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अध्याय चार: विश्वास के विषय में, जिसमें प्रेरितों के विश्वास-वचन की व्याख्या की गई है (भाग 3 / 6)
—रोमियों 8:9, 11
और यह ठीक ही है। क्योंकि सन्त पतरस भी साक्षी देता है कि यह मसीह का आत्मा ही था जिसके द्वारा भविष्यद्वक्ताओं ने बातें कीं:
“मसीह का आत्मा जो उनमें था, पहले से गवाही देता था।” —1 पतरस 1:11
फिर भी पवित्रशास्त्र बार-बार सिखाता है कि वह पिता का आत्मा था।
यह भेद परमेश्वर की एकता का खण्डन करना तो दूर, उलटे यह प्रमाणित करता है कि पुत्र वही परमेश्वर है जो पिता है, क्योंकि उन दोनों का एक ही आत्मा है, और यह कि आत्मा पिता और पुत्र से भिन्न तत्त्व नहीं है, क्योंकि वह उन्हीं का आत्मा है।
क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति में सम्पूर्ण ईश्वरीय स्वभाव को उस व्यक्ति के अपने विशिष्ट गुण के साथ समझना चाहिए। पिता पूर्णतः पुत्र में है और पुत्र पूर्णतः पिता में है, जैसा कि स्वयं मसीह पुष्टि करता है:
“मैं पिता में हूँ और पिता मुझ में है।”
इसलिए कलीसिया के सब शिक्षक व्यक्तियों के बीच सार-तत्त्व का कोई भेद स्वीकार नहीं करते। इसी अर्थ में हमें प्राचीन लोगों के उन कथनों का मेल बैठाना चाहिए जो अन्यथा परस्पर विरोधी प्रतीत हो सकते हैं। क्योंकि वे कभी तो पिता को पुत्र का आदि कहते हैं, और कभी यह सिखाते हैं कि पुत्र अपनी ईश्वरता और सार-तत्त्व अपने ही से रखता है।
सबेलियसवादियों की यह कुतर्कपूर्ण बात कि परमेश्वर को पिता, पुत्र या आत्मा केवल उसी रीति से कहा जाता है जैसे उसे सामर्थी, भला, बुद्धिमान और दयालु कहा जाता है, सरलता से खण्डित हो जाती है। क्योंकि ये पिछले नाम तो उपाधियाँ हैं जो दिखाती हैं कि परमेश्वर हमारे प्रति क्या है, जबकि पहले नाम ऐसे संज्ञा-शब्द हैं जो घोषित करते हैं कि वह अपने आप में क्या है।
फिर, परमेश्वर को आत्मा कहा जाता है, इस कारण हमें आत्मा को पिता और पुत्र के साथ गड्डमड्ड नहीं करना चाहिए। यह कहने में कोई विरोध नहीं कि परमेश्वर का सम्पूर्ण सार-तत्त्व आत्मिक है और इस सार-तत्त्व के भीतर पिता, पुत्र और आत्मा समाए हुए हैं। यह बात पवित्रशास्त्र में प्रकट की गई है। क्योंकि जैसे हम वहाँ सुनते हैं कि:
“परमेश्वर आत्मा है,”
वैसे ही हम यह भी सुनते हैं कि आत्मा परमेश्वर का है और परमेश्वर से निकलता है।
जो लोग झगड़ालू नहीं हैं वे स्पष्ट देख सकते हैं कि एक ही सरल ईश्वरीय सार-तत्त्व के भीतर पिता अपने वचन और अपने आत्मा के साथ समाया हुआ है। अत्यन्त हठीले लोग भी इसका विरोध नहीं कर सकते: पिता परमेश्वर है, पुत्र भी परमेश्वर है, और पवित्र आत्मा भी परमेश्वर है; फिर भी परमेश्वर केवल एक ही हो सकता है।
दूसरी ओर, पवित्रशास्त्र तीन का नाम लेता है, तीन को चिह्नित करता है और तीन में भेद करता है। इसलिए तीन भी हैं और एक भी: एक परमेश्वर, एक सार-तत्त्व। तो फिर ये तीन कौन हैं? तीन परमेश्वर या तीन सार-तत्त्व नहीं, वरन् तीन विशिष्ट गुण।
एकता और भेद दोनों को सूचित करने के लिए प्राचीन लोगों ने कहा कि एक सार-तत्त्व है और उसके भीतर तीन हाइपोस्टासिस (hypostases) हैं। लातीनियों ने अर्थ में उनसे सहमत होकर इनमें से एक शब्द को रख लिया पर दूसरे को कुछ भिन्न रीति से व्यक्त किया। क्योंकि उन्होंने कहा कि एक सार-तत्त्व और तीन व्यक्ति हैं, और इस अन्तिम शब्द से उन्होंने तदनुरूप अर्थ ही अभिप्रेत किया।
विधर्मी इस शब्दावली पर भौंकते हैं, और कुछ लोग जो सर्वथा दुष्ट नहीं हैं वे भी बड़बड़ाते हैं कि ये शब्द सार-तत्त्व और हाइपोस्टासिस मनुष्यों के गढ़े हुए हैं और पवित्रशास्त्र में कहीं नहीं मिलते। परन्तु जब वे इससे इनकार नहीं कर सकते कि एक ही ईश्वरत्व में तीन हैं, तो उन शब्दों को ठुकराना कैसा हठ है जो उसी बात को सूचित करते हैं जिसकी साक्षी पवित्रशास्त्र देता है?
वे कहते हैं कि अपरिचित शब्दों को प्रकाशित करने की अपेक्षा, जो झगड़ों और फूट के बीज बन जाते हैं, यह अधिक उचित होगा कि हम न केवल अपनी समझ को वरन् अपनी वाणी को भी पवित्रशास्त्र की सीमाओं में बाँधे रखें। क्योंकि इस प्रकार, वे कहते हैं, मनुष्य शब्दों के विवादों में मुरझाते हैं, झगड़े में सत्य खो जाता है और प्रेम नष्ट हो जाता है।
परन्तु यदि वे हर उस शब्द को अपरिचित कहें जो पवित्रशास्त्र में अक्षर-अक्षर करके नहीं मिलता, तो वे हम पर कठोर शर्त लगाते हैं, क्योंकि ऐसा करके वे हर उस उपदेश को दोषी ठहराते हैं जो शब्द-शब्द पवित्रशास्त्र से नहीं रचा गया।
परन्तु यदि वे अपरिचित शब्दों से उन शब्दों का अर्थ लेते हैं जो जिज्ञासा-वश गढ़े गए और अन्धविश्वास के साथ बचाए गए हों, जो उन्नति की अपेक्षा झगड़े की सेवा करते हों; जो बिना आवश्यकता या लाभ के प्रयोग किए गए हों; जो विश्वासियों में ठोकर उत्पन्न करते हों; या जो हमें पवित्रशास्त्र की सरलता से दूर खींच ले जा सकते हों, तो मैं उनकी इस संयमशीलता का हृदय से अनुमोदन करता हूँ।
क्योंकि मेरा विचार है कि हमें परमेश्वर के विषय में उतनी ही श्रद्धा से बोलना चाहिए जितनी श्रद्धा से हम उसकी महिमा के विषय में सोचते हैं, क्योंकि उसके विषय में जो कुछ हम अपने से सोच लेते हैं वह मूर्खता मात्र है, और जो कुछ हम अपने से कहने का यत्न करते हैं वह बेतुका है।
तथापि यहाँ हमें उचित संयम का पालन करना चाहिए। यह सच है कि हमें अपने विचारों और अपने वचनों दोनों का नियम पवित्रशास्त्र से लेना चाहिए, अपने मन की हर धारणा और अपने मुँह के हर कथन को उसी की ओर लौटाकर परखना चाहिए। परन्तु जो बातें पवित्रशास्त्र में अस्पष्ट रूप से कही गई हैं, उन्हें अधिक स्पष्ट शब्दों में समझाने से हमें कौन रोक सकता है, बशर्ते कि हम जो कहें वह पवित्रशास्त्र के सत्य को विश्वासयोग्यता से व्यक्त करे, यह अत्यधिक स्वतन्त्रता के बिना किया जाए, और ऐसा करने का उचित कारण हो? इसके उदाहरण हमारे सामने प्रतिदिन हैं।
और जब यह प्रमाणित हो जाए कि कलीसिया को त्रिएकता और व्यक्ति शब्दों का प्रयोग करने को विवश होना पड़ा, तब हम क्या कहें? यदि कोई उन्हें नवीनता के बहाने ठुकरा दे, तो क्या हम यह न समझें कि वह सत्य की ज्योति को सह नहीं सकता, क्योंकि उनमें वह केवल इतना ही दोष ठहरा सकता है कि वे पवित्रशास्त्र की अन्तर्वस्तु की अधिक स्पष्ट व्याख्या हैं?
शब्दों की ऐसी नवीनता—यदि इसे नवीनता कहना ही पड़े—विशेष रूप से तब आवश्यक होती है जब सत्य की रक्षा उन निन्दकों के विरुद्ध करनी पड़े जो टालमटोल से उसे उलट देते हैं। आज हम इसका अनुभव आवश्यकता से अधिक करते हैं, क्योंकि सत्य के शत्रुओं को दोषी ठहराना बड़ा कठिन होता है; वे साँपों की नाईं इधर-उधर बल खाकर बच निकलने का कोई न कोई मार्ग निकाल ही लेते हैं, जब तक कि उन्हें निकट से दबाकर, मानो शिकंजे में, पकड़ न लिया जाए।
इसी प्रकार प्राचीन लोग, भ्रष्ट शिक्षाओं से व्याकुल होकर, विवश हुए कि जो वे मानते थे उसे स्पष्ट और सीधे शब्दों में समझाएँ, ताकि दुष्टों के लिए कोई शरण-स्थान न रहे, जिनके लिए वाणी की हर अस्पष्टता अपनी भूलों को छिपाने की आड़ बन जाती।
आरियस ने मान लिया कि यीशु मसीह परमेश्वर है और परमेश्वर का पुत्र है, क्योंकि वह पवित्रशास्त्र की इतनी साक्षियों का सामना नहीं कर सका। फिर, मानो उसने अपना कर्तव्य पूरा कर दिया हो, उसने दूसरों से सहमत होने का ढोंग किया। फिर भी इस बीच वह कहता रहा कि मसीह सृजा गया था और अन्य प्राणियों के समान उसका भी एक आदि था।
प्राचीन पिताओं ने इस विद्वेषपूर्ण टालमटोल को अन्धकार से बाहर निकालने के लिए और आगे बढ़कर घोषणा की कि मसीह परमेश्वर का अनादि पुत्र है और अपने पिता के समान तत्त्व का है। तब आरियसवादियों की अभक्ति खुलकर प्रकट हो गई, क्योंकि वे इस शिक्षा को सह न सके वरन् इससे घृणा करते थे।
यदि आरम्भ ही से उन्होंने सच्चाई से यीशु मसीह को परमेश्वर माना होता, तो वे उसके ईश्वरीय सार-तत्त्व का इनकार न करते। तो फिर कौन इन भले पिताओं पर झगड़ों और फूट के लिए उत्सुक होने का दोष लगाने का साहस करेगा, क्योंकि वे एक छोटे-से शब्द पर इतने गहरे विवाद में पड़ गए, यहाँ तक कि कलीसिया की शान्ति भंग हुई? क्योंकि उसी छोटे-से शब्द ने सच्चे मसीहियों और विधर्मियों का भेद प्रकट कर दिया।
फिर सबेलियस उठा, और उसने घोषणा की कि पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा शब्द कुछ महत्त्व नहीं रखते, और परमेश्वर की अन्य उपाधियों के अर्थ और महत्त्व के सिवा उनका कोई अपना अर्थ या तात्पर्य नहीं है। यदि कोई उससे विवाद करता, तो वह मान लेता कि पिता परमेश्वर है, पुत्र भी, और पवित्र आत्मा भी। परन्तु बाद में उसने बच निकलने का मार्ग ढूँढ़ लिया, यह कहकर कि उसने इससे अधिक कुछ नहीं माना है जितना कि यदि वह परमेश्वर को भला, बुद्धिमान, सामर्थी आदि कहता। इस प्रकार वह अपनी पुरानी रट पर लौट आया: कि पिता ही पुत्र था और पुत्र ही पवित्र आत्मा था, बिना किसी भेद के।
उस समय जिन्हें परमेश्वर के आदर की चिन्ता थी, उन्होंने उसकी दुष्टता को उलटने के लिए उसका विरोध किया, और दिखाया कि एक ही परमेश्वर में तीन विशिष्ट गुणों को मानना आवश्यक है। उसकी कुतर्कों और टेढ़ी चतुराई के विरुद्ध स्पष्ट और प्रत्यक्ष सत्य से अपने को सज्जित करने के लिए उन्होंने पुष्टि की कि एक ही परमेश्वर में तीन व्यक्ति स्थित हैं—या, जो उसी के बराबर है, कि एक ही ईश्वरीय सार-तत्त्व के भीतर व्यक्तियों की त्रिएकता है।
यदि, इसलिए, ये शब्द उतावली से नहीं गढ़े गए थे, तो हमें सावधान रहना चाहिए कि उन्हें दोषी ठहराकर हम ही उतावलेपन के दोषी न ठहरें। मैं तो प्रसन्नता से उन्हें गाड़ देता, बशर्ते कि यह विश्वास सारे संसार में प्रबल होता: कि पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा एक ही परमेश्वर हैं; कि तौभी पुत्र पिता नहीं है, और न आत्मा पुत्र है; और कि विशिष्ट गुणों का भेद है।
वस्तुतः प्रेरित ने हाइपोस्टासिस (hypostasis) शब्द उसी अर्थ में प्रयोग किया है, जैसा मुझे प्रतीत होता है, जिसमें प्राचीन लोगों ने उसे प्रयोग किया, जब वह पुत्र को कहता है:
“उसके पिता परमेश्वर के हाइपोस्टासिस की सटीक छाप।” —इब्रानियों 1:3
क्योंकि मैं उनसे सहमत नहीं हूँ जो इस स्थल में हाइपोस्टासिस (hypostasis) का अर्थ सार-तत्त्व समझते हैं, और इसकी व्याख्या ऐसे करते हैं मानो मसीह ने अपने भीतर अपने पिता का रूप वैसे धारण किया हो जैसे मोम मुहर की आकृति धारण करता है। वरन् मेरा विश्वास है कि प्रेरित का अर्थ यह है: यद्यपि पिता का अपना भिन्न विशिष्ट गुण है, तौभी उसने अपने आपको अपने पुत्र में इतने जीवन्त रूप से व्यक्त किया है कि उसका हाइपोस्टासिस ही—अर्थात् उसका व्यक्तित्व—उसमें चमकता और प्रकट होता है।
क्योंकि मसीह को उसके पिता के सार-तत्त्व की प्रतिमा कहना अनुचित होगा, क्योंकि वह उस सार-तत्त्व को पूर्णतः अपने भीतर रखता है—न अंश में, न किसी ऐसी वस्तु के रूप में जो उसे सौंपी गई हो, वरन् सिद्धता से।
शेष के विषय में, मैं इतना कठोर और अड़ियल नहीं कि मात्र शब्दों पर बड़े विवाद खड़े करूँ। क्योंकि मैं देखता हूँ कि प्राचीन पिताओं ने, यद्यपि इस विषय में बड़ी श्रद्धा से बोलने का यत्न किया, परस्पर हर बात में सहमत नहीं थे, और उनमें से कुछ सदा एक ही रीति से नहीं बोलते थे।
महासभाओं द्वारा प्रयोग की गई कितनी ही अभिव्यक्तियों और बोलने की रीतियों को सन्त हिलेरी क्षमा करता है? सन्त ऑगस्टीन कभी-कभी कितनी निडरता से बोलता है? यूनानियों और लातीनियों के बीच कितना बड़ा अन्तर है?
इस विविधता को दिखाने के लिए एक ही उदाहरण पर्याप्त होगा। यूनानी शब्द homoousios का अनुवाद करते हुए लातीनियों ने कहा कि पुत्र पिता के साथ समसत्त्व है, अर्थात् उसी तत्त्व का है। इस प्रकार उन्होंने तत्त्व (substance) को सार-तत्त्व के अर्थ में लिया। फिर भी, इसके विपरीत, सन्त हिलेरी में सौ से अधिक बार पढ़ने को मिलता है कि परमेश्वर में तीन तत्त्व (substances) हैं।
वस्तुतः सन्त हिलेरी विधर्मियों को बड़े अपराध का दोषी ठहराता है, क्योंकि उनकी ढिठाई के कारण उसे उन बातों को, जो हृदय में ही रखी जानी चाहिए थीं, मनुष्य की वाणी के जोखिमों के सामने रखना पड़ा। वह यह छिपाता नहीं कि यह अनुचित कार्य हाथ में लेना, अनुमति-रहित बातों पर साहस करना और अवर्णनीय बातों को वर्णन करना है।
थोड़ी देर बाद वह अपने आप को निर्दोष ठहराता है क्योंकि उसे नए शब्द लाने को विवश होना पड़ा। क्योंकि स्वाभाविक नामों—पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा—को रखने के बाद वह जोड़ता है कि इनसे परे जो कुछ कोई खोजे वह सारी वाक्पटुता, हमारी इन्द्रियों की समझ और हमारे मन की धारणा से परे है।
एक और स्थल में, वह गॉल के अध्यक्षों को धन्य मानता है क्योंकि उन्होंने उस प्रथम और सरलतम अंगीकार के सिवा, जो प्रेरितों के समय से सब कलीसियाओं को सौंपा गया था, कोई और अंगीकार न गढ़ा, न ग्रहण किया, न जाना भी।
इस पवित्र जन की विनम्रता हमें चेतावनी दे कि जो हमारी सारी शब्दावली पर हस्ताक्षर करना नहीं चाहते उन्हें हम अति शीघ्र दोषी न ठहराएँ। परन्तु हमें सरल लोगों को सिखाना चाहिए कि हमें किस आवश्यकता से इस रीति से बोलना पड़ता है, और उन्हें धीरे-धीरे अपनी बोलने की रीति का अभ्यस्त बनाना चाहिए। हमें उन्हें प्रेमपूर्वक यह भी चेताना चाहिए कि जब एक ओर आरियसवादियों का और दूसरी ओर सबेलियसवादियों का विरोध करना आवश्यक हो, तब वे ऐसा करने के साधनों में बाधा डालकर इस सन्देह को जन्म न दें कि वे उनकी भूलों के पक्षधर हैं।
आरियस सचमुच कहता है कि मसीह परमेश्वर है, परन्तु भीतर-भीतर कुतर्क करता है कि मसीह सृजा गया था और उसका एक आदि था। वह मानता है कि मसीह पिता के साथ एक है, पर बाद में अपने चेलों के कानों में फुसफुसाता है कि वह पिता से वैसे ही जुड़ा है जैसे अन्य विश्वासी, यद्यपि एक विशेष विशेषाधिकार के साथ। यदि हम कहें कि मसीह पिता के समान तत्त्व का है, तो हम पवित्रशास्त्र में कुछ जोड़े बिना उसके द्वेष का अवसर काट देते हैं।
सबेलियस कहता है कि पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा नाम परमेश्वर में कोई भेद सूचित नहीं करते। यदि हम कहें कि परमेश्वर में तीन हैं, तो वह चिल्लाएगा कि हम तीन परमेश्वर बनाने का यत्न कर रहे हैं। यदि हम कहें कि एक ही ईश्वरीय सार-तत्त्व के भीतर व्यक्तियों की त्रिएकता है, तो हम केवल वही समझाते हैं जो पवित्रशास्त्र सिखाता है और इस विधर्मी का मुँह बन्द कर देते हैं।
यदि कुछ लोग ऐसी सूक्ष्म शंकालुता से जकड़े हैं कि वे इन शब्दों को सह नहीं सकते, तौभी कोई इससे इनकार नहीं कर सकता कि जब हम पवित्रशास्त्र को घोषणा करते सुनते हैं कि एक ही परमेश्वर है, तब हमें ईश्वरीय सार-तत्त्व की एकता समझनी चाहिए, और जब वह तीन का नाम लेता है, तब हमें तीन विशिष्ट गुणों को स्वीकार करना चाहिए।
जब यह सरलता से और बिना छल के स्वीकार किया जाए, तब हमें शब्दों के विषय में अपने को कष्ट देने की आवश्यकता नहीं। अब आइए, इसलिए, विश्वास-वचन की व्याख्या की ओर बढ़ें।
पहला भाग
मैं सर्वशक्तिमान परमेश्वर पिता पर विश्वास करता हूँ।
हमें पहले इस बोलने की रीति पर ध्यान देना चाहिए। परमेश्वर पर विश्वास करने का अर्थ है उसे अपने परमेश्वर के रूप में ग्रहण करना और स्वीकार करना, ताकि हम उससे और उसके वचन से जुड़े रहें। यह अभिव्यक्ति इब्रानी भाषा से ली गई है, जो “परमेश्वर में विश्वास करना” को परमेश्वर की प्रतीति करने और उसे सच मानने के अर्थ में प्रयोग करती है, यद्यपि यह अभिव्यक्ति कुछ और ऊँचा अर्थ भी सूचित करती है।
अतः यहाँ विश्वासी यह अंगीकार करते हैं कि वे परमेश्वर को अपने परमेश्वर के रूप में ग्रहण और स्वीकार करते हैं, ताकि वह उन्हें अपने दास के रूप में स्वीकार करे और वे उसकी सारी प्रजा के साथ महिमा करते हुए कह सकें:
“हे परमेश्वर, तू आदि से हमारा परमेश्वर है; इसलिए हम न मरेंगे।”
क्योंकि जब वह हमारा परमेश्वर है, तो उसमें हमारे पास जीवन और उद्धार है।
इस भरोसे को पक्का करने के लिए यहाँ पिता की उपाधि जोड़ी गई है। क्योंकि अपने प्रिय पुत्र के द्वारा, जिसमें उसकी प्रसन्नता निवास करती है, परमेश्वर ने अपने आपको हमारा पिता प्रकट किया है:
“यह मेरा प्रिय पुत्र है, जिससे मैं अत्यन्त प्रसन्न हूँ।” —मत्ती 3:17
इसलिए वह हमें अपने पुत्र में ग्रहण करता है, और एक आत्मिक पारिवारिक सम्बन्ध स्थापित करता है, जिससे, जैसा सन्त पौलुस कहता है:
“स्वर्ग और पृथ्वी पर हर एक कुल का नाम रखा जाता है।”
इसलिए, जैसे ही विश्वास परमेश्वर तक पहुँचता है, वह उसे पिता के रूप में पाता है, क्योंकि वह उसे उसके पुत्र से अलग नहीं समझ सकता, जिसके द्वारा इतना बड़ा आशीर्वाद हमें पहुँचाया जाता है। यदि वह हमारा पिता है, तो हम उसकी सन्तान हैं; और यदि हम उसकी सन्तान हैं, तो हम उसके वारिस भी हैं।
हम सारी सामर्थ्य उसी को सौंपते हैं—वह व्यर्थ, सुप्त और निष्क्रिय सामर्थ्य नहीं जिसकी कल्पना सोफिस्टों ने की है, वरन् ऐसी सामर्थ्य जो प्रभाव और क्रिया से भरपूर है। क्योंकि परमेश्वर को सर्वशक्तिमान इसलिए नहीं कहा जाता कि वह सब कुछ कर तो सकता है परन्तु निष्क्रिय रहता है, वरन् इसलिए कि सब कुछ उसके हाथ में है, वह अपने विधान से स्वर्ग और पृथ्वी पर शासन करता है, और सब कुछ अपनी युक्ति और इच्छा के अनुसार करता और ठहराता है:
“हमारा परमेश्वर स्वर्ग में है; वह जो कुछ चाहता है वही करता है।” —भजन संहिता 115:3
क्योंकि यदि वह जो कुछ चाहता है वही करता है और उसके विधान से कुछ भी छिपा नहीं, तो इससे निष्कर्ष निकलता है कि सब कुछ उसकी सामर्थ्य और आज्ञा से होता है।
हम इस विषय को अभी केवल संक्षेप में छूते हैं, क्योंकि इसके विस्तृत विवेचन को हम दूसरे स्थान के लिए छोड़ते हैं। विश्वास परमेश्वर की सामर्थ्य से दोहरी सान्त्वना लेकर अपने को सज्जित करता है।
पहली, वह जानता है कि भलाई करने के लिए उसके पास पर्याप्त से भी अधिक सामर्थ्य है, क्योंकि उसकी भुजा सब कुछ पर शासन और प्रबन्ध करने तक फैली है, स्वर्ग और पृथ्वी उसकी सम्पत्ति और अधिकार-क्षेत्र हैं, और विश्वासियों के उद्धार को आगे बढ़ाने के लिए हर प्राणी उसकी इच्छा पर निर्भर है।
दूसरी, विश्वास देखता है कि उसकी सुरक्षा में पूर्ण निश्चिन्तता है, क्योंकि जो कुछ हमें हानि पहुँचा सकता है वह सब उसकी इच्छा के अधीन है; शैतान अपनी सारी युक्तियों के साथ उसकी इच्छा से मानो लगाम से रोका हुआ है; और संक्षेप में, जो कुछ भी हमारे उद्धार का विरोध कर सकता है, वह सब उसकी आज्ञा के अधीन है।
स्वर्ग और पृथ्वी का सृष्टिकर्ता
यद्यपि दुष्टों की समझ भी संसार को देखने मात्र से उसके सृष्टिकर्ता को मानने को विवश होती है, तौभी विश्वास के पास परमेश्वर को स्वर्ग और पृथ्वी के सृष्टिकर्ता के रूप में देखने की एक विशेष रीति है। इसी कारण प्रेरित कहता है:
“विश्वास ही से हम जान जाते हैं कि सारी सृष्टि की रचना परमेश्वर के वचन के द्वारा हुई।”
वस्तुतः परमेश्वर को संसार का सृष्टिकर्ता कहने का क्या अर्थ है, यह हम विश्वास के बिना नहीं समझ सकते, चाहे हम उसे अपने मन से समझते और अपने मुँह से मानते हुए कितने ही क्यों न दिखाई दें।
जब हमारी शारीरिक समझ ने सृष्टि में प्रकट परमेश्वर की सामर्थ्य की धारणा बना ली, तो वह वहीं रुक जाती है। जब वह आगे भी बढ़ती है, तब भी वह केवल उस सामर्थ्य और बुद्धि पर विचार करती है जो उसने ऐसा कार्य बनाने में लगाई। फिर वह किसी सामान्य क्रिया को समझ लेती है जिससे वह अपनी सृजी हुई वस्तुओं को बनाए रखता और चलाता है, और सब प्राणियों की गति इसी क्रिया के सिर मढ़ देती है।
परन्तु विश्वास और ऊँचा उठता है। यह समझ लेने के बाद कि परमेश्वर संसार का सृष्टिकर्ता है, वह उसे उसका सदा का पालनकर्ता और शासक भी मानता है। वह किसी अनिश्चित सार्वभौमिक गति की कल्पना नहीं करता जिससे वह सारे संसार की संरचना को और उसके सब अंशों को चलाता हो। वरन् वह उसके विशेष विधान को समझता है, जिससे वह अपनी रची हुई हर वस्तु को, यहाँ तक कि आकाश के छोटे-से-छोटे पक्षियों को भी, सँभालता, बनाए रखता और जीवन देता है।
यद्यपि यह भेद बड़ा नहीं दिखाई दे, फिर भी मानवी बुद्धि कभी उस चिन्तन तक नहीं पहुँचती जिसमें दाऊद भजन संहिता 104 में लगा है, विशेष रूप से उसके समापन में:
“हे प्रभु, सब तेरी ओर ताकते हैं कि तू उन्हें समय पर भोजन दे। जब तू उन्हें देता है, तब वे बटोर लेते हैं; जब तू अपनी मुट्ठी खोलता है, तब वे अच्छी वस्तुओं से तृप्त होते हैं। जब तू उनसे अपना मुख छिपा लेता है, तब वे घबरा जाते हैं; जब तू उनका श्वास छीन लेता है, तब वे मर जाते हैं और अपनी मिट्टी में लौट जाते हैं। फिर तू अपनी आत्मा भेजता है, और वे सृजे जाते हैं; और तू भूमि के रूप को नया कर देता है।”
ऐसी ही घोषणाएँ पूरे पवित्रशास्त्र में मिलती हैं, जैसे जब कहा गया है:
“उसी में हम जीवित रहते, चलते-फिरते और स्थिर रहते हैं।”
कि उसी के हाथ से ओस और वर्षा खेतों को सींचने के लिए बिखेरी जाती है; कि उसी की आज्ञा से आकाश लोहे के समान कठोर हो जाता है; कि उसी से शान्ति और युद्ध, जीवन और मृत्यु, ज्योति और अन्धकार, महामारी और स्वास्थ्य, बहुतायत और अकाल, और अन्य सब बातें आती हैं, जैसा उसे भाता है कि वह भलाई करके अपनी भलाई प्रकट करे या कठोरता से अपने न्याय की कठोरता को घोषित करे।
इसी से विश्वासी विवेक के लिए एक अनुपम सान्त्वना मिलती है। यदि वह कौओं के बच्चों को, जो उससे सहायता के लिए पुकारते हैं, भोजन देता है:
“वह पशुओं को और कौओं के बच्चों को, जो पुकारते हैं, आहार देता है।”
तो वह हमें, जो उसकी प्रजा और उसके झुण्ड की भेड़ें हैं, कहीं अधिक भोजन देगा।
यदि एक छोटी चिड़िया उसके ज्ञान और इच्छा के बिना भूमि पर नहीं गिरती:
“उनमें से एक भी तुम्हारे पिता के बिना भूमि पर नहीं गिरेगी।”
तो वह हमारे उद्धार की कहीं अधिक रखवाली करता और उसकी चिन्ता करता है, क्योंकि वह प्रतिज्ञा करता है कि हमें अपनी आँख की पुतली के समान सुरक्षित रखेगा:
“जो तुम्हें छूता है वह उसकी आँख की पुतली को छूता है।”
यदि मनुष्य केवल रोटी से नहीं, वरन् परमेश्वर के मुख से निकलनेवाले वचन की सामर्थ्य से जीवित रहता है:
“मनुष्य केवल रोटी से नहीं, वरन् हर एक वचन से जो परमेश्वर के मुख से निकलता है, जीवित रहेगा।”
तो उसकी यह प्रतिज्ञा कि उसकी सहायता हमें कभी न छोड़ेगी, हमारे लिए पर्याप्त होनी चाहिए, क्योंकि वही सहायता अकेली हमें सँभाल सकती है।
इसके विपरीत, जब विश्वासी बंजरपन, अकाल या महामारी देखेगा, तो वह ऐसी बातों को भाग्य के सिर मढ़ने के बजाय परमेश्वर का क्रोध पहचानेगा।
अन्त में, यह समझकर कि परमेश्वर हमारा सृष्टिकर्ता, रक्षक और पोषक है, वह यह निष्कर्ष निकालेगा कि हम उसके हैं, अपने नहीं; कि हमें उसकी इच्छा के अनुसार जीना चाहिए, अपनी इच्छा के अनुसार नहीं; और कि हमारा जीवन, अपने सब कार्यों के साथ, उसी की ओर लगा होना चाहिए, क्योंकि वह पूर्ण रूप से उसी के अनुग्रह से सँभला हुआ है।
अब, ताकि कोई इस बात से व्याकुल न हो कि सब वस्तुओं के सृजन की महिमा यहाँ विशेष रूप से पिता को सौंपी गई है, मानो इससे पुत्र और पवित्र आत्मा अलग कर दिए गए हों, हमें ध्यान देना चाहिए कि इसे उन वैयक्तिक विशिष्टताओं के अनुसार समझना है जिनकी हमने व्याख्या की है कि वे परमेश्वर में हैं।
क्योंकि जब सब वस्तुओं का आदि पिता को सौंपा जाता है, तो हम उचित रूप से कहते हैं कि वह सब कुछ करता है—परन्तु वह ऐसा अपनी बुद्धि में और अपने आत्मा के द्वारा करता है।
इसलिए यदि हम लाभ के साथ परमेश्वर को स्वर्ग और पृथ्वी का सृष्टिकर्ता और सर्वशक्तिमान पिता मानना चाहें, तो हमें उसके विधान पर निर्भर रहना चाहिए। फिर हमें अपने हृदय में उसकी कोमलता और पितृ-तुल्य भलाई पर मनन करना और अपने मुँह से उसे बड़ा मानना चाहिए। हमें ऐसे भले पिता का आदर करना, उसका भय मानना और उससे प्रेम रखना चाहिए; अपने आपको पूरी रीति से उसकी सेवा में लगा देना चाहिए; और हर वस्तु को उसके हाथ से प्रसन्नता से ग्रहण करना चाहिए, यहाँ तक कि उनको भी जो हमारे कल्याण के सबसे अधिक विपरीत दिखाई दें।
जब हम विपत्तियाँ और क्लेश सहते हैं, तब हमें समझना चाहिए कि उसका विधान उन्हें हमारे उद्धार के लिए ठहराता है। इसलिए, चाहे जो भी हो, हमें कभी सन्देह नहीं करना चाहिए कि वह हम पर अनुग्रह करता है और हमसे प्रेम रखता है, और हमारे उद्धार की उन्नति ही उसके सामने है। क्योंकि विश्वास-वचन का पहला भाग हमें ऐसे भरोसे की शिक्षा देने के लिए दिया गया था।
दूसरा भाग
और यीशु मसीह पर, जो उसका एकलौता पुत्र, हमारा प्रभु है।
हमने जो कहा है—कि यीशु मसीह हमारे विश्वास का उचित लक्ष्य और विषय है—यह इस बात से सहज ही प्रकट है कि हमारे उद्धार के सब अंग यहाँ उसी में गिने और समाए गए हैं। क्योंकि, जैसा भविष्यद्वक्ता कहता है:
“प्रभु अपनी प्रजा का उद्धार करने को निकला, अपने अभिषिक्त के संग उनका उद्धार करने को।”
क्योंकि उसने मसीह के हाथ से अपनी दया का कार्य—अर्थात् अपनी प्रजा का छुटकारा—पूरा किया।
पहले, हमारा छुड़ानेवाला यीशु कहलाता है। यह नाम उसे पिता के मुख से दिया गया, क्योंकि वह अपनी प्रजा का उद्धार करने और उन्हें पाप से छुड़ाने को भेजा गया था:
“तू उसका नाम यीशु रखना, क्योंकि वह अपने लोगों का उनके पापों से उद्धार करेगा।”
इसलिए उसी में, और कहीं नहीं, हम उद्धार पाएँगे। क्योंकि यह नाम उस पर संयोग या मनुष्य की धृष्टता से नहीं रखा गया था। और न स्वर्गदूत ने परमेश्वर की आज्ञा से बिना कारण उसे इस नाम से पुकारा। यह इसलिए किया गया कि हम कहीं और उद्धार ढूँढ़ने की हर कल्पना से खींचे जाकर उसी को अपना एकमात्र उद्धारकर्ता मानें।
इसी कारण पवित्रशास्त्र घोषणा करता है:
“स्वर्ग के नीचे मनुष्यों में और कोई दूसरा नाम नहीं दिया गया जिसके द्वारा हमें उद्धार पाना है।”
इसलिए यह नाम सब विश्वासियों को सूचित करता है कि उन्हें उद्धार केवल उसी में ढूँढ़ना चाहिए और उन्हें आश्वस्त करता है कि वे उसे वहीं पाएँगे।
मसीह की उपाधि, जिसका अर्थ अभिषिक्त है, जोड़ी गई है। यद्यपि यह उपाधि कुछ कारण से औरों के लिए भी प्रयुक्त की जा सकती है, तथापि यह उसी की है, एक विशेष अधिकार के साथ। क्योंकि प्रभु उन सब का अभिषेक करता है जिन पर वह अपने आत्मा के अनुग्रह उँडेलता है।
यह निश्चित है कि कोई विश्वासी कभी इस आत्मिक अभिषेक के बिना नहीं रहा। इसलिए इससे निष्कर्ष निकलता है कि सब विश्वासी परमेश्वर की ओर से अभिषिक्त हैं। भविष्यद्वक्ताओं का भी अपना अभिषेक था, वैसे ही राजाओं और याजकों का—केवल वह बाहरी और रीति-सम्बन्धी अभिषेक नहीं जो पुराने नियम में कहा गया है, वरन् आत्मिक अभिषेक।
क्योंकि भविष्यद्वक्ता को, जिसे मनुष्यों के बीच परमेश्वर का सन्देशवाहक होना है, पवित्र आत्मा के विशेष अनुग्रहों से सम्पन्न होना आवश्यक है। यही बात याजक के विषय में भी सच है, जो जीवते परमेश्वर का सन्देशवाहक कहलाता है, और अन्त में राजाओं के विषय में, जो पृथ्वी पर परमेश्वर का स्वरूप धारण करते हैं।
इसलिए वह भौतिक तेल जिससे भविष्यद्वक्ता, याजक और राजा अभिषिक्त किए जाते और अपने-अपने पदों के लिए पवित्र ठहराए जाते थे, कोई व्यर्थ और अर्थहीन चिह्न नहीं था, वरन् सच्चे आत्मिक अभिषेक का संस्कार था।
तथापि ऐसे सब अभिषेक हमारे उद्धारकर्ता के अभिषेक की तुलना में कुछ भी नहीं। क्योंकि अन्य सब मनुष्यों को अनुग्रह के भिन्न-भिन्न अंश उस नाप के अनुसार मिले जो परमेश्वर ने उन्हें बाँटना चाहा, परन्तु मसीह के सिवा किसी ने उन सबको एक साथ उनकी पूर्णता में नहीं पाया।
सन्त यूहन्ना, उसके विषय में जो पहले कहा गया था उसे और खुलकर समझाते हुए,
“परमेश्वर ने तुझे तेरे साथियों से अधिक आनन्द के तेल से अभिषिक्त किया है,”
कहता है:
“परमेश्वर उसे आत्मा नाप से नहीं देता।”
वह इसका कारण भी जोड़ता है:
“उसकी परिपूर्णता से हम सब ने प्राप्त किया, अर्थात् अनुग्रह पर अनुग्रह।”
इसी कारण एक और भविष्यद्वक्ता ने पहले से कहा था कि प्रभु का आत्मा उस पर ठहरेगा—केवल उसे एक ही अनुग्रह देने के लिए नहीं, वरन् उसे बुद्धि, समझ, सामर्थ्य, युक्ति, ज्ञान और भक्ति से सज्जित करने के लिए:
“यहोवा का आत्मा उस पर ठहरेगा: बुद्धि और समझ की आत्मा, युक्ति और पराक्रम की आत्मा, ज्ञान और यहोवा के भय की आत्मा।” —यशायाह 11:2
इस भविष्यद्वाणी की पुष्टि प्रत्यक्ष रूप से तब हुई जब उसके बपतिस्मा के समय आत्मा प्रकट हुआ, उस पर उतरा और उसमें ठहर गया:
“उसने परमेश्वर के आत्मा को कबूतर के समान उतरते और अपने ऊपर आते देखा।”
इसलिए यह उचित ही है कि मसीह की उपाधि हमारे उद्धारकर्ता को सर्वोपरि रूप से दी जाती है।
यह भी उचित कारण से है कि परमेश्वर के आत्मा को अभिषेक और उसके अनुग्रहों को तेल कहा जाता है। जब तक हम उससे सराबोर न हों, हम मुरझा जाते हैं, क्योंकि अपने आप में हमारे पास बंजरपन और सूखेपन के सिवा कुछ नहीं है और हम जीवन की सारी स्फूर्ति से रहित हैं।
इसलिए परमेश्वर के आत्मा ने, यीशु पर पूरी भरपूरी से उँडेले जाकर, उसकी आत्मा को अपना उचित निवास-स्थान चुना, ताकि वहाँ से वह एक ही सोते के समान हम पर बह निकले।
इस प्रकार सब विश्वासी केवल यीशु मसीह में सहभागी होने के द्वारा ही पवित्र आत्मा के तेल से अभिषिक्त होते हैं, और हर एक उसे उसी अनुपात में पाता है जिस अनुपात में उसकी उसके साथ सहभागिता है।
हमारे पास थोड़े शब्दों में हमारे उद्धारकर्ता के अभिषेक और हमारे अभिषेक का भेद है। हमारे प्रभु ने उसे अपनी आत्मिक सम्पत्ति के सब भण्डार पूर्ण रूप से और बिना नाप के दिए, जिनमें से मसीह हम में से हर एक को कुछ अंश बाँटता है। इसके अतिरिक्त, परमेश्वर ने अपना सम्पूर्ण आत्मा उस पर ठहराया, ताकि वह हमारे लिए वह सोता बने जिससे आत्मा आगे चलकर हमें बाँटे जाने के लिए निकलता है, कि हम सब उसकी परिपूर्णता से भर लें और उसके साथ सहभागी होकर उस सहभागिता के द्वारा पवित्र आत्मा के अनुग्रहों में भागी हों।
फिर, इसी अभिषेक के द्वारा यीशु मसीह पिता की ओर से राजा ठहराया गया, ताकि स्वर्ग और पृथ्वी की सारी सामर्थ्य उसके अधीन हो, जैसा भजनकार सिखाता है। वैसे ही वह याजक के रूप में पवित्र ठहराया गया कि पिता के सम्मुख मध्यस्थ का कार्य करे।
ये बातें हमारे विश्वास को दृढ़ करने और थामे रखने के लिए बड़े महत्त्व की हैं। जहाँ तक उसके राज्य का सम्बन्ध है, वह शारीरिक या सांसारिक और इसलिए नाशवान नहीं, वरन् आत्मिक है, जो मुख्यतः आनेवाले जीवन और स्वर्गीय राज्य से सम्बन्ध रखता है।
फिर, उसके राज्य करने की रीति अपने लाभ के लिए उतनी नहीं जितनी हमारे लाभ के लिए है। क्योंकि वह हमें अपनी सामर्थ्य से सज्जित और दृढ़ करता है, अपने वैभव से हमें सँवारता है, अपनी आशीषों से हमें धनवान करता है, और संक्षेप में, अपने राज्य की महिमा के द्वारा हमें उठाता और ऊँचा करता है।
उस सहभागिता के द्वारा जिससे उसने अपने आपको हमारे साथ जोड़ा है, वह हमें राजा बनाता है, शैतान, पाप और मृत्यु से युद्ध करने के लिए हमें अपनी सामर्थ्य से सज्जित करता है; अमरता की आशा में अपनी धार्मिकता के वस्त्रों से हमें पहनाता और सँवारता है; और अपनी पवित्रता की सम्पत्ति से हमें भर देता है कि हम भले कर्मों में परमेश्वर के लिए फल लाएँ।
उसके याजकीय पद से भी हमें कम लाभ नहीं मिलता। अपनी मध्यस्थता से, उस अनन्त मेल-मिलाप के बल पर जो उसने अपनी मृत्यु के द्वारा पूरा किया, वह पिता को हम पर अनुग्रहकारी बनाता है। इसके अतिरिक्त, वह हमें उस याजकपद की सहभागिता और साझेदारी में ग्रहण करता है, कि उसे अपना मध्यस्थ और बिचवई पाकर हम स्वर्गीय पिता के सम्मुख अपनी प्रार्थनाएँ, धन्यवाद, अपने आपको और जो कुछ हम से निकलता है वह सब चढ़ाएँ।
इस प्रकार, जो हमारे प्रभु ने प्राचीन काल में अपनी प्रजा से प्रतिज्ञा की थी:
“तुम मेरे लिए याजकों का राज्य होगे,”
वह आज हमारे उद्धारकर्ता में हमारे लिए पूरी होती है, जो अकेला हमें धार्मिकता के राज्य और परमेश्वर के पवित्र निवास-स्थान में प्रवेश दिलाता है।
संक्षेप में, यीशु नाम से छुटकारे और उद्धार का हमारा भरोसा पक्का होता है। मसीह की उपाधि से हमें पवित्र आत्मा की सहभागिता और उससे निकलनेवाले पवित्रीकरण के फल को ग्रहण करने का निमन्त्रण मिलता है, क्योंकि मसीह ने हमारे लिए अपने आपको पवित्र किया, जैसा वह अपने मुँह से घोषित करता है:
“उनके लिए मैं अपने आपको पवित्र करता हूँ।”
इसके बाद वह परमेश्वर का पुत्र कहलाता है—अन्य विश्वासियों के समान गोद लिए जाने और अनुग्रह से नहीं, वरन् सच्चे और स्वाभाविक पुत्र के रूप में, और इसी कारण एकलौता पुत्र, ताकि वह सब औरों से भिन्न ठहरे।
क्योंकि पवित्रशास्त्र में परमेश्वर हम सब को, जो नए जीवन के लिए नया जन्म पाए हैं, अपनी सन्तान कहलाने का आदर देता है। तौभी वह विशेष रूप से अकेले यीशु मसीह को ही सच्चे और एकलौते पुत्र की उपाधियाँ देता है। इतने भाइयों की भीड़ में वह सच्चा और एकलौता पुत्र कैसे हो सकता था, यदि वह स्वभाव से वह न रखता जो औरों के पास दान के रूप में है?
हमें उन लोगों से सहमत होने से सावधान रहना चाहिए जो यीशु मसीह को परमेश्वर का एकलौता पुत्र इस प्रकार मानते हैं कि यदि उन्हें निकट से दबाया जाए तो प्रकट हो जाता है कि वे यह केवल इसलिए मानते हैं कि वह कुँवारी के गर्भ में पवित्र आत्मा से गर्भ में आया था। मानीवादियों ने भी एक बार यह कल्पना की थी कि मनुष्य परमेश्वर के तत्त्व का है, क्योंकि पढ़ने को मिलता है कि परमेश्वर ने आदम में जीवन का श्वास फूँका।
इसके विपरीत, पवित्रशास्त्र हमें दिखाता है कि परमेश्वर का पुत्र उसका वचन है, जो सब युगों से पहले उससे उत्पन्न हुआ।
यह सच है कि ऐसे लोग अपनी भूल के पक्ष में यह साक्षी देते हैं:
“परमेश्वर ने अपने निज पुत्र को भी न रख छोड़ा।”
वे स्वर्गदूत की इस घोषणा का भी हवाला देते हैं:
“वह पवित्र जो तुझ से उत्पन्न होगा परमेश्वर का पुत्र कहलाएगा।”
परन्तु ताकि वे ऐसी आपत्तियों पर अधिक घमण्ड न करें, वे मेरे साथ विचार करें कि इन शब्दों का क्या अर्थ है।
यदि यह ठोस तर्क है कि यीशु मसीह तब परमेश्वर का पुत्र होना आरम्भ हुआ जब वह कुँवारी के गर्भ में आया, क्योंकि उसमें गर्भ धारण किए जाने पर वह परमेश्वर का पुत्र कहलाया, तो इससे यह भी निकलेगा कि वह जीवन का वचन तभी हुआ जब वह शरीर में प्रकट हुआ। क्योंकि सन्त यूहन्ना कहता है कि वह उस जीवन के वचन का प्रचार करता है जिसे मनुष्य के हाथों ने छुआ और मनुष्य की आँखों ने देखा:
“जो आदि से था, जिसे हमने सुना, जिसे हमने अपनी आँखों से देखा, और हाथों से छुआ, जो जीवन के वचन के विषय में है।”
वैसे ही, यदि वे तर्क की इसी रीति पर चलना चाहें, तो भविष्यद्वक्ता ने जो कहा है उसे वे कैसे समझाएँगे?
“हे बैतलहम, यहूदा के देश, तू यहूदा के हज़ारों में छोटा है; तौभी तुझ में से मैं एक शासक उठाऊँगा जो मेरी प्रजा इस्राएल पर शासन करेगा, जिसका निकलना आदि से, अनन्तकाल के दिनों से है।”
परन्तु सन्त पौलुस का एक ही स्थल ऐसी सब कुतर्कों को सुलझा देगा:
“वह परमेश्वर के सुसमाचार के लिए अलग किया गया, जिसकी प्रतिज्ञा परमेश्वर ने अपने भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा पहले से की थी, अपने पुत्र के विषय में, जो शरीर के भाव से दाऊद के वंश से उत्पन्न हुआ और सामर्थ्य के साथ परमेश्वर का पुत्र ठहराया गया।” —रोमियों 1:1–4
वह उसे विशेष रूप से शरीर के भाव से दाऊद का पुत्र क्यों कहता, और दूसरी ओर यह क्यों कहता कि वह परमेश्वर का पुत्र ठहराया गया, यदि उसका अभिप्राय यह दर्शाना न होता कि यह घोषणा शरीर का विचार किए बिना की गई?
निश्चय ही यह कथन इतना स्पष्ट है कि इसके विरुद्ध उत्तर देना अज्ञानता नहीं वरन् हठ होगा। तथापि हमें इससे इनकार नहीं करना चाहिए कि वह उस शरीर में भी, जो उसने धारण किया, परमेश्वर का पुत्र है। वरन्, यदि हम ऐसी रीति से बोलना चाहें जो हमारे विश्वास की उन्नति करे, तो जब हम उसे परमेश्वर का पुत्र कहें, तब हमें केवल परमेश्वर का वचन ही नहीं समझना चाहिए जो अपने आप में अनादि है, वरन् उस मानवता के साथ वचन को भी, जिसे उसने पहन लिया, जैसा शीघ्र ही और विस्तार से समझाया जाएगा।
अन्त में, प्रभु की उपाधि यीशु मसीह को इसलिए दी गई है कि वह पिता की ओर से हमारा प्रभु, राजा और व्यवस्थादाता ठहराया गया। वैसे ही, जब पिता ने अपने पुत्र को शरीर में प्रकट किया, तब उसने घोषित किया कि यही वह है जिसके द्वारा वह राज्य और शासन करना चाहता है।
इसलिए प्रेरित कहता है:
“हमारे लिए तो एक ही परमेश्वर है, जिससे सब कुछ है और हम उसी के लिए हैं; और एक ही प्रभु यीशु मसीह है, जिसके द्वारा सब कुछ है और हम उसी के द्वारा हैं।”
इससे केवल यही सूचित नहीं होता कि वह हमारा रक्षक और स्वामी है, जिसकी शिक्षा को हमें सुनना और मानना है, वरन् यह भी कि वह हमारा सिर और अधिपति है, जिसकी सामर्थ्य के आगे हमें झुकना, जिसकी इच्छा का हमें पालन करना, और जिसकी इच्छा के अनुसार हमें अपने सब कार्यों को चलाना है।
क्योंकि पिता ने उसे अपने घराने में पहलौठे का अधिकार दिया है, कि वह अपने भाइयों पर अधिकार के साथ शासन करे और अपनी इच्छा के अनुसार अपनी मीरास की आशीषें बाँटे।
जो पवित्र आत्मा के द्वारा गर्भ में आया, कुँवारी मरियम से जन्मा।
क्योंकि देहधारण का भेद, जैसे वह अपनी बड़ी ज्योति से सरल लोगों की समझ को चौंधिया देता है, वैसे ही यदि ठीक से न समझा जाए तो उन्हें व्याकुल और उलझन में भी डालता है, इसलिए आगे बढ़ने से पहले हमें उसे कुछ समझाना चाहिए।
पहले, यह आवश्यक था कि जो हमारा मध्यस्थ होने को था वह सच्चा परमेश्वर और सच्चा मनुष्य हो। क्योंकि जब हमारे अधर्म के कामों ने हमारे और परमेश्वर के बीच बाधा खड़ी कर दी थी, हमें स्वर्ग के राज्य से पराया कर दिया था, और परमेश्वर को हम से फेर दिया था, तो कोई भी हमें मेल कराने का साधन नहीं हो सकता था जब तक कि वह स्वयं परमेश्वर तक न पहुँच सके।
परन्तु कौन-सा प्राणी उस तक पहुँच सकता था? क्या आदम की सन्तानों में से कोई? वे सब, अपने प्रथम पिता समेत, उसके सम्मुख आने से भय के मारे पीछे हट गए थे। क्या स्वर्गदूतों में से कोई? उन्हें भी एक सिर की आवश्यकता थी जिसके द्वारा वे अपने परमेश्वर से सिद्धता से जुड़ें।
तो फिर क्या? बात बिलकुल निराशाजनक थी, जब तक कि परमेश्वर की महिमा हमारे पास उतर न आती, क्योंकि उस तक चढ़ना हमारे सामर्थ्य में नहीं था।
इसी कारण परमेश्वर के पुत्र को इम्मानुएल—अर्थात् परमेश्वर हमारे साथ—होना पड़ा, और इस रीति से कि जैसे उसने अपनी ईश्वरता हमारे साथ जोड़ी, वैसे ही हमारी मानवता को भी अपनी ईश्वरता के साथ जोड़ा। नहीं तो कोई ऐसा मेल न होता जो इतना निकट या इतना दृढ़ होता कि हमें आशा देता कि परमेश्वर हमारे बीच बसा और हमारी सहायता करता है, क्योंकि हमारी तुच्छता और ईश्वरीय महिमा की महानता के बीच इतनी दूरी थी।
इसलिए जब सन्त पौलुस उसे हमारे सामने मध्यस्थ के रूप में प्रस्तुत करता है, तब वह स्पष्ट रूप से उसे मनुष्य कहता है:
“परमेश्वर एक ही है, और परमेश्वर और मनुष्यों के बीच में भी एक ही मध्यस्थ है, अर्थात् मनुष्य यीशु मसीह।”
वह उतनी ही सहजता से उसे परमेश्वर कह सकता था, या कम से कम मनुष्य शब्द छोड़ सकता था, जैसे वह इस स्थल में परमेश्वर का नाम छोड़ देता है। परन्तु वह हमारी निर्बलता को जानता था। इसलिए, ताकि कोई अपने आपको यह सोचकर न सताए कि इस मध्यस्थ को कहाँ ढूँढ़ना चाहिए या किस मार्ग से उसके पास जाना चाहिए, पौलुस तुरन्त जोड़ देता है कि वह मनुष्य है, मानो कह रहा हो कि वह हमारा निकट का पड़ोसी है, हमसे जुड़ा हुआ क्योंकि वह हमारा ही शरीर है।
इससे उसका अभिप्राय उसे सूचित करना था जो अन्यत्र और विस्तार से घोषित किया गया है:
“हमारा ऐसा महायाजक नहीं जो हमारी निर्बलताओं में हमारे साथ दुखी न हो सके, वरन् वह सब बातों में हमारे समान परखा तो गया, तौभी निष्पाप रहा।”
जो हमने कहा है वह और स्पष्ट हो जाएगा यदि हम विचार करें कि मध्यस्थ का कार्य कितना असाधारण था: हमें परमेश्वर के अनुग्रह में ऐसी पूर्णता से लौटा लाना कि हम, जो मनुष्यों की सन्तान थे, उसकी सन्तान बन जाएँ; और हम, जो नरक के वारिस थे, स्वर्गीय राज्य के वारिस बन जाएँ।
यह कौन कर सकता था, जब तक कि परमेश्वर का पुत्र मनुष्य का पुत्र न बन जाता और हमारी दशा को इस रीति से धारण न करता कि अपनी दशा हमें दे दे, और जो उसका स्वभाव से था उसे अनुग्रह से हमारा बना दे?
इसलिए हमें भरोसा है कि हम परमेश्वर की सन्तान हैं, क्योंकि हमारे पास यह बयाना है कि परमेश्वर के स्वाभाविक पुत्र ने हमारी देह में से देह, हमारे मांस में से मांस और हमारी हड्डियों में से हड्डियाँ लीं, ताकि हम से एक हो जाए। उसने अपने व्यक्तित्व में उसे ग्रहण किया जो हमारा था, कि जो उसका निज था वह हमारा हो जाए, और इस प्रकार वह हमारे साथ परमेश्वर का पुत्र भी हो और मनुष्य का पुत्र भी।
इसी कारण हम आशा करते हैं कि स्वर्गीय मीरास हमारी है, क्योंकि परमेश्वर का पुत्र, जिसका वह पूर्णतः था, हमें अपने भाइयों के रूप में अपना चुका है। और यदि हम उसके भाई हैं, तो हम उसके संगी वारिस भी हैं।
एक और कारण है कि जो हमारा छुड़ानेवाला होने को था उसे सच्चा परमेश्वर और सच्चा मनुष्य होना आवश्यक था। उसका कार्य मृत्यु को निगल जाना था। यह जीवन के सिवा कौन कर सकता था? उसका कार्य पाप को जीतना था। धार्मिकता के सिवा यह कौन कर सकता था? उसका कार्य आकाश की शक्तियों—अर्थात् दुष्टात्माओं—को वश में करना था। आकाश और संसार से श्रेष्ठ सामर्थ्य के सिवा यह कौन कर सकता था?
और जीवन, धार्मिकता और स्वर्ग की सामर्थ्य अकेले परमेश्वर को छोड़ और किसमें बसती हैं? इसलिए प्रभु ने अपनी बड़ी कृपा से अपने आपको हमारा छुड़ानेवाला बनाया जब उसने हमें छुड़ाना चाहा।
हमारे छुटकारे का दूसरा भाग यह था कि मनुष्य, जिसने अवज्ञा से अपने आपको खोया और नाश किया था, आज्ञाकारिता से अपनी लज्जा मिटाए, परमेश्वर के न्याय को सन्तुष्ट करे, और अपने पाप के योग्य दण्ड भोगे:
“जैसे एक मनुष्य के आज्ञा न मानने से बहुत लोग पापी ठहरे, वैसे ही एक की आज्ञा मानने से बहुत लोग धर्मी ठहरेंगे।” —रोमियों 5:19
इसलिए प्रभु यीशु आगे आया, उसने आदम की भूमिका ली और उसका नाम धारण किया, ताकि आदम के स्थान पर पिता का आज्ञाकारी बने, हमारी मानवता को प्रायश्चित के रूप में परमेश्वर के न्याय के सम्मुख प्रस्तुत करे, और पाप का दण्ड उसी शरीर में सहे जिसमें वह किया गया था।
अन्त में, क्योंकि अकेला परमेश्वर मृत्यु का अनुभव नहीं कर सकता था और अकेला मनुष्य उसे जीत नहीं सकता था, उसने ईश्वरता को मानवता से जोड़ा ताकि एक की निर्बलता को मृत्यु का दण्ड सहने के लिए अधीन करे, और दूसरी की सामर्थ्य से मृत्यु से तब तक लड़े जब तक विजय न पा ले।
इसलिए जो लोग मसीह को या तो उसकी ईश्वरता से या उसकी मानवता से वंचित करते हैं, वे न केवल उसकी महानता की निन्दा करते या उसकी भलाई को धुँधला करते हैं, वरन् मनुष्यों के विश्वास को उलटकर उनकी भारी हानि भी करते हैं, जो इस नींव के सहारे के बिना दृढ़ नहीं रह सकता।
मैं उसकी ईश्वरता को प्रमाणित करने में और समय लगाना अनावश्यक समझता हूँ। उसके मानव स्वभाव के सत्य पर मानीवादियों और मार्कीयोनवादियों दोनों ने आक्रमण किया और उसे उलटने का यत्न किया। पहले ने कल्पना की कि वह स्वर्ग से एक आत्मिक देह लाया था। दूसरे ने माना कि उसके पास कोई सच्ची देह नहीं थी, केवल एक प्रेत और देह का आभास था।
फिर भी पवित्रशास्त्र बहुत-सी साक्षियाँ देता है जिनसे दोनों भूलों का दृढ़ता से सामना किया जा सकता है। क्योंकि आशीष की प्रतिज्ञा प्राचीन काल में किसी स्वर्गीय वंश में या मनुष्य के वेश में नहीं, वरन् इब्राहीम और याकूब के वंश में की गई थी:
“तेरे वंश के द्वारा पृथ्वी की सारी जातियाँ आशीष पाएँगी।” —उत्पत्ति 22:18
और न अनन्त सिंहासन की प्रतिज्ञा किसी हवा में गढ़े हुए मनुष्य से की गई, वरन् दाऊद के पुत्र से, जो उसके शरीर का फल है:
“तेरे गर्भ के फल में से मैं एक को तेरे सिंहासन पर बैठाऊँगा।” —भजन संहिता 132:11
इसी कारण, शरीर में प्रकट होने पर वह इब्राहीम और दाऊद का पुत्र कहलाता है:
“यीशु मसीह की, जो दाऊद की सन्तान, इब्राहीम की सन्तान था, वंशावली की पुस्तक।”
यह केवल इसलिए नहीं कि वह कुँवारी से जन्मा, मानो पहले वह हवा में गढ़ा गया हो, वरन् इसलिए कि शरीर के भाव से वह दाऊद के वंश से रचा गया, जैसा सन्त पौलुस समझाता है:
“उसका पुत्र, जो शरीर के भाव से दाऊद के वंश से उत्पन्न हुआ।”
वही प्रेरित अन्यत्र साक्षी देता है कि वह यहूदियों से उतरा:
“उन्हीं में से शरीर के भाव से मसीह आया।”
इसलिए स्वयं मसीह, अपने आपको केवल मनुष्य कहकर सन्तुष्ट न होकर, अपने आपको मनुष्य का पुत्र कहता है, यह सूचित करने के अभिप्राय से कि वह मानव-वंश से उत्पन्न मनुष्य है।
जब पवित्र आत्मा ने इस सत्य को, जो अपने आप में विशेष कठिन नहीं, इतनी सावधानी और स्पष्टता से, कितने ही मुखों के द्वारा, इतनी बार प्रकट किया, तो कौन आशा करता कि मनुष्य इतने निर्लज्ज होंगे कि यहाँ भी टालमटोल का सहारा लें? तौभी हमारे पास और भी साक्षियाँ हैं जिनसे ऐसी निन्दाओं का खण्डन किया जा सकता है।
सन्त पौलुस कहता है:
“परमेश्वर ने अपने पुत्र को भेजा, जो स्त्री से जन्मा।”
ऐसे अनगिनत स्थल भी हैं जो दिखाते हैं कि वह ठण्ड, गर्मी, भूख और हमारे स्वभाव की अन्य निर्बलताओं के अधीन था। परन्तु हमें उन्हें चुनना चाहिए जो हमारे हृदयों को सच्चे भरोसे में उन्नत कर सकें।
उदाहरण के लिए, कहा गया है कि उसने स्वर्गदूतों को उनका स्वभाव धारण करने का आदर नहीं दिया, वरन् हमारा स्वभाव धारण किया, ताकि हमारे मांस और लहू में होकर वह मृत्यु के द्वारा उसे नष्ट करे जिसके हाथ में मृत्यु का अधिकार था:
“क्योंकि लड़के मांस और लहू के भागी हैं, इसलिए वह आप भी उनके समान उनका भागी हुआ, ताकि मृत्यु के द्वारा उसे जिसके हाथ में मृत्यु की शक्ति थी नष्ट करे।”
फिर, इसी सहभागिता के द्वारा वह हमें अपने भाई गिनता है:
“वह उन्हें भाई कहने में लज्जित नहीं होता।”
फिर, उसे अपने भाइयों के समान बनना पड़ा ताकि वह विश्वासयोग्य और दयालु मध्यस्थ बन सके:
“उसे सब बातों में अपने भाइयों के समान बनना पड़ा, ताकि वह दयालु और विश्वासयोग्य महायाजक हो।”
फिर:
“हमारा ऐसा महायाजक नहीं जो हमारी निर्बलताओं में हमारे साथ दुखी न हो सके, वरन् वह सब बातों में हमारे समान परखा तो गया, तौभी निष्पाप रहा।”
और ऐसे ही अन्य स्थल भी हैं।
विधर्मी अपनी भूलों की पुष्टि के लिए जिन स्थलों का प्रयोग करते हैं उन्हें अत्यन्त बेढंगेपन से अपनी कल्पनाओं की ओर खींच लेते हैं। मार्कीयोन और उसके अनुयायियों ने कहा कि मसीह ने देह के स्थान पर एक प्रेत धारण किया था, क्योंकि कहा गया है:
“वह मनुष्यों की समानता में हो गया और मनुष्य के रूप में प्रकट हुआ।”
परन्तु वह भूल में पड़ा क्योंकि उसने यह विचार नहीं किया कि सन्त पौलुस वहाँ क्या कहना चाहता है। क्योंकि पौलुस यह समझाना नहीं चाहता कि यीशु मसीह ने किस प्रकार की देह धारण की। वह केवल यह दिखाता है कि यद्यपि यीशु मसीह ईश्वरीय महिमा का दावा कर सकता था, तौभी उसने अपने आपको मनुष्य के समान चलाया, और बाहरी रूप में अपने आपको दीन किया।
मानीवादियों ने उसके लिए हवा में एक देह गढ़ ली, क्योंकि वह दूसरा आदम, स्वर्गीय और स्वर्ग से आनेवाला कहलाता है:
“प्रथम मनुष्य धरती से, मिट्टी का था; दूसरा मनुष्य स्वर्ग से प्रभु है।”
परन्तु इस स्थल में प्रेरित किसी स्वर्गीय सार-तत्त्व की नहीं, वरन् उस आत्मिक सामर्थ्य की बात करता है जो मसीह को हमें जिलाने के लिए दी गई।
इसके विपरीत, यीशु मसीह के सच्चे मानव स्वभाव के विषय में जो शिक्षा विश्वासी मानते हैं, वह इसी स्थल से बहुत अच्छी तरह पुष्ट होती है। क्योंकि यदि उसका वही स्वभाव न होता जो हमारा है, तो सन्त पौलुस जिस तर्क को इतने ज़ोर से दबाता है वह निरर्थक होता: कि जब यीशु मसीह जी उठा है, तो हम भी जी उठेंगे; और यदि हम न जी उठें, तो इससे निकलेगा कि मसीह भी नहीं जी उठा:
“यदि मरे हुओं का पुनरुत्थान नहीं, तो मसीह भी नहीं जी उठा।”
जब कहा जाता है कि वचन देहधारी हुआ:
“वचन देहधारी हुआ और हमारे बीच में डेरा किया,”
तो हमें इसे ऐसा नहीं समझना चाहिए मानो वचन देह में बदल गया हो या उससे गड्डमड्ड मिल गया हो। वरन् उसने कुँवारी के गर्भ से एक मानव देह ली, मन्दिर के रूप में, जिसमें वह निवास करे।
जो परमेश्वर का पुत्र था वह मनुष्य का पुत्र हुआ, तत्त्वों के मिश्रण से नहीं, वरन् व्यक्तित्व की एकता से। अर्थात् उसने अपनी ईश्वरता को अपनी धारण की हुई मानवता के साथ ऐसा जोड़ा और मिलाया कि दोनों स्वभावों में से हर एक ने अपना उचित लक्षण बनाए रखा, जबकि यीशु मसीह दो भिन्न व्यक्ति नहीं वरन् केवल एक ही व्यक्ति था।
यदि इस भेद के समान कुछ मिल सके, तो मनुष्य की समानता उपयुक्त प्रतीत होती है। क्योंकि हम देखते हैं कि मनुष्य दो स्वभावों से बना है, फिर भी उनमें से कोई दूसरे से इस प्रकार नहीं मिला कि अपना उचित लक्षण न बनाए रखे। आत्मा देह नहीं है, और देह आत्मा नहीं है।
इसलिए आत्मा के विषय में विशेष रूप से कुछ ऐसा कहा जा सकता है जो देह का नहीं हो सकता, और वैसे ही देह के विषय में कुछ ऐसा कहा जा सकता है जो आत्मा का नहीं हो सकता। मनुष्य के विषय में भी कुछ ऐसा कहा जा सकता है जो अलग-अलग देखने पर न आत्मा का हो सकता है न देह का।
अन्त में, जो बातें विशेष रूप से आत्मा की हैं वे देह पर आरोपित की जाती हैं, और जो देह की हैं वे परस्पर आत्मा पर आरोपित की जाती हैं। इस बीच, इन दोनों तत्त्वों से बना व्यक्ति एक ही मनुष्य है, अनेक नहीं।
बोलने की यह रीति सूचित करती है कि मनुष्य में एक ही स्वभाव है जो दो संयुक्त अंगों से बना है, फिर भी उनके बीच भेद बना रहता है। पवित्रशास्त्र यीशु मसीह के विषय में इसी रीति से बोलता है। क्योंकि कभी वह उस पर वह आरोपित करता है जो केवल उसकी मानवता से सम्बन्ध रख सकता है; कभी वह जो विशेष रूप से उसकी ईश्वरता का है; और कभी वह जो दोनों संयुक्त स्वभावों का है, किसी एक का अकेले नहीं।
वस्तुतः पवित्रशास्त्र यीशु मसीह में दोनों स्वभावों के मेल को इतनी सावधानी से व्यक्त करता है कि जो एक का है उसे दूसरे को सौंप देता है। बोलने की इस रीति को प्राचीन शिक्षकों ने गुणों का आदान-प्रदान (communicatio idiomatum) कहा।
जब मैं इन सब बातों को पवित्रशास्त्र की ठोस साक्षियों से प्रमाणित कर चुकूँगा, तब यह प्रकट हो जाएगा कि मैं अपनी ओर से कुछ नहीं कह रहा।
जब यीशु मसीह ने अपने विषय में कहा:
“इब्राहीम के होने से पहले मैं हूँ,”
तो यह उसकी मानवता के विषय में नहीं समझा जा सकता था, क्योंकि वह इब्राहीम की मृत्यु के अनेक शताब्दियों बाद ही मनुष्य बना।
वैसे ही, उसके विषय में जो कहा गया है:
“वह सारी सृष्टि में पहलौठा है,” और, “वह सब वस्तुओं में प्रथम है, और उसी में सब वस्तुएँ स्थिर रहती हैं,”
—कुलुस्सियों 1:15, 17
वह मनुष्य का नहीं हो सकता। इसलिए ऐसी स्तुतियाँ उचित रूप से उसकी ईश्वरता की हैं।
परन्तु निम्नलिखित बातें उसकी मानवता की हैं: कि वह पिता का दास कहलाता है; कि वह परमेश्वर और मनुष्यों के सम्मुख आयु और बुद्धि में बढ़ता गया:
“यीशु बुद्धि और डील-डौल में और परमेश्वर और मनुष्यों के अनुग्रह में बढ़ता गया”;
कि वह अपने आपको पिता से छोटा मानता है:
“पिता मुझसे बड़ा है”;
कि वह अपनी महिमा नहीं चाहता; कि वह नहीं जानता कि अन्तिम दिन कब आएगा:
“उस दिन और उस घड़ी के विषय में कोई नहीं जानता, न स्वर्ग के दूत, न पुत्र, परन्तु केवल पिता”;
कि वह अपनी ओर से नहीं बोलता; कि वह अपनी इच्छा नहीं चाहता; और कि वह देखा और छुआ जा सकता है।
क्योंकि जहाँ तक वह परमेश्वर है, वह पिता के तुल्य है; वह किसी बात में बढ़ नहीं सकता; वह सब कुछ अपने ही लिए करता है; उससे कुछ छिपा नहीं है; वह सब कुछ अपनी इच्छा के अनुसार करता है; और वह अदृश्य है और छुआ नहीं जा सकता।
गुणों का आदान-प्रदान तब है जब सन्त पौलुस कहता है:
“परमेश्वर ने अपनी कलीसिया को अपने ही लहू से मोल लिया,”
और:
“महिमा के प्रभु को क्रूस पर चढ़ाया गया।”
निश्चय ही परमेश्वर के पास लहू नहीं और वह दुख नहीं उठा सकता। परन्तु क्योंकि मसीह, जो सच्चा परमेश्वर और सच्चा मनुष्य था, क्रूस पर चढ़ाया गया और हमारे लिए अपना लहू बहाया, इसलिए जो उसकी मानवता में किया गया वह बोलने की एक अनुचित परन्तु युक्तिसंगत रीति से उसके ईश्वरीय स्वभाव पर आरोपित किया जाता है।
यही उदाहरण तब दिखता है जब सन्त यूहन्ना कहता है कि परमेश्वर ने हमारे लिए अपना प्राण दिया:
“हमने प्रेम इसी से जाना कि उसने हमारे लिए अपना प्राण दे दिया।”
क्योंकि वहाँ वह ईश्वरता पर वह आरोपित करता है जो विशेष रूप से मानवता का है।
दूसरी ओर, जब मसीह ने कहा:
“कोई स्वर्ग पर नहीं चढ़ा, केवल वही जो स्वर्ग से उतरा, अर्थात् मनुष्य का पुत्र जो स्वर्ग में है,”
तो वह उस समय अपनी देह के अनुसार स्वर्ग में नहीं था। परन्तु क्योंकि वह परमेश्वर और मनुष्य था, अपने दोनों स्वभावों के मेल के कारण उसने एक का गुण दूसरे को सौंप दिया।
तौभी हम मसीह के सच्चे तत्त्व को उन स्थलों से बढ़कर किसी और रीति से नहीं समझ सकते जो दोनों स्वभावों को एक साथ समेटते हैं, जिनमें से बहुत-से सन्त यूहन्ना के सुसमाचार में हैं। क्योंकि वहाँ जो बातें कही गई हैं वे न तो अलग से देखी गई उसकी मानवता की हैं न उसकी ईश्वरता की, वरन् उसके व्यक्तित्व की हैं, जहाँ तक वह परमेश्वर और मनुष्य है।
इस प्रकार पिता की ओर से उसे पाप क्षमा करने, जिसे चाहे उसे जिलाने, और धार्मिकता, पवित्रता और उद्धार देने का अधिकार दिया गया। वह जीवितों और मरे हुओं का न्यायी ठहराया गया ताकि पिता के समान उसका आदर किया जाए। वह जगत की ज्योति, अच्छा चरवाहा, एकमात्र द्वार और दाखलता है।
क्योंकि उसने ये विशेषाधिकार तब पाए जब वह शरीर में प्रकट हुआ, यद्यपि वे उसके पास जगत की सृष्टि से पहले अपने आप में थे। यह निश्चित है कि वे ऐसे मनुष्य के नहीं हो सकते जिसके पास केवल मानवता ही हो।
हमें इसी अर्थ में समझना चाहिए जो सन्त पौलुस कहता है:
“तब वह राज्य को परमेश्वर पिता के हाथ में सौंप देगा,” —1 कुरिन्थियों 15:24
न्याय निपटाने के बाद। निश्चय ही परमेश्वर के पुत्र का राज्य, जिसका कोई आदि नहीं था, अन्त नहीं पा सकता।
परन्तु जैसे उसका राज्य कुछ अंश में शरीर की दीनता के नीचे छिपा था, और उसने अपने आपको ख़ाली कर दिया, दास का रूप धारण किया और बाहरी रूप से अपनी महिमा को त्यागकर अपने को पिता का आज्ञाकारी बनाया; और जैसे इस अधीनता के बाद वह महिमा और आदर का मुकुट पहनाया गया और, ऊँचा उठाए जाकर, ऐसा नाम पाया जो सब नामों में श्रेष्ठ है, जिसके आगे हर घुटना झुकना है:
“उसने अपने आपको दीन किया और मृत्यु तक, हाँ, क्रूस की मृत्यु तक आज्ञाकारी रहा। इस कारण परमेश्वर ने उसे अति महान भी किया और उसे वह नाम दिया जो सब नामों में श्रेष्ठ है, कि यीशु के नाम पर हर एक घुटना झुके,”
वैसे ही वह तब अपने पिता के आगे महिमा का यह मुकुट और जो कुछ उसने शरीर में उससे पाया वह सब अधीन कर देगा:
“तब पुत्र आप भी उसके अधीन हो जाएगा जिसने सब कुछ उसके अधीन कर दिया, ताकि परमेश्वर सब में सब कुछ हो।”
यह अवलोकन हमें बहुत-सी उलझनों से मुक्त करने में बड़ा उपयोगी होगा। यह उल्लेखनीय है कि कुछ सरल लोग अपने आपको कैसे सताते हैं जब उनके सामने ऐसे कथन रखे जाते हैं जिनमें मसीह पर वे बातें आरोपित की गई हैं जो अलग से देखी गई न उसकी मानवता की हैं न उसकी ईश्वरता की। वे यह विचार नहीं करते कि ये बातें उसके व्यक्तित्व की हैं, जिसमें वह परमेश्वर और मनुष्य के रूप में प्रकट हुआ।
वस्तुतः कोई देख सकता है कि ऊपर कही गई सब बातें आपस में पूर्ण रूप से मेल खाती हैं, बशर्ते कि हम इतने बड़े भेद पर उस श्रद्धा से विचार करना चाहें जो उसकी महानता के योग्य है।
परन्तु ऐसा कुछ नहीं जिसे क्रोधी और विक्षिप्त मन उलट-पुलट न करें। वे यीशु मसीह की मानवता की बातों को पकड़ते हैं कि उसकी ईश्वरता को नष्ट करें; उसकी ईश्वरता की बातों को कि उसकी मानवता को नष्ट करें; और जो दोनों स्वभावों के विषय में एक साथ कहा गया है उसे कि दोनों को उलट दें।
परन्तु यह इसके सिवा क्या है कि यह तर्क दिया जाए कि मसीह मनुष्य नहीं क्योंकि वह परमेश्वर है, वह परमेश्वर नहीं क्योंकि वह मनुष्य है, और वह न परमेश्वर है न मनुष्य क्योंकि वह दोनों स्वभावों को अपने भीतर रखता है?
इसलिए हम यह निष्कर्ष निकालते हैं कि मसीह, जहाँ तक वह परमेश्वर और मनुष्य है, दो स्वभावों से बना, जो संयुक्त हैं पर गड्डमड्ड नहीं, हमारा प्रभु और परमेश्वर का सच्चा पुत्र है, अपनी मानवता के अनुसार भी, यद्यपि केवल अपनी मानवता के कारण नहीं।
क्योंकि हमें नेस्तोरियस की झूठी शिक्षा से घृणा करनी चाहिए, जिसने यीशु मसीह के स्वभावों को भिन्न बताने के बजाय बाँटकर एक दोहरे मसीह की कल्पना कर ली। इसके विपरीत, हम देखते हैं कि पवित्रशास्त्र ऊँचे और स्पष्ट स्वर में घोषित करता है कि जो कुँवारी मरियम से उत्पन्न हुआ वह परमेश्वर का पुत्र कहलाएगा:
“वह पवित्र जो तुझ से उत्पन्न होगा परमेश्वर का पुत्र कहलाएगा।”
वह यह भी घोषणा करता है कि यह कुँवारी हमारे प्रभु की माता है:
“मेरा यह सौभाग्य कहाँ से हुआ कि मेरे प्रभु की माता मेरे पास आई?”
इसलिए हम मानते हैं कि वह कुँवारी मरियम से जन्मा ताकि वह इब्राहीम और दाऊद का वह सच्चा पुत्र पहचाना जाए जिसकी प्रतिज्ञा व्यवस्था और भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा की गई थी। इससे विश्वास को दोहरा लाभ मिलता है।
पहला, वह देखता है कि परमेश्वर का पुत्र, हमारा शरीर धारण करके, मनुष्यों के उद्धार को पूरा करने को तैयार हुआ, क्योंकि इस प्रकार उसने हमें अपने साथ और अपनी सब आशीषों के साथ सहभागिता और संगति में बुलाया। शैतान और मृत्यु को जीतने की इच्छा से उसने हमारी दशा धारण की, जिसमें वह जय पाना और विजय का उत्सव मनाना चाहता था, ताकि जय और विजय हमारी हो।
दूसरा लाभ यह है कि यीशु मसीह की वंशावली को दाऊद और इब्राहीम तक खोज निकालने से हमें और अधिक निश्चय होता है कि हमारा छुड़ानेवाला वही है जिसकी परमेश्वर ने इतने पहले से भविष्यद्वाणी की थी।
फिर कहा गया है कि वह पवित्र आत्मा से गर्भ में आया, क्योंकि यह उचित नहीं था कि जो औरों को शुद्ध करने के लिए भेजा गया था उसकी अपनी उत्पत्ति अशुद्ध और दूषित हो। और न यह उचित था कि मानव देह, जिसे ईश्वरीय सार-तत्त्व ने अपने निवास-स्थान के रूप में लिया, मनुष्य जाति की सार्वभौमिक भ्रष्टता से मलिन हो।
इसलिए पवित्र आत्मा ने यहाँ कार्य किया और अपनी अद्भुत और अगम्य सामर्थ्य से प्रकृति के साधारण नियम पर जय पाई। उसने यीशु मसीह को किसी दाग या शारीरिक अशुद्धता से कलंकित होने नहीं दिया, वरन् सिद्ध पवित्रता और शुद्धता में जन्म लेने दिया।
इसलिए विश्वास को सिखाया जाता है कि सारी पवित्रता को दृढ़ भरोसे के साथ यीशु मसीह में और केवल उसी में ढूँढ़े, क्योंकि केवल वही अपने गर्भ में आने के समय मानवीय भ्रष्टता से बचा रहा।
इसके बाद यह आता है कि उसने हमारा छुटकारा कैसे पूरा किया, जिसके लिए वह नश्वर मनुष्य बना था। क्योंकि परमेश्वर मनुष्य की अवज्ञा से क्रोधित हुआ था, मसीह ने अपनी आज्ञाकारिता से प्रायश्चित किया, और अपने आपको पिता के अधीन किया, यहाँ तक कि मृत्यु तक।
इसलिए हमारे उद्धार की पुनःस्थापना में उसकी आज्ञाकारिता को सर्वोच्च आदर में रखना चाहिए, जैसा सन्त पौलुस कहता है:
“जैसे एक मनुष्य के अपराध से सब पापी ठहरे, वैसे ही एक की आज्ञाकारिता से बहुत लोग धर्मी गिने जाते हैं।”
