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अध्याय चार: विश्वास के विषय में, जिसमें प्रेरितों के विश्वास-वचन की व्याख्या की गई है (भाग 4/6)
इसलिए हमारे उद्धार का सार इसी में है: कि परमेश्वर का पुत्र, जो हमें दिया गया, उसने अपनी इच्छा को एक ओर रख दिया और न केवल अपना जीवन अपने पिता की प्रसन्नता के लिए समर्पित किया, वरन् जब पिता ने उसे आज्ञा दी तब मृत्यु के भय को सहने से भी इनकार नहीं किया, ताकि उसकी उस महिमा को शान्त करे जो हमारे विद्रोह से भड़क उठी थी।
इस प्रकार इसी आज्ञाकारिता के पुण्य से स्वर्गीय पिता का मेल-मिलाप उस मानव-जाति से हुआ, जिससे वह पहले पूरी तरह घृणा करता था।
क्योंकि मसीह ने अपनी मृत्यु के द्वारा पिता के सम्मुख सुगन्धित सुहावना बलिदान चढ़ाया; उसके धर्ममय न्याय की माँग पूरी की और अपने विश्वासियों के लिए अनन्त पवित्रीकरण प्राप्त किया। उसने हमारे छुटकारे के मूल्य के रूप में अपना पवित्र लहू बहाया, ताकि परमेश्वर का वह कोप बुझ जाए जो हमारे विरुद्ध भड़का था और हमारा अधर्म धुल जाए।
इसलिए जब हम उद्धार की निश्चयता खोजते हैं, तब हमें इसी छुटकारे के पास आना चाहिए, जिसके द्वारा परमेश्वर हम पर अनुग्रहकारी हुआ, स्वर्ग हमारे लिए खोला गया और धार्मिकता हमारे लिए प्राप्त की गई।
क्योंकि पवित्रशास्त्र इससे अधिक बार और कुछ नहीं सिखाता: कि मसीह ने अपने बलिदान की सामर्थ्य से हमारे लिए पिता की कृपादृष्टि अर्जित की, जिसमें हमारे जीवन का प्रमुख बन्धक और भरोसा है; और हमारे पापों की वह मैल और कलंक, जिनके कारण परमेश्वर की इच्छा हमसे फिर गई और पराई हो गई थी, उसके लहू से धो और शुद्ध कर दिए गए, जैसा कि सन्त यूहन्ना की घोषणा है:
“यीशु मसीह का लहू हमें सब पापों से शुद्ध करता है।” —1 यूहन्ना 1:7
यहाँ हमारे छुटकारे का सार यह है: मसीह के पाप-दण्ड चुकाने के द्वारा पाप के बन्धनों से छुड़ाए जाकर हम धार्मिकता और पवित्रता में पुनः स्थापित किए गए हैं और उस परमेश्वर से मेल-मिलाप पा चुके हैं, जो हममें हमारे अधर्म को छोड़ और किसी बात से घृणा नहीं करता।
उसने पुन्तियुस पिलातुस के अधीन दुःख उठाया और क्रूस पर चढ़ाया गया।
यहाँ उस न्यायी का नाम, जिसने उसे दोषी ठहराया, और उसकी मृत्यु का प्रकार, दोनों व्यक्त किए गए हैं—केवल इतिहास की सच्चाई को पक्का करने के लिए नहीं, वरन् इसलिए कि दोनों हमारे छुटकारे के भेद के अंग थे।
क्योंकि जब पापों को मसीह की मृत्यु से मिटाया जाना था और उनसे उत्पन्न दण्डाज्ञा को हटाया जाना था, तब उसके लिए किसी भी प्रकार की मृत्यु सहना पर्याप्त न होता। हमारे छुटकारे के प्रत्येक अंग को ठीक-ठीक पूरा करने के लिए एक विशेष प्रकार की मृत्यु चुननी आवश्यक थी, जिसमें हमारी दण्डाज्ञा और परमेश्वर के कोप से उत्पन्न दण्ड को अपने ऊपर लेकर वह हमें दोनों से छुड़ा सके।
इसलिए पहले, उसने प्रान्त के हाकिम के अधीन दुःख उठाया और न्यायिक दण्डादेश द्वारा दोषी ठहराया गया, कि वह हमें सर्वोच्च न्यायी के न्याय-आसन के सामने की दण्डाज्ञा से छुड़ाए।
यदि डाकुओं ने उसका गला काट दिया होता, या किसी हुल्लड़ में निजी लोगों ने उसकी हत्या कर दी होती, तो ऐसी मृत्यु में प्रायश्चित का कोई आभास न होता। परन्तु जब वह अभियोग लगाए जाने के लिए न्यायालय में लाया जाता है, गवाहियों से दोषी ठहराया जाता है और न्यायी के मुख से दण्ड पाता है, तब हम देखते हैं कि उसने एक अपराधी का स्थान ग्रहण किया।
यहाँ हमें दो बातों पर विचार करना चाहिए, जो भविष्यद्वक्ताओं द्वारा पहले ही कही गई थीं और हमारे विश्वास को अनुपम सान्त्वना देती हैं।
जब हम सुनते हैं कि मसीह को न्यायालय से मृत्यु के लिए ले जाया गया और अपराधियों के बीच टाँगा गया, तब हम उस भविष्यद्वाणी की पूर्ति देखते हैं जिसका हवाला सुसमाचार-लेखक देता है:
“वह अपराधियों के संग गिना गया।”
ऐसा क्यों हुआ? इसलिए कि वह पापियों पर आनेवाला दण्ड चुकाए और उनका स्थान ले, क्योंकि उसने धार्मिकता के कारण नहीं, वरन् पाप के कारण मृत्यु सही।
दूसरी ओर, जब हम सुनते हैं कि जिस मुख ने उसे दोषी ठहराया, उसी से वह निर्दोष भी ठहराया गया—क्योंकि पिलातुस को बार-बार उसके निर्दोष होने की सार्वजनिक गवाही देनी पड़ी—तब हमें वह बात स्मरण करनी चाहिए जो एक और भविष्यद्वक्ता ने कही:
“जो मैंने छीना नहीं, उसे मुझे लौटाना पड़ा।”
इस प्रकार यीशु मसीह में हम एक पापी और अपराधी का रूप प्रस्तुत हुआ देखेंगे, जबकि उसकी निर्दोषता से हम जानेंगे कि वह दूसरों के पाप से लदा था, अपने पाप से नहीं।
अतः उसने पुन्तियुस पिलातुस के अधीन दुःख उठाया, और देश के हाकिम के न्यायिक दण्डादेश से अपराधी के रूप में दोषी ठहराया गया। फिर भी वह इस प्रकार दोषी नहीं ठहराया गया कि साथ ही धर्मी भी न घोषित हुआ हो, क्योंकि पिलातुस ने घोषणा की कि उसे उसमें कोई दोष नहीं मिला।
फिर, उसकी मृत्यु की रीति भी भेद से रहित नहीं है। क्रूस श्रापित था, न केवल मनुष्यों की धारणा से, वरन् परमेश्वर की व्यवस्था की आज्ञा से भी:
“जो काठ पर लटकाया जाता है वह परमेश्वर की ओर से श्रापित है।”
इसलिए जब मसीह क्रूस पर जड़ा गया, तब उसने स्वयं को श्राप के अधीन कर दिया। ऐसा ही होना आवश्यक था: वह श्राप जो हम पर आता था और हमारे अधर्म के कारण तैयार था, उस पर डाला जाए ताकि हम उससे छूट जाएँ।
यह बात पहले व्यवस्था में पूर्वचित्रित की गई थी। क्योंकि पापों के लिए चढ़ाए जानेवाले बलि-पशु स्वयं पाप कहलाते थे। इस नाम से पवित्र आत्मा यह जताना चाहता था कि उन्होंने पाप के योग्य सारा श्राप अपने ऊपर ले लिया।
इसलिए मूसा के बलिदानों में जो कुछ प्रतीक रूप में दर्शाया गया था, वह यीशु मसीह में सचमुच पूरा हुआ, जो उन प्रतीकों का सार है। इस प्रकार हमारा छुटकारा पूरा करने के लिए उसने अपने प्राण को पाप-बलि ठहराया, जैसा भविष्यद्वक्ता कहता है:
“तू उसके प्राण को पाप-बलि ठहराएगा।”
इस रीति से पापी होने के नाते हम पर जो सारा श्राप आता था, वह उस पर डाल दिया गया, ताकि वह फिर हम पर न गिना जाए।
प्रेरित इसे और भी खुलकर कहता है जब वह कहता है:
“जो पाप से अज्ञात था, उसे पिता ने हमारे लिए पाप ठहराया, कि हम उसमें होकर परमेश्वर के सम्मुख धार्मिकता प्राप्त करें।” —2 कुरिन्थियों 5:21
क्योंकि परमेश्वर के पुत्र ने, जो पवित्र और हर दोष से मुक्त था, हमारे अधर्मों की निन्दा और लज्जा को अपने ऊपर लिया और ओढ़ लिया, और हमें अपनी पवित्रता से ढाँप दिया।
यह सन्त पौलुस के एक और खण्ड में भी दिखाया गया है, जहाँ कहा गया है कि पाप पर यीशु मसीह की देह में पाप के कारण दण्ड की आज्ञा दी गई:
“परमेश्वर ने अपने ही पुत्र को पापमय शरीर की समानता में और पाप के निमित्त भेजकर, शरीर में पाप पर दण्ड की आज्ञा दी।”
क्योंकि जब पाप का श्राप यीशु मसीह की देह पर डाल दिया गया, तब स्वर्गीय पिता ने पाप की सामर्थ्य को मिटा दिया।
अब स्पष्ट है कि भविष्यद्वक्ता की घोषणा का क्या अर्थ है:
“यहोवा ने हम सबके अधर्म का बोझ उसी पर लाद दिया।”
इसका अर्थ यह है कि उनके कलंक मिटाने की इच्छा से मसीह ने पहले उन्हें अपनी देह पर ले लिया, ताकि वे उसी के नाम गिने जाएँ।
इसलिए क्रूस इसका चिह्न था। उस पर जड़े जाकर यीशु मसीह ने हमें व्यवस्था के श्राप से छुड़ाया, जैसा प्रेरित कहता है, कि वह हमारे लिए श्राप बना:
“मसीह ने जो हमारे लिए श्रापित बना, हमें मोल लेकर व्यवस्था के श्राप से छुड़ाया, क्योंकि लिखा है, ‘जो कोई काठ पर लटकाया जाता है वह श्रापित है,’ ताकि अब्राहम को दी गई आशीष सब जातियों पर उँडेली जाए।”
फिर भी हमें यह नहीं समझना चाहिए कि उसने हमारा श्राप इस प्रकार ग्रहण किया कि उससे ढँक जाए और दब जाए। इसके विपरीत, उसे ग्रहण करके उसने उसे कुचला, तोड़ा और बिखेर दिया।
इसलिए विश्वास मसीह के दोषी ठहराए जाने में क्षमा को और उसके श्रापित होने में आशीष को थाम लेता है।
मरा और गाड़ा गया।
यहाँ हम देख सकते हैं कि आदि से अन्त तक उसने किस प्रकार हमारा ऋण चुकाने और हमारे छुटकारे का मूल्य देने के लिए स्वयं को समर्पित किया। मृत्यु ने हमें अपने जुए के नीचे बाँध रखा था; उसने हमें उससे छुड़ाने के लिए स्वयं को उसके वश में कर दिया।
प्रेरित का यही अभिप्राय है जब वह कहता है:
“उसने हर एक के लिए मृत्यु का स्वाद चखा।”
क्योंकि मरकर उसने हमें मरने से बचाया—या, जो एक ही बात है, अपनी मृत्यु से उसने हमारे लिए जीवन प्राप्त किया।
वह हमसे इस बात में भिन्न था: उसने स्वयं को मृत्यु के हाथ में इस प्रकार दे दिया मानो उसके द्वारा निगल लिया जाए, पर पूरी तरह निगला जाने के लिए नहीं, वरन् मृत्यु को ही निगल जाने के लिए, ताकि उसका हम पर वह अधिकार फिर न रहे जो पहले था।
उसने स्वयं को मानो मृत्यु से हराए जाने दिया—इसलिए नहीं कि उससे दबाया और गिराया जाए, वरन् इसलिए कि हम पर जो प्रभुता वह चलाती थी उसे गिरा दे।
अन्त में, वह इसलिए मरा कि मृत्यु के द्वारा उसे नाश करे जिसके हाथ में मृत्यु की प्रभुता है—अर्थात् शैतान को—और उन्हें छुड़ाए जो मृत्यु के भय से जीवन भर दासत्व में पड़े थे:
“उसने मृत्यु के द्वारा उसे जिसे मृत्यु पर शक्ति मिली थी, अर्थात् शैतान को, निकम्मा कर दिया, और जो मृत्यु के भय के मारे जीवन भर दासत्व में फँसे थे, उन्हें छुड़ा लिया।” —इब्रानियों 2:14–15
यही उसकी मृत्यु का हमें मिलनेवाला पहला फल है।
दूसरा यह है कि उसकी मृत्यु की सामर्थ्य से हमारे पृथ्वी के अंग मारे जाते हैं, ताकि वे अपने पहले के काम फिर न करें, और हमारे भीतर का पुराना मनुष्य मारा जाता है, ताकि उसमें पहले जैसा बल न रहे और वह अपने आप से फल न लाए।
यीशु मसीह का गाड़ा जाना भी इसी उद्देश्य की ओर है: कि उसमें सहभागी होकर हम पाप के लिए गाड़े जाएँ। क्योंकि जब प्रेरित कहता है कि हम मसीह के साथ उसकी मृत्यु की समानता में रोपे गए हैं:
“हम उसकी मृत्यु की समानता में उसके साथ जुड़ गए हैं,”
कि हम उसके साथ पाप की मृत्यु में गाड़े गए हैं:
“हम उसके साथ बपतिस्मा के द्वारा मृत्यु में गाड़े गए,” —रोमियों 6:4
कि उसके क्रूस के द्वारा संसार हमारे लिए और हम संसार के लिए क्रूसित हुए हैं:
“संसार मेरे लिए और मैं संसार के लिए क्रूस पर चढ़ाया गया हूँ,”
और कि हम उसके साथ मर चुके हैं:
“तुम तो मर गए, और तुम्हारा जीवन मसीह के साथ परमेश्वर में छिपा हुआ है,” —कुलुस्सियों 3:3
तो वह न केवल हमें मसीह की मृत्यु के उदाहरण का अनुकरण करने का आग्रह करता है, वरन् यह भी दिखाता है कि उसमें एक ऐसी सामर्थ्य निहित है जो सब मसीहियों में प्रकट होनी चाहिए, जब तक कि वे अपने छुड़ानेवाले की मृत्यु को निष्फल और निष्फलदायी न बनाना चाहें।
इसलिए यीशु मसीह की मृत्यु और गाड़े जाने में हमारे सामने दोहरा अनुग्रह रखा गया है: मृत्यु से छुटकारा और हमारे शरीर का मारा जाना।
वह नरक में उतरा।
यद्यपि विश्वास-वचन की व्याख्या करनेवाले प्राचीन शिक्षकों की पुस्तकों से प्रकट होता है कि यह वाक्यांश सब कलीसियाओं में सर्वत्र स्थापित नहीं था, फिर भी मैं समझता हूँ कि इसे छोड़ना उचित नहीं, क्योंकि इसमें एक महान और उत्तम भेद निहित है।
प्राचीनों में कुछ ऐसे भी हैं जो इसे नहीं छोड़ते। इससे हम अनुमान लगा सकते हैं कि यह प्रेरितों के समय के कुछ ही बाद जोड़ा गया, परन्तु धीरे-धीरे ही सर्वसाधारण में प्रचलित हुआ। जो भी हो, यह निर्विवाद है कि यह उस बात से लिया गया है जिसे सब सच्चे विश्वासियों को मानना और विश्वास करना चाहिए।
क्योंकि प्राचीन पिताओं में कोई ऐसा नहीं जो यीशु मसीह के नरक में उतरने का उल्लेख न करे, यद्यपि वे उसे भिन्न-भिन्न अर्थों में समझते हैं। यह जानना कि यह कथन विश्वास-वचन में किसने या किस समय डाला, कोई बड़ी बात नहीं। हमें तो यह देखना चाहिए कि यहाँ हमारे पास हमारे विश्वास का पूरा और सम्पूर्ण सार है, जिसमें कुछ घटता नहीं और ऐसा कुछ प्रस्तावित नहीं जो परमेश्वर के वचन से न लिया गया हो।
जहाँ तक इस अनुच्छेद का सम्बन्ध है, शीघ्र ही प्रकट हो जाएगा कि हमारे उद्धार की सिद्धि के लिए यह इतना महत्त्वपूर्ण है कि इसे किसी भी प्रकार छोड़ा नहीं जा सकता।
इसकी व्याख्या भिन्न-भिन्न है। कुछ समझते हैं कि यहाँ कोई नई बात नहीं कही गई, वरन् मसीह के गाड़े जाने के विषय में जो पहले कहा गया था वही भिन्न शब्दों में दोहराया गया है, क्योंकि नरक शब्द प्रायः कब्र के अर्थ में प्रयुक्त होता है।
शब्द के अर्थ के विषय में वे जो कहते हैं, उसे मैं सत्य मानता हूँ: नरक शब्द प्रायः कब्र के लिए प्रयुक्त होता है। परन्तु दो कारण उनके मत के विरुद्ध हैं, और मुझे वे उसका खण्डन करने के लिए पर्याप्त लगते हैं।
पहला यह कि जिस बात में अपने आप में कोई कठिनाई नहीं, उसे सीधे और परिचित शब्दों में स्पष्ट कह देने के बाद, उसी को कहीं अधिक अस्पष्ट शब्दों में दोहराना अत्यन्त निरर्थक होता। क्योंकि जब एक ही बात को बताने के लिए दो कथन जोड़े जाते हैं, तब दूसरे को पहले की व्याख्या का काम करना चाहिए। पर यह कहना कि यीशु मसीह का गाड़ा जाना इस बात का अर्थ है कि वह नरक में उतरा, कैसी व्याख्या होगी?
फिर, यह भी सम्भव नहीं कि इस सार में, जहाँ हमारे विश्वास के मुख्य अनुच्छेद थोड़े शब्दों में समेटे गए हैं, प्राचीन कलीसिया का अभिप्राय कुछ ऐसा निरर्थक और असंगत डालने का रहा हो जिसका स्थान किसी कहीं अधिक लम्बे ग्रन्थ में भी न होता। मुझे सन्देह नहीं कि जो बात को ध्यान से जाँचेंगे, वे मुझसे सहमत होंगे।
दूसरे लोग नरक शब्द से पृथ्वी के नीचे का कोई स्थान समझते हैं, जिसे वे लिम्बो नाम देते हैं। वहाँ, वे कल्पना करते हैं, पुराने नियम के अधीन जीनेवाले पिता मानो बन्दीगृह में रोके गए थे। वे कहते हैं कि मसीह उन्हें छुड़ाने वहाँ उतरा, जैसे उसने पीतल के फाटकों को तोड़ा और लोहे के बेंड़ों को काटा।
यद्यपि इस कथा के पीछे प्रतिष्ठित प्रमाण हैं और आज भी इसे सत्य मानकर इसका बचाव किया जाता है, फिर भी यह कथा ही बनी रहती है, और कुछ नहीं।
जकर्याह और सन्त पतरस से वे जो खण्ड प्रस्तुत करते हैं, वे उनके पक्ष का कोई समर्थन नहीं करते। क्योंकि जब भविष्यद्वक्ता कहता है:
“तेरे साथ बाँधी गई वाचा के लहू के कारण मैं ने तेरे बन्दियों को उस गड्ढे से जिसमें जल न था छुड़ा लिया है,”
तब वह मृतकों या लिम्बो की बात नहीं कर रहा। जल-रहित गड्ढे से उसका अर्थ उस दुर्गति की खाई और अथाह कुण्ड से है जिसमें सब पापी पड़े हैं, और बन्दियों से उसका अर्थ उन लोगों से है जो घोर विपत्ति और पीड़ा में बन्दी बने हुए थे।
जब सन्त पतरस कहता है कि यीशु मसीह ने आकर आत्मा में उन आत्माओं को प्रचार किया जो बन्दीगृह में थीं:
“उसने जाकर कैद में पड़े हुए आत्माओं को प्रचार किया।”
तो उसका अर्थ इसके सिवा और कुछ नहीं कि यीशु मसीह द्वारा पूरे किए गए छुटकारे की सामर्थ्य उन लोगों की आत्माओं पर प्रकट की गई जो पहले मर चुके थे।
क्योंकि जो विश्वासी सदा उसमें उद्धार की आशा रखते आए थे, उन्होंने तब उसके आगमन और उपस्थिति को पूरी रीति से और मानो अपनी आँखों से जाना। इसके विपरीत, त्यागे हुए लोगों ने यह देखकर कि केवल वही सारे संसार का उद्धार है और वे उससे बाहर हैं, और अधिक निश्चित रूप से जान लिया कि उनके लिए कोई आशा शेष नहीं है।
जब सन्त पतरस धर्मियों और अविश्वासियों दोनों को बिना भेद के बन्दीगृह में रखता है, तब इसे ऐसा नहीं समझना चाहिए मानो यीशु मसीह के आने से पहले धर्मी किसी संकीर्ण बन्धन में रखे गए थे। वरन् इसलिए कि वे अपने छुटकारे को दूर से और मानो धुँधली छाया में देखते थे, उनकी प्रतीक्षा की तुलना बन्दीगृह से की गई है, क्योंकि वह चिन्ता से पूर्णतः मुक्त नहीं हो सकती थी।
इसलिए हमें इस अनुच्छेद की अधिक निश्चित व्याख्या खोजनी चाहिए। परमेश्वर का वचन ऐसी व्याख्या देता है जो न केवल खरी और पवित्र है, वरन् बड़ी सान्त्वना से भरी भी है।
यदि यीशु मसीह केवल शारीरिक मृत्यु का ऋण चुका देता, तो वह कुछ न होता। उसे परमेश्वर के न्याय की कठोरता का अनुभव भी करना था, ताकि मध्यस्थता करके और मानो बीच में खड़ा होकर वह स्वयं उसे शान्त करके परमेश्वर के कोप को हम पर गिरने से रोक दे।
इसे पूरा करने के लिए आवश्यक था कि वह मानो हाथों-हाथ नरक की शक्तियों और अनन्त मृत्यु के भय से लड़े। भविष्यद्वक्ता कहता है:
“हमारे ही कारण उस पर वह ताड़ना पड़ी जिससे हमें शान्ति मिले; वह हमारे अपराधों के कारण घायल किया गया और हमारे अधर्मों के कारण कुचला गया।”
इससे वह यह बताता है कि मसीह पापियों के स्थान पर उनके प्रतिनिधि और जमानती के रूप में—या यों कहें, मुख्य कर्ज़दार के रूप में—रखा गया, ताकि जो दण्ड उन पर आने चाहिए थे उन्हें वह सहे। भेद केवल इतना है कि मृत्यु की पीड़ाओं से वह रोका और जीता नहीं जा सकता था:
“यह नहीं हो सकता था कि वह मृत्यु के बन्धन में रहता।”
इसलिए यह कोई आश्चर्य नहीं कि कहा गया है कि वह नरक में उतरा, क्योंकि उसने वह मृत्यु सही जो परमेश्वर के कोप ने कुकर्मियों पर ठहराई है।
इसे और सरलता से समझने के लिए: क्या यह एक भयानक और दयनीय अथाह कुण्ड नहीं है कि मनुष्य स्वयं को परमेश्वर द्वारा त्यागा और छोड़ा हुआ अनुभव करे, उसे पुकारने पर कोई सहायता न पाए, और इसके सिवा कुछ आशा न रखे कि उसने हमें नाश करने की ठान ली है?
फिर भी हम देखते हैं कि यीशु मसीह ऐसी दशा तक पहुँचा कि पीड़ा से दबकर उसे चिल्लाना पड़ा:
“हे मेरे परमेश्वर, हे मेरे परमेश्वर, तू ने मुझे क्यों छोड़ दिया?”
कुछ लोग इसकी व्याख्या ऐसे करते हैं मानो उसने अपनी भीतरी अनुभूति से नहीं, वरन् दूसरों की धारणा के अनुसार कहा। परन्तु यह विश्वसनीय नहीं, क्योंकि स्पष्ट है कि ये शब्द उसके हृदय की गहरी कड़वाहट से निकले थे।
फिर भी इससे हम यह निष्कर्ष नहीं निकालते कि परमेश्वर कभी अपने मसीह का विरोधी या उस पर क्रोधित था। क्योंकि पिता अपने प्रिय पुत्र से, जिसमें उसने अपनी सारी प्रसन्नता बताई, कैसे क्रोधित हो सकता था? या मसीह अपनी मध्यस्थता से मनुष्यों के प्रति पिता को कैसे शान्त कर सकता था, यदि उसने पिता को अपने ही विरुद्ध भड़काया होता?
वरन् हम यह कहते हैं कि मसीह ने परमेश्वर के प्रतिशोध का भार उठाया, इस अर्थ में कि वह परमेश्वर के हाथ से मारा और पीड़ित किया गया और उन सब चिह्नों को अनुभव किया जो परमेश्वर पापियों पर प्रकट करता है जब वह उनसे क्रोधित होकर उन्हें दण्ड देता है।
इसलिए सन्त हिलारी कहता है कि यीशु मसीह की मृत्यु के द्वारा हमने यह आशीष पाई है कि मृत्यु अब मिटा दी गई है। अन्य स्थानों में वह हमारे सिद्धान्त से मिलती-जुलती रीति से बोलता है, जैसे जब वह कहता है, “क्रूस, मृत्यु और नरक हमारा जीवन हैं।” फिर, “परमेश्वर का पुत्र नरक में है, परन्तु मनुष्य स्वर्ग तक उठाया गया है।”
संक्षेप में, यीशु मसीह शैतान की शक्ति, मृत्यु के भय और नरक की पीड़ाओं से लड़ा, और उन पर जय पाकर उन पर विजयी हुआ, ताकि मृत्यु में हम उन बातों से फिर न डरें जिन्हें हमारे सरदार ने मिटाकर निष्फल कर दिया है।
तीसरे दिन वह मरे हुओं में से जी उठा।
क्योंकि मसीह के क्रूस, मृत्यु और गाड़े जाने में दुर्बलता के सिवा कुछ दिखाई नहीं देता, इसलिए पूरी रीति से दृढ़ होने के लिए विश्वास को इनसे आगे बढ़ना चाहिए।
यद्यपि उसकी मृत्यु में हमें उद्धार की पूरी सिद्धि प्राप्त है—क्योंकि उसके द्वारा हम परमेश्वर से मेल-मिलाप पा चुके हैं, उसका धर्ममय न्याय पूरा हो चुका है, श्राप मिट चुका है, और जो भी दण्ड हम पर आते थे उन सबसे हम छूट चुके हैं—फिर भी पवित्रशास्त्र यह नहीं कहता कि हम उसकी मृत्यु के द्वारा जीवन की आशा के लिए उठाए गए, वरन् उसके पुनरुत्थान के द्वारा:
“उसने यीशु मसीह के मरे हुओं में से जी उठने के द्वारा हमें फिर जन्म देकर जीवित आशा के लिए बचाया।”
क्योंकि जैसे मसीह ने जी उठकर स्वयं को मृत्यु पर जयवन्त दिखाया, वैसे ही हमारी मृत्यु पर विजय उसके पुनरुत्थान में है।
सन्त पौलुस के शब्द इसे और स्पष्ट करेंगे कि इसका क्या अर्थ है:
“वह हमारे अपराधों के लिए पकड़वाया गया और हमारे धर्मी ठहरने के लिए जी उठाया गया।”
मानो वह यह कहता है कि मसीह की मृत्यु से पाप दूर किया गया, और उसके पुनरुत्थान से धार्मिकता बहाल की गई। क्योंकि यदि वह मृत्यु के आगे हार जाता, तो मरकर हमें मृत्यु से कैसे छुड़ाता? यदि वह संघर्ष में हार जाता, तो हमारे लिए विजय कैसे प्राप्त करता?
इसलिए हम अपने उद्धार के सार को मसीह की मृत्यु और पुनरुत्थान में इस प्रकार बाँटते हैं: उसकी मृत्यु के द्वारा पाप नष्ट हुआ और मृत्यु मिटाई गई; उसके पुनरुत्थान के द्वारा धार्मिकता स्थापित हुई और जीवन फिर प्रभुता में लौटा। फिर भी यह इस रीति से हुआ कि उसकी मृत्यु अपनी सामर्थ्य पुनरुत्थान के द्वारा ही रखती है।
फिर, जैसे हमने ऊपर समझाया कि हमारे शरीर का मारा जाना मसीह के क्रूस की सहभागिता पर निर्भर है, वैसे ही हमें समझना चाहिए कि उसके पुनरुत्थान से एक और संगत फल निकलता है।
क्योंकि, जैसा प्रेरित कहता है, हम उसकी मृत्यु की समानता में साथ रोपे गए हैं, ताकि उसके पुनरुत्थान के सहभागी होकर हम नए जीवन की सी चाल चलें:
“हम उसकी मृत्यु की समानता में उसके साथ जुड़ गए हैं, ताकि जैसे मसीह मरे हुओं में से जिलाया गया, वैसे ही हम भी नए जीवन की सी चाल चलें।”
इसलिए जैसे वह दूसरे स्थान पर इस बात से तर्क करता है कि हम मसीह के साथ मर चुके हैं, इसलिए हमें पृथ्वी पर के अपने अंगों को मार डालना चाहिए:
“तुम तो मर गए। इसलिए अपने उन अंगों को मार डालो जो पृथ्वी पर हैं,”
—कुलुस्सियों 3:3, 5
वैसे ही इस बात से कि हम मसीह के साथ जी उठे हैं, वह यह निष्कर्ष निकालता है कि हमें स्वर्गीय बातों की खोज करनी चाहिए:
“यदि तुम मसीह के साथ जिलाए गए हो, तो ऊपर की वस्तुओं की खोज में रहो।”
इन शब्दों से वह न केवल हमें जी उठे हुए मसीह के उदाहरण के अनुसार नए जीवन के लिए उभारता है, वरन् यह भी सिखाता है कि मसीह ही की सामर्थ्य से हम धार्मिकता के लिए नया जन्म पाते हैं।
इस पुनरुत्थान से हमें तीसरा लाभ मिलता है। इसे अपने पुनरुत्थान के बन्धक के रूप में पाकर हम अपने पुनरुत्थान के विषय में और अधिक निश्चित हो जाते हैं, क्योंकि मसीह का पुनरुत्थान उसकी नींव और सार है:
“मसीह मरे हुओं में से जी उठा है और जो सो गए हैं उनमें पहला फल हुआ।”
हमें प्रसंगवश यह भी ध्यान देना चाहिए कि कहा गया है कि वह मरे हुओं में से जी उठा। इससे उसकी मृत्यु और पुनरुत्थान दोनों की वास्तविकता प्रकट होती है। मानो विश्वास-वचन कहता है कि उसने वही मृत्यु सही जो अन्य मनुष्य सहते हैं, और उसी देह में अमरता पाई जिसे उसने नश्वर रूप में धारण किया था।
वह स्वर्ग पर चढ़ गया और सर्वशक्तिमान परमेश्वर पिता के दाहिने हाथ बैठा है।
यद्यपि मसीह ने अपने पुनरुत्थान से ही अपनी महिमा और सामर्थ्य प्रकट करना आरम्भ कर दिया था, और नश्वर स्वभाव की दीनता तथा क्रूस की लज्जा को उतार दिया था, फिर भी उसने अपने राज्य को वास्तव में तब ऊँचा किया जब वह स्वर्ग पर चढ़ गया। प्रेरित यह दिखाता है जब वह कहता है:
“वह सब स्वर्गों से ऊपर चढ़ गया, कि सब कुछ को परिपूर्ण करे।”
क्योंकि हम देखते हैं कि तब उसने अपनी आत्मा के अनुग्रह कितनी अधिकता से उँडेले, अपनी प्रभुता को कितना बढ़ाया, और अपने लोगों की सहायता करने तथा अपने शत्रुओं को गिराने, दोनों में अपनी सामर्थ्य कितनी अधिक प्रकट की।
इसलिए जब वह स्वर्ग में उठा लिया गया, तब उसने अपनी देह की उपस्थिति हमारी आँखों से हटा ली, पर इसलिए नहीं कि वह उन विश्वासियों की सहायता करना छोड़ दे जिन्हें अभी पृथ्वी पर यात्रा करनी है। वरन् इसलिए कि पहले से अधिक निकट सामर्थ्य से संसार पर शासन करे।
वास्तव में, यह प्रतिज्ञा कि वह युग के अन्त तक हमारे साथ रहेगा, इसी स्वर्गारोहण के द्वारा पूरी हुई:
“देखो, मैं जगत के अन्त तक सदैव तुम्हारे संग हूँ।” —मत्ती 28:20
क्योंकि जैसे उसकी देह सब स्वर्गों से ऊपर उठाई गई, वैसे ही उसकी सामर्थ्य और प्रभाव स्वर्ग और पृथ्वी की हर सीमा के पार फैल गए।
इसलिए तुरन्त जोड़ा गया है कि वह पिता के दाहिने हाथ बैठा है। यह तुलना राजाओं से ली गई है, जिनके नियुक्त किए हुए शासक राज्य का प्रबन्ध सौंपे जाने के बाद उनके पास बैठाए जाते हैं।
इस प्रकार मसीह, जिसे पिता ने ऊँचा करना चाहा और जिसके हाथ से अपना शासन चलाना चाहा, पिता के दाहिने हाथ बैठा कहा जाता है। इस कथन से हमें समझना चाहिए कि वह स्वर्ग और पृथ्वी का प्रभु ठहराया गया और विधिपूर्वक अपने राज्य का अधिकारी हुआ—केवल एक बार उसे ग्रहण करके नहीं, वरन् उसे तब तक थामे रहकर जब तक वह न्याय के दिन उतर न आए।
क्योंकि प्रेरित इसे ऐसे ही समझाता है जब वह कहता है:
“पिता ने उसे अपने दाहिने हाथ पर बैठाया, सब प्रधानता, अधिकार, सामर्थ्य, प्रभुता और हर एक नाम के ऊपर जो लिया जाता है, न केवल इस युग में वरन् आनेवाले युग में भी। उसने सब कुछ उसके पाँवों तले कर दिया और उसे सब वस्तुओं पर सिर ठहराकर कलीसिया को दे दिया।”
तो हम देखते हैं कि यीशु मसीह के बैठे होने का क्या अर्थ है: कि स्वर्गीय और पार्थिव सब प्राणी उसकी महिमा का आदर करते हैं, उसके हाथ से शासित होते हैं, उसकी इच्छा मानते हैं और उसकी सामर्थ्य के अधीन हैं।
प्रेरित जब इसका इतनी बार उल्लेख करते हैं, तब उनका अभिप्राय इसके सिवा और कुछ नहीं कि सब कुछ उसके अधिकार में कर दिया गया है। इसलिए जो समझते हैं कि इस शब्द का अर्थ केवल उस आनन्द से है जिसमें यीशु मसीह ग्रहण किया गया, वे भूल में हैं।
और इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता कि सन्त स्तिफनुस प्रेरितों के काम में गवाही देता है कि उसने उसे खड़ा देखा:
“मैं स्वर्ग को खुला हुआ और मनुष्य के पुत्र को परमेश्वर के दाहिने हाथ खड़ा देखता हूँ।”
क्योंकि यहाँ प्रश्न उसकी देह की मुद्रा का नहीं, वरन् उसके शासन की महिमा का है। इसलिए बैठना स्वर्गीय सिंहासन पर अध्यक्षता करने के सिवा और कुछ नहीं दर्शाता।
इससे हमारे विश्वास को कई लाभ मिलते हैं। पहला, हम समझते हैं कि प्रभु यीशु ने स्वर्गारोहण के द्वारा हमारे लिए वह मार्ग खोल दिया जिसे आदम ने बन्द कर दिया था। क्योंकि चूँकि वह हमारी देह में और मानो हमारे नाम से वहाँ प्रविष्ट हुआ, इसलिए, जैसा प्रेरित कहता है, यह निष्कर्ष निकलता है कि हम पहले ही किसी सीमा तक उसके साथ स्वर्गीय स्थानों में बैठे हैं:
“परमेश्वर ने हमें साथ ही जिलाया और यीशु मसीह में स्वर्गीय स्थानों में साथ ही बैठाया।”
क्योंकि हमारे पास स्वर्ग की केवल कोरी आशा नहीं है, वरन् हम उसे अपने सिर में पहले ही पाए हुए हैं।
फिर, हम स्वीकार करते हैं कि उसका पिता के साथ निवास करना हमारे बड़े लाभ का है। हाथ से न बने पवित्रस्थान में प्रवेश करके वह वहाँ निरन्तर हमारे सहायक और मध्यस्थ के रूप में उपस्थित होता है:
“मसीह स्वर्ग ही में प्रविष्ट हुआ, ताकि अब हमारे लिए परमेश्वर के सामने दिखाई दे।”
वह पिता की दृष्टि को अपनी धार्मिकता की ओर इस प्रकार फेर देता है कि उसे हमारे पापों के दर्शन से हटा देता है। वह पिता के हृदय को हमारे प्रति इस प्रकार मिला देता है कि अपनी मध्यस्थता से हमें उसके सिंहासन तक पहुँच देता है, हमारे लिए अनुग्रह और कृपा तैयार करता है, और उस सिंहासन को हमारे लिए भयानक नहीं रहने देता, जैसा वह सब पापियों के लिए होना ही है।
तीसरा, इस अनुच्छेद में हम यीशु मसीह की उस सामर्थ्य को पकड़ते हैं जिसमें हमारा बल और शक्ति, हमारी सहायता, और नरक पर हमारी जय स्थित है। क्योंकि जब वह स्वर्ग पर चढ़ा, तब उसने अपने शत्रुओं को बन्दी बनाकर चलाया और उन्हें लूटकर अपने लोगों को धनी किया, और प्रतिदिन उन्हें आत्मिक अनुग्रहों से धनी करता चला जाता है:
“उसने ऊँचे पर चढ़कर बन्दियों को बन्धुआई में किया और मनुष्यों को दान दिए।”
इसलिए वह ऊँचे पर इसलिए बैठा है कि वहाँ से अपनी सामर्थ्य हम पर उँडेलकर हमें आत्मिक जीवन दे और अपनी आत्मा से हमें पवित्र करे; अपनी कलीसिया को बहुत से बहुमूल्य वरदानों से सजाए; अपनी रक्षा से उसे हर हानि से बचाए रखे; अपनी सामर्थ्य से अपने क्रूस और हमारे उद्धार के सब शत्रुओं को रोके और लज्जित करे; और अन्त में, स्वर्ग और पृथ्वी में सारा अधिकार तब तक चलाए जब तक वह अपने सब शत्रुओं को, जो हमारे भी शत्रु हैं, जीतकर नाश न कर दे और अपनी कलीसिया को सिद्ध न कर ले।
वहाँ से वह जीवितों और मरे हुओं का न्याय करने आएगा।
अभी भी यीशु मसीह के सेवकों के पास उसकी सामर्थ्य की उपस्थिति को पहचानने के लिए पर्याप्त चिह्न हैं। परन्तु क्योंकि उसका राज्य अभी देह की दीनता के नीचे ढँका और छिपा है, इसलिए विश्वास यहाँ उसकी उस दृश्य उपस्थिति की ओर निर्देशित है जिसे वह अन्तिम दिन प्रकट करेगा।
क्योंकि वह दृश्य रूप में उतरेगा, जैसा वह चढ़ता हुआ देखा गया:
“यही यीशु, जो तुम्हारे पास से स्वर्ग पर उठा लिया गया है, जैसे तुम ने उसे स्वर्ग को जाते देखा है वैसे ही वह आएगा।”
वह अपने राज्य की अवर्णनीय महिमा, अमरता के तेज, अपने ईश्वरत्व की असीम सामर्थ्य और अपने स्वर्गदूतों की मण्डली के साथ सब पर प्रकट होगा।
इसलिए हमें आज्ञा है कि उस दिन आकाश से अपने छुड़ानेवाले की प्रतीक्षा करें, जब वह भेड़ के बच्चों को बकरियों से और चुने हुओं को त्यागे हुओं से अलग करेगा। कोई भी, चाहे जीवित हो या मरा हुआ, उसके न्याय से बच न सकेगा।
तुरही की ध्वनि जगत के हर छोर से सुनाई देगी, जो सब मनुष्यों को उसके न्याय-आसन के सामने उपस्थित होने के लिए बुलाएगी, उन्हें भी जो तब जीवित होंगे और उन्हें भी जो पहले मर चुके होंगे:
“प्रभु आप ही परमेश्वर की तुरही के साथ स्वर्ग से उतरेगा।”
कुछ लोग जीवितों और मरे हुओं का अर्थ भले और बुरे लोगों से लेते हैं। वास्तव में हम देखते हैं कि प्राचीनों में से कुछ इस विषय में अनिश्चित थे कि इन शब्दों की व्याख्या कैसे की जाए। परन्तु पहला अर्थ कहीं अधिक उपयुक्त है, क्योंकि वह अधिक सरल है, कम खिंचा हुआ है और पवित्रशास्त्र के बोलने की सामान्य रीति से लिया गया है।
न ही यह प्रेरित की इस घोषणा के विरुद्ध है:
“मनुष्यों के लिए एक बार मरना नियुक्त है।”
क्योंकि यद्यपि जो लोग न्याय के आने पर नश्वर जीवन में जीवित होंगे वे स्वाभाविक क्रम में नहीं मरेंगे, फिर भी जो परिवर्तन उनका होगा वह मृत्यु से इतना मिलता-जुलता है कि उसे उचित ही मृत्यु कहा जाता है।
यह निश्चित है कि सब के सब उसमें, जिसे पवित्रशास्त्र नींद कहता है, देर तक नहीं रहेंगे, वरन् सब बदल दिए जाएँगे और रूपान्तरित होंगे:
“हम सब तो नहीं सोएँगे, परन्तु सब बदल जाएँगे, और वह भी क्षण भर में, पलक मारते ही।”
इसका क्या अर्थ है? उनका नश्वर जीवन क्षण भर में मिटा दिया जाएगा और नए स्वभाव में बदल जाएगा। कोई इस बात से इनकार नहीं कर सकता कि शरीर का ऐसा मिटाया जाना मृत्यु ही है।
तो भी यह सत्य बना रहता है कि जीवित और मरे हुए न्याय के लिए बुलाए जाएँगे। क्योंकि जो मसीह में मरे हैं वे पहले जी उठेंगे, और उसके बाद जो जीवित बचे रहेंगे वे आकाश में प्रभु से मिलेंगे, जैसा सन्त पौलुस कहता है:
“मसीह में मरे हुए पहले जी उठेंगे। तब हम जो जीवित और बचे रहेंगे, उनके साथ बादलों पर उठा लिए जाएँगे, कि हवा में प्रभु से मिलें।”
वास्तव में सम्भव है कि यह अनुच्छेद प्रेरितों के काम के 10वें अध्याय में सन्त पतरस के प्रचार से लिया गया हो:
“यही वह है जिसे परमेश्वर ने जीवितों और मरे हुओं का न्यायी ठहराया है,”
और तीमुथियुस को दिए गए सन्त पौलुस के गम्भीर आदेश से:
“मैं परमेश्वर और प्रभु यीशु मसीह को, जो जीवितों और मरे हुओं का न्याय करेगा, गवाह करके तुझे आदेश देता हूँ।”
इससे एक अनुपम सान्त्वना मिलती है: हम सुनते हैं कि न्याय करने का अधिकार उसे दिया गया है जिसने हमें न्याय चलाने में अपनी महिमा का सहभागी ठहराया है। वह तो इससे कोसों दूर है कि हमें दोषी ठहराने के लिए सिंहासन पर चढ़े।
क्योंकि ऐसा दयालु राजकुमार अपनी प्रजा को कैसे नष्ट कर सकता है? सिर अपने ही अंगों को कैसे बिखेर सकता है? सहायक उन्हें कैसे दोषी ठहरा सकता है जिनकी पैरवी का भार उसने उठाया है?
यदि प्रेरित इस पर घमण्ड करने का साहस करता है कि जब यीशु मसीह हमारे लिए मध्यस्थता करता है तब कोई दोषी नहीं ठहरा सकता:
“दण्ड देनेवाला कौन है? मसीह वह है जो मर गया, वरन् जी भी उठा, जो परमेश्वर के दाहिने हाथ है और हमारे लिए विनती करता है।”
तो यह और भी निश्चित है कि मसीह, जो हमारा मध्यस्थ है, हमें दोषी न ठहराएगा, क्योंकि उसने हमारा पक्ष अपने ऊपर लिया है और हमें सम्भाले रखने की प्रतिज्ञा की है।
यह जानना कोई छोटा आश्वासन नहीं कि हम अपने छुड़ानेवाले के न्याय-आसन को छोड़ और किसी न्याय-आसन के सामने उपस्थित न होंगे, जिससे हम उद्धार की आशा रखते हैं।
फिर, हम यहाँ सीखते हैं कि जो अब अपने सुसमाचार के द्वारा हमें अनन्त आनन्द की प्रतिज्ञा देता है, वही तब न्याय करके अपनी प्रतिज्ञा की पुष्टि करेगा। इसलिए पिता ने अपने पुत्र को न्याय करने का अधिकार देकर इस प्रकार आदर दिया है कि उसने अपने सेवकों के विवेक के लिए भी सान्त्वना जुटाई है, जो अन्यथा न्याय के भय से काँपते यदि वहाँ उनकी कोई निश्चित आशा न होती।
यह देखकर कि हमारे उद्धार का सम्पूर्ण सार और उसका हर अंश यीशु मसीह में समाया हुआ है, हमें सावधान रहना चाहिए कि उसका छोटे-से-छोटा भाग भी कहीं और न ले जाएँ।
यदि हम उद्धार खोजते हैं, तो अकेला यीशु का नाम हमें सिखाता है कि वह उसी में है। यदि हम पवित्र आत्मा के वरदान चाहते हैं, तो उनको हम उसके अभिषेक में पाएँगे। यदि हम बल चाहते हैं, तो वह उसकी प्रभुता में है।
यदि हमें पवित्रता चाहिए, तो वह उसके गर्भ में पड़ने में हमारे सामने है। यदि हम कोमलता और कृपा चाहते हैं, तो उसका जन्म उन्हें हमारे सामने रखता है, क्योंकि उसके द्वारा वह हमारे समान बना कि दया सीखे।
यदि हम छुटकारा माँगते हैं, तो उसका दुःखभोग उसे हमें देता है। उसके दोषी ठहराए जाने में हमें क्षमा प्राप्त है। यदि हम श्राप से छुटकारा चाहते हैं, तो वह आशीष हमें उसके क्रूस से मिलती है। उसके बलिदान में हमारा पाप-दण्ड चुकाया गया है, उसके लहू में शुद्धि है, और उसके नरक में उतरने के द्वारा मेल-मिलाप है।
हमारे शरीर का मारा जाना उसके गाड़े जाने में है, और नए जीवन की प्राप्ति उसके पुनरुत्थान में, जिसमें हमें अमरता की आशा भी प्राप्त है। यदि हम स्वर्गीय मीरास चाहते हैं, तो वह उसके स्वर्गारोहण से हमारे लिए निश्चित हो जाती है। यदि हम सहायता, सान्त्वना और हर भली वस्तु की बहुतायत चाहते हैं, तो वह हमारे पास उसके राज्य में है। यदि हम निश्चिन्त होकर न्याय की प्रतीक्षा करना चाहते हैं, तो यह आशीष भी हमें इसी बात में प्राप्त है कि वही हमारा न्यायी है।
संक्षेप में, क्योंकि हर भली वस्तु के भण्डार उसी में हैं, इसलिए हमें उसी से लेना चाहिए, और कहीं से नहीं।
क्योंकि जो लोग मसीह से सन्तुष्ट न होकर नाना आशाओं के बीच इधर-उधर डोलते हैं, वे सीधे मार्ग पर नहीं रहते, चाहे वे मुख्यतः उसी की ओर देखते हों, क्योंकि वे अपने विचारों का कोई भाग कहीं और मोड़ देते हैं।
परन्तु ऐसा अविश्वास हमारी समझ में आ ही नहीं सकता जब हमने उसके धन को ठीक से जान लिया हो।
तीसरा भाग
मैं पवित्र आत्मा पर विश्वास करता हूँ।
अब पवित्र आत्मा पर विश्वास आता है, और वह हमारे उद्धार की सिद्धि के लिए आवश्यक है। क्योंकि जो कहा जा चुका—कि हमें अपनी शुद्धि और पवित्रीकरण यीशु मसीह में खोजना चाहिए—वह तब तक प्राप्त नहीं हो सकता जब तक पवित्र आत्मा के द्वारा हमें दिया न जाए।
प्रेरित यही जताता है जब वह कहता है:
“तुम धोए गए, और पवित्र ठहरे, यीशु मसीह के नाम से और हमारे परमेश्वर के आत्मा के द्वारा।”
मानो वह कहता है कि यीशु मसीह के अनुग्रह हमारे विवेक पर पवित्र आत्मा के द्वारा अंकित किए जाते हैं।
इसलिए पिता और पुत्र पर विश्वास के बाद पवित्र आत्मा पर विश्वास उचित ही जोड़ा गया है, क्योंकि उसी के द्वारा ईश्वरीय दया और यीशु मसीह द्वारा प्राप्त अनुग्रह का फल हमें दिया जाता है।
जब हम आत्मा नाम सुनें, तब हमें वे सब कार्य स्मरण करने चाहिए जो पवित्रशास्त्र उसे सौंपता है, और उसकी गवाही के अनुसार उनसे निकलनेवाली आशीषें उसी से आशा रखनी चाहिए।
क्योंकि पवित्रशास्त्र सिखाता है कि परमेश्वर का हर अनुग्रह उसके आत्मा का काम है, क्योंकि उसी के द्वारा पिता अपने पुत्र में सब कुछ करता है। उसी के द्वारा वह अपनी सब रचनाओं को बनाता, थामता, जीवन देता और सुरक्षित रखता है। उसी के द्वारा वह अपने सब विश्वासियों को बुलाकर अपनी ओर खींचता, उन्हें धर्मी ठहराता और नए जीवन के लिए पवित्र करता है। वह उन्हें नाना प्रकार के अनुग्रह से धनी करता और अपनी स्वर्गीय सामर्थ्य से तब तक दृढ़ करता है जब तक वे अपने लक्ष्य तक न पहुँच जाएँ।
इसलिए जब पवित्र आत्मा इस प्रकार हममें वास करता है, तब वही अपनी ज्योति से हमें प्रकाशित करता है ताकि हम समझें कि यीशु मसीह में परमेश्वर की भलाई के कैसे प्रचुर दान हमें प्राप्त हैं। इसलिए उसे उचित ही वह कुंजी कहा जा सकता है जिससे स्वर्गीय राज्य के भण्डार हमारे लिए खोले जाते हैं, और उसका प्रकाश हमारी समझ की वह आँख है जिससे हम उन्हें देखते हैं।
इसी कारण उसे कभी-कभी बयाना और मुहर कहा जाता है, क्योंकि वह हमारे हृदयों में परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं की निश्चयता पर मुहर लगाता है। अन्य समयों में उसे सत्य का शिक्षक, ज्योति का कर्ता, और बुद्धि, ज्ञान और समझ का सोता कहा जाता है।
वही हमें हर अशुद्धता से शुद्ध करके परमेश्वर के लिए पवित्र मन्दिरों के रूप में समर्पित करता है। वह हमें अपनी पवित्रता से इस प्रकार सँवारता है कि हम परमेश्वर के निवास-स्थान बना दिए जाते हैं।
वही हमें सींचकर फलवन्त करता है ताकि हम धार्मिकता का फल लाएँ। इसी कारण उसे प्रायः जल कहा जाता है, जैसा भविष्यद्वक्ता के इन खण्डों में:
“हे सब प्यासे लोगो, जल के पास आओ।”
फिर:
“मैं प्यासी भूमि पर जल और सूखी भूमि पर धाराएँ बहाऊँगा।”
इसी से मेल खाती मसीह की वह घोषणा है जिसमें वह सब प्यासों को जीवित जल भरने के लिए बुलाता है:
“यदि कोई प्यासा हो तो मेरे पास आकर पीए।”
अन्य समयों में उसे शुद्ध और निर्मल करने की सामर्थ्य के कारण जल कहा जाता है, जैसे यहेजकेल में, जहाँ प्रभु अपने लोगों को शुद्ध करने के लिए निर्मल जल की प्रतिज्ञा करता है:
“मैं तुम पर शुद्ध जल छिड़कूँगा और तुम शुद्ध हो जाओगे।”
वही अपनी नमी से हमें तरोताज़ा करके हममें जीवन का बल भर देता है। इसी कारण उसे तेल और अभिषेक कहा जाता है।
वही हमारी पापमय अभिलाषाओं के दोषों को जलाकर भस्म करते हुए हमारे हृदयों में प्रेम की आग भड़काता है। इसी सामर्थ्य के कारण उसे आग कहा जाता है।
वही हममें ईश्वरीय जीवन फूँकता है ताकि हम अपने आप से न जीएँ, वरन् उसकी प्रेरणा और अगुवाई पर चलें।
इसलिए यदि हममें कोई भलाई है, तो वह सब उसके अनुग्रह और सामर्थ्य से उत्पन्न होती है। इसके विपरीत, जो हम अपने आप से रखते हैं वह मन के अन्धेपन और हृदय की कुटिलता के सिवा और कुछ नहीं।
अब स्पष्ट है कि हमारे विश्वास का पवित्र आत्मा की ओर निर्देशित होना कितना लाभदायक और आवश्यक है, क्योंकि उसी में हमारी आत्माओं का प्रकाश, हमारा नया जन्म, हर अनुग्रह का दिया जाना, और यहाँ तक कि यीशु मसीह से हमें मिलनेवाली सब आशीषों की सामर्थ्य भी मिलती है।
चौथा भाग
मैं पवित्र कैथोलिक कलीसिया और सन्तों की सहभागिता पर विश्वास करता हूँ।
कलीसिया के विषय में हम अन्यत्र अधिक विस्तार से बोलेंगे। अभी हम केवल उन बातों को छुएँगे जिन पर विश्वास को ध्यान देना चाहिए ताकि उससे सान्त्वना पाए।
पहली बात, हम यह जो कहते हैं, “मैं कलीसिया पर विश्वास करता हूँ” (credo Ecclesiam), और यह नहीं कि “मैं कलीसिया में विश्वास करता हूँ”, तो यह बिना कारण नहीं है। मैं जानता हूँ कि आज दूसरा कथन अधिक प्रचलित है, कि प्राचीन काल में भी वह प्रयुक्त होता था, और कि कलीसिया के इतिहास में जैसा पाठ मिलता है, उस निकेया के विश्वास-वचन में भी कहा गया है, “मैं कलीसिया में विश्वास करता हूँ।”
फिर भी प्राचीन पिताओं के लेखों से यह भी प्रकट है कि उन्होंने “कलीसिया पर विश्वास करता हूँ” वाले कथन को, “कलीसिया में” की अपेक्षा, सहर्ष स्वीकार किया। क्योंकि सन्त कुप्रियान और सन्त आगस्तीन न केवल इसी रीति से बोलते हैं, वरन् स्पष्ट सिखाते हैं कि यदि “में” (in) उपसर्ग जोड़ दिया जाए तो यह कथन अनुचित होगा।
वे अपने मत की पुष्टि ऐसे कारण से करते हैं जो तुच्छ नहीं है। हम गवाही देते हैं कि हम परमेश्वर में विश्वास करते हैं, क्योंकि हमारा हृदय उस पर सत्य जानकर भरोसा रखता है और हमारा भरोसा उसी में टिकता है। यह कलीसिया पर उससे अधिक शोभा नहीं देता जितना पापों की क्षमा या शरीर के पुनरुत्थान पर।
इसलिए, यद्यपि मैं शब्दों पर विवाद करना नहीं चाहता, फिर भी मैं उसी कथन का अनुसरण करना चाहता हूँ जो बात को ठीक-ठीक स्पष्ट करता है, बजाय इसके कि ऐसी बोलियों का दिखावा करूँ जो अनावश्यक अस्पष्टता लाती हैं।
अब हमें वह स्मरण करना चाहिए जो हमने पहले देखा: अब तक हमारे उद्धार का सार, नींव और कारण हमें दिखाया गया है; अब उसका प्रभाव आता है।
क्योंकि जो व्यक्ति परमेश्वर की सामर्थ्य और उसकी पितृवत् भलाई, मसीह की धार्मिकता और पवित्र आत्मा की सामर्थ्य को समझता है, उसके पास अपने उद्धार का कारण है। परन्तु वह तब तक यह नहीं देखता कि मनुष्यों में उद्धार कैसे पूरा होता है जब तक वह कलीसिया, पापों की क्षमा और अनन्त जीवन तक आगे न बढ़े।
इसलिए यह सिखाए जाने के बाद कि परमेश्वर जीवन का कर्ता है, हम इससे उचित क्रम में आगे बढ़कर उस कार्य को स्वीकार करते हैं जो वह हममें पूरा करता है।
पहले, कलीसिया यहाँ विश्वास के अनुच्छेद के रूप में हमारे सामने रखी गई है, ताकि हम विश्वास करें कि मसीहियों की सारी मण्डली विश्वास के बन्धन से जुड़कर एक प्रजा में इकट्ठी की गई है, जिसका अधिपति और सेनापति प्रभु यीशु है। वास्तव में वह एक देह के रूप में एक है जिसका सिर मसीह है:
“कलीसिया उसकी देह है, उसकी परिपूर्णता जो सब में सब कुछ पूरा करता है।”
क्योंकि परमेश्वर ने अपने सब लोगों को अनादिकाल से मसीह में चुना, ताकि उन्हें अपने राज्य में इकट्ठा करके एक करे।
हमारे लिए कलीसिया पर विश्वास करना कितना आवश्यक है, यह इससे प्रकट है: अमर जीवन के लिए नया जन्म पाने को कलीसिया को हमें वैसे गर्भ में धारण करना होगा जैसे माता अपने बच्चों को; और सुरक्षित रहने के लिए उसे हमें अपनी गोद में थामे रखना और पालना होगा।
क्योंकि वह हम सब की माता है:
“ऊपर की यरूशलेम स्वतन्त्र है, और वह हम सब की माता है।”
हमारे प्रभु ने अपने अनुग्रह के सब भण्डार उसे सौंप दिए हैं ताकि वह उनकी रखवाली करे और अपनी सेवकाई के द्वारा उन्हें बाँटे।
इसलिए यदि हम परमेश्वर के राज्य में प्रवेश चाहते हैं, तो हमें विश्वास से कलीसिया को स्वीकार करना चाहिए। इसका अर्थ केवल चुने हुओं की संख्या को समझ में सोच लेना नहीं, वरन् कलीसिया की ऐसी एकता को मानना है कि हमें इसमें सन्देह न रहे कि हम उसमें सम्मिलित किए जा चुके हैं।
क्योंकि हमारे लिए स्वर्गीय मीरास की कोई आशा तब तक नहीं हो सकती जब तक हम पहले उसके सब अंगों की इस सहभागिता के द्वारा यीशु मसीह अपने सिर से जुड़ न जाएँ, क्योंकि पवित्रशास्त्र घोषणा करता है कि कलीसिया की इस एकता के बाहर कोई उद्धार नहीं।
क्योंकि उन भविष्यद्वाणियों को, जो घोषणा करती हैं कि उद्धार सिय्योन और यरूशलेम में मिलेगा, हमें इसी अर्थ में समझना चाहिए:
“सिय्योन पर्वत और यरूशलेम में छुटकारा होगा।”
इसलिए जब प्रभु कुछ लोगों पर अनन्त मृत्यु की आज्ञा सुनाना चाहता है, तब वह कहता है:
“वे मेरी प्रजा की सभा में न होंगे, और न इस्राएल के घराने की सूची में लिखे जाएँगे।”
फिर, इस सहभागिता को कैथोलिक, अर्थात् सार्वभौमिक, इसलिए कहा जाता है कि दो या तीन कलीसियाएँ नहीं हैं। वरन् परमेश्वर के सब चुने हुए लोग मसीह में इस प्रकार एक किए और जोड़े गए हैं कि जैसे वे एक सिर पर निर्भर हैं, वैसे ही वे एक देह में सम्मिलित हैं, और सच्चे अंगों के समान एक-दूसरे को सम्भालते हैं।
वास्तव में वे सब इसलिए एक किए गए हैं कि वे एक ही विश्वास, आशा और प्रेम में परमेश्वर के एक ही आत्मा से जीवित हैं, और न केवल एक ही मीरास के लिए बुलाए गए हैं, वरन् परमेश्वर और यीशु मसीह के साथ एक ही सहभागिता के लिए भी।
कलीसिया को पवित्र भी कहा जाता है। क्योंकि जितनों को परमेश्वर के विधान ने उसमें सम्मिलित होने के लिए चुना है, वे सब आत्मिक नया जन्म के द्वारा परमेश्वर से पवित्र किए जाते हैं।
इसलिए सन्त पौलुस परमेश्वर की दया का यह क्रम रखता है:
“जिन्हें उसने पहले से ठहराया, उन्हें बुलाया भी; जिन्हें बुलाया, उन्हें धर्मी भी ठहराया; और जिन्हें धर्मी ठहराया, उन्हें महिमा भी दी।”
इस प्रकार हमारी बुलाहट और हमारा धर्मी ठहराया जाना ईश्वरीय चुनाव की गवाही के सिवा और कुछ नहीं, क्योंकि प्रभु उन लोगों को अपनी कलीसिया की सहभागिता में लाता है जिन्हें उसने उनके जन्म से पहले ही ठहरा रखा था।
इसी कारण पवित्रशास्त्र प्रायः कलीसिया का केवल उन्हीं को मानता है जिनमें प्रभु ने इस प्रकार अपना चुनाव प्रकट किया है। क्योंकि उचित है कि परमेश्वर की सन्तानें हमारे सामने वैसे वर्णित की जाएँ जैसा हमारी समझ ग्रहण कर सकती है: अर्थात् कि वे परमेश्वर के आत्मा की अगुवाई में चलती हैं।
फिर भी हमें ध्यान से विचार करना चाहिए कि कलीसिया में किस प्रकार की पवित्रता है। क्योंकि यदि हम किसी कलीसिया को तब तक न मानें जब तक वह आदि से अन्त तक सिद्ध न हो, तो हमें कोई मिलेगी ही नहीं।
सन्त पौलुस जो कहता है वह वास्तव में सच है:
“यीशु मसीह ने कलीसिया के लिए अपने आप को दे दिया, कि उसे पवित्र करे, और जीवन के वचन के द्वारा जल के स्नान से शुद्ध करके, उसे अपने लिए एक तेजोमय दुल्हन के रूप में खड़ी करे, जिसमें न कलंक हो न झुर्री।”
परन्तु यह कथन भी कम सच नहीं: प्रभु दिन-प्रतिदिन उसकी झुर्रियाँ मिटाने और उसके कलंक धोने में लगा है। इससे निष्कर्ष निकलता है कि उसकी पवित्रता अभी सिद्ध नहीं हुई।
इसलिए कलीसिया इस प्रकार पवित्र है कि वह प्रतिदिन आगे बढ़ती है पर अभी सिद्धता तक नहीं पहुँची। वह प्रतिदिन आगे चलती है पर पवित्रता के लक्ष्य तक अभी नहीं पहुँची, जैसा अन्यत्र और अधिक पूर्णता से समझाया जाएगा।
इसलिए जब भविष्यद्वक्ता पहले से कहते हैं कि यरूशलेम पवित्र होगा, परदेशी फिर उसमें से होकर न जाएँगे, और परमेश्वर का मन्दिर ऐसा पवित्र होगा कि कोई अशुद्ध उसमें प्रवेश न करेगा, तब हमें इसे ऐसा नहीं समझना चाहिए मानो कलीसिया के अंगों पर कोई दाग़ रहा ही नहीं।
वरन् इसलिए कि विश्वासी सच्चे मन से पूर्ण पवित्रता और शुद्धता की अभिलाषा रखते हैं, वह सिद्धता जो उनमें अभी नहीं है, परमेश्वर की भलाई के द्वारा उन्हें गिनी जाती है।
यद्यपि प्रायः ऐसा होता है कि मनुष्यों के बीच इस पवित्रीकरण के कोई बड़े चिह्न दिखाई नहीं देते, फिर भी हमें दृढ़ता से मानना चाहिए कि जगत के आरम्भ से कोई ऐसा युग नहीं रहा जिसमें प्रभु की कलीसिया न रही हो, और न कभी ऐसा युग होगा जिसमें उसकी कलीसिया न हो।
क्योंकि यद्यपि जगत के आरम्भ से सारी मानव-जाति आदम के पाप से भ्रष्ट और बिगड़ी हुई है, फिर भी परमेश्वर ने इस भ्रष्ट पिण्ड में से आदर के पात्रों को पवित्र करना कभी नहीं छोड़ा, ताकि कोई युग उसकी दया के अनुभव से रहित न रहे।
उसने इसकी गवाही कुछ प्रतिज्ञाओं के द्वारा दी है, जैसे जब वह कहता है:
“मैं ने अपने चुने हुए के साथ वाचा बाँधी है, मैं ने अपने दास दाऊद से शपथ खाई है: मैं तेरे वंश को सदा बनाए रखूँगा और तेरे सिंहासन को पीढ़ी-पीढ़ी स्थिर रखूँगा।”
फिर:
“यहोवा ने सिय्योन को चुना है; उसने उसे अपने निवास के लिए चाहा है। यह सदा के लिए मेरा विश्रामस्थान है।”
फिर:
“यहोवा जो दिन को प्रकाश देने के लिए सूर्य और रात को प्रकाश देने के लिए चन्द्रमा ठहराता है, यों कहता है: जब यह ठहराई हुई व्यवस्था टल जाएगी, तभी इस्राएल का वंश भी बन्द हो जाएगा—उससे पहले नहीं।”
सन्तों की सहभागिता के विषय में जो अनुच्छेद आगे आता है, प्राचीन लोग उसे प्रायः छोड़ देते थे। फिर भी उसे तुच्छ नहीं जानना चाहिए। क्योंकि जैसे हमारे लिए कलीसिया पर विश्वास करना आवश्यक है, वैसे ही यह जानना भी अनावश्यक नहीं कि हम कलीसिया को क्या मानकर विश्वास करते हैं।
इसलिए मैं इस वाक्यांश को कलीसिया की व्याख्या समझता हूँ, जो हमें उसका स्वभाव और उचित स्वरूप दिखाता है: अर्थात् कि जिस एकता में यीशु मसीह अपने विश्वासियों को जोड़ता है वह इतनी महत्त्वपूर्ण है कि वे हर भली वस्तु में आपस में सहभागी हैं।
फिर भी इस कथन से हमें यह नहीं समझना चाहिए कि हर एक के पास भिन्न-भिन्न अनुग्रह नहीं हैं, क्योंकि सन्त पौलुस कहता है:
“वरदान तो भिन्न-भिन्न हैं, परन्तु आत्मा एक ही है।”
न ही हमें यह मानना चाहिए कि वह नागरिक व्यवस्था, जिसके अनुसार हर एक अपनी सम्पत्ति अलग रखता है, उलट दी जानी चाहिए। क्योंकि इस नश्वर जीवन में आवश्यक है कि मनुष्यों में शान्ति और चैन बनाए रखने के लिए अधिकार और सम्पत्ति अलग-अलग बनी रहे।
वरन् हम ऐसी सहभागिता को समझते हैं जो सम्पत्ति और अनुग्रहों के इस बँटवारे के साथ निभ सके। क्योंकि जो कुछ किसी ने परमेश्वर के हाथ से पाया है, उसमें उसे दूसरों को भी सहभागी बनाना चाहिए, यद्यपि वह विशेष रूप से उसे दिया गया था, उन्हें नहीं।
एक देह के अंगों में भिन्न-भिन्न क्षमताएँ और अलग-अलग कार्य होते हैं, फिर भी ऐसी एकता है कि हर अंग दूसरों की सेवा करता है। क्योंकि, जैसा सन्त पौलुस कुरिन्थियों और इफिसियों को सिखाता है, हर एक ने जो अनुग्रह पाया है उसे कलीसिया की सामान्य भलाई की ओर निर्देशित और समर्पित किया जाना चाहिए, क्योंकि हमारा प्रभु चाहता है कि वह इसी रीति से बाँटा जाए।
इसी प्रकार, अन्यत्र वह तर्क करता है कि बुलाहटें भिन्न-भिन्न हैं, क्योंकि जो सहभागिता हमारी एक-दूसरे से है उसे अनुग्रहों की विविधता के अनुसार व्यवस्थित होना चाहिए।
अब, क्योंकि हम पवित्र कलीसिया पर उसकी सहभागिता के द्वारा विश्वास करते हैं, और मसीह में अपने विश्वास के द्वारा हमें भरोसा है कि हम उसके अंग हैं, इसलिए हमें विचार करना चाहिए कि इससे हमें कौन-सा फल मिलता है।
यह जानना छोटी बात नहीं कि हम कलीसिया की उस एकता में बुलाए गए हैं जिसे प्रभु परमेश्वर ने मसीह की देह और परिपूर्णता होने के लिए चुना और अलग किया है:
“कलीसिया, जो उसकी देह है, उसकी परिपूर्णता जो सब में सब कुछ पूरा करता है।”
वह यह भी है:
“सत्य का खम्भा और नींव,”
और उसकी ईश्वरीय महिमा का सदा का निवास-स्थान।
जब हमें यह निश्चयता प्राप्त है, तब हमारा उद्धार ऐसी दृढ़ नींव पर टिका है कि चाहे जगत का सारा ढाँचा हिल जाए, वह दृढ़ और अटल बना रहेगा।
पहला, वह परमेश्वर के चुनाव पर स्थापित है और जब तक उसका अनन्त विधान उलट न दिया जाए तब तक टल नहीं सकता।
फिर, हमारा उद्धार इसलिए भी पक्का होता है कि मसीह को अखण्ड रहना है, और वह अपने विश्वासियों को अपने से अलग फाड़े जाने देना उतना ही स्वीकार नहीं करेगा जितना अपने अंगों का चीरा जाना।
इसके अतिरिक्त, हम निश्चित हैं कि जब तक हम कलीसिया की गोद में बने रहते हैं, सत्य हमारे साथ बना रहता है।
अन्त में, हम समझते हैं कि वे प्रतिज्ञाएँ हमारी हैं जो घोषणा करती हैं कि परमेश्वर सदा यरूशलेम में वास करेगा और कभी उसके बीच से न हटेगा:
“परमेश्वर उसके बीच में है; वह डिगने की नहीं।”
कलीसिया की एकता की ऐसी सामर्थ्य है कि वह हमें परमेश्वर की सहभागिता में बनाए रख सकती है।
इसी प्रकार, सहभागिता शब्द हमें बड़ी सान्त्वना दे सकता है। क्योंकि चूँकि वे सब अनुग्रह जो हमारे प्रभु ने अपने अंगों को दिए हैं, जो हमारे संगी अंग भी हैं, हमारे हैं, इसलिए उनकी सब आशीषों से हमारी आशा दृढ़ होती है।
फिर, इस कलीसिया की एकता में बने रहने के लिए यह आवश्यक नहीं कि हम कलीसिया को अपनी आँखों से देखें या हाथों से छुएँ। वरन् यही बात कि हमें कलीसिया पर विश्वास करना है, यह जताती है कि जब वह हमें अदृश्य हो तब भी हमें उसे उतना ही मानना चाहिए जितना तब जब हम उसे स्पष्ट देखते।
न ही हमारा विश्वास इससे किसी प्रकार घटता है कि वह ऐसी कलीसिया को मानता है जिसे हमारी समझ ग्रहण नहीं कर सकती। क्योंकि हमें चुने हुओं और त्यागे हुओं में भेद करने की आज्ञा नहीं दी गई—यह तो केवल परमेश्वर का काम है, हमारा नहीं—वरन् अपने हृदय में यह निश्चय रखने की आज्ञा है कि वे सब जो परमेश्वर पिता की कृपा और पवित्र आत्मा की सामर्थ्य से मसीह के सहभागी हो गए हैं, परमेश्वर की निज मीरास के रूप में अलग किए गए हैं। और क्योंकि हम उनमें गिने गए हैं, इसलिए हम इस अनुग्रह के वारिस हैं।
अब दृश्य कलीसिया के विषय में बोलने का समय आ गया है, जिसे हम इन्द्रियों से ग्रहण कर सकते हैं, और यह दिखाने का कि उसके विषय में हमें क्या निर्णय बनाना चाहिए।
क्योंकि प्रभु ने अपनी कलीसिया पर कुछ चिह्न और संकेत लगा दिए हैं, जहाँ तक उसे पहचानने के लिए हमें आवश्यक है। यह सच है कि ठीक-ठीक यह जानने का अधिकार कि कौन उसका है, केवल उसी के पास है, जैसा सन्त पौलुस कहता है:
“प्रभु अपनों को जानता है।”
वास्तव में, ताकि मनुष्य का अहंकार इतना आगे न बढ़ जाए, उसने भली व्यवस्था की है कि प्रतिदिन अनुभव से हमें चेताता रहता है कि उसके गुप्त न्याय हमारी समझ से कितने ऊपर हैं।
एक ओर, जो पूरी तरह खोए हुए दिखाई देते थे और जिनसे आशा छोड़ दी गई थी, वे सही मार्ग पर लौट आते हैं। दूसरी ओर, जो दृढ़ जमे हुए प्रतीत होते थे, वे लड़खड़ा जाते हैं। केवल परमेश्वर देखता है कि कौन अन्त तक स्थिर रहेगा, जो हमारे उद्धार में मुख्य बात है।
फिर भी, क्योंकि प्रभु ने देखा कि हमारा यह जानना आवश्यक है कि किन्हें हम उसकी सन्तान मानें, इस विषय में उसने हमारी क्षमता के अनुसार अपने को ढाल लिया। चूँकि दूसरों का न्याय करने में विश्वास की निश्चयता अपेक्षित नहीं थी, इसलिए उसने प्रेम के निर्णय को उसके स्थान पर रखा। इसी निर्णय के अनुसार हमें उन सबको कलीसिया के अंग मानना चाहिए जो अपने विश्वास-अंगीकार, भक्तिमय जीवन के उदाहरण और संस्कारों में सहभागिता के द्वारा हमारे साथ उसी परमेश्वर और उसी मसीह को स्वीकार करते हैं।
इससे हम सरलता से पहचान सकते हैं कि कलीसिया कहाँ है। जहाँ कहीं हम परमेश्वर का वचन शुद्ध रीति से प्रचारित और सुना जाता तथा संस्कारों को मसीह की स्थापना के अनुसार बाँटा जाता देखें, वहाँ हमें सन्देह नहीं करना चाहिए कि कलीसिया है, क्योंकि उसने हमें जो प्रतिज्ञा दी है वह टल नहीं सकती:
“जहाँ दो या तीन मेरे नाम पर इकट्ठे होते हैं, वहाँ मैं उनके बीच में होता हूँ।”
परन्तु इस विषय के सार को ठीक से समझने के लिए हमें निम्नलिखित चरणों से होकर चलना चाहिए।
सार्वभौमिक कलीसिया वह सारी मण्डली है जो परमेश्वर के सत्य और उसके वचन की शिक्षा से सहमत है, चाहे जातियों में कितनी ही भिन्नता हो या क्षेत्रों में कितनी ही दूरी, क्योंकि वह धर्म के बन्धन से जुड़ी है।
इस सार्वभौमिक कलीसिया के अधीन हर नगर और गाँव में बँटी हुई कलीसियाएँ समाई हुई हैं। इनमें से हर एक कलीसिया की उपाधि और अधिकार रखती है।
जिन व्यक्तियों को किसी विशेष कलीसिया का अंग उनके विश्वास-अंगीकार के कारण माना जाता है, यद्यपि वे सचमुच कलीसिया के न हों, फिर भी वे तब तक उसके माने जाते हैं जब तक सार्वजनिक निर्णय से निकाल न दिए जाएँ।
यद्यपि कलीसियाओं और विशेष व्यक्तियों का न्याय भिन्न रीति से करना चाहिए। क्योंकि ऐसा हो सकता है कि हमें उन्हें भाई मानना और विश्वासी गिनना पड़े जिन्हें हम निजी रूप से उस गिनती के योग्य नहीं मानते, क्योंकि कलीसिया का सामान्य निर्णय अभी उन्हें मसीह की देह के भीतर सहता और रहने देता है।
इसलिए हम ऐसे व्यक्तियों को अपने निजी निर्णय के अनुसार कलीसिया के अंग के रूप में स्वीकृत नहीं करेंगे। फिर भी हम उन्हें परमेश्वर के लोगों के बीच वह स्थान देते रहेंगे जो उनके पास है, जब तक वह वैध रीति से उनसे छीन न लिया जाए।
परन्तु किसी मण्डली के विषय में हमें भिन्न रीति से चलना चाहिए। यदि उसमें वचन की सेवकाई है और वह उसका आदर करती है, और यदि वह संस्कारों के बाँटे जाने को बनाए रखती है, तो निःसन्देह उसे कलीसिया स्वीकार करना चाहिए, क्योंकि निश्चित है कि वचन और संस्कार निष्फल नहीं रह सकते।
इस रीति से हम सार्वभौमिक कलीसिया की एकता को सुरक्षित रखेंगे, जिसे शैतानी आत्माओं ने सदा बिखेरना चाहा है, और हम उन कलीसियाई सभाओं का अधिकार नहीं छीनेंगे जो मनुष्यों की आवश्यकताओं के लिए हर स्थान में स्थापित हैं।
हमने परमेश्वर के वचन के प्रचार और संस्कारों के बाँटे जाने को कलीसिया के चिह्न बताया है। क्योंकि ये दोनों बातें परमेश्वर की आशीष से फल लाए और फूले-फले बिना नहीं रह सकतीं।
मैं यह नहीं कहता कि जहाँ कहीं प्रचार होता है वहाँ उसका फल तुरन्त दिखाई देता है। वरन् मेरा अभिप्राय यह है कि जहाँ कहीं वचन ग्रहण किया जाता और उसे टिकने का स्थान दिया जाता है, वहाँ वह सदा कुछ प्रभाव उत्पन्न करता है।
जो भी हो, जहाँ कहीं सुसमाचार का प्रचार श्रद्धा से सुना जाता है और संस्कारों की उपेक्षा नहीं की जाती, वहाँ कम से कम उस समय के लिए कलीसिया का एक निश्चित रूप दिखाई देता है जिस पर सन्देह नहीं किया जा सकता। उसके अधिकार को तुच्छ जानना, उसकी चेतावनियों की अनसुनी करना, उसकी सम्मति ठुकराना या उसके अनुशासन का उपहास करना उचित नहीं है। उससे अलग होना या उसकी एकता तोड़ना तो और भी अनुचित है।
क्योंकि परमेश्वर अपनी कलीसिया की सहभागिता को इतना मूल्यवान ठहराता है कि जो कोई ऐसी मसीही संगति से, जिसमें उसके वचन और संस्कारों की सेवकाई है, अपने को अलग कर लेता है, उसे वह मसीही धर्म का विश्वासघाती गिनता है। वह उसके अधिकार को इतना आदर देता है कि जब उसका उल्लंघन किया जाता है, तब वह अपने ही अधिकार का उल्लंघन घोषित करता है।
इसलिए हमें ऊपर बताए गए चिह्नों को सावधानी से थामे रहना और परमेश्वर के निर्णय के अनुसार उनका मूल्य आँकना चाहिए।
क्योंकि शैतान किसी बात को पूरा करने की इतनी लगन से युक्ति नहीं रचता जितनी इन दो में से किसी एक की: या तो उन सच्चे चिह्नों को, जिनसे हम कलीसिया को पहचान सकते हैं, मिटाकर या धुँधला करके हमें उसे पहचानने के हर सच्चे साधन से वंचित कर दे; या हमें उन चिह्नों को तुच्छ जानने के लिए उकसाए ताकि वह हमें अलग करके कलीसिया की सहभागिता से विद्रोह करवा दे।
