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भजन संहिता एक सौ उन्नीसवें का दूसरा उपदेश। पद 8-16
बेथ।
9 जवान अपनी चाल को किस उपाय से शुद्ध रखे? तेरे वचन के अनुसार उस पर सावधान रहने से।
10 मैं ने तुझे पूरे मन से ढूँढ़ा है; मुझे अपनी आज्ञाओं से भटकने न दे।
11 मैं ने तेरी प्रतिज्ञा को अपने हृदय में रख छोड़ा है, कि मैं तेरे विरुद्ध पाप न करूँ।
12 हे प्रभु, तू धन्य है; मुझे अपनी विधियाँ सिखा।
13 तेरे मुँह से निकले हुए सब नियमों का मैं ने अपने होठों से वर्णन किया है।
14 मैं तेरी चितौनियों के मार्ग में ऐसा आनन्दित रहा हूँ, जैसा सब प्रकार के धन में।
15 मैं तेरे आदेशों पर ध्यान करूँगा, और तेरे मार्गों पर विचार करूँगा।
16 मेरा आनन्द तेरी विधियों में होगा; और मैं तेरे वचनों को न भूलूँगा।
बीते रविवार को मैं ने तुम्हारे सामने इस भजन का सार, इसका उपयोग, और इससे मिलनेवाली शिक्षा संक्षेप में बताई थी; अर्थात् यह कि एक विश्वासी जन को यहाँ सिखाया जाता है कि वह अपने आप को परमेश्वर का वचन पढ़ने के लिए जगाए, और इस प्रकार अपने आप को उसमें दृढ़ करे। दाऊद ने स्वयं ऐसा ही किया, जो सब मनुष्यों में सबसे उत्तम था; तो फिर हमें कितना अधिक ऐसा ही करना चाहिए? हमें, मैं कहता हूँ, जो इतने अनगढ़ और अज्ञानी हैं, और परमेश्वर की पाठशाला में उसके जितनी उन्नति करने से कोसों दूर हैं? परन्तु हम इतने ठण्डे हैं, और गधों के समान हमें एड़ लगाकर आगे बढ़ाने की आवश्यकता है; इसलिए देखो कि दाऊद यहाँ हमें क्यों दिखाता है कि इस निरन्तर अध्ययन से हमें कैसा लाभ और हित मिल सकता है, यदि हम में से हर एक अपने आप को इस में लगाए कि जो कुछ परमेश्वर ने अपनी व्यवस्था में और पवित्र शास्त्र में हम पर प्रकट किया है, उसे देखे और सुने: जैसा वह यहाँ कहता है,
"जवान अपनी चाल को किस उपाय से शुद्ध रखे? तेरे वचन के अनुसार उस पर ध्यान देने, अर्थात् सावधान रहने से।"
वह हमें यहाँ दिखाता है कि यदि हम चाहते हैं कि अपने जीवन को वैसा चलाएँ जैसा हमें शोभा देता है, उसे ठीक रीति से संचालित करें, और निर्मल और सीधे-सादे बनें, तो हमें उसी मार्ग को पकड़े रहना चाहिए जो परमेश्वर ने हमारे आगे रखा है। क्योंकि हमें अपनी ही बुद्धि पर भरोसा नहीं करना चाहिए, और न अपने लिए ऐसा मार्ग गढ़ना और बनाना चाहिए जो हमें सबसे अच्छा लगे; परन्तु परमेश्वर को अपना अधिकारी और अगुवा होने देना चाहिए, और सीधाई और सरलता से उसकी आज्ञा माननी चाहिए। संक्षेप में, दाऊद हमें जताता है कि हमारे जीवन की सारी बुद्धि और सिद्धता यही है कि हम परमेश्वर के पीछे चलें और उसकी इच्छा से लिपटे रहें। यह सच है कि यह वाक्य पहली दृष्टि में हमें बहुत साधारण, और मानो आवश्यकता से अधिक जान पड़ सकता है। क्योंकि हम कहेंगे, ऐसा कौन है जो यह नहीं जानता और इसे स्वीकार नहीं करेगा; मैं इनकार नहीं करता कि इसे स्वीकार करना तो एक आम बात है: परन्तु इसी बीच, कितने थोड़े हैं जो उस बात पर, जो यहाँ कही गई है, सचमुच विश्वास रखते हैं; या यदि हम अपने मन में ऐसी बात की कल्पना करते भी हैं, तो उसका आचरण कहाँ है? मुझे भय है कि हम में से बहुत थोड़ों में हम इसे पाएँगे। इसलिए हम यह न समझें कि यह नियम, जो परमेश्वर के आत्मा ने हमारे आगे रखा है, व्यर्थ है; क्योंकि यह इसलिए है कि हमारा जीवन उसके वचन के अनुसार सुधरे, और हम समझ लें कि उसके बिना सब कुछ मल और गन्दगी है, कि हम सब भटक गए हैं, और कि हम कोई मार्ग नहीं पकड़े हुए हैं, चाहे हम इसके विपरीत सोचते हों। परन्तु हमें यह विचारना चाहिए कि वह यहाँ विशेष रूप से जवान की बात क्यों करता है। क्योंकि हम निश्चित जानते हैं कि परमेश्वर ने अपनी व्यवस्था बड़े-छोटे, बूढ़े-जवान, सब के लिए दी है: कि जब हम उसकी शिक्षा अपनी जवानी ही से पाने लगें, तो हमें कब्र तक उसे थामे रहना और उस में बने रहना चाहिए। तब दाऊद व्यवस्था की इस शिक्षा को जवानों तक ही क्यों सीमित करता है? इसलिए नहीं कि वह वृद्धों तक नहीं पहुँचती: परन्तु उसने ऐसा दो कारणों से कहा। हम जानते हैं कि जवानी में कितनी गर्म उमंग होती है, और हम में ऐसी गर्मी होती है कि लगता है उसे किसी रीति से रोका नहीं जा सकता।
और क्योंकि जवानों की तेज़ और अत्यन्त उबलती हुई उमंगों को दबाना कठिन काम है, इसलिए दाऊद विशेष रूप से दिखाता है कि परमेश्वर का वचन उन्हें दबाने की सबसे उत्तम औषधि है। मानो वह कहता, यह बिलकुल सच है कि जवान लापरवाह होते हैं और भटक जाते हैं, वरन् उन जंगली पशुओं के समान जो कोई संकोच नहीं करते, ऐसे उग्र और उन्मत्त कि उन्हें किसी भली दशा में लाना, या उन्हें रोकना भी, लगभग असम्भव है। क्योंकि जब हम समझते हैं कि हमने उन्हें सबसे दृढ़ता से पकड़ रखा है, तभी वे सबसे दूर होते हैं; परन्तु यदि उन्हें यह सम्मति और परामर्श दिया जाए कि वे परमेश्वर से संचालित और शासित हों, तो निस्सन्देह वे बहुत दब जाएँगे। और यद्यपि उनकी वासनाएँ और उमंगें बहुत बढ़ी हुई हैं, तौभी मनुष्य उन में कुछ मर्यादा, और शान्त तथा विनम्र व्यवहार देखेगा। तब बुराई यह है कि जवान परमेश्वर के अधीन नहीं होना चाहते: क्योंकि यदि वे होते, तो उसके वचन में एक उत्तम संयम पाते, और वह भी उनके सब दोषों के उपचार के लिए पूरा-पूरा पर्याप्त। और यह इसी उद्देश्य से कहा गया है कि हमें जता दे कि परमेश्वर के वचन में कैसा सामर्थ्य है, कि वह हमारे भीतर की सबसे उग्र वासनाओं को भी दबा सकता है। और पहली बात के विषय में इतना ही।
दूसरा कारण यह है कि दाऊद का अभिप्राय मुख्यतः छोटी अवस्था के लोगों को यह दिखाना है कि उन्हें छोटी लगाम में रखे जाने की बड़ी आवश्यकता है: नहीं तो वे हर प्रकार की बुराई में बढ़ते ही चले जाएँगे: क्योंकि उनका स्वभाव और भी अधिक बुराई की ओर झुका रहता है, इसलिए कि उन में सम्मति थोड़ी और बुद्धि कम होती है। इसलिए उसका मन है कि उन्हें इस आवश्यकता से चिताए, ताकि वे परमेश्वर के वचन में अपना अध्ययन लगाने में और अधिक सावधान हों। और संक्षेप में, उसका अभिप्राय सारे संसार को सामान्य रूप से चेतावनी देना है कि यदि हम चाहते हैं कि उसकी इच्छा के अनुसार शिक्षा पाएँ, तो हमें समय रहते परमेश्वर की पाठशाला में प्रवेश करना चाहिए। हम जानते हैं कि सुलैमान सभोपदेशक की पुस्तक में क्या कहता है; वह कहता है कि हमें इसकी बाट नहीं जोहनी चाहिए कि हम बुढ़ापे के थके-माँदे वर्षों में आएँ, और तब परमेश्वर को स्मरण करें और उसका ध्यान करें। परन्तु जैसे ही परमेश्वर ने हमें समझ और विवेक दिया है, वैसे ही आरम्भ कर दें, और अन्त तक उसे निभाते रहें। देखो, यह ऐसी शिक्षा है जिसे हमें भली-भाँति ध्यान में रखना चाहिए, क्योंकि हम देखते हैं कि सारी उच्छृंखलता और लम्पटता का उद्गम कहाँ से है, जो अब राज्य करती है और सब युगों में संसार में राज्य करती आई है; वह इसलिए कि परमेश्वर की आज्ञा नहीं मानी जाती, क्योंकि यदि मानी जाती, तो हम पर एक लगाम होती जो हमें भय और भली व्यवस्था में रखती, और हम अपने आप को उस शिक्षा से चलाए जाने देते जो पवित्र शास्त्र में है।
यदि हम तब अपने आप को दीन करें और परमेश्वर के अधीन हों, जैसे अपने स्वामी के, तो सब कुछ वैसा ही सुव्यवस्थित होता जैसा हम अधिक से अधिक चाह सकते। परन्तु हम ऐसा क्यों नहीं करते? संसार तो परमेश्वर की आज्ञा वैसे नहीं मानना चाहता जैसा उसे शोभा देता है, और न इस युक्ति पर आना चाहता है। देखो, यही कारण है कि हम सब कुछ ऐसा उलझा हुआ देखते हैं जैसा वह है। सो हम सर्वथा निरुत्तर हैं, क्योंकि हमारा परमेश्वर इस प्रकार अपने आप को हमारे सामने प्रस्तुत करता है, और हम पर प्रकट करता है कि यदि हम उसके वचन पर चलें, तो हमारा सब कुछ भला होगा, हमारा मार्ग निर्मल और शुद्ध होगा, और हमारा जीवन स्वयं सच्ची सिद्धता होगा। और जब परमेश्वर अपनी व्यवस्था के विषय में ऐसी गवाही देता है, तब सब के मुँह बन्द हो जाने चाहिए, और हमें औंधे मुँह गिर जाना चाहिए, क्योंकि हम जानते हैं कि हम इस प्रकार अपने परमेश्वर से बलवा करते रहे हैं, जो सदा हमें सच्ची रीति से चलाने को तैयार रहता है। और इस विषय में इतना ही।
फिर, यदि हमारी उमंगें इतनी विपरीत हैं कि हमारी लालसाएँ और वासनाएँ जंगली पशुओं के समान हैं जिन्हें हम दबा नहीं सकते: तो हम जान लें कि हमारा परमेश्वर अपने वचन को सामर्थ्य और बल देगा, ताकि हम उसके साथ जुड़ जाएँ, यदि हम अपने आप को उसी लक्ष्य की ओर करें। और यह प्रमाणित करने के लिए वह यहाँ विशेष रूप से जवानी की बिगड़ी हुई दशाओं की चर्चा करता है, जो (जैसा मैं पहले बता चुका हूँ) वृद्धों की अपेक्षा अधिक उग्र और अव्यवस्थित होती हैं। परन्तु बात यह है कि क्या बड़े, क्या छोटे, दोनों इस दशा तक अच्छी रीति से पहुँचाए जा सकते हैं कि अपनी अनियन्त्रित उमंगों और लालसाओं को दबा दें, यदि वे परमेश्वर को वह आदर दें जो उसका अधिकार है, अर्थात् यदि वे उसके वचन पर चलें।
इसके अतिरिक्त, हमें यहाँ उस उपदेश पर ध्यान देना चाहिए जिसका हम पहले ही स्पर्श कर चुके हैं, अर्थात् यह कि दाऊद का अभिप्राय हमें यह दिखाना है कि हमें समय रहते परमेश्वर के शिष्य बनना चाहिए, और उसे अपने ऊपर शासन करने देना चाहिए, और अपने जीवन के सारे दिन इसी अध्ययन में अपने आप को लगाए रखने देना चाहिए। इसलिए हम कब्र के किनारे आने तक की बाट न जोहें कि तब इस विषय में बुद्धिमान बनें, जैसे हम इन ठट्ठा करनेवालों को देखते हैं, जो मौज उड़ाते हैं और परमेश्वर का उपहास करने में उत्पात मचाते हैं, और कहते हैं, "अजी महाशय, पश्चाताप करने को हमें बहुत समय मिल जाएगा।" क्योंकि यदि हम केवल एक सच्ची आह भर सकें, तो चिन्ता दूर! तो चूँकि यह अति निश्चित है कि शैतान ही उन्हें इस प्रकार उकसाता है कि वे परमेश्वर की सहनशीलता का ऐसा घोर दुरुपयोग करें: इसलिए हम सावधान रहें कि हम इस प्रकार मोहित न हो जाएँ। परन्तु जो यहाँ लिखा गया है उसका अनुसरण करें, अर्थात् कि हम अपनी जवानी ही से परमेश्वर के शिष्य बनें।
और सब से बढ़कर हम यह विचारें कि जवानों को यहाँ एक विशेष पाठ सीखना है, जैसा पहले संकेत किया जा चुका है। क्योंकि दाऊद यहाँ उन पर प्रकट करता है कि उन्हें औरों से कहीं अधिक रोके जाने की आवश्यकता है। यह बिलकुल सच है कि हम परमेश्वर के सामने सदा छोटे बच्चों के समान ही हैं: हाँ, मैं कहता हूँ कि जो बड़ी अवस्था के हैं, जिनका अनुभव अधिक है, और जो संसार को गम्भीर और बुद्धिमान दिखाई देते हैं, वे बिना किसी सन्देह के परमेश्वर की महिमा के सामने निरे मूर्ख और बुद्धिहीन हैं। हम यह भी सुनते हैं कि दाऊद अपने विषय में दूसरे स्थान पर क्या मान लेता है, जहाँ वह कहता है कि मैं बछड़े के समान और विवेक या बुद्धि से रहित पशु के समान था। और यदि उसका यह हाल था, उसका, मैं कहता हूँ, जो ऐसा उत्तम भविष्यद्वक्ता था, तो हमारा क्या होगा? इसलिए मैं कहता हूँ कि बड़ी अवस्था के लोगों को भी परमेश्वर की बुद्धि की इस पाठशाला में बहुत उन्नति करनी चाहिए: तौभी यह कोई व्यर्थ बात नहीं जिसके लिए दाऊद यहाँ विशेष रूप से जवानों को उपदेश देता है।
और ऐसा क्यों? क्योंकि जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, यह अवस्था ऐसी विचारहीन होती है कि उससे अधिक हो नहीं सकती, और शैतान तथा शरीर की परीक्षाओं के बहुत वश में रहती है। और दूसरी ओर, इसके अतिरिक्त, जवानों में न विवेक होता है न बुद्धि, इस हद तक कि वे गर्मी से ऐसे भड़के रहते हैं कि उनकी उबलती उमंगें फूट निकलती हैं: तौभी कुछ विनम्रता रखने, और जो चेतावनियाँ उन्हें दी जाएँ उन्हें भले मन से ग्रहण करने के स्थान पर, वे और भी ऊँचे और हठीले बन जाएँगे, जबकि डाँटे या फटकारे जाने पर उन्हें अधिक दुखी होने का कारण मिलना चाहिए था।
और यह कि यह सच है, हम आज देखते हैं कि सब कुछ कैसा अव्यवस्थित है। यह निश्चित है कि जवानी में जो सच्चा गुण होना चाहिए वह विनम्रता है: और छोटी अवस्था के लोगों को जानना चाहिए कि जब वे बड़ों के समान बुद्धि और विवेक से सम्पन्न नहीं हैं, तो उन्हें उनकी सुननी चाहिए, और अपनी इच्छा और अपनी बुद्धि के हवाले नहीं होना चाहिए। जवानों में यही सबसे प्रमुख बुद्धि होनी चाहिए। परन्तु क्या कहें? वे आज सब लज्जा से परे हैं। इससे हम देख सकते हैं कि संसार मानो सर्वथा निराश दशा में है, और हम सब प्रकार की बुराई और अधर्म की पूर्णता तक पहुँच गए हैं। क्योंकि हम इन पशु-समान और निर्लज्ज लड़कों और लड़कियों को देखेंगे, जो मुश्किल से अपनी नाक पोंछ सकते हैं, जैसा हम कहते हैं, वरन् जिन्हें अभी दस वर्ष और छड़ी के नीचे रहना चाहिए, वे चिड़चिड़े अभागे जब कभी उनसे कुछ कहा जाए, तो जो कुछ कहा जाता है उसे कुछ नहीं गिनते, परन्तु मुँह बनाते और चिढ़ाते हैं, बन्दरों और वनमानुषों की नकल करते हुए, जैसा हम प्रतिदिन देख सकते हैं।
और जब हम इस जाति में ऐसा चरम अभिमान देखते हैं, तो इसके सिवा और क्या कहें कि शैतान उनमें समा गया है? और कि वे अपने आप को वैसा ही दिखाएँगे जैसे वे वास्तव में हैं, अर्थात् बिना किसी सुधार के? इसलिए इस बात पर और भी भली-भाँति विचार करना चाहिए, जब वह कहता है: "जवान अपनी चाल को किस उपाय से शुद्ध रखे? तेरे वचन के अनुसार उस पर ध्यान देने से।" यह सच है कि बहुत से लोग जिन्हें यहाँ यह बात सुनने की आवश्यकता है, अपने कान ऐसी किसी बात से भरने की चिन्ता नहीं करते; उन्हें इतना ज्ञान तो है कि अपने आप को कलीसिया से दूर रखें: क्योंकि जब वे मदिरालय में, जुए और नाच-रंग में हो सकते हैं, तब उन्हें वही मिल जाता है जो वे चाहते हैं।
परन्तु क्या? यह निश्चित है कि यह शिक्षा उन्हें दोषी ठहराए बिना न छोड़ेगी, जब परमेश्वर उन्हें पुकारता है, जैसा वह सुलैमान के द्वारा गवाही देता है, जहाँ वह बुद्धि को यह कहते हुए प्रस्तुत करता है, "मैं ने सड़कों में पुकारा और अपनी आवाज़ उठाई, मैं ने क्या बड़े क्या छोटे सब को बुलाया, कि लोग मेरी सुनें, और किसी ने मुझे ग्रहण करने, या मुझे ठहरने का स्थान देने की भी कृपा न की।" जब परमेश्वर हम पर प्रकट करता है कि यदि हम उसके वचन को मानें तो हमारा जीवन सुव्यवस्थित होगा, तो निश्चय जितने इस शिक्षा और चेतावनी से भागते हैं, वे अन्तिम दिन लेखा देंगे, क्योंकि परमेश्वर ने उन्हें बुलाया है। और इसलिए भी कि वे न केवल बहरे रहे, वरन् उन्होंने यह बुराई भी जोड़ी कि उन चेतावनियों से भागे जो परमेश्वर के वचन ने उन्हें दी थीं, कि उन्हें उद्धार के उस मार्ग पर फिर लौटा लाए जिससे वे भटक गए थे।
विशेष रूप से कहा गया है, हाँ, तेरे वचन के अनुसार उस पर ध्यान देने से। दाऊद का अभिप्राय यहाँ हमें यह जताना है कि हम अपने आप को यह विश्वास दिला सकते हैं कि हम में बहुत बुद्धि और विवेक है। परन्तु जब तक हम परमेश्वर से चलाए और शासित न हों, उसके अनुसार जो पहले कहा जा चुका, तब तक इससे हमें कुछ भी लाभ न होगा। अब आगे:
मैं ने तुझे पूरे मन से ढूँढ़ा है: मुझे अपनी आज्ञाओं से भटकने न दे। दाऊद यहाँ एक उल्लेखनीय अंगीकार करता है, जो सब मनुष्यों में सामान्य नहीं है, कि उसने परमेश्वर को अपने पूरे मन से ढूँढ़ा है। क्योंकि यद्यपि हम में परमेश्वर के पास जाने की इच्छा है, तौभी वह इतनी निर्बल है कि शोक करने योग्य है, क्योंकि हम इतनी व्यर्थताओं से खींचे जाते हैं, इसलिए कि संसार का हम पर ऐसा प्रभुत्व है, और फिर भी जब हम ने किसी भली भक्ति का भली-भाँति अनुभव कर लिया हो, तब हमें उससे पीछे नहीं हटना चाहिए। हम में बहुत थोड़े हैं जो भविष्यद्वक्ता दाऊद के समान कह सकें कि हम ने परमेश्वर को अपने पूरे मन से ढूँढ़ा है: अर्थात् ऐसी खराई और शुद्धता से कि हम उस लक्ष्य से, जो हमारे उद्धार की सबसे प्रमुख बात है, फिरे नहीं। यह सच है कि दाऊद में अब तक ऐसी सिद्धता न थी, कि वह शरीर की चुभनों के विरुद्ध लड़ाई में ढीला न पड़ा हो और पीछे न हटा हो।
सन्त पौलुस भी मान लेता है कि वह परमेश्वर के पास मानो लँगड़ाते हुए गया, कि जो भलाई वह करना चाहता और चाहता था वह उसने नहीं की, वरन् वह अपने स्वाभाविक दोषों से घिरा हुआ था, कि वह बुराई करे जिसे वह दोषी ठहराता था। दाऊद भी ऐसी परीक्षाओं से रहित न था: परन्तु जो भी हो, यह अति निश्चित है कि जिस मुख्य बात में उसने अपने आप को लगाया वह परमेश्वर की सेवा करना था। अब जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, हम सब इस उदाहरण से दूर हैं। क्योंकि हम में से जितने आज सबसे अच्छी दशा में हैं, वे भी अनेक दोषों, इस संसार की व्यर्थ चिन्ताओं, और शरीर की लालसाओं और अभिलाषाओं से ऐसे रोके और अटकाए जा सकते हैं, कि यदि हम प्रतिदिन अपना पाँव उठाकर एक डग आगे बढ़ें तो वही बहुत है, और तौभी ऐसा प्रायः हो सकता है कि हम फिर उसी स्थान पर लौट आएँ जहाँ से चले थे। तौभी दाऊद ने, यह प्रतिज्ञा करके कि वह परमेश्वर को अपने पूरे मन से ढूँढ़ता है, परमेश्वर से बिनती की कि वह उसे अपनी आज्ञाओं से भटकने न दे। इससे हम देखें कि हमें परमेश्वर को पुकारने की कितनी बड़ी आवश्यकता है, ताकि वह हमें अपने सामर्थी हाथ से थामे रखे। हाँ, और यद्यपि वह पहले ही सामर्थ्य के साथ अपना सहायक हाथ बढ़ा चुका है, और हम यह भी जानते हैं कि उसने हमें बड़े और अनेक अनुग्रह प्रदान किए हैं: तौभी यह सब कुछ नहीं है: परन्तु हमारे स्वभाव में इतने दोष और अपूर्णताएँ हैं, और हम ऐसे दुर्बल और निर्बल हैं, कि हमें प्रतिदिन उससे प्रार्थना करने की बहुत बड़ी आवश्यकता है, हाँ, और अधिकाधिक, कि वह हमें अपनी आज्ञाओं से भटकने न दे। क्योंकि यद्यपि दाऊद ने प्रतिज्ञा की कि उसने परमेश्वर को अपने सारे हृदय से ढूँढ़ा, तौभी वह आगे जोड़ता है, कि हे प्रभु, मुझे अपनी आज्ञाओं से भटकने न दे: तो फिर हम क्या करें? हम भी सावधानी से चलना सीखें: क्योंकि जब वही परमेश्वर है जो हमें यह भली इच्छा देता है कि हम चाहें, और वही हमें पूरा करने की सामर्थ्य भी देता है, और यह सब उसके केवल अनुग्रह और कृपा से: तो (सन्त पौलुस कहता है) हमें भय के साथ चलना और भली चौकसी रखना चाहिए, कि शैतान हमें बेसुध न पाए, और हमारे भीतर प्रवेश न करे।
और देखो, इसी कारण हम ने कुछ मनुष्यों को देखा है जिन्होंने कुछ समय तक पवित्रता का बड़ा दिखावा किया, और मनुष्यों की अपेक्षा स्वर्गदूतों के अधिक समान प्रतीत हुए, जो अन्त में अति उच्छृंखल हो गए: और अपनी सीमाओं से इतना बाहर निकल गए कि परमेश्वर ने भी उन्हें निराश जनों के समान त्याग दिया। और यह कहाँ से आता है? निश्चय उनकी अपनी निश्चिन्तता और लापरवाही से, क्योंकि वे अपने आप को बहुत सिद्ध समझते थे। परन्तु पौलुस इसके सर्वथा विपरीत है, क्योंकि वह यों कहता है, मैं अब तक उस पूर्ण सिद्धता तक नहीं पहुँचा हूँ, तौभी मैं ने वह किया जो मुझ से बन पड़ा। जब वह कहता है, मैं ने वह किया जो मुझ से बन पड़ा, तो वह प्रकट करता है कि उस में वह दीनता थी जिसकी चर्चा उसने ऊपर उस स्थान में की जिसका मैं पहले उल्लेख कर चुका: और इस दीनता का अर्थ यह है कि हम परमेश्वर को वैसे ही पुकारें जैसे दाऊद ने पुकारा, जैसा वह हमें यहाँ इस स्थान में दिखाता है।
आगे: मैं ने अपनी प्रतिज्ञा को अपने हृदय में छिपा रखा है: कि मैं तेरे विरुद्ध पाप न करूँ।
जब दाऊद इस प्रकार कहता है, "मैं ने तेरे वचन या प्रतिज्ञा को अपने हृदय में छिपा रखा है," तो वह भली-भाँति प्रकट करता है कि यदि हमारे पास केवल भटकता हुआ ज्ञान हो, तो वह हमें थामे न रखेगा, वरन् शैतान तुरन्त हम पर विजय पाकर हमें परीक्षाओं से दबा देगा, और अन्त में औंधे मुँह गिरा देगा। तो फिर हमें क्या करना चाहिए? यह पर्याप्त नहीं कि हम कलीसिया में गए, और जो कुछ वहाँ हम से कहा गया वह सुन लिया, और हम में से हर एक ने अपने मन में कोई न कोई बात बुदबुदा ली, परन्तु परमेश्वर का वचन हम में बस जाना और हमारे हृदय में छिपा रहना चाहिए, अर्थात् वह वहाँ निवास करे और निरन्तर बना रहे: और उसे ऐसी लगन से ग्रहण किया गया हो कि वह मानो हम में छाप दिया गया हो। यदि ऐसा न हो, तो पाप हम में राज्य करेगा, क्योंकि स्वभाव से उसका निवास हमारे साथ है: क्योंकि हमारी सब इन्द्रियाँ दुष्ट और भ्रष्ट हैं, हमारी सब इच्छाएँ और अभिलाषाएँ परमेश्वर की बैरी हैं, जब तक परमेश्वर का वचन हमारे हृदयों में भली-भाँति छिपा न हो। फिर, हमें यह समझना चाहिए कि दाऊद यहाँ अपनी ही शक्ति और सामर्थ्य की डींग नहीं मारता, मानो उस पर मुग्ध हो: परन्तु परमेश्वर का आत्मा, जो उसके मुँह से बोलता है, हमें एक दर्पण देना चाहता है जिस में हमें दृढ़ किया जाए, अर्थात् यह कि हमारे कान केवल उद्धार की शिक्षा से न पीटे जाएँ, और हम उसे केवल अपने मस्तिष्क में न ग्रहण करें: परन्तु वह हमारे हृदय में छिपाई जाए, अर्थात् हम उसे मानो किसी भण्डार-घर में सँजोकर रखें। क्योंकि इस वचन "छिपाना" का तात्पर्य यह है कि दाऊद अपने आप को बड़ा दिखाने और मनुष्यों के सामने शानदार प्रदर्शन करने का इच्छुक न था: परन्तु उसके भीतर जो गुप्त अभिलाषा थी, उसका साक्षी परमेश्वर था। उसने कभी संसारी वस्तुओं की ओर नहीं देखा, परन्तु इतना बड़ा खज़ाना पाकर सन्तुष्ट रहकर, वह भली-भाँति जानता था कि परमेश्वर जिसने उसे दिया है, उसकी ऐसी निश्चित और सुरक्षित रखवाली करेगा कि वह शैतान के लिए खुला न छोड़ा जाएगा कि वह उसे उठा ले जाए। सन्त पौलुस भी हमें बताता है कि जिस सन्दूक में यह खज़ाना छिपाया जाना चाहिए, वह भला विवेक है। क्योंकि कहा गया है कि बहुतों ने इस भले विवेक से रहित होकर अपना विश्वास भी खो दिया, और उस से लूट लिए गए। मानो कोई मनुष्य अपनी सम्पत्ति को छोड़कर जोखिम में डाल दे, और कोई द्वार बन्द न करे, तो चोरों के लिए भीतर आकर उसे सब कुछ लूट और बिगाड़ लेना सरल है: वैसे ही, यदि हम उस खज़ाने को, जो परमेश्वर ने अपने वचन में हमें दिया है, शैतान के हाथ अनायास छोड़ दें, जब तक वह इस भले विवेक में और हमारे हृदय की गहराई में, जैसा दाऊद यहाँ कहता है, छिपा न हो, तो हम उस से लूट लिए जाएँगे। वह तुरन्त आगे जोड़ता है:
हे प्रभु, तू धन्य है: मुझे अपनी विधियाँ सिखा। यह कहकर कि "मैं ने तुझे अपने पूरे मन से ढूँढ़ा है," वह आगे जोड़ता है, "हे प्रभु, तू धन्य है: मुझे अपनी विधियाँ सिखा।" दाऊद इस पद में दिखाता है कि वह निवेदन जो उसने यहाँ पहले किया, किसी पुण्य या योग्यता पर, जो उसने अपने में होने का दावा किया हो, आधारित या स्थापित नहीं है। वास्तव में पहली दृष्टि में यह कहा जा सकता था कि दाऊद का अर्थ यह है कि परमेश्वर उसे न त्यागे क्योंकि उसने उसे ढूँढ़ा है, और इस पर यह निष्कर्ष निकाला जाए कि मनुष्य को पहले आगे बढ़ना आरम्भ करना चाहिए, परमेश्वर के अनुग्रह से पहले चलना चाहिए, और तब परमेश्वर उसके पश्चात् उसकी सहायता करेगा। देखो, मनुष्य क्या-क्या कल्पना कर सकते हैं, परन्तु यह दाऊद का अर्थ और उद्देश्य नहीं है। और यह प्रमाणित करने के लिए, यह अति निश्चित है कि वह इसका श्रेय अपनी शक्ति और सामर्थ्य को नहीं देता कि उसने परमेश्वर को अपने पूरे मन से ढूँढ़ा, क्योंकि जब हम में कोई ऐसी लगन होती है, तब पहले परमेश्वर के आत्मा से हमारा स्पर्श होना आवश्यक है। और ऐसा क्यों? क्योंकि स्वभाव से हम सब परमेश्वर से भटक गए हैं, और हमारा सारा बल, सामर्थ्य और प्रयत्न हमें उस से दूर करने ही में लगा रहता है। और इसलिए हमें उसके पास उस रीति से आना चाहिए जैसी पवित्र शास्त्र के अनेक स्थानों में हमें बताई गई है। तब दाऊद पर पहले ही परमेश्वर का अनुग्रह पहुँच चुका था, और वह परमेश्वर से केवल यह माँगता है कि जो उसने उस में आरम्भ किया है उसे बनाए रखे, क्योंकि वह भली-भाँति जानता था कि उसे इसकी बहुत आवश्यकता है। मानो वह कहता, "हे प्रभु, मैं भली-भाँति जानता हूँ कि जब मैं ने तुझे ढूँढ़ा, तब तू अपने पवित्र आत्मा के द्वारा पहले ही सामर्थ्य के साथ अपना सहायक हाथ बढ़ा चुका था: सचमुच यदि मैं तेरे पवित्र हाथ से न चलाया जाता, तो मैं ने कभी ऐसा न किया होता, और यह भी अभी पर्याप्त नहीं, जब तक तू इसे मुझ में बनाए न रखे: और हे प्रभु, जब तू ऐसा करेगा, तो इसके लिए सारी स्तुति और महिमा तेरी ही होगी, क्योंकि तू ने यह अपनी केवल कृपा और अनुग्रह से किया है।"
इससे हम देख सकते हैं कि दाऊद यहाँ अपने ही गुणों और पुण्य पर फूलकर अपनी बड़ाई करना नहीं चाहता: परन्तु इसलिए कि परमेश्वर इस योग्य है कि उसे धन्य कहा जाए और ऊँचा उठाया जाए, ताकि हम उसे सारा आदर और महिमा दें। अब देखो कि वह क्यों निश्चित रहता है कि वह उसे सिखाएगा, और वह उस शिक्षा में, जो उसने पहले ही पाई है, अधिकाधिक दृढ़ किया जाएगा। क्योंकि जब वह कहता है, "हे प्रभु, मुझे अपनी विधियाँ सिखा," तो इसलिए नहीं कि वह सर्वथा अनगढ़ और अज्ञानी था, कि अब नौसिखिया बन सके, जो भविष्यद्वक्ता था, दूसरों को सिखाने का दायित्व उसके पास था, और राजा भी था। तब दाऊद ने अनपढ़ मनुष्य की नाईं नहीं कहा: परन्तु वह भली-भाँति जानता था कि जब तक वह और अधिक उन्नति न करे, यह सब पर्याप्त नहीं। अब यदि दाऊद ने इस रीति से कहा, तो मैं तुम से बिनती करता हूँ, हमें क्या करना चाहिए? इसलिए जब कभी हम परमेश्वर के हाथ से यह अनुग्रह पाना चाहें कि उसकी विधियों में सिखाए जाएँ, तो हम उसके सामने यह तर्क रखें, और इसी पर अपने आप को आधारित करें, कि वह धन्य और स्तुत्य है। और सब से बढ़कर हम उसकी इस आवश्यकता को समझें जो हमें है: अर्थात् यह कि यद्यपि हमें पवित्र शास्त्र में पहले ही शिक्षा मिल चुकी है, तौभी हमें अन्त तक शिष्य बने रहना और प्रतिदिन परमेश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए कि वह हमारे विश्वास को बढ़ाए: मैं विशेष करके उनकी बात कहता हूँ जो वचन का प्रचार करने के लिए ठहराए गए हैं। यह सच है कि किसी मनुष्य के लिए पवित्र शास्त्र में भली-भाँति अध्ययन किए बिना पुल्पिट में आना और प्रचारक के पद को हड़प लेना बड़ी अद्भुत ढिठाई होगी। परन्तु बात यह है कि हम प्रतिदिन पुल्पिट पर इस शर्त के साथ चढ़ते हैं कि जब हम दूसरों को सिखाएँ, तब स्वयं भी सीखें। और ऐसा होने से मैं केवल इसलिए नहीं बोलता कि सुना जाऊँ: परन्तु अपनी ओर से मुझे भी परमेश्वर का शिष्य होना चाहिए, और जो वचन मेरे मुँह से निकलता है वह मुझे भी लाभ पहुँचाए, नहीं तो मैं शापित हूँ। इसलिए हम बीच में यह भी ध्यान में रखें कि जो पवित्र शास्त्र में सबसे अधिक सिद्ध और निपुण हैं, वे घमण्डी मूर्ख हैं, यदि वे यह न मानें कि उन्हें अपने जीवन के सारे दिन परमेश्वर को अपना शिक्षक बनाने, और दाऊद के उदाहरण के अनुसार अधिकाधिक दृढ़ किए जाने की आवश्यकता है।
सचमुच ये बातें और विस्तार से कहने योग्य हैं, परन्तु मैं एक बात का ध्यान रखता हूँ, कि इस भजन को भाग-भाग करके सँभालने से वह हमारी स्मृति में अधिक अच्छी रीति से अंकित हो सकता है। क्योंकि जैसा मैं ने पहले उपदेश में, जो बीते रविवार को दिया था, कहा था कि यह अकारण नहीं कि परमेश्वर का आत्मा चाहता है कि यह भजन वर्णमाला के अक्षरों के क्रम में रचा जाए, क्योंकि सब को इसे वैसी ही पूर्णता से सीखना चाहिए जैसे अपना पेटर नॉस्टर, जैसा हम सामान्यतः कहते हैं। तब जब हमारा प्रभु परमेश्वर चाहता है कि यह भजन हमें पूरा-पूरा याद हो, और हमारे अपने उपयोग के लिए हो, तो यह भी भला और आवश्यक है कि इसका व्याख्यान शुद्ध और सीधा-सादा हो, और पाठ की सादगी का ऐसा अनुसरण करे, कि जो कुछ उसमें है उसे हम मानो शब्द-शब्द करके समझ सकें। अब यह रह जाता है कि हम में से हर एक समझ ले कि क्या सँभाला गया है, बिना किसी और लम्बी पुनरावृत्ति की बाट जोहे। तौभी मैं अपने आप को संक्षिप्त रखने का ऐसा यत्न करूँगा कि (यदि परमेश्वर चाहे) जो शब्द मैं कहूँगा वे बहुत अस्पष्ट न हों, विशेषकर उनके लिए जो ध्यान देकर सुनते हैं।
आगे: "तेरे मुँह से निकले हुए सब नियमों का मैं ने अपने होठों से वर्णन किया है।"
दाऊद यहाँ उस मेल को दिखाता है जो परमेश्वर और हमारे बीच होना चाहिए: अर्थात् यह कि परमेश्वर ने हमें सिखाया है, और जब हम ने वह सुन लिया जो हम से कहा गया, तब हर एक कहे आमीन, और उसके और हमारे बीच बिना खटपट या विरोध के एक मधुर सामंजस्य और मेल हो।
देखो, इस पद का सार यही है। अब, इसी बीच हमें यह ध्यान देना है कि दाऊद प्रकट करता है कि वह अकेले परमेश्वर का अनुसरण करने और उससे लिपटे रहने ही से सन्तुष्ट नहीं होता: परन्तु वह परिश्रम करता और चाहता है कि जहाँ तक उससे हो सके, अपने पड़ोसियों को भी जगाए, और ऐसा करे कि सारे संसार में परमेश्वर की सेवा सर्वसम्मति से हो। इसलिए जिसमें परमेश्वर का आदर करने की सच्ची धुन होगी, वह केवल अपने ही विषय में नहीं सोचेगा, परन्तु चारों ओर दृष्टि रखेगा, और जितने उपायों से हो सके, उनसे दुष्ट प्रवृत्ति के लोगों को सुधारने, ठण्डे और लापरवाह लोगों को जगाने, निर्बल और दुर्बल लोगों को दृढ़ करने, और जो पहले ही भली उन्नति में हैं उन्हें सँभालने और अधिक आगे बढ़ाने का यत्न करेगा। देखो, इसी ओर सब विश्वासियों की दृष्टि रहती है। क्योंकि हमारा प्रभु परमेश्वर हमें इस शर्त पर सिखाता है कि हम में से हर एक केवल अपने ही विषय में न सोचे, वरन् एक दूसरे की परस्पर चिन्ता भी रखे, और जब कभी हम में यह धुन हो, तो हम समझें कि परमेश्वर ने सारे संसार को इस शर्त पर सृजा है कि हम सब उसके आज्ञाकारी हों। परन्तु हमें इस क्रम को भली-भाँति तौलना चाहिए जो यहाँ रखा गया है: क्योंकि दाऊद इस वाक्य से आरम्भ नहीं करता, कि "उसने अपने होठों से प्रभु के मुँह के सब नियमों को सुनाया।" क्योंकि वह पहले कह चुका है कि उसने उन्हें अपने हृदय में छिपा रखा है। जिस बात को दाऊद ने कहा कि हृदय में छिपी है, उसी को वह तुरन्त पीछे अपने मुँह से प्रकट करता है, जिस में वह दिखाता है कि हम में से हर एक को अपने आप से आरम्भ करना चाहिए। जब हम अपने पड़ोसियों को सिखाने और शिक्षा देने का विचार करें, तो उन से यह न कहें कि "तुम आगे चलो," परन्तु यह कि "मेरे पीछे आओ, या मेरे साथ-साथ आओ," और सब के सही मार्ग पर चलने की चिन्ता करते हुए, हम सब एक साथ अपने परमेश्वर की ओर चलने का परिश्रम करें, कि सच्चे विश्वास में उससे जुड़ जाएँ। और मैं यह इसलिए कहता हूँ कि हम बहुतों को देखेंगे जो इस विषय में बहुत अच्छी तरह बकवाद और बड़बड़ कर सकते हैं, और संसार के सबसे बड़े विद्वान दिखना चाहेंगे। परन्तु इस सब का क्या? इसी बीच हम उनके जीवन और चाल-चलन को देखें, तो उन में सड़ाँध और दुर्गन्ध के सिवा कुछ न पाएँगे, और जो कुछ वे करते और सोचते हैं उन सब में परमेश्वर का उपहास करने के सिवा और कुछ नहीं।
इसलिए हमें उस क्रम का अनुसरण करना चाहिए जो दाऊद यहाँ रखता है: अर्थात् यह कि परमेश्वर का वचन हमारे हृदय की गहराई में खज़ाने के रूप में छिपा रहे: और तब जब हम में यह लगन होगी, तो हम औरों को भी इसकी ओर खींचने का यत्न करें, और सब एक चित्त होकर अपने प्रभु परमेश्वर का आदर करने को साथ चलें: और जिसे उसके पड़ोसियों में से किसी की अपेक्षा अधिक शिक्षा मिली है, वह यह स्वीकार करे कि वह परमेश्वर का उतना ही अधिक ऋणी और बाध्य है कि वह वही करे जो दाऊद के द्वारा हमें यहाँ दिखाया गया है। क्योंकि यद्यपि हम सब उसके समान भविष्यद्वक्ता नहीं हैं, तौभी यह बात हम सब से सामान्य रूप से कही गई थी, "एक दूसरे को समझाओ।" सन्त पौलुस इसे सब विश्वासियों और सब मसीहियों से कहता है। और हम यह भी जानें कि यह हम से सम्बन्ध रखता है: और विशेष करके जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, जो सब से आगे बढ़े हुए हैं वे उस अनुग्रह को, जो उन्हें दिया गया, कलीसिया की सामूहिक उन्नति और अपने पड़ोसियों की शिक्षा के लिए प्रस्तुत करें। आगे:
"मैं तेरी चितौनियों के मार्ग में ऐसा आनन्दित रहा हूँ, जैसा सब प्रकार के धन में।"
यहाँ दाऊद प्रकट करता है कि अपने पार्थिव मोहों से, जिनमें हम बहुत अधिक उलझे हुए हैं, अपने आप को छुड़ाकर वह पूरे मन से परमेश्वर के पास आने का परिश्रम करता है। क्योंकि यह हमारे लिए असम्भव है कि हम उस मिठास का स्वाद लें जो परमेश्वर के वचन में है, हमारे उद्धार की इस शिक्षा में आनन्द पाएँ, और पूरी रीति से इसमें लगें, जब तक कि हम अपने से अपनी सब दुष्ट अभिलाषाओं और वासनाओं को, जो हमारी मरनहार देहों में बहुत राज्य करती हैं, काट न डालें। यह वैसा ही है जैसे कोई मनुष्य ऐसी भूमि से अन्न उपजाना चाहे जो सर्वथा काँटों और जंगली घास से भरी हो। या ऐसा कौन है जो पत्थरों और चट्टानों पर, जिन में नमी नहीं, दाखलता उगाना चाहे? क्योंकि मनुष्य के स्वभाव की दशा क्या है? निश्चय वह जितनी हो सकती है उतनी बंजर भूमि है। हमारी सब उमंगें क्या हैं, सिवाय झाड़ियों, काँटों और जंगली घास के, जो परमेश्वर के सारे अच्छे बीज को दबाकर निकम्मा कर देती हैं? तब यह अकारण नहीं कि दाऊद यहाँ धन को परमेश्वर के वचन के साथ मिलाता है, और इस लोभ को, जिससे हम चलाए और भड़काए जाते हैं, उस इच्छा के सामने रखता है जो उसे परमेश्वर के पीछे चलने और उसके वचन पर चलने की थी। मानो वह कहता, "हाय प्रभु, यह सच है कि मैं भी औरों के समान इस संसार की व्यर्थताओं में पड़ा हूँ: तौभी मैं ने मुख्यतः तेरे वचन की अभिलाषा की है, और अपने शरीर की सब बुरी उमंगों को वश में करने के लिए अपने आप से भी संघर्ष किया है।" यहाँ हम देखते हैं कि इस स्थान से हमें कौन सी शिक्षा अपने लिए बटोरनी है: अर्थात् यह कि यदि हम परमेश्वर के अच्छे शिष्य बनना, और उसकी चितौनियों के मार्ग में आनन्दित रहना चाहते हैं, तो हमें पहले अपने शरीर की लालसाओं को वश में करना चाहिए, और संसारी वस्तुओं में पड़ना न सीखना चाहिए, और न उस वस्तु में लाड़-प्यार से पलना जिसे हम अपने सुख की चरम सीमा समझते हैं: परन्तु हम धन को, और अन्य सब वस्तुओं को, जो हमें हमारे परमेश्वर और हमारे उद्धारकर्ता यीशु मसीह से दूर खींच सकती हैं, तुच्छ जानना सीखें, और उसे मल और कूड़े से अधिक कुछ न गिनें, जैसा सन्त पौलुस कहता है। और तौभी यह अति निश्चित है कि दाऊद ने उस धन को, जो उसके पास था, तुच्छ नहीं जाना। क्योंकि वह, जैसा हम जानते हैं, बहुत धनी राजा था, तौभी उसने अपना सोना-चाँदी समुद्र की गहराई में नहीं फेंका, परन्तु उस बहुतायत और भण्डार को जो परमेश्वर ने उसे दिया था काम में लिया, हाँ, हम देखते हैं कि उसका घर कैसा उत्तम और सुन्दर था, जैसा पवित्र इतिहास हमें बताता है। परन्तु तौभी उसने उस नियम का पालन किया जो पवित्र शास्त्र हमारे आगे रखता है: अर्थात् यह कि उसने इस संसार की वस्तुओं को ऐसे बरता मानो उसके पास कभी थी ही नहीं। इसलिए हमें इस संसार में से होकर गुज़रना चाहिए, इसी में अपने आप को पूरी रीति से रोके बिना, जैसा सन्त पौलुस उपदेश देता है: कि यदि परमेश्वर हमें धन की बहुतायत दे, तो हम उसे बरतना जानें, बिना अपने हृदयों को उसमें कैदी बनाए: और तौभी आत्मा में दीन रहें: अर्थात् जब-जब परमेश्वर चाहे कि हम उन से छूट जाएँ, तब-तब सब कुछ त्यागने को तैयार रहें, और सदा एक पाँव उठाए रखें कि जब कभी उसकी इच्छा और प्रसन्नता हो कि हमें इस संसार से उठा ले, तब उसके पास चले जाएँ। परन्तु यह अकारण नहीं कि दाऊद ने यहाँ धन की बहुतायत की बात कही है। क्योंकि हम देखते हैं कि यह मनुष्यों को लोभी बनाता है, जो सब बुराई की जड़ है, जैसा सन्त पौलुस कहता है। इसलिए जब हम इस संसार की वस्तुओं में इतने लगे हुए हैं, और यदि हमारे पास पर्याप्त न हो तो अपने आप को शापित, और जिनके पास बहुत है उन्हें धन्य समझते हैं: तो हम उस पाठ को भली-भाँति स्मरण रखें जो यहाँ हमें सिखाया गया है: अर्थात् यह कि हमारी सारी अभिलाषा परमेश्वर की चितौनियों के मार्ग में हो, जैसे सब प्रकार के धन में: अर्थात् हमारा सारा आनन्द और सन्तोष पूरी रीति से उन्हीं में हो। अब अन्त में दाऊद आगे कहता है,
"मैं तेरी आज्ञाओं पर ध्यान करूँगा और तेरे मार्गों पर विचार करूँगा। मेरा आनन्द तेरी विधियों में होगा: और मैं तेरे वचनों को न भूलूँगा।"
यह उपसंहार है, उस बात की पुष्टि के लिए जिसकी चर्चा हम पहले कर चुके हैं। क्योंकि दाऊद यहाँ किसी नई बात की चर्चा नहीं करता, परन्तु जैसा उसने आरम्भ किया वैसा ही प्रतिज्ञा करता है: कि उसका आनन्द सदा परमेश्वर की आज्ञाओं में, और पवित्र शास्त्र में निहित शिक्षा में रहेगा, और कि वह अपना सारा अध्ययन उसी में लगाएगा, और उसे इसी प्रकार निभाएगा, और परमेश्वर की आज्ञाकारिता में उन्नति करने की जो अभिलाषाएँ उसे हैं उन्हें कभी न भूलेगा। यदि दाऊद ने अब ऐसा कहा है, तो हम समझें कि हमारे लिए यह पर्याप्त नहीं कि हम परमेश्वर की सेवा करने की भली उमंग रखें, और कि उसे पूरा करने के लिए हम पहले ही यथेष्ट परिश्रम कर चुके हैं: परन्तु हमें और भी उकसाया जाना चाहिए, कि हम सदा आगे बढ़ते रहें। क्योंकि विश्वासी भी कभी ऐसी प्रबल और उत्सुक अभिलाषा से नहीं दौड़ते, कि निरन्तर एक पाँव अपने पीछे घसीटते न रहें, और परमेश्वर के पास केवल लँगड़ाते हुए ही नहीं आते। तब हमारे लिए क्या करना शेष है? निश्चय हमें दाऊद के साथ प्रतिज्ञा करनी चाहिए कि जो कुछ परमेश्वर ने एक बार हम पर प्रकट किया है उसे कभी न भूलें, और अपने आप को उकसाने से भी कभी न रुकें, ताकि हम में उसके पास जाने के लिए अधिक प्रबलता हो, अधिक उत्सुक अभिलाषा और अधिक साहस के साथ। कि अन्ततः हम उस सिद्धता तक पहुँचें जिसके लिए परमेश्वर हमें बुलाता और लुभाता है: अर्थात् यह कि हमारे शरीर और स्वभाव के आवरण से निकाले जाकर वह हमें अपनी धार्मिकता से पूरी रीति से जोड़ ले, ताकि इसके द्वारा उसकी महिमा हम में चमके।
और इस पवित्र शिक्षा के अनुसार, हम अपने भले परमेश्वर के सम्मुख दण्डवत् करें, अपने असंख्य पापों को मानते हुए, जिन से हम निरन्तर उसके भारी क्रोध और रोष को अपने ऊपर भड़काते हैं। उससे बिनती करें कि वह हमें हमारे पापों और अधर्म का बोध पहले से कहीं अधिक कराने की कृपा करे, ताकि हम उन उपायों को ढूँढ़ें जो उसने हमारे लिए ठहराए हैं, अर्थात् अपने आप को उसके पवित्र वचन के पढ़ने में, और उसके दैनिक प्रचार में लगाना जो उसने हमें प्रदान किया है। और इसके अतिरिक्त यह भी न भूलें कि हमें उकसाए कि हम उसे पुकारें, ताकि वह अपने पवित्र आत्मा के द्वारा हमारे हृदयों ही में अपना सहायक हाथ बढ़ाए, और उस शिक्षा को जो हम उसके प्रचारकों के मुँह से सुनते हैं हमारे लिए निष्फल न होने दे, वरन् उसमें पूरा सामर्थ्य और बल हो: ताकि हम दिन-प्रतिदिन उसमें दृढ़ होते जाएँ: और अधिकाधिक संसार को, और उस सब को जो हमें अपने प्रभु और स्वामी यीशु मसीह के मेल और संयोग से, जो हमारा सिर है, दूर खींच सकता है, त्यागना सीखें। और वह यह कृपा और अनुग्रह केवल हम ही पर नहीं, वरन् पृथ्वी के सब लोगों और जातियों पर भी दिखाए, इत्यादि।
