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भजन संहिता 119 पर बीसवाँ उपदेश। पद 153-160
रेश।
153 मेरे दुःख पर दृष्टि करके मुझे छुड़ा; क्योंकि मैं तेरी व्यवस्था को भूला नहीं।
154 मेरा मुकद्दमा लड़ और मुझे छुड़ा; अपने वचन के अनुसार मुझे जिला।
155 उद्धार दुष्टों से दूर है, क्योंकि वे तेरी विधियों की सुधि नहीं रखते।
156 हे प्रभु, तेरी दया बड़ी है; अपने नियमों के अनुसार मुझे जिला।
157 मेरे सतानेवाले और मेरे द्रोही बहुत हैं, तौभी मैं तेरी चितौनियों से नहीं हटता।
158 मैं विश्वासघातियों को देखकर शोकित हुआ, क्योंकि वे तेरे वचन को नहीं मानते।
159 हे प्रभु, देख, मैं तेरे आदेशों से कैसी प्रीति रखता हूँ; अपनी करुणा के अनुसार मुझे जिला।
160 तेरा वचन सदा से सत्य है, और तेरे धर्ममय नियमों में से हर एक सर्वदा अटल है।
यदि हमें वह सब मिल सकता जो हम चाहते और अभिलाषा करते हैं, तो निश्चय ही हम अधिक सुख-चैन से रहते और हमें कोई दुःख न होता। मनुष्य स्वभाव से यही चाहता भी है। परन्तु इसी बीच हमें यह समझना है कि जब तक हम इस संसार में हैं, तब तक परमेश्वर हमें नाना प्रकार के क्लेशों में अभ्यस्त करेगा। इसलिए जब तक मसीही लोग यहाँ पृथ्वी पर जीवित रहेंगे, तब तक उनकी दशा और स्थिति यही है कि उन्हें नाना प्रकार के दुःखों से, कभी देह के और कभी आत्मा के दुःखों से, जूझना और अभ्यस्त होना पड़ता है। और इसी कारण हमें अपने आप को शस्त्र-सज्जित करना चाहिए, ताकि हम अपने संघर्षों के बीच परास्त न हों। अब हमारे कवच का प्रधान अंग यह है कि हम परमेश्वर से प्रार्थना करें और उसकी सहायता के लिए उसे पुकारें। और इसे सिद्ध करने के लिए हमें भली-भाँति विचार करना चाहिए कि हमसे बहुत पहले के सब विश्वासियों ने इस विषय में कैसा आचरण किया, ताकि हम उनके उदाहरण के अनुसार अपने आप को ढालें; जैसे इस पाठ में हम देखते हैं कि दाऊद अत्यन्त पीड़ित था। फिर हम यह भी देखते हैं कि अपने सब क्लेशों में उसने अपने आप को कैसे सँभाला; वे क्लेश अत्यन्त प्रचण्ड थे, तौभी उन्होंने उसे परमेश्वर की ओर फिरने से नहीं रोका, और उसी के द्वारा वह बचाया और छुड़ाया गया। तो देखो, हमें किस बात पर मनन करना है, ताकि हम भी वैसा ही करें।
"मेरे दुःख पर दृष्टि करके मुझे छुड़ा; क्योंकि मैं तेरी व्यवस्था को नहीं भूलता।"
जब वह परमेश्वर से बिनती करता है कि वह उसके क्लेशों पर दृष्टि करे, तो यह वही बात है जो हम पहले कह चुके हैं: अर्थात् यद्यपि परमेश्वर उससे प्रेम रखता था, तौभी वह नहीं चाहता था कि वह अनगिनत विपत्तियों, यातनाओं और दुःखों से बचा रहे। इसलिए जब तक हमें यहाँ नीचे पृथ्वी पर चलना है, तब तक हम यह न समझें कि हमें कोई विशेष छूट मिली है, वरन् परमेश्वर हमें अभ्यस्त करेगा, और हमारे धीरज को परखेगा और जाँचेगा, जैसे उसने दाऊद के धीरज को जाँचा, जिससे वह इतना प्रेम रखता था, जैसा पवित्रशास्त्र उसके विषय में साक्षी देता है।
अब यहाँ हमें दो बातें ध्यान में रखनी हैं। पहली यह कि जब दाऊद ने परमेश्वर से बिनती की कि वह उसके क्लेशों पर दृष्टि करे और उसे छुड़ाए, तो वह मान रहा है कि वह चकित और भौंचक्का था, मानो परमेश्वर ने उससे पीठ फेर ली हो। यह सच है कि दाऊद ने उन सब बातों पर विचार नहीं किया जिन पर विचार करना उचित था, और न उसने यह निष्कर्ष निकाला कि परमेश्वर अपनी सन्तान को इस रीति से त्याग देगा; तौभी जहाँ तक स्वाभाविक बुद्धि पहुँच सकती थी, देखो कि वह अपनी दशा के विषय में कैसे निर्णय कर सकता था।
और यहाँ परमेश्वर की सब सन्तानों की भी यही दशा है। क्योंकि एक ओर, जब वे अपनी दशा और स्थिति को देखती हैं, तो उन्हें विवश होकर कहना ही पड़ता है, यह क्या बात है? निश्चय ही यदि परमेश्वर को हम पर कुछ तरस आता, और वह हमें देखता, तो क्या यह सम्भव था कि हमारे साथ कभी ऐसा निर्दयी व्यवहार होता? क्या वह इसके लिए कोई उत्तम उपाय न करेगा? देखो, जब हम पीड़ित और सताए जाते हैं और अपनी वर्तमान दशा को देखते हैं, तब हम अपने मन में ऐसी ही कल्पनाएँ किए बिना रह नहीं सकते; वरन्, जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, हम यह भी अनुभव किए बिना नहीं रह सकते कि मानो हम परमेश्वर से त्यागे हुए हैं। तौभी इस सब के होते हुए हमें पूरा विश्वास और निश्चय रखना चाहिए कि परमेश्वर हमें देखता है; और यद्यपि ऐसा प्रतीत होता है कि उसने हमसे पीठ फेर ली है, तौभी वह हमारी सहायता करना नहीं छोड़ता, और हमारे उद्धार की चिन्ता करता है; वरन् यद्यपि हमें कुछ दिखाई न दे, तौभी अपने मन में इसे निश्चित और निःसन्देह सत्य मानकर थामे रहें। इसलिए जब कभी हमें यह सोचकर व्याकुलता हो कि परमेश्वर को अब हमारी कोई चिन्ता नहीं, वरन् उसने हमें स्पष्ट रूप से त्याग दिया है, तब भी यह बात हमें दाऊद के उदाहरण के अनुसार प्रार्थना करने से न रोके; और न हम ढीले पड़ें, वरन् यही कहें, "हे प्रभु, मुझ पर दृष्टि कर।" दूसरी बात, हमें वह कारण देखना है जो दाऊद यहाँ बताता है: "क्योंकि मैं तेरी व्यवस्था को नहीं भूलता।" इसलिए यदि हम चाहें कि परमेश्वर हमारी सुने, तो हमें उसकी व्यवस्था को मानो पूरी रीति से अपने हृदय में बैठाए रखना चाहिए। और यह कैसे हो? वह ऐसे कि हम उसकी प्रतिज्ञाओं पर विचार और अध्ययन करें, हम उसे प्रेमी और दयालु जानें कि वह अपने सब लोगों की सहायता करता और उनकी सब आवश्यकताओं में उनका साथ देता है; और इसके अतिरिक्त हमारी यह दृढ़ नींव हो कि उसकी प्रतिज्ञाएँ अचूक हैं, और जब उसके लोग उनका सहारा लेंगे तब वह अपनी सन्तान को खाली हाथ नहीं जाने देगा।
तो देखो, हमें परमेश्वर की व्यवस्था पर, अर्थात् उसके वचन पर, कैसे मनन करना चाहिए। क्योंकि इस शब्द "व्यवस्था" के अधीन दाऊद ने निःसन्देह उस सारी शिक्षा का सार समेट लिया था जो परमेश्वर ने अपनी कलीसिया को दी। इसलिए हम में से प्रत्येक को इस अध्ययन में लगा रहना चाहिए, और जब व्यवस्था इस प्रकार हमारे हृदयों में अंकित हो, तब हम निश्चित और निश्चिन्त रह सकते हैं कि परमेश्वर हमें देखता है और हमारे सब क्लेशों में हमारी सहायता करेगा; वरन् चाहे ऐसा प्रतीत हो, और हम अपनी शारीरिक इन्द्रियों के अनुसार यह समझें कि उसने हमसे पीठ फेर ली है, या उसने अपनी आँखें मूँद लीं और सो रहा है, और, जैसा कोई कहे, अब हमारी कुछ सुधि नहीं लेता। अब दूसरे पद में आगे लिखा है,
"मेरा मुकद्दमा लड़ और मुझे छुड़ा; अपने वचन के अनुसार मुझे जिला।"
यहाँ दाऊद बताता है कि उसकी यह भावना क्या है जिसकी चर्चा उसने की है: अर्थात् यह कि दुष्ट उसे अन्याय से सताते थे, जैसा आगे और विस्तार से बताया जाएगा। अब हम जानते हैं कि इस संसार में परमेश्वर की सन्तान जो दुःख उठाती है वे नाना प्रकार के और भिन्न-भिन्न हैं: क्योंकि कभी परमेश्वर उन पर भारी हाथ रखता है, बिना किसी मनुष्य के छुए; और कभी मनुष्य उन्हें अन्यायपूर्ण कामों से सताते हैं, ऐसे कि दुष्ट उन्हें पीड़ा और दुःख देते हैं। तब दाऊद दिखाता है कि जो क्लेश वह सह रहा था वह इस दूसरे प्रकार का था, अर्थात् उसके ऐसे शत्रु थे जो उसे अन्याय से सताते थे। और देखो, वह इसीलिए परमेश्वर से बिनती करता है कि वह उसका मुकद्दमा लड़े और उसे बहाल करे। इससे, जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, हमें चिताया जाता है कि जब हमने शुद्ध विवेक से जीवन बिताया हो और हर एक मनुष्य की भलाई करने का परिश्रम किया हो, ऐसे कि किसी को हम पर उचित रीति से दोष लगाने का कारण न हो, तब भी यदि हम सताए और सतावट में पड़ें, तो इस कारण हमें अत्यधिक लज्जित या विचलित नहीं होना चाहिए: क्योंकि ये सब बड़ी बातें दाऊद पर भी डाली गई थीं। यह तो निश्चित है कि वह ऐसी अद्भुत खराई से चलता था कि हर एक को उससे प्रेम रखने का कारण था। तौभी वह मनुष्यों के बीच क्लेशों से मुक्त न था। और क्यों? उनकी कृतघ्नता के कारण। इसलिए हम समझ लें कि यह दोष, अर्थात् मनुष्यों की कृतघ्नता और अधर्म, इन्हीं दिनों में पहले-पहल नहीं उपजा; वरन् बहुत पहले से चला आता है; इसलिए जहाँ तक हम से हो सके हम मेल-मिलाप का यत्न करें; परन्तु यदि हम किसी का अन्याय करने का यत्न करें, तो संसार कभी हम से बैर रखना और हमारी हानि का उपाय करना न छोड़ेगा, वरन् हमारा नाश करने तक का प्रयास करेगा। परन्तु जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, यह हमें अनोखा न लगे, क्योंकि दाऊद के साथ भी ऐसा ही हुआ। इस विषय में इतना ही।
अब दूसरी बात यह कि हम परमेश्वर से बिनती करें कि वह हमारा पक्ष लेकर बदला ले और जब हम देखें कि हमारे साथ अन्याय हो रहा है तब हमें शान्ति दे, जब हम झूठी और निन्दा-भरी बातों से दबाए जाएँ और बिना उचित कारण हमारी बुराई की जाए; तब हमें चाहिए कि परमेश्वर से बिनती करें कि वह हमारा जमानती और छुड़ानेवाला हो; और हम सन्देह न करें कि वह हमारा मुकद्दमा अपने ही हाथ में ले लेगा, और अपने आप को रक्षक और वकील से कहीं बढ़कर दिखाएगा। क्योंकि वह कहता है कि जब उसके लोग उसके और मनुष्यों के सम्मुख खराई से चले हों, तब उन सब के मुकद्दमों और झगड़ों की रक्षा और बचाव के लिए वह प्रतिपक्षी है। देखो, यहाँ एक उत्तम और अत्यन्त लाभदायक चेतावनी है: अर्थात् जब हम पर झूठा दोष लगाया जाए, हमारे साथ अन्याय किया जाए, हमें सताया और दबाया जाए, तब हम अपनी सारी चिन्ता परमेश्वर पर डाल दें; और परमेश्वर से बिनती करें कि वह मुकद्दमा अपने हाथ में ले और आप ही बदला ले। अब यह हमें धीरजवन्त बनाने के काम आ सकता है: क्योंकि मनुष्य जो अपने आप को इतना सताते और तड़पाते हैं, उग्र और निर्दय हो जाते हैं, बदला लेते हैं, या जब उनके साथ कुछ अन्याय होता है तब निरे कायर बन जाते हैं, इसका क्या कारण है, सिवाय इसके कि वे परमेश्वर की ओर नहीं फिरते, अपने आप को उसकी रक्षा में नहीं रखते, और उससे बिनती नहीं करते कि वह अपना पवित्र हाथ उन पर रखे और उनका मुकद्दमा लड़े? अब यदि हम यह जान लें, तो निश्चित है कि हमारे हृदय तुरन्त बहुत अधिक शान्त हो जाएँगे, और हम में उन लोगों से बदला लेने की ऐसी उबलती हुई भावनाएँ न रहेंगी जो हमें सताते हैं; वरन् हम उस शिक्षा पर चलेंगे जो यहाँ हमारे सामने रखी गई है: अर्थात् जब हमारे साथ अन्याय हो, तब हम परमेश्वर से प्रार्थना करें कि वह हमारा पक्ष लेकर बदला ले। और इसके अतिरिक्त हम उस प्रतिज्ञा पर भी अपने को टिकाना सीखें जो इस विषय में हमें दी गई है: क्योंकि जैसे दाऊद यहाँ ऐसी बिनती करता है, वैसे ही हमें यह भी सोचना चाहिए कि उसने यह अपनी ही मन-मौज से या संयोग से नहीं किया, वरन् वह जानता था कि यह परमेश्वर का काम है: अर्थात् वह सब अत्याचारों का बदला लेगा, जैसा मूसा के गीत में कहा गया है कि यदि मनुष्य किसी पर अन्याय से अत्याचार करें, तो प्रभु कहता है कि वही निर्दोष का और उसका जो अकारण सताया जाता है, मुकद्दमा लड़ने और बदला लेनेवाला है। तब दाऊद यह जानकर कि परमेश्वर ने यह उपाधि अपने ऊपर ली है और घोषित किया है कि वह धर्मियों का गला यों कटने, उन्हें यातना दिए जाने और पैरों तले रौंदे जाने न देगा, वरन् उनकी सहायता के लिए अपना हाथ बढ़ाएगा, यह जानकर वह दृढ़ निश्चय के साथ परमेश्वर को पुकारता है कि वह उसे ग्रहण करेगा। इसलिए उचित है कि जब हम प्रार्थना करें तब इस प्रतिज्ञा की ओर देखें, ताकि हम सन्देह के साथ नहीं, वरन् पूरे निश्चय के साथ प्रार्थना करें कि परमेश्वर हमारी आवश्यकताओं में सहायता के लिए तुरन्त तैयार है। और इसीलिए दाऊद तुरन्त आगे कहता है, "अपने वचन के अनुसार मुझे जिला।" यह बात बिना कारण नहीं जोड़ी गई। क्योंकि जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, जब हम अपने प्रभु परमेश्वर से बिनती करें कि वह हमारा झगड़ा अपने ऊपर ले और हमारे क्लेशों में हमारी सहायता करे, और फिर इसी बीच हम उसके ऐसा करने में सन्देह करते रहें, तो इस प्रकार प्रार्थना करने से हमें थोड़ा ही लाभ होगा। परन्तु हमें पूरा निश्चय होना चाहिए कि वह हमें छुड़ाएगा। और जब कभी ऐसा हो कि हम सब मनुष्यों की सहायता से वंचित हो जाएँ, वरन् ऐसा प्रतीत हो कि सारे संसार ने हमारे विनाश और सत्यानाश का षड्यन्त्र रचा है, तब विशेष रूप से हमें निश्चय रखना चाहिए कि परमेश्वर हमारा पक्ष लेकर बदला लेगा; और न केवल हमारे लिए प्रतिनिधि का काम करेगा, वरन् हमारे शत्रुओं के और उन सब के विरुद्ध, जिन्होंने हमें अन्याय से सताया है, पूरी रीति से हमारा न्यायी और प्रतिपक्षी भी होगा। क्योंकि सब न्यायपूर्ण मुकद्दमों को हाथ में लेनेवाला वही है। इसलिए हमें इस बात का निश्चय रखना आवश्यक है। परन्तु यह हम कहाँ से सीखेंगे? परमेश्वर के वचन ही से, क्योंकि उसने उसमें इसकी साक्षी हमारे लिए छोड़ी है: जैसा हम देखते हैं कि दाऊद यहाँ अन्धाधुन्ध नहीं बोलता, वरन् अपने आप को पहले ही उत्तम नींव पर टिका चुका है, जिस पर उसने अपने आप को स्थिर किया है। अब आगे लिखा है,
"उद्धार दुष्टों से दूर है, क्योंकि वे तेरी विधियों की सुधि नहीं रखते।" और आगे वह कहता है, "हे प्रभु, तेरी दया बड़ी है; अपने नियमों के अनुसार मुझे जिला।"
अब यहाँ दो बातों पर विचार करना है। पहली यह कि दाऊद वह कारण बताता है कि परमेश्वर के सब विरोधी और उसके प्रताप के विरुद्ध बलवा करनेवाले सब लोग क्यों सिर के बल विनाश में जा गिरते हैं, और क्यों वह उन्हें त्याग देता है: कि उन्हें अपने क्लेशों में न कोई स्वाद मिलता है न चैन, वरन् परमेश्वर स्पष्ट रूप से उन्हें त्याग देता है। दाऊद यहाँ इस सब का कारण बताता है: वह कहता है, यह इसलिए कि उन्होंने तेरी व्यवस्था की खोज नहीं की, और इसीलिए वे तेरे उद्धार से दूर हैं। अब वह इसके ठीक विपरीत अपने विषय में घोषणा करता है कि वह परमेश्वर की व्यवस्था पर चलता और उसे अपने हृदय में रखता था। इसलिए हमें यह निष्कर्ष निकालना ही पड़ेगा कि वह उससे पराया नहीं हो सकता था। सचमुच यह वाक्य पहली दृष्टि में कुछ अस्पष्ट है, परन्तु मैं तीन शब्दों में इसे स्पष्ट कर दूँगा, और फिर धीरे-धीरे दिखाऊँगा कि हमें इससे कौन-सी शिक्षा ग्रहण करनी है। जब कोई हमें हमारे उद्धार की बात बताए, तो हमें पहले यह जानना चाहिए कि वह कहाँ से आता है: अर्थात् परमेश्वर से, और यह कि उसके बिना कोई उद्धार नहीं: यहाँ तक कि जब तक परमेश्वर हम पर भला और अनुग्रहकारी है, तब तक हमारी ओर सब कुछ अत्यन्त अच्छा ही चलेगा, और हम निश्चिन्त रहें कि हमारा जीवन धन्य है, और हमें कोई ऐसी वस्तु घटी न होगी जो हमारे कल्याण और सुख के लिए उचित है। इसलिए हमारा उद्धार, और आशीषों की सारी परिपूर्णता और सिद्धता, इसी एक बात में है कि परमेश्वर हम से प्रेम रखता और हमें अपना लेता है। और जब ऐसा है, तो अब विचार करें कि वह कौन है जिसे परमेश्वर त्यागेगा। पहले तो हम उसकी सृष्टि हैं, और जैसे उसने हमें रचा और गढ़ा है, वैसे ही हमारे प्रति अपनी भलाई बनाए रखेगा। अब जब उसकी दया पशुओं तक, निकृष्ट और तुच्छतम वस्तुओं तक, वरन् उन तक भी फैली है जिन्हें हम तुच्छ जानते और देखना भी नहीं चाहते, जब परमेश्वर की दया इतनी दूर तक फैली है, जैसा पवित्रशास्त्र हमें सिखाता है, तो यह कैसे हो सकता है कि वह हमें त्याग दे, हमें जिन्हें उसने इतनी प्रतिष्ठा और श्रेष्ठता दी है? क्योंकि हमारे पास एक ऐसी बात है जो उसकी अन्य सब सृष्टि से बढ़कर है, वह यह कि परमेश्वर ने अपना ही स्वरूप और समानता हम में अंकित की है: अब जब उसने हमें इतने ऊँचे सम्मान के पद तक उठाया है, तो क्या, तुम्हारे विचार में, वह अब हमें त्याग देगा? निःसन्देह नहीं। तब क्या कारण है कि हम इतने अभागे और दुखियारे लोगों को देखते हैं जो मानो छोड़ दिए गए हैं, ऐसे कि परमेश्वर उन्हें छोटी-सी सहायता और शान्ति तक नहीं भेजता, और ऐसा प्रतीत होता है कि उसने उन्हें मानो रंगमंच पर खड़ा कर दिया है कि वे सारे संसार के लिए लज्जा और निन्दा के पात्र हों? यह कहाँ से होता है? निश्चय इसलिए कि वे परमेश्वर से अपने आप को दूर खींच लेते हैं: क्योंकि जब वे उससे दूर नहीं हटते थे, तब यह निश्चित है कि वह उन पर वैसा ही प्रकट हुआ जैसा वह अपने स्वभाव से वास्तव में है, अर्थात् प्रेममय, कृपालु, तरस खानेवाला, कोमल और दयालु। संक्षेप में, जब तक हम उसकी सन्तान होकर उसकी अगुवाई में चलेंगे, तब तक यह निश्चित है कि वह हमारे प्रति पिता का काम करेगा; जब तक हम उसके आज्ञाकारी रहेंगे, वह हमारे साथ कोमलता से व्यवहार करेगा। परन्तु जब हम ऐसे हठीले हों कि न तो स्वयं उसके अधीन हों, न उसके वचन के, वरन् उसके उस प्रेम और अनुग्रह को तुच्छ जानें जो हमें दिया गया है: तो क्या उचित है कि परमेश्वर हमारी सहायता के लिए अपना हाथ बढ़ाए? क्या यह उचित है कि वह हमारे साथ अपनी सन्तान का-सा व्यवहार करे, और हमें उन लोगों में गिने जो अपने आप को पूरी रीति से उसके प्रताप को समर्पित करते हैं? नहीं, ऐसा नहीं। वरन् हम इस योग्य हैं कि उससे दूर रखे जाएँ और उससे हमारा कोई सम्बन्ध न रहे। देखो, यहाँ दाऊद का अभिप्राय यह है जब वह कहता है, "हे प्रभु, उद्धार दुष्टों से दूर है, क्योंकि वे तेरी विधियों की चिन्ता नहीं करते।" मानो वह यह कहता हो: हे प्रभु, यदि तू हमें छोड़ दे, और हम तेरी भलाई की कोई सहायता अनुभव न करें, वरन् सब विपत्ति और संकट में गलते रहें, तो हमें लज्जित न होना चाहिए। और क्यों? क्योंकि हमने तेरा अनुग्रह छोड़ा और ठुकराया है: इसलिए ठीक ही है कि हम लज्जित हों और मिट्टी में मिल जाएँ। अब मैं तुम से पूछता हूँ, बताओ, इसका क्या अर्थ है कि परमेश्वर अपने वचन के बिना हमारे निकट नहीं आना चाहता? हमें उसकी भलाई का अनुभव उसके प्रभाव से होना ही चाहिए; हाँ, निश्चय, और तौभी परमेश्वर अपने वचन के द्वारा हमारे निकट आता है: क्योंकि वह एक तैयारी है जिससे वह हमारे हृदयों को गढ़ता है, ताकि वह अपने आप को हमारे लिए दयालु पिता प्रकट करे। और इस प्रकार वह हमारे हृदयों में अपनी दया के लिए मार्ग बनाता है, ताकि हम उसकी आशीषों का आनन्द लेने के योग्य हों। इसलिए जब ऐसा है कि परमेश्वर अपने वचन के द्वारा अपने आप को प्रकट करता और हमारे निकट आता है, तो हमें लज्जित नहीं होना चाहिए, यदि वे लोग जो उसका वचन ठुकराते हैं, वरन् जो उसे ऐसी नीचता और घृणा से त्यागते हैं जैसा हम देखते हैं: मैं कहता हूँ, हमें यह अनोखा न लगे कि वे अपने क्लेशों में परमेश्वर के हाथ से कोई सहायता अनुभव नहीं करते, और उसकी दयालु भलाई उन तक नहीं पहुँचती। अब दाऊद इस वाक्य की ओर लौटता है जो हमने देखा, और चाहता है कि परमेश्वर के वचन के अनुसार जिलाया जाए। यह सच है कि वह "नियम" शब्द का प्रयोग करता है, परन्तु सब एक ही है, जैसा हम पहले बता चुके हैं। वह कहता है, "इसलिए अपने नियमों के अनुसार मुझे जिला, हाँ, जिनसे मैंने प्रीति रखी है।" तौभी वह हमें दिखाता है कि परमेश्वर ने किस प्रकार हमें जिलाने की प्रतिज्ञा की है, और वह इसे केवल अपनी दया का फल क्यों ठहराता है।
अब यह कथन एक अत्यन्त उत्तम और उत्कृष्ट शिक्षा रखता है: क्योंकि जो यह मानते हैं कि वे परमेश्वर के अनुग्रह के बिना बच नहीं सकते, वे भी, चाहे जैसा हो, परमेश्वर के अनुग्रह को उलटने से नहीं चूकते, या तो अपनी योग्यताओं को बढ़ा-चढ़ाकर कहकर, या अपने आप को यह विश्वास दिलाकर कि परमेश्वर ने उनके प्रति ऐसी कृपा की प्रतिज्ञा इसलिए की है कि वे उसके योग्य ठहरे हैं। इसलिए आवश्यक है कि हम दाऊद के साथ यह जानें कि किस बात ने परमेश्वर को हमें जिलाने की प्रतिज्ञा करने पर उभारा और प्रेरित किया: अर्थात् हमें सँभाले रखने के लिए। क्योंकि यह शब्द "जिलाना" हमारी दशा और उद्धार से सम्बन्ध रखनेवाली सब बातों को समेटे हुए है। वह इसलिए कि वह भला है, और उसने कारण अपनी भलाई को छोड़ और कहीं नहीं ढूँढ़ा। तब जब हमें यह मानना पड़े कि हमें सँभालनेवाला परमेश्वर ही है, तो हमें तुरन्त यह भी मानना चाहिए कि परमेश्वर ने यह अपनी प्रतिज्ञा के कारण किया है, और इसलिए कि उसने इसे अपने वचन में साक्षी के रूप में प्रकट किया है। और देखो, इसमें बहुत लोग बहुत अधिक धोखा खाते हैं: अर्थात् यह कि परमेश्वर हमें सँभालने और बचाए रखने की प्रतिज्ञा इस हिसाब से करता है कि हम उसके योग्य हों, या इस हिसाब से कि हर एक मनुष्य जैसा कमाए। और इसी पर, जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, हम परमेश्वर के अनुग्रह को धुँधला कर देते हैं, और अभिमान से न जाने कैसी धृष्टता गढ़ लेते हैं, कि ऐसा प्रतीत हो कि परमेश्वर जो हम पर कृपा करता है उसका कारण हम ही हैं, और वह कम से कम कुछ अंश में हम ही से आता है। और इसलिए हमें दाऊद की इस बात पर और भी भली-भाँति विचार करना चाहिए जो वह यहाँ कहता है। "हे प्रभु, तेरी दया बड़ी है; हे प्रभु, अपनी चितौनियों के अनुसार मुझे जिला।"
वह केवल यह नहीं कहता, "हे प्रभु, मैं तेरे द्वारा सँभाला गया हूँ, क्योंकि तूने प्रतिज्ञा की है"; वरन् यह प्रकट करने के लिए कि यह सब नितान्त मुफ़्त है, वह दिखाता है कि परमेश्वर ऐसी कोई प्रतिज्ञा करने के लिए उभारा नहीं गया, और न उसे हम में पाए गए किसी कारण ने, या हमारी ओर से ली गई किसी बात ने प्रेरित किया। नहीं, नहीं: वरन् इसलिए कि उसकी दया बड़ी है। इसलिए इस कथन से दाऊद हमें सिखाता है कि परमेश्वर की प्रतिज्ञाएँ नितान्त मुफ़्त हैं, वे हमारी योग्यता पर निर्भर नहीं, और न इस पर कि परमेश्वर ने हम में कुछ ऐसा पाया जिससे वह हम से इस प्रकार प्रेम रखे और हमारी सहायता करे: वरन् इसलिए कि वह भला है और हमारी दुर्दशा पर तरस खाता है।
देखो, किस बात ने उसे हमारे प्रति ऐसा उदार बनाया, और फलस्वरूप अपनी प्रतिज्ञा पूरी करने को प्रेरित किया। इसलिए हमें परमेश्वर के केवल अनुग्रह में घमण्ड करना सीखना चाहिए, और अपने व्यक्तित्व को या अपनी योग्यताओं को कुछ भी न ठहराना चाहिए, क्योंकि हम में कुछ भी नहीं है। अब आगे लिखा है,
"मेरे सतानेवाले और मेरे द्रोही बहुत हैं, तौभी मैं तेरी चितौनियों से नहीं हटता।"
यहाँ दाऊद दावा और शिकायत दोनों करता है, ताकि परमेश्वर उसकी सुनने और उसकी सहायता करने की ओर और झुके। और यह उसी के अनुसार है जो वह पहले कह चुका है। क्योंकि यदि हम चाहें कि परमेश्वर हमारी सहायता करे, तो उचित है कि हम धीरज से उसके अवकाश की बाट जोहें। और सचमुच जो अपने आप को बढ़ाने का साहस करता है, या समझता है कि परमेश्वर उस पर दया करेगा, और फिर परीक्षा से अपने आप को हराने देता है और सर्वथा निराश हो जाता है: वह इस प्रकार परमेश्वर को अपनी भलाई दिखाने नहीं देता जैसी उसने प्रतिज्ञा की है: वरन् ऐसा करके मानो परमेश्वर के लिए द्वार बन्द कर देता है। इसलिए यदि हम अपने शत्रुओं से बदला लेने को उभर आएँ, और जैसा हम कहते हैं, बदले में अपने ही कर्ता बन जाएँ, और परमेश्वर के अपना काम करने तक न ठहरें, तो क्या हम समझते हैं कि वह हमारी सहायता करे? जो अपने हाथ से और अपने निजी अधिकार से न्याय करना चाहता है, क्या वह अपने शत्रु को मार डालने के बाद हाकिम से सहायता माँगने जाएगा? इसलिए यदि कोई ऐसा हो जो अपने आप को आप ही बचाने की सोचे, और फिर भी परमेश्वर से कहे, "हे प्रभु, मुझे बचा", तो यह निरा उपहास है। और इसी कारण दाऊद इस स्थान पर कहता है,
"हे प्रभु, मेरे सतानेवाले और मेरे द्रोही बहुत हैं, तौभी मैं तेरी विधियों से नहीं हटता।"
दाऊद यहाँ अपनी बड़ाई करने को नहीं बोलता, वरन् यह दिखाने को कि वह परमेश्वर की सहायता की बाट जोहता था: और अपने आप को उसकी रक्षा में रखकर भरोसा रखता था कि उसकी बिनती सुनी जाएगी, क्योंकि वह निडर होकर उससे माँग सकता था। तो देखो, परमेश्वर को पुकारने में हम कितना पूरा साहस रख सकते हैं, और सन्देह न करें कि जो कुछ हम उसकी इच्छा के अनुसार उससे माँगेंगे वह हमें अवश्य मिलेगा: अर्थात् वह हम पर तरस खाता है: इसलिए, मैं कहता हूँ, हमें सदा उसकी प्रतिज्ञाओं पर अपने आप को टिकाए रखना चाहिए, जैसा हम देखते हैं कि दाऊद ने यहाँ किया है। तो सबसे पहले हम यह विचार करें कि जब-जब हम परमेश्वर के पास आएँ, तब-तब हम उसके अच्छे अवकाश की बाट जोहते हुए आएँ, और जो भी परीक्षाएँ हम पर आएँ उनसे डगमगाएँ नहीं, वरन् सदा परमेश्वर को ढूँढ़ते रहें, उसकी प्रतिज्ञाओं पर निरन्तर मनन करें, और उन्हें सदा मन में रखें: मैं कहता हूँ, यदि हम चाहते हैं कि परमेश्वर हमारी सहायता और रक्षा करे, तो हम में यह सब होना चाहिए। अब, जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, दाऊद यहाँ अपने गुणों की डींग नहीं मारता, वरन् केवल यह कहना चाहता है कि वह मनुष्यों के अधर्म में बहकर उनसे हिसाब चुकता करने, या जैसा हम कहते हैं, बराबरी करने को नहीं चला, और जो उससे प्रतिज्ञा की गई थी उसे पाने की उसे जल्दी नहीं थी, वरन् वह निरन्तर शान्त और स्थिर बना रहा, और धीरज से बाट जोहता रहा कि परमेश्वर अपनी प्रतिज्ञा पूरी करे, अर्थात् अपने शत्रुओं से बदला लेने के विषय में: वैसे ही जब कोई हमें दुःख और कष्ट दे, तब भी हमें अपनी बुलाहट पर चलना और परमेश्वर के भय में बने रहना नहीं छोड़ना चाहिए। क्योंकि हम में से अधिकांश लोग तब तक द्वेष और कृतघ्नता से भरे रहेंगे जब तक परमेश्वर हमें सुधार न दे। इसलिए जब हमने किसी की हानि न की हो और वे हमारे विरुद्ध शस्त्र उठाकर चढ़ आएँ, तो हम इस पर चकित न हों। इस विषय में इतना ही। अब दूसरी बात यह है कि जब हमारे शत्रु असंख्य हों, तब भी इस कारण हमें घबराना नहीं चाहिए: वरन् हम जानें कि परमेश्वर का सामर्थ्य क्या है, और उसकी महिमा वैसी करें जैसी उसकी होनी चाहिए। और यह हमारे सीखने के लिए अत्यन्त आवश्यक बात है: क्योंकि, जैसा हम कहते हैं, हमें अपनी ही छाया से नहीं डरना चाहिए। और इसलिए यदि दो-तीन ऐसे मनुष्य हों जिनकी साख और अधिकार है और जो हमारे विरुद्ध युद्ध करें, तो हम चोट पड़ने से पहले ही ऐसे कायर हो जाते हैं कि हमें लगता है हम सर्वथा नष्ट हो गए: मानो परमेश्वर हमारी सहायता करने को पर्याप्त सामर्थी न हो। देखो, हम किस मूर्खतापूर्ण अज्ञानता से मनुष्यों के सामर्थ्य पर घमण्ड करते हैं, और परमेश्वर के सामर्थ्य और बल को सर्वथा उलट देते हैं। और इसलिए हमें इस स्थान पर और भी अच्छी रीति से विचार करना चाहिए जहाँ लिखा है,
"मैं विश्वासघातियों को देखकर शोकित हुआ, क्योंकि वे तेरे वचन को नहीं मानते।"
यहाँ दाऊद वह दिखाता है जो हम पहले देख चुके हैं: अर्थात् यह कि परमेश्वर के विरुद्ध किए गए अपराधों को देखकर उसे उन सब अत्याचारों से अधिक शोक हुआ जो उसने अपने ही व्यक्ति पर सहे। और यही वह बात है जिसे हमें बहुत महत्त्व देना चाहिए। क्योंकि यदि हम ऐसे नाजुक और, मानो, स्त्रैण हों कि कुछ सह न सकें, और इसी बीच हमें इसकी कोई चिन्ता न हो कि परमेश्वर का अपमान होता है, उसके न्याय का उल्लंघन होता है और उसकी आज्ञाएँ तोड़ी जाती हैं: मैं तुम से विनती करता हूँ, क्या हम भली-भाँति नहीं दिखाते कि हम अपने ही को प्रसन्न करने में ऐसे लगे हैं कि उसके पवित्र प्रताप को भी तुच्छ जानते हैं? यदि कोई, जैसा हम कहते हैं, दाँत और नाखून से अपनी प्रतिष्ठा की रक्षा करना चाहे, और परमेश्वर की महिमा को पैरों तले रौंदा जाता देखकर कुछ परवाह न करे: यदि वह ऐसा अकड़ू और घमण्डी हो कि हर एक अपमान का बदला ले, और परमेश्वर के पवित्र नाम की बुराई सुन सके, और उसकी व्यवस्था को पैरों तले पड़ा देख सके, तो क्या वह अपने आप को निरा विषयी और शारीरिक मनुष्य नहीं दिखाता? हाँ, निश्चय, वह पशु से किसी बात में अच्छा नहीं है। और इसलिए हम दाऊद के उदाहरण के अनुसार यह सीखें कि जब परमेश्वर की आज्ञाएँ तोड़ी जाती देखें, तब मुख्य रूप से शोकित और खिन्न हों। हम में यह साधारण और प्रचलित रीति है कि जब हमारे साथ कोई अन्याय हो तब अत्यन्त क्रोधित हों; जैसे यदि हम में से किसी की प्रतिष्ठा या साख को ठेस लगे, तो हम तुरन्त बहुत भड़क उठते हैं, और कुछ और नहीं चाहते सिवाय इसके कि बात को गर्मी से आगे बढ़ाएँ। और क्यों? क्योंकि हमें अपने ही व्यक्ति का ध्यान है। यदि कोई किसी की चोरी करे, तो उसका क्रोध या रोष शान्त न होगा: वह अपनी थैली, अपने घास के मैदानों, अपनी सम्पत्ति और अपने घरों को देखता है, जैसे इस बात में या उस बात में उसकी हानि हुई हो।
अब जो मनुष्य अपनी भावनाओं को भली-भाँति वश में रख सकता है, उसे अपनी प्रतिष्ठा या अपनी सम्पत्ति का उतना ध्यान कभी न होगा जितना तब होगा जब वह परमेश्वर की धार्मिकता का उल्लंघन होते देखेगा। वह अपने मन में कराहते हुए कहेगा, "क्या? क्या मनुष्यों को परमेश्वर की धार्मिकता को इस प्रकार बिगाड़ना चाहिए? क्या मनुष्य सारी व्यवस्था और न्याय को तोड़ें और भ्रष्ट करें?" देखो, मैं कहता हूँ, यही वह बात है जो हमें छूनी चाहिए और हमें बहुत क्रोधित करनी चाहिए: अर्थात् जब हम परमेश्वर के विरुद्ध अपराध होते देखें, और न कि वह जो हमारे अपने व्यक्ति को छूता है। परन्तु इसके विषय में क्या कहें: क्योंकि बहुत थोड़े हैं जिन्हें इसकी कोई चिन्ता है। तौभी इस सब के होते हुए दाऊद ने हमारे सामने यह उदाहरण व्यर्थ नहीं रखा: वरन् यह दिखाने के लिए कि परमेश्वर की सन्तान को अपनी भावनाओं को कैसे संयत करना चाहिए: अर्थात् उन्हें सदा इसी छोर से आरम्भ करना चाहिए, कि उन विश्वासघातियों को देखकर शोकित और खिन्न हों जो परमेश्वर के वचन को तोड़ते, तुच्छ जानते और पैरों तले रौंदते हैं, और यही उनका प्रधान शोक और दुःख हो जो उन्हें क्रूस पर चढ़ाए, न कि अपने व्यक्ति का वैसा ध्यान जैसा वे रखते हैं, वरन् परमेश्वर को सदा अपने आप से ऊपर रखें, और उसे सर्वोच्च पद दें, जैसा वह सर्वथा योग्य है। अब यदि हमें उन विश्वासघातियों को देखकर शोक होता है जो सारे न्याय और व्यवस्था को फाड़ते और तोड़ते हैं, तो निश्चित है कि हमें उस बुराई पर भी शोक होना चाहिए जो हम अपने भीतर जानते हैं। क्योंकि हर एक को अपना न्याय बिना किसी अपवाद के करना चाहिए। रहे वे जो कहेंगे, "अरे देखो, मुझे अपने व्यक्ति के विषय में शोक नहीं है: और सचमुच मुझे अपनी इतनी चिन्ता नहीं जितना यह देखकर शोक होता है कि मनुष्य परमेश्वर के प्रताप के विरुद्ध ऐसा भयंकर अपराध करते हैं," और फिर भी वे स्वयं औरों के बराबर या उनसे भी बढ़कर दुष्टता और पाप करने की छूट अपने को दे लेते हैं: और फिर भी यह कहकर वे अपने ही दोष ढाँपेंगे, और परमेश्वर के प्रताप के विरुद्ध पाप करके अपनी चापलूसी करेंगे, जबकि उन्हें उन्हें खोलकर रख देना चाहिए: अब ऐसे लोग सचमुच अपने आप को पक्के कपटी दिखाते हैं। और मैं तुम से पूछता हूँ क्यों? क्योंकि वे विश्वासघातियों को देखकर शोकित नहीं होते, जब परमेश्वर की महिमा घटती, उसकी सेवा नहीं की जाती और उसकी धार्मिकता तुच्छ जानी जाती देखते हैं: वरन् व्यक्तियों को सताते हैं, और उन दोषों से बैर नहीं रखते जो उनमें पाले जाते और जानबूझकर बनाए रखे जाते हैं। क्योंकि चाहे वे बुराई की निन्दा करने का कितना ही दिखावा करें, तौभी सहज ही देखा जा सकता है कि उन पर इसका कोई असर नहीं पड़ा। और इसी से वे भली-भाँति दिखाते हैं कि वे नहीं जानते कि जैसा चाहिए वैसा शोकित होना क्या है। अब यह वैसा करना नहीं जैसा हमें करना चाहिए: क्योंकि परमेश्वर के आदर और महिमा के लिए हम चाहे कितनी ही बड़ी धुन का दिखावा करें, यदि हम निष्पक्ष होकर बात को देखें तो भली-भाँति देखेंगे कि हम में कपट और छल के सिवाय कुछ नहीं है। देखो, इस स्थान से हमें यही बात लेनी है। अब अन्त में दाऊद कहता है,
"हे प्रभु, देख, मैं तेरे आदेशों से कैसी प्रीति रखता हूँ; अपनी करुणा के अनुसार मुझे जिला।"
यहाँ दाऊद और कुछ नहीं करता, केवल उसे और प्रकट रूप में कहता है जो पहले कहा जा चुका, "हे प्रभु, देख, मैं तेरे आदेशों से प्रीति रखता हूँ"; वह केवल उसकी बात नहीं कहता जो हमें कहा गया है कि हम अपने पड़ोसी से प्रेम रखें, पवित्रता से जीवन बिताएँ, अपने पिता और माता का आदर करें, किसी का अन्याय न करें: वरन् इन शब्दों के अधीन वह उस सारी शिक्षा को समेट लेता है जिससे परमेश्वर अपने लोगों और कलीसिया पर शासन करना चाहता है, जैसा हम पहले चर्चा कर चुके हैं। अब इस शिक्षा में वे प्रतिज्ञाएँ सम्मिलित हैं जो हमारे लिए उसकी भलाई की साक्षी देती हैं: हाँ, और उनका स्थान सबसे ऊपर है, क्योंकि परमेश्वर अपने आप को हमारे पिता के रूप में हम पर प्रकट करके किसी भी बात के लिए हमें त्यागेगा नहीं: क्योंकि हमें अपने अनन्त उद्धार का निश्चय है, और यह कि इस संसार में वह हमारी चिन्ता करता है, और हमारा जीवन मानो उसी को सौंपा हुआ है, ऐसे कि सारा सार इसी में है कि जब वह हमारे पापों को क्षमा कर चुका, तब वह हमें धर्मी ठहराता है, और अपने पवित्र आत्मा से हम पर शासन भी करेगा। तो देखो, परमेश्वर की चितौनियों में क्या सम्मिलित है। और इस प्रकार दाऊद सार रूप में इस पद में घोषणा करता है कि वह सदा परमेश्वर के उस प्रेम में चलता रहा जो उसने उसकी प्रतिज्ञाओं में पाया। यही वह घोषणा करता है, और इसी पर कहता है,
"अपनी करुणा के अनुसार मुझे जिला।"
यदि दाऊद परमेश्वर की आज्ञा और उसकी चितौनियों से प्रीति रखता था, तो वह यह क्यों नहीं माँगता कि अपनी योग्यताओं के अनुसार जिलाया जाए? और यदि ऐसा है कि उसने कमाया है, तो वह परमेश्वर की दया की शरण क्यों लेता है? अब वह भली-भाँति दिखाता है कि उसका अभिप्राय न तो अपने गुणों की डींग मारना था, और न किसी ऐसी, न जाने कैसी, सिद्धता की कि उसने परमेश्वर की व्यवस्था को पूरा किया हो: वरन् उसका ध्यान, जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं की विषय-वस्तु पर विशेष रूप से था। वह यहाँ यह नहीं कहता कि वह सहायता पाने के योग्य ठहरा था: वरन् वह चाहता था कि परमेश्वर की दया के अनुसार उसकी रक्षा की जाए। इस बात में वह हमारे सामने अपना उदाहरण रखता है, ताकि हम उसका अनुकरण करें, जैसा पवित्र आत्मा का भी यही अभिप्राय है जब उसने दाऊद के मुख से बात की। अब वह निष्कर्ष के रूप में आगे कहता है,
"तेरा वचन सदा से सत्य है, और तेरे धर्ममय नियमों में से हर एक सर्वदा अटल है।"
अर्थात् तेरे धर्ममय नियम सनातन हैं: या फिर, तेरे नियम सदा धर्ममय हैं। यहाँ दाऊद सार रूप में यह दर्शाना चाहता है कि वह परमेश्वर के वचन पर ऐसा टिका हुआ था कि उसने उस पर अपना हृदय लगा रखा था, अपने आप को पूरी रीति से उसे सौंप दिया था, और अपने सब विचार और बुद्धि उसी पर लगा दी थी। और उसने ऐसा क्यों किया? वह कहता है, "उसका आदि सत्य है, और उसकी धार्मिकता सर्वदा बनी रहती है।" मानो वह यों कहता हो, "हे प्रभु, तू अपने वचन में सच्चा है, और सदा ऐसा ही पाया जाएगा, और आगे, वह धर्म ही धर्म है, वह आदि से सत्य है और तेरी धार्मिकता अन्त तक, वरन् बिना अन्त के बनी रहेगी।" देखो, परमेश्वर के वचन की दो सीमाएँ कैसे बताई गई हैं। जब हम इस वचन की खोज करें, तब हमें सत्य और धार्मिकता में भेद और अन्तर करना चाहिए, इस निश्चय के साथ कि देखो, परमेश्वर कैसे अपने आप को सच्चा और धर्मी प्रकट करता है। और हम जितना आगे बढ़ेंगे, उतना ही उसके वचन को ऐसा ही पाएँगे: ऐसे कि जब हम उसे भली-भाँति उधेड़कर जाँच लेंगे, तब हमें एक भी शब्द ऐसा न मिलेगा जहाँ धार्मिकता और सत्य अपने आप को प्रकट न करें। इसी प्रकार हम भी परमेश्वर के वचन को सदा यही उपाधि दे सकते हैं, जैसा दाऊद यहाँ हमें दिखाता है। सार यह कि जब हम चाहें कि हमें पूरा निश्चय हो, और सब परीक्षाओं में हम पक्के और दृढ़ किए जाएँ, ऐसे कि शैतान कभी हमें कसकर न पकड़ सके: तो हम यह ध्यान रखें कि विशेष रूप से परमेश्वर के वचन पर अपने आप को टिकाएँ, और उसी से अपने आप को सज्जित करें, उसे ये सच्ची उपाधियाँ दें जो यहाँ दी गई हैं, कि उसमें सत्य और धार्मिकता को छोड़ और कुछ नहीं है। और इसलिए हमें परमेश्वर के विषय में निश्चय करके बहुत सन्तोष होना चाहिए, इसमें सन्देह न करते हुए कि वह हमें यह अनुग्रह देगा, कि जब वह एक बार हमें उद्धार के मार्ग में ले आए, तब वह निरन्तर हमारी अगुवाई और शासन करेगा, और अपनी सामर्थी भुजा से हमें थामे रहेगा, जब तक वह हमें उस लक्ष्य तक न पहुँचा दे जिसके लिए उसने हमें बुलाया है।
इस पवित्र शिक्षा के अनुसार, आओ, हम अपने भले परमेश्वर के प्रताप के सम्मुख दण्डवत् करें, अपने अपराधों को मानते हुए, उससे बिनती करें कि वह हमें प्रसन्नता से यह बनाए कि हम अपनी दुर्दशा को पहले से अधिक अनुभव करें, ताकि हम अपने आप को उसके सामने खोल दें। और इसी बीच हम उस उपाय तक पहुँचें कि उससे उनकी क्षमा माँगें: इसमें सन्देह न करते हुए कि वह हमारी अभिलाषा के अनुसार हमें उनकी क्षमा देगा, हमारे प्रभु यीशु मसीह की मृत्यु और दुःखभोग के द्वारा, यद्यपि हम अभागे पापी हैं। और यह भी कि वह अपने पवित्र आत्मा के द्वारा हमें हमारे पापों से ऐसा शुद्ध करे कि हम और कुछ न चाहें सिवाय इसके कि उसकी धार्मिकता में दृढ़ किए जाएँ, उसके पास आएँ, और दिन-प्रतिदिन उसमें और अधिक बढ़ते जाएँ, जब तक वह हमें उस जीवन की पवित्रता से जोड़ न दे जिसके लिए वह निरन्तर हमें समझाता रहता है। कि वह न केवल हमें यह अनुग्रह दे, वरन् पृथ्वी की सब जातियों और लोगों को भी, इत्यादि।
