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भजन संहिता 119 पर आठवाँ उपदेश। 57-64
हेथ।
57 हे प्रभु, तू ही मेरा भाग है; मैंने ठान लिया है कि तेरी व्यवस्था का पालन करूँगा।
58 मैंने तेरे सम्मुख पूरे मन से दीन होकर विनती की; अपने वचन के अनुसार मुझ पर दया कर।
59 मैंने अपने चालचलन पर विचार किया, और अपने पाँव तेरी चितौनियों की ओर फेर लिए।
60 मैंने फुर्ती की, और तेरी आज्ञाओं के मानने में विलम्ब नहीं किया।
61 दुष्टों के हाथों ने मुझे लूट लिया है, परन्तु मैं तेरी व्यवस्था को नहीं भूला।
62 आधी रात को मैं उठकर तेरा धन्यवाद करूँगा, क्योंकि तेरे नियम धर्ममय हैं।
63 मैं उन सब का साथी हूँ जो तुझसे डरते और तेरी आज्ञाओं को मानते हैं।
64 हे प्रभु, पृथ्वी तेरी दया से परिपूर्ण है; मुझे अपनी विधियाँ सिखा।
इन ठीक पहले की आठ आयतों में दाऊद की उन प्रतिज्ञाओं के सिवाय और कुछ नहीं है, जो वह अपने आपको पूरी रीति से परमेश्वर को सौंपते और उसकी व्यवस्था से लिपटे रहते हुए करता है; केवल दूसरी और अन्तिम आयत में उसने दो विनतियाँ की हैं। अब पहली बात यह है कि वह कहता है कि उसका परम हित और सर्वोच्च सुख इसी में था कि वह परमेश्वर की व्यवस्था का पालन करने के लिए दृढ़ संकल्प था। यह तो सच है कि कुछ लोग इसकी व्याख्या यों करते हैं कि दाऊद परमेश्वर को अपना भाग (विरासत) कहता है। परन्तु जब बात को भली-भाँति तौला और विचारा जाएगा, तो अर्थ यह है कि वह अपना सारा सुख इसी में रखता है कि वह पूरी तरह निश्चय और संकल्प कर चुका है (जैसा कि पहले कहा जा चुका है) कि जो कुछ परमेश्वर ने उसे दिखाया और सिखाया है उसी का अनुसरण करे। अब पवित्रशास्त्र में "भाग" शब्द का अर्थ विरासत लिया जाता है, और विरासत से तात्पर्य वह सबसे उत्तम और सबसे अधिक चाही जानेवाली वस्तु है जो मनुष्य के पास होती है। इसलिए यह ऐसा है मानो उसने कहा हो, "हर एक मनुष्य उसे जैसे चाहे और जैसी अभिलाषा करे, बाँट ले।" जैसा कि हम देखते हैं, मनुष्यों की अभिलाषाएँ भाँति-भाँति की और अलग-अलग होती हैं; कोई एक ओर खिंचता है, कोई दूसरी ओर। और सचमुच (वह कहता है) हर एक मनुष्य जैसी कल्पना करता है वैसी ही कामना करता है, परन्तु जहाँ तक मेरा सम्बन्ध है, मैं परमेश्वर की व्यवस्था में सन्तुष्ट रहने के सिवाय और कोई धन्यता या सुख नहीं चाहता; और जब यह मेरे पास है, तो मुझे एक उत्तम और श्रेष्ठ विरासत मिल गई है।
अब जबकि हम इस पहली आयत का सार और प्रभाव देख चुके, तो शेष यह रहता है कि हम उसमें निहित शिक्षा को उसमें से निकालें। क्योंकि जब हम दाऊद को इस प्रकार बोलते सुनते हैं, तो इसमें कोई सन्देह नहीं कि परमेश्वर का आत्मा हम पर प्रकट करता है कि हम में से हर एक को कहाँ पूरी तरह और सम्पूर्ण रीति से अपना भरोसा रखना चाहिए। और ऐसा करने के लिए हमें उन अभिलाषाओं पर ध्यान देना होगा जिनसे हम स्वभाव ही से लुभाए जाते हैं; क्योंकि कोई मनुष्य महत्त्वाकांक्षी होने की ओर झुका है, कोई लोभी होने की ओर, कोई व्यभिचारी होने की ओर। ऐसा है कि मनुष्य अपनी अभिलाषाओं के साथ बह जाते हैं, जैसा कि हम पहले बता चुके हैं। इसलिए उचित है कि हम इन सब व्यर्थ और विकृत अभिलाषाओं और लालसाओं से अपने आपको हटा लें, और जो कुछ हमें परमेश्वर के पास आने से रोक सकता है उस सब से लड़ें; और जब हम इस प्रकार अपने मनोवेगों और शारीरिक लालसाओं को दबा चुकें, तब हम इसके सिवाय और कुछ न चाहें कि परमेश्वर हमें अपनी ओर खींचे, अपने साथ जोड़े, और हमें यह अनुग्रह दे कि हम उसकी आज्ञाओं का पालन करें।
परन्तु हमें प्रायः यह भी ध्यान देना चाहिए कि दाऊद यहाँ एक ऐसे निश्चय की बात करता है जिसे वह अत्यन्त पक्का मानता है और जो कोई हल्का आवेग नहीं है; क्योंकि कभी-कभी हमारे मन में परमेश्वर के पास जाने की इच्छा तो होती है, पर वह बहुत देर नहीं टिकती: क्योंकि शरीर भी दूसरी ओर से हमें उकसाता है और उस भलाई से हमें खींच लेता है जिसकी ओर हम स्वेच्छा से झुके थे। इसलिए थोड़ी-सी इच्छा रखना काफी नहीं, जो शीघ्र ठण्डी पड़ जाती है, या यों कहें कि विपरीत परीक्षाओं से मर ही जाती है; परन्तु हमें एक खरा और दृढ़ निश्चय रखना चाहिए, जैसा दाऊद यहाँ कहता है, "मैंने पूरी तरह ठान लिया है," वह कहता है। वह "प्रतिज्ञा करना" शब्द रखता है; परन्तु इब्रानी लोग इसका अर्थ यह लेते हैं कि किसी बात में पूरी तरह संकल्प करना, दृढ़ और स्थिर रहना, ताकि न डगमगाएँ और न बदलें।
अब सारांश में हम यह ध्यान दें कि जब तक मनुष्य सांसारिक वस्तुओं में लगे रहते हैं, तब तक वे भटकने के सिवाय और कुछ नहीं करते; वे नहीं जानते कि उनका सुख किसमें है; परन्तु हमें इस निष्कर्ष पर पहुँचना है जो यहाँ हमारे सामने रखा गया है, कि परमेश्वर की आज्ञाओं का पालन करें; और तब हमें इन तुच्छ मूर्खतापूर्ण सांसारिक वस्तुओं की अभिलाषा करने का कभी कोई कारण न होगा, जो हवा में उड़ती फिरती हैं और अपने आपको अपनी निरर्थक और व्यर्थ लालसाओं के पीछे बहने देती हैं। क्योंकि जब हम परमेश्वर से उसके वचन के बन्धन द्वारा इस प्रकार जुड़े होंगे, तब हम निश्चय जानेंगे कि हमने उत्तम भाग चुना है। अब, जैसा कि हम पहले कह चुके हैं, दूसरी आयत में एक विनती है जो दाऊद कहता है कि वह निरन्तर करता रहा:
"मैंने तेरे सम्मुख पूरे मन से दीन होकर विनती की; अपने वचन के अनुसार मुझ पर दया कर।"
अब, यह कहने में कि वह परमेश्वर से निरन्तर प्रार्थना करता रहा, वह हमें दिखाता है कि भली-भाँति प्रार्थना करने की रीति क्या है: कि हम उसका अनुसरण करने में दृढ़ रहें और थकें नहीं; इसलिए नहीं कि परमेश्वर को हठपूर्वक दबाव डालने की आवश्यकता है, परन्तु इसलिए कि हमारा विश्वास अभ्यास पाए, और वह हमें भली-भाँति परखे कि हम अपना सारा सुख उसी में खोजते हैं या नहीं। क्योंकि बात यह है कि पवित्रशास्त्र हमारी प्रार्थनाओं में दृढ़ता माँगता है, विशेषकर और सब बातों से बढ़कर; और यह नहीं कि आज तो परमेश्वर से प्रार्थना करें और कल उसे बिलकुल भूल जाएँ, परन्तु यदि हम चाहते हैं कि हमारी सुनी जाए तो हमें लगे रहना होगा। और देखो, इसी में हमें दिखाना है कि हमने परमेश्वर पर भरोसा रखा है, अर्थात् यद्यपि हमें ऐसा प्रतीत हो कि उसने अपने कान बन्द कर लिए हैं, तौभी हमें निरन्तर उसके पास जाने और पहले से सौ गुणा अधिक उससे प्रार्थना करने से रुकना नहीं चाहिए; यह जानते हुए कि जब हमने इस प्रकार प्रार्थना की है तो वह कोई व्यर्थ परिश्रम नहीं है। देखो, यह उस धीरज के विषय में है जिसकी बात दाऊद इस स्थान पर करता है; अब हम देखें कि उसकी प्रार्थना का सार क्या है: "हे प्रभु" (वह कहता है) "अपने वचन के अनुसार मुझ पर दया कर।"
यह विनती सामान्य है; परन्तु दाऊद उन सब उपकारों का मूल स्रोत दिखाता है जो हमें परमेश्वर से माँगने हैं और जो वह हमें उदारता से देता भी है, चाहे हमारी आत्माओं के लिए हों चाहे हमारी देह के लिए: अर्थात् यह कि वह हम पर दयालु है। क्योंकि परमेश्वर हमारा कुछ नहीं देना है, और न हम अपने साथ कुछ ऐसा ला सकते हैं जिससे हम कह सकें कि हम अपने आपको भला करने के लिए उभार सकते हैं; परन्तु सारांश यही है कि वह अपनी केवल निःशुल्क उदारता से हमें यह देता है। तो हम ध्यान दें कि दाऊद का अभिप्राय यह दिखाना है कि जब परमेश्वर अपना हाथ बढ़ाकर हमें इतने उपकार उदारता से देता है जितने हम उससे पाते हैं, तो वही उसकी केवल भलाई से उत्पन्न और प्रवाहित होता है। देखो, इसीलिए वह कहता है, "हे प्रभु, मुझ पर दया कर।" इसलिए परमेश्वर से हम जो कुछ चाहें, हमें सदा इसी मन से आना चाहिए कि उसकी भलाई पर भरोसा रखें। कैसे? हमें परमेश्वर से माँगना चाहिए कि वह हमारे अपराधों को क्षमा करे और अपने पवित्र आत्मा से हमारी सहायता करे; हमें उससे बिनती करनी चाहिए कि हम परीक्षाओं से पराजित न हों; कि वह हमें अपना अनुग्रह दे, जिससे हम खाली और नंगे हैं; कि वह हमें खिलाए; कि जब हम रोगी हों तो हमें चंगा करे; कि हमें संकट से बचाए; या हम और कोई भी विशेष प्रार्थनाएँ कर सकते हैं। ये सब विनतियाँ उसी मूल स्रोत से निकाली जानी चाहिए: अर्थात् यह कि वह हमें यह अपनी ही भलाई से देता है; और हम जानें कि परमेश्वर हमें इस वर्तमान जीवन के लिए भी और हमारी आत्माओं की भलाई के लिए भी इतने उपकार क्यों देता है: अर्थात् इसलिए कि उसे हम पर तरस और करुणा आती है, और इसलिए कि हम दीन और कंगाल प्राणी हैं, जब तक कि वह स्वयं हम पर दयालु होने को न झुके।
संक्षेप में, उन सब विशेष प्रार्थनाओं में प्रवेश करने से पहले जो हम परमेश्वर से करते हैं, आओ हम इसी छोर से आरम्भ करें, और यही वह नींव हो जिस पर हमें निर्माण करना है: कि परमेश्वर को हम पर तरस और करुणा आती है। अब, इसलिए कि हम अपनी प्रार्थनाओं में निश्चिन्त रहें, दाऊद यह जोड़ता है जो वह पहले ही कह चुका था, अर्थात् "तेरे वचन के अनुसार"; क्योंकि यदि हम परमेश्वर से वह माँगें जो हमारी अपनी दृष्टि में अच्छा लगता है, और हमारे पास उसकी कोई प्रतिज्ञा नहीं कि वह हमारी सुनेगा, तो यह ढिठाई से होता है; इसलिए हमें अपनी प्रार्थनाओं के साथ नम्रता और संयम से आना चाहिए, भटकते और लापरवाह ढंग से नहीं; और न हमें परमेश्वर के सम्मुख मनुष्यों के सम्मुख आने से भी अधिक निर्लज्ज मुँह और साहस के साथ आना चाहिए; परन्तु ऐसे विनम्र और संयत रीति से उसके पास आना चाहिए कि हमारे मुँह से कोई बात बिना उचित आधार के न निकले; और यह हम तब तक नहीं कर सकते जब तक हमें निश्चय न हो कि हमारी सब प्रार्थनाएँ उसके मन की इच्छा के अनुसार हैं, और वह उन्हें स्वीकार और पक्का करता है। और यह कैसे होगा? जब उसने कह दिया हो कि हमें अपनी ही बुद्धि के पीछे नहीं चलना, अपनी समझ को लगाम ढीली नहीं देनी; परन्तु जब परमेश्वर कहे, "देखो, मैं चाहता हूँ कि तुम मुझसे यह माँगो, मेरे पास आओ और अपनी विनतियाँ इस रीति से करो:" तब परमेश्वर की उन प्रतिज्ञाओं के अनुसार हम निश्चय रख सकते हैं कि दाऊद के उदाहरण पर उसके पास आएँ और कहें, "हे प्रभु, अपने वचन के अनुसार मुझ पर दया कर।" और यह एक पवित्र ढिठाई है, और ऐसी जिसे परमेश्वर स्वीकार करता है। अब हमें इस शिक्षा पर और भी ध्यान देना चाहिए, जब हम देखते हैं कि यह संसार में केवल धुँधली और अँधेरी ही नहीं की गई, वरन् बिलकुल निरर्थक कर दी गई है; जैसा कि आज पोपवाद में है; क्योंकि जब वे परमेश्वर से प्रार्थना करते हैं तो अन्धाधुन्ध करते हैं। और विशेषकर यह उन बातों में से एक है जिन पर पोप के अनुयायी सबसे अधिक झगड़ते हैं, कि जब हम परमेश्वर से प्रार्थना करें तब हमें यह निश्चय नहीं रखना चाहिए कि वह हमारी सुनता है, वरन् संशय में पड़े रहना चाहिए। हाँ, सचमुच; परन्तु पवित्रशास्त्र हमें बताता है कि जो मनुष्य इस प्रकार डाँवाडोल है, जैसे आँधी और तूफान से उछाली जानेवाली लहरें, उसके लिए कुछ पाना सम्भव नहीं। वह हमें बताता है कि जब हम परमेश्वर के पास आएँ तो विश्वास, आशा और साहस के साथ आएँ।
और इसलिए (जैसा मैं पहले कह चुका हूँ) यह एक पवित्र और सराहनीय ढिठाई है, कि जब हम परमेश्वर के वचन पर टिकते हैं, तो संक्षेप में यह निश्चय करें कि जो उसने हमसे प्रतिज्ञा की है उसे वह पूरा करेगा: क्योंकि हम उसे अपने प्रति बँधा हुआ मानते हैं; इसलिए नहीं कि वह हमारा किसी बात में देनदार है, परन्तु इसलिए कि अपनी केवल उदारता से वह इतना झुकता है कि हमें बताए कि वह चाहता है कि हमें यह स्वतंत्रता और अनुमति हो कि हम उसके सम्मुख इस प्रकार ऐसे साहस और निश्चय के साथ उपस्थित हों, जैसा मैं पहले बता चुका हूँ। और दूसरी आयत के विषय में इतना ही। तीसरी आयत में आगे आता है:
"मैंने अपने चालचलन पर विचार किया, और अपने पाँव तेरी चितौनियों की ओर फेर लिए।"
यह प्रतिज्ञा ध्यान देने योग्य है; क्योंकि इससे हमें चेताया जाता है कि मनुष्य अपनी ही मूर्खताओं और युक्तियों में अपने आपको इतना क्यों सराहते हैं, और अपने को यह विश्वास क्यों दिलाते हैं कि वे परमेश्वर से प्रार्थना करेंगे, चाहे वे उस पर टिकें नहीं, उस पर भरोसा न रखें, और न उसका अनुसरण करें जिसकी उसने उन्हें आज्ञा दी है, केवल अपनी ही कल्पनाओं का।
और यह भी इस प्रकार कि वे समझते हैं कि यदि कोई कहे कि जो परिश्रम उन्होंने किया वह सब व्यर्थ है, तो वह उनके साथ बड़ा अन्याय करेगा; और कि वे अपने आपको बिना किसी प्रयोजन के बहुत सताते हैं, जब तक वे न जान लें कि परमेश्वर उनकी सुनता है। यह बिलकुल सच है कि हर कोई कहेगा, "और यह कैसे, मैं तुमसे पूछता हूँ? परमेश्वर उसे अच्छा क्यों न मानेगा जो मैं करता हूँ, क्योंकि मेरा अन्तिम अभिप्राय तो उसकी सेवा करना है?" नहीं, नहीं, परमेश्वर को इस सब की कोई चिन्ता नहीं। और क्या कारण है कि मनुष्य इतने अभिमान से परमेश्वर के विरुद्ध लड़ते और लात मारते हैं? यह इसलिए है कि वे अपने चालचलन को स्मरण नहीं करते; क्योंकि यदि उनमें यह विचार और बुद्धि होती कि अपने कामों को ध्यान से देखें और अपने मन में इस प्रकार सोचें: मैं क्या करूँ? मेरी दशा क्या है? मुझे भटकना नहीं चाहिए, परन्तु एक सुरक्षित और निश्चित मार्ग और उचित मध्यम मार्ग पर चलना चाहिए: और यह विचार करना चाहिए कि कैसे जिऊँ: और सबसे बढ़कर मुझे इतना तो करना ही चाहिए कि परमेश्वर उस प्रभुता से वंचित न हो जो उसकी अपनी प्रजा पर है।
इसलिए जब मनुष्य अपने चालचलन को भली-भाँति देखते हैं, तो यह निश्चित और पक्की बात है कि वे अपने आपको पूरी तरह परमेश्वर के वचन के अनुसरण में लगा देंगे और उसी में अपना सारा आनन्द पाएँगे। और इसी को वह दूसरे पक्ष में कहता है, कि वह अपने पाँव परमेश्वर की चितौनियों की ओर फेरेगा। इसमें वह अपने उदाहरण से सब मनुष्यों को दिखाता है कि उन्हें वैसे चलना चाहिए जैसी परमेश्वर ने उन्हें आज्ञा दी है, और अपनी ही बुद्धि और सनक से शासित नहीं होना चाहिए। क्योंकि देखो, यह पागलपन कहाँ से आता है जो मानो सारे संसार को पकड़े हुए है, कि हर मनुष्य परमेश्वर की सेवा वैसे करेगा जैसा उसे अच्छा लगे: इसका कारण यह है कि हम अपने पाँव उसकी चितौनियों की ओर नहीं फेरते।
अब हमें इस बात का, जो यहाँ बताई गई है, और भी अधिक अभ्यास करना चाहिए: अर्थात् अपने चालचलन को देखना: कि हम जानें कि जब परमेश्वर ने हमें इस संसार में रखा है, तो इसलिए नहीं रखा कि हम वही करें जिधर हमारी इन्द्रियाँ हमें ले जाएँ; परन्तु हमारा जीवन व्यवस्थित और नियमित होना चाहिए। और यह नियम हमें कहाँ से मिलना चाहिए? परमेश्वर के वचन ही से।
और जब हम अपने जीवन को व्यवस्थित और नियमित करने में इतने सावधान होंगे, तब हमारे लिए इसके सिवाय और कुछ करना शेष नहीं रहता कि वहीं चलें जहाँ हमारा परमेश्वर बुलाता है। परमेश्वर की चितौनियों को देखो, उसके उस सत्य को देखो जो उसने हम पर प्रकट किया है: देखो, वहीं हमें अपने आपको रखना और स्थिर करना है। हमें आगे कभी यह प्रश्न नहीं उठाना चाहिए कि और भटकते फिरें, और तर्क-वितर्क करके कहें, यह अच्छा और सराहनीय क्यों न हो? नहीं, निश्चय ऐसा नहीं; हम अपनी कल्पनाओं के पीछे न चलें, और न अपनी दृष्टि में बुद्धिमान बनें; परन्तु अपने मन में विचार करें कि अपने परमेश्वर की सुनें और उसकी आज्ञा मानें। तो इस तीसरी आयत का सार देखो, जहाँ यह कहा गया है कि दाऊद ने अपने चालचलन पर ध्यान दिया, और अपने पाँव परमेश्वर की चितौनियों की ओर फेर लिए, अर्थात् व्यवस्था की ओर, जहाँ परमेश्वर ने अपनी इच्छा प्रकट की है। अब वह आगे कहता है:
"मैंने फुर्ती की, और तेरी आज्ञाओं के मानने में विलम्ब नहीं किया।"
वह अपने उसी विषय को जारी रखता है; परन्तु वह दिखाता है कि उसकी लालसा मन्द न थी। "मैंने फुर्ती की," वह कहता है, "हाँ, और बिना विलम्ब के।" अब दाऊद का इसे कहना बिना कारण नहीं है; क्योंकि हम देखते हैं कि हमें अपनी ही अभिलाषाओं के विरुद्ध कितनी कठोरता से व्यवहार करना चाहिए: हाँ, मैं कहता हूँ, जो परमेश्वर की सेवा के लिए सबसे अधिक प्रवृत्त हैं, वे भी लँगड़ाते हुए आते हैं, मानो अपने पीछे कभी बाँह कभी टाँग घसीटते हुए, जैसा हम साधारणतया कहते हैं। और इसका कारण क्या है? हम अपने साथ इतनी भ्रष्टताएँ लिए फिरते हैं कि उनका बोझ ही हमें अत्यन्त धीमी चाल से चलाता है, ऐसा कि आगे बढ़ने में हमें बहुत कठिनाई होती है। और हम जानते हैं, और हमें बहुत अधिक अनुभव है, कि जब हम भला करने का इरादा करते हैं तब हमारा स्वभाव कितना निर्बल होता है।
तो आओ हम इन दो बातों को समझें और जानें, और तब हमें यह अनोखा न लगेगा कि हम परमेश्वर का अनुसरण करने में इतने धीमे और ढीले हैं जैसे सचमुच हैं: हाँ, ये ही दो बातें (मैं कहता हूँ)। क्योंकि देखो, शैतान चतुराई से जो कुछ भी सोच सकता है उसे रचने से कभी नहीं थकेगा कि हम पीछे हट जाएँ; वह हमारे सामने बाधाएँ खड़ी करेगा और बाड़ें लगाएगा, वह झाड़ियाँ, काँटे और बुरी-बुरी ठोकर खिलानेवाली वस्तुएँ बिछाएगा जो किसी भी रीति से हमें रोकें और अटकाएँ; ऐसा कि यदि हम केवल तीन पग ही आगे बढ़ना चाहें, तो हम बलपूर्वक इधर-उधर मुड़ने को खींच लिए जाएँगे, और न जानेंगे कि हमारा क्या होगा। फिर, हम अपनी अनियन्त्रित अभिलाषाओं से उकसाए और हिलाए जाएँगे, जो हमें बिलकुल टेढ़े मार्ग पर खींच लें। क्योंकि यदि हम अपना पूरा भरोसा परमेश्वर पर रखना चाहें, तो शैतान हमें उलटी ओर खींचेगा और इस सांसारिक धन-सम्पत्ति के लिए अपने आपको सौंपने पर विवश करेगा, और इसी प्रकार शेष सब के लिए भी। तो जब हम इतनी गाड़ी की रस्सियों से खींचे और घसीटे जा रहे हैं, हाँ, और स्वयं भला करने में इतने निर्बल हैं, और दुष्टता के लिए तो जल रहे हैं: हाय, यदि हम परमेश्वर का अनुसरण करने में धीमे हों तो कोई आश्चर्य नहीं; तौभी इन सब के बावजूद हमें लड़ना अवश्य है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि हम अपने आपको बहलाते हैं, जब अपने में ऐसी शिथिलता देखकर कहते हैं, सचमुच यह बिलकुल सच है कि हमारे स्वभाव की दशा और स्थिति ऐसी ही है, और फिर हमारी निर्बलताएँ इतनी बड़ी हैं कि किसी मनुष्य के लिए जैसा चाहिए वैसा अपना कर्तव्य निभाना असम्भव है। हे प्रिय भाइयो, हम ऐसी नींव पर निर्माण न करें, परन्तु अपने दोषों से लड़ें, और उन सब ठोकरों और घातों के विरुद्ध जो शैतान हमारे लिए बिछाएगा, अपने लिए बल और साहस ले लें, कि हम उन सब बन्धनों और डोरियों को तोड़ डालें जिनसे वह हमें बाँधे रखता है। देखो, मैं कहता हूँ, इस विषय में हमें क्या करना चाहिए। क्योंकि यह न समझें कि दाऊद हमारे समान भावनाओं से भरा मनुष्य न था, और अपने में बड़ी निर्बलताएँ अनुभव न करता था; और न उसने यह प्रतिज्ञा व्यर्थ की, जब वह कहता है कि उसने फुर्ती की और परमेश्वर की आज्ञाओं के पालन में विलम्ब नहीं किया। इसलिए आओ हम भी उसके उदाहरण पर फुर्ती करें, जब परमेश्वर बोलता है, और उसकी सुनने को अपने कान झुकाएँ, और जो कुछ वह हमसे कहे उसे मानने के लिए अपना पाँव उठाएँ।
तो देखो, दाऊद इस स्थान पर हमें क्या बताना चाहता है: अर्थात् परमेश्वर के सब बच्चों में उसका वचन सुनने और ग्रहण करने के लिए कैसी तत्परता होनी चाहिए, और उसे दिन-प्रतिदिन टालना नहीं चाहिए: क्योंकि हम नहीं जानते कि परमेश्वर किस समय हमें यह अनुग्रह देगा कि अपना वचन हमारे सामने रखे। जो इस प्रकार समय को टालते हैं, वे यह हिसाब लगाते हैं कि परमेश्वर उनकी प्रतीक्षा करने को बहुत बँधा और उपकृत है। अब हम देखते हैं कि जब हम उससे ऐसी शर्तों और बन्धनों के साथ प्रार्थना करते हैं, तो वह हमारे ऐसे अहंकार का कैसे उपहास करता है। इसलिए हमें और भी अधिक अपने आपको विवश करना चाहिए, कि उस सिद्धता तक पहुँचें, उस उदाहरण के अनुसार जो यहाँ हमारे सामने रखा गया है, कि जब-जब परमेश्वर हम पर दया करे तब-तब बिना विलम्ब दौड़ पड़ें। इसके तुरन्त बाद यह आता है कि दाऊद उन सब अन्यायों के होते हुए भी, जो दुष्टों ने उसके साथ किए थे, और उन सब दुःखों और संघर्षों के होते हुए भी, जिनसे उन्होंने उसे सताया और जो उसने सहे, दुष्टता करने की ओर न झुका।
चाहे (वह कहता है) दुष्टों के हाथों ने मुझे लूट लिया है, तौभी मैं तेरी व्यवस्था को नहीं भूला। यह यहाँ बिना कारण नहीं रखा गया है। क्योंकि इसमें हम बहुत-से ऐसे लोग देखेंगे जो जब तक कष्ट न दिए जाएँ और अपनी राह चलने के लिए छोड़ दिए जाएँ तब तक काफी शान्त और संयमी रहते हैं; परन्तु यदि कोई संकट उन पर आ पड़े और वे सताए जाएँ, तो देखो, तब वे दुष्टता करने को प्रवृत्त हो जाते हैं, तब वे अपना निश्चय और अभिप्राय बदल लेते हैं, और अपनी नकल पलट देते हैं। इसलिए, क्योंकि मनुष्य बुराई की ओर खिंचने में इतने सरल हैं, यद्यपि पहले वे उसका अनुसरण करते थे जो भला था: इसलिए हमें इस स्थान को जिसे दाऊद यहाँ जोड़ता है, परिश्रम से ध्यान देना चाहिए। क्योंकि यह मानो उसकी पुष्टि करना है जो उसने वचन के अनुसरण की तत्परता के विषय में कहा था: क्योंकि वह पर्याप्त न होता, यदि वह उसमें इस प्रकार दृढ़ न किया गया होता। क्योंकि यद्यपि शैतान उस पर इतना चढ़ बैठा कि उसे हताश कर दे, तौभी वह निराश न हुआ, वरन् उसके विरुद्ध निरन्तर अपनी ओर से डटे रहने की आशा रखता था।
और हमें भी इस विषय में ऐसा ही करना चाहिए। जब हमारा प्रभु हमें मार्ग पर रखे और हमारे मन में कुछ भली प्रेरणाएँ डाले, तब हम उससे बिनती करें कि वह हमें उसी में ऐसा दृढ़ करे कि जब शैतान हम पर चढ़ाई करने लगे, तो हम उन सब चढ़ाइयों को जिनसे वह हम पर चढ़ाई करेगा, पीछे धकेल सकें और जीत सकें; और सदा अपने निश्चय और अभिप्राय में बिना बदले बने रहें और टिके रहें। देखो, वह बात जो यहाँ हमें बताई गई है।
और हमें यह भी ध्यान देना है कि दो परीक्षाएँ हैं, जिनका हमें विरोध करना है, जब हम सताए और हानि पहुँचाए जाएँ। पहली परीक्षा यह है कि जब हमें हानि पहुँचाई जाती है, तो हम तुरन्त वैसा ही बदला देने को उभर जाते हैं: मैं तुमसे बिनती करता हूँ, हमारे स्वभाव की दशा और स्थिति पर ध्यान दो। अब जबकि परमेश्वर हमें आज्ञा देता है कि जो बुरा है उससे भागें, और जो भला है उसे करें, यहाँ तक कि अपने शत्रुओं से प्रेम रखें, तो हमें पवित्रशास्त्र के इन वचनों से भली-भाँति सज्जित और सुसज्जित होना चाहिए। क्योंकि हम कभी ऐसी किसी परीक्षा या बदले की लालसा को जीतने में समर्थ न होंगे, जब तक परमेश्वर अपना सहायक हाथ न बढ़ाए। हम यह भी उचित समझते हैं कि बुराई करें, जब हम देखते हैं कि हम चारों ओर से बुराई और दुष्टता ही से घिरे हैं; यदि हम संसार की व्यवस्था और शासन को देखें, तो एक मनुष्य व्यभिचार में बढ़ा हुआ दिखाई देगा, दूसरा भयानक निन्दक, कोई उगाही करनेवाला और सूदखोर, और दूसरा छल से सौदा करनेवाला; कोई इस बात में, कोई उस बात में: और बहुत-से परमेश्वर से दूर हो गए हैं और शैतान के निकट पड़ोसी बन गए हैं, जो इधर-उधर बलपूर्वक खींचे जाते हैं। जब हम इस प्रकार बुराई और अधर्म से घिरे होते हैं, तो हम समझते हैं कि हमें दुष्टता करने की छूट ले लेनी चाहिए।
देखो, परमेश्वर के बच्चे कैसे परीक्षा में पड़ सकते हैं, और हम यह भी कैसे देखते हैं कि असंख्य लोग मानो प्रतिदिन धोखा खाते हैं। इसलिए हम यह ध्यान दें कि यदि हम कभी साहसपूर्वक परमेश्वर के पास आने को प्रवृत्त हुए हैं, और उसने कुछ समय के लिए अपना हाथ बढ़ाया कि हम उसके पास आएँ, तौभी यह काफी नहीं: परन्तु इस पर हमें अपने लिए नया बल और साहस इकट्ठा करने का यत्न करना चाहिए, ताकि शैतान हमें हिला न सके, जब वह हमारे विरुद्ध संकट और सताव उठाए, और हमारे मार्गों में बहुत-सी रुकावटें और ठोकर की वस्तुएँ रख दे। इसलिए हमें उसके विरुद्ध सज्जित होना चाहिए, कि चाहे जो हो जाए, हम परमेश्वर की व्यवस्था को न भूलें।
और यहाँ हमें इस परिस्थिति पर ध्यान देना है कि दाऊद यह नहीं कहता कि वह केवल एक मनुष्य से सताया गया, और न दो-तीन से, परन्तु वह कहता है, दुष्टों की मण्डली। जब वह कहता है, सारी मण्डली, तो यह बहुत बड़ी बात है: यदि थोड़े ही लोग होते, तो काफी होता: परन्तु वह कहता है, सारी मण्डली, यह जताते हुए कि वह चारों ओर से घेरा गया था, कि वह भेड़ियों, सिंहों, रीछों और अन्य फाड़नेवाले जंगली पशुओं के बीच एक भेड़ के समान था : और फिर भी इन सब के बावजूद, उसने सदा प्रभु पर भरोसा रखा।
अब यदि हम अपने भीतर भली-भाँति देखें, तो हम कितने थोड़े लोगों को देखेंगे जो उस छोटी-से-छोटी परीक्षा से पराजित नहीं हुए जो उन पर आई? बस एक मनुष्य का हमारे विरुद्ध खड़ा होना चाहिए, और देखो, हम तुरन्त दुष्टता करने को खींच लिए जाते हैं; अब हम नहीं जानते कि यह परमेश्वर की ओर से आता है। संक्षेप में, सबसे छोटी मक्खी जो हमारी आँखों के सामने उड़ती है (जैसा हम कहते हैं) हमें सीधे मार्ग से बिलकुल हटा देने को काफी है। और निश्चय हमें बहुत लज्जित होना चाहिए कि हम इतनी अचानक अपनी नकल पलट देते हैं: जहाँ पहले हम परमेश्वर का अनुसरण करने का बड़ा दिखावा करते थे, और तुरन्त बिलकुल उलटी दिशा में चल पड़ते हैं। और हम समझते हैं कि यह एक अत्यन्त उचित बहाना हो सकता है, जब हम बात को यों सँभाल सकें, कि कहें कि हम किसी परीक्षा के कारण दुष्टता करने को खिंच गए। यह बहाना चलने से तो इतना दूर है कि न माल के काम का है न पैसे के। परन्तु हमें दाऊद के साथ कहना चाहिए, हाँ और सचमुच वैसे ही जैसे उसने किया है, कि जब भी दुष्टों की सारी मण्डली हम पर चढ़ाई करे, हम परमेश्वर की व्यवस्था में बने रहने और टिके रहने से न रुकें। और वह विशेष रूप से कहता है कि उन्होंने उसे लूट लिया है, जो फिर भी मनुष्य पर आनेवाली सबसे कठोर और तीखी बात है, और जो उसे सबसे शीघ्र हिम्मत हारने पर ला सकती है। क्योंकि हो सकता है कि दुष्ट हमें सताने का यत्न करें, और फिर भी अपने उद्यम के अन्त तक न पहुँचें: परन्तु दाऊद कहता है कि वह शिकार के रूप में बाहर डाल दिया गया, कि वह एक दुखिया और निराश्रित प्राणी के समान था, और चारों ओर से उस पर चढ़ाई की गई: तौभी वह परमेश्वर की व्यवस्था को न भूला। और यह कहने में मानो उसने प्रतिज्ञा करके कहा हो कि परमेश्वर की व्यवस्था का अनुसरण करने की उसकी लालसा सदा एक ही और वैसी ही रही।
अब आओ हम उस बात की ओर लौटें जिसे हम पहले छू चुके हैं। क्योंकि यह कोई छोटी परीक्षा नहीं है कि परमेश्वर हमें इस प्रकार सताए जाने, दुःख पाने और पीड़ित होने देता है। जब परमेश्वर शैतान और उसके अनुचरों को यह मार्ग लेने देता है, तो यह मानो हमें एक लाख बार हतोत्साहित कर दे। और सचमुच यह शैतान की चाल है, जैसा हम अय्यूब में देखते हैं। क्योंकि जब शैतान दिखाना चाहता था कि अय्यूब के लिए परमेश्वर की सेवा करना सरल बात है। ओह, वह कहता है, वह तो भली-भाँति स्वतंत्र है और चैन से रहता है, वह धनी है, इसलिए उसके लिए परमेश्वर की स्तुति करना बहुत सरल बात है: परन्तु जब वह वह सब खो देगा जो उसके पास है, अपनी सारी सम्पत्ति, और बहुत-सी परेशानियों और पीड़ाओं से सताया जाएगा, तब हम देखेंगे कि वह परमेश्वर को धन्य कहेगा या नहीं। देखो, तब परमेश्वर हमें कैसे परखता है, जब वह दुष्टों को हमें सताने और दुःख देने देता है, कि वे यहाँ तक पहुँच जाते हैं कि हमारे गले पर ही अपना पाँव रख दें। इससे उसका अर्थ यह है कि हमें परखे कि हम उससे सच्चे मन से प्रेम रखते हैं या नहीं। इसलिए हमें इस शिक्षा पर और भी ध्यान देना चाहिए। क्योंकि हमारे लिए जैसा चाहिए वैसा परमेश्वर की सेवा करना असम्भव है, जब तक हममें यह दृढ़ता न हो जिसकी बात दाऊद यहाँ करता है: अर्थात् कि जब हम किसी भी रीति से पीड़ित हों, तब भी हमें सदा परमेश्वर से प्रार्थना करने से नहीं रुकना चाहिए, ताकि हम अपने आपको पूरी तरह उसे सौंप सकें। देखो, इसका सार और प्रभाव क्या है। और इससे हम सिखाए जाते हैं कि न पीड़ाएँ और न ऐसी कोई और बातें हमें परमेश्वर से प्रार्थना करने से रोकें, ताकि हम सदा उसकी आज्ञाकारिता में चलते रहें। क्योंकि यदि वह हमें अपनी देह में पीड़ित होने देता है, तो इसलिए हमें यह नहीं कहना चाहिए कि हमारे प्रति उसका प्रेम घट गया है, और न यह कि उसे हमारे उद्धार की थोड़ी चिन्ता है: हम केवल प्रतीक्षा करें और देखें कि हमारी पीड़ाओं का अन्त और परिणाम क्या होता है, और इस बीच उसके वचन के अनुसार चलते रहें, और उसकी व्यवस्था को कभी न भूलें, चाहे शैतान हमें उलटी ओर कैसे ही उकसाए। अब इसके तुरन्त बाद आता है,
आधी रात को मैं उठकर तेरा धन्यवाद करूँगा, क्योंकि तेरे नियम धर्ममय हैं। देखो, यहाँ एक उत्कृष्ट प्रतिज्ञा है, जो उस बात से भी जुड़ी है जिसकी चर्चा हम पहली आयत में कर चुके हैं। क्योंकि वहाँ दाऊद प्रतिज्ञा करता है कि हमारा सच्चा और पूर्ण सुख यही है, जब हम अपने आपको परमेश्वर और उसके वचन को सौंप देते हैं।
अब वह यहाँ कहता है कि वह आधी रात को उठकर परमेश्वर का धन्यवाद करता था, उसके धर्ममय नियमों के कारण। मानो उसने कहा हो, हे प्रभु, मैं पहले ही कह चुका हूँ कि मेरा भाग यह है कि तेरा वचन मेरे पास हो, और उस पर मेरा अधिकार हो: जो यदि मेरे पास है, तो मैं धन्य हूँ, और अत्यन्त धन्य हूँ: और अब, हे प्रभु, मुझे ऐसे उपकार और विशेषाधिकार के लिए कृतघ्न न होने दे, जो तूने मुझे दिया है। वह उसके सम्मुख उसके धर्ममय नियमों का भी उल्लेख करता है। हम यहाँ पहले बता चुके हैं कि इन शब्दों का अर्थ क्या है: अर्थात् परमेश्वर की विधियाँ: जो हमें ऐसी खराई से शासित करती हैं कि हमारा जीवन सीधा और खरा हो। तब दाऊद, यह कहते हुए कि वह परमेश्वर की स्तुति उसके धर्ममय नियमों के कारण करता है, यह जताता है कि वह इस बात के लिए उसका धन्यवाद करता है कि उसे उसके वचन में सिखाया गया, इसे एक अनुपम उपकार जानते हुए। अब हमें इस कथन पर ध्यान देना चाहिए। क्योंकि हम देखते हैं कि हमारी कृतघ्नता क्या है, न केवल परमेश्वर के सब उपकारों के लिए, परन्तु मुख्य और प्रधान रूप से इसके लिए कि परमेश्वर ने अपने आपको हम पर अपनी व्यवस्था, भविष्यद्वक्ताओं और सुसमाचार द्वारा ऐसा प्रकट किया है, और फिर भी हम इस सब के विषय में कभी नहीं सोचते: और जो इससे भी बुरा है, कि यद्यपि वह हमारी बुराई को अपनी भलाई से जीतना चाहता है, और अपने आपको हमारे सम्मुख पिता और उद्धारकर्ता के रूप में प्रस्तुत करता है, तौभी हम जहाँ तक हो सके उससे उतनी ही दूर भागते हैं।
यह बहुत सच है कि हम दिखावा करेंगे कि उसे ढूँढ़ते हैं, मानो अपने छुटकारे के लिए, हाँ, और वह तब भी होगा जब हमें इसके लिए विवश किया जाए: परन्तु यदि हम अपनी स्वतंत्रता और चुनाव पर होते, तो जहाँ तक सम्भव होता उतनी दूर ही रहते।
अब जब हम परमेश्वर को इस रीति से ढूँढ़ते हैं, तो यह सीधे उसके पास आने के लिए नहीं, परन्तु केवल यह कहने के लिए होता है,
"देखो, मैं परमेश्वर के प्रति अच्छे भाव रखता हूँ, मैं उनमें से हूँ जो उसे ढूँढ़ते हैं।"
और सचमुच, जब परमेश्वर हमें अपने वचन से अपनी ओर खींचना चाहता है, तो हम ऐसे अनुपम उपकार को पर्याप्त रीति से कैसे समझ सकते हैं? इसलिए इस शिक्षा पर भली-भाँति ध्यान दिया जाए, क्योंकि यह हमारी इतनी नीच दुष्टता और कृतघ्नता को सुधारने और सँवारने के लिए अत्यन्त आवश्यक है: और ताकि हम आगे चलकर परमेश्वर की स्तुति करना सीखें, क्योंकि उसे यह भला लगा कि हमें इस अनमोल निधि का भागी बनाए, अर्थात् उद्धार की शिक्षा का: कि उसका अभिप्राय हमारे जीवन को शासित और व्यवस्थित करना है, ताकि हम भटकी हुई दीन भेड़ों के समान नरक के अथाह गड्ढे में सिर के बल न गिराए जाएँ।
इस कथन में एक उत्कट लालसा भी व्यक्त हुई है, कि दाऊद आधी रात को उठा। मानो उसने कहा हो कि दिन उसके लिए काफी न था, परन्तु अपनी शान्ति के समय में उसने अपना मन स्वर्ग की ओर उठाया कि परमेश्वर का धन्यवाद करे। इसमें वह जताता है कि वह बिना थके परमेश्वर की स्तुति करता रहा।
अब यदि हम दाऊद के उदाहरण का ठीक-ठीक अनुसरण करना चाहते हैं, तो हमें परमेश्वर का धन्यवाद तब नहीं करना चाहिए जब हमें अच्छा लगे, और जब हम पन्द्रह दिन में एक बार, या न जाने कब, उसे स्मरण कर लें: या फिर दिखावे के लिए, जैसे जब घण्टा बजता है तो हम उपदेश सुनने आते हैं। परन्तु यह सदा होना चाहिए, क्योंकि हमें साँझ को, भोर को, और आधी रात को भी, उसका धन्यवाद करने के लिए अपने मन जागते रखने चाहिए।
वह आगे कहता है,
"मैं उन सब का साथी हूँ जो तुझसे डरते और तेरी आज्ञाओं को मानते हैं।"
जिससे वह यह जताता है कि उसने परमेश्वर के भय में चलने के लिए अपने आपको लगाने के सब सम्भव साधन खोजे हैं। यहाँ हमें यह ध्यान देना है कि दाऊद एक उत्कृष्ट मनुष्य था, मरणशील प्राणियों के बीच मानो स्वर्गदूत के समान: फिर भी उसके लिए विश्वासी मनुष्यों की संगति करना आवश्यक था, अर्थात् उत्तम उदाहरणवाले, और जीवन तथा आचरण में शुद्ध और पवित्र मनुष्यों की। और क्यों? इसलिए कि वह अपनी बुलाहट और पद में सदा और भी दृढ़ किया जाए, और बुरे उदाहरण से उससे हटाया न जाए। अब (जैसा मैं पहले कह चुका हूँ) यदि दाऊद को इसकी आवश्यकता थी, तो हमारा क्या होगा, जो अपने सब कामों में इतने अस्थिर और चंचल हैं? तो यह पहली बात है जो हमें इस स्थान में ध्यान देनी है: अर्थात् यह कि दाऊद प्रतिज्ञा करता है कि यद्यपि पवित्र आत्मा ने उसकी सहायता की, और उसने अपने आपको दृढ़ किया हुआ अनुभव किया, जैसा हम देख चुके हैं, तौभी उसने परमेश्वर के भय में बने रहने और थामे रहने के लिए और सहायताएँ खोजीं: अर्थात् वे संगतियाँ जो उसके लिए सबसे उपयुक्त थीं, कि वह अपनी बुलाहट का पालन करे और उससे हट न जाए, क्योंकि ऐसी कोई बात न होनी चाहिए जो हमें सीधे मार्ग से एक ओर खींच ले। अब वह आगे यह भी जताना चाहता है कि उसने अपने आपको परमेश्वर का भय माननेवाले मनुष्यों से जोड़ा, ताकि वह भी जैसा चाहिए वैसा उसकी सेवा करे। क्योंकि हम पर यह दायित्व है कि आपसी उपदेशों और अच्छे उदाहरणों द्वारा एक-दूसरे को उभारें। इसलिए उचित है कि हम ये दो बातें विचार में रखें: पहले, हमें उनका अनुसरण करने का विचार करना है जो हमें सीधे मार्ग में आगे बढ़ा सकें, जो परमेश्वर के भय में हमें अधिकाधिक लाभ पहुँचा सकें; और उसके बाद हमें उन्हें भी लाभ पहुँचाने का परिश्रम करना है जिनके साथ हम इसी प्रकार संगति में होंगे, उन्हें हर सम्भव रीति से उभारते हुए कि वे उस सीधे मार्ग पर चलें जिसमें परमेश्वर ने उन्हें रखा है, ताकि वह एक मन होकर आदर पाए: और हम में से हर एक कह सके, "आओ, चलें, और परिश्रम करें कि औरों को भी अपने साथ चलने को प्रेरित करें, कि हम सब मिलकर अपने प्रभु परमेश्वर का आदर करें।" अब आठवीं आयत का समापन, दूसरी विनती है।
"हे प्रभु, पृथ्वी तेरी दया से परिपूर्ण है; मुझे अपनी विधियाँ सिखा।"
यहाँ हम देखते हैं कि हमारे लिए यह कितनी आवश्यक बात है कि हम सदा परमेश्वर से प्रार्थना करते रहें, उससे बिनती करते हुए कि वह हमें और अधिक सिखाए, ताकि हम उसे पहले से अच्छी रीति से पहचानें: हाँ, और विशेषकर तब, जब हम समझते हैं कि जो कुछ जानने योग्य है वह सब हम जानते हैं, कि हम भली-भाँति विचार करें कि हमें अब भी निरन्तर अधिकाधिक आगे बढ़ने की बड़ी आवश्यकता है। क्योंकि हम में से कौन, मैं तुमसे पूछता हूँ, इतना साहस कर सकता है कि दाऊद से अपनी तुलना करे? देखो, ऐसा उत्कृष्ट भविष्यद्वक्ता, कि वह परमेश्वर के स्वर्गदूत के समान है: हम यह भी देखते हैं कि परमेश्वर ने उस पर अपने भेद कैसे प्रकट किए, मानो वह स्वर्गीय राज्य में उठा लिया गया हो: फिर भी, ऐसे उत्कृष्ट वरदान रखते हुए जैसा हम जानते हैं, वह परमेश्वर की विधियों में सिखाए जाने की इच्छा करता है। और हम में से कौन है जिसे उनकी इससे अधिक आवश्यकता नहीं? इसलिए जब हम परमेश्वर के वचन में बहुत ज्ञानी हों, केवल अपने लिए नहीं परन्तु अपने पड़ोसियों को सिखाने के लिए भी: तब भी हम सन्तुष्ट रहें कि अपने आपको उससे सिखाए जाने को सौंपें, उससे बिनती करें कि वह हमें अपना अनुग्रह दे, कि हम प्रतिदिन अधिकाधिक आगे बढ़ें।
और इसलिए हमें उस कारण पर और अच्छी रीति से ध्यान देना चाहिए, जो दाऊद पहले रखता है, "क्योंकि हे प्रभु, पृथ्वी तेरी दया से परिपूर्ण है।" मानो उसने कहा हो, "हे प्रभु, तू अपनी पितृवत् भलाई सब प्राणियों पर फैलाता है: हम देखते हैं कि तू अपनी दया से मैदान के पशुओं को कैसे खिलाता है, हम पेड़ों को फलते-फूलते देखते हैं, पृथ्वी को अपनी उपज उपजाते देखते हैं, तेरी भलाई स्वर्ग और पृथ्वी में फैली है, तो यह कैसे सम्भव है कि तू अपने बच्चों का भला न करे? मैं उनमें से एक हूँ जो तुझे पुकारते हैं और तुझ पर भरोसा रखते हैं। जबकि तू सब प्राणियों पर इतना प्रेमी और दयालु है, तू मुझे न त्यागेगा।"
यहाँ रखा गया कारण दाऊद के लिए इस बात की पुष्टि का काम करता है कि जो विनती उसने की थी उसे पाने में उसे सन्देह न करना चाहिए। और इसलिए जब-जब हम परमेश्वर से माँगें कि वह हमें अपनी विधियों में सिखाए, तो वह भलाई, जिससे वह अपने सब प्राणियों को ढाँपता है, हमारे लिए वह नींव है जिस पर हम अपनी सब विनतियों को बनाएँ। और जबकि परमेश्वर ने हमें यह अनुग्रह दिया है कि हमें अपने बच्चों की गिनती में स्वीकार करे, और अपने आपको हमारा पिता दिखाए, तो हम निश्चय रखें कि जो कुछ उसने प्रतिज्ञा किया है वह हमें देने से वह इन्कार न करेगा। और इस पवित्र शिक्षा के अनुसार, आओ हम उस प्रताप के सम्मुख दण्डवत् करें, इत्यादि।
