अध्याय 16

भजन संहिता के एक सौ उन्नीसवें भजन पर चौदहवाँ उपदेश। 105-112

Sermons on Psalm 119 · John Calvin

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भजन संहिता के एक सौ उन्नीसवें भजन पर चौदहवाँ उपदेश। 105-112

नून।

105 तेरा वचन मेरे पाँव के लिये दीपक और मेरे मार्ग के लिये उजियाला है।

106 मैं ने शपथ खाई है और उसे पूरा भी करूँगा कि तेरे धर्ममय नियमों का पालन करूँगा।

107 हे प्रभु, मैं अत्यन्त पीड़ित हूँ; अपने वचन के अनुसार मुझे जिला।

108 हे प्रभु, मैं तुझ से विनती करता हूँ कि मेरे मुँह की स्वेच्छाबलियाँ तुझे भाएँ, और तू अपने नियमों को मुझे सिखा।

109 मेरा प्राण सदा मेरी हथेली पर रहता है, तौभी मैं तेरी व्यवस्था को नहीं भूलता।

110 दुष्टों ने मेरे लिये फंदा लगाया है, तौभी मैं तेरी आज्ञाओं से नहीं भटका।

111 मैं ने तेरी चितौनियों को सदा के लिये अपना निज भाग कर लिया है, क्योंकि वे मेरे हृदय का सच्चा आनन्द हैं।

112 मैं ने अपने मन को इस पर लगाया है कि तेरी विधियों को सदा, अन्त तक पूरा करूँ।

यदि हम भली-भाँति विचार करें कि परमेश्वर का वचन पढ़ना और उससे ली गई शिक्षा को सुनना हमारे लिये अत्यन्त आवश्यक है, तो हमें इस विषय पर इतना प्रचार करने की आवश्यकता न पड़े कि उससे हमें कितना लाभ और उपयोग मिलता है; क्योंकि हम में से हर एक उसे अनुभव से ही जान लेता। परन्तु जो कुछ परमेश्वर हमें बताता है उसे पढ़ने और सुनने में हम ऐसे ठण्डे और जड़ हैं, कि उचित है कि हमें किसी और रीति से भी इसके लिये जगाया जाए, और हमें दिखाया जाए कि परमेश्वर का वचन हमें किस कारण से लाभ पहुँचाएगा, जब हम ऐसे बुद्धिमान और ऐसे मनवाले हो जाएँ कि अपने आप को उसमें भली-भाँति लगाएँ और अपना सारा परिश्रम उसी में लगा दें। और देखिए कि दाऊद इस विषय को इतनी लगन से क्यों आगे बढ़ाता है। क्योंकि जो कुछ हम इससे पहले यहाँ देख चुके हैं, उसके अतिरिक्त वह यह भी कहता है, “तेरा वचन मेरे पाँव के लिये दीपक और मेरे मार्ग के लिये उजियाला है।” इससे वह दिखाता है कि जब हम परमेश्वर के वचन से शिक्षा पाते हैं तो हमें एक अमूल्य भण्डार मिलता है, अर्थात् यह कि हम अपने जीवन के सारे दिनों में कभी भटकेंगे नहीं, जैसा अविश्वासी भटकते हैं, जो नहीं जानते कि वे कहाँ जा रहे हैं, वरन् अटकल से चलते हैं। दाऊद हमें दिखाता है कि जब हम परमेश्वर के वचन के पथ-प्रदर्शन में चलेंगे, तब हम गिरने के सब संकट से बचे रहेंगे। अब चूँकि किसी मनुष्य के लिए ऐसा कह देना बहुत सरल बात है, इसलिये पहली दृष्टि में यह कथन इतना साधारण लगता है कि हमें इस पर और रुकने की आवश्यकता नहीं। परन्तु इस बीच देखें कि संसार यहाँ कही गई बात का पालन किस प्रकार करता है। सचमुच, हम इसे बिलकुल उलटा पाएँगे, क्योंकि बहुत थोड़े हैं जो परमेश्वर के वचन के पथ-प्रदर्शन में चलना स्वीकार करेंगे; पर अधिकांश उसे ठुकरा देते हैं, और अपनी ही इच्छाओं और अभिलाषाओं के पीछे चलना अधिक पसन्द करते हैं, अथवा इस बात से सन्तुष्ट रहते हैं कि मनुष्यों की इच्छा के अनुसार उन पर शासन हो, पर परमेश्वर को अपने ऊपर किसी प्रकार का राज्य या अधिकार नहीं करने देते। इसलिये हम भली-भाँति ध्यान दें कि इसका क्या आशय है, जब यह कहा गया है कि परमेश्वर का वचन मानो दाऊद के पाँव के लिये दीपक और उसके मार्ग के लिये उजियाला रहा है। इससे वह यह जताता है कि वह अपनी ही समझ में बुद्धिमान बनना नहीं चाहता, परन्तु उसने यह खोजा है कि उसे परमेश्वर के वचन से कैसे चलाया जाना चाहिए, और इस प्रकार अपने आप को पूरी रीति से उसी में थामे रखा।

अब यदि दाऊद के लिये यह एक आवश्यक बात रही है, तो हम में से कोई यह न समझे कि वह उससे आगे बढ़ सकता है। और देखिए कि सन्त पतरस भी सब विश्वासियों को सामान्य रूप से लिखते हुए उन से क्यों कहता है कि तुम भला करते हो जो परमेश्वर के वचन पर, मानो अन्धियारे स्थानों में चमकते हुए दीपक पर, ध्यान देते और चौकस रहते हो। इससे सन्त पतरस हमें बताता है कि दाऊद ने दीपक की यह उपमा बिना कारण नहीं दी। और ऐसा क्यों? क्योंकि वह कहता है कि संसार में रहते हुए हम अन्धकार में चलनेवाले मनुष्यों के समान हैं; और इसके प्रमाण में, मैं आप से पूछता हूँ, हम में से किसी के पास कौन-सी बुद्धि है? यद्यपि हम में से हर एक अपने विषय में पर्याप्त, वरन् आवश्यकता से कहीं अधिक अच्छी राय रखता है, तथापि जब हमारी भली-भाँति परख की जाएगी, तब हम पाएँगे कि हमारी सारी समझ व्यर्थता और मूर्खता से भरी है, और यद्यपि हम समझते हैं कि हमारे पास सुन्दर प्रकाश है, तौभी हम अन्धकार के गहरे बन्दीगृह में पड़े हैं। और इसके सिवाय, चाहे हम इस संसार में अपने आप को भली-भाँति चलाने और सम्भालने के जितने भी उपाय ढूँढ़ें, वह सदा अन्धकार ही रहेगा।

इसलिये हम समझ लें कि यह हो ही नहीं सकता कि परमेश्वर के वचन के बिना हम भटके हुए जंगली पशुओं के समान न हों, और उसके बिना हमारे लिये न कोई मार्ग है न कोई ठौर। और यद्यपि हम अपने आप को पर्याप्त बुद्धिमान समझते हैं, तौभी हम पूरी रीति से भ्रम में पड़े हैं; और जब हम समझेंगे कि हमें पूरा निश्चय हो गया है, तब भी हमारी सारी दशा धुएँ के सिवाय और कुछ न होगी। जब हम इस बात को सच जान लेंगे, तब हम दाऊद के साथ भली-भाँति कह सकेंगे कि परमेश्वर का वचन हमारे लिये दीपक के स्थान पर है। क्योंकि हम परमेश्वर से अपने आप को व्यवस्थित और शासित क्यों नहीं होने देते? या तो अपने अभिमान के कारण, या इसलिये कि हम अपनी घटी को नहीं जानते। हम में से कुछ लोग उस व्यर्थ और मूर्खतापूर्ण धारणा के कारण रुके रहते हैं जो हम अपने विषय में रखते हैं, कि हम इतने शिक्षित हैं कि जो भला और लाभदायक है उसका निर्णय कर सकें। देखिए, यही कारण है कि हम परमेश्वर के वचन को स्थान नहीं देते।

हम में से कुछ और लोग ऐसे हैं जो यद्यपि अपनी बुद्धि पर इतना भरोसा नहीं रखते, तौभी यह नहीं जानते कि यहाँ, मानो घोर गड़बड़ी के स्थान में, होना कैसी दुर्दशा है, और यह कि हमारे सारे जीवन-मार्ग का कोई ठहराव नहीं। और इसी कारण वे परमेश्वर के वचन को तुच्छ जानते हैं और उसे कुछ नहीं गिनते। इसलिये हमें इस दीनता तक आना होगा कि अपनी बुद्धि के घमण्ड की ओर से पूरी रीति से गिराए जाकर हम अपने आप को परमेश्वर से सिखाए जाने दें।

और इसके सिवाय, हम यह भी जान लें कि जब तक हम इस दीपक से प्रकाशित नहीं होते, तब तक हमारी दशा और अवस्था अत्यन्त दयनीय है। अब, जैसे दाऊद अपने उदाहरण से हमें दिखाता है कि हमें उसके सिवाय, जो परमेश्वर के वचन से निकलता है, कोई और पथ-प्रदर्शक या आधार नहीं रखना चाहिए, वैसे ही वह हमें यह भी दिखाता है कि यदि हम परमेश्वर से सीखने को तैयार हों, उसे अपना शिक्षक मान लें और अपने आप को उसके अधीन कर दें, तो हमें उसके वचन में पर्याप्त प्रकाश मिलेगा, यहाँ तक कि हमें इस बात से घबराने का भय न रहेगा कि मानो हम नहीं जानते कि किधर मुड़ें। क्योंकि परमेश्वर अपने वचन में हमें उद्धार तक पहुँचाने के लिये पर्याप्त प्रकाश देगा। और यह ऐसी शान्ति है जिसका वर्णन भली-भाँति हो ही नहीं सकता; क्योंकि जब यह बताया गया कि हम अभागे अन्धे प्राणी हैं, और जब तक हम इस संसार में चलते हैं तब तक अन्धकार में ही हैं, तब देखिए कि परमेश्वर ने हमारे हाथ में कैसा उपाय रख दिया है: अर्थात् यह कि हम उसे बोलते हुए सुनें, और उसके वचन से चलाए जाना सीखें; और तब, यद्यपि यही संसार भूल-भुलैया हो, यद्यपि हमारे जीवन में बहुत से क्लेश हों, यद्यपि शैतान हमें सीधे मार्ग से फेरने के लिये चालाकी से बहुत से छल गढ़ने से कभी नहीं थमता, तौभी हमें निश्चय रहेगा कि हम सीधे चलेंगे और उद्धार तक पहुँचेंगे। और इसी से हम देख सकते हैं कि शैतान ने पोपवादियों को कैसे वश में कर रखा है, जब वे कहते हैं कि परमेश्वर का वचन इतना अस्पष्ट है कि हम उसे कभी एक कौर भी नहीं चख सकते; और यह कि हमें उस पर नहीं टिकना चाहिए क्योंकि वह इतनी अनिश्चित वस्तु है; और इसके सिवाय वह मोम की नाक है जिसे मनुष्य जिधर चाहे उधर मोड़ ले। वे ऐसी भयंकर निन्दाएँ उगलने में लज्जित नहीं होते। परन्तु इसके विपरीत, हम परमेश्वर के आत्मा पर भरोसा रखें जो दाऊद के मुँह से बोलता है: अर्थात् यह कि यदि हम परमेश्वर के वचन से प्रकाशित हैं तो हमें गिरने का भय नहीं; और यह कि इतना निश्चित कोई नियम नहीं। क्योंकि यद्यपि शैतान हज़ार छलों से हमें टेढ़ी पगडण्डियों में इधर-उधर फेरने का यत्न करे, तौभी हमें पूरा निश्चय रखना चाहिए कि परमेश्वर का वचन हमारे पाँव के लिये दीपक है, जो हमें सीधा मार्ग दिखाता है। तौभी दाऊद हमें दिखाता है कि हमें परमेश्वर की व्यवस्था के द्वारा अपने पास आनेवाले इस लाभ को किस प्रकार खोजना चाहिए: अर्थात् जब हम उसे सच्चे हृदय की लगन से ग्रहण करें। क्योंकि वह कहता है,

“मैं ने शपथ खाई है और उसे पूरा भी करूँगा कि तेरे धर्ममय नियमों का पालन करूँगा।”

अब यहाँ वह दिखाता है कि यदि कोई डाँवाडोल मनवाला जन है जो कुतूहल के लिये पवित्रशास्त्र को पढ़ता है, तो वह अवश्य सदा अन्धा और अज्ञानी ही बना रहेगा; जैसा कि हम उन में से बहुतों को देखेंगे जो पन्ने पलटने और इस प्रकार भटकने के सिवाय कुछ नहीं करते, कि उन में से किसी में न दृढ़ता है न खरापन। और इसका कारण क्या है? निश्चय यह कि वे परमेश्वर को सच्ची और उत्कट लगन से नहीं खोजते। इसलिये यदि हम वह लाभ चाहते हैं जिसकी चर्चा दाऊद यहाँ करता है, तो हमें परमेश्वर के वचन की ओर फिर लौट आना होगा, और अपना सारा परिश्रम ऐसे साहस से लगाना होगा कि हम इस सत्य में शिक्षा पाने और अपने आप को पूरी रीति से इसके अधीन करने के सिवाय और कुछ न चाहें। तौभी दाऊद यह कहकर ही सन्तुष्ट न हुआ कि यही उसका एकमात्र निश्चय है; परन्तु कहता है कि उसने शपथ खाई है और दृढ़ता से ठान लिया है कि उसका पालन करेगा: क्योंकि जो शब्द वह प्रयोग करता है उसका अर्थ है कि मैं उसे स्थिर करूँगा: अर्थात् मैं अपने आप को पूरी रीति से उसी को दे दूँगा; क्योंकि इस विषय में मैं ऐसा दृढ़ हूँ कि कभी उससे फिराया न जाऊँगा। इससे वह दिखाता है कि इसमें कोई सन्देह नहीं कि हम में कुछ छोटी-छोटी उमंगें होती हैं जो हमारे हाथ से फिसल जाती हैं, परन्तु हम में ऐसी उत्कट धुन होनी चाहिए जो हमारे सारे मन पर अधिकार कर ले; और फिर इस धुन के साथ हमें स्थिर रहना चाहिए, क्योंकि तब हम उन मनुष्यों को ठीक पहचान सकेंगे जो हमें इतनी चतुराई और सुघड़ाई से धक्का देते और फूँकते हैं। परन्तु क्या? यह तो, जैसा हम कहते हैं, झूठी आग है। अब यदि हम सच्चे मन से परमेश्वर की सेवा करने के इच्छुक हैं, तो हमारी वह इच्छा दृढ़ और पक्की होनी चाहिए, कि हम निष्कपट होकर दाऊद के साथ कह सकें कि हम ने शपथ खाई है और इस बात पर अटल रहने और स्थिर रहने का पूरा निश्चय किया है। सचमुच यहाँ कोई प्रश्न उठ सकता है: क्योंकि ऐसा प्रतीत होता है कि दाऊद ने अपने ऊपर बहुत अधिक भरोसा किया कि शपथ खाए कि वह परमेश्वर की चितौनियों का पालन करेगा। क्योंकि हम कोई ऐसी बात वचन नहीं दे सकते जो हमारी शक्ति और सामर्थ्य में नहीं है। यदि कोई मनुष्य अपने आप को ऐसी वस्तु का वचन देने में आगे बढ़ाए जो उसके पास नहीं है, तो उस पर मूर्खता का दोष उचित ही लगाया जाएगा; क्योंकि सब कहेंगे कि यह उसकी बड़ी ढिठाई है क्योंकि वह अपनी सीमा लाँघ गया है। अब जब हम इस पर भली-भाँति विचार कर लेंगे, तब हम पाएँगे कि किसी भी नश्वर मनुष्य के लिये परमेश्वर की आज्ञाओं का सिद्ध पालन करना असम्भव है।

इसलिये पहली दृष्टि में ऐसा प्रतीत होगा कि जिस शपथ की चर्चा दाऊद यहाँ करता है वह सराहने के योग्य होने के बदले डाँटने के योग्य है; परन्तु यहाँ दो बातों पर विचार करना है: एक तो यह कि जब विश्वासी अपने आप को परमेश्वर से इस प्रकार बाँधते हैं, तब वे यह नींव अपनी ही निज शक्ति पर नहीं डालते, वे अपने सामर्थ्य की ओर नहीं देखते, परन्तु परमेश्वर से माँगते हैं कि जो कुछ उन्होंने उससे वचन दिया है उसे वही पूरा करे।

और वे ऐसा क्यों करते हैं? अब हम ध्यान दें कि यहाँ वह परमेश्वर की आज्ञाओं की बात कर रहा है। और हम यहाँ पहले ही कह चुके हैं कि जब दाऊद व्यवस्था का नाम लेता है, तब वह केवल आज्ञाओं को नहीं, वरन् प्रतिज्ञाओं को भी देखता है: और इन प्रतिज्ञाओं में कहा गया है कि परमेश्वर अपनी सन्तानों के हृदयों का खतना करेगा: वह कहता है कि वह उन्हें ऐसे जीवित रूप से छुएगा कि उन्हें अपनी आज्ञाकारिता में ले आएगा। इसलिये (जैसा हम पहले कह चुके हैं) विश्वासी अपनी निज शक्ति और सामर्थ्य से कुछ करने के लिये अपने आप को परमेश्वर से नहीं बाँधते, परन्तु उससे विनती करते हैं कि जो कुछ उन में घट है उसे वह पूरा करे, उनकी दुर्बलता की पूर्ति करे, और जो उपाय वह उनके लिये सब से आवश्यक और उचित जानता है वही भेजे। देखिए तब दाऊद ने किस भरोसे से परमेश्वर की चितौनियों का पालन करने की शपथ खाई: उसने यह किसी व्यर्थ घमण्ड के कारण नहीं किया, जो उसने अपनी शक्ति और सामर्थ्य के विषय में बाँध रखा हो, और न इस कारण कि वह ऐसा कर सकता था; नहीं, उसने अपनी शक्ति को कुछ न ठहराया: परन्तु परमेश्वर की प्रतिज्ञा के कारण शपथ खाता और ऐसा करता है, जिस प्रतिज्ञा के द्वारा वह घोषणा करता है कि वह अपने पवित्र आत्मा से उन सब का, जो उसके हैं, मार्गदर्शन करेगा। देखिए, दाऊद ने किस पर अपने आप को थामा। अब तुरन्त दूसरी बात आती है: अर्थात् यह कि दाऊद ने चितौनियों का पालन करने की शपथ खाई, और वह भी उस बात पर अपने आप को थामकर जिसकी प्रतिज्ञा परमेश्वर ने की है, कि वह अपनी दया से हमें सम्भालेगा, कि यद्यपि हम लँगड़ाते हैं और वह सारी आज्ञाकारिता जो हम उसे देने का यत्न करते हैं दुर्बल और दोषपूर्ण है क्योंकि वह आधी-अधूरी ही की जाती है, तौभी वह हमारे सब दोषों पर दृष्टि न करके उस इच्छा का स्वाद लेना चाहता है जो हमें उसे प्रसन्न करने की होगी: और वास्तव में हमारी सेवा को, जैसी भी वह है, ग्रहण करेगा, और उन सब दोषों को जो उस में मिले होंगे क्षमा कर देगा। दाऊद ने इसी पर विचार करके कहा कि वह परमेश्वर की आज्ञाओं का पालन करेगा। इसलिये हम ध्यान दें कि जब विश्वासी परमेश्वर के वचन का पालन करने के लिये अपने आप को बाँधते हैं, तब उन्हें अपने ऊपर भरोसा नहीं करना चाहिए, और न इस मूर्खतापूर्ण धारणा से फूल जाना चाहिए कि उन में ऐसा करने की सामर्थ्य है: परन्तु उन्हें यह कहना चाहिए: हे प्रभु, तू ही इसे पूरा कर, तब मैं उसके पीछे चलूँगा: हे प्रभु, अपनी व्यवस्था मेरे हृदय में लिख, तब मुझे तेरी सेवा करने की इच्छा होगी: और इसके सिवाय, विश्वासी सदा स्मरण रखें कि परमेश्वर उनके साथ कठोरता से व्यवहार नहीं करेगा: हाँ, यद्यपि वे बहुत सी बातों में चूकें, यहाँ तक कि एक ही बात या एक मात्रा का भी सिद्ध पालन न कर सकें, तौभी वह अपनी सेंत-मेंत की भलाई और दया से उन्हें बचा लेगा। जब परमेश्वर की सन्तान और विश्वासी इतना जान लें, और शपथ खाएँ कि वे परमेश्वर की आज्ञाओं का पालन करेंगे, तौभी वे इस कारण पापों की क्षमा की शरण में जाना न छोड़ें, कि वे उसे परमेश्वर की इच्छा के अनुसार, उसकी आज्ञाओं के एक अंश की पूर्ति के लिये, आवश्यक उपाय जानकर अनुभव करें। अब हम देख चुके कि दाऊद ने परमेश्वर की आज्ञाओं का पालन करने की शपथ क्यों खाई, और यह कि वह अपने हृदय में इस उद्देश्य को कभी न बदलेगा। अब वह तुरन्त दो विनतियाँ करता है: जिन में से एक यह है कि वह जिलाया और बहाल किया जाए। इसमें वह उसे दिखाता है जिसकी मैं पहले ही चर्चा कर चुका हूँ: अर्थात् यह कि उसे अपनी शक्ति और सामर्थ्य के किसी मूर्खतापूर्ण घमण्ड ने नहीं चलाया। क्योंकि जो परमेश्वर से बहाल किए जाने की प्रार्थना करता है, वह मान लेता है कि वह अपने आप से नहीं जीता, परन्तु परमेश्वर के अनुग्रह और भलाई ही से उसे जीना होगा। और दाऊद इस मान लेने को और भी स्पष्टता से करता है जब वह वह कारण जोड़ता है कि वह ऐसी विनती क्यों करता है: क्योंकि हे प्रभु, मैं अत्यन्त पीड़ित हूँ, वह कहता है। देखिए तब दाऊद को, जो अपने आप को व्याकुल और मानो पूरी तरह मिटाया हुआ मानकर परमेश्वर से बहाल किए जाने की विनती करता है। क्या हम कहेंगे कि उसने अपनी शक्ति पर भरोसा किया? या अपने आप को कुछ भी श्रेय दिया? हम तो बिलकुल उलटा देखते हैं। इसलिये, जो हम पहले कह चुके हैं उसके अनुसार, हम समझ लें कि उसने किसी व्यर्थ घमण्ड के कारण शपथ नहीं खाई: परन्तु इसलिये कि वह जानता था कि परमेश्वर उसे कभी नहीं छोड़ेगा। और यही कारण है कि उसने यह साहस अपने ऊपर लिया। और यही वह जोड़ता है: अपने वचन के अनुसार: अर्थात् अपनी प्रतिज्ञाओं के अनुसार। अब जो कुछ यहाँ कहा गया है उस सब पर हमें भली-भाँति विचार करना चाहिए। हे प्रभु, मुझे जिला, वह कहता है। और पहली बात के विषय में इतना ही। इसमें वह दिखाता है कि वह अपने आप से नहीं जीता, परन्तु परमेश्वर से इसकी विनती करता है। और फिर वह कारण जोड़ता है, इस प्रकार कहकर, मैं अत्यन्त पीड़ित हूँ। इससे वह हम पर प्रकट करता है कि जब हमारा बल हमें छोड़ दे तब हम अपने आप को सँभाल और थाम नहीं सकते, परन्तु परमेश्वर ही है जिसे अपना सहायक हाथ बढ़ाना होगा। और इसके सिवाय, हमें निश्चय रह सकता है कि वह हमारी सहायता करेगा और हमें बहाल करने को तैयार रहेगा, यदि हम उससे विनती करें, और उसे पुकारें, और उसकी भलाई की शरण लें। देखिए, सब विश्वासियों के लिये कैसी भारी शान्ति है, कि जब वे अपने आप को ऐसा बलहीन पाएँ, कि अपने को अति निर्बल, पूरी तरह गिराया हुआ अनुभव करें, और अपने भीतर मृत्यु के सिवाय और कुछ न देखें: तौभी उन्हें पूरा निश्चय और भरोसा रह सकता है कि परमेश्वर सदा उनका चौकीदार रहेगा, कि उन्हें बहाल करे और जिलाए। और ऐसा क्यों? अर्थात् उसके अनुसार जो दाऊद जोड़ता है जब वह कहता है, तेरी प्रतिज्ञाओं के अनुसार। तब यह निकलता है कि परमेश्वर ने अपने लोगों को बहाल करने और जिलाने की प्रतिज्ञा की है, जब वे मृत्यु में हों। और इसलिये हम कभी विश्वास से अपनी विनती न कर सकेंगे, जैसा दाऊद ने यहाँ की है, यदि हमारे पास परमेश्वर की प्रतिज्ञाएँ न हों। क्योंकि, जैसा हम पहले कह चुके हैं, यह मनुष्यों की ढिठाई है कि वे पहले से उसकी इच्छा को निश्चित और निर्धारित जाने बिना, अपनी इच्छा से परमेश्वर से प्रार्थना करने लगें।

तो देखिए वह कारण जिसने दाऊद को यहाँ परमेश्वर की प्रतिज्ञा को इतनी स्पष्टता से रखने के लिये उभारा। अब यह प्रतिज्ञा केवल उसी से नहीं की गई थी, यह कोई निजी विशेषाधिकार नहीं है, जैसा हम कहते हैं, जो केवल एक ही मनुष्य का हो:

परन्तु यह एक सामान्य नियम है जिसे हमें थामे रहना चाहिए, कि परमेश्वर उन्हें मृत्यु में से फिर उठाएगा जो गिरा दिए गए हैं और मानो मिटा दिए गए हैं: हाँ, तब भी जब वे उसे पुकारते और मानते हैं कि उनका इस प्रकार बहाल किया जाना उसके निरे अनुग्रह ही से है, और किसी और रीति से नहीं। अब एक और विनती है जो वह करता है, “हे प्रभु, मैं तुझ से विनती करता हूँ कि मेरे मुँह की स्वेच्छाबलियाँ तुझे भाएँ, और तू अपने नियमों को मुझे सिखा।”

यहाँ दाऊद परमेश्वर से चाहता है कि वह उन स्तुतियों को ग्रहण करे जो वह उसे चढ़ाएगा। क्योंकि जिन भेंटों की चर्चा दाऊद करता है वे स्तुति और धन्यवाद के सिवाय और कुछ नहीं हैं, जिनके द्वारा दाऊद परमेश्वर के उपकारों को मानता है। तौभी वह सचमुच व्यवस्था की सामान्य विधि की ओर देखता है: क्योंकि जब कोई मनुष्य किसी रोग से चंगा हो गया हो, या किसी संकट से छुड़ाया गया हो, या परमेश्वर ने उसे समृद्धि दी हो, तब वह विशेष गवाही के लिये, और यह मानने के लिये कि वह परमेश्वर का कितना ऋणी है, कलीसिया में अपनी भेंट या चढ़ावा लेकर आता है। दाऊद ने ऐसी रीतियों पर बहुत ध्यान न दिया, परन्तु वह उनका उद्देश्य और उपयोग बताता और प्रकट करता है, अर्थात् यह कि हम मुख्य बात पर अपने आप को थामें: क्योंकि यदि मनुष्य किसी पशु का बलिदान करे, तो वह कुछ भी नहीं। तब ऐसी बलि किस काम की थी? निश्चय वह एक सहायक और सहारा थी: क्योंकि आवश्यक है कि हम सदा जगाए जाते रहें।

और इसके सिवाय, यह एक अच्छी चेतावनी है जो हमें दिखाती है कि जब हम परमेश्वर के उन उपकारों के लिये जो वह हम पर करता है उसका धन्यवाद करना चाहें, तब हमें अपने प्रभु यीशु मसीह की मध्यस्थता के द्वारा उसके पास आना चाहिए: क्योंकि परमेश्वर का आदर करने के लिये अपना मुँह खोलने के भी हम योग्य नहीं, क्योंकि हमारे होंठ अशुद्ध और अपवित्र हैं। और इसलिये अपनी अयोग्यता को जानकर हमें अपने प्रभु यीशु मसीह के पास आना और उसके द्वारा परमेश्वर का धन्यवाद करना चाहिए, जैसा इब्रानियों का लेखक भी हमें करने का उपदेश देता है। क्योंकि वह विशेष रूप से हम पर प्रकट करता है कि केवल यीशु मसीह ही है जो हमें परमेश्वर अपने पिता तक पहुँच देता है, कि हम अपने प्रति उसकी उदारता का अंगीकार करें: और नहीं तो हम उसके नाम को अपवित्र ही करेंगे, वरन् वह हमारी स्तुतियों और धन्यवाद को ग्रहण नहीं करेगा, परन्तु वे मानो उसके नथुनों में दुर्गन्ध के समान होंगी। देखिए तब बलिदान किस उद्देश्य से हैं। परन्तु तौभी दाऊद दिखाता है कि परमेश्वर के उपकारों का मुख्य उद्देश्य यह है कि जब हम उसकी भलाई को परख और अनुभव कर चुके हों तब हमारे होंठ उसे मानने के लिये खुलें। और यही वह है जो वह एक सौ सोलहवें भजन में कहता है, “यहोवा ने मेरे जितने उपकार किए हैं, उनका बदला मैं उसे क्या दूँ? मैं उद्धार का कटोरा उठाकर यहोवा से प्रार्थना करूँगा:” मानो वह कह रहा हो कि वह परमेश्वर को प्रसन्न करने का और कोई उपाय नहीं जानता सिवाय इसके कि उसका धन्यवाद करे, जब उसने संसार के सारे उपकार उस पर उदारता से किए हों, ऐसे कि वह अपने आप को उसकी भलाई का अत्यन्त ऋणी अनुभव करे। इसी प्रकार वह हम से भी सन्तुष्ट रहेगा, जब हम उसे ऐसा धन्यवाद चढ़ाएँ। हाँ, परन्तु इस बीच हम विचार करें कि दाऊद जानता था कि यदि परमेश्वर उन स्तुतियों को, जो वह उसे चढ़ाता था, सेंत-मेंत ग्रहण न करता, तो वे कुछ भी मूल्य की न होतीं, जैसा हम पहले कह चुके हैं: परन्तु हमारे पास इसका यहाँ पर्याप्त और स्पष्ट प्रमाण है। दाऊद ने परमेश्वर से क्यों विनती की कि वह उन स्तुतियों को ग्रहण करे जो वह उसे चढ़ाता था? उसने यह कपटी के समान नहीं किया। इसलिये वह मानता है कि जब वह परमेश्वर के सामने उसके नाम की बड़ाई करने के लिये उपस्थित हुआ, तब वह भली-भाँति ठुकराया जा सकता था और उसका मुँह बन्द किया जा सकता था। और ऐसा क्यों? इसलिये कि हम परमेश्वर के नाम को अपवित्र करते हैं, क्योंकि जो सर्वथा भ्रष्ट हैं उन से मलिनता और दुर्गन्ध के सिवाय और कुछ नहीं निकल सकता, और न उन में भलाई की एक बूँद भी हो सकती है। और यद्यपि परमेश्वर ने उन में कोई अच्छे गुण डाले हैं, तौभी वे दोषों से ऐसे मिले हुए हैं कि शोचनीय है। और इसलिये दाऊद यह जानकर परमेश्वर से प्रार्थना करता है कि उसकी स्तुतियाँ उसे भाएँ। अब यदि दाऊद ने अपनी अयोग्यता को ऐसा जाना, तो मैं आप से पूछता हूँ, क्या हम में से कोई कहने का साहस करेगा कि हम अपनी निज सामर्थ्य से परमेश्वर के नाम की बड़ाई करने और उसे ऐसा धन्यवाद चढ़ाने के योग्य हैं जैसा उसे सुहाता है, जब तक कि वह अपनी निरी सेंत-मेंत की इच्छा से उन्हें स्वीकार न करे, और उन दोषों और अपूर्णताओं को जो उनके साथ मिली हैं हम पर न गिने, और हमारी स्तुतियों और धन्यवाद को भला भी न माने, चाहे वे इसके योग्य कभी न हों? और इसके सिवाय, यदि हमें परमेश्वर से विनती करनी पड़े कि वह उन स्तुतियों को ग्रहण करे जो हम उसे चढ़ाते हैं, तो मैं आप से पूछता हूँ कि बाकी का क्या होगा? क्योंकि यह अत्यन्त निश्चित है कि यदि कोई सेवा है जो परमेश्वर को भाती है, तो यही है जब हम उससे जो कुछ पाया है उसके लिये उसे श्रद्धांजलि देने आते हैं: और अंगीकार करते और घोषणा करते हैं कि हमारे पास कुछ नहीं सिवाय उसके जो हम उसी से पाते हैं। जब हम परमेश्वर को यह श्रद्धांजलि देते हैं; देखिए, यही वह सेवा है जो वह हम से मुख्य रूप से चाहता है: देखिए, यही वह सुगन्धित बलिदान है जिसकी चर्चा पवित्रशास्त्र करता है। अब ऐसा है कि जब हम परमेश्वर को यह श्रद्धांजलि देना चाहें, कि इस प्रकार अपने आप को दीन करें, तब भी उसमें सुधार की गुंजाइश है: ऐसे कि हम इस योग्य हों कि वह ठुकराई जाए और अस्वीकार की जाए: तो हमारी अन्य तुच्छ सेवाओं का, और वास्तव में हमारे सारे जीवन का क्या होगा? क्या हम अब पोपवादियों के समान अपनी योग्यताओं से उसकी महिमा करने चलें, जो व्यभिचारिणी की सी निर्लज्जता से परमेश्वर के विरुद्ध सिर उठाते हैं: क्योंकि वे समझते हैं कि परमेश्वर उनका ऋणी है: अथवा, यद्यपि उन्होंने उसके प्रताप के विरुद्ध अपराध किया है, तौभी उससे हिसाब-किताब कर लेने के बाद वे समझते हैं कि अपने प्रायश्चित्तों से उसे भली-भाँति बदला चुका सकते हैं। आइए, हम अपने विषय में यह सोचें कि जब हम देखते हैं कि हमारे सब भले कामों में से सब से उत्तम और आवश्यक में, वरन् मानो हमारे सारे भले कामों के सार में, उन में भी जिन में परमेश्वर हमारा मार्गदर्शन करता है, वे दुर्गन्ध के सिवाय और कुछ नहीं करते, जब तक परमेश्वर स्वयं उन्हें शुद्ध करके सुगन्धित न कर दे, और उन में जो अनावश्यक और मलिन बातें हैं उन्हें दूर न कर दे। अब यदि हमारे सब भले कामों के लिये, वरन् सब से उत्तम कामों के लिये भी, हमें परमेश्वर से क्षमा माँगने का उपदेश दिया जाता है, तो हमारे उन स्थूल और अत्यन्त प्रकट पापों का क्या होगा जिन के विषय में हम दोषी ठहराए गए हैं, और जिन के लिये मनुष्य, वरन् छोटे बच्चे भी हमें डाँट सकते हैं? तो देखिए, यह एक उत्कृष्ट स्थल है जो उन सब व्यर्थ और शैतानी भरोसों को ठीक रीति से मिटा देता है, जिन से हम अपने आप को धोखा देते हैं, जब हम समझते हैं कि अपनी योग्यताओं के साथ, और ऐसे ही न जाने कौन-कौन से खिलौनों और तुच्छ वस्तुओं के साथ, परमेश्वर के प्रताप के सामने खड़े होंगे, और यह सोचते हैं कि इनसे उसे बदला चुका देंगे।

और इस पद के विषय में इतना ही। अब दाऊद आगे कहता है,

“मेरा प्राण सदा मेरी हथेली पर रहता है, तौभी मैं तेरी व्यवस्था को नहीं भूलता।”

“दुष्टों ने मेरे लिये फंदा लगाया है, तौभी मैं तेरी आज्ञाओं से नहीं भटका।”

यहाँ दाऊद पहले के समान घोषणा करता है कि परमेश्वर के वचन का पालन करने की उसकी ऐसी दृढ़ लगन थी कि कोई परीक्षा उसे उससे हटा न सकी। और देखिए कि हम कैसे कह सकते हैं कि हम बिना कपट के और सच्चाई से परमेश्वर की सेवा करते हैं। क्योंकि यदि हमारे साथ सहज और कोमल व्यवहार हो, और हम पर कोई क्लेश न हो, और हमारा परमेश्वर हमारे साथ वैसा ही व्यवहार करे जैसा हम चाहें और हमें हमारी इच्छा पर छोड़ दे, अथवा यदि वह हम पर ऐसी कृपा करे कि हम किसी दुःख और शोक से न दबाए जाएँ: तो उसकी सेवा और आदर करना हमारे लिये सरल है। परन्तु जब परमेश्वर हमें क्लेश दे, कि ऐसा लगे मानो वह घड़ी-घड़ी हमें कुचलना और दुःख देना चाहता है, जब हम मृत्यु को चारों ओर से अपना पीछा करते देखें, कि दुष्ट हमें चारों ओर से घेरे हुए हैं, मानो हमारी आँखें निकाल लेने को तैयार हों, और हमारा जीवन ऐसा दीन हो कि संसार हमें मानो निकम्मा ठहराए: जब ये सब परीक्षाएँ हमें छुएँ, और तौभी हम स्थिर रहकर परमेश्वर की स्तुति करते रहें, और उससे लिपटे रहें, उसकी आज्ञाकारिता में बने रहें, और उसे पुकारते रहें, अपने सब क्लेशों में धीरज धरें, जब तक वह हमें छुड़ा न ले: जब हम में यह सब हो, तब हम दाऊद के साथ कह सकते हैं कि हम ने परमेश्वर की सेवा के लिये अपना जीवन खोलकर रख दिया है: और यह इसका अच्छा और पक्का प्रमाण होगा। परन्तु यदि हम में यह स्थिरता नहीं, तो बहुत से लोग संसार के सामने भक्ति का अद्भुत दिखावा कर सकते हैं, पर वह सब कुछ सिद्ध न करेगा। और इसलिये हम इस स्थल पर भली-भाँति विचार करें: क्योंकि दाऊद ने यह अपने लिये नहीं, परन्तु हमारी सामान्य शिक्षा के लिये कहा। और इसके सिवाय, यदि हम सचमुच इस शिक्षा से लाभ उठाना चाहते हैं, तो विचार करें कि यदि कभी हम मृत्यु के प्रत्यक्ष संकट देखें, कि हम चारों ओर से दबाए जाएँ, तो इसे कोई अनोखी बात न समझें। और ऐसा क्यों? क्योंकि यह कभी-कभी दाऊद पर भी उतना ही भारी आया। क्योंकि वह कहता है कि वह लगातार संकट से रहित न था। “मेरा प्राण (वह कहता है) सदा मेरी हथेली पर रहता है: मेरा जीवन मानो न जाने कहाँ है, वह सब अनिष्ट सहने के लिये आगे रखा गया है, कि ऐसा लगता है मानो मैं घड़ी-घड़ी मृत्यु के द्वार पर हूँ।” यदि दाऊद सदा इस प्रकार व्याकुल रहा, और तौभी परमेश्वर की स्तुति में स्थिर बना रहा: तो मैं आप से पूछता हूँ, क्या हमें कायर होने पर लज्जित न होना चाहिए, जब परमेश्वर हमें केवल कभी-कभी ही परखना चाहे? इसी प्रकार, यद्यपि क्लेश हमें दबाएँ, तौभी हमें उनसे लड़ना और परमेश्वर की सहायता की प्रतीक्षा करना और माँगना न छोड़ना चाहिए। और इस विषय में इतना ही। और इसके सिवाय, जब हमें ऐसा निश्चय हो, तब हम अपनी शान्ति वहीं ढूँढ़ें जहाँ वह मिल सकती है, अर्थात् परमेश्वर के वचन में, और ऐसे स्थिर रहें कि परमेश्वर की व्यवस्था को कभी न भूलें। इसलिये हम इस शिक्षा पर विचार करें और इसे मानें। क्योंकि दाऊद का यह कहना कि “यद्यपि मेरा प्राण मेरी हथेली पर है, तौभी मैं तेरी व्यवस्था को नहीं भूला,” बिना कारण नहीं। वह इससे हमें दिखाता है कि जैसे हम दुर्बल हैं, वैसे ही हम शीघ्र हिल जाएँगे, और अन्त में गिरा दिए जाएँगे, जब हम अपने आप को मृत्यु के आगे खुला पड़ा देखेंगे। इसलिये हमें यह समझकर अपनी चौकसी पर रहना चाहिए, कि शैतान हमें कभी इस बहाने से न बहकाए कि परमेश्वर ने मानो हमें त्याग दिया है, और हम मानो मृत्यु की छाया में हैं। इसके अतिरिक्त, हम देखते हैं कि पोपवादियों में यह कैसी मूढ़ता (वरन् पशुता) है कि इस स्थल को स्वतन्त्र इच्छा के प्रमाण में लेते हैं। “मेरा प्राण मेरी हथेली पर है” अर्थात् मैं अपने स्वभाव और अपनी निज शक्ति से भले और बुरे में भेद कर सकता हूँ: और जो कुछ मैं सब से अच्छा समझूँ वही कर सकता हूँ। यदि पशु बोल सकते, तो वे इससे कुछ अधिक समझदारी की बात बोलते। क्योंकि दाऊद क्यों कहे, हे प्रभु, यद्यपि मेरा प्राण मेरी हथेली पर है, तौभी मैं तेरी व्यवस्था को नहीं भूला? तब तो वह प्रकृति के बिलकुल विरुद्ध बोलता। परन्तु जैसा हम पहले कह चुके हैं, पवित्रशास्त्र में यह बोलने का एक प्रचलित ढंग है, कि मनुष्य का जीवन उसके हाथ में है, अर्थात् मानो वह वायु में है, या न जाने कहाँ है। अब हम उस घोषणा की ओर आएँ जो वह जोड़ता है,

“दुष्टों ने मेरे लिये फंदा लगाया है, तौभी मैं तेरी आज्ञाओं से नहीं भटका।”

यह वाक्य उस दूसरे के समान है जिसे हम अब लेने पर हैं। क्योंकि वह दिखाता है कि उसका जीवन किस प्रकार उसके हाथ में था: अर्थात् यह कि जो क्लेश सीधे परमेश्वर के हाथ से उस पर भेजे गए, उनके अतिरिक्त दुष्ट भी उसे सताते रहे: और जो हिंसा और अत्याचार उस पर किए गए, उनके साथ-साथ उसके लिये गुप्त घात भी लगाए गए। देखिए तब वह कितने प्रकार से दबाया गया, और तौभी वह परमेश्वर की व्यवस्था से कभी न हटा। अन्त में वह जोड़कर कहता है,

“मैं ने तेरी चितौनियों को सदा के लिये अपना निज भाग कर लिया है, क्योंकि वे मेरे हृदय का सच्चा आनन्द हैं।”

अब यहाँ वह दिखाता है कि वह किसी परीक्षा से हटाए बिना कैसे दृढ़ और स्थिर रह सका: परन्तु वह परमेश्वर की व्यवस्था में सदा दृढ़ता से खड़ा रहा: अर्थात् इसलिये कि उसने उसे सदा अपना निज भाग चुना, अर्थात् अपना परम सुख। क्योंकि पवित्रशास्त्र में निज भाग शब्द उस वस्तु के लिये लिया जाता है जिसे मनुष्य सब से अधिक चाहता है और जो सब से अधिक उसकी अपनी है। संक्षेप में, यह वैसी ही उपमा है जैसी भण्डार के विषय में कही जाती है: मानो कोई उसे परम भलाई, सच्चा और सिद्ध सुख कहे। देखिए तब हमें किस छोर से आरम्भ करना चाहिए, यदि हम मृत्यु के बीच भी परमेश्वर की व्यवस्था का पालन करने में वैसे ही दृढ़ रहना चाहते हैं जैसा दाऊद रहा: अर्थात् मैं कहता हूँ, उसे अपना निज भाग चुनना। और यह कैसे? पहले हमें समझना चाहिए कि जिन सुविधाओं में हम अत्यधिक लगे रहते हैं वे सब क्षणभंगुर हैं, निश्चयहीन हैं, और अपनी नहीं हैं। क्योंकि हम उनसे हर घड़ी वंचित हो सकते हैं: और कोई वस्तु चाहे कितनी ही न्यायपूर्वक दी गई हो, हम उसका उपभोग नहीं कर सकते, क्योंकि आज और कल के बीच वह हम से छीनी जा सकती है। तब सब से पक्का सुख कौन-सा है जो हमें मिल सकता है और जिसका हम सदा उपभोग कर सकते हैं? वह परमेश्वर का वचन ही है। और यही वह है जिसे हमें मुख्य रूप से चाहना चाहिए, और जिसमें हमें विशेष रूप से आनन्दित होना चाहिए। देखिए तब हमें उसे कैसे समझना चाहिए जो दाऊद यहाँ घोषणा करता है, कि उसने परमेश्वर के वचन को अपना निज भाग चुन लिया है।

हाँ, और वह तुरन्त बाद यह भी कहता है कि वह उसके हृदय का सच्चा आनन्द रहा है। क्योंकि जब तक हम ने परमेश्वर के वचन में यह स्वाद न पाया हो, कि हम सचमुच उसमें आनन्दित हों, तब तक यह इस बात का चिह्न है कि हम में उसके प्रति कभी कोई अच्छी लगन थी ही नहीं। यद्यपि हम ने जान लिया है कि हमारा परम सुख उसी में है, तौभी हम अपने आप को उसमें भली-भाँति बनाए नहीं रख सकते, जब तक हम यह न समझ लें कि वही है जिसमें हमें मगन होना है, और किसी और वस्तु में नहीं।

अब यह असम्भव है कि हम कभी परमेश्वर की व्यवस्था में कोई आनन्द या सुख पाएँ, जब तक हम यह न जानें कि वह उसमें अपने आप को हम पर प्रकट करता है, कि वह हमारा पिता है, और हमें अपनी सन्तान मानता है, कि हमारे पास इस बात की गवाही है कि हमारे पाप क्षमा किए गए हैं, कि हमें उस तक पहुँच है और हम अपनी सब आवश्यकताओं में उसे पुकार सकते हैं। यदि परमेश्वर हम से केवल इतना कहे, देखो, मैं चाहता हूँ कि तुम यह करो, मैं चाहता हूँ कि तुम मुझे अपना परमेश्वर मानो और अपने सारे मन से मेरी सेवा करो: यदि हमारे पास देखने के लिये केवल ये दो पटियाएँ हों, यह जानने के लिये कि हमें क्या करना है, तो क्या परमेश्वर की व्यवस्था हमें आनन्द देगी? नहीं, वरन् इसके विपरीत वह हमें डराएगी। इसलिये हम भली-भाँति देखते हैं कि जब दाऊद कहता है कि वह परमेश्वर की आज्ञाओं में पूरा आनन्द और सुख पाता था, तब उसके पास व्यवस्था का केवल नंगा शब्द ही न था, कि परमेश्वर ने उसे वह आज्ञा दी जो उसे करनी चाहिए: परन्तु उसने उसके साथ प्रतिज्ञाओं को भी जोड़ा, क्योंकि परमेश्वर अपनी सन्तान को अपने पास आने देना चाहता है, और प्रतिज्ञा करता है कि वह उन्हें अपनी वह भलाई और पितृ-प्रेम अनुभव कराएगा जो वह अपने लोगों पर रखता है। संक्षेप में, वह उन्हें दिखाता है कि उनका सारा सुख केवल उसकी दया में है। अन्त में वह कहता है,

“मैं ने अपने मन को इस पर लगाया है कि तेरी विधियों को सदा, अन्त तक पूरा करूँ।”

अब जब वह कहता है कि उसने अपने हृदय को परमेश्वर की आज्ञाओं का पालन करने की ओर झुकाया, तब वह हमें दिखाता है कि परमेश्वर कैसी सेवा चाहता है: अर्थात् स्वैच्छिक और प्रसन्न मन की सेवा। देखिए, यह एक और बात है जिस पर भली-भाँति विचार होना चाहिए, कि हम यह न समझें कि जब हम परमेश्वर की सेवा विवश होकर करते हैं तब भी उसे प्रसन्न कर सकते हैं, जैसा हम उन अभागे और दीन विश्वासियों को करते देखते हैं जो अपने आप को बहुत सताते हैं। और ऐसा क्यों? क्योंकि जो कुछ वे करते हैं विवश होकर करते हैं, इसलिये कि वे परमेश्वर के हाथ से भली-भाँति बच निकलें, परन्तु जब वे जैसे-तैसे उसके निकट आते हैं तो वह मानो ज़बरदस्ती और विवशता से है, क्योंकि वह उनका न्यायी है। अब यदि हमारी ऐसी स्थिर चाह हो (जैसा हम कहते हैं) कि हमें विवश होकर ही आज्ञा मानना पड़े: तो हमारी सारी दशा का मूल्य थोड़ा है, और परमेश्वर उसे कभी स्वीकार न करेगा। और ऐसा क्यों? क्योंकि वह आज्ञाकारिता के सिवाय और किसी बात को पसन्द नहीं करता, और चाहता है कि हम खुले और स्वेच्छा के मन से उसके पास आएँ।

तो देखिए दाऊद क्यों कहता है कि उसने अपने हृदय को परमेश्वर की आज्ञाओं का पालन करने की ओर झुकाया: इसलिये नहीं कि वह घोषणा करता है कि उसने यह अपने आप से, या अपने ही मन से किया है: परन्तु इसलिये कि परमेश्वर ने उसे ऐसा करने की इच्छा और सामर्थ्य दोनों दी हैं। और इसके प्रमाण में, हम कभी किसी एक स्थान में भी नहीं देखेंगे कि दाऊद अपनी बड़ाई करता हो कि उसने अपने ही निज मन से प्रेरित होकर कोई भलाई चाही; वह कभी न कहेगा कि यह उसका स्वाभाविक झुकाव था, वरन् बिलकुल उलटा कहता है, “मैं पाप में गर्भ में आया,” वह कहता है; वह अपने लिये कुछ नहीं रखता सिवाय उसके जो निकम्मा है। इसलिये जब वह इस विषय में घोषणा करता है कि उसने अपने हृदय को झुकाया, तब वह केवल यह दिखाता है कि उस में परमेश्वर का अनुग्रह कैसा था। और निष्कर्ष में वह जोड़ता है: कि उसने यह सदा के लिये किया, अथवा, अन्त तक, अथवा, यही वह है जिसे हम पहले छू चुके हैं: अर्थात् हमें अचानक के झोंकों के समान नहीं होना चाहिए जो तुरन्त निकल जाते हैं, परन्तु हमें स्थिर रहना चाहिए, और जब हम एक बार आरम्भ कर चुके, तब हमें परमेश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए कि वह हम में आरम्भ किए हुए इसी हमारे भले काम को जारी रखे, और हमारा हाथ थामे रहे, जब तक हम अपनी दौड़ पूरी न कर लें। सदा के लिये कहने के बाद वह जोड़ता है, अन्त तक। यह सच है कि जो शब्द वह यहाँ प्रयोग करता है उसका अर्थ कभी-कभी वेतन या प्रतिफल होता है: परन्तु इस स्थान में (जैसा “हे” अक्षर के पहले पद में वह यही शब्द प्रयोग करता है) उसका अर्थ केवल अन्त तक है: मानो वह कह रहा हो कि अन्य बातों में हम अपना मन बदल और पलट सकते हैं: परन्तु जब परमेश्वर हमें अपने पास बुलाए तब हमें मृत्यु तक चलते रहना चाहिए, यह निश्चय रखते हुए कि इस अनुसरण में हम सच्चे अन्त तक पहुँचने से नहीं चूक सकते, और सदा के लिये चूकने और भटकने से बचे रहेंगे।

और इस पवित्र शिक्षा के अनुसार, आइए हम अपने भले परमेश्वर के प्रताप के सामने अपने दोषों को मानते हुए दण्डवत् करें: उससे विनती करें कि वह हमें उन्हें ऐसी भली-भाँति अनुभव कराए कि हम सारी दीनता से उससे उनकी क्षमा माँग सकें, उन सब अपराधों के लिये आह भरते हुए जो हम ने उसके विरुद्ध किए हैं। और इस बीच हम उसकी शरण में भी आएँ, उससे विनती करते हुए कि वह हमारे सब दोषों और अपूर्णताओं का उपचार करे: और हमारी दुर्बलता को ऐसा दृढ़ करे कि उससे बल पाकर हम उन सब परीक्षाओं पर जयवन्त हों जिन से शैतान किसी भी रीति से हम पर चढ़ाई कर सकता है, कि उसकी पवित्र शिक्षा में अधिक से अधिक दृढ़ होकर हम उसके अधीन होने के सिवाय और कुछ न चाहें, और उस नियम के सिवाय जो उसने अपने वचन के द्वारा हमें दिया है किसी और नियम से न ढाले जाएँ। और वह केवल हमें ही नहीं, वरन् संसार के सब लोगों और जातियों को यह अनुग्रह देने की कृपा करे। इत्यादि।

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