अध्याय 24

भजन संहिता 119 पर बाईसवाँ उपदेश

Sermons on Psalm 119 · John Calvin

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भजन संहिता 119 पर बाईसवाँ उपदेश

ताव।

169 हे यहोवा, मेरी दुहाई तेरे सम्मुख पहुँचे; अपने वचन के अनुसार मुझे समझ दे।

170 मेरी विनती तेरे सम्मुख पहुँचे; अपने वचन के अनुसार मुझे छुड़ा।

171 मेरे होंठों से तेरी स्तुति उमड़ेगी, क्योंकि तू मुझे अपनी विधियाँ सिखाता है।

172 मेरी जीभ तेरे वचन का गीत गाएगी, क्योंकि तेरी सब आज्ञाएँ धर्ममय हैं।

173 तेरा हाथ मेरी सहायता करने को तैयार रहे, क्योंकि मैंने तेरे उपदेशों को अपनाया है।

174 हे यहोवा, मैं तेरे उद्धार का अभिलाषी हूँ, और तेरी व्यवस्था मेरा आनन्द है।

175 मेरा प्राण जीवित रहे, तो वह तेरी स्तुति करेगा, और तेरे नियम मेरी सहायता करें।

176 मैं खोई हुई भेड़ के समान भटक गया हूँ; अपने दास को ढूँढ़, क्योंकि मैं तेरी आज्ञाओं को नहीं भूलता।

ये अन्तिम आठ पद, जो सारे भजन की समाप्ति हैं, हमें वही दिखाते हैं जो हम पहले भी प्रायः देख चुके हैं: अर्थात् यह कि दाऊद की सबसे बड़ी अभिलाषा यही थी कि वह परमेश्वर के वचन में भली-भाँति और सच्चाई से सिखाया जाए और उसी में दृढ़ किया जाए; क्योंकि उसे उसमें ऐसा आनन्द मिलता था कि उसकी तुलना में शेष सब कुछ उसके लिए तुच्छ या कुछ भी मूल्य का नहीं था। अब यह सच है कि वह इस विषय में पहले ही यथेष्ट कह चुका है; तौभी जो कुछ वह अभी जोड़ता है वह अनावश्यक नहीं है, विशेषकर यदि हम इस पर विचार करें कि हमारी शारीरिक अभिलाषाएँ हम पर किस रीति से राज करती हैं। क्योंकि यही हमें रोकती है, कि हम न केवल वह उत्कट उत्साह नहीं रख पाते जो दाऊद को परमेश्वर की पाठशाला में पूरी तरह उन्नति करने के लिए था, वरन् हममें उसकी थोड़ी-सी अभिलाषा भी मुश्किल से होती है। और इसलिए, जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, हम अपनी पार्थिव लालसाओं में बहुत अधिक धँसे हुए हैं। इसलिए यह ऐसी शिक्षा है जो हमें बार-बार स्मरण दिलानी चाहिए: कि यदि हम परमेश्वर से उसकी इच्छा के अनुसार प्रार्थना करना चाहते हैं, तो हमें उसके पास अपनी ही किसी अभिलाषा को लेकर नहीं आना चाहिए कि जो कुछ हमारे मन में आए वही कह दें, वरन् सबसे मुख्य बात को छोड़ दें; परन्तु हमें इसी कथन से आरम्भ करना चाहिए: अर्थात् यह कि परमेश्वर हमें ऐसी शिक्षा दे कि हमारा जीवन उसकी व्यवस्था के अनुसार ढल जाए, और हम उससे ऐसे लिपटे रहें कि दोहरे और दुचित्ते मन से उसके पास न आएँ। यद्यपि हमें संसार से और अपने ही स्वभाव से लड़ना है, तौभी हमें विशेषकर इसी में दृढ़ बने रहना चाहिए कि परमेश्वर के वचन से प्रेम रखें। और इसी कारण दाऊद यहाँ कहता है,

"हे यहोवा, मेरी दुहाई तेरे सम्मुख पहुँचे; अपने वचन के अनुसार मुझे समझ दे।"

जब वह अपनी उस दुहाई की बात करता है जो वह प्रभु के सम्मुख करता है, तब वह दिखाता है कि उसने परमेश्वर से ठण्डी प्रार्थना नहीं की, जैसी हम बहुधा, और मानो प्रतिदिन करते हैं, वरन् बड़ी उग्रता के साथ की। मैं इससे इनकार नहीं कर सकता कि कपटी भी ऊँचे शब्द के साथ दुहाई दे सकता है और अपना गला फाड़ सकता है। परन्तु दाऊद ने यहाँ परमेश्वर को ध्यान में रखा है, और वह मनुष्यों के सामने बाहरी दिखावा नहीं करना चाहता। इसलिए, उसका ऊँचे स्वर से पुकारना उस उत्कट गवाही के बराबर है जिससे वह उभारा गया था। अब इससे हम देखते हैं कि वह मुख्यतः उसी की अभिलाषा करता था जो वह माँगता है: अर्थात् यह कि परमेश्वर उसे सिखाए और उसे समझ दे। और परमेश्वर के इस दान की अभिलाषा करने में वह मान लेता है कि वह स्वयं एक अत्यन्त दीन, अन्धा प्राण था, कि वह कुछ भी नहीं समझता था; हाँ, यद्यपि उसके हाथों में व्यवस्था थी, जिसे वह पढ़ सकता था, और जिसमें सारी बुद्धि की सच्ची सिद्धता समाई हुई थी, तौभी वह एक बेचारे अभागे अन्धे के समान ही बना रहता, जब तक परमेश्वर उसे प्रकाश न देता। इसलिए आओ हम समझें कि यह एक विशेष दान है जो परमेश्वर हमें देता है, जब वह हमारी आँखें खोलता है कि हम उसे समझें जो उसके वचन में दिखाया गया है, चाहे हम उसे पढ़ें, चाहे वह हमें सुनाया जाए। हाँ, और हम यहाँ कोई अपवाद न रखें, यह समझकर कि हम दाऊद से अधिक तीक्ष्ण बुद्धि या अधिक योग्य हैं; वरन् यह जान लें कि यदि उसे परमेश्वर से समझ देने की विनती करनी पड़ी, तो हमें अपनी ओर से भी उतनी ही आवश्यकता है। इसलिए ऐसा होना अनिवार्य है कि जब परमेश्वर ने हमें अपना वचन सौंप दिया है, और उसमें समाई हुई अपनी इच्छा प्रकट कर दी है, तब इसकी पूर्ति के लिए वह अपने पवित्र आत्मा के द्वारा हमारे हृदयों को प्रकाशित करे; क्योंकि और किसी रीति से हमारे कान व्यर्थ पिटेंगे; और तब जो शिक्षा हमने सुनी है वह हमारे किसी काम की न होगी। अब जो आगे आता है, "तेरे वचन के अनुसार", उसकी दो प्रकार से व्याख्या हो सकती है: तेरे वचन के अनुसार: अर्थात् यह कि तू मुझे बुद्धिमान बनाएगा। और किस रीति से? यह कि मैं पूरी तरह तुझसे शासित होऊँ और वही करूँ जिसकी तू आज्ञा देता है। यह बहुत सच्ची बात है, क्योंकि इससे हमें चेतावनी मिलती है कि परमेश्वर को बोलते हुए सुनें, और बदले में हम उसे अपने ऊपर प्रभुता करने दें: और इस मूर्खतापूर्ण अहंकार में न पड़ें कि कहें, "मुझे बहुत ज्ञान है, मुझे इतनी शिक्षा की आवश्यकता नहीं।" इसलिए जब परमेश्वर वचन कह चुका हो, तब हम उसे सीधे-सादे रूप से और बिना विवाद के मान लें।

यह जो वाक्य मैंने कहा है, वह बहुत सच्चा है, परन्तु यह दाऊद के अभिप्राय से मेल नहीं खाता, और न पाठ की सरलता से। क्योंकि वह यहाँ दो बातें माँगता है, एक पहले पद में, दूसरी दूसरे में। वह पहले पद में कहता है, "मेरी दुहाई तेरे सम्मुख पहुँचे, कि मैं तेरे वचन के अनुसार सिखाया जाऊँ।" और फिर वह जोड़ता है,

"मेरी विनती तेरे सम्मुख पहुँचे; और अपने वचन के अनुसार मुझे छुड़ा।"

यह सच है कि वह दो वाक्य काम में लाता है: परन्तु फिर भी वे एक ही अर्थ में अद्भुत शोभा से रहित नहीं हैं: और इस दोहराव से हम और भली-भाँति समझ सकते हैं कि दाऊद का अभिप्राय केवल यही था कि परमेश्वर उसकी दोनों विनतियाँ उन प्रतिज्ञाओं के अनुसार पूरी करे जो उसने उससे की थीं। देखो, तब पहले पद का स्वाभाविक अर्थ यह है, "हे प्रभु, जैसी तूने प्रतिज्ञा की है, वैसी मुझे समझ दे।" और यह उस नियम के अनुसार है जिसकी चर्चा हम पहले कर चुके हैं, कि हमें परमेश्वर से कुछ भी नहीं माँगना चाहिए, सिवाय उसके जिसकी उसने प्रतिज्ञा की है, हाँ इस रीति से कि हमें उसकी इच्छा का निश्चय हो। यह सच है कि परमेश्वर हमारे साथ बहुत घनिष्ठता से व्यवहार करता है, जब वह हमें अपने पास आने को बुलाता है, जैसे पिता अपने बच्चों को बुलाता है, और हमें अपनी सारी भावनाएँ उसके सम्मुख उँडेलने देता है, और मानो उसकी गोद में उनका बोझ उतार देने देता है, जैसा पवित्रशास्त्र में उल्लेख है; तौभी उसका अभिप्राय यह है कि हम यह मर्यादा बनाए रखें कि उससे ऐसी कोई वस्तु न माँगें जो हमारी ही दृष्टि में भली लगे: वरन् उसे पहचानें जो उसे सबसे अधिक भाता है। और हम यह कैसे जानेंगे? निश्चय ही उसकी प्रतिज्ञाओं से। इसलिए हमें अपनी प्रार्थनाओं के विषय में भली-भाँति निश्चित होना चाहिए; और परमेश्वर से यह या वह वस्तु अन्धाधुन्ध नहीं माँगनी चाहिए: वरन् हमें उससे विनती करनी चाहिए और निश्चित और पक्का होना चाहिए कि वह हमारी सुनेगा। और यह कैसे हो सकता है, जबकि किसी ने उसकी सम्मति में भाग नहीं लिया कि कह सके कि हमें ऐसा कोई निश्चय है, जब तक कि वह स्वयं हमें न बता दे कि उसकी इच्छा है कि हमें दे? इसलिए आवश्यक है कि हमारी सब प्रार्थनाएँ परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं के अनुरूप हों, अर्थात् हम पवित्रशास्त्र में से वह सब इकट्ठा करें जिसकी उसने हमसे प्रतिज्ञा की है, ताकि इस रीति से हमें उसके सम्मुख अपनी विनतियाँ और प्रार्थनाएँ करने का मार्ग मिले।

अब हमें यह जानना शेष है कि क्या वह प्रतिज्ञा परमेश्वर की ओर से केवल दाऊद को दी गई थी, या वह हम सब के लिए भी साझी है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि परमेश्वर ने दाऊद से एक निजी मनुष्य के रूप में बात नहीं की: वरन् सामान्य रूप से यह प्रकट करने के लिए कि वह उन सब को सिखाने में चूकेगा नहीं जो दीनता से उसके पास आते हैं, और उसके वचन के अनुसार ही माँगने के सिवाय कुछ नहीं माँगते। जब ऐसा है, कि परमेश्वर ने हमसे सामान्य रूप से कहा है, और बताया है कि यदि हम उसके शिष्य बन जाएँ तो वह शिक्षक का काम करने को तैयार है: तब हम भी दाऊद के साथ कह सकते हैं, "हे प्रभु, अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार मुझे समझ दे।" अब यहाँ हमें संक्षेप में दो बातों पर ध्यान देना है। पहली यह कि हमें चेताया जाता है कि हम अपनी अज्ञानता और मोटी बुद्धि को स्वीकार करें। क्योंकि यदि हम परमेश्वर से बुद्धिमान बनाए जाने की प्रार्थना करें, और फिर यह समझें कि अपने ही उद्योग और सामर्थ्य से बुद्धिमान बन जाएँगे, तो यह निरा उपहास है। इसलिए यदि हम यह प्रार्थना सच्चाई से करना चाहते हैं, अर्थात् यह कि परमेश्वर हमें समझ दे, तो हमें स्वीकार करना होगा कि हम बुद्धि और विवेक दोनों से रहित हैं। और पहली बात के विषय में इतना ही।

इसके अतिरिक्त, हमें जानना चाहिए कि परमेश्वर हमें केवल इसी शर्त पर ग्रहण करना चाहता है: अर्थात् जब हम दीन और नम्र किए गए हों। क्योंकि अन्यथा, चाहे हमारे पास जितना भी पवित्रशास्त्र हो, हम कभी सिखाए जाना न सह सकेंगे, क्योंकि उसमें वह कहता है कि दीनों और नम्रों को सिखाना उसका काम है, कि अन्धों की आँखें खोलना और उन्हें जो बिलकुल अज्ञानी हैं सिखाना मानो उसका निज स्वभाव ही है, कि भटकी हुई भेड़ों को इकट्ठा करे, और जब वे विनाश के मार्ग पर हों तब उन्हें उद्धार के बन्दरगाह में पहुँचाए। जब ऐसा है कि परमेश्वर यह सब अपने ऊपर लेता है, तो हम सन्देह न करें कि वह हमारी सब विनतियाँ सुनेगा। परन्तु क्या? हम देखते हैं कि हम कितने ठण्डे हैं। क्योंकि हम इस संसार की वस्तुओं से ऐसे रुके हुए हैं कि जो मुख्य है उसे छोड़ देते हैं। अब जब दाऊद ने बता दिया कि वह मुख्यतः क्या चाहता था, तो वह आगे कहता है,

"मेरे होंठों से तेरी स्तुति उमड़ेगी, जब तू मुझे अपनी विधियाँ सिखा चुका होगा।"

यहाँ वह उसी को आगे बढ़ाता है जिससे उसने आरम्भ किया था: अर्थात् यह दिखाना कि वह कृतघ्न नहीं होगा, वरन् परमेश्वर के उपकारों को स्वीकार करेगा। यह सच है कि जब हम परमेश्वर के पास आते हैं, तब हमारे लिए बड़े बाहरी दिखावे करना आवश्यक नहीं, मानो वह उन्हें स्वयं ही पूरी रीति से न जानता हो: परन्तु उसका आशय यह है, कि जब हम प्रार्थना करें, तो वह चाहता है कि हम कहें कि हम आगे कभी उसके प्रति कृतघ्न न होंगे: और यह भी आवश्यक न था, परन्तु इसलिए कि हम अपने कर्तव्य करने के लिए और भली-भाँति उभारे जाएँ। और इससे हम और साहसी मन से प्रार्थना भी करते हैं, उस फल को अनुभव करते हुए जो हमें तब मिलेगा जब हमने वह पा लिया होगा जो हमने माँगा और चाहा था। इसलिए दाऊद जब यहाँ कहता है, "हे यहोवा, मेरे होंठों से तेरी स्तुति उमड़ेगी, जब तू मुझे अपनी विधियाँ सिखा चुका होगा", तो उसका अर्थ यह है कि वह खुले मुँह से परमेश्वर की स्तुति करने को तत्पर होगा। अब दाऊद इस प्रकार क्यों बोलता है? ऐसा करने में वह अपने ऊपर उस स्वीकारोक्ति का भार लेता है और अपने आपको उसके लिए उभारता है जिसकी वह प्रतिज्ञा करता है: और यह ऐसा है मानो उसने कहा हो: अच्छा, जब परमेश्वर मुझ पर यह अनुग्रह कर चुका होगा कि मुझे सिखाए, तब मेरा क्या कर्तव्य है? निश्चय ही तब मुझे उसकी स्तुति करनी चाहिए, क्योंकि मुझे इसके लिए और भी अधिक उभारा जाना चाहिए, और इसके लिए अधिक कारण मिलना चाहिए।

और जब मैं परमेश्वर से सिखाए जाने की अभिलाषा करता हूँ, तो जब वह मुझे उद्धार के मार्ग पर बुला चुका होगा, तब मुझे उससे क्या फल मिलेगा? तब मेरे पास उसके पवित्र नाम के स्तुतिगान गाने का कारण होगा, क्योंकि मैं उस अनुग्रह को जानूँगा जो उसने मुझ पर किया है। देखो, इस प्रतिज्ञा में दाऊद किसी प्रतिफल या सेवा के द्वारा परमेश्वर को बाँधने के लिए नहीं बोलता: वरन् केवल अपने आपको उभारता है, और मानो अपने आपको ऐड़ लगाकर आगे बढ़ाता है, ताकि वह उस उपकार को ग्रहण करने के लिए और भली-भाँति तैयार हो जो परमेश्वर ने उससे प्रतिज्ञा किया था: और ताकि वह जाने कि यह उपकार उसके लिए उस पर कृतघ्न होने का कारण न बने जिससे उसने उसे पाया। तौभी यहाँ हमें संक्षेप में दो बातों पर विचार करना है। एक यह कि जैसे परमेश्वर ने अपने अनुग्रह हम पर उदारता से उँडेले हैं, वैसे ही हमें उसकी स्तुति और बड़ाई करने के लिए सदा और भी अधिक तत्पर रहना चाहिए। क्योंकि निश्चय यही एकमात्र प्रतिफल है जो हम उसे किसी रीति से दे सकते हैं, यदि इसे प्रतिफल कहा भी जा सके: तौभी वह इसे इसी नाम से धन्यवाद के साथ ग्रहण करता है, जैसा पवित्रशास्त्र में इसका उल्लेख है। जब ऐसा है, तो यदि हम नहीं चाहते कि जो उपकार परमेश्वर ने हम पर किया है, वह हमारी कृतघ्नता के कारण हमारे लिए दण्ड बन जाए, तो हम सावधान रहें कि उसके प्रति अपना कर्तव्य पूरा करें: और इस प्रकार, जब वह अपनी भलाई हम पर प्रकट कर चुका हो, तो हम उसे भूलें नहीं, और न हमारे मुँह बन्द हों, वरन् उसे उसके सम्मुख स्वीकार करें।

और पहली बात के विषय में इतना ही। दूसरी यह है कि जो परमेश्वर के वचन में भली-भाँति और उचित रीति से सिखाया गया हो, वह इसे दिखाए, हाँ अपने जीवन के सब दिनों में उसके नाम की महिमा करके। इसलिए जो परमेश्वर की स्तुति करने में इतने ठण्डे हैं, वे भली-भाँति दिखाते हैं कि उन्होंने कभी नहीं जाना कि वचन की सामर्थ्य क्या है। और ऐसा क्यों? क्योंकि हमारे लिए यह असम्भव है कि हम परमेश्वर के वचन का कुछ भी स्वाद लें और उससे कोई शिक्षा पाएँ, परन्तु यह कि अवश्य ही हम उससे प्रेरित और मोहित होकर उसके महिमामय नाम के स्तुतिगान गाएँ। इसलिए जो कोई इसमें लापरवाह दिखाई दे, वह यथेष्ट रीति से प्रकट कर देता है कि वह नहीं जानता कि परमेश्वर का वचन क्या है, चाहे वह अपने आपको मसीही ही क्यों न कहे। अब आओ हम उनकी ओर आएँ जो न केवल स्वयं गूँगे हैं, वरन्, जो इससे भी बुरा है, दूसरों के मुँह भी बन्द करना चाहते हैं, ताकि उनके लिए परमेश्वर की स्तुति करना उचित न रहे। और फिर भी निश्चय ये लोग इतने निर्लज्ज हैं कि तौभी अच्छे मसीही गिने जाना चाहते हैं: परन्तु इन उपायों से वे प्रकट करते हैं कि वे परमेश्वर के प्राणघातक शत्रु हैं, हाँ स्वयं शैतानों से भी बुरे।

और ऐसा क्यों? निश्चय वे इसे यथेष्ट नहीं समझते कि उन्होंने परमेश्वर की पाठशाला में कुछ भी उन्नति नहीं की, और न वे इससे सन्तुष्ट हैं कि दूसरों को भलाई का मार्ग दिखाएँ: परन्तु वे चाहते हैं कि सारा संसार उन्हीं के समान हो जाए, कि परमेश्वर की स्तुति की चर्चा कभी हो ही नहीं, और फिर भी, जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, इस बीच यह "मसीही" शब्द उनके एक कौड़ी के काम न आएगा। अब निस्सन्देह परमेश्वर उन सब को अस्वीकार करता है जो उसकी महिमा के गीत गाने में अपने आपको नहीं लगाएँगे, और जो अपने पड़ोसियों को भी ऐसा ही करने के लिए नहीं उभारेंगे, ताकि वे दिखा सकें कि उन्होंने उसके वचन का अध्ययन किया है। परन्तु हम भली-भाँति निश्चित रहें कि केवल अपना मुँह खोलना और जीभ से उसके स्तुतिगान गाना ही काफी नहीं: वरन् वह भली भावनाओं से भरे हृदय से भी निकलना चाहिए। क्योंकि दाऊद यहाँ हमें यह नहीं बताता कि वह परमेश्वर की स्तुति का उत्सव मनाएगा, परन्तु परमेश्वर को सम्बोधित करते हुए वह उसके सम्मुख प्रतिज्ञा करता है कि वह उसके स्तुतिगान गाएगा। और यह कहते हुए वह भली-भाँति जानता है कि उसका हृदय इसके लिए तैयार होना अनिवार्य है। इसलिए जब हम परमेश्वर के नाम की बड़ाई उस रीति से करना चाहें जैसा उचित है, तो हम उसे केवल मुँह से न निकालें: वरन् हमारा हृदय भी उसमें लगा हो, और उससे मेल खाकर मधुर तालमेल बनाए। यदि ऐसा हो, तो हमारा सारा जीवन धीरे-धीरे उसके अनुरूप हो जाएगा, कि जो कुछ हमने मुँह से कहा वह झूठ न ठहरे। अब वह एक बहुत छोटा वाक्य जोड़ता है: अर्थात्,

"मेरी जीभ तेरे वचन का गीत गाएगी: और क्यों? क्योंकि," वह कहता है, "तेरी सब आज्ञाएँ धर्ममय हैं।" इस पद में वह दिखाता है कि जब वह भली-भाँति सिखाया जा चुका होगा, तब वह स्वयं भी दूसरों को धीरे-धीरे वैसे ही ज्ञान में लाने का परिश्रम करेगा।

यही उसका पूरा अभिप्राय है। परन्तु अपने भाइयों और पड़ोसियों को परमेश्वर और उसके सत्य के ज्ञान की ओर खींचने की जो लालसा उसमें है उसे और भली-भाँति प्रकट करने के लिए, वह यह शब्द "गाना" काम में लाता है, केवल सादे ढंग से बोलकर सन्तुष्ट नहीं होता: वरन् यह प्रकट करता है कि वह ऊँचे और साफ स्वर से गाएगा: कि वह उसके वचन को गुँजाएगा, ताकि वह सुना जाए, हाँ, ऐसा कि वह उतनी ही प्रसिद्ध बात बन जाए जितने साधारण गीत। अब जब दाऊद इस रीति से बोलता है, तो आओ अब देखें कि हमारा कर्तव्य क्या है। क्योंकि जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, वह अपनी ही सामर्थ्य पर घमण्ड नहीं करता: परन्तु पवित्र आत्मा ने उसे हमारे सामने दर्पण के स्थान पर रखा है, ताकि वह हमारी अच्छी शिक्षा के काम आए। अब जब हम अपने भले परमेश्वर का सत्य जान चुके होंगे, तब हमारे करने को क्या रह जाता है? निश्चय हमें इस धन को मानो सन्दूक में ताले में बन्द करके नहीं रखना चाहिए, वरन् उसके अनुग्रह दूसरों तक पहुँचाएँ: हाँ और दुखी अज्ञानी लोगों को परमेश्वर की सेवा की ओर खींचने में अपना भरसक करें: और उस शिक्षा को अपने साथ लिए फिरें, कि जब वह हमें धन के समान सौंपी गई है तो उसे सब मनुष्यों में प्रचार करें, और जो दान हमने पाया है उसे अपने पड़ोसियों में बाँटें, उस विश्वास के परिमाण के अनुसार जो परमेश्वर ने हमें दिया है। तौभी यह रीति हमसे बहुत दूर है: क्योंकि यदि परमेश्वर के वचन के केवल तीन शब्द ही कहे जाएँ, तो हम शीघ्र उससे ऊब जाएँगे, वरन् आज के दिन तो हम उसकी चर्चा सुनेंगे ही नहीं। यह इतनी दूर की बात है कि मेज़ पर, मार्ग में, और सब कहीं उसकी चर्चा हो, हम तो यह भी मुश्किल से सह पाते हैं कि दिखावे के लिए भी उसका प्रचार बना रहे: और यद्यपि यहाँ उपदेश-मंच से एक घण्टा परमेश्वर के नाम से बोलना उचित है, तौभी तुम बहुत-से कुत्तों को पाओगे जो उस पर दाँत पीसने से भी न हिचकिचाएँगे, मानो परमेश्वर को बहुत अधिक विशेषाधिकार मिल गया हो। यह बहुत दूर की बात है कि हर एक मनुष्य परमेश्वर की आज्ञाओं और उसके सारे वचन का गीत गाने में लग जाए, और हमारे कान उससे भर जाएँ। अब यह कृतघ्नता कहाँ से आती है? निश्चय इसलिए कि हमने उसका कभी स्वाद नहीं चखा जो दाऊद यहाँ जोड़ता है, "तेरी सब विधियाँ," वह कहता है, "धर्ममय हैं।" यदि हम भली-भाँति जानते कि परमेश्वर की विधियों में कैसी समता और पवित्रता है, तो निस्सन्देह हम उन्हें सीखने, थामे रखने और दूसरों को दिखाने में, जितना अब तक हुए हैं उससे अधिक उत्सुक होते। इसलिए वे सब जो अपने पड़ोसियों को सिखाने की कुछ परवाह नहीं करते, और उस ज्ञान और विश्वास की कद्र नहीं करते जो उन्होंने पाया है: वे इससे दिखाते हैं कि वे परमेश्वर को वह धार्मिकता नहीं देना चाहते जो उसे प्राप्त होनी चाहिए, जैसा उसके वचन में समाया है, और जैसा वह स्वयं उसमें दिखाता है। अब दाऊद तुरन्त जोड़ता है,

"तेरा हाथ मेरी सहायता करने को तैयार रहे, क्योंकि मैंने तेरे उपदेशों को अपनाया है।"

वह फिर उसी की ओर लौटता है जो उसने पहले छुटकारे के विषय में कहा था। क्योंकि परमेश्वर से सिखाए जाने की माँग करने के पश्चात् उसने कहा: "हे, मुझे छुड़ा।" हाँ, वह भली-भाँति जानता था कि यदि वह उसे अपना रक्षक न पाए, तो सदा मानो मृत्यु में पड़ा रहेगा। अब वह जोड़ता है, "तेरा हाथ मेरी सहायता करे।" और क्यों? क्योंकि, वह कहता है, मैंने तेरी आज्ञाओं को चुन लिया है।

जब वह परमेश्वर से माँगता है कि वह अपने हाथ से उसकी सहायता करे, तब वह अपनी घटी मान लेता है, और यह भी कि वह ऐसा मनुष्य था जिसे सहायता की आवश्यकता थी, मानो उसे इससे पहले कभी इतनी आवश्यकता न रही हो: और यह कि स्वयं को छुड़ाना उसके बस में नहीं था, न वह उसे अपनी किसी सृष्टि वस्तु में पा सकता था। और इसलिए यदि परमेश्वर अपना हाथ न बढ़ाता, तो देखो दाऊद पूरी तरह नष्ट हो गया होता। अब यह स्वीकारोक्ति हमारे लिए बहुत लाभदायक है। क्योंकि हममें से कौन है जो क्लेशों से रहित हो? और जो कह सके, "मेरे पास सब आवश्यक वस्तुएँ हैं"? यह बिलकुल सच है कि हम उसकी अपेक्षा जो हमारी देह और इस वर्तमान जीवन से सम्बन्ध रखता है अधिक चिन्ता करते हैं, उसकी तुलना में जो हमारी आत्माओं के उद्धार के लिए आवश्यक है। यदि हमें खाने-पीने की आवश्यकता हो, यदि हम रोगी हों, यदि हम किसी महामारी या युद्ध के संकट में हों, तो वह हमें उभारता है और मर्म को छूता है: परन्तु जब हम किसी बुराई से दबाए जाते हैं, तो हम अपने आपको धोखा देते हैं, और ऐसी मूर्खतापूर्ण धृष्टता में ऊँचे हो जाते हैं कि समझने लगते हैं कि हममें यह करने की कुछ सामर्थ्य है, और तब अपने आपको मना लेते हैं कि हम अपनी रक्षा करने में भली-भाँति समर्थ हैं, यदि पूरी तरह नहीं तो कम-से-कम कुछ अंश में। और इसलिए हमें और भी अधिक उचित रीति से पवित्रशास्त्र के उन वचनों पर ध्यान देना चाहिए जहाँ हमसे कहा गया है कि यह परमेश्वर का हाथ है जो हमारी सहायता करे, ताकि हर एक मनुष्य अपनी आवश्यकता जानना सीखे, और हम सब को इस स्वर्गीय सामर्थ्य से रक्षित होने की आवश्यकता हो: ऐसा कि हम सब अथाह गड्ढे में गिरे पड़े हैं, यदि परमेश्वर को हमारी आवश्यकताओं में सहायता के लिए अपना हाथ बढ़ाना न भाए। और इसके विषय में इतना ही। अब जब दाऊद यह कारण बताता है कि उसने परमेश्वर की आज्ञाओं को चुना है, तो उसने यह अपनी किसी प्रतिष्ठा या योग्यता को बढ़ाने के लिए नहीं किया। तो फिर क्यों? निश्चय यह दिखाने के लिए कि वह अपनी सहायता और मदद परमेश्वर के हाथ से बाट जोहता था। और इसलिए जो अपने मन में यों ही मान लेते हैं कि परमेश्वर उनकी प्रार्थनाएँ सुनता है, और फिर भी उनके साथ यह मूर्खतापूर्ण आशा है कि उसकी सृष्टि वस्तुओं के हाथों से सहायता पाएँगे: वे जहाँ तक उनसे बन पड़ता है परमेश्वर के हाथ को ठुकरा देते हैं: और इस रीति से उसे कभी अपने ऊपर अनुग्रहकारी न पाएँगे। और इसी कारण दाऊद कहता है, "मैंने परमेश्वर की आज्ञाओं को चुना है", अर्थात् यह कि उसकी सारी रुचि उन्हीं में थी। और यह कथन बहुत बड़ी बात को सूचित करता है, और उससे कहीं बड़ी जितनी पहली दृष्टि में दिखाई देती है। दाऊद "चुनाव" या चयन का यह शब्द और किसी की अपेक्षा क्यों रखता है? "मैंने तेरी आज्ञाओं को चुना है।" इसलिए कि हम सदा कुटिल भावनाओं से बहकाए जाते हैं, और हम चयन नहीं कर सकते, न उसे थामे रह सकते हैं जो सबसे उत्तम है। हर एक मनुष्य उसी वस्तु की इच्छा सहर्ष करेगा जो उसके अपने सुख और चैन के लिए सबसे उपयुक्त हो: संक्षेप में, हर एक मनुष्य सुखी होना चाहता है। इसमें हम कुछ भी उदासीन नहीं: क्योंकि संसार के दुष्ट से दुष्ट और अत्यन्त नीच लोग भी कहेंगे, "मैं वह चाहता हूँ जो मेरे लिए अच्छा और उचित हो": तौभी हम चुनाव नहीं कर पाते: वरन् निकृष्टतम को ही चुन लेते हैं। हममें निश्चय स्वाभाविक अभिलाषा होगी, जो हमें मानो एक ही लक्ष्य की ओर ले जाएगी: परन्तु हम मार्ग पर बने नहीं रह सकते। हर एक उससे बाहर निकल जाता है। कोई एक इस वस्तु को चुनेगा, कोई दूसरा उसको, और इस चुनाव में हम सब घबरा जाते हैं। कोई धन, भूमि और सम्पत्ति चुनेगा: कोई दूसरा, व्यापार की बड़ी बिक्री: कोई दूसरा, प्रतिष्ठा और साख में पहुँचना: कोई एक व्यभिचार में लगा रहेगा, और पूरी तरह उसी ओर खिंच जाएगा: कोई दूसरा किसी और अशुद्धता के वश में हो जाएगा, जैसे मतवालापन, असंयम और उच्छृंखलता।

देखो, तब हम सब कैसे उसी को चुनते हैं जो निकम्मा है। और इसी कारण दाऊद कहता है कि उसने परमेश्वर की आज्ञाओं को चुना: अर्थात् यह कि यद्यपि वह मरणहार मनुष्य था, और बहुत-सी दुष्ट भावनाओं के अधीन था, तौभी उसने कभी अपने शरीर पर भरोसा न किया, और न अपनी अभिलाषाओं की मानी कि व्यर्थता को ही चुने, और उसे जो उसे सीधे मार्ग से हटा दे और विनाश की ओर ले जाए: परन्तु उसने अच्छा बुद्धिमानी का चुनाव किया: अर्थात् यह कि उसने अपने आपको परमेश्वर की आज्ञाओं में थामे रखा। इसलिए आओ हम अच्छा चुनाव करना सीखें: जब परमेश्वर हमारे सामने अपना वचन रखे, जब वह अपनी ओर से इतनी उदारता से अपने आपको प्रस्तुत करे कि हमसे और कुछ न चाहे सिवाय इसके कि हम उसे ढूँढ़ने को आएँ, और कि वह स्वयं हमारे सामने उपस्थित है: तो हम शैतान के धोखों से, और उन भ्रष्टताओं से जो वह हमारी आँखों के सामने खोलकर रखता है, धोखा न खाएँ और न बहकाए जाएँ: हम इतने मूर्ख न हों कि निकम्मी बातों पर टिके रहें, और उसे छोड़ दें जो सबसे मुख्य होना चाहिए, और जिसमें हमारा सारा सुख और उद्धार है।

आगे आता है, "हे यहोवा, मैं तेरे उद्धार का अभिलाषी हूँ, और तेरी व्यवस्था मेरा आनन्द है।" यह वाक्य उस सब को समेटता है जिसकी चर्चा हम पहले कर चुके हैं, और उसकी एकमात्र पुष्टि है। क्योंकि वह कहता है कि वह परमेश्वर के उद्धार का अभिलाषी रहा है। और यह कैसे? क्योंकि ऐसा प्रतीत होता है कि हर एक मनुष्य इतना कह सकता है: और इस प्रकार दाऊद के पास अविश्वासियों से अधिक कुछ न था। क्योंकि यदि हम किसी निराश मनुष्य से, वरन् पूरे अर्ध-शैतान से भी, पूछें, और कहें, "क्या तू नहीं चाहेगा कि परमेश्वर तेरा उद्धारकर्ता हो?" तो वह उत्तर देगा और कहेगा, "हाँ, निश्चय।" देखो, हम कैसा उत्तर क्या बड़े और छोटे, क्या भले और बुरे सब के मुँह में पाएँगे।

अब दाऊद का अभिप्राय एक बड़ी प्रतिज्ञा करना है, और ऐसी जो बहुत थोड़े लोग सच्चाई से कर सकते हैं। क्योंकि हम उसे अपना पूरा उद्धारकर्ता मान लेते हैं: और फिर भी हम अपना उद्धार यों ही अन्धाधुन्ध ढूँढ़ते हैं, और हर एक मनुष्य अपने ही विचारों और अपनी ही दूरदर्शिता का सहारा लेगा। जब यहाँ इस वर्तमान जीवन में हमारे निर्वाह का कोई प्रश्न उठे, तो क्या हम विश्वास करते हैं कि परमेश्वर को हमें रखना और बनाए रखना है, और कि वही वास्तव में इसमें हमें सँभालता है? हममें ऐसे बड़े-बड़े बुरे विवेक कहाँ से आते हैं? सब छल, धोखे, अति, क्रूरताएँ, अन्याय, हिंसाएँ और इसी प्रकार की सब बातें कहाँ से आती हैं? वह क्या कारण है जो हमें ऐसे बुरे विवेक के साथ जीने पर विवश करता है? सिवाय इसके कि हम विश्वास नहीं करते कि परमेश्वर हमें हमारी दैनिक रोटी देगा? हम चाहते हैं कि परमेश्वर हमें खिलाए, और फिर भी हम चाहते हैं कि शैतान ऐसा करे: यहाँ तक कि बहुत थोड़े हैं जो आज यह सोचते हैं कि उनके पास जो कुछ है वह परमेश्वर की ओर से है।

इसलिए यह हमारे हृदयों के विचार से बहुत दूर है कि कहें, "हे प्रभु, मैं तेरे उद्धार का अभिलाषी रहा हूँ।" क्योंकि परमेश्वर की बाट जोहने के बदले, कि वह जब-जब हमें आवश्यकता हो हमारा मार्गदर्शन करे, रक्षा करे और सहायता करे: इसके बदले, मैं कहता हूँ, हम क्या करते हैं? जैसा मैंने कहा, हर एक मनुष्य अपना उद्धार अन्धाधुन्ध ढूँढ़ता है। हमें तो उसे नरक में ढूँढ़ना चाहिए, इसकी अपेक्षा कि अपनी आँखें स्वर्ग की ओर उठाकर परमेश्वर को पुकारें, और देह और प्राण दोनों का उद्धार उसी में ढूँढ़ें। इसलिए बहुत थोड़े हैं जो वैसा कह सकें जैसा यहाँ लिखा है, "हे यहोवा, मैं तेरे उद्धार का अभिलाषी रहा हूँ", यदि वे झूठ न बोलें। जैसा हम कपटियों की निर्लज्जता देखते हैं जो निरर्थक बातों में बड़ी-बड़ी डींगें मारेंगे: परन्तु तौभी, जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, यह छोटी बात नहीं है कि पूरी तरह परमेश्वर पर भरोसा रखें, और कहें कि हमारा मार्गदर्शन करना उसी का काम है, कि हम उसके पास दौड़ें, और वहीं देह और प्राण दोनों के लिए अपना शरण पाएँ। अब वह जोड़ता है, "तेरी व्यवस्था में मेरा आनन्द है", यह सूचित करने के लिए कि हमें अपना बर्ताव कैसा रखना चाहिए, कि परमेश्वर ही से अन्य किसी से उद्धार की आशा न रखें, और न उसकी कामना करें: अर्थात् जब हम उसकी व्यवस्था में आनन्दित हो चुके हों।

इसलिए उचित है कि हम अपनी भावनाओं को वश में करें और उन पर लगाम डालें, कि उन्हें अपनी सब अन्य अभिलाषाओं से अलग करें, और कहें कि उसके वचन को देखने और उससे लिपटे रहने में हम अपना भोजन पाते हैं, और उसी में सचमुच आनन्द मनाते हैं।

क्योंकि जब कभी हम इस बिन्दु पर पहुँचेंगे, तो परमेश्वर में अपना उद्धार ढूँढ़ना हमें कुछ भी कठिन न लगेगा। और ऐसा क्यों? क्योंकि हम सारे पवित्रशास्त्र में और कुछ नहीं देखते, केवल इतनी प्रतिज्ञाएँ जहाँ परमेश्वर हमें इतनी कोमलता से बुलाता है, और जहाँ वह हम पर प्रकट करता है कि वह हमें ग्रहण करने को अति तत्पर है, कि वह हमसे और कुछ नहीं चाहता सिवाय इसके कि हम उसे ढूँढ़ें, और कि वह स्वयं आगे बढ़ता है और हमारे सामने ही अपने आपको प्रस्तुत करता है। पवित्रशास्त्र, मैं कहता हूँ, इस शिक्षा से भरा है, कि हमें दिखाए कि जब हम उसकी व्यवस्था में आनन्दित होंगे तो परमेश्वर हमारी सहायता के लिए तैयार है। तब हम परमेश्वर के उद्धार की लालसा भली-भाँति कर सकते हैं, जब हमने सचमुच उसे ढूँढ़ा होगा। परन्तु क्या? हम बहुत थोड़े ऐसे देखते हैं जिनके हृदय इतने दृढ़ हों कि कहें कि वे सीधे मार्ग को थामे रहेंगे, चाहे जो हो जाए। और इसलिए देखो, फिर परमेश्वर हमें क्यों निराश करता है, और हमारी सहायता नहीं करता जैसा हम सहर्ष चाहते हैं कि सहायता पाएँ।

अब वह जोड़ता है, "मेरा प्राण जीवित रहे, तो वह तेरी स्तुति करेगा: और तेरे नियम मेरी सहायता करें।" वह सदा अपने उद्देश्य का पीछा करता है, परन्तु यहाँ वह दो बातों को एक साथ जोड़ता है जिन्हें पहले उसने अलग किया था। जब वह कहता है, "मेरा प्राण जीवित रहे", तो वह सदा, जैसा उसने कहा है, परमेश्वर से अपना उद्धार चाहता और उसकी लालसा करता है। वह यह नहीं कहता, "मैं चाहता हूँ कि मेरा प्राण जीवित रहे", परन्तु परमेश्वर की शरण लेता है, भली-भाँति जानते हुए कि वही उसके जीवन का रक्षक है: और इसलिए उसे उसी के हाथों में सौंपता है, और उसकी रखवाली उसी पर छोड़ता है, जैसा केवल उसी का है। और फिर वह कहता है कि वह उसे धन्यवाद देगा, क्योंकि उसका जीवन बढ़ाया जाएगा।

अब यहाँ हम देखते हैं कि विश्वासियों को किस उद्देश्य से इस संसार में जीने की अभिलाषा करनी चाहिए: अर्थात् इसलिए कि वे परमेश्वर की स्तुति करें, जैसा अन्य स्थानों में भी कहा गया है। और विशेषकर, बहुत दूर जाए बिना, हिजकिय्याह के गीत में। क्योंकि वहाँ, जैसे एक सौ तेरहवें भजन में, और मानो योना के गीत में, दिखाया गया है, कि यदि हमें जीना है, तो हमें केवल जीने के लिए नहीं जीना चाहिए (जैसा हम कहते हैं) और कोई और विचार न रखना चाहिए: और न यह कहना चाहिए, "मैं केवल खाने-पीने के लिए और यहाँ इस वर्तमान संसार में रहने के लिए जिऊँगा।" परन्तु हमें और आगे बढ़ना चाहिए: अर्थात् हमें इसलिए जीना चाहिए कि परमेश्वर की स्तुति करें: ताकि यदि हममें यह नहीं है, तो हम चाहें कि सौ हाथ भूमि के नीचे हों, ताकि हमारी चर्चा फिर कभी न हो। देखो, मैं कहता हूँ, हमारा जीवन कैसे धन्य और परमेश्वर की इच्छा के अनुकूल होगा: अर्थात् जब हम अपने आपको और किसी उद्देश्य की ओर नहीं झुकाएँगे, केवल उसके पवित्र और धन्य नाम की स्तुति और बड़ाई की ओर।

अब इस बीच दाऊद जोड़ता है, "हे, तेरे नियम मेरी सहायता करें।" यह वही है जो उसने पहले परमेश्वर के उद्धार के विषय में कहा था। क्योंकि वह परमेश्वर के नियमों को उन सब सहायताओं के विरुद्ध रखता है जो मनुष्य और अविश्वासी लोग परमेश्वर की खोज के बदले किसी रीति से गढ़ सकते हैं। क्योंकि वे समझते हैं कि उन्हें और कहीं से भली-भाँति सहायता मिलेगी, जब उनके पास अपनी तुच्छ युक्तियाँ होंगी, यह सोचने के लिए कि सृष्टि वस्तुएँ उनकी सहायता के लिए काफी होंगी। जब ये संसारी लोग यह सोचते हैं कि परमेश्वर की सहायता के बिना रक्षा पा लें, तो परमेश्वर के नियमों को भूलने में उनका धोखा खाना अनिवार्य है: अर्थात् उसकी उस व्यवस्था-शासन को, जिससे वह संसार पर राज करता है: क्योंकि हमें पूरी तरह निश्चित होना चाहिए कि वह भक्तिहीनों को लगाम में रखता है जब वे उत्पात मचाते हैं, और बलपूर्वक भले और निर्दोष को हानि पहुँचाने को उठते हैं: और यह उन सब की दुष्टता को दबाने के लिए है जो उसके लोगों को सताते हैं, क्योंकि उसने उन्हें अपने हाथ और संरक्षण में ले लिया है। देखो, तब विश्वासियों को अपने आपको परमेश्वर के नियमों के आधीन कैसे करना चाहिए, अर्थात् इस प्रबन्ध के आधीन, जिसके द्वारा सब कुछ व्यवस्थित और शासित होता है। यह सच है कि परमेश्वर अपनी सब सृष्टि वस्तुओं को हमारी रक्षा और निर्वाह के लिए भली-भाँति सज्जित कर सकता है: परन्तु तौभी इस सब के होते हुए हमें उसके हाथ को अनुभव करने से, और जब वह हमारी सहायता करे तब विश्वास से उसे निहारने से नहीं रुकना चाहिए। हमें इस प्रबन्ध को देखने से नहीं रुकना चाहिए जो अविश्वासियों से छिपा है, क्योंकि उनके मन भयानक अन्धकार में लिपटे हैं।

संक्षेप में, हम जो कुछ सहायता परमेश्वर के हाथ से अनुभव करें उस सब को उसके नियमों का फल मानना न छोड़ें, चाहे उसके पास हमारी सहायता के लिए निचले साधन हों। अब अन्त में दाऊद समाप्त करता है, "मैं खोई हुई भेड़ के समान भटक गया हूँ; अपने दास को ढूँढ़, क्योंकि मैं तेरी आज्ञाओं को नहीं भूलता।" यहाँ हम इसे बहुत विचित्र सोच सकते हैं कि दाऊद क्यों कहता है कि वह खोई हुई भेड़ के समान भटक गया है, जबकि वह जोड़ता है कि उसने परमेश्वर की आज्ञाओं को नहीं भुलाया, और हम इतनी उत्तम प्रतिज्ञाओं से पहले ही देख चुके हैं कि परमेश्वर की सेवा करना उसका पूरा आनन्द था, हाँ, और यह कि वह उसे सोने-चाँदी से भी अधिक प्रिय था। तो अब वह अपने आपको खोई हुई भेड़ से कैसे तुलना करता है?

इस कठिन बात को स्पष्ट करने के लिए, साधारणतः कहा जाता है कि दाऊद अपने आपको भटकी हुई भेड़ मानता है, इस पर भी कि उसमें परमेश्वर को प्रसन्न करने और अपने सारे जीवन को सीधा चलाने की बड़ी लालसा थी, और फिर भी वह भूल करने से न रुका। यह कथन स्वयं उसमें भली-भाँति सत्य ठहरता है। क्योंकि यद्यपि यह दाऊद के सारे जीवन पर लागू नहीं होता, तौभी उसका एक भयानक पतन हुआ, और वह उस पाप में जो उसने ऊरिय्याह की पत्नी बतशेबा के साथ किया एक बेचारे खोए हुए पशु के समान था। क्योंकि ऐसा प्रतीत होता है कि तब उसने परमेश्वर को छोड़ दिया था, और वह मानो एक खोया हुआ मनुष्य था। तब वह भली-भाँति कह सकता था कि उसने खोई हुई भेड़ के समान बहुत और भारी भूल की है।

परन्तु इसे और उचित रीति से यों लिया जा सकता है कि दाऊद ने उस समय को नहीं देखा जब परमेश्वर ने उसे बुलाया और भले मार्ग पर लगाया, वरन् अपनी स्वाभाविक दशा और स्थिति को देखा, और कहता है, "हे प्रभु, यदि तू मेरा मार्गदर्शन न करे तो मैं अपने आप में क्या हूँ? हाय, मेरा क्या होता? मैं किस दशा में होता? मैं कहाँ से आरम्भ करता?" तब दाऊद यहाँ अपनी उस दशा की प्रतिज्ञा भली-भाँति कर सकता था जो हम में साझी है। क्योंकि यह हम सब में सामान्य बात है कि हम सब जंगली और भटके हुए पशुओं के समान भटकते हैं, जब तक परमेश्वर हमें सुधार और ठीक न करे। क्योंकि जब वह हमें अपने लिए चुनता है तब परमेश्वर हमें किस दशा में पाता है? क्या हम उद्धार के मार्ग से नहीं भटकते? हम केवल पहाड़ों और जंगलों में ही नहीं, वरन् सिर से पाँव तक डूबे हुए हैं, अथाह गहराइयों तक।

इसलिए दाऊद, और उसके साथ हम भी, भली-भाँति कह सकते हैं कि हम खोई हुई भेड़ें हैं, जब तक परमेश्वर अपने आपको हमारा चरवाहा न दिखाए और हमें अपना अनुसरण करने का अनुग्रह न दे। और फिर भी एक और कारण है जिसने दाऊद को अपने आपको खोई हुई भेड़ कहने पर प्रेरित किया: और यही सच्चा अर्थ है, और सबसे स्वाभाविक: अर्थात् इसलिए कि उसके शत्रु प्राणघातक रीति से उसका पीछा करते थे और उसे ऐसी कठोरता और पीड़ा से सताते थे कि वह एक बेचारी खदेड़ी हुई भेड़ के समान था। जो भेड़िये को अपना पीछा करते देखकर उससे पहाड़ों में भाग जाती है, यह सोचकर कि वहाँ छिप जाएगी। देखो, यह एक बेचारी भेड़ है जो भेड़िये के गले से बचेगी: वह इतनी गहरी भयभीत है कि यदि उसे कोई कुआँ मिले, तो वह आगे जाने की अपेक्षा उसी में कूद पड़ेगी, क्योंकि वह नहीं जानती कि क्या करे, न यह कि इस प्रकार प्राणघातक रीति से पीछा किए जाने पर उसका क्या होगा। और इसलिए दाऊद ने, यह कहकर कि वह खोई हुई भेड़ के समान भटका, इसे अपने पापों का नहीं ठहराया कि कहे, "हे प्रभु, मैंने अपराध किया है, मैं उद्धार के मार्ग से भटक गया हूँ", परन्तु वह कहता है, "हे प्रभु, मैं नहीं जानता कि मेरा क्या होगा।" तो अब हम यहाँ देखते हैं कि इस पाठ का स्वाभाविक अर्थ क्या है, जिस पर हमें मुख्यतः टिकना चाहिए। यद्यपि जिस शिक्षा की मैं पहले चर्चा कर चुका हूँ वह बहुत अच्छी और लाभदायक है, तौभी हमें दाऊद के अभिप्राय का ध्यान रखना चाहिए। "तब मैं भटक गया हूँ," वह कहता है, "खोई हुई भेड़ के समान।" अब वह कहता है,

"अपने दास को ढूँढ़, क्योंकि मैं तेरी आज्ञाओं को नहीं भूलता।"

जब हम इन दो बातों को एक साथ रखेंगे, कि दाऊद परमेश्वर की आज्ञाओं को नहीं भूला, और कि वह भटक गया है, तो हम पाएँगे कि वह परमेश्वर की सेवा में कितना लगा हुआ था, कि वह उसे अपने हृदय की गहराई से चाहता था; और फिर भी वह अति गहरे क्लेश से रहित न था। हाँ, वह ऐसा निस्सहाय था कि ऐसा प्रतीत होता है कि वह अपने उद्धार से निराश हुए बिना न रह सकता था। इसलिए जब हम ऐसा उदाहरण देखते हैं, तो क्या हमारे पास साहस बाँधने का बहुत अच्छा कारण नहीं है, यद्यपि परमेश्वर हमें बहुधा अति भारी रीति से सताए जाने देता है? क्योंकि यदि यह दाऊद में हुआ, जो ऐसा उत्कृष्ट मनुष्य था जैसा हमने कहा है, तो हम यह न सोचें कि हमें उससे बहुत अधिक विशेषाधिकार मिलेगा। परन्तु हम मुख्यतः अपने क्लेशों में धीरज धरने का विचार करें, क्योंकि परमेश्वर उसके द्वारा हमारे विश्वास और धीरज की परीक्षा करना चाहता है, और यह सब हमारे उद्धार के लिए पलट देगा। और यही दाऊद का निष्कर्ष है, "हे प्रभु, अपने दास को ढूँढ़", जो सूचित करता है कि वह मुख्यतः परमेश्वर के संरक्षण और रक्षा पर टिकता है। और देखो, इस विषय में हमें अपने आपको कैसे चलाना चाहिए: क्योंकि यदि हम सताए जाने के समय उस पर टिक सकें, और उससे विनती करें कि वह हमें ढूँढ़े, तो हमें सन्देह न करना चाहिए कि वह हमें अपनी सहायता अनुभव कराएगा, हाँ, और कि जब हम वहाँ अपना उद्धार ढूँढ़ेंगे तो उसे पाएँगे।

इस पवित्र शिक्षा के अनुसार, आओ हम अपने भले परमेश्वर के प्रताप के सम्मुख दण्डवत् करें, अपने अपराधों को स्वीकार करते हुए, उससे विनती करें कि वह हमें उन्हें पहले से और अच्छी रीति से अनुभव कराए। और इस बीच, यह भी कि वह हमारी सब दुर्दशाओं में सहायता करे, और हमें यह परम औषधि दे, अर्थात् हम अपनी सब दुष्ट भावनाओं से शुद्ध किए जाएँ, कि व्यवस्था हम में पूरी तरह राज करे, हमारे विचारों और अभिलाषाओं पर, और हम में जो कुछ और है उस सब पर पूरा अधिकार रखे, और हम उससे ऐसे शासित हों कि इस संसार की और इस वर्तमान जीवन की सब वस्तुओं को छोड़कर, हम और कुछ न माँगें और न चाहें, केवल अपने भले परमेश्वर से लिपटे रहना, और पूरी तरह उसकी पवित्र इच्छा के अनुरूप होना। और यद्यपि हम अब बहुत-से दोषों और अपूर्णताओं में पाले जा रहे हैं, और बहुत-सी विपत्तियों के अधीन हैं, तौभी इस सब के होते हुए यह जान लें कि जब तक हम उसके संरक्षण और रक्षा में हैं तब तक हम बहुत धन्य हैं, सदा उस उद्धार की बाट जोहते हुए जिसकी उसने हमसे प्रतिज्ञा की है, जब तक वह हमें उसका पूरा आनन्द न दे दे, कि हम उसे उसके स्वर्गीय राज्य में आमने-सामने देखें, जिसे हम अब यहाँ नीचे मानो धुँधले दर्पण में देखते हैं। कि वह न केवल इत्यादि।

समाप्त।

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मोनरजिज़्म बुक्स

भजन संहिता 119 पर उपदेश, जॉन कैल्विन द्वाराकॉपीराइट © 2024

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