जानतीं और उन राज्यों पर जो तेरा नाम नहीं पुकारते।”
वैसे ही दाऊद कहता है:
“हे यहोवा, अपने क्रोध में मुझे न डाँट, और न अपनी जलजलाहट में मुझे ताड़ना दे।”
—भजन संहिता 6:1; 38:1
इसका खण्डन इस बात से नहीं होता कि जब प्रभु अपने सेवकों के दोषों को दण्ड देता और ताड़ना करता है, तब प्रायः कहा जाता है कि वह उन पर क्रुद्ध है। जैसे यशायाह कहता है:
“हे यहोवा, मैं तेरा धन्यवाद करूँगा, क्योंकि तू मुझ पर क्रुद्ध हुआ था; परन्तु तेरा क्रोध शान्त हो गया और तूने मुझे शान्ति दी।”
वैसे ही हबक्कूक कहता है:
“क्रोध के समय भी दया को स्मरण कर।”
क्योंकि इसी प्रकार की भाषा से कहा जाता है कि परमेश्वर अपने निज भाग को अपवित्र करता है, यद्यपि हम जानते हैं कि वह उसे कभी सचमुच अपवित्र नहीं करेगा। इसलिए ऐसी भाषा परमेश्वर की इच्छा या अपने लोगों को ताड़ना देने में उसके उद्देश्य की ओर संकेत नहीं करती, वरन् उस तीव्र पीड़ा की ओर जो उन सब को होती है जिनके प्रति वह कुछ कठोरता या गम्भीरता दिखाता है।
वास्तव में वह कभी-कभी अपने सेवकों को छोटी-छोटी अंकुशियों से ही नहीं चुभोता, वरन् उन्हें इतना गहरा घायल करता है कि वे समझने लगते हैं कि वे नरक से दूर नहीं हैं। ऐसा करके वह उन्हें चिताता है कि उन्होंने उसका क्रोध कमाया है, फिर भी साथ ही उन्हें अपनी कठोरता की अपेक्षा अपनी कृपा का अधिक निश्चय दिलाता है।
क्योंकि जो वाचा उसने एक बार यीशु मसीह और उसके अंगों के साथ बाँधी, वह वैसी ही बनी रहती है जैसी उसने प्रतिज्ञा की थी और कभी तोड़ी नहीं जा सकती:
“यदि उसके पुत्र मेरी व्यवस्था को छोड़ दें और मेरे नियमों पर न चलें, यदि वे मेरी विधियों को तोड़ें और मेरी आज्ञाओं को न मानें, तो मैं उनके अपराध का दण्ड छड़ी से और उनके पाप का दण्ड कोड़ों से दूँगा। तो भी मैं अपनी करुणा उन पर से न हटाऊँगा।”
वास्तव में, हमें इस विषय में और निश्चित करने के लिए वह कहता है कि जिन छड़ियों से वह हमें मारेगा वे मनुष्यों की छड़ियाँ होंगी। इस कथन से, यह सूचित करके कि वह हमारे साथ कोमलता और अनुग्रह से व्यवहार करेगा, वह दिखाता है कि जिन्हें वह अपने हाथ के पूरे बल से मारे, वे पूरी तरह कुचले और घबरा जाने के सिवा और कुछ न हो सकते।
अपने लोगों के प्रति वह जो कोमलता बरतता है, वह भविष्यद्वक्ता के द्वारा भी दिखाई गई है:
“देख, मैंने तुझे आग में तपाया है, परन्तु चाँदी के समान नहीं।”
क्योंकि नहीं तो वे पूरी तरह भस्म हो जाते। अर्थात्, यद्यपि जो क्लेश वह अपने लोगों पर भेजता है वे उनके पापों और दोषों के कारण आते हैं, तो भी वह उन्हें इस प्रकार संयमित रखता है कि वे उन्हें सीमा से बढ़कर नष्ट न करें।
दूसरा भेद यह है कि जब इस संसार में दुष्ट परमेश्वर के कोड़ों से मारे जाते हैं, तब वे उसके न्याय की कठोरता को सहना आरम्भ कर चुके होते हैं। यद्यपि परमेश्वर के क्रोध की इन चेतावनियों से लाभ न उठाने के कारण वे निर्दोष न ठहरेंगे, तो भी उन्हें उनके सुधार के लिए दण्ड नहीं दिया जाता, वरन् केवल इसलिए कि वे समझें कि उनका एक न्यायी है जो उन्हें उनके कर्मों के अनुसार बदला दिए बिना बच निकलने न देगा।
इसके विपरीत, विश्वासी इसलिए नहीं मारे जाते कि परमेश्वर के क्रोध का प्रायश्चित्त करें या उसके न्याय का ऋण चुकाएँ, वरन् इसलिए कि वे पश्चाताप में आगे बढ़ें और सही मार्ग पर लौट आएँ। अतः हम देखते हैं कि ऐसी ताड़नाएँ बीते हुए की अपेक्षा आगे आनेवाले से अधिक सम्बन्ध रखती हैं।
मैं इसे अपने शब्दों की अपेक्षा क्राइसोस्टम के शब्दों में कहना अधिक पसन्द करता हूँ:
“प्रभु हमें हमारे दोषों के लिए दण्ड देता है, इसलिए नहीं कि हमारे पापों का कोई मुआवज़ा पाए, वरन् इसलिए कि हमें आगे के लिए अधिक सावधान बनाए।”
इस भेद के अनुसार, जब परमेश्वर ने शाऊल से उसका राज्य छीन लिया, तब उसने उसे प्रतिशोध में दण्ड दिया; परन्तु जब उसने दाऊद से उसका बच्चा ले लिया, तब उसने दाऊद को उसके सुधार के लिए ताड़ना दी।
हमें सन्त पौलुस के शब्दों को इसी रीति से समझना चाहिए:
“जब प्रभु हमें दुःख देता है, तो हमें ताड़ना देता है, ताकि हम संसार के साथ दोषी न ठहरें।”
अर्थात्, जो दुःख वह हम पर भेजता है वे हमें नष्ट करने के लिए दण्ड नहीं, वरन् हमें शिक्षा देने के लिए ताड़नाएँ हैं।
सन्त अगस्तीन भी हमसे बहुत मेल खाता है, जब वह कहता है कि जिन ताड़नाओं से हमारा प्रभु अपने चुने हुओं और त्यागे हुओं से भेंट करता है, उन्हें हमें भिन्न रीति से देखना चाहिए:
“क्योंकि पहलों के लिए, अनुग्रह पा लेने के बाद, वे अभ्यास हैं; दूसरों के लिए, अनुग्रह के बिना, वे दण्डाज्ञा हैं।”
फिर वह दाऊद और दूसरों के उदाहरण देकर कहता है कि प्रभु का उन्हें ताड़ना देने में इसके सिवा कोई और उद्देश्य नहीं था कि उन्हें नम्रता में अभ्यास कराए।
और यशायाह के इस कथन से, कि यहूदी लोगों का अधर्म क्षमा हुआ क्योंकि उन्होंने प्रभु के हाथ से पूरी ताड़ना पाई थी, हमें यह निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए कि हमारे पापों की क्षमा उन ताड़नाओं पर निर्भर है जो हम उनके लिए पाते हैं।
वरन् अर्थ ऐसा है मानो परमेश्वर ने कहा हो:
“मैंने तुम्हें काफी दण्ड दिया है और दुःख दिया है, यहाँ तक कि तुम्हारा मन शोक और पीड़ा से पूरी तरह दब गया है। इसलिए अब समय है कि दया का सन्देश पाकर तुम्हारे मन फिर आनन्द से भर जाएँ।”
विश्वासियों को अपने क्लेशों की कड़वाहट के बीच इस विचार से अपने आप को सुसज्जित करना चाहिए:
“वह समय आ पहुँचा है कि न्याय परमेश्वर के घर से आरम्भ हो।”
यदि विश्वासी जो क्लेश सहते हैं उसे अपने ऊपर परमेश्वर का प्रतिशोध समझें तो वे क्या करें? क्योंकि जो कोई परमेश्वर के हाथ से मारे जाने पर उसे ऐसा न्यायी समझता है जो उसे दण्ड दे रहा है, वह उसे क्रुद्ध और शत्रु के सिवा और किसी रूप में नहीं सोच सकता। वह परमेश्वर की छड़ी को श्राप और दण्डाज्ञा जानकर उससे घृणा किए बिना नहीं रह सकता।
संक्षेप में, जो कोई सोचता है कि परमेश्वर उसके प्रति ऐसा भाव रखता है कि अब भी उसे दण्ड देना चाहता है, वह कभी अपने आप को यह विश्वास नहीं दिला सकता कि परमेश्वर उससे प्रेम करता है। हम उसके अनुशासन से तब तक लाभ नहीं उठा सकते जब तक यह जानते हुए भी कि वह हमारे पापों से अप्रसन्न है, हम उसे अपने प्रति अनुग्रहकारी और प्रेम का भाव रखनेवाला न मानें।
इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता कि दण्ड अनन्त है या सामयिक। क्योंकि युद्ध, अकाल, महामारियाँ और रोग उतने ही सचमुच परमेश्वर के श्राप हैं जितना अनन्त मृत्यु का न्याय, जब हमारा प्रभु उन्हें दुष्टों के विरुद्ध अपने क्रोध और प्रतिशोध के साधन बनाने के उद्देश्य से भेजता है।
मेरे विचार में हर कोई देख सकता है कि परमेश्वर ने दाऊद को ताड़ना क्यों दी। वह उसे सिखाने के लिए थी कि हत्या और व्यभिचार परमेश्वर को कितने बुरे लगते हैं, क्योंकि उसने उनके विरुद्ध ऐसा क्रोध दिखाया, और उसे चिताने के लिए थी कि आगे फिर ऐसा काम करने का साहस न करे। यह ऐसा दण्ड नहीं था जिससे दाऊद ने अपने दोष के लिए परमेश्वर को कुछ मुआवज़ा दिया हो।
उस दूसरी ताड़ना के विषय में भी हमें इसी प्रकार निर्णय करना चाहिए जिससे परमेश्वर ने दाऊद की लोगों की गिनती करने की आज्ञाभंग के कारण यहूदी लोगों को भयंकर महामारी से पीड़ित किया। क्योंकि उसने दाऊद को अपराध का दोष क्षमा कर दिया था। परन्तु इसलिए कि हर युग के लिए उदाहरण के रूप में और दाऊद की दीनता के लिए भी यह आवश्यक था कि ऐसा कार्य अदण्डित न रहे, हमारे प्रभु ने उसे अपनी छड़ी से कठोर ताड़ना दी।
वह सार्वभौमिक श्राप भी, जो हमारे प्रभु ने सारे मानव जाति पर सुनाया, इसी उद्देश्य की पूर्ति करता है। क्योंकि जब अनुग्रह पा लेने के बाद भी हम उन दुःखों को सहते हैं जो हमारे पिता आदम पर उसके अपराध के कारण ठहराए गए थे, तो हमारा प्रभु इसके द्वारा हमें चेताता है कि उसकी व्यवस्था का उल्लंघन उसे कितना अप्रिय है, ताकि अपनी दरिद्रता को पहचानकर दीन और नम्र होकर हम सच्चे आनन्द की ओर अधिक उत्कट अभिलाषा से बढ़ें।
यदि कोई कहे कि इस नश्वर जीवन में जो सब विपत्तियाँ हम सहते हैं वे हमारे दोषों के लिए परमेश्वर को दिया गया मुआवज़ा हैं, तो उसे ठीक ही समझ से रहित माना जाएगा।
मुझे लगता है कि सन्त क्राइसोस्टम का आशय यही था जब उसने लिखा:
“यदि परमेश्वर के हमें ताड़ना देने का कारण यह है कि हम बुराई में बने न रहें या कठोर न हो जाएँ, तो जब वह हमें पश्चाताप तक ले आया, तब दण्ड का कोई स्थान नहीं रहता।”
इसलिए, जैसा वह जानता है कि हर एक के स्वभाव के लिए क्या उचित है, वह कुछ के साथ अधिक कठोरता से और कुछ के साथ अधिक कोमलता से व्यवहार करता है। तो भी, क्योंकि हम में से कोई ऐसा नहीं जो भटकता न हो और हम सब को ताड़ना की आवश्यकता है, यह भला पिता, हमारी भलाई चाहते हुए, हम सब पर बिना किसी अपवाद के अपनी छड़ियों से भेंट करता है।
आश्चर्य की बात है कि वे दाऊद के अकेले उदाहरण पर ध्यान टिकाए हैं, और पापों की सेंत-मेंत क्षमा दिखानेवाले इतने उदाहरणों से प्रभावित नहीं होते।
हम पढ़ते हैं कि चुंगी लेनेवाला मन्दिर से धर्मी ठहरकर घर गया, और उसके पीछे कोई दण्ड नहीं आया। सन्त पतरस ने अपने पाप की क्षमा पाई। जैसा सन्त अम्ब्रोस कहता है:
“हम उसके आँसुओं के विषय में पढ़ते हैं; दण्ड चुकाने के विषय में कुछ नहीं पढ़ते।”
लकवे के मारे हुए से कहा गया:
“उठ; तेरे पाप क्षमा हुए।”
और उस पर कोई दण्ड नहीं ठहराया गया। पवित्रशास्त्र में जितने भी पापमोचन बताए गए हैं, वे सब हमारे सामने सेंत-मेंत के रूप में वर्णित हैं। नियम इस बहुत से उदाहरणों में से निकाला जाना चाहिए, न कि उस एक उदाहरण से जिसमें अपनी ही कोई विशेषता है।
नबूकदनेस्सर को समझाते हुए:
“अपने पापों को धार्मिकता से और अपने अधर्म को दीनों पर दया करके छुड़ा ले,”
दानिय्येल का यह अर्थ नहीं था कि धार्मिकता और दया परमेश्वर के सामने प्रायश्चित्त हैं या दण्डों से छुटकारा हैं। क्योंकि मसीह के लहू के सिवा और कोई छुड़ौती कभी नहीं रही। परन्तु छुड़ाने की बात करते हुए दानिय्येल उसे परमेश्वर की अपेक्षा मनुष्यों से जोड़ता है, मानो उसने कहा हो: “हे राजा, तूने अन्यायपूर्ण और अत्याचारी शासन किया है। तूने निर्बलों को सताया, गरीबों को लूटा और अपनी प्रजा के साथ दुष्टता और अन्याय का व्यवहार किया है। जो डकैतियाँ, अत्याचार और हिंसा के काम तूने उन पर किए हैं, उनके बदले अब उन पर दया और न्याय कर।”
वैसे ही जब सुलैमान कहता है कि प्रेम से पापों की भीड़ ढँक जाती है, तो उसका अर्थ परमेश्वर के सामने नहीं, वरन् मनुष्यों के बीच है। क्योंकि पूरा वचन यह है:
“बैर से झगड़े उत्पन्न होते हैं, परन्तु प्रेम से सब अपराध ढँक जाते हैं।”
यहाँ सुलैमान अपनी सामान्य रीति के अनुसार बैर से उत्पन्न बुराइयों की तुलना प्रेम के फलों से विरोध के रूप में करता है। उसका आशय यह है: जो एक दूसरे से बैर रखते हैं वे एक दूसरे को काटते, डाँटते और अपमानित करते हैं, और हर बात को दोष और निन्दा बना देते हैं। जो एक दूसरे से प्रेम रखते हैं वे आपस में बहुत सी बातों की अनदेखी करते, सह लेते और क्षमा कर देते हैं—इसलिए नहीं कि कोई दूसरे के दोषों को ठीक ठहराता है, वरन् इसलिए कि वह उन्हें सहता है और आरोप लगाकर उन्हें बढ़ाने की अपेक्षा चेतावनी देकर उनका उपचार करना चाहता है।
और हमें इसमें सन्देह नहीं करना चाहिए कि सन्त पतरस ने इस अंश का उल्लेख इसी अर्थ में किया, जब तक कि हम उस पर पवित्रशास्त्र को बिगाड़ने और उसका अनुचित प्रयोग करने का दोष न लगाना चाहें।
जब सुलैमान कहता है कि दया और भलाई के द्वारा पाप क्षमा होते हैं, तो उसका अर्थ यह नहीं कि परमेश्वर के सामने उनका मुआवज़ा चुकाया जाता है, जिससे वह सन्तुष्ट और तृप्त होकर उन दण्डों को छोड़ देता है जो वह अन्यथा भेजता। वरन् पवित्रशास्त्र की सामान्य बोलचाल के अनुसार उसका अर्थ है कि जो सब अपना बुरा जीवन छोड़कर पवित्रता और भले कामों के साथ परमेश्वर की ओर फिरते हैं वे उसे अपने प्रति अनुग्रहकारी पाएँगे। यह ऐसा है मानो वह कहता हो कि जब हम बुराई करना छोड़ देते हैं, तब परमेश्वर का क्रोध थम जाता और शान्त हो जाता है। इस बोलचाल की रीति की चर्चा अन्यत्र हो चुकी है।
जहाँ तक सन्त लूका के उस अंश का प्रश्न है, जो वहाँ हमारे प्रभु के दृष्टान्त को सही विवेक से पढ़ते हैं वे हमारे विरुद्ध कोई विवाद नहीं उठाएँगे। फरीसी ने अपने मन में सोचा कि हमारा प्रभु उस पापिनी स्त्री को नहीं जानता, क्योंकि उसने उसे अपने पास आने दिया था। क्योंकि उसने कल्पना की कि यदि मसीह उसे जानता कि वह जैसी पापिनी है, तो उसे कभी ग्रहण न करता। इससे उसने निष्कर्ष निकाला कि मसीह भविष्यद्वक्ता नहीं, क्योंकि उससे ऐसी भूल हो सकती थी।
हमारे प्रभु ने यह दिखाने के लिए कि पाप क्षमा हो जाने के बाद उसे अब पापिनी नहीं गिनना चाहिए, यह तुलना प्रस्तुत की:
“किसी साहूकार के दो देनदार थे। एक पचास फ्रैंक का देनदार था और दूसरा पाँच सौ का। उसने दोनों का ऋण क्षमा कर दिया। उन में से कौन उससे अधिक प्रेम रखेगा?”
फरीसी ने उत्तर दिया:
“मेरी समझ में वह जिसका अधिक ऋण क्षमा हुआ।”
हमारे प्रभु ने उत्तर दिया:
“इसी से मैं तुझ से कहता हूँ कि इसके बहुत से पाप क्षमा हुए हैं, क्योंकि इसने बहुत प्रेम किया।”
जैसा स्पष्ट प्रकट है, इन शब्दों से वह स्त्री के प्रेम को उसके पापों की क्षमा का कारण नहीं ठहराता, वरन् केवल उसका प्रमाण। क्योंकि ये उस देनदार की तुलना से लिए गए हैं जिसके पाँच सौ फ्रैंक क्षमा हुए थे। वह यह नहीं कहता कि वे इसलिए क्षमा हुए कि देनदार ने बहुत प्रेम किया, वरन् यह कि देनदार को बहुत प्रेम करना चाहिए क्योंकि वे क्षमा हो चुके थे।
इसलिए इन शब्दों को तुलना पर इस प्रकार लागू करना चाहिए: “तू इस स्त्री को पापिनी समझता है, परन्तु तुझे इसे दूसरी रीति से पहचानना चाहिए, क्योंकि इसके पाप क्षमा हो गए हैं। इसके पापों की क्षमा तुझे इसके प्रेम से प्रकट हो जानी चाहिए थी, जिसके द्वारा यह अपने ऊपर किए गए उपकार के लिए धन्यवाद करती है।”
यह परिणामों से लिया गया तर्क है, जिसमें हम किसी बात को उसके पीछे आनेवाले चिह्नों से प्रमाणित करते हैं। अन्त में, हमारा प्रभु स्पष्ट रूप से गवाही देता है कि उस स्त्री ने अपने पाप की क्षमा किस साधन से पाई:
“तेरे विश्वास ने तुझे बचा लिया है।”
अतः हम क्षमा विश्वास के द्वारा पाते हैं; प्रेम के द्वारा हम धन्यवाद करते और प्रभु की उदारता को स्वीकार करते हैं।
प्राचीन पिताओं के लेखों में दण्ड चुकाने के विषय में जो कथन मिलते हैं, उनसे मुझे बहुत आश्चर्य नहीं होता। सच कहूँ तो मैं देखता हूँ कि उनमें से कुछ ने—और लगभग उन सब ने जिनकी रचनाएँ हम तक पहुँची हैं—इस बात में या तो भूल की या बहुत कठोरता से बोले।
परन्तु मैं यह नहीं मानूँगा कि वे इतने अनगढ़ और अज्ञानी थे कि जो उन्होंने लिखा वह उस अर्थ में लिखा हो जो अब दण्ड चुकाने के इन आधुनिक पक्षधरों ने उनके शब्दों पर थोपा है। क्राइसोस्टम एक स्थान पर इस प्रकार कहता है:
“जब दया माँगी जाती है, तो इसलिए कि मनुष्य के पाप की जाँच न हो, न्याय की कठोरता के अनुसार उसके साथ व्यवहार न हो, और सब दण्ड थम जाए। क्योंकि जहाँ दया है वहाँ फिर गेहन्ना, जाँच, कठोरता या दण्ड नहीं रहता।”
वे इन शब्दों से बचने का चाहे जितना प्रयत्न करें, ये स्कूलवादियों के सिद्धान्त से कभी मेल नहीं खा सकते।
इसके अतिरिक्त, De Dogmatibus Ecclesiasticis नामक पुस्तक में, जो सन्त अगस्तीन के नाम से मानी जाती है, चौवनवें अध्याय में कहा गया है:
“पश्चाताप का दण्ड चुकाना पाप के कारणों को दूर करने और उसके सुझावों के आगे फिर न झुकने में है।”
इससे प्रकट है कि उन दिनों यह मत अस्वीकार किया जाता था कि बीते अपराधों का मुआवज़ा दण्ड चुकाने से देना होगा। क्योंकि वहाँ सारा दण्ड चुकाना भविष्य में अपने आप को बचाने और बुराई से दूर रहने की ओर लक्षित है।
मैं क्राइसोस्टम का वह कथन उद्धृत नहीं करूँगा कि प्रभु हमसे और कुछ नहीं माँगता, केवल यह कि हम उसके सामने अपने दोषों को आँसुओं के साथ मान लें, क्योंकि ऐसे कथन प्राचीन पिताओं में बार-बार मिलते हैं।
सन्त अगस्तीन ने एक स्थान पर निश्चय ही गरीबों पर दया के कामों को परमेश्वर से क्षमा पाने के उपाय कहा है। परन्तु ताकि कोई इससे उलझन या फन्दे में न पड़े, वह अन्यत्र अपना आशय अधिक पूर्णता से समझाता है:
“मसीह का शरीर पापों के लिए सच्चा और एकमात्र बलिदान है—न केवल उन पापों के लिए जो हमें बपतिस्मा में क्षमा हुए, वरन् उनके लिए भी जो उसके बाद शरीर की दुर्बलता से उत्पन्न होते हैं, जिनके लिए कलीसिया प्रतिदिन प्रार्थना करती है, ‘हमारे ऋण हमें क्षमा कर।’ वास्तव में वे इसी एक बलिदान के द्वारा क्षमा होते हैं।”
परन्तु अधिकतर प्राचीन पिताओं ने दण्ड चुकाना शब्द को परमेश्वर को दिए गए मुआवज़े के लिए नहीं, वरन् उस सार्वजनिक घोषणा के लिए प्रयोग किया जिसके द्वारा वे लोग जो बहिष्कार से अनुशासित किए गए थे, जब कलीसिया की सहभागिता में लौटाए जाने आते, तो विश्वासियों की मण्डली को अपने पश्चाताप का प्रमाण देते थे।
क्योंकि उनके लिए कुछ उपवास और अन्य नियम ठहराए गए थे, जिनके द्वारा वे दिखाते थे कि वे अपने पिछले जीवन से सचमुच और सच्चे मन से पश्चाताप करते हैं—या यों कहें कि जिनके द्वारा वे अपने बुरे आचरण की स्मृति मिटा देते थे। इस प्रकार कहा जाता था कि वे परमेश्वर को नहीं, वरन् कलीसिया को दण्ड चुकाते हैं।
इसी प्राचीन रीति से अब प्रचलित पापस्वीकार और दण्ड चुकाने की विधियाँ उतरी हैं। वे सचमुच साँप का बच्चा हैं, जिसने उस प्राचीन प्रथा में जो कुछ अच्छा था उसे ऐसा दबा दिया कि उसकी छाया तक नहीं बची।
मैं भली-भाँति जानता हूँ कि प्राचीन पिता कभी-कभी कुछ अनगढ़ बोलते हैं, और जैसा मैंने अभी थोड़ी देर पहले कहा, मैं इससे इनकार नहीं करना चाहता कि उन्होंने कभी-कभी भूल की हो। परन्तु उनकी पुस्तकें, जिन पर केवल कुछ छोटे धब्बे थे, इन सूअरों के हाथ लगने पर पूरी तरह दूषित हो जाती हैं।
और यदि मामले का निर्णय प्राचीन पिताओं के अधिकार से होना है, तो वे हमारे सामने कौन से प्राचीन पिता रखते हैं? पीटर लोम्बार्ड ने, जो उनका सेनापति है, अपनी पुस्तक में जो अधिकांश कथन भरे हैं, वे न जाने किन मूर्ख भिक्षुओं की कल्पनाओं से लिए गए थे, जो सन्त अम्ब्रोस, जेरोम, अगस्तीन और क्राइसोस्टम के नामों से फैलाई गई थीं।
वर्तमान विषय में, उदाहरण के लिए, वह लगभग सब कुछ पश्चाताप पर नामक एक पुस्तक से उधार लेता है। यह पुस्तक, जिसे किसी अज्ञानी ने अच्छे और बुरे लेखकों से उलझाकर सिल दिया है, सन्त अगस्तीन के नाम से मानी जाती है, यद्यपि यह ऐसी रचना है कि कोई साधारण विद्वान व्यक्ति भी उसे अपनी मानने को तैयार न होगा।
वैसे ही, वे अब हमारा सिर अपने शोधन-स्थान से न खाएँ, जो इस कुल्हाड़ी से काट डाला, ढा दिया और जड़ से उखाड़ दिया गया है। क्योंकि मैं उन लोगों के मत को ठीक नहीं मानता जो सोचते हैं कि हमें इस बात को चुप्पी में टाल देना चाहिए और शोधन-स्थान का उल्लेख नहीं करना चाहिए, क्योंकि, जैसा वे कहते हैं, इससे बड़े विवाद उठते हैं और उन्नति थोड़ी होती है।
निश्चय ही मैं भी सलाह देता कि ऐसी बकवास को पीछे छोड़ दिया जाए, यदि उसके साथ ऐसे गम्भीर परिणाम न जुड़े होते। परन्तु क्योंकि शोधन-स्थान बहुत सी निन्दाओं से बना है, प्रतिदिन उससे भी बड़ी निन्दाओं से टिकाया जाता है, और बड़े ठोकर के कारण उत्पन्न करता है, इसलिए उसे चुप्पी में नहीं टाला जा सकता।
हो सकता है कि कुछ समय तक इस बात की उपेक्षा की जा सकती कि वह परमेश्वर के वचन के बिना मूर्खतापूर्ण और धृष्ट उतावलेपन से गढ़ा गया; कि वह न जाने किन प्रकाशनों के अधिकार पर ग्रहण किया गया जो शैतान की चालाकी से रचे गए थे; और कि उसे पुष्ट करने के लिए पवित्रशास्त्र के कुछ अंशों को दुष्टता से बिगाड़ा गया।
तो भी हमारा प्रभु इसे हल्का अपराध नहीं मानता जब मनुष्य की धृष्टता उसके न्याय के भेदों में उतावली से घुस पड़ती है। उसने मनुष्यों को कड़ाई से मना किया है कि उसकी वाणी को तुच्छ जानकर मरे हुओं से सत्य को खोजें, और न वह अपने वचन के साथ ऐसा अनादर होने देता है।
फिर भी मान लें कि ये सब बातें कुछ समय तक सह ली जा सकती थीं, मानो वे अधिक महत्त्व की न हों। परन्तु जब पापों का शुद्धिकरण मसीह के सिवा कहीं और ढूँढ़ा जाता है, और दण्ड चुकाना उसके सिवा कहीं और पहुँचा दिया जाता है, तब चुप रहना खतरनाक है।
इसलिए हमें ऊँचे स्वर में पुकारना चाहिए कि शोधन-स्थान शैतान की घातक गढ़न्त है, जो परमेश्वर की दया पर असह्य कलंक लगाती है, मसीह के क्रूस को निष्फल करती है, और हमारे विश्वास को बिखेरती और उलट देती है।
क्योंकि उनका शोधन-स्थान और क्या है सिवाय उस दण्ड के जो मरे हुओं की आत्माएँ अपने पापों का दण्ड चुकाने में सहती हैं? इस प्रकार, यदि दण्ड चुकाने की धारणा हटा दी जाए, तो उनका शोधन-स्थान तुरन्त ढह जाता है।
अब यदि हमने पहले जो तर्क दिया है उससे यह बात पूरी तरह स्पष्ट हो जाती है कि मसीह का लहू ही विश्वासियों के पापों का एकमात्र शुद्धिकरण, भेंट और दण्ड की पूर्ति है, तो इसके सिवा क्या शेष रहता है कि शोधन-स्थान यीशु मसीह के विरुद्ध शुद्ध और भयानक निन्दा है?
मैं उन बहुत से झूठों और अपवित्र कामों की चर्चा छोड़ता हूँ जिनके द्वारा वह प्रतिदिन टिकाया और बचाया जाता है, उन ठोकरों की जो वह धर्म में उत्पन्न करता है, और उन असंख्य अन्य बुराइयों की जो इस अभक्ति के स्रोत से बह निकली हैं।
तो भी हमें उनके हाथों से पवित्रशास्त्र की वे गवाहियाँ छीननी चाहिए जिन्हें वे प्रायः झूठ-मूठ अपने लिए बताते हैं। वे कहते हैं:
“जब प्रभु घोषणा करता है कि पवित्र आत्मा के विरुद्ध पाप न इस संसार में क्षमा होगा, न आनेवाले संसार में, तो वह सूचित करता है कि कुछ पाप आनेवाले संसार में क्षमा होंगे।”
उत्तर में मैं पूछता हूँ कि क्या यह प्रकट नहीं कि प्रभु वहाँ पाप के दोष की बात कर रहा है। यदि ऐसा है, तो इससे उनके शोधन-स्थान को कुछ सहायता नहीं मिलती, क्योंकि वे कहते हैं कि वहाँ उन पापों के लिए दण्ड सहा जाता है जिनका दोष इस नश्वर जीवन में क्षमा हो चुका है।
फिर भी, उनका मुँह पूरी तरह बन्द करने के लिए मैं उन्हें और भी स्पष्ट उत्तर दूँगा। क्योंकि प्रभु एक ऐसे घृणित अपराध की क्षमा पाने की हर आशा दूर करना चाहता था, इसलिए वह केवल यह कहकर सन्तुष्ट नहीं हुआ कि वह कभी क्षमा न होगा। अधिक बल देने के लिए उसने यह विभाजन किया, एक ओर उस न्याय को रखा जो हर एक का विवेक वर्तमान जीवन में अनुभव करता है, और दूसरी ओर उस अन्तिम न्याय को जो पुनरुत्थान के दिन सब के सामने प्रकट होगा।
यह ऐसा है मानो उसने कहा हो: “सावधान रह कि जान-बूझकर दुर्भावना से परमेश्वर से मत लड़, क्योंकि ऐसा विद्रोह अनन्त मृत्यु लाता है। जो कोई उसके सामने रखी गई आत्मा की ज्योति को जान-बूझकर बुझाने का यत्न करता है, उसे न इस जीवन में क्षमा मिलेगी, जो पापियों के मन फिराने के लिए ठहराया गया है, और न अन्तिम दिन, जब परमेश्वर के स्वर्गदूत मेमनों को बकरियों से अलग करेंगे और परमेश्वर के राज्य को हर ठोकर के कारण से शुद्ध करेंगे।”
वे सन्त मत्ती का यह दृष्टान्त भी सामने रखते हैं:
“अपने मुद्दई से झट मेल मिलाप कर ले, ऐसा न हो कि वह तुझे न्यायी के पास ले जाए, और न्यायी तुझे सिपाही के हाथ सौंपे, और सिपाही तुझे बन्दीगृह में डाल दे, जहाँ से तू तब तक न निकलेगा जब तक पाई-पाई न चुका दे।”
मैं उत्तर देता हूँ कि यदि इस अंश में न्यायी का अर्थ परमेश्वर है, मुद्दई का शैतान, सिपाही का एक स्वर्गदूत, और बन्दीगृह का शोधन-स्थान, तो मैं मान लेता हूँ कि वे जीत गए।
परन्तु यदि यह प्रकट है कि मसीह यह दिखाना चाहता था कि जो लोग अपने झगड़ों और मुकदमों को मेल-मिलाप से निपटाने की अपेक्षा अन्त तक खींचना चाहते हैं वे अपने आप को कितने खतरों में डालते हैं, और इस प्रकार हमें चेताना चाहता था कि सब के साथ मेल रखने का यत्न सदा करें, तो यहाँ शोधन-स्थान कहाँ मिलेगा? संक्षेप में, उस अंश को उसके सादे अर्थ में जाँचा और समझा जाए, तो उसमें वह कुछ न मिलेगा जो वे दावा करते हैं।
वे सन्त पौलुस के शब्दों से भी प्रमाण निकालते हैं:
“हर एक घुटना मसीह के सामने झुकेगा, चाहे वे स्वर्ग के हों, चाहे पृथ्वी के, चाहे पृथ्वी के नीचे के।”
वे यह मान लेते हैं कि पृथ्वी के नीचे के लोगों का अर्थ वे नहीं हो सकते जो अनन्त मृत्यु में हैं। इसलिए वे निष्कर्ष निकालते हैं कि ये शोधन-स्थान की आत्माएँ होंगी।
उनका तर्क बुरा न होता यदि घुटने टेकने से प्रेरित का अर्थ वह सच्ची आराधना होता जो विश्वासी परमेश्वर को चढ़ाते हैं। परन्तु जब वह सीधे यह सिखाता है कि यीशु मसीह ने पिता से हर सृष्टि पर सर्वोच्च अधिकार पाया है, तो पृथ्वी के नीचे के लोगों को दुष्टात्माएँ समझने में क्या बुराई है? वे निश्चय ही प्रभु के सिंहासन के सामने उपस्थित होंगी और भय और थरथराहट के साथ अपने न्यायी को स्वीकार करेंगी।
सन्त पौलुस स्वयं इस भविष्यद्वाणी को दूसरे स्थान पर समझाता है:
“हम सब मसीह के न्याय आसन के सामने खड़े होंगे। क्योंकि प्रभु कहता है कि हर एक घुटना उसके सामने झुकेगा।”
वे उत्तर देंगे कि प्रकाशितवाक्य के शब्द इस रीति से नहीं समझाए जा सकते:
“मैंने स्वर्ग में, पृथ्वी पर, पृथ्वी के नीचे और समुद्र में की हर सृष्टि को यह कहते सुना, ‘जो सिंहासन पर बैठा है उसकी और मेम्ने की स्तुति, आदर, महिमा और राज्य युगानुयुग रहे।’”
मैं उन्हें यह सहर्ष मान लेता हूँ। परन्तु वे यहाँ किन सृष्टियों की बात समझते हैं, जब प्राणहीन और समझहीन वस्तुएँ भी शामिल हैं? इसका और कोई अर्थ नहीं सिवाय इसके कि सृष्टि का हर भाग, आकाश की चोटी से पृथ्वी के केन्द्र तक, अपने-अपने स्थान में अपने सृष्टिकर्ता की महिमा को बढ़ाता है।
मक्काबियों के इतिहास से वे जो प्रस्तुत करते हैं उसका मैं कोई उत्तर नहीं दूँगा, ऐसा न हो कि मैं उस पुस्तक को प्रामाणिक मानता दिखाई दूँ।
परन्तु वे दावा करते हैं कि सन्त पौलुस में उनके पास एक अजेय गढ़ है, जब वह कहता है:
“यदि कोई इस नींव पर सोना, चाँदी, बहुमूल्य पत्थर, काठ, घास या भूसा रखकर बनाए, तो हर एक का काम प्रकट हो जाएगा, क्योंकि वह दिन उसे बताएगा, इसलिए कि वह आग के साथ प्रकट होगा, और वह आग हर एक का काम परखेगी कि कैसा है। यदि किसी का काम जल जाए, तो वह हानि उठाएगा; परन्तु वह आप बच जाएगा, परन्तु जलते-जलते।”
“कौन सी आग,” वे पूछते हैं, “सन्त पौलुस का अर्थ शोधन-स्थान के सिवा और क्या हो सकती है, जिससे हमारे दाग धोए जाते हैं ताकि हम शुद्ध होकर परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करें?”
मैं उत्तर देता हूँ कि प्राचीन पिताओं में से भी बहुतों ने इसकी भिन्न व्याख्या की, आग का अर्थ क्रूस और क्लेश समझा, जिनसे प्रभु अपने लोगों को परखता है ताकि उन्हें उनकी सारी अशुद्धता से शुद्ध करे। यह निश्चय ही शोधन-स्थान की कल्पना करने से कहीं अधिक सम्भव है।
तो भी मैं यह व्याख्या नहीं मानता, क्योंकि मुझे विश्वास है कि मेरे पास एक अधिक निश्चित और स्पष्ट व्याख्या है। पहले, हम देखते हैं कि प्रेरित एक रूपक या तुलना का प्रयोग करता है, और मनुष्य के मन में गढ़े गए सिद्धान्तों को घास, काठ और भूसा कहता है। इस तुलना का कारण प्रकट है: जैसे काठ आग के निकट लाते ही भस्म हो जाता है, वैसे ही ऐसे मानवीय सिद्धान्त जाँच के सामने लाए जाने पर टिक नहीं सकते। यह भी प्रकट है कि यह जाँच पवित्र आत्मा के द्वारा होती है।
अतः तुलना को पूरा निभाने और हर भाग को दूसरे के अनुरूप बनाने के लिए वह पवित्र आत्मा की जाँच को आग कहता है। क्योंकि जैसे सोना और चाँदी आग के जितने निकट लाए जाते हैं उतने ही निश्चित रूप से परखे जाते हैं, ताकि उनकी शुद्धता जानी जाए, वैसे ही परमेश्वर का सत्य, जितनी ध्यान से आत्मिक जाँच में विचारा जाता है, उतना ही अपने अधिकार में दृढ़ ठहरता है। जैसे काठ, भूसा और घास आग में डालने पर तुरन्त जल उठते और राख हो जाते हैं, वैसे ही सब मानवीय गढ़न्तें जो परमेश्वर के वचन पर स्थापित नहीं हैं, आत्मा की जाँच को नष्ट हुए और मिटे बिना सह नहीं सकतीं।
संक्षेप में, यदि गढ़े हुए सिद्धान्तों की तुलना काठ, भूसे और घास से इसलिए की जाती है कि वे भी काठ, भूसे और घास के समान आग से जलकर कुछ नहीं रह जाते; और यदि वे केवल परमेश्वर के आत्मा से ही नष्ट और तितर-बितर होते हैं, तो इससे निकलता है कि आत्मा वही आग है जिससे वे परखे जाते हैं। सन्त पौलुस इस परख को प्रभु का दिन कहता है, पवित्रशास्त्र की रीति के अनुसार, जो जब कभी प्रभु किसी भी रीति से मनुष्यों पर अपनी उपस्थिति प्रकट करता है तब इसी प्रकार बोलता है। अब उसका मुख मुख्यतः तब हम पर चमकता है जब उसका सत्य हमारे सामने स्पष्ट किया जाता है।
हम पहले सिद्ध कर चुके हैं कि सन्त पौलुस में आग का अर्थ पवित्र आत्मा की जाँच के सिवा कुछ नहीं। अब यह समझना शेष है कि जो अपने काम की हानि उठाते हैं वे इस आग से कैसे बचेंगे। यदि हम विचार करें कि वह किस प्रकार के मनुष्यों की बात कर रहा है तो यह कठिन न होगा। क्योंकि वह उनकी बात करता है जो कलीसिया को बनाने का यत्न करते हुए सही नींव रखते हैं परन्तु उस पर भिन्न प्रकार की सामग्री जोड़ देते हैं जो उसके अनुरूप नहीं है। अर्थात्, वे विश्वास के मुख्य और आवश्यक अंगों से हटते नहीं, फिर भी कुछ बातों में परमेश्वर के सत्य में मानवीय स्वप्न मिलाकर भूल करते हैं।
इसलिए ऐसे मनुष्यों को अपने काम की हानि उठानी होगी—अर्थात् उन्होंने परमेश्वर के वचन में जो कुछ अपनी ओर से जोड़ा है वह नष्ट होगा और पैरों तले रौंदा जाएगा। उनके व्यक्ति, इस बीच, बचाए जाएँगे—इसलिए नहीं कि उनकी भूल और अज्ञानता परमेश्वर को स्वीकार्य है, वरन् इसलिए कि हमारा प्रभु अपने आत्मा के अनुग्रह से उन्हें इन बातों से अलग करके छुड़ा लेता है।
इसलिए वे सब जिन्होंने पवित्रशास्त्र की पवित्र शुद्धता को शोधन-स्थान की इस गन्दगी और मैल से अपवित्र किया है, उन्हें अपना काम नष्ट होने देना चाहिए।
