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भजन संहिता 119 का छठा उपदेश। 41-47
वाव।
41 हे प्रभु, तेरी करुणा मुझ पर प्रकट हो, और तेरी प्रतिज्ञा के अनुसार तेरा उद्धार भी।
42 तब मैं अपने निन्दकों को उत्तर दे सकूँगा, क्योंकि मेरा भरोसा तेरे वचन पर है।
43 और अपने सत्य के वचन को मेरे मुँह से कभी न छीन, क्योंकि मैं तेरे न्यायों की बाट जोहता हूँ।
44 तब मैं सदा तेरी व्यवस्था का पालन करता रहूँगा, हाँ, सदा सर्वदा।
45 और मैं स्वतंत्रता से चलूँगा, क्योंकि मैं तेरी आज्ञाओं का खोजी हूँ।
46 मैं राजाओं के सामने भी तेरी चितौनियों की चर्चा करूँगा, और लज्जित न होऊँगा।
47 और तेरी आज्ञाओं में मेरा आनन्द होगा, जिनसे मैंने प्रेम रखा है।
48 मैं तेरी आज्ञाओं की ओर, जिनसे मैंने प्रेम रखा है, अपने हाथ उठाऊँगा, और तेरी विधियों पर मेरा ध्यान लगा रहेगा।
इन आठ पदों के आरम्भ में दाऊद की परमेश्वर से एक विनती है कि जो प्रतिज्ञाएँ परमेश्वर ने उससे की थीं और जिनकी वह आशा लगाए बैठा था, उनकी पूर्ति और सिद्धि का अनुभव उसे हो। मानो वह कह रहा हो, हे प्रभु, मुझे यह प्रकट कर कि तूने मुझे इतनी भलाई करने की जो प्रतिज्ञा दी है, वह व्यर्थ नहीं है, वरन् तू मुझे सचमुच यह अनुभव कराएगा कि तेरा वचन और तेरी प्रतिज्ञा अत्यन्त निश्चित और सच्ची है। अब, कि उसने अपने आप को परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं की नींव पर स्थिर किया था, यह उसके इस कथन से प्रकट होता है:
हे प्रभु, तेरी करुणा मुझ पर प्रकट हो, और तेरी प्रतिज्ञा के अनुसार तेरा उद्धार भी।
तब मैं अपने निन्दकों को उत्तर दे सकूँगा, क्योंकि मेरा भरोसा तेरे वचन पर है। इसमें हम यह भी देखते हैं कि शैतान चतुराई से उसके विश्वास को उलट देने का यत्न करता है, मानो परमेश्वर ने उसे कुछ भी मूल्य का न बनाया हो। तो सबसे पहले हमें यह ध्यान देना चाहिए कि दाऊद ने जब अपने आप को दबा हुआ पाया, तब वह परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं की ओर दौड़ा। और यह हमारे लिए बड़े लाभ की बात है। क्योंकि देखो, जब हम परमेश्वर का वचन सीख चुके हों, तब हमें उसे व्यवहार में कैसे लाना चाहिए: जब हम संघर्ष में उतरें, और शैतान हम पर चारों ओर से आक्रमण करे, यहाँ तक कि ऐसा लगे मानो सारा संसार हमारे विरुद्ध षड्यन्त्र रच बैठा है, और हमें अपने चारों ओर विनाश ही विनाश दिखाई दे: तब भी, मैं कहता हूँ, हमें उन प्रतिज्ञाओं की ओर दौड़ना चाहिए जो परमेश्वर ने हमसे की हैं, उन्हें मूल्यवान समझना चाहिए, और उन्हें अपने उपयोग में इस प्रकार लाना चाहिए कि हम उनकी शक्ति और सामर्थ्य का अनुभव करें। जब हम चैन और शान्ति में हों, तब परमेश्वर ने हमसे जो कुछ कहा है उसे ग्रहण कर लेना हमारे लिए सहज है। और ऐसा क्यों? क्योंकि उस पूरे समय हमारे विश्वास की परीक्षा और उसका कष्ट नहीं होता, इसलिए जब तक हम परखे न जाएँ, हम कभी जान नहीं पाएँगे कि हमने सचमुच विश्वास किया है या नहीं। देखो, इसीलिए मैंने कहा कि यह स्थल ध्यान देने योग्य है, कि दाऊद बिना कारण नहीं कहता, “तब मैं उन्हें उत्तर दे सकूँगा जो मुझे लज्जित करना चाहते हैं।” क्योंकि इन शब्दों से वह साक्षी देता है कि दुष्टों ने उसे तुच्छ जाना, उसका अनादर किया और उसका उपहास किया, मानो वह परमेश्वर पर इतना भरोसा रखकर निरा मूर्ख हो, फिर भी उसका विश्वास डिगा नहीं। और देखो, जब दुष्ट और अभक्त लोग हमारे विषय में निन्दा के वचन बोलते हैं, तब शैतान हमें परीक्षाओं से कैसे घेरता है: यहाँ तक कि हमें यह बड़ा विचित्र व्यापार प्रतीत हुआ है, क्योंकि परमेश्वर की ऐसी आदरणीय और उत्तम प्रतिज्ञाएँ सुनकर हमने अपने आप को तुरन्त बादलों के ऊपर उठा लिया गया समझा, और फिर भी हमारा वही विश्वास बाहरी रूप में जैसा दिखता था वैसा बिलकुल सिद्ध न हुआ। ठीक ऐसा ही दाऊद के साथ हुआ, जैसा हम विशेषकर बाईसवें भजन में देख सकते हैं।
और हमारे उद्धारकर्ता मसीह ने भी, जो परमेश्वर की सब सन्तानों का सच्चा आदर्श और दर्पण है, ऐसे संघर्ष सहे और झेले हैं। उन्होंने उससे कहा, बहुत अच्छा, वह परमेश्वर पर भरोसा रखता है, अब देखें कि परमेश्वर उसकी सुनता है या नहीं। तो आओ, हम ध्यान दें कि दाऊद ने यहाँ कोई व्यर्थ कल्पनाएँ गढ़कर प्रस्तुत नहीं कीं, जैसा कोई निठल्ला मनुष्य करता है जो कभी न परखा गया हो और न कभी संकट में पड़ा हो। परन्तु जब उसके शत्रुओं ने उसका ऐसा उपहास किया कि उसका विश्वास उलट गया-सा लगा, और वह स्वयं पूरी तरह नष्ट हो जाने के बड़े खतरे में था, तब वह परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं की शरण में आया और बोला: हे मेरे परमेश्वर, तूने मुझे अपना वचन दिया है, जो मुझे कभी निष्फल नहीं कर सकता: देखो, यही सारी आशा और भरोसे का आधार है। इसी प्रकार हमें भी इस शिक्षा पर चलना चाहिए, अर्थात् जब संसार एक ओर हमारी हँसी उड़ाए और हमें तुच्छ जाने कि हमने परमेश्वर पर अत्यधिक सहजता से विश्वास कर लिया, और शैतान हमें उस निश्चय से पूरी तरह फेर देने का भरसक परिश्रम करे जो हमें प्राप्त हुआ था: तब भी हम यह कहना न छोड़ें कि हे प्रभु, बोलनेवाला तू है, और हमारी सारी आशा और भरोसा तुझी में है।
फिर, जैसे शैतान और अभक्तों के आक्रमण के समय हमें परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं को स्मरण करना है, वैसे ही हम यह भी ध्यान दें (जैसा पहले चर्चा हो चुकी है) कि हमारी सब विनतियों की नींव यही होनी चाहिए। क्योंकि यदि हम सच्चे मन से परमेश्वर से प्रार्थना करना और जो माँगें वह पाना चाहते हैं, तो हमें हवा में प्रार्थना नहीं करनी चाहिए, यह कहकर कि हे प्रभु, मैं तुझसे अमुक बात के लिए विनती करता हूँ और चाहता हूँ कि वह ऐसे ही हो जाए। क्योंकि यह तो अत्यधिक उतावलापन और बहुत ही बड़ा दुस्साहस होगा कि हम परमेश्वर को अपनी इच्छाओं के अधीन करना चाहें, उसे अपनी मर्ज़ी से लगाम लगाएँ, और उससे चाहें कि हमारी लालसाओं को जो-जो भाए वह सब हमें दे दे: परन्तु उसका वचन ही हमारा अगुवा और हमारा दीपक होना चाहिए: और हमें अपने आप को पूरी तरह उसी के हवाले करना और सर्वथा उसी पर टिके रहना चाहिए। मैं कहता हूँ, देखो, हमारी प्रार्थनाएँ किस रीति से स्वीकार होती हैं, अर्थात् जब हम परमेश्वर से वह नहीं माँगते जो हमारी अपनी दृष्टि में भला लगता है, परन्तु जब हम उस प्रतिज्ञा से सुरक्षित होते हैं जो उसने हमसे की है।
और इसी बात में हम विधर्मियों और अविश्वासियों से भिन्न हैं। क्योंकि हम देखते हैं कि तुर्क और मूर्तिपूजक भी परमेश्वर से बहुत प्रार्थना करते हैं। पर वे किस रीति से प्रार्थना करते हैं? निश्चय ही अन्धाधुन्ध: ऐसे कि वे जानते ही नहीं कि क्या कर रहे हैं। इसके विपरीत, हमें उससे पूर्ण निश्चय के साथ प्रार्थना करनी चाहिए कि वह हमारी सुनेगा। परन्तु यह निश्चय कहाँ से आएगा, यदि सत्य हमारे आगे-आगे चलकर यह न कहे: देखो, प्रभु जो हमें अपने पास बुलाता है? और तब जब हम उसके पास आते हैं, तो यह कोई मूर्खतापूर्ण धृष्टता नहीं: परन्तु हम उसके पास उसी रीति से आते हैं जैसी उसने हमें आज्ञा दी है।
तो आओ, देखें कि इस स्थल में हमें और क्या ध्यान देना है, जब दाऊद यहाँ परमेश्वर की उन प्रतिज्ञाओं को सामने रखता है जिनसे परमेश्वर उसके प्रति बँधा है: हे प्रभु, वह कहता है, तेरे वचन के अनुसार मेरे साथ हो। अब यहाँ विचार करने योग्य एक बहुत लाभदायक बात है: अर्थात् जब हमें एक बार निश्चय हो जाए कि परमेश्वर ने प्रतिज्ञा की है कि जो कुछ हम उससे माँगेंगे वह हमारे लिए करेगा, तब हमें और सन्देह नहीं करना चाहिए कि वैसा ही होगा: वरन् यह कि बात पूरी तरह तय हो चुकी है, ताकि हम उसके विषय में सदा निश्चिन्त और आश्वस्त रहें। क्योंकि जब परमेश्वर हमसे बोलता है, तो हम पूरी तरह निश्चित हैं कि वह हमें धोखा न देगा: वह हमें मीठी बातें देकर छलेगा नहीं, जैसा मनुष्य प्रायः करते हैं, जो जीभ से तो बड़े उदार होते हैं पर फिर भी मुट्ठी के बड़े कंजूस होते हैं: परन्तु परमेश्वर ऐसा व्यवहार नहीं करता। तो आओ, हम बिना अविश्वास के उसके सामने आएँ। क्या हमारे पास उसका वचन है? तो हम उस बात को पूरी हुई के समान मानें। और इसलिए जब दाऊद कहता है, तेरे वचन के अनुसार, तो वह हमें जताता है कि उसे न केवल यह निश्चय था कि परमेश्वर विश्वासयोग्य और उदार है, और जब हम उस पर भरोसा रखते हैं तो वह हमें छलना नहीं चाहता: परन्तु वह हमें दिखाता है कि परमेश्वर की सच्चाई का जो निश्चय हमें है, वह हमें यह कहते-कहते थका न दे कि हम मानो दबे जा रहे हैं। परन्तु हमें और भी सावधान और परिश्रमी होकर उससे प्रार्थना करनी चाहिए।
कुछ लोग कहेंगे तो कि हम परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं पर विश्वास करते हैं, पर वे कहते हैं कि वह जानता है कि हमें किस वस्तु की आवश्यकता है, फिर हमें उससे बार-बार माँगने की क्या आवश्यकता?
ऐसे लोग भली-भाँति प्रकट करते हैं कि उन्होंने कभी नहीं समझा कि विश्वास और आशा क्या हैं। क्योंकि यदि हम परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं को कपट रहित होकर ग्रहण करते हैं, तो हमें इसी प्रकार उत्कण्ठित और उत्साही होकर प्रार्थना करनी और उसकी शरण लेनी चाहिए, यह कहते हुए कि हे प्रभु परमेश्वर, जब तूने मुझे अपनी उदारता और दया का आश्वासन दिया है, तो इसी उद्देश्य से कि मैं अपनी आवश्यकता में तुझे पुकारूँ। और जब मैं उस विवशता को देखता हूँ जो मुझे दबाती और धकेलती है, तो मुझे तेरे पास आना ही होगा, क्योंकि तूने अपने वचन से मुझे बुलाया है। देखो, तब परमेश्वर की सब प्रतिज्ञाएँ हमारे लिए उतनी ही अनेक एड़ियों का काम करें जो हमें उससे प्रार्थना करने में आगे बढ़ाएँ। अब आओ, दाऊद के शब्दों की ओर चलें।
हे प्रभु, तेरी दया, या तेरे अनुग्रह, मुझ पर प्रकट हों, और तेरा उद्धार भी।
अपनी नींव डाल लेने के बाद, जिस पर उसे निर्माण करना है, वह एक ही बात दो शब्दों में माँगता है, जो बाहरी दृष्टि से भिन्न-भिन्न जान पड़ते हैं: अर्थात् परमेश्वर के अनुग्रह और उसका उद्धार। फिर भी दाऊद का अभिप्राय इसके सिवा और कुछ नहीं कि परमेश्वर अपने आप को उसका उद्धारकर्ता प्रकट करे। और यहाँ कुछ भी अनावश्यक नहीं कहा गया है: क्योंकि यह वैसा ही है मानो वह कहता, हे मेरे परमेश्वर, मैं तुझसे विनती करता हूँ कि अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार तू मुझे अनुभव कराए कि तू मेरा उद्धारकर्ता और पिता है। परन्तु साथ ही वह हमें यह भी बताता है कि जिस उद्धार की हमें बाट जोहनी है और जिसकी प्रतिज्ञा परमेश्वर ने हमसे की है, वह कहाँ से आता है, और वह है उसकी निरी भली इच्छा से। क्योंकि मनुष्य इसके सिवा और कुछ कर ही नहीं सकते कि सदा अन्यायपूर्वक अपने ऊपर कोई-न-कोई ऐसी बात ले लें जो उनसे कुछ सम्बन्ध नहीं रखती, और सदा मूर्खता और घमण्ड से अपने ही में बँधे रहें। पर दाऊद इसके बिलकुल उलट यहाँ दिखाता है कि वह सारा उद्धार जिसकी वह आशा और अभिलाषा रखता है, मनुष्यों के गुण और प्रतिष्ठा से नहीं, किसी और ही स्रोत से आता है: अर्थात् परमेश्वर की निरी भलाई से। तो हम देखते हैं कि जैसे उसने पहले प्रतिज्ञा की बात कही, वैसे ही यहाँ वह उस कारण को भी जोड़ता और प्रकट करता है जिसने परमेश्वर को हमसे इस प्रकार बँधने के लिए प्रेरित किया: अर्थात् उसकी निरी दया।
इससे हमें चिताया जाता है कि जब हमें परमेश्वर को पुकारना हो, तब हमें सदा इन दो बातों का ध्यान रखना चाहिए: अर्थात् परमेश्वर का अनुग्रह और उसकी सेंतमेंत दया, और उसके बाद उसकी प्रतिज्ञा। परमेश्वर भला और उदार है, और इसी कारण वह तरस खाकर हमें देखता है: और करुणा की दृष्टि से हमें निहारकर हमें ग्रहण करने की कृपा करता है, वरन् हमें अपने पास बुलाता और खींचता है, और हमें साहस भी देता है कि हम उससे माँगें कि वह हमारी सब आवश्यकताओं और कठिनाइयों में हमारी सहायता और सहारा बने। अब यह भलाई परमेश्वर में छिपी रह जाती, यदि वह अपनी प्रतिज्ञा के द्वारा हमें उसका अनुभव न कराता। क्योंकि परमेश्वर अपने आप को हमारे सामने वैसा ही प्रकट करता है जैसा वह वास्तव में है, जब वह हमारे प्रति अपने प्रेम की साक्षी देता है तो अपना हृदय पूरा खोल देता है।
इसीलिए मैंने कहा कि हमारी सब प्रार्थनाओं में हमें ये दो बातें विचार में रखनी चाहिए: एक यह कि परमेश्वर ऐसा भला और प्रेमी है कि यद्यपि हम दीन और अभागे प्राणी हैं, और गोबर और दुर्गन्ध के सिवा कुछ नहीं, तथापि वह हमसे प्रेम करना और हमारे उद्धार की बड़ी चिन्ता करना नहीं छोड़ता। और जब हम उस प्रतिज्ञा तक पहुँच गए हैं, जो इस बात की निश्चित साक्षी है कि परमेश्वर ऐसा ही है, तो हमें इस विषय में और सन्देह नहीं करना चाहिए कि वह हमारे प्रति कैसा भाव रखता है, मित्र का या शत्रु का, क्योंकि वह हमारे प्रति बँधने को भली-भाँति इच्छुक है, यह बताकर कि वह हमारा पिता है और हमें अपनी सन्तान मानता है।
अब दाऊद ऐसी विनती इसलिए करता है, जैसा हम पहले छू चुके हैं, कि वह उन्हें उत्तर दे सके जो उसे लज्जित करते थे। यद्यपि वह शब्द-दर-शब्द कहता है, ताकि मैं उन्हें उत्तर दूँ जो मुझे लज्जित करते हैं। यहाँ दाऊद घोषणा करता है कि जब परमेश्वर उसकी सहायता कर चुका होगा, तब वह अपने सब शत्रुओं का सामना कर सकेगा, अविश्वासियों और विश्वासहीनों की सब हानियों और उपहासों को टाल सकेगा जो वे उसके सामने रखते थे, ताकि विश्वासियों को हिला दें और कुचल डालें, वरन् यदि उनके वश में होता तो उनके विश्वास को सर्वथा निकम्मा कर दें। इससे हम यह समझने की ओर चलाए जाते हैं कि यदि हम परमेश्वर से प्रार्थना करें, तो चाहे जब कभी सारा संसार हम पर टूट पड़े, और ऐसा लगे कि हम एक लाख बार नरक में डुबो दिए जाएँगे, तब भी हम अपने सब शत्रुओं के विरुद्ध दृढ़ खड़े रह सकते हैं: हाँ, सचमुच, क्योंकि परमेश्वर हमें कभी निराश न करेगा, जब कभी हम उससे चाहें और विनती करें कि वह अपनी प्रतिज्ञाएँ हमारे लिए पूरी करे, और हमारे उद्धार के लिए अपनी भलाई का हमें अनुभव कराए। फिर, यदि हमारे पास उन दुष्टों और अभक्तों का सामना करने का साधन है जो हमारे विश्वास को डराने और दबाने आते हैं, तो हमारे पास शैतान का सामना करने का साधन भी होगा। क्योंकि जब मनुष्य हमें सताएँ, या परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं की हँसी उड़ाएँ, और हमें उनसे फेर देने के लिए यथासम्भव परिश्रम करें, तो यह उनकी अपनी ओर से नहीं होता, परन्तु शैतान ही है जो उन्हें आगे धकेलता है। इसी प्रकार तब, यदि हम दाऊद के उदाहरण के अनुसार परमेश्वर से प्रार्थना करें, तो हम शैतान के सब संघर्षों के विरुद्ध लड़ सकते और जय पा सकते हैं।
यह भी विचारने और ध्यान देने योग्य है जो वह यहाँ जोड़ता है, जब कहता है, मेरा आनन्द तेरे वचन में है। वह बताता है कि इससे पहले उसने परमेश्वर से कौन-से चिह्न और लक्षण चाहे थे कि वह उसके साथ वैसा ही करे जैसा उसने प्रतिज्ञा की थी। क्योंकि मुझे उसमें आनन्द है, वह कहता है, तो क्या हम चाहते हैं कि परमेश्वर की प्रतिज्ञाएँ हम में पूरी हों, कि वे द्वार खोलें जिससे हम उसके पास आ सकें, कि वे कुंजियों के समान हमें प्रवेश दिलाएँ, ताकि हमारी विनतियाँ और याचनाएँ ग्रहण की जाएँ? तब हमें उनके साथ आशा को भी जोड़ना होगा। और देखो, इसका क्या कारण है कि हम परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं की सामर्थ्य का वैसा अनुभव नहीं करते जैसा करना चाहिए: कारण यह है कि हमें उन पर न आशा है, न भरोसा। यह अत्यन्त सच है कि परमेश्वर अपनी ओर से अपने वचन में सदा सच्चा है: और यद्यपि हम अभागे विश्वासहीन लोग हैं, तथापि वह अपना दिया हुआ वचन कभी झूठा न करेगा। परन्तु क्या? निश्चय ही हम ऐसे आनन्द का अनुभव करने के योग्य नहीं हैं। वास्तव में परमेश्वर ने प्रतिज्ञा की है कि वह हम पर अपना अनुग्रह उण्डेलेगा, जैसा वह उसे हमारे सामने रखता भी है: पर तब भी हम उसके सर्वथा अयोग्य हैं, जब तक हम उसकी प्रतिज्ञाओं पर विश्वास न करें, तो क्या हम चाहते हैं कि परमेश्वर हमारे साथ अपने वचन के अनुसार करे? तब हमें उसका वचन ग्रहण करना और विश्वास से उसे गले लगाना होगा: जैसा प्रेरित भी इसके विषय में कहता है। और इन पहले दो पदों के विषय में इतना ही।
अब आगे: अपने सत्य के वचन को मेरे मुँह से कभी न छीन, क्योंकि मैं तेरे न्यायों की बाट जोहता हूँ।
जब दाऊद कहता है, “हे प्रभु, अपने सत्य के वचन को मेरे मुँह से न छीन,” तो उसका अभिप्राय केवल यही नहीं कि वह अपनी जीभ से परमेश्वर की बड़ाई करे और संसार के सामने बहुत सी सुन्दर घोषणाएँ करे, परन्तु वह यह मानकर चलता है कि जब वह परमेश्वर के सत्य की साक्षी अपने मुँह से दे चुका हो, तब वह उसके हृदय के भीतर भी रोपा हुआ होना चाहिए। और सचमुच दाऊद यहाँ कपटियों के समान नहीं बोलता, जैसे वे लोग जो उसके सामने सुन्दर दिखावा करना चाहते हैं और जब खुले रूप में उन्हें बहुत विश्वासी, सम्मानित और बहुत सज्जन माना जाता है तब अपने आप को भली दशा में समझते हैं। वे सोचते हैं कि बस इतना ही चाहिए। परन्तु दाऊद इस रीति से आगे नहीं बढ़ा: क्योंकि जब वह कहता है, “हे प्रभु, अपने सत्य के वचन को मेरे मुँह से न छीन,” तो यह वैसा ही है मानो वह कहता, “हे प्रभु, मुझ पर केवल यही अनुग्रह न कर कि मैं गुप्त में तुझ पर भरोसा रखूँ, तेरी प्रतिज्ञाओं पर टिका रहूँ, अपने शत्रुओं के सब आक्रमणों के विरुद्ध दृढ़ खड़ा रहूँ, परन्तु विशेषकर और प्रमुखता से मनुष्यों के सामने भी: कि मेरा विश्वास अपने आप को प्रकट करे, कि इस प्रकार मैं उन सब का मार्गदर्शन और शिक्षा कर सकूँ जो तेरे पास आना चाहें: और इसके विपरीत, उन सब का सामना कर सकूँ जो मेरी इस आत्मिक आशा को उलटने का यत्न करें, जो मुझे तुझ में और तेरे सत्य में है। और जब तू, हे प्रभु, अपने वचन को मेरे हृदय में गहरा जमा चुका हो, तो वह मेरे मुँह में भी बार-बार रहे, ताकि मैं मनुष्यों के सामने तेरे नाम की बड़ाई करूँ।
हमें इस स्थल से सीखना है कि पहले तो हमें परमेश्वर के सत्य के विषय में निश्चिन्त होना चाहिए, चाहे मनुष्य हमारी ओर से उसे न भी जानें। और फिर, चाहे हर एक मनुष्य उसे अपने तक ऐसा गुप्त रखे कि संसार भर में कोई न जाने, तौभी परमेश्वर और उसके स्वर्गदूत जानते हैं कि हम उसे कितना सच्चा और निश्चित मानते हैं, और किस प्रकार उसे वह आदर देते हैं जो उसका है, और उसे सचमुच ऐसा मानते हैं जो सच्चा और विश्वासयोग्य समझे जाने के योग्य है। और पहली बात के विषय में इतना ही। अब दूसरी के लिए, आओ, हम सोच-विचार कर अपने पड़ोसियों की उन्नति का ध्यान रखें, कि वे हमारे उदाहरण से दृढ़ हों, और सब एक मन होकर परमेश्वर पर भरोसा रखें, कि दुष्ट और अभक्त लज्जित हों, कि हम उन्हें खिजाएँ, कि हमारे पास घमण्ड करने को कुछ हो, उनकी सब चालों, गुप्त युक्तियों और जो-जो बुराई वे हमारे विरुद्ध सोच सकते हैं, और हमें अपने ही समान अपवित्र बनाने का विचार करते हैं, उनके होते हुए भी, कि दाऊद के उदाहरण के अनुसार हम उन्हें दूर कर सकें। देखो तब, वह वचन जिसे वह सदा अपने मुँह में रखना चाहता है, कि उन सब को दृढ़ करे जो परमेश्वर पर भरोसा करना चाहते हैं, और उन सब को लज्जित करे जो उसके वचन और सत्य का उपहास और तिरस्कार करते हैं। पर “कभी” कहने से उसका क्या अभिप्राय है? यही कि वह अपनी सब विपत्तियों में मानो परमेश्वर से त्यागा हुआ, गूँगे के समान था और बोल नहीं सकता था, जैसा वह दूसरी जगह शिकायत करता है। और सचमुच, जब तक परमेश्वर हमें अपने अनुग्रह का कोई चिह्न नहीं दिखाता, तब तक यद्यपि हमारे शत्रु खुले मुँह से हमारा उपहास करें, तथापि हमें यह स्वतंत्रता नहीं कि उनका खण्डन करें और उनके मुँह बन्द कर दें। इसलिए दाऊद ऐसे लम्बे समय तक परखा जाकर चाहता है कि वह अंगीकार, जिससे वह परमेश्वर की बड़ाई कर सके, उससे सदा के लिए छीना न जाए। इसमें हमें यह देखना है कि यदि परमेश्वर कभी हमें संसार की रीति के अनुसार व्याकुल छोड़ दे, तो निराश होने के बदले हमें उससे विनती करनी चाहिए कि वह हमारे मुँह को सदा के लिए बन्द न होने दे।
अब वह इसे फिर दोहराता है: “क्योंकि मेरी आशा तेरे न्यायों में है।” दाऊद का बार-बार यह घोषणा करना बिना कारण नहीं: क्योंकि जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, देखो, परमेश्वर का वचन हमें कैसी शक्ति और प्रभाव का अनुभव कराता है (उस स्थल के अनुसार जो मैंने इब्रानियों की पत्री से दिया है), जब उसके साथ आशा भी हो, जो विश्वास पर टिकी है। यह सच है कि परमेश्वर ने अपना हाथ अपने लोगों की ओर बढ़ाया जब वह उन्हें मिस्र देश से निकाल लाया, ताकि उन्हें प्रतिज्ञा की हुई भूमि में पहुँचाए। परन्तु क्या? लोग परमेश्वर पर टिके नहीं रहे, और इसलिए उचित था कि वह प्रतिज्ञा निष्फल हो जाए, और ऐसे विश्वासहीन लोगों के लिए न्यायसंगत भी। परमेश्वर को ऐसा अद्भुत और विलक्षण उपाय ढूँढ़ने में देर न लगती कि मनुष्य सोच भी न सकता कि जो उसने कहा है वह कैसे पूरा होगा। पर इससे उन विश्वासहीनों को कुछ लाभ न हुआ: क्योंकि देखो, ऐसे लाभ से वंचित होकर वे उस प्रतिज्ञा की हुई मीरास से रहित रह गए। तो आओ, हम सीखें कि जब हम चाहते हैं कि परमेश्वर अपना हाथ हमारे लिए खोले और हम पर उदारता करे, कि हम उसकी पराक्रमी शक्ति का अनुभव करें, और उसकी प्रतिज्ञाओं का फल और लाभ पहचानें, तो उचित है कि हम उन्हें अपने हृदय में गहरा बैठा लें: कि दाऊद के उदाहरण के अनुसार हम कह सकें, “हे प्रभु, मेरी आशा तेरे न्यायों में है।” क्योंकि इस शब्द “खराई” या “न्याय” का, जैसा हम इससे पहले यहाँ समझा चुके हैं, अर्थ परमेश्वर की व्यवस्था में निहित शिक्षा के सिवा और कुछ नहीं। हाँ, यद्यपि वह यहाँ भिन्न-भिन्न शब्द काम में लाता है, तथापि वे सदा एक ही उद्देश्य की ओर जाते हैं। देखो तब, परमेश्वर के न्यायों को हमें किस ओर ले जाना है: अर्थात् जो हम परमेश्वर के वचन में पढ़ते हैं और जो उसी में से हमें सुनाया जाता है, उसे हमें निश्चित और अटल विधियाँ और आज्ञाएँ जानना और समझना चाहिए, और ऐसी भली-भाँति व्यवस्थित कि उनमें सुधार की गुंजाइश ही नहीं, और इसलिए अपनी सारी आशा और भरोसा उन्हीं पर रखना चाहिए। अब वह आगे कहता है,
“तब मैं सदा तेरी व्यवस्था का पालन करता रहूँगा: हाँ, सदा सर्वदा। और मैं स्वतंत्रता से चलूँगा: क्योंकि मैं तेरी आज्ञाओं का खोजी हूँ।”
दाऊद यहाँ केवल अपने अच्छे भाव और खराई की घोषणा ही नहीं करता, वरन् वह फल और लाभ भी दिखाता है जो उसे तब प्राप्त होगा जब परमेश्वर उसकी सहायता कर चुका होगा और वह अपने विश्वास के फल का अनुभव कर चुका होगा। देखो, तब इस स्थल की व्याख्या यों होनी चाहिए: “हे प्रभु, जब मैं एक बार तुझे अपना उद्धारकर्ता जान लूँगा और तेरी दया का अनुभव कर लूँगा, तब मैं तेरी व्यवस्था का बहुत अच्छी रीति से पालन करूँगा।” मानो वह कहता, “मैं तेरी आज्ञाकारिता में निरन्तर दृढ़ किया जाऊँगा, और यह मुझे सदा आगे बढ़ते रहने में बड़ी सहायता देगा।” और सच तो यह है कि जितने अनुग्रह हमें परमेश्वर से मिलते हैं, उन्हें हमें और भी आगे ले जाना चाहिए, कि यदि हम पहले से ही अच्छे मार्ग पर और उन्नति में हैं, तो इसी उद्देश्य से कि हम उसमें बने रहें और अधिकाधिक आगे बढ़ते जाएँ, जब तक अन्त तक न पहुँचें।
यह बहुत सच है कि परमेश्वर हमें चलाने में कोई प्रतिफल नहीं ढूँढ़ता। क्योंकि वह उसे सहज ही टाल देगा: पर यह हमारे उपयोग और शिक्षा के लिए कहा गया है। और जब हम परमेश्वर से प्रार्थना करें, तो हमें वे सब बातें ढूँढ़नी चाहिए जो हमें दृढ़ कर सकें, कि हम सन्देह न करें कि परमेश्वर हमारी विनतियाँ सुनेगा, और यह भी समझें और जानें कि जो लाभ वह हमें देता है और जो हम उसके हाथ से पाते हैं, उन्हें हमें किस उद्देश्य की ओर ले जाना चाहिए। तो अब, जब दाऊद कहता है, “मैं सदा तेरी व्यवस्था का पालन करता रहूँगा: हाँ, सदा सर्वदा,” इससे हमें यह ध्यान देना है कि जैसे-जैसे परमेश्वर उदारता से हम पर अपने लाभ उण्डेलता है, वैसे-वैसे हमारा विश्वास उसमें और भी दृढ़ होना चाहिए, और हमें और भी बढ़कर सच्ची अभिलाषा और उत्साह से भड़कना चाहिए कि हम अपने आप को पूरी तरह उसे सौंप दें, उसकी धार्मिकता से लगे रहें, और उसकी व्यवस्था और वचन का पालन करें। और मैं चाहता हूँ कि परमेश्वर करे कि यह हमारे मनों में गहरा अंकित हो जाए। परन्तु क्या? हम वह कृतघ्नता देखते हैं जो मानो हम सब में है। क्योंकि परमेश्वर हमारी भलाई करना कभी नहीं छोड़ता और प्रतिदिन हमें नया कारण देता रहेगा कि हम उस पर भरोसा रखें, उससे प्रेम करें और उसकी सेवा करें। परन्तु वह हमारे लिए जो कुछ करता है, उससे हमें कुछ लाभ नहीं होता, क्योंकि हम सदा बर्फ़ के समान ठण्डे रहते हैं: हम में कोई उत्साह नहीं, कोई हलचल तक नहीं, यहाँ तक कि लगता है कि हम सर्वथा संवेदनाहीन हैं। और इसलिए हमें इस शिक्षा पर और भी मनन करना चाहिए: क्योंकि यही हमारी इतनी बड़ी सुस्ती और ठण्डेपन को सुधारने की सही औषधि है।
तो आओ, सीखें कि जब दाऊद कहता है, “हे प्रभु, मैं तेरी व्यवस्था का पालन करूँगा,” तो इससे उसका अभिप्राय यह है कि जैसे-जैसे परमेश्वर हमारी ओर अपना सहायक हाथ बढ़ाता है, और हम उसके अनुग्रहों का अनुभव कर चुके हैं, और वह फल और लाभ पा चुके हैं जिसकी हमने उसकी प्रतिज्ञाओं में आशा रखी थी: तो वह हमारे लिए और भी अधिक विस्तृत और पूर्ण दृढ़ता का कारण होना चाहिए, और हमें और भी बढ़कर परमेश्वर से प्रेम करने, उसकी सेवा करने, और अपने आप को उसके वचन के अधीन करने के लिए उभरना चाहिए, सारांश यह कि जैसा यहाँ कहा गया है, उसकी व्यवस्था का पालन करना। परन्तु इससे भी बहुत कुछ विचारने को है। क्योंकि दाऊद यहाँ हवा के झोंके की बात नहीं करता, जैसे कुछ लोग थोड़े समय के लिए बहुत उत्साही हो जाते हैं: परन्तु वह कहता है, “मैं सदा तेरी व्यवस्था का पालन करता रहूँगा: हाँ, सदा सर्वदा।” इसमें वह दिखाता है कि हमें परमेश्वर के लाभों का ऐसा स्मरण रखना चाहिए जो हम से कभी न छूटे। क्योंकि जैसा मैं इसके विषय में पहले कह चुका हूँ, इस विषय में हम कुछ लोगों को देखेंगे, जो थोड़ी देर के लिए प्रभावित होते हैं, जब परमेश्वर उन्हें किसी संकट से छुड़ा चुका हो और उन पर कोई कृपा और अनुग्रह कर चुका हो: उन्हें बहुत अच्छा स्वाद और अनुभव होगा और वे कहेंगे, “हाय, मैं अपने परमेश्वर का कितना ऋणी और कृतज्ञ हूँ?” देखो, कोई सोचेगा कि ये लोग भले भाव रखते हैं। परन्तु हाथ फेरते ही निश्चय वह भुला दिया जाता है: या कम से कम यदि वे थोड़ी देर उसे स्मरण रखें, तो फिर ठण्डे पड़ जाते हैं और उसका कुछ विचार नहीं करते। चूँकि बात ऐसी है, तो आओ, इस स्थल में जो कहा गया है उसके अनुसार ध्यान दें कि परमेश्वर के लाभों का स्मरण हमारे हृदयों से कभी मिटना उचित नहीं: परन्तु आओ, उससे विनती करें कि वह हमसे सदा सर्वदा अपनी व्यवस्था का पालन कराए: और हमें इस प्रकार शिक्षा दे कि हम उससे और कुछ न चाहें, केवल यह कि उसके प्रताप और उसकी धार्मिकता से लगे रहें। आगे यों है:
“कि वह स्वतंत्रता से चलेगा: क्योंकि वह उसकी आज्ञाओं का खोजी है।”
स्वतंत्रता से चलने का अर्थ है अपनी इच्छा और मर्ज़ी से चलना: क्योंकि जैसे जब हम किसी तंग और सँकरी कोठरी में होते हैं, तो नहीं जानते कि किस ओर मुड़ें, वरन् अपने आप को बिलकुल घिरा हुआ समझते हैं: वैसे ही हम बहुत तंगी में रखे जाते हैं, या फिर चारों ओर देखते हैं कि कोई निकलने की राह मिले, और इस प्रकार उलझन या सन्देह में पड़े रहते हैं। तो क्या परमेश्वर की व्यवस्था में हमें यही निश्चय और आनन्द होना चाहिए? क्या? क्या यही है? दाऊद इसके विपरीत कहता है, “कि वह स्वतंत्रता से चलेगा: अर्थात् जब वह परमेश्वर की आज्ञाओं को ढूँढ़ चुका होगा, तब वह साहस के साथ चौड़े और घिसे हुए मार्ग पर चलेगा, जैसा हम कहते हैं।” यह भी ऐसी बात है जिसे हमें भली-भाँति देखना और थामे रखना चाहिए। क्योंकि पवित्र आत्मा दाऊद के मुँह से हमें ठीक यही दिखाना चाहता है कि जब हम चाहते हैं कि हमारा जीवन परमेश्वर की आज्ञाओं से शासित हो, कि हम उसे अपना अगुवा और मार्गदर्शक होने दें, और अपने सब कार्यों और व्यवसायों की बागडोर उसे सौंप दें, तो वह हमारे साथ ऐसा ही अपने आप को ढालेगा, जहाँ तक वह हमारे उद्धार के लिए भला और उचित जानेगा।
और इसके ज्ञान से जो लाभ हमें मिलता है वह अनमोल है: अर्थात् यह कि हम स्वतंत्रता से चल सकते हैं। अर्थात् हम अनेक सन्देहों और दुःखों से छुड़ाए जाते हैं: कि यद्यपि हम किन्हीं दुःखों से दबाए जाएँ, तौभी हम सर्वथा उलटाए और गिराए नहीं जा सकते: क्योंकि हम सदा यही निष्कर्ष निकालते हैं कि हम पराजित नहीं हो सकते, क्योंकि परमेश्वर हमें अपने सामर्थी और बलवन्त हाथ से थामे हुए है। और सचमुच, मैं तुमसे पूछता हूँ, क्या कारण है कि मनुष्य इतनी बार पीड़ित किए जाते हैं, केवल यही कि वे अपने आप को परमेश्वर के अधीन नहीं करते? यह बहुत सच है कि बहुत थोड़े हैं जो इसे जानते हैं, पर कारण यही है: क्योंकि जब हम बात को कुछ और निकट से देखेंगे, तो पाएँगे कि हमारी अपनी कृतघ्नता से बढ़कर किसी बात ने हमें इतनी बाधा नहीं दी: पर क्योंकि हम अति-बुद्धिमान बनना चाहते हैं, परमेश्वर को यह आदर नहीं देते कि वह हम पर शासन करे और हमारे जीवन का पूरा संचालन करे, और न उसकी प्रजा बनते हैं, इसलिए उचित है कि हम इसकी उचित मज़दूरी पाएँ। क्योंकि मनुष्य जब कोई बात उनके करने की होती है, तो तुरन्त अपनी ही कल्पनाओं में जा पड़ते हैं, वे कभी परमेश्वर की शरण लेने और उसे पुकारने का विचार तक नहीं करते, परन्तु हर एक वही करेगा जो उसे अपनी दृष्टि में उत्तम लगे। और इसलिए उचित है कि परमेश्वर हमें उसी सिक्के में चुकाए जिसके हम योग्य थे, अर्थात् हमें ऐसे सन्देह में डाल दे कि हम कभी न जान सकें कि हमारा क्या होगा, यहाँ तक कि वेदनाएँ हमें कहने को विवश करें, “इस बात का क्या होगा? मैं किधर से आरम्भ करूँ? और इसका अन्त और परिणाम क्या होगा?”
देखो, हम इस दुखी और अभागे संसार को प्रतिदिन कैसे कसकर संकटों में बन्द देखते हैं, कि ऐसा लगता है मानो हम परित्यक्त से भी बढ़कर हैं।
और इसका कारण क्या है? वे ही मनुष्य जिन्होंने अपने लिए ऐसी भूलभुलैयाँ बना ली हैं। क्योंकि वे ही अपने इतने बड़े कष्टों के कारण हैं। क्योंकि दाऊद ने यहाँ हमें बताया है कि जितने परमेश्वर की आज्ञाओं को खोजते हैं, वे स्वतंत्रता से चलते हैं। यह बहुत सच है कि विश्वासी, यद्यपि वे परमेश्वर की आज्ञा मानने और उसे अपना शासक होने देने का भरसक यत्न करते हैं, तौभी वे अद्भुत दुःखों और कष्टों से रहित नहीं होते, कि वे बहुत बार किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाते हैं और नहीं जानते कि क्या करें, पर तौभी वे परमेश्वर के पास आते हैं, और अपनी सारी चिन्ता उसी पर डाल देते हैं, जैसा सैंतीसवें भजन में लिखा है। और वहाँ वे अपने आप को मुक्त और बोझ-रहित पाते हैं। और इस प्रकार वे प्रतिदिन आगे बढ़ते जाते हैं: क्योंकि उन्हें निश्चय है कि परमेश्वर उन्हें कभी निराश न करेगा। देखो तब, हम बहुत से शोकों और दुःखों से भली-भाँति परखे जा सकते हैं, और बहुत सी बेचैनियों से हम मुक्त भी नहीं हो सकते: पर तौभी परमेश्वर सदा हमें उनसे हल्का करेगा, जैसा भजन के एक और स्थान में कहा गया है, कि जब हम कुछ समय तक कसकर बन्द रहे हों, तौभी परमेश्वर हमें स्वतंत्र करेगा: जैसा सन्त पौलुस भी 2 कुरिन्थियों में कहता है: यह बहुत सच है, वह कहता है, कि हम बहुत सी यातनाओं और दुःखों से दबाए जाते हैं, परन्तु हम शोक और पीड़ा में पड़े नहीं रहते: क्योंकि परमेश्वर सदा हमें छुड़ाएगा, और हमें भला और आनन्दमय परिणाम देगा, ताकि अन्त में हम उन पर जय पा सकें।
तो देखो, इस स्थल में हमें क्या बताया गया है, जहाँ कहा गया है, “हे प्रभु, मैं स्वतंत्रता से चलूँगा, क्योंकि मैं तेरी आज्ञाओं का खोजी हूँ।” इसी प्रकार हम जानें कि जब हमारा जीवन दुखी और अभागा है, और हमें दर्द, यातना और शोक में जीना पड़ता है: तो यह सब हमारे पाप के कारण होता है, क्योंकि हम अपने आप को परमेश्वर के सामने प्रस्तुत नहीं करते, अपने आप को उससे चलाए जाने नहीं देते, अपने जीवन उसके हाथों में नहीं सौंपते, और न अपनी पीड़ा जान लेने के बाद इच्छा से उपाय ढूँढ़ने आते हैं: अर्थात् परमेश्वर से यह चाहने कि वह हमें अपनी सुरक्षा में ले लेने की कृपा करे, और किसी और वस्तु की आशा और बाट न जोहें, केवल उसकी जो वह अपने वचन से हमें बताता है। क्योंकि जब हम ऐसा करेंगे, तो निःसन्देह वह हमें स्वतंत्रता से चलाएगा। अब आगे है:
“मैं राजाओं के सामने भी तेरी चितौनियों की चर्चा करूँगा: और लज्जित न होऊँगा।”
देखो, उस बात की घोषणा जिसे हम इससे पहले यहाँ छू चुके हैं: क्योंकि दाऊद ने यह विनती करते हुए कि सत्य का वचन उसके मुँह से सदा के लिए न छीना जाए, दो बातों पर दृष्टि रखी थी: अर्थात् बोल सकना, इसके बाद कि परमेश्वर ने उस पर अनुग्रह करके उसका मुँह खोला हो, अपने उदाहरण से परमेश्वर की सन्तानों को दृढ़ किया हो, और उन्हें मार्ग दिखाकर अपने पास लाया हो, और इस बीच दुष्टों को और परमेश्वर और व्यवस्था के तिरस्कार करनेवालों को, उसकी आशा का उपहास करनेवालों और परमेश्वर की निन्दा करनेवालों को परास्त किया हो: तौभी वह, मैं कहता हूँ, उन्हें पीछे हटा सके और उन सब के विरुद्ध अपना पक्ष स्थिर रख सके। और इस बात को वह साफ़-साफ़ घोषित करता है, जहाँ वह कहता है,
“मैं तेरी चितौनियों की चर्चा करूँगा, क्योंकि परमेश्वर सत्य के वचन को फिर उसके मुँह से न छीनेगा।”
अब इसके सिवा कि परमेश्वर हमें निःसंकोच बोलने की सामग्री देता है, वह हमें उसी की ओर से आनी चाहिए, जैसा हम सुनते हैं कि हमारे प्रभु यीशु मसीह ने कहा है: कि यह पवित्र आत्मा है जो हमारी जीभों का मार्गदर्शन करता है, कि हम अपने शत्रुओं को उत्तर दे सकें, यह हमारी अपनी ओर से नहीं आता, क्योंकि हमें गिराने के लिए हवा का एक हल्का झोंका ही काफ़ी है। इसलिए उचित है कि परमेश्वर अपनी शक्ति काम में लाए ताकि हम उससे दृढ़ किए जाएँ: क्योंकि जब वह अपना वचन हमारे मुँह में रखेगा, तो हम राजाओं और हाकिमों के सामने बोल सकेंगे और कभी लज्जित न होंगे। मानो वह कहता, “हे प्रभु, तेरा वचन हमारे लिए ऐसी सामर्थ्य का होना चाहिए कि हम अपने शत्रुओं को परास्त कर सकें, चाहे वे कितने ही बड़े और बलवन्त हों: चाहे वे ऐसे हों जो सारे संसार को चकित और भयभीत कर सकें, तौभी हमारा विश्वास उनके प्रताप और ठाठ-बाट से न उलटे: यह जानकर कि जब वे सब कुछ निगल जाने की सोचेंगे, तब भी हम सदा विजयी बने रहेंगे, हाँ ठीक इसीलिए कि हमारी दृष्टि उस पर है।”
अब यहाँ हमें यह ध्यान देना है कि जब परमेश्वर अपने सत्य को हम में सामर्थी बनाता है, तो वह हमें थामे रखने के लिए पर्याप्त होगा, हाँ, उन सब संघर्षों के होते हुए भी जो शैतान हमारे विरुद्ध उठाएगा, और चाहे सारा संसार उसके विपरीत खड़ा हो। और यह बिना कारण नहीं कहा गया, क्योंकि हमारा विश्वास किस पर स्थिर है? परमेश्वर के सत्य पर ही। अब आओ, परमेश्वर की तुलना मनुष्यों से और उनके सब कामों और गुणों से करें। आओ, सम्राटों और राजाओं को लें: और उनका सारा वैभव और ठाठ-बाट प्रदर्शन के लिए सामने रखा जाए, और परमेश्वर को ठीक उनके सामने खड़ा किया जाए: अर्थात् क्या मनुष्य अपने सारे प्रताप और बड़ी डींगों के साथ परमेश्वर पर प्रबल हो सकते हैं, उसकी इच्छा को पलट सकते हैं, या उसकी शक्ति और सामर्थ्य को निष्फल कर सकते हैं? अहा, यह अत्यन्त निश्चित है कि वे कभी ऐसा नहीं कर सकते।
तो आओ, विचार करें कि हमारा सामना किससे है, और सन्त पौलुस के इस वचन को स्मरण करें, “तू जानता है (वह कहता है) कि तेरा विश्वास किस उद्देश्य के लिए है।” तब जब हमारी आँखें उस परमेश्वर पर जमी होंगी जिसने हमें अपने अचूक सत्य से सुसज्जित किया है, तो हम उस सब का सामना कर सकेंगे और डटकर खड़े रह सकेंगे जो उसके विरुद्ध सिर उठाता है: हमें संसार से डरने का कोई कारण न होगा, क्योंकि परमेश्वर उन सब सन्देहों और दुःखों पर जय पाने के लिए पर्याप्त समर्थ है जो शैतान हमारे विरुद्ध उठाएगा। और इस बात के विषय में इतना ही।
फिर, हम देखते हैं कि जब अपने विश्वास का अंगीकार करने का प्रश्न हो, तो ऐसा नहीं हो सकता कि मनुष्य अपनी सारी शक्ति और सामर्थ्य से हमें घबरा और डरा दें: जैसा आज हम देखते हैं, जब वे हमें कँपाना चाहते हैं। वे कहेंगे, महाशय, आपसे विनती है, आप तो मुट्ठी भर लोग ही हैं। क्या आप अपने आप को संसार के सब राजाओं और हाकिमों से अधिक बुद्धिमान समझते हैं? आप देखते हैं कि सारा संसार इस शिक्षा के विरुद्ध है जिसे आप मानते और अंगीकार करते हैं: और आप क्या करने की सोचते हैं? सच है कि पहली दृष्टि में यही हमें हिला देने को काफ़ी होता, हाँ, यदि हम न जानते और पूरी तरह निश्चित न होते: परन्तु जब हम परमेश्वर की ओर देखते हैं, तब यह सारा सामान धुएँ में उड़ जाता है: ये तो हवा से फूले हुए बुलबुले हैं: और सुई की नोक भी इन्हें खाली कर देगी। सचमुच ये बड़ी डींगें होंगी, पर सब व्यर्थ ठहरेगा। देखो ये मेंढक, देखो ये चींटियाँ, हाँ, देखो ये मक्खियाँ और मच्छर, क्योंकि जब वे इस प्रकार परमेश्वर के विरुद्ध सिर उठाते हैं तो वे सब कीड़े-मकोड़ों और कृमियों से बढ़कर कुछ नहीं।
तो आओ, सीखें, हाँ सीखें, कि अपने आप को परमेश्वर पर ऐसा टिकाएँ कि जब हमें अपने विश्वास का अंगीकार करने के लिए बुलाया जाए, तो चूँकि बोलनेवाला परमेश्वर है, संसार के सब प्राणी हमारे लिए कुछ न हों: हम लज्जित न हों, और कोई बात हमें उसके वचन का समर्थन करने से रोके और बाधित न करे। अन्त में दाऊद निष्कर्ष निकालकर कहता है,
“मैं तेरी आज्ञाओं की ओर भी, जिनसे मैंने प्रेम रखा है, अपने हाथ उठाऊँगा: और तेरी विधियों पर मेरा ध्यान लगा रहेगा।”
इन दो पदों की यहाँ लम्बी व्याख्या की आवश्यकता नहीं, क्योंकि ये वाक्य हम पहले ही देख चुके हैं: तौभी दाऊद हमें दिखाता है कि इस शिक्षा पर थोड़े समय तक विचार करना काफ़ी नहीं: परन्तु हमें अपने जीवन भर इसमें और अधिक उन्नति करते जाना चाहिए।
देखो, यहाँ मुख्य बात जो हमें ध्यान में रखनी है, वह यह कि हमें परमेश्वर की उन आज्ञाओं में आनन्दित होना चाहिए जिनसे हमने प्रेम रखा है: अर्थात् हमें सीखना चाहिए कि परमेश्वर के वचन के पीछे चलने और उससे लगे रहने की ऐसी अभिलाषा और चाह अपने में उत्पन्न करें कि हम पूरे निश्चय के साथ कह सकें, “सचमुच, यह सबसे मधुर और सुहावनी बात है जो हो सकती है, कि हम अपने परमेश्वर के जूए के अधीन हों और उसे उठाएँ, और इसलिए हमें उसमें खिंचना और उसकी आज्ञा माननी चाहिए।” क्या हमने ऐसा किया? तब हमें उन अनेक मूर्खतापूर्ण व्यर्थताओं के स्थान पर जिनकी ओर हम झुके रहते हैं, हाँ, और शैतान की दुष्ट अभिलाषाओं और फुसलावों के स्थान पर, परमेश्वर के वचन में आनन्दित होना सीखना चाहिए, कि हम (दाऊद के उदाहरण के अनुसार) सच्चाई से घोषणा कर सकें कि ये परमेश्वर की वे आज्ञाएँ हैं जिनसे हमने प्रेम रखा है। फिर आओ, इस वाक्य को भली-भाँति ध्यान में रखें, जब वह कहता है, “मैं तेरी आज्ञाओं की ओर अपने हाथ उठाऊँगा।” क्योंकि यह वैसा ही है मानो वह कहता, “हे प्रभु, मैं केवल अपने मुँह से यह घोषणा न करूँगा कि मैं तेरे वचन से प्रेम रखता हूँ, वरन् अपने हाथ भी उठाऊँगा: हाँ, जैसा हम साधारणतः कहते हैं, मैं हाथ उठाकर परमेश्वर की ओर बढ़ाऊँगा।” इससे वह हमें समझाता है कि यदि हम परमेश्वर की सेवा वैसी करना चाहें जैसी हमें शोभा देती है, तो हमारे लिए यह काफ़ी नहीं कि हम परमेश्वर के सत्य की साक्षी अपने मुँह से दें, परन्तु हमें अपने भले और भक्तिपूर्ण जीवन से भी वह दिखाना चाहिए जिसकी घोषणा हम मुँह से करते हैं, और दोनों में मेल और मधुर संगति हो। सच है, जब परमेश्वर के पीछे चलने का प्रश्न होगा, तब हमें कुछ सन्देह मिलेंगे: परन्तु यह वाक्य ध्यान देने योग्य है, जब वह कहता है, “मैं अपने हाथ उठाऊँगा।”
और यह जान लेने के लिए कि जब परमेश्वर देखे कि यह हमारे बल और सामर्थ्य से परे है, तो हम उससे प्रार्थना करें कि वह हमें यह अनुग्रह दे, कि हम उसकी आज्ञाओं की ओर अपने हाथ उठा सकें, अर्थात् जितना ऊँचा हम सम्भवतः उठा सकें, ताकि हम उसके अनुग्रह और सामर्थ्य को पहले से बेहतर थाम सकें। देखो, इस विषय में हमें किस रीति से करना चाहिए, कि अपनी ही शक्ति और बल का भरोसा न करते हुए भी हम इस भले परमेश्वर से विनती करें कि वह अपने अनुग्रह को हम में ऐसा सामर्थी बना दे कि वह वहाँ बस जाए और राज्य करे, और हमें जनाए कि वह हमें अपने पास व्यर्थ नहीं बुलाता और अपना सत्य नहीं देता। और यह वह निःसन्देह करेगा, बशर्ते हम उसके उस अनुग्रह को ठुकराएँ नहीं जो वह हमें सेंतमेंत देता है। और इसी पवित्र शिक्षा के अनुसार आओ, हम अपने भले परमेश्वर के प्रताप के सामने दण्डवत् करें, अपने दोष मानते हुए, उससे विनती करते हुए कि वह कृपा करके हमारी आँखें खोले, ताकि हम अपनी दुर्दशा और उस दयनीय स्थिति को जानें जिसमें हम खड़े हैं, कि हम उसकी ओर लौटें: हाँ, और इस निश्चित भरोसे के साथ कि जो उसने हमसे प्रतिज्ञा की है उसे वह पूरा करेगा: कि जब हमारी आशा उस पर और उसके सत्य पर टिकी हो तो हम निराश न हों, परन्तु वह उसमें हमें और भी दृढ़ करता जाए, जब तक हम उन बातों के पूर्ण ज्ञान तक न पहुँचें, जिन्हें हम अभी अंशतः ही जानते हैं। कि वह न केवल हमें यह अनुग्रह दे, वरन् संसार के सब लोगों और जातियों को भी, इत्यादि।
