अध्याय 8

अध्याय पाँच: पश्चाताप (भाग 2/3)

Institutes of the Christian Religion (1541) · John Calvin

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अध्याय पाँच: पश्चाताप (भाग 2/3)

वे आगे कहते हैं कि ये कुंजियाँ मसीह ने सब याजकों को दीं, और धर्माध्यक्ष उनके अभिषेक के समय उन्हें ये सौंप देते हैं, परन्तु इनका प्रयोग केवल उन्हीं का है जो कलीसिया के पद पर हैं। इस प्रकार बहिष्कृत और निलम्बित याजकों के पास भी कुंजियाँ सदा बनी रहती हैं, यद्यपि वे जंग खाई और अवरुद्ध होती हैं।

जो लोग ऐसी बातें कहते हैं, वे उन दूसरों की तुलना में संयमी और विनम्र समझे जा सकते हैं जिन्होंने एक नई भट्ठी में नई कुंजियाँ गढ़ ली हैं, और जिनके अधीन, वे कहते हैं, कलीसिया का भण्डार बन्द है। कलीसिया के भण्डार से उनका तात्पर्य यीशु मसीह, प्रेरितों, शहीदों और अन्य सन्तों के पुण्य से है।

वे दावा करते हैं कि इस भण्डार की मुख्य रखवाली रोम के धर्माध्यक्ष को सौंपी गई है, जिसे इन वस्तुओं के प्रथम वितरण का अधिकार है, ताकि वह स्वयं उन्हें बाँटे और दूसरों को उन्हें बाँटने का अधिकार सौंप दे। इसी से क्षमा-पत्र (इंडल्जेंस) निकले हैं, जो पोप कभी पूर्ण रूप में और कभी निश्चित वर्षों की संख्या के लिए देता है, जबकि कार्डिनल सौ दिन और धर्माध्यक्ष चालीस दिन के देते हैं।

इन सब बातों का मैं संक्षेप में उत्तर दूँगा, और फिलहाल इस प्रश्न को छोड़ दूँगा कि वे किस अधिकार से—या कहना चाहिए, किस अन्याय से—विश्वासियों के प्राणों को अपनी व्यवस्थाओं के अधीन करते हैं, क्योंकि उस पर यथास्थान विचार किया जाएगा।

परन्तु प्रत्येक पाप की गिनती कर लेने की व्यवस्था थोपना, यह कहना कि पाप तब तक क्षमा नहीं होते जब तक मनुष्य उन्हें अंगीकार करने का दृढ़ इरादा न रखे, और यह घोषित करना कि जिन्होंने अंगीकार का अवसर गँवा दिया उनके लिए स्वर्गलोक का द्वार बन्द है—ये बातें किसी प्रकार सहन नहीं की जानी चाहिए।

क्योंकि वे कैसे सोचते हैं कि कोई मनुष्य अपने सब पापों की गिनती कर सकता है, जब दाऊद ने, जिसने, मेरे विचार से, अपने पापों के अंगीकार पर बड़ी सावधानी से विचार किया था, केवल यही पुकारने के सिवा कुछ न कर पाया:

“अपनी भूलचूक को कौन समझ सकता है? हे प्रभु, मुझे गुप्त पापों से शुद्ध कर।”

—भजन संहिता 19:12

और दूसरे स्थान पर:

“मेरे अधर्म के कर्म मेरे सिर से भी ऊँचे हो गए हैं; भारी बोझ के समान वे मेरी शक्ति से बाहर हो गए हैं।”

—भजन संहिता 38:4

निश्चय दाऊद समझता था कि हमारे पापों की खाई कितनी गहरी है, मनुष्य के भीतर कितने प्रकार के अपराध बसे हैं, पाप के इस दानव के कितने सिर हैं और वह अपने पीछे कितनी लम्बी पूँछ घसीटता है। इसलिए उसने उनकी पूरी गिनती देने का प्रयत्न नहीं किया, वरन् अपनी दुर्दशा की गहराई से परमेश्वर को पुकारा:

“मैं डूब गया हूँ, गाड़ दिया गया हूँ, मेरा दम घुट रहा है। अधोलोक के फाटकों ने मुझे घेर लिया है। अपना दाहिना हाथ बढ़ाकर मुझे इस गड्ढे से खींच ले जिसमें मैं डूब रहा हूँ, और इस मृत्यु से जिसमें मैं नाश हो रहा हूँ।”

तो अब कौन यह कल्पना करेगा कि वह अपने पापों का हिसाब रख सकता है, जब वह देखता है कि दाऊद अपने पापों की संख्या का पता न लगा सका?

इस नरक से उन लोगों के विवेक क्रूरता से तड़पाए गए जिनमें परमेश्वर का थोड़ा भी बोध था। पहले उन्होंने हिसाब लगाने का यत्न किया, और इसके लिए अंगीकार के विद्वानों के भेदों के अनुसार उन्होंने पापों को तनों, डालियों और पत्तों में बाँटा। फिर उन्होंने उनके गुण, परिमाण और परिस्थितियाँ तौलीं।

आरम्भ में तो कार्य ठीक-ठाक चलता दिखाई दिया। परन्तु जब वे थोड़ा और आगे बढ़े, तो उन्हें आकाश और समुद्र के सिवा कुछ न दिखा, न कोई बन्दरगाह, न लंगर डालने का स्थान। वे जितना आगे बढ़ते, संख्या उतनी बढ़ती जाती; ऊँचे-ऊँचे पहाड़ उनकी आँखों के सामने उठकर उनकी दृष्टि को रोकते थे, और कोई आशा न दिखती थी कि वे कभी निकलने का मार्ग पा सकेंगे। इसलिए वे इसी वेदना में पड़े रहे और अन्त में निराशा के सिवा कोई और छोर न पाया।

तब इन निर्दय जल्लादों ने अपने दिए घावों को भरने के लिए यह उपाय दिया कि हर कोई अपनी शक्ति भर जो कुछ कर सकता है वह करे। परन्तु नई चिन्ताएँ फिर भी उन्हें बेधती रहीं—या कहना चाहिए कि नई यातनाएँ उनके बेचारे प्राणों की खाल उधेड़ती रहीं—जब ये विचार उनके सामने आते: “मैंने इसमें पर्याप्त समय नहीं लगाया। मैंने इस पर जैसा चाहिए वैसा ध्यान नहीं दिया। मैंने असावधानी से कुछ छोड़ दिया, और लापरवाही से उपजी भूल क्षमा के योग्य नहीं है।”

इन बुराइयों को शान्त करने के लिए उन्होंने और उपाय जोड़े: “अपनी लापरवाही का पश्चाताप कर; यदि वह बहुत बड़ी न हो तो क्षमा कर दी जाएगी।” परन्तु इनमें से कोई भी बात घाव को बन्द न कर सकी। ये बुराई को शान्त करनेवाली औषधियाँ कम और शहद में लिपटे विष अधिक थे, ताकि उनकी कड़वाहट पहले स्वाद को बुरी न लगे, परन्तु पहचाने जाने से पहले ही वे धोखा देकर प्राणघातक अंगों में पैठ जाएँ।

इसलिए वह भयानक वाणी उनके कानों में निरन्तर दबाव डालती और गूँजती रहती है: “अपने सब पापों का अंगीकार कर।” उसके आतंक को किसी निश्चित सान्त्वना के बिना शान्त नहीं किया जा सकता।

संसार का एक बड़ा भाग ऐसी मीठी सान्त्वनाओं पर सन्तुष्ट हो गया है, जिनसे इतने घातक विष को मीठा बनाया गया था। ऐसा इसलिए नहीं हुआ कि लोग मानते थे कि परमेश्वर सन्तुष्ट है या वे स्वयं सन्तुष्ट थे। वरन् जैसे समुद्र के बीच लंगर डालनेवाले नाविक नाव चलाने के श्रम से कुछ विश्राम पाते हैं, या जैसे थका-माँदा और मूर्छित होता यात्री मार्ग के बीच बैठकर सुस्ताता है, वैसे ही इन लोगों ने यह विश्राम लिया, यद्यपि वह उनके लिए पर्याप्त न था।

इसे सच प्रमाणित करने में मैं बहुत परिश्रम न करूँगा, क्योंकि हर कोई अपने भीतर इसकी साक्षी दे सकता है। परन्तु मैं संक्षेप में कहूँगा कि यह व्यवस्था किस प्रकार की रही है। पहली बात, यह सीधे-सीधे असम्भव है, और इसलिए नाश करने, दोषी ठहराने, घबरा देने और मनुष्यों को विनाश और निराशा में गिरा देने के सिवा कुछ नहीं कर सकती।

इसके अतिरिक्त, पापियों को उनके पापों की सच्ची समझ से हटाकर यह उन्हें कपटी, और परमेश्वर तथा अपने आप दोनों से अनजान बना देती है। क्योंकि जब वे पूरी तरह अपने पापों की गिनती में लगे रहते हैं, तब वे अपने हृदयों की गहराई में पड़ी भ्रष्टता की गुप्त खाई, अपने भीतरी अधर्म और अपनी छिपी अशुद्धता को भूल जाते हैं। फिर भी मुख्यतः इन्हें पहचानकर ही उन्हें अपनी दुर्दशा पर विचार करना चाहिए था।

इसके विपरीत, अंगीकार का सही नियम यह था कि हम अपने भीतर बुराई की ऐसी खाई को मानें और स्वीकारें जो हमारी समझ से भी परे है। हम देखते हैं कि चुंगी लेनेवाले का अंगीकार इसी नियम के अनुसार रचा गया था।

“हे प्रभु, मुझ पापी पर दया कर।”

—लूका 18:13

मानो वह कह रहा हो: “मेरे भीतर सब कुछ पाप ही पाप है, यहाँ तक कि न मेरा मन और न मेरी जीभ उसकी विशालता को समझ सकती है। इसलिए तेरी दया की खाई मेरे पापों की खाई को निगल जाए।”

“तो फिर क्या?” कोई पूछेगा। “क्या हमें प्रत्येक विशेष पाप का अंगीकार नहीं करना चाहिए? क्या परमेश्वर को वही अंगीकार भाता है जो इन तीन शब्दों में समाया हो: ‘मैं पापी हूँ’?”

मैं उत्तर देता हूँ कि हमें यत्न करना चाहिए कि जहाँ तक हमसे हो सके अपना पूरा हृदय परमेश्वर के सामने खोल दें। हमें केवल अपने को पापी नहीं कहना है, वरन् सचमुच अपने को वैसा ही समझना है, और पूरे मन से यह मानना है कि हमारे पापों की अशुद्धता कितनी बड़ी और कितनी भाँति-भाँति की है। हमें केवल अपने को अशुद्ध नहीं मानना है, वरन् अपनी अशुद्धता के स्वरूप, विस्तार और अनेक रूपों पर विचार करना है। हमें केवल अपने को ऋणी नहीं मानना है, वरन् यह सोचना है कि कितने ऋण हम पर लदे हैं और हमें दबा रहे हैं। हमें केवल अपने को घायल नहीं मानना है, वरन् यह सोचना है कि कितने भारी और प्राणघातक घावों ने हमें बेध दिया है।

फिर भी, जब पापी ऐसे ज्ञान के द्वारा अपने को परमेश्वर के सामने खोल चुका हो, तब भी उसे विश्वास करना और सच्चाई से यह मानना चाहिए कि उसके भीतर इतनी बुराई शेष है जितनी वह समझ नहीं सकता, और उसकी दुर्दशा की गहराई ऐसी है कि वह न उसकी पूरी जाँच कर सकता है और न उसका अन्त पा सकता है। इसलिए वह दाऊद के साथ पुकार उठे:

“अपनी भूलचूक को कौन समझ सकता है? हे प्रभु, मुझे गुप्त पापों से शुद्ध कर।”

—भजन संहिता 19:12

फिर, उनके इस दावे के विषय में कि पाप तब तक क्षमा नहीं होते जब तक मनुष्य अपने अंगीकार का दृढ़ इरादा न रखे, और कि जिन्होंने ऐसा करने का अवसर गँवा दिया उनके लिए स्वर्गलोक का द्वार बन्द है—परमेश्वर न करे कि हम यह बात उन्हें मान लें।

पापों की क्षमा अब उससे भिन्न नहीं है जैसी वह सदा से रही है। जिन लोगों के विषय में हम पढ़ते हैं कि उन्होंने मसीह से अपने पापों की क्षमा पाई, उनमें से किसी के विषय में नहीं कहा गया कि उन्होंने उन्हें किसी गुरु जॉन के कान में अंगीकार किया। वे ऐसा कर भी नहीं सकते थे, क्योंकि उस समय न कोई अंगीकार सुननेवाले थे, न इस प्रकार का अंगीकार। इसके बहुत वर्ष पश्चात् तक यह अंगीकार अज्ञात रहा, और उस समय में पाप उस शर्त के बिना क्षमा होते रहे जो ये लोग माँगते हैं।

परन्तु ताकि हमें इस प्रकार विवाद न करना पड़े मानो बात सन्देहपूर्ण हो, परमेश्वर का वचन, जो सदा बना रहता है, स्पष्ट है:

“जब कभी पापी मन फिराए, मैं उसके सब अधर्म भुला दूँगा।”

—यहेजकेल 18:21–22

जो कोई इस वचन में कुछ भी जोड़ने का साहस करता है, वह पापों को नहीं, वरन् परमेश्वर की दया को बाँधता है।

इसलिए यह कोई आश्चर्य की बात नहीं कि हम कर्णगत अंगीकार को अस्वीकार करते हैं, जो ऐसी महामारी और कलीसिया के लिए अनेक रीति से विनाशकारी वस्तु है। वरन् यदि वह अपने आप में उदासीन बात भी होती, तो भी, जब उससे कोई फल या लाभ नहीं हुआ, उलटे उसने इतनी भूलों, ईशनिन्दाओं और अधर्म के कामों को जन्म दिया, तब कौन न कहेगा कि उसे मिटा देना चाहिए?

वे अवश्य कुछ लाभ गिनाते हैं जो, उनके कथनानुसार, उससे उत्पन्न होते हैं, और जितना हो सके उन्हें बढ़ा-चढ़ाकर कहते हैं, परन्तु वे सब या तो गढ़े हुए हैं या तुच्छ। एक को वे औरों से अधिक सराहते हैं: अर्थात् यह कि अंगीकार करनेवाले को जो लज्जा सहनी पड़ती है वह एक भारी दण्ड है, जिससे वह आगे के लिए अधिक सावधान हो जाता है और अपने आप को दण्ड देकर परमेश्वर के बदले से पहले ही निपट लेता है।

मानो जब हम किसी मनुष्य को उस उच्च स्वर्गीय न्यायालय और परमेश्वर के न्याय के सामने बुलाते हैं तब हम उसे पर्याप्त लज्जित नहीं करते! और मानो मनुष्य ने बड़ी उन्नति कर ली जब दूसरे मनुष्य के सामने की लज्जा ने उसे पाप से रोका, यद्यपि परमेश्वर को अपने बुरे विवेक का साक्षी पाकर उसे कोई लज्जा नहीं हुई!

सचमुच उनका यह कथन स्पष्टतः झूठा है। क्योंकि हम प्रायः देखते हैं कि मनुष्यों को बुराई करने का इतना साहस और छूट और किसी बात से नहीं मिलती जितनी इस विश्वास से कि याजक के सामने अपना अंगीकार कर लेने पर वे मुँह पोंछकर कह सकते हैं कि उन्होंने कुछ किया ही नहीं। वे न केवल पूरे वर्ष भर पाप करने में अधिक निडर हो जाते हैं, वरन् वर्ष के शेष भाग में अंगीकार की कोई चिन्ता न करने और परमेश्वर के लिए कभी आह न भरने के कारण वे अपने आपको जाँचने के लिए कभी नहीं लौटते। उलटे वे पाप पर पाप ढेर करते जाते हैं, जब तक कि, जैसा वे सोचते हैं, वे उन सबको एक ही बार में उगल न दें।

जब वे उन्हें उगल चुकते हैं, तब समझते हैं कि वे अपने बोझ से पूरी तरह हलके हो गए। वे कल्पना करते हैं कि उन्होंने परमेश्वर के न्याय को याजक के हाथ में सौंपकर टाल दिया है, और जो कुछ उन्होंने याजक को बताया है उसे परमेश्वर से भुलवा दिया है।

फिर, अंगीकार के दिन को निकट आता देख कौन प्रसन्न होता है? कौन उसके पास स्वेच्छा से हृदय लेकर जाता है, और बल्कि अनिच्छा से और विवश होकर नहीं आता, मानो उसे कॉलर से घसीटकर बन्दीगृह ले जाया जा रहा हो? सम्भवतः अपवाद याजक हैं, जो एक-दूसरे को अपने कर्म ऐसे बखान करने में प्रसन्न होते हैं मानो मनोरंजक कहानियाँ सुना रहे हों।

कर्णगत अंगीकार जिन घृणित कामों से भरा है, उनका वर्णन करके मैं बहुत कागज़ मैला न करूँगा। मैं केवल इतना कहता हूँ: यदि पवित्र जन नेक्तारियुस ने, जिसकी चर्चा हम ऊपर कर चुके हैं, व्यभिचार की एक ही सूचना पर इस अंगीकार को अपनी कलीसिया से हटाने में—या कहना चाहिए उसकी हर स्मृति को मिटा देने में—उतावली नहीं की, तो उससे उपजे दलाली, व्यभिचार, परस्त्रीगमन और अगम्यागमन के असंख्य कर्म हमें चेतावनी देने के लिए पर्याप्त हैं कि हम आज वैसा ही करें।

अब हमें कुंजियों के अधिकार की जाँच करनी है, जिसमें अंगीकार सुननेवाले अपने राज्य का सारा बल रखते हैं। “क्या कुंजियाँ,” वे पूछते हैं, “बिना कारण दी गई थीं? क्या बिना कारण यह कहा गया था, ‘जो कुछ तुम पृथ्वी पर खोलोगे वह स्वर्ग में खुलेगा’? तो क्या हम मसीह के वचन को निष्फल कर दें?”

मैं उत्तर देता हूँ कि कुंजियाँ दिए जाने के लिए पर्याप्त कारण था। हमें ध्यान देना चाहिए कि दो खण्ड ऐसे हैं जिनमें प्रभु साक्षी देता है कि जो कुछ उसके सेवक पृथ्वी पर बाँधें या खोलें वह स्वर्ग में बँधेगा या खुलेगा। यद्यपि इन खण्डों के अर्थ भिन्न हैं, इन सूअरों की अज्ञानता उन्हें बेतुके ढंग से गड्ड-मड्ड कर देती है, जैसा वे हर बात में करते आए हैं।

एक संत यूहन्ना में है, जहाँ मसीह अपने प्रेरितों को प्रचार के लिए भेजते हुए उन पर फूँककर कहता है:

“पवित्र आत्मा लो। जिनके पाप तुम क्षमा करो, वे उनके लिए क्षमा हुए हैं; और जिनके पाप तुम रखे रहो, वे रखे गए हैं।”

—यूहन्ना 20:22–23

स्वर्ग के राज्य की कुंजियाँ, जिनकी प्रतिज्ञा पहले संत पतरस से की गई थी, अब उसे अन्य प्रेरितों के साथ दी गई हैं। उससे ऐसी कोई प्रतिज्ञा नहीं की गई थी जो उसे यहाँ अन्य सबके समान न मिली हो।

उससे कहा गया था:

“मैं तुझे स्वर्ग के राज्य की कुंजियाँ दूँगा।”

—मत्ती 16:19

यहाँ उन सबको सुसमाचार प्रचार करने की आज्ञा दी गई है। यह उनके लिए स्वर्गीय राज्य का द्वार खोलना है जो मसीह के द्वारा पिता तक पहुँच चाहते हैं, और उनके लिए उसे बन्द करना और बन्द कर अर्गला लगाना है जो इस मार्ग से हट जाते हैं।

उससे कहा गया था:

“जो कुछ तू पृथ्वी पर बाँधेगा वह स्वर्ग में बँधेगा, और जो कुछ तू खोलेगा वह खुलेगा।”

—मत्ती 16:19

यहाँ यह उन सबसे एक साथ कहा गया है:

“जिनके पाप तुम क्षमा करो, वे उनके लिए क्षमा हुए हैं; और जिनके पाप तुम रखे रहो, वे रखे गए हैं।”

—यूहन्ना 20:23

इसलिए बाँधना पापों को रख छोड़ना है; खोलना उन्हें क्षमा करना है। और निश्चय, पापों की क्षमा से विवेक वास्तविक बेड़ियों से छूट जाते हैं, जबकि पापों के रखे जाने से वे कसकर बँध जाते हैं।

मैं इस खण्ड की ऐसी व्याख्या दूँगा जो न अत्यधिक सूक्ष्म है, न खींची-तानी या जबरन गढ़ी हुई, परन्तु सरल, सच्ची और उचित है। पापों को क्षमा करने और रख छोड़ने की यह आज्ञा, और संत पतरस से बाँधने और खोलने के विषय में की गई प्रतिज्ञा, वचन की सेवकाई को छोड़ किसी और बात से सम्बन्धित नहीं की जानी चाहिए। जब हमारे प्रभु ने अपने प्रेरितों के लिए इस सेवकाई को ठहराया, तब उसने उन्हें बाँधने और खोलने का कार्यभार भी सौंपा।

क्योंकि सुसमाचार का सार क्या है, सिवाय इसके कि हम सब, पाप और मृत्यु के दास होकर, उस छुटकारे के द्वारा जो मसीह यीशु में है, छुड़ाए और स्वतंत्र किए जाते हैं? और इसके विपरीत, जो मसीह को अपना छुड़ानेवाला और उद्धारकर्ता नहीं मानते और स्वीकार नहीं करते वे अनन्त कारावास के दण्ड के योग्य ठहराए जाते हैं?

जब हमारे प्रभु ने अपने प्रेरितों को पृथ्वी की सब जातियों में ले जाने के लिए यह आज्ञा दी, तब उसने इसे इस उत्तम साक्षी से सम्मानित किया, यह दिखाने के लिए कि यह उसी की आज्ञा थी, उसी से निकली और उसी की ठहराई हुई। उसने यह प्रेरितों के लिए भी और उन सुननेवालों के लिए भी, जिनके पास यह सन्देश पहुँचना था, एक अनुपम सान्त्वना के रूप में किया।

प्रेरितों के लिए निश्चय आवश्यक था कि अपने प्रचार के विषय में उनके पास बड़ा और दृढ़ आश्वासन हो। उन्हें न केवल असंख्य परिश्रमों, चिन्ताओं, कष्टों और संकटों के बीच इसे अपने ऊपर लेना और पूरा करना था, वरन् अन्त में अपने ही लहू से उस पर हस्ताक्षर और मुहर लगानी थी। इसलिए उचित था कि उनके पास यह निश्चय हो कि उनका प्रचार न व्यर्थ है न तुच्छ, वरन् सामर्थ्य और प्रभाव से भरा हुआ है।

ऐसी वेदना, कठिनाइयों और संकटों के बीच उन्हें इस बात का आश्वासन चाहिए था कि वे परमेश्वर का कार्य कर रहे हैं, ताकि चाहे सारा संसार उनका विरोध और सामना करे, वे जानें कि परमेश्वर उनके पक्ष में है। और यद्यपि उनकी शिक्षा के रचयिता मसीह पृथ्वी पर दृश्य रूप से उनके साथ उपस्थित नहीं थे, फिर भी उन्हें समझना था कि वह स्वर्ग में उसकी सत्यता की पुष्टि कर रहा है।

दूसरी ओर, आवश्यक था कि सुननेवालों को सबसे स्पष्ट साक्षी मिले कि यह शिक्षा प्रेरितों का वचन नहीं वरन् स्वयं परमेश्वर का है, और यह पृथ्वी से उठी हुई वाणी नहीं वरन् स्वर्ग से निकली हुई है। क्योंकि ये बातें मनुष्य के सामर्थ्य में नहीं हो सकतीं: पापों की क्षमा, अनन्त जीवन की प्रतिज्ञा, और उद्धार का सन्देश।

इसलिए मसीह ने साक्षी दी कि सुसमाचार के प्रचार में सेवकाई के सिवा और कुछ प्रेरितों का नहीं था; कि वही था जो उनके मुखों के द्वारा, जैसे साधनों के द्वारा, सब कुछ कहता और प्रतिज्ञा करता था; कि पापों की जो क्षमा वे सुनाते थे वह परमेश्वर की सच्ची प्रतिज्ञा थी; और जो दण्ड की आज्ञा वे देते थे वह परमेश्वर का निश्चित न्याय था।

यह साक्षी सब युगों के लिए दी गई थी और आज भी दृढ़ है, और हम सबको निश्चित और आश्वस्त करती है कि सुसमाचार का वचन, चाहे कोई भी उसका प्रचार करे, परमेश्वर का अपना निर्णय है, जो उसके न्याय-सिंहासन से घोषित हुआ, जीवन की पुस्तक में लिखा गया, स्वर्ग में पारित, पुष्ट और स्थिर किया गया।

इस प्रकार हम समझते हैं कि कुंजियों का अधिकार और कुछ नहीं, सुसमाचार का प्रचार है। वरन् मनुष्यों के सम्बन्ध में वह अधिकार कम और सेवकाई अधिक है। क्योंकि मसीह ने यह अधिकार ठीक अर्थ में मनुष्यों को नहीं, वरन् अपने वचन को दिया, जिसके सेवक उसने मनुष्यों को बनाया।

दूसरा खण्ड, जिसके विषय में हमने कहा है कि उसे दूसरे अर्थ में समझना चाहिए, संत मत्ती में लिखा है:

“यदि तेरा कोई भाई कलीसिया की न सुने, तो वह तेरे लिए अन्यजाति और अपवित्र जन के समान हो। मैं तुम से सच-सच कहता हूँ कि जो कुछ तुम पृथ्वी पर बाँधोगे वह स्वर्ग में बँधेगा, और जो कुछ तुम खोलोगे वह खुलेगा।”

—मत्ती 18:17–18

फिर भी हम इन दोनों खण्डों को इतना भिन्न नहीं बनाते कि उनमें बड़ी समानता और सादृश्य न हो। पहली बात, वे इसमें एक समान हैं कि दोनों कथन सामान्य हैं, और बाँधने-खोलने का अधिकार दोनों में एक ही है—अर्थात् परमेश्वर के वचन के द्वारा। बाँधने और खोलने की आज्ञा भी एक ही है और प्रतिज्ञा भी एक ही।

परन्तु वे इसमें भिन्न हैं: पहला खण्ड विशेष रूप से प्रचार पर लागू होता है, जिसके लिए वचन के सेवक नियुक्त किए गए हैं; दूसरा बहिष्कार के अनुशासन से सम्बन्ध रखता है, जो कलीसिया को सौंपा गया है।

कलीसिया उस व्यक्ति को बाँधती है जिसे वह बहिष्कृत करती है, इस प्रकार नहीं कि उसे सदा के विनाश और निराशा में डाल दे, वरन् उसके जीवन और आचरण को दोषी ठहराकर और यदि वह सही मार्ग पर न लौटे तो उसे उसके दण्ड की पहले से चेतावनी देकर। वह उस व्यक्ति को खोलती है जिसे वह अपनी संगति में ग्रहण करती है, क्योंकि वह उसे उस एकता का भागी बनाती है जो उसे यीशु मसीह में प्राप्त है।

इसलिए, ताकि कोई कलीसिया के न्याय को तुच्छ न जाने या विश्वासियों के दण्डादेश से दोषी ठहराए जाने को हलकी बात न समझे, हमारा प्रभु साक्षी देता है कि ऐसा न्याय उसके अपने दण्डादेश की घोषणा के सिवा कुछ नहीं है, और कि वे पृथ्वी पर जो कुछ करेंगे वह स्वर्ग में स्थिर किया जाएगा।

क्योंकि उनके पास परमेश्वर का वचन है जिससे वे दुष्टों और हठीलों को दोषी ठहराते हैं, और उनके पास वही वचन है जिससे वे उन्हें अनुग्रह में ग्रहण करते हैं जो सुधरे हुए जीवन की ओर लौटते हैं। वे परमेश्वर के न्याय में भूल नहीं कर सकते न उससे भिन्न हो सकते हैं, क्योंकि वे केवल उसकी व्यवस्था के अनुसार न्याय करते हैं, जो कोई अनिश्चित या पार्थिव मत नहीं, वरन् उसकी पवित्र इच्छा और स्वर्गीय वचन है।

इसके अतिरिक्त, कलीसिया से उसका तात्पर्य कुछ मुण्डे और चोटीदार लोगों से नहीं, वरन् उसके नाम में एकत्र हुए विश्वासी लोगों की मण्डली से है। और न हमें उन ठट्ठा करनेवालों की सुननी चाहिए जो इस प्रकार तर्क करते हैं: “कोई उस कलीसिया से शिकायत कैसे कर सकता है जो सारे संसार में बिखरी और फैली हुई है?” क्योंकि मसीह आगे चलकर पर्याप्त स्पष्टता से दिखाता है कि वह हर मसीही मण्डली की बात कर रहा है, जैसे कि कलीसियाएँ प्रत्येक स्थान या प्रान्त में व्यवस्थित हों:

“जहाँ दो या तीन मेरे नाम पर इकट्ठे होते हैं, वहाँ मैं उनके बीच में होता हूँ।”

—मत्ती 18:20

इन दो खण्डों से, जिनकी व्याख्या मेरे विचार में मैंने संक्षेप में और स्पष्टता से कर दी है, ये उन्मत्त लोग बिना किसी विवेक के और अपने पागलपन के अनुसार कभी अपना अंगीकार, कभी अपने बहिष्कार, कभी अपने अधिकार-क्षेत्र, कभी व्यवस्थाएँ थोपने की अपनी शक्ति, और कभी अपने क्षमा-पत्र स्थापित करने का यत्न करते हैं।

परन्तु यदि मैं एक ही प्रहार से ऐसे सब दावों को यह कहकर काट दूँ कि उनके याजक न प्रेरितों के प्रतिनिधि हैं न उत्तराधिकारी, तो? परन्तु इस बात पर कहीं और विचार किया जाएगा।

फिलहाल, जिस वस्तु से वे अपने आपको सुदृढ़ करना चाहते हैं, उसी से वे ऐसा यंत्र बनाते हैं जो उनके सब गढ़ों को गिरा देता है। क्योंकि मसीह ने अपने प्रेरितों को बाँधने और खोलने की शक्ति तब तक नहीं दी जब तक उसने उन्हें पवित्र आत्मा न दे दिया।

इसलिए मैं इन्कार करता हूँ कि कुंजियों का अधिकार किसी का है सिवाय उसके जिसने पवित्र आत्मा पाया हो। और मैं इन्कार करता हूँ कि कोई कुंजियों का प्रयोग कर सकता है जब तक पवित्र आत्मा का शासन और मार्गदर्शन उसके आगे न चले और उसे न सिखाए कि उसे क्या करना चाहिए।

वे डींग मारते हैं कि उनके पास पवित्र आत्मा है, परन्तु अपने कामों से वे उसका इन्कार करते हैं—जब तक कि वे पवित्र आत्मा को कोई खोखली और निकम्मी वस्तु न समझते हों, जैसा वे हमें विश्वास दिलाना चाहते हैं। परन्तु उनका विश्वास नहीं किया जाएगा।

इस यंत्र से वे पूरी तरह गिरा दिए जाते हैं। क्योंकि जिस भी द्वार की कुंजी रखने का वे गर्व करते हैं, उनसे हमें सदा पूछना चाहिए कि क्या उनके पास पवित्र आत्मा है, जो कुंजियों को निर्देशित और संचालित करता है। यदि वे उत्तर दें कि है, तो हमें बदले में पूछना चाहिए कि क्या पवित्र आत्मा से भूल हो सकती है। वे इसे खुले रूप में मानने का साहस न करेंगे, यद्यपि अपनी शिक्षा से वे इसे परोक्ष रूप से मानते हैं।

इसलिए हमें यह निष्कर्ष निकालना चाहिए कि जब याजक उतावली और बिना भेद किए उन्हें बाँधते हैं जिन्हें हमारा प्रभु खोला जाना चाहता है और उन्हें खोलते हैं जिन्हें वह बाँधा जाना चाहता है, तब उनके पास कुंजियों का अधिकार नहीं होता।

जब वे स्पष्ट अनुभव से अपने को दोषी ठहरा देखते हैं कि वे योग्य और अयोग्य को बिना भेद के बाँधते और खोलते हैं, तब वे ज्ञान के बिना अधिकार का दावा करते हैं। यद्यपि वे यह इन्कार करने का साहस नहीं करते कि उचित प्रयोग के लिए ज्ञान आवश्यक है, फिर भी वे सिखाते हैं कि यह अधिकार बुरे भण्डारियों को भी दिया गया है।

परन्तु चूँकि अधिकार यह है:

“जो कुछ तुम पृथ्वी पर बाँधो या खोलो वह स्वर्ग में बँधेगा या खुलेगा,”

इसलिए या तो यीशु मसीह की प्रतिज्ञा झूठी होनी चाहिए, या जो इस अधिकार से सम्पन्न हैं उन्हें वैसे ही बाँधना और खोलना चाहिए जैसा उचित है।

वे यह कहकर बच नहीं सकते कि मसीह की प्रतिज्ञा बाँधे या छोड़े जानेवाले व्यक्ति की योग्यता के अनुसार सीमित है। हम भी अपनी ओर से मानते हैं कि कोई तब तक बाँधा या छोड़ा नहीं जा सकता जब तक वह उसके योग्य न हो। परन्तु सुसमाचार के दूतों और कलीसिया के पास वह वचन है जिससे इस योग्यता को नापा जाना है।

इस वचन से सुसमाचार के दूत सब को विश्वास के द्वारा मसीह में पापों की क्षमा की प्रतिज्ञा दे सकते हैं, और उन सब पर दण्डादेश सुना सकते हैं जिन्होंने मसीह को ग्रहण नहीं किया। इसी वचन से कलीसिया घोषणा करती है कि व्यभिचारियों, परस्त्रीगामियों, चोरों, हत्यारों, लोभियों और दुष्टों का परमेश्वर के राज्य में कोई भाग नहीं, और वह उन्हें सबसे दृढ़ बन्धनों में बाँध देती है। इसी वचन से वह उन्हें खोलती है जो पश्चाताप के साथ लौटते हैं, और उन्हें सान्त्वना देती है।

परन्तु वह कैसा अधिकार है जिसमें यह न जाना जाए कि क्या बाँधना या खोलना चाहिए, क्योंकि बिना जाने कोई बाँध या खोल नहीं सकता? फिर वे क्यों कहते हैं कि वे अपने को दिए गए अधिकार से क्षमा देते हैं, जबकि क्षमा-दान ही अनिश्चित है? इस काल्पनिक अधिकार का क्या लाभ जब उसका कोई वैध प्रयोग ही नहीं?

मैं पहले ही स्थापित कर चुका हूँ कि या तो यह सर्वथा कुछ नहीं है या इतना अनिश्चित है कि इसे कुछ नहीं गिनना चाहिए। क्योंकि जब वे मानते हैं कि अधिकांश याजक कुंजियों का सही प्रयोग नहीं करते, और कि उचित प्रयोग के बिना कुंजियों का अधिकार निष्फल है, तो कौन मुझे आश्वासन देगा कि जो मुझे क्षमा देता है वह कुंजियों का विश्वासयोग्य भण्डारी है?

और यदि वह बुरा भण्डारी है, तो उसके पास इस तुच्छ क्षमा-दान के सिवा क्या है?

“मैं नहीं जानता कि तुझमें क्या बाँधना या खोलना चाहिए, क्योंकि मेरे पास कुंजियों का कोई सच्चा प्रयोग नहीं है। परन्तु यदि तू इसके योग्य है, तो मैं तुझे क्षमा करता हूँ।”

इतना तो कोई साधारण जन—मैं यह नहीं कहूँगा, क्योंकि इससे वे बहुत चिढ़ेंगे—परन्तु कोई तुर्क या शैतान भी कह सकता है। क्योंकि यह कहने के बराबर है:

“मेरे पास परमेश्वर का वचन नहीं है, जो बाँधने और खोलने का निश्चित नियम है; परन्तु मुझे तुझे क्षमा करने का अधिकार दिया गया है, यदि तू इसके योग्य है।”

इसलिए हम देखते हैं कि जब उन्होंने ठहराया कि कुंजियाँ विवेचन के अधिकार और कार्यान्वयन की शक्ति से बनी हैं, और ज्ञान केवल उनके उचित प्रयोग के लिए सलाहकार के रूप में बीच में आता है, तब उनका क्या आशय था। अर्थात् वे परमेश्वर के बिना और उसके वचन के बिना, असंयम और स्वेच्छाचार से राज्य करना चाहते थे।

जहाँ तक इन कुंजियों को इतने द्वारों और तालों में लगाने का प्रश्न है, और उन्हें कभी अपने अधिकार-क्षेत्रों की, कभी अपने अंगीकारों की, कभी अपनी आज्ञप्तियों की और कभी अपने बहिष्कारों की सेवा में लगाने का, मैं संक्षेप में बताऊँगा कि सच्चाई क्या है।

जब मसीह यूहन्ना के सुसमाचार में अपने चेलों को पाप क्षमा करने और रख छोड़ने की आज्ञा देता है, तब वह उन्हें विधायक, कलीसियाई न्यायाधीश, दस्तावेज़ों के अधिकारी, नकलनवीस या अर्जियाँ ढोनेवाले नहीं बनाता। वरन् उन्हें अपने वचन का सेवक बनाकर वह उन्हें एक अनुपम साक्षी से सम्मानित करता है।

जब मत्ती में वह अपनी कलीसिया को बाँधने और खोलने का अधिकार देता है, तब वह यह आज्ञा नहीं देता कि किसी पूज्य मुकुटधारी और सींगोंवाले पदाधिकारी के अधिकार से बेचारे लोग, जो अपने लेनदारों को सन्तुष्ट नहीं कर सकते, बहिष्कृत कर दिए जाएँ और मोमबत्तियाँ बुझाकर तथा घण्टियाँ बजाकर उन पर और कठोर दण्ड लगाए जाएँ। वरन् वह चाहता है कि बहिष्कार के अनुशासन के द्वारा दुष्टों की कुटिलता उसके वचन के अधिकार और उसकी कलीसिया की सेवकाई से सुधारी जाए।

इसके अतिरिक्त, वे उन्मत्त लोग जो दिखावा करते हैं कि कलीसिया की कुंजियाँ यीशु मसीह और शहीदों के पुण्य का वितरण हैं, जिसे पोप अपनी आज्ञापत्रों और क्षमा-पत्रों के द्वारा बाँटता है, उन्हें तर्कों से खण्डन किए जाने की अपेक्षा अपने मस्तिष्क को शुद्ध करनेवाली औषधि की अधिक आवश्यकता है। और क्षमा-पत्रों का परिश्रम से खण्डन करने की कोई बड़ी आवश्यकता भी नहीं, क्योंकि अनेक आक्रमणों से हिलकर वे स्वयं ही ढहने और विफल होने लगे हैं।

निश्चय यह तथ्य कि क्षमा-पत्र इतनी स्वेच्छाचारिता और अति के बीच भी इतने समय तक टिके और बने रहे, हमें दिखाता है कि मनुष्य कितने वर्षों तक कैसे अन्धकार और भ्रम में दबे रहे। उन्होंने स्पष्ट देखा कि पोप और उसके क्षमा बेचनेवालों द्वारा उनका उपहास और छल किया जा रहा है। उन्होंने अपने प्राणों के उद्धार को सौदे की वस्तु बनते देखा; स्वर्गलोक की खरीद का एक निश्चित मूल्य आँका जाते देखा; कुछ भी मुफ़्त नहीं दिया जाता था; और इस बहाने उनकी थैलियों से निकाली गई भेंटें बाद में दुष्टता से व्यभिचार, दलाली और पेटूपन में उड़ा दी जाती थीं।

उन्होंने देखा कि क्षमा-पत्रों के सबसे बड़े प्रचारक ही उनके सबसे बड़े तिरस्कारी थे; कि यह दानव प्रतिदिन बढ़ता जाता था और बिना अन्त के और भी अधिक उग्रता से उठता था; और कि नया धन निकलवाने के लिए नई-नई सीसे की मुहरें लगातार बनती रहती थीं। फिर भी उन्होंने बड़े आदर के साथ क्षमा-पत्र ग्रहण किए, उनकी आराधना की और उन्हें मोल लिया। यहाँ तक कि जिन्होंने औरों से अधिक साफ़ देखा, वे भी यही सोचते रहे कि ये हितकारी धोखे हैं जिनसे कुछ लाभ के साथ छले जाया जा सकता है।

अन्त में, अब जब संसार ने अपने को थोड़ा और बुद्धिमान होने दिया है, क्षमा-पत्र ठण्डे पड़ रहे हैं और जम रहे हैं, जब तक कि वे पूरी तरह लुप्त न हो जाएँ। परन्तु बहुत से लोग जो अब तक क्षमा-पत्रों के एजेंटों और व्यापारियों द्वारा किए गए व्यापार, छल, चोरियों और लूटपाट को पहचानते हैं, वे उसकी अभक्ति का स्रोत नहीं पहचानते। इसलिए यहाँ यह दिखाना लाभकारी है कि क्षमा-पत्र न केवल व्यवहार में जैसे रहे हैं वैसे क्या हैं, वरन् हर आकस्मिक दुरुपयोग को छोड़कर अपनी अपनी उचित और उत्तम प्रकृति में क्या हैं।

उनका सच्चा वर्णन करने के लिए हम कहते हैं कि वे मसीह के लहू का अपवित्रीकरण और शैतान का झूठ हैं, जिनका उद्देश्य मसीही लोगों को परमेश्वर के अनुग्रह से और उस जीवन से, जो मसीह है, फेर देना और उन्हें उद्धार के मार्ग से भटकाना है।

क्योंकि मसीह के लहू का इससे अधिक लज्जाजनक अपवित्रीकरण और अनादर और क्या होता कि यह इन्कार किया जाए कि वह पापों की क्षमा, मेल-मिलाप और पाप का दण्ड चुकाने के लिए पर्याप्त है, जब तक कि उसकी कल्पित कमी कहीं और से पूरी न की जाए?

संत पतरस कहता है:

“व्यवस्था और सब भविष्यद्वक्ता मसीह की साक्षी देते हैं कि पापों की क्षमा उसी में मिलनी है।”

—प्रेरितों के काम 10:43

क्षमा-पत्र संत पतरस, संत पौलुस और अन्य शहीदों के द्वारा पापों की क्षमा देते हैं।

संत यूहन्ना कहता है:

“मसीह का लहू हमें सब पाप से शुद्ध करता है।”

—1 यूहन्ना 1:7

क्षमा-पत्र शहीदों के लहू को पापों के लिए शुद्धिकरण बना देते हैं।

संत पौलुस कहता है:

“जो पाप से अज्ञात था, उसे उसने हमारे लिए पाप ठहराया”—अर्थात् पाप का दण्ड चुकाने का बलिदान—“कि हम उसमें परमेश्वर की धार्मिकता बन जाएँ।”

—2 कुरिन्थियों 5:21

क्षमा-पत्र पाप का दण्ड चुकाने को शहीदों के लहू में रखते हैं।

संत पौलुस ने कुरिन्थियों को पुकारकर साक्षी दी कि केवल मसीह ही उनके लिए क्रूस पर चढ़ाया गया और मरा:

“क्या पौलुस तुम्हारे लिए क्रूस पर चढ़ाया गया?”

—1 कुरिन्थियों 1:13

क्षमा-पत्र ठहराते हैं कि संत पौलुस और अन्य सन्त हमारे लिए मरे।

एक और स्थान पर पौलुस ने कहा कि मसीह ने अपनी कलीसिया को अपने ही लहू से मोल लिया। क्षमा-पत्र शहीदों के लहू में एक और मोल का मूल्य ठहराते हैं।

प्रेरित कहता है:

“उसने एक ही भेंट के द्वारा उन्हें, जो पवित्र किए जाते हैं, सदा के लिए सिद्ध कर दिया है।”

—इब्रानियों 10:14

क्षमा-पत्र इसका खण्डन करते हैं और दृढ़ता से कहते हैं कि मसीह का पवित्रीकरण, जो अन्यथा पर्याप्त न होता, शहीदों के लहू से सिद्ध किया जाता है।

संत यूहन्ना कहता है कि सब सन्तों ने अपने वस्त्र मेम्ने के लहू में धोए। क्षमा-पत्र हमें सिखाते हैं कि हम अपने वस्त्र सन्तों के लहू में धोएँ।

निश्चय, यद्यपि उनकी सारी शिक्षा भयानक ईशनिन्दाओं और अपवित्र कर्मों से सिली और बुनी गई है, यह ईशनिन्दा अन्य सबसे अधिक घोर है। वे स्वीकार करें कि क्या ये उनके निष्कर्ष नहीं हैं: कि शहीदों ने अपनी मृत्यु से परमेश्वर से आवश्यकता से अधिक पुण्य कमाया; कि उनके पास पुण्य की इतनी बहुतायत थी कि उसका एक भाग दूसरों पर उमड़ सकता था; और इसलिए, ऐसा बड़ा लाभ व्यर्थ और नष्ट न हो जाए, उनका लहू मसीह के लहू के साथ मिलाया गया है। इन सब पुण्यों से मिलकर कलीसिया का भण्डार पापों की क्षमा और उनका दण्ड चुकाने के लिए बना और संचित किया गया है।

वे कहते हैं कि इसलिए संत पौलुस के शब्दों को इस प्रकार समझना चाहिए:

“मैं अपने शरीर में मसीह के क्लेशों की घटी को उसकी देह के लिए, जो कलीसिया है, पूरी करता हूँ।”

—कुलुस्सियों 1:24

यह मसीह को नाम भर देकर उसे उन्हीं के बीच केवल एक छोटा सन्त बना देना नहीं तो और क्या है, जो उनकी भीड़ में मुश्किल से पहचाना जाए? फिर भी जब कभी पापों की क्षमा, शुद्धिकरण और पाप का दण्ड चुकाने का प्रश्न हो, तब केवल उसी का प्रचार किया जाना, उसी को दिखाया जाना, उसी का नाम लिया जाना और उसी की ओर देखा जाना चाहिए।

फिर भी आइए हम उनके तर्कों पर विचार करें।

“इसलिए,” वे कहते हैं, “कि शहीदों का लहू व्यर्थ न बहा हो, वह कलीसिया के सामान्य लाभ के लिए बाँटा जाए।”

क्या? क्या यह लाभ पर्याप्त न था कि उन्होंने अपनी मृत्यु से परमेश्वर की महिमा की, अपने लहू से उसके सत्य पर मुहर लगाई, इस वर्तमान जीवन के प्रति अपनी अवहेलना से साक्षी दी कि वे एक उत्तम जीवन की खोज में थे, अपनी दृढ़ता से कलीसिया के विश्वास को स्थिर किया, और उसके शत्रुओं के हठ को लज्जित किया?

परन्तु निश्चय मैं देखता हूँ कि उनका आशय क्या है। वे तब तक किसी लाभ को नहीं मानते जब तक मसीह एकमात्र प्रायश्चित्त करनेवाला न रहे, जब तक वह हमारे पापों के लिए मरनेवाला और हमारे छुटकारे के लिए चढ़ाया जानेवाला अकेला न रहे।

वे उस खण्ड को कितनी दुर्भावना से बिगाड़ते हैं जिसमें संत पौलुस कहता है कि उसने अपने शरीर में मसीह के क्लेशों की घटी पूरी की! क्योंकि वह इस घटी को या उसकी पूर्ति को छुटकारे, शुद्धिकरण या पाप का दण्ड चुकाने की प्रभावशीलता से नहीं जोड़ता, वरन् उन क्लेशों से जोड़ता है जिनमें मसीह के अंगों—अर्थात् विश्वासियों—को तब तक अभ्यास करना है जब तक वे इस शरीर में हैं।

इसलिए उसका आशय यह है कि मसीह के क्लेशों में यह पूरा होना शेष है: कि एक बार अपने आप में दुख उठाकर, मसीह प्रतिदिन अपने अंगों में दुख उठाता है। क्योंकि मसीह हमें इतना सम्मान देता है कि वह हमारे क्लेशों को अपना ही समझता और कहता है।

जब संत पौलुस जोड़ता है कि उसने कलीसिया के लिए दुख उठाया, तब उसका तात्पर्य कलीसिया के छुटकारे, मेल-मिलाप या पाप का दण्ड चुकाने से नहीं, वरन् उसकी उन्नति और वृद्धि से है। इसलिए वह दूसरे स्थान पर कहता है:

“मैं चुने हुओं के लिए सब कुछ सहता हूँ, कि वे भी उस उद्धार को पाएँ जो मसीह यीशु में है।”

—2 तीमुथियुस 2:10

इसी प्रकार वह कुरिन्थियों को लिखता है कि उसने अपने क्लेश उनकी सान्त्वना और उद्धार के लिए स्वेच्छा से सहे।

परन्तु हम यह कल्पना न करें कि संत पौलुस ने धार्मिकता, उद्धार और जीवन की पूर्ण प्राप्ति के विषय में मसीह के क्लेशों में कुछ घटी समझी, या उनमें कुछ जोड़ने का इरादा रखा। क्योंकि वह इतनी स्पष्टता और महिमा से साक्षी देता है कि अनुग्रह की परिपूर्णता मसीह के द्वारा इतनी बहुतायत से उँडेली गई कि वह पाप की हर बहुतायत से कहीं बढ़कर थी।

इसी अनुग्रह से सब सन्त उद्धार पाए हैं, न कि अपने जीवन या मृत्यु के पुण्य से, जैसा संत पतरस स्पष्ट साक्षी देता है:

“हम विश्वास करते हैं कि प्रभु यीशु मसीह के अनुग्रह से हम उद्धार पाएँगे, जैसे वे भी।”

—प्रेरितों के काम 15:11

इस प्रकार, जो कोई किसी सन्त की योग्यता को परमेश्वर की दया के सिवा कहीं और रखता है, वह परमेश्वर और उसके मसीह का अपमान करता है।

परन्तु मैं इस पर इतनी देर क्यों ठहरूँ मानो यह सन्देहपूर्ण हो, जब ऐसी विकृतियों को केवल उजागर कर देना ही उन्हें पराजित करने के लिए पर्याप्त है?

अन्त में, यदि हम इन घृणित बातों को चुपचाप भी छोड़ दें, तो पोप को किसने सिखाया कि यीशु मसीह के अनुग्रह को सीसे और चर्मपत्र में बन्द करे, जबकि प्रभु ने चाहा था कि वह सुसमाचार के वचन के द्वारा बाँटा जाए? निश्चय या तो परमेश्वर का वचन झूठा है या क्षमा-पत्र झूठे हैं।

क्योंकि सुसमाचार में मसीह स्वर्गीय आशीषों की सारी बहुतायत के साथ हमें दिया जाता है—अपने सब पुण्य, अपनी सारी धार्मिकता, बुद्धि और अनुग्रह के साथ—बिना किसी अपवाद के। संत पौलुस इसकी साक्षी देता है जब वह कहता है कि मेल-मिलाप का वचन सेवकों के मुँह में रखा गया ताकि वे मसीह की ओर से संसार में यह राजदूत का कार्य करें:

“हम तुमसे विनती करते हैं कि परमेश्वर से मेल-मिलाप कर लो। क्योंकि जो पाप से अज्ञात था उसे उसने पाप के लिए बलिदान ठहराया, कि हम उसमें परमेश्वर की धार्मिकता को प्राप्त करें।”

—2 कुरिन्थियों 5:20–21

इसके विपरीत, क्षमा-पत्र पोप की अलमारी से मसीह के अनुग्रह का एक नपा-तुला अंश निकालते हैं, उसे सीसे और चर्मपत्र से और एक विशेष स्थान से बाँध देते हैं, और उसे परमेश्वर के वचन से अलग कर देते हैं।

वे पाप का दण्ड चुकाने को पश्चाताप में तीसरा स्थान देते हैं। इसके विषय में वे जो कुछ बकते हैं उस सबको एक ही शब्द से उलट दिया जा सकता है।

वे कहते हैं कि पश्चाताप करनेवाले के लिए केवल अपनी पिछली बुराइयों से दूर रहना और अपना जीवन सुधारना पर्याप्त नहीं, जब तक वह जो कुछ उसने किया है उसके लिए परमेश्वर को पाप का दण्ड न चुकाए। वे बहुत से साधन सुझाते हैं जिनसे पाप छुड़ाए जा सकें, अर्थात् आँसू, उपवास, भेंटें, दान और दया के अन्य कर्म। वे कहते हैं कि इन्हीं से हमें परमेश्वर को मनाना, उसके न्याय का देय चुकाना, अपनी भूलों की क्षतिपूर्ति करना और क्षमा पाना चाहिए।

क्योंकि यद्यपि हमारे प्रभु ने अपनी दया की उदारता से हमारा दोष क्षमा कर दिया है, वे कहते हैं कि अपने न्याय के अनुशासन के अनुसार वह दण्ड को रोक रखता है। फिर भी सारी बात इसी पर आ टिकती है: कि हम अपने पापों की क्षमा परमेश्वर की कृपा से पाते हैं, परन्तु केवल अपने कर्मों के पुण्य के माध्यम से, जो किए गए अपराधों की क्षतिपूर्ति करते हैं, ताकि परमेश्वर के न्याय को, जो पाप का दण्ड चुकाने से ही मनाया जाना चाहिए, सन्तुष्ट किया जाए।

ऐसे झूठों के विरुद्ध मैं पापों की मुफ़्त क्षमा को रखता हूँ, जो पवित्रशास्त्र में लगभग किसी भी बात से अधिक स्पष्टता से बताई गई है। पहली बात, क्षमा शुद्ध उदारता का दान नहीं तो और क्या है? जो लेनदार अपनी रसीद से मानता है कि भुगतान हो चुका है, उसे ऋण क्षमा करनेवाला नहीं कहा जाता। वरन् क्षमा करनेवाला वह लेनदार है जो कुछ पाए बिना उदारता से और मुफ़्त ऋण रद्द कर देता है।

फिर पवित्रशास्त्र मुफ़्त शब्द क्यों जोड़ता है, सिवाय इसके कि पाप का दण्ड चुकाने की हर धारणा को दूर किया जाए? तब वे किस दुस्साहस से अब भी अपने दण्ड चुकाने के ढाँचे खड़े करते हैं जब वे इतनी सामर्थ्य से गिरा दिए गए हैं?

और यशायाह के द्वारा प्रभु की घोषणा के विषय में क्या?

“मैं ही हूँ जो अपने निमित्त तेरे अपराधों को मिटा देता हूँ, और तेरे पापों को फिर स्मरण न करूँगा।”

—यशायाह 43:25

क्या वह खुलकर घोषित नहीं करता कि इस क्षमा का कारण और आधार केवल उसकी भलाई से उत्पन्न होता है?

इसके अतिरिक्त, जब सारा पवित्रशास्त्र यीशु मसीह की साक्षी देता है कि पापों की क्षमा उसके नाम के द्वारा पानी है, तो क्या यह हर दूसरे नाम को बाहर नहीं करता?

“उसके नाम के द्वारा हर एक जो उस पर विश्वास करता है पापों की क्षमा पाएगा।”

—प्रेरितों के काम 10:43

तब वे कैसे सिखाते हैं कि क्षमा पाप का दण्ड चुकाने के कामों के नाम से मिलती है?

उन्हें यह नहीं कहना चाहिए कि यद्यपि पाप का दण्ड चुकाने के काम वे साधन हैं जिनसे क्षमा प्राप्त होती है, फिर भी वह उनके नाम में नहीं, वरन् यीशु मसीह के नाम में प्राप्त होती है। क्योंकि जब पवित्रशास्त्र कहता है मसीह के नाम के द्वारा, तो उसका अर्थ है कि हम अपना कुछ नहीं लाते और अपना कुछ दावा नहीं करते, वरन् केवल मसीह के निमित्त आते हैं। इसी प्रकार संत पौलुस कहता है कि परमेश्वर अपने पुत्र में, उसके निमित्त, संसार का अपने साथ मेल-मिलाप कर रहा था, और उनके पापों को उन पर नहीं गिन रहा था।

मुझे भय है कि अपनी कुटिलता के अनुसार वे यह उत्तर देंगे कि मेल-मिलाप और क्षमा एक ही बार होती है, जब बपतिस्मा में मसीह के द्वारा हम अनुग्रह में ग्रहण किए जाते हैं, परन्तु यदि बपतिस्मा के बाद हम फिर गिरें, तो हमें पाप का दण्ड चुकाने के कामों से अपने आप को उठाना चाहिए; और कि मसीह का लहू इस विषय में हमारे लिए तब तक कुछ लाभ नहीं रखता जब तक वह कलीसिया की कुंजियों के द्वारा हमें न दिया जाए।

परन्तु मैं क्यों कहूँ कि मुझे इस उत्तर का भय है, जब वे इस विषय में अपनी अभक्ति खुलकर घोषित करते हैं—केवल उनमें से एक-दो नहीं, वरन् उनके सारे पन्थ? क्योंकि उनका गुरु, संत पतरस की शिक्षा के अनुसार यह मानने के बाद कि मसीह ने क्रूस पर हमारे पापों का ऋण चुका दिया, तुरन्त एक अपवाद जोड़कर इस कथन को सुधार देता है: कि बपतिस्मा में पापों के सब सांसारिक दण्ड क्षमा होते हैं, परन्तु बपतिस्मा के बाद वे पश्चाताप के साधन से घटाए जाते हैं। इस प्रकार इसे पूरा करने में मसीह का क्रूस और हमारा पश्चाताप साथ-साथ सहयोग करते हैं।

परन्तु संत यूहन्ना बहुत भिन्न बात कहता है:

“यदि कोई पाप करे, तो पिता के पास हमारा एक सहायक है, अर्थात् यीशु मसीह, और वही हमारे पापों का प्रायश्चित्त है।”

—1 यूहन्ना 2:1–2

इसी प्रकार:

“हे बालको, मैं तुम्हें लिखता हूँ, क्योंकि उसके नाम के द्वारा तुम्हारे पाप क्षमा हुए हैं।”

—1 यूहन्ना 2:12

निश्चय वह विश्वासियों से बोल रहा है। जब वह उनके सामने यीशु मसीह को पापों के प्रायश्चित्त के रूप में प्रस्तुत करता है, तो वह दिखाता है कि कोई और ऐसा दण्ड चुकाना नहीं है जिससे परमेश्वर के विरुद्ध अपराध शान्त हो। वह यह नहीं कहता, “परमेश्वर तुमसे एक बार मसीह के द्वारा मेल कर चुका; अब मेल-मिलाप के अन्य साधन खोजो।” वरन् वह मसीह को हमारा सदा का सहायक बनाता है, जो अपनी मध्यस्थता से हमें निरन्तर पिता के अनुग्रह में लौटा लाता है, और सदा का प्रायश्चित्त जिससे पाप निरन्तर शुद्ध होते रहते हैं।

क्योंकि जो संत यूहन्ना बपतिस्मा देनेवाले ने कहा वह सदा सत्य बना रहता है:

“देखो, परमेश्वर का मेम्ना; देखो, जो संसार का पाप उठा ले जाता है।”

—यूहन्ना 1:29

मैं कहता हूँ, वही है जो पापों को उठा ले जाता है, और कोई नहीं। अर्थात् चूँकि केवल वही परमेश्वर का मेम्ना है, इसलिए केवल वही पापों के लिए बलिदान, उनका शुद्धिकरण और उनका दण्ड चुकाना भी है।

यहाँ दो बातों पर विचार करना है। पहली, जो आदर मसीह का है वह पूरी तरह उसी के लिए सुरक्षित रखा जाए। दूसरी, विवेक, अपने पापों की क्षमा का निश्चय पाकर, परमेश्वर के साथ शान्ति पाएँ।

यशायाह कहता है कि पिता ने हम सबके अधर्म उसके पुत्र पर लाद दिए ताकि उसके घाव से हम चंगे हों। संत पतरस इसे दूसरे शब्दों में दोहराता है:

“मसीह ने हमारे सब पापों को अपनी देह पर लकड़ी पर उठा लिया।”

—1 पतरस 2:24

संत पौलुस सिखाता है कि पाप मसीह के शरीर में दोषी ठहराया गया जब वह हमारे लिए पाप ठहराया गया। अर्थात् पाप की सारी शक्ति और श्राप उसके शरीर में घात किए गए जब वह हमारे लिए बलिदान चढ़ाया गया, जिस पर हमारे पापों का सारा बोझ, उनके श्राप और दण्डादेश, परमेश्वर के न्याय और मृत्यु के दण्ड समेत, डाल दिया गया।

यहाँ हम उन कथाओं और झूठों के विषय में कुछ नहीं सुनते जो कहते हैं कि बपतिस्मा के बाद हम में से कोई मसीह की मृत्यु की सामर्थ्य का भागी नहीं होता सिवाय इसके कि वह पश्चाताप से अपने पापों का दण्ड चुकाए। वरन् जब कभी हमने पाप किया है, पवित्रशास्त्र हमें मसीह के उस एक दण्ड-चुकाने की ओर बुलाता है।

उनकी श्रापित शिक्षा पर विचार करो: कि पहली क्षमा में परमेश्वर का अनुग्रह अकेला कार्य करता है, परन्तु यदि हम बाद में गिरें, तो क्षमा पाने में हमारे कर्म सहयोग करते हैं। यदि यह सच होता, तो जो साक्षियाँ हमने उद्धृत की हैं वे मसीह पर कैसे लागू होतीं?

यह कहने में कि हमारे अधर्म मसीह पर इसलिए रखे गए कि उसमें शुद्ध हों, और यह कहने में कि वे हमारे कर्मों से शुद्ध होते हैं; यह कहने में कि मसीह हमारे पापों का प्रायश्चित्त है, और यह कहने में कि परमेश्वर को हमारे कर्मों से मनाना है, कितना बड़ा अन्तर है!

और यदि विवेक को विश्राम दिया जाना है, तो यह सुनकर कि पाप दण्ड चुकाकर छुड़ाए जाने हैं, उसे कौन सी शान्ति मिलेगी? उसे कब निश्चय होगा कि उसका दण्ड चुकाना पूरा हो गया? इसलिए वह सदा सन्देह करता रहेगा कि परमेश्वर उस पर अनुग्रहकारी है या नहीं, और निरन्तर यातना और भय में पड़ा रहेगा।

जो हलके दण्ड चुकाने से सन्तुष्ट हो जाते हैं वे परमेश्वर के न्याय को बहुत अधिक तुच्छ मानते हैं और यह पर्याप्त विचार नहीं करते कि पाप का दोष कितना गम्भीर है, जैसा हमने कहीं और कहा है। और यदि हम उन्हें यह मान भी लें कि कुछ पाप छुड़ाए जा सकते हैं, तो वे क्या करेंगे जब वे इतने पापों से लदे हों कि सौ जीवन-काल भी, जो और किसी काम में न लगाए जाएँ, उनका दण्ड चुकाने के लिए पर्याप्त न हों?

यहाँ वे एक तुच्छ भेद की शरण लेते हैं: कि कुछ पाप घातक हैं और कुछ क्षम्य; कि पहले के लिए बड़ा दण्ड चुकाना आवश्यक है, जबकि दूसरे सरल उपायों से शुद्ध हो सकते हैं, जैसे प्रभु की प्रार्थना बोलना, पवित्र जल लेना और मिस्सा की क्षमा पाना। इस रीति से वे परमेश्वर से खिलवाड़ करते और उसका उपहास उड़ाते हैं।

परन्तु यद्यपि घातक पाप और क्षम्य पाप शब्द निरन्तर उनके होठों पर रहते हैं, उन्होंने अब तक यह भेद करना नहीं जाना कि एक दूसरे से कैसे अलग है, सिवाय इसके कि वे मनुष्य के हृदय की अभक्ति और अशुद्धता को—जो परमेश्वर के सामने सबसे भयंकर पाप है—क्षम्य पाप बना देते हैं।

इसके विपरीत हम, पवित्रशास्त्र की शिक्षा के अनुसार, जो भले और बुरे का नियम है, घोषणा करते हैं:

“पाप की मजदूरी मृत्यु है।”

—रोमियों 6:23

और:

“जो प्राणी पाप करे वही मरेगा।”

—यहेजकेल 18:4

फिर भी विश्वासियों के पाप क्षम्य हैं, इसलिए नहीं कि वे मृत्यु के योग्य नहीं, वरन् इसलिए कि परमेश्वर की दया से:

“जो मसीह यीशु में हैं उन पर दण्ड की आज्ञा नहीं।”

—रोमियों 8:1

उनके पाप उन पर नहीं गिने जाते वरन् अनुग्रह से मिटा दिए जाते हैं।

मैं जानता हूँ कि वे इस शिक्षा की कैसी निन्दा करते हैं, यह कहकर कि यह स्तोइक का वह विरोधाभास है जिसने सब पापों को बराबर ठहराया।

परन्तु वे अपने ही मुँह से सहज ही दोषी ठहराए जाएँगे। क्योंकि मैं पूछता हूँ कि जिन पापों को वे घातक मानते हैं, उनमें क्या वे एक को दूसरे से बड़ा नहीं मानते? इसलिए केवल इसलिए कि वे समान रूप से घातक हैं, यह नहीं निकलता कि पाप बराबर हैं।

अब, चूँकि पवित्रशास्त्र ठहराता है कि मृत्यु पाप की मजदूरी है, और कि जैसे व्यवस्था का पालन जीवन का मार्ग है वैसे ही उसका उल्लंघन मृत्यु है, वे इस दण्डादेश से बच नहीं सकते। तब ऐसी बड़ी संख्या के पापों का दण्ड चुकाने के लिए वे कौन से साधन पाएँगे?

मान लो एक पाप का दण्ड एक दिन में चुकाया जा सकता है। जब वे उसे चुका रहे होंगे, तब वे और कई पाप कर लेंगे, क्योंकि कोई दिन ऐसा नहीं बीतता जिसमें धर्मी जन भी अनेक बार पाप न करे। और जब वे कई पापों का दण्ड चुकाने का यत्न करेंगे, तब वे और भी अधिक पाप कर लेंगे, जब तक कि वे अथाह खाई में न जा पड़ें। मैं सबसे धर्मी जनों की भी बात कर रहा हूँ।

इस प्रकार दण्ड चुकाने का हर भरोसा पहले ही छीन लिया गया है। तब वे क्या स्वप्न देखते या आशा रखते हैं? वे अब भी कैसे कल्पना करने का साहस करते हैं कि वे दण्ड चुका सकते हैं?

वे अपने को निकालने का यत्न करते हैं, परन्तु सफल नहीं हो पाते। वे दण्ड और दोष के बीच एक भेद गढ़ते हैं। वे मानते हैं कि दोष परमेश्वर की दया से क्षमा होता है, परन्तु कहते हैं कि दोष के क्षमा हो जाने के बाद दण्ड शेष रहता है, जिसे चुकाया जाना परमेश्वर का न्याय माँगता है। इसलिए पाप का दण्ड चुकाने के काम दण्ड की क्षमा से सम्बन्ध रखते हैं।

यह कैसी असंगति है? वे अब दोष की क्षमा को मुफ़्त बनाते हैं, यद्यपि अन्यत्र वे आज्ञा देते हैं कि वह प्रार्थनाओं, आँसुओं और अन्य तैयारियों से कमाई जाए।

परन्तु पवित्रशास्त्र में हमें जो कुछ सिखाया गया है वह सब इस भेद का सीधा विरोध करता है। यद्यपि मैं मानता हूँ कि यह ऊपर पर्याप्त रूप से प्रमाणित हो चुका है, मैं कई और साक्षियाँ प्रस्तुत करूँगा, जो, मुझे आशा है, इन साँपों को इतनी कसकर जकड़ देंगी कि वे अपनी पूँछ की नोक भी न मोड़ सकेंगे।

यिर्मयाह कहता है कि यह वह नई वाचा है जो परमेश्वर ने हमारे साथ अपने मसीह में बाँधी है:

“मैं उनके अधर्म को फिर स्मरण न करूँगा।”

—यिर्मयाह 31:34

हम एक और भविष्यद्वक्ता से सीखते हैं कि इसका क्या अर्थ है, जहाँ प्रभु कहता है:

“यदि धर्मी जन अपनी धार्मिकता से फिर जाए, तो मैं उसकी किसी भी धार्मिकता को फिर स्मरण न करूँगा। यदि पापी अपने अधर्म से फिरे, तो मैं उसके किसी भी अपराध को फिर स्मरण न करूँगा।”

—यहेजकेल 18:21–24

जब वह कहता है कि वह धर्मी जन की धार्मिकता को फिर स्मरण न करेगा, तो उसका अर्थ है कि वह उसे प्रतिफल देने के लिए उसका कोई विचार न करेगा। इसलिए उलटे, पापों को स्मरण न करने का अर्थ है उन्हें दण्ड न देना।

पवित्रशास्त्र अन्यत्र जब यह कहता है कि परमेश्वर पापों को अपनी पीठ के पीछे फेंक देता है, उन्हें बादल के समान मिटा देता है, उन्हें समुद्र की गहराइयों में डाल देता है, उन्हें नहीं गिनता और ढाँप देता है, तब उसका यही अर्थ है। इन अभिव्यक्तियों से पवित्र आत्मा ने अपना आशय पर्याप्त स्पष्टता से समझा दिया है, यदि हम अपने को सीखने योग्य बनाएँ और उसकी सुनें।

निश्चय, यदि परमेश्वर पापों को दण्ड देता है, तो वह उन्हें गिनता है; यदि वह उन पर बदला लेता है, तो वह उन्हें स्मरण रखता है; यदि वह उन्हें न्याय में बुलाता है, तो उसने उन्हें ढाँपा नहीं; यदि वह उनकी जाँच करता है, तो उसने उन्हें अपनी पीठ के पीछे नहीं फेंका; यदि वह उन पर दृष्टि करता है, तो उसने उन्हें बादल के समान नहीं मिटाया; और यदि वह उन्हें सामने लाता है, तो उसने उन्हें समुद्र की गहराइयों में नहीं डाला।

अब आइए भविष्यद्वक्ता से सुनें कि प्रभु किस शर्त पर पाप क्षमा करता है:

“तुम्हारे पाप चाहे लाल रंग के हों, वे हिम के समान श्वेत किए जाएँगे; और चाहे वे किरमिजी के समान लाल हों, वे ऊन के समान हो जाएँगे।”

—यशायाह 1:18

यिर्मयाह में भी यही कहा गया है:

“उन दिनों में याकूब के अधर्म की खोज की जाएगी, परन्तु वह नहीं मिलेगा। वरन् वह कुछ भी न होगा, क्योंकि मैं उस बचे हुए जन पर दया करूँगा जिसे मैं बचा रखूँगा।”

—यिर्मयाह 50:20

यदि हम इन शब्दों का अर्थ संक्षेप में समझना चाहें, तो इसके विपरीत विचार करें कि जब प्रभु कहता है कि वह अधर्मों को थैली में बाँधता है, उन्हें गठरी में इकट्ठा करता है, और लोहे की लेखनी और हीरे की नोक से उन्हें खोद देता है, तब क्या सूचित होता है। निश्चय यदि इन अभिव्यक्तियों का अर्थ यह है कि प्रभु उन्हें दण्ड देगा—जिसमें कोई सन्देह नहीं कर सकता—तो मैं भी सन्देह नहीं कर सकता कि पहले के कथन प्रतिज्ञा करते हैं कि परमेश्वर उन अपराधों को दण्ड न देगा जिन्हें वह क्षमा करता है।

यहाँ मैं पाठकों से विनती करता हूँ कि वे मेरी व्याख्याओं की नहीं, वरन् परमेश्वर के वचन की सुनें और उसे कुछ स्थान दें। यदि हमारे पापों के लिए दण्ड फिर भी माँगा जाता, तो मसीह ने हमारे लिए क्या पूरा किया होता?

क्योंकि जब हम कहते हैं कि उसने हमारे सब पाप अपनी देह पर लकड़ी पर उठा लिए, तो हमारा आशय और कुछ नहीं, वरन् यह है कि हमारे पापों के लिए जो सम्पूर्ण दण्ड और बदला ठहरा था वह उसने ले लिया।

यशायाह ने इसे और स्पष्टता से कहा जब वह बोला:

“हमारी शान्ति के लिए ताड़ना—अर्थात् सुधार—उस पर पड़ी।”

—यशायाह 53:5

हमारी शान्ति की ताड़ना हमारे पापों के लिए ठहरे दण्ड के सिवा और क्या है, जिसे हमें स्वयं सहना पड़ता, इससे पहले कि हम परमेश्वर से मेल-मिलाप पाते, यदि मसीह उसे हमारे लिए न चुका देता? यहाँ हम स्पष्ट देखते हैं कि मसीह ने पापों के दण्ड सहे, ताकि अपने लोगों को उनसे छुड़ाए।

जब संत पौलुस मसीह द्वारा पूरे किए गए छुटकारे की बात करता है, तब वह सामान्यतः यूनानी शब्द apolytrosis का प्रयोग करता है, जिसका अर्थ केवल छुटकारा नहीं है, जैसा सामान्यतः समझा जाता है, वरन् वह मूल्य और दण्ड चुकाना है जिसे फ्रेंच में हम फिरौती कहते हैं। इसी कारण वह एक स्थान पर कहता है:

“मसीह ने अपने आप को हमारे लिए छुड़ौती के रूप में दे दिया।”

—1 तीमुथियुस 2:6

अर्थात् उसने अपने आपको हमारा जमानती ठहराया, ताकि हमें हमारे पापों के सब ऋणों से पूरी तरह छुड़ाए।

सबसे बढ़कर, हमारे पास मूसा की व्यवस्था में पापों का प्रायश्चित्त करने—अर्थात् उन्हें शुद्ध करने—की रीति के विषय में विधान से एक दृढ़ तर्क है। क्योंकि वहाँ प्रभु पाप का दण्ड चुकाने की कई रीतियाँ नहीं सिखाता, वरन् सम्पूर्ण क्षतिपूर्ति के रूप में केवल बलिदानों को ठहराता है, यद्यपि वह पाप के भिन्न-भिन्न प्रकारों के अनुसार चढ़ाए जानेवाले बलिदानों को सावधानी से क्रम में बताता है।

इसका क्या अर्थ है? वह पापी को आज्ञा नहीं देता कि क्षमा पाने के लिए भले कर्मों और पुण्यों से दण्ड चुकाए, वरन् सम्पूर्ण प्रायश्चित्त के रूप में बलिदान माँगता है। ऐसा करके, क्या वह साक्षी नहीं देता कि केवल एक ही प्रकार का दण्ड चुकाना है जिससे उसका न्याय शान्त होता है?

जो बलिदान इस्राएली तब चढ़ाते थे वे मनुष्य के कामों के रूप में नहीं आँके जाते थे, वरन् अपनी सच्चाई से—अर्थात् मसीह के उस एक बलिदान से—अपना मूल्य पाते थे।

परमेश्वर को हमसे जो प्रतिदान मिलता है, उसे भविष्यद्वक्ता होशे एक ही कथन में सुन्दरता से व्यक्त करता है:

“हे प्रभु, हमारे सब अधर्म दूर कर, और हम तुझे अपने होठों के बलिदान चढ़ाएँगे।”

—होशे 14:2

यही पापों की क्षमा है; और यही दण्ड चुकाना है, जो धन्यवाद के सिवा और कुछ नहीं।

परन्तु क्योंकि वे अपनी ओर से भी पवित्रशास्त्र की साक्षियों से सुसज्जित होते हैं, इसलिए आइए अब हम उन तर्कों पर विचार करें जो वे हमारे विरुद्ध लाते हैं।

वे कहते हैं कि दाऊद, अपने व्यभिचार और हत्या के लिए भविष्यद्वक्ता नातान से डाँटे जाने के बाद, अपने पाप की क्षमा पा गया, फिर भी बाद में व्यभिचार से गर्भ में आए पुत्र की मृत्यु से दण्डित किया गया। इससे, वे कहते हैं, हमें सिखाया जाता है कि जो दण्ड और सज़ाएँ हमें अपने पापों की क्षमा के बाद भी भुगतनी पड़ती, उन्हें हम पाप का दण्ड चुकाने के कामों से छुड़ाएँ।

वे यह भी कहते हैं कि दानिय्येल ने नबूकदनेस्सर को समझाया:

“अपने पापों को दान देकर छुड़ा ले।”

—दानिय्येल 4:27

और सुलैमान लिखता है कि मनुष्य के अधर्म धार्मिकता और दया के कारण क्षमा होते हैं। इसी प्रकार:

“प्रेम अनेक पापों को ढाँप देता है।”

—नीतिवचन 10:12; 1 पतरस 4:8

और संत लूका में हमारा प्रभु पापिन स्त्री के विषय में कहता है:

“उसके बहुत पाप क्षमा हुए हैं क्योंकि उसने बहुत प्रेम किया।”

—लूका 7:47

वे परमेश्वर के कामों की व्याख्या सदा कितनी कुटिलता से करते हैं! यदि वे, इसके विपरीत, उस बात पर ध्यान से विचार करते जिसे अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए—अर्थात् कि ईश्वरीय न्याय दो प्रकार का होता है—तो वे दाऊद की ताड़ना में पाप के बदले या दण्ड से बिलकुल भिन्न कुछ देखते।

यह समझना हमारे लिए अत्यन्त लाभकारी है कि हमारे पापों को सुधारने के लिए परमेश्वर जो ताड़नाएँ भेजता है उनका उद्देश्य क्या है, और वे उन दण्डों से कितना भिन्न हैं जो वह त्यागे हुओं पर भेजता है। इसलिए मैं इस विषय को संक्षेप में छू लेना अनावश्यक नहीं समझता।

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